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बुजुर्गों की हत्या: अपने ही बहा रहे अपनों का खून

उम्र के आखिरी पड़ाव में अपनों की मार झेलते बुजुर्गों की सुरक्षा पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है. अक्तूबर 2015, मध्य प्रदेश के उमरिया जिले के ग्राम बडेरी में बेटे ने दौलत की खातिर मां और मामा के साथ मिल कर अपने ही पिता की हत्या कर डाली.

अक्तूबर 2015, शहडोल के पाली थाना के औढेरा गांव में एक युवक अपनी पत्नी को पीट रहा था. उसी दौरान उस का बेटा वहां पहुंच गया और पिता को रोकना चाहा. लेकिन जब पिता नहीं माना तो उस ने पिता पर लाठी से वार कर दिया जिस से उस की मौत हो गई.

सितंबर 2015, जशपुरनगर जिले के दुलदुला थाना क्षेत्र के बांसपतरा टीपन टोली में 25 सितंबर को संतोष राम पिता रतिराम के साथ गांव से शराब पी कर घर पहुंचे. नशे में धुत्त बेटे का मां से किसी बात को ले कर विवाद हो गया. गुस्साए संतोष राम ने मां धनमेत बाई पर लाठी से वार कर उसे मौत के घाट उतार दिया. 2 सितंबर 2015 को हरियाणा के रोहतक में परिजनों की रोकटोक से नाराज बेटे ने दोस्तों के साथ मिल कर मां की गला घोंट कर हत्या की और पिता पर भी धारदार हथियारों से हमला कर दिया. सभी आरोपी नाबालिग.

मई 2015, उत्तर प्रदेश के शामली जिले में एक व्यक्ति ने जमीन नहीं बेचने पर अपने मांबाप की हत्या कर दी. बेटे ने बिना पुलिस को सूचित किए मांबाप का अंतिम संस्कार कर दिया और लोगों को बताया कि दोनों ने आत्महत्या कर ली.

धन और जमीन का लालच

चंद महीनों में इस तरह की सैकड़ों वारदातें बताती हैं कि बुजुर्ग अपने ही घर में सुरक्षित नहीं रहे. देश के हर कोने में कहीं संपत्ति तो कहीं संबंधों की उलझन के चलते कभी बेटा पिता का कत्ल कर रहा है तो कहीं जमीन हथियाने के लिए करीबी रिश्तेदारों द्वारा मांबाप की सामूहिक हत्या की जा रही है. बिहार का हालिया मामला भी इसी बात की तस्दीक करता है कि बुजुर्गों की नृशंस हत्या के मामले में ज्यादातर अपराधी अपना ही खून होते हैं.

बिहार की राजधानी पटना का पुराना और घना इलाका पटना सिटी की पटनदवी कालोनी. पिछले 19 सितंबर को सुबह 9 बजे चीखपुकार मचती है. 78 साल की दौलती देवी का उस के 55 साल के बेटे विजय के साथ पैसों को ले कर अनबन शुरू होती है. दौलती ने जब विजय को रुपया देने से इनकार कर दिया तो गुस्से से हैवान बने विजय ने अपनी मां को जोर से धक्का दे दिया.

बूढ़ी दौलती मुंह के बल जमीन पर गिर पड़ी और उस के मुंह से खून बहने लगा. दौलती के छोटे बेटे सुजय ने जख्मी मां को उठाया और अस्पताल ले गया. जांच के बाद डाक्टरों ने बताया कि दौलती की मौत हो चुकी है. मां की मौत होने के बाद गुस्साए सुजय ने घर पहुंच कर विजय पर ईंट, पत्थरों और धारदार हथियार से हमला कर दिया. मौके पर ही विजय की मौत हो गई.

इस दोहरे हत्याकांड के पीछे रुपए और जमीन का ही विवाद था. आसपास के लोगों ने बताया कि दौलती और उस के बेटों के बीच अकसर रुपयों के लेनदेन को ले कर जम कर झगड़ा होता रहता था. दौलती के पति फकीरा महतो सरकारी मुलाजिम थे और रिटायर होने के कुछ ही दिनों के बाद उन की मौत हो गई थी. उन की पैंशन दौलती देवी को मिलती थी. पैंशन की रकम को ले कर हमेशा मांबेटों में विवाद होता था. इस के अलावा ढाई कट्ठे (3,350 वर्गफुट) जमीन के कुछ हिस्से में घर बना हुआ था और अगले हिस्से को मोटरगैराज वाले को किराए पर दिया गया था. किराए का पैसा छोटे बेटे सुजय को मिलता था.

विजय की निगाह पैंशन की रकम पर लगी रहती थी और इसी को ले कर वह झगड़ा करता रहता था. कुछ हजार रुपए के लिए विजय ने अपनी मां की जान ले ली. उस ने मांबेटे के रिश्ते को तारतार कर डाला. जमीन के टुकड़े और कुछ रुपयों को हथियाने के चक्कर में पूरा परिवार तबाह हो गया. दौलती और विजय की तो जान गई, सुजय की पूरी जिंदगी अब जेल की सलाखों के पीछे कटेगी. विजय की बीवी किरण देवी और उस की 3 बेटियों के साथ ही सुजय की बीवी रानी की जिंदगी भी तबाह हो चुकी है.

इसी तरह 15 जुलाई, 2014 को पटना के पीरबहोर थाना क्षेत्र के बिहारी साव लेन में कारोबारी धीरज सहाय की गोली मार कर हत्या कर दी गई. पुलिस को इस मामले में आज तक कोई सुराग नहीं मिल सका है. पुलिस को शक है कि संपत्ति हथियाने की नीयत से धीरज के किसी अपने ने ही उस की हत्या की है. मई 2013 में दानापुर के व्यापारी हरिमोहन लाल को नासरीगंज इलाके के उन के घर में चाकुओं से गोद कर मार डाला गया. इस मामले में पुलिस अपराधियों को दबोचने में कामयाब हो गई.

अपराधियों ने बताया कि हरिमोहन के परिवार के ही एक सदस्य ने हत्या की सुपारी दी थी, पर नाम का खुलासा नहीं हो सका. दिसंबर 2012 में पाटलीपुत्र थाना क्षेत्र के इंद्रपुरी महल्ले में देवेश नाम के युवक ने अपनी सौतेली मां व 2 बहनों का खून कर डाला. देवेश ने संपत्ति को हथियाने के लिए एकसाथ 3 लोगों की जान ले ली.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट बताती है कि साल 2014 में देशभर में बुजुर्गों से जुड़े 18,714 मामले अलगअलग पुलिस थानों में दर्ज किए गए और इन मामलों के तहत 19,008 बुजुर्ग अपराध के शिकार हुए.

रिपोर्ट के मुताबिक, बुजुर्गों से जुड़े अपराध के सब से ज्यादा 3,981 मामले महाराष्ट्र में दर्ज किए गए. अन्य राज्यों–मध्य प्रदेश में 3,438, तमिलनाडु में 2,121, आंध्र प्रदेश में 1,852, राजस्थान में 1,034 और दिल्ली में 1,021 मामले पुलिस थानों में दर्ज किए गए. बिहार में बुजुर्गों की हत्या, लूट और प्रताड़ना के 496 मामले दर्ज किए गए. इन मामलों में 521 बुजुर्गों को अपराधियों ने निशाना बनाया.

दौलत और रुपयों की खातिर बुजुर्गों के बेटे, रिश्तेदार, दोस्त आदि ही उन का कत्ल करने लगे हैं, जिस से परिवार में भरोसा नाम की चीज खत्म होती जा रही है और अपराध का नया व घिनौना चेहरा सामने आने लगा है. रुपयोंपैसों और जमीनजायदाद के लिए पिता, मां, दादा, चाचा आदि का अपने करीबी रिश्तेदारों द्वारा खून करने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.

ब्यूरो के आंकड़ों को देख कर महसूस किया जा सकता है कि रिश्तेदारी और दोस्ती पर दौलत किस कदर भारी पड़ने लगी है. बुजुर्ग और असहाय रिश्तेदारों को मार कर उन की दौलत हड़पने के बढ़ते मामलों से रिश्तों के भरोसे का भी खून हो रहा है.

दौलत को हथियाने के लिए आज अपने खून, अपने जाए ही अपनों का बेरहमी से खून बहा रहे हैं. पुलिस के एक आला अफसर कहते हैं कि ऐसे मामलों में परिवार के सदस्य बड़ी ही सफाई से और मौके का इंतजार कर बड़ी ही चतुराई के साथ हत्या को अंजाम देते हैं. इस से पुलिस को पड़ताल में काफी दिक्कतें आती हैं. ऐसे ज्यादातर  मामलों में हत्यारे या हत्या की साजिश रचने वाले ही शिकायत दर्ज कराते हैं.

हत्या को अंजाम देने के बाद सुबूतों को पूरी तरह से मिटा कर ही वे पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराने पहुंचते हैं. इतना ही नहीं, वे समयसमय पर पुलिस जांच के बारे में जानकारी भी लेते रहते हैं और पुलिस को गुमराह कर जांच को दिशा से भटकाने में कामयाब हो जाते हैं. बिहार पुलिस मुख्यालय से मिली रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2013 से मई 2015 तक पटना जिले में 699 हत्याएं हुईं, जिन में से 77 फीसदी में किसी न किसी तरह से परिवार के किसी सदस्य या पहचान वालों का ही हाथ था.

गया जिले के एसएसपी मनु महाराज कहते हैं कि जब पुलिस में हत्या की शिकायत दर्ज कराने वाला ही कातिल हो तो पुलिस को जांचपड़ताल में काफी दिक्कतें आती हैं. कई मामलों में यह भी देखा गया है कि बुजुर्ग की हत्या के बाद उन के परिवार वाले हत्या को खुदकुशी का भी रूप देने की कोशिश करते हैं, जिस से कानून के चंगुल से आसानी से बचा जा सके. पंखे से लटकने, नींद की गोलियां खाने, फिनाइल और एसिड जैसी जहरीली व जानलेवा द्रव्यपदार्थ पीने, सीढि़यों से गिरने से मौत होने की साजिश परिवार वाले आसानी से रच लेते हैं. इस के साथ ही यह भी देखा गया है कि पेशेवर हत्यारा मर्डर करने से पहले सौ बार सोचता है और काफी सोचसमझ कर काम करता है. वह ज्यादातर मामलों में बूढ़ों व बच्चों की हत्या नहीं करता है. लेकिन परिचित या रिश्तेदार नौसिखिए होते हैं, अपनी पहचान छिपाने के लिए वे बेरहमी से बूढ़ों व बच्चों की हत्या कर डालते हैं.

पटना हाई कोर्ट के वकील उपेंद्र प्रसाद कहते हैं कि घर के बुजुर्ग को परिवार पर बोझ मानने का चलन तेजी से बढ़ा है. बच्चे सोचने लगे हैं कि बूढ़े मांबाप उन के ऊपर बोझ की तरह हैं. उन की वजह से ही वे अपने बीवीबच्चों के साथ घर छोड़ कर घूमने नहीं जा सकते हैं. इस के अलावा, लड़के उस दौलत को जल्दी पाने के चक्कर में अपनों का खून कर डालते हैं जो दौलत कल आसानी से उन्हीं की होने वाली है. मांबाप की सेवा कर उन्हें जिंदगी के आखिरी पड़ाव में खुश रख कर उन की दौलत पाने के बजाय गैरकानूनी तरीके से उसे पाने की कोशिश करना अकसर उन्हें भारी पड़ जाता है. अपनों की जान लेने के बाद वे अपनों के साथ जायदाद व अपने परिवार को भी खो देते हैं और बाकी जिंदगी उन्हें जेल में काटनी पड़ती है. उन की बीवी और बच्चे की जिंदगियां भी बरबाद हो जाती हैं.

