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New Trend : ग्रूमिंग के बाद भी लड़के क्यों लगते हैं झल्ले

New Trend : लड़कों में भी स्मार्ट दिखने का क्रेज बढ़ रहा है जिस के लिए वह सैलून, जिम ही नहीं ट्रीटमेंट के लिए डाक्टरों के पास भी जाने लगे हैं. बावजूद इस के वे लगते हैं झल्ले ही.

जहां सुदंर लड़कियों की चाहत लड़कों को होती है हीं सुदंर लड़कियों को स्मार्ट लड़के पंसद आते है. लड़कियों की पंसद बन सके इसके लिए लड़के जवान होते ही खुद को फिट करने में जुट जाते हैं. इस के लिए वह अच्छे कपड़े पहनते हैं. बौडी को फिट रखते हैं. अब हैल्थ और ब्यूटी सैक्टर लड़कों को सामने रख कर तैयार होने लगा है. पहले लड़कों के सैलून में केवल हेयर कट और शेविंग ही होती थी. अब यह सैलून तो बदल ही रहे हैं लड़कियों के ही सैलून में लड़कों का सैलून खुलने लगा है. जिस को यूनिसैक्स सैलून कहते हैं.

यूनीसैक्स सैलून पहले बड़े शहरों में ही होते थे. अब छोटेबड़े शहरों में भी यह खुल गए हैं. लड़केलड़कियों को एक ही सैलून में सर्विस लेने में कोई दिक्कत नहीं होती है. यहां लड़के हेयर कट, हेयर कलर, फेशियल और फेस और हेड मसाज जैसी तमाम सर्विस लेने के लिए आते हैं. सैलून के साथ लड़के अब फिटनैस के लिए जिम जाने लगे हैं. इस के अलावा स्किन, हेयर और चेहरे पर दागधब्बे का इलाज कराने स्किन स्पैशलिस्ट डाक्टर के पास भी जाने लगे हैं. इतने सारे प्रयासों के बाद भी लड़के लगते झल्ले ही हैं.

सुंदर दिखने के उपाय

लड़के सुदंर दिखने के लिए कुछ दिन उपाय करते हैं पर इस को नियमित नहीं कर पाते. इस कारण झल्ले ही लगते हैं. लड़कियों की तुलना में लड़कों की त्वचा ज्यादा ओयली और मोटी होती है. ऐसे में उन को भी सीटीएम यानि क्लींजिंग, टोनिंग और मौइस्चराइजिंग का प्रयोग समयसमय पर जरूरत के अनुसार करना चाहिए. लड़कों को धूल और धूप में रहना पड़ता है. धूम्रपान करने वाले लड़कों के सामने यह परेशानी अधिक ही होती है. ऐसे में जरूरत इस बात की होती है कि अच्छे फैशियल क्लीन्जर का उपयोग करें. जो सभी प्रकार की त्वचा पर काम करता हो.

जब भी धूप में निकलना हो सनस्क्रीन का प्रयोग करें. 30 से 50 एसपीएफ वाला सनस्क्रीन लगाना चाहिए. सूरज की किरणें आप की त्वचा के रंग और बनावट को खराब करती हैं. इस के लिए टैनिंग कम करने के लिए इसे अपने चेहरे के साथसाथ हाथों पर भी लगाएं. सुनिश्चित करें कि आप बाहर निकलने से 15 मिनट पहले सनस्क्रीन लगाएं, ताकि यह अच्छे से औब्जर्व हो सके.

लड़कों को अपनी त्वचा साफ और चिकना करने के लिए फेस स्क्रब बेहद जरूरी है. फेस स्क्रब करने से ड्राई स्किन से छुटकारा मिलती है. साथ ही त्वचा कोमल होती है और परिणामस्वरूप चिकनी दाढ़ी उगती है. इसलिए हफ्ते में कम से कम 2 से 3 बार फेस स्क्रब करना जरूरी है. ध्यान रखें स्क्रब करते वक्त हल्के हाथों का प्रयोग करें, नहीं तो इस से आप की स्किन छिल सकती है.

आंखों के आसपास की त्वचा का भी ध्यान रखें. ऐसा न करने से आंखों के नीचे काला घेरा बनने लगता है. यह अंडर-आई डिहाइड्रेशन के कारण होता है. इसे रोकने के लिए हर सुबह और सोने से पहले आंखों के आसपास थोड़ी सी हाइड्रेटिंग आई क्रीम लगाएं. इस के साथ ही साथ अपने होठों पर भी ध्यान देने की जरूरत है. होंठ की स्किन बेहद सौप्ट होती है. इन का सही तरीके से ध्यान नहीं रखा जाए तो होंठ फटने के कारण और खराब दिख सकते हैं. इस के लिए जरूरी है कि अच्छे बाम का इस्तेमाल करें.
मैनीक्योर सिर्फ लड़कियों के लिए नहीं है. लड़कों को भी अपने हाथों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए. नाखून साफ और छोटे रखें. आजकल लड़कों में दाढ़ी रखने का क्रेज है. अगर दाढ़ी चेहरे पर अच्छी लगती है तो उस को रखना बिल्कुल ठीक है. लेकिन सुनिश्चित करें कि इसे साफ रखें. समयसमय पर कटिंग करते रहें. दाढ़ी को धोने के बाद खुशबू वाला तेल भी लगा सकते हैं. सुदंर दिखने के लिए नियमित उपाय करें. केवल शौकिया करने से बहुत खराब लगता है. लड़के केवल सैलून ही नहीं जिम भी जाते हैं.

घर में ही करे एक्सरसाइज

जिम जाने से अच्छा है कि घर पर ही एक्सरसाइज करें. इस में सब से सरल स्किपिंग रोप होती है. यह 150 रुपए से 1500 रुपए तक में मिल जाती है. रस्सी कूदना बेहद आसान और प्रभावी वर्कआउट होता है. एक वेट मशीन रख लें. वेट मशीन का होना बहुत जरूरी है. जिस से अपने वजन में होने वाले बदलावों का रिकौर्ड रख सकें. बाजार में वेट मशीन 800 से 1500 रुपए की कीमत तक में मिल जाती है. स्ट्रैचिंग और शरीर का संतुलन बनाए रखने के लिए रजिस्टेंस बैंड्स का काफी उपयोग किया जाता है. अच्छी ग्रिप वाले हैंडल्स हों. यह बाजार में 1500 से 3000 रुपए तक की कीमत में मिल सकते हैं.

वेट लिफ्टिंग एक्सरसाइज के लिए डंबल्स और बार्बेल्स जरूरी होते हैं. इन का प्रयोग भी कर सकते हैं. यह 150 रुपए से 500 रुपए प्रति किलो वजन के आधार पर मिलते हैं. अपनी जरूरत के अनुसार इन का वजन बढ़ा सकते हैं. अपने को शेप में रखने के लिए एक्सरसाइज बौल या स्टेबिलिटी बौल काफी प्रभावी है. इस का इस्तेमाल दूसरे उपकरणों के साथ भी कर सकते हैं. बाजार में इस की कीमत 600 रुपए से 1000 रुपए के बीच तक हो सकती है.

कुछ दिन का शौक

जिम में मेम्बरशिप लेना सरल होता है. लड़कों के पास अपने पैसे होते हैं. वह कहीं न कहीं जौब या बिजनैस कर रहे होते हैं. ऐसे में खुद को फिट रखने के लिए जिम की मेम्बरशिप ले लेते है. कुछ दिन बहुत क्रेजी रहते हैं. सोशल मीडिया पर जिम करते फोटो वीडियो पोस्ट करते हैं. धीरेधीरे यह शौक पुराना हो जाता है. आलस्य उन पर हावी होने लगता है. जिम छूट जाता है. जब तक बौडी फिट नहीं रहती कोई भी फैशन अच्छा नहीं लगता है. गोल मटोल चेहरा, बढ़ा हुआ पेट, झुके हुए कंधों में लड़के झल्ले लगने लगते हैं. इस की सब से बड़ी वजह यह होती है कि फिट और स्मार्ट दिखने के लिए जो अनुशासन चाहिए वह नहीं रह पाता है.

जो लोग नशा करते हैं उस का प्रभाव उन की हैल्थ पर पड़ता ही है. इस के साथ ही साथ इन लड़कों में समय से खाना और सोना भी नहीं होता है. देर रात तक यह जगते हैं. सुबह देर से उठते हैं. कोविड के प्रभाव में जिन लड़कों का वर्क फ्रौम होम चलता है. उन की हालत और भी खराब होती है. वह लोगों से मिलजुल नहीं पाते हैं. शारीरिक मेहनत नहीं होती और खाने के नाम पर होम डिलीवरी में फास्टफूड आ जाता है. यह मोटापा बढ़ाने वाला होता है. लड़कियां इन हालातों में भी अपना ख्याल रख लेती हैं. लड़के नहीं रख पाते.

पुरूष प्रधान समाज है तो लड़कों को लगता है वह अच्छे दिखे या नहीं फर्क क्या पड़ता है ? असल में फर्क पड़ता है भाई. जो लड़की साथ चलती है उस को फर्क पड़ता है. उस की दोस्त कहती है ‘तेरा वाला कैसा दिखता है ? तू कुछ समझाती क्यों नहीं ?’ लड़की बोलती है ‘समझासमझा कर थक गई, दो दिन सुधरता है इस के बाद फिर पुराने जैसा हो जाता है.’ खासतौर से शादी के बाद तो कोई कंट्रोल ही नहीं रहता है.

शौकशौक में कई लड़के तो स्किन स्पैशलिस्ट डाक्टर के पास भी चले जाते हैं. वहां भी तमाम तरह के प्रोसीजर करवा लेते हैं पर इस का असर भी जल्द खत्म हो जाता है. इस की सब से बड़ी वजह यह होती है खानपान पर नियत्रंण न रखना. फास्टफूड और डिब्बाबंद खाना पीना हैल्थ के लिए ठीक नहीं होता है. लड़के इस का मोह छोड़ नहीं पाते हैं. समय पर अपना ध्यान न देने से जिम और सैलून का किया धरा रखा रह जाता है.

ऐसे में अगर स्मार्ट दिखना है समय पर खाना खाना चाहिए. इस के अलावा अपने सोने और जागने का समय तय होना चाहिए. देर रात तक जागना और सुबह देर से उठना बंद करना चाहिए. अगर जिम जाएं तो रेगुलर जाना चाहिए. सैलून जाएं तो समयसमय पर जाते रहें. जीवन में अगर अनुशासित नहीं रहेंगे तो न फिट रहेंगे न स्मार्ट रहेंगे. ऐसे में लोग झल्ला ही कहेंगे.

Love Story : फेसरीडर

Love Story : पैंतालीस साल के अधेड़ दिवाकर ने जल्दी से औटो वाले को किराया दिया और अपना हैंडबैग संभालते हुए तेजी से रेलवे स्टेशन के उस हिस्से की ओर दौड़ पड़ा जहां क्लौकरूम स्थित था. बारबार घड़ी देखने के साथ उस की नजर क्लौकरूम की ओर थी, जहां से उसे अपना सूटकेस लेना था.

ट्रेन छूटने में सिर्फ 20 मिनट ही शेष थे और उसे तत्परता से यह काम कर, 2 फुटओवर ब्रिज पार कर के प्लेटफौर्म नंबर 6 पर पहुंचना था जहां पर वह ट्रेन खड़ी थी जिस में सवार हो कर उसे अपने गंतव्य दिल्ली पहुंचना था. खैर, शीघ्रता से औपचारिकता पूरी कर उस ने अपना सूटकेस लिया और दौड़ताहांफता प्लेटफौर्म नंबर 6 पर जा पहुंचा.

ट्रेन चल पड़ी थी लेकिन अभी उस ने रफ्तार नहीं पकड़ी थी. उस की आंखें चलती ट्रेन में अपने कंपार्टमैंट एस-3 डब्बे को खोजने लगी. ट्रेन धीरेधीरे स्पीड पकड़ रही थी और उस का एस-3 डिब्बा आगे निकल चुका था. उस ने सोचा, यदि वह अपने कंपार्टमैंट की ओर दौड़ेगा और उस तक पहुंचेगा, तब तक तो ट्रेन की स्पीड बढ़ जाएगी और उस का ट्रेन में चढ़ना मुश्किल हो जाएगा. संभव है ट्रेन ही छूट जाए. उस की त्वरा बुद्धि ने तुरंत प्रतिक्रिया दी. उस ने अपना सूटकेस सामने से गुजरते हुए एक डब्बे में फेंका और खुद भी दौड़ कर उस में सवार हो गया.

जिस डब्बे में वह चढ़ा था वह एक द्वितीय श्रेणी का आरक्षित कंपार्टमैंट था. उस ने घूम कर देखा, सभी लोग अपनीअपनी सीट पर बैठे अपने में मशगूल थे. कोई अपना सामान सेट कर रहा था, तो कोई जूते उतार कर उन्हें बर्थ के नीचे खिसका रहा था, तो वहीं, कोई मोबाइल में व्यस्त था. उन्हीं में से एक ऐसा भी हिस्सा था जिस में एक ही महिला बैठी हुई थी. सकुचाते और इधरउधर देखते हुए वह इस हिस्से में महिला के सामने वाली खाली बर्थ पर जा कर बैठ गया. जो महिला उस के सामने वाली बर्थ पर बैठी थी वह लगातार खिड़की से बाहर पीछे छूटते प्लेटफौर्म को निहार रही थी. दिवाकर उसे कनखियों से देखने लगा.

वह सीट पर आ तो बैठा था लेकिन निश्चिंत नहीं था क्योंकि जो निश्चिंतता अपने निर्धारित टिकट से प्राप्त आरक्षित सीट पर आती है वह यहां नहीं थी. कभी भी, किसी भी स्टेशन से आरक्षित बर्थ का वास्तविक पैसेंजर आ सकता था और उसे वहां से अपना बोरियाबिस्तर ले कर उतरना पड़ेगा. यदि उस से पहले टिकट कलैक्टर ही आ गया तो उस के सामने सफाई देनी पड़ेगी और उसे सफाईवफाई देना बहुत ही इरिटेटिंग लगता था.

दिवाकर के मन में सोचविचार का सिलसिला चल ही रहा था कि तभी अचानक उस की सोचविचार की कंदरा के मुहाने पर किसी ने भारीभरकम चट्टान गिरा दी. फलस्वरुप, कंदरा में अंधकार व्याप्त हो गया. विचार, प्रश्न सब तिमिराच्छादित हो गए. कारण था, महिला का उस की ओर, और खुद दिवाकर का उस की ओर एकटक भाव से अपलक देखते ही रह जाना. उस महिला की उम्र कोई चालीसपैंतालीस से कम नहीं थी. उस के चेहरे में एक कशिश थी जो उसे अपनी ओर खींचे जा रही थी.

सामान्य कदकाठी की यह महिला गुलाबी रंग के डिजाइनर सूट सलवार पहने थी जिस पर क्रीम रंग का दुपट्टा और उस में जड़ी छोटीछोटी अनगिनत घंटियां सोने पर सुहागा प्रतीत हो रही थीं. दिवाकर उस महिला के आभामंडल से सम्मोहित हुआ जा रहा था. वह उसे देख कर मन ही मन प्रसन्न हो, खयालों में खोने लगा.

“एक्सक्यूज मी, एक्सक्यूज मी, कुछ कहना है आप को? क्या देख रहे हैं आप, आप को नहीं लगता कि इस तरह से किसी महिला को तकना बदतमीजी कहलाती है? हेलो मिस्टर, आप ही से कह रही हूं. आप चूंकि हुलिए और कपड़ों से शरीफ आदमी लग रहे हैं इसलिए इस भाव में बात कर रही हूं वरना मुझे दूसरे भाव भी आते हैं. हेलो, हां जी?”
दिवाकर अभी भी उसे अपलक देखे जा रहा था. दो चुटकियां चेहरे के पास बजीं, तो वह सम्मोहन से बाहर आया.

“ओह, सौरी मैडम, एक्चुअली मैं एक फेसरीडर हूं. मुझे आप के चेहरे में कुछ विशेष· दिखाई पड़ रहा है जो फेसरीडिंग के मेरे अब तक के अनुभव को चुनौती देता प्रतीत हो रहा है. क्षमा चाहता हूं, मुझे आप को ऐसे नहीं देखना चाहिए था.”

दिवाकर ने क्षमायाचना तो की लेकिन इस दौरान वह उस महिला के पूरे चेहरे को पढ़ चुका था. उसे पूरा विश्वास था कि कुछ ही देर बाद उस से कुछ प्रश्न पूछे जाने हैं. फेसरीडिंग संबंधी जिज्ञासाएं प्रकट होने वाली हैं. वह चाहता तो आमतौर पर सटीक पड़ने वाली एकदो बात बता कर उस महिला को कौतुक में डाल सकता था. परंतु, वह पहल सामने से करवाना चाहता था. इसलिए शांत भाव से अपने मोबाइल के साथ व्यस्त होने का नाटक करने लगा. उस ने प्रतीक्षा करना शुरू किया. उस के अधरों पर मुसकान तैर रही थी.

फेसरीडिंग की बात ने महिला को रोमांचित कर दिया था. उसे ऐसी अनुभूति होने लगी कि वह इस व्यक्ति से पहले भी मिल चुकी है परंतु बहुत जोर देने पर भी वह स्मरण न कर सकी कि वह इस से कब और कहां मिली है. वह मन ही मन सोच रही थी कि इस अजनबी को क्या मालूम कि फेसरीडिंग उस की कमज़ोरी है. फिर उस ने सोचा, कहीं यह कोई बहरूपिया तो नहीं जो उसे हानि पहुंचाना चाहता है?

आजकल बहुत बुरा समय चल रहा है. इसलिए हर किसी के सामने खुलना ठीक नहीं, पर देखने से तो यह कोई पाखंडी या आपराधिक प्रवृत्ति का नहीं लगता. मुझे न जाने क्यों ऐसा महसूस हो रहा है कि यह आदमी मेरे लिए नुकसानदेह नहीं हो सकता, पर आजकल किसी का क्या भरोसा? छलिये और कपटी लोग ऐसी ही मोहिनी सूरत लिए फिरते हैं.
दोनों अपनेअपने मन में विचारमग्न थे.

“चिंता मत कीजिए, आप को मुझ से कोई खतरा नहीं हो सकता,” दिवाकर ने आश्वस्त करते हुए कहा.
“आप हंस क्यों रहे हैं?” महिला ने दिवाकर से पूछा.
“मुझे लगता है मैडम कि मेरे चेहरे पर जो भाव प्रतिलक्षित है वह मुसकान कहलाती है. हंसने में तो अधर कपाट खुलते हैं और दंतुलियों के दिग्दर्शन होते हैं जोकि नहीं हुए, इसलिए इस भावमुद्रा को आप हंसना नहीं कह सकती हैं.”
“हांहां, वहीवही. मेरा मतलब वही था. आप मुझे देख कर मुसकरा क्यों रहे हैं?”
“क्योंकि मेरी फेसरीडिंग विद्या मुझ से कह रही है कि यहां एक इंटरैस्टिंग फेसरीडिंग का सैशन होने वाला है, जिस की शुरुआत आप करेंगी.”
“मैं भला क्यों आप से बात करूंगी, मैं आप को जानती नहीं, पहचानती नहीं. और वैसे भी, मेरी फेसवेस रीडिंग में कोई दिलचस्पी नहीं है.”
“वैसे, आप कहें तो मैं आप के बारे में कुछ अनुमान लगा सकता हूं” दिवाकर ने महिला की ओर एक सटीक गुगली फेंकी.
“लेकिन मैं आप को क्यों इजाज़त दूं? और मैं ने कहा न, मुझे इन अंधविश्वासों में कोई दिलचस्पी नहीं है.”
“लेकिन मेरी फेसरीडिंग विद्या कह रही है कि आप के शब्द कुछ और कह रहे हैं और आप का चेहरा कुछ और ही बयान कर रहा है.”
“’मतलब?”
“मतलब, आप के चेहरे ने जैसे ही मेरे मुंह से फेसरीडिंग शब्द सुने, सकारात्मक प्रतिक्रिया दी. आप की आंखों की चमक, अधरों का स्मित भाव और भौंहों का फैलाव बताता है कि आप भी इस क्षेत्र में दखल रखती हैं. मतलब, आप को भी थोड़ाबहुत इस विद्या का ज्ञान है.”
महिला उस की बात सुन कर थोड़ा गंभीर हुई, फिर मुसकराते हुए बोली, “चलिए, मान लेते हैं, इसी बहाने थोड़ा टाइम ही पास हो जाएगा. लगाइए क्या अनुमान लगा सकते हैं आप मेरे बारे में?”
जैसे ही महिला ने दिलचस्पी दिखाई, दिवाकर मन ही मन खुश हो गया. यही तो चाहता था वह. बस, फिर क्या था, खेल शुरू.
“जैसे कि मेरी विद्या कहती है कि आप दिल्ली जा रही हैं.”
“हाहाहाहाहाहा, अरे, दिल्ली वाली ट्रेन से सवारी दिल्ली नहीं जाएगी तो क्या लंदन जाएगी?” और महिला जोर से खिलखिला कर हंस पड़ी. उस की हंसी में बालसुलभ निर्मलता थी.

