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अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजैक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण

सरकार देश के 3 राज्यों-तमिलनाडु, ओडिशा तथा बिहार में एकएक अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजैक्ट (यूएमपीपी) स्थापित कर रही है. इन परियोजनाओं की स्थापना से बिजली संकट को कम किया जा सकेगा. बिहार में यह परियोजना बांका में स्थापित की जानी है. नए यूएमपीपी के तहत सब से ज्यादा फायदा किसानों को होगा. बिजली परियोजना के लिए किसान की जमीन को नए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत लिया जाएगा. बिजली विभाग इस योजना के तहत भूमि अधिग्रहण के लिए पहले की तुलना में 50 फीसदी अधिक का भुगतान करेगा. इस तरह परियोजना की लागत में स्वाभाविक रूप से बढ़ोतरी होगी. अब तक इन परियोजनाओं को पूरा करने की लागत 20 हजार करोड़ रुपए के आसपास थी लेकिन नए कानून के तहत यह परियोजना 50 फीसदी महंगी हो जाएगी और उस की अनुमानित लागत 30 हजार करोड़ रुपए से अधिक हो जाएगी. निश्चित रूप से इस का नुकसान बिजली उपभोक्ताओं को उठाना होगा और उन्हें महंगी बिजली खरीदनी पड़ेगी. बिजली विभाग बिजली की लाइन खींचने के लिए बिजली के पोल लगाने के वास्ते इस्तेमाल जमीन के लिए 1893 के पोस्ट ऐंड टैलीग्राफ कानून के तहत जमीन का मुआवजा देता है, जिस की वजह से बिजली की लाइन खींचने में भारी दिक्कत होती है.

इस कानून के तहत सिर्फ फसल का मुआवजा दिया जाता है. मेगा पावर परियोजना के लिए अब तक पुराने कानून के तहत भूमि अधिग्रहण होता था लेकिन अब परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण नए कानून के दायरे में किया जाएगा. यह उचित है और इस का सीधा फायदा किसान को मिलेगा.

जनकल्याण के लिए आवंटित पैसा खर्च होना जरूरी

हमारे यहां जनप्रतिनिधियों और सरकारी विभागों को लगता है कि विकास कार्य खत्म हो चुके हैं, लोगों के लिए सुविधाएं जुटाने की जरूरत और ढांचागत विकास आवश्यक नहीं है. यह स्थिति दुविधा वाली है. कारण, विकास कार्य तो हुआ ही नहीं है, इसलिए खत्म होने की बात निराधार है. विकास के कार्य करें अथवा नहीं, या चुनावी वर्ष में ही देख लेंगे, इस तरह की अवधारणा ही हो सकती है जो हमारे सरकारी विभागों और जनप्रतिनिधियों को विकास के लिए आवंटित धन को इस्तेमाल करने से रोकती है. सरकार पैसा इसलिए देती है कि देश के हर हिस्से में लोगों को बुनियादी सुविधाएं दी जाएं, जनप्रतिनिधि और समाज कल्याण विभाग देश के हर हिस्से में विकास सुनिश्चित करें और विकास के लिए आवंटित पैसे का इस्तेमाल हो. आश्चर्य की बात है कि जिन्हें विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई है वे सब उदासीन हो कर बैठे हैं. सांसद, विधायक लोक कल्याण के लिए आवंटित पैसे का इस्तेमाल नहीं करते हैं. अगर वे कुछ पैसों का इस्तेमाल करते हैं तो अपने लोगों के हितों को ध्यान में रख कर ही करते हैं. सरकारी विभागों का भी यही हाल है. सभी मंत्रालयों और विभागों को बजट में आवंटित राशि का इस्तेमाल करने का सरकारी फरमान हाल में इसीलिए जारी हुआ है. हालत यह है कि सरकार के विभिन्न मंत्रालयों ने इस वर्ष अप्रैल से जुलाई की तिमाही में आवंटित बजट का सामाजिक व ढांचागत विकास कार्य के लिए सिर्फ 34 प्रतिशत ही इस्तेमाल किया है.

बैंकमित्रों के सहारे जनधन योजना

प्रधानमंत्री जनधन योजना का लाभ दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचाने की सरकार की योजना जमीनी स्तर पर क्रियान्वित होती नजर आ रही है. इस के लिए सरकार ने करीब सवा लाख बैंकमित्र यानी बिजनैस करैसपौंडेंट एजेंट (बीसीए) नियुक्त कर दिए हैं. इन बैंकमित्रों की नियुक्ति का उद्देश्य जनधन योजना का लाभ उन क्षेत्रों के ग्रामीणों तक पहुंचाना है जहां बैंक की शाखाएं नहीं हैं और एटीएम मशीन लगाने की संभावना नगण्य है. वित्त मंत्रालय ने बैंकमित्रों के कार्य को संतोषजनक बताते हुए खुलासा किया है कि करीब 80 हजार बैंकमित्रों ने 9 सितंबर को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान करीब सवा करोड़ रुपए का लेनदेन किया है. इसी तरह से जून में समाप्त तिमाही के दौरान इन क्षेत्रों से 678 करोड़ रुपए का लेनदेन हुआ जिस में 532 करोड़ रुपए का नकदी के रूप में लेनदेन हुआ है. मंत्रालय ने कहा कि धीरेधीरे बैंकमित्रों की सक्रियता बढ़ रही है और उन के जरिए पैसे का बड़े स्तर पर लेनदेन हो रहा है. साथ ही, बैंकमित्रों की गतिविधियों पर वीडियो कौन्फ्रैंस के जरिए कड़ी निगाह भी रखी जा रही है. अभावग्रस्त ग्राम स्तर तक मित्रों के जरिए बैंक की सुविधा पहुंचाने की यह पहल बहुत अच्छी है और इस से जनधन योजना को फायदा होगा लेकिन सब से बड़ी चुनौती ग्रामीणों के विश्वास को जीतने की है. बैंकमित्र पर उन का भरोसा बना रहे, इस के लिए बैंकमित्रों को और अधिक सक्रिय बनाने के साथ ही उन को भरोसे का प्रतीक बनाना होगा. इस काम में जरा भी चूक हुई तो भोलेभाले ग्रामीणों का विश्वास फिर से अर्जित करना बड़ी चुनौती बन जाएगी. देश के दूरदराज के क्षेत्रों में बसे गांव के आदमी तक बैंक की सुविधा पहुंचाने के सरकार के लक्ष्य का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन आसपास बसे कुछ गांवों के बीच बैंक की शाखा खोलने की संभावना तलाशना ज्यादा बेहतर होगा. बैंकों को बैंकमित्र की जगह शाखा स्थापना पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है.

यात्री सुरक्षा के लिए ओला की पहल

टैक्सी सेवा प्रदाता कंपनियां पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तथा आसपास के क्षेत्रों में टैक्सी ड्राइवरों की आपराधिक वारदात के कारण चर्चा में रही हैं. दिल्ली के लोगों के लिए, खासकर महिला सुरक्षा के लिए टैक्सियों का सफर खतरनाक सेवा के रूप में सामने आया था. टैक्सियों में छेड़छाड़ की घटनाओं के बढ़ने से टैक्सी महिलाओं के लिए अत्यधिक असुरक्षित सेवा मानी जाने लगी थी लेकिन ओला जैसी कंपनियों ने अपनी सेवाओं में तरहतरह के तकनीकी सुधार कर के ग्राहकों का भरोसा जीतने का प्रयास किया था. इस क्रम में टैक्सी सेवा प्रदाता ओला ने 2 करोड़ डौलर खर्च कर टैक्सी सेवा में सुरक्षा व्यवस्था को बढ़ाने का फैसला किया.

इस निधि का इस्तेमाल ओला टैक्सी द्वारा यात्रियों की सुरक्षा के उपाय पर खर्च किया जाएगा. यात्री सुरक्षा के लिए ओला टैक्सी के ड्राइवर के मोबाइल पर सब से पहले ऐसा मास्क लगाया जाएगा कि टैक्सी ड्राइवर ग्राहक से बात तो कर सकेगा लेकिन उसे ग्राहक का मोबाइल नंबर नहीं दिखाई देगा. उस से अपराधी अथवा शातिर ड्राइवर मोबाइल नंबर का इस्तेमाल आपराधिक वारदात के लिए नहीं कर सकेगा और न ही वह ऐसी प्रकृति के किसी अपराधी को ग्राहक का मोबाइल नंबर दे सकेगा. कंपनी का कहना है कि इस से ग्राहक की निजता की सुरक्षा के संरक्षण के साथ ही ड्राइवर पर बराबर नजर भी रखी जा सकेगी. ड्राइवर की बातचीत और उस के व्यवहार पर ओला प्रशासन की नजर होगी और साथ ही, ड्राइवर की मोबाइल कौल पर खर्च होने वाले पैसे को भी बचाया जा सकेगा. कंपनी का कहना है कि उसे अगले वर्ष मार्च तक टैक्सी सेवा में सुधार के लिए 2 करोड़ डौलर यानी करीब 135 करोड़ रुपए खर्च करने हैं.

सूचकांक में भारी उतारचढ़ाव से अनिश्चितता

कुछ माह से भारी उतारचढ़ाव एक तरह से बाजार का स्वभाव जैसा बन गया है. अचानक बाजार में तेज गिरावट के बाद उसी स्तर का उछाल देखने को मिल रहा है. बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई का सूचकांक अत्यंत संवेदनशील नजर आ रहा है लेकिन बाजार के जानकारों का कहना है कि वैश्विक माहौल में यह सामान्य स्थिति है और पूरी दुनिया के शेयर बाजार इसी तरह से इस माहौल से प्रभावित होते हैं. अमेरिका के फैडरल रिजर्व ने अपनी दरों में बदलाव की योजना को टाला है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और दुनिया के अन्य देशों में फैडरल रिजर्व के इस निर्णय ने शेयर बाजारों में रौनक बढ़ाई है. बीएसई का सूचकांक भी 18 सितंबर को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान 3 सप्ताह के उच्चतम स्तर पर बंद हुआ और रुपया 2 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचा. इस के ठीक विपरीत अगले सत्र में बाजार वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था के कमजोर रहने और जीडीपी में गिरावट की आशंका के कारण 541 अंक से अधिक गिर गया जबकि सुबह बाजार 80 अंक की तेजी के साथ खुला भी. जानकार कहते हैं कि बाजार में इस तरह की अनिश्चितता का माहौल पहले भी रहा है इसलिए उस से घबराने की आवश्यकता नहीं है. 2 सत्र तक लगातार भारी गिरावट के बाद निवेशकों ने चीन के कमजोर विनिर्माण आंकड़े को दरकिनार करते हुए जम कर उत्साह दिखाया और सूचकांक 171 अंक की उछाल के साथ 26 हजार अंक के नजदीक पहुंचा.

