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Love Story : मिलने का वादा – नीलू से किया हुआ वादा क्या राज पूरा कर पाया

Love Story : नीलू ससुराल से मायके महीनाभर रहने को आई थी. नीलू यानी नीलोफर की शादी को 2 साल गुजर गए थे. ऐसा लगता था कि कल ही की बात हो. राज के जेहन में जो यादें धुंधली पड़ गई थीं, वे एकएक कर सामने आने लगीं. नीलू की शादी में दर्द देने वाले डरावने मंजर धीरेधीरे जिंदा होने लगे थे.

यह राज नीलू की अधूरी मुहब्बत का अंजाम था. निगाहों में हर पल बसने वाली नीलोफर को वह आज तक नहीं भुला पाया था.

राज अपनी अधूरी मुहब्बत का इलजाम पूरी तरह नीलू पर नहीं लगा सकता था. अपनी नाकाम मुहब्बत का वह खुद भी जिम्मेदार था. आने वाले तूफान से वह घबरा गया था.

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चांद सी सूरत वाली नीलोफर राज पर अपनी जान लुटाती थी, पर नीलोफर का बाप अकरम गांव का दबंग, शातिर, झगड़ालू किस्म का आदमी था. गांव में कहीं भी झगड़ाफसाद, राहजनी, आगजनी… यहां तक कि कई हत्याओं में उस का नाम जुड़ा होता था. आधे गांव ने तो अकरम का हुक्कापानी बंद कर रखा था.

अकरम और राज के घरों की दीवारें आपस में मिली हुई थीं. बचपन के दिनों में मासूम राज गांव के स्कूल में पढ़ता था. नीलू भी वहीं पढ़ती थी.

राज और नीलू घर से साथसाथ ही स्कूल जाते थे और घर आ कर अपने घरों के सामने एकसाथ खेलते थे.

उन दिनों राज शाम के समय अपनी छत पर पतंग भी उड़ाया करता था. उस समय नीलू भी अपने घर की छत पर चढ़ जाया करती थी और राज को पेंच लड़ाने को उकसाया करती थी.

जब राज नीलू के कहने पर किसी की पतंग काट देता था, तो नीलू उछलउछल कर अपनी खुशी जाहिर किया करती थी. अगर पेंच लड़ाने के मुकाबले में राज की पतंग कट जाती, तो वह उदास हो जाती थी.

एक दिन राज बड़ी सी पतंग खरीद कर लाया. उस ने स्कैच पैन से पतंग पर कार्टून बना कर नीचे शरारत से नीलू का नाम लिख दिया.

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कार्टून के नीचे अपना नाम लिखा देख कर नीलू गुस्से से भर उठी थी. राज बारबार उड़ती पतंग को नीलू पर झुका कर उस के गुस्से को बढ़ा रहा था.

अचानक राज की पतंग जरा ज्यादा झुक गई और नीलू के हाथ में आ गई. उस ने राज की पतंग दबोच कर धागा खींचा और अपने घर के अंदर भाग गई.

नीलू की इस शरारत पर राज को बहुत गुस्सा आया. वह चीखताचिल्लाता हुआ सीधा नीलू के घर पहुंच गया. वह नीलू को उस के घर में ही दबोच कर पीटने लगा.

उस समय नीलू का बाप अकरम घर पर ही मौजूद था. छोटे से राज की इतनी हिम्मत देख उस ने उसे 2 तमाचे मारे और अपने घर से भगा दिया.

उस समय राज की उम्र 12 साल की रही होगी. वह रोताबिलखता अपने घर चला गया और पापा को बताया.

राज के पापा रामदयाल शांत स्वभाव के थे. वे एक स्कूल में टीचर थे. उन्होंने अपराधी अकरम के मुंह लगना ठीक नहीं समझा और राज को ही डांटडपट कर खामोश कर दिया.

अब रामदयाल ने राज को जेबखर्च देना बंद कर दिया. इस तरह राज की पतंगबाजी पर रोक लग गई.

राज नीलू से बेहद नाराज था. वह नीलू को अकेला देख कर उसे पीटने की फिराक में था.

एक दिन स्कूल में खेलकूद का पीरियड चल रहा था. उस समय क्लास के तमाम सहपाठी अपनेअपने मनपसंद खेल खेलने में मसरूफ थे, तभी राज ने देखा कि नीलू नलके से पानी पी कर अकेली आ रही है.

उसी समय राज ने नीलू को लपक कर उस का एक बाजू पकड़ा और गुर्राया, ‘‘परसों शाम को मेरी पतंग पकड़ कर क्यों खींची थी? वह पतंग मैं 2 रुपए की खरीद कर लाया था, जिस की तू ने ऐसी की तैसी कर के रख दी.’’

‘‘उस पर तो मेरा नाम लिखा था, इसलिए मैं ने अपनी पतंग ले ली. तुम दूसरी पतंग उड़ा लेते,’’ नीलू बोली.

‘‘मैं तेरे दोनों हाथ और मुंह तोड़ दूंगा. तुझे बचाने इस समय कोई नहीं आएगा,’’ राज चिल्लाया.

‘‘लो मारो मुझे. मेरे दोनों हाथ तोड़ दो. सामने पड़ी ईंट उठा कर मेरे मुंह पर दे मारो. अगर मुझे मारने से तुम्हारी पतंग जुड़ जाए, तो अपने मन की इच्छा पूरी कर लो,’’ नीलू ने कहा. मगर राज का हाथ नीलू पर उठा नहीं. राज ने चेतावनी देते हुए नीलू को छोड़ दिया.

4-5 दिनों तक नीलू से उस की कोई बात नहीं हुई. अब उस ने घर जाना बंद कर दिया. उसे अपने पापा का डर भी था. सालाना इम्तिहान सिर पर आ गएथे. वह मन लगा कर अपनी पढ़ाई में जुट गया.

एक दिन शाम के समय नीलू अपनी मां के साथ राज के घर आई. उन दिनों नीलू के बड़े भाई की शादी होने वाली थी. नीलू की मां उस के परिवार को शादी में शामिल होने का न्योता देने आई थीं.

नीलू सब की नजरें बचा कर राज के कमरे में आ गई और उस से पूछने लगी कि वह अब पतंग क्यों नहीं उड़ाता है?

राज ने उदास मन से बताया कि अब उसे जेबखर्च नहीं मिलता. इतना सुनते ही नीलू ने छिपा कर साथ लाई एक छोटी सी पोटली राज की तरफ उछाल दी और पतंग उड़ाने को कह कर चली गई.

राज ने पोटली खोली, तो उस के चेहरे पर बेशुमार खुशियों के भाव चमक उठे. उस के सामने सिक्कों का अंबार सा लग गया. शायद नीलू ने अपनी गुल्लक खाली कर के दी थी.

धीरेधीरे समय गुजरता चला गया. प्यार भरी शरारतें कब चाहत में बदल गईं, उन दोनों को पता ही नहीं चला. वे दोनों पलभर भी एकदूसरे से दूर होने पर बुरी तरह तड़प उठते थे.

अकरम को इस इश्क की भनक लग गई. वह दोनों प्रेमियों के बीच दीवार बन कर खड़ा हो गया. वह किसी भी सूरत में अपनी बेटी को गैरजात में ब्याहना नहीं चाहता था. उस ने आननफानन बेटी नीलोफर यानी नीलू का रिश्ता दूसरे गांव के गुलेमान, जो जुआघरों, शराब की दुकानों का मालिक था, के साथ पक्का कर दिया.

अकरम अपनी बेटी को जल्दी ब्याह कर ससुराल भेजना चाहता था, पर उसे डर भी था कि कहीं नीलोफर बगावत न कर दे.

नीलोफर के लिए अकरम ने जो शौहर पसंद किया था, वह उम्र में नीलू से दोगुना बड़ा था. जल्दबाजी में शादी की तारीख भी तय कर दी गई. 2-4 दिन बाद अकरम 4-5 बदमाश ले कर रामदयाल मास्टर के घर जा पहुंचा और धमकी दे आया कि वे अपने बेटे को समझा कर रखे, वरना पूरे परिवार को इसी घर में बंद कर के आग लगा देगा.

राज के पापा लड़ाईझगड़े से दूर रहना पसंद करते थे. उन्होंने प्यार से अपने बेटे पर दबाव डाला कि वह नीलू को भूल जाए.

राज ने मन ही मन अपने पापा का कहना मानने का मन बना लिया, मगर कामयाब नहीं हो पा रहा था.

एक दिन राज दोपहर के समय गांव के बाहर नीलू से मिला. नीलू ने उलाहना देते हुए न मिलने की वजह पूछी, तो राज खामोश रहा.

नीलू ने अपनी बात पर जोर देते हुए दोबारा पूछा, पर राज को कुछ भी बताना मुनासिब नहीं लग रहा था.

राज की खामोशी देख नीलू ने राज का कौलर पकड़ते हुए सारा माजरा पूछा. राज ने आखिरकार दुखी मन से सारी बातें नीलू को बता दीं. नीलू गरजते हुए बोली कि उसे अपने निजी मामलों में बाप की दखलअंदाजी बिलकुल मंजूर नहीं है. वह जिस से प्यार करती है, उसी से शादी करेगी.

राज ने नीलू को जिद न करने की सलाह दी. यह भी समझाया कि अगर उन दोनों ने गलत कदम उठाया, तो उस का अपराधी बाप उस के परिवार की हत्या कर देगा. मगर नीलू सारी बात सुन कर भी अपनी जिद पर अड़ी थी.

कुछ देर सोचने के बाद नीलू ने एक सलाह दी, तो राज सोच में पड़ गया.

नीलू बोली, ‘‘हम दोनों इस जालिम जमाने से बहुत दूर भाग चलते हैं, जहां हमारे प्यार का कोई दुश्मन न हो. जब हमारे 4-5 बच्चे हो जाएंगे, तब पापा का गुस्सा अपनेआप ठंडा हो जाएगा.’’

