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प्यार की मिसाल : शादी से 4 दिन पहले प्रेमी संग फरार प्रेमिका

रचना और नीरज बचपन से ही एकदूसरे को प्यार करते थे. उन का प्यार शारीरिक आकर्षण नहीं बल्कि प्लैटोनिक था, जिस में इसे नादानी और कम उम्र के प्यार का नतीजा कहना रचना और नीरज के साथ ज्यादती ही कहा जाएगा. दरअसल, यह दुखद हादसा सच्चे और निश्छल प्यार का उदाहरण है. जरूरत इस प्यार को समझने और समझाने की है, जिस से फिर कभी प्यार करने वालों की लाशें किसी पेड़ से लटकती हुई न मिलें.

विश्वप्रसिद्ध पर्यटनस्थल खजुराहो से महज 8 किलोमीटर दूर एक गांव है बमीठा, जहां अधिकांशत: पिछड़ी जाति के लोग रहते हैं. खजुराहो आने वाले पर्यटकों का बमीठा में देखा जाना आम बात है, इन में से भी अधिकतर विदेशी ही होते हैं. बमीठा से सटा गांव बाहरपुरा भी पर्यटकों की चहलपहल से अछूता नहीं रहता. लेकिन इस गांव में लोगों पर विदेशियों की आवाजाही का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि वे इस के आदी हो गए हैं.

भैरो पटेल बाहरपुर के नामी इज्जतदार और खातेपीते किसान हैं. कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपनी 18 वर्षीय बेटी रचना की शादी नजदीक के गांव हीरापुर में अपनी बराबरी की हैसियत वाले परिवार में तय कर दी थी. शादी 11 फरवरी को होनी तय हुई थी, इसलिए भैरो पटेल शादी की तारीख तय होने के बाद से ही व्यस्त थे.

गांव में लड़की की शादी अभी भी किसी चुनौती से कम नहीं होती. शादी के हफ्ते भर पहले से ही रस्मोरिवाजों का जो सिलसिला शुरू होता है, वह शादी के हफ्ते भर बाद तक चलता है. ऐसी ही एक रस्म आती है छई माटी, जिस में महिलाएं खेत की मिट्टी खोद कर लाती हैं. बुंदेलखंड इलाके में इस दिन महिलाएं गीत गाती हुई खेत पर जाती हैं और पूजापाठ करती हैं.

यह रस्म रचना की शादी के 4 दिन पहले यानी 7 फरवरी को हुई थी. हालांकि फरवरी का महीना लग चुका था, लेकिन ठंड कम नहीं हुई थी. भैरो पटेल उत्साहपूर्वक आसपास के गांवों में जा कर बेटी की शादी के कार्ड बांट रहे थे. कड़कड़ाती सर्दी में वे मोटरसाइकिल ले कर अलसुबह निकलते थे तो देर रात तक वापस आते थे.

7 फरवरी को भी वे कार्ड बांट कर बाहरपुर की तरफ वापस लौट रहे थे कि तभी उन की पत्नी का फोन आ गया. मोटरसाइकिल किनारे खड़ी कर उन्होंने पत्नी से बात की तो उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. पत्नी ने घबराहट में बताया कि जब वह छई माटी की रस्म पूरी कर के घर आई तो रचना घर में नहीं मिली. वह सारे गांव में बेटी को ढूंढ चुकी है. पत्नी की बात सुन कर उन्होंने बेसब्री से पूछा, ‘‘और नीरज…’’

‘‘वह भी घर पर नहीं है,’’ पत्नी का यह जवाब सुन कर उन के हाथपैर सुन्न पड़ने लगे. जिस का डर था, वही बात हो गई थी.

20 वर्षीय नीरज उन्हीं के गांव का लड़का था. उस के पिता सेवापाल से उन के पीढि़यों के संबंध थे. लेकिन बीते कुछ दिनों से ये संबंध दरकने लगे थे, जिस की अपनी वजह भी थी.

इस वजह पर गौर करते भैरो पटेल ने फिर मोटरसाइकिल स्टार्ट की और तेजी से गांव की तरफ चल पड़े. रचना और नीरज का एक साथ गायब होना उन के लिए चिंता और तनाव की बात थी. 4 दिन बाद बारात आने वाली थी. आसपास के गांवों की रिश्तेदारी और समाज में बेटी की शादी का ढिंढोरा पिट चुका था.

यह सवाल रहरह कर उन के दिमाग को मथ रहा था कि कहीं रचना नीरज के साथ तो नहीं भाग गई. अगर ऐसा हुआ तो वे और उन की इज्जत दोनों कहीं के नहीं रहेंगे. ‘फिर क्या होगा’ यह सोचते ही शरीर से छूटते पसीने ने कड़ाके के जाड़े का भी लिहाज नहीं किया.

गांव पहुंचे तो यह मनहूस खबर आम हो चुकी थी कि आखिरकार रचना और नीरज भाग ही गए. काफी ढूंढने के बाद भी उन का कोई पता नहीं चल पा रहा था. घर आ कर उन्होंने नजदीकी लोगों से सलाहमशविरा किया और रात 10 बजे के लगभग चंद्रपुर पुलिस चौकी जा कर बेटी की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी. उन्होंने नीरज पर रचना के अपहरण का शक भी जताया. थाना इंचार्ज डी.डी. शाक्य ने सूचना दर्ज की और काररवाई में जुट गए.

बुंदेलखंड इलाके में नाक सब से बड़ी चीज होती है. एक जवान लड़की, जिस की शादी 4 दिन बाद होनी हो, अगर दुलहन बनने से पहले गांव के ही किसी लड़के के साथ भाग जाए और यह बात सभी को मालूम हो तो लट्ठफरसे और गोलियां चलते भी देर नहीं लगती.

इसलिए पुलिस वालों ने फुरती दिखाई और रचना और नीरज की ढुंढाई शुरू कर दी. डी.डी. शाक्य ने तुरंत इस बात की खबर बमीठा थाने के इंचार्ज जसवंत सिंह राजपूत को दी. वह भी बिना वक्त गंवाए चंद्रपुर चौकी पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने अपनी संक्षिप्त मीटिंग में तय किया कि दोनों अभी ज्यादा दूर नहीं भागे होंगे, इसलिए तुरंत छतरपुर बस स्टैंड और खजुराहो रेलवे स्टेशन की तरफ टीमें दौड़ा दी गईं. रचना और नीरज कहीं भी जाते, उन्हें जाना इन्हीं दोनों रास्तों से पड़ता.

पुलिस ने खजुराहो रेलवे स्टेशन और छतरपुर बस स्टैंड सहित आसपास के गांवों में खाक छानी, लेकिन रचना और नीरज को नहीं मिलना था सो वे नहीं मिले. आधी रात हो चली थी, इसलिए अब सुबह देखेंगे सोच कर बात टाल दी गई.

इधर बाहरपुर में भी मीटिंगों के दौर चलते रहे, जिन में नीरज और रचना के परिवारजनों को बच्चों के भागने से ज्यादा चिंता अपनी इज्जत की थी, खासतौर से भैरो सिंह को, क्योंकि वे लड़की वाले थे. ऐसे मामलों में छीछालेदर लड़की वाले की ही ज्यादा होती है.

बस एक बार रचना मिल जाए तो सब संभाल लूंगा जैसी हजार बातें सोचते भैरो सिंह बारबार कसमसा उठते थे. अंत में उन्होंने भी हालात के आगे हथियार डाल दिए कि अब सुबह देखेंगे कि क्या करना है.

सुबह सूरज उगने से पहले ही नीरज की मां रोज की तरह उठ कर मवेशियों को चारा डालने गांव के बाहर अपने खेतों की तरफ गईं तो आम के पेड़ को देख चौंक गईं. रोशनी पूरी तरह नहीं हुई थी, इसलिए वे एकदम से समझ नहीं पाईं कि पेड़ पर यह क्या लटक रहा है.

जिज्ञासावश वह पेड़ के नजदीक पहुंचीं, तो ऊपर का नजारा देख उन की चीख निकल गई. पेड़ पर रचना और नीरज की लाशें झूल रही थीं. वह चिल्लाते हुए गांव की तरफ भागीं.

देखते ही देखते बाहरपुर में हाहाकार मच गया. अलसाए लोग खेत की तरफ दौड़ने लगे. कुछ डर और कुछ हैरानी से सकते में आए लोग अपने ही गांव के बच्चों की एक और प्रेम कहानी का यह अंजाम देख रहे थे. भीड़ में से ही किसी ने मोबाइल फोन पर पुलिस चौकी में खबर कर दी.

पुलिस आती, इस के पहले ही लव स्टोरी पूरी तरह लोगों की जुबान पर आ गई. इस छोटे से गांव में सभी एकदूसरे को जानते हैं. गांव में एक ही मिडिल स्कूल है, इस के बाद की पढ़ाई के लिए बच्चों को चंद्रपुर जाना पड़ता है.

नीरज की रचना से बचपन से ही दोस्ती थी. आठवीं के बाद उन्हें भी चंद्रपुर जाना पड़ा. सभी बच्चे एक साथ जाते थे और एक साथ वापस आते थे. सब से समझदार और जिम्मेदार होने के चलते आनेजाने का जिम्मा नीरज पर था. बच्चे खेलतेकूदते मस्ताते आतेजाते थे. यहीं से इन दोनों के दिलों में प्यार का बीज अंकुरित होना शुरू हुआ.

दोनों जवानी की दहलीज पर पहला कदम रख रहे थे. बचपना जा रहा था और दोनों में शारीरिक बदलाव भी आ रहे थे. साथ आतेजाते रचना और नीरज में नजदीकियां बढ़ने लगीं और कब दोनों को प्यार हो गया, उन्हें पता ही नहीं चला. हालत यह हो गई थी कि दोनों एकदूसरे को देखे बगैर नहीं रह पाते थे.

यह प्यार प्लैटोनिक था, जिस में शारीरिक आकर्षण कम एक रोमांटिक अनुभूति ज्यादा थी. बाहरपुर से ले कर चंद्रपुर तक दोनों तरहतरह की बातें करते जाते थे तो रास्ता छोटा लगता था. रचना को लगता था कि यूं ही नीरज के साथ चलती रहे और रास्ता कभी खत्म ही न हो. यही हालत नीरज की भी थी. उस का मन होता कि रचना की बातें सुनता रहे, उस के खूबसूरत सांवले चेहरे को निहारता रहे और उसे निहारता देख रचना शर्म से सर झुकाए तो वह बात बदल दे.

दुनियादारी, समाज, धर्म और जाति की बंदिशों और उसूलों से परे यह प्रेमी जोड़ा अपनी एक अलग दुनिया बसा बैठा था. अब दोनों आने वाली जिंदगी के सपने बुनने लगे थे. ख्वाबों में एकदूसरे को देखने लगे थे.

अब तक घर और गांव वाले इन्हें बच्चा ही समझ रहे थे. इधर इन ‘बच्चों’ की हालत यह थी कि दिन में कई दफा एकदूसरे को ‘आई लव यू’ बोले बगैर इन का खाना नहीं पचता था. दोनों एकदूसरे की पसंद का खास खयाल रखते थे, यहां तक कि टिफिन में खाना भी एकदूसरे की पसंद का ले जाते थे और साथ बैठ कर खाते थे.

प्यार का यह रूप कोई देखता तो निहाल हो उठता, लेकिन सच्चे और आदर्श वाले प्यार को नजर जल्द लगती है यह बात भी सौ फीसदी सच है. रचना तो नीरज के प्यार में ऐसी खोई कि कौपीकिताबों में भी उसे प्रेमी का चेहरा नजर आता था. नतीजतन 9वीं क्लास में वह फेल हो गई. इस पर घर वालों ने स्कूल से उस का नाम कटा दिया.

लेकिन उस के दिलोदिमाग में नीरज का नाम कुछ इस तरह लिखा था कि दुनिया की कोई ताकत उसे मिटा नहीं सकती थी. स्कूल जाना बंद हुआ तो वह बिना नीरज के और बिना उस के नीरज छटपटाने लगा. दिन भर घर में पड़ी रचना मन ही मन नीरज के नाम की माला जपती रहती थी और नीरज दिन भर उस की याद में खोया रहता था.

सुबह जैसे ही स्कूल जाने का वक्त होता था तो रचना हिरणी की तरह कुलांचे मारते सड़क पर आ जाती थी. दोनों कुछ देर बातें करते और फिर शाम का इंतजार करते रहते. जैसे ही आने का वक्त होता था तो रचना गांव के छोर पर पहुंच जाती.

दोनों का दिल से अख्तियार हटने लगा था. कुछ ही दिनों बाद जैसे ही नीरज बच्चों के साथ वापस आता तो दोनों खेतों में गुम हो जाते थे और सूरज ढलने तक अकेले में बैठे एकदूसरे की बांहों में समाए दुनियाजहान की बातें करते रहते.