मनोविज्ञानी अनिल पांडे कहते हैं कि जमीनजायदाद को ले कर घरेलू विवादों के बढ़ते मामलों के बीच परिवार वालों को देखनासमझना होगा कि ऐसे विवादों को तूल न पकड़ने दें और न ही ऐसे मामलों को लटका कर रखें. ऐसे मामलों का जितना जल्दी निबटारा कर दिया जाए, परिवार और परिवार वालों के लिए उतना ही अच्छा है. आज की फास्ट लाइफ के बीच रिश्तों और जज्बातों की डोर कमजोर होती जा रही है. यही वजह है कि जराजरा सी घरेलू झड़प या संपत्ति के विवादों में अपनों का खून करने में जरा भी हिचक नहीं होती है. रिश्तों में कड़वाहट इस कदर बढ़ती जा रही है कि बाप बेटे का, बेटा मां का, भाई बहन का, मामा भांजे का, भतीजा चाचा का कत्ल करने में देर नहीं लगाते.

परिवार की संपत्ति को ले कर बढ़ते विवाद को कम करने के लिए बुजुर्ग मांबाप को यह ध्यान रखना होगा कि उन के बच्चों के बीच दौलत व रुपयों को ले कर तनाव की गुंजाइश ही नहीं हो. इस के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रख कर बुजुर्ग अपने बच्चों को खुश रख सकते हैं और अपनी जान पर आफत आने से भी रोक सकते हैं. आज रिश्तों के महत्त्व के कम होने के बीच भी कुछ सावधानी बरत कर रिश्ते और जान दोनों को बचा कर रखा जा सकता है :

– दौलत का बंटवारा बच्चों के बीच कर दें और यह ताकीद कर दें कि उन के मरने के बाद सभी बच्चों को उन की दौलत पर बराबरी का हक होगा.

– अपनी दौलत की वसीयत समय रहते कर दें और बच्चों व परिवार के सभी लोगों को इस की जानकारी दें, ताकि कोई अंधेरे में न रहे.

– घरेलू झगड़ों की अनदेखी न करें, न ही उसे दबाने की कोशिश करें. परिवार के साथ मिलबैठ कर निबटारा कर लें. ऐसा नहीं हो पाता है तो अदालत का दरवाजा खटखटाएं.

– कई ऐसे मामले देखने में आते हैं कि किसी बच्चे के प्रति मांबाप का ज्यादा झुकाव होता है, जिस से बाकी बच्चों में असुरक्षा की भावना बैठ जाती है कि कहीं पिता अपने लाड़ले बेटे को सारी दौलत या दौलत का ज्यादा हिस्सा न दे दें. मांबाप को चाहिए कि किसी बच्चे में ऐसी गलत भावना न आने दें और बच्चों को भी चाहिए कि सभी मांबाप के लिए जिम्मेदार हों, ताकि किसी एक बच्चे की ओर उन का ज्यादा झुकाव न हो.

– अगर किसी बेटे को किसी कारोबार को शुरू करने में रुपयों की मदद करते हैं तो बाकी बेटों और परिवार के सभी सदस्यों को भरोसे में ले कर करें. ऐसा नहीं करने से बेटों के बीच तनाव का माहौल पैदा होने लगता है जो बाद में बड़े झगड़े का रूप ले लेता है. उस के बाद मामला थानाअदालत तक जा पहुंचता है.

– किसी बेरोजगार बेटे को कोई धंधा चालू करने के लिए रुपए दें तो उसे यह हिदायत भी दें कि रुपए कर्ज के तौर पर दिए जा रहे हैं, जिसे धीरेधीरे वापस करना होगा. इस से बेटा धंधे में पूरा मन लगाएगा और बाकी बेटों में किसी तरह की ईर्ष्या की भावना नहीं पैदा होगी.

– घर के किसी भी सदस्य से किसी भी तरह का खतरा होने या किसी के धमकी देने के मामले में बुजुर्ग खामोश नहीं रहें. अपने किसी रिश्तेदार, दोस्त, वकील और पुलिस को इस के बारे में जरूर बताएं.       

विदेशों में स्थिति बेहतर

जहां भारत में बुजुर्गों की सुरक्षा को ले कर सिर्फ कागजी कानून है वहीं विदेशों में, खासकर अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के देशों में, रिटायरमैंट के साथ ही बुजुर्गों के घरों पर वे तमाम तरह की सहूलियतें दी जाती हैं जो उन की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं. भले सीढि़यों से उतरने और बाथरूम्स में रैलिंग या हैंडिल का मामला हो या फिर उन के घरों को पुलिस केंद्रों से फोन के जरिए सीधे जोड़ना, बुजुर्गों को हर मदद तत्काल मिलती है.

धर्म का जाल: गो भक्ति के नाम पर दान का धंधा

हिंदू धर्म में गो की बड़ी महिमा बताई गई है. गाय की सेवा करना पुण्य कर्म माना गया है. धर्मग्रथों में कहा गया है कि मनुष्य को मोक्ष, स्वर्ग प्राप्ति के लिए गोदान करना चाहिए. गो में 33 करोड़ देवीदेवताओं का वास होता है और गोदान करने वाले मनुष्य के सामने समस्त देवीदेवता नतमस्तक रहते हैं. राजा और अन्य लोगों द्वारा ब्राह्मणों को गाय दान के अनेक किस्से हैं. धर्मराज युधिष्ठिर, महाराज वसुदेव समेत अनेक छोटेमोटे राजा और आम लोग ब्राह्मणों को गोदान किया करते थे.

पुराणों में गोदान का महात्म्य देखिए,

हिरण्यं गां महीं ग्रामान हस्त्यश्वांनृपतिर्वरान्,

प्रादात्स्वनं च विप्रेभ्य:

प्रजीतीर्थ स तीर्थवित्.

-भागवत महापुराण 1-12-14

अर्थात, महाराज युधिष्ठिर दान की महत्ता जानते थे. उन्होंने प्रजापति नामक काल में यानी नाल काटने से पहले ही ब्राह्मण को सुवर्ण, गाएं, पृथ्वी, गांव, उत्तम जाति के घोड़े और उत्तम अन्न दान किए.

देहि दानं द्विजातीनां कृष्णनिर्मुक्तिहेतवे,

नंद: प्रीतमना राजन् गा: सुवर्ण तदादिशत्.

-भागवत महापुराण-10-17-18

अर्थात, कृष्ण के मृत्यु के मुख से लौट आने के उपलक्ष्य में तुम ब्राह्मणों को दान करो. ब्राह्मणों की यह बात सुन कर नंद बाबा को बड़ी प्रसन्नता हुई. उन्होंने बहुत सा सोना और गाएं ब्राह्मणों को दान दीं. सूर्य ग्रहण के समय ब्राह्मणों को दान देने की सिफारिश की गई है,

हरण्यरूप्यवासांसि तिलांश्च गुडमिश्रितान्,

प्रादाद् धेनूश्च विप्रेभ्यों राजा विधिविदांवर:

-भागवत महापुराण-10-53-13

अर्थात, समग्र वेद विधि जानने वालों में श्रेष्ठ राजा भीष्मक ने ब्राह्मणों को सोना, चांदी, वस्त्र, गुड़ मिश्रित तिल तथा बहुत सी गाएं दान दीं.

ब्राह्मणेभ्यो ददुर्धेनूर्वास: स्त्रग्रुक्ममालिनी:

ददू: स्वन्नं द्विजाग्रयेभ्य:

कृष्णे नो भक्तिरस्थिति.

स्वयं च तदनुज्ञातावृष्णय: कृष्णदेवता.

-भागवत महापुराण-10-82-10,11

अर्थात, उन्होंने ब्राह्मणों को गोदान दिया. ऐसी गायों का दान दिया जिन्हें वस्त्रों के सुंदरसुंदर झूले, पुष्पमालाएं एवं सोने की जंजीरें पहना दी गई थीं. सत्पात्र ब्राह्मणों को सुंदरसुंदर पकवानों का भोजन करवाया गया. उन्होंने अपने मन में यह संकल्प लिया कि

कृष्ण के चरणों में हमारी भक्ति बनी रहे. कृष्ण को ही अपना आदर्श मानने वालों ने ब्राह्मणों से अनुमति ले कर तब स्वयं भोजन किया. महाराज वसुदेव ने यज्ञोत्सव का आयोजन भी किया था और गाएं दान कीं.

भागवत महापुराण में लिखा है, महाराज वसुदेव ने उचित समय पर वस्त्र, अलंकारों से सुसज्जित ब्राह्मणों को शास्त्र के अनुसार बहुमूल्य दक्षिणा गाएं, पृथ्वी और सुंदरी कन्याएं प्रदान की थीं.

इसी तरह राजा नृग कहता है,

यावत्थ: सिकता भूमेर्यावत्थो दिवि तारका:,

यावत्यो वर्ष धाराश्च तावतीरदंदा स्म गा:.

-10-64-12

अर्थात, पृथ्वी पर जितने धूलि कण हैं, आकाश में जितने तारे हैं और वर्षा में जितनी जल की धाराएं गिरती हैं, मैं ने उतनी ही गाएं दान की हैं.

वह आगे भी कहता है,

मैं ने दूध देने वाली, तरुणी, शील गुण और रूप से संपन्न बहुत सा घी देने वाली तथा सुवर्ण के सींग और चांदी के खुर मढ़ी न्यायपूर्वक प्राप्त तथा वस्त्र, माला आदि अलंकृत बछड़ों वाली गाएं दान की थीं. इस प्रकार मैं ने बहुत सी गाएं, पृथ्वी, सुवर्ण, घर, घोड़े, हाथी तथा दासियों सहित कन्याएं, तिल, पर्वत, चांदी, शैया, वस्त्र, रत्न, परिच्छद अर्थात गृह सामग्री और रथ आदि दान दिए. अनेक यज्ञ किए और बहुत से कुएं, बावड़ी आदि बनवाए.

(14,15)

इसी तरह गरुड़ पुराण में भी लिखा है,

मांसा स्थिरक्तवत्कायवैतरण्यां पतेन्न स:,

योअंते दद्याद् द्विजेभ्यश्य नंदनंदनगामिनि.

-गरुड़ पुराण-24

अर्थात, मांस और रुधिर से युक्त कायारूपी वैतरणी है क्योंकि वैतरणी भी मांस रुधिर के कीच से भरी है. ब्राह्मण को गोदान देने वाले और भगवान को भजने वाले कायारूपी वैतरणी में नहीं गिरते अर्थात मुक्त हो जाते हैं.

तत: संकल्पयेदन्नं सघृतं च सकांचनम्,

सवत्सा धेनवो दया: श्रोत्रियाय द्विजातये

(27)

अर्थात, पश्चात घी और सुवर्ण सहित अन्न को संकल्प कर के और दूध देने वाली गाय वेदपाठी ब्राह्मण को दान करें.

तस्याह्युद्धरणोपायं गोदानं कथचापिते. (69)

गरुड़ पुराण में कहा गया है कि मनुष्य की जब मृत्यु होती है तब नीचे से ऊपर जाने के लिए मार्ग में वैतरणी नदी मिलती है जो बहुत भयानक होती है. अगर व्यक्ति ने अपने जीवन में गाय का दान किया है तो नदी को पार करने के लिए वही गाय मिलती है

जिस की पूंछ पकड़ कर वह आसानी से नदी पार कर जाता है. हे गरुड़, मैं अब वैतरणी के वृत्तांत के बाद उस को पार करने का गोदान के रूप में उपाय कहता हूं.