यह सुन कर राज डर गया और बोला, ‘‘नहींनहीं, मेरी प्यारी नीलू, यह रास्ता बदनामी और तबाही की तरफ जाता है. ऐसा करने से हमारे परिवारों की बदनामी तो होगी ही, तुम्हारा बाप मेरे परिवार पर कहर बन कर टूट पड़ेगा. इस का अंजाम बहुत बुरा होगा.’’

राज ने खतरे का सुलगता हुआ आईना दिखाया, तो नीलू थोड़ा सहम गई.

नीलू बोली, ‘‘सोच लो राज, आया समय एक बार हाथ से निकल गया, तो दोबारा हमारे हाथ कभी नहीं आएगा. हिम्मत और कोशिश करने से हमारी समस्या का हल हो सकता है.’’

मगर राज को अकरम का डर था. वह जल्लाद से कम न था. राज अपने मांबाप और बहन से बहुत प्यार करता था, इसलिए उस ने अपनी मुहब्बत को कुरबान करने का मन बना लिया. उस दिन के बाद से वह नीलू से नहीं मिला. मगर नीलू को दिल से भुलाना इतना आसान कहां था?

अकरम ने हफ्तेभर में ही नीलू की शादी कर के उसे ससुराल भेज दिया.

आज जब राज को पता चला कि नीलू अपने मायके आई है, उस का दिल मिलने को मचल उठा.

मिलने की चाहत लिए राज धीरेधीरे कदमों से चलता हुआ नीलू के घर पहुंच गया. घर का मेन गेट अंदर से बंद था. उस ने नीलू के घर का गेट खटखटाया, तो वह खुल गया. सामने उस की प्यारी नीलू ही खड़ी थी. शायद नहा कर निकली थी, पानी के मोती उस के काले लंबे बालों से गिर रहे थे.

‘‘अरे राज, कैसे हो? अंदर आओ न…’’ राज को देखते ही नीलू खुशी से चहक उठी, ‘‘अपनी क्या हालत बना ली है तुम ने? अपनेआप को संभालो राज?’’

‘‘नीलू, जो मुसाफिर अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचते, उन का यही अंजाम होता है. लेकिन, तुम मेरी हालत पर मत जाओ, अपनी सुनाओ?’’ राज ने कांपती आवाज में पूछा.

नीलू को लगा कि हालात से घबरा कर राज उस से दूर तो हो गया, मगर अपनी महबूबा को भूल नहीं पाया.

‘‘मैं खुश हूं या नहीं, इस का कोई माने नहीं है. जब तुम ने ही हालात से घबरा कर मेरा कहा मानने से इनकार कर दिया, तो मुझे तो हालात से समझौता करना ही था. मगर आज तुम्हारी हालत देख कर ऐसा लग रहा है कि तुम अधूरी मुहब्बत की आग में बुरी तरह झुलस

रहे हो. बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूं?’’ कहते हुए नीलू ने राज के दोनों हाथ थाम लिए.

‘‘नीलू, मैं जो देखना और महसूस करना चाहता था, वह सब देख कर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि मेरी कुरबानी कामयाब हो गई है. मैं जिंदगीभर तुम्हारी यादों को अपने दिल में सहेज कर रखूंगा. तुम खुशहाल रहोगी, तो मैं समझूंगा कि मुझे सबकुछ मिल गया,’’ राज ने कहा.

‘‘नहीं राज, तुम मुझे कभी अपने से अलग मत समझना. मैं आज भी तुम्हारे साथ हूं. जहां चाहे ले चलो, मैं तुम्हारी बन कर रहूंगी,’’ कहते हुए नीलू ने राज को अपनी बांहों में कस कर चूमना चाहा.

‘‘मेरी वजह से जमाना तुम्हें बदचलन कहे, मैं यह सब सह नहीं पाऊंगा,’’ राज ने कहा.

नीलू बोली, ‘‘अब पता नहीं कब आ सकूंगी. थोड़ी देर अंदर आओ. अपने मन की बात मैं तुम्हारे सामने रखना चाहती हूं,’’ इतना कह कर नीलू ने राज का हाथ पकड़ कर कमरे में ले जाना चाहा.

‘‘नहीं नीलू, मुझ से यह नहीं हो पाएगा. मुझे माफ कर देना,’’ इतना कह कर राज उलटे कदमों से गेट से बाहर आ गया. नीलू राज को रोकना तो चाहती थी, मगर उसे रोक नहीं सकी.

Romantic Story : अनुत्तरित प्रश्न – प्रतीक्षा और अरुण के प्यार में कौन बन रहा था दीवार

Romantic Story : सोफे पर अधलेटी सी पड़ी आभा की आंखें बारबार भीग उठती थीं. अंतर्मन की पीड़ा आंसुओं के साथ बहती जा रही थी. उस के पति आकाश भी भीतरी वेदना मन में समेटे मानो अंगारों पर लोटते सोच में डूबे थे. ‘यह क्या हो गया? क्या अतीत की वह घटना सचमुच हमारी भूल थी? कितनी आसानी से प्रतीक्षा ने सारे संबंध तोड़ डाले. एक बार भी मांबाप की उमंगों, सपनों के बारे में नहीं सोचा. उस का दोटूक उत्तर किस तरह कलेजे को बींध गया था, देखो मम्मी, अब तुम्हारा जमाना नहीं रहा. मैं अपना भलाबुरा अच्छी तरह समझती हूं. वैसे भी अपने जीवन का यह महत्त्वपूर्ण फैसला मैं किसी और को कैसे लेने दूं?’

‘पर प्रतीक्षा, मैं और तुम्हारे पापा कोई और नहीं हैं. हम ने तुम्हें जन्म दिया है,’ आभा ने कहा तो प्रतीक्षा चिढ़ गई, ‘यही तो मुसीबत है, जन्म दे कर जो इतना बड़ा उपकार कर दिया है, उस का ऋण तो मैं इस जन्म में चुका ही नहीं सकती… क्यों?’

‘बेटा, तुम हमारी बात को गलत दिशा में मोड़ रही हो. शादी का फैसला जीवन का अहम फैसला होता है, इस में जल्दबाजी ठीक नहीं. दिल से नहीं दिमाग से निर्णय लेना चाहिए,’ आभा ने समझाया तो प्रतीक्षा बोली, ‘मैं ने कोई जल्दबाजी नहीं की है, मैं अरुण को 2 वर्षों से जानती हूं. आप दोनों अच्छी तरह समझ लें, मैं अरुण से ही शादी करूंगी.’

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‘मुझे अरुण पसंद नहीं है, प्रतीक्षा. वह अभी ठीक से कोई जौब भी नहीं पा सका है और मुझे लगता है कि वह एक जिम्मेदार जीवनसाथी नहीं बन पाएगा. तुम दोनों अभी कल्पना की उड़ान भर रहे हो, जब धरातल से सिर टकराएगा तो बहुत पछताओगी, बेटी,’ आकाश ने कहा.

‘आप अगर अरुण को पसंद नहीं करते तो मैं भी ऐसे पिता को पसंद नहीं करती जो बच्चों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं.’

‘प्रतीक्षा…’ आभा सन्न रह गई थी.

आकाश कुछ देर  चुप रहे फिर उन्होंने बेटी से कहा, ‘शादी को ले कर हमारे भी कुछ अरमान हैं.’

‘बी प्रैक्टिकल पापा, डोंट बी इमोशनल और आप ने भी तो प्रेमविवाह ही किया था न?’ प्रतीक्षा पांव पटकती कमरे से बाहर चली गई पर उस का तर्क मुंह चिढ़ा रहा था.

आभा ने कुछ कहना चाहा तो आकाश ने उसे रोक दिया, ‘मुझे कुछ देर के लिए अकेला छोड़ दो.’

आकाश अकेले बैठे सोच के अथाह सागर में डूब गए. उन्होंने और आभा ने भी तो प्रेमविवाह किया था. आज जिस स्थान पर वे खड़े हैं कल उसी स्थान पर उन के मांबाप खड़े थे.

‘आकाश, यह तू क्या कह रहा है? अभी तो तू ने गे्रजुएशन भी नहीं किया है. यह कैसे संभव है?’ मां ने अवाक् हो कर पूछा था.

‘क्यों संभव नहीं है, मां? रही ग्रेजुएट होने की बात, तो मात्र 4 महीने बाद मुझे बीकौम की डिगरी मिल ही जाएगी.’

‘बेटा, केवल डिगरी मिल जाने से क्या होगा? क्या तू अभी परिवार संभालने के योग्य है? वैसे भी तेरे पिताजी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं होंगे.’

मां ने समझाया तो आकाश चिढ़ कर बोला, ‘पिताजी नहीं मानते तो मत मानें, मुझे उन की परवा नहीं. मैं आभा के सिवा किसी और से शादी नहीं करूंगा.’

आकाश और आभा एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों ने विवाह का फैसला किया था. पर दोनों के परिवार वाले इस विवाह के सख्त खिलाफ थे. आभा के परिवार वाले पढ़ालिखा कमाऊ वर चाहते थे और आकाश के मातापिता पुत्र को उच्च पद पर पहुंचते हुए देखने के अभिलाषी थे. उस समय दोनों परिवारों के बच्चे उम्र की उस परिधि पर खड़े थे जहां केवल अपना निर्णय, अपनी भावनाएं और अपनी सोच ही अंतर्मन पर हावी होती हैं.

आकाश के पिता सबकुछ जान कर क्रोध से फट पड़े थे, ‘आकाश की मां, समझाओ इस नालायक को, शादी के लिए तो उम्र पड़ी है, अभी पढ़ाई पर ध्यान दे. कहां तो मैं इस के लिए सोच रहा हूं, बीकौम के बाद ये आगे पढ़े, चार्टर्ड अकाउंटैंट बने, खूब नाम कमाए, और यह है कि लैलामजनूं का नाटक कर रहा है.’

