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१४०० साल पुराने इसलाम को लागू करने की जिद पर खूनी खेल

इराक और सीरिया के  एक हिस्से पर बना स्वतंत्र राष्ट्र आईएसआईएस या इसलामिक राज्य दुनिया में हैवानियत का दूसरा नाम बन गया है. हर नया दिन उस की नृशंसता की रोंगटे खड़े कर देने वाली नई कहानी ले कर आता है. कभीकभी तो लगता है कि वह क्रूरता की सारी हदें पार करता जा रहा है. तालिबान, अलकायदा, बोको हरम, अलशहाबा आदि इसलामी आतंकी संगठनों की क्रूरता और जुल्म की मिसालें शायद काफी नहीं थीं, इसलिए आतंकवादी चरम क्रूरता की नई मिसाल ले कर आए हैं- आईएसआईएस या इसलामिक राज्य. इस आतंकी संगठन की क्रूरता इराक और सीरिया तक ही सीमित थी लेकिन अब वह उसे अंतर्राष्ट्रीय बना रहा है.

यमन में 2 मसजिदों पर आत्मघाती हमले कर आईएस ने 140 लोगों की हत्या की और 269 लोगों को जख्मी किया. इस से एक दिन पहले उस ने ट्यूनीशिया में 20 विदेशियों की हत्या की. विख्यात लेखक वी एस नायपाल ने हाल ही में लिखा है, ‘‘आईएस नया नाजी राज्य बनता जा रहा है. इसे खत्म करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिलजुल कर कोशिश की जानी चाहिए,’’ कहना न होगा कि कई सुपर पावर कहलाने वाले देशों का गठबंधन इस तरह की नाकाम कोशिश कर चुका है.  आईएस की हैवानियतभरी हरकतों की मुसलिम जगत में तीखी आलोचना हो रही है. कुछ अरसे पहले दुनिया के 126 मुसलिम धर्मशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों ने खलीफा बगदादी को खुली चिट्ठी लिख कर इसलामिक राज्य की करतूतों की कड़ी निंदा की है. इस से पहले मिस्र की एक प्रमुख मसजिद के इमाम भी इसलामिक राज्य को मुसलिम विरोधी बता चुके हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि इसलामिक राज्य गैर इसलामिक है. ओबामा इस आंदोलन को ले कर वही बात बोल रहे हैं जो राजनीतिक तौर पर सुविधाजनक हो. इस संगठन की सोच और रणनीति को न समझ पाने के कारण ही तमाम देश मिल कर भी इस संगठन का बाल बांका नहीं कर पाए, नतीजतन वह फलताफूलता जा रहा है. लेकिन पिछले कुछ समय से पश्चिमी देशों में उस का गंभीरता से अध्ययन हो रहा है. आखिरकार, दुनियाभर के देशों से लाखों लड़ाकों को आकर्षित करने वाले आईएस या इसलामिक राज्य संगठन में कोई तो बात है जो दुनियाभर के दर्जनों देशों के लोग अपनी जान जोखिम में डाल कर वहां खिंचे चले जा रहे हैं.

शुद्ध इसलाम और धर्मद्रोह

आईएस द्वारा जारी वीडियो उस की पत्रिका ‘दबिक’ और अन्य प्रचार साहित्य को पढ़ने पर एक बात उभर कर आती है कि वह शुद्ध इसलाम या इसलाम के मूलरूप पर विश्वास करता है. उस का मानना है कि इसलाम के 1400 साल पहले की पहली पीढ़ी यानी मोहम्मद और उन के साथियों की सोच और तरीके ही शुद्ध इसलाम हैं. इस में किसी तरह का संशोधन करने का मतलब है कि आप इसलाम के मूलरूप की शुद्धता पर विश्वास नहीं करते. यह धर्मद्रोह है और धर्मद्रोह की इसलाम में एक ही सजा है-मौत. अपने इस नजरिए के कारण आईएस लोकतंत्र, समाजवाद, फासीवाद आदि आधुनिक विचारधाराओं को नकारता है. उस का मानना है कि इसलाम की पहली पीढ़ी ने जो व्यवस्थाएं स्थापित कीं वे ईश्वरीय हैं जबकि अन्य व्यवस्थाएं  मानवनिर्मित हैं. वह इन मानवनिर्मित व्यवस्थाओं को पूरी तरह से नकारता है. यही वजह है कि वह उन इसलामवादी दलों को भी गुनाहगार मानता है जो चुनाव में हिस्सा लेते हैं. आईएस केवल ईश्वरीय व्यवस्था यानी शुद्ध मोहम्मदी इसलाम में विश्वास करता है, जिस के 2 स्तंभ हैं, खिलाफत और ईश्वरीय कानून शरीया. इन्हें वह ठीक उस तरह लागू करना चाहता है, जैसे मोहम्मद और उन के साथियों ने अपने समय में लागू किया था.

पहली पीढ़ी के इसलाम की बात केवल इसलामी राज्य ही नहीं तालिबान, बोको हरम आदि कई संगठन भी मानते हैं. बोको हरम के नेता शेकू ने कहा था कि वे नाइजीरिया में चुनाव नहीं होने देंगे क्योंकि वे जनता द्वारा जनता की और जनता के लिए बताए जाने वाले लोकतंत्र में विश्वास नहीं करते बल्कि ईश्वर की, ईश्वर द्वारा चलाई जाने वाली सरकार में विश्वास करते हैं. वे हर तरह की आधुनिक व्यवस्था के खिलाफ हैं. बोको हरम का मानना है कि पश्चिमी शिक्षा वर्जित है. हाल ही में जानीमानी अमेरिकी पत्रिका ‘एटलांटिक’ में अमेरिकी प्रोफैसर ग्राहम वुड का इसलामिक राज्य पर लिखा लेख बौद्धिक हलकों में चर्चा का केंद्र रहा. इस में वे कहते हैं कि इस में मध्यपूर्व और यूरोप के बहुत से मनोविक्षिप्त और दुस्साहसी लोग शामिल हो गए हैं लेकिन इस के ज्यादातर अनुयायी इसलाम के गहन अध्ययन पर आधारित भाष्यों को मानते हैं. इसलामिक राज्य द्वारा किए गए हर फैसले और कानून में वे पैगंबर के तौरतरीकों को अपनाते हैं. यानी मोहम्मद की भविष्यवाणियों और उदाहरणों का पूरी तरह से पालन करते हैं. मसलन, आईएस की औनलाइन पत्रिका का नाम दबिक है. दबिक वह जगह है जिस के बारे में मोहम्मद ने भविष्यवाणी की थी कि इसलाम की सेनाओं का रोम की सेनाओं से आखिरी युद्ध होगा.

ग्राहम वुड कहते हैं कि असल में अगर हम इसलामिक स्टेट जैसी प्रवृत्ति से लड़ना चाहते हैं तो इस के बौद्धिक विकास को समझना होगा. इसलाम में तकफीर यानी बहिष्कार की अवधारणा है जिस के तहत एक मुसलमान दूसरे मुसलमान को धर्मद्रोही कह कर गैर मुसलिम करार दे सकता है. हर वह मुसलिम धर्मद्रोही भी है जो इसलाम में संशोधन करता है. कुरान या मोहम्मद के कथनों  को नकारना पूरी तरह से धर्मद्रोह माना जाता है लेकिन  इसलामिक राज्य ने कई और मुद्दों पर भी मुसलमानों को इसलाम से बाहर निकालना शुरू कर दिया है. इस में शराब, ड्रग बेचना, पश्चिमी कपड़े पहनना, दाढ़ी बनाना, चुनाव में वोट देना और मुसलिमों को धर्मद्र्रोही कहने में आलस बरतना आदि बातें शामिल हैं. इस आधार पर शिया और ज्यादातर अरब धर्मद्र्रोह के निष्कर्ष पर खरे उतरते हैं. शिया होने का मतलब है इसलाम में संशोधन करना और आईएस के अनुसार, कुरान में कुछ नया जोड़ने का मतलब है उस की पूर्णता को नकारना. शियाओं में जो इमामों की कब्र की पूजा करने और अपने को कोड़े मारने की परंपरा है उस की कुरान या मोहम्मद के व्यवहार में कोई मिसाल नहीं मिलती. इसलिए धर्मद्रोही होने के कारण करोड़ों शियाओं की हत्या की जा सकती है. यही बात सूफियों पर भी लागू होती है.

इसी तरह मुसलिम देशों के प्रमुख भी धर्मद्र्रोही हैं जिन्होंने दिव्य माने जाने वाले इसलामी कानून शरीया के बावजूद मनुष्यनिर्मित कानून बनाया और उसे लागू किया. इस तरह इसलामिक राज्य या आईएस इस विश्व को शुद्ध करने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या करने के लिए प्रतिबद्ध है. उस के नजरिए से जो भी मूल इसलाम में संशोधन करता है वह धर्मद्रोही है, इसलिए हत्या ही उस का दंड है. इसलिए इसलामिक राज्य 1-2 हत्याएं लगातार और सामूहिक हत्याकांड हर कुछ हफ्तों में करता रहता है. कथित मुसलिम धर्मद्रोही ही ज्यादातर उन के शिकार बनते हैं.

कुरान में जो युद्ध के नियम बताए गए और इसलामिक राज का जो वर्णन है उस का इसलामिक राज्य के लड़ाके पूरी ईमानदारी और श्रद्धा से पालन कर रहे हैं. इन में से बहुत सी बातें ऐसी हैं जिन के बारे में आधुनिक मुसलमान मानते हैं कि यह उन के धर्म का अपरिहार्य अंग नहीं है. गुलामी, सूली चढ़ाना, सिर कलम करना आदि मध्ययुगीन बातें हैं जिन्हें इसलामी राज्य के लड़ाके थोक के भाव में आज के जमाने में ले आए हैं. कुरान में साफतौर पर इसलाम के शत्रुओं के लिए सूली पर चढ़ाना एकमात्र दंड बताया गया है. ईसाइयों के लिए जजिया और इसलाम के वर्चस्व को स्वीकार करने का प्रावधान किया गया है. ये नियम मोहम्मद ने लागू किए हैं. इसलामिक राज्य के नेता, जो मोहम्मद का अनुसरण करना अपना कर्तव्य मानते हैं, ने इन दंडों को फिर लागू किया. इसलाम की पहली पीढ़ी ने जो भी किया वह ईश्वरीय था, यह मान कर लकीर का फकीर बन कर उस समय की हर चीज को आईएस लागू कर रहा है. उस ने गुलामी को पुनर्जीवित किया तो कुछ लोगों ने विरोध जताया लेकिन इसलामिक राज्य ने कोई अफसोस जताए बगैर गुलामी और सूली पर चढ़ाना जारी रखा. पत्रिका  दबिक में तो गुलामी की पुनर्स्थापना पर एक पूरा लेख लिखा है. इस लेख में लिखा गया था, ‘यजदी महिलाओं और बच्चों को शरीया के मुताबिक सीरिया में भाग लेने वाले लड़ाकों के बीच बांट दिया गया है. काफिरों के परिवारों को गुलाम बना कर उन की महिलाओं को रखैल बनाना शरीया का स्थापित हिस्सा है. अगर कोई कुरान की इन आयतों और मोहम्मद की बातों को नकारेगा या उन का मजाक उड़ाएगा तो इसलाम का द्रोही होगा.’