बात छिपने वाली नहीं थी. साथ के बच्चों ने जब उन्हें इस हालत में देखा तो बात उन से हो कर बड़ों तक पहुंची. भैरो सिंह को जब यह बात पता चली तो उन्होंने वही गलती की जो आमतौर पर ऐसी हालत में एक पिता करता है.

गलती यह कि रचना पर न केवल बंदिशें लगाईं बल्कि आननफानन में उस की शादी भी तय कर दी. उन का इरादा जल्दी से जल्दी बेटी को विदा कर देना था, ताकि कोई ऐसा हादसा न हो जिस की वजह से उन की मूंछें झुक जाएं.

यह रचना और नीरज के लिए परेशानियों भरा दौर था. दोनों के घर वालों ने साफतौर पर चेतावनी दे दी थी कि उन की शादी नहीं हो सकती, लिहाजा दोनों एकदूसरे को भूल जाओ.

शादी तय हुई और तैयारियां भी शुरू हो गईं तो दोनों हताश हो उठे. दोनों जवानी में पहला पांव रखते ही साथ जीनेमरने की कसमें खा चुके थे, लेकिन घर वालों से डरते और उन का लिहाज करते थे. इसी समय उन्हें समाज की ताकत और अपनी बेबसी का अहसास हुआ. यह भी वे सोचा करते थे कि आखिर उन की शादी पर घर वालों को ऐतराज क्यों है.

प्रेम प्रसंग आम हो चुका था, इसलिए दोनों का मिलनाजुलना कम हो गया था. शादी की रस्में शुरू हुईं तो रचना को लगा कि वह बगैर नीरज के नहीं रह पाएगी. फिर भी वह खामोशी से वह सब करती जा रही थी जो घर वाले चाहते थे.

रचना अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी, जहां से कोई रास्ता नीरज की तरफ नहीं जाता था. घर वालों के खिलाफ भी वह नहीं जा पा रही थी और नीरज को भी नहीं भूल पा रही थी. उसे लगने लगा था कि वह बेवफा है.

ऐसे में जब मंगेतर देवेंद्र का फोन आया तो वह और भी घबरा उठी. क्योंकि इन सब बातों से अंजान देवेंद्र भी प्यार जताते हुए यह कहता रहता था कि हम दोनों अपनी सुहागरात 11 फरवरी को नहीं बल्कि 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे पर मनाएंगे.

नीरज के अलावा कोई और शरीर को छुए, यह सोच कर ही रचना की रूह कांप उठती थी. लिहाजा उस ने जी कड़ा कर एक सख्त फैसला ले लिया और नीरज को भी बता दिया. जिंदगी से हताश हो चले नीरज को भी लगा कि जब घर वाले साथ जीने का मौका नहीं दे रहे तो न सही, रचना के साथ मरने का हक तो नहीं छीन सकते.

7 फरवरी की दोपहर जब मां दूसरी महिलाओं के साथ छई माटी की रस्म के लिए खेतों पर गई तो रचना घर से भाग निकली. नीरज उस का इंतजार कर ही रहा था. दोनों ने आत्महत्या करने से पहले पेड़ के नीचे सुहागरात मनाई और नीरज ने रचना की मांग में सिंदूर भी भरा, फिर दोनों एकदूसरे को गले लगा कर फंदे पर झूल गए.

दोनों के शव जब पेड़ से उतारे गए तो गांव वाले गमगीन थे. जिन्होंने अभी अपनी जिंदगी जीनी शुरू भी नहीं की थी, वे बेवक्त मारे गए थे. दोनों के पास से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला था. पोस्टमार्टम के बाद शव घर वालों को सौंप दिए गए और दोनों का एक ही श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार हुआ.

प्रेमियों का इस तरह एक साथ या अलगअलग खुदकुशी कर लेना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस मामले से यह तो साफ हो गया कि सच्चा प्यार मर जाना पसंद करता है, जुदा होना नहीं.

ऐसे प्रेमी जब परंपराएं, धर्म, जाति वगैरह की दीवारें तोड़ने में खुद को असमर्थ पाते हैं, तो उन के पास सिवाय आत्महत्या के कोई भी रास्ता नहीं रह जाता, जिन की मंशा घर वालों और समाज को उन की गलती का अहसास कराने की भी होती है.

भैरो सिंह और सेवापाल जैसे पिता अगर वाकई बच्चों को प्यार करते होते तो उन की इच्छा और अरमानों का सम्मान करते, उन्हें पूरा करते लेकिन इन्हें औलाद से ज्यादा अपने उसूल प्यारे थे तो क्यों न इन्हें ही दोषी माना जाए.

डिजिटल दुनिया के चमत्कारी बाबा

आप ने ‘डिजिटल अरैस्ट’ की कई घटनाएं हालफिलहाल में सुनी होंगी. मतलब अब डिजिटल तांत्रिक भी चर्चा में आने लगे हैं. हालांकि, ‘डिजिटल तांत्रिक’ के बारे में आप ने शायद ही सुना हो, लेकिन इस से जुड़ा एक हैरान करने वाला मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से आया है, जहां एक डिजिटल तांत्रिक ने काले जादू का डर दिखा कर एक शेयर कारोबारी से 65 लाख रुपए हड़प लिए. इस मामले में एफआईआर दर्ज की गई है.

जानकारी के मुताबिक, हेमंत कुमार राय नाम के एक व्यापारी ने नुकसान का सामाधान तलाशने के लिए एक तांत्रिक से औनलाइन बात की.

इंटरनैट पर तलाशने पर प्रिया बाबा के बारे में जानकारी मिली, जिस पर चैटिंग होने के बाद प्रिया बाबा ने हेमंत कुमार राय को बताया कि उस पर काला जादू का साया है, जिस के लिए कुछ क्रियाएं करानी पड़ेंगी.

हेमंत कुमार राय के मुताबिक, क्रिया के नाम पर शुरुआत में तकरीबन 11,000 रुपए तांत्रिक को दिए गए. पर प्रिया बाबा के सुझाई गई क्रियाओं से हेमंत को कोई फायदा नहीं हुआ. बाबा ने कभी उन की ग्रह दशा को खराब तो कभी किसी और वजह को उन की दिक्कतों की वजह बताया.

साथ ही, तांत्रिक ने पीड़ित को बताया कि तंत्र क्रियाओं को पूरा होने तक नहीं छोड़ना है. अगर बीच मे तंत्र बंद हुआ, तो इस का उलटा असर दिखना शुरू हो जाएगा.

परेशानी से उबारने के लिए बताए गए उपायों को पूरा करने के लिए हेमंत कुमार राय ने तांत्रिक प्रिया बाबा को समयसमय पर रुपए दिए. आरोप है कि धीरेधीरे कर के साइबर तांत्रिक ठग ने 65 लाख रुपए समाधान की आड़ में ले लिए. इस के बाद भी जब वह रुपयों की मांग करता रहा, तब परेशान हो कर पीड़ित ने हजरतगंज कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराया.

इस से पहले भी लखनऊ से साइबर ठगी के मामले सामने आ चुके हैं. हाल ही में ठगों ने एक डाक्टर को अपना शिकार बनाया था. अलीगंज के रहने वाले डाक्टर अशोक सोलंकी का विकास नगर में अपना क्लिनिक है. साइबर ठगों ने 20 और 21 अगस्त, 2025 को उन के घर पर डेढ़ दिन तक उन्हें डिजिटल अरैस्ट कर के 48 लाख रुपए ठग लिए. इन में से एक ने खुद को कूरियर सर्विस का मुलाजिम और दूसरे ने खुद को मुंबई का डीजीपी बताया था.

क्या है डिजिटल अरैस्ट

दरअसल, ‘डिजिटल अरैस्ट’ कानून की भाषा का कोई शब्द नहीं है, बल्कि साइबर अपराधियों के ठगी करने का नया तरीका है. साइबर अपराधियों का सब से बड़ा हथियार डर और लालच होता है. साइबर ठग लोगों को वीडियो काल करते हैं. वे डरा कर या लालच दे कर वीडियो काल पर अपने शिकार को जोड़ लेते हैं. हफ्तों या कुछ घंटे तक आप को डर या लालच दिखा कर कैमरे के सामने रखते हैं.

‘डिजिटल अरैस्ट’ के मामले में स्कैमर्स एक वर्चुअल लौकअप भी बना देते हैं और अरैस्ट मैमो पर दस्तखत भी डिजिटल कराया जाता है.

‘डिजिटल अरैस्ट’ में ये फेक फार्म (फर्जी फार्म) भी भरवाते हैं. सबकुछ डिजिटल होता है, लेकिन ये इतनाडरा देते हैं कि पीड़ित घर के बाहर तक नहीं निकलता. जालसाज डर या किसी न किसी बहाने तब तक वीडियो काल पर जोड़े रखते हैं, जब तक आप उन की डिमांड पूरी करते रहते हैं. इस के लिए स्कैमर्स बड़ी एजेंसियों और अफसरों के शामिल होने, सालों जेल में रहने जैसी बातों से डराते हैं.

कैसे अंजाम देते हैं

आरोपी खुद को या तो सभी परेशानियों से मुक्त करने वाला बाबा बताते हैं या फिर खुद को पुलिस या इनकम टैक्स अफसर बताते हैं, ताकि शिकार को यकीन हो जाए. इस के लिए वे वरदी पहन कर काल करते हैं. बैकग्राउंड भी ऐसा रखते हैं, जिस से लगे है कि काल करने वाला शख्स किसी दफ्तर में बैठा है और और सही बोल रहा है. आरोपी अपने शिकार को धमकाते हैं कि उन के पैनकार्ड और आधारकार्ड का इस्तेमाल गैरकानूनी काम में किया गया है. इतना नहीं नहीं, आरोपी इस दौरान पूरी नजर रखते हैं. शिकार को किसी से बात तक नहीं करने देते. इस के बाद उसे डराधमका कर रुपए ट्रांसफर करा लेते हैं.

लेकिन अगर आप बाबा के चुंगल में फंसे हैं तो आप खुद ही वहां बैठे रहेंगे, यह सो चकर कि बस अभी चमत्कार हुआ और आप की सब परेशानी दूर हो जाएंगी या फिर आप अमीर हो जाएंगे. इसी चमत्कार की आस में आप खुद ही ‘डिजिटल अरैस्ट’ हो जाते हैं और जब सामने वाला आप से पैसा लूट लेता है और कोई चमत्कार नहीं होता, तब अब पछताय होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत वाली कहावत ही सच होती नजर आती हैं.

क्या वाकई आप को लगता है कि इस में सारी गलती लूट बाबा की है? क्या बाबा आप के घर आए थे आप को लूटने? खुद आप ने संपर्क किया बाबा से तो फिर उन्हें कुसूरवार उन्हें क्यों ठहराना?

आप ने खुद उन्हें ढूंढ़ा अपना माल लुटाने के लिए. अच्छे पढ़ेलेखे लोग यहां तक कि इंजीनियर और डाक्टर तक ऐसी घटनाओं को शिकार हो रहे हैं. सवाल यह उठता है कि जब ऐसी चीजों में ही फंसना है, तो इतनी महंगी डिगरियां लेने का क्या फायदा? फिर आप ने किस बात की डाक्टरी या इंजीनियरिंग की है? अगर जादूटोना पर ही यकीन करना था, तो बेकार है आप की इतनी महंगी तालीम.

कैसे बचें इन से

अगर कोई आप को बोलता है कि आप का फोन नंबर, आधारकार्ड या पैनकार्ड गैरकानूनी रूप से इस्तेमाल हो रहा है तो उस पर यकीन न करें. या फिर वह आप को कहे कि आप का कोई जानपहचान का, आप का बेटाबेटी, पतिपत्नी या कोई रिश्तेदार किसी केस में फंस गया है, तो उस पर भी यकीन न करें. जब तक कि उन के मोबाइल नंबर से आप को खुद काल कर के यह सब न बताया जाए.

जब कोई आप को काल पर आप से पैसों के लेनदेन की बात करे, तो आप बिलकुल भी न करें. अपनी निजी जानकारी बिलकुल भी शेयर न करें. किसी भी अनजाने मैसेज पर क्लिक न करें. उस लिंक को कभी न खोलें. अपने फोन में या कहीं लैपटौप वगैरह में कभी भी थर्ड पार्टी एप डाउनलोड न करें. अपने बैंकिंग एप्स और फाइनैंशियल ट्रांजैक्शन अकाउंट एप पर मजबूत सिक्योरिटी पासवर्ड लगाएं.

जांच एजेंसी या पुलिस आप को काल कर के धमकी नहीं देती है. जांच एजेंसी या पुलिस कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्यवाही करती है. अगर आप को भी डरानेधमकाने के लिए इस तरह के फोन आते हैं तो आप तुरंत इस की सूचना स्थानीय पुलिस को दें या फिर 1930 नैशनल साइबर क्राइम हैल्पलाइन पर काल कर के शिकायत दर्ज कराएं.