‘आप शांत रहिए, मैं उसे समझाऊंगी,’ मां बेहद दुखी थीं.  पर बगल के कमरे में बैठा, अब तक सबकुछ चुपचाप सुन रहा आकाश तमतमा कर कमरे में चला आया था, ‘पिताजी, यह लैलामजनूं… नाटक, आप क्याक्या बोलते जा रहे हैं? क्या प्यार करना गुनाह है? और अगर है भी, तो मैं यह गुनाह कर के ही रहूंगा, मैं आभा से कल ही कोर्टमैरिज करने वाला हूं, आप से जो बन पड़ता है कर लीजिए.’

पिताजी सन्न रह गए थे और मां ने एक तमाचा जड़ दिया था आकाश के मुंह पर, ‘नालायक, तू इन्हें भलाबुरा कह रहा है. बेटा, मांबाप हर परिस्थिति में बच्चों का भला ही सोचते हैं. तू पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर, अपने पांव पर खड़ा हो, तब आभा से ही शादी करना पर अभी नहीं. क्यों पांव पर कुल्हाड़ी मार रहा है?’

पर उस वक्त न जाने आकाश की सोच को क्या हो गया था? क्रोध में विवेक खो बैठे आकाश ने आभा से कोर्टमैरिज कर ली.

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‘मेरे घर में तुम्हारा कोई स्थान नहीं. निकल जाओ मेरे घर से, फिर कभी अपना मुंह मत दिखाना. कल जब पछताओगे तो केवल मैं ही याद आऊंगा. आज मेरी बातें बुरी लग रही हैं न, कल यही तीर सी चुभेंगी.’

पिता के कहे शब्दों को आकाश आज भी महसूस करते हैं. कम उम्र में सोच कितनी ‘अपरिपक्व’ होती है? इस बात को वे धीरेधीरे समझने लगे थे. बिना सोचेसमझे भावावेश में आ कर उन्होंने आभा से विवाह तो कर लिया पर जल्द ही दोनों को अपनी गलतियों का एहसास होने लगा था.

आकाश ने एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर ली थी और एक छोटे से किराए के घर से जीवन शुरू कर दिया था. छोटीछोटी चीजों के लिए भी तरसता जीवन. आकाश लाख चाह कर भी पत्नी की इच्छा पूरी नहीं कर पाता था. नमकहल्दी का जुगाड़ करने में ही पूरा महीना बीत जाता था. इसी बीच, आभा गर्भवती हो गई. खर्च बढ़ता जा रहा था और आमदनी सीमित थी. भीतरी कुंठा अब आकाश का सुखचैन जैसे लीलती जा रही थी. बातबात पर भड़कना जैसे उस की आदत में शुमार होता जा रहा था.

‘मैं जब भी कुछ मांगती हूं तुम इतना भड़क क्यों जाते हो? कहां गए तुम्हारे वादे? मुझे हर हाल में खुश रखने का तुम ने वादा किया था न?’ एक दिन आभा ने पूछ ही लिया था.

‘मैं अभी इस से ज्यादा कुछ नहीं कर सकता,’ आकाश ने चिढ़ कर कहा तो आभा बोली, ‘काश, हम अपनी पढ़ाई पूरी होने के बाद शादी करते तो शायद जीवन कितना सुखमय होता.’

‘तुम ठीक कह रही हो, आभा. न जाने मुझे उस वक्त क्या हो गया था? मुझे कैरियर बनाने के बाद ही विवाह के लिए सोचना चाहिए था,’ एक ठंडी सांस भरते हुए आकाश ने कहा.

समय धीरेधीरे सरकता जा रहा था. दोनों पतिपत्नी ने विचार किया कि वे अभी किसी तीसरे की जिम्मेदारी उठाने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए गर्भपात ही एकमात्र उपाय है. और एक अजन्मा शिशु इस दुनिया में आंखें खोलने से रोक दिया गया. उस रात दोनों पतिपत्नी की आंखों में नींद नहीं असंख्य प्रश्न थे.

चुपचाप बैठा आकाश सोच रहा था, किशोरावस्था और यौवन की दहलीज पर खड़ा व्यक्ति कितना असहाय होता है. निर्णय लेने की क्षमता से रहित. पर फिर भी स्वयं को परिपक्वता से भरा समझ कर भूल करता जाता है. ऐसे में मातापिता का सहयोग, विचार, सहमति, निर्णय और प्रेम कितना महत्त्वपूर्ण होता है. ठीक ही तो कहा था पिताजी ने, ‘पछताओगे एक दिन तब केवल मैं ही याद आऊंगा. अभी मेरी बातें कड़वी लग रही हैं न? पर एक दिन, यही सोचने पर विवश कर देंगी.’

उधर, आभा परकटे पंछी की तरह बिस्तर पर करवटें बदल रही थी. मांबाप का दिल दुखा कर कोई भी खुश नहीं रह सकता. प्रेम एक नैसर्गिक अनुभूति है. इसे अनुभव कर के खुशहाल जीवन बिताना ही जीवन की सार्थकता है. प्रेम कभी पलायन का कारण नहीं बन सकता. सच्चा प्रेम तो संबंधों में दृढ़ता प्रदान करता है, एक व्यापक सोच प्रदान करता है. प्रेम के कारण परिजनों से मुख मोड़ने वाले कभी सच्चा सुख नहीं पा सकते. आभा ने जैसे अपनेआप से कहा, ‘मेरा और आकाश का प्रेम एक आकर्षण था. जो धीरेधीरे एकदूसरे के प्रति आसक्ति में बदलता गया. आसक्ति विचारधाराओं को स्वयं में समेटती गई. हम परिवार से दूर होते गए और आखिरकार अकेले रह गए. काश, थोड़ा सा विचार किया होता तो आज सारे सुख हमारी मुट्ठियों में होते.’

अगली सुबह आभा ने आकाश से कहा, ‘मैं टीचर की ट्रेनिंग करना चाहती हूं. तब हम ने विवाह में जल्दबाजी की थी, यह हमारी भूल थी, पर अब मैं अपने पांव पर खड़ी हो कर तुम्हारा हाथ बंटाना चाहती हूं.’

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‘तुम बिलकुल ठीक सोच रही हो. मैं भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना चाहता हूं. सफल होने के बाद हम दोनों अपने परिवारों के साथ फिर से जुड़ जाने का प्रयास करेंगे. परिवार से अलग रह कर कोई खुश नहीं रह सकता,’ आकाश का स्वर भीग उठा था.

समय अपनी धुरी पर सरकता रहा. प्रकृति ने प्रत्येक इंसान को यह शक्ति दी है कि अगर वह मन से कुछ ठान लेता है तो कर के ही रहता है. समय के साथ आभा और आकाश ने भी इच्छित मंजिल पा ली. आकाश बैंक में पीओ हो गए और आभा एक स्कूल में शिक्षिका बन गई. 2 प्यारे बच्चों की किलकारी से घर गूंज उठा. सुखमय जीवन तो जैसे क्षणों में बीत जाता है. बेटा निलय इंजीनियरिंग पढ़ रहा था और बेटी प्रतीक्षा मैनेजमैंट की पढ़ाई कर रही थी. मातापिता की नजरों में बच्ची, प्रतीक्षा उस दिन सहसा बड़ी लगने लगी जब उस ने अरुण के बारे में उन्हें बताया.

‘मां, अरुण मेरा सीनियर है. एक बार मिलोगी तो बारबार मिलना चाहोगी,’ प्रतीक्षा ने चहकते हुए कहा था.

‘यह अरुण कौन है?’

‘बताया न, मेरा सीनियर है.’

‘अरे नहीं, हमारी जातिधर्म का तो है न?’ आभा ने हठात पूछ लिया था.

‘उस से क्या फर्क पड़ता है?’ प्रतीक्षा ने मुंह बना लिया था.

‘फर्क पड़ता है, सब की अपनीअपनी संस्कृति होती है.’

‘डोंट बी सिली, मां, प्रेम के सामने इन ओछी बातों की कोई अहमियत

नहीं होती. वैसे भी मैं बेकार ही इस बहस में पड़ रही हूं. मुझे अरुण पसंद है, दैट्स आल.’

प्रतीक्षा, मां को अवाक् छोड़ कर कमरे से बाहर जा चुकी थी. आभा के कलेजे में अपने ही कहे कुछ शब्द चुभ रहे थे, जो उस ने अपनी मां से कहे थे, ‘आप लोगों ने अपना जीवन जी लिया है, अब मुझे भी चैन से अपना जीवन जीने दो. जिस से प्रेम है, उस से शादी की है, घर छोड़ कर भागी नहीं हूं. जो तुम लोगों को समाज का भय सता रहा है.’

आकाश को जब सबकुछ पता चला तो उन्होंने भी बेटी से बात की. पर प्रतीक्षा अपनी बात पर अड़ी रही.

‘पापा, आप ने मुझे उच्च शिक्षा दी है, तो भलाबुरा समझने की बुद्धि भी दी है. आप ही बताइए, मैं कभी गलत निर्णय ले सकती हूं?’

आकाश सोच में पड़ गए. इसे कहते हैं परिवर्तन, पहले प्रेमविवाह की जड़ में होती थी जिद और अब…? आज की पीढ़ी तो आत्मस्वाभिमान को ही ढाल बना कर मनचाहा निर्णय ले रही है. अभिभावक तब भी असहाय थे और आज भी मूक रहने को विवश हैं.

‘बताइए न पापा, क्या प्रेम करने से पहले जाति, धर्म सबकुछ पूछ लेना ही सही है? आप ने भी तो मां से…’

प्रतीक्षा की बात बीच में ही काट कर आकाश बोले, ‘हमारी जाति एक थी, प्रतीक्षा. दूसरी जाति में विवाह से कई सामाजिक मुश्किलें आती हैं. फिर भी तुम अपनी पढ़ाई पूरी करो, अरुण को भी सही जौब मिल जाने दो. फिर हम धूमधाम से तुम्हारी शादी करवा देंगे.’

