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मशरूम की छांव में पनपता रोजगार

मशरूम मृत कार्बनिक पदार्थों पर उगने वाला एक कवक होता है. इसे खुंब, छतरी व कुकुरमुत्ता के नामों से भी जाना जाता है. इस की खासीयत यह है कि दूसरे कृषि उत्पादों की तरह इस के उत्पादन के लिए लंबेचौड़े खेतों का होना जरूरी नहीं है. इस का उत्पादन बंद कमरे में थोड़ी सी जगह में भी आसानी से किया जा सकता है. यही वजह है कि मौजूदा समय में मशरूम उत्पादन के क्षेत्र में पुरुषों के साथसाथ महिलाओं को भी रुचि लेते देखा जा सकता है. व्यावसायिक स्तर पर उगाई जाने वाली खुंबियों में एगेरिकस बाइस्पोरस (यूरोपियन टैंपरेट या व्हाइट बटन मशरूम), वालवेरियल्ला (पेडो स्ट्री या जाइनाज मशरूम), प्ल्यूरोटस स्पीसीज (आयस्टर या ढिंगरी मशरूम), लेंटाइनस इडोडिस (थाईटेक) और फलैम्यूलाइंना बेल्यूटाइप्स (एनोकाइटेक) खास हैं. इन में से भारत में पहले 3 मशरूमों की खेती की जाती है, क्योंकि इन के उत्पादन की तकनीक यहां विकसित की जा चुकी है.

मशरूम की खासीयत

मशरूम की खासीयत यह है कि यह एक अच्छा पौष्टिक आहार है. इसे सब्जी के रूप में बहुत चाव से खाया जाता है. इस में प्रोटीन, खनिज, लवण, विटामिन व एमीनो एसिड वगैरह पौष्टिक तत्त्व पाए जाते हैं. वसा व स्टार्च की मात्रा कम होने के कारण यह दिल के रोगियों व मधुमेह जैसी बीमारियों से पीडि़तों के लिए बेहतरीन आहार है. इस में फोलिक एसिड व लौह तत्त्व भी पाए जाते हैं, जो रक्त में लाल कण बनाने में मददगार हैं.

शिक्षणप्रशिक्षण

मशरूम उत्पादन को रोजगार के रूप में अपनाने की इच्छा रखने वालों के लिए देशभर के तमाम कृषि विश्वविद्यालयों व कृषि अनुसंधान केंद्रों में साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक कोर्स संचालित किए जा रहे हैं. इन पाठयक्रमों का मकसद उत्पादकों को मशरूम उत्पादन की तकनीक व बीजों की अच्छी नस्ल से परिचित कराना है. इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में दखिले के लिए उम्र व पढ़ाई संबंधी कोई जरूरी शर्त नहीं है. फिर भी अगर दाखिला लेने वाला 8वीं या 10वीं तक पढ़ालिखा हो, तो वह तमाम तकनीकी पहलुओं को आसानी से समझ सकेगा.

सरकारी कर्ज का इंतजाम

मशरूम उत्पादन में जुटे लोगों की आर्थिक मदद के लिए सरकारी सहायता का पूरा इंतजाम है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने इस काम के लिए विभिन्न माध्यमों की व्यवस्था कर रखी है, जो अपनेअपने सतर पर मशरूम उत्पादकों को 50 हजार से ले कर 2 लाख रुपए तक की सहायता का प्रबंध कराते हैं. मशरूम उत्पादन के काम से जुड़े अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों को इस सरकारी कर्ज पर कुछ विशेष भुगतान राहत भी दी जाती है, जो देश के सभी राज्यों में एकसमान है. इस के अलावा निजी बैंक भी उचित दरों पर कर्ज देते हैं.

वातावरण

मशरूम के तमाम प्रकारों के उत्पादन के लिए अलगअलग तापमान व वातावरण की जरूरत होती है. इस के बिना इन का उत्पादन करना मुमकिन नहीं है. सफेद बटन मशरूम (टेंपरेंट या यूरोपियन मशरूम) का उत्पादन नवंबर से फरवरी के बीच में करना ठीक रहता है. इस के लिए 15 से 25 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान व सापेक्षिक आर्द्रता 80 से 90 फीसदी होनी जरूरी है. आयस्टर मशरूम (ढिंगरी) के लिए फरवरीमार्च व सितंबरअक्तूबर के महीने अच्छे होते हैं. इस के लिए तापमान 20 से 28 डिगरी सेंटीग्रेड व सापेक्षिक आर्द्रता 80 फीसदी से अधिक होनी चाहिए. भारत में उत्पादित की जाने वाली मशरूम की तीसरी किस्म वालवेरियल्ला का उत्पादन मध्य अप्रैल से अक्तूबर तक किया जाता है. इस के लिए तापमान 30 से 40 डिगरी सेंटीग्रेड व सापेक्षिक आर्द्रता 80 फीसदी से ज्यादा होनी बेहद जरूरी है.

अवसर1

मशरूम उत्पादन ऐसा रोजगार है, जिस में आप कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं. भारत में पैदा होने वाली मशरूम की नस्लों की न केवल देश में, बल्कि विदेशों में भी भारी मांग है. अगर आप व्यवसाय में थोड़ा धन लगा कर काम शुरू करते हैं, तो कई लोगों को रोजगार दे सकते हैं.

आमदनी

मशरूम का उत्पादन एक ऐसा रोजगार है, जिसे अगर आप घरेलू स्तर पर घर के सदस्यों के साथ भी शुरू करते हैं, तो हर महीने 6 से 8 हजार रुपए आसानी से कमा सकते हैं.

कृषक मित्र बन कर मालाराम कर रहे कमाल

राजस्थान में जोधपुर जिले के अणवाणा गांव के 65 साला किसान मालाराम विश्नोई बीए की पढ़ाई करने के बाद वायु सेना में भर्ती हो गए. वायुसेना में पूरी सेवाएं देने के बाद उन्होंने खेती के काम में नवाचार करने की सोची. राज्य में कृषि विस्तार कार्यक्रम को चलाने के लिए हर 2 आबाद गांवों पर 1 स्थानीय पढ़ेलिखे प्रगतिशील किसान को कृषक मित्र के रूप में ग्राम पंचायत के जरीए चुने जाने का प्रावधान था. लिहाजा मालाराम ने कृषक मित्र बन कर नवाचार शुरू कर दिया. उन्होंने सब से पहले बाजरे की संकर किस्म एचएचबी 67 का बीज तैयार किया. उन्होंने 5 बीघे में बीज उत्पादन किया और 6 क्विंटल बीज पैदा किया. जब बाजरे का भाव बाजार में 10 रुपए प्रति किलोग्राम था, तब उन से 60 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बीज निगम ने बीज खरीदा. इस प्रकार उन्हें नवाचार से अच्छा लाभ मिला. आज भी वे बाजरे का अच्छा उत्पादन लेते हैं और लगभग 15 बीघे में बाजरे की खेती करते हैं. मालाराम ने खरीफ में अरंडी की खेती शुरू की. पहले बूंदबूंद सिंचाई विधि से 5 हेक्टेयर में अरंडी की खेती की और 120 क्विंटल अरंडी पैदा की. मालाराम को नवाचार करने की वजह से हैदराबाद में अरंडी की राष्ट्रीय कार्यशाला में राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला. वे एक किसान प्रतिनिधि के रूप में राजस्थान की तरफ से शामिल हुए.

