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अपने दिल की सुनें और इस का खयाल कैसे रखें

इंसान के जिस्म में हृदय रोज 1,00,000 बार खून को पंप करता है. रक्त संचार प्रणाली के अभिन्न अंग के रूप में हृदय शरीर के हर अंग में खून के साथ औक्सीजन पहुंचाता है, जिस से टिश्यू व अंग जीवित रहते हैं. हृदय बीमार पड़ जाए, तो खून के संचार में बाधा आ जाती है. इस का तुरंत इलाज कराना आवश्यक हो जाता है.

दिल को जानें

हृदय मांस का बना एक छोटा सा अंग होता है, जो हमारी मुटठी के समान दिखता है. हृदय का वजन 300 से 450 ग्राम के बीच होता है.
यह छाती के मध्य थोड़ा सा बाईं ओर थोरैक्स के अंदर स्थित होता है. इस में 4 चैंबर होते हैं, जिन में निचले चैंबर को वेंट्रिकल्स और ऊपरी चैंबर को एट्रिया कहा जाता है. हृदय के 2 चैंबर्स को बांटने वाली मांसपेशी की दीवार को सेप्टम कहा जाता है.

हृदय के दाईं ओर का हिस्सा खून को शरीर से फेफड़ों में धकेलता है, वहीं बाईं ओर का हिस्सा फेफड़ों से खून को शरीर के अन्य अंगों में भेजता है. इस प्रकार हृदय का काम पूरे शरीर में रक्त का संचार बना कर रखना, अंगों तक पोषण और औक्सीजन पहुंचाना और टौक्सिन व कार्बन डाईऔक्साइड जैसे व्यर्थ पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना होता है.

इस निरंतर चलने वाली प्रक्रिया में हृदय की पेशियां संकुचित होती हैं और फैलती हैं. पेशियों के संकुचन की प्रक्रिया सिस्टोल के दौरान और फैलने की प्रक्रिया डायस्टोल के दौरान होती है. सिस्टोल के दौरान वेंट्रिकल्स संकुचित हो कर कस जाते हैं और खून को आर्टरी में प्रवाहित करते हैं, बायां वेंट्रिकल खून को आयोर्टा में और दाहिना वेंट्रिकल फेफड़ों में धकेलता है. डायस्टोल के दौरान हृदय की पेशियां फैलती हैं, जिस से एट्रिया में खून भर जाता है और फिर वेंट्रिकल्स में प्रवाहित होता है.

दिल को को रखें स्वस्थ

दैनिक जीवन में निम्न मुख्य बिंदुओं का ध्यान रख कर हृदय को स्वस्थ रखें:

* स्वस्थ आहार: अपने दैनिक आहार में फलों और सब्जियों का भरपूर सेवन करें. फल, सब्जियों, साबुत अनाज, लीन प्रोटीन, स्वस्थ फैट, कुछ मछलियों, चिकन और बीन्स में पर्याप्त प्रोटीन मिलता है. अतिरिक्त शुगर, कोलैस्ट्रौल, ट्रांस फैट, सैचुरेटेड फैट्स, और सोडियम का सेवन कम करने से हृदय को स्वस्थ रखने में मदद मिलती है. आहार में रेड मीट की मात्रा कम करने से कोलैस्ट्रौल कम
होता है.

* नियमित व्यायाम: सप्ताह में कम से कम 150 मिनट तक हलके से गहरा व्यायाम करें, 75 मिनट कठोर व्यायाम करें या दोनों तरह के व्यायामों की दिनचर्या बनाएं. सप्ताह में कम से कम 2 बार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग से मांसपेशियों के कार्य और मेटाबोलिज़्म में काफी सुधार होता है. हलके से व्यायाम, जैसे वौकिंग करने या सीढ़ियों का उपयोग करने से भी हृदय के स्वास्थ्य में सुधार आता है.

* धूम्रपान न करें: धूम्रपान हृदय रोग के मुख्य कारणों में से एक है. इस से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम काफी कम हो जाता है.

* तनाव को नियंत्रित रखें: योगा, ध्यान, प्राणायाम जैसी गतिविधियों द्वारा तनाव को नियंत्रित करें. समाज में सक्रिय रहने और लोगों से संबंध अच्छा रखने से तनाव कम करने में मदद मिलती है.

* नियमित स्वास्थ्य जांच: उच्च रक्तचाप चुपचाप शरीर को खोखला करता चला जाता है. इस की वजह से हृदयरोग पनपते हैं. इसलिए नियमित जांच की मदद से रक्तचाप को नियंत्रण में रखें. ज्यादा कोलैस्ट्रौल से रक्तवाहिनियों में प्लौक जम जाता है, जिस की वजह से हार्टअटैक या स्ट्रोक हो सकता है. अगर मरीज को डायबिटीज है, तो हृदय को स्वस्थ रखने के लिए शुगर को नियंत्रित रखना बहुत आवश्यक होता है.

हृदय को किस से जोखिम होता है

कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों या समस्याओं का जोखिम कई कारणों से बढ़ जाता है. उच्च रक्तचाप, उच्च कोलैस्ट्रौल, धूम्रपान, मोटापा, और शिथिल जीवनशैली समय के साथ हृदय और रक्तवाहिनियों को कमजोर करते चले जाते हैं.

हृदय के अस्वस्थ होने से गंभीर विकार और जान का खतरा उत्पन्न हो सकते हैं. इन में से सब से आम कोरोनरी आर्टरी डिजीज (सीएडी) है, जिस में कोरोनरी आर्टरीज में प्लौक जम जाता है, और वह आंशिक या पूरी तरह से ब्लौक हो जाती हैं. प्लौक जमने के कारण सांस फूलने लगती है, छाती में दर्द होने लगता है. अगर इस का तुरंत इलाज न किया जाए, तो हार्टअटैक हो सकता है.

खराब जीवनशैली, जैसे अस्वस्थ आहार, अत्यधिक मदिरासेवन से हृदय रोग का जोखिम बढ़ता है. अगर व्यक्ति को डायबिटीज, तनाव, और परिवार में हृदयरोग का इतिहास रहा हो, तो यह जोखिम बढ़ जाता है.

पुरुषों को हृदयरोग कम उम्र में होने का जोखिम ज्यादा होता है. अगर इन बातों का ध्यान रखा जाए और जीवनशैली में सुधार कर के दवाइयों की मदद ली जाए, तो हृदय को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है.

डाक्टर को दिखाएं

गंभीर स्थितियों में तुरंत डाक्टर को दिखाना आवश्यक होता है:

* हार्टअटैक: हार्टअटैक तब हो सकता है जब कोरोनरी आर्टरी या इस की कोई छोटी रक्तनलिका में प्लौक जम कर यह अवरुद्ध हो जाती है. इस की वजह से हृदय की मांसपेशियों में खून की सप्लाई रुक जाती है और वे क्षतिग्रस्त हो जाती हैं. यह स्थिति जानलेवा होती है.

* हार्टफेल: हार्ट के फेल होने पर हार्ट शरीर में पर्याप्त खून को पंप नहीं कर पाता है. इस से फेफड़ों और लिवर में फ्लूइड जमा हो जाता है. इस स्थिति को एडेमा कहते हैं. हार्टफेल होने पर मरीजों को अनेक लक्षण महसूस होते हैं, जिन में सांस का फूलना, थकान और हाथों व पैरों में सूजन है. हृदय के इलैक्ट्रिक सिस्टम में गड़बड़ी के कारण भी हृदय असामान्य रूप से धड़कने लगता है, इस स्थिति को एरिथमिया कहते हैं. यह अकसर कोरोनरी आर्टरी डिजीज?, हार्टअटैक या हृदय की किसी अन्य बीमारी के कारण हो सकता है. कुछ एरिथमिया नुकसान नहीं पहुंचाते हैं पर कुछ जानलेवा हो सकते हैं.

* स्ट्रोक: स्ट्रोक होने पर मस्तिष्क के किसी हिस्से में खून की आपूर्ति थक्का जमने के कारण रुक जाती है, जिस की वजह से टिश्यू तक औक्सीजन और पोषक तत्त्व नहीं पहुंच पाते हैं. इस की वजह से मस्तिष्क के टिश्यू को स्थायी क्षति पहुंच सकती है और मरीज को विकलांगता या मृत्यु हो सकती है. इस के मुख्य कारणों में उच्च रक्तचाप और कार्डियोवैस्कुलर आर्टरी डिजीज होती हैं.
कार्डियोवैस्कुलर आर्टरी डिजीज की तरह ही एक पेरिफेरल आर्टरी डिजीज भी होती है, जो अंगों को खून पहुंचाने वाली आर्टरी को प्रभावित करती है. इस की वजह से दर्द, सुन्नपन या गंभीर मामलों में संक्रमण का जोखिम हो सकता है.

* कार्डियेक अरेस्ट: इस स्थिति में हृदय अचानक काम करना बंद कर देता है और मरीज की सांस एवं चेतना चली जाती है. यह आमतौर से गंभीर एरिथमिया की वजह से होता है. इस स्थिति में मरीज अगर तुरंत हौस्पिटल न पहुंचे तो उस की मौत हो सकती है. इन बीमारियों से बचे रहने के लिए हृदय का खयाल रख कर समस्याओं की रोकथाम करना बहुत आवश्यक है.

हृदय एक महत्त्वपूर्ण अंग है, जिस की बहुत सतर्कता से खयाल रखने की आवश्यकता है. हृदय की संरचना और क्रियाओं को समझ कर और हृदय के लिए लाभकारी गतिविधियों की मदद से हृदय रोग के जोखिम को काफी कम किया जा सकता है. यदि फिर भी किसी को सांस लेने में मुश्किल, छाती में दर्द या बेचैनी महसूस हो, तो उसे फौरन कार्डियोलौजिस्ट के पास जा कर अपने हृदय की जांच करानी चाहिए क्योंकि शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करने से स्थिति गंभीर हो सकती है और मरीज की जान भी जा सकती है.

(लेखक मणिपाल इंस्टिट्यूट औफ कार्डियक साइंसेज, एचसीएमसीटी मणिपाल अस्पताल, द्वारका, दिल्ली में चेयरमैन हैं.)

प्लानिंग के साथ कर्ज लें, नहीं आएगी जान देने की नौबत

ऋषि चार्वाक ने कहा था- ‘यावत जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत.’ यानी, जब तक जिएं, सुख से जिएं, कर्ज ले कर घी पिएं. 
यह श्लोक हम ने कई बार सुना है. इस के उलट इस पर अमल करने को हमारे पूर्वजों ने गलत बताया है. उन का कहना था कि कर्ज ले कर जीवनयापन करना बहुत खराब है. इस पर कई कहावतें और लोकोक्तियां भी बनीं. सभी में यही कहा गया, ‘जितनी चादर हो, अपने पैर उतने ही फैलाने चाहिए.’ हालांकि, कर्ज ले कर अगर अपना बिजनैस बढ़ाया जाए तो यह बुरा नहीं है.

– लेकिन कर्ज आप कहां से ले रहे हैं?

– उस पर कितना ब्याज दे रहे हैं?

– कर्ज के पैसों को कहीं आप घर के ऐशोआराम में तो नहीं खर्च कर रहे?

ये सब बातें माने रखती हैं. 

अभी हाल ही में कर्ज के जाल में फंस कर एक और हंसताखेलता परिवार खत्म हो गया. यूपी के सहारनपुर के सर्राफा कारोबारी सौरभ बब्बर और उस की पत्नी मोना बब्बर ने गंगा नदी में कूद कर जान दे दी. कूदने से पहले दोनों ने सैल्फी ली. उसे अपने दोस्तों को भेजा. साथ में, सुसाइड नोट भी था, जिस में लिखा था- ‘कर्ज में डूबे हुए हैं.  ब्याज देदे कर परेशान हो गए हैं. अब हम से और ब्याज नहीं दिया जाता. इसलिए मौत को गले लगाने जा रहे हैं.

ऐसा भी नहीं है कि उन्हें अपने बच्चों की चिंता नहीं थी. पतिपत्नी ने अपने बच्चों के भविष्य की चिंता करते हुए उन्हें नानानानी के घर में छोड़ा. उन के ऊपर 10 करोड़ रुपए का कर्ज था. उन्होंने कर्ज चुकाने की कोशिश में घर या मकान को नहीं बेचा, बल्कि बच्चों के लिए उस प्रौपर्टी को छोड़ने की बात लिखी. यह केवल एक घटना नहीं है बल्कि आएदिन इस तरह की घटनाओं से अखबारों के पन्ने भरे रहते हैं. ऐसे जाने कितने मामले हैं जहां आर्थिक तंगी और कर्ज ने पूरा परिवार बरबाद कर दिया.

मशहूर ऐक्टर और प्रोड्यूसर नितिन देसाई ने भी कर्ज के जाल में फंस कर जान दे दी थी.

सिर्फ आम लोग ही नहीं बल्कि बड़े और मशहूर लोग भी कर्ज के जाल से बचे नहीं हैं.  हिंदी सिनेमा के दिग्गज, आर्ट डायरैक्टर, ऐक्टर व प्रोड्यूसर नितिन देसाई पर 180 करोड़ रुपए का कर्जा चढ़ा हुआ था. इस कर्ज को उतारने के लिए उन्होंने अपनी सारी जमीनजायदाद को गिरवी रखा हुआ था. बताया जा रहा है कि आर्ट डायरैक्टर ने यह रकम एक फाइनेंस कंपनी से ली थी. जब नितिन देसाई इस कर्ज को उतारने में खुद को असमर्थ समझने लगे तो उन्होंने खुदकुशी जैसा जानलेवा कदम उठा लिया.

कर्ज को ले कर क्या कहते हैं आंकड़े 

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े चौंकाने वाला खुलासा करते हैं जिन में पता चलता है कि हर साल यह कर्ज जाने कितने लोगों की जिंदगियां लील रहा है. एजेंसी पर आत्महत्या के 2022 तक के आंकड़े मौजूद हैं. उन से पता चलता है कि भारत में होने वाली सौ में से हर चौथी सुसाइड कर्ज या आर्थिक तंगी के कारण होती है.

2022 में देशभर में 1.70 लाख से ज्यादा लोगों ने खुदकुशी कर ली थी. उन में से 7 हजार से ज्यादा लोग ऐसे थे जिन्होंने कर्ज से परेशान हो कर आत्महत्या की थी. इस हिसाब से हर दिन औसतन 19 लोगों ने सुसाइड की. 

आंकड़े बताते हैं कि 2018 से 2022 के बीच 5 साल के दौरान कर्ज से परेशान हो कर 29 हजार 486 लोग आत्महत्या कर चुके हैं.

चमत्कारों की उम्मीद में लेते हैं कर्ज 

हमारे यहां लोगों को चमत्कारों की बहुत उम्मीद होती है. कई बार लोग बाबाओं के चक्कर में पड़ जाते हैं और वे कहते हैं मोटा कर्ज ले कर धंधा करो, खूब माया बरसेगी. भले ही उस व्यक्ति ने कभी बिजनैस न किया हो लेकिन बाबा की बात मानकर वह अपने हाथ आजमाने निकल पड़ता है और अपना सब गंवा बैठता है. इस में फायदा बाबा का भी होता है. मोटा कर्ज लिया जाता है तो उस में से बाबा को भी खासी रकम दी जाती है. और जब कर्ज का जाल फंस जाता है, तो ये बाबा उन्हें बीच अधर में लटका के गायब हो जाते हैं.

एक अच्छे लाइफस्टाइल की आदत हो जाती है उसे कैसे बदलें 

कई बार कर्ज ले कर व्यापर आदि में लगा देते हैं और किसी कारणवश अगर कारोबार डूबा तो मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं. आप को अब तक जिस लाइफस्टाइल को जीने की आदत होती है, आप अब कर्जे के रातदिन किए जाने वाले तकादे के साथ वह लाइफस्टाइल मैनेज नहीं कर पाते और वह लाइफस्टाइल और शानोशौकत को छोड़ कर जीना भी अच्छा नहीं लगता. बैंक वाले प्रौपर्टी सीज कर लेते हैं. आप को आदत होती है कि मर्सडीज से कम में नहीं चलूंगा. लेकिन हालत हो गई है टूव्हीलर में चलने वाली. टूव्हीलर में चलना पड़े उस से अच्छा वे समझते हैं कि मर जाओ. यह कोई नई बात नहीं है, दुनियाभर में ऐसा ही होता है. आत्महत्या परिवार को भी बहुत सारे झंझटों से छुटकारा दिला देती है.

कर्ज ले कर घी मत पियो

लोग इस उम्मीद पर कर्ज लेते हैं कि मैं कर्ज ले कर उसे आराम से चुका दूंगा. अपना बिज़नैस चला लूंगा. कर्ज तो लेना ही पड़ेगा, तभी सोसाइटी आगे बढ़ेगी और आप कुछ बड़ा कर पाएंगे. लेकिन कर्ज ले कर घी मत पियो. कर्ज लिया है, तो गाड़ी मत खरीदो, घर मत खरीदो, घर का सामान, जैसे फ्रिज आदि मत खरीदो. ये सब अपनी सेविंग से करें.

कारोबार के लिए कर्ज लेना बुरा नहीं है पर प्लानिंग जरूरी है 

नया बिजनैस शुरू करने या पहले से चल रहे बिजनैस को बढ़ाने के लिए लोन लेने में कोई बुराई नहीं है. दुनिया के बड़े से बड़े बिजनैस किसी न न किसी रूप में लोन ले कर आगे बढ़े हैं. लेकिन बिजनैस में सफलता की उम्मीद के साथ ही नाकामी का जोखिम भी छिपा होता है. इसलिए लोन लेने से पहले एक अच्छा बिजनैस प्लान बनाना जरूरी है, ताकि जोखिम को कम से कम रख कर सफलता की संभावना को बढ़ाया जा सके.

जब भी आप कर्ज लें, इस बात का ध्यान रखें कि अपनी कमाई को 50:30:20 का नियम बना कर खर्च करें. जहां कमाई का 50 फीसदी हिस्सा जरूरतों को पूरा करने में, 30 फीसदी हिस्सा अपने शौक पूरे करने में और 20 फीसदी हिस्सा बचत करने व कर्ज चुकाने में इस्तेमाल करना चाहिए.

मुनाफे के पैसे से लोन उतारें 

कहीं से कोई पैसा अचानक से मिल जाए या फिर व्यापार में कोई मुनाफा हो तो उन पैसों को घर में खर्चने के बजाय लोन उतरने में खर्च करें, ताकि लोन कुछ कम हो सके और इंट्रैस्ट भी काम देना पड़े.

पर्सनल लोन, गोल्ड लोन भी है एक विकल्प 

एक डेब्ट क्न्सौलिडेशन लोन बेहद कम ब्याज दर पर आप के कर्जों के भुगतान में मदद कर सकता है. इस में आप के लिए पर्सनल लोन भी एक विकल्प हो सकता है. मगर यह ध्यान रखें कि पर्सनल लोन की ब्याज दर कर्जों की ब्याज दर से कम होनी चाहिए वरना आप एक कर्ज से निकलने के चक्कर में कर्ज के दूसरे जाल  में फंस जाएंगे.

आजकल गोल्ड लोन के जरिए भी काफी अच्छी रकम मिल जाती है. आप सोने के गहनों  व सिक्कों के बदले कर्ज ले सकते हैं. यह आप की संपत्ति के इस्तेमाल का सब से बेहतर और तेज विकल्प है. इस तरह के कर्ज पर करीब 08 से 15 फीसदी सालाना का ब्याज देना होता है. इसलिए अगर आप के ऊपर ऊंची ब्याज दर वाला कोई लोन है तो इस से मिलने वाली राशि से पहले उसे चुका सकते हैं.

अगर आप कम इंट्रैस्ट वाला लोन ले कर पुराने ज्यादा ब्याज दर वाले लोन को चुका सकते हैं, तो यह एक अच्छा कदम हो सकता है. लेकिन इस बारे में कोई भी फैसला करने से पहले दोनों तरह के कर्जों पर लागू ब्याज दरों के अलावा उस से जुड़ी अन्य शर्तों व लोन ट्रांसफर पर होने वाले खर्च पर भी अच्छी तरह विचार कर लें.

लोन लेने के कई सुरक्षित तरीके भी हैं

लोन सिर्फ बैंकों से लें. बाजार से लोन मत उठाओ. इस बात का ध्यान रखें कि  बाजार में 40 से 50 परसैंट तक का ब्याज लगता है जोकि बहुत ज्यादा होता है, दूसरे, समय पर इंट्रैस्ट न दिए जाने पर ये लोग ब्लैकमेल करना, धमकी देना जैसी चीजें करते हैं जिस से मानसिक तनाव बढ़ता है. आप लोन लेने के दूसरे सुरक्षित विकल्प भी चुन सकते हैं, जैसे सरकारी या दिग्गज निजी बैंकों से गोल्ड लोन, बैंकों के पर्सनल लोन, एफडी के बदले लोन, एलआईसी पौलिसी पर लोन, अपने संस्थान से पीएफ के बदले या कर्मचारियों को मिलने वाला लोन आदि.

कैसा रहा फिल्मों का कारोबार: हरियाली के लिए तरसता रहा बौलीवुड

वर्ष 2024 के साढ़े आठ माह गुजर गए. अगर हम ‘स्त्री 2’ को नजरअंदाज कर दें, तो पूरे वर्ष बौलीवुड हरियाली के लिए तरसता रहा. ‘स्त्री 2’ पिछले 4 सप्ताह से जबरन चलाई जा रही है. इस के निर्माता अपनी तरफ से भरसक प्रयास कर रहे हैं कि 2023 की ‘पठान’, ‘जवान’ व ‘गदर 2’  की तथाकथित कमाई का रिकौर्ड वे तोड़ कर दिखा दें.

मजेदार बात यह है कि लोग अभी भी ‘स्त्री 2’ को घटिया फिल्म बता रहे हैं और वे यह कहने से नहीं चूक रहे कि ‘स्त्री 2’ के आंकड़े देख कर किसे अच्छी व किसे बुरी फिल्म कहें. लोग आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं कि आखिर यह फिल्म कैसे बौक्सऔफिस पर कमाई कर रही है.

हम इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहते. ‘स्त्री 2’ के पीआर ने एक सप्ताह पहले से ही चिल्लाना शुरू कर दिया था कि ‘स्त्री 2’ ने छह सौ करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है और जल्द ही ‘गदर 2’ को पछाड़ देगी. जबकि, 20 सितंबर तक ‘स्त्री 2’ का बौक्सऔफिस कलैशन 564 करोड़ रुपए तक ही पहुंचा. यह आंकड़ा भी निर्माता द्वारा बताया जा रहा है. हम इसे सच नहीं मानते. यदि बौक्सऔफिस पर फिल्में चल रही होतीं, तो दूसरे निर्माता अपनी फिल्मों को प्रदर्शित करने से न भागते. 20 सितंबर को निर्माता एकता कपूर की फिल्म ‘‘बिन्नी एंड फैमिली’ प्रदर्शित होनी थी, पर बिना कोई वजह बताए अचानक एकता कपूर ने अपनी इस फिल्म को प्रदर्शित नहीं किया. अब यह फिल्म कब प्रदर्शित होगी, पता नहीं.

जहां तक सितंबर के दूसरे सप्ताह यानी कि 13 सितंबर को प्रदर्शित हंसल मेहता निर्देशित फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ का सवाल है, तो यह फिल्म पूरे सप्ताह में 5 करोड़ रुपए भी बौक्सऔफिस पर इकट्ठा नहीं कर पाई. इस में से निर्माता की जेब में 2 करोड़ रुपए ही जाएंगे. जबकि, इस फिल्म में करीना कपूर खान जैसी अदाकारा हैं. इस फिल्म की सह निर्माता भी करीना कपूर खान हैं. फिल्म के रिलीज के बाद 14 सितंबर को करीना कपूर खान ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट कर दर्शकों से आग्रह किया था कि वे उन की फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ को जरूर देखें, पर अफसोस कि उन के इस वीडियो का भी कोई असर नहीं हुआ.

बौक्सऔफिस पर इतनी बुरी पिटाई के बाद फिल्म के निर्देशक हंसल मेहता ने बयान दिया है कि उन की फिल्म की सफलता को बौक्सऔफिस आंकड़ों पर नहीं तोलना चाहिए. अब बताएं, अब तक तो हर फिल्मकार बौक्सऔफिस के आंकड़े की ही दुहाई देता आ रहा था, पर हंसल मेहता को बौक्सऔफिस की कमाई नहीं चाहिए. अगर फिल्म बौक्सऔफिस पर कमाएगी नहीं, तो बेचारे फिल्म में काम करने वाले वर्करों को पैसा कौन देगा? पर हसल मेहता का मामला अलग है.

इस की मूल वजह यह है कि फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ को लंदन में वहां की सब्सिडी ले कर फिल्माया गया है. और यह फिल्म रिलीज होने से पहले ही ओटीटी प्लेटफौर्म ‘नेटफ्लिक्स’ को बेची जा चुकी थी. इसलिए निर्माता ने शायद अपनी जेब भर ली, तो उन्हें दर्शकों ओर सिनेमाघर मालिकों की परवा नहीं. वैसे भी, फिल्म की असफलता की मूल वजह यह है कि यह भारतीय दर्शकों के लिए बनी ही नहीं है. फिल्म लंदन की पृष्ठभूमि में लंदन के बकिंघम पैलेस में होने वाली हत्या की कहानी है. अब लंदन में हो रही हत्या की कहानी देख कर तनाव में जी रहे भारतीय दर्शक को कैसे आनंद मिलेगा. यही वजह है कि 20 सितंबर को टिकट केवल 99 रुपए का था, फिर भी सिनेमाघर खाली पड़े हुए थे, जबकि 2 दिनों पहले से ही प्रचारित किया जा रहा था कि 20 सितंबर के दिन 99 रुपए में कोई भी फिल्म देखी जा सकती है.

1947 के बाद कानूनों से बदलाव की हवाएं

पिछले अंक में हमने पढ़ा –   1947 के बाद कानूनों से रेंगती सामाजिक बदलाव की हवाएं

अब आगे …

नेहरू काल में बने कानूनों ने भारतीय समाज में कई सामाजिक बदलाव किए. इन में वोट देने के अधिकार से ले कर अस्पृश्यता उन्मूलन और इम्मोरल ट्रैफिक जैसे कई जरूरी कानून शामिल हैं. इन सुधारों के बारे में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मांगें बड़े ही दबे शब्दों में उठाई जा रही थीं. इन्होंने ही असल में आधुनिक यानी स्वतंत्र समाज वाले भारत की नींव रखी.

नेहरू काल में बने कानूनों से सामाजिक बदलावों के प्रयास पिछले अंक में प्रकाशित हुए थे पर वे पूरे नहीं थे. नेहरू की कांग्रेस ने जो और कानून बनाए उन की मांग न तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान की गई थी और न ही कानून बनाते समय की जा रही थी. स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने विचारों और सहयोगियों के सु?ावों पर जो किया उस ने आधुनिक भारत की आधुनिक सोच के निर्माण की अमिट छाप छोड़ी है.

वैसे तो समाज की डोर पंडेपुजारियों के हाथों में होती है पर भारतीय जनसंघ और उस के जैसे दूसरे दल, जो पुरातनवादी सोच से घिरे थे और एक खास वर्ग की ठेकेदारी कर रहे थे, उस समय कानून के जरिए किसी बदलाव की मांग नहीं कर रहे थे. उन की मुख्य मांग गौपूजन को ले कर थी या फिर हिंदूमुसलिम विवाद की.

नेहरू ने न केवल हिंदू औरतों को बराबरी का स्थान देते हुए हिंदू पर्सनल कानूनों में भारी हेरफेर किया और बड़ा जोखिम लिया, गांधी के प्रिय क्षेत्र छुआछूत पर भी कानून बनवाया जिस से चाहे जमीनी तौर पर अंतर दशकों बाद भी पूरी तरह नहीं आया, फिर भी कानूनन कोई अछूत नहीं रह गया.