समाचार

त्योहारों में दामों में इजाफा होने के आसार जारी है दालों और प्याज का कहर

नई दिल्ली : यकीनन दालें और प्याज आम आदमी की रोजाना की जिंदगी से जुड़ी अहम चीजें हैं. इन चीजों की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लग जाता?है कि इन की किल्लत से तमाम राजनीतिक समीकरण गड़बउ़ा जाते?हैं. आजकल भी कुछ ऐसा ही आलम है. घटिया मानसून की वजह से पैदावार कम होने और त्योहारों के मौसम की वजह से मांग में इजाफा होने से तमाम दालों की कीमतों में 10 से 15 फीसदी तक और इजाफा होने का अंदेशा?है. गड़बड़ाए हालात से निबटने के लिए सरकार को 1 करोड़ टन दाल का आयात करना पड़ सकता?है.  ऐसा ही हाल प्याज का भी लगातार बना हुआ है. पिछले महीने भर से प्याज के तेवर लगातार तने हुए हैं, उन में रत्ती भर भी फर्क नहीं आया?है. प्याज की कीमतें लगातार 80 से 60 रुपए प्रति किलोग्राम पर टिकी हुई हैं. सड़ागला प्याज तक 50 रुपए प्रति किलोग्राम से कम में नहीं मिल रहा है. पिछले महीने भर से सरकार आम लोगों की इन खास चीजों के दाम कम करने की कोशिश में लगी है, मगर नतीजा सिफर रहा है. प्याज 60 और 80 रुपए प्रति किलोग्राम पर अटका है, तो तमाम दालों के दाम 140 से 160 रुपए प्रति किलोग्राम पर टिके हुए हैं. यानी इन चीजों की कीमतें पहले के मुकाबले दोगुनी से ज्यादा हो गई हैं.

अगस्त महीने की शुरुआत में प्याज के दाम बढ़ने शुरू हो गए थे, तब सरकार ने प्याज का आयात करने का फैसला लिया था. केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय, उपभोक्ता मामले मंत्रालय व वाणिज्य मंत्रालय के मंत्रियों सहित कई बड़े अफसरों की बैठक में दाल व प्याज के 10-10 हजार टन के आयात का फैसला लिया गया था. प्याज व दाल के दामों पर नजर रखने के लिए सरकार की ओर से बाकायदा एक कमेटी भी बनाई गई?थी, मगर करीब डेढ़ महीने गुजर जाने के बावजूद दाल व प्याज की कीमतों पर लगाम लगाने की सरकार की कोशिशें कामयाब नहीं हुईं. अगस्त महीने के अंत में प्याज आयात के लिए मुकर्रर सार्वजनिक कंपनी एमएमटीसी की ओर से बताया गया कि 10 सितंबर तक आयातित प्याज की पहली खेप आ जाएगी, मगर अब अक्तूबर महीने के पहले हफ्ते में आयातित प्याज के आने की उम्मीद की जा रही?है. दाल के मामले में वाणिज्य एवं उद्योग मंडल एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मानसून सीजन में औसत से कम पानी बरसने से देश के खास दाल उत्पादक सूबों में पैदावार घटने का अंदश्े है. इन हालात में दलहनों की कुल पैदावार 1.7 करोड़ टन तक सिमट सकती?है, जबकि इन की जरूरत 2.7 करोड़ टन है.

ऐसे आलम में दशहरे से क्रिसमस तक दालों की मांग में तेजी रहने से दालों की कीमतों में 15 फीसदी तक का इजाफा हो सकता है. मौजूदा वक्त में बाजार में अलगअलग दालों की कीमतें 100 रुपए से 160 रुपए प्रति किलोग्राम तक हैं, जो दीवाली व क्रिसमस तक काफी आगे तक जा सकती हैं. तमाम लोग आजकल दालों की बजाय छोले व राजमा ज्यादा खा रहे हैं, मगर इन से दालों की कीमतों पर खास असर नहीं पड़ने वाला. हालांकि ये चीजें करीब आधे दामों पर उपलब्ध हैं. छोले व राजमा फिलहाल 80 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहे?हैं. भारत में महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सूबों में दलहन का ज्यादा उत्पादन होता?है, मगर सामान्य से 18 फीसदी कम बरसात होने की वजह से इस बार पैदावार काफी घटने के आसार हैं. वैसे देश के कुल दलहन उत्पादन में इन सूबों का दखल करीब 70 फीसदी होता है, जो इस बार काफी घट सकता?है. कुल मिला कर प्याज व दालों के मामले लगातार गड़बड़ाए हुए?हैं और जनता के साथसाथ सरकार का चैन भी छीने हुए?हैं. देखने वाली बात?है कि कब तक हालात काबू में आते हैं.                           

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प्याज पर नेताजी की नसीहत

जयपुर : महंगा प्याज वैसे भी आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है, वहीं तुर्रा यह कि प्याज नहीं खाओगे, तो मर नहीं जाओगे. यह बात आम नागरिक नहीं कह रहा, बल्कि प्रदेश के कृषि मंत्री कह रहे हैं. राजस्थान के कृषि मंत्री प्रभुलाल ने एक बैठक में यह कह कर सभी को चौंका दिया कि प्याज नहीं खाओगे तो मर नहीं जाओगे. हुआ यों कि एक बैठक में कृषि मंत्री प्रभुलाल ने एक किसान से पूछा कि सब से ज्यादा खाई जाने वाली चीज क्या है?

इस पर उस किसान ने जवाब दिया कि प्याज. उस किसान का इतना कहना ही था कि कृषि मंत्री प्रभुलाल नाराज हो गए. वे किसान को नसीहत देने लगे कि प्याज नहीं खाओगे तो मर नहीं जाओगे. इतना कह कर वे यहीं नहीं रुके. उन्होंने आगे कहा कि किसानों को प्याज के 2 रुपए ज्यादा मिलने लगे, तो इस में परेशानी क्या है. इस पर एक किसान ने कहा कि हमें दुख इसी बात का है. प्याज की बोरियां कारोबारियों के गोदामों में लगी हैं. किसान के घर में प्याज है ही नहीं. बहरहाल, मंत्री की बात मुनासिब नहीं कही जा सकती.

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सलाह

‘इफको’ ने कराई किसान गोष्ठी

जोधपुर : इंडियन फार्मर्स फर्टीलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड यानी इफको द्वारा 19 सितंबर को श्री नगाराम, भवाल में एक किसान गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिस में कृषि विशेषज्ञ डाक्टर तखतसिंह ने फसलों में लगने वाले रोगों व कीटों के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि रसायनों का इस्तेमाल कम करते हुए जैविक नियंत्रण किया जाना चाहिए ताकि मानव व पशु स्वास्थ्य के साथसाथ खेत की मिट्टी का स्वास्थ्य भी बना रहे. इफको के मुख्य क्षेत्रीय प्रबंधक दिलीप कुमार सीवर ने किसानों को बताया कि यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल देश की अर्थव्यवस्था के लिए ही नहीं बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक साबित हो रहा?है. इस के कारण ग्रामीण क्षेत्र में अनेक प्रकार की बीमारियां पनप रही हैं. खेती के लिए मिट्टी जांच के बाद ही उर्वरक इस्तेमाल करें. खेती में गोबर की खाद, कंपोस्ट खाद, जैव उर्वरक का इस्तेमाल बहुत जरूरी है. दलहन व तिलहन फसलों में अच्छी उपज व बीमारी और कीड़ों से बचाव के लिए सल्फर व पोटाश का इस्तेमाल किया जाना बहुत जरूरी है.

‘इफको’ किसान संचार के गोपाराम ने वर्तमान मोबाइल युग में कृषि के लिए लाभदायक जानकारी हासिल करने का सही माध्यम इफको किसान संचार को बताते हुए कहा कि हर किसान के पास कृषि से संबंधित नई जानकारी हासिल करने के लिए इफको किसान संचार का सिम जरूर होना चाहिए. इस में मौसम, मंडी भाव, फसलों में रोग व कीट नियंत्रण, उन्नत किस्में, कृषि रसायन, संतुलित उर्वरक, मिट्टी की जांच, रोजगार, पशुपालन व कृषि विभाग की विभिन्न योजनाओं की जानकारी से संबंधित 5 संदेश रोजाना मुफ्त में दिए जाते हैं.   

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सख्ती

कुएं सूखे मिले तो होगी कार्यवाही

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के लघु सिंचाई, भूगर्भ एवं पशुधन मंत्री राजकिशोर सिंह ने बापू भवन सभागार में लघु सिंचाई विभाग की समीक्षा बैठक में निर्देश दिए कि किसानों के बीच जागरूकता फैलाई जाए कि पाइप द्वारा सिंचाई करने से कितनी मात्रा में पानी की बचत होती है और पानी की बचत से उन को क्या फायदा मिलेगा.लघु सिंचाई मंत्री ने बैठक में कहा कि मुख्यमंत्री पेयजल योजना में अभियंताओं द्वारा दिलचस्पी नहीं ली जा रही है और शासन को कोई प्रस्ताव अभी तक नहीं भेजा गया है. उन्होंने योजना के बारे में शासन को प्रस्ताव भेजने के लिए 15 दिनों का समय दिया. राजकिशोर सिंह ने इस अवसर पर राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत चौकडैम निर्माण, तालाबों का निर्माण व जीर्णोद्धार, मुफ्त बोरिंग और सामूहिक नलकूपों के उर्जीकरण एवं जल वितरण योजनाओं की गहन समीक्षा की. उन्होंने कहा कि यदि कुएंतालाब सूखे पाए गए तो संबंधित अभियंताओं के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी. उन्होंने कुओं के गहरीकरण के लिए 15 दिनों का समय दिया और नलकूपों के ऊर्जीकरण के सत्यापन का काम पूरा करने के लिए 10 दिनों का समय तय किया.

उन्होंने कहा कि तमाम इंजीनियर ऊर्जा विभाग की ऊर्जीकरण की रिपोर्ट पर ही अपनी रिपोर्ट तैयार कर लेते हैं, जो कि सही नहीं है. निरीक्षण में यह रिपोर्ट गलत मिलती है. उन्होंने कहा कि जिला स्तर पर योजनाओं के सत्यापन के लिए अवर अभियंता व अधिशासी अभियंता के साथसाथ अधीक्षण भी बराबर के उत्तरदायी माने जाएंगे.            

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कसौटी

कोक और स्लाइस ड्रिंक में हैं खामियां

लखनऊ : अभी तक नैस्ले कंपनी की मैगी पर ही गाज गिरी थी, भले ही उसे मुंबई हाईकोर्ट से राहत मिल गई हो, पर अब कोक और स्लाइस जैसी कोल्ड ड्रिंकों पर भी गाज गिरी है. फैजाबाद जिले में कोल्ड ड्रिंक बनाने वाली 2 बड़ी कंपनियों कोका कोला और पेप्सी में गड़बडि़यां पाई गई हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2 तरह के कोल्ड ड्रिंक खाद्य पदार्थ के मानक पर खरे नहीं उतरे. बता दें कि कोल्ड ड्रिंक कोका कोला व स्लाइस की पैकेजिंग और लेबलिंग में खामी पाई गई है. दोनों ब्रांड के फ्रेंचाइजी को खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की ओर से 2 लाख रुपए जुर्माने का नोटिस भेजा गया है. फैजाबाद में कोका कोला के फ्रेंचाइजी अमृत बाटलर्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा कोक की सप्लाई की जाती है. 13 जुलाई, 2015 को एफएसडीए की छापामारी में पैकेजिंग व लेबलिंग में खामी मिली थी. इस पर बोतलों को सील करने के साथ ही एक नमूना गोरखपुर लैब में भेजा गया. 13 अगस्त को आई रिपोर्ट में कोक की क्वालिटी में तो कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई, मगर नए कानून के मुताबिक पेय पदार्थ के मानकों का विवरण बोतल पर होना चाहिए, जो नहीं था, परंतु यह विवरण क्वार्क यानी ढक्कन के अंदर मिला.