दिवाकर मंत्रमुग्ध हो उस महिला को हंसते हुए देखता रहा. फिर मुसकराते हुए उस ने हाईफाई वाली मुद्रा में अपनी दाईं हथेली आगे बढ़ाई और महिला ने भी हंसते हुए ही उस के हाथ पर ताली दे दी.
महिला हंसतेहंसते अचानक रुक गई, बोली, “आप ने इस तरह हाथ आगे क्यों बढ़ाया?”
“क्योंकि मेरी विद्या कहती है कि आप हंसते हुए सामने वाले के हाथ पे ताली मार कर अपनी हंसी समाप्त करती हैं.”
“आप को यह बात कैसे पता?” महिला ने हैरत से पूछा.
“कहा न, कि मेरी फेसरीडिंग विद्या मुझे सिग्नल देती है.”
“इंटरैस्टिंग, वैरी इंटरैस्टिंग. और क्या सिग्नल दे रही है आप की फेसरीडिंग विद्या?”
महिला दिवाकर के चेहरे को गौर से पढ़ने लगी. दिवाकर भी गौर से महिला के चेहरे को देखने लगा. कुछेक क्षण देखता रहा. फिर आंखें बंद कर के बोला, “आप के चेहरे को देख कर मुझे पुष्प दिखाई पड़ने लगे हैं. पुष्प के साथ भीमराव बाबासाहेब अंबेडकर भी दिखने लगे हैं. मतलब, आप का दिल्ली में पुष्प या अंबेडकरजी से कोई संबंध जरूर होगा. मतलब, कोई गार्डन या अंबेडकरजी से संबंधित कोई पुस्तक या कोई नगर या घर का पता वगैरहवगैरह.”

दिवाकर ने अब आंखें खो दीं. उस ने देखा, महिला आश्चर्य से भरी उस को अपलक देख रही थी.
“और, और क्या बता रही है तुम्हारी विद्या, तुम्हारी यह फेसरीडिंग?” महिला ने गंभीर होते हुए पूछा.
“लेकिन आप ने जवाब नहीं दिया कि आप का पुष्प और अंबेडकरजी से क्या संबंध है?”
“मैं दिल्ली में पुष्प विहार में रहती हूं, उसे अंबेडकर नगर भी कहते हैं.”
“आप हाथ आगे कीजिए एक मिनट.”
महिला ने दिवाकर की बात का अनुसरण किया. दिवाकर थोड़ा आगे झुक कर महिला की हथेली को किसी अनुभवी और प्रशिक्षित ज्योतिषी की भांति देखने लगा. कुछ देर निरीक्षण करने के बाद वह वापस पीछे की ओर सरक गया और गौर से महिला के फेस को देखा, फिर आंखें बंद कर मंदमंद मुसकराने लगा.

“क्या बात है, आप मुसकरा क्यों रहे हैं?” महिला ने आश्चर्य से पूछा.
“कोई खास बात नहीं है,” दिवाकर ने आंखें बंद किएकिए ही कहा.
“कोई ख़ास बात नहीं है तो फिर यों एकाएक मुसकराने का सबब?”
“देखिए, यदि आप बुरा न माने तो कहूं?”
“ऐसी क्या बात है?”
“मुझे कुछ ऐसा दिखाई पड़ रहा है कि असमंजस में हूं कि कहूं या न कहूं. कहूं तो डर है कि कहीं आप बुरा न मान जाएं.”
“ऐसा क्या विलक्षणण दिख रहा है आप को कि दुविधाग्रस्त हो गए, मैं जानना चाहती हूं, मेरी उत्सुकता न बढा़इए.”
“तो सुनिए, मुझे दिखाई पड़ रहा है एक रसगुल्ला, उस के ऊपर रखी हुई एक मूंछ, एक किताब, जिस पर ‘कविता’ लिखा हुआ है. एक चाक, एक डस्टर और साथ में गुलाब के 2 अधखिले फूल. कुछ समझ में आया, मैडम?”
“मैं कैसे समझ सकती हूं, तुम यह सब देख रहे हो, तुम ही बताओ?”
“शायद मैं गलत भी हो सकता हूं लेकिन इन सब के मुताबिक जैसे, रसगुल्ले के ऊपर मूंछ अर्थात मिठाई और व्यक्ति, मतलब आप का या आप के किसी करीबी का मिठाइयों का कारोबार या मिठाई में दिलचस्पी…”
“मेरे पिताजी की मिठाई की दुकान है,” महिला ने दिवाकर की बात काटते हुए कहा.
“ओके, दूसरा, एक कविता की किताब और चाकडस्टर अर्थात आप टीचर हैं और हिंदी विषय की शिक्षिका हैं. क्या यह भी सही है?”
“हां, सही है.”

दिवाकर ने अब महिला के चेहरे को और भी गौर से देखते हुए कहा, “मैं ने कहा था न कि यहां फेसरीडिंग का एक इंटरैस्टिंग सैशन होने वाला है,” दिवाकर ने आंखें खोलते हुए कहा.
“वह सब तो ठीक है परंतु अभी आप ने पूरी बात नहीं बताई है. उन 2 अधखिले गुलाब के फूलों का क्या रहस्य है?” महिला ने दिवाकर की आंखों में आंखें गडा़ते हुए पूछा.

दिवाकर कुछ क्षण खामोश रहा, फिर एक गहरी निश्वास खींचते हुए बोला, “वे आप के युवावस्था के अधूरे प्रेम के प्रतीक हैं.”
“क्या बकवास कर रहे हैं, आप? यों ही कुछ भी अनापशनाप आप कहेंगे और मैं हां करती जाऊंगी. यह ग़लत है.” यह कह कर महिला खिड़की के बाहर देखने लगी. दिवाकर उसे गौर से देखने लगा. कुछ देर तक कंपार्टमैंट में मौन छा गया.
“लेकिन मेरी विद्या और आप के फेशियल एक्सप्रैशन कह रहे हैं कि मैं जो कह रहा हूं वह ग़लत नहीं है.”
“मुझे लगता है कि ये बहुत निजी बातें होती हैं जिन्हें सब से शेयर नहीं करनी चाहिए.”
“मैं आप की भावना का सम्मान करता हों पर फिर भी सच बताइएगा, क्या कोई आप से प्रेम करता था कालेज में?”
महिला ट्रेन की छत पर लगे पंखे को देखने लगी. कुछ देर मौन रही.
“देखिए, यदि आप नहीं बताना चाहती हैं तो ठीक है, मैं अपनी दुकान बंद करता हूं.”
महिला ने उस की ओर देखा, फिर गहरी सांस छोड़ते हुए बोली, “यस, मैं जानती थी कि वह मुझे चाहता है पर कभी कह नहीं सका. शरीफ और ईमानदार लड़का था.”
“क्या उस ने कभी कुछ नहीं कहा?”
“नहीं, कभी नहीं.”
“लेकिन मेरी विद्या कहती है कि उस ने एक बार इज़हार किया था.”
“तो आप यह कहना चाहते हैं कि मैं झूठ बोल रही हूं?”
“नहीं, बिलकुल नहीं. लेकिन आप कोशिश कर रही हैं, पर आप का फेस इस के उलट गवाही दे रहा है.”
महिला फिर से खिड़की के बाहर तेजी से बदलते दृश्यों को देखने लगी. उस का चेहरा गंभीर हो उठा.
“हां, एकदो बार कहने की कोशिश जरूर की थी उस ने पर हिम्मत नहीं जुटा सका था. फिर आखिरकार एक दिन उस ने इस पार या उस पार की मुद्रा में कहा.
“’मतलब?”
“मतलब, उस ने सीधेसीधे मुझ से कहा कि वह मुझ से शादी करना चाहता था.”
“वैरी इंटरैस्टिंग, तो फिर अड़चन क्या थी?”
“अड़चन मैं खुद थी. मेरे संस्कार, मेरा डर था.”
“मतलब, आप ने उसे मना कर दिया?”
“कह सकते हो.”
“फिर आप उस से कभी नहीं मिलीं?”
“मिली थी एकदो बार उस के दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस में.”
“क्यों, आप ने तो उसे मना कर दिया था, फिर क्यों मिलीं आप?”
“बस, ऐसे ही मन किया.”
“मतलब, आप भी उस से प्यार करती थीं?”
“हो सकता है. यह अनुभूति मुझे उस के एमए में पास आउट हो जाने के बाद महसूस हुई. उस के बाद फिर उस से कभी नहीं मिली. पच्चीसछब्बीस साल हो गए हैं इस बात को, अब तो वह मेरे सामने आ भी जाए तो शायद मैं उसे पहचान न पाऊं.”
“और अगर वह संयोग से किसी दिन आप के सामने आ ही गया तो वह आप को पहचान लेगा?”
“सौ फीसदी पहचान लेगा,” महिला ने दृढ़ता से कहा.
“लेकिन पच्चीसतीस सालों में तो आदमी की शक्लसूरत, चालढाल, डीलडौल सब बदल जाता है. आप में भी तो बदलाव आए होंगे, फिर भी आप को विश्वास है कि वह आप को पहचान लेगा?”
“बिलकुल, बिलकुल विश्वास है,” महिला ने फिर दृढ़ता से कहा.
“आप जानना नहीं चाहती हैं कि इस समय वह कहां और कैसा है?”
“जरूर जानना चाहती हूं, बल्कि, मैं यह भी जानना चाहती हूं कि उस ने शादी की या नहीं, क्या तुम बता सकते हो?”

दिवाकर मुसकरा दिया और उस ने आंखें बंद कर लीं. कुछ क्षण मौन, बंद आंखों के साथ मुसकराता रहा. फिर आंखें बंद किए हुए ही बोला, “उस के 2 बच्चे हैं. एक खूबसूरत, मृदुभाषिणी पत्नी है जो उस पर अपनी जान निछावर करने को हमेशा तैयार रहती है. खुश है वह अपनी दुनिया में, सुखी है.”
यह कह कर दिवाकर ने आंखें खोल दीं, देखा, महिला की आंखें सजल हो आई थीं. उस ने दुपट्टे से आंखें पोंछते हुए कहा, “मुझे ख़ुशी है कि वह सुखी है.”
“मैडम, एक बात पूछूं? ऐक्चुअली मैं भविष्यवाणी नहीं करता और न ही भविष्य के बारे में कुछ बताता हूं लेकिन मैं आप से एक बात पूछना चाहता हूं, हालांकि यह एक निजी प्रश्न है फिर भी, क्या आप ने शादी की?”
“की थी, मैं ने भी शादी की थी, पर मेरी शादी की उम्र मात्र 3 साल ही रही. लेकिन छोड़ो, मुझे ख़ुशी है कि वह सुखी है,” कहते हुए महिला फिर से बाहर देखने लगी.

खेत, घर, सड़क, पेड़ों का समूह, दूर पहाड़ों की पंक्तियां तीव्र गति से पीछे छुटते जा रहे थे. कुछ देर बाद स्टेशन आ गया और ट्रेन रुक गई. प्लेटफौर्म से चायपकौड़े, पूरीसब्जी की आवाजें आने लगीं. सवारी का चढ़नाउतरना जारी था. तभी एक फैमिली कंपार्टमैंट में दाखिल हुई और दिवाकर के सामने आ कर खड़ी हो गई.

दिवाकर समझ गया कि आरक्षित बर्थ का वास्तविक स्वामी आ गया है. उस ने एक क्षण महिला को देखा. फिर तुरंत ही अपना सूटकेस और हैंडबैग ले कर नीचे उतर गया. खिड़की के पास आ कर महिला से बोला, “यह मेरा कार्ड है, कभी कोई समस्या हो, जरूरत हो, तो मुझे याद कर लेना. मुझे तुम्हारे कुछ काम आने में बहुत खुशी होगी.” यह कह कर उस ने खिड़की की सलाखों के सामने एक विशेष मुद्रा में राजेश खन्ना स्टाइल में सिर झुका कर दाएं हाथ की एक उंगली से जैसे ही सैल्यूट किया, वैसे ही ट्रेन खिसकने लगी.

यह देख महिला का मुंह आश्चर्य से खुला का खुला ही रह गया. वह दौड़ कर दरवाजे तक गई. परंतु तब तक ट्रेन ने गति पकड़ ली थी. प्लेटफौर्म पीछे छूटने लगा था. महिला की नजर दूरदूर तक प्लेटफौर्म पर दौड़ कर लौट आई पर वो नहीं दिखा. उस ने दुपट्टे से अपना मुंह ढांप लिया. वह वापस अपनी बर्थ पर आ बैठी.
‘वो मेरे सामने था और मैं उसे पहचान न पाई, ओह!’
वह छत के पंखे को एकटक देखने लगी. उस की सांसें तेज़तेज़ चलने लगीं. वह उस के साथ हुई बातचीत को मन ही मन रिवाइंड करने लगी. उस ने बर्थ की पीठ पर सिर टिका दिया और आंखें मूंद लीं. फिर कुछ देर बाद अचानक उस का ध्यान हाथ में पकड़े कार्ड की ओर गया. उस ने कार्ड देखा, उस के कोनों में उकेरी गई नीली कमल पत्तियों को देख मुसकरा दी.
‘दुनिया कितनी छोटी है, रश्मि, वह एक बार फिर तुम्हारे सामने था और तुम पहचान न सकी. उस ने इतने सालों बाद भी झट से तुझे पहचान लिया. तुझ से बतियाता रहा, हायवाय भी किया. घर, परिवार, ऐड्रेस, कालेज की बात की. और तू मूर्ख, उस की बातों में ही अटकी रही. उसे न पहचान सकी. दिवाकर, मुझे समझ जाना चाहिए था कि तुम फेसरीडिंग नहीं बल्कि इतने सालों बाद मुझे पहचान कर पुरानी स्मृतियों को ताज़ा कर रहे थे.’
यह सब सोचतेसोचते महिला (रश्मि) मुसकराने लगी. उस ने अपने हैंडबैग में से एक कार्ड निकाला और उसे दिवाकर के दिए कार्ड के साथ मिलाने लगी. नीली कमल पत्तियों वाले दोनों कार्डों पर लिखा था- ‘तुम सर्वश्रेष्ठ हो.’ उस ने दोनों कार्डों को हैंडबैग में रखा और मुसकराते हुए एक बार फिर खिड़की के बाहर देखने लगी.

कुछ देर पहले के निर्जन मैदानों, सूखे-कंटीले पेड़ों, काले-मटमैले पहाड़ों के दृश्यों की जगह अब हरेभरे लहलहाते खेतों, फूलों से लदेफंदे पेड़पौधों, बलखाती नदी के दृश्यों ने ले ली थी. और रश्मि खयालों में खोई, बाहर की ओर देखते हुए लगातार मुसकरा रही थी.

लेखक : नेतराम भारती

Hindi Kahani : डिंपल – आखिर क्यों डिंपल बदलने लगी?

Hindi Kahani : जैसे शरद पूर्णिमा की ठंडी रात में आसमान सितारों से भरा रहता और हर सितारा मानों चांद के इर्दगिर्द रहता है, उसी तरह सारी क्लास में भी ऐसा लगता था जैसे सब डिंपल की ओर ही आकृष्ट रहते हैं. यों चांद का तसव्वुर कौन नहीं चाहता… उस की उजली चांदनी में सब के चेहरे उजले और आनंद से लबरेज दिखाई देते हैं. हर सितारा चांद के करीब रहना चाहता है क्योंकि चांद होता ही प्यारा है।

डिंपल का नाम ही डिंपल नहीं बल्कि उस के कपोलों पर भी जब भी वह चहकती है नर्म डिंपल वहां उभर आते हैं. उस के बालों में बंधा वह सुर्ख रिबन दूर तक चमकता है जैसे कोई भंवरा किसी महकते फूल पर मधु के लिए उमड़ा हुआ हो. तारीफ सुनना किसे नहीं भाता और फिर जब भी कोई प्रेमवश डिंपल के लिए कोई 2 शब्द कह दे तो फिर तो डिंपल की सुंदरत में चार चांद लग जाते हैं. यह उम्र का तकाजा है या कुछ और पर कुछ भी हो इस का भी अपना ही नशा है बिलकुल अलग बिलकुल जुदा.

सुबह की नर्म धूप जैसे ही डिंपल के चेहरे पर गिरी वह पलंग पर उठ कर बैठ गई. आज इतवार है यानी कि आज की छुट्टी किताबों से और कक्षाओं से. वह तकिए पर उलटा लेट कर अपनी टांगों को बारीबारी से हिलाने लगी. कल रात का सपना अभी भी उस के जेहन में तैर रहा है कि वह रोहन के साथ सब से अलग स्कूल पिकनिक पर है. कितनी खुश है वह इस नई जिंदगी से, जहां वह है और केवल रोहन है. रोहन उस के नर्म हाथों को थामे हुए है. पिंक ड्रैस में वह बहुत खूबसूरत दिखाई दे रही है. वह एक चबूतरे पर बैठी है और रोहन ने मुसकराते हुए एक लाल गुलाब उसे औफर किया है। वह प्यार से उस गुलाब को ले लेती है और उस फूल को अपनी जुल्फों में लगाने के लिए कहती है. वे दोनों एकदूसरे का हाथ थामे लालपीले फूलों से खिले बगीचे में दूर कहीं चलते जा रहे हैं, ऐसी नई जगह जहां वे आज पहली ही बार आए हैं.

रोहन उस की क्लास का सब से सुंदर और बिंदास लडका है. उंचालंबा कद, चेहरे पर हलकी मूंछें और दिलकश आंखें सहज ही डिंपल को अपनी तरफ खींच लेती हैं. आज डिंपल इतनी खुश है जैसे उस ने जिंदगी की सारी खुशियां पा ली हो. कल तक डिंपल में बचपना था, मम्मीपापा के साए में वह जी रही थी पर आज जैसे वह किसी फिल्म की हीरोइन की भांति जलपरी सी चहक रही थी.

वह मानसिक और शारीरिक रूप से पहले से कहीं परिपक्व हो चुकी है और तभी शायद आज उसे यह नई जिंदगी ज्यादा अच्छी दिखाई दे रही है. उस ने उलटे लेटेलेटे पैरों में पैर उलझा कर खिड़की से बाहर देखा. आज की सुबह उसे बहुत खूबसूरत दिखाई दे रही है. उस ने रातभर रोहन को अपने करीब देखा था. क्लास में कितने ही तो लड़के हैं जो उस पर मरते हैं पर किसी में भी रोहन जैसी बात नहीं. रोहन जैसे ही स्कूल में प्रवेश करता है जाने क्यों उस की नजरें उस के चेहरे पर अटक जाती हैं. रोहन से डिंपल ने हालांकि आज तक सामान्य रूप से ही बात की है पर जाने क्यों दिल उसी को एक नजर भर देखने के लिए दौड़ता है.