काली अथवा लाल रंग की गाय को सोने के सींग, चांदी के खुर और कांस्य के पात्र से अलंकृत करें. उस के काले रंग के जोड़े वस्त्र से गो को आच्छादित करें. उस के कंठ में सुंदर घंटा बांधें. कपास के ऊपर बैठा कर वस्त्रों सहित कांस्यपात्र को रखें और लोहदंड के लिए सोने की बनी यमराज की मूर्ति की स्थापना करें. कांस्य पात्र में घी को रख कर उस के ऊपर रखें. सूर्य की देह से उत्पन्न यम की मूर्ति उस गाय के ऊपर रख शास्त्रोक्त विधि से उस गाय का संकल्प करें. अलंकार सहित वस्त्र ब्राह्मण को दान करें और गंध, पुष्प, अक्षत आदि से विधिपूर्वक पूजा करें.

हे जगन्नाथ, हे शरणागत पर प्रेम करने वाले, संसाररूपी समुद्र में डूबते हुए को और शोकसंताप रूपी तरंगों से दुखी मनुष्यों को आप उबारने वाले हैं. हे विष्णु रूपी ब्राह्मण देवता, हे महीश्वर, मेरा उद्धार करो.                   (77-78)

इसी पुराण में आगे लिखा है,

जब शरीर स्वस्थ रहे तभी वैतरणी पार होने की इच्छा से ब्राह्मण को अलंकार सहित गोदान करना चाहिए. हे गरुड़, गोदान करने से वह महानदी मार्ग के मध्य में नहीं आती है. इसलिए पुण्यकाल में अवश्य गोदान करना चाहिए.   (85-86)

जाहिर है ब्राह्मणों ने राजाओं और आम लोगों को स्वर्ग, मोक्ष प्राप्ति के लिए गोदान के अंधविश्वास में बुरी तरह फंसा रखा था. ब्राह्मण राजाओं को पूरी तरह से वश में रखते थे. उन की अनुमति के बिना राजा कुछ भी नहीं करते थे. ब्राह्मण चाहते थे कि धर्म के जो भी ढोंगढकोसले वे चाहते हैं, राजा लोग समस्त प्रजा से भी वही सब कराएं, राजा जो दान, धर्म, पूजा, कर्मकांड करता था, वही प्रजा से कराता था. इस से ब्राह्मणों की पौबारह थी.

पंडों को गोदान के नाम पर दानदक्षिणा का धंधा मंदा पड़ रहा है, इसलिए भाजपा सरकारें हिंदू धर्म के नाम पर चल रहे पाखंडों को बरकरार रखना अपना जन्मजात कर्तव्य समझती आई हैं क्योंकि धर्म के धंधेबाजों की एक बहुत बड़ी फौज चुनावों में भाजपा के समर्थन में वोट जुटाने के हथकंडे अपनाकर पार्टी की जीत सुनिश्चित कराने में कोई कसर नहीं छोड़ती.

हाल ही में महाराष्ट्र और हरियाणा की भाजपा सरकारों ने गोमांस पर प्रतिबंध लगाया है. राजस्थान में भी गोतस्करी के लिए सजा का  प्रावधान किया जा रहा है. महाराष्ट्र पशु संरक्षण (संशोधन विधेयक 2015) मार्च महीने में लागू कर दिया गया. राज्य में इस कानून के अमल में आने से गोवंश यानी गाय, बैल, बछड़े का मांस रखना, बेचना, लाना, ले जाना अपराध हो गया है. हरियाणा में भी ऐसा ही निषेध लगाया गया है.

राज्य सरकारों द्वारा कानूनों में किए गए संशोधन गोसंवर्द्धन के लिए नहीं हैं, गो भक्ति के नाम पर दान के धंधे को बढ़ावा देने के लिए हैं. भागवत पुराण में वशिष्ठ मुनि की कामधेनु गाय द्वारा अनेक लोगों की उदरपूर्ति करने का जिक्र है. पर धर्म की किताबों में गोसेवा और गोवध को ले कर विरोधाभास भी है. महाभारत के अरण्य पर्व में हिंदू राजा रंतिदेव की पाकशाला के लिए रोजाना सैकड़ों गायों का वध करने का दृष्टांत है.

हमारे देश में आजादी के बाद से गो वध कानून बनाने की मांग उठने लगी थी. हिंदू संगठन और उन के पैरोकार राजनीतिक दल खासतौर से पहले जनसंघ और अब भारतीय जनता पार्टी, गोवध पर प्रतिबंध की मांग का समर्थन करते रहे हैं.

धर्म और धर्मोपदेशकों से प्रेरणा ले कर देशभर में गोसेवा के नाम पर हजारों संगठन, संस्थाएं बनी हुई हैं. गोभक्ति के नाम पर करोड़ों का चंदा इकट्ठा किया जाता है. सरकारें इन संस्थाओं को आर्थिक मदद मुहैया कराती हैं. गोशालाएं खुद अपने स्तर पर पैसा एकत्रित करती हैं. इस के बावजूद गायों की हालत सही नहीं नजर आती. गोवध खत्म नहीं हो रहा. शहरों, कसबों में गाएं गलियों, सड़कों में आवारा घूमती दिखाई देती हैं. ट्रैफिक जाम के हालात देखे जा सकते हैं.

गाय पालक गायों के साथ कैसे पेश आते हैं, हैरानी की बात है. दूध निकालने के बाद गायों को घर से बाहर निकाल दिया जाता है. गाय बूढ़ी हो जाती है, दूध देने लायक नहीं रहती तो उस की कोई सुध नहीं ली जाती. ऐसी गायों को या तो गोशाला के हवाले कर दिया जाता है या थोड़े पैसों में कसाई के हाथों बेच दिया जाता है.

गायों को ले कर किसी भी शहर, कसबे में आम नजारा देखा जा सकता है कि कहीं गाय कचरा खा रही है, कहीं पौलिथीन की थौलियां, कहीं मैला. और ऐसी लावारिस गाएं लोगों से लाठियों की मार खा कर इधर से उधर भागती रहती हैं. ये आवारा गाएं कई दुर्घटनाओं का सबब बन रही हैं.

मुनाफे का बाजार

2012 में भारत में हुई पशुगणना के मुताबिक, देश में 4.8 करोड़ गाएं थीं. इन में से करीब आधी बच्चा देने लायक हैं. विलायती या वर्णशंकर गायों की संख्या करीब 2 करोड़ का आंकड़ा छूने लगी है. हमारे यहां देसी गायों की बढ़ोतरी उतनी नहीं हो रही जितनी जर्सी यानी विदेशी नस्ल की गायों की हो रही है. असल में इस का कारण दूध का बाजार है. देसी गायों की तुलना में जर्सी गाएं ज्यादा दूध देती हैं.

अब तो ज्यादा दूध पाने के लिए हमारे गोप्रेमी अपनी देसी गायों का विलायती सांडों के साथ क्रौस कराने से परहेज नहीं बरतते. यह मामला भारतीय संस्कृति के खिलाफ है या नहीं, अभी तक तो किसी गोभक्त ने आवाज नहीं उठाई. खाप पंचायतों की ओर से भी कभी कोई फतवा नहीं आया, उल्टे खाप पंचायत वाले प्रदेश में दूधदही की नदियां अब जर्सी गायों के जरिए बहाने के प्रयास हो रहे हैं. हां, मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने केवल उन्हीं गोशालाओं को अनुदान देने का आदेश जरूर दिया था जिन में केवल देसी गाएं होंगी.

देश की गोशालाओं में भी गायों की दुर्दशा का आलम यह है कि यहां भी दुधारू गायों की ही पूछ है, बूढ़ी और बीमार गाएं आजकल घरपरिवारों में वृद्धों की तरह उपेक्षित हैं. घरपरिवार में भले ही वृद्ध स्त्री को बाहर नहीं निकाला जाता हो पर वृद्ध गाय को दूध न देने की स्थिति में घर से बाहर निकाल दिया जाता है. गाय को मां मान कर पूजने वाली संस्कृति का यह कैसा रूप है? अब तो ज्यादा दूध देने वाली गायों की भरमार हो रही है. क्या हिंदू इन विलायती गायों को भी पूजते हैं?

जिम्मेदार कौन

ऐसे में सवाल यह है कि गायों को बूचड़खाने तक पहुंचाने का जिम्मेदार कौन है? क्या यही लोग नहीं हैं जो गाय को पूजते हैं और जब वही गाय दूध देना बंद कर देती है या बूढ़ी हो जाती है तो उसे लावारिस छोड़ देते हैं, घर से निकाल देते हैं या किसी खरीदार के हवाले कर देते हैं. गोरक्षा के नाम पर बने कुछ संगठन तो गाय व बछड़ों से भरे हुए ट्रकों से मोटी रकम वसूल कर बूचड़खाने जाने देते हैं. पैसा न देने पर पकड़वाने की धमकी देते हैं.

इस तरह गोरक्षा, गोसेवा के नाम पर गोरखधंधा खूब चल रहा है. गाय के संरक्षण की ही बात सर्वोपरि क्यों? भैंस, बकरी, भेड़ आदि पशुओं की रक्षा क्यों नहीं? इसलिए क्योंकि दूसरे पशुओं के संरक्षण में पैसा नहीं है.

दिल्ली में जितनी संख्या में गाएं नहीं, उस से गोशालाएं कहीं अधिक हैं. बवाना में कंझावला रोड पर स्थित श्रीकृष्ण गोशाला दिखने में काफी बड़ी है. यहां करीब 300 गाएं बताई जाती हैं. गायों के रखरखाव की व्यवस्था देखने में ठीकठाक है. गोशाला के पदाधिकारी पवन जैन कहते हैं कि हमारे यहां उन गायों को रखा जाता है जो दूध नहीं देतीं, बूढ़ी, बेकार हो चुकी होती हैं. ऐसी गायों की देखभाल के लिए और उन का शेष जीवन आरामपूर्वक गुजरने के लिए गोशालाओं का संचालन किया जाता है.

पवन जैन कहते हैं कि दूध देने वाली गाएं भी हैं जो बाजार से खरीदी जाती हैं. दान की हुई गाएं नहीं ली जातीं. गाय के वृद्ध होने पर लोग इन्हें आवारा छोड़ देते हैं, यह गलत है. ऐसी गायों के भरणपोषण एवं इलाज आदि के लिए गोशाला दानदाताओं से पैसा इकट्ठा करती है

कई शहरों में गोसेवा समितियां बनी हैं. दिल्ली में कई दुकानों पर दानपेटियां रखी देखी जा सकती हैं जो किसी न किसी गोशाला की हैं. उस पर गोशाला का नाम, पता और टैलीफोन नंबर भी लिखा होता है. यह व्यवस्था कमाल की होती है. हर दुकानदार अपनी श्रद्धा से पैसा देता है. दुकानदारों से 2,100, 1,100, 500, 100 रुपए का सहयोग लिया जाता है. गोशालाओं द्वारा अपने यहां गायों की संख्या को बढ़ाचढ़ा कर बताया जाता है ताकि ज्यादा से ज्यादा माल, चंदा इकट्ठा किया जा सके पर हकीकत में उतनी गाएं होती नहीं हैं.

कुछ गोशालाओं की गाडि़यां कालोनियों में सुबहसुबह गोग्रास इकट्ठा करने के लिए घूमती हैं, जहां लोग घरों से निकल कर, खासतौर से औरतें इकट्ठी की  हुई सूखी, बासी रोटियां इन गाडि़यों में रख आती हैं. गाडि़यों के बाहर गाय की तसवीर के साथ गोशाला का नाम, पता और टैलीफोन नंबर लिखा रहता है. गोशालाओं द्वारा मार्केटिंग का यह अच्छा तरीका है.

इस तरह गाय को ले कर खूब ढोंग चल रहा है. राजनीति खूब की जाती है. गाय को पूजने वाले लोग एक खास वर्ग की तरफ नफरत की भावना से भी देखते हैं. पर हकीकत यह है कि इन लोगों के कारण ही गाय की हालत बदतर है और गोवध हो रहा है. भारत गोमांस का सब से बड़ा निर्यातक माना जाता है और यह कारोबार करने वाले हिंदू ही ज्यादा हैं.