वे खरीफ में ही हर साल 2 हेक्टेयर में कपास लगाते हैं. कपास में नवाचार कर के पौधों की संख्या पूरी रख कर 5 क्विंटल प्रति बीघे तक का उत्पादन करते हैं. मालाराम कृषि विभाग के 2 गांवों अणवाणा व केलावा के कृषक मित्र हैं. पिछले 5 सालों से वे पड़ोसी किसानों को कृषि विभाग की नवीन तकनीकों की जानकारी भी देते हैं. उन्होंने किसानों को कपास के मिलीबग कीट की भी जानकारी दी. उन्होंने कृषि विभाग द्वारा क्षेत्र में सब से पहले केंचुआ खाद की शुरुआत कराई. उन्होंने कुल 9 वर्मीबेड अपने खेत में बनवाए और वर्मी कंपोस्ट बना कर अपने खेत में डाल कर उत्पादन बढ़ाया. मालाराम ने क्षेत्र में पानी की अहमियत को देखते हुए सब से पहले 1995 में 30 बीघे में फव्वारा सिंचाई व्यवस्था लगाई और 2008 में बूंदबूंद सिंचाई तकनीक अपने खेत पर 5 हेक्टेयर खेत में लगाई है. मालाराम ने हाल ही में 10 बीघे में सरसों की खेती कर के 4 क्विंटल प्रति बीघे का उत्पादन लिया. पिछले साल उन्होंने 8 बीघे में 9 क्विंटल जीरा पैदा किया और 5 बीघे में 35 क्विंटल गेहूं पैदा किया. गेहूं की नई किस्म राज 4037 अच्छी साबित हुई. मालाराम ने पड़ोसी किसानों को भी बीज मुहैया करा कर लाभ दिलाया. वे 5 बीघे में ईसबगोल और 2 बीघे में प्याज की खेती करते हैं.

मालाराम ने खेती के साथ ही पशुपालन में भी नवाचार किए. उन्होंने साल 1998 में 8 गायों को ले कर डेरी लगाई थी. इस से कमाई भी की, पर मार्केट नहीं होने से यह काम कम कर दिया. अभी वे 2 गायें व 2 भैंसें रखते हैं. उन्हें जैविक खेती में अधिक दिलचस्पी थी, इसलिए गोबर की खाद खेत में डालते रहे. उन्हें वर्मी कंपोस्ट यूनिट से भी अपने खेत के लिए खाद मिलती रही और खेत ताकतवर बने. मालाराम के उम्दा काम और कृषि में रुचि को देखते हुए तहसील स्तर पर उन्हें 10 हजार रुपए का इनाम भी मिला. वे पड़ोसी किसानों से नवाचार कराते रहते हैं और कृषक मित्र का काम भी अच्छे ढंग से करते हैं. ज्यादा जानकारी के लिए किसान मालाराम के मोबाइल नंबर 09413956951 पर संपर्क कर सकते हैं या लेखक के मोबाइल नंबर 09414921262 पर भी बात कर सकते हैं.

नई मशीनों से किसानों की दूरी : कितनी मुश्किलें कितनी मजबूरी

मशीनों के इस्तेमाल ने दुनिया को बदल कर रख दिया है. खेती भी इन के असर से अछूती नहीं है. पैदावार बढ़ाने में नए बीज, खाद, पानी व बोआई की तकनीक के साथसाथ मशीनें भी बहुत मददगार साबित हुई हैं. नए दौर में मशीनों के बगैर खेती करना मुश्किल व महंगा है. खेती में मशीनों के इस्तेमाल से फायदे ही फायदे हैं. मशीनों से किसानों का वक्त, मेहनत व धन बचता है. मशीनें, खेती को घाटे से उबार कर फायदेमंद बना सकती हैं. इन से काम जल्दी, ज्यादा व बेहतर होता है. मशीनें किसानों की कूवत बढ़ाती हैं. इन से कम लागत में उम्दा और ज्यादा पैदावार हासिल होती है. उपज उम्दा हो तो उस की कीमत ज्यादा मिलती है. मशीनेें उपज की कीमत बढ़ाने व डब्बाबंदी में भी खूब काम आती हैं. खेती से मुंह मोड़ कर शहरों की ओर भागती नई पीढ़ी को मशीनों से गांवों में ही रोजगार मिल सकता है. कुल मिला कर मशीनें किसानों का नजरिया कारोबारी बना कर खेती व उस से जुड़े कामधंधों के बहुत से मसले सुलझाती हैं.

मुश्किलें कम नहीं हैं

खेती में बोआई, निराई, गुड़ाई, सिंचाई, कटाई, गहाई, छंटाई व ढुलाई वगैरह कामों में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ा है. सरकार का इरादा अगले 5 सालों में पैदावार दोगुनी करने का है. ऐसे में खेती में मशीनों का इस्तेमाल तेज करना लाजिम है, लेकिन मुश्किल यह है कि ज्यादातर किसानों की माली हालत खराब है. बहुत से किसान महंगी व बड़ी मशीनें नहीं खरीद पाते. देश के 85 फीसदी किसान छोटे व सीमांत दर्जे के हैं. वे हल, बैल व पाटे का जुगाड़ ही मुश्किल से कर पाते हैं. खुरपी, फावड़े और दरांती से ही खेती करना उन की मजबूरी है, लिहाजा आम किसानों व खेती की मशीनों के बीच में दूरी बरकरार है.

बीच के फासले

खेती की मशीनों का दायरा बहुत बड़ा है. आए दिन मशीनें बन रही हैं. मगर 3 जुलाई, 2015 को जारी आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ  4 फीसदी किसानों के पास खेती की मशीनें हैं. इन में भी पंपसेट, इंजन, थ्रेशर, पावर ट्रिलर, कल्टीवेटर, स्प्रेयर, डस्टर, हैंडहो व सीडड्रिल जैसी छोटी मशीनें ज्यादा हैं. ट्रैक्टर, प्लांटर, डिस्कंप्लाऊ व बड़े कंबाइन हार्वेस्टर जैसी बड़ी मशीनें कम किसानों के पास?हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के माहिरों ने बहुत सी नायाब मशीनें बनाई हैं. इन में गन्ने की बड चिपिंग मशीन, क्यारी बनाने वाली रोटेरी बिजाई मशीन, 3 लाइनों वाली धान रोपाई मशीन, अनार में छिड़काव के लिए अल्ट्रासोनिक सेंसर, बहुफसली थ्रैशर, सेब तोड़ू सीढ़ी, पेड़ी गन्ने के लिए खाद डिबलर, हल्दी राइजोम रोपाई मशीन, हलदी व लहसुन खोदने के औजार, मक्का ज्वार के मिनी हार्वेस्टर व कीटनाशी छिड़काव के लिए सेफ्टी किट वगैरह मशीनें खास हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के माहिरों ने खरपतवार साफ  करने वाली पावर मशीन, पावर नैप सैक स्प्रेयर, सौर ऊर्जा चालित फल सब्जियों की रेहड़ी ठंडी करने की मशीन, गांवों के लिए मुफीद सौर पावर चालित फ्रिज, ग्रीन हाउस को ठंडा करने के फैन पैड, उठी क्यारी में गाजर रोपने व खोदने की मशीनें बनाई हैं.

खेती की मशीनें बनाने का सब से ज्यादा काम केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल में हुआ है. वहां के माहिरों ने बहुत सी उम्दा व किफायती मशीनें और औजार बनाए हैं, लेकिन मुश्किल यह है कि आम किसानों में मशीनों की जानकारी व दिलचस्पी की कमी है. बहुत से किसानों को अब भी पुरानी लीक पर चलने की आदत है. दूसरी ओर खेतीबागबानी के महकमे व रिसर्च स्टेशन भरपूर प्रचार नहीं करते, लिहाजा किसानों को नई मशीनों की जानकारी नहीं होती. ज्यादातर किसान आज भी गेहूं, धान व चारा वगैरह हंसिया से ही काटते हैं. पुराने ढर्रे पर चल कर खेती के काम करने में काफी समय लगता है. अब आसानी से मजदूर भी नहीं मिलते. महंगा कंबाइन हार्वेस्टर खरीदना आम किसानों के बस की बात नहीं है. वैसे भी बड़ी मशीनें छोटे खेतों की बजाय बड़ेबड़े फार्मों के लिए ज्यादा कारगर रहती हैं. ऐसे में किफायती व छोटी मशीनें ज्यादा कारगर साबित होती?हैं. पंपसेट, इंजन, ट्रिलर व स्प्रेयर वगैरह बनाने वाली होंडा सियल कंपनी का ब्रश कटर गेहूं, धान व चारे की फसलें तेजी से काटता है. करीब 22 हजार रुपए कीमत की यह छोटी व हलकी मशीन पेट्रोल की मोटर से चलती है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद, बुलंदशहर, नोएडा, आगरा व शिकोहाबाद जिलों में इस के डीलर हैं.

