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हमारी बेडि़यां

मेरी बहन के पति की छोटी सी बीमारी के चलते मृत्यु हो गई. बहन की आयु अधिक नहीं थी. पति के अचानक चले जाने पर वे बहुत सहम सी गईं. वे दिनरात रोती रहतीं और अपने खानेपीने व पहननेओढ़ने पर ध्यान न देतीं. उन्होंने अपनेआप को जैसे दुनिया से अलग ही कर लिया, सदा सफेद कपड़े पहनतीं, हारशृंगार का तो प्रश्न ही नहीं उठता था. एक दिन टीवी पर खबर आ रही थी कि एक विधवा महिला को इसलिए पैंशन नहीं मिली क्योंकि फौर्म पर लगी फोटो में उस के माथे पर बिंदी लगी हुई है. इस बात की चर्चा घर में भी होने लगी कि यह क्या दलील है. बिंदी लगाना कोई जुर्म तो नहीं. फोटो पुरानी भी हो सकती है अथवा और भी कोई कारण हो सकता है. ये सब बातें बहन की 13 साल की पोती सुन रही थी, झट से बोली, ‘‘यह तो कोई बात नहीं है. आज बिंदी पर ऐतराज है, सफेद कपड़े पहनने को कहा जाता है. इस तरह तो सतीप्रथा को दोबारा वापस ले आया जाएगा. हमारा समाज फिर से पुरानी प्रथाओं से घिर जाएगा.’’ बहन ने पोती की बातें सुनीं तो उन के मन में उथलपुथल होने लगी.

उसी दिन से उन्होंने अपनेआप को थोड़ा बदला. सफेद कपड़ों के बदले पहले की तरह सादगी से सभी कपड़े पहनने शुरू कर दिए. खुद ही कहने भी लगीं, ‘दुख तो अंदर सदैव ही रहेगा लेकिन इन पुराने रिवाजों को छोड़ना ही पड़ेगा.’ सच है यदि जीवन ठीक रखना है तो सामाजिक बेडि़यों को काटना ही होगा.

कमलेश नागरथ, ग्रेटर कैलाश-2 (न.दि.)

*

जितिया पर्व के दिन जगन्नाथ घाट पर नहाना हमारे यहां अच्छा माना जाता है. हमारे पड़ोस में रहने वाली आंटी अपनी बहू और 10 माह के पोते के साथ वहां गई थीं. घाट पर काफी भीड़ व फिसलन देख उन्होंने अपनी बहू से पोते को ले कर ऊपर ही खड़े रहने को कहा. वे खुद अकेली पानी में उतर कर नहाने लगीं. नहाते वक्त आंटी ने देखा कि 4 हट्टीकट्टी औरतें उन्हें घेर कर पानी में दबाने लगीं. वे डांटते हुए उन्हें कहने लगीं, ‘औरत हो कर वे उन्हें क्यों दबा रही हैं?’ तो सभी औरतें बेशर्मों की तरह हंसने लगीं. आंटी उन की गिरफ्त से छूट कर, थोड़ी दूरी पर जा कर नहाने लगीं. थोड़ी ही देर में जैसे ही उन्होंने अपनी गरदन पर हाथ फिराया तो पाया कि उन की 2 तोले की सोने की चेन गले में नहीं है. मुड़ कर पीछे देखा तो वे चारों औरतें नदारद थीं. यह हमारी बेडि़यों का ही नतीजा था कि न हम वहां जाते और न ही ऐसा होता.

अंजु सिंगड़ोदिया, हावड़ा (प.बं.)

आंसू

बहुत रोका मगर ये कब रुके हैं

ये आंसू तो मेरे तुम पर गए हैं

जो तुम ने मेरी पलकों में रखे थे

वो सपने मुझ को शूल से गड़े हैं

न रांझा है यहां, न हीर कोई

चरित्र ऐसे कथाओं में मिले हैं

जो आने के बहाने ढूंढ़ते थे

वो जाने के बहाने अब गढ़े हैं

हवाएं सावनी जो पढ़ सको तुम

उन्हीं पे आंसुओं ने खत लिखे हैं.

 

          – आलोक यादव

इन्हें भी आजमाइए

  1. आप की शैली को व्यक्त करने में आप का हेयरस्टाइल महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. विभिन्न प्रकार के हेयरस्टाइल करें. जरूरी नहीं केवल बाल कटवा कर ही हेयरस्टाइल बदल सकती हैं. आप अलग तरीके से कंघी कर के, उन्हें बांध कर या कलरिंग से भी नया रूप दे सकती हैं. बस, ध्यान रखें कि यह अजीब न दिखे.
  2. सोने से पहले कोई हर्बल टी पिएं, जैसे ग्रीन टी, नीबू टी या कैमोमाइल टी. इन को पीने से बौडी में ताजगी आती है और नींद भी अच्छी आती है. इस प्रकार की चाय में नींद को भगाने वाले तत्त्व नहीं होते हैं.
  3. ब्लीच का इस्तेमाल आप अनचाही घास को हटाने के लिए भी कर सकते हैं. इस के लिए आप को ब्लीच को घास की जड़ों में पाउडर रूप में ही डालना है, जड़ें अपनेआप कट जाती हैं और घास सूख जाती है.
  4. दीवार में पड़ी दरार को छिपाने के लिए आप चाहें तो बैंबू ब्लाइंड्स से अपने घर को और भी खूबसूरती से सजा सकती हैं. बस, खयाल रखें, ब्लाइंड उस दीवार से मैच करनी चाहिए.
  5. औफिस के ट्रैंडी लुक के लिए इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप का औफिस यूनिफौर्म कितना फीका है. यदि आप एक स्टाइलिश डिजाइनर बैग चुन सकते हैं तो भी आप अलग और आकर्षक दिख सकते हैं.

महायोग : 14वीं किस्त

अब तक की कथा :

पुलिस ईश्वरानंद के आश्रम में दबिश दे चुकी थी और आश्रम के अंदर जाने का प्रयास कर रही थी. इधर नील और उस की मां को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें. अब तक तो अंधेरा ही था, अब तो सामने गहरी खाई दिखाई दे रही थी. मां के कारण उस ने दिया को हाथ तक न लगाया और अब नैन्सी भी उस के हाथों से फिसल रही थी. अब आगे…

अचानक दिया आगे बढ़ आई और उस ने सुनहरी पेंटिंग पर लगे हुए बड़े से सुनहरी बटन को दबा दिया. बटन दबाते ही दीवार में बना गुप्त दरवाजा खुल गया. सब की दृष्टि उस गलियारे में पड़ी जो फानूसों से जगमग कर रहा था. ब्रिटिश महिला पुलिस औफिसर एनी गलियारे की ओर बढ़ीं और उन्होंने सब को अपने पीछे आने का इशारा किया. गैलरी पार कर के सब लोग अब एक आलीशान दरवाजे के पास पहुंच गए थे जहां अंदर अब भी रासलीला चल रही थी. यहां भी दिया ने आगे बढ़ कर दरवाजे के खुलने का राज जाहिर कर दिया. दरवाजा क्या खुला, कई जोड़ी आंखें फटी की फटी रह गईं. सबकुछ इतना अविश्वसनीय था कि लोग अपनी पलकें झपकाना तक भूल गए थे.