इस के आलावा ढोंगी बाबा के जाल में भी न फंसे..पाखंडी बाबा सिर्फ अपनी जेब भरने वाले होते हैं. इन की करनी और कथनी में अंतर होता है.

भाई और जीजा से करवाया लिव-इन पार्टनर का कत्ल

9 सितंबर, 2019 को अनीता अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा गई थी. अगले दिन अपराह्न 2 बजे जब वह दिल्ली के लाजपत नगर में स्थित अपने फ्लैट में पहुंची तो वहां का खौफनाक मंजर देखते ही उस के मुंह से चीख निकल गई. उस के पैर दरवाजे पर ही ठिठक गए.

उस के लिवइन पार्टनर सुनील तमांग की लहूलुहान लाश फर्श पर पड़ी थी. उस की गरदन से खून निकल कर पूरे फर्श पर फैल चुका था, जो अब जम चुका था. अनीता ने सब से पहले अपने फ्लैट के मालिक ए.के. दत्ता को फोन कर इस घटना की जानकारी दी. ए.के. दत्ता पास की ही एक दूसरी कालोनी में रहते थे. लिहाजा कुछ देर में वह अपने लाजपत नगर वाले फ्लैट पर पहुंचे, जहां बुरी तरह घबराई अनीता उन का इंतजार कर रही थी.

सुनील की खून से सनी लाश देखने के बाद उन्होंने घटना की जानकारी दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम को दी तो कुछ ही देर के बाद थाना अमर कालोनी के थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए और घटनास्थल की जांच में जुट गए. उन्होंने डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया.

घटनास्थल की फोटोग्राफी और वहां पर मौजूद खून के धब्बों के नमूने एकत्र करने के बाद थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन ने तहकीकात शुरू की. मृतक सुनील की गरदन पर पीछे की तरफ से किसी तेज धारदार हथियार से जोरदार वार किया गया था, जिस से ढेर सारा खून निकल कर फर्श पर फैल गया था.

कमरे के सभी कीमती सामान अपनी जगह मौजूद थे, जिसे देख कर लगता था कि यह हत्या लूटपाट के लिए नहीं बल्कि रंजिशन की गई होगी. उन्होंने अनीता से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह और सुनील पिछले एक साल से इस फ्लैट में लिवइन पार्टनर के रूप में रह रहे थे. वह एक ब्यूटीपार्लर में काम करती थी, जबकि सुनील एक रेस्टोरेंट में कुक था. लेकिन कई महीने पहले किसी वजह से उस की नौकरी छूट गई थी.

कल रात साढ़े 11 बजे किसी जरूरी काम से वह अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा गई थी. रात को वह वहीं रुक गई थी. रात में उस ने फोन पर काफी देर तक सुनील से बातें की थीं.

आज दोपहर को वह यहां पहुंची तो देखा फ्लैट का दरवाजा खुला था और अंदर प्रवेश करते ही उस की नजर सुनील की लाश पर पड़ी थी. इस के बाद उस ने अपने मकान मालिक को फोन कर इस घटना के बारे में बताया तो उन्होंने यहां पहुंचने के बाद इस घटना की सूचना पुलिस को दी.

थानाप्रभारी ने मकान मालिक ए.के. दत्ता से भी पूछताछ की तो उन्होंने भी वही बातें बताईं जो अनीता ने बताई थीं.

सारी काररवाई से निपटने के बाद थानाप्रभारी ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और थाने लौट कर सुनील की हत्या का मामला दर्ज कर लिया.

इस केस की गुत्थी सुलझाने के लिए दक्षिणपूर्वी दिल्ली के डीसीपी चिन्मय बिस्वाल ने कालकाजी के एसीपी गोविंद शर्मा की देखरेख में एक टीम का गठन किया, जिस में थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन, एसआई अभिषेक शर्मा, ईश्वर, आर.एस. डागर, एएसआई जगदीश, कांस्टेबल राजेश राय, मनोज, सज्जन आदि शामिल थे.

विरोधाभासी बयानों से हुआ शक 

अगले दिन थानाप्रभारी ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई, ताकि वारदात की रात फ्लैट के आसपास घटने वाली सभी गतिविधियों की बारीकी से जांच की जा सके. साथ ही मृतक सुनील तमांग और अनीता के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स और सीसीटीवी फुटेज की बारीकी से जांचपड़ताल करने के बाद थानाप्रभारी ने गौर किया कि अनीता के बयान विरोधाभासी थे. इसलिए अनीता को पुन: पूछताछ के लिए अमर कालोनी थाने बुलाया गया. उस से सघन पूछताछ की गई तो अनीता यही कहती रही कि वह रात साढ़े 11 बजे अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा गई थी, लेकिन वह वहां देर रात को क्यों गई, इस की वजह नहीं बता पाई.

पुलिस को लग रहा था कि वह झूठ पर झूठ बोल रही है. उस ने उस रात जिनजिन नंबरों पर बात की थी, उन के बारे में भी वह संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी. लिहाजा उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई और सुनील तमांग की हत्या में खुद के शामिल होने का जुर्म स्वीकार कर लिया.

उस ने बताया कि इस हत्याकांड में उस का भाई विजय छेत्री तथा जीजा राजेंद्र छेत्री भी शामिल थे. ये दोनों पश्चिम बंगाल के कालिंपोंग शहर के रहने वाले थे. अनीता द्वारा अपने लिवइन पार्टनर की हत्या में शामिल होने की बात स्वीकार करने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

बाकी आरोपियों विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री को गिरफ्तार करने के लिए थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन ने एसआई अभिषेक शर्मा के नेतृत्व में एक टीम गठित की. यह टीम 13 सितंबर, 2019 को वेस्ट बंगाल के कालिंपोंग शहर पहुंच गई. स्थानीय पुलिस के सहयोग से दिल्ली पुलिस ने विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री को उन के घर से गिरफ्तार कर लिया.

दोनों से जब सुनील तमांग की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उन दोनों ने पुलिस को बरगलाने की काफी कोशिश की लेकिन बाद में जब उन्हें बताया गया कि अनीता गिरफ्तार हो चुकी है और उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है, तो उन दोनों ने भी अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

वेस्ट बंगाल की स्थानीय कोर्ट में पेश करने के बाद दिल्ली पुलिस दोनों आरोपियों को ट्रांजिट रिमांड पर ले कर दिल्ली लौट आई.

अनीता, विजय और राजेंद्र से की गई पूछताछ तथा पुलिस की जांच के आधार पर इस हत्याकांड के पीछे की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

अनीता मूलरूप से पश्चिम बंगाल के कालिंपोंग की रहने वाली थी. करीब 5 साल पहले वह अपने पति से अनबन होने पर उसे छोड़ कर अपने सपनों को पंख लगाने के मकसद से दिल्ली आ गई थी. यहां उस की एक सहेली थी, जो बहुत शानोशौकत से रहती थी. वह सहेली जरूरत पड़ने पर उस की मदद भी कर दिया करती थी.

दरअसल, अनीता स्कूली दिनों से ही खुले विचारों वाली एक बिंदास लड़की थी. वह जिंदगी को अपनी ही शर्तों पर जीना चाहती थी, जबकि उस का पति एक सीधासादा युवक था. उसे अनीता का ज्यादा फैशनेबल होना तथा लड़कों से ज्यादा मेलजोल पसंद नहीं था.

विपरीत स्वभाव होने के कारण शादी के थोड़े दिनों बाद ही वे एकदूसरे को नापसंद करने लगे थे. बाद में जब बात काफी बढ़ गई तो एक दिन अनीता ने पति को छोड़ दिया और वापस अपने मायके चली आई. कुछ दिन तो वह मायके में रही, फिर बाद में उस ने अपने पैरों पर खडे़ होने का फैसला कर लिया. और वह दिल्ली आ गई.

वह ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, महज 8वीं पास थी. छोटे शहर की होने और कम शिक्षित होने के बावजूद उस का रहने का स्टाइल ऐसा था, जिसे देख कर लगता था कि वह काफी मौडर्न है.

दिल्ली पहुंचने के बाद अनीता ने अपनी उसी सहेली की मदद से ब्यूटीशियन की ट्रेनिंग ली. इस के बाद वह एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी करने लगी. नौकरी करने से उस की माली हालत अच्छी हो गई और जिंदगी पटरी पर आ गई.

इसी दौरान एक दिन उस की मुलाकात सुनील तमांग नाम के युवक से हुई जो नेपाल का रहने वाला था. उस की मां कुल्लू हिमाचल प्रदेश की थी. 28 वर्षीय सुनील दक्षिणी दिल्ली के साकेत में स्थित एक रेस्टोरेंट में कुक था.

दोनों एकदूसरे को चाहने लगे 

कुछ दिनों तक दोस्ती के बाद वह सुनील को अपना दिल दे बैठी. सुनील अनीता की खूबसूरती पर पहले से ही फिदा था. एक दिन सुनील ने अनीता को अपने दिल की बात बता दी और कहा कि वह उसे दिलोजान से प्यार करता है. इतना ही नहीं, वह उस से शादी रचाना चाहता है.

अनीता उस के दिल की बात जान कर खुशी से झूम उठी. उस ने सुनील से कहा कि पहले कुछ दिनों तक हम लोग साथ रह लेते हैं. फिर घर वालों की रजामंदी से शादी कर लेंगे. इस की एक वजह यह भी थी कि अभी पहले पति से अनीता का तलाक नहीं हुआ था. तलाक के बाद ही दूसरी शादी संभव हो सकती थी.

कोई 4 साल पहले अनीता ने सुनील तमांग के साथ चिराग दिल्ली में किराए का मकान ले कर रहना शुरू कर दिया. दोनों एकदूसरे को पा कर बेहद खुश थे. सुनील अनीता का काफी खयाल रखता था. अनीता भी सुनील के साथ लिवइन में रह कर खुद को भाग्यशाली समझती थी.

सुनील न केवल देखने में स्मार्ट था, बल्कि एक अच्छे पार्टनर की तरह उस की प्रत्येक छोटीछोटी बात का विशेष ध्यान रखता था. अनीता भी सुनील की खुशियों का खूब खयाल रखती थी. वह अपनी तरफ से कोई ऐसा काम नहीं करती थी, जिस से सुनील की कोई भावना आहत हो.

अनीता और सुनील 3 सालों तक चिराग दिल्ली स्थित इस मकान में रहे. इस बीच जब अनीता की पगार अच्छी हो गई तो वह चिराग दिल्ली से लाजपत नगर आ गई. यहां वह ए.के. दत्ता के फ्लैट में किराए पर रहने लगी. यहां उस का फ्लैट तीसरी मंजिल पर था.

इतने दिनों तक लिवइन रिलेशन में रहने के कारण दोनों के परिवार वाले भी उन के संबंधों से परिचित हो गए थे. अनीता का भाई विजय छेत्री जबतब कालिंपोंग से दिल्ली में उस के पास आता रहता था. उसे सुनील का व्यवहार पसंद नहीं था.

विजय ने अनीता की पसंद पर ऐतराज तो नहीं जताया लेकिन एक दिन उस ने सुनील की गैरमौजूदगी में अपने मन की बात अनीता को बता दी. चूंकि अनीता सुनील से प्यार करती थी, इसलिए उस ने भाई से सुनील का पक्ष लेते हुए कहा कि सुनील दिल का बुरा नहीं है लेकिन फिर भी अगर सुनील की कोई बात उसे अच्छी नहीं लगती है तो वह उसे कह कर इस में सुधार लाने का प्रयास करेगी.

विजय ने जब देखा कि उस की बहन ने उस की बात को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है तो उस ने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी. सुनील और अनीता को विजय की बातों से जरा भी फर्क नहीं पड़ा था.

लेकिन कहते हैं कि हर आदमी का वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता है. सुनील तमांग के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. किसी बात को ले कर सुनील की रेस्टोरेंट से नौकरी छूट गई. नौकरी छूट जाने की वजह से वह परेशान तो हुआ लेकिन अनीता अच्छा कमा रही थी, इसलिए घर का खर्च आराम से चल जाता था.

हालांकि कुछ दिन बाद अनीता सुनील को समझाबुझा कर जल्दी कहीं नौकरी खोजने का दबाव बना रही थी, मगर 6 महीने तक सुनील को उस के मनमुताबिक नौकरी नहीं मिली.

धीरेधीरे अनीता को ऐसा लगने लगा जैसे सुनील जानबूझ कर नौकरी नहीं करना चाहता है और अब वह उस के ही पैसों पर मौज करना चाहता है. ऐसा विचार मन में आते ही उस ने एक दिन तीखे स्वर में सुनील से कहा, ‘‘सुनील, या तो तुम जल्दी कहीं पर नौकरी ढूंढ लो अन्यथा मेरा साथ छोड़ कर यहां से कहीं और चले जाओ.’’