‘रोहन अभी 17 का है और मैं 16 की. ओह यस… आई एम स्वीट सिक्सटीन…’ उस वक्त उस की आंखों में खास किस्म की चमक थी. डिंपल ने माथे पर से गिरी जुल्फों को समेटते हुए पीछे पलट कर देखा. सामने मम्मी खड़ी थीं. वह डिंपल को आश्चर्य से देख रही थीं. उस के कांपते होंठ वहीं सिमट गए, “क्या हुआ मम्मा, ऐसे घूर कर क्या देख रही हो?” उस ने मम्मी की और गंभीरता से देखते हुए पूछा.

“कुछ नहीं बेटे, अभी कल तक तुम कितनी छोटी और भोली थी,” मम्मी ने दार्शनिक भाव से कहा.

“हां तो…” डिंपल ने बीच में ही टोकते हुए पूछा.

“कुछ नहीं…” मम्मी ने बात टालते हुए कहा.

“नहींनहीं… मां, कहो भी अब. कुछ कहना चाहती हो?” डिंपल सकपकाते हुए बोली.

“नहींनहीं…बेटा, चलो उठ कर नहाधो लो. आज तेरे पापा के औफिस से किसी को आना है। चल, सफाई भी तो करनी है.”

“क्या मां आज भी… आज तो संडे है न। एक ही दिन तो रैस्ट के लिए मिलता है पर आज भी…” डिंपल ने मुंह बिचकाते हुए उत्तर दिया.

“डिंपल बेटा, जिंदगी में हर काम जरूरी है और फिर जब हम लोगों से मिलेंगे तभी तो हम दुनिया को और दुनिया हमें जान सकेगी,” मम्मी डिंपल को देखते हुए बोलती रहीं.

कमरे में कुछ आहट हुई जैसे कोई फोन वाईब्रैट हो रहा हो. डिंपल ने अपना फोन उठाया,”हैलो, आ रही हो न मेरी जान? फोन में शैली की आवाज सुनाई दी. नहीं यार, मेरा कोई कन्फर्म नहीं,” डिंपल ने मम्मा की ओर देखते हुए जवाब दिया.

“क्यों, कल तुम तो मेरे यहां आने के लिए बहुत उछल रही थीं, फिर नहीं क्यों?”

डिंपल अनमने ढंग से जवाब देती रही,” पता नहीं यार, अब फोन रखो. अभी मम्मी हैं,” डिंपल मम्मी को देखते हुए बोली.

“जानती हो, रोहन भी आ रहा है,” दूसरी ओर से आवाज आई.

“सच…रियली…” डिंपल का मुसकराता हुआ चेहरा सुर्ख हो गया,”चलो, कोशिश करती हूं,” और उस ने फोन रख दिया.

“किस का फोन था?” मम्मी ने खिड़की के दरवाजे को रगड़ते हुए पूछा.

“वो…वो… शैली का?”  उस ने कुछ झिझकते हुए जवाब दिया.

“कब जाना है?” मम्मी ने पूछा.

“आज ही दोपहर,” डिंपल फोन में कुछ देखते हुए बोली,”उस का जन्मदिन है न मम्मी. अब मैं क्या कर सकती हूं और बाकी सभी दोस्त भी तो आ रहे हैं फिर मैं कैसे उसे टाल सकती हूं.”

“बेटे, देखो, अब तुम बड़ी हो गई हो. तुम्हारी भी कोई जिम्मेदारी है. यह नहीं कि केवल अपने में जीना होता है. मैं कुछ दिनों से देख रही हूं कि तुम बहुत बदल गई हो. जाने क्यों लगता है कि तुम अब झूठ भी बोलने लगी हो,” डिंपल जैसे अब सपने से जाग गई,”अरे नहीं मम्मा, ऐसा कुछ नहीं. वह स्टडी है न बस कोर्स कंपलीट हो जाए उस में ही उलझी हूं.”

“चलो देख लेना… कह देती हूं. बस, अपना खयाल रखना फिर तुम्हारी उम्र भी उस नाजुक दौर से गुजर रही है कि कोई भी तुम्हें बेबकूफ बना कर तुम से फायदा उठा सकता है. समझ रही हो न कि मैं क्या कह रही हूं,” डिंपल अब पलंग से उठ कर मम्मी के सामने आ कर खड़ी हो गई,”आप साफसाफ कहो जो भी कहना चाहती हो,” डिंपल ने उत्तेजित हो कर कहा.

“बस बेटे, तुम अब समझदार हो जाओ. किसी गलत रास्ते पर न चलना. कल रात भी तुम्हें देर रात तक फोन पर बात करते देखा था. तुम्हारे पापा को और मुझे भी बहुत अजीब सा महसूस होता है.”

“ओ मम्मा… कमऔन. ऐसा कुछ नहीं है,” वह शायद पहले शैली के घर न जाती पर जैसे ही उस ने रोहन का नाम सुना उस के मन में सैकड़ों तरंगे दौड़ने लगीं. वह एक पल खामोश रही फिर मम्मी के करीब जा कर गाल पर प्यार से किस करती हुई बोली,”बस, 2 घंटों में आ जाउंगी. पापा के औफिस के अंकल कितने बजे आएंगे? डिंपल ने गुमसुम मम्मी के चेहरे को देखते हुए पूछा?

“वह 5 बजे आ रहे हैं,” मम्मी ने आंख बंद कर के तेज सांस खींचते हुए जवाब दिया,”अब पापा को क्या जवाब दोगी? घर में कोई आने वाला है पर यह राजदुलारी कहीं बाहर जा रही हैं. चली जाना पर 2 एक घंटे में वापस आ जाना,” मम्मी ने डिंपल को समझाते हुए कहा.

मम्मी को भी लगा कि इस तरह किसी दोस्त के जन्मदिन पर जाने से मना करना कहां की समझदारी है. फिर लड़की अब बङी हो चुकी है। इस तरह घर में कैद करना क्या अच्छी बात है।

“कोई नहीं, आई विल बी हियर टिल 4,” डिंपल ने मम्मी के कानों के करीब आ कर कहा. मम्मी ने हां में गरदन को हिला दिया. डिंपल के चेहरे पर वही पुरानी सी रौनक लौट आई. वह जल्दी से अपने कमरे में गई. कमरे में रखी अलमारी को खोल कर सामने टंगी गोल्डन गाउन को देखने लगी. उस ने हैंगर से निकाल कर उस गाउन को बैड पर लटका दिया. पीली रौशनी में वह खूब दमक रहा था. ‘रोहन भी वहां होगा. वाऊ…’ वह मन ही मन चहक गई.

उस वक्त उस के शरीर का 1-1 रोया रोमांच से पुलकित हो रहा था मानों रोहन उस के सामने हो, उस के पतली मुलायम कलाई को थाम कर प्यार से मुसकरा रहा हो. उस ने गाउन को उम्मीद भरी नजरों से देख कर निर्णय किया कि हो न हो आज वह अपने दिल का हाल उसे कह ही देगी. उसे पूरा यकीन है कि यदि रोहन के दिल में भी ऐसी ही कोई बात होगी तो आज इस मौके पर वह जरूर कहेगा,’जाने क्यों लगता है कि वह भी मुझ से कुछ कहना चाहता है पर शायद सब के सामने अपने प्रेम का इजहार नहीं कर पाता है. अब मेरी जिंदगी है मैं इतनी छोटी भी तो नहीं कि किसी के दिल की बात न जान सकूं. रोहन है ही इतना अच्छा कि कोई भी लड़की हो एक ही बार में उस की हो जाए. काश, आज का सपना सच हो जाए…’

डिंपल को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उसे तो बस हर पल रोहन और रोहन का खयाल दिखाई दे रहा था,’मम्मीपापा, भाईबहन सब अपनी जगह हैं। उन का प्यारदुलार अपनी जगह है पर रोहन अपनी जगह है. मुझे क्यों लगता है कि रोहन के बिना अब नहीं जी सकती? रोहन में अजीब सा आकर्षण है, शायद तभी मैं खुदबखुद उस की तरफ खिंची चली जाती हूं.

‘काश, मैं बालिग होती फिर जैसेतैसे अपनी चाहत को अपना बना लेती, चाहे प्यार से या भाग कर. फिर अब लगने लगा है कि मेरी भी तो कुछ जरूरते हैं जिन्हें मैं जैसे चाहूं पूरी कर सकूं. मम्मी भी न… अब तो हर वक्त किसी साए की भांति मेरे पीछे पड़ी रहती हैं. काश, आज रोहन मेरे दिल का हाल जान ले.

‘रोहन, एक बार मेरा हाथ थामो तो, देखो मैं खुद तुम्हारे पीछेपीछे न चली आऊं तो कहना,’ उस ने फोन गैलरी खोली और रोहन का फोटो देखने लगी. उस का मुसकराता चेहरा और सिर पर बालों का वह पफ जो हमेशा उसे और भी अधिक सुंदर बनता है, वह पलभर उस के होंठों को देखती रही फिर फोटो को करीब ला कर अपने लरजते होंठों से छू दिया. वह आंखे मूंदे खड़ी रही मानों दोनों एक हो गए हों.

“ओह रोहन, आई लव यू,” वह फोटो को करीब ला कर बारबार चूमती रही. उस की सांसें इस वक्त किसी मशीन की भांति कंपित हो रही थीं. कमरे की खिड़की से ठंडी शीतल हवा का झोंका अंदर आया, तो वह स्वयं में चहक गई,’ओह रोहन, कितना सुखद एहसास है. अब तक तुम्हें ख्वाबों में देखती हूं पर अब यही तमन्ना है कि यह ख्वाब अब सच हो जाए,’ वह बारबार बैड पर लटके गाउन को उठा कर अपने सीने से लगा कर देखती है मानों हर बार उस के शरीर में कोई नई सिहरन उठती हो. वह शैली को फोन लगाती है,”हैलो… शैली, यार, एक बात बता, पक्का रोहन आ रहा है न…” और वह हंस पड़ी. जैसे ही वह हंसी उस के गालों पर उस के नाम के अनुरूप डिंपल पङने लगे।

“हां बाबा हां…” शैली ने दूसरी ओर से हामी भरी,”जानती हो, पहले वह भी नहीं आ रहा था. पर उसे जैसे ही उसे पता चला कि तुम भी आ रही हो तो वह पलभर में तैयार हो गया. अब तो खुश हो मेरी जान,” और शैली भी तेजतेज हंसने लगी.

“ओए जान, तो मैं केवल उसी की हूं,” डिंपल ने तनिक लजाते हुए जवाब दिया और खुशी की एक लहर उस के शरीर में दौड़ गई,”यार, यह उम्र ही इतनी कातिल है कि जो मन को भा जाए बस उसी का हो जाने का दिल करता है. और बताओ, तुम्हारे वाले साहब यानी दीपक भी आ रहा है न?”

“हां मेरी जान, वह नहीं आया तो केक भी नहीं काटूंगी. जानती हो वह कुछ सरप्राइज देने वाला है,” शैली ने उत्सुकतावश कुछ बताना चाहा.

“अच्छा क्या?” कुछ देर सन्नाटा… “क्या, बोल न…” डिंपल ने उत्तर की आशा में फिर दोहराया. जब आओगी तभी बताउंगी. अच्छा, टाइम से आ जाना.”

“यार, मेरे पापा के औफिस से कोई मेहमान आ रहे हैं. मैं केवल 2 घंटे के लिए ही आ पाउंगी.”

डिंपल आईने के सामने आ कर खुद को तरहतरह से निहारती रही मानों उसे किसी खास के लिए ही वहां जाना हो. उस ने अपने नर्म मुलायम गालों पर उंगलियां फिराईं, उभरे हुए नाजुक डिंपल को कपोलों पर देखते ही उस का चेहरा खिल गया था.

Best Hindi Story : सीजर – क्या दादाजी की कुत्तों से नफरत कम हो पाई?

Best Hindi Story : कुत्ते का पिल्ला पालने की बात चली तो दादाजी ने अपनी अप्रसन्नता व्यक्त की, ‘‘पालना ही है तो मिट्ठू पाल लो, मैना पाल लो, खरगोश पाल लो…और कोई सा भी जानवर पाल लो, लेकिन कुत्ता मत पालो.’’

घर की नई पीढ़ी ने घोषणा की, ‘‘नहीं, हम तो कुत्ता ही पालेंगे. अच्छी नस्ल का लाएंगे.’’

दादाजी ने दलील दी, ‘‘भले ही अच्छी नस्ल का हो…मगर होगा तो कुत्ता ही?’’

नई पीढ़ी ने प्रतिप्रश्न किया, ‘‘तो क्या हुआ? कुत्ते में क्या खराबी होती है? वह वफादार होता है. इसीलिए आजकल सभी लोग कुत्ता पालने लगे हैं.’’

दादाजी का मन हुआ कि कहें, ‘हां बेटा, अब गोपाल के बजाय सब श्वानपाल हो गए हैं.’ किंतु इस बात को उन्होंने होंठों से बाहर नहीं निकाला.

कुत्ते की अच्छाईबुराई के विवाद में भी वे नहीं पड़े. व्यावहारिक कठिनाइयां ही बताईं, ‘‘कुत्ते बड़े बंगलों में ही निभते हैं क्योंकि वहां कई कमरे होते हैं, लंबाचौड़ा लौन होता है, खुली जगह होती है. इसलिए वह बड़े मजे से घूमताफिरता है. इस छोटे फ्लैट में बेचारा घुट कर रह जाएगा.’’

नई पीढ़ी ने दलील दी, ‘‘अपने आसपास ही छोटेछोटे फ्लैटों में कई कुत्ते हैं. आप कहें तो नाम गिना दें?’’

दादाजी ने इनकार में हाथ हिलाते हुए दूसरी व्यावहारिक कठिनाई बताई, ‘‘वह घर में गंदगी करेगा, खानेपीने की चीजों में मुंह मारेगा. कहीं पागल हो गया तो घर भर को पेट में बड़ेबड़े 14 इंजैक्शन लगवाने पड़ेंगे.’’

नई पीढ़ी ने इन कठिनाइयों को भी व्यर्थ की आशंकाएं बताते हुए कहा, ‘‘अच्छी नस्ल के कुत्ते समझदार होते हैं. वे देसी कुत्तों जैसे गंदे नहीं होते. प्रशिक्षित करने पर विदेशी नस्ल के कुत्ते सब सीख जाते हैं. सावधानी बरतने पर उन के पागल होने का कोई खतरा नहीं रहता है.’’

दादाजी ने अपनी आदत के अनुसार हथियार डाल दिए. नई पीढ़ी से असहमत होने पर भी वे ज्यादा जिद नहीं करते थे. अपनी राय व्यक्त कर छुट्टी पा लेते थे. इसी नीति से वे कलह से बचे रहते थे. इस मामले में भी उन्होंने यह कह कर छुट्टी पा ली, ‘‘तुम जानो…मेरा काम तो सचेत करना भर है.’’

अलसेशियन पिल्ला घर में आया तो दादाजी ने उस में कोई विशेष रुचि नहीं ली. वे आश्चर्य से उसे देखते रहे. वह अस्पष्ट सी ध्वनि करता हुआ उन के पैर चाटते हुए दुम हिलाने लगा, तब भी वे उस से दूरदूर ही रहे. उन्होंने उसे न उठाया, न सहलाया. हालांकि उस छोटे से मनभावन पिल्ले का पैरों को चाटना व दुम हिलाना उन्हें अच्छा लगा.

नई पीढ़ी ने खेलखेल में कई बार उस पिल्ले को दादाजी की गोद तथा हाथों में रख दिया, तब न चाहते हुए भी उन्हें उस पिल्ले के स्पर्श को सहना पड़ा. यह स्पर्श उन्हें अच्छा लगा. नरमनरम बाल, मांसल शरीर, बालसुलभ चंचलता आदि ने उन के मन को मोहा. घर में कोई छोटा बच्चा न होने से ऐसा स्पर्श सुख उन्हें अपवाद-स्वरूप ही मिलता था. इस पिल्ले के स्पर्श ने उसी सुख की अनुभूति उन्हें करा दी. फिर भी वे पिल्ले को अपने से परे हटाने का नाटक करते रहे. इसलिए नई पीढ़ी को नया खेल मिल गया. वे जब देखो तब दादाजी के पास उस पिल्ले को छोड़ने लगे. दादाजी का उस से कतराना एवं परे हटाने का प्रयास उन्हें प्रसन्नता से भर देता.

नई पीढ़ी ने अपने चहेते पिल्ले का नाम रखा, सीजर.

दादाजी ने इस नाम का भारतीयकरण कर दिया, सीजरिया.

नई पीढ़ी ने शिकायत की, ‘‘दादाजी, सीजर का नाम मत बिगाडि़ए.’’

दादाजी ने सफाई दी, ‘‘मैं ने तो उसे भारतीय बना दिया.’’

‘‘यह भारतीय नहीं है…अलसेशियन है.’’

‘‘नस्ल भले ही विदेशी हो…मगर है तो यहीं की पैदाइश. इसलिए नाम इस देश के अनुकूल ही रखना चाहिए.’’

‘‘नहीं, इस का नाम सीजर ही रहेगा.’’

‘‘लेकिन हम तो इसे सीजरिया ही कहेंगे.’’

दादाजी को इस छेड़छाड़ में मजा आने लगा. नई पीढ़ी से बदला लेने का उन्हें अच्छा मौका मिल गया. वे लोग सीजर को उन के पास धकेल कर खुश होते रहते थे. दादाजी ने सीजर के नाम को ले कर जवाबी हमला कर दिया. इस हमले के दौरान वे सीजर को अपने दिए नाम से संबोधित करकर के अपने पास बुलाने लगे.

‘सीजरिया’ संबोधित करने पर भी पिल्ला जब ललक कर उन के पास आने लगा तो वे नई पीढ़ी को चिढ़ाने लगे, ‘‘देखा, सीजरिया को यह नाम पसंद है.’’

आएदिन की इस छेड़छाड़ ने दादाजी का सीजर से संपर्क बढ़ा दिया. अब वे उसे अपनी बांहों में भरने लगे, उठाने लगे, सहलाने लगे. नई पीढ़ी की अनुपस्थिति में भी वे उस से खेलने लगे. पलंग पर अपने पास लिटाने लगे. उस की चेष्टाओं पर प्रसन्न होने लगे. उस के स्पर्श से गुदगुदी सी अनुभव करने लगे.

एक दिन घर के लोगों ने दादाजी से प्रश्न किया, ‘‘आप तो इस के खिलाफ थे?’’

‘‘हां, था तो…मगर इस खड़े कान वाले ने मेरे मन में जगह बना ली है,’’ दादाजी ने मुसकराते हुए उत्तर दिया.

सीजर के लिए दादाजी का स्नेह दिनोदिन बढ़ता ही गया क्योंकि अपने खाली समय को भरने का उन्हें यह अच्छा साधन लगा. जब सीजर इस घर में नहीं आया था तब वे खाली समय बातों में, पढ़ने में, टीवी देखने में तथा ऐसे ही अन्य कामों में व्यतीत किया करते थे. बातों के लिए घर के लोग हमेशा सुलभ नहीं रहते थे क्योंकि दिन के समय सभी छोटेबड़े अपनेअपने काम से घर से बाहर चले जाते थे. कोई स्कूल जाता था तो कोई कालेज, कोई बाजार जाता था तो किसी को दफ्तर जाना होता था. खासी भागमभाग मची रहती थी. घर में रहने पर सभी की अपनीअपनी व्यस्तताएं थीं, इसीलिए दादाजी से बातें करने का अवकाश वे कम ही पाते थे.