गाय के नाम पर पंडों ने काल्पनिक सपने दिखाए हैं, सचाई से जिन का कोई वास्ता नहीं होता. तभी विरोधाभास सामने आते हैं. धर्म के ठेकेदारों को खुद नहीं पता कि गोदान से मोक्ष कैसे मिलता है. मरने के बाद आदमी का क्या होता है?

मोक्ष के नाम पर कारोबार

अगर हिंदू गाय को माता, उस में 33 करोड़ देवीदेवताओं का वास मानता है तो उसे मारने वालों, लावारिस छोड़ने वालों, बूचड़खाने वालों को ये देवता मिल कर सजा क्यों नहीं देते और फिर एक गाय में इतने देवता होते हुए उसे कोई परेशान, कत्ल क्यों कर सकता है? उस का पेट इंसानों को क्यों भरना पड़ता है? क्या गाय जो मल, कचरा, गंदगी खाती है-गाय में विराजमान इन देवताओं को भी यही सब भक्षण करना पड़ता है?

असल में धर्म के रचनाकारों ने मोक्ष के नाम पर गाय को अपनी आमदनी का जरिया बना लिया है. इस देश में गाय के नाम पर सिर्फ गोरखधंधा चलता आया है. अब धर्म के धंधे को बढ़ावा देने के लिए सरकारें गो के नाम पर कानूनों में बदलाव कर रही हैं पर वास्तव में ऐसे कानूनों से न तो गो का भला होगा न पालकों का. दानदक्षिणा का कारोबार खूब चलेगा. देश में बूढ़ी, बीमार, बेकार, दूध न देने वाली गाएं ज्यादा संख्या में दिखाई देने लगेंगी. गोशालाओं में चंदों की बारिशें होने लगेंगी और पंडेपुरोहितों की चांदी होने लगेगी. भाजपाई सरकारें यही तो चाहती है.

आदित्‍य-कैटरीना की फिल्म ‘फितूर’ का फर्स्ट लुक जारी

आदित्‍य रॉय-कैटरीना कैफ की अपकमिंग फिल्म फितूर का फर्स्‍टलुक जारी कर दिया गया है. इस फिल्म में आदित्‍य एक कश्‍मीरी लड़के का किरदार निभा रहे हैं. हालांकि अदित्य कपूर इससे पहले की फिल्मों में नार्मल बॉडी में ही दिखे, लेकिन इस बार फिल्म फितूर के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की है.

उन्‍होंने अपनी फिजिक को दमदार दिखाने के लिए जिम में काफी पसीना बहाया है. दोनों कलाकार पहली बार एक साथ काम कर रहे हैं. फिल्‍म की शूटिंग कश्‍मीर की वादियों में हुई है और इस फिल्‍म में दर्शकों को शानदार लोकेशंस भी देखने को मिलेंगी. सुनने में आया था कि इस फिल्‍म में सदाबहार अभिनेत्री रेखा भी थी.

उन्‍होंने फिल्‍म की शूटिंग शुरु भी कर दी थी लेकिन फिर अचानक उन्‍होंने इस फिल्‍म से पल्‍ला झाड़ लिया. इसके बाद रेखा की जगह फिल्‍म में अभिनेत्री तब्‍बू नजर आएंगी. इस फिल्म को अभिषेक कपूर ने डायरेक्‍ट किया है. आदित्‍य ने फिल्‍म 'आशिकी 3' से बॉलीवुड में डेब्‍यू किया था.

फिक्सिंग की सजा झेल वापसी के लिए तैयार आमिर

पाकिस्तान की वनडे टीम में शामिल किए गए तेज गेंदबाज मोहम्मद आमिर ने कहा कि वह इंटरनेशनल क्रिकेट में वापसी के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हैं.

आमिर को न्यूजीलैंड के खिलाफ होने वाली वनडे और टी-20 सीरीज के लिए पाकिस्तानी टीम में शामिल किया गया. आमिर ने कहा, 'अगर मुझे न्यूजीलैंड में खेलने का मौका मिलता है तो फिर बदले हुए रवैये के साथ गेंदबाजी करना आसान नहीं होगा लेकिन मैं मानसिक तौर पर मजबूत वापसी के लिए तैयार हूं.'

उन्होंने कहा, 'मेरे मन में एक बात साफ है कि मुझे अपने फैन्स का विश्वास जीतने के लिए अच्छा प्रदर्शन करना होगा. मुझे पूरा भरोसा है कि वे मेरा साथ देंगे और मैं उन्हें निराश नहीं करूंगा.'

15 करोड़ के विराट ने 12.5 करोड़ के धोनी को पीछे छोड़ा

रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के कैप्टन विराट कोहली 15 करोड़ रुपये पाने के साथ आईपीएल-9 के सबसे महंगे खिलाड़ी बन गए हैं. इससे पहले महेंद्र सिंह धोनी को सबसे ज्यादा सैलरी मिलती थी. इस बार धोनी को पुणे ने 12.5 करोड़ में खरीदा है. धोनी दो साल पुणे की ओर से खेलेंगे.

कैसे मिली सबसे ज्यादा फीस…
– आईपीएल ने शुक्रवार को खिलाड़ियों के बेसिक सैलरी के आंकड़े जारी किए.

– विराट आइकॉन होने की वजह से बेंगलुरु टीम के सैलरी पर्स से 12.5 करोड़ रुपए पाते हैं, लेकिन हकीकत में उन्हें 15 करोड़ मिलते हैं.

– इस लिहाज से विराट इस लीग के सबसे महंगे खिलाड़ी बन गए हैं.

– इससे पहले चेन्नई सुपरकिंग्स के महेंद्र सिंह धोनी को सबसे ज्यादा 20 करोड़ रुपए मिलते थे. धोनी को अब 12.5 करोड़ रुपए मिलेंगे.

– चेन्नई और राजस्थान रॉयल्स टीमें दो साल के लिए सस्पेंड कर दी गई हैं. नई टीम होने के कारण धोनी को मिलने वाला टोटल अमाउंट कम कर दिया गया है.

किन प्लेयर्स को मिलता है कितना पैसा…
– बेंगलुरु की टीम अपने आक्रामक कैरेबियन बैट्समैन क्रिस गेल को पर्स कैपिसिटी से ज्यादा पेमेंट करती है. गेल के लिए 7.50 करोड़ रुपए कटते हैं, जबकि उन्हें 8.40 करोड़ रुपए पेमेंट किया जाता है.

– मुंबई इंडियन्स की टीम भी हरभजन सिंह, लसिथ मलिंगा और अंबाती रायडू को पर्स कटौती से ज्यादा पेमेंट करती है. हरभजन को 5.50 करोड़ के मुकाबले आठ करोड़, मलिंगा को 7.50 करोड़ के मुकाबले 8.10 करोड़ और रायडू को चार करोड़ के मुकाबले छह करोड़ रुपए दिए जाते हैं.

कुछ प्लेयर्स को होता है नुकसान…
– माना जाता है कि आईपीएल में खिलाड़ियों को ऑफिशियल पर्स कटौती से ज्यादा का पेमेंट होता है. लेकिन ऐसा नहीं है. कई खिलाड़ियों को भारी कटौती भी झेलनी पड़ती है.

– किंग्स इलेवन पंजाब टीम के मनन बोरा के लिए पर्स कटौती चार करोड़ है, लेकिन उन्हें मिलते सिर्फ 35 लाख रुपए हैं.

– कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान गौतम गंभीर को 12.50 करोड़ की पर्स कटौती के मुकाबले 10 करोड़, मुंबई के कप्तान रोहित शर्मा को 12.50 करोड़ रुपए की पर्स कटौती के मुकाबले 11.50 करोड़ और पंजाब के डेविड मिलर को 12.50 करोड़ की पर्स कटौती के मुकाबले सिर्फ पांच करोड़ रुपए मिलते हैं.

ओनिर ने खोला रवीना टंडन के नए अंदाज का राज

बॉलीवुड फिल्मकार ओनिर का कहना है कि उनके निर्देशन में बन रही फिल्म 'शब' में रवीना टंडन का परफॉर्मेंस देखने वालों को चौंका देगा. रवीना पिछले साल रिलीज हुई फिल्मक 'बॉम्बे वेलेवेट' में भी कुछ देर के लिए नजर आई थीं. उसके बाद अब वह फिल्मि 'शब' में काम करने जा रही हैं. फिल्म में उनका रोल खासा बड़ा है.

ओनिर से जब पूछा गया कि क्या 'शब' रवीना की कमबैक फिल्म साबित होगी, तो ओनिर ने जवाब दिया कि हां, बिल्कुल होगी. ऐसा इसलिए भी क्योंकि उनका 'बॉम्बे वेलवेट' में बेहद छोटा रोल था. वह वाकई इस बात को महसूस करते हैं कि वे जबरदस्त एक्टर हैं. बीते लंबे समय से वह उनके साथ इस फिल्म में काम करना चाह रहे थे. फिल्मह के बारे में उन्हों ने आगे बताया कि इसमें दिल्ली की कहानी है. प्रेम त्रिकोण है. फिल्म से प्रोसेनजीत चटर्जी की पत्नी अर्पिता और आशीष बिष्ट भी बॉलीवुड में कदम रखेंगे. ओनिर के पसंदीदा संजय सूरी भी इस फिल्म में नजर आएंगे.

ओनिर खुश हैं कि इस फिल्म को बनाने का उनका सपना अब पूरा हो रहा है. उन्होंने बताया कि यह वो पटकथा है, जो उन्होंहने सबसे पहले लिखी थी. लगभग 13 या 14 साल हो गए हैं, इसे लिखे. मजेदार बात यह है कि इसे रवीना टंडन और संजय को ध्यान में रखकर ही लिखा गया था. उस वक्त वह इनके साथ फिल्मल 'दमन' में काम कर रहे थे. यह पटकथा उस समय से ही उनके साथ है और वह इसको लेकर बेहद खुश भी हैं.

किशोर कुमार की भूमिका निभा सकते हैं आमिर खान

बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान सिल्वर स्क्रीन पर लीजेंडरी गायक किशोर कुमार का किरदार निभाते नजर आ सकते हैं.

बॉलीवुड के निर्देशक अनुराग बसु, किशोर कुमार के जीवन पर फिल्म बनाना चाहते थे. अनुराग बासु ने इसके लिये किशोर कुमार पर शोध भी किया था. चर्चा है कि आमिर अब किशोर कुमार की जीवनी में काम करना चाहते हैं.

आमिर इन दिनों फिल्म दंगल में काम कर रहे हैं. दंगल की शूटिंग खत्म होने के बाद आमिर सिल्वर स्क्रीन पर किशोर कुमार की भूमिका निभा सकते हैं. 

अनुराग पहले यह फिल्म रणबीर कपूर को लेकर बनाना चाहते थे. लेकिन अब चर्चा है कि रणबीर की किशोर कुमार पर बनने वाली फिल्म से दिलचस्पी खत्म हो गई है. रणबीर अब राजकुमार हिरानी की फिल्म में रूचि ले रहे हैं जो संजय दत्त पर फिल्म बना रहे हैं.

अनुराग बासु इन दिनों रणबीर कपूर को लेकर फिल्म 'जग्गा जासूस' भी बना रहे हैं. इस फिल्म की शूटिंग आधी हो चुकी है.