हालांकि अनीता ने यह बात सुनील को समझाने के लिए कही थी, लेकिन उस दिन के बाद सुनील के तेवर बदल गए. उस ने अनीता से कहा कि वह उसे छोड़ कर कहीं नहीं जाएगा और फिर भी अगर वह उसे जबरन खुद से दूर करने की कोशिश करेगी तो उस के पास अंतरंग क्षणों के कई फोटो मोबाइल पर पड़े हैं, जिन्हें वह उस के सगेसंबंधियों के मोबाइल पर भेज देगा, जिस के बाद वह कहीं भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी.

रुपयों की तंगी तथा सुनील की धमकी को सुन कर अनीता कांप उठी. इस घटना के कुछ दिनों बाद तक अनीता ने सुनील को नौकरी ढूंढने पर जोर देती रही, लेकिन सुनील पर इस का कोई फर्क नहीं पड़ा.

अंत में अनीता ने कालिंपोंग स्थित अपने भाई विजय को अपनी मुसीबत के बारे में बताया तो विजय गुस्से से भर उठा. उस ने अनीता से कहा कि वह जल्द ही सुनील नाम के इस कांटे को उस की जिंदगी से निकाल फेंकेगा.

भाई ने बनाया हत्या का प्लान 

भाई की बात सुन कर अनीता को राहत महसूस हुई. विजय को सुनील पहले से नापसंद था. अब जब अनीता खुद ही उस से छुटकारा पाना चाहती थी तो उस ने अपने रिश्ते के बहनोई राजेंद्र के साथ मिल कर सुनील को मौत की नींद सुलाने की योजना तैयार कर ली. इस के बाद उस ने अनीता को अपनी योजना के बारे में बताया तो अनीता ने दोनों को दिल्ली पहुंचने के लिए कह दिया.

7 सितंबर, 2019 को विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री पश्चिम बंगाल के कालिंपोंग से नई दिल्ली पहुंचे और पहाड़गंज के एक होटल में रुके. अनीता फोन से बराबर भाई के संपर्क में थी. लेकिन सुनील अनीता और विजय के षडयंत्र से अनजान था. उसे सपने में भी गुमान नहीं था कि अनीता उस की ज्यादतियों से तंग आ कर उस का कत्ल भी करवा सकती है.

9 सितंबर को विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री पूर्वनियोजित योजना के अनुसार रात के 10 बजे अनीता के फ्लैट पर पहुंचे. अनीता दोनों से ऐसे मिली जैसे उन्हें पहली बार देखा हो. सुनील भी उन से घुलमिल कर बातें करने लगा.

साढ़े 11 बजे उस ने अचानक सब को बताया कि उसे अभी इसी वक्त अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा जाना है. इस के बाद वह तैयार हो कर फ्लैट से बाहर निकल गई.  रात में अनीता सुनील के मोबाइल पर काल कर के उस से 2-3 घंटे तक मीठीमीठी बातें करती रही.

तड़के करीब 4 बजे जैसे ही सुनील सोया, तभी विजय ने राजेंद्र के साथ मिल कर उस की गरदन पर चाकू से वार किया. थोड़ी देर तड़पने के बाद जब उस का शरीर ठंडा पड़ गया तो दोनों वहां से आनंद विहार के लिए निकल गए, क्योंकि वहां से उन्हें कालिंपोंग के लिए ट्रेन पकड़नी थी.

आनंद विहार जाने के दौरान रास्ते में विजय ने खून से सना चाकू एक सुनसान जगह पर फेंक दिया. आनंद विहार स्टेशन से रेलगाड़ी द्वारा वे कालिंपोंग पहुंच गए.

इन से विस्तार से पूछताछ करने के बाद अगले दिन 16 सितंबर, 2019 को थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन ने सुनील तमांग की हत्या के आरोप में उस की लिवइन पार्टनर अनीता, विजय छेत्री तथा राजेंद्र छेत्री को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से तीनों को तिहाड़ जेल भेज दिया गया. मामले की जांच थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन कर रहे थे.

मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं अपनी युवा बेटी को पीरियड्स के बारे में कैसे बताऊं

अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..

सवाल –

मेरी शादी को कुछ ही साल हुए थे जब मेरी पत्नी अचानक चल बसी. मेरी एक बेटी है जिसे मैं ने अपनी पत्नी के जाने के बाद बहुत प्यार से पाला है. मैं ने उस की हर फरमाइश पूरी करने की कोशिश की है और उसे अपनी मां की कमी कभी महसूस नहीं होने दी. जैसेजैसे मेरी बेटी की उम्र बढ़ रही है, वैसेवैसे मेरी चिंता भी बढ़ती जा रही है. कभीकभी तो मैं पूरी रात बस यही सोचता रहता हूं कि मैं अपनी बेटी का अकेले कैसे खयाल रखूंगा क्योंकि मां अपनी बेटियों के साथ फ्रैंक होती हैं और बेटियां भी अपनी मां से हर तरह की बातें कर लेती हैं. तो ऐसे में मेरी बेटी मुझ से अपनी परेशानियों के बारे में कैसे बात कर पाएगी जोकि अब बङी हो चुकी है? मैं उसे पीरियड्स के बारे में भी कैसे बताऊं? आप ही कुछ सलाह दीजिए?

जवाब –

एक पिता अपनी बेटी से हर वह बात नहीं कर सकता जो उस की मां कर सकती है और बेटियां भी अपने पिता से ऐसी बातें करने में शरमाती हैं जो कि बिलकुल गलत नहीं है. हमारे देश में बेटियां बाप की इज्जत करना अच्छी तरह जानती हैं और शुरुआत से ही बेटियों के मन में पिता के लिए एक डर और शर्म होती है। उन्हें अपनी मां से बात करना ज्यादा पसंद होता है.

जैसाकि आप ने बताया कि आप की पत्नी का देहांत हो चुका है और काफी समय से आपने ही अपनी बेटी को मांबाप दोनों का प्यार दिया है तो ऐसे में यह जिम्मेदारी भी आप की ही बनती है कि आप अपनी बेटी को हर तरह की जानकारी दें जोकि उस के लिए जरूरी है. आप अपनी बेटी के पिता के साथसाथ एक अच्छे दोस्त बन कर रहें.

अपनी बेटी के मन से अपने लिए डर या संकोच बिलकुल खत्म कर दें और अपनी बेटी को इस बात का विश्वास दिलाएं कि वे आप से हर तरह की बात कर सकती है और अपनी हर परेशानी आप के साथ शेयर कर सकती है.

आप उस की परेशानियों को हमेशा समझें और उस के साथ कदम से कदम मिला कर चलें. अपनी बेटी को समझाएं कि आप के होते उस को किसी बात की परेशानी नहीं होगी.

रही पीरियड्स की बात, तो पीरियड्स के बारे में बात करना कोई गलत बात नहीं है. पहले के जमाने में लोग पीरियड्स के बारे में बात करने से शरमाते थे पर इस आधुनिक जमाने में लोग पीरियड्स के बारे में खुल कर बात करते हैं और अपने बच्चों को इस की जानकारी भी देते हैं.

आप भी अपनी बेटी से बिना हिचक पीरियड्स के बारे में बताएं और पीरियड्स की जानकारी देने वाली वीडियोज भी दिखाएं. अपनी बेटी को बताएं कि पीरियड्स प्राकृतिक है, इस से घबराएं नहीं.

हां, आप चाहें तो इस के लिए अपनी बहन, मौसी, ताई या फिर घर की बुजुर्ग औरतों से भी मदद ले सकते हैं. वे आप की बेटी को समयसमय पर समझाती रहेंगी.

कुछ समय बाद बेटी खुद समझदार हो जाएगी और महिला संबंधी इन परेशानियों से खुद ही अपनी दोस्तों, परिजनों से पूछ कर समाधान कर लेगी.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें.

सिध सिरी जोग लिखी कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

लेखिका – नीलू शेखावत

कल प्रांशु ने पूछा- चिट्ठी क्या होती है? क्यों लिखी जाती है? संयोग से मैं ने कुछ खाली पोस्टकार्ड्स और लिफाफे संभाल कर रखे थे वरना अब तो पोस्टऔफिस का भी अस्तित्व नहीं, पोस्टकार्ड कहां से मिलते? मैं ने उन्हें पोस्टकार्ड्स तो दिखा दिए पर इस सब के लिए लिखना और पढ़ना भी तो जरूरी है.

बच्चे हंस रहे थे कि जो काम मैसेज या कौल से हो सकता है वह पत्र से क्यों? पर अब उन्हें आनंद आ रहा है. पत्र की भाषा मैं भी भूल रही हूं पर यत्नपूर्वक याद किया तो बचपन की स्मृतियां तैर गईं. मेरे सारे भाईबहन टैलीफोन पीढ़ी हैं, उन्होंने न कभी किसी को पत्र लिखा, न ही पढ़ा. मैं छुटपन में ननिहाल में रही जहां से मैं ने अपनी मां और मौसियों को खूब पत्र लिखे.

उस समय पत्र लिखना भी एक कला थी और यकीन मानिए, मैं ने इस में बहुत कम उम्र में निपुणता प्राप्त कर ली थी. हालांकि इस कार्य हेतु नियत एक कुशल व्यक्तित्व विद्यमान था जिन से हमारी कोई बराबरी नहीं थी. घर की दीवान-ए-इंशा हमारी मुरधर मौसी थी जिस के पास आसमानी रंग वाले खूब सारे अंतर्देशीय पत्र और सुंदरसुंदर पैन होते थे. किंतु मुझे उन्हें छूनेछेड़ने की इजाजत नहीं थी.

मेरे पिताजी जब भी असम से आते, मौसी के लिए चाइना पैन (एक महंगा पैन जिसे हम इसी नाम से जानते थे) लाते. यह पैन कमाल का होता था, एक बार दवात में मुंह डालता तो बकरी की तरह पूरा पेट भर कर ही बाहर निकलता. लिखते समय मजाल है कि स्याही का एक छींटा भी कहीं लग जाए? निप (निब) इतनी बारीक कि डोरे जैसे अक्षर छपते. जब उंगलियों के बीच फंसता तो शब्ददरशब्द ऐसा सरपट फिसलता कि हाथ को पता ही न चलता कि कब तीनचार पेज भर गए.

एक हमारा वक्त, मोटी निप वाला पैन जिस में स्याही डालनी हो तो पूरी दवात को उन्धाओ. पैन में चार बूंद और कपड़ों पर पूरी स्याही. नीचे कौपीकिताब होती तो वह भी हरहर गंगे! इस दौरान जुल्फें झूल रही हों और उन को चेहरे से हटाना हो तो चेहरा भी स्याह. लिखने बैठो तो निप दोफाड़. कुछ लिखने के बजाय कागज ही खुरच डालती. मगर पोस्टकार्ड इस लिहाज से ठीक था. चिकना व मोटा पुट्ठा जल्दी खुरचता नहीं और न ही दूसरी ओर छपता जैसा अकसर कौपियों में होता. एक तरफ का लेख दूसरी तरफ भी छप जाता. दूसरी तरफ लिखने पर राख-राबड़ी सब एक. इस के साथ टूटा हुआ निब वमन भी करता. इसलिए हर दूसरे पेज पर कोई न कोई स्याही-नक्शा बना ही रहता.

तब बौलपैन भी चलते थे पर वे भी अतिसार से त्रस्त रहते. लाल, नीले, काले, हरे धब्बेदार चेहरे उन दिनों हमारे लिए आम थे. कम से कम 5वीं कक्षा तक के बच्चे तो अपने होंठ रंगीन ही पाते काहे कि जब पैन चलता नहीं तो उसे मुंह में ले कर हवा खींचने का रिवाज था. इस से बीचबीच में बना गतिरोध टूट जाता है और स्याही निब की ओर खिंची चली आती है. यह नुस्खा काम तो करता पर इतना ज्यादा कर जाता कि जोरदार प्रैशर के साथ गुल्ली तो निकल जाती मगर पूरी स्याही मुंह में आ कर गोल मेज कर बैठती. हम कुल्ले थूकते, कभी लाल, कभी हरा, कभी नीला तो कभी काला. स्याही का रंग कुछ छूटता, कुछ रह जाता. खुशबूदार स्याही वाले पैन उन दिनों बड़े अच्छे लगते थे. लाइट वाले पैन भी याद हैं जिन से अंधेरे में भी लिखा जा सकता था पर यह काफी दिनों के बाद की बात है. पत्र लिखने वाले दिनों में ढंग का पैन शायद ही मिला हो.

मुझे अंतर्देशीय पत्र लिखने की अनुमति तभी मिलती जब मेरी पत्रलेखा मौसी घर में गैरहाजिर होती या वह स्वयं अनुमति देती. ऐसी स्थिति में मुझे एक गंभीर पत्रलेखन करना होता जिस की भाषा मेरी भाभू (नानी) की होती. ‘सिध सिरी जोग लिखी…’ और ‘अत्र कुशलम् तत्रास्तु…’ वाला पत्र तो मैं ने कभी नहीं लिखा पर तब भी कुछ विरुदावलीयुक्त वाक्य स्थायी होते थे जिन्हें हर पत्र के फौर्मेट में लिखना होता. आज भरसक प्रयत्न के बाद भी वह फौर्मेट याद न आया जो कभी मुंहजबानी याद था.

