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पुरुष होती नारी

नगर निगम की सीमा से बाहर एक नई कालोनी ‘गृहनिर्माण सहकारी समिति’ के नाम से धंधेबाजों ने बसाई जिस का नामकरण हुआ ‘लक्ष्मी नगर.’ यह नामकरण विश्लेषणात्मक था. लक्ष्मी शब्द जहां धनसंपदा की दात्री का पर्याय था वहीं झांसी वाली मर्दानी रानी लक्ष्मीबाई का भी पर्याय था.

शहर से बाहर होने के कारण इस अविकसित कालोनी में प्लौटों के भाव शहर की अपेक्षा खासे कम थे, लिहाजा, नवधनाढ्यों ने यहां धड़ाधड़ प्लौट खरीद लिए. धंधेबाजों की पौबारह हो गई. उन्होंने सड़क, पुलिया आदि बनवा कर लोगों को आकर्षित करने का प्रयास किया, किंतु इन प्रयासों के बावजूद यहां मकान बनने धीरेधीरे शुरू हुए, क्योंकि संपर्क सड़क की बुरी हालत, कालोनी के मुख्य मार्ग से दूर होने एवं बिजलीपानी आदि बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण लोगों में निर्माण कार्य के प्रति उत्साह नहीं बढ़ा.

संपन्न लोगों ने तो इनकम टैक्स से बचने एवं फालतू पैसों को लगा कर प्लौट हथियाने भर का ही खयाल रखा, मगर जो मध्यमवर्गीय लोग शहर में मकान की किल्लत भुगत रहे थे, धीरेधीरे वे ही यहां मकान बनवाने आगे आए.

नूपुर ऐसे ही लोगों में थी. उसे शहर में 2 कमरे वाले फ्लैट में रहना पड़ रहा था. किराया भी ज्यादा था और मकान मालिक से उस की खटक गई थी इसलिए वह वहां रहने में दिक्कत महसूस कर रही थी. पास ही उस की अंतरंग सहेली नसरीन रह रही थी इसलिए यहां बनी रही वरना इस फ्लैट को छोड़ कर तो वह कभी की कहीं और रहने चली जाती.

इस अप्रिय स्थिति से मुक्ति पाने को नूपुर ने लक्ष्मीनगर के अपने प्लाट पर मकान बनवा कर अपना सपना साकार करने का निश्चय किया. अपने इस सपने में वह नित नएनए रंग भरती उसे साकार करने को बेचैन थी.

उस के पति सौरभ ने उसे बहुत समझाया, ‘‘देखो नूपुर, वहां जंगल में अभी बसने में खतरे हैं इसलिए जल्दबाजी मत करो.’’

‘‘खतरे कहां नहीं हैं?’’ नूपुर का यही जवाब होता.

पिछले दिनों शहर की इस पौश कालोनी में इन के पड़ोस में ही दिनदहाड़े ताले टूट गए थे. चोर काफी माल ले उड़े थे. नूपुर का संकेत किराए पर लिए अपने फ्लैट वाली कालोनी की तरफ था. सौरभ भी इस संकेत को समझ गया था, फिर भी बोला, ‘‘यहां की अपेक्षा वहां ज्यादा खतरे हैं. वहां अभी जंगल है. कुछ बसावट हो जाने दो, फिर हम भी कदम बढ़ाएंगे.’’

‘‘इसी तरह सभी सोचेंगे तो लक्ष्मीनगर कभी बसेगा ही नहीं. किसी को तो पहल करनी होगी,’’ नूपुर एकदम झल्ला पड़ी.

‘‘वह पहल हम ही क्यों करें, नूपुर?’’

‘‘तो फिर यह पहल हम ही क्यों न करें, सौरभ?’’

‘‘तुम सच में बहुत जिद्दी हो. खतरों से खेलना तुम्हारा स्वभाव है.’’

‘‘तुम्हें जब मेरे स्वभाव का पता है तो फिर मुझे क्यों रोक रहे हो? हमारा सपना साकार होने दो.’’

‘‘जानबूझ कर मुसीबत मोल लेनी है तो लो, करो अपने मन की. बाद में रोना मत…’’

‘‘ऐसा मौका ही नहीं आएगा, सौरभ. तुम चिंता मत करो, मैं सारी स्थिति से निबट लूंगी.’’

सौरभ ने नूपुर को समझाना व्यर्थ जान कर और मगजपच्ची नहीं की. उस ने प्रवाह में पड़े तिनके की तरह खुद को मान लिया. फिर भी उसे यह चिंता तो थी ही कि नूपुर यह सारा काम कैसे संभालेगी. वह स्वयं तो हफ्ते में एक रोज इतवार के दिन ही इस शहर में आ पाता था, बाकी के दिन वह दूसरे शहर में अपनी नौकरी में व्यस्त रहता था.

वह सोचने लगा, घर में नूपुर के अलावा और कोई तो है नहीं. संतान होती तो वह सहायक होती. ऐसे में नितांत अकेली नूपुर यह काम कैसे पूरा कराएगी. यह काम कोई 1-2 दिन का तो है नहीं. महीनों लग जाते हैं, तब कहीं मकान का काम पूरा हो पाता है. ऐसे में नूपुर कैसे तो कालेज जाएगी और कैसे निर्माण कार्य की निगरानी रखेगी.

इतनी छुट्टी इसे कालेज से कैसे मिलेगी. घर शहर में, कालेज शहर की दूसरी दिशा में और यह लक्ष्मीनगर तीसरी दिशा में. ये तीनों जगहें कैसे भटकेगी. चकरघिन्नी बन जाएगी.

माना कि इस के पास स्कूटर है, मगर तीनों जगहों की दूरी कितनी है. स्कूटर तो खुद को ही चलाना पड़ता है, वह खुद थोड़े ही चलता है.

आनेजाने की इस मेहनत के अलावा कारीगर, ठेकेदार, बिल्डर, मजदूर आदि से मगजपच्ची करनी होगी. ये लोग परेशान करते ही हैं. निगरानी बारबार न होने पर आंख में धूल झोंक देते हैं. यह इन सब से कैसे निबटेगी? ज्यादा दौड़धूप करेगी तो बीमार पड़ जाएगी. मकान का काम सहज नहीं होता. जानकारों ने इसीलिए कहा है कि मकान बना कर और ब्याह कर के देख. मकान और विवाह दोनों कठिन काम हैं, मगर यह किसी की सुने तब न. यह तो अपने मन की ही करती है.

सौरभ की इन चिंताओं के बावजूद नूपुर ने लक्ष्मीनगर के अपने प्लौट पर अपने घर का सपना साकार करने का काम शुरू कर दिया. इस इलाके में अभी एक ही मकान सामने की पंक्ति में शैलेंद्रजी का बना था. उन्होंने तो अपना ताला लगा रखा था. वे अभी यहां रहने नहीं आए थे. नूपुर को काम शुरू कराते देख वह खुश हुए. उन्होंने उस का हौसला बढ़ाया था.

मगर नूपुर के हितचिंतकों ने तो उसे सचेत किया, ‘‘व्यर्थ की परेशानी में मत पडि़ए, मैडम. सुख की जान को दुख में मत डालिए. अभी रुकिए.’’

मगर नूपुर ने किसी की नहीं सुनी. उस ने बढ़ाए कदम पीछे नहीं हटाए. वह पूरे उत्साह एवं लगन से अपना सपना साकार करने में जुटी रही.
नूपुर साइट पर नजर रखने लगी. दिन में कई चक्कर साइट पर लगाने शुरू किए. घर, कालेज और साइट इसी त्रिभुज के बीच फिरकनी की तरह फिरने लगी. जरूरत पड़ने पर रात को भी चक्कर लगाती.

जिस रोज छत पड़ी उस रोज तो नूपुर आधी रात तक वहीं डटी रही. छत पड़ने के बाद ही दनदनाती हुई देर रात अपने घर, शहर लौटी. ठेकेदार, राजमिस्त्री, मजदूर आदि सभी उस के साहस पर चकित हुए.

सौरभ ने उस की सहायता के लिए आदिवासी युवा बुधसिंह को अपने यहां से भेज दिया. उसे स्कूटर पर बिठा कर वह दनदनाती हुई साइट पर आतीजाती रही.

नूपुर ने अपनी सहेली नसरीन से आग्रह किया कि वह भी अपने प्लौट पर निर्माण कार्य शुरू करा दे. वह उस के यहां की भी निगरानी रखेगी, मगर नसरीन के मित्रों ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. वे यही कहते रहे कि यह जंगल जब आबाद हो जाएगा तभी सोचेंगे. हमें अभी कोई जल्दी नहीं है. मगर नूपुर को तो जल्दी थी.

वह चाहती थी कि उस का सपना साकार हो जाए जिस से वह फ्लैट छोड़ कर यहां रहने आ जाए. मकान मालिक के सामने फ्लैट की चाबी फेंक कर उस से कहे कि संभाल अपनी धर्मशाला, हम तो अपने सपनों के महल में जा रहे हैं. अब तेरी तानाशाही हम पर नहीं चलेगी. हम अपनी मरजी के मालिक होंगे.

इस के विपरीत सौरभ यही चाह रहा था कि मकान का काम तेजी से न चले. इस में देरी हो तो ठीक रहेगा ताकि वहां रहने का मुहूर्त अभी न आए. मगर नूपुर की दिनरात की व्यस्तता और भागदौड़ के कारण वह यह भी चाहता था कि इस परेशानी से नूपुर को जल्दी छुटकारा मिले.

इस तरह सौरभ काम में देरी चाहता भी था और नहीं भी. वह बहुत ही असमंजस की स्थिति में था. लेदे कर खुद को यही कहकह कर समझता रहता था कि मकान का काम पूरा हो जाने पर भी हम अभी वहां रहने नहीं जाएंगे. अकेली नूपुर को वहां वीराने में नहीं छोडेंगे. वहां अभी सन्नाटे के सिवा है क्या? एक मकान यहां तो दूसरा उस कतार के सिरे पर. चारों ओर मैदान ही मैदान. लोगों ने अपनेअपने प्लौट की घेराबंदी कराकरा कर अपना कब्जा कर रखा है.

बीच कालोनी में ऊंचे गुंबद वाला महालक्ष्मी का भव्य मंदिर ही जैसे घोषणा करता है कि यह वीराना नहीं बस्ती है. न दुकान, न फेरी वाले. रात को सियार हुआंहुआं का डरावना शोर करते हैं. खासा डरावना माहौल है. ऐसे में तो बड़े परिवार वाले ही रहने का साहस कर सकते हैं. हमारा परिवार तो बिलकुल छोटा सा है. उस में भी मैं स्वयं तो हफ्ते में एक दिन ही यहां आ पाता हूं. नहींनहीं, हम अभी वहां रहने नहीं जाएंगे.

सौरभ ऐसा निश्चय तो मन ही मन कर रहा था, मगर वह जानता था कि नूपुर हमेशा की तरह इस बार भी उस की एक नहीं सुनेगी, वह अपने मन की करेगी. वह तो कब से पर तौल रही है. यहां से उड़ कर वहां जाने को बेताब है. बहुत ही जिद्दी औरत है. किसी बात का उसे खौफ ही नहीं.

वह स्वयं रात को वहां जाने में डरता है, मगर वह नहीं डरती. स्कूटर पर दनदनाती हुई रातबिरात चली जाती है. उस जिद्दी औरत को वह कैसे रोकेगा वहां जाने से. मकान का काम पूरा होते ही वह अपना मालअसबाब उठा कर वहां चल देगी. रस्सी तुड़ा रहे पशु की तरह हो रही है उस की हालत. इसी संभावना की आशंका से सौरभ ने कर्ज ले कर पुरानी मारुति कार खरीद ली. उस ने सोचा कि नूपुर यदि वहां चली गई तो स्कूटर के बजाय कार में उस वीराने में उस की सुरक्षा रहेगी.

कार पा कर नूपुर खुश तो हुई, मगर सोचने लगी कि यह रकम कार पर खर्च करने के बजाय मकान पर खर्च होती तो कितना अच्छा रहता. वह तो मकान को ही तरजीह दे रही थी. अपने नए निवास को सारी सुविधाओं वाला बनाने में ही वह जुटी हुई थी.

मकान का काम लगभग पूरा होते ही नूपुर ने अपने डेरेडंडे उखाड़ने शुरू किए तो सौरभ ने आदेशात्मक स्वर में कहा, ‘‘अभी हम वहां नहीं जाएंगे.’’

‘‘क्यों?’’ नूपुर चौंकी.

‘‘अभी वहां बिजली का कनेक्शन नहीं हुआ है.’’

‘‘उस की चिंता मत करो. अस्थायी व्यवस्था हम ने कर रखी है.’’

‘‘मगर स्थायी व्यवस्था होने तक रुकने में क्या हर्ज है?’’

‘‘मुझे तो इस फ्लैट के मालिक की सूरत से नफरत है. मैं उस की परछाईं से दूर चली जाने को तड़पती रही हूं.’’

‘‘मैं जानता हूं, मगर कुछ रोज और अभी उसे सहन कर लो.’’

‘‘नहीं, हम तो अपने घर में जाएंगे, तुरंत जाएंगे.’’

इस घोषणा ने सौरभ को चिंतित किया. वह उस वीराने में नूपुर के अकेली रहने की कल्पना से ही सिहर उठा. उसे यही डर कचोटने लगा कि यदि उस वीराने में कुछ हो गया तो वह कहीं का नहीं रहेगा.

कुछ दिन पहले ही उस ने अखबारों में पढ़ा था कि एक रात शहर की एक मशहूर कालोनी में कच्छाबनियानधारी 10-12 चोर खिड़की तोड़ कर एक मकान में घुस गए और घर के सभी प्राणियों को एक कमरे में बंद कर लूटपाट की. टैलीफोन के तार काट दिए. घर में छोटेबड़े 15 व्यक्ति होते हुए भी वे चोरों का मुकाबला नहीं कर पाए.

इस घटना की जानकारी ने सौरभ को भीतर तक दहला दिया था. वह यही सोचसोच कर परेशान हो रहा था कि उस वीराने में तो खिड़की क्या, दरवाजे भी तोड़ कर चोर घुस सकते हैं. वहां चीखनेचिल्लाने पर भी कोई मदद को नहीं आएगा. पुलिस थाना भी दूर है. जिस गांव की सीमा में यह लक्ष्मीनगर बसाया गया वह भी दूर है. इन्हीं संभावनाओं के काल्पनिक चित्रों से सौरभ भयभीत रहने लगा, किंतु नूपुर उस के डर की खिल्ली उड़ाती कहती रही, ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत.’

तब सौरभ झल्ला पड़ता था, ‘तुम्हारा मन कितना ही बलशाली हो, मगर तन तो तुम्हारा औरत का है, नूपुर. जरा सोचो, दुस्साहस मत करो, बुद्धिमानी से काम लो. अभी उस जंगल में मत जाओ.’

इस पर नूपुर दोटूक शब्दों में कह देती, ‘मैं तो जाऊंगी, भले ही कुछ भी हो. मैं हर खतरे से जू?ांगी. खयाली डर से मैं नहीं डरती.’

उस के इस दृढ़ निश्चय से विचलित हो कर सौरभ ने पिस्तौल खरीदने का निश्चय किया. उस ने सोचा पिस्तौल नूपुर के लिए सुरक्षाकवच का काम करेगी. इस से उस का बल बढ़ेगा. आपातकाल में पिस्तौल से मुकाबला संभव हो सकेगा. पिस्तौल के नाम से ही चोर आतंकित रहेंगे.

आयकरदाता होने के कारण नूपुर के नाम से भी लाइसेंस बन जाएगा.

नूपुर ने जब पिस्तौल वाली बात सुनी तो झल्लाई, ‘‘तुम सच में बहुत डरपोक हो और मुझे भी डरपोक बना देते हो. जरा सोचो, पास में पिस्तौल बेशक हो मगर उसे चलाने की हिम्मत न हो तो वह किस काम की. इसलिए खास चीज तो हिम्मत है, जो मेरे पास है और खूब है.’’

सौरभ जानता था कि नूपुर बहुत हिम्मत वाली है. गांव की बेटी होने के कारण उस का बचपन जंगलों में भटकते हुए ही बीता था. एक बार बाल्यावस्था में ही उस ने गांव में रात में सेंध लगा रहे चोरों की आहट पा कर शोर मचा दिया था, इसीलिए चोर पकड़ में आ गए थे. भूतप्रेत, सांपबिच्छू से भी वह डरती नहीं थी. स्कूल में बास्केटबौल की वह खिलाड़ी रही थी. कालेज में आने पर एथलीट के रूप में उस की पहचान बनी थी.

उस ने कई इनाम पाए थे. प्राध्यापिका बन जाने पर भी वह तेजतर्रार रही थी. हर काम में अग्रणी भूमिका रहती थी उस की, इसीलिए कालेज में सहयोगियों ने उस का नाम ‘नेताजी’ रख दिया था. चुनाव में धांधली करने वाले एक छुटभैये नेताजी को इस नेताश्री ने अपनी ड्यूटी में मजे चखा दिए थे. नूपुर के ऐसे साहसिक कई कारनामे सौरभ को पता थे.

सब से ज्यादा चौंकाने वाली घटना उसे नूपुर की अंतरंग सहेली नसरीन के बारे में पता चली थी कि नसरीन और नूपुर आसपास ही रहती थीं.

दोनों में खूब घुटती थी. सहपाठी एवं पड़ोसी होने के कारण दोनों में घनिष्ठता बढ़ती ही गई थी, जो धीरेधीरे इतनी बढ़ गई कि दोनों एक ही कमरे में रहने लगी थीं. दोनों एक ही बिस्तर पर सोतीं, इसीलिए लोगों को उन में समलैंगिक संबंध का संदेह होने लगा था. इस संदेह की पुष्टि नसरीन के कथन से भी होती थी. वह जबतब कक्षा में अपनी सहपाठिनों से कहा करती थी कि वह नूपुर की बीवी है. वे दोनों विवाह करेंगी.

इस कथन से चौंक कर दोनों के परिवार वालों ने उन के विवाह की जल्दबाजी की थी. सौरभ के कानों तक जब यह बात आई थी तो वह इस रिश्ते से हिचकिचाया था. उस की यह हिचकिचाहट समझाने बुझाने के बाद ही दूर हुई थी, मगर विवाह के बाद भी उसे लगा था कि नूपुर सच में थोड़ी मर्दानी है. मगर उस मर्दानी पत्नी को औरतजात मान कर भी वह उस के लिए पिस्तौल की व्यवस्था करने में जुट गया था.

इधर नूपुर ने पिस्तौल आने तक रुकने का सौरभ का प्रस्ताव ठुकरा दिया. वह अपना फ्लैट खाली कर अपनी स्वप्नकुटी में, उस वीराने में चली गई. वहां जा कर उसे बेहद खुशी हुई. आदिवासी युवा बुधसिंह को सहायक के रूप में पा कर उस को सुविधा हुई. वह बहुत ही बेफिक्री से खुली हवा में सांस लेने लगी, पर सौरभ उस की निश्चिंतता एवं खुशी पर चकित हुआ.