किल्लत

खेती की मशीनों से जुड़ी एक मुश्किल है बिजली की कमी. बहुत सी मशीनें बिजली से चलती हैं, लेकिन गांवों में बिजली कम आती है. मशीनें खेती की कायापलट कर के किसानों को खुशहाल कर सकती हैं, लेकिन भारतीय किसान मशीनी खेती में दूसरे देशों के किसानों से काफी पीछे हैं. वहां के किसान खेती में मशीनों का भरपूर इस्तेमाल करते हैं. साथ ही अमीर मुल्कों में बड़ेबड़े फार्म हैं, जबकि हमारे देश में छोटी जोतों की गिनती ज्यादा है. साल 2004 से 2014 तक भारत में 48,21,976 ट्रैक्टर व 4,17,898 पावर ट्रिलर बिके थे, फिर भी भारत में प्रति 1 हजार हेक्टेयर पर औसतन 16 ट्रैक्टर हैं, जबकि वैश्विक स्तर 20 से भी ज्यादा हैं. हरियाणा, पंजाब वगैरह में खेती की तरक्की का कारण मशीनें भी हैं, जबकि दूसरे राज्यों में मशीनोें की भारी कमी है.

सरकारी स्कीमें

नेशनल मिशन आन एग्रीकल्चर एक्टेंशन टैक्नोलाजी के तहत कृषि यंत्रीकरण पर 1 उपमिशन चल रहा है. खेती में मशीनों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार का खेती महकमा 2 स्कीमें चला रहा है. नई मशीनों की ट्रेनिंग व प्रदर्शन  की आउटसोर्सिंग की स्कीम में खेती की मशीनों के बारे में जागरूकता बढ़ाई जाती है, ताकि किसान नई मशीनें इस्तेमाल करने के तरीके सीख सकें. साल 2013-14 में इस स्कीम पर 21 करोड़ 12 लाख रूपए खर्च किए गए. कटाई के बाद की तकनीक व प्रबंधन की दूसरी स्कीम में उपज के प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन, भंडारण व ढुलाई के लिए नई तकनीकों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है, ताकि कटाई के बाद उपज कम से कम खराब हो. इस में पीएचटी उपकरण व ट्रेनिंग की सहूलियतें दी जाती हैं. साल 2013-14 में इस स्कीम पर 18 करोड़ 77 लाख रुपए खर्च हुए. यह बात दीगर है कि करोड़ों रुपए खप जाते हैं, लेकिन प्रचार की कमी से ज्यादातर किसानों को सरकारी स्कीमों की जानकारी नहीं होती.

माली इमदाद

खेती की मशीनें खरीदने पर सरकार किसानों को सिर्फ  50 फीसदी छूट देती है. यह कम व सिर्फ  कहने भर की है, क्योंकि इस में कई तरह के पेंच व पाबंदियों के पैबंद हैं. मसलन राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में अब तक 395 अरब रुपए खर्च हुए, लेकिन उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को इस स्कीम में मानव चालित मशीनों पर सिर्फ 500 रुपए, पशुचालित मशीनों पर 2500 रुपए व पावर चालित मशीन पर 30 हजार रुपए तक की छूट है, जो महंगाई के जमाने में ऊंट के मुंह में जीरे जैसी है. हज पर सब्सिडी, अमीरों को हीरे, सोने पर अरबों की कर रियायत, कारपोरेट सेक्टर को करों में छूट, धार्मिक संस्थाओं को कर में छूट देने से अरबों का घाटा सहने वाली व राजनैतिक दलों को अरबों रुपए आयकर में छोड़ने वाली दरियादिल सरकार को किसानों की छूट बढ़ाने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए. संसद की कैंटीन में खाने की चीजों पर 90 फीसदी तक छूट है. सांसदों को वाहन खरीद पर बिना ब्याज कर्ज मिलता है. किसानों को भी मशीन खरीदने पर 90 फीसदी छूट व बिना ब्याज का कर्ज दिया जाना चाहिए. साथ ही मशीनों के बैंक बनाए जाने चाहिए, जिन से मशीनें किराए पर मिलें. गन्ना, कपास व चावल वगैरह खरीदने वाले मिल मालिक किसानों को मशीनें मुहैया कराएं, ताकि किसानों की मुश्किलें दूर हो सकें. 

मचान खेती से खुशहाली

गांव पेवनपुर, ब्लाक पिपरौली, जिला गोरखपुर के 44 साला आनंद निशाद ने अपनी खेती को नई तकनीक से एक नया रूप दे दिया. बचपन से ही आनंद का खेती के प्रति बहुत लगाव था. जब वे 10 साल के थे, तभी अपने पिता के साथ खेती करने लगे थे और उन का हाथ बराबर बंटाते रहते थे. 4 भाइयों में सब से गरीब आनंद ही थे. उन के पास बहुत कम जमीन है. उन्हें व्यावसायिक खेती करने का बेहद शौक था, इसलिए उन्होंने दूसरों की 1 एकड़ जमीन ले कर उस पर पारंपरिक ढंग से खेती शुरू की. साल 2013 में आधार संस्था द्वारा सर दोराब जी टाटा ट्रस्ट के सहयोग से कृषि आधारित आजीविका परियोजना पेवनपुर गांव में शुरू हुई. इस में आनंद निशाद को आधार द्वारा संचालित किसान विद्यालय का संचालक बनाया गया.

इस दौरान आनंद संस्था के कार्यकर्ताआें व संस्था में बुलाए गए कृषि विशेषज्ञों के संपर्क में आए और अपनी खेती संबंधी जानकारियों को लगातार बढ़ाते रहे. संस्था के कहने पर उन्होंने हुंडा की 500 वर्गमीटर जमीन पर मचान में द्विस्तरीय सब्जी की खेती शुरू की. पहले फसल चक्र में उन्होंने नीचे प्याज लगाया और ऊपरी स्तर पर लौकी के पौधे लगाए. दूसरे फसलचक्र में उन्होंने नीचे सूरन लगाया और ऊपरी स्तर पर करेले की खेती की. पहले साल मचान की फसलों को लगाते समय उन्हें काफी दिक्कतें हुईं, लेकिन इस से प्राप्त उत्पादन व आमदनी से वे इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन पर भी इस साल मचान लगाया है. अप्रैल में उन्होंने मचान के नीचे खीरा लगाया, जिस से अब तक 15 हजार रुपए प्राप्त हुए. मई में उन्होंने मचान के ऊपर खीरा लगाया, जिस से अब तक 69 हजार रुपए प्राप्त कर चुके हैं. इस प्रकार महज 4 महीने में वे अब तक 84 हजार रुपए की सब्जी बेच चुके हैं. करीब 20 हजार रुपए की सब्जी और होने का अनुमान है. पहले साल में खीरा, लौकी, मचान, खाद व कीटनाशक को मिला कर 40 हजार रुपए का निवेश किया गया था.  इस तरह पहले साल में लगभग 50 हजार रुपए की आमदनी हुई.