शरीया कानून

बाकी इसलामी संगठनों और इसलामी राज्य संगठन में एक बहुत बड़ा फर्क यह है कि उस ने  ब्रिटेन से भी ज्यादा क्षेत्रफल वाला स्वतंत्र देश स्थापित कर लिया है. खिलाफत की स्थापना के लिए यह जरूरी है. इस कारण दुनियाभर की खिलाफत की स्थापना चाहने वालों को बगदादी द्वारा अपने को खलीफा घोषित करने पर खुशी हुई. पिछली खिलाफत आटोमन साम्राज्य थी जो 16वीं शताब्दी में अपनी कीर्ति के शिखर पर पहुंची. 1924 में तुर्की के तानाशाह कमाल अता तुर्क ने उसे खत्म कर दिया. इसलामी राज्य के समर्थक उसे वैध खिलाफत नहीं मानते क्योंकि उस ने पूरी तरह से शरीया कानून लागू नहीं किया था जिस में गुलामी, पत्थर मार कर हत्या करना और शरीर के अंग काटना आदि भी शामिल है. बगदादी ने मोसुल में दिए अपने भाषण में खिलाफत के महत्त्व पर प्रकाश डाला था. उस ने कहा कि संस्था ने पिछले 1 हजार साल से कोई काम नहीं किया. खलीफा का एक दायित्व शरीया को लागू करना है. इसलामी राज्य के कुछ समर्थक मानते हैं कि अब तक शरीया को आधेअधूरे तरीके से लागू किया गया, जैसे सऊदी अरब में सिर कलम कर दिया जाता है और चोर के हाथ काट दिए जाते हैं. इस तरह से अपराध कानून लागू किया जाता है लेकिन शरीया के सामाजिक व आर्थिक न्याय को लागू नहीं किया जाता. शरीया, उन के अनुसार, एक पूरा पैकेज है. उसे पूरा लागू न करने से उस के प्रति नफरत फैलती है. खलीफा का दूसरा काम है हमलावर के खिलाफ जिहाद शुरू करना. इस का मतलब है गैरमुसलिमों द्वारा शासित देशों में जिहाद को फैलाना. खिलाफत का विस्तार करना खलीफा का कर्तव्य है.

इस तरह इसलामी राज्य के समर्थक लोगों को इसलाम की 1400 साल पुरानी दुनिया में ले जाना चाहते हैं जहां  ईश्वरीय कानून शरीया पूरी तरह से लागू होगा. एक इसलामी राज्य के समर्थक का बयान अखबार में छपा था कि ईश्वरीय कानून यानी शरीया में जीने का अपना आनंद है. इसी आनंद का आस्वाद लेने के लिए दुनिया के कई देशों के लाखों मुसलमान वहां पहुंच रहे हैं. यह बात अलग है कि बाकी लोग इसलामी राज्य की करतूतों को हैवानियत मानते हैं. यह भी अलग बात है कि इसलामिक राज्य के मुखिया आधुनिक तकनीक का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं. यदि वे 1400 साल पहले जाना चाहते हैं तो उन्हें बंदूकें, गाडि़यां, टैंक, टैलीफोन, वायरलैस, कंप्यूटर, पैट्रोल, प्लास्टिक, दवाएं यानी हर चीज जो 1400 साल पहले नहीं थी, छोड़नी चाहिए. घोड़ों और भेड़ों के बल पर इसलामिक राज्य 2 दिन चल कर चलाएं तो. इस मामले में दूसरे धर्मों में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जो 2000, 2500 या उस से पुराने धर्म को उसी रूप में थोपने की कोशिश करते हैं पर कौपीकिताबों, वीडियो, आधुनिक हथियारों, तकनीक के बल पर.

‘माई चौइस’ वीडियो : औरतों में आजादी की छटपटाहट

पुराना फलसफा है कि अरे, वह ऐसा कैसे कर सकती है, वह तो औरत जात ठहरी. औरतों की आजादी, उन की मरजी, उन के अपने हक की बात कहने पर सदियों से पहरा रहा है. जब भी कोई महिला अपनी आजादी की बात करती है तो समाज के उस वर्ग में हलचल मच जाती है जो महिलाओं को आज भी अपनी मरजी के अनुसार चलाना चाहता है, उन पर अपना रूढि़वादी व सामंतवादी रवैया बनाए रखना चाहता है. कुछ ऐसी ही हलचल एक पत्रिका के लिए होमी अदजानिया निर्देशित वीडियो ‘माई चौइस’ के रिलीज होते ही पूरे देश में मची. इस वीडियो में बौलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण का वौयसओवर है.

इस वीडियो में दीपिका अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने की आजादी का संदेश देती दिखाई दी हैं. वे कहती हैं :

‘‘मैं शादी करूं या न करूं, मेरी मरजी.

शादी से पहले सैक्स करूं या शादी के बाद भी किसी से रिश्ता रखूं, मेरा मन.

किसी पुरुष से प्यार करूं या महिला से या फिर दोनों से, मेरी मरजी.

मुझ से जुड़े सारे फैसले मेरे हैं, यह मेरा हक है.’’

ब्लैक ऐंड व्हाइट कलर में शूट किया गया यह वीडियो नारी सशक्तीकरण की राह में दीपिका की ओर से एक जबरदस्त कदम माना जा रहा है. इस वीडियो ने देशभर में तहलका मचाया. कुछ लोग इस के पक्ष में बोले तो कइयों ने इस के खिलाफ झंडा उठा लिया. कहने को हम आजाद हैं पर इस देश की महिलाएं आज भी सामाजिक, कानूनी बंदिशों की बेडि़यों में जकड़ी हुई हैं और आजादी के लिए छटपटा रही हैं. जहां एक ओर दीपिका का यह वीडियो माई चौइस मेरी मरजी की बात करता है वहीं देश की अधिकतर महिलाएं जो बद से बदतर जिंदगी गुजार रही हैं, उन के पास कोई चौइस नहीं है. पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में एक 16 साल की लड़की से उस के पिता, भाई और चाचा 2 साल तक बलात्कार करते रहे. इस बीच वह 2 बार प्रैग्नैंट भी हुई. जब मदद की आस में अपनी मां को बुलाया तो मां ने कहा, ‘वे तुम्हारे बाप, चाचा और भाई हैं, कोई गैर नहीं.’

जिन 2 सालों के दरम्यान यह मासूम इस हैवानियत से गुजर रही थी, शायद उसी दरम्यान सोशल मीडिया के धुरंधर महिला स्वतंत्रता, नारी सशक्तीकरण और दीपिका के ‘माई चौइस’ वीडियोनुमा विज्ञापन बनाने में व्यस्त रहे होंगे. बिना इस बात की परवा किए कि सताई जा रही औरतें जिन कालकोठरियों में सड़ रही हैं, वहां न तो यूट्यूब पहुंचता है न ‘माई चौइस’ का जुमला. और हां, जैसा कि अंगरेजी में कहावत है, ‘स्लेव्स हैव नो चौइस’ की तर्ज पर दीपिका की तरह सब के पास अपनी चौइस का विकल्प नहीं है. पुरुष प्रधान समाज और पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती देते महिला सुधारवादी संगठन, फिल्मकार होमी अदजानिया जैसे निर्देशक, आधुनिक महिला लेखिकाएं, अभिनेत्रियां और एंटरप्रेन्योर शायद यह भूल जाते हैं कि नारी स्वतंत्रता या समानता में रुकावट के लिए सिर्फ आदमी या औरत जिम्मेदार नहीं, बल्कि सालों पुरानी धर्मजनित शिक्षा, प्रचलित कुरीतियां, सामंतवाद और जातिवादी व्यवस्था है. वरना जलपाईगुड़ी के मामले में अगर घर के पुरुष बलात्कार कर रहे थे तो उस की मां उन्हें समर्थन दे कर उस का दोहरा मानसिक व शारीरिक बलात्कार कर रही थी. इसलिए बजाय पुरुष बनाम महिला की बहस के, समस्या की जड़ पर गौर फरमाया जाए और न सिर्फ गौर बल्कि उसे जड़ समेत उखाड़ा जाए वरना ‘माई चौइस’ का जुमला सिवा फिल्मी फैंटेसी के और कुछ हो ही नहीं सकता.

हालांकि ऐसे प्रयास गलत नहीं हैं लेकिन अगर ये संदेश ग्लैमरस जमीन से हट कर वास्तविकता के धरातल पर उन लोगों तक भी पहुंचें, जिन्हें इन की जरूरत है तो शायद ‘माई चौइस’ के मतलब सही समझ आएं. बहरहाल, दीपिका के इस वीडियो से बहस के अंगार को हवा जरूर मिल गई है. दीपिका का यह वीडियो, जितना सोचा गया था उस से कहीं ज्यादा हंगामा कर गया. इस के बड़ी मजेदार प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. इस का असर इस बात से समझा जा सकता है कि दीपिका के ‘माई चौइस’ वीडियो आने के 1 दिन बाद ही पुरुषों का ‘माई चौइस’ वीडियो भी बाजार में आ गया. इस में दीपिका के बहाने तमाम आजादीपसंद लड़कियों को निशाना बनाते हुए लड़कियों की जम कर खिल्ली उड़ाई गई. कुतर्कों के साथ कहा गया कि महिलाओं की चौइस हो सकती है तो पुरुषों की क्यों नहीं? कुछ लोगों ने तो आपत्तिजनक कमैंट्स भी किए. अभिनेता कमाल आर खान ने भी महिलाओं के प्रति आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया.

फिगर को ले कर उठे सवाल

दीपिका की जिस बात को महिलाओं का सब से ज्यादा समर्थन मिला वह थी, ‘मेरा साइज जीरो हो या साइज 15, इट्स माई चौइस.’ और ऐसा हो भी क्यों न, फिगर मेंटेन के लिए लड़कियों को कितने जतन करने पड़ते हैं यह पुरुष क्या जानें. महिलाओं का शरीर समाज के सांचे के मुताबिक नहीं ढला है और इस के लिए उस को मजाक, हीनभावना, बेइज्जती न जाने क्याक्या सहना पड़ता है. शादी करनी हो, इस के लिए भी लड़की का फिगर अच्छा होना जरूरी है. मोटी लड़की को कोई पसंद नहीं करता. कोई लड़का उसे अपनी गर्लफ्रैंड नहीं बनाना चाहता. प्रैग्नैंसी में एक महिला का शरीर किस कदर बदलता है, यह वही जान सकती है. पुरुष उस पीड़ा को नहीं समझ सकते.