लेदे कर घर में बस, दादीजी ही थीं, जो दादाजी के लिए थोड़ा समय निकालती थीं. किंतु उन के पास अपनी बीमारी और घर के रोनों के सिवा और कोई बात थी ही नहीं. आसपास भी कोई ऐसा बतरस प्रेमी नहीं था, इसलिए दादाजी बातें करने को तरसते ही रहते थे. कोई मेहमान आ जाता था तो उन की बाछें खिल उठती थीं.

पढ़ने और टीवी देखने में दादाजी की आंखों पर जोर पड़ता था. इसलिए वे अधिक समय तक न तो पढ़ पाते थे, न ही टीवी देख पाते थे. दैनिक समाचारपत्र को ही वे पूरे दिन में किस्तों में पढ़ पाते थे. घर की नई पीढ़ी उन के इस वाचन का मजा लेती रहती थी. सुबह के बाद किसी को यदि अखबार की आवश्यकता होती तो वह मुसकराते हुए दादाजी से पूछता, ‘‘पेपर ले जाऊं दादाजी, आप का वाचन हो गया?’’

सीजर ने उन के इस खाली समय को भरने में बड़ा योगदान दिया. वह जब देखो तब दौड़दौड़ कर उन के पास आने लगा, उन के आसपास मंडराने लगा. दादाजी उसे उठाने और सहलाने लगे तो उस का आवागमन उन के पास और भी बढ़ गया. घर के दूसरे लोगों को उसे पुकारना पड़ता था, तब कहीं वह उन के पास जाता था. दादाजी के पास वह बिना बुलाए ही चला आता था. घर के लोग शिकायत करने लगे, ‘‘दादाजी, आप ने सीजर पर जादू कर दिया है.’’

सीजर जब इस घर में नयानया आया था तब उस का स्पर्श हो जाने पर दादाजी हाथ धोते थे. खानेपीने से पहले तो वे साबुन से हाथ धोए बिना किसी वस्तु को छूते नहीं थे. वही दादाजी अब सारासारा दिन सीजर के स्पर्श में आने लगे. किंतु हाथ धोने की सुध उन्हें अब न रहती. खानेपीने की वस्तुएं उठाते समय भी साबुन से हाथ धोना वे कई बार भूल जाते थे. नई पीढ़ी कटाक्ष करने लगी, ‘‘दादाजी, गंदे हाथ.’’

दादाजी उत्तर देने लगे, ‘‘तुम ने ही भ्रष्ट किया है.’’

सीजर के प्रति यों उदार हो जाने के बावजूद यह भ्रष्ट किए जाने वाली बात दादाजी को फांस की तरह चुभती रहती थी. यह शिकायत उन्हें शुरू से ही बनी हुई थी. सीजर का सारे घर में निर्बाध घूमना, यहांवहां हर चीज में मुंह मारना उन्हें खलता रहता था. रसोईघर में उस का प्रवेश तथा भोजन करते समय उस का स्पर्श वे सहन नहीं कर पाते थे. इसलिए कई बार उन्हें नई पीढ़ी को झिड़कना पड़ा था, ‘‘कुछ तो ध्यान रखा करो…अपने संस्कारों का कुछ तो खयाल करो.’’

इस शिकायत के होते हुए भी सीजर का जन्मदिन जब मनाया गया तो दादाजी ने भी घर भर के स्वर में स्वर मिलाया, ‘‘हैप्पी बर्थ डे टू यू…’’

सीजर के अगले पंजे से छुरी सटा कर जन्मदिन का केक काटने की रस्म अदा कराई गई तो दादाजी ने भी दूसरों के साथ तालियां बजाईं.

केक का प्रसाद भी दादाजी ने लिया. सीजर के साथ फोटो भी उन्होंने सहर्ष खिंचवाई.

देखते ही देखते जरा से पिल्ले के बजाय सीजर जब ऊंचा, पूरे डीलडौल वाला बनता गया. दादाजी भी घर भर की तरह प्रसन्न हुए. उस में आए इस बदलाव पर वे भी चकित हुए. वह पांवों में लोटने के बजाय अब कंधों पर दोनों पैर उठा कर गले मिलने जैसा कृत्य करने लगा तो दादाजी भी गद्गद कंठ से उसे झिड़कने लगे, ‘‘बस भैया, बस.’’

यों प्रेम दर्शाते हुए सीजर जब मुंह चाटने को बावला होने लगा तो दादाजी को पिंड छुड़ाना मुश्किल होने लगा. फिर भी उन्होंने उसे पीटा नहीं. हाथ उठा कर पीटने का स्वांग करते हुए वे उसे डराते रहे.

आसपास के बच्चे पत्थर फेंकफेंक कर या और कोई शरारत कर के सीजर को चिढ़ाने की कुचेष्टा करते तो दादाजी फौरन दौड़े जाते थे और उन शरारती बच्चों को झिड़कते थे, ‘‘क्यों रे, उस से शरारत करोगे तो वह मजा चखा देगा…भाग जाओ.’’

रात को जब कभी भी सीजर भूंकता था तो वे फौरन देखते थे कि क्या मामला है. उन से उठते बनता नहीं था, फिर भी वे उठ कर जाते थे. घर भर के लोग उन की इस तत्परता पर मुसकराते तो वे जवाब देते, ‘‘सीजर अकारण नहीं भूंकता है.’’

एक बार 10-12 दिन के लिए दादाजी को दूसरे शहर जाना पड़ा. वे जब लौटे तो बरामदे में ही सीजर उन से लिपट गया. दादाजी उस के सिर को सहलाते हुए बुदबुदाते रहे, ‘बस बेटा, बस…इतना प्रेम अच्छा नहीं है.’

दादाजी की नींद बड़ी नाजुक थी. संकरी जगह में उन्हें नींद नहीं आती थी. किसी अन्य का स्पर्श हो जाने से भी उन की नींद उचट जाती थी. किंतु सीजर ने उन की इन असुविधाओं की कतई परवा नहीं की. वह दादाजी से सट कर या उन के पैरों के पास सोता रहा. दादाजी उसे सहन करते रहे. टांगें समेटते हुए कहते रहे, ‘‘तू जबरदस्त निकला.’’

एक बार सीजर घर से गायब हो गया. पड़ोसियों से पता लगा कि वह घर के सामने की मेहंदी की बाड़ को फलांग कर भागा है. एक बार इस बाड़ में उलझा, फिर दोबारा कोशिश करने पर निकल पाया. बाहर निकल कर गली की कुतिया के पीछे लगा था.

इस जानकारी के प्राप्त होते ही इस घर की नई पीढ़ी सीजर को ढूंढ़ने निकल पड़ी. सभी का यही खयाल था कि वह आसपास ही कहीं मिल जाएगा.

दादाजी भी अपनी लाठी टेकते हुए सीजर को ढूंढ़ने निकले. दादीजी ने टोका, ‘‘तुम क्यों जा रहे हो? सभी लोग उसे ढूंढ़ तो रहे हैं?’’

मगर दादाजी न माने. वे गलीगली में भटकते हुए परिचितअपरिचित से पूछने लगे, ‘‘हमारे सीजर को देखा? अलसेशियन है, लंबा…पूरा…बादामी, काला और सफेद मिलाजुला रंग है. कान उस के खड़े रहते हैं.’’

उन की सांस फूलती रही और वे लोगों से पूछते रहे, ‘‘हमारे सीजर को तो आप पहचानते ही होंगे? उसे बाहर घुमाने हम लाते थे. वह लोगों को देखते ही लपकता था. चेन खींचखींच कर हम उसे काबू में रखते थे. उस ने किसी को काटा नहीं, वह बस लपकता था.’’

काफी भटकने के बाद भी न तो नई पीढ़ी को और न ही दादाजी को सीजर का पता लगा. सारा दिन निकल गया, रात हो  गई, किंतु सीजर लौट कर न आया.

सभी को आश्चर्य हुआ कि वह कहां चला गया. गली की कुतिया के पास भी नहीं मिला. इस महल्ले के सारे रास्ते उस के देखेभाले थे, वह रास्ता भी नहीं भूल सकता था. किसी के रोके वह रुकने वाला नहीं था.

दादाजी ने आशंका व्यक्त की, ‘‘किसी ने बांध लिया होगा…बेचारा कैसे आएगा?’’

नई पीढ़ी ने इस आशंका को व्यर्थ माना, ‘‘उसे बांधना सहज नहीं है. वह बांधने वालों का हुलिया बिगाड़ देगा.’’

‘‘दोचार ने मिल कर बांधा होगा तो वह बेचारा क्या करेगा, असहाय हो जाएगा,’’ दादाजी ने हताश स्वर में कहा.

नई पीढ़ी ने उन की इस चिंता पर भी ध्यान न दिया तो वे बोले, ‘‘नगर निगम वालों ने कहीं न पकड़ लिया हो?’’

दादाजी के पुत्र झल्लाए, ‘‘कैसे पकड़ लेंगे…उस के गले में लाइसैंस का पट्टा है.’’

‘‘फिर भी देख आने में क्या हर्ज है?’’ दादाजी ने झल्लाहट की परवा न करते हुए सलाह दी.

पुत्र ने सहज स्वर में उत्तर दिया, ‘‘देख लेंगे.’’

दूसरे रोज भी दिन भर सीजर की तलाश होती रही. नई पीढ़ी ने दूरदूर तक उसे खोजा मगर उस का कहीं पता न लगा. वह जैसे जमीन में समा गया था. दादाजी सड़क की ओर आंखें लगाए बाहर बरामदे में ही डटे रहे. हर आहट पर उन्हें यही लगता रहा कि सीजर अब आया, तब आया.

दिन ढलने तक भी सीजर का जब कोई पता नहीं लगा तो दादाजी ने आदेश दिया, ‘‘जाओ, समाचारपत्रों में चित्र सहित इश्तहार निकलवाओ. लिखो कि सीजर को लाने वाले को 100…नहीं, 200 रुपए इनाम देंगे.’’

नई पीढ़ी भी इश्तहार निकलवाने का विचार कर रही थी. किंतु वे लोग यह सोच रहे थे कि एक दिन और रुक जाएं. किंतु दादाजी तकाजे पर तकाजे करने लगे, ‘‘जाओ, नहीं तो सुबह के अखबार में इश्तहार नहीं निकलेगा.’’

दादाजी का बड़ा पोता सीजर का चित्र ले कर चला तो उन्होंने मसौदा बना कर दिया. साफसाफ लिखा, ‘सीजर का पता देने वाले को या उसे लाने वाले को 200 रुपए इनाम में दिए जाएंगे.’

आधी रात के बाद बाहर के बड़े लोहे के फाटक पर ‘खरर…खरर’ की ध्वनि हुई तो बरामदे में सो रहे दादाजी ने चौंक कर पूछा, ‘‘कौन है?’’

कोई उत्तर नहीं मिला, तो उन्होंने फिर तकिए पर सिर टिका दिया. कुछ देर बाद फिर ‘खरर…खरर’ की आवाज आई. दादाजी ने फिर सिर ऊंचा कर पूछा, ‘‘कौन है?’’

इस बार खरर…खरर ध्वनि के साथ सीजर का चिरपरिचित स्वर हौले से गूंजा, ‘भू…भू…’

इस स्वर को दादाजी ने फौरन पहचान लिया. वे खुशी में पलंग से उठने का प्रयास करते हुए गद्गद कंठ से बोले, ‘‘सीजरिया, बेटा आ गया तू.’’

गठिया के कारण वे फुरती से उठ नहीं पाए. घुटनों पर हाथ रखते हुए जैसेतैसे उठे. बाहर की बत्ती जलाई, बड़े गेट पर दोनों पंजे टिका कर खड़े सीजर पर नजर पड़ते ही वे बोले, ‘‘आ रहा हूं, बेटा.’’

बरामदे के दरवाजे का ताला खोलते- खोलते उन्होंने भीतर की ओर मुंह कर समाचार सुनाया, ‘‘सीजरिया आ गया… सुना, सीजरिया आ गया है.’’

घर भर के लोग बिस्तर छोड़छोड़ कर लपके. दादाजी ने बड़ा फाटक खोला, तब  तक सभी बाहर आ गए. फाटक खुलते ही सीजर तीर की तरह भीतर आया. दुम हिलाते हुए वह सभी के कंधों पर अगले पंजे रखरख कर खड़ा होने लगा. कभी इस के पास तो कभी उस के पास जाने लगा. मुंह के पास अपना मुंह लाला कर दयनीय मुद्रा बनाने लगा. तरहतरह की अस्पष्ट सी ध्वनियां मुंह से निकालने लगा.

कीचड़ सने सीजर के बदन पर खून के धब्बे तथा जख्म देख कर सभी दुखी थे. दादाजी ने विगलित कंठ से कहा, ‘‘बड़ी दुर्दशा हुई सीजरिया की.’’

नई पीढ़ी ने सीजर को नहलायाधुलाया, उस के जख्मों की मरहमपट्टी की, खिलायापिलाया. दादाजी विलाप करते रहे, ‘‘नालायक को इन्फैक्शन न हो गया हो?’’

देर रात को सीजर आ कर दादाजी के पैरों में सोया तो वे उसे सहलाते हुए बोले, ‘‘बदमाश, बाड़ कूद कर चला गया था.’’

सुबह अखबार में सीजर की तसवीर आई. उस तसवीर को सीजर को दिखाते हुए दादाजी चहके, ‘‘देख, यह कौन है? पहचाना? बेटा, अखबार में फोटो आ गया है तेरा…बड़े ठाट हैं तेरे.’’

लेखक- चंद्रशेखर दुबे

Emotional Story : तेरी मेरी कहानी – कैसे बदल गई रिश्तों की परिभाषा

Emotional Story : नींद कोसों दूर थी. कुछ देर बिस्तर पर करवटें बदलने के बाद वह उठ खड़ा हुआ और अपने कमरे के आगे की छोटी सी बालकनी में जा खड़ा हुआ. पूरा चांद साफ आसमान में चुपड़ी रोटी की तरह दमक रहा था… कुछ फूला सा कुछ चकत्तों वाला, लेकिन बेहद खूबसूरत, दूरदूर तक चांदनी छिटकाता… धुले हुए से आसमान में तारे बिखरे हुए थे, बहुत चमकीले, हवा के संग झिलमिलाते. मंद बयार उस के कपोलों को सहला गई थी, आज हवा की उस छुअन में एक मादकता थी जो उसे कई बरस पीछे धकेल गई थी.

तब वह युवा था, बहुत से सपने लिए हुए… जिंदगी को दिशा न मिली थी पर मन में उत्साह था. आज जिंदा तो था पर जी कहां रहा था… एक आह के साथ वह वहां पड़ी कुरसी पर बैठ गया. सिगरेट बहुत दिन से छोड़ दी थी पर आज बेहद तलब महसूस हो रही थी, कमरे में गया और माचिस व सिगरेट की डिबिया उठा लाया, लौटते हुए दोनों बच्चों और पत्नी पर नजर पड़ी. वे अपनी स्वप्नों की दुनिया में गुम थे. अब वे ही उस की दुनिया थे पर आज जाने क्यों दिल हूक रहा था यह सोच कर कि उस की दुनिया कितनी अलग हो सकती थी…

ऐसी ही दूरदूर तक फैली चांदनी वाली रात तो थी, वह उन दिनों हारमोनियम सीखता था. सभी स्वर सधे हुए न थे पर कर्णप्रिय बजा लेता था. जाने चांदनी ने कुछ जादू किया था या फिर दबी हुई कामना ने पंख फैलाए थे. न जाने क्या सोच कर उस ने हारमोनियम उठाया था और बजाने लगा था… ‘एक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है, जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है…’ गीत का दर्द सुरों में पिघल कर दूर तक फैलता रहा था… रात गहरा चुकी थी, चांदनी को चुनौती देती कोई बिजली कहीं नहीं टिमटिमा रही थी पर शब्द जहां भेजे थे वहां पहुंच गए थे.

उस ने क्यों मान लिया था कि गीत उस के लिए बजाया गया था. चार शब्द कानों में बस गए थे… तेरी मेरी कहानी है और तब से दुनिया उस के लिए अपनी और उस की कहानी हो गई थी. वे बचपन में साथ खेले थे, वह लड़का था हमेशा जीतता पर वह कभी अपनी हार न मानती. वह हंसता हुआ कहता, ‘‘कल देखेंगे…’’ तो वह भी, ‘‘हांहां, कल देखेंगे,’’ कह कर भाग जाती. उसे यकीन था एक दिन वह जीतेगी. लड़की थी लेकिन बड़ेबड़े सपने देखती थी. वह उन दिनों की कुछ फिल्मों की नायिका की तरह बनना चाहती थी जो सबला व आत्मनिर्भर थी, एक ऐसी स्त्री जिस पर उस के आसपास की दुनिया टिकी हो.

कसबे के उस महल्ले में ज्यादातर घर एकमंजिले थे. बड़ेबड़े आंगन, एक ओर लाइन से कुछ कमरे, एक कोने में रसोई व भंडार जिस का प्रयोग सामान रखने के लिए अधिक होता था और खाना रसोई के बाहर अंगीठी रख कर पकाया जाता था, वहीं पतलीपतली दरियां बिछा कर खाना खाया जाता था. कोई मेहमान आता तो आंगन में चारपाई के आगे मेज रख दी जाती, गरमगरम रोटियां सिंकतीं और सीधे थाली में पहुंचतीं.

आंगन के बाहर वाले कोने की ओर 2 छोटे दरवाजे थे, शौच व गुसलखाने के. लगभग सभी घरों का ढांचा एकसा था. उस महल्ले में बस एक एकलौता घर तीनमंजिला था उस का. तीसरी मंजिल पर एक ही कमरा था, जिसे उस की पढ़ाई के लिए सब से उपयुक्त माना गया. आनेजाने वालों के शोर से परे वहां एकांत था. मामा के निर्देश थे कि मन लगा कर पढ़ाई की जाए. उस के और पढ़ाई के बीच कुछ न आए. मामा पुलिस में थे. ड्यूटी के कारण हफ्तों घर न आते थे. मामी और उन के 2 बच्चे उन के साथ रहते थे. घर में कुल मिला कर वह, उस की मां, उस के दादाजी, जिन्हें वह बाबा पुकारता था और मामी व उन के बच्चे रहते थे. वह समझ न पाता था कि मामा ने उस की विधवा मां को अकेले न रहने दे कर उसे सहारा दिया या अपना घोंसला न होने के कारण कोयल का चरित्र अपनाया. खैर जो भी कारण रहा हो, मामा उसे बहुत प्यार करते थे. घर में पित्रात्मक सत्ता प्रदान करते थे पर मामी ऐसी न थीं. मामा न होते तो मां से खूब झगड़तीं, शायद उन के मन में कुछ ग्रंथियां थीं. तीनमंजिला घर के भूतल पर वे रहते थे, बाहर बैठक थी और उस के साथ में एक गलियारा आंगन में ला छोड़ता था जहां एक ओर रसोई, सामने एक कमरा और कमरे के भीतर एक और कमरा था. बैठक में बाबाजी रहते थे, अंदर के कमरों में वे सब. पहली और दूसरी मंजिल के कुल 4 कमरों में कभी 3 किराएदार रहते तो कभी 4. उन कमरों का किराया उस के परिवार के लिए पर्याप्त था.