अपनी अर्धनग्न चहेती शिष्याओं के साथ सामने के बड़े से मंच पर लगभग नग्नावस्था में विराजमान ईश्वरानंद का फूलों, केसर व चंदन से शृंगार किया जा रहा था. सुंदरियां उस के अंग को कोमलता से स्पर्श करतीं, चूमतीं और फिर उसे फूलों से सजाने लगतीं. सब इस कार्यक्रम में इतने लीन थे कि किसी को हौल में पुलिस के पहुंचने का आभास तक न हुआ. सैक्स का ऐसा रंगीला नाटक देख पुलिस भी हतप्रभ थी. इंस्पैक्टर ने साथ आए हुए फोटोग्राफर को इशारा किया और उस का मूवी कैमरा मिनटभर की देरी किए बिना वहां पर घटित क्रियाकलापों पर घूमने लगा.

ब्रिटिश पुलिस के लिए यह सब बहुत आश्चर्यजनक था. इत्र का छिड़काव जैसे ही दिया के नथुनों में पहुंचा उस को छींक आनी शुरू हो गईं. दिया को बचपन से ही स्ट्रौंग सुगंध से एलर्जी थी. छींकतेछींकते दिया बेहाल होने लगी. ईश्वरानंद की लीला में जबरदस्त विघ्न पड़ गया. यह कैसा अन्याय, सब का ध्यान भंग हुआ और उन्होंने पीछे मुड़मुड़ कर देखना शुरू किया. जैसे ही उन की दृष्टि पुलिस वालों पर पड़ी, अब तो मानो वे ततैयों की लपेट में आ गए. ईश्वरानंद अधोवस्त्र संभालता हुआ स्टेज से भागने का प्रयास कर रहा था. जैसे ही ईश्वरानंद ने सीढि़यों से उतरने को कदम बढ़ाया वैसे ही इंस्पैक्टर ने उसे धरदबोचा.

‘‘क्यों, हमें क्यों डिस्टर्ब किया जा रहा है?’’ ईश्वरानंद ने इंस्पैक्टर की बलिष्ठ भुजाओं में से सरकने का प्रयास करते हुए हेकड़ी दिखाने की चेष्टा की.

किसी ने उस की बेवकूफी का उत्तर नहीं दिया. पुलिस अपनी ड्यूटी करती रही. चेलेचांटों सहित उसे एक कतार में खड़ा कर दिया गया. पुलिस के जवान आश्रम के प्रत्येक कमरे में घुस कर तलाशी लेने लगे. सभी संदिग्ध वस्तुओं को जब्त कर लिया गया. बहुत से भारतीय सुरक्षा से जुड़े कागजात, जाली प्रमाणपत्र, जाली पासपोर्ट…और भी दूसरी अवैध चीजें, बिना लाइसैंस की गन्स, और न जाने क्याक्या बरामद कर लिया गया. एक कमरे में से धीमीधीमी सिसकने की आवाजें सुन कर दरवाजा तोड़ डाला गया और उस में से नशे से की गई बद्तर हालत में 3 लड़कियों को निकाला गया जो जिंदा लाश की तरह थीं. उन का कटाफटा शरीर, उन के मुंह पर लगे टेप, आंखों में भय व घबराहट सबकुछ दरिंदगी की कहानी बयान कर रहे थे. दिया ने उन्हें देखा तो घबराहट के कारण उस के मुख से चीख निकल गई. अगर वह फंस गई होती तो आज उस की भी यही दशा होती.

पुलिस गुरुचेलों को गाड़ी में ठूंस कर पुलिस स्टेशन ले गई. दिया दूसरी गाड़ी में उन 3 लड़कियों के साथ बैठ कर पुलिस स्टेशन पहुंची थी. लड़कियों के मुंह पर से टेप हटा दी गई थी परंतु वे कुछ कहनेसुनने की हालत में थीं ही नहीं. ईश्वरानंद, उस के चेलेचेलियां, नील व उस की मां से कोई बात नहीं की गई. उन को यह बता कर मुख्य जेल में भेज दिया गया कि उन का फैसला कोर्ट करेगी. नैन्सी से थोड़ीबहुत पूछताछ की गई और यह कह कर उसे फिलहाल रिहा कर दिया गया था कि जरूरत पड़ने पर उसे कोर्ट या पुलिस के समक्ष हाजिर होना पड़ेगा. धर्म के बारे में दिया से मौखिक व लिखित बयान ले लिए गए थे. एनी ने पहले ही दिया से खुल कर सबकुछ पूछ ही लिया था.

अब दिया को इंडियन एंबैसी ले जाने का समय था.

‘‘कैन आय टौक टू धर्म, प्लीज,’’ दिया ने पुलिस से आग्रह किया.

धर्म को उस के सामने ले आया गया.

‘‘तुम इंडिया चली जाओगी शायद 2-4 दिन में ही?’’

‘‘हूं.’’

‘‘मुझे अपनी सजा भुगतनी है.’’

‘‘हूं.’’

‘‘कुछ तो बोलो, दिया.’’

वातावरण में पसरे मौन में दिया व धर्म की सांसें छटपटाने लगीं. आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे. यह कैसा मिलन था? मौन ही उन की जबान बन कर भावनाओं, संवेदनाओं को एकदूसरे के दिलों तक पहुंचा रहा था.

धर्म ने दिया के गालों पर फिसलते आंसुओं को अपनी हथेली में समेट लिया. उसे गले लगाते हुए बोला, ‘‘अपनी गलतियों की सजा पा कर ही मैं भारमुक्त हो सकूंगा, दिया.’’

दिया की आंखें एक बार फिर गंगाजमुना हो आईं.

‘‘नहीं, रोते नहीं, दिया. तुम इंडिया लौट कर जाओगी, मेरी प्रतीक्षा करोगी?’’ 

दिया चुपचाप उसे देखे जा रही थी.

‘‘मैं जल्दी ही आऊंगा, दिया.’’

‘‘मैं प्रतीक्षा करूंगी.’’