सैक्स आउटसाइड मैरिज

सैक्स पर बात करना भारतीय समाज में खतरे से खाली नहीं है. फिर दीपिका ने तो सैक्स आउटसाइड मैरिज यानी शादी के बाद पति के अलावा किसी और से भी मरजी से सैक्स का मामला उठाया है. इस पर सब से तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. पुरुष ही नहीं, महिलाओं की ओर से भी इस पर सवाल उठाए गए. कमाल आर खान ने तो दीपिका और ‘माई चौइस’ डायरैक्टर होमी अदजानिया की व्यक्तिगत जिंदगी पर भी आपत्तिजनक बातें कीं और कहा कि अगर आप की शादी के बाद आप का पार्टनर किसी और से सैक्स करे तो आप को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए.  वैसे बता दें कि शादी के बाद पत्नी से जबरदस्ती करने पर पति पर रेप का आरोप भी लग सकता है, इसलिए चाहे शादी के पहले प्रेम संबंध हों या शादी के बाद, साथी की इच्छा भी महत्त्वपूर्ण होती है. शादी के बाद पति के अलावा किसी और से सैक्स करने के कानूनी ही नहीं, नैतिक पहलू भी हैं जिन्हें ज्यादातर समाजों में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता. इस सवाल पर सब से ज्यादा बहस की जरूरत है.

गोरे रंग की दीवानगी

सांवली दीपिका जब अपनी पसंद के लड़के की बात करती हैं तो वे समाज की गोरे रंग के प्रति संकीर्ण सोच को भी दुत्कारती हैं और उस लड़के को अपनी पसंद बताती हैं जिस के मातापिता या वह लड़का खुद उस का रंग नहीं, बल्कि उस के गुण और प्रतिभा को देख कर उसे पसंद करे. गोरे रंग को ले कर भारत ही नहीं, पूरे भारतीय उपमहाद्वीप, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका जैसे देशों में भी दीवानगी देखी जाती है. हमारे सिर पर सीधे सूरज गिरने के कारण हमारा रंग काला होना स्वाभाविक है. अत्यधिक ठंडे देशों में रहने वाले गोरे रंग के लोगों को देख कर हमारे मन में हीनभावना आखिर क्यों पैदा हो जाती है? जदयू नेता शरद यादव ने संसद में गोरे रंग के प्रति भारतीयों की दीवानगी को ले कर टिप्पणी की थी और दक्षिण भारत की महिलाओं को सांवली लेकिन उन के फिगर को खूबसूरत बताया था, जिस पर विवाद भी हो गया था. हालांकि उन का तर्क सही था लेकिन उदाहरण गलत हो सकता है. इस के अलावा भारतीय जनता पार्टी नेता गिरिराज सिंह का सोनिया गांधी पर दिया गया बयान काफी हद तक नस्लभेदी था. उन्होंने कहा था-अगर राजीव गांधी नाइजीरियन महिला से शादी करते तो उन्हें इतना सम्मान और पद नहीं मिल पाता जो सोनिया को मिला. इस पर नाइजीरिया के राजदूत ने आपत्ति भी जताई थी.

आम भारतीय की सोच बहू को ढूंढ़ते वक्त दिए गए विज्ञापनों में देखी जा सकती है जिस में साफ लिखा होता है कि गोरी लड़की चाहिए. हमारी सोच का एक और नमूना टीवी पर आने वाले फेयरनैस क्रीम, फेसवाश और पाउडर के विज्ञापनों में भी झलकता है. भाजपा की ओर से दिल्ली की सीएम कैंडिडेट रहीं किरन बेदी वैसे तो महिला सशक्तीकरण की आदर्श मानी जाती हैं लेकिन वे भी फेयरनैस क्रीम का विज्ञापन कर चुकी हैं.

पुरुषों को लगी मिरची

दीपिका के इस वीडियो का असर उम्मीद से कहीं ज्यादा देखने को मिला. एक तरह से इसे नैगेटिव पब्लिसिटी ज्यादा मिली. सोशल मीडिया में लड़के अजीबोगरीब तर्क देने लगे कि हम भी अपनी मरजी कर सकते हैं. पर समाज में तो सदियों से पुरुषों की ही मरजी चली आ रही है. इस दौरान अभिनेता गोविंदा पर फिल्माया गया गाना, ‘मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं, मेरी मरजी…’ को खूब शेयर किया गया. इस से यह पता चलता है कि एक सामान्य बात कह देने भर से पुरुषों को कितनी मिर्ची लगती है.

पुरुषवादी सोच से लड़ाई

नारीवाद पुरुषों के खिलाफ नहीं है. यह पुरुषवादी सोच के खिलाफ खड़े होने की बात करता है. यह पुरुषवादी सोच पुरुषों में ही नहीं, महिलाओं में भी हो सकती है. उदाहरण के तौर पर हम ने भाजपा और हिंदूवादी संगठनों के नेताओं को हिंदू महिलाओं से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील करते देखा. इस में महिला नेता भी शामिल हैं. यही पुरुषवादी सोच है और यह सिर्फ जीवनशैली को अपने ढंग से अपनाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि महिलाओं को बराबर के अधिकार, उचित सम्मान दिलाने की भी लड़ाई है.

वीडियो में पुरुषों का मुद्दा

इस वीडियो में पुरुषों के हित की भी बात है. दीपिका जब कहती हैं कि उन की चौइस लड़का हो या लड़की तो वे एक तरह से पुरुषों की भी बात करती हैं. हमारे समाज में ‘गे’ और ‘लैस्बियन’ की मरजी की बात तो छोडि़ए, उन्हें जरूरी सम्मान तक नहीं दिया जाता. दीपिका जब लड़की के साथ लड़की की बात करती हैं तो उस में लड़के के साथ लड़के की भी बात छिपी होती है. इस वीडियो में इस महत्त्वपूर्ण विषय पर भी चर्चा हो रही है. एक कमजोर ही कमजोर का सहारा बनता है. समाज में न तो लड़कियों को उन की जगह मिली है और न सेम सैक्स करने वालों को. इसलिए ‘माई चौइस’ वीडियो कई पुरुषों के हक में भी खड़ा होता है. महिलाओं की स्थिति पर भाजपा नेता डा. मुरली मनोहर जोशी कहते हैं, ‘‘यह चेतनाशून्य होने की पराकाष्ठा है. हमें पता नहीं कि हम कितना बदल गए हैं. भारत में महिलाओं को मां के रूप में संबोधित करने की परंपरा रही है लेकिन अब मां कहे जाने पर आपत्ति जताई जा रही है. अब आप एक शरीर हैं. एक उत्पाद हैं.’’

अभिव्यक्ति की लड़ाई

दीपिका की तरह अभिव्यक्ति की कुछ ऐसी ही लड़ाई कनाडा के टोरंटो शहर में रहने वाली भारतीय मूल की रूपी कौर ने भी लड़ी. यह लड़ाई रूपी ने इंस्टाग्राम में एक तसवीर पोस्ट कर के लड़ी. तसवीर में वे लेटी हुई थीं और उन के कपड़ों पर लगे खून से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे माहवारी यानी पीरियड से गुजर रही हैं. रूपी की इस तसवीर को इंस्टाग्राम ने कम्युनिटी गाइडलाइन के खिलाफ बताते हुए हटा दिया. लेकिन रूपी कौर ने इंस्टाग्राम के इस फैसले को चुनौती दी और लिखा कि न तो यह तसवीर किसी ग्रुप की भावना को ठेस पहुंचाती है और न ही पौर्नोग्राफी को बढ़ावा देती है. यह कोई स्पैम भी नहीं है, यह मेरी खुद की तसवीर है. उन्होंने तसवीर को दोबारा पोस्ट किया. आखिर इंस्टाग्राम को रूपी कौर से माफी मांगनी पड़ी और माना कि यह तसवीर किसी गाइडलाइन का विरोध नहीं करती. इंस्टाग्राम के खिलाफ अभिव्यक्ति की लड़ाई लड़ने वाली रूपी कौर के इस साहसिक कदम के बाद दुनियाभर में इस पर बहस शुरू हो गई है कि आखिर कब तक माहवारी जैसी प्राकृतिक चीज को अपवित्र माना जाएगा.

एक सच यह भी

औरतों को जागरूक करने की दिशा में काम करने वाले महिला संगठनों में भी औरतें हैं तो वहीं लुटेरी दुलहनों की शक्ल में ठगी का जाल बुनने वाली भी औरतें ही हैं. मौडलिंग व ग्लैमरस फील्ड में बदन की नुमाइश कर विवाहेतर संबंधों को अपना हक व अधिकार समझने वाली भी औरत है तो वहीं पति को सात जन्मों तक सिर्फ उसी को अपना सबकुछ मानने वाली भी औरत ही है. औरत वह भी है जो आज भू्रण हत्या में अपने पति के साथ सहभागिता निभाती है और औरत का एक रूप ऐसा भी है जो नीना गुप्ता की तरह बिना ब्याह के अपनी बेटी को न सिर्फ जन्म देने का तथाकथित समाज विरोधी फैसला करती है बल्कि उसे समाज में इज्जतदार छवि भी देती है. ऐसे ही गांव, कसबे, शहर की औरतों के मिजाज, सामाजिक व्यवस्था व मानसिकता में भेद है तो वहीं आर्थिक आधार पर भी औरतों में असमानता है. घर की मालकिन और उसी घर में झाड़ूपोंछा करने वाली औरतों में भी समानता का अलग गणित काम करता है.

लिहाजा, इन तमाम शक्लों को लिए हुए नारी समाज के लिए पहले यह तय करना होगा कि नारी स्वतंत्रता व समानता के अधिकार के माने वास्तविकता में आखिर हैं क्या? कानूनी या सामाजिक व राजनीतिक आधार पर महिलाओं की स्वतंत्रता का इंसाफ नहीं किया जा सकता. जिस तरह एक सफल उपभोक्ता कंपनी अपने विज्ञापन के जरिए टारगेट कस्टमर या औडियंस का चुनाव कर उचित सुविधा या प्रोडक्ट जरूरतमंद तक पहुंचा कर अपना ध्येय सफल बनाती है, वैसे ही किस समाज व तबके की महिला किस तरह की स्वतंत्रता चाहती है, इस का निर्धारण किए बिना माई चौइस को सब की चौइस कहना अतार्किक व अनैतिक होगा.

आजादी के अलगअलग माने

किसी महिला के लिए आजादी का मतलब कम कपडे़ पहनना व नाइट पार्टी में घूमना हो सकता है तो किसी के लिए बुरके से नजात पाना. कोई घर से निकल कर सिर्फ स्कूल तक पहुंचने को आजादी मानती है तो कोई मौडलिंग की दुनिया में नाम कमाने को आजादी की परिभाषा मानती है. कई महिलाएं तो पुरुषों की सेवा को ही आजादी का नाम देती हैं तो कई आजादी को अपने बदन से जोड़ती हैं. एक मजदूर औरत के लिए स्वतंत्रता के माने किसी से शादी हो जाए, में निहित है तो किसी को शादी की जंजीर से आजाद होने में भी फ्रीडम का फील आता है. जाहिर है, माई चौइस के इतने वर्जन हैं कि कोई भी भ्रमित हो जाए. इसलिए किनारे पर बैठ कर गहराई का अंदाजा लगाने के बजाय पानी में उतरना निहायत जरूरी है.