जब से उसे ऊपर वाला कमरा मिला था वह वहीं पर पढ़ाई करने लगा था. कमरे के बाहर छोटी सी 4 ईंटों की मुंडेर वाले छज्जे पर छोटी मेजकुरसी लगा कर वह पढ़ता… जानता था उसे कोई देख रहा है, पर वह किताब से नजरें न हटाता. बहुत होशियार न था पर पढ़ाई तो पूरी करनी ही थी. वह भटक भी नहीं सकता था, मां को दुख नहीं देना चाहता था. मामा प्रेरणा देते थे पर पिता की कमी को कब कोई पूरा कर पाया है? उस का मन पढ़ने में बहुत न था, उसे डाक्टर इंजीनियर न बनना था. कोई बड़े ख्वाब भी न थे, मामा जैसी नौकरी न करनी थी जिस में महीने के 25 दिन शहर से बाहर काटने पड़ें और बाकी के 5 दिन आप के घर वाले छठे दिन का इंतजार करें. उसे पिता सी पुरोहिताई भी नहीं करनी थी. एक समय इंटर पास बड़े माने रखता था. पर अब ऐसा न था. उस पर घर के गुजारे का बोझ न था पर जिंदगी बिताने को कुछ करना जरूरी था… भविष्य के विषय में संशय ही संशय था.

वह बारबार चबूतरे तक चक्कर लगा आती. चबूतरे से छज्जा साफ दिखाई पड़ता था, लेकिन उसे शाम को 8 से 9 बजे तक का बिजली की कटौती वाला समय पसंद था, क्योंकि मिट्टी के तेल के लैंप की आभा में पढ़ने वाले का चेहरा चमक उठता था. वह स्वयं अनदेखा रह कर उसे देख पाती. अब वे बच्चे न रहे थे, किशोरवय को बड़ी निगरानी में रखा जाता था, कोई बंदिश तो न थी, लेकिन पहले की उन्मुक्तता समाप्त हो गई थी. तब वह 10वीं में थी और वह 12वीं में था. वह अकसर सोचती, ‘काश, दोनों एक ही कक्षा में होते तो वह पढ़ाई और किताबों के आदानप्रदान के बहाने ही एकदूसरे से बात कर पाते. यदाकदा मां के काम से ताईजी के पास जाने में सामना हो जाता, पर बात न हो पाती,’ शायद मन के भीतर जो था, वह सामान्य बातचीत करने से भी रोकता था. संस्कारों में बंधे वे 2 युवामन कभी खुल न पाए. उस दिन भी नहीं जब अम्मां ने उसे गला बुनने की सलाई लेने भेजा था लेकिन ताईजी घर पर नहीं थीं और वह बैठक में अकेला था. वह चाह कर भी कह नहीं पाया कि दो पल रुको और वह मन होते भी रुक नहीं पाई. शायद वह तब भी सोच रहा था, ‘कल देखेंगे.’

दादाजी के गुजर जाने के बाद बहुत दिन तक बैठक खाली रही, फिर मां के कहने पर उस ने उसे अपना कमरा बना लिया. दादाजी के कमरे में आते ही उसे लगा वह बड़ा हो गया है. दोस्त पहले ही बहुत न थे, जो थे वे भी धीरेधीरे छूटते गए. मन बहलाव को कुछ तो चाहिए सो उस ने तीसरी मंजिल के कमरे में कबूतरों के दड़बे रख दिए थे. सुबहशाम वह कबूतरों को दानापानी देने ऊपर चढ़ता, कबूतरों को पंख पसारने के लिए ऊपर छोड़ता… और जब उन्हें वापस बुलाने को पुकारता आ आ आ… तो उसे लगता वह पुकार उस के लिए है. वह किसी न किसी बहाने छत पर चढ़ती, कभी कपड़े सुखाने, कभी छत पर सूख रहे कपड़े इकट्ठे करने तो कभी छोटे भाईबहनों को खेल खिलाने.

वह जिस अंगरेजी स्कूल में पढ़ती थी वह कक्षा 12वीं से आगे न था. वह शुरू से अंगरेजी स्कूल में पढ़ी थी. सरकारी स्कूल में जाने का स्वभाव न था… मौसी दिल्ली रहती थीं, उसे वहीं भेज दिया गया. वह भारी मन से चली थी, जाने से पहले की रात चांद पूरा खिला था, उस के कान हारमोनियम की आवाज को तरसते रहे… काश, एक बार वह सुन पाती पर उस रात कहीं कोई संगीत न था.

रात आंखों में कटी और सुबह तैयार हो गई. मां मौसी के घर छोड़ने गई थी. वह पिता की बात गांठ बांध कर साथ ले गई थी. मन लगा कर पढ़ना और कुछ बन कर लौटना.

वह पढ़ती रही, बढ़ती रही, यह संकल्प लिए कि कुछ बन कर ही लौटेगी. आज 10 बरस बाद लौटी. पिता बहुत खुश, मां बारबार आंख के कोने पोंछतीं, उसे देखती निहाल हो रही हैं. लड़की पढ़लिख कर सरकारी अफसर बन गई, आला अधिकारी. मौका लगते ही वह छत पर जा पहुंची. सब बदल गया था… कहीं कोई न था. महल्ले के ज्यादातर घर दोमंजिले हो गए थे, दूर कुछ तीनचार मंजिले घर भी दिखाई दे रहे थे.

शाम को बाहर चबूतरे पर निकली ही थी कि देखा एक छोटा बालक तीनमंजिले घर की देहरी पार कर बाहर निकल आया था, घुटनों के बल चलते उस बालक को उठाने का लोभ वह संवरण न कर पाई, ‘कहीं यह?’

वह उसे पहुंचाने के बहाने घर के भीतर ले गई थी. तेल चुपड़े बालों की कसी चोटी, सिर पर पल्ला, गोरी, सपाट चेहरे वाली एक महिला सामने आई और अपने मुन्ना को उस की बांहों में झूलते देख सकपका गई.

एक अजब सा क्षण, जब आमनेसामने दोनों के प्रश्न चेहरे पर गढ़े होते हैं किंतु शब्द खो जाते हैं… और एक मसीहा की तरह ताईजी आ गई थीं… ‘अरे, बिट्टो तुम, अभी तो शन्नो की अम्मां से सुना कि तुम आई हो… कितने बरस बाहर रहीं, आंखें तरस गईं तुम्हें देखने को… बहुत बड़ा कलेजा है तुम्हारी मां का जो इत्ती दूर छोड़े रही… बहू, रजनी जीजी के पैर छू कर आशीर्वाद लो, जानो कौन हैं ये?’ हां अम्मां, मैं समझ गई थी.

वह अचानक जिज्जी और बूआ बन गई.

तभी वह आया था, सामने के बाल उड़ चुके थे, सुना था किसी दुकान पर सहायक लगा था… खबरें तो कभीकभार मिलती रही थीं, उस के ब्याह की खबर भी मिली थी पर खबर मिलने और प्रत्यक्ष देखने में बड़ा अंतर होता है. इस सच से अब रूबरू हुई. 2 बच्चों का पिता 30-32 वर्ष का वह आदमी उस की कल्पना के पुरुष से बिलकुल अलग था.

पल भर के लिए वह वहां नहीं थी, मानो 10 सदी से लगने वाले 10 बरसों में उसे खोजने का प्रयास कर रही थी, देखना चाह रही थी कि उस के चेहरे की लकीरें इतना कैसे गहरा गईं.

उस ने नाम से संबोधित करते हुए कहा था… ‘‘रजनी, बैठो. खाना खा कर जाना…’’ उफ्फ, वह औपचारिकता भरी आवाज उस का कलेजा चीर गई थी. कसी चोटी वाली एक आत्मीयता भरी नजर भर तुरंत रसोई में चली गई थी, वह समझ नहीं पाई कि वह भोजन लगाने का निमंत्रण था या उस के लिए प्रस्थान करने का संकेत. वह क्षमा याचना सी करती, मां के इंतजार का बहाना कर ताईजी को प्रणाम कर लौट आई थी.

एक गहरी निश्वास के साथ उस के मुंह से निकला… ‘अब कल न होगी.’

वह समझ गया था कि कहीं कुछ चटका है, भीतर या बाहर, यह अंदाजा नहीं कर पा रहा था.

Romantic Story : सावधानी हटी दुर्घटना घटी – आखिर क्या हुआ था सौजन्या के साथ?

Romantic Story : ‘‘सौजन्या तुम अब तक यहीं बैठी हो? घर नहीं गईं?’’ रीमा सौजन्या को अपने कक्ष में लैपटौप में व्यस्त देख चौंक गई. ‘‘आओ रीमा बैठो. घर जाने का मन नहीं कर रहा था. इसीलिए समाचार आदि देखने लगी. यह इंटरनैट भी कमाल की चीज है. समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता,’’ सौजन्या बोली.

‘‘हां, वह भी जब तुम विवाह डौट कौम पर व्यस्त हो,’’ रीमा हंसी. ‘‘तुम भी उपहास करने लगीं. विवाह

डौट कौम मेरा शौक नहीं मजबूरी है. सोचती हूं कोई ठीकठाक सा प्राणी मिल जाए तो समझो मैं चैन से जी सकूंगी,’’ सौजन्या बड़े दयनीय ढंग से मुसकराई.

‘‘समझ में नहीं आता तुम्हें कैसे समझाऊं… एक बार नवीन से मिल तो लो. वह भी तुम्हारी तरह हालात का मारा है. पत्नी ने 3 माह की मासूम बच्ची को छोड़ कर आत्महत्या कर ली. बेचारा कोर्टकचहरी के चक्कर में फंस कर बुरी तरह टूट चुका है,’’ रीमा ने पुन: अपनी बात दोहराई. ‘‘तुम भी रीमा… मैं तो सोचती थी तुम मेरी परम मित्र हो. मुझे और मेरी मजबूरी को भली प्रकार समझती हो. मैं तो स्वयं अपने तलाक के केस में उलझ कर रह गई थी. जीवन में कड़वाहट के अलावा कुछ बचा ही नहीं था. 10 साल लग गए उस मकड़जाल से निकलने में. सोचा था तलाक के बाद खुली हवा में सांस ले पाऊंगी, पर अब शुभचिंतक पीछे पड़े हैं. एक तुम्हारे नवीन का ही प्रस्ताव नहीं है मेरे सामने. दूरपास के संबंधियों को अचानक मेरी इतनी चिंता सताने लगी है कि मेरे लिए विवाह के प्रस्तावों की वर्षा होने लगी है,’’ सौजन्या एक ही सांस में बोल गई.

‘‘तो इस में बुराई ही क्या है? अब तो तुम्हारा तलाक भी हो गया है. कब तक यों ही अकेली रहोगी? अपनी नहीं तो अपने मातापिता की सोचो. तुम्हारी चिंता में घुल रहे हैं… तुम तो स्वयं समझदार हो. तुम्हारे भाईबहन अपनी ही दुनिया में इतने व्यस्त हैं कि तुम्हारी खोजखबर तक नहीं लेते,’’ रीमा भी कब चुप रहने वाली थी. ‘‘मैं ने कब मना किया है. मैं तो स्वयं अपने जीवन से ऊब गई हूं. पर समस्या यह है कि सभी प्रस्ताव तुम्हारे कजिन नवीन जैसे ही हैं. मैं ने अपनी मुक्ति के लिए इतनी लंबी लड़ाई लड़ी है कि मैं किसी और के घावों पर मरहम लगाने की हालत में नहीं हूं. मुझे तो कोई ऐसा चाहिए जो मेरे घावों पर मरहम लगा सके.’’

‘‘ठीक है, जैसा तू ठीक समझे. मैं तो तुझे खुश देखना चाहती हूं. मन को मन से राह होती है. पर जब तुम्हें कोई मनचाहा साथी मिल जाए तो बताना जरूर. अकेले ही कोई निर्णय मत ले लेना. इस बार तो हम खूब ठोकबजा कर देखेंगे ताकि बाद में पछताना न पड़े.’’ ‘‘वही तो. मैं तो ऐसा जीवनसाथी चाहती हूं, जो मेरी नौकरी और मोटे वेतन के लालच में नहीं, मैं जैसी हूं मुझे वैसी स्वीकार कर ले,’’ सौजन्या भीगे स्वर में बोली तो रीमा का मन भी भर आया.

दोनों बचपन की सहेलियां थीं और एकदूसरी पर जान छिड़कती थीं. रीमा अपने 2 बच्चों और पति के साथ अपने घरसंसार में सुखी थी, तो सौजन्या अपने नारकीय वैवाहिक जीवन से मुक्त होने के संघर्ष में टूट चुकी थी. 10 सालों के लंबे संघर्ष के बाद उसे पीड़ा से मुक्ति तो मिल गई पर इन 10 सालों के अपमान, तिरस्कार और कड़वाहट को भूल पाना सरल नहीं था. उस पर शुभचिंतकों द्वारा लाए गए नितनए विवाह के प्रस्ताव उस का जीना दूभर कर रहे थे. अत: उस ने अपने जीवन की बागडोर दृढ़ता से अपने हाथों में थामने का निर्णय ले लिया. दूसरा विवाह वह करेगी पर अपनी शर्तों पर. अपने भावी वर का चुनाव वह स्वयं करेगी. वह नहीं चाहती थी कि कोई उस पर तरस खा कर विवाह करे या उस की नौकरी और ऊंचे वेतन के लालच में विवाह के बंधन में बंधे और उस का जीवन नर्क बना दे. अंतर्मुखी सौजन्या को इन हालात में ‘इंटरनैट’ देवदूत की भांति लगा था और वह उसी में अपने सपनों के राजकुमार की खोज में जुट गई थी. 1 सप्ताह पहले जब रीमा अचानक उस के कक्ष में चली आई थी तो वह विभिन्न इंटरनैट पटलों पर भावी वरों के जीवनविवरण देखने में व्यस्त थी.

आशीष कुमार नाम के एक युवक का फोटो और जीवनविवरण उसे इतना भा गया कि वह देर तक उस फोटो को हर कोण से देख कर मंत्रमुग्ध होती रही. जीवनविवरण का हर शब्द उस ने कई बार पढ़ा और पंक्तियों के बीच छिपे अर्थ को ढूंढ़ने का प्रयत्न करती रही. पहली बार उसे लगा कि आशीष को कुदरत ने उसी के लिए बनाया है. चेहरे का हर भाव उसे दीवाना सा किए जा रहा था. फिर तो सौजन्या मौका मिलते ही अपना लैपटौप खोल कर बैठ जाती और मंत्रमुग्ध सी अपने प्रिय को निहारती रहती.

सौजन्या को लगता कि अब उसे छिप कर रोमांस करने की जरूरत नहीं है. अब तो वह डंके की चोट पर अपने प्यार का इजहार करेगी. आशीष भी उस के प्रति अपना प्रेम प्रकट करने में पीछे नहीं रहता था. उस का फोटो देख कर ही वह इतना मंत्रमुग्ध हो गया था कि उस से मिलने की प्रबल इच्छा प्रकट करता रहता था. पर न जाने क्यों सौजन्या ही उस से मिलने का साहस नहीं जुटा पा रही थी. वह एक ही तर्क देती, पहले एकदूसरे को जान लें, समझ लें तब मिलने की सोचेंगे. सौजन्या के मन में अजीब सी जड़ता ने घर कर लिया था. कहीं मिल कर निराशा हाथ लगी तो? कभी सोचती कि उस के जीवन में जो कुछ घट रहा है कहीं मात्र स्वप्न तो नहीं? कहीं आंखें खोलते ही सबकुछ विलुप्त तो नहीं हो जाएगा? क्यों न इस स्वप्न को यों ही चलने दे और उस का रसास्वादन करती रहे.

उधर आशीष का उस से मिलने का हठ बढ़ता ही जा रहा था. सौजन्या का एक ही उत्तर होता कि पहले हम एकदूसरे को भली प्रकार समझ तो लें. ‘‘हमारा परिचय हुए 3 माह से अधिक हो गए हैं. अधिक समझने के लिए एकदूसरे से मिलना भी तो जरूरी है,’’ एक दिन आशीष अनमने स्वर में बोला.

‘‘अभी नहीं, मैं जब मानसिकरूप से तुम से मिलने को तैयार हो जाऊंगी तो स्वयं तुम्हें सूचित कर दूंगी,’’ सौजन्या ने दोटूक उत्तर दिया. अब सौजन्या को रीमा की याद आई, ‘‘रीमा, आज शाम को घर आना. कुछ जरूरी बातें करनी हैं,’’ उस ने रीमा को फोन कर कहा.

‘‘ऐसी क्या जरूरी बातें हैं, जो तुम औफिस में नहीं कर सकतीं?’’ रीमा ने उत्सुक स्वर में पूछा. ‘‘यह तो घर आ कर ही पता चलेगा,’’ सौजन्या ने टाल दिया.

सौजन्या घर पहुंची ही थी कि रीमा आ पहुंची. उस का सामना पहले सौजन्या की मां से हुआ. ‘‘नमस्ते आंटी,’’ रीमा उन्हें देखते ही बोली.

‘‘नमस्ते, तुम तो ईद का चांद हो गई हो बेटी. कभीकभी हम से भी मिलने आ जाया करो,’’ वे बोलीं. ‘‘2 माह पहले ही तो आई थी आंटी,’’

रीमा बोली. ‘‘हां, और मैं ने तुम से कुछ कहा था पर उस का कोई नतीजा तो सामने आया नहीं. विवाह का नाम सुनते ही सौजन्या बेलगाम सांड़ की तरह भड़क उठती है.’’

सौजन्या की मां रीमा से बातें कर ही रही थीं कि सौजन्या अपने कमरे के बाहर की बालकनी में प्रकट हुई, ‘‘अरे रीमा, वहां क्या कर रही हो? ऊपर आओ न.’’ ‘‘जाओ बेटी, हम वृद्धों के पास तुम्हारा

क्या काम?’’ ‘‘क्या मां, छोटी सी बात पर भड़क उठती हो. थोड़ी देर में हम दोनों नीचे आती हैं,’’ सौजन्या बोली.

‘‘जाओ रीमा बेटी, लैपटौप खोल कर बैठी होगी. आजकल वही इस का सबकुछ है. अपने परिवार या समाज की तो इसे चिंता ही नहीं है.’’ ‘‘आंटी, अपना गुस्सा मुझ पर उतार रही थीं. वे शायद समझती नहीं कि सहेली हूं तो क्या हुआ? औफिस में तो तू मेरी बौस है. मेरी बात भला क्यों मानने लगी,’’ रीमा सौजन्या के कक्ष में पहुंचते ही आहत स्वर में बोली.

‘‘अब दूंगी एक, पर छोड़ ये सब, यह देख,’’ सौजन्या ने विवाह डौट कौम पर आशीष का फोटो और जीवनविवरण निकाल लिया, ‘‘देख तो कैसा है?’’ ‘‘वाऊ, यह तो किसी फिल्मी हीरो की तरह लग रहा है. कब से चल रहा है ये सब?’’ रीमा आशीष का विवरण पढ़ते हुए बोली.

‘‘3 माह पहले मिले थे हम दोनों.’’ ‘‘कहां?’’

‘‘यहीं इंटरनैट पर और कहां.’’ ‘‘तो अभी मेलमुलाकात भी नहीं हुई? विवाह भी इंटरनैट पर ही करोगी क्या?’’ रीमा हंस दी.

‘‘आशीष तो बहुत दिनों से मिलने की रट लगाए हैं. मेरी ही हिम्मत नहीं होती. तुम चलोगी मेरे साथ?’’ ‘‘मैं क्यों कबाब में हड्डी बनने लगी? अब तुम छोटी बच्ची नहीं हो. अपने निर्णय स्वयं लेने सीखो. औफिस में तो लाखों के वारेन्यारे करती हो और यहां किसी से मिलने से कतरा रही हो?’’ रीमा ने समझाना चाहा.

‘‘यही पूछना था तुम से. तुम ने कहा था न कि कोई पसंद आए तो बताना. तो सब से पहले तुम्हें ही बता रही हूं.’’ ‘‘ओह हो, तुम अभी से शरमा रही हो. चेहरे पर भी लाली छा रही है. चल अभी इस से मिलने का दिन और तिथि तय कर लो.’’