नूपुर के वहां जा कर बसने से इलाके के एकमात्र पड़ोसी शैलेंद्रजी को भी खुशी हुई. वह इस सान्निध्य को सराहने लगे, नूपुर के साहस की दाद देने लगे.

धीरेधीरे इस लक्ष्मीनगर के अन्य विद्यार्थियों से भी नूपुर ने देखते ही देखते परिचय पा लिया. वह सब की सुध लेने लगी. उन की हिम्मत बंधाने लगी. उन से आग्रह करने लगी कि एकदूसरे के सुखदुख में सहभागी बनें. अपनेआप में सिमटेसिमटे न रहें. एकदूसरे के नजदीक आएं. हमारे घर बेशक दूरदूर हों मगर मन पासपास रहें.

इस अविकसित बस्ती में नई चेतना जगाने में नूपुर कामयाब रही. उस की प्रेरणा से यहां स्नेहसम्मेलन हुआ. सभी निवासी एकत्रित हुए. सहभोज हुआ. सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए. नूपुर का भाषण सब से ज्यादा सराहा गया.

नूपुर ने सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था के लिए संबंधित थाने से भी संपर्क साधा. क्षेत्रीय विधायक, गांव के पंच, सरपंच आदि सभी से मिली. लोगों की शिकायतों के समाधान में योगदान दिया.

नूपुर की इन गतिविधियों से प्रभावित हो कर क्षेत्रीय विधायक ने नूपुर की अध्यक्षता में एक सुरक्षा समिति गठित की. संबंधित शासकीय विभागों को इस समिति की सूचना दे कर आग्रह किया कि वे समिति से सहयोग करें. नतीजतन, लगभग एक माह में ही दरमियाने कद, उजले रंग, अच्छे नाकनक्श वाली हंसमुख नूपुर इस सारे क्षेत्र में पहचानी जाने लगी. स्लेटी रंग की कार को ऊबड़खाबड़ रास्तों पर दौड़ाने वाली इस नारी को राह चलते लोग तारीफ की नजरों से देखने लगे. लोगों ने उस का नाम रखा नई लक्ष्मीबाई.

इतना सबकुछ होते हुए भी दूर बैठे सौरभ को अपनी पत्नी की चिंता सताती रहती थी. पिस्तौल का विधिवत लाइसैंस बन जाने के बाद उस ने वह नूपुर को सौंप दी थी. फिर भी उस के मन में संशय बना ही रहता था. वह रोज रात को बारबार टैलीफोन पर उस से संपर्क साधता रहता था.

एक रोज आधी रात को बुरा सपना देखने पर उस का मन उद्वेलित हुआ. तुरंत उस ने नूपुर से संपर्क साधा. काफी देर तक घंटी बजने के बाद नूपुर ने चोंगा उठाया. सौरभ ने घबराए से स्वर में पूछा, ‘‘क्यों नूपुर, क्या हाल है?’’

‘‘सब ठीक है,’’ नूपुर ने जम्हाई लेते हुए कहा.

‘‘फिर इतनी देर क्यों लगा दी? कितनी देर तक घंटी बजती रही.’’

‘‘मैं गहरी नींद में थी, पर तुम अभी तक जाग रहे हो?’’

‘‘नहीं, सो गया था, मगर खराब सपना आया इसलिए तुम्हें जगाया. सच, सब ठीक है न?’’

‘‘हां बाबा, विश्वास न हो तो आ कर देख लो. तुम सच में बहुत डरपोक हो.’’

चोंगा रखने के बाद भी सौरभ आश्वस्त नहीं हुआ. उसे लगा यह बुरा स्वप्न कहीं भावी अनिष्ट का सूचक न हो. इस आशंका ने उसे उद्वेलित
कर दिया.

वह बिस्तर से उठ खड़ा हुआ. कुछ देर कमरे में टहलने के बाद उस का मन हुआ कि नूपुर के पास चला जाए. यहां नींद आएगी नहीं. उस ने घर को ताला लगाया. सर्वेंट क्वार्टर में सोए नौकर को जगाया और उसे जानकारी दी कि वह नए घर जा रहा है.

लगभग 4 घंटे बाद वह नए घर पहुंचा. इस समय सुबह के साढ़े 3 बज रहे थे. तभी उसे जाने क्या सूझ, जीप को शैलेंद्रजी के घर के सामने रोक कर वह दबेपांव अपने नए घर के सामने जा खड़ा हुआ. चारों ओर सन्नाटा था. वह लोहे के बड़े मेन गेट के भीतर उतर गया और भीतरी दरवाजे के सामने जा कर कुछ देख वहां खड़ा आहट लेता रहा. तभी उस ने कौलबेल का बटन दबा दिया. 2-3 बार बटन दबाने और दरवाजा खटखटाने पर भीतर से ही बुधसिंह ने पूछा, ‘‘कौन है?’’

सौरभ ने बदले स्वर में कहा, ‘‘तेरा बाप. उस लक्ष्मीबाई से कह कि सीधी तरह दरवाजा खोल दे वरना हम दरवाजा तोड़ देंगे. हल्ला मचाएगी तो जान ले लेंगे. खोल फाटक.’’

बुधसिंह ने सहमे स्वर में अंदर दरवाजा खटखटाते हुए कहा, ‘‘मैडम, लगता है चोर आ गए हैं. वे फाटक खोलने को कह रहे हैं.’’

‘‘मैं ने सब सुन लिया है. तू डर मत, मैं चोरों का मुकाबला करूंगी,’’ नूपुर बोली.

सांस रोके सौरभ दरवाजा खोलने का इंतजार करने लगा. उसे लगा कि नूपुर शोर मचाएगी. लोगों को मदद के लिए पुकारेगी. थाने में फोन करेगी. मगर उस की आशा के विपरीत अंदर शांति बनी रही.

इधर सौरभ का दिल धकधक करने लगा. तभी दरवाजा खुलने की चरमराहट हुई. सौरभ कार की आड़ में छिप गया. वह डरा कि नूपुर कहीं गोली न चला दे.

उधर दरवाजा खोल कर नूपुर दहाड़ी, ‘‘लो, खोल दिया दरवाजा. आओ सामने, बोलो क्या चाहिए?’’

कार के पीछे छिपे सौरभ ने घबराए से स्वर में कहा, ‘‘यह तो मैं हूं, पिस्तौल मत चलाना, नूपुर.’’

यह सुन कर नूपुर ठठा कर हंसती हुई बोली, ‘‘मेरी परीक्षा लेने आए थे.’’

तभी सौरभ ने पास आते हुए कहा, ‘‘हां, तुम सच में नई लक्ष्मीबाई हो.’’

इधर बुधसिंह अवाक सा खड़ा तमाशा देखता रहा.

बिस्तर पर जाने के बाद नूपुर ने सौरभ से शिकायती लहजे में कहा, ‘‘तुम्हें मेरे बारे में हमेशा संदेह ही रहा है.’’

तभी सौरभ उसे बांहों में भरता हुआ बोला, ‘‘तुम हो ही पहेली जैसी.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि तुम अब स्त्री के साथसाथ पुरुष भी बनती जा रही हो. तुम में पुरुषत्व दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है.’’

बेसहारा

“किस की बात कर रहे हो, वह मेरा दर्द कैसे समझेगी? वह पराया खून है, हमेशा पराया ही रहेगा.”

अपनी सास ममता के कमरे के पास से गुजरते हुए रिंकी को ये शब्द सुनाई दे रहे थे जो वे अपने बेटे विवेक से कह रही थीं. हालांकि, विवेक अपनी मां की बातों का विरोध कर रहा था, “तुम हमेशा रिंकी को पराया क्यों समझती हो, मां? वह भी तो इसी घर की सदस्य है. पता नहीं क्यों तुम उस के पीछे पड़ी रहती हो?”

“तुम क्या जानो, मांबेटे के बीच जो सहज रिश्ता होता है, उस की जगह बहू नहीं ले सकती. तुम हमारे अपने खून हो, वह तो पराया खून है. पराए कभी अपने नहीं हो सकते.”

रिंकी का मन हुआ कि वह उन से पूछे कि पिछले चारपांच सालों से उस की निश्च्छल सेवा और प्यार में ऐसी क्या कमी रह गई थी कि वे आज भी उसे पराई ही समझती हैं. लेकिन मजबूर थी, चाह कर भी वह उन के साथ कभी सख्ती नहीं बरत सकी.

ममता को जब भी किसी सलाह की जरूरत होती तो वे अपने तीनों बेटों विवेक, तुषार और नैतिक को बुलातीं. गलती से भी अपनी दोनों बहुओं को उस में शामिल न करतीं. उन के दोनों बेटे शादीशुदा थे और दोनों अलगअलग बैंकों में मैनेजर थे. छोटे बेटे नैतिक की अभी शादी नहीं हुई थी. वह मेरठ से इंजीनियरिंग कर रहा था.

रिंकी का दिल हमेशा अपनी सास के भावनात्मक सहारे और प्यार के लिए तरसता था. लेकिन प्यार के बदले में सास के ताने और कठोर शब्द उस के दिल को चुभते थे. उसे समझ में नहीं आता था कि वह सास से क्या कहे, उन्हें कैसे समझाए? उन के व्यवहार से वह नाराज हो कर मायके चली जाती थी. लेकिन मायके में भी कितने दिन तक रह पाती. बेटियां आज भी बोझ ही समझी जाती हैं. मायके में भी खुशियों का कोई भंडार नहीं था.

जब 10 दस साल की थी तभी उस के पिता की मृत्यु हो गई. इकलौते भाई श्यामसुंदर की शादी हो गई. उस के बाद उसे दादादादी के पास भेज दिया गया क्योंकि भाभी नहीं चाहती थी कि वह उस के साथ रहे. जब थोड़ी और बड़ी हुई तो होस्टल में डाल दी गई. बीए पास करते ही उस की शादी हो गई. मांबाप का प्यार तो उसे कभी मिला ही नहीं.

शादी के बाद उसे अपनी सास का अपने बेटों के प्रति उमड़ता प्यार देख कर बहुत अच्छा लगा. उसे वे अपनी मां के प्यार की प्रतिमूर्ति लगीं और उन का प्यार पाने की हर संभव कोशिश की. लेकिन न जाने क्यों, वे कभी भी उसे अपनी बेटेबेटियों की तरह स्वीकार नहीं कर पाईं. उन्हें केवल अपने खून पर भरोसा था. उन्हें लगता था कि एक मां के दिल का दर्द उस के बेटों से ज़्यादा कोई नहीं समझ सकता. जब भी वे किसी परेशानी में होतीं तो अपने बेटों से ही अपना दर्द साझा करतीं. उन की बहू हमेशा उन के लिए एक अजनबी सी रहती थी, जिस से वे बस काम लेतीं, लेकिन कभी अपने दिल के करीब नहीं आने देतीं.

उन की 3 बेटियां भी थीं जो अलगअलग शहरों में रहती थीं. जब भी वे आतीं, अपनी मां से मीठीमीठी बातें कर के उन से बहुत प्यार जताती थीं.

रिचा अपनी मां की कुछ ज्यादा ही लाडली थी, इसलिए वह उन का दिमाग ज्यादा चाटती, ‘मां, आप की जगह कौन ले सकता है. आप हैं तो हमारा मायका है. आप के बाद हमें इतना प्यार कौन देगा? मैं हमेशा यही चाहती हूं कि आप का प्यार, स्नेह और आशीर्वाद हम बहनों पर हमेशा बना रहे. मैं अपने घर में जरूर रहती हूं, लेकिन हमेशा आप की चिंता करती हूं. तुम कितनी दुबली हो गई हो. अपना खयाल रखना.

आजकल तो बहुएं अपनी सास को घर में रहने दें, यही बड़ी बात है. उन्हें मां मानना तो दूर की बात है आदिआदि.’

इस तरह वह मां के दिल में बहू के प्रति नफरत भर कर चली जाती और रिंकी को मां का खयाल रखने की खूब नसीहत देती. ममता को लगता कि उन की तीनों बेटियां ही उन का सब से ज्यादा खयाल रखती हैं, बहू तो सिर्फ अपना फर्ज निभाती है. इसीलिए वे हर सुखदुख में बहूओं को नजरअंदाज कर बेटियों को तरजीह देतीं.

ममता का अर्थ तो हम सभी जानते हैं, यही न कि एक मां का अपने बच्चों के प्रति स्नेह. पर बहुत सारे लोगों को लगता होगा, प्यार महोब्बत ओर ममता में क्या अंतर है. मैं तो कहूंगा अंतर तो कुछ नहीं,पर जो स्नेह मां अपनी ममता के भाव से जाहिर करती वह दूसरा कोई नहीं कर पाता. प्यार-मोहब्बत तो सब करते है, पिता से ले कर प्रिय या प्रेयसी तक पर इन में वह मां वाला स्नेह नहीं होता.

यह भी सच है कि मां का अपने बच्चों के लिए प्यार अनमोल होता है, खासकर बेटी संग का रिश्ता बहुत खूबसूरत होता है. मां बेटी में अपने बचपन को देखती है. वह अपने सपने बेटेबेटियों के जरिए पूरा करने की चाह रखती है. उम्र बढ़ने के साथ मां और बेटी का रिश्ता सहेलियों जैसा हो जाता है. मां अपने बच्चों को हर खुशी देना चाहती है, तो वहीं बेटी भी मां से अपने दिल की हर बात शेयर करती है. एक बेटी के लिए मां परिवार का वह सदस्य है जो उस के दिल की बात को सुनती है और सब से पहले समझती है. लेकिन ऐसा बहू के साथ नहीं होता, क्योंकि सास के दिल में कहीं न कहीं यह बात जरूर रहती कि यह दूसरे परिवार से आई है.

जब हम बेटी और बहू की बात करते हैं तो रिश्ते का दूसरा छोर मातापिता या सासससुर होते हैं. दोनों छोर एकदूसरे के बिना पूरे नहीं हो सकते. एक बहू वो सब कुछ कर सकती है जो एक बेटी कर सकती है, बस, फर्क इतना है कि बहू को उस घर को वंश देने का मौका मिलता है, जो एक बेटी अपने घर को कभी नहीं दे सकती क्योंकि उस का जन्म किसी और घर का वंश बढ़ाने के लिए होता है.

मदर्स डे,फादर्स डे मनाए जाते हैं. मां का प्यार दिल की गहराई से उतर कर इंटरनैट पर आ गया है. ममता देवी की बेटियां अपनी मां के लिए तरहतरह की तारीफें लिखतीं, ‘आप जैसी मां कहां मिल सकती है. आप का निस्वार्थ प्यार पा कर हम बहनों का जीवन सफल हो गया. आप से बात करने मात्र से ही मेरा सारा कष्ट दूर हो जाता है. मां, सारी दुनिया आप की तरह क्यों नहीं है आदिआदि.’

मां भी उतना ही भावुक हो कर जवाब देतीं.

रिंकी समझ न पाती थी कि वाट्सऐप पर मांबेटी के बीच प्यार दिखाना कितना सच था. हर मां का प्यार निस्वार्थ होता है, चाहे वह बेटी की मां हो या बेटे की या फिर बहू की. मां तो मां होती है, उस की नजर में सभी बच्चे बराबर होते हैं. वैसे भी, प्यार एक एहसास है, जिसे खुशबू की तरह महसूस किया जाता है. इसे सिर्फ मां पर अपना दबदबा दिखाने के लिए नहीं दिखाया जाता. लेकिन वह अपनी दोनों भाभियों के सामने कुछ भी कह कर अपने लिए मुसीबत खड़ी नहीं करना चाहती थी.

धीरेधीरे समय बीतता गया. नैतिक की भी शादी हो गई. उस की पत्नी माया डाक्टर थी. उस ने जल्दी ही अपना घर बसा लिया, क्योंकि उसे अस्पताल जाने में परेशानी होती थी. फिर भी उस की सास ममता को लगता था कि अगर जरूरत पड़ी तो वह उसे यमराज के हाथों से छीन लेगी.

दरअसल इंसानी ज़िंदगी एक इम्तिहान है. कइयों की ज़िंदगी में कई इम्तिहान आते हैं. कई पास होते हैं तो कोई फेल. लेकिन डाक्टरी ऐसा पेशा है जिस में हर दिन हर डाक्टर के लिए एक नहीं, कई इम्तिहान होते हैं. हर मरीज़ डाक्टर के लिए एक इम्तिहान होता है. डाक्टर इम्तिहान में कामयाब है, तो मरीज़ की हालत सुधरेगी और नाकामयाब है, तो मरीज़ की हालत बिगड़ेगी. हर मरीज़ डाक्टर के सामने एक चुनौती पेश करता है जिसे उस को स्वीकार करना पड़ता है.

एक दिन सुबहसुबह ममता देवी बाथरूम में गिर पड़ीं और सिर में चोट लग गई. उन्हें तुरंत अस्पताल में भरती कराया गया. पूरी रात बेहोश पड़ी रहीं. अगले दिन उन्हें होश आया. वे थोड़ाबहुत बोल पाईं, पर उन का बायां हाथ और पैर लकवाग्रस्त हो गया. स्थिति गंभीर थी, घर में सभी को इस की जानकारी दी गई. ममता की तीनों बेटियां भी आ गईं. अपनी बेटियों को देख कर उन का चेहरा खिल उठा. तीनों बहनें कुछ देर वहीं बैठी रहीं.

सब से पहले उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि आखिर उस की मां की इस हालत के लिए कौन जिम्मेदार है. वे उस की समीक्षा करते हुए आंसू बहाती रहीं. उन की आलोचना को अनदेखा करते हुए जब रिंकी ने घर की बढ़ती जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए कम से कम एक बहन को घर या अस्पताल में रहने के लिए कहा तो कोई भी रुकने को तैयार नहीं हुई. तीनों ने ही किसी जरूरी काम का बहाना बना कर वहां रहने में असमर्थता जताई और मां को जल्दी आने का आश्वासन दे कर चली गईं.

उस दिन ममता की आंखें भर आईं. शायद उस ने सोचा हो कि बेटियों के लिए मृत्युशैया पर पड़ी अपनी मां की देखभाल से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण कोई काम हो सकता है क्या? ममता के बीमार दिल पर यह पहला आघात था.

छोटी बहू माया डाक्टर थी, इसलिए आसानी से उन के इलाज की सारी व्यवस्था अच्छे ढंग से कर दी गई. पर उस के पास भी इतना समय नहीं था कि ममता देवी के पास कुछ देर बैठ सके. उन की देखभाल और उन के पास रहने की सारी ज़िम्मेदारी रिंकी पर आ गई थी.

समय के साथ पेरैंट्स बूढ़े हो जाते हैं और उन्हें अपने बच्चों की जरूरत होती है. जिस तरह बचपन में मांबाप अपने बच्चों की परवरिश करते हैं, उसी तरह बच्चों को भी अपने मांबाप को उन के बुढ़ापे में संभालना चाहिए. लेकिन बड़े होने पर ये बच्चे सब भूल जाते हैं.