कार्यवाही के बाद 90 फीसदी ऐसी बोतलें बाजार से हटा ली गई हैं, मगर अब जुर्माने का मुकदमा चलाने का नोटिस भेजा जा रहा है. इसी तरह 16 मई, 2015 को शहर से सटे गद्दोपुर स्थित पेप्सी के डिपो से स्लाइस कोल्ड ड्रिंक का नमूना सील किया गया. इस के बैच नंबर में गड़बड़ी मिली. 3 सितंबर, 2015 को लैब से रिपोर्ट आई, तो यह शीतल पेय भी लेबलिंग के मानक पर खरा नहीं उतरा. उम्मीद है कि अब ऐसा नहीं होगा.                 

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अजीब

तेंदुए के पेट से निकलीं तमाम चीजें

देहरादून : पिछले दिनों गढ़ी कैंट इलाके के सैप्टिक टैंक के ऊपर कांटेदार तारों में फंस कर मरे तेंदुए की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने वन अधिकारियों को चौंका दिया है. चौंकाने वाली बात यह है कि तेंदुए के पेट से पानमसाले के तमाम पाउच निकले हैं. साथ ही कचरा और कीड़े भी पाए गए हैं. तेंदुए के डीएनए सैंपल, कीड़ों और बिसरा को जांच के लिए वन्य जीव संस्थान भेजा गया है. परंतु सवाल यह है कि पान मसाले के पाउच उस के पेट में कैसे पहुंचे? 4 साला तेंदुए की मौत पेट में कांटेदार तार घुसने से हुई है, परंतु पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस की मौत खून का अधिक बह जाना पाई गई. वन विभाग के कुछ अफसरों को शक था कि कहीं तेंदुए की मौत किसी के जहर देने से तो नहीं हुई. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अब यह बात साफ हो गई है कि उसे जहर नहीं दिया गया था, मगर उस के पेट से पानमसाला, कचरा और कीड़े निकलने से मामला उलझ गया है. वन अधिकारियों को आशंका है कि कहीं तेंदुए ने भूख की वजह से कचरा तो नहीं खाया, वहीं यह भी कयास लगाया जा रहा है कि उस ने कुत्ता, सूअर या कोई गायभैंस खाई होगी, जिस से उस के पेट में पानमसाला पहुंच गया होगा.

कहीं तेंदुए ने पूरा कुत्ता या सूअर तो नहीं खाया होगा, ऐसे में पानमसाले के पाउच और कचरा अंदर कैसे पहुंचा? इस सवाल का हल ढूंढ़ने के लिए वन्य जीव संस्थान उस के पेट से निकले कीड़ों, डीएनए और बिसरा पर जांच करेगा. वाकई यह हादसा अजीबोगरीब है और तमाम सवाल खड़े करता है. आमतौर पर तेंदुआ कचरा वगैरह नहीं खाता है. खतरनाक तेंदुआ तो मार कर ताजा मांस खाना पसंद करता?है. खैर, मामले का खुलासा जांच की रिपोर्ट आने पर होगा.                  ठ्ठ

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नेकी

दादी की रसोई : गरीबों की भलाई

नोएडा : दादी की रसोई का नाम सुनते ही आंखों में एक नई चमक उभर आती है. क्योंकि यहां का खाना ऐसा होता है, जो अपने घर की याद दिला देता है. जहां एक ओर महंगाई की मार से आम जनता परेशान है. उन्हें भरपेट खाना नहीं मिल पाता है. ऐसे में अगर कोई 5 रुपए में गरीबों का पेट भर दे, तो वह वाकई मसीहा होने का काम कर रहा है. 5 रुपए में भरपेट खाना खिलाने की बात सुन कर भले ही आप को अपने कानों पर भरोसा न हो, लेकिन यह सच बात है. 5 रुपए में भरपेट खाना खिलाने का बीड़ा उठाया है समाजसेवी अनूप खन्ना ने. समाजसेवी अनूप खन्ना का इस बारे में कहना है, ‘मेरी दादी मां ने एक बार मुझ से कहा था कि अब तो मैं सिर्फ  खिचड़ी खाती हूं, मेरे ऊपर होने वाले खर्च में काफी बचत होती है, उस से तुम गरीबों को खाना खिलाओ. ‘दादी की बात मान कर मैं ने गरीबों के लिए कम पैसों में खाना खिलाने का बीड़ा उठाया है.’    

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योजना

गोरखपुर विश्वविद्यालय में कृषि संकाय

गोरखपुर : पूर्वी उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा का केंद्र गोरखपुर विश्वविद्यालय अब कृषि विभाग में छात्रों को पढ़ाई का अवसर मुहैया कराएगा. इस के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा शासन से अनुमति मांगी गई थी, जिस की मंजूरी मिलने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कृषि संकाय के संचालन के लिए शहर के चरंगांवा में जमीन तलाश कर के 94 करोड़ रुपए का प्रस्ताव भेजा गया?है. गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अशोक कुमार ने बताया कि गोरखपुर व बस्ती मंडल के छात्रों को कृषि की पढ़ाई के लिए अब गोरखपुर से ही डिगरी मिल सकेगी. उन्होंने कहा कि कृषि संकाय खुल जाने से यहां नएनए शोध होंगे, जिस से किसानों का फायदा होगा. कई सालों से विश्वविद्यालय प्रशासन से कृषि संकाय खोलने की मांग की जा रही थी. उसी के तहत यह फैसला लिया गया है. कुलपति प्रो. अशोक कुमार ने बताया कि विश्वविद्यालय में नब्बे के दशक में 2 सालों तक कृषि की पढ़ाई हुई. भवन भी बन रहा था, लेकिन बाद में उस बिल्डिंग में वनस्पति विज्ञान की पढ़ाई होने लगी. विश्वविद्यालय से जुड़े मात्र 3 महाविद्यालयों में कृषि विषय की पढ़ाई हो रही थी, जिन में गोरखपुर, बस्ती व देवरिया के 1-1 महाविद्यालय शामिल हैं. कृषि संकाय शुरू हो जाने से छात्रों को दूर के शहरों में जाने से नजात मिलेगी.  

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वापसी

आटे के नूडल्स लाएंगे चेहरों पर खुशियां

हरिद्वार : जिधर देखो उधर मैगी ही दुकानों में लटकी दिखाई देती थी. मैगी का बाजार चरम पर था. लाखोंकरोड़ों रुपए का कारोबार था. कइयों की रोजीरोटी का जरीया था. मैगी बच्चों की जबान पर चढ़ चुकी थी और जल्दी बनने वाली मैगी हर किसी की चहेती बनी हुई थी. अचानक ही मैगी के कुछ सैंपल जांचे गए और उस के मसाले में लैड की ज्यादा मात्रा पाए जाने पर रातोंरात मैगी बाजार से बाहर हो गई. मैगी न मिलने से बच्चे बेहद मायूस से दिखते थे. नैस्ले की मैगी तो मैदे से बनती थी, पर छोटे बच्चों की ख्वाहिश को ध्यान में रखते हुए पतंजलि योगपीठ ने आटे से तैयार नूडल्स बनाने की जोरशोर से तैयारी कर ली है, क्योंकि मैदे से बनने वाले नूडल्स बच्चों के पेट खराब करते थे, साथ ही सेहत भी नहीं बनती थी. पर अब बाबा रामदेव खुद बच्चों के लिए आटे से बने नूडल्स बाजार में लाने जा रहे हैं. पतंजलि योगपीठ आटे से बने नूडल्स बाजार में उतारने जा रहा है. पतंजलि योगपीठ का दावा है कि आटे से बने नूडल्स खाने से बच्चों की सेहत ठीक रहेगी और वे सेहतमंद भी बने रहेंगे.       

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मुहिम

सोलर पावर बिजनेस देगा एक नई दिशा

नई दिल्ली : नए कारोबारी आगे आएं, हम उन्हें काम देंगे.

यह बात भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में एक बार कही थी, जो शायद अब लोगों को याद भी न हो. पर सच यही है कि जनता से किए गए वादे अब निभाए जा रहे हैं. जो कहा, वह किया के वादों में से एक है सोलर पावर बिजनेस. यह बिजनेस आम लोगों की जिंदगी से जुड़ा है. सरकार की योजनाओं का फायदा लेते हुए नए चैनल पार्टनर सोलर प्लांट लगाने में मदद करेंगे. इन सोलर प्लांट को ग्रिड से जोड़ कर ये चैनल पार्टनर 7 रुपए प्रति यूनिट की दर से अपनी बिजली बेच सकेंगे. जी हां, यह सच कर दिखाया है मोदी सरकार ने. सोलर पावर बिजनैस के बारे में मोदी सरकार जो सोच रही है, अगर सही साबित हुआ तो साल 2022 तक हर घर को बिजली मिलने की उम्मीद है. सरकार की योजना है कि नए कारोबारियों को चैनल पार्टनर बना कर सोलर पावर बिजनेस शुरू किया जाए. इस योजना का दायरा बढ़ाने के लिए सरकार ने औनलाइन प्रक्रिया शुरू की है. नए चैनल पार्टनर बनने की प्रक्रिया औनलाइन करने के लिए मंत्रालय ने अलग से एक नया साफ्टवेयर तैयार किया है. इस साफ्टवेयर को मंत्रालय की वैबसाइट पर अपलोड किया जाएगा.

स्पिन नाम का यह साफ्टवेयर केवल नए चैनल पार्टनर के लिए होगा, जिस में चैनल पार्टनर बनने के लिए कारोबारी आवेदन करेंगे, बल्कि इसी साफ्टवेयर पर मंत्रालय की ओर से आवेदन मंजूरी की सूचना भी दी जाएगी. इतना ही नहीं, चैनल पार्टनर बनने के बाद कारोबारियों को इसी साफ्टवेयर पर अपने प्रोजेक्ट अपडेट करने होंगे. सोलर पावर बिजनेस कितना कामयाब रहेगा, यह तो आने वाला वक्त ही बता पाएगा.          