सब से पहले सब बड़ों को पांवां धोक और छोटों को प्रेम. फिर अपनी राजीखुशी (कुशलक्षेम) बतानी और अगले की पूछनी. सब से जरूरी ‘जमाना’ और ‘धीणा’. आप के वहां जमाना कैसा है और हमारे इधर जमाना ऐसा है. जमाने का अर्थ हुआ- मेह, पानी और खेतीबाड़ी. धीणे से आशय दुधारू पशुधन यानी कितनी गाय-भैंस दुहा रही हैं. ये दोनों दुरुस्त हैं तो आप समृद्ध हैं, मौज में हैं. दोनों में से एक ठीक हो तब भी बाबा भला करे. प्रत्येक वाक्य के अंत में ‘सा’ लिखना भी अनिवार्य था और शब्दावली लच्छेदार. जैसे, आप को हमारा पांव धोक अरज होवे सा. जब अंतर्देशीय लिखा जाता तो घर के एकएक बुजुर्ग को पूछा जाता कि आप को क्या सम्चार (समाचार) लिखवाना है. वे बताते- ‘आजकल पेट में आफरा रहता है, रोटी पचती नहीं, फलांने को पैसे उधार दिए थे, राख उड़े ने अब तक नहीं लौटाए. आंखों की कारी (औपरेशन) करवाने की सोच रहे हैं पर अभी ठंड (मौसम) नहीं हो रही, पड़ोस में पीहर आई फलांनी बाई का टाबर तीनचार दिनों से दूध नहीं चूंक रहा आदिआदि.’

अब यह लिखने वाले के विवेक पर निर्भर था कि वह इन समाचारों को कैसे लिखे. बड़ा और समझदार व्यक्ति इन्हें फिल्टर कर के तरीके से लिखता और मेरे जैसे लोग हूबहू.

कला पत्र लिखने की नई पीढ़ी हिंदी में पत्र लिखने लगी थी पर पुराने लोग अपनी बोली में लिखते. जैसे ढूंढाड के रिश्तेदार अपनी बोली में और उस का उत्तर मारवाड़ वाले अपनी बोली में देते. मेरे समय तक राजस्थानी भाषा गंवारपने का तमगा प्राप्त कर चुकी थी, इसलिए किसी को राजस्थानी में पत्र लिखते हुए न देखा, न ऐसा कोई पत्र पढ़ा. पत्र लिखना अपनेआप में बहुत बड़ी कला थी जिस पर हर किसी का अधिकार नहीं होता था. सधे शब्दों से कम जगह में अधिक से अधिक लिख देना कलाकारी थी.

सुंदर लिखावट भी बड़ा फैक्टर था. कई बार सामने वाले लोग पूछते थे- आप के पत्र की लिखावट बड़ी सुंदर थी सा, जिस ने देखा थुथकी डाली. जवाबी पत्र में लेखक का पूरा ब्योरा दिया जाता कि वह पढ़नेलिखने में कितना होशियार है.

मैं ने अधिसंख्य पोस्टकार्ड्स ही लिखे जिन में लिखने लायक सम्चार मेरे पास होते ही थे, फिर भी मुझे आंगन में बैठ कर मुनादी करनी ही होती थी कि फलांने को कागज लिख रही हूं, किसी को कुछ लिखवाना हो तो लिखवा दो. बड़े लोग चलतेफिरते एकदो वाक्य फेंक देते और मैं हाथोंहाथ झोल कर पत्र में चेप देती. मौसी पत्र लिखतीं तो बड़ी तहजीब से लिखतीं. आंगन में दरी बिछती. माचे पर दादोसा, पीढे पर दासा और घूंघट में भाभू अपूठी बैठ कर पत्र लिखवाते. मैं माचे पर बैठ कर पैर हिलाती जाती और कुछकुछ सम्चार याद दिलाती जाती. हालांकि उन्हें वैटेज कम ही मिलता मगर फूंदा बीचबीच में पूरा रंगती.

पत्र पूरा लिख चुकने के बाद मुझे सुपुर्द किया जाता तब पत्रों पर सूखा गोंद चिपका हुआ नहीं आता था और घर में गोंद रखते नहीं थे, ऐसे में आकड़े का दूध काम आता. बाड़ में कहीं भी आकड़ा उगा मिल जाता, कच्ची टहनी तोड़ो और उसे पत्र के किनारे से रगड़ कर चिपका दो. ऐसा चिपकता कि प्राप्तकर्ता को वह सिरा फाड़ना ही पड़ता, तब जा कर पत्र खुलता.

चिपकाने से ले कर पोस्टबौक्स में डालने तक का जिम्मा मेरा था. मैं जब भी उस लालकाले चिरमी जैसे डब्बे में पत्र डालती, अपना छोटा हाथ आगे ले जाती इस उम्मीद में कि कोई पोस्टकार्ड मेरे हाथ लगे और मैं उस में लिखे सारे सम्चार पढ़ लूं पर ऐसा कभी नहीं हो पाया. यह डब्बा सिर्फ निगलना जानता था, उगलना नहीं. डाकिया खुद ही खिड़की खोलता और पत्र निकाल कर फिर मोटा सा ताला जड़ देता.

डाकिया आया डाक लाया

खाकी कपड़े, खाकी गांधी टोपी और साइकिल की ट्रिनट्रिन करता डाकिया वैसे किताबी चित्रों और टीवी में ही देखा. हमारा डाकिया साधारण कपड़ों में, मोटे कपड़े का चेनदार थैला कंधे पर झलाते हुए आता था. उसे दूर गुवाड़ से आते देख कर मैं भांप लेती थी कि वह हमारे घर ही आएगा. बाहर के फाटक से ही पत्र लपकती, जोरजोर से प्रेषक का पता पढ़ती और सब के बीच बैठ कर बांचती.

जिन शब्दों का उच्चारण या आशय गलत बांचती तो बड़े लोग ठीक करते. पत्र में बहुत अच्छा सम्चार होता तो छोटीमोटी बधाई भी मिलती. फिर पत्र पढ़ने में भी एक प्रकार का रस था जिसे पढ़ने वाला ही जानता है.

ज्यों गूंगे मीठे फल को रस, अंतरगत ही भावै.

सुनने वाले भावविभोर हो कर सुनते. मेरी मां और बड़े मासीसा शादी के शुरुआती दिनों में जब अपने घर पत्र भेजते तो दादोसा डाकिए से उसे ले कर ऐसे दौड़ते मानो बूढ़े, पतले और कमजोर पांवों में सहसा पंख लग गए हों. कहते हैं- जब तक पत्र पढ़ा जाता, वे ?ार?ार रोते. मैं ने यह दृश्य कम देखा. हां, एक बार किसी इराक वाले (जीविका के लिए विदेश में रहने वाले) के कागज पढ़ने के दौरान उस की मां को रोते हुए देखा. उस ने लिखा था, दीवाली पर आप लोगों ने तो सब के साथ चावल-लापसी खाई होगी. यहां दूर देश में कैसी होली, कैसी दीवाली? मां, न मां का जाया, देश पराया.

कुछ लोग कैसेट भी भेजा करते थे क्योंकि पत्र में इतना कुछ लिखा नहीं जा सकता जितना एक घंटे की टेप में रिकौर्ड किया जा सकता था. गांव में दोचार ही टेप रिकौर्डर होते थे जो इराक वालों के घर में ही मिलते. इन्हें सुनने के लिए आसपड़ोस की भीड़ जुटती. कैसेट में उन सब का भी जिक्र होता.

मुझे याद है, हमारी जो सहेलियां स्कूल छोड़ कर चली जाती थीं वे भी पीछे पत्र लिखा करतीं. ये पत्र स्कूल और क्लास के पते पर आते. दूसरी कक्षाओं की लड़कियां वे पत्र औत्सुक्य से सुनतींपढ़तीं.

खास सहेलियों में ‘हमकौं लिख्यौ है कहा, हमकौं लिख्यौ है कहा’ वाली भागमभाग मचती. हर कोई सुनने को उत्सुक रहती कि पत्र में उन के लिए क्या लिखा गया है. पत्र में नाम आना प्रतिष्ठा का विषय था. ‘देखा, मैं उसे अब भी याद हूं.’ फिर वह पत्र मैडमें भी पढ़तीं और चारपांच सौ लड़कियों के स्कूल में मैडम अपना नाम बोले तो अहोभाग्य!

जब मैं ननिहाल छोड़ कर गांव में रहने लगी तो मैं ने भी कुछ दिन अपनी सहेलियों को पत्र लिखे. मैं ने कभी उन्हें अपने गांव का सही नाम नहीं बताया क्योंकि यह नाम जब भी कोई सुनता तो पहले ठहाका लगाता. कांकरा भी भला कोई नाम हुआ! मैं किसी को अपना गांव जोधपुर बताती तो किसी को जयपुर. मौज आई तो दिल्ली की फान्फ भी टेक देती. जब पत्र लिखने की बारी आई तो यह आठ दिक देने लगा. पत्र पर जयपुर, जोधपुर लिखती तो शायद डाकिया ही पढ़ कर वापस कर देता. इसलिए अपना पता ही न लिखती या तो गंतव्य तक पहुंच जाए या बीच में ही रुक जाए पर पत्र वापस न आए.

गांव के नाम के साथ ही सहेलियों के नाम भी इज्जत का सवाल बनते. छोटी, चिमनी, बिदामी जैसे नामों के बजाय प्रीति, कीर्ति, श्रुति जैसे नाम प्रभावशाली लगते. मैं जीभर कर इन पत्रों में गप हांकती. चूंकि यह गप किसी के आगे प्रकट नहीं की जा सकती थी, इसलिए पत्रलेखन के लिए नितांत एकांत ढूंढ़ा जाता. हालांकि उस समय बच्चों के लिए एकांत दूर की कौड़ी थी. एक पोस्टकार्ड कईकई दिनों में पूरा होता, तब तक उसे छिपा कर रखना भी कम जोखिम का काम न था. फिर किसी रोज चुपके से पोस्टबौक्स के हवाले करने के बाद मैं राहत की सांस लेती.

बचपन की अपनी दुनिया है, कितनी सारी विचित्रताएं. अच्छी शक्ल और बुरी शक्ल, बहुत पैसा-कम पैसा, ऊंची जात-नीची जात, बढि़या घर-घटिया घर, हलके नाम-भारी नाम जैसे पूर्वाग्रह उन्हीं दिनों में पलते हैं पर बच्चा यह सब अपने साथ तो नहीं लाता, बस, ठीक से बड़ों का निरीक्षण करता है और काफीकुछ समाज का अनुकरण भी. फिर जीवनभर उसे ही ढोता रहता है.

खैर, वे झठेसच्चे पत्र सहेलियों तक पहुंचते. वे भी मेरी तरह खुश होतीं और जवाबी पत्र लिखतीं. जब घर में मेरे लिए पत्र आते तो सब लोग खूब हंसते क्योंकि इस घर में कई वर्षों से टैलीफोन का उपयोग हो रहा था. पिताजी का बाकायदा औफिस था जिस में दिनभर फोन की घंटियां टनटनातीं. बच्चे फोन उठाने के लिए दौड़ते. कौन कैसे ‘हैलो’ बोलता है, इस पर रोस्ंिटग चलती. धीरेधीरे मैं भी इस एडवांस दुनिया का हिस्सा बन गई और आज उस पुरानी पत्रलेखन की दुनिया से इतनी दूर पहुंच गई कि प्रांशु को लिखवाते समय कितने ही वाक्य बारबार लिखनेमिटाने पड़े पर फिर भी वैसा पत्र न लिखवा पाई. एक वक्त था जब मु?ो कितने ही रिश्तेदारों के पते और पिनकोड उंगलियों पर याद हुआ करते थे मगर अब ‘ओ बख्त बेह गया!’

युवतियां ब्रेकअप से कैसे उबरें

औफिस के लंचब्रेक में पाखी को अनमना और उदास देख कर मैं ने उस से पूछा, “क्यों, अद्यांत को मिस कर रही है? बेहद दुखी दिख रही है. भूलने की कोशिश कर यार उसे?”

“कैसे भूलूं उसे, पूरे 3 बरसों का साथ था. उस पर बहुत ज़ोरों का गुस्सा आ रहा है कि वह अपनी मां के सामने कोई स्ट्रौंग स्टैंड क्यों नहीं ले सका. हम दोनों की शादी करने की मंशा सुन कर उन के ब्लडप्रैशर हाई होने से ही घबरा गया और मुझ से ब्रेकअप कर लिया. अरे, दवाइयों से ब्लडप्रैशर कम नहीं होता क्या? चलो, एक तरह से अच्छा ही हुआ, शादी से पहले ही उस की असली फितरत समझ आ गई कि वह मम्माज बौय है.”