‘‘रविवार कैसा रहेगा?’’ ‘‘बहुत बढि़या, छुट्टी का दिन है. दोनों पूरा दिन साथ बिता सकते हो. एकदूसरे को जाननेसमझने में मदद मिलेगी.’’ तुरंत सौजन्या और आशीष के बीच संदेशों का आदानप्रदान हुआ और रविवार के दिन मिलने की बात तय हो गई.

‘‘आंटी, अब मत डांटना मुझे. आप की इच्छा पूरी होने जा रही है. बैंडबाजा बजने में अधिक देर नहीं है अब,’’ रीमा जातेजाते सौजन्या की मां से बोली. ‘‘तुम्हारे मुंह में घीशक्कर, पर पूरी बात तो बताती जाओ,’’ वे बोलीं.

‘‘वह तो आप सौजन्या से ही पूछना. मुझे देर हो रही है. घर में सब इंतजार कर रहे होंगे,’’ कह रीमा सरपट भागी. मगर दूसरे दिन कुछ अप्रत्याशित सा घट गया. सौजन्या एक मीटिंग में व्यस्त थी कि उस के सहायक ने एक चिट ला कर दी. चिट पर आशीष कुमार का नाम देखते ही उस के होश उड़ गए. वह बाहर की ओर लपकी.

आशीष लौबी में बैठा उस का इंतजार कर रहा था. ‘‘आप यहां? इस समय?’’ सौजन्या के मुंह से किसी प्रकार निकला.

‘‘रहा नहीं गया. इसीलिए मिलने चला आया. मैं रविवार तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता. चलो छुट्टी ले लो कहीं घूमनेफिरने चलते हैं,’’ आशीष बोला. ‘‘यह क्या पागलपन है. मेरी एक जरूरी मीटिंग चल रही है. मैं छुट्टी नहीं ले सकती… इस तरह यहां क्यों चले आए? देखो सब की निगाहें हम दोनों पर ही टिकी हैं,’’ सौजन्या झेंप गई थी पर आशीष अपनी ही जिद पर अड़ा था.

बड़ी मुश्किल से सौजन्या ने आशीष को समझाबुझा कर भेजा और रविवार को मिलने की बात दोहराई. लंच के समय रीमा ने सौजन्या की खूब खिंचाई की, ‘‘लगता है आशीष बाबू से अब यह दूरी सहन नहीं हो रही.’’

‘‘पर इस तरह औफिस में आ धमकना? मुझे तो अच्छा नहीं लगा.’’ ‘‘चलता है सब चलता है. प्रेम और जंग में सब जायज है,’’ रीमा हंस दी.

शुक्रवार को सौजन्या घर पहुंची ही थी कि रीमा आ पहुंची. ‘‘क्या हुआ? आज औफिस क्यों नहीं आईं और अब इस तरह अचानक?’’ सौजन्या चौंक गई.

‘‘इतने प्रश्न मत किया करो. अपने कमरे में चलो. जरूरी बात करनी है,’’ रीमा बोली और फिर दोनों सहेलियां सौजन्या के कमरे में जा बैठीं. रीमा ने चटपट ‘विवाहविच्छेद डौट कौम’ नाम की साइट खोली और एक फोटो और जीवनविवरण ढूंढ़ निकाला.

‘‘यह देखो, पहचाना?’’ रीमा बोली. ‘‘यह तो आशीष है.’’

‘‘नहीं, नीचे पढ़ो. यह रूबीन है. यहां इस का नाम, काम, धाम सब बदला हुआ है. यहां ये महोदय सरकारी अफसर नहीं चिकित्सक हैं. अविवाहित नहीं तलाकशुदा हैं. पर फोन नंबर वही है. जाति, धर्म भी बदल गए हैं.’’ ‘‘उफ, ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है?’’ सौजन्या ने सिर पकड़ लिया.

‘‘स्वयं पर तरस खाना छोड़ दो सौजन्या. ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है. चलो नवीन से मिलने चलते हैं.’’ ‘‘मैं किसी से मिलने की स्थिति में नहीं हूं.’’

‘‘मैं तुम्हें उस से मिलवाने नहीं ले जा रही. हम उस से इन आशीष उर्फ रूबीन महोदय के विरुद्ध सहायता मांगेंगी. इस धोखेबाज को दंड दिलाए बिना मुझे चैन नहीं मिलने वाला. नवीन साइबर अपराध शाखा में कार्यरत है,’’ रीमा नवीन को फोन मिलाते हुए बोली. कुछ ही देर में दोनों सहेलियां नवीन के सामने बैठी सौजन्या की आपबीती सुना रही थीं.

‘‘मैं ने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि औनलाइन भी इस तरह की धोखाधड़ी होती है. मैं तो सोचती थी कि ये डौट कौम कंपनियां सबकुछ पता लगा कर ही किसी का विवरण पंजीकृत करती हैं.’’ ‘‘धोखाधड़ी कहां नहीं होती सौजन्याजी. हमारे अपने भी हमें धोखा दे देते हैं. हमें सावधानी से काम लेना चाहिए. यों समझ लीजिए कि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी,’’ नवीन बोला और फिर देर तक फोन करने में व्यस्त रहा.

‘‘कुछ देर तक यह आशीष उर्फ रूबीन मुझ से बात करता रहा. पर जब मैं ने पूछताछ शुरू की तो फोन काट दिया. पर आप चिंता न करें. आप चाहें तो अपनी जानकारी गुप्त रखते हुए इस व्यक्ति के विरुद्ध रपट लिखवा सकती हैं.’’ ‘‘नहीं, मैं किसी चक्कर में नहीं पड़ना चाहती. वैसे भी मैं तो बालबाल बच गई… रीमा ने बचा लिया मुझे नहीं तो पता नहीं क्या होता. मैं बहुत डर गई हूं… अब कभी इस झंझट में नहीं पड़ने वाली.’’

‘‘वही तो मैं समझा रहा हूं. उस ने मानसिक संताप दिया है आप को. इस के लिए उसे 3 साल की सजा भी हो सकती है,’’ नवीन ने समझाया. ‘‘मैं कुछ समय चाहती हूं,’’ सौजन्या ने हथियार डाल दिए थे.

धीरेधीरे जीवन अपने ही ढर्रे पर चलने लगा था. न सौजन्या ने आशीष वाली घटना का कभी जिक्र किया न रीमा ने पूछा. रीमा को लगा कि उस घटना को किसी बुरे सपने की तरह भूल जाना ही ठीक था. अचानक एक दिन नवीन रीमा के घर आ धमका. ‘‘मैं तो खुद तुम से मिल कर धन्यवाद देना चाहती थी. तुम ने उस प्रकरण को कितनी कुशलता से संभाला वरना तो पता नहीं मेरी सहेली सौजन्या का क्या हाल होता,’’ रीमा ने आभार व्यक्त किया.

‘‘रीमा, आभार तो मुझे तुम्हारा व्यक्त करना चाहिए. सौजन्या मेरे जीवन में सुगंधित पवन के झोंके की तरह आई है. शाम की प्रतीक्षा में दिन कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता.’’ ‘‘क्या? फिर से कहो, सुगंधित पवन का झोंका और न जाने क्या? लगता है आजकल सौजन्या तुम्हें घास डालने लगी है,’’ रीमा मुसकराई.

‘‘घास तो फिलहाल हम ही डाल रहे हैं, पर जीवन में कुछ ऐसा घटित हो रहा है जो पहले कभी नहीं हुआ था.’’ ‘‘मैं सौजन्या से बात करूंगी,’’ रीमा ने कहा.

‘‘नहीं, तुम ऐसा कुछ नहीं करोगी. उसे भनक भी लग गई कि मैं उस पर डोरे डाल रहा हूं तो भड़क उठेगी. यह समस्या मेरी है. इसे सुलझाने का भार भी मेरे ही कंधों पर है,’’ कह नवीन कहीं खो सा गया. मगर रीमा उस की आंखों में लहराते प्रेम के अथाह सागर को साफ देख पा रही थी. पहली बार रीमा को लगा कि अपने करीबी लोगों को भी कितना कम जानते हैं हम. पर वह खुश थी सौजन्या के लिए और नवीन के लिए भी जो अनजाने ही निशांत की ओर बढ़े जा रहे थे.

Love Story : नजरिया बदल रहा – आखिर क्या हुआ अपर्णा के साथ?

Love Story : अपर्णा आधुनिक युवती थी. ऊपरी चकाचौंध, हाई लाइफस्टाइल उसे आकर्षित करता था. तभी तो शीर्ष के साथ अमेरिका में बसने का सपना देखने लगी थी. लेकिन जब हकीकत की दुनिया में देखा तो… ‘‘देख अपर्णा, इधर आ जल्दी.’’ ‘‘क्या है मम्मा?’’ अपर्णा वीडियो पौज कर मोबाइल हाथ में लिए चली आई थी.

‘‘वह देख, पार्थ नीचे खड़ा अपने गमलों को कितने प्यार से पानी दे रहा है. सादे कपड़ों में भी कितना हैंडसम दिखता है.’’

अपर्णा ने मां रागिनी को घूर कर देखा. ‘‘यह देख, कितना हराभरा कर दिया है उस ने यह बगीचा. अभी आए कुल 2 महीने ही तो हुए हैं इन लोगों को यहां,’’ वह फुसफुसा कर बताए जा रही थी.

‘‘मम्मा, आप तो पीछे ही पड़ जाते हो. बस, कोई लड़का दिख जाना चाहिए आप को. उस की खूबियां गिनाने लग जाती हो. बोल दिया न, मुझे नहीं करनी शादीवादी, वह भी एक सरकारी नौकरी वाले से कतई नहीं. शगुन दी की शादी की थी न सरकारी डाक्टर से. बेचारी आज तक वहीं बनारस में अटकी अस्पताल, मंदिर और घाटों के दर्शन कर रही हैं.’’

‘‘तेरी प्रौब्लम क्या है. स्मार्ट है, हैंडसम है पार्थ, दिल्ली विश्वविद्यालय में बौटनी का लैक्चरर है. उस का अपना घर है. उस पर से अकेला लड़का है, एक बहन है, बस.’’

‘‘हां, एक बहन है, जिस की शादी हो चुकी है. बड़े भले लोग हैं. पिता डिग्री कालेज में इंग्लिश के प्रोफैसर थे, रिटायर हो चुके हैं. मां स्कूल टीचर थीं, रिटायर हो चुकीं. अपनी ही जाति के हैं…और कुछ? मम्मा कितनी बार बताओगे मुझे यही बातें,’’ वह खीझी सी एक सांस में सब बोल कर ही ठहरी थी और रागिनी को खींच कर अंदर ले आई थी.

‘‘अभीअभी नौकरी लगी है उस की, रिश्तों की भरमार है उस के लिए, कमला बहनजी बता रही थीं. कोई रुका थोड़े ही रहेगा तेरे लिए,’’ रागिनी ने कहा.

‘‘हां, तो किस ने कहा है रुकने के लिए. मैट्रिमोनियल में देखो, हजार मिलेंगे एक से एक, यूएस, इंग्लैंड में वैल सैटल्ड, हैंडसम लड़के. प्रिया, शिखा, रूबी, जया मेरी सारी खास सहेलियां कोई अमेरिका, आस्ट्रेलिया तो कोई कनाडा, लंदन की उड़ानें भर रही हैं या तैयारी में हैं. किसी की शादी हो चुकी है तो किसी की इंगेजमैंट. आप को तो मालूम है, प्रिया तो पिछले महीने ही शादी कर लंदन चली गई. मुझे तो वर्ल्ड के बैस्ट प्लेस जाना है यूएसए, उस में भी न्यूयौर्क.’’

‘‘हम से इतनी दूर जाने की सोच रही है, अप्पू. तेरे और शगुन के अलावा कौन है हमारा. पास है तो शगुन कभीकभी आ जाती है. कभी हम भी मिल आते हैं. तू आसपास भारत में ही कोई ढूंढ़. तेरे लिए व हमारे लिए, यही सही रहेगा. शगुन तो समझदार है, सब संभालना जानती है. दुनियादारी का पता है उसे. तुझे तो कुछ भी नहीं मालूम. बस, तेरे परीलोक जैसे सपने. मैट्रिमोनियल से अनजाने लोगों से रिश्ता कर तुझे परदेस भेज दें, कुछ गड़बड़ हुई तो… न्यूज तो देखतीपढ़ती है न?’’

‘‘शीर्ष की तो याद होगी आप को, जो मेरे साथ बीएससी में था. जिस ने एक दिन हमें अपनी कार में लिफ्ट दी थी, आप का पैर मुड़ गया था मार्केट में, जोर की मोच आ गई थी आप को. इतने सालों बाद वह कुछ समय पहले अचानक मुझे मौल में मिल गया था. उस की कंपनी उसे यूएस भेज रही है वह भी सीधा न्यूयौर्क. 3 साल का असाइनमैंट है. अपने पेरैंट्स को मना रहा था. वे नहीं चाहते कि जाए और यदि जाना ही है तो शादी कर के जाए. पर वह चला गया.

‘‘मुझे से बोल रहा था. ‘वहीं कोई दूसरी कंपनी जौइन कर लूंगा. पागल हूं जो इतनी अच्छी जगह छोड़ इंडिया वापस रहने आऊंगा. हां, शादी जरूर भारत की लड़की से करूंगा ताकि घर का काम बढि़या हो सके और घर का खाना भी मिल सके. हाहा वह रुक कर हंसा था, फिर बोला. तब तक तुम अपनी पीएचडी पूरी कर लो. अगर वेट किया मेरा, तो शादी तुम्हीं से करूंगा. मेरी पहली पसंद तो तुम ही थीं. यह बात और है मैं ने कभी जाहिर नहीं किया.’ कह कर वह मुसकरा रहा था. मैं आप को बताने ही वाली थी.’’

‘‘अरे, तुझे बना रहा है. वह भी कैसा लड़का है जैसे मांबाप से कोई मतलब नहीं, उन्हें भी ले जाने की बात कहता तो भी बात समझ आती. वह तेरी क्या कद्र करेगा.’’

‘‘नहीं मम्मा, फोन नंबर दिया है उस ने मुझे, उस पर उस से मेरी कई बार बात भी हुई है. कई बार उस के फोन भी आ चुके हैं. उस ने प्रौमिस किया है, 6 महीनों में लौटने वाला है, तब आप सब से मिलेगा अपने मम्मीपापा के साथ, शादी की बात करने.’’

‘‘वाह, कब आएगा, कब बात करेगा. इतना ही था तो उन्हें हम से मिलवा कर क्यों नहीं गया? एक नंबर का फेंकू लगता है. पापा से बात करती हूं, ला, पता दे उस का. हम खुद ही जा कर उस के मांबाप से बात करते हैं.’’

‘‘मैं कभी घर नहीं गई उस के, न ही उस से कभी पता पूछा. शायद कालकाजी में घर है उस का.’’

‘‘कमाल है, घरपरिवार भी देखा नहीं. और इतना बड़ा फैसला ले लिया. सच में बच्चों वाला दिमाग है तेरा. कब आएगा, कब बात करेगा वह. 27 की हो चली है तू. धीरगंभीर स्थिर चित्त, पार्थ जैसा ही कोई संभाल सकता है तुझे, जान रही हूं.’’ उन्हें कुछ इसी थीम पर गिरीश कर्नाड और शबाना आजमी की ‘स्वामी’ फिल्म याद हो आईर् थी. जिद्दी चंचल लड़की और गंभीर लड़का…

‘‘एक बार फिर अच्छी तरह सोच ले. फिर कहूंगी पार्थ तेरे लिए बिलकुल फिट है. वे लोग भी तुझे पसंद करते हैं.’’

‘‘कहां हो भई दोनों मांबेटी. देखो कुमार के घर का बना गरम इडलीसांभर फिर दे गए और मेरी प्रिय मखाने की खीर भी. विश्व में बढ़ रहे करोना संकट के लिए टीवी पर प्रधानमंत्री क्या बोलते हैं. यहां भी लौकडाउन होना तो तय है.’’ पापा नंदन कुमार की आवाज पर दोनों टीवी रूम में चली आईं.

21 दिनों का लौकडाउन हुआ, फिर 19 दिनों का. सभी बताए नियमों का पालन कर रहे थे. पार्थ और अपर्णा की भी छुट्टी हो गईर् थी. तालीथाली, दीयाबत्ती अभियान में अपर्णा ने पूरी बिल्ंिडग में सब से अधिक जोरशोर से हिस्सा लिया. नीचे पार्थ के घर होहल्ला न सुन कर अपर्र्णा मुंह बिचकाती रही. जरा भी जज्बा नहीं देश के लिए. कैसा अजीब आदमी है, अकड़ू खां बना बैठा होगा कहीं, प्रवक्ता पार्थ. अंधेरे में अपनी उन किताबों में भी तो नहीं खो सकता इस समय. कुमार साहब ने दीप बाहर रख दिए थे, तो थाली वाले दिन मिसेज कुमार ने मंदिर की घंटी टुनटुना दी थी. बस, हो गया देशप्रेम. अपर्णा को खल रहा था. पार्थ तो वैसे भी कम ही बाहर निकलता. उसे यह सब बचकाना लगता. हां, सब्जीफल, दूध लाने के लिए जरूर जाता, मांपापा को जाने नहीं देता.

एक दिन कुमार फिर घर आए, बोले, ‘‘भाईसाहब, बहनजी, आप भी पार्थ से ही मंगा लिया कीजिए. आप क्यों जाएंगे, यह ही ले आया करेगा न. बुजुर्गों और छोटे बच्चों को ही ज्यादा खतरा है कोरोना से.’’

तो रागिनी ने घूमने को उतावली अपर्णा को सामान लाने के बहाने पार्थ के साथ भेज दिया. एक पंथ दो काज. शायद, पार्थ को पसंद ही करने लगे.

सामान ले कर अपर्णा पार्थ की कार में पहले ही आ बैठी. पार्थ अभी लाइन में था. तब तक उस ने शीर्ष को फोन लगा दिया. इतने दिनों से फोन लग नहीं रहा था. आज कौल कनैक्ट हो गई. तो उस ने शीर्ष की पूरी खबर ली. बहुत दिनों से फोन नहीं आया, न मिला तुम्हारा फोन. अधिक बिजी हो या मुझे भूल गए. किसी और के चक्कर में तो नहीं पड़ गए. क्या हाल है वहां? न्यूज में तो तुम्हारा न्यूयौर्क सब से अधिक कोरोना की चपेट में है. दिल घबरा रहा था, और तुम हो कि फोन ही नहीं उठा रहे. तुम सेफ तो हो?’’

‘‘अरे, यहां सब मजे में हैं. छुट्टियां हो गई हैं. अपार्टमैंट से ही काम होता है औनलाइन. मुझे क्या होना है. स्टैच्यू औफ लिबर्टी के साथ हूं. और तुम सब?’’

‘‘ठीक है सब. छुट्टियां यहां भी हो गई हैं. अच्छा, तुम्हारे पेरैंट्स तो ठीक हैं? कौन है उन के पास? कैसे कर रहे होंगे मैनेज. उन का घर का पता, फोन नंबर दो, तो कभी जरूरत पर मदद को परमिशन ले कर पहुंचा जा सकता है. मम्मा को सब बता दिया, वे मिलना भी चाहती हैं.’’

‘‘पापा की तो डेथ हो गई.’’

‘‘ओह, वैरी सैड ऐंड पेनफुल. कब? कैसे?’’

‘‘10 दिन तो हो ही गए, कोरोना से. मम्मी को भी आइसोलेशन में रखा गया है. रिश्तेदारों को भी जाने नहीं दे रहे. यहां से जाना ही पौसिबल नहीं था. सारी फ्लाइटें बंद. मामा लोग उन से फोन से कनैक्टेड हैं और मैं भी. क्या कर सकता हूं.’’