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जज्बा

शौचालय तो बनवाया, पर अपनी बकरियां बेच कर

छत्तीसगढ़ : कलक्टर का आदेश हुआ कि कोई खुले में शौच नहीं जाएगा. शौचालय अपने घरों में ही बनवाएं, वरना उचित कार्यवाही की जाएगी. कलक्टर का फरमान सुनते ही 104 साल की बुढि़या ने अपनी बकरियां बेच सब से पहले खुद के लिए  शौचालय बनवाया, साथ ही, दूसरे लोगों को भी शौचालय बनाने के फायदे समझाए. छत्तीसगढ़ राज्य के धमतरी जिले में गंगरेल तालाब के पास कोटाभर्री गांव है. जिला मुख्यालय धमतरी से यह गांव महज 14 किलोमीटर दूर है. धमतरी के कलक्टर की अपील पर गांव की 104 साल की बुढि़या कुंवर बाई यादव सब से पहले शौचालय बनवाने के लिए आगे आईं. उन की इसी सोच ने आज गांव की तसवीर बिल्कुल बदल कर रख दी है. बकरियां चरा कर अपनी जिंदगी गुजारने वाली कुंवर बाई ने 22 हजार रुपए में बकरियां बेच कर गांव में सब से पहले शौचालय बनाया. इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान से प्रेरित हो कर कुंवर बाई ने बाकायदा घरघर जा कर लोगों को शौचालय बनवाने के लिए कहा और गांव वालों को इस के फायदे समझाने में कामयाब हुईं. आज यह गांव खुले में शौच करने नहीं जाता है. जिंदगी के आखिरी पड़ाव में कुंवर बाई की मजबूत इच्छाशक्ति लाजवाब है. उन के द्वारा गांव में शौचालय बनवाना नई पीढ़ी के लिए यादगार बन गया है. आज कोटाभर्री गांव के सभी घरों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत शौचालय बन चुके हैं. इतना ही नहीं, जंगल ऊपरपारा में रह रहे 30 परिवारों ने भी स्वच्छता और शौचालय की अहमियत को समझा और अपने घरों में शौचालय बनवा लिए. 30 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है. इस गांव में जिले के कलक्टर ने चौपाल लगा कर स्वच्छता के प्रति लोगों की सोच बदल दी है. गांव कोटाभर्री के लोग खुले में शौच करने के बजाय घरों में शौच के लिए जाते हैं. महिलाएं भी अब खेतों में लोटा ले कर नहीं जाती हैं.        

             

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मुद्दा

बकरी का दूध ज्यादा कीमती

नई दिल्ली : चाहे आंखें फाड़ो या हैरानी जताओ, पर है तो सच कि बकरी का दूध अब आम इनसानों के बजाय डेंगू के मरीजों को दवा के रूप में मिलने लगा है, वह भी आसमान छूती कीमतों पर. बकरी का दूध पीने में पहले भले ही हम नाकभौं सिकोड़ते रहे हों, पर अब यही दूध गायभैंस के दूध से भी ज्यादा कीमत चुकाने पर मिलता है. इस के दाम को सुन कर अच्छेअच्छों के पसीने आ जाएं. बकरी का दूध बेचने वालों से उस की कीमत पूछोगे, तो सीधे कहेंगे कि 2000 रुपए लीटर. मरता क्या न करता. मरीज की जिंदगी बचाने की खातिर लोगों को खरीदना पड़ रहा है इतना महंगा बकरी का दूध. डेंगू के मरीज को दुरुस्त रखने की वजह से इन दिनों बकरी का दूध 2 हजार रुपए प्रति लीटर बिक रहा है. हालांकि पैसे देने के बाद भी मरीजों को महज 50 ग्राम से ले कर 100 ग्राम ही दूध मिल पा रहा है. डेंगू के इलाज के लिए सब से ज्यादा मुफीद बकरी का दूध दिल्ली के अलावा गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद, गुड़गांव में जा कर लोग तलाश रहे हैं. वैसे तो डेंगू बुखार में पपीते के पत्ते का रस, नारियल का पानी, मौसमी का जूस व अनार का सेवन मरीजों को काफी फायदा पहुंचाता है. इस वजह से इन चीजों के दाम भी काफी महंगे हो गए हैं. मगर इस मामले में बकरी के दूध की अहमियत सब से ज्यादा है.

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मुहिम

बिहार की पंचायतें होंगी शौचमुक्त

पटना : बिहार की 38 पंचायतों को 2 अक्तूबर तक पूरी तरह से साफ बनाने की कवायद शुरू कर दी गई?है. राष्ट्रीय सफाई अभियान के तहत उन पंचायतों में खुले में शौच पर पूरी तरह से पाबंदी लग जाएगी. बिहार सरकार ने इस अभियान के तहत सब से पहले राज्य के सभी 38 जिलों में 1-1 पंचायत को पूरी तरह से साफ बनाने की योजना पर काम शुरू किया है. गौरतलब है कि अब तक 12 गांवों को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जा चुका है. खगडि़या जिले के घोघरी प्रखंड की रामपुर पंचायत को सब से पहले पिछली 10 अगस्त को पूरी तरह से खुले में शौच से मुक्त घोषित किया गया था. उस के बाद 15 अगस्त को गया जिले के शेरघाटी प्रखंड के हरना और मंझौली गांवों व दरभंगा की बनौली ग्राम पंचायत को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया गया. सफाई अभियान के तहत राज्य की कुल 8534 पंचायतों को खुले में शौच से मुक्त बनाना?है. राज्य सरकार का दावा है कि हर रोज 1 हजार शौचालय बनाए जा रहे?हैं. जल्द ही रोजाना 5 हजार शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया है.

इस अभियान की देखभाल के लिए हर जिले में जिलाधीश की अगवाई में ‘जिला जल एवं स्वच्छता समिति’ बनाई गई है. खुले में शौच को बंद करने के लिए गांव वालों को जागरूक करने के लिए स्वयं सहायता समूहों समेत कई एनजीओ की मदद ली जा रही है. वे लोग प्रभातफेरी के जरीए लोगों को खुले में शौच न करने को ले कर जागरूक कर रहे हैं. बिहार सरकार की यह मुहिम वाकई काबिलेतारीफ है. वाकई कंप्यूटर व इंटरनेट के आधुनिक जमाने में लोटा ले कर जंगल जाने की बात अटपटी ही नहीं शर्मनाक भी लगती है. ऐसे में सरकार का कमर कसना बेहद सही कदम?है. 

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सलाह

कलेक्टर ने संभाली खेतीबारी

सिरोही : जिला कलेक्टर वी सरवन कुमार ने किसानों को नई व उन्नत खेती अपनाने की सलाह दी?है. इस के लिए उन्होंने विभागीय अधिकारियों को भी नई तकनीकी खेती में किसानों की भरपूर मदद करने की हिदायत दी?है. उन्होंने कहा है कि खेती व उद्यान महकमे के अफसर दफ्तरों से बाहर निकल कर किसानों के खेतों में जाएं व उन्हें कम पानी की उन्नत खेती के बारे में बताएं. उन्होंने हर गांव में किसानों को कृषि विभाग से जोड़ने के लिए एसएमएस सेवा शुरू करने पर भी जोर दिया और किसान पोर्टल से भी किसानों को सीधा जोड़ने की खेती व उद्यान महकमे के अफसरों को सलाह दी. कृषि व आत्मा परियोजना के तहत होने वाले कार्यक्रमों की समीक्षा करते हुए कलेक्टर ने कहा कि इस तरह का माहौल बनाया जाए, जिस से कि गांवों में खेती की फायदेमंद योजनाओं से किसान अपनेआप जुड़ें. कलेक्टर महोदय का काम वाकई काबिलेतारीफ है.    

          

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अजूबा

खुद को ही खाने की कोशिश

फ्लोरिडा : कोई जीव अपना पेट भरने के लिए दूसरे जीव को खाए, यह तो आम बात है, लेकिन अगर वह खुद को ही खाने की कोशिश करे, तब क्या होगा. मियामी शहर के एक बाशिंदे टोड रे के पास दोमुंहा सांप है. यह सांप कई बार अपने मुंह के साथ वाले दूसरे मुंह को देखता है, तो उसे ही खाने की कोशिश करता है. मेडुसा नाम के इस सांप के अलावा टोडरे के पास 2 मुंह के जानवरों का नायाब कलेक्शन है. इस कलेक्शन में 2 मुंह वाला मेढक और 2 मुंह की छिपकली भी हैं. वे कहते हैं कि दूसरे जीवों की तुलना में 3 फुट लंबा मेडुसा सब से ज्यादा ऐक्टिव है. टोड रे का नाम गिनीज बुक में भी दर्ज है.                                             

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खोज

गेहूं बीज कुदरत 8 छोटा पौधा उपज कमाल

वाराणसी : कुदरत बीज श्रृंखला के जनक प्रकाश सिंह रघुवंशी के पास ‘कुदरत 8’ के नाम से गेहूं बीज की खास प्रजाति है. इस गेहूं की बाली की लंबाई 9 इंच है, जिस में तकरीबन 80 से 100 दाने निकलते?हैं. गेहूं का दाना मोटा और चमकदार?है. इस की पैदावार 25 से 30 क्विंटल प्रति एकड़?है. फसल पकने का समय 120 दिन का है और बोआई में 40 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ लगते हैं. राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रगतिशील किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी ने बताया कि ‘कुदरत 8’ बौनी किस्म की प्रजाति है. यह प्रजाति मौसम के उतारचढ़ाव को सहने की कूवत रखती?है और इस किस्म में बीमारी लगने की बहुत कम संभावनाएं हैं. रघुवंशी ने बताया कि उन के द्वारा विकसित की गई कुदरत बीज प्रजाति को देश के कोनेकोने में लाखों किसान अपने खेतों में लगा रहे?हैं और अधिक उत्पादन भी पा रहे?हैं. किसान ही किसानों से बीज खरीद रहे?हैं और किसानों को घर बैठे कुदरत बीज से रोजगार भी मिल रहा?है. रघुवंशी का मानना है कि ‘किसान का पैसा किसान के हाथ, गांव का पैसा गांव में’. अगर कोई किसान बीज उत्पादन का तकनीकी प्रशिक्षण व जानकारी चाहता?है तो मोबाइल नंबर 09839253974 पर जानकारी ले सकता है.       

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बेईमानी

बेंतफल की हो रही तस्करी

महाराजगंज : जंगलों में उगने वाले बेंतों में बाघ व तेंदुए अपने घर बनाते हैं. बेंतफल महंगे सौंदर्य प्रसाधनों व सजावट की वस्तुओं के लिए इस्तेमाल में लाए जाते हैं. इसी वजह से इन की तस्करी की जाती है. महाराजगंज जिले के सोहगीबरवा वन्य प्रभाग में नेपाल से निकलने वाली गंडक नदी के इलाके शिवपुर, निचलौल व मधवलिया रेंज में उगने वाले बेंतफलों की तस्करी जोरशोर पर है. तस्करों द्वारा यहां के आसपास के लोगों को मुंहमांगे दाम दे कर बेंतफल तोड़वाए जाते हैं और फिर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बेच दिया जाता है. बेंतफल नेपाल, बिहार व पश्चिम बंगाल के रास्ते विदेशों में भेजे जाते हैं. सोहगीबरवा वन्य क्षेत्र में अब तक पकड़े गए बेंतफलों से यह साबित हो गया है कि वनविभाग की लाख कवायदें भी इन बेंतफलों के तस्करों को रोकने में नाकाम रही हैं. मधवलिया रेंज के सिंहपुर में ट्रकों में लाद कर ले जाते हुए 500 बोरी बेंतफल बरामद हुए थे. उस वक्त मुख्य वनसंरक्षक के थामस ने मौके पर पहुंच कर एक वनदरोगा को निलंबित कर दिया था.

सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग महाराजगंज के डीएफओ शिवाजी राय ने बताया कि कुछ लोग जंगलों से सटी अपनी निजी जमीन पर बेंतफल की खेती करते हैं, जिस की आड़ में बेंतफल तोड़ने का परमिट ले कर तस्कर वनकर्मियों की मिलीभगत से वन क्षेत्र के बेंतफल तोड़ लेते हैं. वन क्षेत्र में बेंतफल तोड़े जाने में शामल वनकर्मियों के खिलाफ भी जरूरी कार्यवाही की जा रही?है. शिवाजी राय ने बताया कि तस्करों द्वारा बेंतफल के 10-12 फल वाले गुच्छों को तोड़ कर धूप में सुखाया जाता है और फिर उन्हें पैक कर के गंडक डोमा, नेपाल, बिहार, पश्चिम बंगाल के रास्ते दूसरे देशों तक पहुंचा दिया जाता है.      

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सुविधा

फोन से किसानों की समस्याओं का हल

बस्ती : अब किसानों को फसल में रोग लगने की दशा में कृषि वैज्ञानिकों के पास चक्कर नहीं काटना पड़ेगा. इस के लिए कृषि विभाग ने मोबाइल फोन के जरीए किसानों की समसया हल करने की पहल की है. बस्ती जिले में इस की शुरुआत की जा चुकी?है. यह काम भारत सरकार द्वारा देश भर के किसानों को विशेषज्ञों से मोबाइल से जोड़ने की योजना के तहत शुरू किया गया?है. किसान मोबाइल फोन के जरीए जान सकेंगे कि उन्हें फसल में कब और कितनी मात्रा में खाद का इस्तेमाल करना है. इस के अलावा किसानों को 5 दिन पहले ही मौसम की जानकारी मिल जाएगी. इस के अलावा अगर किसान की फसल में कोई रोग लगा है और वह उस का इलाज चाहता?है, तो उसे अपनी रोगग्रसत फसल का फोटो खींच कर वाट्सऐप नंबर से विभाग द्वारा मुहैया कराए गए नंबरों पर भेजना होगा. इस के अलावा खेती की अन्य जानकारियों के लिए विभाग के नंबरों पर एसएमएस करना होगा. बस्ती जिले के उपनिदेशक कृषि डा. पीके कन्नौजिया ने बताया कि इस काम में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान भी अपना पूरा सहयोग देगा. इस प्रकार मोबाइल आधारित सेवा के जरीए किसान को उस की समस्या का समाधान आसानी से मिल सकेगा.        

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घपला

बूंदबूंद सिंचाई में भ्रष्टाचार की बूंदें

जयपुर : किसानों के लिए वरदान बनी प्रदेश की बूंदबूंद सिंचाई योजना में अब भ्रष्टाचार की बूंदें भी नजर आने लगी हैं. योजना के तहत मिलने वाली सब्सिडी में हेरफेर के ऐसे कई मामले बीकानेर व चुरू जिलों में सामने आए हैं. दोनों ही जिलों में पिछले दिनों?भ्रष्टाचार निरोधक टीम ने?छापा मार कर विभागीय अनुदान पत्रावलियां जब्त की?हैं. विभागीय अफसरों ने बूंदबूंद सिंचाई व फव्वारा सिस्टम के अनुदान में कार्यकारी एजेंसियों से मिलीभगत कर करोड़ों रुपए का घपला किया है. जानकारी के मुताबिक बीकानेर में साल 2014-15 के लिए चयनित 234 किसानों की फाइलें भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने जब्त की हैं. एसीबी के अपर पुलिस निदेशक परवत सिंह के मुताबिक 4.84 करोड़ रुपए का अनुदान कार्यकारी एजेंसी व फर्मों को फरवरी 2015 में जारी करने का जिक्र?है, जबकि मौके पर काम ही नहीं हुआ?है. इसी तरह चुरू जिले में भी एसीबी के सीआई लीलाधर जांगिड़ के मुताबिक जिले के उद्यानिकी विभाग के अफसरों ने किसानों के खेतों में बिना फव्वारा सिस्टम लगाए ही कार्यकारी एजेंसियों व फर्मों को बड़ी रकम का भुगतान कर दिया. एसीबी टीम ने यहां भी सारे रिकार्ड जब्त कर लिए.                 

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नकेल

सहकारी समितियों पर कसा शिकंजा

पटना : बिहार की सभी सहकारी समितियों में लूटखसोट और अफसरों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए सभी समितियों के काम की निगरानी करने का फरमान जारी कर दिया गया है. सहकारी समितियों में होने वाली गड़बडि़यों की बढ़ती शिकायतों को देखते हुए बहुराज्यीय सहकारी समितियों, क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसाइटियों और चिट फंड कोऔपरेटिव सोसाइटियों के कामकाज की छानबीन शुरू की गई है. सहकारिता विभाग के सूत्रों के मुताबिक विभागीय छानबीन के बाद तैयार की गई रिपोर्ट को आर्थिक अपराध इकाई को सौंपा जाएगा. मल्टी स्टेट बचत व साख सहकारी समितियों के कामों की समीक्षा का काम भी शुरू किया गया है. सरकार को कई ऐसी शिकायतें मिली हैं कि नियमों का उल्लंघन कर के समितियों के सदस्य अवैध तरीके से आम लोगों की बचत की रकम जमा रखते?हैं और उन्हें ज्यादा सूद देने का झांसा दे कर शिकार बनाते हैं. फ्राड समितियों द्वारा जनता से मोटी रकम ले कर फरार होने की वारदातों में भी तेजी आई?है. इस बात की भी जांच की जा रही है कि पिछले 3 सालों में सहकारी समितियों ने कितने लोगों को कर्ज दिए हैं. सरकार को रिपोर्ट मिली है कि राज्य में सैकड़ों फर्जी समितियों का जाल फैला हुआ?है, जबकि सरकारी रिकार्ड में केवल 23 मल्टी स्टेट सहकारी समितियां ही रजिस्टर्ड हैं.सहकारी समितियों का मकसद आम लोगों व किसानों की मदद करना होता?है, मगर तमाम समितियां अपने मकसद से भटक रही?हैं. अमूमन समितियों की साख उस के सदस्यों व कर्मचारियों से बनती?है, मगर अकसर बेईमान लोग फिजां ही बिगाड़ देते हैं.     

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सहूलियत

5 साल में चुकाएं कर्ज

जयपुर : अकसर देखा जाता है कि बाढ़ व सूखे जैसे कुदरती कहर के चलते खेत के खेत तबाह हो जाते हैं. किसानों की आंखें झरना बन जाती हैं और दिल पत्थर. ऐसे हालात में राज्य भी उन की नहीं सुनता, लेकिन अब किसानों के लिए राहत की खबर है. रिजर्व बैंक किसानों के लिए राहत की सौगात ले कर आया है. रिजर्व बैंक ने कहा है कि बाढ़ व सूखे जैसे कुदरती कहर के चलते फसल में 50 फीसदी खराबी होने पर कर्ज चुकाने की मियाद 5 साल तक बढ़ाई जा सकती है. यदि 33 फीसदी फसल खराब हुई, तो कर्ज चुकाने की मियाद 2 साल तक बढ़ाई जा सकती है. इस में 1 साल तक कर्ज वापसी पर रोक भी शामिल है. रिजर्व बैंक द्वारा जारी की गई अधिसूचना में कहा गया है कि 33 फीसदी या उस से ज्यादा फसलों को नुकसान होता?है, तो राज्य स्तर की बैंकर्स कमेटी को बैंकों को कर्ज चुकाने के शिड्यूल में हालात के मुताबिक जरूरी बदलाव करने का पूरा हक होगा.                  

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मुहिम

बांसवाड़ा बनेगा मैंगो हब

बांसवाड़ा : वागड इलाके के आमों की बेहतरीन किस्मों को संरक्षण देने की कोशिशें तेज हो चुकी हैं. जिले को मैंगो हब के तौर पर विकसित करने के लिए जनजातीय क्षेत्रीय विकास महकमे ने कमर कस ली है. इस कोशिश के तहत अगले 3 सालों में इलाके में आम के कई बगीचे नजर आएंगे. फिलहाल बांसवाड़ा जिले में दशहारी, लंगड़ा, मल्लिका और आम्रपाली आमों की 4 खास किस्में हैं. वहीं बाम्बे ग्रीन, केसर और चौसा किस्म के आमों की भी भरपूर पैदावार होती है. गौरतलब है कि मल्लिका व आम्रपाली आमों की पैदावार इलाके में हर साल भरपूर मात्रा में होती है, वहीं बाकी किस्मों के आमों की पैदावार 1 साल ज्यादा, तो 1 साल कम की दर से होती है. क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र वागड अंचल के मुताबिक, अगले 3 सालों में आम के बागों का रकबा बढ़ाया जाएगा. इस योजना में छोटे किसानों को?भी शामिल किया जाएगा. किसानों को आम के बगीचे लगाने के लिए सब्सिडी राशि भी दी जाएगी. इलाके में कोल्ड स्टोरेज भी बनाए जाएंगे.              

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कहर

बारिश की दगाबाजी से सूखे खेत

पटना : बिहार में इस साल भी बारिश की दगाबाजी की वजह से किसानों और खेती का काफी नुकसान होना तय है. बारिश न होने की वजह से राज्य के 2 लाख हेक्टेयर खेल खाली रह गए हैं. किसानों ने किसी तरह से 95 फीसदी खेतों में धान और 90 फीसदी खेतों में मक्के की फसल की बोआई कर दी है, लेकिन ज्यादातर पौधों का पानी की कमी में सूखना तय माना जा रहा है.ऐसा अनुमान है कि इस साल किसानों को 4 लाख टन धान का नुकसान होगा, जिस की कीमत 28 अरब रुपए के करीब होगी. राज्य में अब तक 20 फीसदी कम बारिश हुई है. 18 जिलों में करीब 30 फीसदी कम पानी हुआ. सूखे की हालत को देखते हुए सरकार ने डीजल पर अनुदान देने का ऐलान किया?है, लेकिन धान की अच्छी फसल के लिए बारिश का पानी काफी जरूरी?है. इस के साथ ही जिन इलाकों में धान की रोपनी देरी से हुई है, वहां भी उत्पादन पर बुरा असर पड़ेगा. गौरतलब है कि राज्य में 34 लाख हेक्टेयर में धान की खेती का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन 32 लाख हेक्टेयर में ही रोपनी हो सकी है. 4 लाख 75 हजार हेक्टेयर में मक्के की खेती का लक्ष्य था, पर 4 लाख 25 हजार हेक्टेयर में ही बोआई हो पाई.   