मेहनत पर निर्भर अर्थव्यवस्था

एक और कैलेंडर साल बदल गया है. देश की अर्थव्यवस्था में जिस चमक की कल्पना की जा रही थी, वह नई सरकार के आने के डेढ़ साल बाद भी कहीं दिख नहीं रही है. इसके लिए नरेंद्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उन के हर रोज उग्र होते भगवा ब्रिगेड को दोष देना गलत होगा. देश में असहनशीलता व धर्मांधता का जो वातावरण बन रहा है, उसका आर्थिक उन्नति से ज्यादा लेनादेना नहीं है.

देश की अर्थव्यवस्था में सुधार सिर्फ राष्ट्रपति भवन और संसद भवन के बीच बने नॉर्थ ब्लॉक के फरमानों से नहीं हो सकता, यह हम 1947 के बाद से देख चुके हैं. नॉर्थ ब्लॉक स्थित वित्त मंत्रालय असल में देश की प्रगति में बाधा पहुंचाने वाला है, पर इतना नहीं कि देश दब जाए. जो परिवर्तन 1991 के बाद देखने को मिले, उनसे चमक तो आई, पर फिर वह धुंधली पड़ती चली गई, म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के स्ट्रीटलैंप की तरह, जो 10 दिन चमकता है और फिर फीका पड़ने लगता है.

एक देश की अर्थव्यवस्था तब सुधरती है, जब पूरी जनता मेहनत पर उतारू हो जाए और टोटकों, टैक्स ब्रेकों, सहूलियतों, कानूनों के बदलाव आदि का हल्ला न मचाती रहे. पिछले 100 सालों से पूरा देश नई तकनीक का लाभ उठाने में जुटा है, इसके सबूत कहीं नहीं हैं. अंग्रेजों ने भारतीयों के हाथ बांध नहीं रखे थे. हां, वे भारत को उभरता देश देखने के लिए मेहनत भी नहीं कर रहे थे.

जवाहरलाल नेहरू या इंदिरा गांधी ने बातें बनाने और राज करने के अलावा देश को मेहनत करने के लिए नहीं उकसाया. सभी प्रधानमंत्री बात बंटवारे की करते रहे, निर्माण की नहीं. जब की भी, तो वह उस कान तक नहीं पहुंची, जिसके हाथ काम कर सकते थे. असल में कोई आवाज इतनी बुलंद ही न थी कि अनपढ़, अशिक्षित, फटेहाल, 10वीं सदी के नियमों और तब की तकनीक में जीते लोगों के कानों तक पहुंच सके.

आर्थिक पिछड़ेपन के लिए तो पग-पग पर फैले निकम्मेपन, भाग्यवाद, जातिवाद, लूट की संस्कृति, पूजापाठ से संपन्नता की आशा, छोटे स्तर का भ्रष्टाचार, तकनीक के प्रति उदासीनता आदि जिम्मेदार हैं, जिन्हें एक प्रधानमंत्री न तो दूर कर सकता है और न ही एक पार्टी.

1991 के करिश्माई वित्त मंत्री 2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री रहे, पर वे क्या कर पाए? 1991 में उन्होंने सरकारी बांध के दरवाजे खोल कर पानी बहने का अवसर तो दे दिया, पर पहाड़ों पर जमी निकम्मेपन की बर्फ को मेहनत की गरमी से कौन पिघलाएगा? नरेंद्र मोदी को दोष दें, पर दूसरी बहुत सी बातों के लिए. जो हाल हम देश का आज देख रहे हैं उस में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन अगले दशक में होगा, भूल जाइए. हमारी सोच और कार्यप्रणाली में मेहनत लिखी ही नहीं, तो हम तो यहीं रहेंगे, चाहे तिरंगे में लिपटा हाथ राज करे या भगवा में लिपटा कमल. किसी बदलाव की आशा करनी हो, तो खुद में झांक कर देखो कि क्या पिछले साल से ज्यादा काम किया था इस साल?

आपबीती: चेन्नई में बाढ़ का वो दहशत भरा मंजर

‘‘वह 1 दिसंबर की शाम थी. बारिश हो रही थी. बारिश इतनी तेज भी न थी कि हम लोग कुछ खाने के लिए चंद कदमों की दूरी पर स्थित फूड कोर्ट में न जा पाते. मैं अपने दोस्तों नितिन और आशुतोष के साथ होस्टल से निकल चल पड़ा. मौसम सुहाना था लेकिन मन में डर और आशंकाएं थीं क्योंकि मौसम विभाग की चेतावनी थी कि आने वाले दिनों में फिर तेज बारिश और बाढ़ आ सकती है.’’ चेन्नई से 25 किलोमीटर दूर स्थित श्री रामास्वामी मैमोरियल इंस्टिट्यूट यानी एसआरएमआई में इंजीनियरिंग के पहले साल में पढ़ रहे भोपाल के आर्यमान और उस के दोस्तों ने जो बताया वह वाकई दिल दहला देने वाला था.

आर्यमान एसआरएमआई के ऊरी होस्टल में कमरा नंबर 631 में रहता है. बीती 4 दिसंबर की रात जब वह जैसेतैसे चेन्नई से भोपाल पहुंचा तो उस के चेहरे पर दहशत थी जो प्लेटफौर्म पर इंतजार करती मम्मी कल्पना, पापा देवेंद्र और दीदी अदिति को खड़े देख खुशी में बदल गई. ऐसी खुशी जिसे वह बयां नहीं कर सकता. लेकिन चेन्नई में आई बाढ़ और वहां से भोपाल तक के सफर की दास्तां के जो हिस्से वह साझा कर पाया उन्हें सुन लगता है कि वाकई यह बाढ़ बहुत ही भयानक थी.

बकौल आर्यमान, ‘‘जब हम फूड कोर्ट से वापस लौटे तो हमें आने वाली दुश्वारियों का कतई अंदाजा न था. पिछले हफ्ते की बाढ़ ने हम छात्रों को खासा दहला दिया था. 25 नवंबर तक हालात ठीक हो गए थे, इसलिए हमें लग रहा था कि अब इस का दोहराव नहीं होगा. लेकिन 30 नवंबर की सुबह से एहसास होने लगा था कि अब यहां और रुकना खतरे से खाली नहीं.’’

एसआरएमआई के कुल 6 छात्रावासों में तकरीबन 6 हजार छात्र रहते हैं जो देश के सभी हिस्सों से इस नामी इंस्टिट्यूट में पढ़ने आए हैं. आर्यमान ने इसी साल यहां दाखिला लिया है. उस के साथ मध्य प्रदेश के तकरीबन 300 और उत्तर भारत के मिला कर लगभग 3 हजार छात्र वहां पढ़ रहे हैं. विदेशी छात्रों के लिए अलग एनआरआई होस्टल है.

‘‘सभी की हालत एक जैसी थी,’’ आर्यमान बताता है, ‘‘30 नवंबर से जो बारिश शुरू हुई तो 2 दिसंबर तक तांडव सा मचा रहा.’’ यह बतातेबताते वह सिहर उठता है, ‘‘हम पूरी तरह टूट चुके थे, कहीं कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था. चारों तरफ घुप अंधेरा था, दिन और रात में फर्क करना मुश्किल था. सभी के मोबाइल और लैपटौप की बैटरियां डिस्चार्ज हो चुकी थीं.

‘‘1 दिसंबर की सुबह होस्टल के ग्राउंडफ्लोर पर पानी आ गया था, इसलिए नीचे की मंजिल के छात्र ऊपर आ गए थे. देखते ही देखते, चारों तरफ पानी भर गया. ऊपर छत से भी पानी बह कर नीचे आने लगा था. तेज बारिश के साथ हवा भी बहुत तेज चल रही थी. हम लोग खिड़कियां खोलने से भी डर रहे थे कि कहीं उन में से अंदर पानी न भर जाए और हम भी न बहने लगें.’’

कट गए थे दुनिया से

बाहर क्या हो रहा है, यह इन छात्रों को नहीं मालूम था. किसी से मोबाइल पर बात नहीं हो पा रही थी. बिजली कब आएगी, यह भरोसा न था. लिहाजा, छात्रों की घबराहट बढ़ती जा रही थी. जो बच्चे दिन में 3-4 बार मम्मीपापा और रिश्तेदारों से बात किए बगैर नहीं रह पाते थे वे बारबार मोबाइल की स्क्रीन की तरफ देखते थे कि शायद किसी जादू के असर से बैटरी चालू हो जाए.

‘‘होस्टल के बाहर कमर तक पानी था,’’ आर्यमान बताता है, ‘‘फर्स्ट फ्लोर पर छात्रों का सामान बहने लगा था. कपड़े, पर्स, मोबाइल फोन, पैन, कौपियां कागज की नाव की तरह तैर रहे थे. पर लैपटौप सभी ने सिर पर रख कर बचा लिए थे.

‘‘हमें एहसास था कि मम्मीपापा और दूसरे रिश्तेदार हमारी कितनी चिंता कर रहे होंगे, खासतौर से मम्मी, जिन्होंने रोरो कर अपनी आंखें सुजा ली होंगी. मेरे मन में एक ही खयाल आ रहा था कि जैसे भी हो, उन्हें बता दूं कि मैं ठीक हूं, चिंता मत करना.

‘‘लेकिन हकीकत में मैं ठीक नहीं था,’’ आर्यमान कहता है, ‘‘बाहर से जो खबरें आ रही थीं वे अच्छी नहीं थीं कि पूरा चेन्नई शहर बाढ़ में डूबा हुआ है, लोग लकड़ी की तरह बह रहे हैं और कहीं से कोई सहायता नहीं आ रही है. लग ऐसा रहा था मानो दुनिया में पानी के सिवा कुछ है ही नहीं.’’

कालेज प्रबंधन ने जैसेतैसे खाने का इंतजाम किया था पर वे लोग भूखे होते हुए भी खा नहीं पा रहे थे. वजह, सामग्री खत्म हो जाने के कारण खाने का फीका और बेस्वाद होना ही नहीं, बल्कि बाढ़ का कहर थी. दूसरे दिन तो वे लोग कमरा छोड़ क्लासरूम में जा कर सोए. अंधेरा इतना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. आवाजों के सहारे एकदूसरे को पहचान पा रहे थे.

आर्यमान बताता है, ‘‘सीनियर छात्रों ने पानी संभल कर पीने की सलाह दी थी क्योंकि खतरा बीमारी फैलने का था. वाटर सप्लाई बंद थी लेकिन आसमान से पानी लगातार बरस रहा था.’’

हालत यह थी कि पूरी तरह हिम्मत हार चुके ये छात्र वजह होने पर भी एकदूसरे से बात करने से कतरा रहे थे जो कुछ दिन पहले तक बिना बात की बात पर एकदूसरे से बात किया करते थे.

यों निकले बाढ़ से

सभी छात्र पूरी तरह से हताश हो चुके थे. अच्छा यह हुआ था कि छात्रों को मेन बिल्डिंग में शिफ्ट कर दिया गया था जहां जनरेटर से बिजली चल रही थी. सब से पहले उन्होंने मोबाइल प्लग में लगाए और बैटरी के 5 फीसदी चार्ज होने पर ही सब ने घर वालों से बात करनी शुरू कर दी. गर्ल्स होस्टल में कई लड़कियां लगातार रोए जा रही थीं.

घर वालों से जब बात हुई तो जान कर सुखद आश्चर्य हुआ कि अधिकांश पेरैंट्स ने बच्चों के रिजर्वेशन पहले से ही औनलाइन करवा रखे हैं पर दिक्कत यह थी कि बच्चे स्टेशन तक पहुंचें कैसे. ट्रैफिक बिलकुल बंद था. सिर्फ सेना की नाव और गाडि़यां, वह भी इक्कादुक्का ही दिख रही थीं. इस पर भी दिक्कत यह थी कि जैसेतैसे स्टेशन पहुंच भी गए तो वहां जा कर करेंगे क्या, ट्रेनें तो सारी रद्द हैं.