कुछ दिन अस्पताल में रहने के बाद ममता देवी घर आ गई थीं. रिंकी ने उन की देखभाल में दिनरात एक कर दिया था. ऐक्सरसाइज कराने में वह मदद करती थी जिस से वे तेज़ी से ठीक हो रही थीं. काम इतना बढ़ गया था कि उसे हर पल किसी अपने की ज़रूरत महसूस होती थी. जब भी उस की ननदें ममता से मिलने आती थीं, तो वह उन से कुछ दिन अपनी मां के पास रहने का अनुरोध करती थी, क्योंकि बेटियों के साथ रहने से ममता देवी के जल्दी ठीक होने की संभावना थी. इस से उसे कुछ मदद भी मिल जाती. लेकिन तीनों बहनें कोई न कोई बहाना बना कर चली जाती थीं.

ममता देवी भी चाहती थीं कि ऐसे मुश्किल समय में उन्हें अपनी बेटियों का साथ मिले और वे अपना दर्द उन से साझा कर सकें. एक दिन उन्होंने खुद ही सब से छोटी बेटी से कहा, ‘बेटी, कुछ दिन मेरे पास ही रहो. तुम तीनों बहनों से ज़्यादा मेरे करीब और कौन है जो मेरा दुखदर्द समझ सके?’ यह बोलतेबोलते उन का गला भर आया और वे सिसकियां भरने लगीं.

‘हां मां, क्या यह कहने लायक बात है? एक मां अपनी बेटियों से ज्यादा किसी के करीब नहीं हो सकती. पर क्या करूं मां, बच्चों के स्कूल खुल गए हैं, वरना मैं खुद ही तुम्हारे पास रहने को बेचैन रहती हूं,’ यह कह कर वह घर की जिम्मेदारियां गिनाते हुए चली गई. ममता के बीमार दिल पर यह दूसरा झटका था.

रिंकी को हैरानी हुई कि वह ममता की बेटी नहीं थी, पर इतने दिनों से साथ रहने के कारण वह उस से इतना जुड़ गई थी कि वह उन्हें दर्द में देख नहीं सकती थी और उसे सांत्वना देने की पूरी कोशिश करती थी. ममता अब पूरी तरह से अपनी बहू रिंकी पर निर्भर थी. उन की गंभीर हालत में भी उन के बच्चों के पास उन के लिए समय नहीं था. उन की बहू, जिसे वे हमेशा एक अजनबी की तरह समझती थीं, अब उन लोगों से भी ज्यादा उस का खयाल रख रही थी जिन्हें वे अपना मानती थीं.

रिंकी के प्रयासों से वे धीरेधीरे ठीक हो रही थीं. एक महीने के भीतर ही वे अपने पैरों पर खड़ी होने लगीं और चलने लगीं. आज उन्हें किसी के सहारे की जरूरत नहीं थी. ममता उसी बहू के सहारे जिंदा थीं जिस का वे अकसर तिरस्कार किया करती थीं. कैसा जमाना आ गया है, जिस मांबाप के सहारे बच्चे बड़े होते हैं उसी को अंत में बेसहारा कर देते हैं.

लेखिका – पूनम

एक नई शुरुआत

दिवाकर जी ने एक बार फिर करवट बदली और सोने की कोशिश की लेकिन उन की कोशिश नाकाम रही, हालांकि देखा जाए तो बिस्तर पर लेटेलेटे वे पूरी रात करवटें ही तो बदलते रहे थे.

नींद उन से किसी जिद्दी बच्चे की तरह रूठी हुई थी. समझ नहीं पा रहे थे कि नींद न आने का कारण स्थान परिवर्तन है या मन में उठता पत्नी मानसी की यादों का रेला.

मन खुद ही अतीत के गलियारे की तरफ़ निकल गया जब बरेली में अपने घर में थे तो पत्नी मानसी से बोलतेबतियाते कब नींद की आग़ोश में चले जाते उन्हें पता न चलता. नींद भी इतनी गहरी आती कि मानसी कभीकभी तो प्यार से उन को कुंभकरण तक की उपाधि दे डालती.

सुबह होने पर भी नींद मानसी की मीठी सी झिड़की से ही खुलती क्योंकि मानसी द्वारा बनाई अदरक-इलायची वाली चाय की सुगंध जब उन के नथुनों में भर जाती तो वे झटपट फ्रैश हो कर पलंग पर ही बैठ जाते और फिर वहीं पर बैठ कर ही वे दोनों चाय का आनंद लेते. पीतेपीते वे मानसी की तरफ़ ऐसी मंत्रमुग्ध नज़रों से देखते मानो कह रहे हों कि तुम्हारे हाथ की बनाई सुगंधित चाय का कोई जवाब नहीं.

मानसी उन्हें अपनी ओर इस तरह ताक़तें देख कर लजा कर लाल हो जाती, जानती थी कि संकोची स्वभाव के दिवाकरजी शब्दों का प्रयोग करने में पूरी तरह अनाड़ी हैं, उन की इन प्यारभरी निगाहों का मतलब वह वखूबी समझने लगी थी.

वे दोनों एकदूसरे के प्यार में पगे जीवन का भरपूर आनंद उठा रहे थे. बेटे नमन की शादी कर वे अपनी जिम्मेदारियां पूरी कर चुके थे. उन को रिटायर हो कर 6 महीने हो रहे थे, दिवाकरजी मानसी के साथ भारतभ्रमण का प्रोग्राम मन ही मन बना चुके थे. मानसी को अपने इस प्लान की बाबत बता कर वे सरप्राइज देना चाहते थे क्योंकि नौकरी की आपाधापी, फिर बेटे नमन को उच्चशिक्षा दिला कर सैटिल करने में ही उन की आय का अधिकांश भाग खर्च हो जाता था.

वह तो मानसी इतनी संतुष्ट प्रवृत्ति की थी कि उस ने कभी भी दिवाकरजी से किसी चीज की कोई मांग व किसी तरह की कोई शिकायत नहीं की. परिवार के सुख को ही अपना सुख माना. इसी कारण दिवाकरजी का मन कभीकभी अपराधबोध से भर उठता कि 30 साल के बैवाहिक जीवन में वे मानसी के मन की खुशी के लिए कुछ क्यों नहीं सोच पाए. चलो देर आयद, दुरुस्त आयद वाली कहावत सोच कर खुद ही मुसकरा दिए.

कहते हैं कि इंसान का भविष्य उस के जन्म के समय ही लिख दिया जाता है. इंसान सोचता कुछ और है, होता कुछ और है. लेकिन ऊपरवाले के इंसाफ को भी कैसे गलत ठहराया जा सकता है. मानसी एक रात को सोई तो सुबह उस के लाख झकझोरने के बाद भी न उठी तो अचानक लगे इस आघात से दिवाकरजी हतप्रभ रह गए थे. किसी तरह हिम्मत बटोर कर बेटे नमन को फोन कर के इस अप्रत्याशित घटना की सूचना दी. दोनों बेटा व बहू फ्लाइट ले कर पंहुच गए थे. कुछेक दिन इस अप्रत्याशित घटना से उबरने में लगे, फिर आगे के बारे में उन के बहूबेटे ने आपस में विचारविमर्श किया कि अब पापाजी को यहां अकेले छोड़ कर जाना ठीक नहीं रहेगा.

सारी जरूरी क्रियाकलापों से निबटने के बाद नमन व नीरा दिवाकरजी के काफी नानुकुर करने के बाद भी उन का अकेलापन दूर करने के लिए उन्हें अपने साथ मुंबई ले आए थे. दिवाकरजी अपने बच्चों के साथ मुंबई आ जरूर गए थे लेकिन उन का मन यहां रम नहीं पा रहा था. अकेलेपन से पीछा यहां भी नहीं छूटा था. वहां बरेली में तो फिर भी उन के कुछ पहचान वाले व यारदोस्त थे. यहां तो उन की किसी से जानपहचान नहीं थी. और नमन व नीरा सुबह 8 बजे घर से निकल कर रात 8 बजे तक ही घर लौट पाते थे.

उन दोनों के औफिस जाने के बाद खाली घर उन को एकदम खाने को दौड़ता. कामवाली बाई आ कर घर की साफसफाई कर जाती, साथ ही, उन को खाना बना कर खिला देती.

एकाएक गला सूखने का एहसास होते ही उन्होंने पानी पीने के लिए पलंग के पास रखी साइड टेबल की ओर हाथ बढ़ाया. टेबल पर रखा जग खाली था. शायद नीरा जग में पानी भरना भूल गई होगी, यह सोच कर दबेपांव उठ रसोई में जा कर फिल्टर से पानी भरा और अपने कमरे में आ कर पलंग पर बैठ कर पानी पिया.

नींद तो आ नहीं रही थी, सो अब उन को चाय की तलब लगने लगी थी. वैसे, चाय बनानी तो उन को आती थी लेकिन रसोईघर में होती खटरपटर से कहीं नमन व नीरा की नींद न टूट जाए, इस ऊहापोह में उलझे कुछ देर पलंग पर ही बैठे रहे.

सिर में कुछ भारीपन सा महसूस होने पर सोचा, कुछ देर खुली हवा में ही घूम आएं. वैसे भी इन 10-15 दिनों में वे केवल 2 बार ही घर से निकले थे. एक बार बहू नीरा उन को कपड़े दिलाने मार्केट ले गई थी. दूसरी बार बेटा नमन घर के पास बनी लाइब्रेरी दिखा लाया था ताकि मन न लगने पर वे लाइब्रेरी में आ कर मनपसंद क़िताबें पढ कर अपना मन बहला सकें. लाइब्रेरी के पास ही एक पार्क भी था, नमन ने पापाजी को पार्क का भी एक चक्कर लगवा दिया था, जबकि नमन जानता था कि उन को घूमने का कोई खास शौक नहीं है.

उन्होंने सोचा कि पार्क में जा कर कुछ देर ठंडी हवा का आनंद लिया जाए और पार्क की तरफ कदम बढ़ा दिए. घर से बाहर निकलने पर पाया, धुंधलका कुछकुछ छंटने लगा था, सूरज आसमान में अपनी लालिमा बिखेरने की तैयारी में था. पार्क में इक्कादुक्का लोग घूम रहे थे, कुछेक जौगिंग भी कर रहे थे.

एक खाली बैंच देख कर दिवाकरजी उस पर जा कर बैठ गए. एक तो रातभर की उचटती नींद, दूसरे पार्क में बहती ठंडी बयार ने जल्दी ही उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया. अभी उन को सोते हुए कुछ ही समय हुआ होगा कि उन को महसूस हुआ जैसे उन को कोई झकझोर रहा है. आंखें खोलीं तो पाया कि एक महिला, जिस की उम्र लगभग 50-55 वर्ष के आसपास की होगी, उन के ऊपर झुकी हुई थी. दिवाकरजी उसे देख कर एकदम सकपका गए और एकदम सीधे खड़े हो गए. “अरे, यह कैसा मजाक है?”

उन के आंखें खोलते ही वह महिला भी हड़बड़ा गई और पीछे हट गई, “आप ठीक तो हैं न, मैं ने समझा आप लंबी यात्रा पर निकल गए,” कह कर खिलखिला कर हंसने लगी, “अब जब आप ठीक हैं तो प्लीज़ मेरा यह बैग देखते रहिएगा,” कह कर दिवाकर जी की सहमति व असहमति जाने बिना दौड़ गई.

दिवाकरजी सोचने लगे, बड़ी अजीब महिला है, जान न पहचान बड़े मियां सलाम और उन्हें यों सोते देख कर इतना खिलखिला कर हंसने की क्या बात थी.

दिवाकरजी ने ध्यान से देखा, व्हीलचेयर पर बैठी वह महिला सैर करने को निकल गई.

दूसरे दिन दिवाकरजी ने नोट किया कि वही महिला आज अपनी मेड को साथ ले कर आई थी. उस की मेड व्हीलचेयर धकेल कर उन को सैर करवा रही थी. किसीकिसी दिन वह महिला एक युवक के साथ भी आती जो उस के बेटे जैसा लगता था. एक दिन वही महिला खुद ही अपनी व्हीलचेयर चला कर आ रही थी कि अचानक किसी गड्डे के आ जाने से व्हीलचेयर फंस गई. दिवाकरजी ने देखा तो उस की व्हीलचेयर को बाहर निकालने में उस की मदद की.

इस के बाद से दोनों की बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. उस ने बताया, तकरीबन 5-6 महीने पहले चोट लगने के कारण उस की हिपबोन सर्जरी हुई थी, इसी कारण व्हीलचेयर की जरूरत हुई.

तकरीबन 15-20 मिनट के बाद वही महिला अपने रूमाल से पसीना पोंछती हुई दिवाकरजी की बगल में आ कर बैठ गई. उन से अपना बैग लिया. उस में से फ्लासक निकाला और एक कप में चाय उड़ेल कर दिवाकरजी की ओर बढ़ा दिया, साथ ही पूछा, “वैसे, चाय तो पीते हैं न आप?” चाय की तलब तो उन को कब से हो रही थी, सो सारा संकोच एकतरफ रख चाय का कप ले लिया और चाय पीने लगे, साथ ही, कनखियों से उस महिला की ओर भी देखते जा रहे थे.

फ्लास्क के ढक्कन में चाय डाल कर वह खुद भी वहीं बैठ कर चाय पीने लगी.

दिवाकरजी ने उस महिला की तरफ उचटती सी नजर डाली, वह ट्रैक सूट पहने हुए थी, कसी हुई काठी और खिलता हुआ गेहुंआ रंग, चमकीली आंखें, एकदम चुस्तदुरुस्त लग रही थी. इस से पहले उन्होंने किसी महिला को बरेली में ऐसी ड्रैस पहने नहीं देखा था. अपनी पत्नी मानसी को सदैव साड़ी पहने ही देखा था.

चाय पीतेपीते वह बोली, ‘‘मेरा नाम वसुधा है, यहीं पास की उमंग सोसाइटी में रहती हूं, पास के ही एक स्कूल में पढ़ाती हूं. हर रोज इस पार्क में सैर करना मेरा नियम है. पार्क के तीनचार चक्कर लगाती हूं, फिर बैठ कर चाय पीती हूं और घर चली जाती हूं.

मानसी के अलावा दिवाकरजी ने कभी किसी महिला से बातचीत नहीं की थी, सो पहले वसुधा से बात करने में उन्हें संकोच सा अनुभव हो रहा था.

“लगता है आप यहां नए आए हैं, वरना मैं ने आज तक पार्क में किसी को इस तरह सोते नहीं देखा?”

दिवाकरजी यह सुन कर कुछ झेंप से गए, “वो क्या है कि घुटनों के दर्द के कारण अधिक घूम नहीं पाता,” उन्होंने जैसे बैंच पर बैठ कर सोने के लिए सफ़ाई सी दी.

किसी अपरिचित महिला से बातचीत का यह उन का पहला मौका था. मानसी के अलावा किसी और महिला से बातचीत उन्होंने कभी न की थी. और तो और, बहू नीरा से भी वे अभी तक कहां खुल पाए थे. लेकिन वसुधा की जिंदादिली व साफगोई ने उन को अधिक देर तक अजनबी नहीं रहने दिया.

“अब जब मैं आप का नाम जान ही चुकी हूं, तो आप को आप के नाम से ही पुकारूंगी. वो क्या है कि भाईसाहब का संबोधन मुझे बहुत औपचारिक सा लगता है,” कह कर वह एक बार फिर से खिलखिला कर हंस पड़ी. इस बार उन को वसुधा की खनकती हंसी बहुत प्यारी लगी, प्रतिउत्तर में वे भी हलका सा मुसकरा दिए. फिर मन ही मन सोचा, पत्नी मानसी के जाने के बाद शायद आज ही मुसकराए हैं, यह कमाल शायद वसुधा के बिंदास स्वभाव का ही था.

दिवाकरजी आश्चर्यचकित थे, वसुधा की तरफ देख रहे थे और मन ही मन सोच रहे थे कि कितनी जिंदादिल है यह. वे भी अब वसुधा से कुछकुछ खुलने लगे थे.

‘‘अच्छा, आप के घर में कौनकौन है,” उन्होंने वसुधा से पूछा.

“कोई नहीं, मै अकेली हूं. पति का निधन हुए 8 साल हो चुके हैं.”

“फिर आप इतनी खुश व जिंदादिल कैसे रहती हैं?”

“अरे, मैं खुद हूं न अपने लिए, मैं सिर्फ जीना ही नहीं चाहती, जिंदा रहना चाहती हूं. जिंदगी हर समय पुरानी यादों के बारे में सोच कर मन को मलिन करने का नाम नहीं है. जीना है तो ज़िंदगी में आगे बढ़ना ही पड़ता है. वर्तमान में जीना ही जीवन का असली आनंद है. वैसे भी जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए. कितना जिएं, इस से महत्त्वपूर्ण यह है कि किस तरह जिएं.

“खुश रहने के लिए मैं ने ढेर सारे शौक पाल रखे हैं. कभी मार्केट जा कर ढेर सारा ऊन खरीद कर ले आती हूं, उस से स्वेटर, मोजे, टोपे बना बना कर घर के सामने बनी झुग्गियों में बांट देती हूं. इस से उन लोगों की आंखों में खुशी की जो चमक आती है, मेरा मन खुश हो जाता है. व्यस्त रहने से समय अच्छी तरह बीत जाता है और मन भी खुश रहता है.

“अच्छा, अब आप अपने बारे में कुछ बताइए,” वसुधा ने कहा.

“हां, मैं यहां पास ही की सनशाइन सोसाइटी के फ्लैट नंवर 703 में अपने बहूबेटे के साथ रहता हूं. पत्नी मानसी मेरा साथ छोड़ कर लंबी यात्रा पर चली गई है.

बहूबेटे मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत हैं. सुबह 8 बजे घर से निकलते हैं, फिर रात 8 बजे तक ही लौट पाते हैं. मेड आ कर घर की साफसफाई करती है, मुझे खाना खिला कर चली जाती है. टीवी देखना मुझे अधिक पसंद नहीं है, खाली घर सारा दिन काटने को दौड़ता है.”

“मेरा कहा मानिए, हर रोज सुबह सैर करने की आदत बना लीजिए. सैर करने से तन स्वस्थ व मन प्रफुल्लित रहता है. रोज यहां आने से आप के कुछेक मित्र भी बन जाएंगे, फिर टाइम का पता ही नहीं चलेगा.” यह कह कर वसुधा अपने घर की ओर निकल गई. वसुधा के जाने के बाद दिवाकरजी काफी देर तक उस की कही बातों को मन ही मन दोहराते रहे. वैसे कह तो ठीक ही रही थी, बीती यादों के सहारे जिंदगी नहीं काटी जा सकती. वसुधा पार्क से चली जरूर गई थी लेकिन दिवाकर के दिलदिमाग पर अपने विचारों की गहरी छाप छोड़ गई थी.

घर पहुंचने पर दरवाजे की घंटी बजाई, सकुचाती हुई बहू नीरा ने दरवाजा खोल दिया, ‘‘इतनी सुबहसुबह आप कहां चले गए थे, पापाजी?” नीरा ने पूछा.