जनता के हाथ में राजनीतिक ताकत

1951 में जवाहरलाल नेहरू और भीमराव अंबेडकर ने देश में लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने के लिए रिप्रेजैंटेशन औफ पीपल एक्ट 1951 बनवाया, जिसे 17 जुलाई, 1951 को अंतरिम संसद ने संविधान के अनुच्छेद 327 के अनुसार बनाया. इस कानून में संसद, विधानसभाओं और विधानपरिषदों के चुनावों को विस्तार से बताया गया है. यह कानून देश के समाज सुधारों के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित हुआ क्योंकि 2024 तक के लोकसभा चुनाव इसी कानून के अंतर्गत हुए.

उस समय जो लोग सत्ता में थे वे चाहते तो वोट का या चुनाव में खड़े होने का अधिकार कुछ को ही दे सकते थे. पौराणिक मान्यता के अनुसार तो यह हक केवल पुरुष क्षत्रियों और ब्राह्मणों को था पर इस 1951 के कानून में ऐसी कानूनी बाधा नहीं थी कि एक अछूत, एक शूद्र, एक वैश्य, एक महिला चुनाव में खड़ी न हो सके.

1919 और 1935 के ब्रिटिश काल के कानूनों में सपंत्ति होने पर ही वोट करने का अधिकार था और वह भी सिर्फ ब्रिटिश शासन वाले क्षेत्रों में. 1919 के कानून में 2.5 प्रतिशत और 1935 के कानून के बाद 11 प्रतिशत लोगों को ही वोट देने का अधिकार था.

1950 के संविधान और रिप्रेजैंटेशन औफ पीपल्स एक्ट 1951 के कारण सभी बिना जाति और संपत्ति के भेद के न केवल वोट दे सकते थे बल्कि सभी चुनावों में खड़े भी हो सकते थे. यह एक बड़ा समाज सुधार था जो सिर्फ कानून से लाया गया जिस की मांग को ले कर न जुलूस निकले न धरनेप्रदर्शन हुए.

चुनाव आयोग भी बना जो सरकार से अलग था ताकि सरकार चुनाव नतीजों को मनमाने ढंग से नियंत्रित न कर सके. इसी के कारण गांवगांव में अछूतों और पिछड़ों को बराबरी की निगाहों से देखा जाना जरूरी हो गया क्योंकि जो भी खड़ा होता उसे उन के वोट की जरूरत थी.

आज 2024 में हम जिस हक को जन्मसिद्ध सम?ा रहे हैं, यह 1947 में नहीं था और उसी के बाद उपहार में दिया गया है. जनता ने उस के लिए कोई संघर्ष किया, यह नहीं दिखता.

जातिवाद पर चोट

इसी तरह अस्पृश्यता (अपराध) कानून 1955 ने हिंदू समाज के अंधविश्वास की जड़ में तेजाब डालने का काम किया. संविधान में पहले ही अनुच्छेद 17 के अंतर्गत अस्पृश्यता उन्मूलन का प्रावधान शामिल कर लिया गया था. सरकार ने इस में और वृद्धि करते हुए 1955 में अछूत विरोधी कानून पास कर दिया जिस से छुआछूत का रिवाज दंडनीय और संज्ञेय अपराध बना दिया गया. यह कानून 1 जून, 1955 से लागू हुआ था. बाद में, अप्रैल 1965 में गठित इलाया पेरूमल समिति की सिफारिशों के आधार पर 1976 में इस में व्यापक बदलाव किए गए और इस का नाम बदल कर नागरिक अधिकार संरक्षण कानून कर दिया गया.

इस अधिनियम के तहत, अस्पृश्यता से जुड़े अपराधों के लिए दंड का प्रावधान किया गया था. इस के तहत किसी भी निम्न जाति के व्यक्ति को किसी दुकान, सार्वजनिक रैस्तरां, होटल या सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान पर जाने से रोका नहीं जा सकता. वे किसी सार्वजनिक भोजनालय, होटल, धर्मशाला, सराय या मुसाफिरखाना में जा सकते हैं या ठहर सकते हैं. वे आम जनता या उस के किसी अनुभाग के उपयोग के लिए रखे गए किसी बरतन या अन्य वस्तुओं का उपयोग कर सकते हैं. उन को अपनी पसंद का कोई पेशा अपनाने या कोई उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने या कोई नौकरी करने पर कोई पाबंदी नहीं लगाई जा सकती है.

जाति के आधार पर बंटे हर गांव शहर, गली, महल्ले में छुआछूत पर आक्रमण करने वाले इस कानून के अंतर्गत किसी सार्वजनिक वाहन का उपयोग या उस तक पहुंच से किसी को नहीं रोका जा सकता. छुआछूत या जाति के आधार पर किसी को किसी आवासीय परिसर में घर बनाने से मना नहीं किया जा सकता है.

निम्न जाति के लोगों को आभूषण पहनने और सजनेसंवरने का पूरा अधिकार दिया गया जो पहले नहीं था और ऊंची जातियों के दबदबे से नीची जातियों के समर्थ लोग भी असहाय थे. आज जो उन से कांवड़ ढुलवा रहे हैं उन ऊंची जातियों वालों से पूछा जाना चाहिए कि ये सुधार उन की मांग क्यों नहीं थे?

वेश्यावृत्ति कानून

भारतीय पौराणिक साहित्य में अप्सराओं और वेश्याओं का खुला उल्लेख है जो विशिष्ट लोगों को सेवाएं देती थीं. इतिहास में दर्ज है कि हर फौज के साथ वेश्याओं का दल चलता था. यहां विधवाओं और नीची जातियों की औरतों के लिए वेश्यालयों के दरवाजे हर समय खुले ही नहीं रहते थे, ‘पाकीजा’, ‘गंगूबाई’, ‘हीरामंडी’ जैसी फिल्मों से उन्हें समयसमय पर सहज ग्लैमराइज भी किया जाता रहा है. सआदत हसन मंटो ने कई कहानियां इन्हीं पर 1947 से पहले लिखी थीं.

हमारे यहां देवदासी प्रथा धर्म के नाम पर ही चलती रही है और इसीलिए हिंदू कट्टर नेताओं की ओर से इस में सुधार करने की कोशिश कभी नहीं की गई. कांग्रेस को न जाने क्या सूझा कि उस ने बेबात में पुरुषों के ‘सांस्कृतिक अधिकार’ पर ‘इम्मोरल ट्रैफिक एक्ट (अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम) 1956’ के जरिए रोकथाम लगाने का, आधाअधूरा ही सही, प्रयास किया.

इस का उद्देश्य अनैतिक कार्यों के व्यवसायीकरण और महिलाओं की तस्करी को रोकना है. यह सैक्स वर्क से जुड़े कानूनी ढांचे को रेखांकित करता है. हालांकि यह अधिनियम खुद सैक्स वर्क को अवैध घोषित नहीं करता लेकिन यह वेश्यालय चलाने पर रोक लगाता है. वेश्यावृत्ति में शामिल होना कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त है, लेकिन लोगों को बहलाफुसला कर यौन गतिविधियों में शामिल करना अवैध माना जाता है. अधिनियम के अनुसार, वेश्यावृत्ति व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए व्यक्तियों का यौन शोषण या दुर्व्यवहार है.

इस अधिनियम की धारा 5 के तहत वेश्यावृत्ति के लिए व्यक्तियों को खरीदने, उन्हें प्रेरित करने या ले जाने वालों को दंडित किया जाता है. सजा में 3-7 साल का कठोर कारावास शामिल है. इस कानून में असल में वेश्यावृत्ति की कमाई पर जीवनयापन करने पर दंड का प्रावधान है. शायद उम्मीद थी कि इस से व्यापार खत्म हो जाएगा तो इस व्यवसाय में औरतों को धकेला नहीं जाएगा पर ऐसा हुआ नहीं.

आज भी धड़ल्ले से औरतों के बाजार चल रहे हैं. वेश्यावृत्ति के लिए किसी व्यक्ति को खरीदना, प्रेरित करना या ले जाने पर दंड का प्रावधान काम का नहीं रहा. यह समाज में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन तो नहीं ला पाया पर बड़े पैमाने पर चल रहे व्यापार में पुलिस का मोटा हिस्सा बंध गया और औरतों की खरीदफरोख्त में उन की राय भी शामिल हो गई.

संघीय ढांचे का निर्माण

स्टेट रिऔर्गेनाइजेशन एक्ट 1956 से भाषाओं के आधार पर देश के राज्यों का गठन और पुरानी रियासतों के भाषाई आधार पर बने राज्यों का गठन आम जनता के लिए एक समाज सुधार का काम था क्योंकि इस के बाद रियासतों वाले इलाकों का विलय राज्यों में हो गया और नेताओं की एक नई पौध पैदा हुई, जिस ने राज्यों के लिए काम करना शुरू किया. आंध्र प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र में कुछ मिश्रित इलाकों के भेदभाव चलते रहे और राज्यों के तोड़ने का काम देर तक होता रहा पर संविधान का 7वां संशोधन और 1956 कानून मूलरूप से देश में राज्यों का जिस तरह गठन कर गया, उस ने देश को एक करने में सहायता की है.

इस पुनर्गठन से बहुत सी टेढ़ीमीढ़ी लाइनों को भी ठीक किया गया और रियासतों के बीच रियासतों को भी समाप्त किया गया. 500 से ज्यादा टुकड़ों को 14 राज्यों और 6 केंद्रशासित क्षेत्रों में बदलने और प्रक्रिया को सफल बनाने में कांग्रेसी नेताओं ने जो काम किया उस का लाभ आज भी देश उठा रहा है.

इसी पुनर्गठन से राज्यों में भाषाओं का विकास हुआ और इंग्लिश की महत्ता के बावजूद स्कूलों, कालेजों व सरकारी दफ्तरों में अपनी भाषा बोलने वालों की सुविधा बढ़ गई. पहले 1947-1950 के बीच रियासतों का विलय और फिर रियासतों का राज्यों में विलय कठिन काम थे पर नेहरू सरकार ने बिना ढोल पीटे और बिना जुलूस निकाले, थालीताली पीटे इस काम को पूरा किया और आज इस पुनर्गठन के खिलाफ कोई बड़ा विवाद नहीं है.

भाषाई सिनेमा और साहित्य, तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़, बंगला में अगर पनपा तो उस के पीछे भाषाई आधार पर बनी राज्यों की सरकारों का गठन, उन्हें प्रोत्साहन देने की नीतियां, स्कूलों में भाषा को वहीं की बोली को माध्यम बनाना रहा. आज नागपुर के मराठीभाषी संघ के कार्यकर्ता अगर कट्टर हिंदू धर्म फैला पा रहे हैं तो उस की वजह भाषाई राज्य है जहां से उन्होंने उस भाषा के प्रचारक ढूंढे़ और धार्मिक कट्टरता ही सही, अपना धार्मिक व्यवसाय जम कर फैलाया.

संघीय शासन

श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय संघीय प्रणाली के विरुद्ध थे और उन के इस बारे में स्पष्ट लिखित विचार मौजूद हैं पर कांग्रेस सरकार ने देश को राज्यों में तो बांटा और पूरे देश को एक डोर में पिरोने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग कानून 1956 भी बनाया. गांव निकाला, राज निकाला की पौराणिक हिंदू धार्मिक चक्रवर्ती राज्य बनने की नीति के उलट राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम 1956 भारतीय संसद का एक कानून है जो देश को जोड़ने वाले राजमार्गों को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित करने तथा इन राजमार्गों के विकास, रखरखाव और प्रबंधन का प्रावधान करता है.

यह कानून राष्ट्रीय राजमार्गों के संबंध में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और अन्य संबंधित प्राधिकरणों की शक्तियों व कर्तव्यों को निर्धारित करता है, आज आम व्यक्ति किसी भी इलाके में बिना रोकटोक जा सकता है. संविधान का अनुच्छेद 302 भी यही अधिकार देता है.

इस कानून के लागू होने से देश को कई तरह के फायदे हुए, जिन से देश के आर्थिक विकास में बढ़ोतरी हुई. अलगअलग शहरों को आपस में और बंदरगाहों से जोड़ने से व्यापार बढ़ा और आर्थिक विकास हुआ. रेल के पतन और सड़क के विस्तार से औटोमोबाइल की मांग बढ़ी. इस अधिनियम के तहत सड़क और पुल संबंधी तकनीकी जानकारी का विकास हुआ. पौराणिक कथाओं में कहीं भी मार्ग बनाने की बात नहीं कही गई है और उस समय भारतीय जनसंघ वही सोचता था जो पुराणों का हिस्सा हो.

स्वास्थ्य पर कानून

बढ़ती जनसंख्या और नईनई बीमारियों के पता चलने पर स्वास्थ्य सेवाओं पर बो?ा बढ़ने लगा और उस ओर कदम उठाने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) अधिनियम 1956 को संसद में पास किया गया. आजकल नरेंद्र मोदी अकसर दावे करते रहते हैं कि उन्होंने 10-20 एम्स बना दिए हैं जिन के बारे में खोजबीन में पत्रकार लगे रहते हैं पर यह काम शुरू तो कांग्रेस सरकार ने बिना मांगे किया था.

भोर समिति की सिफारिशों को मिला कर एक प्रस्ताव बनाया गया था जिसे न्यूजीलैंड की सरकार का समर्थन मिला. उस से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की आधारशिला 1952 में रखी गई और 1956 में संसद के एक कानून के माध्यम से एम्स को एक स्वायत्त संस्थान के रूप में स्वास्थ्य देखभाल के सभी पक्षों में उत्कृष्टता को पोषण देने के केंद्र के रूप में कार्य करने हेतु अधिकृत किया गया.

कहते हैं कि पहला अस्पताल कोलकाता (तब के कैलकटा) में बनना था लेकिन वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधानचंद्र रौय ने अड़ंगा लगा दिया और फिर एम्स दिल्ली में बना. इस के बाद एम्स के हवाले से अगले करीब साढ़े 4 दशकों तक सन्नाटा छाया रहा.

2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत देश में एम्स जैसे और कई नए संस्थान बनाने की बात की. आज हर गरीब का सपना एम्स में इलाज कराना है और मैडिकल के हर छात्र का सपना एम्स में पढ़ने का है.

औफिशियल लैंग्वेजेज एक्ट

स्वतंत्रता के प्रारंभिक दिनों में कई कानून ऐसे भी बने जिन का कोई विशेष असर नहीं पड़ा. औफिशियल लैंग्वेजेज एक्ट 1963 के बावजूद आज भी देशभर में इंग्लिश में ही काम हो रहा है और कानून के सहारे जनता की भाषा को सरकार और अमीरों की भाषा बनाने का प्रयास बेकार गया. संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 में भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का आदेश दिया गया था पर यह कागजी शेर साबित हुआ है. आज देशभर में महंगे इंग्लिश मीडियम स्कूल दिख रहे हैं.

संविधान की व्यवस्था बढि़या थी कि इंग्लिश 1965 तक ही रहेगी पर अब यह व्यवस्था पक्की है. इंग्लिश न जानने वाले कई प्रधानमंत्रियों (चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी, नरेंद्र मोदी) के बावजूद इंग्लिश का दबदबा बना रहा. आम जनता के 2 बंटवारे हो गए हैं, एक इंग्लिश जानने-पढ़ने व लिख सकने वाला और दूसरा भारतीय भाषाओं को जानने वाला. पहला वर्ग दूसरे पर भारी है. यह वर्णव्यवस्था और जाति व्यवस्था का ही एक रूप है. जो शक्ति पहले हिंदू राजाओं के युग में संस्कृत जानने वाले ब्राह्मणों की होती थी वह आज इंग्लिश जानने वाले नेताओं, प्रशासकों, व्यापारियों और नीतिनिर्धारकों की है.

कानून क्यों

आज हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पार्टियों का उद्देश्य अब सिर्फ राज करना रह गया है और समाज में जो परिवर्तन आ रहा है वह शिक्षा, टैक्नोलौजी और दुनियाभर के विचारों से भी आ रहा है. सरकार कई बार एक कदम आगे चलती है तो कभी जबरन कानून बनाती है क्योंकि जनता मांग कर रही है. जनता को न केवल जानने का हक है बल्कि उस की जिम्मेदारी है कि वह यह देखे कि सरकार के कानून हैं क्या और वे कैसे समाज को बदल सकते हैं.

आमतौर पर सरकारें जनता को नियंत्रण में रखने के लिए कानून बनाती हैं. नेहरू के जमाने से मोदी के जमाने तक बीसियों कानून ऐसे बने हैं जिन्होंने जनता को जंजीरों से बांधा है. इस शृंखला में हम उन कानूनों की बात कर रहे हैं जिन से सरकार को बहुत कम जबकि जनता को काफी ज्यादा लाभ हुआ है.

यह शृंखला पढ़ते रहिए ताकि आप सरकार से उन कानूनों की मांग कर सकें जो आप को हक दिलाएं, जीवन सुचारु रूप से चलाने में सहायक हों.

-अगले अंक में जारी…

सड़ते शहर, निकम्मे अफसर और बेबस नागरिक

अपने एक लेख में एक विदेशी अमेरिकी नागरिक मार्क मैनसन लिखता है कि जैसे ही आप का प्लेन दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरता है, एक हलकी नारंगी सी हवा आप को घेर लेती है. (यह नारंगी हवा भगवा सरकार की भगवा बातें कतई नहीं हैं. मार्क बात गंदी और बदबूदार हवा की कर रहा है. यह बात दूसरी कि वह नहीं जानता कि पिछले 40 वर्षों से यह हवा भगवा गैंग ने शहरों में ही नहीं, शहरियों के दिमागों में भी भर दी है).

मार्क मैनसन ‘अ डस्ट ओवर इंडिया’ शीर्षक से प्रकाशित अपने लेख में लिखता है, ‘‘प्लेन के नीचे शैंटी टाउन दिखते हैं जिन का ट्रैफिक बिखराव पूरे लैंडस्केप को भर देता है. पूरे माहौल में स्मौग, स्मोक, कैमिकल भरा पौल्यूशन, डस्ट इस तरह फैला रहता है कि आप कहीं जाओ, ये आप का पीछा नहीं छोड़ेंगे.’’ मार्क मैनसन आगे लिखता है कि उस ने 40 से ज्यादा देश देखे हैं, गलत वजह से भारत सब से गहरा असर छोड़ता है, सही वजह से नहीं.

जो भी विदेशी पर्यटक इस बारे में अगर कुछ और कहता है तो समझ उस की आंखों पर पट्टी बंधी हुई है. भारत विरोधाभासों का देश है. एक ही शहर की एक सड़क पर आप को उपलब्धियां दिख जाएंगी, मौन्यूमैंट्स दिख जाएंगे, भयंकर अवसाद पैदा करने वाली गरीबी दिख जाएगी, क्रूरता दिख जाएगी. आप कहीं चले जाओ, दिल्ली से कितनी ही दूर चले जाओ, यह गैस, यह बदबू आप को सवाल पूछने पर मजबूर कर देती है कि यहां के लोग असल में करते क्या हैं कि स्थिति इस कदर बेकाबू है.

एक और विदेशी पर्यटक जूरे स्नोज एक्स पर लिखती है कि इनक्रेडिबल इंडिया की इनक्रेडिबिलिटी केवल एक मामले में है, वह है इस के प्रदूषित शहर. वह बताती है कि उस ने मुंबई, हैदराबाद, मैसूर, कोयंबटूर, कर्नाटक के तटीय इलाके, पश्चिमी घाट, मैंगलोर, बेंगलुरु, भोपाल, खजुराहो, ओरछा, ?ांसी, ग्वालियर, आगरा, न्यू दिल्ली देखे. अभी शायद और बहुतकुछ देखने को है, वह मानती है और उस ने सब जगह एक चीज देखी- कूड़ा, कागज, फेंका हुआ खाना, कुत्ते, गाय और लोग, सब बिखरे, सड़ते.

वर्णव्यवस्था की देन गंदगी

पर्यटकों को आजकल अपनी बात कहने के अवसर मिलते हैं. वे इंटरनैट पर अपने अनुभव सांझा करते रहते हैं और इसीलिए डर्टी इंडिया के बारे में जानने के लिए इंटरनैट पर बहुत सा मैटर है और सब में एक ही बात है, भारत के शहर डर्टी नहीं, डिस्गस्टिंग हैं. साउथ इंडिया गंदा है तो नौर्थ इंडिया, सीधे शब्दों में, सड़ा हुआ.

शहरों की गंदगी वास्तव में हमारे चरित्र, संस्कार, धर्म, समाज, संस्थाओं, शासन की पोल खोलती है. यह बताती है कि विश्वगुरु, सब से प्राचीन धर्म, सब से प्राचीन ज्ञान, पौराणिक युग की गाथाएं कितनी कपोलकल्पित हैं. हमारी सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि सफाई का काम शूद्र भी नहीं, बल्कि अछूत करते हैं जिन्हें अब सम्माननीय शब्द शैड्यूल कास्ट के नाम से जाना जाता है.

शहरों को साफ करने के अफसर

चाहे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य हों, यह पक्का है झाड़ू उठाने वाले और कूड़े के ट्रक ढोने वाले केवल और केवल एससी जमातों के मिलेंगे. उन्हें खुद गंद में रहने को मजबूर किया गया है. हिंदू राजाओं ने उन्हें गांवों से बाहर जानवरों की तरह रहने और गांव के भीतर की साफसफाई जबरन करने पर मजबूर किया.

जो लोग 50 वर्ष पहले तक घरों का मैला सिर पर रिसती टोकरी में ले जाने के आदी हों उन पर शहरों की सफाई का जिम्मा डाला जाएगा तो हाल यही होगा जो आप आगे पढ़ेंगे. आज भी सीवर ऐसे बन रहे हैं जो मानव मल के साथ पत्तियां, बोतलें, पत्थर, सीमेंट डाल दिए जाने पर ब्लौक हो जाते हैं और उन्हें खोलने या चालू करने के लिए गंदे पानी में ये लोग डुबकी लगाते हैं. उन के बलबूते शहर साफ रह ही नहीं सकते.
शहरों की गंदगी संस्कार का मामला है, संस्कृति का मामला है, धर्म का मामला है, प्रशासन का अकेला मामला नहीं है. वर्णव्यवस्था ने हमें गंदगी में रहने को मजबूर ही नहीं किया है, उस पर गर्व करने को प्रोत्साहन भी दिया है.

हमारे शहर कितने गंदे हैं, इस के लिए बात शुरू करते हैं मुंबई से, देश की कमर्शियल राजधानी, जहां अरबपतियों की लाइन लगी है. देश के नीतिनिर्धारक यहीं रहते हैं. वे यहां की गगनचुंबी इमारतों में रहते हैं और रौल्स रौयस गाडि़यों में चलते हैं. खरबों का खेल यहां के स्टौक एक्सचेंज में होता है.

दुनिया के सब से गंदे शहरों की लिस्ट में शामिल सपनों का शहर कहलाने वाला मुंबई शहर जहां एक तरफ अपनी ग्लैमर और फिल्मी दुनिया के लिए प्रसिद्ध है, वहीं एक सर्वे के अनुसार, 5 प्रमुख पर्यटन स्थलों में मुंबई सब से गंदे शहरों की लिस्ट में शामिल भी है.

मुंबई में रास्ते पर बेइंतहा गड्ढे हैं. उन्हीं गड्ढों में भरा गंदा पानी, कई सारे इलाकों की तंग गलियों में कचरे के ढेर, बीचबीच में झोपड़पट्टी वगैरह मुंबई के एक दूसरे पहलू को दर्शाते हैं जिस का नाम गरीबी है. गरीबी के चलते आम लोग ऐसी गंदगी में रहने को मजबूर हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है मायानगरी कहलाने वाली मुंबई नगरी में इतनी गंदगी की भरमार का जिम्मेदार कौन है- मुंबईवासी या महानगरपालिका?

मोदी सरकार को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वच्छता अभियान की मुहिम में नेता से ले कर अभिनेता तक हरकोई हिस्सा बना. इस के चलते कई अभिनेताओं ने मौजूदा सरकार को खुश करने के लिए शूटिंग स्थल और रास्तों पर झाड़ू तक लगाई.

इतना ही नहीं, मुंबई में स्वच्छता अभियान को और ज्यादा तूल देने के लिए प्लास्टिक की थैलियां तक बंद की गईं ताकि रास्ते में कचरा न हो.
महानगरपालिका ने नागरिकों पर कंट्रोल करने के लिए रास्ते पर थूकने और कचरा फेंकने पर दंड भी लगाया लेकिन मुंबईवासियों ने, हम नहीं सुधरेंगे बोल कर, अपना खुद का उलटा अभियान चला रखा है कि हर जगह थूकने के लिए है, कूड़ा फेंकने के लिए है जिस वजह से कई जगहों पर कचरों के ढेर दिखाई देते हैं.

मुंबईवासियों द्वारा सड़क पर कचरा फेंकना अगर उन का जन्मसिद्ध अधिकार है तो भी, मुंबईवासियों के अनुसार, कचरे के ढेर को उठाने की जिम्मेदारी महानगरपालिका की ही है पर न तो वह कचरा उठाने को ले कर पूरी तरह सक्रिय है और न ही रास्ते पर कचरों के डब्बे ठीक तरीके से लगाने में रुचि लेती है.

बीएमसी यानी ब्रहन्मुंबई म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन ढंग से एक नाली भी साफ नहीं करवाती जिस की वजह से नालों में कचरा जमा होने की वजह से बारिश आने पर या वैसे भी नाले जाम हो जाते हैं और उन का गंदा पानी अकसर सड़कों पर आ जाता है.

यह पानी लोगों के घरों तक भी पहुंच जाता है. चारों तरफ कचरे से घिरी तंग गलियों में बनी झोपड़पट्टियों में भी वह पानी घुस जाता है जो बच्चे से बूढ़े तक को उक्त पानी में तैरने को मजबूर कर देता है. बावजूद इस के, सरकार गंदगी दूर करने या उस पर नियंत्रण करने के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं करती. बस, हर साल सिर्फ आश्वासन ही दिया जाता है और दोष नागरिकों के सिर पर मढ़ दिया जाता है.

बारिश के मौसम में रास्तों पर इतना पानी भर जाता है कि चलना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में कई जगहों पर गटर के ढक्कन न होने की वजह से लोग उस बिना ढक्कन के गटर में गिर कर मौत के घाट उतर जाते हैं. 2023 में एक डाक्टर बिना ढक्कन वाले गटर में गिर गया और वह कहां गया, किसी को पता ही नहीं चला. उस की लाश तक नहीं मिली.

धारावी चाल की गंदगी में जीते हजारों लोग

मुंबई में झुग्गी बस्ती धारावी पर कई फिल्में तक बनी हैं. यह एक ऐसी गंदी बस्ती है जहां गंदगी होने के साथ कई गैरकानूनी काम और अपराध भी अंजाम पाते हैं. धारावी पर केंद्रित कई फिल्में बनी भी हैं, जैसे ‘स्लम डौग मिलेनियर’, रजनीकांत की ‘काला’, रणवीर सिंह की ‘गली बौय’, ‘धारावी’ और ‘धारावी बैंक’. रितिक रोशन अभिनीत ‘अग्निपथ’ फिल्म की शूटिंग भी धारावी में हुई है.

मुंबई शहर के सब से गंदे स्टेशन

उतरते ही मुंबई में गंदे स्टेशनों के दर्शन होते हैं. उन के बाहर कचरे के ढेर देखने को मिलते हैं. कल्याण, कुर्ला और ठाणे जैसे स्टेशनों के बाहर फैले कचरे के ढेर की वजह से राहगीरों का चलना मुश्किल हो जाता है. मुंबई शहर में एक और जगह गंदगी के लिए प्रसिद्ध है जिस का नाम है बांद्रा की खाड़ी. बांद्रा की खाड़ी में मुंबई शहर का सारा कचरा जमा होता है. ऐसे में वहां से गुजरना भी मुश्किल और बदबूदार होता है. यहां तक कि लोकल ट्रेन से सफर करते समय जब बांद्रा की खाड़ी आती है, ट्रेन में मौजूद राहगीर अपनी नाक पर रूमाल रखने में जरा भी देरी नहीं करते.