‘मुझे और अरुण को तो कोर्टमैरिज पसंद है, तामझाम के लिए आज किस के पास वक्त है?’ प्रतीक्षा ने मुंह बना कर कहा तो आकाश क्रोधित हो उठे, ‘जब तुम ने सारे निर्णय स्वयं ही ले लिए हैं तो हमारी जरूरत क्या है? तुम्हें और अरुण को यह पसंद नहीं, वह पसंद नहीं, और हमारी पसंद? मुझे अरुण अपने दामाद के रूप में पसंद नहीं.’

‘मैं भी ऐसे पिता को पसंद नहीं करती जो मेरी भावनाएं न समझे,’ कह कर प्रतीक्षा मांबाप को सकते की हालत में छोड़ कर चली गई.

‘‘चाय ले आऊं?’’ आभा ने पूछा तो आकाश की सोच पर विराम लग गया.

‘‘प्रतीक्षा कहां है?’’ उन्होंने पूछा तो आभा ने बताया कि वह बाहर गई है.

‘‘क्या सोच रहे हो?’’ आभा बोली.

‘‘यही कि एकमात्र बेटी का विवाह भी हम अपने रीतिरिवाज और परंपरा के अनुसार नहीं कर सकेंगे. वह जिद्दी लड़की कोर्टमैरिज ही करेगी, देखना.’’

‘‘पता नहीं बच्चे मांबाप की भावनाओं का खयाल क्यों नहीं रखते? बच्चों की उद्दंडता उन्हें कितनी चोट पहुंचाती है.’’

‘‘यह एक कटु सत्य है.’’

‘‘हां, पर उस से बड़ा एक सच और है,’’ आभा ने ठहरे हुए स्वर में कहा.

‘‘क्या?’’

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‘‘यही कि जब अभिभावक स्वयं बच्चे होते हैं, युवावस्था की दहलीज पर पांव रखते हैं तो अपने मांबाप की कद्र नहीं करते और जब अपना समय आता है तो बच्चों की उद्दंडता, निर्लिप्तता आहत करती है. बबूल के पेड़ पर आम का फल नहीं लगता.’’

‘‘तुम सच कह रही हो, आभा. मांबाप बनने के बाद ही उन की वेदना का सही साक्षात्कार हो पाता है, और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. आज मैं भी बाबूजी और मां की पीड़ा का सहज अनुमान लगा पा रहा हूं,’’ आकाश के शब्द आंतरिक पीड़ा से भीग उठे थे.

‘‘अगर दोनों पीढि़यां एकदूसरे की भावनाओं को समझ कर परस्पर सामंजस्य बिठाएं तो ऐसी जटिल परिस्थिति कभी उत्पन्न ही नहीं होगी. कभी मांबाप अड़ जाते हैं तो कभी बच्चे. थोड़ाथोड़ा दोनों झुक जाएं तो खुशियों का वृत्त पूरा हो जाए, है न?’’ आभा ने कहा.

‘‘खुशियों का वृत्त जरूर पूरा होगा मां,’’ तभी अचानक प्रतीक्षा कमरे में आ गई.

मातापिता की प्रश्नवाचक दृष्टि देख कर वह मुसकराती हुई बोली, ‘‘मैं आप लोगों की इस बात से सहमत हूं कि हमें फ्लैक्सिबल होना चाहिए. अगर आप को मेरे निर्णय पर एतराज नहीं तो चलिए, मानती हूं आप की बात. अरुण की जौब के बाद ही मैं शादी करूंगी और कोर्टमैरिज नहीं, पारंपरिक विवाह जैसा कि आप लोग चाहते हैं. ठीक है?’’

‘‘हां बेटी,’’ आकाश ने बेटी का कंधा थपथपा दिया था. प्रतीक्षा के जाने के बाद आभा ने देखा आकाश का चेहरा अब भी गंभीर था.

‘‘अब तो ठीक है न?’’ आभा ने पूछा तो आकाश ने कहा, ‘‘हां, ऊपरी तौर पर. सोच रहा हूं, 2 पीढि़यों का यह द्वंद्व क्या कभी समाप्त हो पाएगा?’’

एक प्रश्न कमरे में गूंजा और अनुत्तरित रह गया. पर दोनों का मौन बहुत कुछ कह रहा था.

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लेखिकाडा. निरुपमा राय

Hindi Kahani : पहेली – क्या ससुराल में शिखा को प्रताड़ित किया जाता था

Hindi Kahani : मैं शनिवार की शाम औफिस से ही एक रात मायके में रुकने आ गई. सीमा दीदी भी 2 दिनों के लिए आई हुई थी. सोचा सब से जी भर कर बातें करूंगी पर मेरे पहुंचने के घंटे भर बाद ही रवि का फोन आ गया.

मैं बाथरूम में थी, इसलिए मम्मी ने उन से बातें करीं.

‘‘रवि ने फोन कर के बताया है कि तेरी सास को बुखार आ गया है,’’ कुछ देर बाद मुझे यह जानकारी देते हुए मां साफतौर पर नाराज नजर आ रही थीं.

मैं फौरन तमतमाती हुई बोली, ‘‘अभी मुझे यहां पहुंचे 1 घंटा भी नहीं हुआ है कि बुलावा आ गया. सासूमां को मेरी 1 दिन की आजादी बरदाश्त नहीं हुई और बुखार चढ़ा बैठीं.’’

‘‘क्या पता बुखार आया भी है या नहीं,’’ सीमा दीदी ने बुरा सा मुंह बनाते हुए अपने मन की बात कही.

‘‘मैं ने जब आज सुबह सासूमां से यहां 1 रात रुकने की इजाजत मांगी थी, तभी उन का मुंह फूल गया था. दीदी तुम्हारी मौज है, जो सासससुर के झंझटों से दूर अलग रह रही हो,’’ मेरा मूड पलपल खराब होता जा रहा था.

‘‘अगर तुझे इन झंझटों से बचना है, तो तू अपनी सास को अपनी जेठानी के पास भेजने की जिद पर अड़ जा,’’ सीमा दीदी ने वही सलाह दोहरा दी, जिसे वे मेरी शादी के महीने भर बाद से देती आ रही हैं.

‘‘मेरी तेजतर्रार जेठानी के पास न सासूमां जाने को राजी हैं और न बेटा भेजने को. तुम्हें तो पता ही है पिछले महीने सास को जेठानी के पास भेजने को मेरी जिद से खफा हो कर रवि ने मुझे तलाक देने की धमकी दे दी थी. अपनी मां के सामने उन की नजरों में मेरी कोई वैल्यू नहीं है, दीदी.’’

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‘‘तू रवि की तलाक देने की धमकियों से मत डर, क्योंकि हम सब को साफ दिखाई देता है कि रवि तुझ पर जान छिड़कता है.’’

‘‘सीमा ठीक कह रही है. तुझे रवि को किसी भी तरह से मनाना होगा. तेरी सास को दोनों बहुओं के पास बराबरबराबर रहना चाहिए,’’ मां ने दीदी की बात का समर्थन किया.

मैं ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा, ‘‘मां, फिलहाल मुझे वापस जाना होगा.’’

‘‘पागलों जैसी बात न कर,’’ मां भड़क उठीं, ‘‘तू जब इतने दिनों बाद सिर्फ 1 दिन को बाहर निकली है, तो यहां पूरा आराम कर के जा.’’

‘‘मां, मेरी जिंदगी में आराम करना कहां लिखा है? मुझे वापस जाना ही पड़ेगा,’’ कह अपना बैग उठा कर मैं ड्राइंगरूम की तरफ चल पड़ी.

‘‘शिखा, तू इतना डर क्यों रही है? देख, रवि ने तेरे फौरन वापस आने की बात एक बार भी मां से नहीं कही है,’’ दीदी ने मुझे रोकने को समझाने की कोशिश शुरू की.

‘‘दीदी, अगर मैं नहीं गई, तो इन का मूड बहुत खराब हो जाएगा. तुम तो जानती ही हो कि ये कितने गुस्से वाले इनसान हैं.’’

उन सब का समझाना बेकार गया और करीब घंटे भर बाद मुझे दीदी व जीजाजी कार से वापस छोड़ गए. अपनी नाराजगी दर्शाने के लिए दोनों अंदर नहीं आए.

मुझे अचानक घर आया देख रवि चौंकते हुए बोले, ‘‘अरे, तुम वापस क्यों आ गई हो?

मैं ने तुम्हें बुलाने के लिए थोड़े ही फोन किया था.’’

मेरे लौट आने से उन की आंखों में पैदा हुई खुशी की चमक को नजरअंदाज करते हुए मैं ने शिकायत की, मुझे 1 दिन भी आप ने चैन से अपने मम्मीपापा के घर नहीं रहने दिया. क्या 1 रात के लिए आप अपनी बीमार मां की देखभाल नहीं कर सकते थे?

‘‘सच कह रहा हूं कि मैं ने तुम्हारी मम्मी से तुम्हें वापस भेजने को नहीं कहा था.’’

‘‘वापस बुलाना नहीं था, तो फोन क्यों किया?’’

‘‘फोन तुम्हें सूचना देने के लिए किया था, स्वीटहार्ट.’’

‘‘क्या सूचना कल सुबह नहीं दी जा सकती थी?’’ मेरे सवाल का उन से कोई जवाब देते नहीं बना.

उन के आगे बोलने का इंतजार किए बिना मैं सासूमां के कमरे की तरफ चल दी.

सासूमां के कमरे में घुसते ही मैं ने तीखी आवाज में उन से एक ही सांस में कई सवाल पूछ डाले, ‘‘मम्मीजी, मौसमी बुखार से इतना डरने की क्या जरूरत है? क्या 1 रात के लिए आप अपने बेटे से सेवा नहीं करा सकती थीं? मुझे बुलाने को क्यों फोन कराया आप ने?’’

‘‘मैं ने एक बार भी रवि से नहीं कहा कि तुझे फोन कर के बुला ले. इस मामले में मेरे ऊपर चिल्लाने की कोई जरूरत नहीं है, बहू,’’ सासूमां फौरन मुझ से भिड़ने को तैयार हो गईं.

‘‘इन के लिए तो मैं खाना साथ लाई हूं. आप ने क्या खाया है? मैं सुबह जो दाल बना कर…’’

‘‘मेरा मन कोई दालवाल खाने का नहीं कर रहा है,’’ उन्होंने नाराज लहजे में जवाब दिया.