“पास के पार्क में चक्कर लगाने चला गया था.”

“अच्छा, अब आप फ्रैश हो लीजिए, तब तक मैं चाय बनाती हूं.”

“अरे नहीं बहू, तुम अपने औफिस जाने की तैयारी करो, आज चाय मैं बनाता हूं.”

नीरा ने आश्चर्यचकित हो कर उन की तरफ देखा क्योंकि पिछले 10-15 दिनों से जब से यहां आए हैं, उन के मुंह से सिर्फ हां या हूं शब्द ही सुने थे. आज वे उन दोनों के लिए चाय बनाने की कह रहे थे, कुछ बात तो जरूर है वरना एकदम चुपचाप रहने वाले पापाजी आज उन दोनों के लिए चाय बनाने की जिद ठान कर बैठे हैं. शायद पार्क में कोई हमजोली मिल गया हो. चाय पी कर बहूबेटे दोनों अपने औफिस के लिए निकल गए. हां, जातेजाते इतनी अच्छी चाय बना कर पिलाने के लिए उन का धन्यवाद करना नहीं भूले.

दिवाकरजी का मन आज बहुत खुश था. आज उन को घर काटने को नहीं दौड़ रहा था. अपना बिस्तर ठीक किया. तब तक मेड आ चुकी थी. अच्छी तरह घर की साफसफाई करवाई. अपनी पसंद का खाना बनवाया. खा कर थोड़ी देर आराम किया. फिर अपना चश्मा ठीक करवाने मार्केट निकल गए.

मार्केट में घूमतेघूमते याद आया कि कितने दिनों से उन्होंने हेयरकटिंग नहीं करवाई है. हेयरकटिंग करवा कर लौटे तो उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट थी. उन्हें याद आया कि मानसी को उन के बड़े बालों से कितनी चिढ़ थी. घर लौटते समय उन का मन खुश था. वे मन ही मन मुसकरा दिए और सोचा वे अब से सिर्फ जिएंगे ही नहीं, जिंदा रहेंगे. मानसी के जाने के बाद आज कितने दिनों बाद वे मुसकराए थे.

अब हर रोज सुबह पार्क जाने का नियम बना लिया. पार्क में वसुधा से रोज मुलाकात होती लेकिन अब पार्क में जा कर बैंच पर बैठने के बजाय वे धीरेधीरे पार्क के दोतीन चक्कर लगाने लगे, फिर बैंच पर बैठ कर वसुधा का इंतजार करते. वसुधा दौड़ लगा कर आती, फ्लासक से कप में चाय उड़ेल कर उन की ओर बढ़ा देती. चाय पीतेपीते वे दोनों थोड़ी देर गपशप करते, फिर अपनेअपने घर की तरफ निकल लेते.

दिवाकर ने महसूस किया कि उन्हें वसुधा के साथ की आदत पड़ती जा रही है. वसुधा को भी उन के साथ समय बिताना अच्छा लगता. पिछले कई महीनों से यही सिलसिला चल रहा था.

एक दिन दिवाकर सो कर उठे तो सिर में भारीपन सा महसूस हुआ, चैक किया तो पता चला कि उन को तेज बुखार है. ऐसे में पार्क जाने का तो सवाल ही नहीं उठता था. औफिस जाने से पहले नमन ने डाक्टर को दिखा कर दवा दिलवा दी थी. उन दोनों के औफिस में औडिट चल रहा था, सो, छुट्टी लेना मुमकिन न था.

पूरे 2 दिन हो गए थे उन को बिस्तर पर पड़े हुए, बुखार तो उतर गया था लेकिन कमजोरी अभी बाकी थी.

तीसरे दिन दोपहर को दरवाजे की घंटी बजी. इस समय कौन होगा, सोचते हुए उठे और दरवाजा खोला. सामने वसुधा खड़ी थी. वसुधा को यों अचानक अपने घर पर देख वे हैरान रह गए. फिर ध्यान आया कि परिचय देते समय खुद उन्होंने ही तो अपना फ्लैट नंबर वसुधा को बताया था.

“मुझे लग ही रहा था कि तुम्हारी तबीयत खराब होगी,” वसुधा आते ही बोली, “डाक्टर को दिखाया, नहीं दिखाया होगा, आदतन खुद ही प्रश्न कर खुद ही जवाब भी दे दिया. पूरे दिन वह दिवाकर के साथ ही रही. इस बीच दिवाकर ने कई बार वसुधा से उस के घर जाने को कहा लेकिन मन ही मन वसुधा का उन की इस तरह चिंता करना बहुत अच्छा लग रहा था.

दोतीन दिन आराम करने के बाद दिवाकर ने ठीक महसूस होने पर पार्क जाना शुरू कर दिया. उन्हें देख कर वसुधा के चेहरे पर उजली सी मुसकान खिल गई.

धीरेधीरे वसुधा व दिवाकर की पार्क में समय बिताने की अवधि बढ़ती गई. सैर करते, फिर बैंच पर बैठ कर कई बार चाय पीतेपीते एकदूसरे के जीवन जीने के नजरिए के बारे में अपनीअपनी राय एकदूसरे के सामने रखते. जब से वे

वसुधा से जुडे थे उन के स्वभाव में काफी परिवर्तन आ गया था. अब उन्हें वसुधा की बातें अच्छी लगने लगी थीं.

एक दिन दिवाकरजी जैसे ही पार्क से घर लौटे, बेटे नमन ने टोका, ‘‘पापा, आजकल आप पार्क में कुछ ज्यादा समय नहीं बिताने लगे हैं. जहां तक मुझे मालूम है, आप को घूमने का इतना अधिक शौक तो है नहीं.”

“हां तो, पार्क में ठंडी हवा चल रही होती है, लोग घूम रहे होते हैं, फिर मैं पेपर भी वहीं बैठ कर पढ़ लेता हूं,” दिवाकरजी ने जवाब दिया.

“नहीं, पापा, वह बात नहीं है. मेरा दोस्त बता रहा था कि आजकल आप किसी औरत के साथ…” आगे की बात नमन ने बिना कहे ही छोड़ दी.

दिवाकरजी ने आग्नेय नेत्रों से नमन की ओर देखा, फिर लगभग चिल्लाते हुए बोले, “तुम्हें अपने दोस्त के कहे पर विश्वास है पर अपने पापा पर नहीं. अब इस उम्र में क्या यही सब करने को रह गया है,” कह कर तेजी से अपने कमरे की तरफ जा कर दरबाजा बंद कर लिया.

मन बहुत खिन्न था. पूरे दिन मन में विचारों का घमासान चलता रहा. क्या वे व वसुधा सिर्फ अच्छे दोस्त हैं, क्या उन को वसुधा के साथ जीवन की नई शुरुआत करनी चाहिए, परंतु वसुधा के मन में क्या है, कैसे पता करें आदिआदि.

दूसरे दिन पार्क पहुंचे तो चेहरे पर परेशानी साफ नजर आ रही थी.

“क्या बात है, कुछ परेशान लग रहे हो?” वसुधा ने पूछा.

“कल मेरा बेटा हमारे, तुम्हारे रिश्ते पर सवाल उठा रहा था.”

“तो तुम ने क्या कहा?”

“मुझे क्या कहना चाहिए था?” दिवाकर ने वसुधा की तरफ प्रश्न उछाल दिया.

“मुझे नहीं पता, आज मुझे घर पर कुछ काम है, सो जल्दी जाना है,” कह कर वसुधा अपने घर जल्दी ही चली गई.

दिवाकरजी ने सोचा, कहीं इस तरह का प्रश्न पूछ कर उन्होंने कोई गलती तो नहीं कर दी वरना रोज तो घंटों बैठ कर दुनियाजहान की बातें करती थी. पता नहीं वह उन के बारे में न जाने क्या सोच रही होगी. कहीं वसुधा ने उन से बातचीत करना बंद कर दिया तो?

वे घर तो आ गए थे लेकिन मन में उठ रहे विचारों की उठकपटक से बहुत परेशान थे. वे समझ नहीं पा रहे थे कि किसी औरत से मिलने पर नमन को एतराज़ क्यों है? क्या एक स्त्री, पुरूष सिर्फ अच्छे दोस्त नहीं हो सकते? परंतु अगले ही पल विचार आया कि इस में उन के बेटे का भी क्या दोष है. इस तथाकथित समाज में इस तरह के रिश्तों को सदैव शक की निगाह से ही देखा जाता है तो क्या उन्हें अपने व वसुधा के रिश्ते को कोई नाम दे कर इस उलझन को दूर कर देना चाहिए.

कुछ निर्णय नहीं ले पा रहे थे. मन में ऊहापोह की स्थिति निरंतर बढ़ती जा रही थी क्योंकि वे वसुधा जैसी जिंदादिल व बेबाक बात करने वाली दोस्त को खोना नहीं चाहते थे.

एक दिन औफिस से आ कर नमन ने कहा, ‘‘पापा, आप से कुछ बात करनी थी?”

“हां, हां, कहो क्या बात है?”

“पापा, मेरा प्रमोशन हो गया है.”

“अरे, यह तो बड़ी खुशी की बात है परंतु यह सव बताते हुए तुम इतना सकुचा क्यों रहे हो?”

“पापा, असल में बात यह है कि मेरी कंपनी किसी प्रोजैक्ट के सिलसिले में तीनचार साल के लिए मुझे विदेश भेज रही है और नीरा भी मेरे साथ जा रही है. ऐसे में आप का यहां अकेले रहना व इतने बड़े फ्लैट का किराया देना मुश्किल हो जाएगा. सो, आप का बरेली वापस जाना ही ठीक रहेगा.”

“तुम अपनी लाइफ का फैसला करो, मेरा मैं खुद देख लूंगा,” दिवाकरजी ने तुनक कर कहा.

दूसरे दिन पार्क जाते समय मन ही मन एक फैसला कर लिया, आज वसुधा से वे क्लीयर बात कर ही लेंगे कि वह उन के बारे में क्या सोचती है. आखिर मालूम तो करना ही पड़ेगा कि उस के मन में क्या चल रहा है.

बेटे के विदेश जाने के समय तक उन दोनों में परस्पर कुछ लगाव सा हो गया था. लेकिन सिलसिला अभी तक सिर्फ बातचीत तक ही सीमित था. दोनों ने आपस में इस पर खुल कर कोई बातचीत नहीं की थी. दिवाकरजी अपने इस रिश्ते को ले कर सीरियस थे. बेटे के जाने से पहले ही वे इस बात को अंजाम देना चाहते थे, इसीलिए आज उन्होंने वसुधा से बात करने की ठानी, ताकि कोई फैसला लिया जा सके.

जैसे ही वसुधा पार्क के चक्कर लगा कर उन की बगल में आ कर बैठी, विना किसी लागलपेट के वसुधा की तरफ देख कर कहा, ‘‘वसुधा, शादी करोगी मुझ से?”

“शादी और तुम से, वह भी इस उम्र में,” वसुधा ने चौंकते हुए उन की तरफ देखा.

“उम्र की बात छोड़ो, तुम तो सिर्फ यह बताओ कि शादी करोगी या नहीं मुझ से?”

वसुधा कोई जवाब न दे कर चुपचाप उन को देखती रही.

इस के बाद उन दोनों के बीच चुप्पी छा गई. 5 दिन हो गए थे, वे दोनों पार्क आते, वसुधा पार्क के चक्कर लगा कर उन के पास बैठती, चाय पिलाती लेकिन पहले की तरह गपशप व बातचीत का आदानप्रदान बंद था, क्योंकि दोनों के मन में ही विचारों की जंग छिड़ी हुई थी.

एक दिन दिवाकर पार्क पहुंचे, दोतीन चक्कर लगा कर बैंच पर आ बैठे. उन की द्रष्टि बारबार पार्क के गेट की तरफ जाती क्योंकि वसुधा आज अभी तक पार्क में नहीं आई थी. उन को वसुधा की कमी बहुत ज्यादा खल रही थी कयोंकि आज उन का बर्थडे था और इस खुशी को वे वसुधा के साथ बांटना चाहते थे. बहूबेटे को तो शायद याद भी नहीं था कि आज उन का वर्थडे है. पत्नी मानसी उन के इस दिन को बहुत खास बना देती थी. उन की पसंद का खाना बना कर और भी न जाने बहुत सी ऐसी गतिविधियां कर के वह उन को खुशखबर देती. तभी उन की नजर पार्क के गेट की तरफ पड़ी, देखा, सामने से वसुधा चली आ रही थी. उस के हाथ में आज एक गिफ्टपैक था.

रोज की तरह वसुधा ने अपना बैग व गिफ्ट पैकेट उन को थमाया और बिना कुछ बोले, सैर करने निकल गई. जब लौट कर आई, उन की बगल में बैठते हुए बोली, ‘‘हैपी बर्थडे टू यू. हां, यह गिफ्ट पैकेट तुम्हारे लिए है.”

“तो तुम्हें याद था कि आज मेरा बर्थडे है?”

“लो, उस दिन तुम ने ही तो बताया था कि मानसी मेरा जन्मदिन बहुत धूमधाम से मनाती थी. गिफ्ट देख कर उन के चेहरे पर खुशी की चमक आ गई.

दिवाकर ने गिफ्ट को खोलने की बहुत कोशिश की परंतु गिफ्ट पैकिंग पर लगा टेप खोल ही नहीं पा रहे थे.

वसुधा ने उन के हाथ से पैकेट लिया और मुसकराते हुए बोली, “एक गिफ्टपैक तो खुलता नहीं और ख्वाब देख रहे हैं शादी करने के.

“इस में तुम्हारे लिए शर्टपैंट है और सैर करने के लिए ट्रैक सूट. कुरतापजामा पहनने वाले आदमी मुझे कतई पसंद नहीं और पार्क में आ कर बैंच पर बैठ कर सोने वाले तो बिलकुल नहीं. मुझे स्मार्ट पति पसंद है,” कह कर आदतन खिलखिला कर हंस दी, “सो, यह ट्रैक सूट पहन कर पार्क के तीनचार चक्कर लगाने पड़ेंगे हर रोज. घूमने का शौक तो है नहीं और मन में लड्डू फूट रहे हैं शादी करने के,” वसुधा ने मुसकराते हुए कहा.

वसुधा उन की बगल में आ कर बैठ गई. दिवाकर ने कुछ नहीं कहा. कुछ देर दोनों के बीच चुप्पी छाई रही. लेकिन कनखियों से दोनों एकदूसरे को देख रहे थे. एकाएक दोनों की नज़रें मिलीं तो दोनों ठहाका मार कर हंस दिए. इस हंसी ने सारे सवालों के जवाब दे दिए थे. वे दोनों ही जिंदगी की एक नई शुरुआत करने को मन ही मन तैयार थे. अपने बच्चों से इस बाबत बात की, तो उन को खुशी हुई सुन कर कि कैसे 2 बुजुर्ग अपनी दूसरी पारी खेलने के लिए तैयार हैं.

लेखिका – माधुरी

शिल्पशास्त्र या ज्योतिषशास्त्र : अंतिम भाग

पिछले 5 अंकों में आप ने भूमि की जाति, भूमि से भविष्य और भूमि पर कब निर्माण करें आदि के बारे में पढ़ा था जो बेसिरपैर का था. अब आगे शिल्पशास्त्र में क्या कहा गया है, उसे पढि़ए-

वास्तुशास्त्र या वास्तुनाग

शिल्पशास्त्र में ऐसीऐसी ऊटपटांग बातें लिखी गई हैं कि कोई भी तर्कशील व्यक्ति अपना माथा पकड़ ले. इस में ज्योतिषी, अंधविश्वास और छद्मविज्ञान का उपयोग किया गया है, जिस से हिंदू समाज को मूर्ख बनाया जा रहा है.

शिल्पशास्त्र में हर घर की जमीन के अंदर एक आदमी की कल्पना की गई है, जिसे ‘वास्तुपुरुष’ कहा गया है. इसी तरह हर घर की जमीन के अंदर एक नाग (सांप) की कल्पना की गई है, जिसे ‘वास्तुनाग’ कहा गया है.

इस नाग की स्थिति तीनतीन महीने के बाद बदलती है. तीन महीने मुंह पूर्व में, पीठ उत्तर में और पूंछ पश्चिम में. फिर तीन महीने पीठ पूर्व में, मुंह दक्षिण में और पूंछ उत्तर में है. इस तरह आगे के तीनतीन महीनों की भिन्नभिन्न स्थितियां हैं. (शिल्पशास्त्र 2/16).

यदि वास्तुनाग के सिर वाले स्थान पर (जो तीन महीने पूर्व दिशा है, तीन महीने उत्तर दिशा है) खुदाई की जाए, कोई पेड़पौधा आदि लगाने के लिए यदि जगह खोदी जाए तो इस से पत्नी और बच्चों का विनाश होता है. यदि उस स्थान को खोदा जाए जहां उस नाग का पेट पड़ता हो तो सभी प्रकार का सुख प्राप्त होता है. यदि उस की नाभि के स्थान को खोदा जाए तो गुप्तांगों का रोग होता है, घुटने पर खोदा जाए तो लंबे समय के लिए प्रवास मिलता है, उस की जंघा पर खोदा जाए तो क्षयरोग होता है और उस की पूंछ खोदने पर मृत्यु होती है.

दारापत्यप्रणाशो भवति च खनने मस्तके नागराजस्य,
श्रीसंपत्ति: प्रभुत्वं यदि हृदि जठरे सर्वभागैरूपेत:.
नाभिगात्रेरतिशभयदो गृह्यदेशे च रोगो,
जान्वो दीर्घप्रवासी क्षयमपि जघने पुच्छदेशे च मृत्यु:.
(शिल्पशास्त्रम् 2/21-22)

यहां शिल्पशास्त्र ने काफी गप्पें हांकी हैं. यहां सांप के घुटने और जांघ की बात कही गई है. ये दोनों टांग के हिस्से हैं. सांप की टांग होती ही नहीं तो उस के घुटने और जांघें कहां से टपक पड़ेंगी?

दूसरे, यह नाग (सांप) सचमुच का नहीं, बल्कि कल्पित है. इसी लिए शिल्पशास्त्र ने कहा है-

स्थाने स्थाने प्रकल्पन्ते विपाके नाग अंतक: (2/15)
अर्थात वास्तुनाग की कल्पना की जाती है (प्रकल्पन्ते).

प्रश्न है कि यह कल्पित नाग किसी का क्या कुछ बना या बिगाड़ सकता है? यदि सचमुच का भी नाग हो और उस के सिर पर खुदाई करें, कुदाल वगैरह चलाएं तो वह खुद मर जाएगा. इधर, उस कल्पित नाग के कल्पित सिर पर कुदाल चलाने के शिल्पशास्त्र आदमी की पत्नी व उस के बच्चों की मौत की घोषणा कर रहा है.

कल्पित नाग के उन अंगों पर खुदाई के अच्छेबुरे फल शिल्पशास्त्र ने बता दिए हैं, जो अंग सचमुच के नाग के भी नहीं होते. यह सारा कुछ ऐसे लगता है मानो शिल्पशास्त्र भांग के नशे में लिखा गया हो.

