‘कौन कहता है आसमान में सूराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो...’ एक कविता की इन पंक्तियों को बिहार में सदियों से जमी पोंगापंथ की गंदगी को साफ करने में लगे कुछ लोग सच साबित कर रहे हैं. अंधविश्वास और पाखंडी बाबाओं के किले को ढहाने के लिए शुरू की गई छोटीछोटी कोशिशें, धीरेधीरे ही सही, रंग लाने लगी हैं. ऐसे लोगों पर पाखंड के धंधेबाजों ने कई दफे हमले भी किए पर उन्होंने हार नहीं मानी और अपने मकसद में लगे रहे. फिल्म ‘पीके’ ने न सिर्फ देश के सामाजिक और रूढि़वादी तानेबाने पर सीधा प्रहार कर पोंगापंथ के खिलाफ उठ रही आवाजों को मजबूती दी बल्कि मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारा और चर्च के नाम पर सियासी रोटियां सेंकने वालों व पाखंड की दुकान चलाने वालों के चेहरे से नकाब हटाने की पुरजोर कोशिश की.

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