– मधुप सहाय, भानु प्रकाश, अक्षय कुलश्रेष्ठ, बीरेंद्र बरियार, मदन कोथुनियां और बृहस्पति कुमार

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सवाल किसानों के

सवाल : आम, जामुन व नीबू के पेड़ों की कलम कैसे तैयार करते हैं? सहजन के पेड़ के बारे में भी जानकारी दें?

-दिलीप महाजन, बैतूल, मध्य प्रदेश

जवाब : आम की कलम द्वारा पौधे तैयार करने के लिए इनार्चिंग व वेज या स्लैफ्ट ग्राफ्टिंग तरीका अपनाया जाता है. नीबू में कटिंग या गुटी बांध कर नए पौधे तैयार किए जाते हैं. जामुन में व्यावसायिक तौर पर पेंच बडिंग अपनाई जाती है. सहजन की कटिंग लगा कर या बीज द्वारा नए पौधे तैयार कर सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से ट्रेनिंग हासिल करें.

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सवाल : मिर्च की फसल को कीटों व बीमारियों से कैसे बचाएं?

-ओम नारायण उरांव, चांपा, छत्तीसगढ़

जवाब : मिर्च की फसल में ज्यादातर बिल्ट रोग व मोजैक रोग लगता है. मिर्च को एफिड व जैसिड कीटों द्वारा ज्यादा नुकसान होता है. बिल्ट व मोजैक रोग की रोकथाम के लिए रोग अवरोधी प्रजातियां बोएं और ट्राइकोडर्मा द्वारा खेत को उपचारित करें. ऐफिड, जैसिड व सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए नीम का तेल व इमिडाक्लोरप्रिड का इस्तेमाल करें.

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सवाल : मेरी गाय अकसर सानी खाना काफी कम कर देती है. ऐसा क्यों होता?है? कभीकभी गाय का शरीर हलका गरम लगता है, ऐसे में क्या इलाज करना चाहिए?

-सुनीता, कानपुर, उत्तर प्रदेश

जवाब : किसान भाई, गाय के चारा न खाने के कई कारण हो सकते हैं. इस मौसम में पशुओं को पेट के कीड़े मारने की दवा हर 3 महीने के अंतराल में देनी चाहिए. साथ में पशु को 60 ग्राम खनिज मिश्रण एग्रीमिन फोर्ट चेल्टेड रोजाना दाने में मिला कर दें और 50 ग्राम सादा नमक भी खिलाएं. पशुओं को जुओं और किल्ली से होने वाले रोगों से बचाने के लिए पशु चिकित्सक से संपर्क कर के दवा देनी चाहिए. गाय का बदन गरम लगे तो उसे निकट के पशुचिकित्सक को दिखाएं. पशु चिकित्सक थर्मामीटर से गाय का बुखार चेक कर के उस के मुताबिक मुनासिब दवा दे देगा. वैसे आप थर्मामीटर के जरीए खुद भी गाय का बुखार देख सकती हैं.

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सवाल : क्या बकरीपालन फायदे का काम?है? इस बारे में पूरी जानकारी दें?

-बबलू, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

जवाब : बकरीपालन काफी फायदे का काम?है. 1 बकरा व 1 बकरी खरीद कर भी यह काम शुरू किया जा सकता?है. बकराबकरी की तादाद बहुत तेजी से बढ़ती है. मीट के लिहाज से भी बकरे काफी महंगे बिकते?हैं और बकरी का दूध भी महंगा बिकता है.                        

– डा. अनंत कुमार, डा. प्रमोद मडके, डा. देवेंद्र पाल

कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद

झारखंड : मछली उत्पादन में लंबी छलांग

झारखंड के पथरीले इलाकों के बीच मछली उत्पादकों की मेहनत को देख कर सरकार यह दावा कर रही है कि मछली उत्पादन के मामले में झारखंड जल्द ही अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा. कभी मछली उत्पादन के मामले में फिसड्डी माने जाने वाले राज्य ने मछली उत्पादन में जोरदार छलांग लगाई है. साल 2004-05 में सूबे में 22 हजार मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ था, जो आज बढ़ कर 71 हजार मीट्रिक टन हो गया है. राज्य के मछलीपालकों का कहना है कि मछलीपालन को बढ़ावा देने से एक ओर जहां ज्यादा लोगों को रोजगार मिलेगा, वहीं मछली उत्पादन के मामले में राज्य आत्मनिर्भर भी हो जाएगा. रांची के पास नामकुम इलाके के मछलीपालक सुखदेव महतो ने बताया कि राज्य में तालाबों की कमी को देखते हुए वैज्ञानिक तरीके से वैसे तालाब बनाने की जरूरत है, जिन में पूरे साल पानी रह सके. इस से मछली उत्पादन में ज्यादा तेजी आ सकेगी.

मछली उत्पादन से होने वाले फायदे को इस से आसानी से समझा जा सकता है कि 10 पैसे के 1 मछली बीज से 7-8 महीने बाद प्रति मछली 60 से 70 रुपए की कमाई हो जाती है. मछली उत्पादकों को सुविधाएं मिलें तो मछली उत्पादन के क्षेत्र में झारखंड कामयाबी की बुलंदियां छू सकता है. मछली उत्पादन के मामले में बंजर माने जाने वाले झारखंड में मछली उत्पादकों का हौसला बढ़ाने को ले कर सरकार की भी नींद खुली है. पिछले साल रिकार्डतोड़ मछली उत्पादन करने वाले किसानों को सरकार ने सम्मानित कर के उन का हौसला बढ़ाया. पाकुड़ जिले के सोमनाथ हलधर ने 200 क्विंटल मछली उत्पादन के साथसाथ 50 लाख मछली बीज का भी उत्पादन किया, जिस के लिए उन्हें पहला पुरस्कार मिला. गुमला जिले शिव प्रसाद साहू ने 150 क्विंटल मछली और 50 लाख मछली बीज का उत्पादन कर के दूसरा पुरस्कार हासिल किया. इस के अलावा साहू 70 गायों की डेरी चला कर खुद को और सूबे को माली रूप से मजबूत करने में लगे हुए हैं. चतरा जिले के प्रहलाद चौधरी ने 100 क्विंटल मछली उत्पादन कर के तीसरे पुरस्कार पर कब्जा जमाया. इन के साथ सरायकेला के राधाकृष्ण और बोकारो के गुहीराम घीवरने को 1-1 करोड़ और कोडरमा के सकलदेव सिंह को 50 लाख मछली बीज का उत्पादन करने के लिए सम्मानित किया गया. सरकार की ओर से मदद और सम्मान मिलने के बाद झारखंड में मछलीपालन की तरक्की तेज हुई है.

झारखंड के मत्स्यपालन मंत्री रणधीर कुमार सिंह कहते हैं कि सूबे में 1 लाख 15 हजार मीट्रिक टन मछली की खपत होती है, जबकि फिलहाल 71 हजार मीट्रिक टन का ही उत्पादन हो रहा है. मछली की कमी को पूरा करने के लिए पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश से मछलियां मंगाई जाती हैं. झारखंड में रेहू, कतला व मिरगा जैसी मछलियों का ज्यादा उत्पादन होता है और इन मछलियों की मांग भी सब से?ज्यादा है. पोलासिया, गरई व मांगुर जैसी मछलियां गंदे पानी में भी जिंदा रह लेती हैं, जबकि रेहू, कतला, मिरगा, पोठिया व दिलवरकाट वगैरह मछलियों को साफ पानी की जरूरत होती है. मत्स्य संसाधन विकास संस्थान से मिली जानकारी के मुताबिक झारखंड में हर जिले में स्थानीय युवकों में से करीब 5 हजार मत्स्य मित्र बनाए गए हैं. इन के जरीए सूबे के जलकरों के सर्वे का काम कराया जा रहा है. 1 लाख, 5 हजार जलकरों के जल क्षेत्र, मछलीपालकों के नाम और मत्स्य बीज की जरूरत से जुड़ी जानकारियां जमा की जा रही?हैं. मत्स्य मित्रों के जरीए सूबे के मछुआरों की गिनती भी कराई जा रही है.

मत्स्यपालन मंत्री के मुताबिक झारखंड में मछली उत्पादन को बढ़ाने के लिए सभी तालाबों, जलाशयों, चेकडैम और नहरों को दुरुस्त करने के साथ ही नए जल संसाधनों को विकसित करने और उन की जलग्रहण कूवत को बढ़ाने की योजनाओं पर काम चालू किया गया है. पायलट प्रोजेक्ट के तहत बोकारो जिले में पंगद मछली का उत्पादन शुरू किया गया है. यह मछली 2 महीने में 250 ग्राम अैर 7-8 महीने में 1 किलोग्राम की हो जाती है. सूबे के बाकी जिलों में भी इस योजना को चालू किया जाएगा. उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनने के लिए 80 करोड़ मत्स्य बीज का उत्पादन करना जरूरी है, जबकि फिलहाल 54 करोड़ मत्स्य बीज का उत्पादन किया जा रहा?है.   

नकदी फसल मसूर की खेती

दलहनी फसलों में मसूर की खेती किसानों के लिए नकदी फसल के रूप में उगाई जाती है. मसूर का इस्तेमाल न केवल दालों बल्कि नमकीन, अंकुरित अनाज व तमाम खाद्य पदार्थों में किया जाता है. मसूर की खेती में मेहनत व लागत दोनों कम लगती है. किसानों के लिए यह माली आमदनी का अच्छा जरीया माना जाता है. मसूर की खेती दोमट मिट्टी से ले कर भारी जमीन में आसानी से की जा सकती है. इस की खेती धान के खाली पड़े खेतों या परती जमीन में भी की जा सकती?है. मसूर की खेती के लिए मिट्टी पलटने वाले हल से 2-3 बार जुताई कर के पाटा लगा देना चाहिए. अगर रोटावेटर या पावर हैरो से जुताई की जा रही है, तो 1 बार जुताई करना ही काफी होता है. इस की बोआई का सही समय अक्तूबर के दूसरे हफ्ते से नवंबर के दूसरे हफ्ते तक होता है. इस की बोआई जीरो टिल सीड ड्रिल से भी की जा सकती है. मसूर की समय से बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर 40-60 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. बोआई समय से न करने की हालत में 65-80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत पड़ती है.

बीज को खेत में बोने से पहले उपचारित किया जाना जरूरी होता है. मसूर बीज का उपचार राइजोबियम कल्चर से किया जाना ज्यादा सही होता है. 10 किलोग्राम बीज के उपचार के लिए 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर की जरूरत पड़ती है. किसी खेत में मसूर की खेती पहली बार की जा रही हो, तो बीजोपचार से पहले बीज का रासायनिक उपचार भी किया जाना चाहिए. चूंकि मसूर की जड़ों में राइजोबियम गांठें होती हैं, इसलिए इस की फसल में ज्यादा उर्वरक की जरूरत नहीं पड़ती है. अगर सामान्य तरीके से खाली खेत में मसूर की बोआई की जा रही हो, तो प्रति हेक्टेयर 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस व 20 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करना चाहिए. अगर धान की कटाई के बाद खेत में मसूर की बोआई करनी है, तो 20 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से टापड्रेसिंग करना चाहिए. इस के बाद 30 किलोग्राम फास्फोरस का छिड़काव 2 बार फूल आने पर व फलियां बनते समय करना चाहिए.