‘‘फिर क्या कह रहे थे, मैं मजे में हूं?’’

‘‘तो, मैं तो ठीक ही हूं. फादरमदर की वैसे भी उम्र थी ही, जाना तो वैसे भी था, फिर मैं इंडिया आ कर भी क्या कर लेता, न देख सकता न छू सकता. अच्छा है यहां सेफ हूं. कुछ हुआ तो बैस्ट इलाज हो जाएगा. चिल्ल… डोंट वरी फौर मी.’’

‘‘तुम अपने फादरमदर के लिए ही बोल रहे हो न?’’ अपर्णा को आश्चर्य हो रहा था. ऐसा निर्मोही, स्वार्थी बेटा कैसे हो सकता है? क्या फायदा ऐसे एडवांस शहर, ऊंचे स्तर और पैसों का जो ऐसे समय भी मांबाप के पास न रह सके, न आ सके और फिर उन के प्रति मन में ऐसी भावना रखे.

‘‘क्या सोचने लगी भई, कोई तुम्हें तो नहीं मिल गया? अरे दोचार महीनों की बात है. सबकुछ नौर्मल हो जाएगा. वैज्ञानिक लगे हुए हैं, दवावैक्सीन जल्द ही ढूंढ़ निकालेंगे ये लोग. शादी कर के तुम्हें भी यहां ले आऊंगा. फिर अपनी तो घरबाहर ऐश ही ऐश होगी. हाहा, ओके, औनलाइन काम का वक्त हो गया. रखता हूं, बहुत काम है. ट्वेंटी डेज से पहले कौल नहीं कर पाऊंगा. ओके, बाय, लव यू स्वीटहार्ट.’’ उस के फ्लाइंग किस के साथ ही फोन कट गया था.

अपर्णा इधरउधर देखने लगी, कहां रह गया पार्थ. वह भी जाने कितना सामान ले रहा है पागल सा. रोज ही तो आता है मार्केट, फिर भी. उस ने नजरें दूर घुमाईं तो पार्थ नजर आया. वह मास्क लगाए, गरीब बच्चों में दूध की थैली, केले, बिस्कुट और ब्रैड बांट रहा था. तभी किसी गरीब बूढ़ी महिला ने उस से हाथ जोड़े कुछ कहा तो वह फिर राशन की दुकान में घुस गया. लौट कर उस ने लाई आटेचावल की थैलियां महिला के सिर पर अपनी मदद से रखवा दीं. महिला ने हाथ जोड़ कर हाथ ऊपर उठाए तो अपर्णा समझ गई कि जरूर गरीब महिला उसे दुआएं दे रही है. अपना सामान ला कर पार्थ ने गाड़ी में रखा.

‘‘एक मिनट,’’ कह कर उस ने जा रहे ठेले से साग खरीदा और कूड़े में खाना ढूंढ़ती कमजोर गाय को खिला कर वापस चला आया, ‘‘सौरी, थोड़ा टाइम लग गया.’’

‘‘आप रोज ही ऐसे इतना सब…’’ वह हैरान थी. दिल भी भर आया था उस का.

‘‘इतनाउतना कुछ नहीं. बहुतथोड़ा ही कर पाता हूं. दुनिया की जरूरत के आगे यह तो नगण्य ही है.’’

अपर्णा ने पहली बार पार्थ के चेहरे को ध्यान से देखा था, ‘जज्बा भी, जज्बात भी और सुंदर, सही सोच भी, मतलब सोने जैसा दिल. शीर्ष के दिल, दुनिया से कितना अलग, निर्मल…शायद मम्मी सही ही कह रही थीं. मुझे अब उन की ही बात मान लेनी चाहिए. नजरिया बदलने लगा था. उस ने एक बार ऊपर से नीचे किन्हीं खयालों में गुम ड्राइव करते पार्थ को देखा और मन ही मन मुसकरा उठी.

Hindi Story : और ‘तोड़’ टूट गई – क्यों मुन्नालालजी मंदमंद मुसकुरा रहे थे?

Hindi Story : मैं 3 महीने से उस आफिस का चक्कर लगा रहा था. इस बार इत्तेफाक से मेरे पेपर्स वाली फाइल मेज पर ही रखी दिख गई थी. मेरी आंखों में अजीब किस्म की चमक सी आ गई और मुन्नालालजी की आंखों में भी.

‘‘मान्यवर, मेरे ये ‘बिल’ तो सब तैयार रखे हैं. अब तो सिर्फ ‘चेक’ ही बनना है. कृपया आज बनवा दीजिए. मैं पूरे दिन रुकने के लिए तैयार हूं,’’ मैं ने बड़ी ही विनम्रता से निवेदन किया.

उन्होंने मंदमंद मुसकान के साथ पहले फाइल की तरफ देखा, फिर सिर पर नाच रहे पंखे की ओर और फिर मेरी ओर देख कर बोले, ‘‘आप खाली बिल तो देख रहे हैं पर यह नहीं देख रहे हैं कि पेपर्स उड़े जा रहे हैं. इन पर कुछ ‘वेट’ तो रखिए, नहीं तो ये उड़ कर मालूम नहीं कहां चले जाएं.’’

मैं ‘फोबोफोबिया’ का क्रौनिक पेशेंट ठहरा, इसलिए पास में रखे ‘पेपरवेट’ को उठा कर उन पेपर्स पर रख दिया. इस पर मुन्नालालजी के साथ वहां बैठे अन्य सभी 5 लोग ठहाका लगा कर हंस पड़े. मैं ने अपनी बेचारगी का साथ नहीं छोड़ा.

मुन्नालालजी एकाएक गंभीर हो कर बोले, ‘‘एक बार 3 बजे आ कर देख लीजिएगा. चेक तो मैं अभी बना दूंगा पर इन पर दस्तखत तो तभी हो पाएंगे जब बी.एम. साहब डिवीजन से लौट कर आएंगे.’’

मैं ने उसी आफिस में ढाई घंटे इधरउधर बैठ कर बिता डाले. मुन्नालालजी की सीट के पास से भी कई बार गुजरा पर, न ही मैं ने टोका और न ही उन्होंने कोई प्रतिक्रिया जाहिर की. ठीक 3 बजे मेरा धैर्य जवाब दे गया, ‘‘बी.एम. साहब आ गए क्या?’’

‘‘नहीं और आज आ भी नहीं पाएंगे. आप ऐसा करें, कल सुबह साढ़े 11 बजे आ कर देख लें,’’ उन्होंने दोटूक शब्दों में जवाब दिया.

वैसे तो मैं काफी झल्ला चुका था पर मरता क्या न करता, फिर खून का घूंट पी कर रह गया.

मैं ने वहां से चलते समय बड़े अदब से कहा, ‘‘अच्छा, मुन्नालालजी, सौरी फौर द ट्रबल, एंड थैंक यू.’’ पर मेरा मूड काफी अपसेट हो चुका था इसलिए एक और चाय पीने की गरज से फिर कैंटीन में जा पहुंचा. संयोग ही था कि उस समय कैंटीन में बिलकुल सन्नाटा था. उस का मालिक पैसे गिन रहा था. जैसे ही मैं ने चाय के लिए कहा, वह नौकर को एक चाय के लिए कह कर फिर पैसे गिनने लगा.

मैं ने सुबह से 3 बार का पढ़ा हुआ अखबार फिर से उठा लिया. अभी इधरउधर पलट ही रहा था कि वह पैसों को गल्ले के हवाले करते हुए मेरे पास आ बैठा, ‘‘माफ कीजिएगा, मुझे आप से यह पूछना तो नहीं चाहिए, पर देख रहा हूं कि आप यहां काफी दिनों से चक्कर लगा रहे हैं, क्या मैं आप के किसी काम आ सकता हूं?’’ कहते हुए उस ने मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही.

‘‘भैया, यहां के एकाउंट सैक्शन से एक चेक बनना है. मुन्नालालजी 3 महीने से चक्कर लगा रहे हैं,’’ मैं ने कहा.

‘‘आप ने कुछ तोड़ नहीं की?’’ उस ने मेरी आंखों में झांका.

‘‘मैं बात समझा नहीं,’’ मैं ने कहा.

‘‘बसबस, मैं समझ गया कि क्या मामला है,’’ उस ने अनायास ही कह डाला.

‘‘क्या समझ गए? मुझे भी तो समझाइए न,’’ मैं ने सरलता से कहा.

‘‘माफ कीजिएगा, या तो आप जरूरत से ज्यादा सीधे हैं या फिर…’’ वह कुछ कहतेकहते रुक गया.

‘‘मैं आप का मतलब नहीं समझा,’’ मैं ने कहा.

‘‘अरे, ऐसे कामों में कुछ खर्चापानी लगता है जिस को कुछ लोग हक कहते हैं, कुछ लोग सुविधाशुल्क कहते हैं और कुछ लोग ‘डील’ करना कहते हैं. यहां दफ्तर की भाषा में उसे ‘तोड़’ कहा जाता है.’’

‘‘तो इन लोगों को यह बताना तो चाहिए था,’’ मैं ने उलझन भरे स्वर में कहा.

‘‘यह कहा नहीं जाता है, समझा जाता है,’’ उस ने रहस्यात्मक ढंग से बताया.

‘‘ओह, याद आया. आज मुन्नालालजी ने मुझ से पेपर्स पर ‘वेट’ रखने के लिए कहा था. शायद उन का मतलब उसी से रहा होगा,’’ मैं ने उन को बताया.

‘‘देखिए, किसी भी भौतिक वस्तु में जो महत्त्व ‘वेट’ यानी भार का है वही महत्त्व भार में गुरुत्वाकर्षण शक्ति का है. आप गुरुत्वाकर्षण का मतलब समझते हैं?’’ उस ने पूछा.

‘‘हां, बिलकुल, मैं ने बी.एससी. तक फिजिक्स पढ़ी है,’’ मैं ने कहा.

‘‘तो यह रिश्वत यानी वेट यानी डील यानी सुविधाशुल्क उसी गुरुत्वाकर्षण शक्ति के जैसा काम करता है. बिना इस के वेट नहीं और बिना वेट के पेपर्स उड़ेंगे ही. वैसे आप का कितने का बिल है?’’ वह गुरुत्वाकर्षण का नियम समझाते हुए पूछ बैठा.

‘‘60,400 रुपए का,’ मैं ने झट से बता दिया.

‘‘तो 6 हजार रुपए दे दीजिए, चेक हाथोंहाथ मिल जाएगा,’’ वह बोला.

‘‘पर यह दिए कैसे जाएं और किसे?’’

‘‘मुन्नालालजी को यहां चाय के बहाने लाएं. उन के हाथ में 6 हजार रुपए पकड़ाते हुए कहिए, ‘यह खर्चापानी है.’ फिर देखिए कि चेक 5 मिनट के अंदर मिल जाता है कि नहीं,’’ कहते हुए वह उठ खड़ा हुआ.

मैं ने उसी बिल्डिंग में स्थित ए.टी.एम. से जा कर 7 हजार रुपए निकाले. उस में से 1 हजार अपने अंदर वाले पर्स में रखे और बाकी बाईं जेब में रख कर मुन्नालालजी के पास जा पहुंचा तथा जैसे मुझे चाय वाले ने बताया था मैं ने वैसा ही किया. मैं चेक भी पा गया था पर लौटते समय मैं ने उस कैंटीन वाले को शुक्रिया कहना चाहा.

उस ने मुझे देखते ही पूछा, ‘‘चेक मिला कि नहीं?’’

‘‘साले ने 6 हजार रुपए लिए थे. चेक कैसे न देता?’’ मेरे मुंह से निकल गया.

मैं वहां से बाहर आ कर गाड़ी स्टार्ट करने वाला ही था कि एक चपरासी ने आ कर कहा, ‘‘मांगेरामजी, आप को मुन्नालालजी बुला रहे हैं.’’

पहले मैं ने सोचा कि गाड़ी स्टार्ट कर के अब भाग ही चलूं, पर जब उस ने कहा कि चेक में कुछ कमी रह गई है तो मैं ने अपना फैसला बदल लिया.

जैसे ही मैं मुन्नालालजी के पास पहुंचा वे बोले, ‘‘अभी आप को फिर से चक्कर लगाना पड़ता. उस चेक में एक कमी रह गई है.’’

मैं ने खुशीखुशी चेक निकाल कर उन को दिया. उन्होंने उसे फिर से दबोच लिया. फिर मेरे दिए हुए 6 हजार निकाल कर मेरी ओर बढ़ा कर बोले, ‘‘ये आप के पैसे आप के पास पहुंच गए और यह मेरा चेक मेरे पास आ गया. अब आप जहां और जिस के पास जाना चाहें जाएं, कोर्ट, कचहरी, विधानसभा, पार्लियामैंट, अखबारों के दफ्तर या अपने क्षेत्र के दादा के पास. तमाम जगहें हैं.’’

हाथ में आई मोटी रकम यों फिसल जाएगी यह सोच कर मैं ने मायूसी व लाचारगी से मुन्नालाल को देखा पर कुछ बोला नहीं. मेरे मन में तोड़ की टूटी कड़ी को फिर से जोड़ने की जुगत चल रही थी.

Hindi Story Telling : काली स्याही – सुजाता के गुमान को कैसे किया बेटी ने चकनाचूर

Hindi Story Telling : क्लब में ताश खेलने में व्यस्त थी सु यानी सुजाता और उधर उस का मोबाइल लगातार बज रहा था.

‘‘सु, कितनी देर से तुम्हारा मोबाइल बज रहा है. हम डिस्टर्ब हो रहे हैं,’’ रे यानी रेवती ताश में नजरें गड़ाए ही बोली.

‘‘मैं इस नौनसैंस मोबाइल से तंग आ चुकी हूं,’’ सु गुस्से से बोली, ‘‘मैं जब भी बिजी होती हूं, यह तभी बजता है,’’ और फिर अपना मुलायम स्नैक लैदर वाला गुलाबी पर्स खोला, जो तरहतरह के सामान से भरा गोदाम बना था, उस में अपना मोबाइल ढूंढ़ने लगी.

थोड़ी मशक्कत के बाद उसे अपना मोबाइल मिल गया.

‘‘हैलो, कौन बोल रहा है,’’ सु ने मोबाइल पर बात करते हुए सिगरेट सुलगा ली.

‘‘जी, मैं आप की बेटी सोनाक्षी की क्लासटीचर बोल रही हूं. आजकल वह स्कूल बहुत बंक मार रही है.’’

‘‘व्हाट नौनसैंस, मेरी सो यानी सोनाक्षी ऐसी नहीं है,’’ सु अपनी सिगरेट की राख ऐशटे्र में डालते हुए बोली, ‘‘देखिए, आप तो जानती ही हैं कि आजकल बच्चों पर कितना बर्डन रहता है… वह तो स्कूल खत्म होने के बाद सीधे कोचिंग क्लास में चली जाती है… अगर कभी बच्चे स्कूल से बंक कर के थोड़ीबहुत मौजमस्ती कर लें, तो उस में क्या बुराई है?’’ और फिर सु ने फोन काट दिया और ताश खेलने में व्यस्त हो गई.

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वह जब रात को घर पहुंची तब तक सो घर नहीं आई थी.

‘‘मारिया, सो कहां है?’’ सु सोफे पर ढहती हुई बोली.

‘‘मैम, बेबी तो अब तक नहीं आया है,’’ मारिया नीबूपानी से भरा गिलास सु को थमाते हुए बोली, ‘‘बेबी, बोला था कि रात को 8 बजे तक आ जाएगा, पर अब तो 10 बज रहे हैं.’’

‘‘आ जाएगी, तुम चिंता मत करो,’’ सु अपने केशों को संवारती हुई बोली, ‘‘विवेक तो बाहर से ही खा कर आएंगे और शायद सो भी. इसलिए तुम मेरे लिए कुछ लो फैट बना दो.’’

‘‘मैम, हम कुछ कहना चाहते थे, आप को. बेबी का व्यवहार और उन के फ्रैंड्स…’’

‘‘व्हाट, तुम जिस थाली में खाती हो, उसी में छेद करती हो. चली जाओ यहां से. अपने काम से काम रखा करो,’’ सु गुस्से में बोली.

‘सभी लोग मेरी फूल सी बच्ची के दुश्मन बन गए हैं. पता नहीं मेरी सो सभी की आंखों में क्यों खटकने लगी है, यह सोचते हुए उस ने कपड़े बदले. झीनी गुलाबी नाइटी में वह पलंग पर लेट गई.

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‘‘क्या हुआ जान? बहुत थकी लग रही हो,’’ विवेक शराब का भरा गिलास लिए उस के पास बैठते हुए बोला.

‘‘हां, आज ताश खेलते हुए कुछ ज्यादा पी ली थी और फिर पता नहीं, रे ने किस नए ब्रैंड की सिगरेट थमा दी थी. कमबख्त ने मजा तो बहुत दिया पर शायद थोड़ी ज्यादा स्ट्रौंग थी,’’ सु करवट लेते हुए बोली, ‘‘पर तुम इस समय क्यों पी रहे हो?’’

‘‘अरे भई, माइंड रिलैक्स करने के लिए शराब से अच्छा कोई विकल्प नहीं और फिर सामने शबाब तैयार हो तो शराब की क्या बिसात?’’ कहते हुए विवेक ने अपना गिलास सु के होंठों से लगा दिया.

‘‘यू नौटी,’’ सु ने विवेक को गहरा किस किया और फिर कंधे से लगी शराब पीने लगी.

‘‘सोनाक्षी कहां है?’’ विवेक सु के केशों में उंगलियां फिराते हुए बोला.

‘‘होगी अपने दोस्तों के साथ. अब बच्चे इतने प्रैशर में रहते हैं तो थोड़ीबहुत मौजमस्ती तो जायज है,’’ और सु ने अपनी बांहें विवेक के गले में डाल दीं. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे में समाने लगे.

तभी सु का मोबाइल बज उठा, ‘‘व्हाट नौनसैंस, मैं जब भी अपनी जिंदगी के मजे लूटना शुरू करती हूं, यह तभी बज उठता है,’’

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सु विवेक को अपने से अलग कर मोबाइल उठाते हुए बोली. फोन पर सो की सहेली प्रज्ञा का नाम हाईलाइट हो रहा था.

पहले तो सु का मन किया कि वह अपना मोबाइल ही बंद कर दे और फिर से अपनी कामक्रीडा में लिप्त हो जाए, पर फिर उस का मन नहीं माना और अपना फोन औन कर दिया.

‘‘आंटी, सो ठीक नहीं है. वह मेरे सामने बेहोश पड़ी है,’’ प्रज्ञा रोते हुए बोली.

‘‘तुम मुझे जगह बताओ, मैं अभी वहां पहुंचती हूं,’’ कह कर सु ने तुरंत अपने कपड़े बदले और गाड़ी ले कर वहां चल दी.

वैसे वह विवेक को भी अपने साथ ले जाना चाहती थी, लेकिन वह सो चुका था. उसे ज्यादा चढ़ गई थी.

जब सु प्रज्ञा के बताए पते पर पहुंची तो हैरान रह गई. सारा हौल शराब की बदबू और सिगरेट के धुएं से भरा था. सो सामने बैठी नीबूपानी पी रही थी.

‘‘क्या हुआ तुम्हें?’’ सु के स्वर में चिंता थी.

‘‘ममा, अब तो ठीक हूं, बस आज कुछ ज्यादा हो गई थी,’’ सो अपना सिर हिलाते हुए बोली.

‘‘तुम ने ड्रिंक ली है?’’ सु ने चौंककर पूछा.

‘‘तो क्या हुआ ममा?’’

‘‘तुम ऐसा कैसे कर सकती हो?’’ सु परेशान हो उठी.