दिया भी इंडियन एंबैसी के लिए निकल पड़ी. 3 दिन तक उसे वहां रखा गया और चौथे दिन उस की फ्लाइट थी. हीथ्रो हवाई अड्डे से सीधे अहमदाबाद की. इधर ईश्वरानंद के परमानंद आश्रम की धज्जियां उड़ गई थीं. देखते ही देखते परमानंद आश्रम के परम आनंद की खबर ब्रेकिंग न्यूज बन कर विश्वभर में फैल गई. लैंड करने के बाद दिया को हवाई अड्डे से निकलने में अधिक समय नहीं लगा. उस ने एंबैसी के अफसर को मना कर दिया था कि कृपया उस के घर पहुंचने की सूचना घर वालों को न भेजें. बाहर निकल कर वह टैक्सी में जा बैठी. भरपूर गरमी, सड़क पर दौड़ती गाडि़यां. दिया ने अपने बंगले की ओर जाने वाली सड़क ड्राइवर को बताई और कुछ ही मिनट में गाड़ी घर के बडे़ से गेट पर थी.

सुबह लगभग 9 बजे का समय. बंगले का गार्ड बगीचे में पानी देते हुए माली से बातें कर रहा था. अचानक उस की दृष्टि दिया पर पड़ी.

‘‘दिया बेबी?’’ वह चौंका. माली की दृष्टि भी ऊपर उठी.

‘‘हां, दिया बेबी ही तो हैं,’’ उस ने गार्ड की बात दोहराई.

गार्ड ने दीनू को आवाज दी, वह बरामदे में भागता आया और तुरंत मुसकराते हुए अंदर की ओर भागा. आश्चर्य और घबराहट से भर कर सभी लोग बरामदे तक भागे आए. यशेंदु भी अपनी व्हीलचेयर पर सब के पीछे तेजी से कुरसी के पहियों को चलाते हुए पहुंचे, दादी भी अपनेआप को धकेलती हुई मंदिर से बरामदे तक न जाने कैसे अपने भगवानज को छोड़ कर आ पहुंची थीं. सब से पीछे कामिनी थी जो शायद कालेज जाने की तैयारी छोड़ कर पति के पीछेपीछे तेजी से आ रही थी. दादी ने सब से आगे बढ़ कर दिया को अपने निर्बल बाहुपाश में जकड़ लिया. उस ने कोई प्रतिकार नहीं किया. स्वयं को दादी की निर्बल बांहों में ढीला छोड़ दिया. कुरसी पर बैठे एक टांगविहीन पापा को और उन के पीछे खड़ी मां की गंगाजमुनी आंखों को देख कर उस की आंखों का स्रोत फिर बहने लगा. दिया के मन में एक टीस सी उठी. वह दादी के गले से हट कर पापा के गले से चिपट गई और हिचकियां भर कर रोने लगी. काफी देर दिया पिता के गले से चिपकी रही. कामिनी ने धीरे से उस के सिर पर हाथ फेरा तो वह पिता से हट कर मां से जा चिपटी. कामिनी ने कुछ नहीं कहा और सहारा दे कर उसे अंदर की ओर ले आई.

दिया सब की आंखों में प्रश्नचिह्नों का सैलाब साफसाफ देख पा रही थी परंतु उत्तर देने वाले की मनोस्थिति देखते हुए सब को अपने भीतर ही प्रश्नों को रोक लेना पड़ा. दादी के मन में तो उत्सुकता, उत्कंठा और उत्साह कलाबाजियां खा रहे थे. दादी जल्दी से कुरसी खिसका कर उस के पास बैठ गईं.

‘‘दिया, नील और तेरी सास तो मजे में हैं न?’’

दादी चाहती थीं कि दिया ससुराल की सारी बातें बताए. आखिर उन की लाड़ली पोती कितने दिनों बाद विदेश से वापस आई थी. छुटकारा न होते देख दिया ने दादी की बात के लिए हां कहा और फिर बोली, ‘‘मां, मैं अपने कमरे में जाना चाहती हूं,’’ कह कर वह ऊपर अपने कमरे में आ गई.

दीनू कई बार ऊपर बुलाने आया परंतु दिया का मन बिस्तर से उठने का नहीं हुआ. नीचे सब की आंखों में प्रश्न भरे पड़े थे. दादीमां बड़ी बेचैन थीं, दिया से ढेर सी बातें करना चाहती थीं. कामिनी ने नीचे आ कर सब को समझाने की चेष्टा की.

‘‘अभी बहुत थकी हुई है. आराम कर के फ्रैश हो जाएगी तो अपनेआप नीचे आ जाएगी.’’

-क्रमश:

जीवन की मुसकान

मैं और मेरे पति रायबरेली से बड़ी बेटी की ससुराल अपनी गाड़ी से जा रहे थे. बेटी के बच्चे हमारे साथ थे. रास्ते में उन को भूख लगने पर हम ने सड़क के किनारे एक अच्छे रैस्टोरैंट के पास गाड़ी रोक ली. खाने का और्डर दे दिया. बच्चों ने लैमन सोडा पीने की फरमाइश की. खाना लाने वाले लड़के को 2 लैमन सोडा लाने को कह दिया. खाना मेज पर लग गया. ‘‘लैमन सोडा भी ले आओ,’’ हम ने कहा था.

‘‘जी साहब,’’ उस ने तुरंत एक प्लेट में 2 नीबू और कटोरी में खाने वाला सोडा दिखाते हुए कहा, ‘‘साहब, यह रहा लैमन सोडा.’’ यह देख कर हम खिलखिला कर हंस पड़े. बेचारा लड़का कुछ न समझ पाया.

कैलाश, गाजियाबाद (उ.प्र.)

*

बचपन में मैं और मेरा भाई एकसाथ स्कूल जाते थे. मैं कक्षा दूसरी में व भाई पहली कक्षा में पढ़ता था. हम रिकशा से आतेजाते थे. एक दिन हमारी छुट्टी हुई तो किसी बात पर मेरा व भाई का झगड़ा हो गया. हम लड़ते हुए इधरउधर हो गए. भाई तो सही रास्ते निकल गया लेकिन मैं दूसरी गली में चली गई. मैं काफी घबराई हुई थी. एक बुजुर्ग वहां से गुजर रहे थे. उन्होंने मुझे देखा तो मुझ से पूछा, ‘‘क्या बात है?’’ मैं ने उन्हें सबकुछ बता दिया. उन्होंने कहा, ‘‘आओ बेटी, मेरे साथ. तुम्हें सही रास्ता दिखा देता हूं.’’ यह अच्छा था कि रिकशा वाला इंतजार कर रहा था. भाई भी बैठा था. रिकशा वाले ने बताया कि यह बहुत घबरा रहा था कि मेरी बहन पता नहीं कहां रह गई, उसे आ जाने दो. फिर हम दोनों भाईबहन खुश हो कर झगड़े को भुला कर बड़े प्यार से मिले.     