गुलामी का इतिहास

यह अंदाजा लगाना तो मुश्किल है कि महिलाओं की आजादी और समानता का अधिकार छिनना कब शुरू हुआ होगा लेकिन एक बात मोटेतौर पर समझ आती है कि पौराणिक व धार्मिक ग्रंथों ने हमेशा औरतों को नीचा, पुरुष की संपत्ति व दोयम दरजे की वस्तु के सांकेतिक इशारे किए हैं. इन ग्रंथों को अतार्किक आधार मान कर सामंतवाद व जातिवादी व्यवस्था का उद्भव हुआ और उसी दौरान नारी को दास संपत्ति व भोग्या मानने की मानसिकता का चलन शुरू हुआ. जैसे एक कमजोर तबके, समाज या पुरुष वर्ग को शूद्र की श्रेणी में डाल कर निम्नवर्गीय काम करने पर मजबूर कर उसे गुलामों सरीखा जीवन जीने पर बाध्य किया गया, ठीक वैसे ही नारी को भी कमजोरों की तरह पुरुष की सेवा के लिए उन के नीतिग्रंथों में ऐसे सिद्धांत नियमित कर दिए कि तुम्हारा उद्धार पुरुष ही कर सकता है, वही तुम्हारा सबकुछ है. इन तमाम घटनाक्रमों के दौरान उन के मन में हीनता की ग्रंथि गहरी जड़ें जमाती गई. एक स्थिति ऐसी भी आई कि पुरुष तो पुरुष, महिलाएं ही दूसरी व अपने से कमजोर व असहाय महिलाओं को प्रताडि़त करने की परंपरा विकसित करती गईं.

घर में सासबहू की गृहकलह नीति, ननददेवरानी के झगड़े और पुरुषों के दिलों व उन की संपत्ति व घरों पर राज करने की प्रतिस्पर्धा ने औरत को औरतों का दुश्मन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लिहाजा, इस स्थिति पर आ कर महिलाओं को किस से, कैसे व कब आजाद होना है, तय कर लेना चाहिए. 14वीं व 15वीं शताब्दी में तुलसीदास नारी को ताड़ना का अधिकारी मानते थे. 18वीं सदी में सुधारवादी आंदोलनों के दौरान भी प्रताड़ना का सिलसिला जारी रहा. और अगर आज भी ‘माई चौइस’ वीडियो को ले कर इतना हंगामा मचा है तो स्पष्ट है कि ताड़ना की अधिकारी महिला आज भी जस की तस है.

महिलाएं खुद पहल करें

सरकार के नीतिनिर्धारकों के कानून बना देने, कमेटियां बैठा देने या आंदोलनों से बदलाव आना होता तो कब का आ गया होता. सचाई तो यह है कि महिलाएं अपनी आजादी के लिए खुद पहल करें. किसी के कंधों पर सवार हो कर अगर वे गंभीर मसले भी उठाएंगी तो उन के असर दूरगामी नहीं होंगे. दीपिका पादुकोण, रेने वर्मा, रूपी कौर की आवाज हर उस महिला की आवाज है जो महिलाओं के प्रति समाज में पसरे गैरबराबरी के रवैए से खफा है और अपने जीवन के तमाम फैसले करने की आजादी चाहती है. दीपिका का माई चौइस का तीर भले ही अंधेरे में चला हो लेकिन अगर इसे एक जागरूक पहल के तौर पर लिया जाए तो महिलाएं आंखों पर पट्टी बांध कर भी अपनी आजादी व समानता का तीर देश, दुनिया व समाज पर टारगेट कर उन्हें भेद सकती हैं.

-गीतांजलि, ललिता गोयल, राजेश कुमार

वैध अवैध का खेल

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने अवैध कही जाने वाली बस्तियों को नियमित करने का काम शुरू करा दिया है. अब तक पूरी दिल्ली में फैली सैकड़ों ऐसी बस्तियों में, सरकारी रिकौर्डों के अनुसार, रहने वालों के पास मालिकाना हक नहीं थे. काफी बस्तियां ऐसी जमीनों पर हैं जो किसानों से ली गईं. उन जमीनों को पिछली सरकारों ने भूमि अधिग्रहण कानून के तहत उन से जबरन छीना था. चूंकि छीनने के बाद सरकार उन जमीनों पर कुछ नहीं कर पाई थी, पुराने किसान मालिकों ने वहां फसलों की जगह मकान उगवा दिए और आज अवैध कही जाने वाली उन कालोनियों में लाखों लोग रहते हैं. अगर दिल्ली की नई सरकार इस काम को तुरतफुरत कर दे तो ही कहा जाएगा कि सत्ता में नई तरह की सरकार आई है. इन्हें कानूनी जामा पहनाना कठिन नहीं है. सरकार को सिर्फ 4-5 आदेश जारी करने हैं और बिना पैसापाई खर्च किए लाखों मकानमालिक सरकारी अफसरों की घूसखोरी से मुक्ति पा जाएंगे.

दिल्ली में राज्य सरकार के अलावा कौर्पाेरेशन और दिल्ली डैवलपमैंट अथौरिटी भी हैं पर इस बड़े काम के लिए एक अजगर कम होगा, बाकी 2 अजगरों को भी ढीला होना पड़ेगा. अगर निवासियों को रहने का पक्का हक मिलेगा तो वे अपने मकानों को सुधारेंगे. खरीदफरोख्त बढ़ेगी. विरासत के बंटवारे के समय विवाद कम होंगे. गृह और संपत्ति कर में बढ़ोतरी होगी. कालाधन कम लगेगा. अरविंद केजरीवाल को लीजहोल्ड का तमाशा भी समाप्त करना चाहिए. जिस जमीन को सरकार ने बेचा है वह नागरिक की अपनी है और अनुबंध चाहे कैसा भी हो, सरकारी दखल समाप्त हो और पूरा शहर फ्रीहोल्ड माना जाए. यह एक आदेश से हो सकता है या कानून में छोटे संशोधन से. यह बड़ी राहत देने वाला छोटा काम होगा.

इस तरह का वैधअवैध खेल देशभर में चलता है. सिवा उस जमीन पर जिस पर सरकारी कब्जा पक्का था और सरकार उसे इस्तेमाल करती थी. सिर्फ जमीन पर बने मकान अवैध नहीं माने जाने चाहिए. ‘सब भूमि सरकार’ की का सिद्धांत नहीं चलना चाहिए. सरकार बनाम जनता में 100 प्रतिशत हक जनता का होना चाहिए. जो भी जहां भी मकान बनाता है उसे उस का हकदार माना जाना चाहिए. नदी, नालों, जंगलों, बागों पर कब्जे न हों, सरकार का काम केवल यही हो. भूमि अधिग्रहण कानून के अंतर्गत ली गई जमीन पर अगर पुराने मालिक ने मकान बनवा दिए हैं तो उन्हें सरकार को मान लेना चाहिए. सरकार जनता की सेवा के लिए है, जनता की मालिक नहीं, इस सिद्धांत को सरकारी अफसरों के दिमाग में ठूंसने की जरूरत है.

धर्म की धौंस

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एच एल दत्तू ने गुड फ्राइडे के दिन न्यायाधीशों का एक सम्मेलन कर विवाद पैदा कर दिया है. भारतीय जनता पार्टी के कट्टरवादी, विधर्मी विरोधी माहौल में यह सम्मेलन गुड फ्राइडे के दिन शायद किसी चूक के कारण आयोजित किया हो, यह संभव था पर सीनियर अधिवक्ता लिली थौमस और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की आपत्तियों के बाद यह गंभीर हो गया है. मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र में कुरियन जोसेफ ने यह तक लिख दिया कि क्या इस तरह के सम्मेलन दीवाली, होली या दशहरे को आयोजित किए जाने के उदाहरण हैं.

उत्तर में मुख्य न्यायाधीश का कहना कि एक जज के पारिवारिक कारणों से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण न्यायालय की संस्था है और संबंधित जज को अपने परिवार को यह बात समझानी चाहिए. असल में धार्मिक त्योहारों पर किसी तरह का जबरन अवकाश होना ही नहीं चाहिए. धर्म की धौंस कि जिस दिन वह कहे उस दिन सब लोग काम छोड़ कर धर्म के नाम पूजापाठ और उस से ज्यादा दानपुण्य में लग जाएं, गलत ही है. धार्मिक अवसरों पर, देवीदेवताओं या नेताओं के जन्मदिन पर अवकाश रखना अपनेआप में गलत है. अगर दीवाली या ईद जैसे त्योहार कुछ लोगों को मनाने हैं तो वे काम न करने को स्वतंत्र होने चाहिए. हरेक व्यक्ति साल में 4-5 दिन अपनी मरजी के दिन तय कर ले और उन दिनों में वह चाहे घर बैठे या कहीं अंधविश्वासी बन कर सिर टिकाए, लाइनों में लगे, जेबें कटाए, दानपुण्य करे, यह उस की अपनी इच्छा पर निर्भर होना चाहिए. दूसरे, पहले की तरह उस दिन काम करने के लिए स्वतंत्र होने चाहिए.

सरकारी अवकाश केवल 15 अगस्त, 26 जनवरी जैसे दिन होने चाहिए. कुछ और त्योहार इन में जोडे़ जा सकते हैं जैसे ग्रेगोरियन कैलेंडर का पहला दिन या अंतिम दिन. लगातार काम से राहत देने के लिए 2 माह में एक शुक्रवार को कुछ नाम दे कर सरकारी अवकाश दिया जा सकता है. धर्म के नाम पर छुट्टी करने का दुष्प्रभाव यह है कि अब अनजान पर्वों पर छुट्टी मांगी जाने लगी है. गुड फ्राइडे की तरह छठ, तरहतरह की ईदों, अंबेडकर जयंती, वाल्मीकि जयंती, कांशीराम जयंती, नेहरू जयंती, कांवड़ जयंती, तिरुपति जयंती, थैंक्सगिविंग और न जाने किसकिस दिन की छुट्टी मांगी जाने लगी है.

पूरा देश 10 दिन एकसाथ बंद रहे यह माना जा सकता है. पर इन दिनों के अतिरिक्त रविवारों को छोड़ कर पूरा देश 300 दिन काम करे, चाहे बैंक हों, राज्य सरकारें हों या केंद्र सरकार. हर व्यापारी को छूट हो कि वह चाहे जिस दिन अपनी दुकान या व्यापार बंद रखे. हर सरकारी कर्मचारी भी इन 10-12 दिनों के अलावा अपनी सालाना छुट्टियों में से किसी भी त्योहार पर छुट्टी ले. छुट्टियों का मानकीकरण अब बहुत आवश्यक है, केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में.