‘‘मैं तो पिछले 6 महीनों से ड्रिंक कर रही हूं, इस में क्या बुरा है?’’ सो लापरवाही से एक अश्लील गाना गुनगुनाते हुए बोली.

‘‘पर तुम तो कोचिंग क्लास जाने की बात कहती थीं और कहती थीं कि माइंड रिलैक्स करने के लिए तुम थोड़ाबहुत हंसीमजाक और डांस वगैरह कर लेती हो, पर यह शराब…’’

‘‘व्हाट नौनसैंस, अगर आप से कहती कि मैं शराब पीती हूं तो क्या आप इजाजत दे देतीं?’’

सु ने तब एक जोरदार थप्पड़ सो के गाल पर दे मारा.

‘‘ममा, मुझे टोकने से पहले खुद को कंट्रोल कीजिए. आप तो खुद रोज ढेरों गिलास गटक जाती हैं. अगर मैं ने थोड़ी सी पी ली तो क्या बुरा किया?’’ सो सिगरेट सुलगाती हुई बोली, ‘‘माइंड रिलैक्स करने के लिए बहुत बढि़या चीज है यह.’’

सो को सिगरेट पीते देख सु को इतना गुस्सा आया कि उस का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा और तब गुस्से के अतिरेक में उठा उस का हाथ सो ने हवा में ही लपक लिया और हंसते हुए बोली, ‘‘ममा, मुझे सुधारने से पहले खुद को सुधारो. खुद तो क्लब की शान बनी बैठी हो और मुझ से किताबी कीड़ा बनने की उम्मीद रखती हो. ममा, मांबाप तो बच्चों के लिए सब से बड़े आदर्श होते हैं और फिर मैं तो आप के द्वारा अपनाए गए रास्ते पर चल कर आप का ही नाम रोशन कर रही हूं,’’ कह कर सिगरेट की राख ऐशट्रे में डाली और अपने दोस्तों के साथ विदेशी गाने की धुन पर थिरकने लगी.

तभी बाहर से हवा का एक तेज झोंका आया और उस से ऐशट्रे में पड़ी राख उड़ कर सु के मुंह पर आ गिरी. तब सु का सारा मुंह ऐसा काला हुआ मानो किसी ने अचानक आधुनिकता की काली स्याही उस के मुख पर पोत दी हो.

Online Hindi Story : सबक – शादी के बाद राहुल बदल क्यों गया था

Online Hindi Story : ‘‘सुनो क्या आप औफिस से आते हुए सब्जी लेते आओगे?’’ संगीता जल्दी जल्दी घर में ताला लगाते हुए बोली.

सुन कर राहुल चौंक गया. बोला, ‘‘क्यों, तुम्हें क्या हुआ? रोज तो तुम्हीं लाती हो?’’

‘‘आज मुझे घर आने में देर हो जाएगी… मम्मी के घर जाना है. उन की तबीयत ठीक नहीं है.’’

संगीता की बात सुनते ही राहुल की त्योरियां चढ़ गईं, ‘‘तुम्हें तो रोज मायके जाने का कोई बहाना चाहिए… कभी मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है, तो कभी पापा का मूड खराब है,’’ राहुल झुंझलाते हुए बोला.

राहुल की बात सुन कर संगीता रोंआसी हो गई. मांबाप की इकलौती संतान संगीता ने विवाह से पहले ही राहुल से कह दिया था कि उसे अपने मांबाप का खयाल रखना है. तब तो राहुल ने उस की इस सोच को सराहा था, लेकिन अब जब भी वह मायके जाने का नाम लेती है, राहुल ऐसे ही रिऐक्ट करता है. वैसे तो वह चुपचाप राहुल की बात सुन लेती है, लेकिन आज उस की बात संगीता के मन में चुभ गई. अत: वह भी तल्ख लहजे में बोली, ‘‘ठीक है, अब मैं वापस घर नहीं आऊंगी वहीं रह लूंगी.’’

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राहुल ने संगीता की बात को हलके में लिया और उसे बसस्टौप पर छोड़ कर औफिस चला गया.

संगीता का मूड पूरी तरह खराब हो गया था. बस जब उस के सामने रुकी, तो वह अनमनी सी उस में चढ़ गई. औफिस में जल्दीजल्दी पैंडिंग काम निबटा कर लंच में घर के लिए निकल गई. लेकिन घर जाने के बजाय अपनी सहेली रितु के पास चली गई.

दरवाजे पर संगीता को देखते ही रितु खुशी से उस के गले लग गई.

उस के उदास चेहरे की ओर देखते हुए रितु बोली, ‘‘सचसच बता क्या हुआ? राहुल से फिर झगड़ा हुआ है क्या?’’

‘‘नहीं यार, ऐसी बात नहीं है,’’ संगीता आंखें चुराते हुए बोली.

‘‘अच्छा, तो अब तुम मुझ से बात छिपाओगी,’’ रितु नाराजगी दिखाते हुए बोली.

‘‘नहीं यार, तुझ से क्या छिपाना. तुझे तो सब पता है,’’ संगीता रितु का हाथ पकड़ते हुए बोली.

‘‘अच्छा ठीक है, तू बैठ मैं अभी आती हूं,’’ कह कर रितु किचन में चली गई. थोड़ी देर बाद चायनाश्ता ले कर बाहर आई.

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जब संगीता नाश्ता कर चुकी, तो रितु बोली, ‘‘अब बता क्या बात है? क्यों इस खूबसूरत चेहरे पर 12 बज रहे हैं?’’

‘‘क्या बताऊं यार, रोजरोज की किचकिच से तंग आ गई हूं. जब भी राहुल से मम्मी के घर जाने की बात करती हूं, तो उस का पारा चढ़ जाता है. तू तो जानती ही है कि मम्मीपापा का मेरे अलावा और कोई नहीं है. राहुल से यह बात मैं ने पहले ही कह दी थी कि विवाह के बाद भी मैं मम्मीपापा की जिम्मेदारी इसी तरह निभाऊंगी. तब तो उन्होंने हंसते हुए हामी भर दी थी. लेकिन अब अपनी ही बात से पलट गए हैं.’’

‘‘अच्छा तो यह बात है, राहुल ने फिर से तेरे मायके जाने पर ऐतराज जताया. इसीलिए तेरा मूड खराब है,’’ रितु ठंडी सांस लेते हुए बोली, ‘‘चिंता न कर, इस समस्या का कोई समाधान निकालते हैं.’’

‘‘क्या समाधान निकलेगा इस का. मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है… एक तरफ मम्मीपापा हैं, तो दूसरी ओर राहुल. दोनों के प्रति अपने दायित्व निभातेनिभाते मैं तो थक गई हूं… कभीकभी तो मन करता है सब कुछ छोड़ कर कहीं दूर भाग जाऊं,’’ संगीता रोंआसे स्वर में बोली.

रितु कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘सही कह रही है तू. कुछ दिनों के लिए इन झमेलों से कहीं दूर चली जा, तब राहुल को पता चलेगा कि बीवी घर में न रहे, तो कैसा महसूस होता है.’’

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‘‘क्या तू मेरी बात से सहमत है रितु,’’ संगीता असमंजस में भर कर बोली.

‘‘और नहीं तो क्या? मैं कोई बात बिना सोचेसमझे थोड़े ही करती हूं,’’ रितु बोली.

‘‘पर जाऊं कहां यार यह भी तो समस्या है?’’

‘‘कहीं जाने की जरूरत नहीं है. यहीं मेरे पास ही रह… वरुण पूरे महीने के लिए अमेरिका गए हैं. मैं घर में अकेली ही हूं. दोनों सहेलियां मिल कर कालेज के दिनों की यादों को ताजा करेंगी.’’

‘‘चल यही ठीक है. कुछ दिन मैं तेरे पास ही रहती हूं,’’ संगीता राहत की सांस लेते हुए बोली.

‘‘अभी राहुल को इस बारे में कुछ भी नहीं बताना. उन्हें भी तो पता चले तेरी कीमत… आज जब तू घर नहीं पहुंचेगी तो बच्चू को पता चलेगा.’’

रितु से अपने मन की बात बताने के बाद संगीता बहुत हलका महसूस कर रही थी. रितु ने संगीता के अपने घर रहने की बात उस के माता पिता और सास ससुर को बता दी और साथ ही यह भी बोला कि वे राहुल से यह न बताएं कि संगीता कहां पर है.

औफिस जा कर राहुल संगीता से हुए झगड़े की बात भूल कर अपने काम में बिजी हो गया. जब घड़ी में 8 बजे तो उसे घर जाने की सुध आई. घर पहुंचने के बाद उस ने घर पर ताला देखा, तो उसे सुबह के वाद विवाद की याद आई. वह बड़बड़ाते हुए ताला खोलने लगा, ‘‘कितना भी मना कर लो, पर मैडम करेंगी अपने ही मन की… मायके जाना बंद नहीं कर सकतीं चाहे उस के लिए भले ही पति से झगड़ा मोल लेना पड़े.’’

जब रात के 10 बजे तक भी संगीता घर नहीं आई, तो राहुल को गुस्सा आने लगा कि आज तो हद हो गई. 10 बज गए पर मैडम का कहीं पता नहीं. आज घर आए, तो इस मामले का सही तरीके से निबटारा करता हूं. लेकिन जब 12 बजे तक भी संगीता नहीं आई, तो राहुल को सुबह का वाकेआ याद आ गया, साथ ही अपना डायलौग भी याद आ गया कि तुम वहीं क्यों नहीं रुक जातीं. अब उसे अपनेआप पर गुस्सा आने लगा कि क्यों नहीं वह अपनी जबान पर नियंत्रण रख पाता है. अभी वह संगीता को फोन करने की सोच ही रहा था कि फोन की घंटी बज उठी. धड़कते दिल से उस ने रिसीवर उठाया, तो उस के ससुर रमाकांत थे, ‘‘क्या बात है पापाजी इतनी रात को क्यों फोन किया?’’ राहुल झल्लाते हुए बोला.

‘‘बेटा, जरा संगीता से बात करवा दो, आज वह यहां आने वाली थी, पर आई नहीं. उस की तबीयत तो ठीक है न?’’ रमाकांत सुस्त स्वर में बोले.

रमाकांत की बात सुन कर राहुल घबराहट भरे स्वर में बोला, ‘‘क्या संगीता आप लोगों के पास नहीं गई है? वह तो वहीं जाने वाली थी. अभी तक घर भी नहीं आई है.’’

‘‘क्या कह रहे हो तुम? कहां चली गई मेरी बेटी बिना बताए?’’ रमाकांत रोंआसे स्वर में बोले फिर रिसीवर रख दिया.

अब तो राहुल की हालत खराब हो गई. वह बारबार संगीता के मोबाइल पर फोन करने लगा, लेकिन उस का फोन स्विच औफ आ रहा था.

सुबह होते ही राहुल सब से पहले संगीता के मायके गया. उसे लगा शायद संगीता अपने मम्मीपापा के पास गई हो और उसे सबक सिखाने के लिए यह सब कर रही हो… लेकिन जब संगीता वहां भी नहीं मिली तो वह निराश हो कर उस के औफिस गया. वहां तो पता चला कि संगीता तो लंच के समय ही औफिस से चली गई थी और आज औफिस नहीं आई. हताश सा राहुल घर चला गया. पूरा दिन वह संगीता की अच्छाइयों को याद कर के सुबकता रहा और यह सोच कर कहीं नहीं गया कि शायद संगीता घर वापस आ जाए. लेकिन सुबह से रात हो गई, संगीता नहीं आई.

संगीता और रितु दोनों रात भर गप्पें मारती रहीं. देर रात सोईं. सुबह कालबैल की आवाज से संगीता की नींद टूटी, तो उस ने देखा कि रितु गहरी नींद सो रही है, संगीता का मन उसे जगाने को नहीं हुआ. वह यह सोच कर दरवाजा खोलने चली गई कि दूध वाला आया होगा.

संगीता ने दरवाजा खोला, तो देखा कि दरवाजे पर 4 अजनबी खड़े हैं. उन्हें देख कर वह घबरा गई और जल्दी से दरवाजा बंद करने लगी. लेकिन इस से पहले ही उन चारों में से 2 ने संगीता को दबोच कर गाड़ी में डाल दिया. जब संगीता की आंख खुली, तो उस ने खुद को एक कच्चे घर में पाया. वह घबराई सी इधरउधर देखने लगी, लेकिन कुछ समझ नहीं आया.

संगीता घबराहट के मारे रोने लगी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे, किस से बात करे? फिर चुपचाप किसी के आने की राह देखने लगी. शाम के करीब 4 बजे 2 लोग आए और संगीता से उस के पति के बारे में पूछने लगे. संगीता ने अपने पति राहुल के बारे में बता दिया, तो वे बोले, ‘‘हम राहुल की नहीं वरुण की बात कर रहे हैं.’’

‘‘वरुण तो मेरी सहेली रितु का पति है,’’ संगीता ने अचकचाते हुए पूछा, ‘‘क्या किया है उस ने और आप लोग मुझे क्यों पकड़ कर लाए हैं?’’

रितु की बात सुन कर दोनों अजनबी अचकचा गए. उन्होंने संगीता को डांटते हुए कहा, ‘‘ज्यादा स्मार्ट बनने की कोशिश न करो, तुम्हारे पति ने हमारे मालिक से कर्जा लिया है और अब उसे चुकाने से कतरा रहा है. जब तक हमारा पैसा नहीं मिलेगा हम तुम्हें नहीं छोड़ेंगे… पैसा नहीं मिला तो हम तुम्हें बेच देंगे.’’

अजनबियों की बात सुन कर संगीता के हाथपांव फूल गए. वह सोचने लगी कि अजीब मुसीबत में फंस गई… कैसे छुटकारा मिलेगा? काश, राहुल को फोन कर पाती. दोनों अजनबी संगीता को धमका कर चले गए.

जब अगले दिन भी संगीता अपने घर नहीं पहुंची तो राहुल बुरी तरह टूट गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. संगीता को गए 2 दिन हो गए थे, लेकिन उस की कोई खबर नहीं थी. कहीं वह किसी हादसे का शिकार तो नहीं हो गई. यह सोचसोच कर वह रोने लगा.

अगले दिन डोरबैल की आवाज से उस की नींद टूटी. वह खुशीखुशी यह सोच कर दरवाजा खोलने गया कि शायद संगीता हो दरवाजे पर. लेकिन सामने उस के मातापिता खड़े थे. उन्हें देखते ही राहुल के सब्र का बांध टूट गया और वह अपने पिता के गले लग कर बच्चों की तरह रोने लगा.

उस के इस तरह रोने पर घबराते हुए उस के पिता बोले, ‘‘क्या बात है, तुम रो क्यों रहे हो? सब ठीक तो है?’’

‘‘नहीं पिताजी, कुछ भी ठीक नहीं है… संगीता घर छोड़ कर चली गई है… 2 दिन हो गए, लेकिन घर वापस नहीं आई,’’ राहुल सुबकते हुए बोला.

‘‘क्या कहा बहू घर छोड़ कर चली गई. पर क्यों?’’ राहुल की मां हैरानी से बोलीं, ‘‘जरूर तूने ही उस से झगड़ा किया होगा वरना मेरी बहू तो बेहद समझदार है.’’

‘‘हां मां, मैं ने ही उस का दिल दुखाया है… पहली बार नहीं, हमेशा उसे दुखी करता हूं मैं. तभी वह मुझे छोड़ कर चली गई,’’ कहते हुए राहुल ने सारी बात मातापिता को बता दी.

‘‘हूं, किया तो तूने गलत है बेटा, जब उस ने शादी से पहले ही यह कह दिया था कि उसे ही अपने मातापिता का सहारा बनना है, तो तू क्यों उस के मायके जाने पर ऐतराज जताता है? क्या कभी उस ने तुझे रोका है हमारे प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाने से या फिर उस ने कभी हमारी सेवा करने में कोई कसर छोड़ी है?’’ राहुल के पिता उसे समझाते हुए बोले.

‘‘आप सही कह रहे हैं पापा. मैं ही गलत था, जो अपनी बीवी के मनोभावों को नहीं समझ सका. एक बार वह वापस आ जाए, तो मैं उस की सारी बातों को मानूंगा और उस के मातापिता को भी आप की ही तरह समझूंगा.’’

राहुल के मम्मीपापा को उस के घर आए 2 दिन हो गए, लेकिन संगीता का कोई फोन नहीं आया, तो उन्हें भी घबराहट होने लगी. वे सोचने लगे कि संगीता ने हम से कौंटैक्ट क्यों नहीं किया? कहीं सचमुच में उस के साथ कोई हादसा तो नहीं हो गया?

उधर संगीता के अचानक गायब हो जाने से रितु बहुत परेशान थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अचानक कहां चली गई. उस ने अपने दिल को यह सोच कर तसल्ली दी कि हो सकता है वह राहुल के पास लौट गई हो, लेकिन जाने से पहले वह अपना फोन क्यों नहीं ले कर गई. यह बात रितु को परेशान कर रही थी. 2 दिन तक उस ने संगीता के आने का इंतजार किया, लेकिन जब उस की कोई खबर नहीं मिली, तो उस ने राहुल से मिलने का निश्चय किया. अगले दिन रितु राहुल के औफिस पहुंची और उसे सारी बात बता दी. रितु की बात सुन कर राहुल घबरा गया.

रितु बोली, ‘‘ऐसे घबराने से काम नहीं चलेगा राहुल. लगता है संगीता किसी बड़ी मुसीबत में फंस गई… हमें पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए.’’

फिर दोनों पुलिस स्टेशन पहुंचे और संगीता की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा दी. रिपोर्ट लिखवाने के अगले ही दिन राहुल के पास फोन आया कि पास के गांव से कुछ लोगों की शिकायत आई है कि वहां एक खाली मकान में कुछ औरतों को कैद कर के रखा गया है… उन्हें कहीं बाहर भेजने की तैयारी चल रही है. हम वहां रेड मारने जा रहे हैं… आप भी हमारे साथ चलिए… शायद आप की पत्नी की कोई खबर मिल जाए.

फोन सुनते ही राहुल अपने और संगीता के मम्मीपापा के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचा, साथ में रितु भी थी. पुलिस की टीम के साथ वे सभी गांव में पहुंचे. वहां एक कमरे में संगीता बंद थी.

सभी औरतों और वहां उपस्थित गुंडों को पकड़ लिया गया. पुलिस इंस्पैक्टर ने राहुल से कहा, ‘‘देखिए, इन में से कोई आप की पत्नी तो नहीं है?’’

उन्हें देख कर राहुल निराश हो गया, क्योंकि उन में संगीता नहीं थी.

इंस्पैक्टर बोले, ‘‘आप परेशान न हों. हम पूरे घर की तलाशी लेते हैं. हो सकता है कि आप की पत्नी को किसी और कमरे में रखा गया हो.’’

पूरे घर की तलाशी लेने के बाद संगीता एक कमरे में घुटनों पर मुंह रखे रोती मिली.

संगीता को देखते ही खुशी के मारे राहुल की चीख निकल गई, ‘‘थैंक्यू इंस्पैक्टर, मेरी पत्नी वह रही.’’

राहुल को देखते ही संगीता उस से लिपट गई. राहुल उस से माफी मांगते हुए बोला, ‘‘मुझे माफ कर दो संगीता… मेरी वजह से तुम्हें इतनी मुसीबतों का सामना करना पड़ा. मैं तुम से वादा करता हूं कि अब कभी तुम्हें अपनी जिम्मेदारियां पूरी करने से नहीं रोकूंगा… अब घर चलो.’’

‘‘बहू घर चलो… तुम्हारा पति पूरी तरह सुधर गया है,’’ संगीता अपने सासससुर का सम्मिलित स्वर सुन मुसकराने लगी.

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