सरकार की मुंबई स्वच्छ अभियान की मुहिम

राष्ट्रीय स्तर पर सफाई में पिछड़ने के बाद बीएमसी ने मुंबई को स्वच्छ रखने के लिए स्वच्छता अभियान की मुहिम शुरू की है. खबरों के अनुसार सड़कों, चौक और महत्त्वपूर्ण स्थानों पर 720 क्लीनअप मार्शल तैनात किए गए हैं जो सार्वजनिक जगह पर गंदगी फैलाने वालों पर 200 से 1,000 रुपए तक का दंड लगाएंगे, ताकि राहगीर गंदगी फैलाने से पहले दस बार सोचें.

मुंबई पर भी और शहरों की तरह मंदिरों ने गंदगी फैलाने में पूरा असर डाला है. हर मंदिर के आसपास गंदगी का आलम रहता है. गणपति जैसे त्योहारों में लगे झंडे, फूलतोरण, पोस्टर और जुलूस के रास्ते में लोगों का जमा पेशाब-मल (पब्लिक टौयलेट कहां है?) आदि कोई निर्माण नहीं बल्कि स्थिति का नाश करते हैं.

इस से यही निष्कर्ष निकलता है कि मुंबई की खराब व्यवस्था के जिम्मेदार मुंबईवासी और बीएमसी दोनों ही हैं. जब तक ये दोनों अपनी जिम्मेदारी नहीं महसूस करेंगे तब तक मुंबई शहर स्वच्छ और सुंदर नहीं हो पाएगा. शिवसेना, जो म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन पर वर्षों से राज कर रही है, अयोध्या जा कर बाबरी मसजिद गिरा सकती है लेकिन अपनी सरकार होने के बावजूद मुंबई शहर को दर्शनीय नहीं बना सकती क्योंकि यह ‘पुण्य’ का काम नहीं है.

मानसून की बारिश के बाद देश के महानगर, शहर और कसबे बदहाल हैं, शहरों की कुव्यवस्था की एक तरह से पोल खुल रही है. यातायात जाम, सड़कों, गलियों और घरों, दुकानों, स्कूलों और विधानसभाओं तक यानी हर जगह पानी ही पानी. सीवर जाम, नालियां ठप हैं.

स्कूलों की छुट्टी कर दी जाती है, औफिस, व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रखने पड़ते हैं. सड़कें, पुल, मकान ढह रहे हैं. अनेक मौतें हो रही हैं.

कमोबेश हर शहर का यही हाल है. शासन-प्रशासन पंगु दिखाई देते हैं. शहर सड़ रहे हैं, हमें न शहर बनाने आते हैं और न ही उन्हें संभालना. शासन, प्रशासन शहरों का प्रबंधन कर पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं.

मुंबई ऐसे ही गंदा नहीं है. मुंबई की गंदगी में सैकड़ों अपने हाथ साफ करते हैं, धोते हैं. वे ऊंचे अपार्टमैंटों में रहते हैं. 2024-25 में मुंबई पर 59,954 करोड़ रुपए खर्च होंगे. ये रुपए मुंबई के सिर्फ मेयर, उन की चुनी हुई टीम नहीं खर्चेगी, इस में अफसरों से ज्यादा कौंट्रैक्टरों का योगदान होगा जो बीएमसी से अरबों लेंगे और पूछेगा कोई नहीं.

1,400 करोड़ रुपयों का टैंडर तो इस बात के लिए दिया गया है कि घरों से कूड़ा उठाया जाए. यह कौंट्रैक्टर हर घर से भी वसूलेगा, यह भी पक्का है. कहने को यह कौंट्रैक्टर नालियां साफ करेगा, सड़कों पर झाड़ू लगाएगा.

स्लम एरिया से कूड़े के निबटान के लिए 350 करोड़ रुपए दिए जाएंगे. एक एक्टिविस्ट अनिल गलापनी का कहना है कि एक ठेकेदार पर निर्भर रहना गलत होगा. उस की बात सही है. 1,800 करोड़ रुपए लूटने के लिए कौंट्रैक्टरों ने जम कर टैंडर तो भरे पर पता चला कि सब के सब खुद धब्बेदार थे, सब पर बेईमानियों के आरोप थे. मुंबई शहर की आफत सिर्फ उस के नागरिक या उस की जनसंख्या नहीं, उन की गंदी आदतें भी नहीं हैं बल्कि इस की वजह सिर्फ और सिर्फ नौकरशाही, नेताशाही हैं.

पर्यटन के लिए मशहूर शहर जयपुर का भी यही हाल है

जयपुर में ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह खराब है. जयपुर में परकोटे के भीतर की अनेक कालोनियों में पहले घरों की दहलीज ऊंची होती थी और सड़कें नीचे लेकिन इन वर्षों में सड़कें ऊपर हो गईं और घर नीचे चले गए. लिहाजा, सड़कों का पानी घरों में घुस जाता है. लोग ऊपर की मंजिल पर चले जाते हैं और पंप मंगवा कर पानी निकालना पड़ता है. परकोटे के अंदर की सभी सड़कें, कालोनियां गणगौरी बाजार, ब्रह्मपुरी, सुभाष चौक, जोरावर सिंह गेट, कंवर नगर, चांदी की टकसाल आदि में पानी भर गया.

यहां चौमूं पुलिया से ले कर हरमाड़ा तक करीब 8-10 किलोमीटर तक की सड़क पर इतना पानी भर जाता है कि नाव तैरा दी जाए. शहर की उत्तरी आबादी की दर्जनों कालोनियों को जोड़ने वाली यह मुख्य सड़क है. यही नहीं, शहर के बाहर बनी नई कालोनियों का भी बहुत बुरा हाल है. अजमेर रोड स्थित कमला नेहरू नगर, वैशाली नगर, मानसरोवर, विवेक विहार, महेश नगर, मालवीय नगर, तिलक नगर, मुरलीपुरा, सिरसी रोड, झाटवाड़ा, निवारू रोड के आसपास की कालोनियों, जो पिछले 15-20 सालों में विकसित हुई हैं, की हालत भी बारिश होते ही बदतर दिखती है. घरों, दुकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों को लाखोंकरोड़ों का नुकसान उठाना पड़ता है.

असल में शहर की स्थानीय व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के उद्देश्य से सरकार ने कुछ समय पहले जयपुर को 2 भागों हैरिटेज सिटी और ग्रेटर जयपुर में बांट दिया था.

शहर की नई बसावट का जिम्मा जयपुर विकास प्राधिकरण के अलावा प्राइवेट बिल्डरों के हाथों सौंप दिया गया था. सरकार की नाकामी के चलते बिल्डरों, बेईमान, निक्कमों, करप्ट, नौकरशाहों और राजनीतिबाजों के गठजोड़ ने यह काम हथिया लिया. आधे लोग तो नारे लगाने और शहर को भगवा रंग में पोतने में लगे रहते हैं.

शहर बसाने की जिम्मेदार संस्थाओं के पास नगर नियोजन का कोई सुव्यवस्थित, वैज्ञानिक तरीका नहीं है. न ही इन के पास शहरों को बसाने का ज्ञान है. अराजक, अव्यवस्थित, अवैध बस्तियों, कालोनियों का जाल बिछता जा रहा है. प्राइवेट बिल्डर बिना प्लानिंग के अवैध कालोनियां बसाने में लगे हैं.

अव्यवस्थित माहौल

जयपुर के इतिहास के अनुसार यह देश का पहला योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया शहर था. राजा जयसिंह ने जयपुर को 9 आवासीय खंडों में बसाया था. शहर इस तरह नियोजित था कि नागरिकों को मूलभूत आवश्यकताओं के साथ अन्य किसी प्रकार की दिक्कत न हो. सुचारु पेयजल व्यवस्था, बागबगीचे, कलकारखाने आदि के साथ वर्षा के पानी का संग्रह और निकास का सुव्यवस्थित प्रबंध कराया गया. लेकिन आज हालात बदतर दिखाई देते हैं.

पिछले दिनों यहां विधानसभा के चुनाव होते ही हवामहल क्षेत्र से विधायक बालमुकुंदाचार्य चौपड़ के बाजार में अपने समर्थकों के साथ आ गए और अधिकारियों को सख्त हिदायत दी कि परकोटे के भीतर अव्यवस्थित, अवैध रेहडि़यां, थडि़यां हटाई जाएं. खासतौर से विधायक खुले में बिकने वाले मीटमांस की दुकानों को हटाना चाहते थे.

आबादी में ये दुकानें इसलिए खुल गईं क्योंकि हम ने शहर, कालोनियां बसाते वक्त इस बात का ध्यान ही नहीं रखा कि कालोनियों, महल्लावासियों के खानेपीने की छोटीमोटी दुकानें बना दें. शहरों के नियोजन के लिए सरकार ने कानून भी बनाए हैं लेकिन न तो ये कानून कारगर हैं और न ही शहर बनाने वाले किन्हीं नियमों का पालन करते हैं.

दिल्ली दिल वालों की नहीं, दिल दहलाने वालों की

देश का दिल दिल्ली शहर मुख्यतया 2 हिस्सों में है- नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली. इस के दूसरे हिस्से यानी पुरानी दिल्ली का हाल भी बेहाल है.
देश की राजधानी दिल्ली आम आदमी पार्टी की भारी बहुमत से चुनी राज्य सरकार, म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन और भारतीय जनता पार्टी के कठपुतले उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना के पेंच में फंसी है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सिर्फ बयानों के आधार पर नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने जेल में बंद कर रखा है.

कौर्पोरेशन की सुध लेने वाला आज कोई नहीं है. पहले कांग्रेसी जमाने में कुछ अच्छा था, यह भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि कौर्पोरेशन का हर अफसर और चुना हुआ हर पार्षद हर शहर की तरह, शहर की गंदगी की नहीं, अपनी जेब की चिंता करता है. दिल्ली सरकार का बजट 71 हजार करोड़ रुपए है और कौर्पोरेशन का 8 हजार करोड़ रुपए. दिल्ली को साफ करना नहीं, बजट को साफ करना नेताओं और अफसरों का पहला ‘कर्तव्य’ है. इसे हर शहर के नेता और अफसर इस देश में बखूबी निभाते हैं.

दिल्ली भारत का शायद वह एकलौता शहर है जो पूरी तरह आधुनिक होने के बावजूद अपने इतिहास की डोर से जुड़ा हुआ है, जिस की झलक आज भी दिल्ली के लजीज खानपान और ऐतिहासिक इमारतों में नजर आती है. जब भी दिल्ली के इतिहास की बात होती है तो ज्यादातर लोगों को केवल मुगलकाल याद आता है.

मुगलों की कई पीढि़यां दिल्ली के सिंहासन पर बैठीं और उन्होंने दिल्ली में बेहतरीन निर्माण कार्य करवाए. मुगलकाल में बनी शानदार इमारतें और खूबसूरत बाग आज भी दिल्ली की पहचान हैं. हालांकि मुगलों के अलावा भी कई मुसलिम और हिंदू शासक दिल्ली की गद्दी पर बैठे.

11वीं शताब्दी आने तक दिल्ली की समृद्धि को देखते हुए दिल्ली पर बाहरी आक्रमण होने लगे जिस के फलस्वरुप मोहम्मद गौरी ने दिल्ली पर अपनी सत्ता स्थापित की और मरने से पहले कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली सौंप दी. इस के बाद दिल्ली पर बाहरी मुसलिम शासकों का ही राज रहा. 16वीं शताब्दी में बाबर ने भारत पर आक्रमण किया और मुगल साम्राज्य की स्थापना की.

आखिरी मुगल सुल्तान बहादुर शाह जफर के बाद वर्ष 1857 से हुकूमत ब्रिटिश शासन के हाथ आ गई. 1857 में कलकत्ता को ब्रिटिश भारत की राजधानी घोषित किया गया लेकिन 1911 में दिल्ली को ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाया गया. इस के बाद नई दिल्ली क्षेत्र भी बना, जिस में वायसराय हाउस, नौर्थ ब्लौक, साउथ ब्लौक, पार्लियामैंट और कनाट प्लेस आदि बने. उस समय और आज भी कनाट प्लेस खरीदारी का प्रमुख केंद्र है.

गंदगी का ढेर दिल्ली

1947 में भारत की आजादी के बाद दिल्ली को आधिकारिक रूप में भारत की राजधानी घोषित कर दिया गया. 1,483 वर्ग किलोमीटर में फैली दिल्ली जनसंख्या की दृष्टि से भारत का दूसरा सब से बड़ा महानगर है जिस में करीब 2 करोड़ लोग निवास करते हैं.

दिल्ली ने वैभव भी देखा है और आपदाएं भी देखी हैं. दिल्ली कई बार उजड़ी और कई बार बसी है. मुगलकाल और ब्रिटिशकाल में दिल्ली बहुत खूबसूरत और साफसुथरी रही है. शाही इमारतें, मकबरे, ?ारने और बागान दिल्ली की शान की कहानी कहते थे. साफसुथरी सड़कें थीं और सड़कों पर वाहन कम थे. लिहाजा, प्रदूषण कम था और सीवर सिस्टम भी बेहतर था. बरसात में कभी सड़कें पानी से लबालब नहीं होती थीं, जैसी कि आज जरा सी बारिश में हो जाती हैं.

मौजूदा समय में भी दिल्ली में 350 से अधिक गांव हैं. इन सभी गांवों का अपना समृद्ध इतिहास और सरस-संस्कृति है. समय की रफ्तार के साथ यहां पर आधुनिकता का तड़का लगा और जिस के बाद गांव का मिजाज अब शहरों की तरह हो गया है.

अब भी कुछ जगहों को गांवों के नामों से ही जाना जाता है. मगर इन गांवों में चूंकि सीवर सिस्टम नहीं था और कच्चे मकान बेतरतीब ढंग से बने हुए थे, लिहाजा इन गांवों का शहरीकरण होने के बाद भी यहां ड्रेनेज सिस्टम ठीक से नहीं बन पाया और बेतरतीब कच्चे मकान जब पक्के बहुमंजिला मकानों व इमारतों में तबदील किए गए तो सीधी सड़कें, नालियां, गटर आदि का खयाल नहीं रखा गया.

जिस ने जहां जैसा मन हुआ बिना नक्शा पास कराए अपना मकान खड़ा कर लिया. नतीजा यह हुआ कि अब ये इलाके दमघोंटू गंदगी और जलभराव के शिकार हैं. सड़कें ऊबड़खाबड़ हैं. संकरी गालियां कूड़े के ढेर से पटी रहती हैं. दिल्ली का सब से बड़ा दाग हैं स्लम और कूड़े के वे पहाड़ जो निरंतर आसमान छू रहे हैं.

दिल्ली की जनसंख्या 1971 की 40 लाख से बढ़ कर आज लगभग 2 करोड़ से अधिक पहुंच गई है, जिस से यह दुनिया का दूसरा सब से अधिक आबादी वाला और सब से गंदे शहरों में शामिल शहर बन गया है. दिल्ली को पेरिस बनाने का दावा करने वाली केजरीवाल सरकार राजधानी के लोगों को आम सुविधाएं देने में असफल साबित हो रही है.

सीवर व्यवस्था बदहाल

दिल्ली का शायद ही कोई ऐसा इलाका बचा हो जहां के लोग सीवर जाम और सीवर ओवरफ्लो की समस्या से न जूझ रहे हों. समस्याओं के समाधान की बात हो तो सिर्फ दिखावा और लीपापोती होती है. जनता को स्थायी समाधान नहीं मिलता.

दिल्ली में सीवरेज निस्तारण की उचित व्यवस्था न होना जहां परेशानी का सबब है वहीं यमुना को प्रदूषित करने का भी प्रमुख कारण यही है.
यह भी अफसोसनाक है कि दिल्ली में 22 स्थानों पर स्थित कुल 37 सीवरेज शोधन संयंत्रों में से मात्र 18 चालू हालत में हैं और उन में से भी सिर्फ 3 ही अपनी पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं. यही नहीं, सूबे में 7,200 किलोमीटर लंबे सीवरेज नैटवर्क में से अब तक 100 किलोमीटर तक को ही दुरुस्त करने या गाद हटाने का काम किया जा सका है. काम की सुस्त रफ्तार दर्शाती है कि सीवरेज सिस्टम को दुरुस्त करने को ले कर अब तक गंभीरता नहीं दिखाई गई है.

दशकों पुराना ड्रेनेज सिस्टम इतना बदहाल हो चुका है कि अब वह राजधानी की सवा 2 करोड़ से ज्यादा आबादी के जलमल का भार सहने की क्षमता खो चुका है. फिर भी दिल्ली उसी 48 वर्षों पुराने ड्रेनेज सिस्टम पर आश्रित है.

दिल्ली में जलनिकासी के लिए 4 फुट से ऊपर के 713 नाले हैं जबकि 4 फुट से कम के 21 नाले हैं. इन की सफाई 2 चरणों में होती है. सफाई का पहला चरण मानसून से पहले शुरू होता है, जिस में इन नालों को पूरी तरह से साफ किया जाता है. सफाई का दूसरा चरण तब शुरू होता है जब मानसून का सीजन खत्म होता है.

यमुना के फ्लड एरिया की चौड़ाई हुई कम

20-22 साल पहले तक यमुना जितना बरसाती पानी कैरी कर सकती थी, उतना अब नहीं कर सकती है. ऐसा इसलिए कि यमुना के फ्लड प्लेन एरिया में कई रेलवे ब्रिज और फ्लाईओवर बन गए हैं. ऐसे कुल 22 पुल और फ्लाईओवर बने हैं जिन से फ्लड प्लेन एरिया की चौड़ाई कम हो गई है. पहले यमुना फ्लड प्लेन एरिया 2 से 2.5 किलोमीटर तक था. अब कई जगहों पर फ्लड प्लेन एरिया 800 मीटर तक ही बचा है.

वजीराबाद से ओखला बैराज तक यमुना फ्लड प्लेन एरिया 9,700 हेक्टेयर था. 22 किलोमीटर तक फ्लड प्लेन एरिया में से डीडीए के पास सिर्फ 3,638 हेक्टेयर ही रह गया है. इस में से भी 1,000 हेक्टेयर फ्लड प्लेन एरिया में स्थायी स्ट्रक्चर बन गए हैं जिन में अक्षरधाम मंदिर 100 हेक्टेयर, खेलगांव 63.5 हेक्टेयर, यमुना बैंक मैट्रो स्टेशन डिपो 40 हेक्टेयर, शास्त्रीपार्क डिपो 70 हेक्टेयर में बने हैं.

आईटी पार्क, दिल्ली सचिवालय, मजनू का टीला और अबू फजल एनक्लेव यमुना फ्लड प्लेन एरिया में ही हैं. इस से यमुना की चौड़ाई कम हो गई है और पहले जितना बरसाती पानी यमुना में जा सकता था, अब उतना नहीं जा सकता. इसलिए पिछली बार जब यमुना में अधिक पानी आया तो वह बैकफ्लो होने लगा और आईटीओ, विकास मार्ग, राजघाट व रिंग रोड पर कई दिनों तक नालों से पानी बैकफ्लो होता रहा. बरसाती पानी यमुना तक ले जाने के लिए पहले 201 नैचुरल ड्रेन थे जिन में से 50 गायब हो चुके हैं. नालों के गायब होने से भी दिल्ली में जलभराव की समस्या गंभीर हो रही है.

बेसमैंट में पानी भरने से 3 स्टूडैंट्स की मौत

राष्ट्रीय राजधानी के पौश इलाके ओल्ड राजेंद्र नगर में अगस्त 2024 में बेहद दर्दनाक घटना घटी. एक नामी आईएएस कोचिंग सैंटर के बेसमैंट में अचानक नाले का गंदा पानी घुसने से 3 स्टूडैंट्स की उस में डूब कर मौत हो गई, मृतकों में 2 छात्राएं और एक छात्र था. जिस समय कोचिंग सैंटर के बेसमैंट में पानी घुसा वहां करीब 35 छात्रछात्राएं मौजूद थे. बेसमैंट में लाइब्रेरी बनी थी तो वे वहीं पढ़ाई कर रहे थे. जिस जगह बेसमैंट में यह लाइब्रेरी बनी थी वहां आनेजाने का सीढि़यों के जरिए एक ही रास्ता था. दिल्ली में हुई इस दर्दनाक घटना पर छात्र कहते हैं कि हर साल बारिश में उन्हें सड़क पर घुटनेभर पानी से हो कर कोचिंग जाना पड़ता है.

कचरे के बोझ में दबी दिल्ली

दिल्ली में 3 जगहों पर कूड़े के पहाड़ हैं, जिन्हें लैंडफिल साइट कहा जाता है- गाजीपुर, ओखला, भलस्वा. इन लैंडफिल साइटों पर शहरभर का कूड़ाकचरा इकट्ठा किया जाता है. इन की ऊंचाई कुतुबमीनार के बराबर पहुंच चुकी है. इन पहाड़ों पर कई बार आग लगती है और इस से राजनीति भी गरम हो जाती है.

इन पहाड़ों से निकलने वाली जहरीली गैस से आसपास के इलाके प्रदूषित हो जाते हैं. अब तो ये कूड़े के पहाड़ दर्शनीय स्थान बनने लायक हैं और नए संसद भवन, इंडिया गेट की जगह लोगों को आधुनिक भारत के नायाब नमूने गाजीपुर और भलस्वा के पहाड़ कूड़े के, देखने आना चाहिए. यह दिल्ली की ‘महान उपलब्धि’ है.

दिल्ली की 1,400 किलोमीटर लंबी मुख्य सड़कों की सफाई आज भी हाथ में ?ाड़ू लिए कर्मी करते हैं. ये अब अपने साथ एक पहिए वाली सफाई करने की मशीन भी नहीं रखते क्योंकि कौर्पोरेशन उन की मरम्मत नहीं कर पाता था. मशीनें सिर्फ 70 हैं जिन में से भारी बदबू आती है और कितनी मरम्मत के लिए खड़ी रहती हैं, पता नहीं. सैकड़ों पुरजे वाली इन मैकेनिकल स्वीपर्स को मेंटेन करना मुश्किल काम है. 70-75 लाख की एक मैकेनिकल स्वीपर एक छोटे से पुरजे के खराब होने पर खड़ी हो जाती है तो उस की देखरेख वाला कोई नहीं होता. खरीद में भारी बेईमानी की जाती है.

दिल्ली की हालत दूसरे शहरों से अलग नहीं है. कच्ची गलियां, खराब सड़कें, टूटे ओवरब्रिज, रैड लाइटों के अभाव या खराब होना, मैले मकान, सड़े स्कूल और सरकारी व निजी भवन शहर को दूसरे शहरों की तरह गंदा कर रहे हैं.

74वें संविधान संशोधन के अनुसार, मैट्रोपोलिटन सिटी में मैट्रोपोलिटन प्लानिंग कमेटी के गठन की व्यवस्था की गई है जो स्थानीय निकायों द्वारा तैयार योजनाओं को मैट्रोपोलिटन क्षेत्र में एकीकृत करेगी. मैट्रोपोलिटन शहर 10 लाख से अधिक आबादी वाले कहलाते हैं. 3 लाख से ऊपर वाले शहरों के लिए वार्ड कमेटी के गठन की व्यवस्था की बात कही गई है जो नगरपालिका संबंधी कार्यों को देखेगी.

सरकार की नीति-अनीति

भारत के पहले नैशनल कमीशन औन अर्बनाइजेशन ने 1988 में शहरी नीति पर एक रिपोर्ट सौंपी थी. उस के बाद 1992 में 72वां एवं 73वां संशोधन लाए गए जिन्हें पंचायती राज एक्ट एवं नगर पालिका एक्ट के नामों से जाना जाता है. इन का उद्देश्य आर्थिक एवं स्थानीय नियोजन द्वारा ग्रामीण एवं शहरों का विकास करना था. लेकिन भूमि राज्यों का विषय होने के कारण कुछ ही राज्यों ने इसे अपनाया. इस से इस कानून के क्रियान्वयन में ढिलाई आ गई.

2015 में केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी योजना शुरू की थी, जिस का उद्देश्य 5 वर्षों में 100 शहरों की स्थिति में सुधार लाना था. इसी वर्ष आधुनिक व्यवस्था के साथ अधिक से अधिक शहरों के विकास के लिए अमृत योजना यानी अटल मिशन फौर रेजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफौर्मेशन लाई गई. उस के बावजूद समस्या से नजात नहीं मिल पाई.

प्राचीन काल में लोग शहरों, कसबों को हम से अधिक अच्छे से बसाना और सुव्यवस्थित रखना जानते थे. उन का नगर नियोजन वैज्ञानिक, सुव्यवस्थित, सुंदर होते थे. सिंधु घाटी सभ्यता के शहरों के नियोजन की खासीयत यह थी कि इस की सीधी रेखाएं और नियमितता थी जो स्थिरता और व्यवस्था की प्रतीक थी. तब शहर का एक व्यवस्थित मजबूत लेआउट होता था.

गुजरात का अधिकांश हिस्सा दक्षिण की ओर भावनगर के पास लोथल से ले कर उत्तर की ओर कच्छ के रण के पास धोलावीरा तक सिंधु घाटी सभ्यता क्षेत्र का हिस्सा रहा है. यहां उस युग की बस्तियां मौजूद थीं. उन बस्तियों की योजना ज्यादातर ग्रिडिरोन पैटर्न पर बनाई गई थी और उन में सीवरेज सिस्टम, स्टौर्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम और जल वितरण प्रणाली जैसी बुनियादी संरचनाएं थीं.

देश पर 5वीं शताब्दी से ले कर 19वीं शताब्दी तक की अवधि के दौरान कई साम्राज्यों और राजवंशों ने शासन किया. उन में सोलंकी राजवंश और मुगल काल प्रमुख थे. उन के काल में हालांकि शहर की योजना में आक्रमणकारियों के हमलों से नागरिकों की रक्षा के लिए रक्षात्मक योजना का दृष्टिकोण था लेकिन इस ने लोगों के विभिन्न वर्गों और उन की गतिविधियों को मान्यता दी, जो नियोजन और क्षेत्र विकास में बुनियादी कारक थे. इसे विभिन्न क्षेत्रों के रूप में कहा जा सकता है, जो बस्ती की सभी दिशाओं से सीधी पहुंच वाले उपयुक्त स्थानों पर स्थित थे. प्रमुख प्रशासनिक क्षेत्रों के साथसाथ व्यापारिक क्षेत्रों को इस तरह से स्थित किया गया था कि वे शहर के साथसाथ भीतरी इलाकों की जरूरतों को पूरा कर सकें.

नगर नियोजन का उद्देश्य

तेजी से बढ़ते शहरीकरण के इस दौर में शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में समस्याओं के साथ भविष्य के शहरी विकास के लिए योजना बनाना बहुत जरूरी है. नगर नियोजन की शुरुआत मानव बस्तियों की उत्पत्ति के साथ हुई. पूरी दुनिया में मानव बस्तियां नदी के किनारे या नदी के आसपास स्थित थीं. वे बस्तियां वाणिज्य, व्यापार, उद्योग, सामाजिक संबंध और प्रशासन से जुड़ी थीं, जिन्होंने बदले में नगर नियोजन के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. मानव बस्तियों का विकास बेहतर जीवनस्तर की दिशा में पहला कदम था. ये शुरुआती मानव बस्तियां अब आज के कसबों और शहरों में तबदील हो गई हैं.

नगर नियोजन का मुख्य उद्देश्य जनता को बेहतर जीवनस्तर प्रदान करना है. 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में तकनीकी विकास हुआ, जिस के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर बड़े पैमाने पर पलायन हुआ. उद्योगों में वृद्धि के साथ ही ?ाग्गी?ांपडि़यों का भी जन्म हुआ.

शहरीकरण और उस से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों के तेजी से बढ़ने के कारण शहरी भूमि की कमी हो गई, जिस से विकास परिदृश्य प्रभावित हुआ और साथ ही, लोगों के जीवनस्तर में भी गिरावट आई. इसलिए, अव्यवस्थित और अनियोजित विकास को नियंत्रित करने, नियोजित विकास को प्रोत्साहित करने और स्वस्थ पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए नगर नियोजन की अवधारणा विकसित की गई.