ईरान-अमेरिका परमाणु करार

ईरान से परमाणु करार करा कर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वह काम कर लिया है जिस की इस समय कल्पना नहीं की जा सकती थी कि जब पूरा पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका धार्मिक दंगों में जल रहा हो और ईरान एक तरफ अपने शिया समर्थकों को बचाने में लगा हो तो दूसरी ओर सुन्नी कट्टर वहशीपन पर उतरे हुए हों. जब बारूद बरस रहा हो तो शांति की बात करवा पाना और वाश्ंिगटन व तेहरान से दूर स्विट्जरलैंड में बैठ कर ऐसा करार करा लेना, जिस में ईरान ने परमाणु बम न बनाने की बात मान ली हो, एक आश्चर्य है. परमाणु नियंत्रण पर परमाणु हथियारों से लैस देश ही जोर दे रहे हैं, यह विडंबना है. पर जीवन ऐसा ही चलता है. जिस के हाथ में ताकत होती है वह दूसरों को हथियार छोड़ने को कहता है. पुलिस प्रतिबंध लगाती रहती है कि आम आदमी के पास हथियार न हों जबकि खुद अकारण गोलियां बरसाए तो कोई हर्ज नहीं. अमेरिकी संविधान ही ऐसा है जो आम नागरिकों को हथियार रखने का हक देता है ताकि सरकार सर्वशक्तिमान न बन सके. उसी अमेरिका ने ईरान को मनाफुसला व धमका कर परमाणु बम न बनाने को राजी किया है.

ईरान नतांज और अरक में अपने परमाणु संयंत्रों में हथियार बनाने योग्य एनरिच्ड प्लूटोनियम न बनाने को तैयार हो गया है और इंटरनैशनल एटौमिक एजेंसी द्वारा जांच भी होने देगा. बदले में ईरान पर लगी आर्थिक रोक हटेगी. यूरोपीय देशों व अमेरिका द्वारा व्यापार न करने की नीति से ईरान को बहुत संकटों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि न तो उस का तेल बिक पा रहा है, न उसे रोजमर्रा की चीजें मिल पा रही हैं जिन का उत्पादन दूसरे देशों में हो रहा है. बड़ी बात यह है कि ईरान का यह समझौता उस के आतंकवाद से दूर रहने का वादा लगता है. ईरान सीरिया व यमन में शियाओं को समर्थन दे रहा है और वह सुन्नी मुसलिमों की बढ़त को रोकने के लिए तत्पर है. आज इसलामी आतंक मुख्यतया सुन्नी मुसलिमों के हाथों में है. शियाओं को अमेरिकी समर्थन मिलने से वे भी थोड़ा कमजोर होंगे.यह समझौता यह भी साबित करता है कि देशों के विवाद हथियारों से नहीं, मेजों पर कागजों से सुलझाए जाते हैं. हथियारों से विजय हमेशा थोड़े समय के लिए मिलती है जबकि कागजी टैंक हमेशा के लिए जंग जीतते हैं. 

विदेशी हथियार

नरेंद्र मोदी लगातार विदेशों की यात्राओं पर जा रहे हैं. वे जहां भी जा रहे हैं वहां से हथियार खरीद कर ला रहे हैं. फ्रांस की यात्रा में उन्होंने 36 रैफेल लड़ाकू विमान खरीदे. फ्रांस का उन के प्रति आभार तो प्रकट करना ही था क्योंकि उन से पहले ये विमान केवल इजिप्ट के तानाशाह टाइप राष्ट्रपति अदेल फतह अलसीसी ने ही खरीदे थे. रूस से 45 मिग-29के विमान पहले ही खरीदे जा चुके हैं. अमेरिका से भारी मात्रा में हथियार खरीदे जा रहे हैं. अमेरिका से एफ-35 जेट विमान खरीदने की बात चल रही है. फरवरी में इसराईल से स्वचालित हवाई ड्रोन खरीदे गए हैं. इसराईल से 52 करोड़ डौलर की मिसाइलें भी खरीदी जा चुकी हैं.

जिस देश में 96 करोड़ लोग केवल 100 रुपए रोज पर जिंदगी गुजारते हैं, वह बिना खास वजह के हथियार खरीदता रहे तो इसे सही निर्णय नहीं कहा जा सकता. देश के गरीबों की छाती पर पांव रख कर लड़ाकू टैंक, हवाई जहाज, पनडुब्बियां और मिसाइलें नहीं खरीदी जा सकतीं. नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद गरीबी से छुटकारा दिलाने के लिए खास काम नहीं किए. मेक इन इंडिया, भ्रष्टाचार मुक्त भारत, स्वच्छ भारत जैसे नारे गरीबों के लिए नहीं, देश के अमीरों के लिए हैं. गरीबों को देने के लिए उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून को ढीला न करने के लिए कमर कस रखी है ताकि किसानों की जमीनें ले कर उन्हें और उन पर निर्भर गांव के मजदूरों व कारीगरों को बेघरबार करने का हक बना रहे.

हथियारों की खरीद मुफ्त में नहीं होती. उस के लिए पैसा देना होता है. और इस देश में कमाई देश का गरीब ही करता है. यहां नई खोजों से नाममात्र का पैसा मिलता है. यहां के इंजीनियर ऐसा कोई काम नहीं करते कि उन्हें दुनियाभर के ठेके मिलते रहें. यहां की बड़ी कंपनियों के पैर दुनियाभर में नहीं पसरे हैं, उलटे उन्होंने विदेशी कंपनियों को अपने शयनकक्ष में सुलाया है. हथियार जरूरी हैं पर विदेशों से खरीद कर सुरक्षा ऐसी ही है जैसे फटेहाल गरीब किसान लठैतों को घर में रख कर दूध, घी, मट्ठा पिलाए और खुद रूखी रोटी खाए. अगर नरेंद्र मोदी का हर देश, जहां वे जाते हैं, में स्वागत होता है तो इसलिए कि वे हवाई जहाज भर कर भारतीयों के खूनपसीने का पैसा ले कर वहां जा रहे हैं.

अगर भारत अपनी खोजों के बल पर भारत में हथियार बना रहा होता तो बात दूसरी थी. जापान, जरमनी, इसराईल, स्वीडन, दक्षिण कोरिया छोटे देश हैं पर वे अपनेआप हथियार बना कर निर्यात करते हैं. नरेंद्र मोदी की काबिलीयत तो तब होती जब देश के सैकड़ों कारखानों में हथियार बन रहे होते  विदेशी हथियारों के बल पर हम किसे डराना चाहते हैं? पाकिस्तान के पास तो जिहादियों की फौज है जो इन हथियारों से ज्यादा ताकतवर है. चीन की आर्थिक प्रगति अभी भी इतनी है कि भारत उस से युद्ध की सोच तक नहीं सकता. ये भारीभरकम हथियार क्या दूसरे छोटे देशों के काम आएंगे?

फ़िल्मी गॉसिप

मधुबाला की शादी

टीवी की दुनिया में अभिनेत्री द्रष्टि धामी पौपुलर चेहरा है. उन को ज्यादातर दर्शक फेमस सीरियल ‘मधुबाला’ में बेहतरीन अभिनय के लिए जानते हैं. हाल में उन्होंने अपने बौयफ्रैंड नीरज खेमका से शादी कर ली. वाइन शेड के लहंगे में द्रष्टि और गोल्डन व्हाइट शेरवानी में नीरज परफैक्ट कपल दिख रहे थे. मधुबाला की इस शादी में मेहमान, टीवी जगत और बौलीवुड के फ्रैंड्स थे. पहले खबर थी कि द्रष्टि टीवी छोड़ कर फिल्मी पारी शुरू करने जा रही हैं और करन जौहर की एक फिल्म के लिए उन्हें साइन भी कर लिया गया है. हालांकि बाद में सारी बातें महज अफवाह निकलीं और सब को चौंकाते हुए द्रष्टि ने अपना घर बसा लिया. अब जाहिर है कयास लगेंगे कि उन की टीवी की पारी लगभग खत्म हो गई क्योंकि शादी के बाद अभिनेत्रियों के साथ अकसर ऐसा ही होता है.

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काला सच

झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के गांवों में किसी भी नारी को डायन घोषित कर असरदार लोग उसे अपनी भोग्या बना कर मार डालते हैं. इसी काले सच पर आधारित फिल्म बनाई है निर्माता जितेंद्र सोनी और निर्देशक मयंक श्रीवास्तव ने. ‘काला सच द ब्लैक ट्रुथ’ फिल्म के माध्यम से निर्देशक समाज में महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आंदोलन छेड़ना चाहते हैं. महिला उत्पीड़न की वास्तविक घटना पर आधारित इस फिल्म में मुख्य कलाकार के रूप में पाखी हेगड़े, हिमानी शिवपुरी, मुश्ताक खान, संजय बत्रा, रफी खान और ब्रिजेश त्रिपाठी हैं. झारखंड के धनबाद के निकट के गांव में घटित घटना को आधार बना कर निर्देशक मयंक श्रीवास्तव ने पूरी घटना पर शोध किया और फिर स्क्रिप्ट तैयारी की. शूटिंग भी उन्हीं स्थानों पर जा कर की. देखते हैं लोग फिल्म से कितने प्रभावित होते हैं.

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सैंसरबाजी पर बवाल

फिल्मों में बोल्ड कंटैंट और गालीगलौज को ले कर सैंसर बोर्ड और निर्मातानिर्देशकों में ठनी हुई है. सैंसर बोर्ड ने हिंदी और अंगरेजी के कुल 28 शब्दों को फिल्मों में इस्तेमाल करने पर रोक लगाने की बात कही तो फिल्म बिरादरी में इस का विरोध होते देख सैंसर बोर्ड थोड़ा पीछे हटा है. बोर्ड की ताजा बैठक में तय हुआ कि शब्दों पर रोक लगाने का फैसला फिलहाल टाल दिया जाए. गौरतलब है कि पहले सैंसर बोर्ड रिश्वतखोरी मामले में अपनी काफी फजीहत करवा चुका है और अब इस मसले पर उस की काफी आलोचना हो रही है. दरअसल, सैंसर बोर्ड के नए चीफ पहलाज निहलानी के आदेश पर बवाल मचा है. बहरहाल, देखना दिलचस्प होगा कि सैंसर बोर्ड और फिल्म बिरादरी के बीच कौन अपनी बात मनवा पाता है.

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सिनेमा बचाओ मुहिम

सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं है बल्कि सिनेमा के जरिए ही हम उस दौर के माहौल, कल्चर को जानते और समझते हैं. लेकिन अफसोस की बात यह है कि सिनेमा को सहेजने के लिए कोई ठोस प्रयास न होने के चलते कई दुर्लभ फिल्मों के पिंट नष्ट हो चुके हैं. फिल्म हैरिटेज फाउंडेशन द्वारा एक कार्यशाला का आयोजन किया गया जिस के तहत पुरानी फिल्मों को संरक्षित करने और देखरेख पर जोर दिया गया. इस कार्यशाला में अमिताभ बच्चन, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और फिल्म से जुड़ी कई जानीमानी हस्तियां शामिल हुईं. इन सभी ने कहा कि फिल्मों को बचाना हमारी संस्कृति को बचाने के समान है. उम्मीद है यह पहल अपने उद्देश्य से नहीं भटकेगी.