इस मचान की कामयाबी को देख कर अब तक 7-8 अन्य किसान भी मचान लगा चुके हैं और कई अन्य किसान भी मचान लगाने के लिए बेताब हैं. गांव के लोग आनंद के कृषि ज्ञान के कारण उन्हें कृषि डाक्टर के नाम से पुकारते हैं. आनंद मचान के अलावा आधार संस्था के तकनीकी सहयोग से नए ढंग से पत्तागोभी, गाजर, चुकंदर, मूली, लौकी व खीरा की वैज्ञानिक खेती कर के अपने उत्पाद बाजार में ऐसे समय पहुंचाते हैं, जब उन की मौजूदगी कम रहती है जिस से उन की सब्जियां अधिक दामों में बिक जाती हैं और अन्य किसानों की तुलना में उन्हें अधिक आमदनी होती है. आनंद की सफलता व आमदनी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे अपने 6 बच्चों की पढ़ाईलिखाई व पत्नी समेत पूरे परिवार का खर्च बेहतर ढंग से चलाते हैं और अपनी सारी पारिवारिक जिम्मेदारियों को बाकायदा पूरा करते हैं. वे बचत भी कर लेते हैं.

अपने कृषि उत्पादों को उचित समय पर बाजार पहुंचाने के लिए आनंद ने दोपहिया वाहन भी खरीद लिया है. कृषि के साथसाथ पशुपालन कर के भी वे अपनी आय में इजाफा करते हैं. कृषि वानिकी के तहत उन्होंने आधार संस्था के सहयोग से क्लोनल यूकेलिप्टस व सागौन के पेड़ों को भी अपने खेत के किनारों पर लगाया है. आनंद को बचपन में स्कूली तालीम नहीं मिल पाई थी, फिर भी वे अपने बच्चों व अन्य लोगों से थोड़ाबहुत पढ़नालिखना सीख गए हैं. वे अपने खेती के कामों का पूरा लेखाजोखा रखते हैं. आनंद समयसमय पर अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए आधार संस्था के सहयोग से और निजी खर्चे पर भी विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों व सब्जी अनुसंधान केंद्रों पर जाते रहते हैं. उन्होंने अपने 2 भाईबहनों की शादियां भी खूब धूमधाम से कीं. आनंद के तमाम कामों में उन की पत्नी मीरा देवी व बच्चों का पूरा साथ रहता है.

कुदरती खेती की अहमियत

अपने खेतों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए इस वैज्ञानिक युग में विभिन्न रसायनों का इस्तेमाल कर के हम फसलों का अधिक उत्पादन ले रहे हैं. इन रसायनों में कीटनाशी, फफूंदनाशी व रासायनिक उर्वरक खास हैं. सभी रसायन फसलों की पैदावार जरूर बढ़ाते हैं, लेकिन हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं. इसलिए आज यह जरूरी हो गया है कि फसलों में रसायनों का सोचसमझ कर कम इस्तेमाल किया जाए. ये तमाम रसायन पौधों व इनसानों के शरीर के अंदर ऊतकों की प्रतिरोधक कूवत को खत्म करते हैं. ऐसे में गुणवत्ता वाले उत्पादन के लिए निम्नलिखित नवीनतम तकनीकों का इस्तेमाल कर के घातक रसायनों के इस्तेमाल से छुटकारा मिल सकता है :

प्राकृतिक खाद : जीवाणु खाद, वर्मी कंपोस्ट, गोबर की खाद व वे खादें जो पशुओं के अवशेषों से बनाई जाती हैं, वे सभी कुदरती यानी प्राकृतिक खाद कहलाती हैं. इन सभी प्राकृतिक खादों से पोषक तत्त्व संतुलित मात्रा में प्राप्त होते हैं.

संतुलित मात्रा में पोषक तत्त्व प्राप्त होने से पौधों की बढ़वार तो अच्छी होती ही है, साथ ही गुणवत्तायुक्त उत्पादन भी प्राप्त होता है. पोषक तत्त्वों की पूर्ति के अलावा प्राकृतिक खाद से खेत की उत्पादकता में इजाफा होता है. कुदरती खादों के इस्तेमाल से पोषक तत्त्वों की मात्रा में इजाफा होता है. प्राकृतिक खादों की मात्रा और इस्तेमाल करने की विधि तालिका में दी गई है.

जैव उत्पाद : वैज्ञानिक खेती के विकास के साथसाथ कीट व बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ा है. नतीजतन तमाम तरह के रसायनों का अंधाधुंध इस्तेमाल होने लगा है. अब हालत यह है कि ये तमाम रसायन भी असरहीन हो रहे हैं, क्योंकि कीटों ने अपने शरीर की प्रतिरोधक कूवत बढ़ा ली है. इस हालत में जैव उत्पाद जैसे नीम के बने उत्पाद, लहसुन के उत्पाद, गोमूत्र व अन्य पौध या जंतु उत्पादों का इस्तेमाल काफी फायदेमंद साबित हो रहा है. जैव उत्पादों के इस्तेमाल से प्रदूषण का खतरा बिल्कुल भी नहीं होता है और गुणवत्ता वाली उपज में इजाफा होता है. गुणवत्ता वाले उत्पादों की कीमत बाजार में अधिक होती है.

वर्मी कंपोस्ट : जैविक खादों में वर्मी कंपोस्ट की बहुत अहमियत है. इस के लिए कृत्रिम विधि द्वारा केंचुओं को पाला जाता है. ये केंचुए  गोबर व फसलों के अवशेषों को शीघ्र अपघटित कर के उम्दा किस्म की जैविक खाद में बदल कर मल के रूप में बाहर निकालते हैं, इसी को वर्मी कंपोस्ट कहा जाता है.

वर्मी कंपोस्ट के लाभ

* केंचुए जमीन की कुदरती तरीके से जुताई करते हैं.

* केंचुए के मल में जो पेरिट्रोपिक झिल्ली होती है, वह मिट्टी के कणों से चिपक कर उन के चारों ओर परत सी बना देती है.

* इस के इस्तेमाल से जल संग्रहण की कूवत बढ़ जाती है.

* इस के इस्तेमाल से भूमि क्षरण में कमी आती है.

* इस के इस्तेमाल से फलों व खाद्यान्नों में होने वाले प्रदूषण में कमी आती है.

* इस के इस्तेमाल से फसलों व पौधों को संतुलित पोषण मिलता है, जिस से उपज व गुणवत्ता में इजाफा होता है.

* यह मिट्टी की उर्वरा कूवत बढ़ाने में मददगार है.

* वर्मी कंपोस्ट में पोषक तत्त्वों की भरपूर मात्रा होती है.

परजीवी का इस्तेमाल : हर जीव एकदूसरे पर निर्भर है. इस सोच के तहत कुछ जीव ऐसे हैं, जो फसल की हिफाजत करते हैं. उदाहरण के लिए पक्षी कीट नियंत्रक का काम करते हैं. इस के लिए खेतों में ‘टी’ आकार में लकडि़यां गाड़ कर पक्षियों को लुभाते हैं. इसी प्रकार एनवीपी वायरस के इस्तेमाल से कैटरपिलर (सूंड़ी) द्वारा पहुंचने वाला नुकसान कम हो जाता है. इस के तहत वे कीट भी आते हैं, जो हानिकारक कीटों को खाते हैं.