काशी चौहान, कोटा (राज.)

*

मैं पति के साथ इंदौरपुणे ऐक्सप्रैस ट्रेन से पुणे जा रही थी. ट्रेन बड़ौदा स्टेशन पर पहुंची. यहां 20 मिनट का हाल्ट था. मैं और मेरे पति ट्रेन से उतर कर प्लेटफौर्म पर अपने रिश्तेदार का इंतजार कर रहे थे. वे आ भी गए. हम उन से बात करने में मशगूल थे कि अचानक देखा, ट्रेन चलने लगी. मेरे पति दौड़ कर चलती ट्रेन में चढ़ गए परंतु मैं नहीं चढ़ सकी. मेरे रिश्तेदार ने कहा कि चलो, घर चलो, अगले दिन चली जाना. मैं रिश्तेदार के साथ कुछ देर प्लेटफौर्म पर इस आशा के साथ कि ट्रेन चेनपुलिंग से रुकेगी, रुकी रही. अचानक दूसरे ट्रैक पर एक ट्रेन आ कर रुकी. उस ट्रेन के गार्ड ने मुझे देखा और बोला,  ‘‘मैडम, आप को पुणे जाना है, इस ट्रेन में बैठ जाओ. मुंबई में आप की ट्रेन आएगी.’’ मैं उस ट्रेन में बैठ कर मुंबई पहुंच गई. 10 मिनट के बाद उसी ट्रैक पर मुझे इंदौरपुणे ट्रेन मिल गई और मैं पति के साथ पुणे पहुंच गई. 

राजमती जैन, उज्जैन (म.प्र.)

रजनी यौवन की

रजनी यौवन की आती है

जब उन रातों में

शर्मोहया सब फना हो जाती

उन की बांहों में

दिल से दिल की बातें होती हैं

धड़कनें महसूस होती हैं

जब उन की बांहों में

अंतर्मन खो जाता है

उन राहों में

चादर की सलवटें बयां करती हैं

उन करवटों को

जो हम ने ली संग तुम्हारे

कुछ भी न बचा बिन तुम्हारे

जीवन में हमारे

हर क्षण डूबी रहती हूं

उन यादों में

तन्हातन्हा सिमटी रहती हूं

उन चाहों में

कसकता है मन बिन तुम्हारे

आ के जीवन में भर दो चांदसितारे.

 

         – शीला बर्नवाल

अमेरिकी शिक्षा : बहुमुखी विकास

अमेरिका आने पर स्वाभाविक था कि हम प्रवासी भारतीयों के पड़ोस में ही घर ढूंढ़ते किंतु घनिष्ठ मित्रों व हितैषियों ने समझाया कि अमेरिकी जीवन की मुख्यधारा में समावेश के लिए मध्यवर्गीय अमेरिकी पड़ोस श्रेयस्कर होगा. एक उदार हृदय अमेरिकी पड़ोसी परिवार ने जैसे हमें गोद ही ले लिया. पगपग पर उन की सहायता और अमूल्य सलाह के बल पर हम यहां की मुख्यधारा में समाहित होने के साथसाथ अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखने में सफल हुए हैं. इस परिवार के रहनसहन को समझ कर हमारे दिमाग के कुछ बंद रोशनदान भी खुले हैं. सधीबंधी सोच से बाहर संभावनाओं में आस्था जगी है.

उच्च शिक्षित मध्यवर्गीय पड़ोसी दंपती किफायतशारी के कायल हैं किंतु आवश्यकताओं के लिए कतई कोताही नहीं. संतान की उच्च शिक्षा के पूरे खर्च के लिए चैक लिखने को सदैव व सहर्ष तत्पर. बेटियां भी उन्हीं का खून. 12 वर्ष की आयु से बेबी सिटिंग और 16 वर्ष की आयु से अन्य पार्टटाइम जौब्स कर के अपने एजुकेशन बेनेफिट फंड में पैसे जमा करने लगी थीं. एक बेटी अपने बलबूते पर अकाउंटिंग में डिगरी ले कर बैंक में लोन औफिसर है और बिजनैस ला में मास्टर्स कर रही है. दूसरी बेटी को नर्सिंग में बैचलर्स डिगरी के लिए स्कौलरशिप मिली और 5 वर्ष तक औपरेटिंग रूम में अनुभव के बाद मास्टर्स के लिए फैलोशिप. वह पीएचडी कर के नर्सिंग कालेज में प्रोफैसर बनना चाहती है. सिर्फ बड़ी बेटी पेनी अपने कैरियर पथ पर फोकस करने में तनिक ढीली रही. कैलिग्राफी (खुशखत लिखाई) में वह बालपन से बहुत अच्छी थी. हालांकि स्कूलों में बच्चों की लिखावट पर बहुत जोर नहीं दिया जाता. वर्डप्रोसैसर जिंदाबाद, हाथ से कुछ भी लिखने की जरूरत धीरेधीरे कम होती जाती है.

पेनी और मझली बेटी की आयु के बीच 5 वर्ष का अंतराल है. घर और बच्चे संभालने में वह मां का दाहिना हाथ बनी. किचन में खुशीखुशी काम करवाती. हर हफ्ते केक या पाई बनवातेबनवाते मां से आगे निकल गई. 4 वर्ष के लिए आर्ट्स कालेज जाने का निर्णय किया तो पिता ने तुरंत चैक लिख डाला. 1 साल में ही पेनी का मन बदल गया और उस ने अकाउंटिंग में दाखिला ले लिया. जिस नामी ग्रोसरी स्टोर चेन में पहले उस ने कुछ वर्ष पार्टटाइम काम किया था उस में स्थायी पोजिशन मिल गई. मार्क से प्यार हुआ और शादी के बाद प्रेमी पति और उस के दोस्त की ‘स्टार्ट अप’ कंस्ट्रक्शन कंपनी में साथ देने के खयाल से पेनी ने इलैक्ट्रीशियन का सर्टिफिकेशन कोर्स पूरा कर डाला.