‘‘तो बाजार से टिक्की या छोलेभठूरे मंगवा दूं?’’

‘‘बेकार की बातें कर के तू मेरा दिमाग मत खराब कर, बहू.’’

‘‘सच में मेरा दिमाग खराब है, जो आप की बीमारी की खबर मिलते ही यहां भागी चली आई. जिस इनसान के पास इतनी जोर से चिल्लाने और लड़ने की ऐनर्जी है, वह बीमार हो ही नहीं सकता है,’’ मैं ने उन के माथे पर हाथ रखा तो मन ही मन चौंक पड़ी, क्योंकि मुझे महसूस हुआ मानो गरम तवे पर हाथ रख दिया हो.

‘‘तू मुझे और ज्यादा तंग करने के लिए आई है क्या? देख, मेरे ऊपर किसी तरह का एहसान चढ़ाने की कोशिश मत कर.’’

उन की तरफ से पूरा ध्यान हटा कर मैं रवि से बोली, ‘‘आप खड़ेखड़े हमें ताड़ क्यों रहे हो? गीली पट्टी क्यों नहीं रखते हो मम्मीजी के माथे पर? इन्हें तेज बुखार है.’’

‘‘मैं अभी गीली पट्टी रखता हूं,’’ कह वे हड़बड़ाए से रसोई की तरफ चले गए.

‘‘मैं आप के लिए मूंग की दाल की खिचड़ी बनाने जा रही….’’

‘‘मैं कुछ नहीं खाऊंगी. मेरे लिए तुझे कष्ट करने की जरूरत नहीं है,’’ वे नाराज ही बनी रहीं.

मैं भी फौरन भड़क उठी, ‘‘आप को भी मुझे ज्यादा तंग करने की जरूरत नहीं है. पता नहीं मैं क्यों आप के इतने नखरे उठाती हूं? बड़े भाईसाहब के पास जा कर रहने में पता नहीं आप को क्या परेशानी होती है?’’

‘‘तू एक बार फिर कान खोल कर सुन ले कि यह मेरा घर है और मैं हमेशा यहीं रहूंगी. तुझ से मेरे काम न होते हों, तो मत किया कर.’’

‘‘बेकार की चखचख से मेरा समय बरबाद करने के बजाय यह बताओ कि क्या चाय पीएंगी?’’ मैं ने अपने माथे पर यों हाथ मारा मानो बहुत तंग हो गई हूं.

‘‘तू मेरे साथ ढंग से क्यों नहीं बोलती है, बहू?’’ यह सवाल उन्होंने कुछ धीमी आवाज में पूछा.

‘‘अब मैं ने क्या गलत कहा है?’’

‘‘तू चाय पीने को पूछ रही है या लट्ठ मार रही है?’’

‘‘आप को तो मुझ से जिंदगी भर शिकायत बनी रहेगी,’’ मैं अपनी हंसी नहीं रोक पा रही थी, इसलिए तुरंत रसोई की तरफ चल दी.

मैं रसोई में आ कर दिल खोल कर मुसकराई और फिर खिचड़ी व चाय बनाने में लगी.

कुछ देर बाद पीछे से आ कर रवि ने मुझे अपनी बांहों में भर लिया और भावुक हो कर बोले, ‘‘मां का तेज बुखार देख कर मैं घबरा गया था. अच्छा हुआ जो तुम फौरन चली आईं. वैसे वैरी सौरी कि तुम 1 रात भी मायके में नहीं रह पाई.’’

‘‘तुम ने कब मेरी खुशियां की चिंता की है, जो आज सौरी बोल रहे हो?’’ मैं ने उचक कर उन के होंठों को चूम लिया.

‘‘तुम जबान की कड़ी हो पर दिल की बहुत अच्छी हो.’’

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‘‘मैं सब समझ रही हूं. अपनी बीमार मां की सेवा कराने के लिए मेरी झूठी तारीफ करने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘नहीं, तुम सचमुच दिल की बहुत अच्छी हो.’’

‘‘सच?’’

‘‘बिलकुल सच.’’

‘‘तो कमरे में मेरे लौटने से पहले सो मत जाना. अपने प्रोग्राम को गड़बड़ कराने की कीमत तो पक्का मैं आज रात को ही वसूल करूंगी,’’ मैं ने उन से लिपट कर फटाफट कई सारे चुंबन उन के गाल पर अंकित कर दिए.

‘‘आजकल तुम्हें समझना मेरे बस की तो बात नहीं है,’’ उन्होंने कस कर मुझे अपनी बांहों में भींच लिया.

‘‘तो समझने की कोशिश करते ही क्यों हो? जाओ, जा कर अपनी मम्मी के पास बैठो,’’ कह मैं ने हंसते हुए उन्हें किचन से बाहर धकेल दिया.

वे ठीक कह रहे हैं. महीने भर से अपने व्यवहार में आए बदलाव के कारण मैं अपनी सास और इन के लिए अनबूझ पहेली बन गई हूं.

अपनी सास के साथ वैसे अभी भी मैं बोलती तो पहले जैसा ही तीखा हूं पर अब मेरे काम हमेशा आपसी रिश्ते को मजबूती देने व दिलों को जोड़ने वाले होते हैं. तभी मैं बिना बुलाए अपनी बीमार सास की सेवा करने लौट आई.

कमाल की बात तो यह है कि मुझ में आए बदलाव के कारण मेरी सासूमां भी बहुत बदल गई हैं. अब वे अपने सुखदुख मेरे साथ सहजता से बांटती हैं. पहले हमारे बीच नकली व सतही शांति कायम रहती थी पर अब आपस में खूब झगड़ने के बावजूद हम एकदूसरे के साथ खुश व संतुष्ट नजर आती हैं.

सब से अच्छी बात यह हुई है कि अब हमारे झगड़ों व शिकायतों के कारण रवि टैंशन में नहीं रहते हैं और उन का ब्लडप्रैशर सामान्य रहने लगा है. सच तो यही है कि इन की खुशियों व विवाहित जीवन की सुखशांति बनाए रखने के लिए ही मैं ने खुद को बदला है.

‘‘मम्मी और मेरे बीच हो रहे झगड़े में कभी अपनी टांग अड़ाई, तो आप की खैर नहीं,’’ महीने भर पहले दी गई मेरी इस चेतावनी के बाद वे मंदमंद मुसकराते हुए हमें झगड़ते देखते रहते हैं.

‘‘जोरू के गुलाम, कभी तो अपनी मां की तरफ से बोला कर,’’ मम्मीजी जब कभी इन्हें उकसाने को ऐसे डायलौग बोलती हैं, तो ये ठहाका मार कर हंस पड़ते हैं.

सासससुर से दूर रह रही अपनी सीमा दीदी की मौजमस्ती से भरी जिंदगी की तुलना अपनी जिम्मेदारियों भरी जिंदगी से कर के मेरे मन में इस वक्त गलत तरह की भावनाएं कुलबुला रही हैं. सासूमां के ठीक हो जाने के बाद पहला मौका मिलते ही किसी छोटीबड़ी बात पर उन से उलझ कर मैं अपने मन की सारी खीज व तनाव बाहर निकाल फेंकूंगी.

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Best Hindi Story : एहसास – कौनसी बात ने झकझोर दिया सविता का अस्तित्व

Best Hindi Story : शिखा और मैं 1 सप्ताह नैनीताल में बिता कर लौटे हैं. वह अपनी बड़ी बहन सविता को बडे़ जोशीले अंदाज में अपने खट्टेमीठे अनुभव सुना रही है.

सविता की पूरी दिलचस्पी शिखा की बातों में है. मैं दिवान पर लेटालेटा कभी शिखा की कोई बात सुन कर मुसकरा पड़ता हूं तो कभी छोटी सी झपकी का मजा ले लेता हूं.

मेरी सास आरती देवी रसोई में खाना गरम करने गई हैं. मुझे पता है कि सारा खाना सविता पहले ही बना चुकी हैं.

सारा भोजन मेरी पसंद का निकलेगा, पुराने अनुभवों के आधार पर मेरे लिए यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं. ससुराल में मेरी खूब खातिर होती है और इस का पूरा श्रेय मेरी बड़ी साली सविता को ही जाता है.

शिखा अपनी बड़ी बहन सविता के बहुत करीब है, क्योंकि वह उस की सब से अच्छी सहेली और मार्गदर्शक दोनों हैं. शायद ही कोई बात वह अपनी बड़ी बहन से छिपाती हो. उन की सलाह के खिलाफ शिखा से कुछ करवा लेना असंभव सा ही है.

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‘‘हमें पहला बच्चा शादी के 2 साल बाद करना चाहिए,’’ हमारी शादी के सप्ताह भर बाद ही शिखा ने शरमाते हुए यों अपनी इच्छा बताई तो मैं हंस पड़ा था.

‘‘मैं तो इतना लंबा इंतजार नहीं कर सकता हूं,’’ उसे छेड़ने के लिए मैं ने उस की इच्छा का विरोध किया.

‘‘मेरे ऐसा कहने के पीछे एक कारण है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘इन पहले 2 सालों में हम अपने वैवाहिक जीवन का भरपूर मजा लेंगे, सौरभ. अगर मैं जल्दी मां बनने के झंझट में फंस गई तो हो सकता तुम इधरउधर ताकझांक करने लगो और वह हरकत मुझे कभी बरदाश्त नहीं होगी.’’

‘‘यह कैसी बेकार की बातें मुंह से निकाल रही हो?’’ उसे सचमुच परेशान देख कर मैं खीज उठा.

‘‘मेरी दीदी हमेशा मुझे सही सलाह देती हैं और हम बच्चा…’’

‘‘तो यह बात तुम्हारी दीदी ने तुम्हारे दिमाग में डाली है.’’

‘‘जी हां, और वह गलत नहीं हैं.’’