आर्यमान कहता है, ‘‘मातापिता हिम्मत बंधा रहे थे और मशवरा दे रहे थे कि जैसे भी हो, बेंगलुरु तक आ जाओ, वहां से आसानी से घर पहुंच सकते हो. सारे इंतजाम हम कर देंगे. फलां अंकल से बोल दिया है, वे तुम्हें लेने आ जाएंगे या फिर हम ही बेंगलुरु तक आ जाते हैं.’’

तय है बच्चों को अब समझ आ रहा था कि मातापिता का प्यार क्या होता है लेकिन बेबसी यह थी कि बेंगलुरु तो दूर की बात थी, ये नजदीक के अन्ना नगर तक जाने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. बाहर पानी ही पानी था और चेन्नई तक कितना और कैसा होगा, इस का अंदाजा लगाते ही ये सिहर उठते थे.

कुछ छात्रों ने पैदल स्टेशन तक चलने की बात कही लेकिन सवाल यही उठ खड़ा हुआ कि फिर क्या करेंगे, ट्रेन तो सारी बंद हैं, इसलिए यहीं सुरक्षित रहना समझदारी की बात है. इस दौरान कितने छात्र गुम थे, इस का भी हिसाबकिताब किसी के पास नहीं था. इसी बीच, किसी ने ब्लैकबोर्ड पर रिफ्यूजी लिख कर हम सब लोगों की हालत एक शब्द में बयान कर दी थी.

‘‘वह 3 दिसंबर की रात थी,’’ आर्यमान बताता है, ‘‘मैं अपने दोस्तों के साथ क्लासरूम में सो गया था’ तभी अचानक एक सीनियर ने आ कर पूछा, ‘बेंगलुरु चलोगे क्या, गाड़ी का इंतजाम हो गया है.’ तो मुझे यकीन नहीं हुआ. बारिश तब हलकी हो गई थी, लिहाजा तुरंत मैं ने और नितिन ने हां में सिर हिला दिया. अच्छी बात यह थी कि 4 दिन पहले ही एटीएम से निकाले बचे पैसे हमारे पास थे और कार्ड भी पैंट की जेब में पैसों के साथ सलामत था.’’

24 सीटों वाली मिनी बस का किराया 50 हजार रुपए था, जो सभी 24 छात्रों ने इकट्ठा कर के दिया. जब वे होस्टल से चले तो उन्हें उम्मीद नहीं थी कि सहीसलामत बेंगलुरु तक पहुंच जाएंगे. रास्ते में चारों तरफ पानी ही पानी था और बूंदाबांदी लगातार हो रही थी. वे सभी शंका में थे कि कब फंसें और बह जाएं.

मिनी बस जैसेजैसे बढ़ती जा रही थी वैसेवैसे उन सब की हिम्मत भी वापस आ रही थी. लेकिन सड़कों पर बहता पानी और रास्ते में उजड़े मकान देख सभी दहल जाते थे. अंदाजा लगाया जा सकता है कि तबाही का आलम क्या रहा होगा.

‘‘हम सभी हिंदीभाषी थे,’’ आर्यमान बताता है, ‘‘जब चेन्नई पार किया तो जान में जान आई. पानी का प्रकोप कम हो चला था लेकिन बिजली कहीं नहीं थी. रास्ते में हमें पता चला कि चेन्नई में डीजल 500 रुपए प्रति लिटर और दूध 100 रुपए प्रति लिटर बिक रहा है. हमें लगा कि चेन्नई के स्थानीय लोगों के मुकाबले हम काफी सुरक्षित थे.

‘‘तबाही का मंजर दिखना कम होता जा रहा था और देर रात बेंगलुरु की लाइटें दिखीं तो हम झूम उठे. इस बीच, मोबाइल से मम्मी से बात होती रही और हम उन्हें ढाढ़स बंधाते रहे कि हम सुरक्षित हैं. बेंगलुरु से सुबह हमारी ट्रेन कर्नाटक एक्सप्रैस थी जिस में पापा ने तत्काल स्कीम के जरिए रिजर्वेशन कर दिया था. लिहाजा, हम बेफिक्र हो गए थे.’’

आर्यमान बताता है, ‘‘हम लोग काफी दिनों से सोए नहीं थे, इसलिए ट्रेन के कंपार्टमैंट में जा कर सोए. इधर, मम्मी बारबार कह रही थीं, बस आ जाओ, तुम्हारी पसंद का खाना बना कर रखा है. घबराना मत, रास्ते में खातेपीते रहना और कहीं उतरना मत.’’

जब नागपुर आ गया तो हम लोग हिपहिप हुर्रे कर झूम उठे. डब्बे में सभी सहयात्री बाढ़ की ही चर्चा कर रहे थे कि कैसेकैसे मकान ढह गए, सैकड़ों लोग बह कर मर गए, छोटेमोटे सामान तो दूर की बात है गाडि़यां तक बह गईं. कैसे लोगों ने अपनी जान बचाई और सेना के जवानों ने दिनरात एक कर बाढ़ पीडि़तों की मदद की. हालात ये थे कि भूखेप्यासे लोग खाने के पैकेटों के लिए टूटे पड़ रहे थे.

जब भोपाल स्टेशन आया तो मम्मीपापा और दीदी को देख आर्यमान को रोना आ गया. मम्मी ने जब उसे गले लगाया तो उसे लगा कि कोई भी बाढ़ उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकती, बकौल आर्यमान, ‘‘अगर उस रात होस्टल से निकलने से चूक जाते तो जाने क्या होता. इस के आगे मैं कुछ सोच भी नहीं पाता सिवा इस के कि बाढ़ में फंस गए थे और बालबाल बच गए.’’

अमेरिका: अवसरों का अद्भुत देश

अमेरिका का एक नया, अलग, रोमांचक रूप देखिए जिसे देख कर मुख से सहसा ही ये शब्द निकल पड़ेंगे, ‘अमेरिका, यू आर रियली ग्रेट.’ अमेरिका को यूएस अथवा यूएसए या फिर संक्षेप में केवल स्टेट्स कहा जाता है, उस की अत्यंत दर्शनीय राजधानी वाशिंगटन डीसी है. सारी दुनिया अमेरिका को ग्रेट मानती है. कोई इसे सामरिक दृष्टि से तो कोई इसे स्टैच्यू औफ लिबर्टी व नियाग्रा फौल्स जैसे आश्चर्यों के कारण ग्रेट कहता है तो कोई इसलिए कि इसी देश ने अब तक सब से ज्यादा नोबेल पुरस्कार जीते हैं.

कुछ लोग इसे इस के माइकेल फेल्प्स जैसे धुरंधर तैराकों या फिर टाइगर वुड्स जैसे प्रतिष्ठित गोल्फर्स के कारण भी ग्रेट मानते व समझते हैं, तो कई और लोग इसे इसलिए ग्रेट कहते हैं कि दुनियाभर के स्टूडैंट्स शिक्षा की दृष्टि से इसी को अपनी श्रेष्ठ पसंद मानते हैं.

इस देश का हम ने 5 बार भ्रमण किया, महसूस किया कि अब इस के तन की सुंदरता के बजाय इस के मन की, सामाजिक रचना की, इस की अनोखी संस्कृति की एक संक्षिप्त झांकी सब को दिखा दें ताकि इस सुंदर देश की पहचान आप के मन में बस जाए. इस के कई रस्मोरिवाज, उत्सव, कानूनी नजरिए, सार्वजनिक सेवाएं दिलचस्प और उल्लेखनीय हैं. इन पहलुओं के व्यक्तिगत अनुभव से भी यह गे्रट बन जाता है.

वाह न्यूयौर्क

सुपर पावर अमेरिका की झांकी, न्यूयौर्क से शुरू करते हैं. ‘बिग ऐप्पल’ कहलाने वाला यह शहर अमेरिका की आर्थिक राजधानी तो है ही, इसे वैश्विक राजधानी भी कहा जाता है. इसलिए नहीं कि यहां स्टैच्यू औफ लिबर्टी व ऐंपायर स्टेट बिल्डिंग जैसे आश्चर्य हैं बल्कि इसलिए कि यहां एक पूरा लघु विश्व समाया है. न्यूयौर्क सिटी में दुनिया के सभी 220 देशों के वंशज बसे मिलेंगे, यहां दुनिया का हर व्यंजन मिलेगा और यहां विश्व की 300 भाषाएं बोलते लोग मिलेंगे शांति और प्यार के सहअस्तित्व में.

न्यूयौर्क को ‘वर्ल्ड संस्कृतियों का मैल्टिंग पौट’ भी कहा गया है. यहां ‘लिटिल इटली’, ‘लिटिल चाइना’, ‘लिटिल इंडिया’ जैसे छोटेछोटे इटैलियन, चीनी, भारतीय बाजार हैं जहां आप को हर देसी चीज मिल जाएगी. समोसे की प्लेट जरूर दोढाई सौ रुपए की पड़ेगी, पर उपलब्ध तो है.

न्यूयौर्क में हमारे साथ एक मजेदार घटना घटी. एक रेस्तरां में हम ने मसालेदार गुजराती चाय पी और पहले जब काउंटर पर पेमैंट करने लगे तो देखा कि ‘सरिता’ का नया अंक मैनेजर के सामने पड़ा था. पूछने पर पता लगा कि मैनेजर की पत्नी नौर्थ इंडियन हैं और ‘सरिता’ उन की प्रिय पत्रिका है जो वहां 3-4 डौलर में खरीदी जाती है. जब मैं ने बताया कि मैं ‘सरिता’ का एक लेखक हूं तो मैनेजर ने मेरी चाय के पैसे लेने से इनकार कर दिया. उन की इस भावना से मैं विभोर हो उठा, मैं ने उन्हें हृदय से धन्यवाद दिया.

यहां यह बता देना शायद अहम रहेगा कि यूरोप के मुकाबले अमेरिका फिर भी सस्ता व अफोर्डेबल है. एक और बात भी बताने योग्य है कि सामान्य व्यवहार में वहां स्वच्छता, सफाई, ईमानदारी आम बात है.

एक अन्य भारतीय रेस्तरां में भोजन करते टेबल के नीचे मुझे किसी का गिरा हुआ पर्स मिला जिसे मैं ने मैनेजर को दे दिया. कुछ ही देर में पर्स का मालिक आ पहुंचा और मुझे धन्यवाद के साथ उस ने 50 डौलर का नोट भी औफर किया. पैसे लेने का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि यदि मेरा पर्स उसे मिलता तो वह भी निश्चय ही उसे वापस करता. वहां यह एक सामान्य व्यवहार है. पर्स का मालिक गोरा अमेरिकी था.

अमेरिकी भी भारतीय व्यंजनों को खूब पसंद करते हैं. आप उन्हें भारतीय थाली खाते अकसर देख सकते हैं. न्यू जर्सी के अपने रिहायशी इलाके न्यूपोर्ट-पावनिया में जब फनफेयर लगता है तो सब से लंबी कतारें भारतीय खाद्य काउंटरों पर ही देखी जाती हैं. गोरे, अश्वेत, मैक्सिकन, चाइनीज सभी अमेरिकी भारतीय व्यंजनों के दीवाने हैं.

मैं ने न्यूपोर्ट मौल में भी यही देखा जहां चाइनीज, जापानी, इटैलियन, इंडियन सभी प्रकार के ईटिंग काउंटर्स हैं पर इंडियन काउंटर्स सब से ज्यादा लोकप्रिय हैं. एक दिलचस्प बात यह है कि इन काउंटर्स के सामने एकएक लड़की अपनेअपने व्यंजन को मुफ्त में चखाने को खड़ी रहती है ताकि आप उन के काउंटर्स को पसंद करने लगें. यह एक स्वस्थ और जायकेदार एडवरटाइजिंग हुई न? थोड़ा सावधान भी रहना है क्योंकि चखने से पहले आप साफसाफ पूछ लें कि यह वैज डिश है या नौनवेज डिश.