समय का पूरा सदुपयोग

बच्चे हुए तो फ्लेक्सिबल वर्क आवर्स वाली नौकरी की जरूरत पड़ी. जानेपहचाने ग्रोसरी स्टोर में नाइट शिफ्ट के लिए सीनियर बेकर की पोजिशन निकली तो उस ने वह नौकरी कर ली ताकि वह दिन में घर और बच्चों की देखभाल कर सके और रात में निश्ंिचत हो कर उन्हें पति के पास छोड़े. अच्छा वेतन, नियमित बोनस, स्टौक औप्शंस, हैल्थ इंश्योरैंस, सवैतनिक छुट्टियां, मैटरनिटी लीव आदि. सब से बढ़ कर वहां बेकिंग और केक्स व टार्ट्स पर उस के कलात्मक डैकोरेशन में उस के शौक की कद्र. और क्या चाहिए उसे?शनिवार, रविवार के बजाय मार्क के  व्यस्ततम दिन, सोमवार और शुक्रवार को पेनी औफ लेती है. सोमवार को मार्क देर से घर आ पाता है और शुक्रवार को वह अकसर जबरदस्ती उसे दोस्तों के साथ ‘बौयज नाइट आउट’ मनाने के लिए भेज देती  है. महीने, 2 महीने में एक शुक्रवार को सखियों के साथ वह ‘गर्ल्स नाइट आउट’ मनाती है. बाकी शुक्रवार को वे दोनों कहीं डिनर, डांस, कोई कौन्सर्ट या मूवी या दोस्त कपल्स के साथ बौलिंग ऐली में मौजमस्ती. बच्चे बेबी सिटर के सुपुर्द.

आर्ट के बाद पेनी का दूसरा चाव है फोटोग्राफी, जिस में वह सिद्धहस्त है. उस की कई प्रविष्टियां नैशनल जियोग्राफिक में स्थान पा चुकी हैं. वह फूड स्टाइलिस्ट भी है और चतुराई से हर डिश का मेकअप कर के उस की ऐसी फोटो खींचती है जो जीभ पर स्वाद जगा दे. पेनी की अवार्डविनिंग बेकिंग रैसिपीज और फूड फोटोज जानीमानी पत्रिकाओं में छपती रहती हैं. उस के हितैषी बारबार इस बात पर जोर देते हैं कि वह अपनी रैसिपीज का सचित्र कलैक्शन पब्लिश करे. रात के 10 बजे से सुबह 4, साढ़े 4 बजे तक काम करती है वह. नाइट शिफ्ट में काम के घंटों में रियायत मिलती है, 8 की जगह 6, लेकिन वेतन पूरे 8 घंटों का. गाहेबगाहे ओवरटाइम करना पड़े तो पेनी मना नहीं करती क्योंकि छोटे बच्चों के साथ पता नहीं कब ऐक्स्ट्रा आवर्स के बदले छुट्टी की जरूरत पड़ जाए. घर लौटते ही वह सो जाती है और सुबह के काम मार्क के जिम्मे, बच्चों को उठाना, तैयार करना, खिलापिला कर स्कूल और ‘डे केयर’ में छोड़ते हुए अपने काम पर निकल जाना. पेनी 11, साढ़े 11 बजे तक उठ कर नहातीधोती है और खापी कर शाम का डिनर बनाने के साथसाथ घर सुव्यवस्थित करती है. छोटे बच्चों का साथ है तो लौंड्री का काम भी लगभग रोज ही निकल आता है. बाजार का कोई छोटामोटा काम हुआ तो उसे करते हुए बच्चों को घर लाती है.

दूध, नाश्ता दे कर उन का होमवर्क करवाती है और नजदीक पार्क में उन्हें खेलने के लिए, कभी स्केटिंग के लिए ले जाती है. मार्क के घर लौटने से पहले वह मेज सजाती है, सलाद बनाती है और 6 बजे उस के आते ही सब डिनर के लिए बैठ जाते हैं. खाने के बाद बच्चे डैड के साथ मस्ती करते हैं, तब तक वह किचन समेटती है और अगले दिन के लिए मार्क का लंच बौक्स जमा कर फ्रिज में रख देती है. यदि बच्चे कहते हैं कि वे भी अगले दिन स्कूल में मिलने वाले हौट लंच के बजाय घर से सैंडविच, स्नैक्स व फल ले जाएंगे और स्कूल में सिर्फ जूस या दूध लेंगे तो वह उन के लंच बौक्स भी तैयार कर देती है. जब तक वह थोड़ा सुस्ताती है तब तक मार्क बच्चों को नहलाधुला कर बिस्तर के लिए तैयार करता है और उन की मनपसंद कहानी सुना कर उन के कमरे की लाइट औफ कर देता है. पतिपत्नी थोड़ा समय साथसाथ गुजारते हैं या कोई जरूरी काम हुआ तो मार्क झटपट कर आता है. नहाधो कर अखबार और जरूरी कागजपत्तर देखता है. सवा 9, साढ़े 9 बजे तक पेनी घर से निकल लेती है और मार्क कंप्यूटर पर जरूरी काम निबटा कर बच्चों के कमरे में झांकते हुए सोने चला जाता है.

सप्ताह की दिनचर्या अत्यधिक व्यस्त तो वीकेंड भी खासे व्यस्त होते हैं. सुबह तनिक देर से उठें सही, लेकिन ताजा नाश्ता आराम से कर के बच्चे दोस्तों के साथ मस्त और पति, पत्नी घर के रखरखाव के बड़े काम में जुट जाते हैं. घर की सफाई, कोई जरूरी ठोकापीटी या पेंटिंग, लौन केयर, बागबानी. अपना कोई प्रोजैक्ट या मित्र व संबंधियों के किसी प्रोजैक्ट में सहयोग. मिलनामिलाना, पार्टी या पिकनिक. लंबे वीकेंड पर बच्चों को किसी सुरम्य स्थान पर घुमा लाना. स्वयं अपने जीवन में भी रोमांस ताजा रखने के लिए छोटीमोटी रोमैंटिक वैकेशन. पति, पत्नी को ‘क्वालिटी टाइम’ देने के लिए बच्चों को बाबा, दादी, नाना, नानी या आंटीज सदा तत्पर बेबी सिटर्स. पति, पत्नी भी जिस प्रकार बन पड़े उन लोगों के लिए बहुतकुछ करने को तैयार. उन के घरों में छोटीबड़ी मरम्मत, उन के लिए किसी खास शो की टिकटें, उन की अकाउंटिंग और टैक्स प्रेपरेशन आदि.

सफल ब्लू कौलर जौब

ग्रोसरी स्टोर की मिल्कीयत बदले भी तो तजरबेकार सीनियर स्टाफ मैंबर होने के नाते पेनी की नौकरी लगभग सुरक्षित है. बहनें ‘व्हाइट कौलर’ जौब्स में और वह ‘ब्लू कौलर’ श्रेणी में. लेकिन बहनों की ही तरह सफल और महत्त्वाकांक्षी. आर्टिस्ट, फोटोग्राफर, फूड स्टाइलिस्ट, अकाउंटेंट, इलैक्ट्रीशियन, प्राइज विनिंग बेकर/डैकोरेटर पेनी इन में से किसी भी क्षेत्र में आराम से पैर जमा सकती है. बड़ी बात नहीं, जो वह मार्क के साथ अपनी ‘क्राफ्ट बेकरी’ खोले या बढ़ती जाती ग्रोसरी स्टोर चेन में से एक स्टोर की फ्रैंचाइजी ही ले डाले.