‘‘चलो, मान लिया कि वह गलत नहीं हैं पर एक बात बताओ. क्या तुम हर तरह की बातें अपनी दीदी से कर लेती हो?’’

‘‘बिलकुल कर लेती हूं.’’

‘‘वह बातें भी जो बंद कमरे में हमारे बीच होती हैं?’’ मैं ने चुटकी ली.

‘‘जी, नहीं.’’

वैसे मुझे उस के इनकार पर उस दिन भरोसा नहीं हुआ क्योंकि मेरा सवाल सुन कर उस के हावभाव वैसे हो गए थे जैसे चोरी करने वाले बच्चे को रंगे हाथों पकडे़ जाने पर होते हैं.

इस बात की पुष्टि अनेक मौकों पर हो चुकी है कि शिखा अपनी बड़ी बहन को हर बात बताती है. इस कारण अगर मैं या मेरे परिवार वाले परेशान नहीं हैं तो इसलिए कि सविता बेहद समझदार और गुणवान हैं. मैं उन्हें अपने परिवार का मजबूत सहारा मानता हूं, टांग अड़ा कर परेशानी खड़ी करने वाला रिश्तेदार नहीं.

सविता के पास न रंगरूप की कमी है न गुणों की. कमाती भी अच्छा हैं पर दुर्भाग्य की बात यह है कि बिना शादी किए ही वह खुद को विधवा मानती हैं.

रवि नाम के जिस युवक को वह किशोरावस्था से प्रेम करती थीं, करीब 2 साल पहले उस का एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया. इस सदमे के कारण सविता ने कभी शादी न करने का फैसला कर लिया है. किसी के भी समझाने का सविता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.

मेरे मातापिता ने भी उन्हें शादी करने के लिए राजी करने की कोशिश दिल से की थी. तब उन का कहना था, ‘‘मेरी तकदीर में अपनी घरगृहस्थी के सुख लिखे होते तो मैं जिसे अपना जीवनसाथी बनाना चाहती थी वह मुझे यों छोड़ कर नहीं जाता. रवि की जगह मैं किसी और को नहीं दे सकती.’’

करीब महीने भर पहले मेरा जन्मदिन था. सविता ने कमीजपैंट और मैचिंग टाई का उपहार मुझे दिया था.

‘‘थैंक यू, बड़ी साली साहिबा,’’ मैं ने मुसकराते हुए उपहार स्वीकार किया और फिर भावुक लहजे में बोला,  ‘‘मुझे आप से एक तोहफा और चाहिए. आशा है कि आप मना नहीं करोगी.’’

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‘‘बिलकुल नहीं करूंगी,’’ उन्होंने आत्मविश्वास से भरे स्वर में फौरन जवाब दिया.

‘‘आप शादी कर लो, प्लीज,’’ मैं ने विनती सी की.

पहले तो वह चौंकीं, फिर उन की आंखों में गंभीरता के भाव उपजे और अगले ही पल वह खिलखिला कर हंस भी पड़ीं.

‘‘सौरी, सौरभ, उपहार तुम्हें अपने लिए मांगना था. मेरा शादी करना तुम्हारे लिए गिफ्ट कैसे बन सकता है?’’

‘‘आप का अकेलापन दूर हो जाए, इस से बड़ा गिफ्ट मेरे लिए और कुछ नहीं हो सकता.’’

‘‘तुम सब के होते हुए मुझे अकेलेपन का एहसास कैसे हो सकता है?’’ शिखा और मेरी बहन प्रिया के गले में बांहें डाल कर सविता हंस पड़ीं. और मेरा प्रयास एक बार फिर बेकार चला गया.

हमारे नैनीताल घूम कर आने के बाद सविता दीदी ने मुझे और शिखा को पास बिठा कर एक महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा शुरू की थी.

‘‘सौरभ, तुम को भविष्य को ध्यान में रख कर अब चलना शुरू कर देना चाहिए. खर्चे संभल कर करना शुरू करो. बचत करोगे तो ही बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पाओगे… अपने मकान में रह सकोगे,’’ वह हमें इस तरह समझाते हुए काफी गंभीर नजर आ रही थीं.

‘‘हम दोनों नौकरी करते हैं, पर आज के समय में मकान खरीदना बड़ा महंगा हो गया है. अपने मकान में रहने का सपना जल्दी से पूरा होने का फिलहाल कोई मौका नहीं है,’’ मैं ने दबी आवाज में कहा.

‘‘तुम दोनों क्या मुझे पराया समझते हो?’’ उन्होंने फौरन आहत भाव से पूछा.

‘‘ऐसा बिलकुल भी नहीं है.’’

‘‘तब अपने मकान का सपना पूरा करना तुम दोनों की नहीं, बल्कि हम तीनों की जिम्मेदारी है. सौरभ, आखिर मैं, मां और तुम दोनों के अलावा और किस के लिए कमा रही हूं?’’

वह नाराज हो गई थीं. उन्हें मनाने के लिए मुझे कहना पड़ा कि जल्दी ही हम 3 बेडरूम वाला फ्लैट बुक कराएंगे और उन की आर्थिक सहायता सहर्ष स्वीकार करेंगे. मेरे द्वारा ऐसा वादा करा लेने के बाद ही उन का मूड सुधरा था.

शिखा और मेरे मन में उन के प्रति कृतज्ञता का बड़ा गहरा भाव है. हम दोनों उन के साथ बड़ी गहराई से जुड़े हुए हैं. तभी उन की व्यक्तिगत जिंदगी का खालीपन हमें बहुत चुभता है. बाहर के लोगों के सामने वह सदा गंभीर बनी रहती हैं, पर हम दोनों से खूब खुली हुई हैं.

उस दिन दोपहर का खाना सचमुच मेरी पसंद को ध्यान में रख कर सविता ने तैयार किया था. मैं ने दिल खोल कर उन की प्रशंसा की और वह प्रसन्न भाव से मंदमंद मुसकराती रहीं.

खाना खाने के बाद मैं ने 2 घंटे आराम किया. जब नींद खुली तो पाया कि शरीर यों टूट रहा था मानो बुखार हो. कुछ देर बाद ठंड लगने लगी और घंटे भर के भीतर पूरा शरीर भट्ठी की तरह जलने लगा.

सविता दीदी जिद कर के मुझे शाम को डाक्टर के पास ले गईं. हमें रात को घर लौट जाना था पर उन्होंने जाने नहीं दिया.

‘‘ज्यादा परेशान मत होइए आप,’’ मैं ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘‘इस मौसम में यह बुखार मुझे हर साल पकड़ लेता है. 2-4 दिन में ठीक हो जाऊंगा.’’

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उन की चिंता दूर करने के लिए मैं ने अपनी आवाज में लापरवाही के भाव पैदा किए तो वह गुस्सा हो गईं.

‘‘सौरभ, हर साल तुम बीमार नहीं पड़ोगे तो कौन पड़ेगा?’’ उन्होंने मुझे डांटना शुरू किया, ‘‘तुम्हारा न खाने का कोई समय है, न ही सोने का. दूध से तुम्हें एलर्जी है. फल खाने के बजाय तुम टिक्की और समोसे पर खर्च करना बेहतर मानते हो. अब अगर तुम नहीं सुधरे तो मैं तुम से बोलना बंद कर दूंगी.’’

‘‘दीदी, आप इतना गुस्सा मत करो,’’ मैं ने फौरन नाटकीय अंदाज में हाथ जोडे़,  ‘‘मैं ने दूध पीना शुरू कर दिया है. आप के आदेश पर अब लंच भी ले जाने लगा हूं. वैसे एक बात आप मेरी भी सुन लो, अगर कभी सचमुच आप ने मुझ से बोलना छोड़ा तो मैं आमरण अनशन कर दूंगा. फिर मेरी मौत की जिम्मेदार…’’

सविता ने आगे बढ़ कर मेरे मुंह पर हाथ रख दिया और मेरे देखते ही देखते उन की आंखों में आंसू छलक आए.

‘‘इतने खराब शब्द फिर कभी अपनी जबान पर मत लाना सौरभ. किसी अपने को खोने की कल्पना भी मेरे लिए असहनीय पीड़ा बन जाती है,’’ उन का गला भर आया.

‘‘आई एम सौरी,’’ भावुक हो कर मैं ने उन का हाथ चूमा और माफी मांगी.

उन्होंने अचानक झटका दे कर अपना हाथ छुड़ाया और तेज चाल से चलती कमरे से बाहर निकल गईं.

मैं ने मन ही मन पक्का संकल्प किया कि आगे से ऐसी कोई बात मुंह से नहीं निकालूंगा जिस के कारण सविता के दिल में रवि की याद ताजा हो और दिल पर लगा जख्म फिर से टीसने लगे.

अगले दिन सुबह भी मुझे तेज बुखार बना रहा. शिखा को आफिस जाना जरूरी था. मेरी देखभाल के लिए सविता ने फौरन छुट्टी ले ली.

उस दिन सविता के दिल की गहराइयों में मुझे झांकने का मौका मिला. उन्होंने रवि के बारे में मुझे बहुत कुछ बताया. कई बार वह रोईं भी. फिर किसी अच्छी घटना की चर्चा करते हुए बेहद खुश हो जातीं और अपने दिवंगत प्रेमी के प्रति गहरे प्यार के भाव उन के हावभाव में झलक उठते.

मुझे नहीं लगता कि सविता ने मेरे अलावा कभी किसी दूसरे से इन सब यादों को बांटा होगा. उन्होंने मुझे अपने बहुत करीब समझा है, इस  एहसास ने मेरे  अहम को बड़ा सुख दिया.

शाम को मेरी तबीयत ठीक रही पर रात को फिर बुखार चढ़ गया. शिखा भी अपनेआप को ढीला महसूस कर रही थी, सो वह मेरे पास सोने के बजाय अपनी मां के पास जा कर सो गई.

सविता को अब 2 मरीजों की देखभाल करनी थी. हम दोनों को उन्होंने जबरदस्ती थोड़ा सा खाना खिलाया. वह नहीं चाहती थीं कि भूखे रह कर हम अपनी कमजोरी बढ़ाएं.