इंटरनेट : खत्म हो रही किसानों की झिझक

देश भर में किसानों और गांवों को इंटरनेट और नई तकनीकों से लैस करने की योजनाएं अब रंग लाने लगी हैं. इंटरनेट को ले कर किसानों की बेरुखी और झिझक खत्म होने लगी है. कई किसान इंटरनेट, स्मार्ट फोन, लैपटौप, कंप्यूटर वगैरह नई तकनीकों की मदद से खेती और उत्पादन को बढ़ा रहे हैं. पंचायत भवनों, किसान भवनों और कृषि विज्ञान केंद्रों में इंटरनेट की सुविधा मिलने से पढ़ेलिखे किसानों को खेती की नई तकनीकों के बारे में जानकारी हासिल करना आसान हो गया है. कृषि वैज्ञानिक लगातार किसानों को इंटरनेट के फायदों के बारे में जागरूक कर रहे हैं. बिहार के शेखपुरा जिले के मैट्रिक पास किसान रामबालक सिंह सीना तान कर कहते हैं कि इंटरनेट के जरीए हर कोई शिक्षा, कारोबार, स्वास्थ्य, मौसम वगैरह से जुड़ी कई तरह की जानकारियां हासिल कर सकता है. इंटरनेट तो वाकई जानकारियों का खजाना है.

बिहटा गांव के किसान संजय मिश्र कहते हैं कि वे पढ़ेलिखे नहीं हैं, इसलिए उन्हें कंप्यूटर और इंटरनेट के बारे में कुछ भी पता नहीं है. वे अपने 10वीं क्लास में पढ़ने वाले बेटे की मदद से इंटरनेट से खेती की नई जानकारियां लेते हैं और उन्हें खेतों में आजमाते हैं. संजय बताते हैं कि बेटे की मदद से उन्होंने इंटरनेट का फायदा उठाना शुरू कर दिया है. खेत को बनाने से ले कर फसलों की सिंचाई और अनाज भंडारण तक के बारे में अब वे इंटरनेट से मिलने वाली सलाहों पर अमल कर रहे हैं. उन्हें सब से ज्यादा खुशी इस बात की है कि सिंचाई की नई तकनीक को अपनाने से सिंचाई का खर्च आधा रह गया है.बिहार जैसे पिछड़े राज्य में पंचायती राज के ठेठ गंवई प्रतिनिधियों को हाईटेक बनाने की कवायद शुरू की गई है. इफ्को का ‘किसान संचार लिमिटेड’ वायस मैसेज के जरीए पंचायत प्रतिनिधियों को खेती की तकनीकों और मौसम की जानकारी  देगा. इफ्को किसान संचार से जुड़े पंचायत प्रतिनिधियों को 20 रुपए में सिम कार्ड मिलेगा.

कृषि मंत्री विजय कुमार चौधरी ने बताया कि सभी प्रतिनिधियों के मोबाइल फोनों पर एसएमएस के जरीए कृषि विकास बागबानी, पशुपालन, मछलीपालन और मौसम वगैरह की जानकारी दी जाएगी. पंचायती राज महकमे ने पंचायत प्रतिनिधियों और किसानों को संचार सेवा से जोड़ने का फैसला लिया है. जिला परिषद के सदस्य, पंचायत समितियों के सदस्य और प्रमुख, सभी मुखिया और सरपंच, वार्ड सदस्य और पंच, जिला और प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी, पंचायत सेवक, जनसेवक और बाकी पंचायत कर्मचारी इस सिम का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस से वे खेतीबारी, बाजार, सरकारी योजनाओं और मौसम के बारे में पूरी जानकारी रख सकेंगे. इस से पंचायत प्रतिनिधियों को सरकारी दफ्तरों और अफसरों के पास भागदौड़ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

नालंदा जिले के नूरसराय गांव के किसान कपिलदेव प्रसाद कहते हैं कि बिहार में पंचायत स्तर पर कृषि उत्पादों का डाटा बैंक बनाने की कवायद शुरू की गई है. इस से किसानों को आसानी से पता चल सकेगा कि किस गांव में किस तरह की फसलें लगाई जा सकती हैं, किस गांव की मिट्टी कैसी है, वहां कौन सी फसल लगाना फायदेमंद साबित होगा, मिट्टी का उपचार कैसे किया जाए. इस के अलावा दूसरी कई तरह की जानकारियां भी किसानों को मिल सकेंगी. इस के लिए वेब आधारित एमआईएस सिस्टम की मदद से सभी जानकारियों को इकट्ठा किया जाएगा. इसी तरह से बिहार के दुधारू पशुओं के बारे में ठोस आंकड़े हासिल करने के लिए गायों और भैंसों में इलेक्ट्रोनिक चिप (रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटीफिकेशन टैग) लगाने का काम भी चालू किया गया है. पशु और मत्स्य संसाधन विभाग द्वारा डेरी यूनियनों से जुड़े पशुपालकों  को पहले चरण में इस सिस्टम से जोड़ा जा रहा है. पशुओं की सही आबादी पता लगने से उन के रोगों की रोकथाम, टीकाकरण और बीमा योजनाओं की कामयाबी की गारंटी योजना बनाने और उसे अमल में लाने में आसानी होगी. साल 2007 के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 1 करोड़ 24 लाख गायें और 67 लाख भैंसें हैं, लेकिन इस में से ज्यादातर पशुओं का जुड़ाव दूध सोसाइटियों से नहीं है. कृषि रोड मैप के तहत सूबे में दूध उत्पादन को बढ़ाने और इस व्यवसाय में ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने के लिए मवेशियों की संख्या का सही आंकड़ा जुटाना जरूरी है. लिहाजा विभाग की साइट पर मवेशियों का पूरा ब्योरा मुहैया कराया जाएगा.

हर साल धान की खरीद के समय किसानों को परेशानियों से बचाने के लिए भी इंटरनेट की मदद ली जा रही है. बिहार में धान खरीद से ले कर उस के पेमेंट को औनलाइन किया जाएगा. इस के लिए सभी पैक्सों (प्राथिमिकी कृषि साख समिति) को पूरी तरह से कंप्यूटराइज्ड किया जा रहा है. खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री श्याम रजक ने बताया कि धान खरीद को औनलाइन कर देने से गड़बड़ी की गुंजाइश पूरी तरह से खत्म हो जाएगी. सूबे के कुल 8463 पैक्सों को कंप्यूटराइज्ड करने के लिए डीपीआर बनाने की जिम्मेदारी बेलट्रौन को सौंपी गई है. हर प्रखंड में मिट्टी जांच प्रयोगशाला और कंप्यूटर, इंटरनेट, फोन वगैरह सुविधाओं से लैस ई किसान भवन बनाने का काम चल रहा है. इस से किसानों को अपने उत्पादों की नेशनल और इंटरनेशनल कीमतों का पता आसानी से चल सकेगा और अपनी समस्याओं के हल के लिए उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे. साथ ही उन्हें खेती के लिए वैज्ञानिकों की सलाह भी मुफ्त में मिल सकेगी.

गंवई : तालाबों में बतखपालन खेती संग आमदनी का बेहतर साधन

खेती में प्रति हेक्टेयर लागत दिनोंदिन बढ़ रही है. लिहाजा साथ में कोई और कामधंधा कर के आमदनी बढ़ाना लाजिम है. इस लिहाज से बतखपालन का काम किया जा सकता?है. हालांकि पोल्ट्री के धंधे में ज्यादातर लोग मुरगियां पालते हैं, लेकिन देश की कुल पोल्ट्री में करीब 10 फीसदी हिस्सा बतखों का है. यदि बेहतर तरीके से बतखें पाली जाएं तो फायदा ज्यादा हो सकता है. मुरगियों के मुकाबले बतखें पालना किफायती व फायदेमंद है, क्योंकि ये दड़बों के अंदर कम रहती हैं और मुरगियों के मुकाबले कम दाना खाती हैं. बतखों के चूजों को कम दिनों तक सेया जाता है. प्रति बतख अंडा देने की सालाना कूवत करीब 200 है, जो मुरगियों के मुकाबले करीब 2 गुनी है. साथ ही बतख के अंडे का वजन 70 ग्राम तक होता है, जबकि मुरगी का अंडा औसतन 55 ग्राम का होता है. लिहाजा बतखपालन से कम लागत में ज्यादा लाभ मिलता है.