यह भी खूब रही

दिल्ली में चुनाव होने वाले थे. सभी पार्टियों वाले कालोनी में अपनीअपनी पार्टी का प्रचार करने आ रहे थे. भाजपा वाले भी आए. मैं और मेरे पति बाहर बालकनी में खड़े थे. उन लोगों ने हम से भी भाजपा को वोट देने को कहा और अपना हाथ हिलाया. अनायास मेरे मुख से धीरे से निकला, ‘‘करते हैं प्रचार भाजपा का, दर्शाते हैं हाथ कांगे्रस का.’’ पास खड़े मेरे पतिदेव मुसकरा दिए और बोले, ‘‘यह भी खूब रही.’’

अरुणा रस्तोगी, मोतियाखान (न.दि.)

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एक बार मैं नई दिल्ली से भोपाल शताब्दी ऐक्सप्रैस ट्रेन से यात्रा कर रहा था. मेरी सीट एसी बोगी में विंडो की तरफ की थी. मैं जब अपनी सीट पर पहुंचा तो वहां अधेड़ उम्र के, सूटटाई पहने एक व्यक्ति पहले से बैठे थे.

मैं ने उन से कहा, ‘‘मैं अपनी सीट पर बैठ जाऊं,’’ उन्होंने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मैं ने कोई अनावश्यक प्रश्न कर दिया हो. फिर उन्होंने मुझ से इशारे से कहा, ‘‘यहां बैठ जाओ.’’

मैं बिना विवाद और कुछ बोले अपने मन में समझौता कर उन के पास वाली सीट पर बैठ गया. ट्रेन रवाना हो गई थी. अकसर ऐसा देखा गया है कि रेलयात्री रेल में अपने झूठे अहंकार के साथ यात्रा करते हैं. विशेषकर एसी कोच में वे सामान्य नहीं रहते. वे अखबार पढ़ने लगे. मेरे से रहा नहीं गया. मैं ने आग्रह किया, ‘‘आप की सीट के ऊपर जो सामान रखा है वह आप ने ठीक से नहीं रखा है. जरा उसे संभाल कर रख लें, वह गिर सकता है.’’ उन्होंने मेरी ओर, और फिर सामान की ओर देखा और हाथ हिला दिया. मतलब था, सब ठीक है. गाड़ी ने जैसे ही स्पीड पकड़ी, सामान उन महाशय के सिर पर गिर गया. अब उन महाशय की शक्ल देखने लायक थी.

सरन बिहारी माथुर, दुर्गापुर (प.बं.)

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मेरे पति का फ्रैंड सर्किल बहुत बड़ा है, इसलिए हमें आएदिन खाने के निमंत्रण आते रहते हैं. न चाहते हुए कई जगह जाना पड़ता है और कई बार केवल शगुन देने की रस्म अदायगी के लिए ही जाना पड़ता है. हमारे अड़ोसीपड़ोसी कहते हैं कि शर्माजी, आप खाना खाने के लिए बहुत जाते हैं, क्या बात है हमारे यहां तो इतने निमंत्रण नहीं आते. मेरे पति ने खीझ कर कहा कि नहीं, मैं निमंत्रण में नहीं जाता. मेरे पास कई मैरिज गार्डन के ग्रीन कार्ड हैं. जब भी वहां कोई कार्यक्रम होता है, वहां से मेरे पास फोन आ जाता है. पड़ोसी इस बात पर हंसे बिन नहीं रह सके.          

आशा शर्मा, बूंदी (राज.)

स्वस्थ जिंदगी मस्त जिंदगी

स्वस्थ जिंदगी जीने के लिए लगभग हर व्यक्ति के लिए व्यायाम करना जरूरी है. ‘मेरी जिम जाने की चाहत है लेकिन क्या करूं, समय ही नहीं मिलता.’ यह बात आमतौर पर सुनने में आती है. लेकिन अपने शरीर की सुडौलता बरकरार रखने के साथ जिंदगीभर स्वस्थ रहने के लिए अपनी व्यस्त जीवनशैली से थोड़ा समय अपने लिए अवश्य निकालें.

आज महिला को कैरियर, घरगृहस्थी, प्रसव, प्रसूति, बच्चों को पढ़ाने के अलावा सामाजिक जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं. इन सब के लिए उस का स्वस्थ रहना बहुत जरूरी है और स्वस्थ रहने के लिए पौष्टिक खानपान के साथ व्यायाम यानी ऐक्सरसाइज करना जरूरी है.

हर पुरुष व महिला के स्वास्थ्य, जीवनपद्धति, काम, व्यवसाय, उम्र आदि चीजों को ध्यान में रख कर ऐक्सरसाइज की रूपरेखा तय करनी होती है. किसी एक को बताई गई ऐक्सरसाइज, दूसरे को भी सूट करेगी, ऐसा जरूरी नहीं है. रनिंग, वेट ट्रेनिंग, स्विमिंग, कोई खेल खेलने, डांस करने में से कोई भी प्रकार हमें जिंदगीभर के लिए स्वस्थ रख सकता है. व्यायाम करते वक्त ये चीजें ध्यान में रखनी चाहिए.

हृदय व फेफड़ों की क्षमता : हमारे स्नायु और पेशी की मांग के अनुसार पोषणमूल्य व प्राणवायु मुहैया करने का काम हृदय और फेफड़े करते हैं. जैसे दौड़ते वक्त आप के पांव तक खून पहुंचना चाहिए, प्राणवायु पूर्ति होनी चाहिए, स्नायु का काम बढ़ने से निर्माण हुए लैक्टिक एसिड की आपूर्ति भी होनी चाहिए.

स्नायु की ताकत : स्नायु या स्नायु के समूह के एक ही झटके से लगाया हुआ जोर यानी स्नायु की ताकत.

स्नायु की क्षमता : वेट ट्रेनिंग करते वक्त यह क्षमता बढ़ती है.

लचीलापन : जोड़ की ज्यादा से ज्यादा घूमने की क्षमता. बौडी को खिंचाव देने वाले व्यायाम में लचीलापन जरूरी होता है.