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औस्कर का मेला

लंबे इंतजार के बाद आखिर औस्कर अवार्ड की घोषणा हो ही गई. दुनियाभर की फिल्मों ने अलगअलग श्रेणियों में कई पुरस्कार झटके जबकि हमेशा की तरह कोई भी भारतीय फिल्म विदेशी फिल्मों की श्रेणी में अवार्ड नहीं जीत सकी. इस बार के अवार्ड समारोह में बर्डमैन ने बाजी मारते हुए बैस्ट फिल्म का खिताब अपने नाम किया. वहीं, एडी रेडमायन को ‘थ्योरी औफ एवरीथिंग’ के लिए बैस्ट मेल ऐक्टर और जूलियन मूर को ‘स्टिल एलिस’ के लिए बैस्ट अभिनेत्री का औस्कर पुरस्कार मिला. 87वें एकेडमी अवार्ड्स समारोह में पोलैंड की फिल्म ‘इदा’ बेस्ट फौरेन लैंग्वेज फिल्म के पुरस्कार से नवाजी गई. बैस्ट एनिमेशन फिल्मों की दौड़ में ‘बिग हीरो 6’ ने बाजी मारी.

फिल्म समीक्षा

बदलापुर

‘बदलापुर’ बदले वाली फिल्म है. अब तक बौलीवुड में बदले पर जितनी भी फिल्में बनी हैं, सभी में बहुत खूनखराबा दिखाया जाता रहा है.  ‘बदलापुर’ कुछ अलग किस्म की है. ऐसा नहीं है कि इस फिल्म में हिंसा नहीं है, नाममात्र की है. असल में यह एक साइकोलौजिकल थ्रिलर फिल्म है. निर्देशक श्रीराम राघवन ने फिल्म की कहानी को नए तरीके से पेश किया है. इस तरह की कहानियों को डार्क कहानियां कहा जाता है जिन्हें हिंदी में श्यामा कहा जा सकता है. इन में सभी काम खलनायकी व्यवहार वाले होते हैं. इन कहानियों का अलग मजा होता है और जीवन के ये अधिक निकट होती हैं. ‘बदलापुर’ का हीरो वरुण धवन है, जो अब तक 2-3 फिल्में कर चुका है. अब तक उस ने कौमेडी और कूदनेफांदने वाली भूमिकाएं ही की हैं. इस फिल्म में उस ने मैच्योर ऐक्ंिटग की है. वह काफी परिपक्व लगा है. निर्देशक ने उस के किरदार को काफी गंभीर बनाया है. वह सोचीसमझी चाल के तहत अपना बदला पूरा करता है. हालांकि फिल्म देखते वक्त शुरू में ही आभास हो जाता है कि नायक कैसे और किस से बदला लेगा लेकिन फिर भी दर्शक कुछ हद तक बंधे से रहते हैं, यह जानने के लिए कि नायक का बदला लेने का तरीका क्या होगा.

श्रीराम राघवन ने खुद की लिखी कहानी और पटकथा का बढि़या ट्रीटमैंट किया है. राघव उर्फ रघु (वरुण धवन) एक नौजवान है. वह अपनी पत्नी मीशा (यामी गौतम) और बेटे के साथ रहता है. अचानक एक दिन एक बैंक डकैती के दौरान बैंक लुटेरे मीशा और उस के बेटे को किडनैप कर मार डालते हैं. बैंक डकैती में शामिल एक युवक लायक (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) पकड़ा जाता है और दूसरा हरमन (विनय पाठक) फरार हो जाता है. लाख कोशिशों के बाद भी लायक अपने पार्टनर का नाम पुलिस को नहीं बताता. उसे 20 साल की सजा हो जाती है.

उधर रघु हर पल कातिल से बदला लेने के बारे में सोचता रहता है. बदला लेने के मकसद से वह छोटे से शहर बदलापुर पहुंचता है. वहां उसे कातिलों के बारे में पता चलता है, जो बैंक डकैती में शामिल थे. वह पहले लायक की प्रेमिका झिमली (हुमा कुरैशी) की मदद से लायक तक पहुंचता है, जो 15 साल की सजा काट कर रिहा हुआ है. फिर उसे उस के दूसरे साथी हरमन का पता चलता है, जो अपनी पत्नी कोको (राधिका आप्टे) के साथ ऐयाशी की जिंदगी गुजार रहा है. राघव हरमन और उस की बीवी की हत्या कर देता है. हरमन को मारने से पहले वह उस से ढाई करोड़ रुपए ले लेता है जो लायक का हिस्सा था. पुलिस अफसर का शक राघव पर है. वह राघव को ब्लैकमेल करता है और ढाई करोड़ रुपए देने को कहता है. इधर लायक को यह महसूस हो जाता है कि राघव उसे भी जान से मार डालेगा. वह हरमन और कोको की हत्या का इलजाम अपने सिर लेता है और फिर से जेल पहुंच जाता है. इस तरह राघव का बदला पूरा होता है और वह अपने शहर लौट जाता है. फिल्म की पटकथा काफी कसी हुई है. हालांकि फिल्म बीचबीच में झटके भी देती है और कई दृश्य अनावश्यक से लगते हैं, फिर भी निर्देशक की पकड़ बनी रहती है. निर्देशक ने किरदारों को डार्कशेड में दिखाया है. फिल्म के संवाद अच्छे हैं. वरुण धवन का काम तो अच्छा है ही, नवाजुद्दीन सिद्दीकी का अभिनय भी शानदार है. फिल्म देखते वक्त दर्शक इन दोनों किरदारों से खुद को जुड़ा सा महसूस करते हैं. फिल्म में सभी कलाकारों ने चरित्र भूमिकाएं ही निभाई हैं, कोई भी कलाकार पूरी तरह हीरो या हीरोइन नहीं है. यामी गौतम को कम फुटेज दी गई है, फिर भी उस ने खुशनुमा ऐक्ंिटग की है. हुमा कुरैशी ने वेश्या का किरदार निभाया है. राधिका आप्टे ने अपनी ऐक्ंिटग से चौंकाया है. दिव्या दत्ता साधारण है. फिल्म का गीतसंगीत पक्ष अच्छा है. छायांकन अच्छा है.

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रौय

यह फिल्म रूखीरूखी सी, उदासी में लिपटी हुई है. फिल्म में न तो ऐक्शन है न कौमेडी, न ड्रामा और न ही उत्तेजना देने वाला रोमांस. जैकलीन फर्नांडिस और अर्जुन रामपाल के लिप टु लिप किस सीन देख कर दर्शकों को सिहरन नहीं हो पाती क्योंकि अर्जुन रामपाल की बढ़ी दाढ़ी और खिचड़ी बाल देख कर दर्शकों को मजा ही नहीं आ पाता. रणबीर कपूर के साथ भी जैकलीन के किस सीन हैं, वे भी दर्शकों को गरमाई नहीं दे पाते, क्योंकि रणबीर कपूर पूरी फिल्म में बुझाबुझा सा नजर आया है. जहां तक फिल्म की कहानी की बात है, कहानी एकदम सुस्त है. कहानी को आगे बढ़ाने में निर्देशक विक्रमजीत सिंह को काफी मशक्कत करनी पड़ी है. फिल्म में एक किरदार कहता भी है कि जब कहानी आगे नहीं बढ़ रही हो तो उसे वहीं खत्म कर देना चाहिए. निर्देशक विक्रमजीत सिंह की यह पहली फिल्म है. उस ने अपना पूरा ध्यान जैकलीन फर्नांडिस पर ही केंद्रित किया है. जैकलीन ने सिर्फ एक गाने ‘चिट्टियां कलाइयां वे’ में अपनी सैक्सी परफौर्मेंस दे कर डांस किया है. यह गाना दर्शकों को पसंद आएगा. वैसे फिल्म में जैकलीन की दोहरी भूमिका है परंतु दोनों ही भूमिकाओं में वह एक जैसी ही लगी है.

फिल्म की कहानी शुरू होती है एक फिल्ममेकर कबीर गे्रवाल (अर्जुन रामपाल) से. एक फिल्म निर्माता कबीर के निर्देशन में एक फिल्म बनाना चाहता है परंतु कबीर को फिल्म की कहानी पर अभी सोचना बाकी है. वह स्क्रिप्ट पर काम शुरू करता है. वह एक बैंक में पड़ी डकैती की घटना पर काम शुरू करता है. शूटिंग के लिए वह मलयेशिया जाता है, जहां पहले से लंदन की एक फिल्म मेकर आयशा (जैकलीन फर्नांडिस) अपनी एक फिल्म की शूटिंग करने आई हुई है. कबीर और आयशा में नजदीकियां बढ़ती हैं. वह अपनी स्क्रिप्ट पर काम शुरू करता है. उस की कहानी का हीरो रौय (रणबीर कपूर) एक चोर है जो पेंटिंगें चुराता है. कबीर अपनी फिल्म के लिए आयशा की शक्ल से मिलतीजुलती एक लड़की टिया (जैकलीन की दूसरी भूमिका) को लेता है. टिया रौय से प्यार करती है. तभी एक दिन आयशा कबीर से नाराज हो कर चली जाती है. आयशा के जाने के बाद कबीर निराश हो जाता है. लेकिन फिर वह एक दिन फिल्म पूरी करने का फैसला लेता है और पूरी भी कर लेता है. फिल्म हिट होती है और कबीर आयशा से मिलने हौंगकौंग जाता है. वहां आयशा फिर से उस की बांहों में आ जाती है. दूसरी तरफ टिया और रौय भी एकदूसरे का हाथ थाम लेते हैं.

फिल्म की यह कहानी दुनिया के सब से बड़े चोर रौय से शुरू होती है. रौय की डिक्शनरी में कोई भी काम नामुमकिन नहीं है. परंतु जल्दी ही यह कहानी कबीर और आयशा पर केंद्रित हो जाती है. रौय के किरदार में कोई रहस्य नजर नहीं आता. फिल्म की लंबाई भी बहुत ज्यादा है. इसे कम से कम आधा घंटा कम किया जा सकता था. कई सीन तो बहुत ज्यादा लंबे हो गए हैं. फिल्म की फोटोग्राफी बहुत अच्छी है. मलयेशिया की खूबसूरती को कैमरामैन ने अपने कैमरे में कैद किया है. फिल्म के गाने भी अच्छे हैं, पहले से ही खूब बज रहे हैं.