1884 में बंबई, बंगलौर और मद्रास के लिए स्वच्छता आयोग की स्थापना की गई. सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश प्रदान करने के लिए एक आयोग की स्थापना की गई थी.

1898 में बंबई राज्य में सुधार ट्रस्ट की स्थापना की गई. इसे बौम्बे इम्प्रूवमैंट ट्रस्ट के नाम से जाना जाता था. इस ट्रस्ट का गठन संवैधानिक प्रावधान के तहत वित्तीय रूप से लाभदायक योजनाओं को लागू करने के लिए किया गया था. ट्रस्ट ने नए क्षेत्रों के विकास को बढ़ावा दिया, लेकिन पुराने क्षेत्र के सुधार की उपेक्षा की. इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा का मुख्य उद्देश्य पूरा नहीं हुआ.

1915 में बौम्बे राज्य में बौम्बे टाउन प्लानिंग एक्ट लागू किया गया. इस एक्ट के तहत कई टाउन प्लानिंग योजनाएं तैयार की गईं और उन्हें लागू किया गया. बौम्बे, पुणे और अहमदाबाद को टाउन प्लानिंग योजनाओं के जरिए विकसित किया गया. इसी तरह गुजरात नगर नियोजन और शहरी विकास अधिनियम 1976 को अधिनियमित किया गया.

शहरी आबादी में हर साल 3 से 4 फीसदी की दर से वृद्धि होती है. इसलिए भविष्य की आबादी को उचित रूप से समायोजित, आवास के लिए प्रावधान करने, परिवहन और श्रमिकों की आवश्यकता को पूरा करने और औद्योगिक विकास को सही दिशा में पूरा करने के लिए योजना बनाना बहुत जरूरी है.

सरकारी कानूनों और अनगिनत योजनाओं के बावजूद भारत के शहर सड़ रहे हैं, जनता बेबस है. सरकारें विकास के थोथे दावे कर रही हैं.
भोपाल का हाल बुरा दूसरे मुख्य शहरों में जो कभी साफसफाई के लिए जाने जाते थे, उन में से भोपाल एक है.

भोपाल के बारे में एक दिलचस्प वाकेआ अब से कोई 7 वर्षों पहले का है, जब शिवराज सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. 25 अक्तूबर, 2017 को वे अमेरिकी यात्रा पर थे. वाशिंगटन डीसी में रसेल सीनेट हौल में पंडित दीनदयाल उपाध्याय फोरम के शुरू होने पर अपने भाषण में शिवराज सिंह ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा था कि अगर किसी राज्य को आगे बढ़ाना है तो बुनियादी ढांचे के बिना वह आगे नहीं बढ़ सकता. इस के लिए हम ने सड़कें बनवाईं. सड़कें भी ऐसी कि जब मैं यहां वाशिंगटन में एयरपोर्ट पर उतरा और सड़कों पर चल कर आया तो मुझे लगा कि मध्य प्रदेश की सड़कें यूएस से बेहतर हैं.

इधर मध्य प्रदेश में लोगों ने यह सुना तो हरकोई भौचक रह गया. नेता अकसर ?ाठ बोलते हैं, यह अंदाजा तो सभी को था लेकिन शिवराज सिंह इतने बड़े ?ाठेले हो चुके हैं, इस की उम्मीद किसी को न थी. जल्द ही लोगों ने उन का मखौल उड़ाना शुरू कर दिया. सोशल मीडिया पर तो टूटीफूटी खराब, खस्ताहाल और गड्ढेदार सड़कों के फोटो यूजर्स ने जम कर शेयर किए कि देखो, हमारी सड़कें यूएस से बेहतर हैं.

भोपाल के कोलार रोड के एक दुकानदार इकबाल ने तब कहा था कि मध्य प्रदेश की सड़कें और अमेरिका से बेहतर… क्या मजाक कर रहे हो. क्या यहां गड्ढों को आप देख नहीं सकते. मेरी दुकान के ठीक बाहर ही गड्ढे में 2 दर्जन लोग गिर चुके हैं. क्या शिवराज सिंह को यह नहीं दिखता? तब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस में थे, उन्होंने तंज कसते हुए ट्वीट किया था, ‘‘कृपा कर के कोई उन की आंखें खोलने में मदद करे. श्रीमान चौहान, अपनी आंखें खोलिए और हकीकत देखिए.’’

हाल वाकई बुरे और चिंतनीय हैं. भोपाल की सड़कें और सीवरेज सिस्टम दोनों फेल हैं. बरसात के दिनों में पानी नदी सरीखा बहता है और आएदिन के जाम किसी सुबूत के मुहताज नहीं. जुलाई के महीने में जब बारिश ढंग से शुरू ही हुई थी तब 11 तारीख को पुराने भोपाल में भोपाल लौज के नजदीक ड्यूटी पर जा रहा एक सिपाही अपनी बाइक सहित गड्ढे में जा गिरा था. मजेदार बात तो यह है कि 10 जुलाई को ही भोपाल की महापौर मालती राय ने इस इलाके का निरीक्षण किया था लेकिन उन्हें ये गड्ढे नजर नहीं आए थे.

शहर के सब से बड़े कारोबारी इलाके एमपी नगर और सब से व्यस्ततम बाजार न्यू मार्केट की सड़कें जरा सी बारिश से लबालब हो जाती हैं. होशंगाबाद रोड पर भी नजारा तालाब सरीखा नजर आता है. पौश इलाकों शाहपुरा, गुलमोहर और शिवाजी नगर की सड़कों पर तो चलना मुहाल हो जाता है.

नगरनिगम जिम्मेदार

हकीकत में नगरनिगम ज्यादा जिम्मेदार है जो हर साल सीवेज पर करोड़ों रुपए खर्चता है लेकिन सालदरसाल पानी का भराव उस के दावों को खोखला साबित कर देता है. 289 किलोमीटर में फैले भोपाल की आबादी 25 लाख का आंकड़ा छू रही है. लेकिन यह आंकड़ा देख हैरानी होती है कि हालफिलहाल शहर के 23 फीसदी इलाकों में ही सीवेज नैटवर्क बन पाया है, बाकी 77 फीसदी इलाके नारेबाजी के.

इसी साल जुलाई में 19 तारीख को तेज बारिश हुई थी तो पूरा शहर अस्तव्यस्त हो कर त्राहित्राहि कर उठा था. सड़कों पर पानी इतना भर गया था कि लोगों का पैदल चलना भी मुहाल हो गया था. बरसात से पहले नगरनिगम आयुक्त हरेंद्र नारायण और महापौर मालती राय ने दावे किए थे कि अब की बार भोपाल में कहीं भी जलभराव नहीं होगा. लेकिन उन के दावे नए सहित पुराने भोपाल में पानी के साथ बहते दिखे थे जब सैफिया कालेज रोड पर अलमारियां, पेटियां और ट्रंक भी बह गए थे.

तब कोई पूछने वाला नहीं था और न ही कोई जवाब देने वाला था कि हर साल जो 100 करोड़ रुपए ड्रेनेज और सीवेज के नाम पर खर्चे जाते हैं वे इस साल भी क्या पानी के साथ बह गए.

पिछले 20 सालों में भोपाल नगरनिगम एक हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा की राशि सीवेज और ड्रेनेज पर खर्च कर चुका है. लेकिन पानी है कि सलीके से बहने का नाम ही नहीं लेता.

नगरनिगम क्या करता है, इस पर नजर डालें तो समझ आता है कि वह नेताओं की तरह सिर्फ वादे और दावे करता है. शहर में लगभग 789 नाले हैं जिन पर 25 हजार से भी ज्यादा अतिक्रमण हैं. इस का जिम्मेदार कौन है?

भोपाल के एक टाउन प्लानर सुयेश कुलश्रेष्ठ कहते हैं कि शहर में कालोनियों का निर्माण मनमरजी से किया जा रहा है. इन पर रोक लगाई जानी चाहिए और भूमि विकास नियम के मुताबिक निर्माण होना चाहिए. निमानुसार घर सड़क से डेढ़ फुट ऊंचे होने चाहिए. ऊंचाई कम होने से नई कालोनियों में भी जलभराव होता है.

भोपाल के 789 नालों पर अगर 25 हजार नाजायज कब्जे हैं जिन की वजह से 70 फीसदी नालों की सफाई नहीं हो पाती तो इस का जिम्मेदार और जवाबदेह नगरनिगम ही होता है.

लखनऊ की खस्ता हालत

‘मुसकराइए कि आप लखनऊ में हैं’ रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट पर इस स्लोगन को पढ़ कर जैसे ही आगे बढ़ेंगे, आप का सामना सड़क जाम, जलभराव और गंदगी से होगा. केंद्र सरकार के स्वच्छता सर्वेक्षण में 2022 में लखनऊ 17वें नंबर से फिसल कर 2023 में 44वें नंबर पर पहुंच गया. बागों का शहर अब जलभराव, गंदगी, सड़क पर जाम, पेयजल की कमी से जू?ा रहा है. मायावती सरकार में अंबेडकर पार्क और शहर का विस्तार किया गया. समाजवादी पार्टी की सरकार में शहर को हराभरा बनाने के लिए जनेश्वर मिश्रा और राम मनोहर लोहिया जैसे पार्क बने. 7 साल से भाजपा सरकार में शहर विस्तार की केवल कागजी योजनाएं तैयार होती रहीं. एक भी नई कालोनी, अस्पताल विश्वविद्यालय नहीं बना. बागों का शहर सड़तेबिगड़ते शहरों की कतार में खड़ा है. जमीनमकान लेने वालों को धोखाधड़ी का शिकार होना पड़ता है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की गिनती बेहद खूबसूरत शहरों में की जाती है. तसवीरों में सुदंर दिखने वाला शहर पूरी तरह से खस्ताहाल है. जानकीपुरम, आशियाना और गोमती नगर जैसी नई बसी कालोनियों का बुरा हाल है. बरसात के दिनों में सड़कों पर पानी भर जाता है. देखने को यहां पर चौड़ीचौड़ी सड़कें हैं. अच्छी कोठियों जैसे दिखने वाले मकान हैं. जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं. इन कालोनियों में 7 हजार रुपए स्क्वायर फुट से 10 हजार रुपए स्क्वायर फुट जमीन की कीमत है. इन को बनाने का काम लखनऊ विकास प्राधिकरण और आवास विकास परिषद द्वारा किया गया है. इस के बाद यहां के रहने वाले परेशान और बेबस हैं.

अगर लखनऊ की इन 3 पौश कालोनियों में रहने वालों का यह हाल है तो इस के अलावा जो कालोनियां बनी हैं उन का और भी बुरा हाल है. इन में राजाजीपुरम, इंदिरानगर, महानगर, हजरतगंज, अमीनाबाद, नखास, चौक, निशातगंज कल्याणपुर, मोहबुल्लापुर, त्रिवेणीनगर जैसे तमाम महल्ले हैं जिन की सब से बड़ी परेशानी बरसात के पानी के निकासी की है. सड़क के किनारे बनी नालियों में पानी, कीचड़ और गंदगी भरी रहती है. इस से पानी में मच्छर पनपते हैं जो बीमारी का कारण बनते हैं. सड़कें ऊंची हो जा रही हैं. नालियों से पानी नहीं निकलता, इस का सब से बड़ा कारण शहर में सड़क, पानी की निकासी और सीवर के काम की खराब प्लानिंग है.

हैदर कैनाल बन गया गंदा नाला

आज के मुकाबले अगर 200 साल पहले की सोच को देखें तो उस समय पानी के निकास की अच्छी व्यवस्था थी. उस की प्लानिंग सही दिशा में थी. लखनऊ शहर में बरसात के पानी की निकासी के लिए हैदर कैनाल बनी थी जो राजाजीपुरम के पास से शुरू हो कर हजरतगंज के पास गोमती नदी में मिलती है. बरसात के पानी की निकासी के लिए बनी यह हैदर कैनाल आज गंदा नाला बन कर रह गई है. उस समय की सोच थी कि यह हैदर कैनाल बरसात का पानी बहाने का काम करेगी. इस के जरिए कानपुर के पास की गंगा नदी का पानी गोमतीनदी में भेजने की योजना थी. नदियों को नदियों से जोड़ कर पानी के सही उपयोग की चाहत थी.

200 वर्षों पहले 1814 में नवाब गाजीउद्दीन हैदर अवध के वजीर बने थे. लखनऊ व आसपास रहने वाले किसानों ने मांग की कि खेती के लिए पानी नहीं मिलता है. लखनऊ के पास 2 नदियां हैं- एक गोमती दूसरी सई नदी. ये दोनों ही नदियां बरसाती हैं जिन में बरसात के दिनों में पानी रहता है. लखनऊ से दूर गंगा नदी थी. ऐसे में गाजीउद्दीन हैदर ने सोचा कि यदि एक नहर बना कर गंगा का पानी गोमती तक पहुंचा दिया जाए तो पानी की परशानी दूर हो जाएगी. 1815 में हजरतगंज की तरफ से हैदर कैनाल की खुदाई शुरू हुई. 1830 तक लगभग 13 किलोमीटर नहर की खुदाई कर यह सई नदी तक पहुंच गई. इस में करीब 17 लाख रुपए का खर्च आया.

पुराने लखनऊ शहर की परेशानी गंदगी और सड़कों पर लगने वाला जाम है. चौक, अमीनाबाद, गणेशगंज, यहियागंज, नखास, कैसरबाग में आधी से अधिक सड़कों पर अतिक्रमण हो गया है. दुकानें लग गई हैं. नालियां बंद हैं, जिस की वजह से न तो इन जगहों पर सही तरह से आनाजाना हो सकता है और न ही गंदगी दूर होती है. जब सड़क बनती है तो उस के ऊपर से ही बनाना शुरू कर दिया जाता है. सड़कें घरों से एक से दो मीटर तक ऊंची हो गई हैं, जिस से सड़क और नाली का पानी घरों में घुस जाता है.

बरसात ने खोली पोल

2 अगस्त की दोपहर 12 बज कर 30 मिनट से 2 बजे तक डेढ़ घंटे की तेज बारिश हुई. बरसात ने लखनऊ की पोल खोल दी. पूरा शहर तालाब जैसा दिखने लगा. नगरनिगम मुख्यालय में पानी घुस गया. सैकड़ों फाइलें भीगने से खराब हो गईं. अफसरों को पैंट ऊपर कर पानी से हो कर जाना पड़ा. 100 वर्षों से अधिक पुरानी नगरनिगम की दूसरी मंजिल पर रिकौर्डरूम है. बिल्डिंग की छत जर्जर है, जिस के कारण रिकौर्डरूम उस कमरे में है जहां पर कर्मचारी बैठते हैं. वहां पर उसी तरह बारिश हो रही थी जैसे बाहर हो रही थी. इस से यहां पर रखे रजिस्टर और रिकौर्ड की नकल के कागजात भीग गए. कर्मचारी भी भीग गए. जलभराव को ले कर नगरनिगम के सारे दावे फेल हो गए. जलभराव को रोकने की तैयारी पानी में बह गई. नगरनिगम न खुद जलभराव से बच पाया और न ही शहर को बचा पाया.

मैनचेस्टर बन गया सब से गंदा शहर

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर की गिनती आज देश के सब से गंदे शहर के रूप में की जाती है. अंगरेजों के समय में यह ‘मैनचेस्टर औफ ईस्ट’ कहा जाता था. अब होने वाले सर्वे में कानपुर की गिनती देश के सब से गंदे शहरों में की जाती है. आज भी कानपुर में आईआईटी, एचबीटीआई, चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और जीएसवीएम मैडिकल कालेज जैसे संस्थान हैं जिन की पहचान पूरी दुनिया में है. आंकड़े बताते हैं कि कानपुर के शहरियों के फेफड़ों की क्षमता 11 फीसदी कम हो गई है. फैक्ट्रियों और टेनरियों के कचरे ने गंगा को प्रदूषित कर दिया है. औद्योगिक प्रदूषण ने हवाओं में जहरीले तत्त्व घोल दिए हैं. शहर में दाखिल होते ही बजबजाते कचरे से निकला बदबू का भभका मुंह से टकराता है.

इस के लिए कहीं न कहीं कानपुर में रहने वाले भी जिम्मेदार हैं. कचरा तो हमारे ही घरों से निकलता है. पांडु नदी अब गंगा के लिए खतरा बन चुकी है. इस के जरिए पनकी क्षेत्र की राख, कैमिकलयुक्त कचरा गंगा में आ रहा है. यह नदी उन्नाव और फतेहपुर जिले के बीच में स्थित बक्सर के पास गंगा में मिलती है, जहां गंगा सब से गंदी है. नालों से रोजाना 50 करोड़ 40 लाख लिटर (544 एमएलडी) कचरा गंगा में गिर रहा है.

2023 में कानपुर नगरनिगम का बजट 21 अरब 73 करोड़ रुपए और जलकल का बजट 3 अरब 63 करोड़ रुपए पास हुआ था. इस के अलावा, मार्च 2024 में नगरनिगम ने 181 करोड़ रुपए की वसूली की है. इस के तहत, हर पार्षद को विकास कार्य कराने के लिए 34 लाख रुपए दिए गए थे. करोड़ों के बजट के बाद भी शहरों की दशा में सुधार नहीं हो रहा है.

उत्तर प्रदेश में शहरों के निर्माण का काम 2 संस्थाएं करती हैं. आवास विकास परिषद और विकास प्राधिकरण. आवास विकास परिषद पूरे प्रदेश के हर शहर में कालोनी बनाती है. इस का मुख्यालय राजधानी लखनऊ में है. विकास प्राधिकरण हर जिले के नाम से होते हैं. इन के मुख्य कार्यालय हर शहर में होते हैं. ये कालोनी बसाने के बाद नगरनिगम को दे देते हैं. नगरनिगम टैक्स वसूल कर शहर की देखभाल करता है. पंचायती राज कानून लागू होने के बाद जनता द्वारा चुने प्रतिनिधि, जिन को पार्षद कहते हैं, देखभाल करते हैं. ये नगरनिगम या नगर पंचायत में वही स्थान रखते हैं जो विधानसभा में विधायक और संसद में सांसद रखता है.

यही हालत वाराणसी, आगरा, गोरखपुर और बरेली जैसे बड़े शहरों की है. यहां तक कि दिल्ली एनसीआर में बसे गाजियाबाद, नोएडा जैसे शहरों में भी अव्यवस्था देखने वाली है. बड़ेबड़े अपार्टमैंट अंदर तो साफ दिखते हैं लेकिन जैसे ही सड़क किनारे निकलेंगे तो बजबजाती सड़क दिखेगी. गंदगी ही नहीं, यातायात और अपराध भी खूब होते हैं.

वेनिस शहर एक उदाहरण

शहरों की अच्छी व्यवस्था का एक शानदार उदाहरण इटली का वेनिस है जिस के उत्तरी इलाके में समुद्र के नीचे 2,500 साल पुरानी रोमन साम्राज्य के समय बनाई गई एक सड़क से ले सकते हैं. माना जाता है कि उस समय वेनिस का यह हिस्सा पूरी तरह से सूखा था, जबकि आज समुद्र के पानी में डूबा हुआ है. सड़क की खोज 1980 के दशक में की गई थी. रोमन साम्राज्य के समय बनी यह सड़क वेनिस के बाहरी लैगून के उत्तरी इलाके में स्थित ट्रीपोर्टी चैनल में मौजूद है.

जबकि अयोध्या में जिस राममंदिर के विवाद को सुलझने के लिए खुदाई की गई उस के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले. केवल राममंदिर का ही नहीं, अयोध्या में राजा दशरथ के महल का भी कोई हिस्सा नहीं मिला. अयोध्या में और कोई बस्ती 2500 साल थी. 5,000 साल पहले से आज तक इस का कोई सुबूत नहीं मिला जैसा रोमन सड़कों का मिल रहा है.

वेनिस स्थित इंस्टिट्यूट औफ मैरीन साइंस की जियोफिजिसिस्ट फैंटिना मद्रीकार्डो ने कहा कि यह इलाका सदियों पहले सूखा था. उस समय यह मुख्य सड़कमार्ग हुआ करती थी. जिस से कई गलियां और रास्ते निकलते थे. यहां पर व्यापारिक क्षेत्र होने का अनुमान लगता है.

अयोध्या में भले ही आर्कियोलौजिकल सुबूतों में भव्य शहर का पता नहीं चला है लेकिन रोमन साम्राज्य में बनी सड़कें अभी भी साफतौर पर दिखती हैं. उन से सड़कों की डिजाइन, पानी निकासी और पानी की सप्लाई को सम?ा जा सकता है. कई शहरों में आज भी इन का उपयोग हो रहा है.

सड़कें ही नहीं, रोमन साम्राज्य की कलाकृतियां और प्राचीन वस्तुएं भी समुद्री मार्गों व द्वीपों पर मिली हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि रोमन साम्राज्य के कई शहरों में जब रोमन कला की सड़कों की जांच की गई तो पता चला कि 2 ऊपरी परतें एकदम चिकनी हैं जबकि अंदर की तरफ नुकीली और खुरदुरी, ताकि निचला हिस्सा मजबूती से जमीन को पकड़ सके. जो पत्थर प्राचीन रोमन सड़कों में लगाए जाते थे, उन्हें रोमन बैसोली कहा जाता है.

रोमन राजाओं ने भारी सार्वजनिक भवनों का निर्माण किया. उन्होंने आवास और सार्वजनिक स्वच्छता का पूरा ध्यान रखा. सार्वजनिक और निजी स्नानघर व शौचालय, हाइपोकोस्ट, मीका ग्लेजिंग, ओस्टिया एंटिका और गरम व ठंडा पानी पाइप इस के उदाहरण हैं.

वास्तुकला रोमन ने कंक्रीट के साथ आसानी से उपलब्ध पत्थर को ईंट के विकल्प के रूप में प्रयोग करना शुरू किया था. बड़े भवनों में मेहराब और गुंबदों को बनाया गया.

रोमन साम्राज्य में कई सड़कों का निर्माण, जैसे सेवोवेट औफ सेगोविया, पोंट डु गार्ड और रोम के 11 मुख्यालयों की सड़कों व कई पुलों आदि का निर्माण किया गया था. इन में से स्पेन में मेरिडा में पुएंटे रोमानो और प्रोवंस, वैनला रोमेन में पंट जूलियन और पुल अभी भी दैनिक उपयोग में हैं.

ये बातें इसलिए बताई जा रही हैं कि हम अपने ‘महान’ धर्म का ढोल खूब पीटते हैं कि हमारा धर्म रोमन साम्राज्य व ईसाई धर्म से पहले का है.
धर्म में भी धांधली इधर अपने अयोध्या को लें. अयोध्या में वित्तीय वर्ष साल 2023 और 24 में राममंदिर में 776 करोड़ रुपए खर्च हुए. आगामी वित्तीय वर्ष में टोटल मिला कर 850 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान राम मंदिर ट्रस्ट ने लगाया है. 363 करोड़ 34 लाख रुपए लोगों ने दान भी दिए हैं. राममंदिर के संपूर्ण निर्माण में अभी तक लगभग 1,800 से 1,900 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं.

इतना पैसा खर्च करने के बाद भी अयोध्या में नई बनी सड़कें पहली बरसात में ही धंस गईं. आज आधुनिक से आधुनिक टैक्नोलौजी से बने शहर समस्याओं से घिरे हैं. बरसात में पानी का जलभराव पूरे शहर में हो जाता है. उत्तर प्रदेश के अयोध्या में नवनिर्मित रामपथ पर कई जगह सड़क धंस गई, जिस से बारिश में जलभराव हो गया. इस की वजह से आनेजाने वालों को भारी परेशानी हुई.

23 जून और 25 जून को बारिश के बाद रामपथ के साथ लगभग 15 गलियों और सड़कों पर पानी भर गया. सड़क के किनारे के घरों में भी पानी भर गया था. इस 14 किलोमीटर लंबी सड़क के कई हिस्से भी कई जगहों पर धंस गए. उत्तर प्रदेश सरकार ने साल 2024-25 के लिए 7,36,437 करोड़ रुपए का बजट पेश किया है. इस बजट में अयोध्या के सर्वांगीण विकास के लिए 100 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है.

राममंदिर के कारण अयोध्या को भव्य बनाने के लिए बड़े इंतजाम किए गए. राज्य सरकार ने इस मामले में गुजरात के अहमदाबाद स्थित ठेकेदार भुवन इन्फ्राकौम प्राइवेट लिमिटेड को नोटिस जारी किया है. रामपथ की सब से ऊपरी परत निर्माण के तुरंत बाद क्षतिग्रस्त हो गई थी, जो उत्तर प्रदेश सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता वाले कार्य में लापरवाही को दर्शाता है. यह केवल एक शहर की बात नहीं है. भारत के छोटेबड़े हर शहर की कुछ यही कहानी है.

नगर निगमों में बेईमानी का राज

एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने अहमद नगर के म्यूनिसिपल कमिश्नर पंकज जावले को एक बिल्डर से 8 लाख रुपए की रिश्वत लेने के आरोप में जून 2024 में पकड़ा.

मुंबई से सटे थाने में एसीबी इंस्पैक्टर विजय कावले ने एक व्यक्ति को झाठे मामले में फंसाने के लिए कथित तौर पर दस्तावेज तैयार करने के आरोप में 5 नगर निगम कर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया.

वर्ष 2023 में महाराष्ट्र सरकार ने स्पैशल इन्वैस्टिगेशन टीम गठित की जो 2019 से 2022 के बीच हुए 12,024 करोड़ रुपए के खर्च में की गई गड़बड़ी की जांच कर रही है.

सूरत म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन में

10 लाख रुपए की रिश्वत लेने के आरोप पर सितंबर 2024 में 2 पार्षदों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए. मार्च 2023 में अहमदाबाद के वार्ड इंस्पैक्टर को रिश्वत के मामले में गिरफ्तार किया गया. दिल्ली के निकट गुरुग्राम में 50 मामलों में म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन के अधिकारी विजिलैंस विंग के रिकौर्ड नहीं दे रहे. जो 2 वर्षों से चल रहे हैं.

दिल्ली में एक मकान मालिक से घर के निर्माण के लिए 15 हजार रुपए की रिश्वत की मांग को ले कर एंटी करप्शन ब्यूरो ने भजनपुरा इलाके के एक बेलदार और गौरव गर्ग, जूनियर इंजीनियर को पकड़ा.

कौर्पोरेशनों के पास हक है, जिम्मेदारियां हैं या नहीं, यह पता नहीं. इन कौर्पोरेशनों को चलाने वाले नेता और अफसर से आखिरी सफाई कर्मचारी तक रिश्वत बटोरने में लगे रहते हैं, उन के लिए यही पुण्य का काम है. पोस्ट पर बने रहने के लिए जब पूजापाठ है तो जनता की खुशी की क्या जरूरत है.

देशभर में शहरों में जमीनों के दाम आसमान तक पहुंच रहे हैं. किराए के मकान भी नहीं मिलते. इस के बाद भी गांव से लोग शहरों में रहने आ रहे हैं, जिस से गंदगी और अव्यवस्था दोनों फैल रही हैं. इस को सुधारने के लिए न तो सरकार के पास कोई प्लान है और न जनता के पास तमीज.

दिल्ली से नसीम अंसारी कोचर, मुंबई से आरती सक्सेना, जयपुर से जगदीश पंवार, भोपाल से भारत भूषण श्रीवास्तव, लखनऊ से शैलेंद्र सिंह.

शांतिदूत या अ(शांतिदूत)

भाजपा नेता व देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को शायद विश्वगुरु साबित करने के लिए रूस और यूक्रेन के बीच सम झौता कराने को 24 अगस्त, 2024 को कीव पहुंच गए. वे वहां राष्ट्रपति व्लोदोमीर जेलेंस्की से मिले. उस स्मारक को देखा जहां रूसी मिसाइल अटैक के कारण अस्पताल में बच्चे मरे थे. वह अटैक तब हुआ था जब वे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मास्को में गले मिल रहे थे और फिर शांति की अपीलें कीं मानो वे कोई महात्मा गांधी हों जिन की बातों को दुनिया उन के जीतेजी सुनती थी और आज याद करती है.