मसूर की फसल में ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है. अगर बोआई के समय नमी न हो तो फली बनते समय सिंचाई करनी चाहिए. इस से पहले फूल आने पर भी सिंचाई जरूरी होती है. मसूर की बोआई के 20-25 दिनों बाद खरपतवार निकाल देने चाहिए.

खास बीमारियां : मसूर की बोआई से पहले उस के बीज को 2.5 किलोग्राम?थीरम या 4 किलोग्राम ट्राइकोडरमा या 1 ग्राम कार्बेंडाजिम से उपचारित करने पर बीमारियां लगने का खतरा काफी कम होता?है. फिर भी मसूर की फसल में अकसर उकठा, गेरुई गलन रोग, ग्रीवा गलन व मूल विगलन रोग का असर दिखाई पड़ता?है. ऐसे में इन बातों पर खास ध्यान देना चाहिए:

* अगर खेत में उकठा या गेरुई रोग का प्रकोप हो तो मसूर की रोग प्रतिरोधी प्रजातियों जैसे नरेंद्र मसूर 1, पंत मसूर 4, पंत मसूर 5, प्रिया, वैभव जैसी प्रजातियों की बोआई करनी चाहिए.

* बीज व मिट्टी से होने वाले रोगों में?ऊपर बताई गई विधि से बीज को उपचारित करने पर रोग का असर नहीं होता?है.

* अगर ग्रीवा गलन या मूल विगलन रोग से फसल का बचाव करना?हो, तो 5 किलोग्राम ट्राइकोडरमा पाउडर को 2.5 क्विंटल गोबर की खाद में मिला कर मिट्टी में मिला देना चाहिए.

* जिस खेत में उकठा, ग्रीवा गलन या मूल विगलन रोगों का प्रकोप हो, उस में 3-4 सालों तक मसूर की फसल नहीं लेनी चाहिए.

कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया, बस्ती में विषय वस्तु विशेषज्ञ डा. प्रेमशंकर का कहना?है कि मसूर में माहू कीट व फलीछेदक कीट का हमला देखा गया?है. माहू कीट पौधे के कोमल भागों का रस चूस कर पौधे का विकास रोकता है. वहीं फलीछेदक कीट फली के दानों को खा कर उत्पादन घटाता है.

ऐसे में मिथाइल ओ डिमटोन, क्यूनालफास या मेलाथियान का छिड़काव कृषि विशेषज्ञ की सलाह के मुताबिक करना चाहिए. इस के अलावा मोनोक्रोटोफास या मेथिलान का छिड़काव भी कारगर होता है. कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया, बस्ती में वरिष्ठ विशेषज्ञ डा. राघवेंद्र विक्रम सिंह के मुताबिक मसूर की खेती के दौरान कुछ सावधानियों को अपना कर उत्पादन में इजाफा तो किया ही जा सकता?है, साथ ही खेती के जोखिम को?भी कम किया जा सकता?है. मसूर की खेती के दौरान ध्यान देने वाली खास बातें निम्न हैं:

* मसूर की रोगरोधी प्रजाति का ही चयन करें.

* सूत्रकृमियों के नियंत्रण के लिए गरमी में जुताई करें.

* लगातार दलहनी फसलों या सब्जियों की खेती एक ही खेत में न करें, बल्कि 3 साल का फासला रखें.

* अपने क्षेत्र के मुताबिक बताई गई प्रजातियों का ही चयन करें.

* बीज शोधन जरूर करें.

* सिंगल सुपर फास्फेट का इस्तेमाल जरूर करें.

* रोग का नियंत्रण समय से करें.

ऊपर बताई गई बातों को अगर ध्यान में रखा जाए तो मसूर किसानों के लिए महज 4 महीने के कम समय में ही अच्छी आमदनी का साधन साबित होती?है.

कटाई व भंडारण : मसूर की फलियां जब सूख कर भूरे रंग की हो जाएं, तो फसल की कटाई कर के उस में अल्यूमीनियम फास्फाइड की 2 गोलियां प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से?डाल कर भंडारित करें.

मसूर की खेती के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए खेती के माहिर राघवेंद्र विक्रमसिंह के मोबाइल नंबर 09415670596 पर बात कर सकते?हैं. इस के अलावा कीटों व बीमारियों के बारे में वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. प्रेम शंकर के मोबाइल नंबर 09935668097 पर संपर्क किया जा सकता है

फिर पड़ी सूखे की मार फसलें खराब किसान लाचार

जमीन, आसमान, हवा, पानी व आग के मेल से दुनिया बनी है, लेकिन इन महापंचों की नजर टेढ़ी होने पर बनाबनाया खेल बिगड़ जाता है. किसानों को अकसर यह मार सहनी पड़ती है, क्योंकि ज्यादातर खेती कुदरत के भरोसे है. जमीन ऊसर, बंजर, बीहड़ या दलदली हो, आसमान से बिजली, ओले गिरें, आंधी, तूफान, चक्रवात आएं, बादल फटें, पानी न बरसे या पकी फसल जल जाए, किसानों को जानमाल का नुकसान ज्यादा होता है, क्योंकि खेती में जोखिम बहुत हैं. खतरे उठा कर फसलों को महफूज रखना आसान नहीं है. भले ही खेती को देश की रीढ़ व किसान को अन्नदाता कहें, लेकिन सहूलियतों की बरसात कारखानेदारों पर ज्यादा, किसानों पर कम होती है. लिहाजा दूसरों की थाली भरने वाले किसानों की थाली खाली रहती है. ऊपर से सूखे की मार पड़ जाने के कारण किसानों की मुश्किलें बेहिसाब बढ़ जाती हैं.

दरअसल ज्यादातर किसान आज भी मानसून की मेहरबानी पर खेती करते हैं. बारिश कम होने से असिंचित इलाकों में बसे किसानों की परेशानी ज्यादा बढ़ जाती है. मौसम की बेरुखी व राहत में कमी किसानों को खुदकुशी के कगार पर पहुंचा देती है. ज्यादातर किसान सूखा प्रबंधन की तकनीकों से नावाकिफ हैं. बीते 67 सालों में पानी की तरह पैसा बहाने के बावजूद खेती की यह कैसी तरक्की है? पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में बादल तो घिरे, लेकिन इस बार सावन का महीना सूखा चला गया. पिछले साल के मुकाबले इस बार 44 फीसदी कम बारिश हुई है.  मेरठ ही क्या देश के कई राज्यों में बहुत से जिले सूखे की चपेट में हैं. महाराष्ट्र में मराठवाड़ा इलाके में किसान पानी की भयंकर कमी से जूझ रहे हैं. लिहाजा खेती, पानी बचाने, उस के किफायती इस्तेमाल जैसे मुद्दों पर खास व कारगर पहल बेहद जरूरी है, क्योंकि बहुत से किसान जलप्रबंधन की तकनीकों से एकदम नावाकिफ हैं.

कमजोर मानसून

सालाना बारिश में करीब 70 फीसदी जून से सितंबर तक होती है. मौसम महकमे के मुताबिक पिछले दिनों देश के 6 फीसदी हिस्से में सैलाब आया, 44 फीसदी हिस्से में कम पानी बरसा व बाकी में औसत बारिश हुई. जून से सितंबर मध्य तक बारिश का औसत 13-14 फीसदी कम रहा. उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश में 20 फीसदी, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व महाराष्ट्र वगैरह में 41 फीसदी व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस बार 44 फीसदी तक कम बारिश रही. देश के 91 बड़े जलाशयों में पानी तकरीबन 16 फीसदी तक घट गया है. जमीन के नीचे का पानी भी लगातार नीचे उतर रहा है. लिहाजा हालत खराब हो रही है. हालांकि पहले ओडिशा का कालाहांडी जिला फसल खराब होने के लिए जाना जाता था, लेकिन सूखे की वजह से देश के कई दूसरे व खुशहाल इलाकों में भी खुश्की के आसार बन रहे हैं.

देश की कुल माली तरक्की में खेती का हिस्सा काफी अहम है, लिहाजा कमजोर मानसून से बारिश व पैदावार में आने वाली कमी का सीधा असर विकास दर पर पड़ता है. लगातार दूसरे साल भी सूखा पड़ने की वजह से पैदावार इस बार भी घटेगी. खासकर खरीफ की फसलों व दूसरी कृषि जिंसों में तेजी आएगी. केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय के मुताबिक 2014-15 के दौरान देश के 96 जिलों में सूखा पड़ा था. इन में हरियाणा के 21, उत्तर प्रदेश के 44, कर्नाटक के 9 व महाराष्ट्र के 22  जिले शामिल थे. इस साल मौसम के महकमे ने पहले ही मानसून की नजाकत व बारिश में 12 फीसदी कमी से आगाह करा दिया था, लिहाजा किसानों व सरकार के पास सूखे से निबटने का मौका था. सरकार ने 3.7 करोड़ की जगह 5.5 करोड़ टन गेहूं व चावल का भंडार कर लिया.

बचाव की तकनीक

पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा व पंजाब वगैरह में नदीनहरों, ट्यूबवैलों और पंपसेटों वगैरह की भरमार है. ऐसे इलाकोें में यदि बारिश कम भी हो तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता, लेकिन महंगे डीजल व बिजली की किल्लत से किसानों को दिक्कत होती है और प्रति हेक्टेयर फसलों की उत्पादन लागत बढ़ती है. छोटे व सीमांत किसान बारिश के भरोसे खेती करते हैं. उन्हें कम पानी से खेती करने की तकनीक मुहैया कराई जाए. मसलन धान व गन्ने को ज्यादा पानी चाहिए. पानी कम हो तो आयरन की कमी से धान के पत्ते पीले हो जाते हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसे में 1 फीसदी फेरस सल्फेट व 0.25 फीसदी चूने का घोल धान की फसल में डालें. खेत में पानी जमा रहे व 10 दिनों बाद इसे फिर दोहराएं तो फसल बच जाएगी.

उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर ने कोशा 767,07250 व कोसे 01434 वगैरह गन्ने की ऐसी कई किस्में निकाली हैं, जो कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं. इस के अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों ने भी सूखे से निबटने के कई तरीके निकाले हैं, जैसे कि छोटे जल भंडारों के लिए किफायती रन आफ सैंपलर, सस्ता जल संचयन व सिंचाई की सूक्ष्म प्रणाली, खेती रन आफ के इस्तेमाल से सीधे जलभराव के लिए फिल्टर और पालीमर के इस्तेमाल से पानी की नमी को ज्यादा देर तक बनाए रखना. सरकारी मुलाजिमों की कामचोरी से ऐसी तमाम जरूरी बातों की जानकारी ज्यादातर किसानों तक नहीं पहुंचती. केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय ने हैदराबाद में केंद्रीय बारानी खेती अनुसंधान संस्थान, सीआरआईडीए और सूखी बागबानी पर रिसर्च व ट्रेनिंग के लिए बीकानेर में केंद्रीय शुष्क बागबानी संस्थान खोल रखा है. इन संस्थानों के वैज्ञानिकों ने फसलों, जानवरों, सिंचाई के तरीकों, मिट्टी की खासीयतों व ढांचागत सहूलियतों को मौसमी बदलाव के पहलुओं पर बांट कर कम पानी से खेती व बागबानी के कारगर उपाय निकाले हैं.