“बिलकुल सही कह रही है तू, ऐसे कमजोर, बिना रीढ़ की हड्डी वाले इंसान के साथ तू कभी खुश नहीं रहती जो मां की जरा सी बीमारी से अपने पार्टनर से मुंह मोड़ ले. फिर उस के बारे में इतना सोच क्यों रही है तू. परे कर उस की यादों को.”

“मेरे वश में नहीं, अवनी. सच कह रही हूं. बेहद दुखी और कन्फ़्यूज्ड फील कर रही हूं. दुखी हूं उसे खोने पर और कन्फ़्यूज्ड हूं कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ. मैं उसे पहचान क्यों नहीं पाई.”

“चलचल, उस के बारे में ज्यादा सोच मत और औफिस के काम में मन लगा. आई एम श्योर, वक़्त के साथ तू उसे भूलने लगेगी.”

लंचब्रेक के ख़त्म होने के थोड़ी देर बाद मैं उस के पास गई तो देखा, वह अपना काम छोड़ पनीली आंखों से शून्य में ताक रही थी.

“पाखी, डियर, अगर काम में मन न लग रहा हो तो घर जा और रैस्ट कर. तू मुझे ठीक नहीं लग रही.”

शाम को औफिस के बाद मैं उस के फ्लैट पहुंची. मैं ने देखा कि वह बेतहाशा रो रही थी और उस ने रोरो कर आंखें सुजा ली थीं.

उस का यह हाल देख मैं घबरा गई और उसे अपनी एक सहेली की मनोचिकित्सक मां डाक्टर सीमा शर्मा, फाउंडर, यंग इंडिया सायकोलौजिकल सौल्यूशंस के घर ले गई. डाक्टर सीमा ने ब्रेकअप को सक्षमता से हैंडल करने के लिए उसे जो टिप्स दिए उन्हें मैं आप सब के साथ साझा कर रही हूं.

अपना सैल्फकेयर रूटीन बनाएं और उस को फौलो करें: ब्रेकअप के बाद रोजाना कुछ ऐसी गतिविधि करें जो आप को खुशी दे, जैसे कि अपने फ्रैंड्स से मिलनाजुलना, नए खुशनुमा अनुभव लेना जैसे पिकनिक, सिनेमा जाना, दोस्तों के साथ होटल या पार्टी में जाना, अपनी पसंदीदा हौबी में समय बिताना. अपने को शारीरिक अथवा मानसिक पोषण देने वाली गतिविधियां करें, जैसे ऐक्सरसाइज़ करें, कुछ देर मैडिटेशन करें या यदि आप को कुकिंग पसंद हो तो कुछ नया और स्वादिष्ठ पकाएं.

अपनी डायरी में ब्रेकअप के बाद महसूस की गई अपनी फीलिंग्स व्यक्त करें अथवा किसी घनिष्ठ परिचित से उन्हें शेयर करें. किसी मनोचिकित्सक से अपनी भावनाएं साझा करना व उन की सलाह लेना भी ब्रेकअप से उबरने का कारगर उपाय है.

ब्रेकअप के बाद समुचित आराम करना चाहिए. करीब सात से आठ घंटों की नींद लेने का प्रयास करें. लेकिन इस से अधिक सोने से बचें क्योंकि नींद में कमी या ओवरस्लीपिंग आप के मूड को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती है.

इस स्थिति में समुचित पोषणयुक्त भोजन करना न भूलें.

अपनी भावनाओं को व्यक्त करें: आप ब्रेकअप के बाद अकेलापन, कन्फ़्यूजन, उदासी, दुख, और क्रोध जैसे स्ट्रौंग इमोशन्स का अनुभव कर सकती हैं. सो, इन्हें सहज और सामान्य भाव से स्वीकार करें. इन्हें अपनी डायरी में लिखें या किसी दोस्त से शेयर करें.

अपनी भावनाओं को खुल कर व्यक्त करें लेकिन उन में डूबे न रहें. नैगेटिव इमोशन्स और विचारों के अंतहीन दुष्चक्र में उलझने से बचें.
गौर करें, अपने ब्रेकअप के बारे निरंतर सोचते रहना आप के दुख और उदासी की अवधि में इजाफा कर सकता है.

यदि आप अपने एक्सप्रेमी को नहीं भूल पा रहीं, तो घर की डीप क्लीनिंग में जुट जाएं, अपना पसंदीदा संगीत सुनें, दोस्तों से मिलेंजुलें या उन से बातें करें.

यदि आप अपने एक्स को याद कर बेहद इमोशनल फील कर रही हैं तो टीवी पर कौमेडी शोज या प्रेरक कार्यक्रम देखें. हलकेफुलके, सुखद अंत वाला रोमांटिक साहित्य पढ़ें. यह आप का अपनी हालत से ध्यान हटाने में बहुत सहायता करेगा.

सोशल मीडिया से कुछ दिनों के लिए हर संभव दूरी बनाएं: सोशल मीडिया, जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम पर बारबार जाने से आप अपने एक्स के फोटो देख कर उसे याद करेंगी जो आप को उसे भूलने नहीं देगा. वहां अपने परिचित जोड़ों की हंसतीमुसकराती फ़ोटोज़ आप का मूड खराब कर सकती हैं.

सोशल मीडिया पर अपने ब्रेकअप को कतई पोस्ट न करें: ऐसा करना आप को लोगों के निरर्थक सवालों से बचाएगा.

सोशल मीडिया पर अपने एक्स को अन-फौलो या म्यूट कर दें: यदि आप के एक्स से ब्रेकअप के बाद भी परस्पर संबंध में बहुत अधिक कड़वाहट नहीं घुली, आप उसे अब भी अपना दोस्त मानती हैं तो उसे अनफ्रैंड करने की आवश्यकता नहीं. उसे बस म्यूट, अनफौलो या हाइड करने से आप उस की पोस्ट देखने से बच जाएंगी.

अपने एक्स का सोशल मीडिया पेज चैक करने से बचें: ब्रेकअप के बाद आप को उस की मनोदशा का पता लगाने के लिए उस के फोटो या स्टेटस देखने की इच्छा हो सकती है कि उस का हाल कैसा है लेकिन यह बिलकुल न करें क्योंकि यह मात्र आप के दुख में बढ़ोतरी करेगा.

उस के उपहारों को किसी अलमारी में ताले में रख दें: उस के गिफ्ट्स, आप के साथ खींचे गए फोटोज़ को अपने सामने से हटा देने से आप को अपने टूटे रिश्ते की याद नहीं आएगी जोकि आप को दुखी करने के अलावा और कुछ नहीं करेंगे.

भाषा की मर्यादा लांघ चुके भाजपा नेताओं पर कार्रवाई कब

लोकसभा चुनाव में मुंह की खाने के बाद से भारतीय जनता पार्टी बौखलाई हुई है. उस के नेता लगातार राहुल गांधी पर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं. कोई मुंह से भले न कहे, भीतर से तो सभी जान रहे हैं कि भाजपा और मोदी के तिलिस्म को राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ ने तोड़ दिया है. रहीसही कसर इंडिया गठबंधन ने पूरी कर दी है और 400 पार का नारा देने वालों को 240 पर समेट दिया है.

उधर उत्तर प्रदेश के फायरब्रैंड भाजपाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बुलडोजर न्याय पर सुप्रीम कोर्ट ने हथौड़ा चला दिया है. योगी आदित्यनाथ समाज का ध्रुवीकरण करने की नीयत से मुसलिम समाज को डराने व हिंदू समाज को खुश करने के लिए प्रदेशभर में मुसलिम घरों, दुकानों को बुलडोजर से ढहा रहे थे. तुर्रा यह दिया जा रहा था कि जिन घरों और दुकानों पर बुलडोजर चलाए जा रहे हैं वो अवैध रूप से बने थे. कोई पूछे कि जब बन रहे थे तब इन के निकम्मे प्रशासन ने क्यों नहीं रोका? तब कैसे बन गईं इतनी अवैध संपत्तियां?

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो योगी की बुलडोजर नीति की लंबे समय से आलोचना करते आ रहे हैं. इधर जब से भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से राहुल गांधी पर आक्रामक टिप्पणी करने की मौन स्वीकृति भाजपा नेताओं को मिली है तभी से अखिलेश यादव के खिलाफ भी भाजपा नेता ही नहीं, योगी आदित्यनाथ तक भाषाई मर्यादा लांघ कर निंदनीय बयानबाजी कर रहे हैं. दरअसल, राहुल और अखिलेश की जोड़ी से भाजपा थर्रा रही है, इसीलिए इन दोनों पर पिली हुई है. बात आरोपप्रत्यारोप की होती तो सहन की जा सकती थी मगर जिस तरह की बातें अब सामने आ रही हैं वे नेताओं की बयानबाजी नहीं बल्कि जान से मारने की धमकियां है, जिन के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए और आरोपियों की गिरफ्तारी होनी चाहिए.

भाजपा के रेल राज्यमंत्री रवनीत सिंह बिट्‌टू ने 15 सितंबर को राहुल गांधी को आतंकवादी कहा. उन्होंने राहुल गांधी की नागरिकता को भी ख़ारिज करने की कोशिश की, कहा कि, राहुल गांधी हिंदुस्तानी नहीं हैं. उन को भारत से प्यार भी नहीं है. राहुल ने पहले मुसलमानों का इस्तेमाल करने की कोशिश की, लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो वे अब सिखों को बांटने की कोशिश कर रहे हैं. राहुल गांधी देश के नंबर वन टेररिस्ट हैं. उन को पकड़ने वाले को ईनाम दिया जाना चाहिए, क्योंकि वे देश के सब से बड़े दुश्मन हैं. देश की एजेंसियों को उन पर नजर रखनी चाहिए.

भाजपा नेता और यूपी के मंत्री रघुराज सिंह ने भी 16 सितंबर को इंदौर में सार्वजनिक तौर पर कहा था कि नेताप्रतिपक्ष राहुल गांधी ‘भारत के नंबर वन आतंकवादी’ हैं.

दरअसल, हाल ही में राहुल गांधी अमेरिकी यात्रा पर थे जहां उन्होंने भारतीय मूल के लोगों से मुलाक़ात की और मंच से उन को संबोधित करते हुए देश के बारे में अपनी चिंता जाहिर की. राहुल गांधी ने अमेरिका में कहा कि भारत में सिख समुदाय के बीच इस बात की चिंता है कि उन्हें पगड़ी और कड़ा पहनने की इजाजत दी जाएगी या नहीं. उन के इस वक्तव्य पर भाजपा नेताओं ने राहुल को घेरना और उन पर आरोप मढ़ना शुरू कर दिया. मगर देश के नेताप्रतिपक्ष को आतंकवादी कहना न सिर्फ निंदनीय है बल्कि एक संगीन जुर्म है. एक ऐसा नेता जिस की दादी और पिता देश के प्रधानमंत्री रहे, जिन्होंने देश के लिए शहादत दी, जो खुद देश की सब से बड़ी पार्टी का नेतृत्व करता रहा हो, जिस के कदम से कदम मिला कर देश की जनता आज चलती हो, जिस को सुनने के लिए अपार जनसैलाब उमड़ता हो, ऐसे व्यक्तित्व को भाजपा का एक ऐसा नेता ‘आतंकवादी कह रहा है जिस ने कभी खुद कांग्रेस की गोद में बैठ कर राजनीति का ककहरा सीखा था.

रवनीत सिंह बिट्‌टू के बयान पर कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने उन की बखिया उधेड़ते हुए कहा- जिस ने राहुल गांधी के आगेपीछे घूम कर अपना राजनीतिक कैरियर बनाया, वो सत्ता के लालच में विरोधियों की गोदी में बैठ कर सस्ते बयान दे रहा है. रवनीत बिट्टू जैसों को ही शास्त्रों में आस्तीन का सांप कहा गया है.

राजनीति में नेताओं के बीच आरोपप्रत्यारोप चलते रहते हैं. वे एकदूसरे पर कटाक्ष भी करते हैं जो अखबारों की सुर्खियां बनते हैं मगर आज जिस प्रकार की बातें नेताओं की गंदी जबान उगल रही हैं वे महज बयानबाजी या कटाक्ष या भाषा की मर्यादा लांघने जैसी नहीं हैं बल्कि नेताप्रतिपक्ष को जान की धमकी और मानहानि का मामला है जिस के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए.

गत 16 सितंबर को महाराष्ट्र के बुलढाणा से विधायक संजय गायकवाड़ ने राहुल गांधी की जीभ काट कर लाने वाले को 11 लाख रुपए का ईनाम देने की घोषणा कर डाली. संजय गायकवाड़ ने कहा- राहुल गांधी पिछड़ों, आदिवासियों का आरक्षण खत्म करना चाहते हैं. उन्हें इस का ईनाम मिलेगा, जो भी राहुल की जीभ काटेगा, उसे 11 लाख रुपए दिए जाएंगे.