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एमएसजी : द मैसेंजर

आखिरकार डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत रामरहीम की फिल्म ‘एमएसजी’ रिलीज हो ही गई. फिल्म के पहले दिन थिएटरों में ज्यादातर उस के समर्थक ही फिल्म देखने पहुंचे. इस फिल्म को बड़े बजट की डौक्यूमैंटरी फिल्म कहना ज्यादा उपयुक्त होगा. फिल्म में डेरा प्रमुख रामरहीम की स्तुति की गई है. फिल्म का निर्माण खुद डेरा प्रमुख ने किया है. हमारे देश में बाबाओं की कमी नहीं है. ये बाबा उलटेसीधे चमत्कार दिखा कर अपने शिष्यों को बेवकूफ बनाते हैं और उन का शोषण तक करते हैं. इस फिल्म में रामरहीम के नाम पर चमत्कारिक घटनाओं को जोड़ा गया है. फिल्म इस तथाकथित धर्मगुरु की कहानी पेश करती है. फिल्म में बाबा रामरहीम लोगों को शराब और ड्रग्स की लत से दूर कर अपना अनुयायी बनाता है तो शराब माफिया उस का दुश्मन बन जाता है लेकिन रामरहीम अपनी चमत्कारिक शक्तियों से अपने शिष्यों को ड्रग और शराब माफिया से बचाता है. आम आदमी के रूप में क्या यह आंदोलन नहीं छेड़ा जा सकता.

यह फिल्म बनाना, अपनी चमत्कारी शक्तियों का प्रचार करना एक नए प्रकार का पाखंड है. फिल्म की क्वालिटी बेहद खराब है. फिल्म में नाचगाने भी हैं और रामरहीम की बेकार की ऐक्ंिटग भी है. इस फिल्म के विरोध में पंजाब और हरियाणा के शहरों में खूब प्रदर्शन हुए हैं.

कुआलालंपुर : खूबसूरती और हरियाली का संगम

मलय भाषा में कुआलालंपुर का अर्थ है कीचड़भरी नदियों का संगम (कुआला=संगम, लंपुर=कीचड़), क्योंकि यह नगर क्लांग तथा गंबक नामक 2 कीचड़भरी नदियों के संगम पर बसा है. बधाई हो मलयेशिया निवासियों को, जिन्होंने उस कीचड़ में भी कुआलालंपुर रूपी कमल उगा दिया है. नगर के बाहरी भागों में ही नहीं, बल्कि पूरे मलयेशिया में ताड़ के पेड़ों व अन्य हरेभरे वृक्षों की शान देखते ही बनती है. कुआलालंपुर का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा नगर के मध्य भाग से लगभग 50 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है. उत्तम तथा चौड़े राजपथों (ऐक्सप्रैस-वेज) के फलस्वरूप तूफानी गति से दौड़ती टैक्सियां यह विशाल दूरी केवल 30-35 मिनटों में ही पूरी कर लेती हैं. रास्ते के दोनों तरफ लगे ताड़ के घने जंगल मन मोह लेते हैं. इस तरह कुआलालंपुर को वास्तव में कीचड़ भरी नदियों का संगम न कह कर खूबसूरती और हरियाली का संगम कहना उचित होगा. उल्लेखनीय है कि मलयेशिया तथा कुआलालंपुर की सारी समृद्धि व प्रगति पिछले 40-50 वर्ष में ही हुई है.

मलयेशिया की राजधानी कुआलालंपुर अपने संक्षिप्त नाम ‘केएल’ के नाम से प्रचलित है जिसे सभी स्थानीय निवासी तथा विदेशी पर्यटक जानते हैं. दक्षिणपूर्व एशिया का व्यस्त नगर होने के साथसाथ ‘केएल’ एक खूबसूरत नगर भी है तथा इस की सुंदरता नएनए शौपिंग मौल्स, गगनचुंबी भवनों, फ्लाईओवरों तथा राजपथों आदि के बन जाने के कारण बढ़ती ही जा रही है. कुआलालंपुर का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा अति आधुनिक तथा विशाल है जहां लगभग 40 अंतर्राष्ट्रीय तथा स्थानीय हवाई कंपनियों की सेवाएं संचालित होती हैं. हमारे देश के दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता, बेंगलुरु से कुआलालंपुर के लिए उड़ान सेवाएं उपलब्ध हैं. इस हवाई अड्डे के अंदर अनेक दुकानें हैं जिन का उपयोग वे पर्यटक भी कर सकते हैं जो कुआलालंपुर में रुकते नहीं हैं, केवल गुजरते हैं अर्थात ट्रांजिट करते हैं. कुआलालंपुर पहुंचने के बाद भारतीय समय के अनुसार घड़ी को ढाई घंटे आगे करना पड़ता है.

तीन संस्कृतियों का देश

वास्तव में मलयेशिया 3 प्रमुख संस्कृतियों, मलय (57 प्रतिशत), चीनी (33 प्रतिशत) तथा भारतीय (10 प्रतिशत) का संगम है. कुआलालंपुर में अनेक भारतीय मूल के निवासी नजर आ जाएंगे. इन में से अधिकतर लोग ऐसे हैं जिन के पूर्वज अंगरेजों के जमाने में रबर बागानों में काम करने के प्रयोजन से लाए गए थे तथा पिछली कई पीढि़यों से यहां पर बसे हुए हैं. इन में तमिलभाषियों की बहुलता है. इसी कारण मलयेशिया में अनेक स्थानों पर तमिल भाषा बोली व समझी जाती है. यहां पर तमिल भाषा के अनेक समाचारपत्र भी प्रकाशित होते हैं तथा तमिल भाषा को देश की एक सरकारी भाषा का भी दरजा प्रदान किया गया है. मलयेशिया में सिख संप्रदाय के भी कई लोग हैं, जिन में से अधिकतर पुलिस या दूसरे रक्षा संगठनों में नियुक्त हैं. उन के पगड़ी बांधने की शैली भारतीय सिखों की शैली से थोड़ी अलग सी है, इसलिए वे भारतीय सिखों से कुछ भिन्न दिखते हैं.

मलयेशिया एक मुसलिम राष्ट्र है, किंतु यहां पर हिंदू, बौद्ध, ताओ (चीनी) तथा ईसाई धर्मों को भी पर्याप्त सम्मान दिया जाता है. दीवाली तथा क्रिसमस यहां के प्रमुख त्योहार हैं जिन पर यहां सार्वजनिक अवकाश रहता है.

दर्शनीय स्थल

कुआलालंपुर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में सर्वप्रथम गगनचुंबी जुड़वां इमारत पेट्रोनास टावर्स तथा मेनारा कुआलालंपुर का नाम आता है. पेट्रोनास टावर्स 88 मंजिली तथा 452 मीटर ऊंची जुड़वां इमारतें हैं. वर्ष 1999 में निर्मित ये टावर्स कुआलालंपुर के अति आधुनिक व्यावसायिक क्षेत्र केएल सिटी सैंटर में स्थित हैं. विचित्र बात तो यह है कि यद्यपि पेट्रोनास टावर्स की जुड़वां इमारतें बिलकुल एकजैसी दिखती हैं परंतु उन का निर्माण भिन्नभिन्न कंपनियों द्वारा किया गया है. 170 मीटर की ऊंचाई पर इन इमारतों को एक हवाई पुल द्वारा जोड़ा गया है. कुआलालंपुर की दूसरी भव्य इमारत 421 मीटर ऊंची ‘मेनारा कुआलालंपुर’ है जिस का निर्माण 1995 में हुआ था. इस मीनार का निर्माण वस्तुत: दूरसंचार के प्रयोजन से किया गया था किंतु इसे पर्यटकों के लिए भी खोल दिया गया है. मेनारा में 276 मीटर की ऊंचाई पर दर्शकों के लिए खानपान की सुविधाएं उपलब्ध हैं, जहां से वे नगर के विहंगम दृश्यों का आनंद ले सकते हैं. ‘मेनारा कुआलालंपुर’ में पर्यटकों का मेला सा लगा रहता है.

कुआलालंपुर का एक अन्य आकर्षण नगर के उत्तर में स्थित ‘बातू गुफाएं’ हैं. प्राकृतिक रूप से चूनापत्थरों से निर्मित ये गुफाएं वास्तव में हिंदुओं के पूजा स्थल हैं, जिन में मूर्तियों का निर्माण 1878 में किया गया था. गुफाओं तक पहुंचने के लिए 272 सीढि़यों की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है. जहां पर सुब्रमण्यम की प्रतिमा स्थापित है. कुआलालंपुर का एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल ‘लेक गार्डन’ है जिस के अंतर्गत पक्षी पार्क, तितली पार्क, औरकिड पार्क तथा हिबिस्कस पार्क (गुड़हल पार्क) आते हैं. यहां पर यह बताया जा सकता है कि हिबिस्कस अर्थात गुड़हल मलयेशिया का राष्ट्रीय फूल है, इस के विकास व सुधार पर यहां बहुत ध्यान दिया जाता है. नैशनल लाइब्रेरी यहां का प्रसिद्ध पुस्तकालय है जिस की नीली रंग वाली छत वास्तुकला का एक उत्तम नमूना है. इस के अलावा कुआलालंपुर में सुंदर तथा पुरानी वास्तुकला से युक्त अनेक भवन बने हैं जैसे यहां का पुराना रेलवे स्टेशन, सुलतान अब्दुल समद भवन इत्यादि. अन्य पर्यटन आकर्षणों में नैशनल मसजिद, पुत्रा मसजिद, नैशनल म्यूजियम आदि भी देखने योग्य हैं. कुआलालंपुर को प्राचीनता तथा आधुनिकता का संगम माना जाता है.

कुआलालंपुर में ठंडक अधिक नहीं होती है, इसलिए हलके सूती वस्त्रों से काम चल जाता है. किंतु यहां बारिश बहुत होती है. हां, यदि कुआलालंपुर से आगे किसी पर्वतीय स्थान जैसे जैंटिंग हाईलैंड्स जाना हो तो वहां पर हलके गरम वस्त्रों की आवश्यकता पड़ सकती है.

खानपान

खानपान की दृष्टि से कुआलालंपुर में मलय तथा चीनी व्यंजनों की बहुलता है. इस के अलावा वहां अनेक भारतीय व्यंजन (अधिकतर मांसाहारी) भी उपलब्ध हैं. उदाहरण के लिए चिकन पुलाव, नान, परांठे, तंदूरी चिकन, कोरमा, मछली आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं. दक्षिण भारतीय शाकाहारी व्यंजनों में इडली, दोसा, बड़ा, सांभर, चावल आदि भी खूब मिलते हैं. सत्य यहां का प्रसिद्ध लोकप्रिय मलय व्यंजन है, जो काफी कुछ भारतीय कबाब जैसा होता है. कुआलालंपुर एक मध्यवर्गीय होटल 100 से 200 रिंगित (1 मलयेशियाई रिंगित यानी 18 भारतीय रुपए) तथा उच्च वर्गीय होटल 250 से 350 रिंगित या अधिक में उपलब्ध हैं. छोटे होटलों का खाना 20-35 रिंगित (लगभग 350 से 700 भारतीय रुपए) तथा बड़े होटलों का भोजन 40-55 रिंगित (लगभग 800 से 1200 भारतीय रुपए) में मिल जाता है.