सिर्फ चौथाई एकड़ के पोखर में 20-25 बतखें पाली जा सकती हैं. खुले में बतख पालने से उन्हें मनचाहा खाना ज्यादा मिलता है, लिहाजा अंडे भी ज्यादा मिलते हैं. बतखें 2 साल तक अंडे देती हैं. नए चूजों को अलग रख कर बतखों के समूह बनाए जा सकते हैं, ताकि हर 5-6 महीने पर अंडा व मीट देने वाली बतखें लगातार तैयार होती रहें.

फायदे का धंधा

जाहिर है कि बतखपालन में उन के रहने व खाने पर कम खर्च होता है. बतखें पानी में रहना ज्यादा पसंद करती हैं. लिहाजा गांव के तालाबों, धान व मक्के के खेतों या फिर घर के आसपास बनाए गए बनावटी तालाबों में बतखें पाली जा सकती हैं. बतखें गांव के तालाबों में, नालेनालियों के आसपास घूमघूम कर अपना भोजन खुद ढूंढ़ लेती हैं. उन्हें पोखरों व नालों वगैरह में पानी के पौधे, कीड़ेमकोड़े व घेंघे वगैरह खाने को मिल जाते हैं. बतखों की एक सब से बड़ी खासीयत यह है कि मुरगियों के मुकाबले उन में बीमारियों से लड़ने की कूवत ज्यादा होती है. लिहाजा वे जल्दी से बीमार नहीं होतीं. सर्दियों में पंछियों को होने वाला तेज बुखार व रानीखेत नाम की बीमारी बतखों में नहीं होती. लिहाजा छोटे किसानों को खेती व मछलीपालन करने के साथसाथ बतखपालन का धंधा जरूर करना चाहिए.

सावधानी

हालांकि बतखों में रोगों से लड़ने की ताकत मुरगियों से ज्यादा होती है, लेकिन उन के रहने की जगह पर गंदगी, गंदा दानापानी, दूसरे जीवों से नजदीकी व गीला कूड़ा कई बार बीमारी फैलाने की बड़ी वजह बन जाते हैं. लिहाजा फर्श सूखा व साफ रखना जरूरी है. बतखों के चूजे हमेशा रोगरहित व अच्छी नर्सरी से लें और बीमार बतखों को फौरन अलग कर दें. मरी बतखों को जला दें या कहीं दूर ले जा कर दबा दें. डाक्टरों से सलाह लें व बीमारियों से बचाव के लिए बतखों को वक्त पर टीके जरूर लगवाएं. 10-12 फुट लंबे व 5-6 फुट चौड़े कमरे में 20-25 बतखें आराम से रह लेती हैं. कमरे की दीवारें व फर्श यदि कच्चे हों तब भी चलता है. प्रति बतख रहने की जगह करीब 2 वर्ग फुट होनी चाहिए और यदि वह पोखर के आसपास हो जाए तो और भी अच्छा होगा. जहां बतखें रहें वहां फर्श पर 1 सेंटीमीटर मोटी रेत की तह बिछा दें ताकि अंडे न टूटें.

तरहतरह की बतखें

हमारे देश में 4 तरह की बतखें पाई जाती हैं. उन में खाकी कैंपबेल भूरे रंग की व छोटी होती है. यह बतख 300 तक अंडे देती है. सफेद पेकन बतख ब्रायलर यानी मांस के लिहाज से बेहतर व बड़ी होती है और आमतौर पर गांवकसबों में पाली जाती हैं. ये बतख अंडे कम देती है, लेकिन इस की जिस्मानी बढ़वार ज्यादा व तेजी से होती है. मोती या मसकोवी बतख बड़ी, काले व सफेद रंग की होती है. इस का मीट बहुत नर्म व जायकेदार होता है और यह बीमार बहुत कम पड़ती है. चौथी बतख देसी किस्म की होती है. इस का साइज मंझला व पंख चमकीले होते हैं. यह बतख 1 साल में 280 तक अंडे देती है. यह खुद इधरउधर घूम कर कीड़ेमकोड़े ढूंढ़ती है और खा कर पेट भर लेती है. लिहाजा पालने के लिहाज से देसी बतख को अपने देश में सब से अच्छा माना जाता है.

बतखों के चूजे

बनावटी गरमी से 15 दिनों तक सेए गए चूजों को पालने में सावधानी बरतें. मसलन चूजों को टीन गार्ड के घेरे में रखें. 200 वाट का ऊपरी शेड लगा बल्ब फर्श से 2 फुट ऊंचा लगाएं. अंडों से निकले चूजों को फर्श पर रखने से पहले चटाई जरूरी बिछा दें. 5-6 हफ्तों तक हर 2-3 दिनों में चटाई को धूप में सुखाएं. चूजों को रोज दिन में 3-4 बार साफ पानी पिलाएं व मक्कामूंगफली छोड़ कर टूटे चावल वगैरह का बारीक दाना, पानी में भिगो कर दें. अंडों से निकलने के 2 हफ्ते बाद चूजे बढ़ने लगते हैं, लिहाजा उन्हें खुले में छोड़ें. दाना चुगने दें, लेकिन कुत्ते, बिल्ली, सांप, चूहे व नेवले वगैरह से उन्हें बचाना जरूरी है. 1 महीने बाद चूजों को तालाब में छोड़ें, लेकिन शिकारी पशुपक्षियों से वहां भी बचाएं. 4 महीने की उम्र में नर व मादा की पहचान हो जाती है. नर भारी होते हैं व उन की पूंछ ऊपर को मुड़ी होती है  खानपान ठीक हो और पूरा ध्यान रखा जाए तो बतखें 5 महीने में अंडे देने लगती हैं. उस वक्त नर बतखों को बेच दें. इस से पैसा मिलेगा व दाना बचेगा. 5 माह में देशी व खाकी कैंपबेल बतखें करीब डेढ़ किलोग्राम तक की, सफेद पेकिन ढाई किलोग्राम तक की व मोती मस्कोवी बतखें 3 किलोग्राम तक की हो जाती हैं. माहिरों के मुताबिक टूटा चावल, गेहूं, खली, नमक व कैल्शियम का चूरा दोपहर में देने से मादा बतखें ज्यादा वक्त तक अंडे देती हैं.

सेहत

ध्यान रखें कि बतखों को पीने का साफ पानी तथा उम्दा क्वालिटी का फफूंदी रहित दाना वक्त पर जरूर मिलता रहे. बतखों को हैजा, प्लेग व हेपेटाइटिस जैसी बीमारियां होने का खतरा रहता है, पर इन के कारगर टीके व दवाएं मौजूद हैं. लिहाजा पहले की तरह अब बतखों में छूत की बीमारी या महामारी फैलने का खतरा घटा है. बस जरूरत सही इंतजाम करने की है.      

फलों व सब्जियों की तोड़ाई भंडारण व परिरक्षण

फलों व सब्जियों की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए तोड़ाई, भंडारण व परिरक्षण यानी प्रिजर्व करने की नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि फलों व सब्जियों में पानी की अधिक मात्रा होने के कारण वे तोड़ाई के बाद शीघ्र खराब हो जाते?हैं. इस प्रकार कुल फलों व सब्जियों का 30-35 फीसदी भाग खराब हो जाता?है. ज्यादातर फलों व सब्जियों की तोड़ाई हरी अवस्था में की जाती?है, जिस से उन की गुणवत्ता पर उलटा असर पड़ता?है.