गौरतलब है कि एक सभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा था कि जब भारत में (आरक्षण के लिहाज से) निष्पक्षता होगी, तब हम आरक्षण खत्म करने के बारे में सोचेंगे. अभी भारत इस के लिए एक निष्पक्ष जगह नहीं है. उन के कहने का सीधा अर्थ था कि जिस दिन भारत के सभी लोगों को समान अधिकार प्राप्त हो जाएगा, वे आरक्षण को ख़त्म करने की बात तब सोचेंगे.

इस में उन्होंने क्या गलत कहा? मगर अपने केंद्रीय आका को खुश करने के लिए कमअक्ल, बददिमाग और बदजबान भाजपा नेता सदन के नेताप्रतिपक्ष को जान की धमकी खुलेआम देने लगे और मोदी-शाह व उन की पुलिस गायकवाड़ जैसे नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय तमाशा देखती रही.

याद होगा 13 अप्रैल, 2019 को, आम चुनाव से पहले भारत के कर्नाटक के कोलार में एक राजनीतिक रैली के दौरान राहुल गांधी ने हिंदी में टिप्पणी करते हुए कहा था, “सभी चोर, चाहे वह नीरव मोदी, ललित मोदी या नरेंद्र मोदी हों, उन के नाम में मोदी क्यों होता है?” इस टिप्पणी पर उन के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज हुआ था और उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उपनाम को बदनाम करने के आरोप में 2 साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी. इस के चलते राहुल गांधी को 24 मार्च, 2023 को भारतीय संसद के निचले सदन (लोकसभा) के सदस्य के रूप में अयोग्य घोषित कर दिया गया था. मगर अब जबकि संजय गायकवाड़ राहुल गांधी की जीभ काटने की धमकी दे रहे हैं और रवनीत सिंह बिट्‌टू और रघुराज सिंह उन को आतंकवादी घोषित कर रहे हैं, तो इन के खिलाफ पुलिस का कोई ऐक्शन न होना और इन्हें गिरफ्तार न किया जाना देश की न्याय प्रणाली को कठघरे में खड़ा करता है.

धमकियों का सिलसिला इन्हीं 3 नेताओं तक सीमित नहीं है. सदन के भीतर बातबात पर बेतुकी कविताएं सुनाने वाले रामदास अठावले भी बदजबानी में आगे हैं. अठावले कहते हैं- राहुल गांधी विदेश में जा कर देश की प्रतिष्ठा को गिराते हैं, उन का पासपोर्ट रद्द होना चाहिए. वहीं भाजपा सांसद अनिल बोंडे भी राहुल की जीभ काट लेने का मशवरा देते हैं. भाजपा नेता तरविंदर सिंह ने तो अपनी सड़कछाप भाषा का परिचय दिया, एक्स पर लिखा- राहुल गांधी बाज आ जा, नहीं तो आने वाले टाइम में तेरा भी वही हाल होगा, जो तेरी दादी का हुआ.

यानी, भाजपा नेता खुलेआम देश के नेताप्रतिपक्ष को हत्या की धमकी दे रहा है. यह बेहद गंभीर मामला है. ये सभी भाजपा की नफरत की फैक्ट्री के प्रोडक्ट हैं और इन पर कठोर से कठोर कार्रवाई इसलिए होनी चाहिए क्योंकि ये देश के युवाओं को हत्या और मारकाट के लिए उकसा रहे हैं. देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री अगर इन धमकियों पर खामोशी ओढ़े हुए हैं तो माना जाना चाहिए कि उन की मौन स्वीकृति भाजपा नेताओं को मिली हुई है. इन के पाप और अपराध में वे बराबर के शरीक हैं.

नेता की भाषा उस के राजनीतिक स्तर को मापने का एक पैमाना होती है. इस में नेता का स्तर रिफ्लैक्ट होता है. अगर भाजपा नेता ऐसी आपराधिक बातें कह रहे हैं तो देश की जनता को समझ लेना चाहिए कि देश अगर ऐसे लोगों के हाथों में रहा तो आने वाले वक्त में चारों तरफ अपराध और अराजकता का बोलबाला होगा.

राहुल गांधी पर भाजपा द्वारा लगाए गए आरोप और उन को दी जा रही धमकियां केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं हैं बल्कि भारतीय लोकतंत्र, राजनीति और समाज के मूल्यों पर भी हमला हैं. जनता को यह समझना होगा कि यह राजनीति का गिरता स्तर है और इसे सुधारने की जिम्मेदारी जनता पर ही है.

भारतीय राजनीति में विचारधारा, मूल्यों और सिद्धांतों का अपना विशेष महत्त्व है. यह न केवल देश के विकास और स्थायित्व के लिए आवश्यक है बल्कि यह जन के प्रति राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी का भी प्रमाण होता है. लेकिन जब राजनीति में व्यक्तिगत हमले, अनर्गल आरोप और मिथ्या प्रचार का सिलसिला शुरू हो जाता है, तो यह राजनीति के गिरते स्तर को ही दर्शाता है.

भारतीय जनता पार्टी जिस तौरतरीके की राजनीति करना चाह रही है, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए अस्वीकार्य है. यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि स्तर की इस गिरावट पर प्रधानमंत्री की चुप्पी वाचाल वर्ग को प्रोत्साहन दे रही है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में नेताप्रतिपक्ष राहुल गांधी पर भाजपा द्वारा लगाए गए अनर्गल आरोप इसी विकृत मानसिकता का परिचायक हैं. भाजपा का बारबार राहुल गांधी के खिलाफ इस प्रकार के आरोप लगाना उस के राजनीतिक भय का भी बड़ा प्रमाण है. चूंकि राहुल गांधी देशहित में सरकार से लगातार सवाल पूछते हैं, गांव, गरीब, मजदूर और किसान की आवाज उठाते हैं, महिला उत्पीड़न के मामलों को राष्ट्रीय मुद्दा बनाते हैं, इसलिए प्रधानमंत्री के संरक्षण और प्रोत्साहन से केंद्र सरकार के मंत्री से ले कर अलगअलग राज्यों के विधायक तक गैरजरूरी व अनर्गल आरोप लगाते रहते हैं.

राहुल गांधी पर लगाए जाने वाले आरोप और भाजपा द्वारा अपनाई जा रही यह रणनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है. प्रजातंत्र की मौलिक परिभाषा में यह एक स्थापित तथ्य और सत्य है कि स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष का स्थान और सम्मान महत्त्वपूर्ण होता है. विपक्ष सरकार की नीतियों की आलोचना करता है और जनता की आवाज उठाता है. लेकिन जब विपक्ष के शीर्ष नेतृत्व पर नितांत निराधार व्यक्तिगत हमले होते हैं, तो यह सदन की गरिमा और गंभीरता के साथ लोकतंत्र की नींव को भी कमजोर करता है. राहुल गांधी पर लगाए गए आरोप अल्पजीवी चर्चा तो बटोर लेते हैं लेकिन लोकतांत्रिक प्रणाली के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर कर देते हैं. इस से जनता के बीच यह संदेश जाता है कि राजनीति में विचारधारा और सिद्धांतों के बजाय व्यक्तिगत हमले ही प्रमुख हो गए हैं.

भाजपा अपनी नफरत से भरी वैचारिक विचारधारा और बांटने की राजनीतिक भावना को बढ़ावा देती है जबकि कांग्रेस एक धर्मनिरपेक्ष और समावेशी समाज की वकालत करती है. इस वैचारिक संघर्ष में बारबार हारने के बावजूद भाजपा राहुल गांधी को केवल इसलिए निशाना बनाती है क्योंकि वह कांग्रेस की विचारधारा के आगे आज भी खुद को बौना पाती है, परास्त होती है और बौखला कर बेशर्मी व अपराध की राह पकड़ती है.

मेरी मां अकसर चुपके से मेरी बीवी का मोबाइल फोन चैक करती है.

अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..

सवाल –

मेरी शादी को 1 साल हुआ है और मेरे घर में मैं, मेरी पत्नी और मेरे मातापिता रहते हैं. हम चारों में काफी प्यार है और किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं रहती. मेरी पत्नी भी मेरे मातापिता का खूब अच्छे से खयाल रखती है. मैं ज्यादातर समय अपने काम पर ही रहता हूं और कभीकभी अपने काम के सिलसिले में मुझे शहर से बाहर भी जाना पड़ता है पर मैं इस बात से निश्चिंत हूं कि मेरी बीवी ने मेरा घर अच्छे से संभाल लिया है और वह अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभाती है. पिछले कुछ दिनों से मेरी बीवी ने मुझ से एक ऐसी शिकायत की जिसे सुन कर मुझे उस पर विश्वास नहीं हुआ. मेरी पत्नी को लगता था कि मेरी मां उस से छिप कर उस का मोबाइल फोन चैक करती हैं. पहले तो मुझे यकीन नहीं हुआ लेकिन मैं काफी हैरान हुआ जब मैं ने अपनी मां को खुद मेरी बीवी का फोन चैक करते हुए देखा. मुझे नहीं पता वे ऐसा क्यों कर रही हैं. मुझे क्या करना चाहिए ?

जवाब –

जैसाकि आप ने बताया कि आप ज्यादातर अपने काम पर ही रहते हैं, तो ऐसे में आप के मातापिता के सब से नजदीक आप की पत्नी ही रहती है. हो सकता है कि आप की मां ने कुछ ऐसा देखा हो या फिर उन्हें कुछ एहसास हुआ हो जो वे ऐसा कर रही हैं. या फिर यह भी हो सकता है आप की माताजी आप की पत्नी के मोबाइल से कुछ सीखने की कोशिश भी कर रही हों.

आप को बिना सारी बात जाने किसी से कोई बात नहीं करनी चाहिए. यहां तक की आप अपनी पत्नी को भी न बताएं कि आप ने भी अपनी मां को उन का फोन चैक करते देखा है. आप अपनी पत्नी से ऐसा कहें कि हो सकता है कि यह सब उन का वहम हो.

अपनी मां के साथ अकेले में बैठें और उन से पूछें कि वे यह सब क्यों कर रही हैं. आखिर उनके मन में ऐसा क्या चल रहा है जो वे अपनी बहू का फोन चैक करने लगी हैं. यह भी जानने की कोशिश करें कि कहीं वे मोबाइल पर कुछ जानने की कोशिश तो नहीं करतीं.

बात जो भी हो, वे यकीनन आप को सारी सचाई जरूर बताएंगी. ऐसे में आप को शांत दिमाग से काम लेना होगा.

अपनी मां की बात सुन कर पहले सारी सचाई का अपनी तरफ से पता लगा लें उस के बाद ही किसी से कुछ कहें क्योंकि रिश्तों की डोर काफी नाजुक होती है तो इसे संभाल कर चलना पङता है.

मां और पत्नी दोनों का साथ दे कर एकदूसरे के मन के वहम को दूर करना आप की जिम्मेदारी है.

अलबत्ता, मां को आप की बहू का फोन पसंद है, तो एक अपनी मां को भी ला कर दे दें. दूसरा, अगर वे पढ़ीलिखी हैं तो उन्हें पत्रपत्रिकाएं व अच्छा साहित्य भी पढ़ने को दे सकते हैं. इस से वे मोबाइल से दूर रहेंगी और बुजुर्ग अवस्था में उन का मन भी लगा रहेगा.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें.

महाराष्ट्र : शक्की पति को पत्नी के चरित्र पर था शक, चाकू घोंप कर बेरहमी से मार डाला

महाराष्ट्र के पालघर जिले में एक 34 वर्षीय भारती नामक महिला की हत्या खुद उस के पति ने ही कर दी। उस ने चाकू से गोदगोद कर पत्नी की हत्या कर दी. इस घटना से पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई. आरोपी की पहचान 37 वर्षीय गोपाल राठौड़ के रूप में की गई है.

पड़ोसियों की मानें तो दोनों पतिपत्नी के बीच काफी समय से किसी न किसी बात को ले कर विवाद चल रहा था.

आरोपी गोपाल राठौड़ को शराब पीने की भी लत थी और इसी के चलते बीते दिनों उस ने फुलपाड़ा इलाके में स्थित अपने घर खूब शराब पी कर आया और किसी बात पर उस में और उस की पत्नी में झगड़ा होने लगा। झगड़े के बीच उस ने बिना सोचेसमझे सुबह के साढ़े 4 बजे चाकू उठा कर अपनी पत्नी भारती के सीने में घोंप कर उस की हत्या कर दी.

खबर मिलते ही पुलिस की एक टीम घटनास्थल पहुंची और महिला के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

बताया जा रहा है कि आरोपी को अपनी पत्नी के चरित्र को ले कर शक था जिस के चलते दोनों में अकसर लड़ाइयां हुआ करती थीं.