चक्कर अंगरेजी और दाएंबाएं का

पहली दफा आप को शायद अजीब लगे कि स्थानीय अमेरिकियों की अंगरेजी आप को ठीक से पल्ले नहीं पड़ती. उन का उच्चारण, लहजा, स्टाइल हम से अलग है. अश्वेतों का कुछ ज्यादा अलग है. परंतु घबराएं नहीं, थोड़ा ध्यान से उन्हें सुनें और जरूरत पड़े तो आप उन्हें ‘स्लो’ बोलने के लिए रिक्वैस्ट करें. कुछ ही समय में आप वहां की स्थानीय अंगरेजी समझने लगेंगे. आप स्वयं भी स्लो और ज्यादा स्पष्ट बोलने की कोशिश करें. अलबत्ता वहां के स्थानीय लोगों को हमारी अंगरेजी समझने में दिक्कत नहीं होगी क्योंकि वे सारी दुनिया के लोगों की अंगरेजी समझने के अभ्यस्त हो चुके हैं.

अमेरिका जाने से पहले कुछ होमवर्क कर के जाएं. मसलन, वहां बैगन को एग प्लांट, भिंडी को ओकरा और बेल फू्रट को स्टोन ऐप्पल बोला जाता है, भले ही आप इन्हें इंडियन बाजार से खरीदें. और वहां के भारतीय तकल्लुफ वाली अंगरेजी के बजाय

अपनी खुद की अंगरेजी बोलते हैं. मसलन, ‘मैं ठीक हूं’ को कहेंगे ‘आई एम गुड’ जबकि हम लोग ‘आई एम फाइन’ वगैरा बोलते हैं.

आज हम भारतीयों का सम्मान वहां पहले से ज्यादा है. सो, आश्चर्य न करें यदि कोई दुकानदार आप का ‘नमस्ते’ या ‘नस्ते’ कह कर स्वागत करे. हौलीवुड फिल्में देख कर पाठकों को शायद यह पता तो होगा ही कि अमेरिका में वाहन सड़क के दाईं ओर चलते हैं जबकि भारत में लैफ्टहैंड ड्राइविंग है. तो, पैदल घूमते वक्त खयाल रहे कि आप फुटपाथ के दाईं ओर रहें. एस्केलेटर पर उतरतेचढ़ते समय भी आप दाईं ओर रहें. अगर इस दाएंबाएं का चक्कर आप नहीं समझे तो लोगों से फुटपाथ पर बेवजह टकराते रहेंगे.

सड़कों, बाजारों में घूमते समय आप को टौयलेट जाने की जरूरत कभी न कभी जरूर पड़ेगी. बता दें कि जब मैकडोनल्ड्स, डंकिन डोनट्स या सबवे आदि में कौफी पीने या सैंडविच, फ्रैंचफ्राइज खाने के लिए घुसें तो वहां इन सुविधाओं का इस्तेमाल करना आप का हक माना जाता है. मौल्स, स्टोर्स वगैरा में भी ये सुविधाएं रहती हैं. अच्छी बात यह है कि आप को इस के लिए एक पैसा भी नहीं चुकाना है. अमेरिका के विपरीत यूरोप के कई देशों में आप को पैसे खर्च कर के ही टौयलेट में प्रवेश मिलता है.

न्यूयौर्क की सार्वजनिक बसों में व्हीलचेयर वाले विकलांगों के लिए प्रवेश के इंतजाम भी हैं. हम ने देखा कि बस के ड्राइवर ने लीवर घुमाया तो बस के पिछले हिस्से का एक प्लेटफौर्म नीचे हो गया. ड्राइवर ने मदद की और यात्री व्हीलचेयर समेत इस प्लेटफौर्म से बस के अंदर पहुंच गया. पूरे देश में विकलांगों के लिए सुविधाएं हैं, उन के लिए अलग टौयलेट कक्ष, अलग पार्किंग वगैरा का इंतजाम रहता है. इन मानवीय मूल्यों ने हमें मोह लिया. यदि आप सीनियर हैं और पैदल सड़क पार करना चाहते हैं तो डिवाइडर या सड़क के किनारे एक बटन दबाइए, सिगनल लाल हो जाएगा और आप निर्विघ्न दूसरी ओर जा सकते हैं.

सीनियर्स की बात चली तो एक दिलचस्प वाकेआ बताते हैं. न्यू जर्सी में हम अपने बेटे के घर पर रुके थे. एक दिन मन किया कि पास की पब्लिक लाइब्रेरी में जाएं, कुछ पढ़ेंलिखें. बेटे से कहा तो उस ने सीनियर्स सर्विसेज वालों को फोन कर दिया. गाड़ी आई, हमें लाइब्रेरी ले गई और उसे वापसी का समय बता कर हम लाइब्रेरी में जा बैठे. कुछ घंटे बिता कर फिर उसी गाड़ी से वापस आ गए. बेटे के लाइब्रेरी कार्ड पर 5 पुस्तकें भी इश्यू करा लाए.

लाइब्रेरियन ने बताया, यह फ्री लाइब्रेरी है, कोई चार्ज नहीं. एक बार में आप 50 पुस्तकें तक इश्यू करा सकते हैं. लाइब्रेरी काफी बड़ी थी और वहां काम करने वाले अधिकतर वृद्ध लोग थे. बाद में बेटे ने बताया कि इन सारी सुविधाओं का खर्च उस टैक्स से निकलता है जोकि उस इलाके के निवासी ‘हाउस टैक्स’ के तौर पर देते हैं.

एक दिन बहू के संग मैं यों ही एक सरकारी दफ्तर गया, बहू को एक लाइसैंस रिन्यू करवाना था. लंबी लाइन थी, पर मुझे देख एक कर्मचारी आ गया और पूछा कि क्या काम है? मेरे सीनियर होने के कारण हमें सीधे खिड़की तक पहुंचा दिया गया. सीनियोरिटी का एक और फायदा भी मुझे मिला. बेटा और मैं एक केंद्र पर अपनी कार रिपेयर कराने गए तो जब बेटा मेकैनिक के साथ व्यस्त था, मुझे सैंडविच, कौफी आदि भेज कर व्यस्त रखा गया.

कोल्स के स्टोर्स में बुधवार के दिन सीनियर्स को हर चीज पर 15 फीसदी की छूट दी जाती है. तो अमेरिका में सीनियर दिखना, मतलब फायदा, कोई उम्र नहीं पूछता.

अमेरिका, आज का जगद्गुरु

प्यारे, आज पूरी दुनिया के विद्याकांक्षी नौजवानों की प्रथम चौइस यूएस ही है. चाइना के तो 3 लाख विद्यार्थी वहां पढ़ रहे हैं. हम दूसरे नंबर पर हैं. जी हां, आज की तारीख में अमेरिका के 4 हजार से अधिक विश्वविद्यालयों, कालेजों में 1 लाख 33 हजार भारतीय फैशन, बिजनैस, डाक्टरी आदि के अलावा साइंस, टैक्नोलौजी, इंजीनियरिंग, मैथ्स भी पढ़ रहे हैं और हमें पता है कि पढ़ने के बाद ज्यादातर लोग वहीं बस जाना चाहेंगे. मगर क्यों?

दरअसल, वहां कानून का राज है, अक्ल का राज है, साफसफाई है, सुरक्षा है, नियम हैं, आकर्षक भवन सुविधाएं हैं, बढि़या सड़कें हैं, खुशगवार माहौल है और भ्रष्टाचार का नाम नहीं.

अमेरिकी लोग दुनिया में किसी तरह की भी राजनीति खेलें, अपने देश में सामान्य जीवन को उन्होंने राजनीतिमुक्त और स्वच्छ बना रखा है. यद्यपि 50 साल पहले तक अमेरिका में कालेगोरे न साथ में पढ़ सकते थे, न ही एक टेबल पर खाना खा सकते थे परंतु आज भारी परिवर्तन है. सभी लोगों में बराबरी का एहसास है और आज रेसिज्म यानी कालेगोरे का फर्क नगण्य सा है. कालेगोरे आपस में खूब ब्याह रचा रहे हैं.

भारतीय भी निष्कंटक और अच्छा जीवन जी रहे हैं, वहां उन की इज्जत भी है. अलबत्ता, टैक्सी ड्राइवरों तथा सड़क के किनारे फू्रट विक्रेताओं में भारतीय जरूर मिलेंगे.

एक दिलचस्प बात? अपने देश में पटेल गुजरातियों को रिजर्वेशन चाहिए पर अमेरिका में पटेल लोग बड़े व्यवसायी, होटल, स्टोर मालिक आदि हैं और उत्तम जीवन जी रहे हैं. सच कहें तो भारतीय बाजारों जैसे जैक्सन हाईट्स, जर्नल स्क्वायर, ऐडिसन आदि में गुजरातियों का ही प्रभुत्व है. वहां हमें घूमते हुए ऐसे गुजराती भी मिले जोकि बरसों से अमेरिका में हैं पर न वे अंगरेजी समझते हैं न हिंदी. गुजराती भाषा से ही वे अपना व्यवसाय व जीवन चला पा रहे हैं. तो अगर आप को अमेरिका जैसा देश बेहतर जीवन, बेहतर शिक्षा, बेहतर माहौल और

बेहतर भविष्य देगा तो आप क्यों न वहां जा बसेंगे?

क्या आश्चर्य कि अमेरिका आ बसने का ख्वाब देखने वाले विदेशी नागरिकों पर कुछ वीसा नियंत्रण भी हो? शिक्षा, विज्ञान आदि के क्षेत्र की बात करें तो भारतवंशी सुब्रमण्यम चंद्रशेखर, हरगोविंद सिंह खुराना तथा रामकृष्णन को अमेरिका जा कर ही नोबेल पुरस्कार मिल सके. अब वर्ष 2015 में अमेरिका के 3 नोबेल विजेताओं में 2 ऐसे हैं जो विदेशों से आ कर वहां बसे. अजीज सैंकर (रासायनिकी नोबेल विजेता) टर्की में जन्मे थे तथा कैम्पबैल (चिकित्साविज्ञान नोबेल विजेता) आयरलैंड में जन्मे थे. शिक्षा के क्षेत्र में कई भारतीयों ने भी कई पुरस्कार जीते हैं. सच तो यह है कि अमेरिका आज का जगद्गुरु तो है ही, वहां शिक्षा पाने का खर्च इंगलैंड के मुकाबले कम भी है जबकि स्कौलरशिप्स वहां ज्यादा हैं.

एक बात और, जो हमें रट्गर यूनिवर्सिटी के एक भारतीय प्रोफैसर ने बताई. वह यह कि अमेरिका का अलिखित नियम है कि दुनिया के सर्वोत्तम प्रोफैसरों को अपनी यूनिवर्सिटीज में पढ़ाने को आमंत्रित करो, पैसा वे जितना मांगें, दे दो. किसी देश की यह पौलिसी हो तो उसे जगद्गुरु बनने से कौन रोकेगा? वहां ‘नासा’ की तो शुरुआत ही जरमनी ने की.

अमेरिका के कुछेक लोकप्रिय नगरों में भारतीयों का बड़ा जमावड़ा है. न्यूयौर्क के अलावा न्यू जर्सी, शिकागो, सिएटल, सैनफ्रांसिस्को, वाश्ंिगटन आदि इन में शामिल हैं. 3 साल के 5 प्रवासों में हम ने देखा कि भारतीय गर्व से अपने उत्सव मनाते हैं जिन में अन्य देशवंशी भी रुचि से भाग लेते हैं. इसी प्रकार भारतीय लोग भी वहां क्रिसमस, हैलोवीन आदि स्थानीय उत्सव जोश के साथ मनाते हैं, घरों में क्रिसमस ट्री लगातेसजाते हैं. यह स्वस्थ परंपरा है. भारतीय बच्चे क्रिसमस को भारतीय उत्सव ही समझते हैं.