व्लोदोमीर जेलेंस्की ने 2 दिनों बाद मोदी पर खुल्लमखुल्ला तंज कसते हुए कहा भी कि जो भारत अपने और चीन के बीच शांति को न ला सका वह दूसरों के बीच शांति कैसे लाएगा?

रूस को लगातार हथियार, अनाज देने वाला भारत और उस से पैट्रोल खरीदने वाला भारत ठीक वैसा ही एकतरफा दूत है जैसे कृष्ण तब कौरवों और पांडवों के बीच में थे. उन का महाभारत के युद्ध में उद्देश्य किसी तरह लड़ाई करवाना था और इसीलिए उन्होंने लड़ाई के मैदान में जंग के बीच अर्जुन को उपदेश दिया जिस में एक तरफ वर्णव्यवस्था थी तो वहीं दूसरी तरफ अपने कामों के फल दूसरों (यानी ब्राह्मणों) को दे देने जैसा था. उन्होंने अर्जुन से कहा कि तू इस युद्ध में उतर कर मार वरना ये तु झे मार डालेंगे. कृष्ण किसी भी तरह से निष्पक्ष बिचौलिए नहीं थे और न ही मोदी आज यूक्रेन व रूस की जंग में निष्पक्ष शांतिदूत कहे जा सकते हैं. यूनाइटेड नेशंस के जितने प्रस्ताव इस युद्ध के बारे में पारित किए गए हैं, उन में भारत ने यूक्रेन का नहीं, रूस का साथ दिया है.

यूक्रेन और रूस का युद्ध उसी तरह का है जैसे मोदी की यात्रा से पहले हो रहा था वैसा ही अब भी हो रहा है. मोदी की तथाकथित अपील निरर्थक सी है. मोदी तो बंगलादेश के गुटों में शांति नहीं करा पा रहे, नेपाल में नहीं करा पा रहे, म्यांमार में नहीं करा पा रहे, मालदीव में नहीं करा पा रहे और श्रीलंका तक में नहीं करा पा रहे.

इस देश के ऋषिमुनियों का हमेशा एक काम रहा है कि वे दूसरों के विवादों में बेमतलब दखल देते रहते थे. उन के दखल को नजरअंदाज करने पर वे रूठ जाते थे. लक्ष्मण को यम और दुर्वासा की जिद के कारण अपनी जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि यम और दुर्वासा लगभग एक ही वक्त राजा राम से मिलने आ पहुंचे. दोनों को तभी राम से क्या बात करनी थी, यह तो पौराणिक कहानी नहीं बताती पर यह निरर्थक दखल की दास्तां दिखाती है.

हर गांव, शहर, राज्य में यह होता है. फेसबुक, एक्स और इंस्टाग्राम इन बेकार के दखल देने वालों से भरे हुए हैं. ऋषिमुनियों के नए अवतार हमारे न्यूज चैनल अब समाचार नहीं देते बल्कि किसी भी हुई घटना पर उन लोगों को दखल देने के लिए आमंत्रित करते हैं जिन का उस घटना से दूरदूर तक वास्ता नहीं.

नरेंद्र मोदी की मास्को और फिर कीव की यात्राएं उसी तरह निरर्थक सी हैं, दूसरों के कामों में बिन बुलाए दखल की हैं. मोदी की इन यात्राओं ने पौराणिक किस्सों को दोहराया है. इस के लिए नरेंद्र मोदी को ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि उन्होंने कूटनीति तो केवल अपने पुराणों में लिखी कहानियों को सुन कर (शायद पढ़ कर नहीं) सीखी, पिछले 400 सालों के लिखित विश्व इतिहास को पढ़ कर नहीं.

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के ‘परमदोस्त’ की यूक्रेन के राष्ट्रपति आखिर क्यों सुनेंगे जबकि अभी जून 2024 में हुई ग्लोबल पीस समिट के प्रस्ताव का भारत ने रूस के कहने पर समर्थन नहीं किया. नरेंद्र मोदी कीव से पहले पोलैंड गए थे जहां रूस का मिसाइल आक्रमण उन्हीं दिनों हुआ जब मोदी यात्रा पर थे.

अपराध बिना जेल

जनता देश से यह उम्मीद तो करती है कि देश की न्याय व्यवस्था ऐसी हो जिस में न्याय तुरंत मिले, कम से कम ऐसे मामलों में जिन में एक व्यक्ति को बिना अपराध साबित हुए वर्षों जेल में काटने पड़ रहे हों. अफसोस यह है कि हजार हल्लों, महीनों मुख्यमंत्रियों को कैद में रखने, मंचों पर सुप्रीम कोर्ट के जजों के प्रवचनों आदि के बावजूद कहीं से नहीं दिखता कि पहले मजिस्ट्रेट की कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक कोई भी लोगों को जेलों से बाहर तब तक रखने को आसानी से तैयार है.

पूरा सिस्टम तैयार बैठा रहता है कि जल्दी से जल्दी किसी पर भी झूठासच्चा आरोप लगा कर उसे जेल में बंद कर दो और चाबी को न्यायिक कुंओं में फेंक दो जो गहरे, बदबूदार मगरमच्छों व कीड़ों से भरे हैं. जिन के पास साधन हैं वे देरसवेर निकल आते हैं और बाहर निकलने पर, डर के मारे, यह कहने को मजबूर रहते हैं कि उन्हें न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है.

23 नवंबर, 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में फैसला दिया जिस में आरोपी 8 साल से जेल में सड़ रहा है, बिना अपराध साबित हुए. अमनदीप सिंह सरन ने छतीसगढ़ में कुछ कंपनियों के माध्यम से 97,707 लोगों से मोटे मुनाफा दिलाने के झूठे वादे पर करोड़ों रुपए जमा कर लिए थे और न लौटाने पर उस के खिलाफ 2015 में आपराधिक मामला दर्ज हुआ. 2 फरवरी, 2015 को अमनदीप सिंह सरन को शायद भारत से बाहर भाग जाने के डर से इंदिरा गांधी एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया. अब तक, यानी 2023 तक, 86 गवाहों में से केवल 10 की सुनवाई हुईर् थी और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार का वकील बिना कोई दुख प्रकट किए यही कह रहा था कि चूंकि बहुत से गवाहों की पेशी बाकी है, इसलिए 8 साल बाद भी आरोपी को रिहा नहीं किया जा सकता. मामला दर्ज होने के बाद आरोपी महीनों तक लापता रहा था और फरवरी 2015 में एयरपोर्ट पर पकड़ा जा सका था, इसलिए कोई भी अदालत उसे जमानत तक देने को तैयार न थी.

सुप्रीम कोर्ट ने 1980 के एक फैसले का जिक्र किया जिस में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कहा कि स्पीडी ट्रायल एक आरोपी का मौलिक अधिकार है जो संविधान का अनुच्छेद 21 सब को देता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान ही नहीं, तब लागू क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 300 भी कहती है कि किसी निर्दोष को बिना कारण ज्यादा लंबे समय तक सलाखों के पीछे न रखा जाए और पहली अदालतें अपना काम तुरंत व मौलिक कानूनी अधिकारों के अंतर्गत करें.

पर क्या इस देश में सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों और सर्वोच्च न्यायालय के जजों के न्यायालयों के बाहर के उपदेशों का कोई फर्क पड़ रहा है?

देश की अधिकांश अदालतें हर मामले में जमानत देने से इनकार कर देती हैं. पुलिस को उस से वसूली की अपार शक्ति मिली हुई है. नागरिक बेबस है, जेलों में बंद 5 लाख से अधिक कैदियों में से 75 फीसदी बिना अपराध साबित हुए जेलों में दिनरात काटने को मजबूर हैं.

क्यों? किस ने पुलिस, पुलिस के वकील, राज्य सरकार या मजिस्ट्रेट को किसी नागरिक से उस के आजाद घूमने के हक को छीनने का हक दिया? कोई पुलिस का वकील आखिर अदालत में यह मांग भी कैसे कर सकता है कि आरोपी को जमानत न दी जाए? उस से यह हक छीना जाना चाहिए. मजिस्ट्रेटों पर जमानत न देने के कारणों पर लंबा फैसला लिखने का भार नहीं सौंपा जाना चाहिए, उस पर हाईकोर्ट की नजर रहनी चाहिए.

सैशन कोर्ट या ऊपरी कोर्टों में कहीं भी सरकारी वकील को यह हक ही नहीं होना चाहिए कि वह यह तर्क दे कि आरोपी को गिरफ्तार कर रखना जरूरी है. यह निर्णय केवल जजों का होना चाहिए और उन्हें केवल आरोपी के वकील की बात सुनने का हक होना चाहिए कि आरोपी को जमानत क्यों दी जाए. जज सुबूत देख सके, गवाहों से पूछताछ कर सके, अपने विवेक का इस्तेमाल कर सके लेकिन कोई पुलिस अफसर अदालत में यह न कह सके कि आरोपी को जमानत न दी जाए.

सुप्रीम कोर्ट की कथनी को करनी में बदलना है तो जरूरी है कि न्याय व्यवस्था में बदलाव किया जाए. जेल में बंद रखने का फैसला जज को मिले, जबकि अपराध को सिद्ध करने का जिम्मा पुलिस और पुलिस के वकील को मिले.

मनमानी पर सुप्रीम नजर

सुप्रीम कोर्ट आजकल मोदी सरकार के पेंच ढीले करने में लगा हुआ है. 10 साल तक मोदी सरकार ने इस देश की जनता को राम मंदिर और हिंदूमुसलिम विवादों को भड़का कर चक्रवर्ती राजा बनने के सपने ही देखे, इन चक्रवर्ती राजाओं के राजगुरुओं और उन के यहां आकस्मिक तौर पर पधारने वाले ऋषिमुनियों की तरह का मनमानी वाला राज जनता पर थोपा. सरकार जो कहे वही राजा व ऋषिमुनि का सम्मिलित आदेश बन गया.

राजा की मानो वरना आप सहो, नरक तैयार करने के लिए ईडी, एनआईए, सीबीआई, पीएमएलए जैसे नाम इस्तेमाल किए जाने लगे और ‘पाप’ करने पर दंडस्वरूप जेल, बुलडोजर, एनकाउंटर, इनकम टैक्स छापे, जीएसटी नोटिस आदि बिना ठोस जांच और वजह के थोपे जाने लगे. असल में कहा जा रहा था कि चक्रवर्ती राजा और उस के ऊपर बैठे ऋषिमुनियों की पोलपट्टी न खोलो.

राजनीतिक दलों पर कहर ज्यादा टूटा और जैसे निर्दोष बाली को राजनीति के लिए मारा गया, लंका को जलाया गया, दुर्वासा द्वारा अयोध्या को नष्ट करने की धमकी दी गई वैसे ही धर्म के नशे में चूर, जनता के वोटों के बल पर भगवा सरकार द्वारा पौराणिक युग का आतंक देश पर थोप दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मायावी जाल के फंदे काटने शुरू कर दिए हैं.

इलैक्टोरल बौंड्स को अंसवैधानिक घोषित कर के राजनीति में सफेद किए गए कालेधन की वाशिंग मशीन का प्रोसैस अंसवैधानिक बना दिया गया.

कितने ही नेताओं को जमानत दे दी गई जो बिना खास कारण जेलों में बंद कर दिए गए थे, अब सुप्रीम कोर्ट बुलडोजर एनकाउंटरों के पीछे पड़ गया है. कई सरकारों ने बुलडोजर से किसी के भी घर को नष्ट कर उसे श्राप देने की नीति अपना ली थी.

जिस पर कोई आरोप लगा भी नहीं, कोई सरकार के खिलाफ बोला नहीं, किसी ने सत्तारूढ़ पार्टी छोड़ी नहीं कि अवैध निर्माण के नाम पर बुलडोजर चला दिया गया. रोतेबिलखते बच्चे, अपना घरसंसार उजड़ते देखती औरतें, वृद्ध-अपाहिज मांबाप इस बुलडोजर अन्याय के शिकार हुए.

यह संभव है कि हजारों नेता या सक्रिय विचारक अपने घरों में कुछ निर्माण करा चुके हों जो सरकारी नक्शों में अनुमति प्राप्त न हों. पर जब तक आम जनता को नुकसान न हो और उन्हें तोड़ने की नीति बहुतों पर एकसाथ लागू न हो रही हो तो ऐसे में बुलडोजर ‘न्याय’ पुलिस के एनकउंटर ‘न्याय’ की तरह है जिस में अपराध सिद्ध हुए बिना सजा दे दी जाती है.

सुप्रीम कोर्ट का इस ओर, देर से ही सही, आदेश देना देश की जनता को राहत देता है जो धर्मराज के आतंक से भयभीत दिन गिनगिन कर जी रही थी. सरकारों को बुलडोजर सड़कों की सफाई करने, कूड़े के ढेरों को हटाने, खेल का मैदान बनाने, बाढ़ रोकने, वाटर हारवेस्ंिटग के लिए गड्ढे खोदने आदि के लिए लगाना चाहिए, कुछ तोड़ने या किसी को सजा देने के लिए नहीं लगाना चाहिए.

सिनेमा के नाम पर सिरदर्द है “द डायरी औफ वैस्ट बंगाल”

यह फिल्म पश्चिम बंगाल की कथित सच्ची घटनाओं पर आधारित है जबकि तृणमूल के लोगों का मानना है कि यह फिल्म नरेंद्र मोदी की एजेंडा फिल्म है. नरेंद्र मोदी धर्म के नाम पर वहां नफरत फैलाना चाहते हैं और दंगे कराना चाहते हैं. फिल्म के निर्देशक सनोज मिश्रा का कहना है कि फिल्म में ममता बनर्जी के खिलाफ कुछ भी नहीं है.

इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद पश्चिम बंगाल में अच्छाखासा विवाद पैदा हो गया है. कहा जा रहा है कि फिल्म के जरिए पश्चिम बंगाल को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है. हाल ही में कोलकाता की एक महिला डाक्टर के साथ रेप और फिर उस की हत्या से काफी बवाल मचा था. इस पर भाजपा ने खूब राजनीति भी की. रेप की घटनाओं पर अकसर राजनीति ही होती है, समाधान के नाम पर बस दोषी को कड़ी सजा की बात की जाती है.

इस फिल्म के निर्देशक का कहना है कि उसे पुलिस द्वारा फंसाया जा सकता है, इसीलिए वह शहर से गायब बताए जा रहे हैं. कोलकाता पुलिस ने फिल्म के निर्माता और निर्देशक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है. फिल्म पश्चिम बंगाल में रोहिंग्या और कट्टरपंथी बंगलादेशियों के आप्रवासन और बस्तियों और सांप्रदायिक गड़बड़ी की बात करती है.

असल में भाजपा कार्यकाल में एक समुदाय को निशाने पर लेने वाली फिल्में खूब बनने लगी हैं. इस फिल्म को भी नफरत फैलाने वाला बताया जा रहा है. एजेंडा फिल्में बनाने वाले निर्देशक अकसर गुमनामी में कहीं खो जाते हैं. ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ बनाने वाले संदीप सिंह का आज कहीं अतापता नहीं. गडकरी की बायोपिक बनाने वाले आज गलियों की धूल फांक रहे हैं. ‘आदिपुरुष’ बनाने वाले ओम राउत आज अज्ञातवास में हैं.

फिर भी ऐसे निर्माता उग आते हैं. किसी ने इन सब को किसी जमात में बिठा कर सम झा दिया लगता है कि फलां टाइप की फिल्म बनाओगे तो मामला ‘सैट’ हो जाएगा. तंत्र में पूछपाछ होने लगेगी और ऐसा भी हो सकता है कि प्रधानमंत्री खुद प्रचार करने लगें.

इस फिल्म की कहानी विवादित है. जैसे कहानी में बताया गया है कि पिछले कई वर्षों से पश्चिम बंगाल के हालात नहीं सुधरे हैं. आज भी वहां पर रेप हो रहे हैं, हिंदुओं की हत्याएं ठीक उसी प्रकार से हो रही हैं जैसे बंगलादेश में हो रही हैं. तृणमूल कांग्रेस के लोग देसी बम चला कर लोगों को आतंकित कर रहे हैं. बाकायदा पुलिस को चढ़ावा चढ़ाया जाता है.

इस फिल्म की कहानी बंगलादेश में एक कट्टरपंथी संगठन द्वारा एक हिंदू परिवार को मार डालने से होती है. एक हिंदू विधवा सुहासिनी (अर्शिन मेहता) नरसंहार में अपने पति की हत्या के बाद बेसहारा और महिलाओं के एक समूह में शामिल हो जाती है. वह बंगलादेश से भाग कर पश्चिम बंगाल आ जाती है. बंगाल में सुहासिनी का साथ विशाल (यजुर मारवाह) नाम का एक युवक देता है, मगर यहां वह लवजिहाद का शिकार हो जाती है और उसे कठमुल्लाओं के हाथों यातनाएं झेलनी पड़ती हैं. कठमुल्ला उस की जबरन शादी एक मुसलमान से कराना चाहते हैं.

कहानी के क्लाइमैक्स में सुहासिनी का साथी विशाल जब उस से जबरदस्ती करना चाहता है तो वह उसे गोली मार देती है. अब सारे कट्टरपंथी उस के पीछे पड़ जाते हैं और उस का सिर धड़ से अलग कर देते हैं. फिल्म में कई ऐसी चीजें हैं जो ‘क्यों हुई, कैसे हुई’ इसे बताया नहीं गया है और दर्शकों पर छोड़ दिया गया है कि आप को ही मान लेना है कि ऐसा हुआ.

फिल्म की इस कहानी में हिंदूमुसलिम के उस घिसेपिटे एंगल को लिया गया है जिस का रायता पहले ही फैलाया जा चुका है और दर्शक इस जौनर को देख कर उकता चुके हैं. सुहासिनी तो यह सोच कर बंगाल आई थी कि वह हिंदू है और बंगाल में सुरक्षित रहेगी. मगर उस का यह सोचना गलत साबित हुआ.

जिस तरह एजेंडा के तहत हालफिलहाल केरल को ले कर फिल्म बनी और विवाद खड़ा किया गया, उसी तर्ज पर निर्देशक ने बंगाल के कथित विवादों पर फिल्म बनाने की कोशिश की. फिल्म में रोहिंग्या मुसलमानों के भारत आने, फर्जी पहचान पत्र हासिल करने से ले कर वोट न देने वालों के कत्ल करने तक का इशारा किया गया है.

मगर फिल्म की यह कहानी सिलसिलेवार नहीं है. ऐसा लगता है जैसे पनवाड़ी की दुकान पर कुछ व्हाट्सऐप का ज्ञान लिए गपोडि़ए बैठे और वहीं कहानी लिख डाली. न सिर है न पैर, छुट्टे सांड़ के सींग जैसे कहानी यहांवहां चलती रहती है, इसीलिए दर्शकों पर प्रभाव नहीं छोड़ पाती. निर्देशन औसत से भी नीचे दर्जे का है. नायिका अर्शिन मेहता की एक्ंिटग भी खराब है. यजुर मारवाह का काम तो बहुत ही खराब है. कट्टरपंथियों की एक्टिंग भी नाटकीय है. अन्य सहायक कलाकार कमजोर हैं. गीतसंगीत कमजोर है. ऐसा लगता है फिल्म चलतेफिरते निबटा दी गई है. निर्देशक और कलाकार निहायत नौसिखिया हैं. तकनीकी दृष्टि से भी फिल्म प्रभावित नहीं करती. सिनेमेटोग्राफी भी कुछ खास नहीं है.

वेदा

दलितों और कमजोर वर्ग के लोगों पर हमेशा से अत्याचार होते आए हैं. आज देश को आजाद हुए 77 साल बीत चुके हैं, आज भी यदाकदा दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होने व उन्हें नंगा कर के गांव में घुमाने की खबरें सुनने को मिल जाती हैं. दलितों पर ये अत्याचार बाहुबलि किस्म के लोग करते हैं.

दलितों के अत्याचारों के पीछे हमारे धर्मग्रंथ हैं. धर्मग्रंथों में दलितों को पशुतुल्य बताया गया है- ‘ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी; ये सब हैं ताड़न के अधिकारी. अर्थात दलितों की पशुओं की तरह पिटाई की जानी चाहिए. दलितों को वेदवाक्य सुनने तक का अधिकार नहीं था. धर्मग्रंथों में कहा गया है कि दलित या शूद्र यदि गलती से भी वेदवाक्य सुन लेता है तो उस के कानों में पिघला सीसा डाल देना चाहिए.

दलितों की तरह ही मनुस्मृति में स्त्रियों को पाप की योनि कहा गया है. महाराज मनु ने तो स्त्रियों के घोड़े से संभोग कराने की बात तक कही है.

धर्मग्रंथों का यह प्रभाव मानव जीवन पर गहराई से पड़ा है. धर्मग्रंथों का अनुसरण कर के ही आज समाज में दलित स्त्रियों के साथ बलात्कार होते हैं. उन्हें नंगा कर घुमाया जाता है. उन्हें पेशाब तक पिलाया जाता है.

अभी हाल ही में कोलकाता के एक अस्पताल में एक जूनियर डाक्टर के साथ रेप होने और फिर उस की हत्या तक की बात सामने आई है. वह युवा डाक्टर महिला दलित तो नहीं थी, मगर उस की पारिवारिक स्थिति इतनी सशक्त नहीं थी कि वह अस्पताल के प्रिंसिपल और सीनियर डाक्टरों का मुकाबला कर पाती. ये सभी डाक्टर्स रसूखदार थे कि एक कमजोर महिला डाक्टर की हत्या तक कर डाली. यह भी धर्मग्रंथों का प्रभाव है कि महिलाओं को कमजोर सम झ कर उन का रेप कर दो या उन की हत्या कर दो.

फिल्म ‘वेदा’ भी राजस्थान के एक गांव में रहने वाली नीची जाति की एक महिला वेदा (शरवरी वाघ) की कहानी है. वह जिंदगी में आगे बढ़ने के सपने देखती है, मगर गांव के दबंग बारबार उसे दबाते हैं. गांव का प्रधान जितेंद्र प्रताप सिंह (अभिषेक बनर्जी) और उस का परिवार जातपांत के नाम पर गांव वालों पर जुल्म करता है.

वेदा की मुलाकात भारतीय सेना में मेजर रह चुके अभिमन्यु कंवर (जौन अब्राहम) से होती है. अपनी पत्नी राशि (तमन्ना भाटिया) को आतंकवादियों के हाथों खो चुका अभिमन्यु वेदा को सपोर्ट करता है. उधर वेदा का भाई एक ऊंची जाति की लड़की से प्रेम करता है तो गांव वाले वेदा के भाई की हत्या कर देते हैं. वेदा अंदर से टूट जाती है लेकिन अभिमन्यु का साथ मिलने पर वह गलत के खिलाफ जंग लड़ने का फैसला करती है. अन्याय के खिलाफ वेदा की इस लड़ाई में अभिमन्यु उस का साथ देता है और गांव में नीची जाति वालों पर अत्याचार करने वाले दबंगों का सफाया करता है.

दबंगों की दबंगई और दलितों पर होने वाले अत्याचार विश्व के हर समाज की कड़वी सचाई है. लगातार कुचले जा रहे किसी इंसान का दबंगों के खिलाफ सिर उठाना भी कभीकभी देखनेसुनने में आ जाता है, मगर इस फिल्म के साथ दिक्कत यह है कि इस में कोई नई बात नहीं कही गई है. यह एक बदला प्रधान फिल्म बन कर रह गई है. इस में कहीं भी नारीशक्ति वाली बात नहीं है जो दर्शकों में जोश भर सके.

फिल्म घिसेपिटे ट्रैक पर चलती है, घटनाओं को जबरन फैलाया गया है. इस फिल्म के मैसेज की बात की जाए तो यह कहती है कि संविधान सर्वोपरि है, जिस की शरण में आ कर कोई भी निर्भय हो सकता है, मगर देश में तो ‘निर्भया’ महिलाओं तक के रेप और हत्याएं हो रही हैं और गरीब इंसान संविधान तक अपनी आवाज ही नहीं पहुंचा पाता. फिल्म का मूल मकसद मारधाड़ को ही दिखाना है. फिल्म का क्लाइमैक्स दमदार नहीं है.

अभिनय की दृष्टि से शरवरी वाघ ने अच्छा काम किया है, जौन अब्राहम का काम अच्छा है. कैमरा वर्क अच्छा है. म्यूजिक कुछ खास नहीं है.

पड़ गए पंगे??

यह कौमेडी फिल्म 1999 में आई फिल्म ‘सरफरोश’ के एक गाने ‘जिंदगी मौत न बन जाए, संभालो यारो…’ से प्रेरित है. इस कौमेडी फिल्म में निर्देशक कौमेडी क्रिएट करने में पूरी तरह सफल नहीं हुआ है.

जिस प्रकार हौरर और कौमेडी का कौंबिनेशन फिल्म को हिट करा देता है जैसा कि ‘स्त्री-2’ में दिखाया गया है, उसी प्रकार कौमेडी और इमोशनल का कौंबिनेशन बनाना भी आसान नहीं है. निर्देशक संतोष कुमार ने इस फिल्म में इस कौंबिनेशन को दिखाने की कोशिश की है. पटकथा में हंसी के भरपूर मौके तो हैं मगर अधिकांश मौके चूक जाते हैं. राजेश शर्मा और राजपाल यादव की एंट्री के बाद दर्शकों को कुछ हंसने का मौका मिलता है.

फिल्म की कहानी शास्त्रीजी (राजेश शर्मा) पर केंद्रित है. जो एक रिटायर्ड शिक्षक है और स्टूडैंट्स को ट्यूशन पढ़ाता है. वह अपने बेटेबहू के साथ रहता है. उस का अपने पूर्व छात्र आयुष (समर्पण सिंह) के साथ दोस्ताना रिश्ता है. आयुष एक बैंक में काम करता है. शास्त्रीजी की जिंदगी में अचानक मोड़ तब आता है जब उन्हें पता चलता है कि उन्हें और आयुष दोनों को कैंसर है और लास्ट स्टेज में है.

असल में मैडिकल अफसर ने उन से झूठ कहा था, साथ ही इलाज के लिए 40 लाख रुपए खर्च होने की बात कही थी. हालात तब और खराब हो जाते हैं जब शास्त्रीजी प्रौपर्टी डीलरों के झांसे में आ जाते हैं. ये दोनों सुसाइड करने की कोशिश करते हैं. ये प्रौपर्टी डीलर अपराधी किस्म के हैं. लेकिन जब शास्त्रीजी को बाद में पता चलता है कि मैडिकल अफसर ने उन से झूठ बोला था तो उन के लिए और भी मुश्किल हो जाता है.

उधर आयुष ने बैंक से 50 लाख रुपए का लोन लिया है और लोन रिकवर करने वाले जबतब उसे धमकाने आ जाते हैं. क्लाइमैक्स में शास्त्रीजी अपने मकान का पैसा आयुष के बैंक अकाउंट में जमा करा देते हैं. आयुष के दोस्त और प्रेमिका भी बैंक अकाउंट में पैसे जमा करा देते हैं. सब से पूछताछ होती है कि इतनी बड़ी रकम कहां से जमा कराई तो सब अपनीअपनी परेशानियां बैंक वालों को बताते हैं. शास्त्रीजी भी उन्हें पैसे का सोर्स बताते हैं. बैंक वाले संतुष्ट हो जाते हैं. उन सब को जिंदगी में आए पंगों से छुटकारा मिल जाता है.

फिल्म की यह कहानी कुछ हद तक रोचक है, दर्शक बोर नहीं होते. फिल्म कई जगह सचेत भी करती है कि मैडिकल अफसर किस तरह लोगों से झूठ बोलते हैं. साथ ही, यह कर्जा देने वाले प्रौपर्टी डीलरों से भी सचेत करती है.

फिल्म यह बताती है कि जिंदगी से परेशान हो कर सुसाइड करना कोई हल नहीं है. फिल्म का बजट कम है. निर्देशन ठीकठाक है. गीतसंगीत पक्ष कमजोर है, सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.