वास्तु पुरुष की पूंछ?

जैसे नाग के न घुटने होते हैं, न जांघ, उसी तरह पुरुष की पूंछ नहीं होती परंतु यदि भांग का सुरूर हो तो शायद यह सब संभव है. इसीलिए वास्तु (घर) में जैसे कल्पित नाग के न होने वाले अंगों के भी अच्छेबुरे फल बता दिए गए हैं, वैसे ही वास्तु पुरुष की पूंछ पर खुदाई न करने की बात कही गई है.

वास्तो: शिरसि पुच्छे च,
आयु : कामं खनन्नैव.
शिल्पशास्त्रम् 2/23

(वास्तु पुरुष की पूंछ और उस के सिर पर अपनी जिंदगी (उमर) चाहने वाला कभी खुदाई न करे.)

दो अध्याय समाप्त हो गए हैं. क्या आप ने शिल्प संबंधी कोई बात सम झी, सुनी या सीखी है, इस शास्त्र से?

तीसरे अध्याय में केवल दो बातें हैं. पहली है, जब आप घर बनाने के लिए खुदाई करने जा रहे हों तो आप को क्या दिखाई देने पर कैसा फल मिलेगा.

यदि तब ध्वज, वस्त्र आदि दिखाई दे तो धन प्राप्ति होती है, यदि जल से पूर्ण घड़ा दिखाई दे तो धन व स्वर्ग आदि प्राप्त होता है.

ध्वजवस्त्रपताकादि दर्शने धनसम्भव :
पूर्णकुंभे भवेद् वित्तं प्राप्रोति कनकादिकम्
शिल्पशास्त्रम् 3/1

परंतु यदि आप को कोई अपाहिज, भिक्षुक, विधवा, रोगी और लंगड़ा दिखाई दे और आप तब भी घर बनाना शुरू कर दें तो आप की मृत्यु निश्चित है :

हीनांगो भिक्षुकश्चैव वन्ध्या रोगार्त्तिखंजकौ,
दृश्यते चेद् गृहारंभे कर्त्तुश्च मरणं धु्रवम्.
शिल्पशास्त्रम् 3/3

यह ‘अपाहिज’ व ‘लंगड़े’ के प्रति दुर्भावना का परिचायक है, जबकि आज इन लोगों के लिए इस तरह के ठेस पहुंचाने वाले शब्द इस्तेमाल करना भी उचित नहीं सम झते. इन्हें ‘शारीरिक तौर पर चुनौतीपूर्ण’ कहते हैं. जो स्वयं भिखारी है, जो स्वयं विधवा है, जो स्वयं शारीरिक तौर पर परेशान हैं, वे बेचारे उस घर बनाने वाले की मृत्यु के कारण कैसे बन सकते हैं? क्या इन्हें देखने से ही गृहकर्ता के मुंह में पोटैशियम साइनाइड पहुंच जाएगी? इन्हें देखने से कितने गृहकर्ता या गृहस्वामी आज तक मर चुके हैं?

यह सारा कथन उक्त लोगों के प्रति अकारण द्वेषपूर्ण प्रचार है. हमें इस से बचना होगा.

इस अध्याय की दूसरी बात है उन अंधविश्वासों की सूची जो घर बनाते समय सूत्र (= धागे) के टूट जाने आदि से संबंधित हैं.

कहा है, यदि विस्तार करते समय सूत्र टूट जाए तो इस से मृत्यु होने की आशंका पैदा हो जाती है. अत: घर बनवाने वाले को चाहिए कि वह विधिविधान के साथ शांति कर्म (शांति के लिए पूजापाठ), हवन आदि करवाए :

सूत्रस्य छेदनात् क्षिप्रं दु:खं स्यान्मरणान्तकम्,
अतो विधिविधानेन शांतिहोमं तु कारयेत्. शिल्पशास्त्रम्, 3/4

जब सूत्र को गिनतीमिनती आदि के लिए फैलाया जाए, तब यदि गाय के रंभाने की आवाज सुनाई दे तो निश्चित है कि वहां धरती में किसी गाय की हड्डियां होंगी. इस के फलस्वरूप वास्तुपति (= गृहस्वामी) की मृत्यु निश्चित है :

सूत्रे बिस्तीर्यमाने तु धेनु: शब्दायते यदि,
गवास्थीन्यत्र
जानीयान्मृत्युर्वास्तुपतेर्भवेत्
शिल्पशास्त्रम्, 3/8

अब यदि सचमुच में धरती के नीचे किसी मृत गाय की हड्डियां हों भी तो कोई दूसरी जीवित गाय उस धरती पर सूत्र फैलाने के समय कैसे रंभा सकती है? धरती के नीचे की हड्डियों, उस के ऊपर के सूत्र तथा दूर स्थित किसी गाय, इन तीनों में आपस में क्या संबंध है? गाय को किस माध्यम से पता चलेगा कि उस स्थान पर गाय की ही हड्डियां हैं? अब यदि वे हैं भी और मान लो गाय को भी पता चल गया है, तब गाय या वे हड्डियां उस की मृत्यु का कारण कैसे हो सकती हैं, जो वहां घर बनवा रहा है?

लोग जब गाय के बछड़े को दूध नहीं देते या जब उस का बछड़ा मर जाने पर नकली बछड़ा वहां उस के आगे डाल देते हैं, तब तो गाय किसी की मृत्यु का कारण नहीं बनती, फिर वह गृहस्वामी की मृत्यु का कारण कैसे बन सकती है, जबकि उस ने उस गाय को मारना तो एक ओर रहा, कभी देखा तक भी नहीं? यदि गाय में किसी को मारने की दैवीय शक्ति है, तब तो ‘गौहत्या बंद करो’ के नारे लगाने की किसी को जरूरत ही नहीं, तब तो उन हत्यारों से गाएं खुद ही हिसाब बराबर कर लेंगी. हत्यारे को तो गाय मार नहीं सकतीं, परंतु जिस ने कुछ भी नहीं बिगाड़ा, उस की वह मौत ला देगी- ऐसा कोई घोर अंधविश्वासी ही मान सकता है, कोई स्वस्थ व सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति नहीं.

कुत्ता, गधा व कौआ

शिल्पशास्त्र कहता है कि यदि सूत्र विस्तार करते समय कुत्ते का रोना सुनाई दे तो इस का मतलब है कि गृहस्वामी शीघ्र ही कुत्ते के काटने से मारा जाएगा :

सूत्रे विस्तीर्यमाने तु कक्कुरो यदि रुघते,
अचिरेणैव कालेन शूना निहत एव स:
-शिल्पशास्त्रम् 3/9

जो कुत्ता खुद रो रहा है, वह अपना तो दुख दूर नहीं कर पा रहा. वह किसी दूसरे की मृत्यु का सूचक व कारक कैसे हो सकता है? आज तो टीके बन चुके हैं, कुत्ते के काटने की दवा के तौर पर. समय पर पूरा कोर्स करने से कोई नहीं मरता. अत: यह शिल्पशास्त्रीय कथन एकदम निरर्थक है.

यदि गधा रेंकता सुनाई दे तो जहां घर बनाते ही, उस स्थान को खाली कर जाओ और घर कहीं अन्यत्र बनाओ. यदि गृहस्वामी का मुख देख कर कौआ शब्द करने लगे तो उस की अचानक मृत्यु हो सकती है :

गर्दभो शब्दयते तत्र तद्गेहं परिवर्जयेत्,
काको दृष्ट्वा मुखं रौति धु्रवं मृत्युर्विनिर्दिशेत्.
-शिल्पशास्त्रम् 3/10

गधा यदि रेंकता है तो क्या वह गृहस्वामी से यह कहता है कि तुम यह जगह छोड़ कर चले जाओ और अन्यत्र घर बनाओ? यदि वह ऐसा कहता भी हो तो कोई दूसरा गधा भी उस की बात न मानेगा, इंसान की तो बात ही छोडि़ए. फिर शिल्पशास्त्र किस आधार पर उस जगह को छोड़ कर भागने के लिए कह रहा था? क्या यह भोलेभाले लोगों को इस तरह भगा कर खुद उन की भूमि को हथियाने का षड्यंत्र तो नहीं?

आगे कहा है कि यदि किसी गृहस्वामी को देख कर कौआ शब्द करे तो सम झो वह मृत्यु के आगे की सूचना दे रहा है. यह किस आधार पर कहा है? क्या कौआ मृत्यु के यहां संदेशहर का काम करता है? कौआ गृहस्वामी को देख कर चाहे रोटी का टुकड़ा मांगता हो, पर वास्तुशास्त्र को मृत्यु ही मृत्यु सर्वत्र दिखाई देती है. लोग इस तरह डरेंगे, तभी तो इन के जाल में फंसेंगे.

यदि सूत्र विस्तार करते समय सांप दिखाई दे तो सम झो वह गृहपति थोड़ा समय ही जीवित रहेगा और सांप के काटने से मरेगा :

सूत्रे विस्तीर्यमाने तु पन्नगो यदि दृश्यते,
अचिरेणैव कालेन सर्पेण निहतो धु्रवम्.
शिल्पशास्त्रम् 3/11

आज तो कई बड़ेबड़े होटलों में लोग चुन कर सांप का मीट खाते हैं, अपने ये शिल्पशास्त्र सांप दिखे जाने को ही मौत का वारंट बता रहे हैं. यदि सांप दिखाई दे गया है तो क्या उस का इलाज नहीं किया जा सकता? इस तीसरे अध्याय में भी शिल्प के बारे में कुछ नहीं, उस का छिलका तक नहीं. सिर्फ अंधविश्वासपूर्ण और थोड़ी बातें हैं.

चतुर्थ अध्याय में कहा गया है कि जिस स्थान पर राख, हड्डी, काठ, कोयला, भूसा, बाल, खोपड़ी, रक्त, दांत, मिट्टी का घड़ा मिला हो, वहां घर नहीं बनाना चाहिए. जो वहां रहेगा उस के यश और धन का श्रय होगा :

भस्मास्थि काष्ठमंगारं तुषं बालं कपालकम्,
रक्तपुत्तिकदन्तं च मृद्भाण्डास्थीति यत्र वै,
तत्रावासो न कर्तव्य : कृते कीर्तिधनक्षयम्. -शिल्पशास्त्रम् 4/1

ये चीजें किसी के यश और धन का क्षय कैसे करेंगी, इस के बारे में शिल्पशास्त्र ने कुछ नहीं बताया. इन चीजों को वहां से हटा देने पर और भूमि की साफसफाई करने के बाद ये किसी को क्या कहेंगी, सम झ नहीं आता.

यदि उस स्थान से, जहां घर बनाना है, खोदते समय ईंट निकले तो धन का लाभ होता है, परंतु यदि पत्थर निकले तो सारी संपत्ति का क्षय होगा. यदि सांप निकले तो मौत होगी, यदि कोयला निकले तो वहां घर बनाने वाले का सारा कुछ नष्ट हो जाएगा.

इष्टकायामर्थलाभ: पाषाणे सर्वसम्पद:,
सर्पादौ निधन कर्त्तुरंगारे च कुलक्षयम्.
-शिल्पशास्त्रम्, 4/2

यदि ईंट निकलने पर धन लाभ होता है, फिर तो पत्थर निकलने पर स्वर्ण, रत्न, हीरक आदि मिलने चाहिए, परंतु शिल्पशास्त्र पहली संपत्ति के भी नष्ट होने की बात करता है, जो खुद पत्थर है वह यह सब कैसे कर सकता है?

सर्प यदि निकला है तो उसे ठिकाने लगाओ, वह तुम्हारी मृत्यु कैसे ला सकता है? रही बात कोयले की. जिस स्थान पर नीचे कोयले की खाने हैं, वहां रहने वाले का भी किसी का सारे का सारा कुल नष्ट नहीं हुआ, तुम्हारा कुल धरती के नीचे से निकले कोयले के एक टुकड़े से ही नष्ट हुआ जा रहा है? है कोई तुक इस में?

यदि घर के पूर्व में ढलान हो तो वह वृद्धिकारक होती है, उत्तर में हो तो धनदायक होती है, पर पश्चिम में हो तो हानिकारक होती है. इसी तरह दक्षिण की ओर झुके मकान में रहना भी मृत्युकारक होता है :

पूर्वप्लवो वृद्धिकरो धनदश्चोत्तरप्लव:,
दक्षिणो मृत्युदश्चैव धनहा पश्चिमप्लव : शिल्पशास्त्रम् 4/3

यदि पूर्व में ढलान वृद्धिकारक है और उत्तर में धनदायक, तो पश्चिम में वह हानिकारक क्यों? क्या उधर से खजाना खिसक जाएगा? किस आधार पर? कैसे, उस के धनदायक या वृद्धिदायक होने का भी क्या प्रमाण है? जैसे उस के धनात्मक पक्ष गप और मनगढ़ंत हैं, उसी तरह उस के ऋणात्मक पक्ष हैं.

दक्षिण की ओर झुके मकान से ही क्यों मृत्यु होती है, बाकी दिशाओं में उस के झुके रहने से क्यों नहीं होगी? क्या उन दिशाओं में झुके मकानों में रहने वाले अमर हैं?

पीपल का पेड़

पीपल के पेड़ की प्रशंसा में कई बार जमीनआसमान के कुलाबे मिलाए जाते हैं. परंतु शिल्पशास्त्र कहता है कि इसे घर के पूर्व में नहीं लगाना चाहिए. इसी तरह दक्षिण में इमली का, पश्चिम में बरगद का तथा उत्तर में उदुंबर (गूलर) का पेड़ लगाना वर्जित है :

पूर्वेडश्वत्थं वर्जयित्वा तिन्हड़ीं दक्षिणे तथा,
पश्चिमांशे वटं तद्वदुत्तरे न हयुदुम्बरम्. – शिल्पशास्त्रम् 4/4

ये पेड़ जिन दिशाओं में वर्जित कहे गए हैं, वे किस आधार पर कहे गए हैं? वास्तुशास्त्र या शिल्पशास्त्र के पास केवल बातें हैं, जिन्हें आंखें बंद कर के स्वीकार करना होगा, क्योंकि इस के पास किसी प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है. जो कह दिया, बस वही अंतिम शब्द बन गया. कोई जरा सी भी बुद्धि रखने वाला और जरा सा भी स्वाभिमानी व्यक्ति इस को आंखें मूंद कर कैसे स्वीकार कर सकता है?

आगे के कई श्लोकों में ऐसे ही अन्य वृक्षों के बारे में फतवे जारी किए गए हैं कि यदि पूर्व दिशा में जलभरण होता हो तो पुत्र की हानि होती है, यदि आग्नेय (=दक्षिण पूर्वी) दिशा में होता हो तो अग्निभय होता है, दक्षिण दिशा में हो तो शत्रुभय होता है, यदि नैनहत्य (दक्षिण पश्चिमी) दिशा में हो तो पत्नी से कलह होती है, पश्चिम में हो तो पत्नी दुष्ट होगी, वायव्य (= पश्चिम उत्तर) दिशा में हो तो संपत्ति का क्षय होता है, और उत्तर पूर्व में हो तो वृद्धिकारक होता है :

प्रागादिस्थे सलिले सुतहानि: शिखिमयं रिपुभयं च,
स्त्रीकलह : स्त्रीदौष्टयं नै:ष्टं वित्तामृज वृद्धि:.
-शिल्पशास्त्रम् 4/7

यह फल कथन भी पहले फलकथनों के समान ही निराधार, निर्मूल, मनगढ़ंत और थोथा है. इसी के साथ अध्याय चार समाप्त हो जाता है.
पांचवें अध्याय के केवल 4 श्लोक मिलते हैं, जिन में साधारण सी बातें हैं. पूर्व का कमरा किस नक्षत्र में शुभ होता है, किस दिशा के द्वार में किस ओर मुंह कर के प्रवेश करना चाहिए, आदि.

बिना कोई शिल्प के कोई बात बताए शिल्पशास्त्र समाप्त हो जाता है. क्या इस तरह के ग्रंथ शिल्प की दृष्टि से किसी काम के हैं? ये शिल्प के नाम पर ज्योतिषी, लालबु झक्कड़पन, पुरोहितवाद, अंधविश्वास, छद्मविज्ञान और शकुन आदि को ही प्रचारित करते हैं. इन से सावधान रहने में ही हिंदू समाज का भला है, क्योंकि यह यथार्थ में शिल्पशास्त्र नहीं बल्कि शिल्प का छीछड़ा है, शिल्प का विद्रूप है.

पति पर निर्भर न रहे पत्नी

रीवा और ईशान को शादी के बंधन में बंधे कुछ ही महीने हुए हैं. रीवा एक मल्टीनैशनल कंपनी में वर्किंग है और ईशान का अपना सफल बिजनैस है. जब रीवा और ईशान ने एक होने का निर्णय लिया था तभी उन के कानों में घरपरिवार और आसपास के लोगों की खुसफुसाहट पड़ने लगी थी कि अगर ईशान इतना अच्छा कमाता है तो रीवा को भला नौकरी करने की क्या जरूरत है. रीवा और ईशान दोनों अपने कैरियर के अच्छे मुकाम पर थे और उन दोनों ने लोगों की बातों को अनदेखा करते हुए अपना अलग घर बसाने का निर्णय लिया.

अगर घरपरिवार की सोच के हिसाब से सोचें तो उन्होंने ऐसा निर्णय ले कर बहुत गलत किया लेकिन अगर ध्यान से देखा जाए तो उन्होंने बहुत सही निर्णय लिया.

लोगों का काम है कहना

भले ही समाज बदल रहा है और बदलते समय के साथ भारतीय समाज के लोगों की सोच में भी काफी बदलाव आया हो लेकिन आज भी पुरानी सोच के लोगों के मुंह से काम के साथ घर संभालने वाली महिलाओं को ‘जब पति इतना कमाता है तो तुम्हें जौब करने की क्या जरूरत’ सुनने को मिल ही जाता है. लेकिन मौडर्न एज के मैरिड कपल्स ने ‘कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना’ वाली कहावत को सही मानते हुए अपने कैरियर को न छोड़ने का निर्णय लिया.

आप ही सोचिए अगर लड़का अपने कैरियर को बनाने में मेहनत करता है और लड़की भी उतनी ही मेहनत करती है तो उस की मेहनत को कम क्यों आंका जाए और उस से जौब छोड़ने की उम्मीद क्यों की जाए?

पकापकाया नहीं खुद की मेहनत का

हमारे समाज में अधिकांश कपल शादी के बाद पेरैंट्स के साथ उन के बनाए उन के सैटल घर में रहते हैं जहां उन्हें सबकुछ रेडीमेड मिलता है लेकिन वहीं जब रीवा की ईशान की तरह आप अपने घर में अलग रहने का निर्णय लेते हैं तो उस घर में वे हर चीज खुद से करते हैं जिस से उन में न केवल कौन्फिडैंस आता है बल्कि उन्हें दुनियादारी की सम झ और आटेदाल का भाव भी पता चलता है जो हर कपल को सीखना चाहिए.