जैंटिंग हाईलैंड्स

कुआलालंपुर जाने के बाद यदि जैंटिंग हाईलैंड्स न देखा जाए तो कुआलालंपुर की यात्रा अधूरी मानी जाएगी. यह स्थान कुआलालंपुर से वहां के तीव्र वाहनों द्वारा लगभग 1 घंटे में पहुंचा जा सकता है. सागर तल से 2 हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित जैंटिंग हाईलैंड्स एक पर्वतीय स्थल है. जहां का तापमान 15 से 30 डिगरी सैल्सियस तक रहता है. यहां पर ठंडी हवा तथा खूबसूरत फिजाएं पर्यटकों का मन मोह लेती हैं. यह एक सुप्रसिद्ध मनोरंजन का केंद्र है जिसे दक्षिणपूर्व एशिया का ‘लास वेगास’ भी कहा जाता है. जैंटिंग हाईलैंड्स में अनेक विशाल तथा भव्य होटल, थीम पार्क, शौपिंग मौल्स तथा कई कैसिनो (जुआघर) स्थित हैं. इस स्थान पर पहुंचने के बाद पर्यटक अपनी सारी चिंताओं व थकावट से मुक्ति पा लेता है.    

मौसम

यहां साल भर एक जैसा मौसम रहता है. इसलिए आप यहां कभी भी जा सकते हैं. वैसे जब भारत में कड़ाके की ठंड या फिर बहुत अधिक गरमी पड़ रही हो तो मलयेशिया का रुख कर सकते हैं. यहां का तापमान 21 डिगरी से 32 डिगरी तक रहता है.

खरीदारी का अड्डा

कुआलालंपुर खरीदारी के लिए भी मशहूर है. यहां इतने अधिक शौपिंग मौल्स तथा फुटकर दुकानें उपलब्ध हैं कि पर्यटक खरीदारी करतेकरते थक जाएगा किंतु दुकानें खत्म होने का नाम नहीं लेती हैं. शौपिंग के लिए मशहूर क्षेत्रों में तुंकू अब्दुल रहमान स्ट्रीट, जालान बुकित बिंतांग, जालान सुलतान इसमाइल, जालान इम्बी अग्रणी हैं. भारतीय पर्यटकों के लिए एक आकर्षक स्थान मसजिद इंडिया है जहां उचित मूल्यों पर अनेक प्रकार के लुभावने सामान जैसे रेडीमेड कपड़े, खिलौने, सूटकेस, इलैक्ट्रौनिक चीजें इत्यादि मिल जाती हैं. इस के अलावा यहां का चाइना टाउन भी खरीदारी के दीवानों का खास स्थान है. चाइना टाउन के पेटलिंग स्ट्रीट के स्टाल तो सामान से भरे पड़े रहते हैं, जहां हीरेजवाहरात से ले कर चीनी सुगंधियों तक सबकुछ मिल जाता है. यहां पर रात के समय तो दुकानदारी और भी रंग पकड़ लेती है जब ग्राहक फुरसत के वक्त पहुंच कर खरीदारी का आनंद लेते हैं.

कुआलालंपुर में खरीदारी के लिए लोकप्रिय स्थल वहां के रात्रि बाजार (पसार मलम) हैं जो शाम के समय खुले मैदान में लगते हैं तथा देर रात तक चलते हैं. वहां पर भांतिभांति की उपयोग की वस्तुएं सस्ती तो मिलती ही हैं साथ ही मोलभाव भी खूब होता है. कुआलालंपुर का सैंट्रल मार्केट हस्तशिल्प तथा हस्तकला के लिए जाना जाता है. वह कुछकुछ दिल्ली के ‘दिल्ली हाट’ जैसा लगता है.

जरूरी बातें

वैसे तो कहीं भी जाने के लिए उस देश के तौरतरीकों का ध्यान रखना ही चाहिए. मलयेशिया एक मुसलिम देश है. इसलिए अगर किसी महिला से हाथ मिलाना हो तो आप पहल न करें, उन्हें पहल करने दें. अगर आप पहल करेंगे तो यह ठीक नहीं समझा जाता है. इस के अलावा किसी के घर जा रहे हैं तो जूते या चप्पल उतार कर जाएं. कोई ऐसी बात न करें जिस से बात बिगड़े.

कैसे पहुंचें

कुआलालंपुर के लिए दिल्ली, चेन्नई आदि शहरों से कई एअरलाइंस उड़ानें भरती हैं. अगर आप का प्लान पड़ोसी देशों थाईलैंड, इंडोनेशिया या फिर सिंगापुर होते हुए मलयेशिया जाने का है तो वहां से रेल या सड़क मार्ग से मलयेशिया जाया जा सकता है.

कहां ठहरें

कुआलालंपुर में घूमनेफिरने के बेहतरीन अड्डों के साथ रहने के होटल भी हर बजट में उपलब्ध हैं. अगर शुरुआती बजट से शुरू करें तो केएलसीसी का सिटी पार्क होटल 40 से 50 रिंगित में उपलब्ध है. स्टैंडर्ड बजट में चाइनाटाउन का होटल चाइनटाउन 2 पर्यटकों को खासा भाता है. यहां का किराया 60 रिंगित प्रतिदिन के हिसाब से लगता है. अगर सुपीरियर श्रेणी के होटल्स में ठहरना हो तो ग्रांड पैसिफिक होटल (चाउ फिट स्थित), द फाइव ऐनीमेंट होटल (के एल सेंटल) और शाह आलम स्थित अलामी गार्डन होटल बेहतर विकल्प हैं. यहां का किराया औसतन 700 से 100 रिंगित के बीच रहता है. वहीं फर्स्ट क्लास श्रेणी व डीलक्स श्रेणी में डी बुटीक, विवाटेल, 5 नोमाड सुकापा और सेरी पैसिफिक हैं जिन के लिए प्रतिदिन के हिसाब से 150 से 500 रिंगित तक खर्च करना पड़ता है.

अंतरंग दृश्य फिल्माना आसान नहीं : करण सिंह ग्रोवर

धारावाहिक ‘कितनी मस्त है जिंदगी’ से कैरियर की शुरुआत करने वाले करण सिंह ग्रोवर अभिनेता के साथसाथ मौडल भी हैं. अभिनय से पहले वे मौडलिंग, रैंप शो, विज्ञापन और रेडियो शो के आयोजन किया करते थे.

दिल्ली में जन्मे करण का नाम हमेशा उन के कोस्टार के साथ जुड़ता रहा. पहले उन की दोस्ती टीवी अभिनेत्री बरखा बिष्ट के साथ ‘कितनी मस्त है जिंदगी’ के दौरान हुई. उन की सगाई भी हुई थी पर 2006 में दरार आ गई. 2007 में लोकप्रिय अभिनेत्री श्रद्धा निगम के साथ डेटिंग और शादी. किसी वजह से केवल कुछ ही दिनों में शादी टूटी और जेनिफर विंगेट उन के जीवन में आई. वर्ष 2012 में दोनों ने शादी की और अपनी जिंदगी अच्छी तरह बिता रहे थे, लेकिन अब वे अलग हो चुके हैं.

आप ने ‘अलोन’ फिल्म से डेब्यू किया है. छोटे परदे से बड़े परदे पर आने में आप का अनुभव कैसा रहा?

छोटे परदे से बड़े परदे पर आने से खुशी तो होती ही है पर थोड़ीबहुत नर्वसनैस भी होती है. क्योंकि टीवी पर अगर पहले एपिसोड में रेटिंग कम हो तो दूसरे और तीसरे में सुधारने का मौका मिलता है. वहीं फिल्म में केवल 3 घंटे दर्शकों का ध्यान फिल्म की ओर रहता है. इस में वे मनोरंजन के लिए आते हैं. अगर फिल्म ठीक रही तो वे संतुष्ट हो जाते हैं और अगर नहीं तो उन का मूड खराब हो जाता है. और आप उन की नजर में गिर जाते हैं. इसलिए मैं ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है कि दर्शक हमेशा के लिए मेरे साथ जुड़ जाएं और उन का प्यार मिलता रहे.

आप के और बिपाशा के अंतरंग दृश्यों की काफी चर्चा है, इसे आप कैसे लेते हैं?

चर्चा के बारे में मैं अधिक नहीं सोचता. घर वालों की प्रतिक्रिया तो मैं उन के साथ मिल कर ही समझ लेता हूं. मैं इस सीन को ले कर काफी नर्वस था. हालांकि स्क्रिप्ट के दौरान यह पता लग चुका था कि ऐसा दृश्य होगा परंतु दृश्य फिल्माते समय कई विचार मेरे अंदर आए. मसलन, मैं पहली बार किसी नामचीन अभिनेत्री के साथ काम कर रहा था. पूरी यूनिट, 4 कैमरे, कोरियोग्राफर, निर्देशक आदि सभी थे. ऐसे में अगर मेरा सीन ठीक नहीं हुआ तो मेरे लिए यह गलत बात होगी कि मैं ने अपनी वजह से किसी को दृश्य रीटेक करने पर मजबूर किया. मेरे लिए यह पहली बार था पर बिपाशा ऐसे अंतरंग दृश्य कई बार फिल्मा चुकी है. उस ने बतौर ऐक्टर पूरा सहयोग दिया.

आप अपनी बौडी के लिए काफी मशहूर हैं, अपनी फिटनैस कैसे बनाए रखते हैं?

मैं कभी वर्कआउट बंद नहीं करता. 1 या 2 घंटे अवश्य वर्कआउट करता हूं. मैं अपनी डाइट में प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाडे्रट, फाइबर सब गिन कर खाता हूं. हर दिन हर ‘मील’ मेरा ऐसा ही होता है. अगर कभी बड़ा पाव खाने का मन हुआ तो एक साथ 10 खा जाता हूं. तब मैं कैलोरी नहीं गिनता क्योंकि एक बड़े पाव से मैं खुश नहीं हो सकता. मैं बिपाशा के फिटनैस मंत्र से बहुत प्रभावित हूं. बिपाशा शूटिंग के दौरान कभी भी वर्कआउट ‘मिस’ नहीं करती.

आप के और जेनिफर के रिश्ते को ले कर चर्चा है, इस में कितनी सचाई है?

हमारे रिश्ते टूट चुके हैं, यह सही है. जेनिफर कुनाल कोहली की फिल्म में काम कर रही है. हम दोनों अब अलग हैं. अब आगे मैं किसी रिलेशनशिप पर नहीं जाना चाहता.

टीवी से आप ने क्या सीखा?

टीवी से मेरी जर्नी शुरू हुई है. उस में रह कर मैं ने धैर्य, उत्सुकता और अच्छा काम करने की चाहत सीखी है. अभी भी अगर टीवी पर काम मिलेगा तो अवश्य करूंगा.   द्य

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