शरीर की संरचना : पूरे शरीर के वजन में वसा का वजन कितना है यह देखा जाता है, महिला में यह 25 प्रतिशत या उस से कम होना चाहिए और पुरुषों में वह 15-25 प्रतिशत से कम होना चाहिए.इन में से 4 चीजों में अगर आप महारत हासिल करते हैं तो शरीर की संरचना सुधरती है. इस से ताजगी महसूस होती है और शरीर की संतुलन क्षमता बढ़ने से आप का बाह्य रूप निखरता है व मन शांत रहता है.

व्यायाम के 5 तत्त्व

शरीर का खिंचाव बढ़ाना : सभी व्यायाम के तत्त्वों का यह प्रमुख तत्त्व है. व्यायाम करते वक्त हम जो शरीर को खिंचाव देते हैं वह हमारी गतिविधियों के खिंचाव से ज्यादा होना चाहिए और वह चढ़ते क्रम से बढ़ाना चाहिए.

मांग के अनुसार निर्माण करना : यह व्यायाम का बहुत ही महत्त्वपूर्ण तत्त्व है. शरीर व उस के अवयव हम जैसी मांग करें वैसे काम करने लगते हैं. उसी तरह व्यायाम के लिए भी शरीर को अनुकूल करना पड़ता है. जैसे, अगर वेट ट्रेनिंग करना है तो वार्म अप वेट टे्रनिंग से ही करना पड़ता है. सिर्फ उस की तीव्रता प्रमुख व्यायाम से कम रखनी पड़ती है. प्रमुख व्यायाम में जो स्नायु काम करने वाले हैं, पहले वही स्नायु व्यायाम के लिए तैयार करने हैं.

छीज भरना : शरीर जुड़ने के बाद का तत्त्व, अच्छी तरह व्यायाम होने के बाद शरीर की छीज भरी जानी चाहिए वरना शरीर सक्षम नहीं रहता है. जले हुए ऊष्मांक का इस्तेमाल होता नहीं. छीज भरने के लिए सही आहार, ज्यादा पानी, पूरी नींद की जरूरत होती है.

निरंतरता : व्यायाम में स्थायित्व रखना जरूरी है, वरना सब बेकार हो जाएगा. दूसरे तत्त्व से स्नायु को स्मरणशक्ति मिलती है. व्यायाम नियमित रूप से नहीं करेंगे तो व्यायाम के बारे में स्नायु भूल जाते हैं और सभी तत्त्वों पर इस का नकारात्मक असर पड़ता है.

व्यायाम में वैविध्य रखना : लगातार एक ही प्रकार के व्यायाम की शरीर को आदत हो जाती है. इस से उस का सकारात्मक परिणाम दिखना बंद हो जाता है. व्यायाम में वैविध्य रखना चाहिए. व्यायाम की रूपरेखा तैयार कर उस के अनुसार हफ्ते में 5 से 6 दिन लगातार व्यायाम करना चाहिए.

कौन सा व्यायाम करें

हर एक के शरीर की जरूरतें अलगअलग होती हैं. उस के अनुसार व्यायाम चुनना होता है. इस के लिए प्रशिक्षक की मदद लेनी चाहिए. व्यायाम का प्रकार, समय आदि चीजें प्रशिक्षकों से मिल कर तय करनी चाहिए.

व्यायाम का वर्गीकरण

साधन के बगैर करने वाले व्यायाम–चलना, दौड़ना आदि.

साधनों के साथ करने वाले जिम के व्यायाम–रस्सी कूद.

श्वसन क्षमता बढ़ाने के लिए बिना रुके 20-25 मिनट तक तैरना, दौड़ना, साइकिल चलाना, हौकी, फुटबौल खेलने जैसी क्रियाएं करनी चाहिए.

लचीलापन बढ़ाने के लिए व्यायाम से पहले की जाने वाली स्ट्रैचिंग करनी चाहिए.

ताकत बढ़ाने के लिए वेट ट्रेनिंग सर्वोत्तम तरीका है.

उपयुक्त टिप्स

व्यायाम कोई भी हो, उस के मूलभूत तत्त्वों का पालन अवश्य करना चाहिए.

कौन सा व्यायाम करना है, यह विशेषज्ञ के मार्गदर्शन के अनुसार करना चाहिए.

व्यायाम वेदनादायक न हो कर आनंददायी होना चाहिए.

तालमेल बैठने वाला व्यायाम करें लेकिन नियमित रूप से करें.

हर दिन के व्यायाम का समय निश्चित करें और उसी समय का पालन करें.

व्यायाम से पहले कुछ हलका सा खाइए, जैसे कोई फल या ड्रायफ्रूट.

भोजन के 3-4 घंटे बाद व्यायाम करें.

व्यायाम के परिधान आकर्षकता के साथ सूती और आरामदायी होने चाहिए.

मौसम के अनुसार कपड़ों में बदलाव करें. ठंडी हवा में ऊपर से जैकेट पहनें.

व्यायाम करते वक्त पसीना पोंछने के लिए पास में नैपकिन रखें.

व्यायाम की शुरुआत करने के बाद शुरुआत में बदनदर्द होता है लेकिन बाद में फायदा होता है.

व्यायाम करते वक्त मन को तरोताजा रखिए, सकारात्मक सोच रखिए.

दौड़ते रहें

चलने का वेग निरंतरता से बढ़ाए रखने का प्रयास करें.

प्रशिक्षकों से पूछ कर उचित समय तय करें.

चलते वक्त श्वसन पर नियंत्रण रखें. दीर्घ श्वसन से हृदय को व्यायाम मिलता है.

चलते वक्त इरादतन सीधा चलें. कमर न झुकाइए.

यह व्यायाम बिना खर्चे का है लेकिन जूतों पर अच्छे पैसे खर्च करें. सही माप के जूतों का चुनाव करें.

सूती जुराबों का इस्तेमाल करें.

चलने के लिए सुबह के समय का चुनाव करें. इस समय हवा में धूलमिट्टी, धुआं आदि की मात्रा कम होती है. सुबह की सूर्यकिरणों से मन प्रसन्न होता है.

संभव हो तो अकेले घूमें. चलने पर और गति पर लक्ष्य केंद्रित करें.

दौड़ना एक परिपूर्ण व्यायाम

दौड़ने जैसा परिपूर्ण व्यायाम कोई और नहीं. किसी भी आयुवर्ग के व्यक्ति स्वयं की प्रकृति के अनुसार दौड़ सकते हैं. वजन कम करना, शारीरिक क्षमता बढ़ाना आदि दौड़ने के महत्त्वपूर्ण फायदे हैं. इस के सिवा और भी कई फायदे दौड़ने से शरीर को होते हैं.

निरोगी हृदय : दौड़ने से हृदय के स्नायुओं को फायदा होता है, उन की ताकत बढ़ती है.