रात 11 बजे के आसपास मेरा बुखार बहुत तेज हो गया. सब सो चुके थे, इसलिए मैं चुपचाप लेटा बेचैनी से करवटें बदलता रहा. नींद आ रही थी पर तेज बदन दर्द के कारण मैं सो नहीं सका.

शायद कुछ देर को आंख लग गई होगी, क्योंकि मुझे न तो सविता के कमरे  में आने का पता लगा और न ही यह  कि उन्होंने कब से मेरे माथे पर गीली पट्टियां रखनी शुरू कीं.

तपते बुखार में गीली पट्टियों से बड़ी राहत महसूस हो रही थी. मैं आंखें खोलने को हुआ कि सविता ने मेरे बालों में उंगलियां फिराते हुए सिर की हलकी मालिश शुरू कर दी. इस कारण आंखें खोलने का इरादा मैं ने कुछ देर के लिए टाल दिया.

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जिस बात ने मुझे बहुत जोर से कुछ देर बाद चौंकाया, वह सविता के होंठों का मेरे माथे पर हलका सा चुंबन अंकित करना था.

इस चुंबन के कारण एक अजीब सी लहर मेरे पूरे बदन में दौड़ गई. मैं सविता के बदन से उठ रही महक के प्रति एकदम से सचेत हुआ. उन की नजदीकी मेरे लिए बड़ा सुखद एहसास बनी हुई थी. मैं ने झटके से आंखें खोल दीं.

सविता की आंखें बंद थीं. वह न जाने किस दुनिया में खोई हुई थीं. उन के चेहरे पर मुझे बड़ा सुकून और खुशी का भाव नजर आया.

‘‘सविता,’’ अपने माथे पर रखे उन के हाथ को पकड़ कर मैं ने कोमल स्वर में उन का नाम पुकारा.

सविता फौरन अपने सपनों की दुनिया से बाहर आईं. मुझ से आंखें मिलते ही उन्होंने लाज से अपनी नजरें झुका लीं. अपना हाथ छुड़ाने की उन्होंने कोशिश की, पर मेरी पकड़ मजबूत थी.

‘‘सविता, तुम दिल की बहुत अच्छी हो…बहुत प्यारी हो…बड़ी सुंदर हो,’’ इन भावुक शब्दों को मुंह से निकालने के लिए मुझे कोई कोशिश नहीं करनी पड़ी.

जवाब में खामोश रह कर वह अपना हाथ छुड़ाने का प्रयास करती रही.

एक बार फिर मैं ने उस का हाथ चूमा तो उन्होंने अपना हाथ मेरे हाथ में ढीला छोड़ दिया.

मैं उठ कर बैठ गया. सविता की आंखों में मैं ने प्यार से झांका. वह मुझ से नजरें न मिला सकीं और उन्होंने आंखें मूंद लीं.

सविता का रूप मुझे दीवाना बना रहा था. मैं उन के चेहरे की तरफ झुका. उन के गुलाबी होंठों का निमंत्रण अस्वीकार करना मेरे लिए असंभव था.

मेरे होंठ उन के होंठों से जुडे़ तो उसे तेज झटका लगा. उन की खुली आंखों में बेचैनी के भाव उभरे. कुछ कहने को उन के होंठ फड़फड़ाए, पर शब्द कोई नहीं निकला.

सविता ने  झटके से अपना हाथ छुड़ाया और कुरसी से उठ कर कमरे से बाहर चल पड़ीं. मैं ने उन्हें पुकारा पर वह रुकी नहीं.

मैं सारी रात सो नहीं सका. मन में अजीब से अपराधबोध व बेचैनी के भावों के साथसाथ गुदगुदी सी भी थी.

अगले दिन सुबह सविता, अपनी मां और शिखा के साथ कमरे में आईं. मैं काफी बेहतर महसूस कर रहा था.

‘‘सौरभ बेटे, एक खुशखबरी सुनो. सविता ने शादी के लिए  ‘हां’ कर दी है,’’ यह खबर सुनाते हुए मेरी सास की आंखों में खुशी के आंसू उभर आए.

‘‘अरे, यह कैसे हुआ?’’ मैं ने चौंक कर सविता की तरफ अर्थपूर्ण दृष्टि से देखा.

‘‘मुझे अचानक एहसास हुआ कि मेरे अंदर की औरत, जिसे मैं मरा समझती थी, जिंदा है और उसे जीने का भरपूर मौका देने के लिए मुझे अपनी अलग दुनिया बसानी ही पडे़गी, सौरभ,’’ सविता ने मुझ से बेधड़क आंखें मिलाते हुए जवाब दिया.

‘‘आप का फैसला बिलकुल सही है. बधाई हो,’’ अपनी बेचैनी को छिपा कर मैं मुसकरा पड़ा.

‘‘थैंक यू, सौरभ. तुम ने रात को मेरी आंखें खोलने में जो मदद की है, उस के लिए मैं आजीवन तुम्हारी आभारी रहूंगी,’’ सविता सहज भाव से मुसकरा उठीं.

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‘‘सौरभ, ऐसा क्या समझाया तुम ने, जो दीदी ने अपना कट्टर फैसला बदल लिया?’’ शिखा ने उत्सुक लहजे में सवाल पूछा.

मैं ने कुछ देर सोचने के बाद गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘मेरे कारण सविता को शायद यह समझ में आ गया है कि टेलीविजन धारावाहिक या फिल्में देख कर…या फिर किसी दूसरे की घरगृहस्थी का हिस्सा बन कर जीने का असली आनंद नहीं लिया जा सकता है. जिंदगी के कुछ अनुभव शेयर नहीं हो सकते…शेयर नहीं करने चाहिए. मैं ठीक कह रहा हूं न, सविता जी?’’

सविता से हाथ मिलाते हुए मैं ने उन्हें एक बार फिर शुभकामनाएं दीं. वह प्रसन्नता से भरी आफिस जाने की तैयारी में जुट गईं.

मैं भी अपनेआप को अचानक बड़ा हलका, तरोताजा और खुश महसूस कर रहा था. शिखा का हाथ अपने हाथों में ले कर मैं ने सविता को दिल से धन्यवाद दिया क्योंकि उन्होंने मुझे बड़ी भूल व गलती की दलदल में फंसने से बचा लिया था.

सविता के प्रति मेरे मन में आदरसम्मान के भाव पहले से भी ज्यादा गहरे हो गए थे.

लेखक – अवनीश शर्मा

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24 जनवरी, 2025 से शुरू हुआ जनवरी माह का चौथा सप्ताह बौलीवुड में काफी धमाकेदार रहा. बौलीवुड के इतिहास में अब तक जो कुछ नहीं हुआ था, वह सब हो गया.

गणतंत्र दिवस के अवसर पर रिलीज हुई फिल्म ‘स्काई फोर्स’ के निर्माताओं ने सारी हदें पार करते हुए 1965 के भारत पाक युद्ध के समय शहीद हुए एअरफोर्स स्क्वार्डन लीडर ए बी देवैय्या के परिवार वालों का भी अपमान करने से बाज नही आए. जी हां! 24 जनवरी को प्रदर्शित हुई फिल्म ‘स्काई फोर्स’ 1965 के भारत पाक युद्ध के समय अपने साथियों को बचाते हुए शहीद हुए एअरफोर्स स्क्वार्डन लीडर ए बी देवैय्या के जीवन व वीरता पर आधारित है. मगर निर्माताओं ने फिल्म में स्कवार्डन लीडर ए बी देवैय्या के किरदार का नाम बदल कर टी ए विजय कर दिया. यह अलग बात है कि फिल्म खत्म होने पर स्क्वार्डन लीडर ए बी देवैय्या की तस्वीर लगा कर सच बयां कर दिया गया.

निर्माताओं की तरफ से पिछले 2-3 माह से प्रचारित किया जा रहा था कि वह गणतंत्र दिवस पर शहीद को सम्मान देने के लिए फिल्म ‘स्काई फोर्स’ ले कर आ रहे हैं. मगर सच यह है कि किसी के भी अंदर शहीद देवैय्या के सम्मान की कोई चिंता नजर नहीं आई, बल्कि इस फिल्म के साथ अक्षय कुमार व वीर पहाड़िया को अपनीअपनी इज्जत बचाने की चिंता सवार रही. लगातार 17 असफल फिल्में दे चुके अक्षय कुमार ने इस फिल्म को हिट साबित कराने के लिए जो कुछ किया, उसे शर्मनाक ही कहा जाएगा. तो वहीं इस फिल्म से उद्योगपति पिता व फिल्म निर्माता मां के के बेटे वीर पहारिया ने अभिनय जगत में कदम रखा है.

वीर पहाड़िया ने इस फिल्म में शहीद ए बी देवैय्या का ही किरदार निभाया है, यह एक अलग बात है कि फिल्म में शहीद ए बी देवैय्या का नाम टी के विजया रखा गया है. वीर पहाड़िया और मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी बचपन के दोस्त हैं और आज भी लोग इन की दोस्ती की मिसाल देते हैं.

हम यहां याद दिला दें कि फिल्म ‘स्काई फोर्स’ का निर्माण मुकेश अंबानी की कंपनी ‘जियो स्टूडियो’ और दिनेश विजन की कंपनी ‘मैडौक फिल्म्स’ ने मिल कर किया है.

वीर पहाड़िया के पिता संजय पहाड़िया की मंशा जबरियन अपने बेटे को ‘न्यू बोर्न सुपर स्टार’ के रूप में स्थापित करने की रही. इसी वजह से फिल्म के रिलीज से एक दिन पहले निर्माताओं की तरफ से विज्ञापन दे दिया गया कि सभी दर्शकों को सिनेमाघर की टिकट खरीदने पर 250 रूपए से 400 रुपए की छूट दी जाएगी. परिणामतः 400 रुपए तक की दर वाली टिकटें तो हर दर्शक को मुफ्त में मिली. फिर भी सिर्फ 20 प्रतिशत दर्शक ही सिनेमाघर पहुंचे. इस के बाद निर्माताओं व फिल्म के कलाकारों ने खुद टिकटें खरीद कर घर घर बंटवाई.