अलग रहने का एक फायदा यह भी होगा कि आप को फैमिली, नातेरिश्तेदारों की चूंचूं भी नहीं सुननी पड़ेगी और अकेले रहने से नातेरिश्तेदार आप की वैल्यू करेंगे, इज्जत करेंगे कि आप ने अपना घर खुद बनाया है. सास, ननद देवरानी, जेठानी के ताने देने पर लड़की को नौकरी नहीं छोड़नी पड़ेगी. वैसे भी, आज के जमाने में एक व्यक्ति की कमाई से न घर बनाया जा सकता है न चलाया जा सकता है. आज की जरूरत है कि पतिपत्नी दोनों काम करें.

पतिपत्नी के बीच प्यार और नजदीकी बढ़ेगी

शादी के बाद हर कपल ऐसी प्लानिंग करे कि वे अलग घर में रहें भले ही और वह घर एक कमरे का हो या दो कमरे का, यंग कपल का अपना अलग किचन होना चाहिए.

इस से उन में अलग रहने का, जीवन के उतारचढ़ावों का सामना करना आएगा, खुद पर गर्व होगा कि वे खुद का घर बना और चला सकते हैं जहां लड़के और लड़की दोनों की भागीदारी होगी. इस से कपल के बीच प्यार और नजदीकी भी बढ़ेगी. पति भी पत्नी की कमाई की वैल्यू करेगा और घरपरिवार दोनों के खर्चे से ही चलेगा.

औरतों को मिलेगी अपनी पहचान

लड़कियों के लिए नौकरी या कमाई करना सिर्फ पैसा कमाने का जरिया होने से ज्यादा आत्मसम्मान, इंडिपैंडैंट बने रहने और अपनी पहचान बनाने का जरिया होता है. यह बात उन परिवारों और समाज को सम झने की जरूरत है जिन्हें लगता है कि पति अच्छा कमाता है तो पत्नी को घर से बाहर जा कर काम करने की क्या जरूरत है.

पतिपत्नी दोनों का होगा घर

जब पतिपत्नी दोनों मिल कर शादी के बाद अपना अलग घर बसाएंगे तो वह घर पतिपत्नी दोनों की कमाई से बनेगा और चलेगा. ऐसे में घर दोनों का होगा और लड़कियों की आखिरकार, शादी के बाद ‘उस का घर कौन सा’ की समस्या भी दूर होगी.

हिंदी माह : देश के माथे की बिंदी सरीखा है हिंदी का हाल

हिंदी के महीने के बारे में आप को पता है न, यह बहुत ही खास समय होता है, विशेषकर, सरकारी कार्यालयों के लिए. इस महीने में हम काफी हद तक अपनी मातृभाषा या राष्ट्रभाषा लेकिन कानूनन सरकारी यानी राजभाषा हिंदी के आंगन में सम्मान के सुंदर पौधे जरूर लगाते हैं. हर शहर में मुश्किल है लेकिन बड़े शहरों में नगर समितियां बनी हैं जो अनेक आयोजन करवाती हैं.

कार्यालयों को इन आयोजनों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने के लिए आग्रहपत्र भेजे जाते हैं. उन्हें प्रेरित किया जाता है कि प्रतियोगिता के जमाने में कुछ नया व दिलचस्प हो ताकि सहभागिता बढ़े और हिंदी फैले, यहांवहां उगे. आयोजकों द्वारा यह खयाल जरूर रखा जाता है कि मेजबान और मेहमान जरूर कहें ‘वी एंजौयड अ लौट.’ यह प्रशंसनीय है कि सरकार के आदेशों ने हिंदी का मामला संजीदा बनाया है, इसलिए आयोजन करने ही पड़ते हैं.

एक कार्यालय में आयोजन का विषय रहा. ‘चित्र देखो कहानी लिखो प्रतियोगिता.’ बिलकुल ऐसा लगा जैसे किसी बालपत्रिका द्वारा नन्हेमुन्नों के लिए प्रतियोगिता हो रही है. शायद कर्मचारियों के हिंदी प्रेम को बुनियादी स्तर पर उगाने के लिए ही यह विषय रखा गया था. प्रतियोगिता सुबह 11 बजे रखी गई थी. लेकिन बेमौसमी बारिश होने लगी.

खराब मौसम के कारण प्रतियोगिता देर से शुरू होने की घोषणा हो चुकी थी. छतरी में भीगते बचते, मौसम को ‘एंजौय अ लौट’ करते आयोजनस्थल पर पहुंचे, तो पता चला आयोजन स्थल का दरवाजा बंद था. कोई मेजबान या उन का चेला नहीं दिखा.

समझदार आयोजकों को पता होता है कि आएगा आने वाला, तभी पुरस्कार पाएगा. दरवाजा खोला तो देखा मीटिंग चल रही है. यही सोचा कि गलत जगह आ गए हैं. गलत समय पर आने वाली बारिश में भीगा चेहरा साफ कर देखा, लगा कि जगह तो यही है. पूछ ही लिया, क्या यहां हिंदी से संबंधित प्रतियोगिता हो रही है. जवाब मिला, ‘नो, इट्स अ सैमिनार औन इंगलिश टीचिंग.’

अच्छा रहा कि आयोजकों का कार्यालय सामने ही था. वहां से पता चला कि प्रतियोगिता, कर्मचारी मनोरंजन कक्ष में कुछ ही कदम की दूरी पर हो रही है. ढूंढ़ते हुए फिर गलत जगह पहुंच गए. फिर काफी सीढि़यां उतर कर मनोरंजन कक्ष पहुंचे. यहां भी दरवाजे के बाहर कोई नहीं, उन्हें पता था आएगा आने वाला.

अंदर पहुंचे तो टेबल टैनिस की मेज, कैरम बोर्ड, व्यायाम के उपकरण. आयोजक प्रतिनिधि बोले, वहां अभी सैमिनार चल रहा है, सोचा, यहीं निबटा लेते हैं. अपनी हिंदी की प्रतियोगिता खेल ही तो है, प्रतियोगी ज्यादा नहीं थे टैनिस टेबल के चारों ओर बैठे. कुछ और महालेटलतीफ आए तो छोटा टेबल रख कर ऐडजस्ट किया गया.

इधर प्रतियोगी सोच रहे थे, उधर आयोजक विषय का साधन ढूंढ़ रहे थे. हां, क्या विषय था…चित्र देखो…उन्होंने चित्र ढूंढ़ लिया था. एक पुराने कैलेंडर में छपा दक्षिण भारतीय प्राकृतिक दृश्य. पहले उन्होंने एकएक कर सभी प्रतियोगियों को दिखाया, फिर कहा, ध्यान से देख लीजिए, पूरे कैलेंडर को ही पुराने टेप के एक टुकड़े से चिपकाने लगे. मगर वह चिपकता नजर नहीं आया. एक प्रतियोगी ने सुझाव दिया, चित्र वाला पेज ही चिपकाइए. झट से पेज फाड़ कर चिपका दिया.

प्रतियोगिता शुरू करने की घोषणा करने के लिए बारिश में भी पहुंचे आयोजक सदस्य ने कहा, इत्मीनान से देखिए और दिमाग से लिखिए. एक प्रतियोगी ने कहा, ‘‘दिमाग से नहीं, हम तो दिल से लिखेंगे.’’ प्रतियोगिता के बीच में परंपरागत समोसे

व गुलाबजामुन परोसे गए. प्रतियोगिता संपन्न हो गई. मगर परिणाम भारतीय कार्यसंस्कृति के लालफीते के नीचे दब गए और घोषित होने बाकी रहे.

दोपहर बाद दूसरी प्रतियोगिता निबटानी थी. बदलते समय के साथ यहां अंदाज नया रहा. तकनीक साथ ली गई और मुख्य प्रेरणास्त्रोत रहे समझदार बक्से पर आ रहे शो. प्रतियोगियों के सामने स्क्रीन पर चित्र दिखाए गए व निश्चित समयसीमा में पूछा गया कि चित्र किस का.

हैरानी यह रही कि इन चेहरों में फिल्म व टीवी से जुड़े चेहरे नहीं थे. आयोजकों, प्रतियोगियों व अन्य को खूब आनंद आया. उन्हें नयापन अच्छा लगा. सवाल हिंदी में पूछे गए, मुसकराहटों का आदानप्रदान भी हिंदी में ही हुआ. सो, इस तरह हिंदी सप्ताह एक दिन में सही तरीके से मना लिया गया.

इस कार्यक्रम से जुड़े सब लोगों ने एंजौयड अ लौट किया. एक नटखट व्यक्ति का सुझाव था कि अगले पखवाड़े में रिऐलिटी शो जैसा ही कोई कार्यक्रम हो ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग दिलचस्पी लें व प्रतियोगी भी बढ़ें. बढि़या है, हिंदी के बहाने कुछ तो हो रहा है. यह अलग बात है कि कुछ लोग इसे काफी कुछ कहते हैं और कुछ सिरफिरे हरकुछ कहते हैं. कुछ भी कह लो, हिंदी के महीने में आयोजनों के मोरों का नृत्य जरूरी है.

मेरी बीवी बहुत खर्चीली है और उस के अजीबोगरीब शौक हैं.

अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..

सवाल –

मेरी उम्र 28 साल है और मेरी शादी हुए 2 साल हो चुके हैं. जब मेरी शादी हुई तब मेरा काफी अच्छा बिजनैस था और किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं थी. मेरी पत्नी को शौपिंग करना बेहद पसंद है. उसे अच्छे से अच्छा ब्रैंड पहनना पसंद है और शादी के बाद से मैं ने भी उसे कभी किसी चीज के लिए मना नहीं किया. उस ने जो चाहा उसे दिलवाया और उस ने जहां कहा मैं उसे वहां घूमाने भी ले कर गया. अब पिछले कुछ समय से मेरा बिजनैस ठीक नहीं चल रहा और इस वजह से मेरे ऊपर कर्जा भी काफी हो गया है. मगर इस के बावजूद मेरी पत्नी अपने खर्चे बिलकुल भी कंट्रोल नहीं कर रही है और उस के खर्च उठातेउठाते मेरा पूरा बजट हिल जाता है. मैं क्या करूं?

जवाब –

बिजनैस हर समय एकजैसा नहीं चलता. इस में उतारचढ़ाव आते रहते हैं. अलबत्ता आप अपनी जगह बिलकुल सही है.

आप ने शुरुआत से ही अपनी पत्नी की हर ख्वाइश पूरी करने की कोशिश की है जिस से कि उन को अब इस की आदत लग चुकी है. जिस का स्वभाव खर्चीला होता है उस के लिए खर्चे कंट्रोल करना आसान नहीं होता.

आप अपनी पत्नी के साथ बैठें और उन्हें प्यार से समझाएं कि कुछ समय के लिए उन्हें अपने खर्चे कंट्रोल करने चाहिए नहीं तो उन के खर्चे पूरे करने के चक्कर में आप के ऊपर कर्जा बढ़ता चला जाएगा. आप अपनी पत्नी को सारी स्थिति समझाएं कि आप की आमदनी अब पहले जितनी नहीं रही जिस कारण आप परेशान रहते हैं और उधार ले कर शौक पूरे करना कोई समझदारी नहीं है.

आप उन्हें जौब करने की सलाह भी दे सकते हैं जिस से कि उन के खर्चे भी नहीं रुकेंगे और साथ ही आप की थोड़ीबहुत मदद भी हो जाएगी.

आजकल की लड़कियां वैसे भी किसी के ऊपर आश्रित नहीं रहना चाहतीं और परिवार की भी मदद करना चाहती हैं तो इस के लिए जौब एक बैस्ट औप्शन है.

अगर आप अपनी पत्नी को प्यार से समझाएंगे तो वे जरूर आप की बात समझेंगी भी और बेतहाशा खर्च करने की आदत पर रोक भी लगा लेंगी.

हां, पत्नी से कुछ न छिपाएं क्योंकि अगर आप की पत्नी को सबकुछ पता होगा तभी वे आप की मदद कर पाएंगी.

ऐसे में आप उन्हें समझाएं कि उन्हें सिर्फ कुछ समय के लिए ही अपने खर्चों पर ब्रेक लगानी है और जब आप का बिजनैस फिर से अच्छा चलने लगेगा तब सब सामान्य हो जाएगा.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें.

तंत्रमंत्र का खेला : बाबा के भ्रमजाल से निकल पाई सुजाता

‘‘यह क्या है शैलेश? तुम्हें मना किया था न कि अगली बार लेट होने पर क्लास में एंट्री नहीं मिलेगी,’’ प्रोफैसर महेंद्र सिंह गुस्से से चीख उठे. ‘‘सौरी सर, आज आखिरी दिन था मजार में हाजिरी लगाने का, आज 40 दिन पूरे हो गए हैं, कल से मैं समय से पहले ही हाजिरी दर्ज करा लूंगा.’’

‘‘यह क्या मजार का चक्कर लगाते रहते हो? इतना पढ़नेलिखने के बाद भी अंधविश्वासी बने हो,’’ प्रोफैसर ने व्यंग्य किया. ‘‘सर, ऐसा न कहिए,’’ एक छात्र बोल उठा.

‘‘सर, आप को रेलवे स्टेशन पर बनी मजार की ताकत का अंदाजा नहीं है,’’ दूसरे छात्र ने हां में हां मिलाई. ‘‘सर, आप ने देखा नहीं, मजार

2 प्लेटफौर्म्स के बीच में बनी है, तीसरे, चौथे, 5वें प्लेटफौर्म्स जगह छोड़ कर बनाए गए हैं,’’ एक कोने से आवाज आई. ‘‘सर, अंगरेजों के जमाने से ही इस मजार का बहुत नाम है, 40 दिनों की नियम से हाजिरी लगाने पर हर मनोकामना पूरी हो जाती है,’’ किसी छात्र ने ज्ञान बघारा.

आज भौतिकी की क्लास में मजार का पूरा इतिहासभूगोल ही चर्चा का विषय बना रहा. प्रोफैसर भी इस वार्त्तालाप को सुनते रहे. महेंद्र सिंह का पूरा छात्रजीवन व नौकरी के शुरू के वर्ष भोपाल में बीते हैं. पिछले वर्ष उन्हें इस छोटे से जिले से प्रोफैसर का औफर आया तो वे अपनी पत्नी को ले कर इस कसबेनुमा जिले परसिया में चले आए, जहां सुविधा व स्वास्थ्य के मूलभूत साधन भी उपलब्ध नहीं हैं. इस कसबे को जिले में बदलने के 5 वर्ष ही हुए हैं, इसलिए विकास के नाम पर तहसील, जिला अस्पताल व सड़कों का विस्तार कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है.

सरकारी अस्पताल में जरूरी उपकरण और विशेषज्ञ डाक्टर्स की कमी बनी हुई है. बेतरतीब तरीकों से बने मकानों के बीच में, कहींकहीं सड़कें बन गई हैं तो सीवर और नाली का अभी कोईर् अतापता नहीं है. आसपास के गांवों के समर्थ लोग इस शहर में मकान बना कर रहने तो लगे हैं पर मानसिकता और आचरण से वे

अभी भी गंवई विचारधारा से जुड़े हैं. केवल 3 से 4 किलोमीटर के दायरे में इस कसबेनुमा शहर की हद सिमट कर रह गई है. इस दायरे से बाहर नदी है, जंगल हैं और हैं शुद्ध प्राकृतिक हवा के संग हरेभरे खेतखलिहान के नजारे. जो भी बैंक, तहसील व दूसरे विभागों से ट्रांसफर हो कर, दूरदराज से यहां आते हैं, वे अच्छे बाजार, संचार साधनों की असुविधा, यातायात के साधनों की कमी से उकता कर जल्दी ही इस जगह से भाग जाना चाहते हैं. नए खुले आईटीआई में महेंद्र सिंह को उन के अनुभव के आधार पर प्रोफैसर के पद का औफर मिला, तो वे मना न कर सके और भोपाल के अपने संयुक्त परिवार को छोड़ कर अपनी पत्नी को साथ लिए यहां चले आए. पत्नी सुजाता बेहद आधुनिक व उच्च शिक्षित है, इसीलिए कभीकभार वह भी कालेज में गैस्ट फैकल्टी बन क्लास लेने आ जाती.

सुजाता जब भी कालेज में आती, छात्रों की बांछें खिल जातीं. वैसे तो यह कोएड इंस्टिट्यूट है किंतु लड़कियों की संख्या उंगलियों में गिनी जा सकती है. लड़कियां साधारण ढंग से तैयार हो कर कालेज आती हैं. फैशन से उन का दूरदूर तक कोई नाता नहीं हैं. बस, बालों की खजूरी चोटी या पफ उठा बाल बना भर लेने से उन का शौक पूरा हो जाता है. नीले कुरते और सफेद सलवारदुपट्टा डाले 18 से 20 वर्षीया सहपाठिनों के सामने 35 वर्षीया सुजाता भारी पड़ती. नाभि दिखने वाली साड़ी, खुले और करीने से कटे बाल, गहरी लिपस्टिक से सजे होंठ और आंखों में गहरा काजल सजाए वह जब भी क्लास लेने आती, लड़कों में मैम को प्रभावित करने की होड़ मच जाती. वे उसे फिल्मी हीरोइन से कम न समझते.

महेंद्र सिंह अपने साथी शिक्षकों के बीच गर्व से गरदन अकड़ा कर घूमते, मानो चुनौती सी देते हों कि मेरी बीवी से बढ़ कर तुम्हारी बीवियां हैं क्या. साथी शिक्षक पीठ पीछे सुजाता और महेंद्र का मजाक बनाते, मगर उन के सामने उन की जोड़ी की तारीफ में कसीदे काढ़ते. उस दिन महेंद्र जब घर लौटे तो चाय पीते हुए, दिनभर की चर्चा में मजार का जिक्र करना न भूले. यह सुनते ही

निसंतान सुजाता की आंखें एक आस से चमक उठीं कि हो सकता है कि इसीलिए ही समय उसे यहां परसिया खींच लाया है.

सुजाता जितनी वेशभूषा से आधुनिक थी उतनी ही धार्मिक थी. आएदिन घर में महिलाओं को बुला कर धार्मिक कार्यक्रम करवाना उस की दिनचर्या में शामिल था. इसी वजह से वह अपने महल्ले वालों में काफी लोकप्रिय हो गई थी. आसपास के मकानों में ज्यादातर नजदीकी गांव से आ कर बसने वाले परिवार थे. वे दोचार सालों के भीतर ही परसिया में अपने छोटेबड़े बच्चों को पढ़ाने के लिए घर बना कर रहने आ गए थे. उन में से कुछ पंडित, कुछ पटेल तो एकदो राठौर परिवार थे.