तिकड़म

यह पारिवारिक फिल्म बच्चों के साथ मातापिता को देखनी चाहिए. इस फिल्म को बच्चों और फैमिली को ध्यान में रख कर बनाया गया है. फिल्म दर्शकों को उन के बचपन में ले जाती है, दर्शकों को लगेगा कि काश, उन का बचपन लौट आता.

फिल्म पर्यावरण को बचाने की बात करती है. आज ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण के चलते हमारे पर्यावरण में बहुत से बदलाव देखने को मिल रहे हैं. पहाड़ों पर बर्फ कम गिरने लगी है, नदियों, तालाबों में पानी का स्तर घट गया है. कहींकहीं तो बहुत अधिक बारिश होने लगी है, फलस्वरूप बाढ़ आने लगी है. फिल्म मातापिता और बच्चों की बौंडिंग की बात भी कहती है और परिवार की अहमियत को बताती है. जिन बच्चों के पिता अपने घर से दूर किसी दूसरे शहर में काम करते हैं, उन के दुखदर्द को साझा करती है. फिल्म बताती है कि कोई भी तिकड़म लगाइए लेकिन परिवार से दूर मत जाइए.

फिल्म एकदम सिंपल है और यही इस की खासीयत है. कोई लाउड सीन नहीं, कोई शोरशराबा नहीं, फिल्म अपनी गति से चलती है, दर्शक भी फिल्म के साथ बंधे से रहते हैं. फिल्म में लौजिक के साथ समझाया गया है कि पर्यावरण को कैसे बदला जाए. बच्चे भी इस काम में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. फिल्म कहींकहीं दर्शकों की आंखों में आंसू ला देती है. फिल्म जियो सिनेमा पर स्ट्रीम हो रही है. इस के लिए न कोई ज्यादा प्रमोशन किया गया है, न होहल्ला मचाया गया है. ऐसी फिल्मों की तारीफ होनी चाहिए.

फिल्म की कहानी एक छोटे से हिल स्टेशन की है. इस गांव में प्रकाश (अमित सियाल) अपने बच्चों समय (अमिष्ट जैन) और चीनी (आरोही सऊद) और अपने मातापिता (नमन भट्ट और अजीत केलकर) के साथ रहता है. प्रकाश की पत्नी की मौत हो चुकी है, बच्चे दादादादी के साथ सुखी हैं. प्रकाश का परिवार एक सुखी परिवार है. प्रकाश एक छोटे से होटल में नौकरी करता है. हिल स्टेशन पर बर्फ कम गिरने की वजह से होटल में टूरिस्टों की आवाजाही कम हो चली है. होटल के बंद हो जाने नौबत आ चुकी है. प्रकाश भी और लोगों की तरह अपने गांव से बाहर शहर जा कर नौकरी करने का फैसला लेता है.

प्रकाश के दोनों बच्चे अपने पापा को गांव से दूर शहर नहीं जाने देने का फैसला करते हैं और ये बच्चे पर्यावरण को बचाने की योजना बनाते हैं ताकि हिल स्टेशन पर खूब बर्फ गिरे ताकि होटल को बंद न करना पड़े और उन के पापा को दूर शहर न जाना पड़े. वे अपने दोस्त भानु (दिव्यांश द्विवेदी) से कहते हैं कि वह उन के पापा को शहर जाने से रोकने में उन की मदद करे.

अब तीनों बच्चे पर्यावरण को बचाने में लग जाते हैं. ये बच्चे तिकड़म लगा कर प्लास्टिक को बैन कराते हैं. पेड़ों को काटने से औक्सीजन खत्म हो रही थी. पेड़ों को काटने से बचाते हैं. पानी को सेव करने की योजना बनाते हैं. एक तालाब की फट्टे से गहराई नापते हुए समय तालाब में गिर जाता है. प्रकाश आ कर उसे बचा लेता है.

दीवाली का त्योहार नजदीक है. बच्चे पटाखों पर बैन लगवाते हैं. तभी प्रकाश का टाइम शहर जाने का होता है. बच्चे उसे कहते हैं कि चिडि़या अपने बच्चों के लिए दाना लाने सुबह जाती है, शाम को वापस लौट आती है. बच्चों की बातें सुन कर प्रकाश का मन भी बदल जाता है. उधर हिल स्टेशन पर पारा गिरने लगता है और बर्फ गिरनी शुरू हो जाती है. होटल वालों का फोन आ जाता है कि होटल में टूरिस्ट आने लगे हैं. अब होटल बंद नहीं होगा. प्रकाश शहर जाने का खयाल छोड़ देता है. बच्चे पिता का फैसला सुन कर खुश होते हैं कि अब वे अपने पिता से दूर नहीं रहेंगे.

फिल्म की यह कहानी सीधीसीधी चलती है, कहीं कोई टर्न और ट्विस्ट नहीं, हां कई जगह इमोशनल सीन जरूर हैं. कहानी फैमिली के प्रति सैक्रिफाइस और बच्चों के पिता से बिछुड़ने का गम बयां करती है.

फिल्म का निर्देशन अच्छा है. फिल्म की लोकेशन काफी खूबसूरत है. इसे पहाड़ी इलाके में शूट किया गया है. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बढि़या है.

क्या रोबोटिक कैंसर सर्जरी एक भरोसेमंद विकल्प है ?

डा. राज नगरकर एचसीजी मानवता कैंसर सेंटर (एचसीजीएमसीसी) के प्रबंध निदेशक और सर्जिकल औन्कोलौजी और रोबोटिक सेवाओं के प्रमुख हैं. डा. नगरकर को 23+ वर्षों का अनुभव है और उन्होंने 1100 से भी अधिक रोबोटिक असिस्टेड सर्जरीज किए हैं, 2,00,000 से अधिक कैंसर रोगियों की जांच और उपचार किए हैं, 65000 से अधिक प्रमुख और अति-प्रमुख कैंसर सर्जरी, 1500 चाइल्डहुड कैंसर पेशेंट्स और ऑन्कोलॉजी में 300 से अधिक बहुराष्ट्रीय क्लीनिकल ट्रायल्स किए हैं.

अपने देश में कैंसर के मरीजों की संख्या में वृद्धि हो रही है इसकी क्या वजह है?

शरीर पर होने वाले पर्यावर्णिक घटकों के प्रभाव के कारण कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है. इस रोग से संबंधित बढ़ती जानकारी की उपलब्धता के कारण कैंसर से पीडि़त मरीज हौस्पिटल्स जाकर जाँच करा रहे हैं.

इस बीमारी के कुछ शुरुआती संकेत और लक्षण क्या हैं?

कैंसर अपने शरीर में उपलब्ध सेल्स में होने वाले बदलाव के कारण होता है. अंदरुनी सेल्स में होने वाले बदलाव इतने धीमी गति से बढ़ते हैं कि इस रोग के बारे में तुरंत पता नहीं चल पाता है. कैंसर के आम तौर पर चार स्टेजेस बताए जाते हैं. प्राथमिक स्टेज में जो कैंसर रहता है ये अपने शरीर में शुरु होकर जब तक इसकी लक्षण पता चले तब तक कई वर्ष बीत जाते हैं. अगर शरीर पर कोई गांठ पंद्रह दिनों से ज्यादा वक्त तक है और दर्द नहीं हो रहा हो तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खास करके महिलाओं में स्तन में होने वाली गांठ. अगर मुंह में छाला है या कोई ज़ख्म पंद्रह दिनों से ज्यादा अवधी तक ठीक नहीं हो रहा हो, आवाज बदल रही है, खाना निगलने में दिक्कत हो रही है, कफ में से खून निकल रहा है, बार-बार खांसी हो रही है, पाचनशक्ति में बदलाव आया है, खून जा रहा है, अगर पेशाब में से खून जा रहा है या पेशाब की समस्या आ रही है तो ये सारे उन अंगों के संबंधित कैंसर के संभावित लक्षण हैं.

आपने आज तक 1000 से ज्यादा रोबोटिक कैंसर सर्जरीज किए हैं. ट्रेडिशनल कैंसर सर्जरी और रोबोटिक कैंसर सर्जरी में क्या फर्क है?

ट्रेडिशनल कैंसर सर्जरी में कैंसर के हिस्से को, मतलब जरूरत पड़ने पर उस अवयव को शरीर से हटा देते हैं. रोबोटिक्स सर्जरी या रोबोटिक्स असिस्टेड लेप्रोस्कॉपीक सर्जरी के कारण मरीज के अवयव को बचाकर कैंसर की सर्जरी करना आसान हो गया है.

क्या रोबोटिक कैंसर सर्जरी भरोसेमंद है? क्या ट्रेडिशनल कैंसर सर्जरी की तुलना में ऐसी सर्जरी में एक्सपेंस ज्यादा होते हैं?

रोबोटिक्स कैंसर सर्जरी ज्यादा भरोसेमंद है, इस में कोई संदेह नहीं. एक इंटेस्टाइनल कैंसर के मरीज के बारे में सोचें जिसे रोबोटिक सर्जरी के कारण पेट से मल निकालने के रास्ते की ज़रूरत पड़े या जिसकी किडनी सर्जरी के लिए, बिना किडनी निकाले ऑपरेशन संभव हो और ऑपरेशन के बाद उसका आईसीयू या अस्पताल में ठहरना कम हो जाए तो इन सब की तुलना में रोबोटिक असिस्टेड सर्जरी का जो थोड़ा सा ज्यादा खर्च है, वास्तव में वह इन सब परेशानियों के मुकाबले बहुत कम हो जाता है.

सरकार ने कैंसर इलाज की दवाओं पर सीमा शुल्क से छूट दी है. क्या इससे इलाज के एक्सपेंस में कुछ राहत होगी?

सरकार के निर्णय अनुसार कुछ टार्गेटेड थेरैपी जैसे ट्रास्टुजुमैब और कुछ इम्यूनोथेरेपी के इंजेक्शंस की कीमतें घटा दी गई हैं. सरकार के इस निर्णय से मरीजों को उन्नत इलाज की सुविधा प्राप्त होगी.

1947 के बाद कानूनों से रेंगती सामाजिक बदलाव की हवाएं

15 अगस्त, 1947 को भारत को जो आजादी मिली वह सिर्फ गोरे अंगरेजों के शासन से थी. असल में आम लोगों, खासतौर पर दलितों व ऊंची जातियों की औरतों, को जो स्वतंत्रता मिली जिस के कारण सैकड़ों समाज सुधार हुए वह उस संविधान और उस के अंतर्गत 70 वर्षों में बने कानूनों से मिली जिन का जिक्र कम होता है जबकि वे हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं. नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी का सपना इस आजादी का नहीं, बल्कि देश को पौराणिक हिंदू राष्ट्र बनाने का रहा है. लेखों की श्रृंखला में स्पष्ट किया जाएगा कि कैसे इन कानूनों ने कट्टर समाज पर प्रहार किया हालांकि ये समाज सुधार अब धीमे हो गए हैं या कहिए कि रुक से गए हैं.

15 अगस्त, 2024 को लालकिले से सैक्युलर सिविल कोड और उस के जुड़वां भाई कम्युनल सिविल कोड शब्दों का जन्म हुआ है वरना तो इन शब्दों का जिक्र किसी शब्दकोष, कानूनी किताब या संविधान में नहीं मिलता. 15 अगस्त, 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन शब्दों का इस्तेमाल करते कहा, हम ने कम्युनल सिविल कोड में 75 साल बिताए हैं, अब हमें सैक्युलर सिविल कोड में जाना होगा, तभी हम धर्म के आधार पर भेदभाव से मुक्त हो सकेंगे.

बस, इतना सुनना था कि जल्द ही इन शब्दों के माने और मंशा सामने आ गए कि दरअसल नरेंद्र मोदी यूनिफौर्म सिविल कोड की बात कर रहे हैं. यह बात रत्तीभर भी नई नहीं है, बल्कि यह भाजपा के सनातनी एजेंडे का सनातनी हिस्सा है जिस का मकसद सिर्फ और सिर्फ कट्टर हिंदुओं को खुश करना, पौराणिक एवं धर्म राज स्थापित करना और मुसलमानों को कानूनी डंडा दिखा कर डराना व परेशान करना है, ठीक वैसे ही जैसे तीन तलाक कानून और जम्मूकश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया गया था और जीएसटी कानून ला कर राज्य सरकारों का संघीय अधिकार कम करना था.

यूनिफौर्म सिविल कोड या सैक्युलर सिविल कोड का समाज के सामाजिक सुधारों से कोई लेनादेना नहीं है. यह बहुसंख्यक हिंदुओं को विवाह या विरासत के कानूनों में कोई छूट देने के लिए बनाया जाने वाला प्रस्ताव नहीं है, यह सिर्फ मुसलिम और ईसाई विवाह, विरासत, तलाक कानूनों में दखलंदाजी का उद्देश्य लिए है.

आज भी हिंदू औरतें पतियों के जुल्मों की मारी हैं. तलाक के लिए वर्षों उन की चप्पलें अदालतों में घिसती हैं. हिंदू समाज विवाह के विषय में जाति और दहेज से मुक्त नहीं हुआ है. विरासत में बेटियों को पराया माना जा रहा है. हिंदू संयुक्त परिवार कानून के कारण रामायण और महाभारत काल से भाईभाई में जो विवाद होता था, आज भी होता है क्योंकि जो सुधार कानूनों ने किए उन्हें लागू करने में लोगों, सरकारों, अदालतों और भगवा गैंग ने स्पीडब्रेकर लगा कर धीमा कर दिया.

संविधान का तुलनात्मक अध्ययन

भगवाई प्रधानमंत्री मोदी के यूनिफौर्म सिविल कोड या सैक्युलर सिविल कोड पर वरिष्ठ कांग्रेसी जयराम रमेश ने, यह कहते कि यह भीमराव अंबेडकर का अपमान है, एतराज जताया है. अफसोस यह है कि उन सहित किसी कांग्रेसी नेता को यह एहसास ही नहीं कि आजादी के बाद से ही कांग्रेस के राज में बिना वोटों की चिंता किए समाज सुधार के जो कानून बने हैं उन्हें गिना कर कभी हल्ला नहीं मचाया गया. कांग्रेस की स्थिति हनुमान जैसी हो गई है जिसे अपनी ताकत का अंदाजा या स्मरण नहीं.

नरेंद्र मोदी की और उन की पार्टी भारतीय जनता पार्टी की हकीकत इस से परे कुछ और है जो बरबस ही जवाहरलाल नेहरू और भीमराव अंबेडकर व उन के बनाए संविधान को तो आरक्षण के कारण कोसती है लेकिन हिंदू कोड बिल की याद नहीं दिलाती कि इसी के बलबूते सैक्युलर सिविल कोड की बात संभव हुई.

आज तक कट्टर हिंदूवादियों के दिमाग से नासूर बन कर हिंदू कोड बिल रिसता है क्योंकि इस का विरोध श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने संसद में पुरजोर तरीके से किया था और यहां तक कह दिया था कि यह बिल हिंदू संस्कृति को टुकड़ों में बांट देगा. जनसंघ इसी कोड बिल के कारण पैदा हुआ जिस के आधार पर आज नरेंद्र मोदी सैक्युलर सिविल कोड की बात कर रहे हैं.

आखिर ऐसा क्या था हिंदू कोड बिल में जिसे 75 साल बाद कम्युनल कहा जा रहा है, इसे समझने के लिए जरूरी है कि उस दौर में झांका जाए और तब के बने संविधान और उस के अंतर्गत बने कानूनों को परखा जाए जिन्होंने समाज सुधारों की एक मजबूत बुनियाद रखी चाहे उन पर बनी इमारतें टेढ़ीमेढ़ी ही हों.

पहले एक नजर पाकिस्तान और बंगलादेश के संविधानों पर डाली जाए तो बहुत सी समानताएं होते हुए भी एक बड़ा फर्क सामने आता है. अविभाजित पाकिस्तान में 3 बार संविधान यानी दस्तूर ए पाकिस्तान बना और तीनों ही बार अल्लाह के नाम पर बना. इसलाम पाकिस्तान का राजकीय धर्म है और तमाम कानून शरीयत के मुताबिक बने. मार्च 1949 में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने पाकिस्तानी संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव पेश करते कहा था कि पूरे ब्रह्मांड पर संप्रभुता अल्लाह की है. मुसलमानों को व्यक्तिगत और सामूहिक क्षेत्रों में इसलाम की शिक्षाओं और आवश्यकताओं के अनुसार अपने जीवन को व्यवस्थित करने में सक्षम बनाया जाएगा जैसा कि पवित्र कुरान और सुन्ना में निर्धारित किया गया है.

यह प्रस्ताव 1956, 1962 और 1973 के संविधानों में यथावत रहा. तब से ले कर अब तक पाकिस्तान अल्लाह और इसलाम के नाम पर चल रहा है जिस के चलते लोग भूख और अभावों से बिलबिला रहे हैं लेकिन क्या मजाल कि वे एक शब्द भी इन के बारे में बोल पाएं कि ऊपरवाला हमारी सुध क्यों नहीं लेता. यानी, पाकिस्तानियों ने गोरों के हाथों से सत्ता ले कर या तो मौलानाओं को दे दी या रजवाड़ों की तरह रह रहे अशरफ मुसलमानों के हाथों में दे दी.

इंदिरा गांधी के कारण बने बंगलादेश का संविधान भी हालांकि सभी धर्मों को समान दर्जा और सम्मान देने की बात करता है लेकिन हकीकत कुछ और है जो 22 मार्च, 2014 को शेख हसीना ने इसलामिक फाउंडेशन के एक जलसे में इन शब्दों में बयां की थी कि देश मदीना चार्टर और पैगंबर मुहम्मद के अंतिम उपदेश व निर्देशों के अनुसार चलेगा. देश में कभी भी पवित्र कुरान और सुन्नत के खिलाफ कानून नहीं बनेगा. लेकिन 5 अगस्त, 2024 को न तो पवित्र कुरान उन्हें बचा पाया, न अल्लाह कुछ कर पाया और न ही मदीना चार्टर काम आया.

सार यह है कि इन दोनों देशों में भारत जैसा संविधान और कानून नहीं बने तो इस की इकलौती वजह कठमुल्लाओं के हाथों नाचते नेता थे जिन में जवाहरलाल नेहरू की तरह दूरदर्शिता और सख्ती नहीं थी, जिन्होंने कानून मंत्री भीमराव अंबेडकर के साथ बनाए संविधान और कानून लागू किए और जिन के चलते आज कोई भी भारतीय गर्व से कह सकता है कि हम औरों से कहीं बेहतर हैं और सुकून से जी रहे हैं.

संविधान निर्माण और उठापटक

15 अगस्त, 1947 को जब देश आजाद हुआ तब हर किसी के मन में यह सवाल था कि अब देश चलेगा कैसे? समाज और देश का भविष्य इसी सवाल के जवाब से तय होना था. 4 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश पार्लियामैंट में एक अधिनियम पारित हुआ था जिस का नाम था- इंडियन इंडिपैंडैंस एक्ट यानी भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 जिसे मंजूरी 18 जुलाई, 1947 को मिली थी. इस के मुताबिक, ब्रिटेन शासित भारत को 2 भागों- भारत तथा पाकिस्तान – में विभाजित किया गया था. इस काम के लिए लौर्ड माउंटबेटन को नियुक्त किया गया था.

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के प्रावधानों के तहत आजादी कई शर्तों पर मिली थी जिन्हें सभी राजनीतिक दलों ने स्वीकार किया था. लेकिन दोनों देशों के सामने तमाम तरह की मुसीबतें सिर उठाए खड़ी थीं. पाकिस्तान घोषिततौर पर इसलामिक राष्ट्र बन गया और मोहम्मद अली जिन्ना वहां के गवर्नर जनरल बने. भारत की कमान संभालने की जिम्मेदारी पंडित जवाहरलाल नेहरू को मिली.

जिन्ना नेहरू की तरह पेशे से वकील थे और नेहरू की तरह लिबास से ही नहीं, बल्कि विचारों से भी आधुनिक थे. कांग्रेस छोड़ कर मुसलिम लीग जौइन कर वे मुसलमानों के सर्वमान्य नेता बन गए थे और मुसलिम हितों की दुहाई देते मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान बनाए जाने की जिद पर अड़ गए थे. इस के पीछे उन की दलील यह थी कि हिंदूबाहुल्य भारत में मुसलमान अमनचैन से नहीं रह पाएंगे.

उन की जिद पूरी तरह नाजायज नहीं थी हालांकि कहीं न कहीं इस के पीछे पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बन जाने की उन की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी थी. पाकिस्तान बनने के बाद वे वहां के राष्ट्रपिता करार दिए गए और कायदे आजम की उपाधि भी उन्हें मिली. जिन्ना कानून से चलने वाला पाकिस्तान चाहते थे लेकिन उन का यह सपना पूरा नहीं हो पाया क्योंकि आजादी के एक साल बाद ही टीबी की बीमारी के चलते उन की मौत हो गई. जिन्ना के बाद पाकिस्तान कट्टरवादी मुसलमानों के हाथों में जो पड़ा तो आज तक उन की गिरफ्त में है और इसीलिए दुर्गति का शिकार भी है.

इधर भारत में कानून के राज को ले कर एक और महाभारत छिड़ गया था क्योंकि संविधान का मसौदा हिंदुत्व से यानी मनुस्मृति से मेल नहीं खाता था. विनायक दामोदर सावरकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे नेता मनुस्मृति को भारत का संविधान बनाना चाहते थे जिस में ब्राह्मणों को सर्वश्रेष्ठ स्थान जन्म से ही मिलता और अछूतों, जो आज एससीएसटी कहलाए जाते हैं, को शहरों व गांवों के बाहरी क्षेत्र में रहने की जगह मिलती है. हर व्यक्ति को वोट का अधिकार तो इस प्रणाली में सपना होता.

अविभाजित भारत के लिए संविधान बनाने की प्रक्रिया 1946 में शुरू हो गई थी जब प्रोविंसों के चुने प्रतिनिधियों से एक तरह की संसद का गठन हुआ था. 389 सदस्यों वाली संविधान सभा ने 3 वर्षों में संविधान बनाया था और इसे 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया. बहुत से सामाजिक सुधार उसी दस्तावेज की देन हैं जिस पर कांग्रेस और नेहरू की छाप है.

कांग्रेस उस समय भारी बहुमत में थी और जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री पर कट्टर हिंदूवादियों से उन्हें दोदो मोरचों पर लड़ना पड़ रहा था. एक तरफ कांग्रेस विरोधी हिंदूवादी गुट और दल थे, मसलन आरएसएस, हिंदू महासभा, राम राज्य परिषद और मंदिरों व मठों में बैठे तमाम साधुसंत तो दूसरी तरफ वे सवर्ण कांग्रेसी नेता थे जो हिंदू राष्ट्र चाहते थे. इन में वल्लभभाई पटेल, डा. राधाकृष्णन, डा. राजेंद्र प्रसाद भी थे और श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी थे, जिन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देते भारतीय जनसंघ बनाया था. अब इसे भाजपा के नाम से जाना जाता है.

नेहरू अंबेडकर की जोड़ी

अंगरेज तो चले गए लेकिन हिंदुत्व का मसला या सनातनी विवाद ज्यों का त्यों रहा. नेहरू सोशलिस्ट डैमोक्रैसी चाहते थे लेकिन हिंदूवादी, जिन में कुछ कांग्रेसी भी शामिल थे, एक धार्मिक राष्ट्र की जिद पर अड़े थे जो हिंदू धर्मग्रंथों के मुताबिक चले यानी वर्णव्यवस्था के तहत कानून बनें.

नेहरू ने कहा था, ‘‘जीवन ताश के एक खेल की तरह है. आप को जो हाथ दिया जाता है, वह नियतिवाद है पर जिस तरह से आप इसे खेलते हैं, वह स्वयं इच्छा है.’’ नेहरू ने हर व्यक्ति को अपनी इच्छा से चलने की स्वतंत्रता संविधान से ले कर हिंदू कोड बिल और जमींदारी उन्मूलन से दी, लेकिन भारतीय जनता पार्टी, जिस की जड़ में हिंदू महासभा, राम राज्य परिषद हैं, के नरेंद्र मोदी ने 2014 में केंद्र की सत्ता में आते ही इसे नोटबंदी, जीएसटी, कृषि कानूनों, लैटरल एंट्री, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को समाप्त कर छीन ली जिन से आम लोगों के अधिकार कम होने लगे. राज्यों की संघीय शक्तियां भी पिछले 10 वर्षों में कम हुईं.

नेहरू ने जो लड़ाई लड़ी, नई लड़ाई नहीं थी बल्कि आजादी के पहले से चली आ रही थी. दोटूक कहें तो यह लड़ाई सवर्ण उच्च पुरुष बनाम दलित, आदिवासी मुसलमान और सवर्ण औरतें थी. लेकिन इन औरतों की भूमिका अदृश्य थी जिन्हें भीमराव अंबेडकर ने सब से पहले कानूनी तौर पर बराबरी का हक दिया था. हैरत की बात तो यह है कि इन औरतों का अंबेडकर से सीधे कोई लेनादेना ही नहीं था. लेकिन नेहरू और अंबेडकर को उन की चिंता थी कि अगर इन के हक में कानून नहीं बने तो ये पौराणिक युग की महिलाओं जैसे पुरुषों की गुलामी ढोती रहेंगी जिस का असर देश की तरक्की पर भी पड़ेगा. 1937 में चुनाव हुए थे जिन में महज 3 करोड़ वोटर थे जो तब की आबादी के 6ठे हिस्से थे. कुछ ही औरतों को वोट डालने का हक मिला था. प्रोविंसों के चुनावों से चुने लोगों ने कौंस्टीट्युएंट असैंबली चुनी थी जिस ने भारत का संविधान बनाया जिस में हर नागरिक को वोट देने का अधिकार मिला. शूद्रों, दलितों, उन की औरतों और सवर्ण औरतों को पहली बार वोट डालने का मौका मिला.

हिंदू कोड बिल और कट्टरपंथियों का विरोध

वह 11 अप्रैल, 1947 का दिन था जब अंबेडकर ने चुनावों से पहले बनी संविधान सभा के सामने हिंदू कोड बिल का मसौदा पेश किया. तब तक भारत को आजादी भी नहीं मिली थी पर यह पक्का था कि ब्रिटिश भारत का विभाजन होगा. इस बिल के एक प्रावधान के मुताबिक अगर कोई हिंदू पुरुष बिना वसीयत किए मर जाता है तो मृतक की विधवा, पुत्र और पुत्री को उस की संपत्ति में बराबर का अधिकार मिलेगा. अलावा इस के, बेटियों को भी बेटों की तरह जायदाद में बराबर का हक देने की बात कही गई थी. इतना ही नहीं, हिंदू कोड बिल हिंदू पुरुषों को एक से ज्यादा शादी करने को भी प्रतिबंधित करने की बात कह रहा था और हैरतअंगेज तरीके से महिलाओं को भी तलाक का अधिकार देने की वकालत कर रहा था.

इस के बाद क्या हुआ, यह जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि आजादी के वक्त तक औरतों को, सवर्णों की औरतों को भी, कोई हक ही हासिल नहीं था. उन की हालत घर के आंगन में बंधे मवेशियों सरीखी हुआ करती थी. पति दो, तीन या चार या 16,000 शादियां कर ले तो वे विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थीं क्योंकि इस का अंजाम होता अहल्या या सीता जैसी श्रापित जिंदगी जीना या फिर घरपरिवार, समाज से निष्काषित हो कर किसी तीर्थस्थल या आश्रम में भीख मांगना व हर कभी शारीरिक शोषण के लिए तैयार रहना. तब की तथाकथित सभ्य ऊंची सवर्ण जातियों के शिक्षित और अभिजात्य समाज में औरतों की यह बदहाली आम थी. उस की हैसियत एक दासी और पांव की जूती जैसी ही हुआ करती थी.