पतझड़ के बाद वहां पेड़ करीबकरीब नंगे हो जाते हैं तो बुरे लगते हैं पर क्रिसमस व नए वर्ष से 1 महीने पहले ही इन पेड़ों पर सुंदर सजावटें होने लगती हैं. सो दिसंबरजनवरी में भी माहौल में जीवंत रौनक हो जाती है. क्रिसमस पर इतनी औनलाइन खरीदारी होती है कि कूरियर सर्विसेज बजाय क्रिसमस मनाने के डिलीवरी में व्यस्त रहती हैं, क्रिसमस वाले दिन भी. गलीगली में केरौल सौंग की मधुर ध्वनि गूंजती है. थैंक्सगिविंग भी अच्छा उत्सव है.

खरीदारी की बात चली तो ‘ब्लैक फ्राइडे’ का मुकाबला नहीं. साल में एक फ्राइडे को ऐसी राष्ट्रव्यापी सेल लगती है कि कईकई बड़े आइटम जैसे टीवी, कंप्यूटर आदि भी आधे दामों में मिल जाते हैं. दुकानेंस्टोर्स सुबह 9 बजे खुलते हैं मगर लाइनें रात को 12 बजे ही लग जाती हैं. यों समझिए कि इसे ‘स्टोर’ की लूट कहा जा सकता है. विशाल क्वांटिटी में सामान एकदो दिन में ही बिकने से अनेक कंपनियां ‘रैड’ से ‘ब्लैक’ में आ जाती हैं, इसी कारण इस फ्राइडे को ब्लैक फ्राइडे कहा जाता है (यहां ‘ब्लैक’ शब्द पौजिटिव है). बता दें कि जीसस के प्रयाण दिवस को गुड फ्राइडे कहा जाता है. व्यापार, व्यवसाय, मार्केटिंग, इकोनौमी में भी अमेरिका जगद्गुरु है, है न?

सावधान, यह अमेरिका है

आप जब अमेरिका में घूमें तो थोड़ी सावधानी भी बरतें. यहां बड़ेबड़े स्टोर्स में लाखोंकरोड़ों का सामान खुला पड़ा रहता है, सिर्फ कैमरों की निगरानी में. काउंटर्स पर पहुंचें तो सारा सामान पेश करें, कुछ भी आप के थैले या पर्स या बच्चे के हाथ में न रह जाए ताकि सभी खरीदारी की उचित रसीद बन जाए. यदि गलती से भी कुछ आप के पर्स में खरीदारी से पहले चला गया तो इसे चोरी माना जाएगा और चोरी मतलब पुलिस का आगमन.

अमेरिका में कोई भी 911 नंबर दबाता है तो 2 से 5 मिनट में पुलिस हाजिर (यदि आप को भी कोई इमर्जेंसी आ जाए तो बेशक 911 दबाएं) हो जाती है. इस का मतलब यह नहीं कि आप खरीदारी करते समय डरें, बस कोई मौका न दें कि कोई आप पर लांछन लगाए.

इसी प्रकार लालबत्ती पर नियमानुसार रुकें, जब पदयात्री सिग्नल हरा/सफेद हो तभी क्रौस करें. स्थानीय लोगों से कोई तकरार न करें, न ही उन की या अपने देश की राजनीति पर बहस करें. यदि मौल में ‘विश्राम सर्कल’ में आप बैठ कर कुछ खानापीना चाहें तो वहां निर्देशपट्टी देख लें कि वहां खाने की इजाजत है कि नहीं. खाने के बाद सारा कचरा कूड़ेदान के हवाले करें. मैट्रो टे्रन में कभी कुछ न खाएं.

आप को जान कर आश्चर्य होगा कि एक ही टमाटर ‘शौप राइट’ स्टोर में 2 डौलर, बीजेस स्टोर में 3 डौलर तथा ए ऐंड पी स्टोर में 4 डौलर प्रति मिल सकता है, स्टोर्स अपनेअपने दाम खुद तय करते हैं. किसी अन्य चीज में यह क्रम उलट भी सकता है. सो, ऐसी बहस न करें कि फलां स्टोर में ऐप्पल और केले इस स्टोर के मुकाबले आधे दाम में हैं. वैसे, यद्यपि पानी की, कोक की, दूध की, जूस की, बियर की हर बोतल या कैन केवल एक डौलर की आएगी मगर यही चीजें आप को ‘ब्रांक्स जू’ या फिर ‘डिज्नीलैंड’ में 5 डौलर प्रति में मिलेंगी. सो, शिकायत न करें.

एक खास बात और, जब आप ऐसे रेस्तरां में जाएं जहां टेबल सर्विस हो तो खानेपीने के बाद टिप देना न भूलें. अमेरिका में टिप्स एक प्रकार का मानवीय हक है चाहे आप बाल कटवाएं या फिर कोई और सेवा लें. यदि आप टिप न देंगे तो यह माना जाएगा कि सेवा में कमी थी वगैरा.

अमेरिकी लोग गिफ्ट और प्रशंसा के भूखे होते हैं, इसलिए आप किसी के घर खाने या चाय पर जाएं तो कुछ भेंट अवश्य ले जाएं और उन के भोजन की तारीफ भी करें. जीभर के खाएं, जीभर के तारीफ करें, शर्माएं तो बिलकुल नहीं, क्योंकि ‘और लीजिए’ जैसे शब्द वहां कोई न बोलेगा. और हां, कोई यह भी न बोलेगा कि आप पेटू हो या ज्यादा खाया. याद रखिए, अमेरिका में हमारे स्वयं के देशवासी, हमारे स्वयं के बच्चे, भाईबहन भी अमेरिकियों सा व्यवहार करेंगे. वहां खानेपीने व घूमने में स्वयं खर्च करें, भाईबहन या बच्चों पर निर्भर न रहें. इन सभी बातों का ध्यान रखें क्योंकि आप अमेरिका में हैं.

अमेरिका में भारतीय एकता

न्यूयौर्क में काम करने वाले चीनी व भारतीय युवा न्यू जर्सी के न्यूपोर्ट इलाके में हड्सन नदी के किनारे महंगे फ्लैटों में रहते हैं. वहां लोग कहते हैं कि यह इलाका सिर्फ भारतीय व चीनी युवा प्रोफैशनल्स ही अफोर्ड कर सकते हैं. मेरा बेटा भी सपरिवार वहां अपने फ्लैट में रहता है और जाहिर है कि मेरी तरह और कई मांबाप भी अपने बच्चों से मिलने आते रहते हैं. नतीजा, हर शाम नदी के किनारे भारतीय वृद्धों का जमावड़ा रहता है.

एक स्थानीय गुजराती हर्षद ने ‘नमस्ते इंडिया’ संस्था बना कर सब के नामपते भी नोट कर लिए हैं और साप्ताहिक कार्यक्रमों की सूची सहित सभी सदस्यों को ईमेल से साप्ताहिक न्यूज भी मिल जाती है. हर्षद सच्चे सामाजिक सेवी हैं और भारतीयों को महत्त्व के स्थल दिखा लाते हैं. वहां जो ‘विविधता में भारतीय एकता’ दिखती है वह भारत में नदारद है. एक स्थानीय भारतवंशी रोज शाम का समय हमारे संग बिताते थे, इस विषय पर उन की कुछ काव्य पंक्तियां हैं :

यह बज्मे दोस्तां है,

मोहब्बते जाविदां

आता है मुझ को इस में

नजर उल्फत का इक जहां

हड्सन का ये किनारा भी

एक दोस्त बन गया

संगम हमारा कर दिया,

कितना है मेहरबां

वहां जातिपांति, धर्मपंथ, हिंदू- मुसलमान, ऊंचनीच शब्द कभी दिमाग में न आते थे. एक दिन नदी के किनारे रहमान खान भी हम सभी से मिले, बोले, ‘यारो, हम सभी वहां हिंदुस्तान में भी इसी मोहब्बत से रहें तो मजा आ जाए.’ बता दें कि के रहमान खान उन दिनों हमारी पार्लियामैंट (राज्यसभा) के डिप्टी स्पीकर थे. हर 3-4 दिन में हम लोग 20-30-40 के ग्रुप में कनेक्टिकट का फौक्सवुड्स कैसीनो या वाशिंगटन का लिंकन मैमोरियल, न्यूयौर्क का ब्रांक्स जू या एटलांटिक सिटी कैसीनो वगैरा देखने को निकल जाते थे, फिर उसी दिन लौट आते. कभी किसी पार्क में  सामूहिक भोजन के बाद गीतसंगीतशायरी होती तो पुलिस भी आ जाती कि क्या चल रहा है. ‘प्योरली सोशल कल्चरल’ इंडियन फ्रैंड्स मीटिंग है, यह सुन कर, इंडियन स्नैक चख कर पुलिस वाले मुसकराते हुए वापस चले जाते.

इस के अलावा छोटेछोटे 3-3 या 4-4 के ग्रुप्स में भी कई भारतीय दिन में मौल्स घूम आते, कुछ घर का आलूप्याज ले आते, बच्चों को स्कूल से ले आते आदि. हर बुधवार हर परिवार अपनाअपना खाना बना लाता, काव्यजोक्सकहानी की महफिल के बाद इस भोजन को सामूहिक तौर पर खाते. पूरा खाना एक ही जगह रख देते, फिर अपनी पसंद से जो चाहो, खाओ. अलबत्ता, सर्दी के मौसम में ये सब मुश्किल था क्योंकि बाहर बर्फ में गिरनेफिसलने की बच्चों की ओर से मनाही थी. कुल मिला कर जिंदगी खुशगवार गुजरी.

भारत विरोधी सैंटीमैंट्स–डौट बस्टर्स

आज भारत का सब से बड़ा हितैषी मुल्क होने का दावा करते अमेरिका में कभी साउथ एशियन, खासकर भारतीयों, को अपने मुल्क से खदेड़ने के लिए डौट बस्टर्स जैसी मुहिम चली थी. आज की नई पीढ़ी डौट बस्टर्स टर्म से वाकिफ नहीं है. दरअसल, यह एक खास समुदाय या संप्रदाय से नफरत करने वाला हेट ग्रुप था जो 1987 के दौरान न्यू जर्सी में बड़ा कुख्यात था. इस ग्रुप का काम अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों से मारपीट करना तथा उन्हें अमेरिका से भगाना था.

जुलाई 1987 में तो बाकायदा जर्सी जर्नल में इस आशय की धमकी प्रकाशित हुई थी जिस में कहा गया था– ‘‘जर्सी सिटी से भारतीयों को निकालने के लिए किसी भी हद तक जाया जाएगा.’’ उस दरम्यान कई भारतीयों पर 10-12 के गुट में अमेरिकियों ने हमले किए. कई लोग कोमा में गए जबकि कइयों की मौत हो गई. प्रमुख तौर पर न्यूयौर्क और जर्सी में फैले इस डौट बस्टर्स ने ऐसी कई वारदातों को अंजाम दिया. 1987 से 1993 तक इस ग्रुप का खौफ रहा. कहा जाता है यह हिंदू औरतों, जो माथे पर बिंदी (डौट) लगाती हैं, उन्हें निशाना बनाता था. और ग्रुप के नाम के पीछे भी यही वजह रही.

कितनी अजीब बात है कि सालों बाद अमेरिका में ही प्रैसिडैंट के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में मुसलिमों को न घुसने की बात वैसे ही कह रहे हैं जैसे डौट बस्टर्स हिंदुओं के साथ करते थे.

– साथ में राजेश कुमार

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