कुछ परिवारों की महिलाएं अंगूठाछाप हैं तो कुछ 10वीं या 12वीं तक पढ़ी हैं किंतु इस के बाद विवाह हो जाने के कारण वे आगे न पढ़ सकीं. अभी तक यहां 16-17 वर्ष में शादी और 20-21 वर्ष में गौना कर देने का चलन रहा है. ऐसे परिवारों के बीच सुजाता को कार्यक्रम करवाने के लिए इन महिलाओं से बढ़ कर कौन मिलता. ये महिलाएं, जो गांव में दिनभर किसी न किसी कार्य में व्यस्त रहती थीं, यहां परसिया में घर से बाहर, कुरसियां डाले, दिनभर गाउन पहन कर बतियाती रहतीं. गाउन पहनना उन के लिए आधुनिकता की निशानी है. बस, इतना ही फैशन करना आता है इन को.

सुजाता का शुरू में तो यहां बिलकुल मन नहीं लगता था मगर धीरेधीरे उस ने अपनेआप को साथी महिलाओं के साथ सामूहिक कार्यक्रम में व्यस्त कर लिया. उसे रहरह कर भोपाल याद आता. वहां की चमचमाती सड़कों की लौंग ड्राइव, किट्टी पार्टी, बड़े ताल का नजारा, क्लब और अपनी आधुनिक सखियों का साथ. शादी के 10 वर्षों बाद सारी शारीरिक जांचों के परिणामों से उसे मालूम हो गया था कि वह कभी मां नहीं बन सकती. वह अपने खाली समय को किसी न किसी तरह व्यस्त रखती ताकि खाली दिमाग में कोई खुराफात न पैदा हो जाए.

जहां भोपाल में वह किट्टी, क्लब और सोशल वर्क में बिजी थी वहीं यहां के माहौल में वह पूरी तरह रम गई थी. हां, मगर नियम से, वह यहां के एकलौते ब्यूटीपार्लर में जाना न भूलती. यहां की ब्यूटीशियन से ज्यादा तो उसे ब्यूटी नौलेज थी, इसीलिए उसे भी वह तरहतरह के ब्यूटी टिप्स देती रहती.

ब्यूटीशियन रमा जबलपुर में अपनी मौसी के घर रह कर,

6 महीने का कोर्स कर के परसिया में अपना पार्लर खोल कर बैठ गई थी. यहां युवतियां थ्रेडिंग और फेशियल खूब करवाती थीं. उस का पार्लर चल निकला. परंतु सुजाता के आने के बाद रमा को वैक्सिंग, मैनीक्योर, पैडिक्योर, हेयर कटिंग के नए तरीके जानने को मिले. वह सुजाता को देखते ही खिल उठती और सोचती, कितनी उच्चशिक्षित है मगर स्वभाव उतना ही सरल है. इधर, सुजाता का मन मजार के चक्कर लगाने को मचलने लगा. वह सोचती सारे वैज्ञानिक तरीके अपना कर देख ही लिए हैं, कोई परिणाम नहीं मिला. अब इस मजार के चक्कर लगा कर भी देख लेती हूं. जब इस विषय में महेंद्र की राय लेनी चाही तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया, शायद उन्होंने भी सुजाता की आंखों में आशा की चमक को देख लिया था. महेंद्र से कोई भी जवाब न पा कर सुजाता सोच में पड़ गई. उस ने अपने पड़ोसियों से इस विषय में बात करने का मन बना लिया.

दूसरे दिन हमेशा की तरह दोपहर में जब सारी महिलाएं अपने चबूतरे पर या प्लास्टिक की कुरसियां डाल कर गपों में मशगूल हो गईं, सुजाता ने मजार का जिक्र छेड़ दिया. फिर क्या था, सभी के पास तर्क निकल आए कि मजार इतनी महत्त्वपूर्ण क्यों है? सभी सवर्र्ण और पिछड़े वर्ग के परिवारों की महिलाओं में वैसे तो पूजापाठ के नियमों में बहुत अंतर था मगर मजार के विषय में वे सभी एकमत थीं. लगेहाथ महिलाओं ने सुजाता की दुखती रग पर हाथ रखते हुए उसे भी संतान की मनौती मांगने के लिए 40 दिन मजार का फेरा लगाने का सुझाव दे ही दिया. कुछ का तो कहना था कि 40 दिन पूरे होने से पहले ही उस की गोद हरी हो जाएगी. जितने मुंह उतनी बातें सुन कर सुजाता ने तय कर लिया कि वह कल सुबह से ही मजार जाने लगेगी. महेंद्र उस के इस फैसले से खुश तो नहीं हुआ, किंतु उस ने उसे उस के विश्वास के साथ फैसला लेने को स्वतंत्र कर दिया.

मजार का रास्ता रेलवे स्टेशन के ओवरब्रिज से गुजर कर 2 प्लेटफौर्म्स के बाद है. छोटा सा स्टेशन होने के कारण, बहुत ही कम यात्रीगाड़ी के फेरे लगते हैं. दिनभर पास के अंचल से कोयला खदानों का कोयला लाद कर गुजरने वाली मालगाडि़यों का ही तांता लगा रहता है, जो ज्यादातर तीसरे प्लेटफौर्म से गुजरती हैं. दूसरे और तीसरे प्लेटफौर्म के बीच में ही मजार है, जिसे चारों तरफ से घेर कर ओवरब्रिज की सीडि़यों से जोड़ दिया गया है. जिस से लोगों की मजार में आवाजाही से रेलवे स्टेशन के सुरक्षा प्रबंधन पर कोई असर नहीं पड़ता. लोगों का आनाजाना एक ओर से लगा ही रहता.

जब से यह जगह जिले में परिवर्तित हुई है तब से भीड़ बढ़ने लगी और एक बाबा की मौजूदगी भी. वह हफ्ते में 3 दिन मजार में, शेष 4 दिन स्टेशन के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे बैठा मिलता.

कोई कहता कि बाबा मुसलिम है तो कोई उस के हिंदू होने का दावा करता. मगर बाबा से जाति पूछने की हिम्मत किसी में नहीं थी. बाबा से लोग अपनी परेशानियां जरूर बताते जिन्हें वह अपने तरीके से हल करने के उपाय बताता. बाबा बड़ा होशियार था, वह शाकाहारियों को नारियल तोड़ने तो मांसाहारियों को काला मुरगा काट कर चढ़ाने का उपाय बताता. लोगों के बुलावे पर उन के घर जा कर भी झाड़फूंक करता. जो लोग उस के उपाय करवाने के बाद मनमांगी मुराद पा जाते, वे खुश हो उस के मुरीद हो जाते. लेकिन जो लोग सारे उपाय अपना कर भी खाली हाथ रह जाते, वे अपने को ही दोषी मान कर चुप रहते. इसीलिए, बाबा का धंधा अच्छा चल निकला.

सुजाता सुबह के समय जब घर से निकली उस समय जाड़े के मौसम के कारण कोहरा छाया हुआ था. वह तेज कदमों से स्टेशन की ओर निकल गई. उस के घर और स्टेशन के बीच एक किलोमीटर का ही फासला तो था. अभी मजार में अगरबत्ती सुलगा कर पलटी ही थी कि बाबा से सामना हो गया. उस ने प्रणाम करने को झुकना चाहा पर उस की मंशा भांप कर बाबा दो कदम पीछे हट गया. मेरे नहीं, इस के पैर पकड़ो, वह जो इस में समाया है. उस ने उंगली से मजार की तरफ इशारा करते हुए कहा, जिस मंशा से यहां आई हो, वह जरूर पूरी होगी. बस, अपने मन में कोई शंका न रखना.

सुजाता गदगद हो गई. आज सुबह

इतनी सुहावनी होगी, उस ने सोचा न था. उसे पड़ोसिनों ने बताया तो था यदि मजार वाले बाबा का आशीर्वाद भी मिल जाए तो फिर तुम्हारी मनोकामना पूरी हुई ही समझो.

खुश मन से सुजाता ने जब घर में प्रवेश किया, तो उस का पति चाय की चुस्की के साथ अखबार पढ़ने में तल्लीन था. सुजाता गुनगुनाते हुए घर के कार्यों में व्यस्त हो गई. महेंद्र सब समझ गया कि वह मजार का चक्कर लगा कर आई है, मगर कुछ न बोला. वह सोचने लगा कितने सरल स्वभाव की है उस की पत्नी, सब की बातों में तुरंत आ जाती है, अब अगर मैं वहां जाने से रोकूंगा तो रुक तो जाएगी मगर उम्रभर मुझे दोषी भी समझती रहेगी कि मैं ने उस के मन के अनुसार कार्य न कर के, उसे संतान पाने के आखिरी अवसर से भी वंचित कर दिया. आज जा कर आई है तो कितनी खुश लग रही है वरना कितनी बुझीबुझी सी रहती है. चलो, कोई नहीं, 40 दिनों की ही तो बात है, फिर खुद ही शांत हो कर बैठ जाएगी. मेरे टोकने से इसे दुख ही पहुंचेगा.

दिन बीतते देर नहीं लगती, 40 दिन क्या 4 महीने बीत गए, मगर सुजाता का मजार जाना न रुका. अब वह गैस्ट फैकल्टी के कार्य में भी रुचि नहीं लेती, न ही आसपड़ोस की महिलाओं के संग कार्यक्रम में मन लगाती. अपने कमरे को अंदर से बंद कर, घंटों न जाने कैसे तंत्रमंत्र अपनाती. इन सब बातों से बेखबर एक दिन अचानक रमा उस महल्ले से गुजरी. उस ने सोचा, सुजाता भाभी की खबर भी लेती चलूं, अरसा हो गया उन्हें, वे पार्लर नहीं आईं. दोपहर का समय, दरवाजे की घंटी सुन सुजाता को ताज्जुब हुआ कि इस समय कौन है? दरवाजा खोलते ही रमा को देख कर खुशी से चहक उठी. उसे लगभग खींचते हुए भीतर ले गई.

मगर रमा उसे देख कर हैरान थी कि क्या यह वही सुजाता है जो कितनी सजीसंवरी रहती थी. सामने मैलेकुचैले गाउन में, कालेसफेद बेतरतीब बालों की खिचड़ी के साथ, न मांग में सिंदूर, न मंगलसूत्र, न चूडि़यां, न बिंदी पहने सुजाता किसी सड़क पर घूमती पगली से कम नहीं लगी. ‘‘भाभी, आप को क्या हो गया है? तबीयत तो ठीक है न आप की? भाईसाहब ठीक तो हैं न?’’ रमा ने हैरानी से पूछा. ‘‘अब आई है, तो बैठ. तुझे सब बताती हूं. मेरी तबीयत को कुछ नहीं हुआ बल्कि मेरे चारों तरफ भूतों का डेरा हो गया है. कोई मेरी बात का विश्वास नहीं करता. यहां देख मैं इसे सोफे पर रातभर जाग कर टीवी देखती रहती हूं. अगर झपकी आई तो सो गई वरना पूरी रात यों ही कट जाती है. ये भूत दिनरात मेरे चारों तरफ मंडराते रहते हैं. दिन में भी कभी महल्ले के बच्चे के रूप में तो कभी पड़ोसिन के रूप में आ कर बैठ जाते हैं. फिर चाय बनाने या कुछ लेने भीतर जाओ, तो गायब हो जाते हैं.’’

‘‘भाभी, ऐसी बातें कर के मुझे मत डराओ?’’ रमा घबरा गई. ‘‘यह मेरी जिंदगी की सचाई बन गई है. ये देखो, मेरे हाथ में ये निशान. अगर मैं चूड़ी, बिंदी, कुछ भी पहनती हूं तो ऐसे निशान बन जाते हैं. सजनेसंवरने पर मुझे ये भूत बहुत परेशान करते हैं, इसीलिए मैं अब सादगी से रहती हूं, बाल भी नहीं रंगती, मेहंदी भी नहीं लगाती,’’ सुजाता बोली.

‘‘भाईसाहब, आप को कुछ समझाते नहीं हैं क्या?’’ रमा सुजाता की बातें सुन कर उलझन में पड़ गई. ‘‘मेरे पति के अंदर तो खुद ही आत्मा आती है. जब वह आत्मा आती है तो उन की आवाज भर्रा जाती है, चेहरा सर्द हो जाता है, उसी आत्मा ने मुझे सादगी से रहने का आदेश दिया है.’’

‘‘मैं चलती हूं भाभी, बेटे के स्कूल से लौटने का समय हो गया है,’’ कह कर रमा उठ खड़ी हुई. सुजाता की बातें सुन कर रमा के रोंगटे खड़े हो गए. उस ने वहां से निकलने में ही अपनी भलाई समझी. रमा अपनी स्कूटी स्टार्ट कर ही रही थी कि सामने से शैलेश आता दिखा. शैलेश उसी की गांवबिरादरी का है, रिश्ते में उस का चचेरा भाई लगता है. उसे देख कर वह रुक गई. उसी ने तो 2 महीने पहले उसे स्कूटी चलानी सिखाई थी. उस ने सुजाता के दरवाजे पर नजर डाली. सुजाता ने अपनेआप को फिर से घर में कैद कर लिया था. उस ने शैलेश को अपने पीछे बैठने का इशारा किया और वहां से सीधा अपने घर को चल पड़ी.

शैलेश ने जो बताया उसे सुन कर रमा हैरान रह गई. ‘‘सुजाता जब पहली बार मजार में गई थी तो उसी दिन बाबा ने उस के बारे में पूरी जानकारी उस से जुटा ली. सुजाता धीरेधीरे बाबा की कही बातों का आंख मूंद कर विश्वास करने लगी थी. किंतु 40 दिन बीतने के बाद भी जब कोई परिणाम न मिला तो बाबा ने उसे समझाया कि यह सब तुम्हारे पति की शंका करने की वजह से हो रहा है. जब तक वे भी सच्चे मन से इस ताकत को नमन नहीं करेंगे, तब तक तुम अपने लक्ष्य को नहीं पा सकतीं. यह सुन कर सुजाता ने अपने पति को भी मजार लाने का फैसला किया और रोधो कर, गिड़गिड़ा कर, उसे यहां तक लाने में सफल हो ही गई. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या, शैलेश? रमा की उत्सुकता चरम पर थी.’’ ‘‘लेकिन जब मैं ने महेंद्र सर से कहा तो वे गुस्से से लालपीले हो कर कहने लगे, ‘ये सारी बातें बकवास हैं, ये फेरे लगाने से कुछ नहीं होता बल्कि अब तो सुजाता घरेलू कार्य में भी रुचि नहीं लेती. बीमारों की तरह पूरे दिन वह लेटी रहती है. चलो, मैं भी वहां का नजारा देख कर आता हूं.

‘‘उस दिन बाबा स्टेशन से पहले पीपल के पेड़ के नीचे बैठे आसपास से आए आदिवासियों को घेर कर बैठे थे. उस दिन मजार का मेला भी था जो मजार पर न लग कर बाहर पास के मैदान में लगता है. उस दिन की भीड़ को देखते हुए किसी को भी स्टेशन की सुरक्षा के लिहाज से मजार तक जाने नहीं दिया जाता. इसलिए जो भी भक्त, चादर, अगरबत्ती, धूप जो भी चढ़ाना चाहे, वह बाबा को सौंप देता है. इसीलिए बाबा के चारों तरफ भीड़ जुटी थी. जिस में गरीब आदिवासी महिलाएं, उन की बेटियां बहुत श्रद्धा के साथ हाथ जोड़ लाइन से आगे बढ़ती जा रही थीं.’’ ‘‘सर, उन सब को बड़े ध्यान से देख रहे थे. थोड़ी देर में जब बाबा की नजर मेरे साथ खड़े सर पर पड़ी तो वे समझ गए कि ये सुजाता मैम के पति होंगे. उन्होंने उन्हें दूसरे दिन आ कर बात करने को कहा. सर मेरे साथ वापस आ गए.

‘‘तब तक तो मैं भी नहीं जानता था कि मैं खुद बाबा के हाथों का मोहरा बन कर रह गया हूं. वह एकतरफ सुजाता मैम को बच्चे के ख्वाब दिखा कर बरगला रहा था तो दूसरी तरफ प्रोफैसर को दूसरी शादी के सब्जबाग दिखाने लगा. इन दोनों को अपनी बातों का विश्वास दिलाने को, बाबा जब न तब, मुझे और मेरे दोस्तों को बुला कर हमारी मनोकामनाओं के पूरी होने के उदाहरण देता. हम भी उस की बात में हां में हां मिलाते, क्योंकि हमें बाबा की ताकत पर भरोसा भी था और डर भी.’’ ‘‘धीरेधीरे उस ने मैम के दिमाग में यह बात भर दी कि उस का रहनसहन, पहनावा आकर्षक होने के कारण, पीपल के पेड़ के भूत, उस पर आसक्त हो गए हैं. इसलिए उसे सब से पहले अपने आप को सादगी में रखना होगा. दूसरी तरफ, प्रोफैसर को दूसरी शादी के लिए रिश्ते दिखाने लगा. उन्हीं में से एक रिश्ते में 16 साल की एक गरीब की लड़की का रिश्ता भी था, जो प्रोफैसर को बहुत ही भा गया.

‘‘आजकल सर के बहुत चक्कर लग रहे हैं उस लड़की के गांव के. यहां से 15 किलोमीटर पर ही तो है वह गांव. वहां आदिवासी परिवार हैं. उन के वहां अभी भी बालविवाह, बहुविवाह का चलन है. अब क्या है, सर की पांचों उंगलियां घी में हैं. वे भी बस लगता है अपनी बीवी के पूरी पागल होने के इंतजार में हैं ताकि उसे पागलखाने भेज कर, उस की सहानुभूति भी बटोर लें और फिर उस कन्या से विवाह कर संतान भी पैदा कर लें. ‘‘मेरी गलती, बस, यही है कि मैं बाबा और सर की चालों को पहले समझ ही नहीं पाया वरना मैम की कुछ मदद कर देता. मगर अब उन की मानसिक स्थिति को केवल किसी मानसिक रोग विशेषज्ञ से मिल कर ही संभाला जा सकता है.’’

लेकिन मानसिक रोग विशेषज्ञ इस शहर में मौजूद ही नहीं हैं और दूसरे बड़े शहर में ले जा कर इलाज कराने के मूड में प्रोफैसर हैं ही नहीं. शैलेश के मुख से यह सब सुन रमा घोर चिंता में आ गई.

बेचारी सुजाता भाभी, यह मक्कार बाबा जब प्रोफैसर को अपनी बातों में न उलझा पाया तो उस ने दूसरा जाल फेंका जिस में बड़ेबड़े ऋ षिमुनि न पार पा पाए. तो फिर उस जाल में यह प्रोफैसर कैसे बच पाता. वह दूसरी शादी करने के लिए अपनी पहली पत्नी को भूल गया, मौकापरस्त आदम जात. यह सोच कर रमा अपना सिर पकड़ कर बैठ गई.

ईश्वर और आतंकवाद : दोनों में समानता को समझिए

रामभरोसे ईश्वर की तलाश में है. सरकार आतंकवादी की तलाश में है. दोनों परेशान हैं कि दोनों को दोनों ही नहीं मिल रहे.

दोनों ही छिपे रहते हैं. उन के तो बस कारनामों का ही पता चलता है जिस से उन की उपस्थिति का भ्रम बनता है. काम चाहे जिस ने किया हो पर नाम इन के मढ़ दिया जाता है.