वजन कम करना : वजन कम करने के लिए दौड़ना एक अच्छा व्यायाम है. एक साधारण व्यक्ति दौड़ते वक्त लगभग हजार कैलोरीज जलाता है.

हड्डी की क्षमता बढ़ाना : व्यायाम न करने से हड्डियां कमजोर होती हैं, जैसे औस्टियोपोरोसिस. नियमित रूप से दौड़ने से, व्यायाम करने से हड्डियों की क्षमता बढ़ती है.

श्वसन संस्था में सुधार : दौड़ने से श्वसन क्रिया में सुधार होता है. श्वसन को मदद करने वाले स्नायुओं की ताकत बढ़ती है. श्वसन की क्षमता बढ़ती है.

मानसिक तनाव से मुक्ति : नियमित दौड़ने से तनाव से दूर रहने में मदद होती है. सकारात्मक मानसिकता तैयार होती है. दिनभर फ्रैश रहने में मदद मिलती है. थकावट महसूस नहीं होती है.

अनिद्रा दूर होती है : दौड़ने से पूरे शरीर को व्यायाम मिलने से अच्छी नींद आती है.

प्रसन्न रहना : दौड़ने से शरीर में बदलाव होते हैं. इस से इंसान आनंदित रहता है.

बीमारी से दूर रहना : नियमित रूप से दौड़ने से स्ट्रोक, रक्तचाप, डायबिटीज जैसी बीमारियों से दूर रहना संभव होता है.

विज्ञान कोना

अब बैक्टीरिया रोकेगा प्रदूषण

दिसंबर 1984 में जहरीली गैस से लाखों जिंदगियां तबाह हो गईं. भोपाल की घटना को देख कर वहीं के एक छात्र ने बैक्टीरिया के माध्यम से हानिकारक गैसों को अलग करने की विधि खोज निकाली है. प्रदूषित हवा में से हानिकारक गैसों को अलग करने के लिए तमाम तरह की खोजें की गई हैं पर इस छात्र ने बैक्टीरिया ई-कोलाई के द्वारा पर्यावरण को वायु प्रदूषण से बचाने का उपाय निकाला है. यह वही बैक्टीरिया है जो आमतौर पर प्रदूषित भोजन के जरिए मनुष्य की आंत में पहुंच कर फूड पौइजनिंग का कारण बनता है. शहर के एक छात्र मयंक साहू ने ई-कोलाई बैक्टीरिया के जीन में बदलाव कर उस में ऐसी क्षमता विकसित करने में कामयाबी हासिल की है जो उद्योगों की चिमनियों और वाहनों से निकलने वाले धुएं में मौजूद हानिकारक गैसों को अवशोषित (एब्जौर्ब) कर सकेगा.

यह बैक्टीरिया इन तत्त्वों को अवशोषित कर इन्हें खाद में बदल देगा. यह खाद खेतों की मिट्टी को उर्वरक बनाने में सहायक होगी. इस मौडिफाइड बैक्टीरिया को उद्योगों की चिमनियों में एक डिवाइस के जरिए लगाया जाएगा जहां यह सल्फर डाईऔक्साइड और नाइट्रोजन डाईऔक्साइड को अवशोषित कर सके. डिवाइस में मौजूद बैक्टीरिया, सल्फर डाईऔक्साइड को सल्फर और नाइट्रोजन डाईऔक्साइड को अमोनिया में बदल देते हैं. तय समय में काम करने के बाद ये बैक्टीरिया मर जाते हैं. इन मरे हुए बैक्टीरियों को डिवाइस से बाहर निकाल कर इन से सल्फर और नाइट्रोजन को अलग कर लिया जाता है. डिवाइस से निकली सल्फर और नाइट्रोजन मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने में सहायक होती है.

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बायोनिक हैंड

किसी दुर्घटना में अपना हाथ खो चुके लोगों के लिए बायोनिक हैंड आशा की किरण बन कर आया है. दुनिया में पहली बार आस्ट्रिया में ऐसे 3 लोगों पर इस का सफल परीक्षण किया गया जो दुर्घटनाओं में अपना हाथ खो चुके थे. विज्ञान ने ऐसे बायोनिक हैंड के प्रत्यारोपण में सफलता  हासिल कर ली है जो दिमाग के जरिए नियंत्रित हो सकता है. आस्ट्रिया के ये लोग बायोनिक हैंड लगने के बाद आसानी से (हाथ से) सामान उठा रहे हैं. लिखना, अंडा पकड़ना जैसे कई काम अब आसानी से कर पा रहे हैं. पहले भी कई मरीजों को आर्टीफिशियल हाथ लगाए गए  हैं पर उन्होंने पूरी तरह से दिमाग के अधीन हो कर काम नहीं किया. इसी दोष को विएना मैडिकल यूनिवर्सिटी के डाक्टरों ने दूर कर दिया है. वे नए नर्व सिग्नल बनाने में सफल रहे हैं. उन्होंने शरीर के अन्य अंगों से ये सिग्नल चोटग्रस्त हाथ तक लाने का काम अच्छे से कर लिया. पुरानी प्रक्रिया में इन सिग्नल को रिकवर करना संभव नहीं हो पाता था. नए सिग्नल को फिर से उपयोगी बनाने का काम भी कम मुश्किल नहीं था. इस के लिए मरीजों को खातौर पर एक हाईब्रिड हैंड के साथ प्रशिक्षित किया गया जिस के बाद नर्व सिग्नल सक्रिय होने में एक हफ्ता लगता है. इस के लिए आर्टीफिशियल हाथ लगाने वाले मरीज के उस हाथ की क्षतिग्रस्त नसों को बदला गया. कृत्रिम नसें बनाई गईं जिन्हें ब्रेकियल प्लेक्सेस कहते हैं. इन नसों से जांघ की मांसपेशियों से बनाई नसों को कनैक्ट किया गया. यह संपूर्ण प्रकिया एक विद्युत वायरिंग के ही समान है जो शौर्ट या टूटफूट होने पर काम नहीं करती. अंत में कोहनी के नीचे के बेकार हिस्से को अलग कर बायोनिक आर्म लगाई जाती है. उस के नियंत्रण के लिए आर्म में लगे सेंसर्स को तंत्रिका नसों से जोड़ा गया ताकि दिमाग से हाथ नियंत्रित हो सके. बायोनिक सर्जरी के ऐक्सपर्ट प्रो. औस्कर एजमैन बताते हैं, ‘हम ने 3 मरीजों पर ये पूरी प्रक्रिया अपनाई और मौजूदा विधियों की तुलना में इस प्रक्रिया के परिणाम बेहतर.

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