तोड़ाई : फलों की तोड़ाई फलों के पकने के आधार पर की जाती?है. तरबूज, खरबूजा, बेर, अंगूर, जामुन, अमरूद व नीबू वर्गीय फलों को पेड़ों पर पकाते?हैं और बाद में तोड़ते?हैं. लेकिन आम, केला, पपीता व चीकू वगैरह फलों को पकने से पहले तोड़ाई कर कमरों में पकाते?हैं. सब्जियों की तोड़ाई तब की जाती है, जब वे मुलायम व रेशा रहित होती हैं. लिहाजा सब्जियों की हरी अवस्था तोड़ाई के लिए सब से अच्छी होती?है. फलों व सब्जियों की तोड़ाई में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:

* फलों व सब्जियों की तोड़ाई सुबह के समय करनी चाहिए.

* फलों व सब्जियों की तोड़ाई डंठल सहित करनी चाहिए.

* यदि फलों व सब्जियों पर कीटनाशी या फफूंदनाशी या जहरीले रसायनों का इस्तेमाल किया गया हो तो कम से कम उन्हें 1 हफ्ते बाद ही तोड़ा जाना चाहिए.

* तरबूज, खरबूजा, कद्दू व टमाटर के फलों को पकी हालात में तोड़ा जाना चाहिए.

* बीन, लोबिया, खीरा, बैगन, भिंडी, लौकी, तुरई व पत्तेदार सब्जियों को मुलायम व हरी अवस्था में तोड़ा जाना चाहिए.

* गोभी वर्गीय सब्जियों को तैयार होने पर काटें.

* प्याज, लहसुन व आलू पूरी तरह पकने पर ही खोदें.

* केला, पपीता, चीकू, आम, कटहल, शरीफा व बेल वगैरह फलों को पेड़ से पकने की हालत में तोड़ कर कमरे में पकाना चाहिए.

* अंगूर, अमरूद, जामुन, बेर, फालसा व नीबूवर्गीय फलों को पेड़ पर पकने के बाद तोड़ना चाहिए.

भंडारण : जब खेत के ज्यादा फल पकने की हालात में आ जाते हैं, तो उन्हें एकसाथ तोड़ना जरूरी हो जाता?है. ऐसे में यह जरूरी?है कि सही ढंग से तोड़ाई कर के उन का अच्छी तरह भंडारण किया जाए. अगर सब्जियों व फलों को साधारण कमरे के तापमान पर खुले हवादार स्थान पर जूट की बोरी पर रख कर पानी छिड़कते रहें तो वे 2-3 दिनों तक बहुत आसानी से रखे जा सकते?हैं. निम्न बातों का ध्यान रख कर तोड़ाई के बाद सब्जियों व फलों का जीवनकाल बढ़ाया जा सकता?है:

* भंडारण के लिए उन्हीं फलों व सब्जियों का चुनाव करना चाहिए जिन पर कीट, बीमारी, चोट व खरोंच न लगी हो.

* पत्तीदार सब्जियों को काटने के बाद भीगे कपड़े में लपेट कर रखें और समयसमय पर उन में पानी छिड़कते रहें.

* तोड़ाई के बाद खेत की गरमी को खत्म करने के लिए फलों व सब्जियों को हवादार कमरे या किसी छायादार स्थान पर रख कर गरमी खत्म होने के बाद भंडारण करना चाहिए.

* कार्बन डाई आक्साइड का 5-10 फीसदी उपचार गाजर, खरबूजा व आलू वगैरह में बेहतर रहता है, जिस से भंडारण कूवत बढ़ जाती है.

परिरक्षण : परिरक्षण द्वारा यानी प्रिजर्व कर के हम बिना मौसम के तमाम सब्जियों व फलों का प्रयोग कर के लाभ उठा सकते?हैं व उन की उपयोगिता बढ़ा सकते हैं. तमाम फलों व सब्जियों को हम निम्न कामों में इस्तेमाल कर सकते हैं डब्बाबंदी के लिए सही फल व सब्जियां : आम, अमरूद, आड़ू, खुबानी, नाशपाती, लीची, स्ट्राबेरी, केला, लोकाट, अंजीर, मटर, आलू, टमाटर, करेला, बैगन, अदरक व गाजर वगैरह. चटनी व केचप के लिए मुनासिब फल व सब्जियां : टमाटर, आम, पपीता, सेब, आंवला, आलूबुखरा व कैथ वगैरह. सौस व सूप के लिए कारगर फल व सब्जियां : टमाटर व आलूबुखारा वगैरह.

पनीर के लिए सही फल : अमरूद व सेब वगैरह.

जैम के लिए मुनासिब फल : सेब, आड़ू, खुबानी, आम, अनन्नास, आलूबुखारा व पपीता वगैरह.

जैली के लिए सही फल व सब्जियां : अमरूद, कैथ, करौंदा, लोकाट, अंगूर व आलूबुखारा वगैरह.

मार्मलेड?के लिए मुनाबिस फल व सब्जियां : नीबू व संतरा वगैरह.

मुरब्बों के लिए सही फल व सब्जियां : आंवला, आम, बेल, गाजर, पपीता, बेर, नाशपाती व केला वगैरह.

कैंडी के लिए सही फल व सब्जियां : पेठा, आंवला, पपीता व अदरक वगैरह.

कुछ फलों व सब्जियों को 2 फीसदी नमक के घोल में काट कर धूप में सुखाया जा सकता?है और दूसरे मौसमों में उन का इस्तेमाल किया जा सकता है.

– अभिषेक बहुगुणा व संध्या बहुगुणा

दलहनी फसलों के लिए राइजोबियम कल्चर

भारतीय कृषि में दलहनी फसलों का खास स्थान है. शाकाहारी भोजन में प्रोटीन का मुख्य जरीया होने के कारण दलहनी फसलों का महत्त्व काफी बढ़ जाता है. चना, मूंग, मोठ, उड़द, अरहर व सोयाबीन वगैरह खास दलहनी फसलें हैं. दलहनी वर्ग की इन सभी फसलों में प्रोटीन काफी मात्रा में होने के कारण इन में नाइट्रोजन की भी जरूरत पड़ती है. इन फसलों में नाइट्रोजन की मात्रा की पूर्ति वायुमंडल में मौजूद आण्विक नाइट्रोजन से हो जाती है. दलहनी फसलों की जड़ ग्रंथियों (गांठों) में पाए जाने वाले राइजोबियम जीवाणु वायुमंडल की स्वतंत्र नाइट्रोजन को यौगिकीकृत कर के पौधों को मुहैया कराते हैं. इस कारण इन फसलों को ज्यादा नाइट्रोजन की जरूरत नहीं पड़ती है. परंतु जमीन में मौजूद राइजोबियम जीवाणुओं को पौधों की जड़ों पर ग्रंथियां बनाने में 20 से 30 दिनों का समय लगता है. इसलिए इस समय पौधों की बढ़वार व जड़ ग्रंथियों के विकास के लिए उर्वरक नाइट्रोजन का इस्तेमाल करना फायदेमंद रहता है. इसलिए बोआई के समय सिंचित क्षेत्रों में 20 किलोग्राम व असिंचित क्षेत्रों में 10 किलोग्राम नाइट्रोजन का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

राइजोबियम कल्चर की विधि : 1 लीटर पानी में 250 ग्राम गुड़ डाल कर गरम कर के घोल बनाएं और ठंडा होने पर इस में 3 पैकेट राइजोबियम कल्चर मिलाएं. घोल को धीरेधीरे लकड़ी के डंडे से हिलाते रहें. इतना घोल 1 हेक्टेयर में बोए जाने वाले बीजों के उपचार के लिए पर्याप्त होता है. इस घोल को बीजों पर धीरेधीरे इस तरह छिड़कना चाहिए कि घोल की परत सब बीजों पर समान रूप से चिपक जाए. इस के बाद इन बीजों को छायादार स्थान पर सुखाना चाहिए. ध्यान रखें कि बीज आपस में चिपके नहीं. बीजों की बोआई कुछ घंटों के बाद ही कर देनी चाहिए.