सीआरआईडीए किसानों को सूखे व बाढ़ में होने वाले फसली नुकसान को कम करने की सलाह देगा. इस के लिए इस संस्थान ने देश के 574 जिलों के लिए औचक स्कीमें बनाई हैं, लेकिन ऐसी बातें जमीनी हकीकत से दूर हैं. वे तब तक सिर्फ हवाई, कोरी व कागजी बातें ही मानी जाएंगी, जब तक कि लैब से निकल कर गांवों, खेतों व किसानों तक न पहुंच जाएं.

सरकारी इमदाद

सूखा पड़ने पर सरकारें राहतकारी उपाय करती हैं. खरीफ 2014 के सीजन में हुई कम बारिश के असर को कम करने के लिए डीजल पर छूट, बागबानी फसलों पर माली इमदाद, बीज पर छूट में 50 फीसदी बढ़ोतरी, चाराविकास की स्कीम, तेलखली पर आयात शुल्क माफ जैसे कदम उठाए गए थे, लेकिन हमारे देश में सूखे पर भी राहत कम व राजनीति ज्यादा होती है. सूखा सहायता के लिए राज्यों में विपदा अनुक्रिया निधि एसडीआरएफ व केंद्र में एनडीआरएफ के तहत रकम मौजूद रहती है. इस मद में 2014-15 के दौरान 7,387 करोड़ 1 लाख रुपए थे, जबकि 2015-16 के दौरान 3,693 करोड़ 99 लाख रुपए बढ़ा कर कुल 11,081 करोड़ रुपए एलाट किए गए हैं, लेकिन इस में भी भेदभाव है. लिहाजा सूखा पड़ने पर सभी राज्यों को एक जैसी व बराबर माली इमदाद मयस्सर नहीं होती. देश के 29 में से 18 राज्य आम कैटेगरी के हैं. सूखा राहत में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश व पश्चिम बंगाल को 3 हिस्से केंद्र सरकार के व 1 हिस्सा राज्य सरकार का होता है. बाकी 11 राज्यों अरुणांचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर व उत्तराखंड के लिए 9 हिस्से केंद्र सरकार के व 1 हिस्सा राज्य सरकार का होता है.

मोदी सरकार ने कई नए कदम उठाए हैं. पहले फसल के 50 फीसदी नुकसान पर राहत मिलती थी, अब 33 फीसदी पर मिल जाती है. पहले 1 हेक्टेयर जोत वालों को राहत मिलती थी, अब 2 हेक्टेयर जोत वालों को भी मिलती है. साथ ही दी जाने वाली माली इमदाद भी बढ़ा कर प्रति हेक्टेयर 4,500 रुपए से 18 हजार रुपए कर दी गई है. साथ ही कुदरती आपदा में मरने पर वारिसों को देय मुआवजा डेढ़ लाख रुपए से बढ़ा कर 4 लाख रुपए कर दिया गया है.

हीलाहवाली

सब जानते हैं कि सरकारी राहत किसानों तक आसानी से नहीं पहुंचती. उस में काफी देर लगती है, क्योंकि कागजी खानापूरी का रास्ता काफी लंबा व चाल कछुए जैसी होती है. सूखा पड़ने पर राज्य सरकार नुकसान का अंदाजा लगाती है. फिर केंद्र सरकार से माली इमदाद की मांग करती है. इस के बाद केंद्र सरकार उस की जांच के लिए टीम बनाती है. वे टीमें घूमघूम कर दौरा करती हैं व मौकामुआयना करने के बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को देती हैं. इस सारे काम में काफी समय लगता है और तब कहीं जा कर राहत की रकम राज्यों को दी जाती है. फिर उस के बंटने में काफी देर लगती है. लिहाजा सूखा राहत की बूंदें किसानों तक जल्द व पूरी न पहुंच कर रास्ते में ही सूख जाती हैं. पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के सिकंदराबाद इलाके में किसानों को बंटने आए फसली मुआवजे में से 56 लाख रुपए की रकम 2 चेकों के जरीए हड़प ली गई. भांडा फूटने पर तहसीलदार मुकर गया. उस ने अपने दस्तखत ही फर्जी बता दिए. पूरा अमला उसे बचाने में जुट गया, लेकिन स्टेट बैंक ने इस मामले की जांच रिजर्व बैंक से कराई तो पोल खुल गई. जांच रिपोर्ट में चैकों पर किए गए तहसीलदार के हस्ताक्षर असली पाए गए. इस उदाहरण से साफ जाहिर है कि सरकार के भरोसे रहने से कुछ होने वाला नहीं है. किसानों का खुद जागरूक होना बहुत जरूरी है. बारिश कम होने पर पानी की कमी से निबटने के उपायों की जानकारी किसानों को जरूर होनी चाहिए. इस बाबत इच्छुक किसान इन पतों पर संपर्क कर सकते हैं :

निदेशक,

केंद्रीय बारानी खेती अनुसंधान संस्थान, सीआरआईडीए, संतोष नगर, सैदाबाद, हैदराबाद, आंध्र प्रदेश : 500059

निदेशक,

केंद्रीय शुष्क बागबानी संस्थान,

बीकानेर, राजस्थान : 334006.

नुकसानदेह है मवेशियों में मोटापा

उम्र बढ़ने के साथ मोटापा मवेशियों को भी अपनी गिरफ्त में ले लेता है. आमतौर पर इस तरफ मवेशीपालकों का ध्यान नहीं जाता, क्योंकि वे इस गलतफहमी में रहते हैं कि मवेशियों में मोटापा नहीं होता बल्कि वे सेहतमंद हो रहे हैं. मवेशियों की सेहत के बारे में किसान ज्यादा जाननेसमझने की जरूरत नहीं महसूस करते. मवेशी खापी रहा है, काम कर रहा है और गायभैंसें दूध दे रही हैं, यही किसानों के लिए काफी है. लेकिन हकीकत यह है कि मोटे होते हुए मवेशी धीरेधीरे काम करना बंद कर देते हैं और गायभैंसों के दूध की मात्रा घटती जाती है.

इसलिए मोटे होते हैं मवेशी

इनसानों की तरह कुछ मवेशी भी आलसी मिजाज के होते हैं. उन्हें जब तक धक्का न दिया जाए, वे हिलते ही नहीं. ऐसे मवेशियों से किसान परेशान रहते हैं, क्योंकि इस से खेती के काम धीमे होते जाते हैं. लेकिन गायभैंसों की यह लत आसानी से पकड़ में नहीं आती. पेटू जानवरों को अगर घासचारा लगातार मिलता रहे, तो वे जरूरत से ज्यादा खाते रहते हैं, इस से धीरेधीरे उन के शरीर में चर्बी बढ़ती जाती है और वे सुस्ती का शिकार होने लगते हैं. ऐसे में दूध घट जाता है. बात सीधी है कि मवेशी ज्यादा खाएगा और मेहनत कम करेगा तो उस का मोटा होना तय है और यही मोटापा उस में कई बीमारियों की वजह बनता है, जिन की पहचान आसानी से नहीं हो पाती. मवेशीपालक भी पशुओं की खुराक पर खास ध्यान नहीं देते, क्योंकि उन्हें इस बारे में जानकारी ही नहीं होती. नीमच के मवेशियों के माहिर डाक्टर प्रदीप त्रिवेदी का कहना है कि यह सच है कि मवेशी भी मोटापे का शिकार हो कर तरहतरह की बीमारियों से घिर जाते हैं, जिन में खास हैं डायबिटीज यानी शुगर की बीमारी, प्रजनन कूवत में कमी और दिल से ताल्लुक रखती बीमारियां. इन से बचाव के लिए किसानों को वक्तवक्त पर मवेशियों की निगरानी करते रहना चाहिए कि कहीं वे मोटे तो नहीं हो रहे.

ऐसे नापें मोटापा

मवेशियों का मोटापा नापने का सब से पहला तरीका उन के वजन में इजाफा है. हर मवेशी का उम्र के मुताबिक वजन तय होता है, जिसे उस की लंबाई से नापा जा सकता है. अगर माहिर 4 साल की भैंस का औसत वजन 200 किलोग्राम बताते हैं और वह इस से 15 फीसदी ज्यादा वजन की यानी 230 किलोग्राम से ज्यादा की हो जाए तो साफ है कि वह मोटी हो गई है. मोटाई नापने का दूसरा तरीका शरीर में वसा या चर्बी की मात्रा परखना है. इस के लिए मवेशी की पसलियों पर अपना हाथ इस तरह रखें कि उंगलियां पसलियों पर और अंगूठा पीठ पर रहे. ऐसा करने पर अगर आप पसलियों को महसूस कर पाएं तो मवेशी का वजन ठीक है और अगर पसलियां महसूस न हों, तो समझ जाएं कि बढ़ी चर्बी के कारण मवेशी मोटा हो गया है. गायभैंसों के पेट का जरूरत से ज्यादा लटकना भी उन के मोटापे की तरफ इशारा करता है.

कैसे रोकें मोटापा

मोटे मवेशी धीरेधीरे बीमारियों के शिकार हो कर किसी काम के नहीं रह जाते. यह बात मवेशियों पर भी लागू होती है कि मोटापा कई बीमारियों की जड़ है, लिहाजा बेहतर है कि मवेशियों को मुटाने ही न दें मवेशियों को मोटापे से बचाने के लिए निम्न बातों पर ध्यान दें: * कम उम्र से ही मवेशियों की खानपान की आदतों को काबू में रखें. उन्हें ज्यादा मात्रा में जायकेदार चारा न दें.

* मवेशियों के चरने की मियाद तय रखें, उसे घटाएं बढ़ाएं नहीं.

* मवेशियों को एकसाथ ज्यादा चारा न दें, बल्कि दिन में 4-6 बार में थोड़ाथोड़ा कर के दें.

* अगर मवेशी सुस्त दिखे तो उस का खाना कम कर के उसे चलाएंफिराएं यानी कसरत कराएं ताकि जमा हो रही फालतू चर्बी घटे.

* मवेशियों को ज्यादा से ज्यादा पानी पिलाएं.

* तमाम कोशिशों के बाद भी मोटापा काबू में न आए, तो अपने नजदीकी पशु डाक्टर से मिलें और उन से मवेशी के आहार की जानकारी लें कि उसे कब, कितना और कैसा चारा दिया जाए, जिस से उस का मोटापा कम हो.

यह वह दौर है जिस में मवेशी लगातार कम हो रहे हैं, इसलिए जो हैं उन का ध्यान रखा जाना बेहद जरूरी है. मवेशियों में ज्यादातर बीमारियां उन के मोटापे की वजह से होती हैं, पर जब तक उन की पहचान होती है, तब तक बात बिगड़ चुकी होती है. इसलिए अपने मवेशियों को मोटा न होने दें. उन्हें फिट रखें और उन से ज्यादा काम लें व पैसे कमाएं.

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