पुलिस की तारीफ करनी चाहिए जिन्होंने सीसीटीवी फुटेज और अपने नैटवर्क का इस्तेमाल कर केवल 6 घंटे में इस केस को सौल्व कर आरोपी गोपाल राठौड़ को हिरासत में ले लिया.

पुलिस ने गोपाल राठौड़ को कोपर स्टेशन से गिरफ्तार किया जिस समय वह कर्नाटक भागने की कोशिश कर रहा था.

पतिपत्नी का रिश्ता आपसी भरोसे और विश्वास पर कायम रहता है, जिसे दोनों को ही निभाना चाहिए. मगर शराबी पति ने न सिर्फ नशे में अपनी पत्नी की हत्या कर दी, रिश्ते को भी कलंकित कर दिया.

कानून को हाथ में लेने वाले लोग अक्सर यह सोचते हैं कि वह पुलिस को चकमा दे कर बच जाएगा. मगर कानून के हाथ लंबे होते हैं और अपराधी कितना भी शातिर हो, एक न एक दिन जरूर पकड़ा जाता है.

अब वह सनकी पति पूरी उम्र जेल में बिताएगा और पलपल खुद को कोसता रहेगा कि ऐसी बङी गलती उसे नहीं करनी चाहिए थी.

शादी से पहले अपना आशियाना बना लें और खुशियों का दरवाजा खोलें

करन और काशवी की शादी को 6 महीने भी नहीं हुए हैं कि दोनों का रिश्ता टूटने की कगार पर है. काशवी और उस की सास में रोज किसी न किसी बात पर कलह होती है. काशवी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती है कि करन के पेरैंट्स के साथ उस का रिश्ता अच्छा रहे और घर में सब मिलजुल कर रहें, लेकिन उस की लाख कोशिशों के बाद भी ऐसा नहीं हो पा रहा. करन अपनी वाइफ और पेरैंट्स के बीच सैंडविच बना हुआ है. अब स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि काशवी और करन ने अलग रहने का फैसला किया है. शादी के शुरुआती दिनों में अधिकतर परिवारों की यही कहानी होती है.

पेरैंट्स भी खुश और बच्चे भी खुश

आजकल विवाह के बाद कपल्स का लड़के के पैरैंट्स के घर को छोड़ अलग से रहना आम बात होती जा रही है. अगर लड़केलड़की दोनों जौब करते हैं और पेरैंट्स शारीरिक व आर्थिक रूप से स्वस्थ और संपन्न हैं तो अलग रहने में ही भलाई है.

इस का एक फायदा यह भी है कि वह घर जो दोनों ने अपनी कमाई से खरीदा है दोनों का बराबर होगा और एकदूसरे को कोई इमोशनल ब्लैकमेल नहीं कर सकता कि यह मेरा घर है.

समय तेजी से बदल रहा है, अब भारतीय युवा भी पारिवारिक रजामंदी से अपने पेरैंट्स से अलग रहने लगे हैं. पेरैंट्स को भी अब बच्चों को अपने से अलग रहने में कोई समस्या नहीं दिखाई देती क्योंकि साथ रह कर रोज की किचकिच से थोड़ा दूर रह कर प्यार बना रहना उन्हें सही फैसला लगता है. शहरों में पढ़ेलिखे परिवारों में जहां बच्चे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, अपना अलग घर बसाने लगे हैं या फिर पेरैंट्स खुद अपने बच्चों को अपनी ही सोसाइटी या आसपास ही अलग घर दिला देते हैं, ताकि बच्चे और वे भी बिना किसी मनमुटाव के अपनी मनमरजी से रह सकें और दूर रह कर भी आपसी प्यार बना रहे.

आप सब ने स्टार वन चैनल पर दिखाया जाने वाला हिंदी हास्य धारावाहिक ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ जरूर देखा होगा. इस धारावाहिक में बेटाबहू यानी डा. साहिल साराभाई और मनीषा ‘मोनिशा’ सिंह साराभाई, ससुर इंद्रवदन साराभाई और सास माया मजूमदार साराभाई के सामने वाले फ्लैट में रहते हैं और दोनों अलगअलग रहते हुए भी साथ रहते हैं और इन के बीच की मीठी नोकझोंक सब का खूब मनोरंजन करती थी.

अपने पैरेंट्स से अलग अपने आशियाने में रहने वाले बौलीवुड सितारे

बौलीवुड में आप को कई ऐसे स्टार्स मिल जाएंगे जिन्होंने शादी से पहले ही अपना नया घर बना लिया और शादी करते ही अपने नए आशियाने में अपने पार्टनर के साथ शिफ्ट हो गए. बौलीवुड के उन मैरिड कपल्स में रणवीर सिंह-दीपिका पादुकोण, सिद्धार्थ मल्होत्रा-कियारा आडवाणी, कैटरीना कैफ-विक्की कौशल से ले कर रणबीर कपूर-आलिया भट्ट के अलावा और भी कई स्टार्स शामिल हैं.
वरुण धवन ने भी अपनी गर्लफ्रेंड नताशा दलाल से शादी करने के बाद अपने पिता डेविड धवन का घर छोड़ दिया था. सोनम कपूर भी शादी के बाद अपने बिजनैसमैन पति आनंद आहूजा के साथ उन के अपने घर में लंदन शिफ्ट हो गई थीं.

पेरैंट्स भी खुश और बच्चे भी खुश. लेकिन ऐसा बहुत कम है. अधिकतर मामलों में तो पारिवारिक अनबन, निजता, आजादी, घर के खर्चे और सामाजिकता आदि मुद्दे ही आधार होते हैं.

मजबूरी में नहीं हंसीखुशी लें अलग रहने का फैसला

पेरैंट्स से अलग रहने का फैसला कहीं हंसीखुशी से होता है तो कहीं मजबूरीवश. जहां यह फैसला हंसीखुशी से होता है वहां इस के कई फायदे हैं और जहां मजबूरीवश होता है वहां कई तरह के नुकसान.

एकदो कमरे का फ्लैट और उस में शादी के बाद सासससुर के साथ रहना अपने लिए स्पेस तलाशना, मनचाहे कपड़े पहनना, दोस्तों का आनाजाना आसान नहीं होता. कई तरह की बंदिशें और औपचारिकताएं निभानी पड़ती हैं. उस पर पेरैंट्स के नियमकायदे रिश्तों में मनमुटाव का कारण बन जाते हैं, इसलिए हंसीखुशी अलग रहें.

वर्किंग बहू की परेशानियां

परिवार के अपने रिवाज और परंपराएं होती हैं, ऐसे में कई बार बहुओं को इन के मुताबिक ढलने में परेशानी आती है. उदाहरण के लिए, अगर किसी घर में यह रिवाज हो कि सुबह के नाश्ते से ले कर दिन का खाना बहुएं ही बनाती हों, तो उन महिलाओं को दिक्कत आ सकती है जिन्हें सुबह औफिस जाना होता है. इसी तरह कुछ परिवारों में लड़कियों के लिए एक कर्फ्यू टाइम तय होता है. इस स्थिति में भी बहू अगर औफिस से लेट आए तो उसे सासससुर से सुनने को मिल सकता है. महिला के लिए जब इन स्थितियों में एडजस्ट करना मुश्किल हो जाता है तो वह अलग होना ही बेहतर समझती है.

हंसतेमुसकराते बनाएं स्पेस

हंसतेमुसकराते अपने और उन के लिए भी स्पेस बना कर जिस की उन को भी जरूरत है, खुशियों को इन्वाइट किया जा सकता है. शादी के बाद पेरैंट्स से अलग रहने का मतलब उन के प्रति लगाव कम होना नहीं होता. दूर रह कर भी पारिवारिक रिश्ते मजबूत बने रह सकते हैं.

फोनकौल, वीडियो चैट, त्योहारों, घर के कार्यक्रमों में शामिल हो कर रिश्तों में मजबूती और प्यार बनाए रखा जा सकता है. साथ रह कर एकदूसरे को दुख देने से बेहतर है थोड़ा दूर रह कर एकदूसरे की खुशियों को बढ़ाने में सहयोग किया जाए. नई पीढ़ी दूर रह कर भी पेरैंट्स के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को ले कर सजग रह सकती है. पेरैंट्स को भी यह समझना जरूरी है कि बदलते समय के साथ नई पीढ़ी का अपना घर चलाने का तरीका और लाइफस्टाइल बदल चुका है. इस नजरिए से दोनों दूर रह कर भी एक परिवार की तरह रह पाएंगे.

आज के युवाओं के लिए प्राइवेसी और पर्सनल फ्रीडम बहुत माने रखते हैं और वे अपना जीवन अपने हिसाब से जीना चाहते हैं जिस के वे काबिल भी हैं.

शादी के बाद परिवार से अलग रहने के फायदे

पेरैंट्स के साथ रहने से मैरिड कपल को प्राइवेसी नहीं मिल पाती है. इस के अलावा जब नए शादीशीदा कपल पेरैंट्स से अलग रहते हैं तो लड़का अपनी वाइफ की घर के कामों में मदद कर पाता है, दोनों को एकदूसरे को समझने का मौका मिल पाता है, दोनों एकदूसरे के साथ क्वालिटी टाइम स्पैंड कर पाते हैं, कैरियर पर फोकस कर पाते हैं. इसलिए लड़का हो या लड़की, आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते ही, शादी से पहले ही, पेरैंट्स से अलग अपना आशियाने का इंतजाम करना बेहतर होता है. क्योंकि 2 पीढ़ियों की सोच, जिंदगी, खानपान, जीवनशैली आदि में बहुत फर्क होता है.

साथ में घर के काम करने से बढ़ता है प्यार

शादी के बाद जब अपने घर में अलग रहते हुए नए शादीशुदा कपल साथ में घर का काम करते हैं, जैसे साथ खाना बनाते हैं या फिर घर का कोई अन्य कार्य करते हैं तो उन का रिश्ता मजबूत बनता है, उन के बीच की बौन्डिंग मजबूत होती है और साथ काम करने से भेदभाव भी खत्म होता है. लेकिन जब आप पेरैंट्स के घर में रहते हैं तो घर के काम की सारी जिम्मेदारी नई बहू को दे दी जाती है और इस से जैंडर भेदभाव को बढ़ावा मिलता है.

एकदूसरे को समझने का मौका

जौइंट फैमिली में शादी के शुरुआती दिनों में पतिपत्नी को एकदूसरे को समझने का पर्याप्त मौका नहीं मिल पाता है जबकि पेरैंट्स से दूर रह कर पतिपत्नी एकदूसरे को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ पाते हैं. परिवार के सभी सदस्यों को यह समझना चाहिए कि पतिपत्नी को बहुत लंबा जीवन जीना है, इसलिए उन्हें एकदूसरे को समझना बहुत जरूरी है. अकेले रहते हुए वे एकदूसरे की अच्छी और बुरी आदतों को समझते हुए दोनों एकदूसरे में रम जाते हैं और उस के बाद जीवन की असली खूबसूरती निखर कर आती है. जब कपल अकेले रहते हैं तो वे अपने व्यक्तित्व को ज्यादा बेहतर तरीके से निखार पाते हैं. उन्हें एकदूसरे को समझने का मौका मिलता है और उन्हें मिल कर जीवन के उतारचढ़ावों से जूझना आता है.

पति के साथ प्राइवेट मोमैंट मिलने का मौका चाहे लव मैरिज हो या फिर अरेंज्ड, हर कपल शादी के बाद एकदूसरे के साथ समय बिताना चाहता है लेकिन जब कपल शादी के बाद पेरैंट्स के साथ रहने का फैसला करता है तो नए नए पतिपत्नी बने कपल पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने में ही इतना बिजी हो जाते हैं कि उन्हें आपस में क्वालिटी टाइम स्पैंड करने का मौका ही नहीं मिलता. नईनवेली दुलहन के लिए यह स्थिति बहुत चैलेंजिंग होती है क्योंकि जिस के लिए वह परिवार में आती है उसी के साथ उसे समय बिताने का मौका नहीं मिल पाता जो उसे फ्रस्ट्रेट करता है और उन के बीच प्यार के बजाय झगड़े शुरू हो जाते हैं. ऐसी स्थिति नए कपल का अलग घर में शिफ्ट होना उन्हें साथ में समय बिताने का मौका देता है.

मैंटल स्ट्रैस से बचाव और रिश्तों में मिठास

बहुत सारे मामलों में नइ बहू के लिए सासससुर या ससुराल के किसी अन्य मैंबर से रोजरोज की तूतू मैंमैं, पति के साथ प्राइवेट मोमैंट का न मिलना जबरदस्त मैंटल स्ट्रेस का कारण बनते हैं और शादी को ले कर बुने सारे सपने हवा हो जाते हैं और झगड़े बढ़ने लगते हैं. ऐसे में मानसिक शांति और रिश्तों में मिठास के लिए पेरैंट्स से अलग रहना सही फैसला साबित होता है.

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