राइजोबियम कल्चर के लाभ

*      राइजोबियम जीवाणु वातावरण की स्वतंत्र नाइट्रोजन को पौधों तक पहुंचाते हैं, लिहाजा दलहनी फसलों को अलग से नाइट्रोजन देने की जरूरत नहीं रहती है.

*      जीवाणुओं के द्वारा यौगिकीकृत नाइट्रोजन कार्बनिक रूप में होने के कारण इस का क्षय कम होता है, जबकि नाइट्रोजन वाले उर्वरकों का एक बड़ा हिस्सा तमाम कारणों से इस्तेमाल नहीं हो पाता है. यह राइजोबियम जीवाणुओं द्वारा पौधों को मिल सकता है.

*      दलहनी फसलों की जड़ों में मौजूद जीवाणुओं द्वारा जमा की गई नाइट्रोजन अगली फसल में इस्तेमाल हो जाती है.

*      राइजोबियम कल्चर के इस्तेमाल से चना, अरहर, मूंग व उड़द की उपज में 20-30 फीसदी व सोयाबीन की उपज में 50-60 फीसदी तक का इजाफा होता है.

*      चारे वाली फसलें जैसे बरसीम व रिजका वगैरह में प्रोटीन का संचयन अधिक होता है और जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहती है.

*      जीवाणु खाद के इस्तेमाल से दलहनी फसलें हर साल मिट्टी में  नाइट्रोजन जमा करती हैं, जिस से उर्वरक पर होने वाला खर्च कम होता है.

सावधानियां

*      हर दलहनी फसल में एक खास प्रजाति के कल्चर का ही इस्तेमाल करें. अन्य फसल के कल्चर का इस्तेमाल करने से जड़ों में गांठें नहीं बनेंगी और कल्चर का फायदा फसल को नहीं मिलेगा.

*      पैकेट पर लिखी आखिरी तारीख से पहले ही कल्चर का इस्तेमाल करें. पुराने पैकेटों में जीवाणु नष्ट हो जाते हैं.

*      पैकेटों को बोआई से पहले ही खोलना चाहिए और बीजोपचार के फौरन बाद ही बीज बो देने चाहिए या किसी छायादार जगह पर सुखाने के कुछ देर बाद ही बो देने चाहिए.

*      यदि बीजों को कीटनाशक व फफूंदनाशक रसायनों से उपचारित किया जाना हो तो पहले फफूंदनाशक, फिर कीटनाशक और अंत में राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए.

*      गुड़पानी के गरम घोल में राइजोबियम कल्चर का पैकेट नहीं डालना चाहिए.

कुल मिला कर नतीजा यही निकलता है कि दलहनी फसलों से ज्यादा पैदावार हासिल करने के लिए बीजों को मुनासिब राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर के ही बोआई करनी चाहिए.

बालूशाही : आम लोगों की खास पसंद

हमारे देश में पुराने समय से अनाज से तैयार होने वाली मिठाइयों का खूब प्रचलन रहा है. बालूशाही ऐसी मिठाई है, जिस का स्वाद बिना खोए के भी दिनोंदिन याद रहता है. बालूशाही जैसी खस्ता और स्वादिष्ठ मिठाइयां बहुत कम होती हैं. बालूशाही की एक खासीयत यह है कि इसे बिना किसी दूसरी चीज की मदद के लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. मैदा, घी और चीनी से बनी होने के कारण इस की कीमत भी कम होती है. आम लोगों से ले कर खास लोगों तक को बालूशाही बहुत पसंद आती है. गांवों और कसबों में शादी या दूसरे अवसरों पर लोग बालूशाही जरूर बनवाते हैं. इसे लेनदेन में भी बहुत इस्तेमाल किया जाता है. बालूशाही भारत के अलावा पाकिस्तान और दूसरे अरब देशों में भी बहुत मशहूर है.

लखनऊ में रहने वाले हलवाई दिनेश लाल कहते हैं, ‘बालूशाही को बनाना बहुत आसान होता है. इसे कोई भी कारीगर बना सकता है. इसीलिए बालूशाही सभी जगह मिल जाती है. कई दिनों तक खराब न होने के कारण सफर में जाने वाले लोग इसे लेकर जाते हैं.’ बालूशाही का रसीला स्वाद खाने वालों को दीवाना बना देता है. कुछ बड़ी मिठाई की दुकानों में देशी घी वाली बालूशाही बनती है. यह कीमत में ज्यादा भले ही होती है, पर इस का स्वाद मुंह में खुशबू और जायका दोनों को घोल देता है.

बालूशाही बनाने की सामग्री

500 ग्राम मैदे से बालूशाही बनाने के लिए 150 ग्राम घी मिलाने की जरूरत होती है. इन के अलावा आधा चम्मच बेकिंग सोडा, आधा कप दही, 600 ग्राम चीनी और बालूशाही को तलने के लिए जरूरत के अनुसार घी चाहिए होता है.

बनाने की विधि

सब से पहले मैदे में बेकिंग पाउडर, दही और घी डाल कर मिलाया जाता है. कुनकुने पानी की मदद से इसे नरमनरम आटे की तरह गूंध लिया जाता है. मैदे को ज्यादा मलने की जरूरत नहीं होती है. सेट होने के लिए तैयार मैदे को 20-25 मिनट के लिए अलग रख दें. बालूशाही बनाने से पहले मैदे को फिर से गूंध लें. इस मैदे से छोटे नीबू के आकार की लोइयां बना लें. लोइयों को दोनों हाथों की मदद से गोलगोल कर लें. पेड़े की तरह दबा कर गड्ढा सा बना दें. सारे मैदे की इसी तरह बालूशाही बना लें और सूती कपड़े से ढक कर एक जगह रख लें. बालूशाही को तलने के लिए कड़ाही में जरूरत के हिसाब से तेल डाल कर गरम करें. जब तेल गरम हो जाए तो बालूशाही को कड़ाही में डालें. धीमी और मध्यम आंच में बालूशाही को ब्राउन होने दें. जब बालूशाही दोनों तरफ से सही तरह से पक जाएं तो उन्हें थाली या प्लेट में निकाल लें. अब 600 ग्राम चीनी में 300 मिलीलीटर पानी मिला कर गरम करते हुए 1 तार की चाशनी बना लें. हलकी गरम चाशनी में बालूशाही डालें. 5-7 मिनट तक बालूशाही को चाशनी में पड़ी रहने दें. चिमटे की मदद से एकएक बालूशाही को बाहर निकाल कर प्लेट में ठंडी होने के लिए रख दें. कुछ समय के बाद बालूशाही पर पड़ी चाशनी ठंडी हो कर सूख जाएगी. बालूशाही को सजाने के लिए कतरे हुए बादाम व खरबूजे के बीज और चांदी के वरक का इस्तेमाल किया जाता है. गरम बालूशाही खाने का मजा अलग ही होता है. वैसे इसे 20 से 25 दिनों तक रखा जा सकता है. इस का स्वाद 3-4 हफ्ते तक बिल्कुल ठीक बना रहता है कारीगर दिनेश कहते हैं, ‘अच्छी बालूशाही वह होती है, जो ठंडी होने के बाद भी खाने में मजेदार लगे. बालूशाही खाने पर अंदर कड़ापन नहीं लगना चाहिए. खाते समय ऐसा लगना चाहिए जैसे यह अभी ही बनी है.

‘उम्दा बालूशाही बनाने के लिए जरूरी है कि मैदा, बेकिंग पाउडर, दही और घी को सही तरह से मिलाया जाए. इसे मिलाने और फिर घी में तलने के समय सावधान रहने की जरूरत होती है. अगर इस में कहीं कोई कमी हुई तो बालूशाही खस्ता नहीं बनेगी और उसे खाने में स्वाद भी नहीं आएगा.’

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