सवर्ण हिंदू समाज औरतों के प्रति कितना क्रूर और बर्बर था (और एक हद तक आज भी है), सतीप्रथा इस का बेहतर उदाहरण है, जिस पर अंगरेजों ने साल 1829 में कानून बना कर रोक लगाई थी. लेकिन इस से समस्या पूरी तरह हल नहीं हो पाई. विधवाएं, खासतौर से सवर्ण विधवाएं, आज भी पारिवारिक, सामाजिक और उस से भी ज्यादा धार्मिक तिरस्कार की शिकार हैं. उन्हें मनहूस की उपाधि मिली हुई है. इस स्थिति से बचने के लिए कई महिलाएं पति की मौत के बाद आत्महत्या कर लेती हैं क्योंकि वे इस अनदेखी को बरदाश्त नहीं कर पातीं. बारबार करवाचौथ को शानोशौकत से मनाना इसी मानसिकता की निशानी है. मंगलसूत्र के नाम पर आज वोट मांगने/लेने की कोशिश वही मानसिकता है.

हिंदू कोड बिल में महिलाओं को संपत्ति का अधिकार देने का अंबेडकर का मकसद यही था कि महिलाएं आत्मसम्मान और स्वाभिमान की जिंदगी जिएं. एक हद तक वे अपने मकसद में कामयाब भी रहे हैं. यानी, कानून बना कर ही समाज सुधार किया जा सकता है. यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं रह जाती.

हिंदू समाज या धर्मसत्तात्मक समाज का लाभ पुरुषों को मिलता है. यह हकीकत सम?ाते हुए अंबेडकर ने जो कानून बनाए उन्हें देख कट्टरवादी इतना तिलमिलाए थे कि एक दफा तो उन का विरोध देख नेहरू ने इस्तीफे तक की पेशकश कर डाली थी. हिंदू कोड बिल चूंकि कई कुरीतियों को दूर कर रहा था इसलिए कट्टरपंथियों ने जम कर बवाल काटा था. दरअसल इस से ब्राह्मणों, पंडेपुजारियों, पेशवाओं और सामंतों का कारोबार भी खतरे में पड़ रहा था और समाज पर से उन का दबदबा भी खत्म हो रहा था.

तब हिंदूवादियों ने एक दलील यह दी थी कि संसद सदस्यों को जनता ने नहीं चुना है, इसलिए इतने बड़े विधेयक को पारित करने का संसद को अधिकार नहीं है. उधर संसद के बाहर करपात्री महाराज यानी हरिहरानंद उर्फ हरिनारायण ओझा धरनाप्रदर्शनों के जरिए विरोध जता रहे थे.

राम राज्य परिषद के संस्थापक इस संत ने तो यहां तक कह दिया था कि हम एक अछूत का लिखा संविधान नहीं मानेंगे. यह बिल हिंदू धर्म में हस्तक्षेप है. यह हिंदू रीतिरिवाजों, परंपराओं और धर्मशास्त्रों के खिलाफ है. उसी वक्त आरएसएस भी देशभर में प्रदर्शन कर हिंदू कोड बिल की मुखालफत कर रहा था.

निर्णायक कदम

नेहरू ने सियासी जोखिम उठाते साफ कर दिया था कि अगर पहले आम चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला तो ही वे हिंदू कोड बिल वाले कानून बनाएंगे. कांग्रेस को बहुमत मिला तो उन्होंने अपना कहा पूरा भी किया क्योंकि मुसलमानों, दलित, आदिवासियों और महिलाओं ने भी कांग्रेस पर भरोसा जताते इन सुधारवादी कानूनों की बाबत अपनी सहमति नेहरू की अगुआई वाली कांग्रेस को दी थी.

1950 में लागू संविधान का बनाया जाना, उस की एकएक धारा पर लंबी, गंभीर और बेहद सार्थक बहस होना एक उदार नेता की देन है. जवाहरलाल नेहरू इस मामले में महात्मा गांधी और सरदार पटेल जैसे नेताओं से अलग थे. उन्हें राजनीति में क्यों सर्वसहमति का स्थान मिल गया, यह एक रहस्य सा ही है क्योंकि वे कट्टरपंथियों के बीच तार्किक शक्ति थे और बेहद अल्पमत में होते हुए भी अपनी मंशा चला पा रहे थे.

जनता का अधिकार

जवाहरलाल नेहरू ने संविधान के जरिए देश का समाज पूरी तरह हिला डाला हालांकि उन्हें न तो इस का श्रेय मिला, न उन्होंने नरेंद्र मोदी और भाजपा की तरह इस का ढोल पीटा. उस समय उन्हें छूट थी कि वे 1947 में गवर्नर इन काउंसिल जैसी शासन पद्धति देश पर थोप देते यानी 1935 के गवर्मेंट औफ इंडिया एक्ट, जो ब्रिटिश पार्लियामैंट ने पास किया था, की तरह की सरकार बनाते जिस में न तो हरेक को बराबर माना जाता न ही हरेक को वोट का अधिकार मिलता, न मौलिक स्वतंत्रताएं होतीं. भारत की स्थिति इंगलैंड और अमेरिका से अलग थी. इन दोनों देशों में जनता ने या तो राज्य से या अपने मूल देश से लड़ कर आम जनता के लिए अधिकार हासिल किए थे पर वहां प्लेट में रख कर दिए गए, कांग्रेस की बदौलत.

भारत में आजादी की लड़ाई जनता के मौलिक अधिकारों के लिए हुई ही नहीं थी, तिलक से ले कर नेहरू तक का स्वतंत्रता संग्राम केवल इंगलैंड के शासन से मुक्ति पाने के लिए था. इस का सुबूत है कि तब 1947 में बने पाकिस्तान का शासन सिर्फ गोरे साहबों को हटा कर पंजाबी उर्दूभाषी मुसलमानों के हाथ में आया और मौलिक अधिकार वहां आज तक, असल में, नहीं हैं.

26 जनवरी, 1950 से लागू भारत के संविधान का हर शब्द एक राज्य की प्रभुसत्ता से ले कर जनता को अधिकार देता है. हर आर्टिकल में शासक के हाथ बांधे गए हैं. देश के समाज में जो बदलाव आया है, चाहे वह आधाअधूरा हो, इसी संविधान के कारण आया है और इसे जनता ने लिया नहीं, नेहरू ने दिया. इन अधिकारों के लिए कोई लड़ाई नहीं लड़ी गई.

आज कहा जा सकता है कि हिंदूहिंदू चिल्लाने से समाज का सुधार नहीं होगा. समाज का सुधार या तो जमीनी बदलाव से होता है या कानूनों से जिस के दर्शन पिछले 10 वर्षों से कहीं नहीं हो रहे हैं.

संविधान सहित जो कानून कांग्रेस ने बनाए उन से समाज में भारी बदलाव हुआ पर यह विटामिन की गोलियों की तरह का सा रहा, एंटीबोयोटिक इंजैक्शन का नहीं. दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के बाद मौर्फिन के इंजैक्शन लगा कर समाज सुधारों और जनता के अधिकारों को छीनने में कोई कसर नहीं छोड़ी और इसलिए लगता है कि नेहरू-गांधी और आज के मोदी युग में जो हुआ उसे परखा जाना चाहिए. कई भागों में प्रकाशित किए जाने वाले इस लेख में यही प्रयास किया गया है.

सरिता पत्रिका शासन की हर गलती के लिए अपनी आवाज बुलंद करती रहेगी, चाहे सरकार किसी की भी हो. सरिता का विश्वास है कि पत्रकारिता का अर्थ सत्ता में बैठे लोगों, चाहे वह सत्ता शासन की हो, धर्म की हो, समाज की हो, परिवार की हो, हर गलती को उजागर करे, जम कर उस से संघर्ष करे.

जमींदारी प्रथा का उन्मूलन

कांग्रेस सरकार ने 1950 से कानूनों के जरिए जमींदारी प्रथा भी खत्म करने का काम शुरू कर दिया था. तब जमीनें रसूखदारों की हुआ करती थीं. दलित, आदिवासी और पिछड़े तो बैल की तरह उन में जुते रहते थे. अलगअलग राज्यों ने अपनी सहूलियत से जमींदारी खत्म की तो निचले तबके के लोगों को मालिकाना हक मिलने लगा. आज जो ताकत ओबीसी, एससी के पास है वह जमींदारी प्रथा समाप्त होने के कारण मिली थी. उस ने गांवों में मिल्कीयत को बदला, कुछ जातियों का प्रभाव कम किया.

भारत में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन करने के लिए साल 1950 में जमींदारी उन्मूलन कानून बनाया गया था. यह कानून 1 जुलाई, 1952 से लागू हुआ था. इस कानून के तहत, 7 जुलाई, 1949 के बाद किसी भी संपत्ति का हस्तांतरण मान्य नहीं होगा. अगर कोई संपत्ति हस्तांतरित की जाती है तो उसे संपदा हस्तांतरक माना जाएगा. इस कानून के लागू होने के बाद, कृषकों को जमीन का स्वत्वाधिकार वापस मिल गया. इस से कृषकों और राज्य के बीच सीधा संबंध बन गया.

इस कानून को लागू करने से पहले साल 1946 में हुए चुनावों के बाद कांग्रेस के मंत्रिमंडल ने जमींदारी प्रथा खत्म करने के लिए विधेयक पेश किए थे. ये विधेयक साल 1950 से 1955 के बीच अधिनियम बन कर लागू हो गए. कुछ राज्यों, जैसे कि उत्तर प्रदेश और बिहार ने साल 1949 में ही जमींदारी उन्मूलन बिल लागू कर दिया था. अब लोगों को मालिकाना हक मिलने लगा.

भारत में जमीन की मिल्कीयत का कानून हमेशा स्पष्ट रहा है. जब अंगरेज भारत में आए और उन्होंने व्यापार करना शुरू किया तो उन्हें समझ आया कि यहां तो संपत्ति का कोई कानून न हिंदुओं का है न मुसलिम शासकों का. जमीन से लगान मिलना ही राजा की आय थी, इसलिए यह जिम्मा पंचायतों पर छोड़ रखा गया था जो मनमाने ढंग के फैसले करती थीं. अंगरेजों ने 1793 में परमानैंट सैटलमैंट के तहत एकमुश्त रकम के बदले हजारों एकड़ जमीन एक जने को दे दी कि वह जैसे चाहे लगान वसूल करे पर एक तय राशि ईस्ट इंडिया कंपनी को दे.

जमीन का वितरण

यह परमानैंट सैटलमैंट कुछ समय तो चला क्योंकि गोरे या गोरों की दी गई वरदी में भारतीय सैनिकों को लगान वसूल करने के लिए घरघर नहीं जाना पड़ता था. यह परमानैंट सैटलमैंट के अंतर्गत नियुक्त को मिला जो एक तरह से अपने इलाकों के राजा बन गए और उन्होंने हर जुल्म ढाह कर लगान वसूला. उन की शान देखते बनती थी. वे गोरे अफसरों से भी ज्यादा अमीर होने लगे. आजादी की लड़ाई के दौरान ही जमींदारी प्रथा को हटाने की मुहिम शुरू हो गई थी पर अधिकतर जमींदार ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ थे. पहले वे अंगरेजभक्त थे, बाद में धर्मभक्त बन गए.

श्यामाप्रसाद मुखर्जी (जो कांग्रेस छोड़ कर आए थे), बलराज मधोक व दीनदयाल उपाध्याय की बनाई गई भारतीय जनसंघ को इन जमींदारों का पूर्ण समर्थन मिला. जवाहरलाल नेहरू ने ही सभी कांग्रेस राज्य सरकारों के मारफत जमींदारों की जमीनों का अधिग्रहण करा डाला और राजसी समाज को लोकतांत्रिक समाज में बदलने की नींव डाल दी. जमींदारों के लठैतों की शक्ति छीन कर जमीन जोतने वालों को दे दी गई. जमीदारों के लठैतों की लाठी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आज भी प्रतीक है. जमींदारों ने पहले हिंदू भावना, फिर भारतीय जनसंघ और बाद में उन की संतानों ने भारतीय जनता पार्टी को समर्थन दिया.

भारत की कृषि क्रांति जमींदार उन्मूलन के बिना संभव न हो पाती. स्वतंत्रता के पहले दशक में भारत में अनाज की भारी कमी हुई क्योंकि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, स्कूलों में शिक्षा मिलने और जमींदारी उन्मूलन के कारण आबादी तो बढ़ी पर जमीन पर पूंजी लगाने का पैसा उन किसानों के पास नहीं था जिन्हें जमींदारों से मुक्ति तो मिल गई पर हाथ में कोरी जमीन के अलावा कुछ न था.

जमींदारी उन्मूलन के बाद ही गांवों में समाज सुधार चालू हुआ. जातिबंधन टूटने लगे. गांवों में पुश्तों से राज करने वाले ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों ने शहरों का रुख किया जहां सरकारी और गैरसरकारी नौकरियां मिल रही थीं. गांवों का समाज अगर बदला तो जमींदारी उन्मूलन कानूनों के कारण.

हिंदू कोड बिल का विरोध

कांग्रेस सरकार ने बीच में छोड़े गए हिंदू कोड बिल वाला काम पूरा करने के लिए 1955 में एचएमए विशेष विवाह अधिनियम 1954 और फिर 1955 में भारतीय दंड संहिता में धारा 498ए व आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 198ए की शुरुआत कर के हिंदू विवाह को बदला. विवाह, उत्तराधिकार और गोद लेने के लिए कांग्रेस सरकार द्वारा कानून में जो संशोधन किए गए, उन का विपक्षी पार्टियों द्वारा भयंकर विरोध हुआ. पंडोंपुजारियों ने भी हिंदू समाज को उद्वेलित कर खूब धार्मिक प्रतिरोध किया.

सब से बड़ा विरोध तलाक के प्रावधान को ले कर था, जो हिंदू धर्म के लिए अभिशाप माना जाता था. तब तक बेटियों को उन के मातापिता द्वारा यही कह कर ससुराल के लिए विदा किया जाता था कि अब वही उन का घर है और वहां से ही उन की अर्थी उठेगी. मतलब बेटी अपनी ससुराल में कितनी भी प्रताडि़त हो, मारीपीटी जाए या उस की जान ही क्यों न ले ली जाए मगर वह अपने पति से तलाक ले कर अपने मायके वापस नहीं आ सकती थी. यह स्त्रियों के प्रति हिंदू पितृसत्तात्मक समाज की सब से बड़ी क्रूरता थी, जिस से कांग्रेस ने मुक्ति दिलाई.

चाहे बेटी विवाहित हो या अविवाहित, बेटे और बेटियों को समान उत्तराधिकार के सिद्धांत का भी हिंदू पितृसत्तात्मक समाज द्वारा जम कर विरोध किया गया. विपक्षी पार्टियां और धर्म के ठेकेदार बेटियों को संपत्ति पर हक नहीं देना चाहते थे. वे उन्हें हमेशा पुरुषों पर निर्भर रखना चाहते थे. मगर कांग्रेस पार्टी ने बेटियों को आर्थिक रूप से मजबूत और स्वावलंबी बनाने के लिए घोर विरोध के बावजूद कानून में संशोधन किया.

संविधान के निर्माण और समाज सुधारों में जमींदारी उन्मूलन के बाद सब से बड़ा सुधार 1955 में बना हिंदू मैरिज एक्ट है जिस ने हिंदू समाज को बदल डाला. इन कानूनों के चलते आज के युवा बिना किसी व्यवधान के मनपसंद पार्टनर से शादी कर पा रहे हैं. जातियों का जाल भी अंतर्जातीय शादियों से टूट रहा है. 1955 के मैरिज एक्ट में एक से ज्यादा शादियों को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया. यह उन सवर्ण महिलाओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं था जो बातबेबात पर देखते ही देखते अपनी ही सौत का दरवाजे पर स्वागत और आरती उतारने को मजबूर हो जाती थीं. यह मर्दों की मनमानी पर रोक थी लेकिन औरतों की गैरत इसी से सलामत है.

इस एक्ट ने तलाक को कानूनी दर्जा दे कर भी उन की गैरत सलामत रखी और महिलाओं को भी तलाक मांगने का हक मिला जिस से वे कई दुश्वारियों से बच गईं.

एक वक्त में हिंदू पुरुष कभी भी पत्नी को घर से बाहर निकाल देने का अधिकार रखता था जो खत्म हो गया तो विवाह संस्था के सही माने भी सामने आए. श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसों ने इस का सख्त विरोध किया. वे संस्कार के नाम पर विवाह को दैविक मानते थे जबकि उन के सामने लाखों विधवाएं जानवरों से बदतर जीवन जी रही थीं.

हिंदू परिवारों में यह एक्ट क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जिस के तहत पत्नी दोयम दरजे की और आसानी से छोड़ देने या भगा देने की आशंका से मुक्त हो गई. इस कानून में जो कमियां रह गई थीं उन्हें नेहरू सरकार ने स्पैशल मैरिज एक्ट 1954 बना कर दूर किया. जिस में अंतर्धर्मीय शादियों को कोई सामाजिक और कानूनी मान्यता नहीं थी जो इस कानून के जरिए मिली. इस से पहले विधर्मी से शादी करने के लिए सब को धर्म बदलना होता था.

अधिनियम की खासीयत

इस अधिनयम की खासीयत यह है कि 2 अलगअलग धर्मों के स्त्रीपुरुष कुछ सामान्य शर्तों का पालन करते शादी कर सकते हैं और उस में धर्म व उस के ठेकेदारों का कोई दखल नहीं, रजिस्टर ही काफी है. यह और बात है कि धर्म के धंधे और मकड़जाल के अलावा लोगों का शादी को एक संस्कार समझने से यह लोकप्रिय नहीं हो पाया, नहीं तो इस से बड़ा सैक्युलर कानून शायद ही कोई और हो. फिर मोदी का यह कहना कि हम कम्युनल सिविल कोड में जी रहे हैं, एक भड़ास और कुंठा ही लगती है, जिसे वे यूसीसी या अब नए शब्द एससीसी के जरिए निकाल रहे हैं. सैक्युलर सिविल कोड तो नेहरू स्पैशल मैरिज एक्ट, इंडिया सक्सैशन एक्ट के जरिए पहले ही बना चुके हैं.

पौराणिक कानूनों की चाहत

240 पर अटकी भाजपा के लिए यह नामुमकिन सा काम है क्योंकि उस के सहयोगी दल जब लैटरल एंट्री और वक्फ जायदाद कानून पर ही सहमत नहीं तो एससीसी पर क्या राजी होंगे. एक सैकंड को मान भी लिया जाए कि ऐसा हो गया तो सब से ज्यादा नुकसान भगवाई दुशाले में लिपटे नए प्रभावित एक्ट से महिलाओं के हिस्से में आना तय दिख रहा है क्योंकि उन से शादी, तलाक और जायदाद सहित कई दूसरे अधिकार व सहूलियतें छिन जाएंगी और वे धीरेधीरे 1950 के पहले के युग में पहुंच जाएंगी. भाजपा सरकार ने अपराध कानूनों में जो बदलाव किए हैं, वे बहुत से मौलिक हकों को छीनने वाले हैं. यह उस की मानसिकता का नमूना है.

नरेंद्र मोदी शायद थक गए हैं. गठबंधन को वे ज्यादा ढो पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा, इसलिए मुमकिन है अभी से उस की तैयारी यह जताते कर रहे हैं कि अगर हिंदू अपना हित चाहते हैं, मनुस्मृति वाले पौराणिक कानूनों यानी सिर्फ सवर्ण पुरुषों का राज चाहते हैं तो मुझे 400 पार कराएं नहीं तो वे इसी तरह याद दिलाते रहेंगे कि देखो, आजादी के पहले का दौर कितना सुनहरा था कि किसी गरीब, दलित की जमीनजायदाद छीन लो, कुछ नहीं होगा. जब जी करे, उस की पीठ पर कोड़े बरसाओ, वह कहीं नहीं जाएगा क्योंकि उस की सुनवाई के लिए कोई थाना, अदालत और कानून नहीं. जब चाहो दूसरी या तीसरी शादी कर लो. कोई पुलिस वाला समन या वारंट ले कर नहीं आएगा. बीवी से अनबन हो तो तलाक के लिए अदालत तो दूर की बात है पंचायत तक भी जाने की जहमत आप को नहीं उठानी पड़ेगी क्योंकि इस बाबत भी कोई कानून वजूद में नहीं होगा.

इस की वजह यह कि पिछले जन्म के पुण्यों और दानदक्षिणा के प्रताप से इस जन्म में आप ऊंची जाति के मर्द हैं. अब नेहरू सरकार ने 1955 में आप के ये ठाटबाट छीन लिए तो हम क्या करें. हमारी कोशिश तो धर्मराज की वापसी की है.

यहां एक दिलचस्प और गौरतलब बात यह भी है कि यूसीसी या एससीसी की एक मंशा उत्तराखंड की तरह देशभर में मुसलिमों से एक से ज्यादा शादी के मौके या हक छीनने की है जो बिलाशक वक्त की मांग है लेकिन इस का असर इसलाम से ज्यादा दूसरे धर्मों पर पड़ेगा.

नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे के एक ताजा सर्वे में उजागर हुआ है कि बहुविवाह की दर मुसलिमों में महज 1.9 फीसदी है जबकि ईसाईयों में उस से ज्यादा 2.1 फीसदी है. हिंदू इस मामले में मुसलमानों से 1.9 फीसदी की दर के साथ थोड़े ही पीछे हैं. बौद्ध समुदाय में यह दर 1.5 तो आदिवासियों में 2.4 फीसदी है. दलितों में यह दर 1.5 फीसदी है. यह और बात है कि इसलाम में दूसरी, तीसरी और चौथी शादी करने की अनुमति है लेकिन यह जरा भी आसान नहीं है. उस के लिए कड़ी शर्तें तय हैं.

महिलाओं को हक

हिंदू मैरिज एक्ट 1955 व स्पैशल मैरिज एक्ट 1954 अधिनियमों के बाद अगले ही साल हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 भी अस्तित्व में आ गया जिस ने महिलाओं को संपत्ति संबंधी वे बहुत सारे हक दिए जो पहले केवल पुरुषों को हासिल थे. यह अधिनियम स्पष्ट करता है कि हिंदू महिला के पास जो भी संपत्ति है उसे उस के पास पूर्ण संपत्ति के रूप में रखा जाना चाहिए और इस से निबटने व अपनी मरजी से इसे निबटाने का महिला को पूरा हक है. हर पुरुष की अपनी कमाई संपत्ति में पत्नी, मां व बेटियों को बराबर का हिस्सा दिया गया. यह अद्भुत था. अचानक कानून ने औरतों के लिए हकों का सैलाब बना दिया.

यह एक अकल्पनीय बात महिलाओं के लिए थी क्योंकि सनातनियों का संविधान और कानून मनुस्मृति तो उसे संपत्ति का अधिकार देता ही नहीं. उलटे, उसे ही पुरुषों की संपत्ति करार देता है. आज की नौकरीपेशा और व्यवसायी महिला को जो आत्मविश्वास और सम्मान हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम ने दिया है वह सामाजिक क्रांति साबित हुई है. आज भारत में जो आजादी औरतों में दिख रही है, वह उसी की देन है.

उसी साल पास हुआ हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरणपोषण अधिनियम 1956 गोद लिए बच्चे के अधिकार जैविक संतान की तरह सुनिश्चित करता है बल्कि कुछ शर्तों के साथ गोद लेने की प्रक्रिया को भी परिभाषित करता है. अलावा इस के, यह एक्ट विधवा बहुओं और मातापिता के भरणपोषण की जिम्मेदारी भी तय करता है. यानी, अब विधवा का हक कोई हड़प नहीं सकता. आज भी आएदिन ऐसे समाचार सुर्खियों में रहते हैं कि बूढ़े अशक्त मांबाप ने बेटे या बेटी पर भरणपोषण का दावा किया.

ये मामले बताते हैं कि मांबाप की महिमा का राग अलापते रहने वाले धर्म की हकीकत दरअसल क्या है और कैसे कानून के जरिए उसे सुधारा गया. हिंदू धर्म ने कभी औरतों की सुध नहीं ली. आज भी कोई हिंदू धर्म की सुधार की बात नहीं कर रहा. भगवा गैंग उन्हें मंदिरों में धकेल रहा है और अंधविश्वासी बना रहा है.

इसी तरह हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम 1956 नाबालिगों के संपत्ति संबंधी अधिकारों को परिभाषित करता है. अवयस्कों के अधिकार किसी भी समाज में वयस्कों जितने ही अहम होते हैं. उन के अधिकारों के लिए बना यह अधिनियम भी मील का पत्थर साबित हुआ.

दहेज निषेध अधिनियम 1961

दहेज निषेध अधिनियम के बावजूद देश में दहेज की प्रथा को रोकना असंभव माना गया. इस के अतिरिक्त दहेज की मांग को पूरा करने के लिए ससुराल पक्ष और पति स्त्री के साथ विभिन्न प्रकार की क्रूरताएं करता और कहींकहीं तो स्त्री को जान से भी मार दिया जाता. महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए कांग्रेस सरकार ने कानून में संशोधन किया.

1984 में कानून में बदलाव करते हुए, जो 2 अक्तूबर 1985 को लागू हुआ, कहा गया कि शादी के समय दुलहन या दूल्हे को उपहार देने की अनुमति है मगर प्रत्येक उपहार, उस का मूल्य, इसे देने वाले व्यक्ति की पहचान और विवाह में किसी भी पक्ष के साथ व्यक्ति के संबंध का वर्णन करते हुए एक सूची बनाई जानी आवश्यक है. दहेज संबंधी हिंसा की पीडि़त महिलाओं की सुरक्षा के लिए अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की प्रासंगिक धाराओं में और संशोधन किए गए.

दहेज निषेध अधिनियम, भारतीय कानून? 1 मई, 1961 को अधिनियमित किया गया, जिस का उद्देश्य दहेज देने या लेने को रोकना है. दहेज निषेध अधिनियम के तहत, विवाह के किसी भी पक्ष द्वारा या विवाह के संबंध में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी गई संपत्ति, सामान या धन दहेज में शामिल है. दहेज निषेध अधिनियम भारत में सभी धर्मों के व्यक्तियों पर लागू होता है.

एक और कानून संविधान के संशोधन के साथ लाया गया जिस में आर्टिकल 45 जोड़ा गया जिस के अनुसार 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान करने का निर्देश था (बाद में शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दिया गया). 1950 से 1960 के बीच सरकारी प्राइमरी स्कूलों, जिन में हर जाति, हर धर्म के बच्चे जा सकते थे, की संख्या 2,09,700 बढ़ने लगी. 1988 तक 5,48,100 स्कूल हो गए थे जिन्होंने असल में समाज को बदला. 1950 में शहरी बच्चे तो 90 फीसदी स्कूलों में जा रहे थे जो ब्रिटिश सरकार ने म्यूनिसिपल बौडीज से खुलवाए थे पर गांवों में केवल 20 फीसदी पढ़ रहे थे. स्कूलों की शिक्षा का देश पर बड़ा प्रभाव पड़ा जिसे आज गिनाने की जरूरत नहीं है. उस समय केवल कुछ क्रिश्चियन स्कूल ही प्राइवेट स्कूल थे. अधिकांश नेता सरकारी शिक्षा प्राप्त कर के ही आए थे.

समाज सुधार का एक बड़ा कदम असल में संविधान में आरक्षण से कर दिया गया. कांस्टीट्यूशनल एसैंबली (संविधान सभा) ने न केवल नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की व्यवस्था की, उस ने लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 1932 के पूना पैक्ट के अनुसार आरक्षण दे दिया. इस सुधार के कारण अछूतों जिन्हें, एससी, एसटी कहा जा रहा है, की एक पौध पैदा हो गई जो अब तक चाहे पूरे समाज को बदल न पाई हो पर अब इज्जत से जी सकती है. यह संविधान संसद की उस गोल बिल्डिंग से निकला जिसे मोदी सरकार ने नए संसद भवन की शास्त्रीय हिंदू धार्मिक पूजापाठ किए जाने के बाद छोड़ दिया. शायद उन की हिम्मत गोल भवन को गंगाजल से धोने की नहीं हुई और उन्होंने सैकड़ों करोड़ रुपए का खर्च नए संसद भवन के लिए जनता के सिर पर मढ़ दिया.