रामभरोसे के 8 बच्चे हैं और वह इन सब के लिए कह देता है कि सब ईश्वर की देन हैं जबकि महल्ले भर को उस के एकएक बच्चे के बारे में पता है. शाखा के एक भाई साहब रात को चोरीचोरी उस के  घर के बाहर एक स्टिकर चिपका गए थे, ‘हिंदू घटा देश बंटा.’ तब से राम भरोसेजी ने अपने घर में हिंदुओं को घटने नहीं दिया. बच्चों के हिस्से की रोटी घट गई. दूध घट गया.

पत्नी के तन का कपड़ा जहांजहां से फटता गया वहांवहां से घटता गया पर रामभरोसे ने हिंदू नहीं घटने दिया. हर साल जब ताली ठोंक कर बधाई देने वाले अपनी खरखरी आवाज में नाचगा कर बधाई दे रहे होते तो महल्ले के लोगों को पता चलता कि रामभरोसे ने एक हिंदू और बढ़ा दिया है. रामभरोसे मुश्किल से 5 रुपए निकाल पाते जबकि वे 500 मांग रहे होते. अंतत: वे 5 रुपए रामभरोसे के मुंह पर मार कर और थूक कर चले जाते. रामभरोसे देशभक्ति से अपनी शर्म उसी तरह ढक लेते जिस तरह बहुत सारे लोग अपने पाप ढक लेते हैं, अपनी सांप्र- दायिकता ढक लेते हैं.

आतंकवादी भी 10 घटनाएं करता है और 100 घटनाएं अपने नाम पर जुड़वा लेता है. शाम को दफ्तर का चपरासी जाते समय बाहर लगा बल्ब खींच ले जाता है और अगले दिन कह देता है कि आतंकवाद बढ़ गया है, देखो आतंकवादी रात में बल्ब खींच कर ले गए. अब छिपा आतंकवादी सफाई देने थोड़े ही आ सकता है.

हत्या, चोरी, डकैती, अपहरण सारे अपराध आतंकवादियों के नाम लिख कर पुलिस दिनदहाड़े टांगें पसार कर सो जाती है. जब जागती है तो जा कर 2-4 डकैती डाल लीं, राहजनी कर ली, दारू पी मुर्गा खाया, वीआईपी ड्यूटी की और सो गए. प्रेस वालों से कह दिया कि सारे अपराध आतंकवादी कर गए.

ज्यादातर आतंकवादी विदेशी या विदेश प्रेरित माने जाते हैं इसलिए मामला विदेश मंत्रालय से संबंधित माना जाता है. बेचारे विदेश मंत्री ओबामा और हिलेरी के नखरे देखें या तुम्हारी चोरीडकैती की चिंता करें. उन का भी काम यह कह कर चल जाता है कि विदेश प्रभावित आतंकवाद बहुत बढ़ गया है.

सरकार परमाणु बम फोड़ सकती है, सीमा पर फौज खड़ी कर सकती है, मिसाइल का परीक्षण कर सकती है पर आतंकवादी नहीं तलाश सकती. जैसे रामभरोसे को ईश्वर नहीं मिलता वैसे ही सरकार को आतंकवादी नहीं मिलता.

मिल भी जाए तो आतंकवादी को पकड़ने की परंपरा हमारे पास नहीं है, उसे मार दिया जाता है. अगर उसे पकड़ लिया गया तो वह बता सकता है कि मैं ने पुलिस के रास्ते में बम जरूर बिछाए थे पर दफ्तर का बल्ब नहीं चुराया, डकैती नहीं डाली, राहजनी नहीं की, इसलिए उसे मार दिया जाना जरूरी है.

ज्ञात तो ज्ञात अज्ञात आतंकवादी तक मार गिराए जाते हैं. देश ने शायद ऐसी गोलियां तैयार कर ली हैं जो आंख मूंद कर चलाए जाने पर भी किसी आतंकवादी को ही लगती हैं और उसे मार गिराती हैं. सैनिक की गोली से मारा जाने वाला हर व्यक्ति आतंकवादी होता है. उस की धर्मप्राण गोली किसी निर्दोष को लगती ही नहीं.

रामभरोसे ईश्वर की आराधना करते हैं, पूजा करते हैं, आरती करते हैं, व्रत- उपवास करते हैं, माथा रंगीन रखते हैं, चोटी रखते हैं, हाथ में कलावा बांधते हैं, जहां कहीं सिंदूर लगा पत्थर दिख जाए तो माथा झुकाते हैं, पर ईश्वर नहीं मिलता.

सरकार के सैनिक भी इधर से उधर गाडि़यां दौड़ाते हैं, मुखबिर पालते हैं, संदेशों की रिकार्डिंग करते हैं, डिकोडिंग करते हैं, रातरात भर जागते हैं, कंबिंग आपरेशन करते हैं, रिश्तेदारों को टार्चर करते हैं पर आतंकवादी नहीं मिलते.

दोनों की ही ग्रहदशा एक जैसी है. दोनों के ही आराध्य अंतर्धान हैं. रामभरोसे ने मंदिर में उस की संभावित मूर्ति बैठा रखी है. सुरक्षा सैनिकों ने उन के संभावित चित्र बनवा रखे हैं. दोनों ही सोचते हैं कि एक बार मिल जाए तब देखते हैं कि फिर कैसे छूटते हैं हमारी पकड़ से. शायद उसी खतरे को सूंघ कर ही न ईश्वर खुले में आता है और न ही आतंकवादी.

ईश्वर सर्वत्र है. आतंकवादी भी सर्वत्र हैं. सरकारी नेताओं की भाषा में कहें तो वर्ल्डवाइड फिनोमिना. वे पंजाब में रहे हैं, वे कश्मीर की जन्नत में रह रहे हैं, वे असम में हैं वे त्रिपुरा में हैं, नागालैंड में हैं, वे तमिलनाडु में हैं, वे बस्तर में हैं, बिहार, उड़ीसा, झारखंड में हैं. वे केरल में उभर आते हैं व पश्चिम बंगाल में वारदातें कर के भाग जाते हैं. वे कभी अयोध्या में दिखते हैं तो बनारस और मथुरा में भी दिख सकते हैं, वे मालेगांव में होते हैं तो बेलगांव में भी होते हैं. वे कहां नहीं हैं. वे लंका में हैं, वे अफगानिस्तान में हैं, नेपाल में हैं और यहां तक कि अमेरिका की चांद पर भी बाजे बजाते रहते हैं.

वे चित्र प्रदर्शनियों में चित्र फाड़ते हैं, फिल्में नहीं बनने देते, बन जाती हैं तो चलने नहीं देते, वे क्रिकेट के मैदान में पिचें खोद देते हैं, वे लाखों संगीत प्रेमियों को प्रभावित करने वाले गजल गायकों के कार्यक्रम नहीं होने देते, वे दिलीप कुमार के घर के बाहर प्रदर्शन करते हैं. वे मंदिर तोड़ते हैं, गिरजा तोड़ते हैं, मसजिद तोड़ते हैं. वेलेंटाइन डे पर प्रेमियों का दिल तोड़ते हैं.

अगर सरकार की आंख भेंगी न हो और वह विकलांग न हो तो बहुत सा आतंक साफसाफ देखा जा सकता है. और उसी तरह अगर रामभरोसे का मन साफ हो तो उसे भी ईश्वर दिख सकता है जैसे गांधीजी को दरिद्र में दिख गया था और उन्होंने उसे दरिद्र नारायण का नाम दिया था. पर अभी न तो सरकार को आतंकवादी दिख रहा है और न ही रामभरोसे को ईश्वर.

हिमाचल प्रदेश का आर्थिक संकट, जीएसटी की गलत नीतियों की देन

जीएसटी को ले कर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच ही विवाद नहीं है. बिजनेसमैन भी परेशान है. केंद्र सरकार इस पर झुकने के लिए तैयार नहीं है. इस की ताजी मिसाल केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और श्री अन्नपूर्णा होटल श्रंखला के मालिक डी. श्रीनिवासन के बीच का मसला भी है. जीएसटी बैठक के दौरान होटल व्यवसायी श्रीनिवासन ने कहा था कि मिठाई पर 5 प्रतिशत जीएसटी है, नमकीन पर 12 प्रतिशत और क्रीम बन पर 18 प्रतिशत, लेकिन सादे बन पर कोई जीएसटी नहीं है. इस पर ग्राहक मजाक करते हुए कहते हैं ‘बस मुझे बन दे दो, क्रीम मैं खुद डाल लूंगा’

उन के यह कहे जाने के बाद वहां मौजूद लोगों की हंसी छूट गई. यह वीडियो वायरल हो गया. व्यापारी पर माफी मांगने का दबाव बनाया गया. इस के बाद होटल व्यवसायी ने वित्त मंत्री से माफी मांगते कहा ‘वह किसी पार्टी से नहीं जुड़े हैं. उन्हें माफ कर दिया जाए.’ इस वीडियो को भाजपा के किसी नेता ने वायरल कर दिया.

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए एक्स पर लिखा कि कोयंबटूर में अन्नपूर्णा रेस्तरां जैसे छोटे व्यवसाय के मालिक ने सरल जीएसटी व्यवस्था की मांग की, लेकिन उन के अनुरोध को अहंकार और घोर अनादर के साथ लिया गया’.

इस मसले ने तूल पकड़ लिया. तब तमिलनाडु भाजपा प्रमुख के. अन्नामलाई की तरफ से बयान में कहा गया कि वह अपने पदाधिकारियों द्वारा किए गए इस कृत्य के लिए क्षमा मांगते हैं, जिन्होंने एक सम्मानित व्यवसायी और माननीय वित्त मंत्री के बीच एक निजी बातचीत को साझा कर दिया. इस घटना से समझा जा सकता है कि जीएसटी को ले कर केंद्र कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है. ऐसे में यह जनता और राज्य दोनों पर बोझ बन गई है.

संकट में हिमाचल प्रदेश

हिमाचल प्रदेश आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है. इस के चलते वेतन के देर से मिलने और तमाम वस्तुओं पर टैक्स बढ़ाने का काम शुरू हो गया है. हिमांचल तो एक उदाहरण है. इसी क्रम में पंजाब, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश जैसे कई राज्य और हैं जिन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है. इस का एक बड़ा कारण जीएसटी कानून की नीतियां हैं. आंध्र प्रदेश और बिहार को केंद्र सरकार आर्थिक सहायता देने का काम कर रही है. क्योंकि इन दो राज्यों के बल पर केंद्र सरकार सत्ता में बनी है.

राज्य सरकारों ने केंद्र को आर्थिक समस्याओं के कारण ही समर्थन दे रखा है. राज्य सरकारों को पता है कि एक देश एक टैक्स के जमाने में वह केंद्र सरकार से विरोध ले कर सत्ता पर काबिज नहीं रह पाएगी. बिहार, झारखंड, ओडिसा, तेलंगाना और उत्तराखंड जैसे राज्यों को भी अपना राजस्व बढ़ाने पर काम करना होगा. नहीं तो उन के सामने भी ऐसे हालात आने में देर नहीं लगेगी. केंद्र के विरोधी दलों वाले राज्यों के सामने दूसरे संकट भी हैं. ऐसे में केंद्र सरकार से राज्य कोई पंगा नहीं लेना चाहते हैं.

हिमाचल प्रदेश में इन दिनों आर्थिक संकट गहराया हुआ है. सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार का खजाना खाली हो गया है. इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब राज्य के 2 लाख कर्मचारियों और 1.5 लाख पेंशनर्स को 1 तारीख को सैलरी और पेंशन नहीं मिली है. अब केंद्र सरकार से राजस्व घाटा अनुदान की 490 करोड़ रुपए की मासिक किस्त मिलने के बाद ही कर्मचारियों को वेतन मिल पाएगा.

नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि ‘इन दिनों प्रदेश आर्थिक संकट से गुजर रहा है. इसी वजह से अब तक कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है और रिटायर कर्मियों को भी पेंशन नहीं मिली है. सभी के लिए यह गहन चिंता का विषय बना हुआ है. हिमाचल दिवालियापन की ओर बढ़ता जा रहा है.‘

मौजूदा समय में हिमाचल पर करीब 94 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है. इस वित्तीय बोझ ने राज्य की वित्तीय स्थिति को काफी कमजोर हो गई है. कांग्रेस सरकार पर कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए करीब 10 हजार करोड़ रुपए की देनदारियां बाकी चल रही हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव जीत कर सत्ता में वापस आने के लिए कांग्रेस ने कई बड़े वादे किए थे. सुक्खू सरकार में आने के बाद इन वादों पर बेतहाशा खर्च किया गया.

इस वित्तीय बोझ ने राज्य की वित्तीय स्थिति को अत्यधिक कमजोर कर दिया है, जिस के कारण राज्य सरकार को पुराने कर्ज चुकाने के लिए नए कर्ज लेने पड़ रहे हैं. कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए राज्य सरकार पर लगभग 10 हजार करोड़ रुपए की देनदारियां बकाया हैं. हिमाचल प्रदेश के इतिहास में पहली बार, राज्य के 2 लाख कर्मचारियों और 1.5 लाख पेंशनर्स को 1 तारीख को सैलरी और पेंशन नहीं मिल पाई.

हिमाचल सरकार के बजट का 40 फीसदी सैलरी और पेंशन देने में ही चला जाता है. लगभग 20 फीसदी कर्ज और ब्याज चुकाने में खर्च हो जाता है. हिमाचल प्रदेश की खराब आर्थिक स्थिति को देखते हुए सरकार ने बड़ा फैसला लिया. मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने आदेश दिया कि मुख्यमंत्री, मंत्री, मुख्य संसदीय सचिव, बोर्ड निगमों के चेयरमैन दो महीने तक वेतन-भत्ता नहीं लेंगे. हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने सभी विधायकों से भी वेतनभत्ता दो महीने के लिए छोड़ने की मांग रखी थी.

सीएम सुक्खू ने कहा, ‘आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है इसलिए वो दो महीने के लिए अपना और अपने मंत्रियों का वेतनभत्ता छोड़ रहे हैं.’ उन्होंने विधायकों से कहा कि हो सके तो दो महीना एडजस्ट कर लीजिए. अभी वेतन-भत्ता मत लीजिए. आगे देख लीजिएगा. सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू का आरोप है कि ‘पिछली भाजपा सरकार द्वारा छोड़ा गया कर्ज विरासत में मिला है, जो राज्य को फाइनेंशियल इमरजैंसी में धकेलने के लिए जिम्मेदार है. हम ने राजस्व प्राप्तियों में सुधार किया है. पिछली सरकार ने 5 साल में 665 करोड़ रुपए का आबकारी राजस्व एकत्र किया था और हम ने सिर्फ एक साल में 485 करोड़ रुपए कमाए. हम इस पर काम कर रहे हैं और राज्य की वित्तीय सेहत सुधारने के लिए प्रतिबद्ध है.’

केंद्र सरकार पर आरोप

राज्य में 1,89,466 से अधिक पेंशनभोगी हैं, जिन के 2030-31 तक बढ़ कर 2,38,827 होने की उम्मीद है. केंद्र सरकार ने कर्ज सीमा को 5 फीसदी से घटा कर 3.5 फीसदी कर दिया है. जिस का अर्थ है कि राज्य सरकार जीडीपी का केवल 3.5 फीसदी कर्ज के रूप में जुटा पाएगी. जीएसटी में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच जो विरोध है उस का प्रभाव भी राज्यों पर पड़ रहा है. 101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 के लागू होने के बाद 1 जुलाई, 2017 से जीएसटी को लागू को लागू किया गया.

केंद्र सरकार ने ‘एक देश एक टैक्स’ को देश के विकास के लिए बेहद उपयोगी मानते इस को बड़े जोरशोर से लागू किया था. उस समय केंद्र सरकार ने कहा था कि राज्यों के नुकसान की पूरी भरपाई की जाएगी. इसी आधार पर राज्यों को जीएसटी लागू करने के लिए राजी किया गया था. जीएसटी लागू होने के बाद केंद्र सरकार ने जीएसटी में आने वाली राज्यों की परेशानियों को दूर नहीं किया. कानूनन केंद्र को राजस्व नुकसान की भरपाई करनी होती है.

जीएसटी कानून में यह तय किया गया था कि इसे लागू करने के बाद पहले 5 साल में राज्यों को राजस्व का जो भी नुकसान होगा, उस की केंद्र सरकार भरपाई करेगी. आधार वर्ष 2015-16 को मानते हुए यह तय किया गया कि राज्यों के इस प्रोटेक्टेड रेवेन्यू में हर साल 14 फीसदी की बढ़त को मानते हुए गणना की जाएगी. 5 साल के ट्रांजिशन पीरियड तक केंद्र सरकार महीने में दो बार राज्यों को मुआवजे की रकम देगी. कहा गया कि राज्यों को मिलने वाला सभी मुआवजा जीएसटी के कम्पेनसेशन फंड से दिया जाएगा.

राज्यों को मुआवजे की भरपाई के लिए जीएसटी के तहत ही एक कम्पेनसेशन सेस यानी मुआवजा उपकर लगाया जाता है. यह उपकर तंबाकू, औटोमोबाइल जैसे गैर जरूरी और लग्जरी आइटम पर लगाया जाता है. इस उपकर के कलैक्शन से जो फंड बनता है उसी से राज्यों के मुआवजे की भरपाई सरकार करती है. लौकडाउन में इस फंड में भी कुछ खास रकम नहीं आई जिस के बाद केंद्र सरकार के लिए राज्यों को मुआवजा देने में काफी मुश्किल आने लगी.

केंद्र सरकार ने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार किया है कि जीएसटी के तहत निर्धारित कानून के हिसाब से राज्यों की हिस्सेदारी देने के लिए उस के पास पैसे नहीं है. सरकार को यह आभास हो गया था कि राज्यों को मुआवजा देने के लिए कम्पेनसेशन सेस संग्रह काफी नहीं है. कंपनसेशन सेस संग्रह हर महीने 7,000 से 8,000 करोड़ रुपए हो रहा था, जबकि राज्यों को हर महीने 14,000 करोड़ रुपए देने पड़ रहे हैं. जीएसटी एक्ट का सेक्शन 10(1) सरकार को यह अधिकार देता है कि वह जीएसटी काउंसिल की इजाजत से टैक्स संग्रह की अन्य राशि में से भी राज्यों को मुआवजा दे.

ऐसे में जब तक केंद्र राज्यों जीएसटी की परेशानियों को हल नहीं करेगी तब तक राज्यों के सामने आने वाले आर्थिक संकट दूर नहीं होगा. इस के साथ ही साथ राज्य सरकारों को भी अपने खर्चों पर काबू करना होगा. फिजूलखर्ची खत्म करनी होगी. आय के दूसरे रास्ते तलाशने होगे जो जनता पर बहुत बोझ डाले बिना हो जाएं. दूसरे राज्यों को हिमांचल प्रदेश से सबक लेना चाहिए. खुद को जरूरत के हिसाब से तैयार करना चाहिए.

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