वैज्ञानिक सोच पर जोर

जवाहरलाल नेहरू ने संस्कृति के सार को आंतरिक विकास, दूसरों के प्रति व्यवहार, दूसरों को समझने की क्षमता और सभी को स्वयं को सम?ाने की क्षमता के रूप में लिया. इस के जरिए नेहरू ने विज्ञान एवं वैज्ञानिक सोच पर बल दिया. इस का भारत की संस्कृति पर एक नवीनीकरणकारी प्रभाव पड़ा. उन्होंने तानाशाही, रूढि़वाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ देश में एक माहौल बनाने का काम किया था. उसी दौरान भारतीय जनसंघ का परिवार अपना काम करता रहा और हिंदू की रक्षा के बहाने उसे इन सुधारों से उलट दिशा में ले जाने वाले कदम उठाता रहा.

नेहरू का मानना था कि वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी प्रगति भारत और उस के लोगों की वृद्धि के लिए आवश्यक हैं. नेहरू ने नवाचार को बढ़ावा देने और आर्थिक विकास को चलाने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, शिक्षा और बुनियादी ढांचे पर जोर दिया था. वे वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष थे जिस ने राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं और ?अन्य वैज्ञानिक संस्थानों को बनाने में अहम भूमिका अदा की.

विज्ञान की शिक्षा का असर गुरुकुलों की शिक्षा से अलग होता है. विज्ञान न धर्म देखता है, न जाति, न देश, न रंग, न जैंडर, न आयु. नेहरू की वैज्ञानिक शिक्षा जिस के स्कूलों में दिए जाने से एक नई चेतना आई हालांकि उसी समय हिंदूमुसलमान, गौपूजा, पूजापाठ, संस्कार, अखंड भारत का प्रचार कर के समाज के अग्रणी, पढ़ेलिखे वर्ग के कुछ लोग हिंदू महासभा व भारतीय जनसंघ के मारफत पुरातनवादी विचार भी थोप रहे थे. पाकिस्तान में बढ़ती कट्टरता के कारण हिंदू भयभीत भी थे कि कहीं फिर से मुगलों जैसा राज भारत में न हो जाए.

भारत जैसे देश में ही नहीं, शिक्षित अमेरिका में भी गुलामी के लिए हुए गृहयुद्ध के 150 वर्षों बाद भी वहां मौजूद 13-14 फीसदी अश्वेत आज भी बराबरी का स्थान नहीं पा पाए हैं. अश्वेत बराक ओबामा 8 वर्ष राष्ट्रपति रहे, अब अश्वेत कमला हैरिस राष्ट्रपति पद के लिए डैमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हैं पर जमीनी तथ्य यह है कि अश्वेतों का दर्जा आज भी दोयम है, उन्हें जेलों में मारा जाता है. 20 डौलर के नोट के ?ागड़े को ले कर एक अश्वेत की गोरे पुलिसमैन द्वारा टांग से गरदन दबा कर हत्या तक कर दी जाती है.

यही भारत में हुआ है. शुरुआती दशकों में कानूनों से समाज सुधार और समाज बदलाव का प्रयास किया गया पर साथ ही, ठीक उलटी दशा में चलने वाला हिंदू गौरव का ढोल और जोर से बजने लगा. 80 फीसदी हिंदू जनसंख्या वाले देश में इस ढोल की कर्कश आवाज बंद करना असंभव था और नतीजा था कि बहुत से समाज सुधार, जो कानूनों से लाए गए, कानूनी किताबों के पन्नों में बस फड़फड़ा रहे हैं. फिर भी संतोष है कि आज कानूनी ढांचा ऐसा है कि कट्टरपंथी एक हद तक ही जा पाते हैं.

इस के बाद के दशकों में किन कानूनों में क्या हुआ, इस बारे में अगले अंकों में पढ़ें.

अगले अंक में जारी…

रीता सा शजर-ए-बहार

मोबाइल में समय देखते ही एकाएक अगले मैट्रो स्टेशन पर बिना कुछ सोचे वह उतर गया. ग्रीन पार्क मैट्रो स्टेशन से निकल कर धीरेधीरे चलते हुए ग्रीन पार्क इलाके की छोटी सी म्युनिसिपल मार्केट की ओर निकल आया, यह सोच कर कि वहीं रेहड़ीपटरी से कुछ ले कर खा लेगा. लेकिन आसपास कोई रेहड़ीपटरी वाला नहीं था तो वहीं एक छोटे से तिकोने पार्क की मुंडेर पर बैठ गया यह सोचते हुए कि इतनी जल्दी वापस जा कर भी क्या करेगा. कुछ देर यों ही इधरउधर देखता रहा और आतीजाती गाडि़यों को गिनने लगा. वापस घर जाने की कोई तो वजह होनी ही चाहिए हर इंसान के पास. मगर उस के पास कोई वजह ही नहीं है.

बहुत मुश्किल है 50 की उम्र में फिर से काम की तलाश में यहांवहां भटकना और मायूसी में आ कर बिस्तर पर पड़ जाना. दिल्ली की गरमी जूनजुलाई में अपने पूरे शबाब पर होती है मगर आज बादल छाए हुए हैं तो हवा में तपिश नहीं है. फिर वह उठ कर टहलने लगा. इस के दाहिने ओर सड़क के उस तरफ एक ऊंची दीवार दूर तक जाती दिखाई दे रही थी और उस के बाएं थोड़ी दूर पर ऊंची रिहायशी इमारतें.

चलतेचलते उस की निगाह सामने बड़े से गेट के ऊपर स्पास्टिक सोसाइटी औफ नौर्दर्न इंडिया के बोर्ड पर पड़ी तो वह सड़क पार कर वहां पहुंचा कि शायद इन्हें किसी वौलंटियर की जरूरत हो. पता करने में क्या हर्ज.

वह गेट की ओर बढ़ गया. गेट की सलाखों से भीतर झांका तो दूर तक हरियाली फैली हुई थी. उसे ऐसे झांकते देख कर गार्ड दौड़ता हुआ आया. उस से बात करने पर मालूम हुआ कि दोपहर 2 बजे तक ही मैडम मिलती हैं जो यहां की सर्वेसर्वा हैं. उसे शुक्रिया कहते हुए वह मायूस हो कर वहीं लौट आया.

भूख तो लग रही थी. उस ने छोटी सी मार्केट पर नजर डाली. एक पर आयशा बुटीक का बोर्ड था, एक बार्बर शौप और एक अन्नपूर्णा स्वीट. यार, यह तो महंगी दुकान है, कुछ खाया तो बहुत पैसे खर्च हो जाएंगे, सारा मसला तो पैसे का ही है.

यही सोचते वह वहीं उसी मुंडेर पर आ कर बैठ गया. कुछ ही पल बीते थे कि एक अधेड़ उम्र की महिला कार से उतर कर उस के नजदीक आ कर बैठ गई. उस ने देखा कि पकी उम्र के बावजूद वह खूबसूरत दिख रही थी. बस, खिचड़ी बाल उस की उम्र की चुगली कर रहे थे, शायद खिजाब का इस्तेमाल नहीं करती.

‘‘सिगरेट है तुम्हारे पास?’’ उस के इस अप्रत्यक्ष सवाल से हतप्रभ सा वह उसे ही देखता रह गया.

‘‘क्यों, क्या तुम स्मोक नहीं करते?’’

‘‘जी, अब नहीं.’’

‘‘मतलब; पहले करते थे तो छोड़ क्यों दी?’’

‘‘जी, दिल की वजह से.’’

‘‘मतलब इश्क?’’

‘‘नहीं, स्टंट,’’ कह कर वह मुसकरा दिया.

‘‘मतलब कि दिल के ही मरीज हो, दोनों एक ही बात है,’’ और वह खिलखिला कर हंस दी. हवा में थोड़ी ठंडक सी बढ़ती महसूस हुई.

‘‘कमबख्त मु झ से छूटती ही नहीं. डाक्टर भी वार्निंग दे चुके हैं. मगर लगता है मु झे भी दिल का दर्द लेना होगा सिगरेट जैसी बुरी लत को छोड़ने के लिए.’’

‘‘आप के साथ ऐसा न हो,’’ एकदम उस की जबान से निकला.

उस ने नजरें उठा कर उसे गौर से देखा और बोली, ‘‘मेरे लिए सिगरेट ला दोगे और 2 ले कर आना.’’

‘‘2,’’ उस ने उठते हुए सवालिया निगाह से देखा.

‘‘अकेला होना सिगरेट को भी तो बुरा लगता होगा न?’’ और वह फिर खिलखिला दी. आसमान में बादल थोड़े से और काले पड़ने लगे.

थोड़ा आगे चल कर कोने में बनी छोटी सी पानबीड़ी की दुकान पर पहुंच कर उस ने सिगरेट मांगी.

‘‘कौन सी सिगरेट बाबू?’’

‘धत्त तेरी, यह पूछा ही नहीं उस से,’ उस ने मन ही मन खुद को लताड़ा. लड़कियों को मोर ब्रैंड की सिगरेट बहुत पसंद होती है, लगभग 30 वर्ष पहले कही गई उस की कालेजफ्रैंड नीलिमा की बात अचानक याद आ गई.

‘‘मोर की सिगरेट है तुम्हारे पास?’’ उस की बात सुन कर दुकानदार ने मुसकरा कर उसे गौर से देखा और बोला, ‘‘मिल तो जाएगी बाबू, डेढ़ सौ की एक पड़ेगी.’’

उस ने बिना कुछ कहे 300 रुपए उसे दिए और 2 सिगरेट ले कर मुड़ा तो दुकानदार आवाज लगा कर उसे माचिस देते हुए बोला, ‘‘बाबू यह भी लेते जाओ, जलाने के लिए किस से मांगोगे?’’

दुकानदार की इस सम झदारी और दयालुता की मन ही मन तारीफ करता हुआ वह वापस अपनी जगह लौट आया लेकिन महिला वहां नहीं थी. इधरउधर नजरें दौड़ाईं तो उस की औडी भी वहां नहीं थी. कुछ मिनट इधरउधर देखने के बाद वह फिर उसी मुंडेर पर बैठ गया.

कहां चली गई सिगरेट मंगा कर? खामखां मु झे हैरान किया. अब इन सिगरेट्स का मैं क्या करूं? दुकानदार को वापस कर दूं? नहीं यार, उसे बुरा लगेगा. उसे क्या हर दुकानदार को बुरा लगेगा बिकी हुई चीज के पैसे वापस करना और फिर यह दुकानदार तो भला मानस है. वरना कौन इस बात की परवा करता है कि सिगरेट ले जाने के बाद कोई उसे जलाएगा कैसे. वह तो सब ठीक है मगर अब इन का करूं क्या?

इसी उधेड़बुन में था कि किसी के हाथ कंधे पर महसूस हुए. उस ने थोड़ा घूम कर देखा तो वह खड़ी मुसकरा रही थी.

‘‘मुझे मिस कर रहे हो न?’’ कहती हुई उस के नजदीक बैठ गई.

‘‘जी, लीजिए आप की सिगरेट.’’

‘‘तुम्हें लड़कियों की पसंद की काफी नौलेज है,’’ उस ने सिगरेट लेते हुए कहा.

‘‘जी, ऐसा कुछ नहीं है. लेकिन आप ऐसा क्यों कह रही हैं?’’

उस ने कोई जवाब नहीं दिया. बस, चुपचाप सिगरेट जलाने के साथ एक गहरा कश लगा कर धुआं नाक से छोड़ती हुई बोली, ‘‘लो, एक कश तुम भी लगा लो.’’

‘‘नहीं,’’ उस ने उस के चेहरे को गौर से देखते हुए इनकार किया.

‘‘लो, ले लो, एक सुट्टे से कुछ नहीं होता,’’ और उस ने सिगरेट उस के हाथ में पकड़ा दी. वैसे भी, नशा करने का मजा अकेले नहीं लिया जाता.

‘‘एक्चुअली मैं गाड़ी पीछे पार्किंग में लगाने चली गई थी तुम्हें बिना बताए, बुरा मत मानना.’’

‘‘क्यों, क्या कोई फर्क पड़ता है?’’ सिगरेट अभी उस की उंगलियों में ही थी.

‘‘तुम इतने उखड़े से क्यों हो? देखने में तो सोफेस्टिकेटिड लग रहे हो और तुम्हारी लैंग्वेज व अंदाज बता रहा है कि एजुकेटेड भी हो. सबकुछ खो चुके हो?’’

उस के सवाल से उस की गरदन हलकी सी झुक गई.

‘‘मर्दों के कंधे और गरदन हमेशा सीधे ही अच्छे लगते हैं, सीधे हो कर बैठो,’’ उस की आवाज में नायकों जैसी खनक थी.

उस ने अपनी उंगलियों में फंसी सिगरेट उसे वापस पकड़ा दी.

‘‘किसी से प्रौमिस किया है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘फिर?’’

‘‘नहीं, बस यों ही.’’

‘‘सोफेस्टिकेटिड लगना क्या नकलीपन नहीं है?’’

‘‘सोफेस्टिकेटिड होना जरूरी है और होना भी चाहिए.’’

‘‘मैं केवल सोफेस्टिकेटिड लग भर रहा हूं, शायद, हूं नहीं.’’

वह बहुत देर तक उस के चेहरे को पढ़ती सी रही, फिर एकाएक बोली, ‘‘एक अजनबी लड़की के सामने ऐब करते हुए शरमा रहे हो,’’ और वह फिर खिलखिला कर हंस दी. हवा में ठंडक और नमी बढ़ने लगी. ‘‘तुम्हें अजीब सा नहीं लग रहा है कि एक अजनबी लड़की इतनी बेतकल्लुफी से बातें कर रही है और सिगरेट मंगा कर पी रही है?’’

‘‘नहीं, इस में क्या अजीब? बस, यही अलग सा लग रहा है कि एक औडी वाली महिला अपनी एयरकंडीशंड गाड़ी से उतर कर यों गरमी में मुझ अजनबी से क्यों…’’

‘‘ओय, महिला मत बोल,’’ वह सीधे तू पर आ गई.

‘‘तो?’’

‘‘लड़की बोल, गर्ल्स बोलते हुए मौत आती है?’’

उस की इस बात पर वह मुसकरा कर रह गया.

‘‘क्या सुबह से कुछ नहीं खाया?’’ उस ने सवालिया निगाह से उसे देखा, ‘‘इतनी फीकी मुसकान सिर्फ भूखे पेट वालों की होती है. चल, कुछ खा कर आते हैं,’’ वह उठते हुए बोली.

लेकिन वह बैठा ही रहा.

‘‘ओए, चल न. क्यों भैंस की तरह पसरा है? चल, खड़ा हो,’’ उस ने उस का हाथ पकड़ कर उठाने की कोशिश की.

‘‘अरे, सुनिए तो,’’ उस ने झिझकते हुए कहा, ‘‘मेरे पास पैसे नहीं हैं.’’

उस की यह बात सुन कर वह अपनी ऐड़ी पर थ्रीसिक्सटी डिग्री घूम गई और ठहाका लगा कर हंसती हुई बोली, ‘‘यार, अपनी 47 की एज में पहली बार एक लड़के को एक लड़की से यह कहते हुए सुन कर मजा आ गया.’’ फिर एकाएक धीरे से बोली, ‘‘बीवी छोड़ कर चली गई?’’ फिर उस का हाथ पकड़ कर ग्रीन पार्क की मेन मार्केट की ओर बढ़ चली.

वह बिना कुछ कहे सम्मोहित सा उस के साथ चल दिया, यह सोचते हुए कि क्या यह कोई जादूगरनी है अथवा ब्रेन रीडर. जो भी है, है बिलकुल निश्च्छल. अपने मस्तिष्क में ढेर सारे सवाल लिए उस के कदम से कदम मिला कर चलता रहा और वह उसे ले कर बर्गर शौप में एक टेबल के सामने बैठ गई. 2 बर्गर और 2 सौफ्ट ड्रिंक वेटर उन के सामने रख कर हट गया.

‘‘चलो, अब शुरू करो,’’ और वह खाने में मशगूल हो गई. लेकिन उस की निगाह उसी के चेहरे पर टिकी रह गई.

‘‘ज्यादा सोचने से कुछ हासिल नहीं होता. बस, ब्लडप्रैशर बढ़ जाता है. मैडिसन तो लेते होगे हार्ट के लिए? वैसे, बीपी की मैडिसन तो मैं भी लेती हूं, फिर हार्ट की मैडिसन तो और भी कौस्टली आती है, फिर?’’

‘‘जी, मैं कुछ सम झा नहीं.’’

‘‘या फिर सम झना नहीं चाहते? सैंसिटिव लोग हमेशा तकलीफ में रहते हैं.’’

‘‘आप भी सैंसिटिव हो?’’

‘‘हां, थोड़ी तो हूं, लेकिन इतनी नहीं कि सबकुछ गंवा दूं.’’

‘‘जी, प्रैक्टिकल होना अच्छी बात है.’’

‘‘तुम क्यों नहीं हुए? जबकि पुरुष सच में प्रैक्टिकल होते हैं. यह पूरी दुनिया उन्हीं की रचाई हुई है. स्त्रियों ने क्या किया बच्चे जनने के सिवा. तुम्हारे कितने बच्चे हैं?’’

‘‘शायद, आप ज्यादा पर्सनल हो रही हैं.’’

‘‘तो एक?’’ इतनी हैरानी से मेरा मुंह मत देखो. खाते रहो. हम खाते हुए भी बात कर सकते हैं.’’

‘‘चलिए, फिनिश हो गया,’’ उस ने उठते हुए कहा.

‘‘बेटे से इतना प्यार करते हो? वह अपनी मां के साथ है?’’

‘‘मु झ भूखे को खाना खिलाने के लिए थैंक्यू.’’

‘‘थैंक्यू मत कहो,’’ फिर उस की वही नायिकाओं वाली खनक गूंज गई और उस का हाथ पकड़ कर पेमैंट करती हुई बाहर चली आई.

‘‘मैं ने तो तुम्हें थैंक्यू नहीं कहा, मियां.’’

उस ने जल्दी से हाथ छुड़ा कर सामने आते हुए कहा, ‘‘आप यह सब कैसे…’’

‘‘अरे मस्तक पर सजदे का इतना बड़ा निशान ले कर घूम रहे हो, अंधा भी जान जाएगा कि… अबे तुम सच में इतने ही भोले हो?’’ और वह फिर खिलखिला दी. चलते हुए बाजार में सभी की निगाहें उस पर आ कर रुक गईं.

‘‘अब तुम वही फौरमैलिटी वाले सवाल मत पूछना कि तुम कौन हो और इतना सब कैसे जानती हो?’’ उस ने फिर से उस का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘आओ चलें,’’ चलते हुए अपनी गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए बोली, ‘‘कार तो चला लेते होगे?’’

‘‘जी, मगर मेरा लाइसैंस रिन्यू नहीं हुआ है.’’

‘‘क्यों, यही सोच कर कि अब गाड़ी नहीं रही तो ड्राइविंग लाइसैंस का क्या, यही न? चलो, मेरे साथ बैठो, ड्राइविंग मैं करती हूं. तुम भी याद रखोगे कि एक शानदार पायलट के साथ लौंग ड्राइव पर गए थे.’’

‘‘लौंग ड्राइव?’’

‘‘क्यों डर गए क्या?’’ वह फिर खिलखिला कर हंस दी.

‘‘घर पर कोई इंतजार तो नहीं करेगा?’’

‘‘कोई नहीं.’’

‘‘फिर ठीक है. आओ बैठो, चलते हैं,’’ और उस ने कार आगे बढ़ा दी.

‘‘मकान किराए का है या…?’’

‘‘जी, बस वही बचा रहा. मकान नहीं, फ्लैट है. पुश्तैनी है तो बच गया.’’

‘‘हूं.’’ और वह बिना कुछ बोले गाड़ी चलाती रही.

‘‘दोबारा जीरो से शुरू करना बहुत मुश्किल होता है, है न?’’ और वह कनखियों से देखती इंतजार करती रही कि शायद वह कुछ बोले, लेकिन वह चुप बाहर खिड़की से झांकता रहा.

‘‘तुम्हें डर तो नहीं लग रहा?’’

‘‘डर, कैसा डर?’’

‘‘कुछ नहीं. बस यों ही पूछ लिया.’’

कुछ ही देर में गाड़ी महरौली की पहाडि़यों में किसी मकबरे के दरवाजे पर थी. उस ने सवालिया निगाहों से उसे देखा तो वह उतरते हुए बोली, ‘‘आओ चलें.’’ फिर उस ने गाड़ी में से स्कार्फ निकाल कर सिर पर बांध लिया और वहीं नजदीक एक दुकान से फूलों की टोकरी ले कर उस का हाथ थामे दरवाजे की ओर बढ़ गई. अंदर जा कर उस ने बड़ी तन्मयता से फूल बिछाए और हाथ जोड़ कर होंठों ही होंठों में बुदबुदाने लगी.

वह उसे ऐसा करते देख विस्मित था. कुछ देर बाद वह माथा टेक कर आते ही उस का हाथ पकड़ एक तरफ ले जा कर आंखें तरेरते हुए बोली, ‘‘तुम ने न दुआ मांगी और न ही सिर ढका? क्यों?’’

उस के इस तरह से झिड़कने पर वह सिर्फ मुसकरा दिया.

‘‘जवाब दो, क्या तुम वहाबी हो?’’

‘‘आप यह सब जानती हैं?’’

‘‘मेरे जानने या न जानने से कुछ फर्क पड़ने वाला नहीं है.’’

‘‘फिर यह सब जानने में इतना इंट्रैस्ट क्यों?’’

‘‘मतलब, कम्युनिस्ट हो?’’

‘नहीं, हो तो तुम मजहबी ही,’ वह खुद से खुद ही बोली.

उस ने उस की कलाई पकड़ी और दूर ले जा कर बैठ गया.

‘‘क्या तुम राइटर हो या पेंटर?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘तुम्हारे हाथ बहुत सौफ्ट हैं.’’

‘‘आप का इंट्यूशन क्या कहता है?’’

‘‘यही कि मुझे तुम से प्यार होता जा रहा है.’’

‘‘आप की इस बात पर हंसा जा सकता है.’’

‘‘तो हंसो, रोका किस ने है? मैं भी देखना चाहती हूं कि हंसते हुए तुम कैसे दिखते हो.’’

‘‘आप ने तो कहा था कि आप प्रैक्टिकली स्ट्रौंग हैं?’’

‘‘क्या यथार्थवादी प्रेम नहीं कर सकते?’’

‘‘कर सकते हैं मगर मु झ जैसे फटीचर से नहीं.’’

‘‘खुद को फटीचर मत कहो,’’ उस की फिर वही नायिकाओं वाली खनक गूंज गई.

कुछ देर वह उस के चेहरे को यों ही देखता रहा, फिर बोला, ‘‘मैं बालों को खिजाब से रंगता हूं.’’

‘‘उम्र बालों से नहीं, चेहरे से दिखती है.’’

‘‘मेरा तात्पर्य उम्र से नहीं, बल्कि सचाई से है, मैं सच्चा नहीं हूं जबकि आप सच्ची हैं.’’

‘‘हर वक्त गहरा सोचना जरूरी तो नहीं.’’

‘‘जी, आदत हो जाती है. आप भी अकेली हैं?’’

‘‘मुझ में इंट्रैस्ट ले रहे हो?’’

‘‘शायद. लेकिन सम झने की कोशिश जरूर कर रहा हूं.’’

‘‘पहले खुद को तो सम झ लो.’’

‘‘यहां क्यों ले कर आई हैं आप मुझे?’’

‘‘यहां सुकून है, मैं अकसर आती हूं यहां.’’

‘‘जी, कब्रिस्तान में सुकून के सिवा और कुछ होता भी नहीं.’’

‘‘कब्रिस्तान, तुम इस जगह को कब्रिस्तान कहते हो?’’

‘‘और फिर क्या कहें? जमीन के नीचे सोए हुए लोगों के ऊपर इमारत तामीर कर दी गई और क्या, बस.’’

‘‘मालूम नहीं, इन सोए हुए लोगों को आदमी जगाने की कोशिश क्यों करता है जबकि वहां कोई सुनने वाला नहीं होता.’’

‘‘जब इंसान अकेला था तो भीड़ तलाशता रहा और अब जब भीड़ है तो एकांत तलाश रहा है.’’

‘‘ऐसा नहीं है जैसा तुम सोचते हो.

इंसान दुनिया के छल, प्रपंच और आपाधापी से मुक्त होने के लिए ऐसी जगह पर आता है. बेशक, कुछ वक्त के लिए ही सही, साथसाथ अपने जज्बात भी कह जाता है.’’

‘‘आप सुल झी हुई बात कह रही हैं लेकिन सभी आप के जैसा नहीं सोचते.’’

‘‘और सभी तुम्हारे जैसा भी नहीं सोचते, रियलिस्टिक बंदे,’’ उस के होंठों पर मुसकान सी खिली हुई थी. दूर कहीं बादलों के गरजने की आवाज हुई और ठंडी हवा बहने लगी.

‘‘तो फिर सुकून मिला?’’

‘‘तुम जैसा साथी साथ में हो तो सुकून मिल सकता है क्या?’’ इस बार वह, बस, हंस दी. ‘‘तुम इतने रूखे तो लगते नहीं हो, लेकिन तुम्हारी सैंसिटिविटी ने तुम्हारी लचक को हाईजैक कर लिया है.’’

‘‘नहीं. नाकामी ने.’’

‘‘नाकामी का अर्थ पैसे से लगाया जाए या परिवार से?’’

‘‘आप स्वतंत्र हैं सम झने के लिए.’’

‘‘तुम इतने ईजी क्यों हो, यार?’’

‘‘ईजी मतलब? मैं सम झा नहीं?’’

‘‘यही कि दूसरों की बातों को आसानी से मान जाना, उन्हें तवज्जुह देना और साथ ही स्पेस देना. और देखो न, मेरी भी सभी बातें तुम ने आसानी से मान लीं जबकि हम एकदूसरे के लिए अजनबी हैं.’’

‘‘अजनबी?’’

‘‘हां, अजनबी.’’

‘‘मैं ने तो ऐसा सोचा ही नहीं.’’

‘‘मैं, कनुप्रिया श्वेताम्बर, प्रोफैसर कनुप्रिया. और तुम?’’

‘‘छोडि़ए, क्या करेंगी जान कर? चलिए चलते हैं,’’ उस ने कलाई छोड़ कर उठते हुए कहा.

‘‘मुझ से भाग रहे हो या खुद से?’’

‘‘शायद, दोनों से.’’

‘‘नाम नहीं बताओगे?’’

‘‘वैसे, आप लगभग सभी कुछ तो जानती हैं.’’

‘‘कह सकते हो लेकिन जानती नहीं, सिर्फ अनुमान लगाती हूं जो अकसर सही होते हैं. तुम अकेले रहते हो,’’ उस ने उठते हुए कहा, ‘‘खाना तो खुद बनाते होगे?’’

‘‘हां.’’

‘‘कैसा बनाते हो?’’

‘‘बस, खाया जा सके, वैसा.’’

‘‘तो फिर चलो, आज से मु झे खाना बना कर खिलाओ,’’ और उस ने अपनी बाईं कलाई उस के दाएं हाथ में पकड़ा कर खंडहर से बाहर कदम बढ़ाया. हलकीहलकी बारिश की फुहारें उन के स्वागत को तत्पर थीं.

जब वह उस के घर पहुंचा तो उसे लगा कि यह घर कुछ जानापहचाना सा है. कनुप्रिया ने कहा, ‘‘जनाब, अब याद आया कि नहीं, हम जब चौथी कक्षा में थे तो तुम मेरी क्लास में ही थे और एकदो बार घर भी आए थे. मैं जब पार्किंग में गाड़ी में बैठी सोच रही थी कि कैसे दिन गुजारा जाए, तुम्हारे बालों के ठीक करने के स्टाइल से तुम्हें पहचान लिया. इतनी बातें पक्का करने के लिए कीं कि तुम वही हो न?’’

वह भौचक्का रह गया पर लगा कि जिंदगी को अब एक राह मिलेगी.

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