तो वहीं सोशल मीडिया हैंडल इंस्टाग्राम पर वीर पहाड़िया की हजारों रील्स व वीडियो वायरल की गई, जिन में वीर पहारिया को ‘न्यू बोर्न सुपर स्टार’ सहित कई तमगे दिए गए.

वीर पहाड़िया की पीआर टीम ने तो सारी सीमाएं लांघते हुए एक वीडियो जारी किया, जिस में एक वृद्ध महिला फिल्म देख कर बाहर निकलते हुए रो रही है और वीर पहाड़िया उस के आंसू पोछे रहे हैं.

इस वीडियो को शहीद ए बी देवैय्या के परिवार के लोगों ने शहीद देवैय्या और उन के परिवार के हर सदस्य को अपमानित करने वाला कृत्य बताया पर इस तरह के कई वीडियो इंस्टाग्राम पर मौजूद हैं. उधर अक्षय कुमार की पीआर टीम लिखवा रही है कि ‘स्काई फोर्स’ से हुई अक्षय कुमार की जबरदस्त वापसी और तो और अक्षय कुमार ने 27 जनवरी को मुंबई के बोरीवली इलाके की अपनी एक प्रोपर्टी सवा 4 करोड़ रुपए में बेच डाली, तब मीडिया में छपा कि टिकटें खरीद कर बांटने के लिए अक्षय कुमार ने अपनी प्रोपर्टी बेची.

इसी बीच ट्रेड एनालिस्ट और फिल्म इनफौर्मेशन पत्रिका के संपादक कोमल नाहटा ने पीवीआर सिनेमा के कुछ मैनेजरों व अन्य सिनेमाघरों के मालिकों के हवाले से बताया कि फिल्म निर्माता व कलाकारों ने मिल कर ‘स्काई फोर्स’ की 60 करोड़ रुपए की टिकटें खरीद कर मुफ्त में बांटी. इन टिकटों को पाने वाले लोग भी सिनेमाघर नहीं गए.

बहरहाल, निर्माताओं द्वारा खुद की जेब से खरीदे गए 60 करोड़ रुपए की टिकटों को मिला कर पूरे 7 दिन में ‘स्काई फोर्स’ केवल 86 करोड़ रुपए ही बौक्स औफिस पर एकत्र कर सकी. इस में से हम 60 करोड़ निकाल दें तो बचेंगे 26 करोड़ रुपए. जबकि विक्कीपीडिया के अनुसार फिल्म का बजट 160 करोड़ रुपए हैं.

अन्य सूत्र दावा कर रहे हैं कि फिल्म का बजट 380 करोड़ रुपए है, जिस में से अक्षय कुमार की फीस 90 करोड़ रुपए है.
इस पूरे सप्ताह वीर पहाड़िया, अक्षय कुमार और निर्माताओं की तरफ से तमाम पत्रकारों, फिल्म आलोचकों व यूट्यूबरों को धमकाने की भी खबरें गर्म रहीं जिन्हें धमकी मिली, उन में से कईयों ने बाकायदा इस की जानकारी वीडियो बना कर आम जनता तक पहुंचाई.

जनवरी के पहले, दूसरे व तीसरे सप्ताह रिलीज हुई फिल्में भी रो ही रही हैं. 10 जनवरी को रिलीज हुई फिल्म ‘गेम चेंजर’ 21 दिन में सिर्फ 130 करोड़ ही एकत्र किए, जबकि फिल्म का बजट 500 करोड़ है. 500 करोड़ रुपए की लागत वसूल करने के लिए ‘गेम चेंजर’ को चाहिए था कि वह बौक्स औफिस से कम से कम 1500 करोड़ रुपए एकत्र करती. पर ऐसा नहीं हुआ. यह फिल्म बुरी तरह से घाटे में रही.

10 जनवरी को ही सोनू सूद की 80 करोड़ रुपए की लागत वाली फिल्म ‘फतेह’ 21 दिन में केवल साढे 13 करोड़ रुपए ही एकत्र कर सकी.

17 जनवरी को रिलीज हुई अजय देवगन, अमन देवगन और राशा थडाणी की 50 करोड़ की लागत वाली फिल्म 15 दिन में महज 8 करोड़ रुपए ही एकत्र कर सकी. वहीं 17 जनवरी को ही रिलीज हुई कंगना रनौत की 80 करोड़ रुपए में बनी फिल्म ‘इमरजेंसी’ 15 दिन में केवल 17 करोड़ रुपए ही एकत्र कर सकी.

31 जनवरी को रिलीज हुई शाहिद कपूर की फिल्म ‘देवा’ तो पहले ही दिन टें बोल चुकी है.
इस तरह देखा जाए तो एक जनवरी से 21 जनवरी यानी कि पूरे जनवरी माह में एक भी फिल्म ऐसी नहीं है जिस ने अपनी लागत की 10 प्रतिशत रकम भी भी बौक्स औफिस पर ईमानदारी से एकत्र किया हो.

Bollywood : धर्म पर बनी 5 बौलीवुड फिल्में

Bollywood : फिल्ममेकर्स कुछ नया और बड़ा करने के लिए धार्मिक फिल्मों का सहारा लेते हैं, ये दर्शकों के बीच सब से ज्यादा पसंद भी की जाती हैं. बौलीवुड में ऐसी ही कुछ फिल्में हैं जो काफी विवादों में रहने के बावजूद भी छप्परफाड़ कमाई कर चुकी हैं.

हिंदी फिल्में असल में मनोरंजन का एक पैकेज हुआ करती हैं, जिस में गाने, डांस, मारधाड़ आदि दृश्य होते हैं. फिल्मों को समाज का आईना भी कहा जाता है, इस वजह से हिंदी फिल्में भी उस बात को ध्यान में रखते हुए ही बनाई जाती हैं, जिस में सब से अधिक धार्मिक फिल्में सब को अधिक पसंद आती है, क्योंकि धर्म हर व्यक्ति की भावनाओं से जुड़ा होता है और इस पर बनी फिल्में दर्शकों को अधिक आकर्षित करती हैं. बौलीवुड की ऐसी 5 सफल धार्मिक फिल्में हैं, जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया. ऐसी फिल्मों पर कई बार सवाल भी उठाए जाते हैं, लेकिन फिल्ममेकर इसे बनाने से नहीं चूकते.

पीके

अभिनेता आमिर खान और अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की फिल्म ‘पीके’ भक्ति और आस्था के नाम पर चल रहे गोरखधंधे को ले कर बनाई गई फिल्म है, जिस में धर्म को ले कर आडंबर और लूटपाट की घटनाओं के बीच एक दूर ग्रह से एक अंतरिक्ष यात्री आता है, जिस के भाषा का कोई आचरण नहीं और न ही उस के शरीर पर वस्त्रों का कोई आवरण है. सच्चे दिल का एक इंसान है, लेकिन उस के बातचीत और सवालों से धरतीवासी चकित हो जाते हैं और मान बैठते हैं कि वह हमेशा पिए रहता है यानि पीके घूम रहा है.

धर्म के नाम पर चल रही राजनीति, सारे भेदभाव और आस्थाओं में बटे इस समाज में भटकते हुए पीके के जरिए सारी कुरीतियों के सामने व्यक्ति खड़ा मिलता है, जो हमारे रोजमर्रा की जिंदगी के हिस्से बन चुके हैं और हम सभी उस के आदि बन चुके है. इसलिए मन में कोई सवाल नहीं उठते. मुसीबतों के साथसाथ हमारे विचार भी संकीर्ण होते जा रहे हैं. निर्देशक राजकुमार हिरानी और पटकथा लेखक अभिजीत जोशी की ये कल्पना का यह एलियन चरित्र हमारे ढोंग को बेनकाब करता है, जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया.

ओ माय गौड

बौलीवुड की एक लोकप्रिय धार्मिक फिल्म “ओएमजी: ओह माय गौड!” (2012) है, जिस का निर्देशन उमेश शुक्ला ने किया है. यह फिल्म एक भारतीय व्यंग्यपूर्ण कौमेडीड्रामा फिल्म है, जो नास्तिकता और ईश्वर में विश्वास की अवधारणा पर आधारित है. फिल्म में अभिनेता अक्षय कुमार मुख्य भूमिका में है और यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो भूकंप में अपनी दुकान नष्ट होने के बाद भगवान पर मुकदमा करता है. यह फिल्म “कांजी विरुद्ध कांजी” नामक एक गुजराती नाटक का रूपांतरण है और दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय रही. इस फिल्म को समीक्षकों ने सराहा और व्यावसायिक रूप से सफल रही.

धर्म संकट में

फिल्म ‘धर्म संकट में’ ब्रिटिश की कौमेडी फिल्म द इन्फिडेल से प्रेरित कहानी है. इस में धर्म और धार्मिक पहचान के संकट का चित्रण हास्यास्पद तरीके से किया गया है. ऐसी फिल्मों में अधिकतर अभिनेता परेश रावल ही होते हैं, क्योंकि वे ऐसी भूमिका को अच्छी तरीके से निभा पाते हैं. उन्होंने धर्मपाल के चरित्र को बखूबी निभाया है. निर्देशक फुवाद खान ने भारतीय संदर्भ में यहूदी और मुसलमान चरित्रों की मूल कहानी को हिंदी और मुसलमान में बदल दिया और मुसलमानों के बारें में प्रचालित धारणाओं और मिथकों पर संवेदनशील कटाक्ष किया है. फिल्मों के इतिहास में ऐसी कई फिल्में बनी हैं, जिस में बताया गया है कि इंसान पैदाइशी अच्छा या बुरा नहीं होता, उस के हालात और परवरिश उस के वर्तमान के कारण होते हैं.

ब्रह्मास्त्र

ब्रह्मास्त्र एक बौलीवुड ड्रामा फिल्म है, जिस का निर्देशन अयान मुखर्जी ने किया है. फिल्म में रणबीर कपूर, अलिया भट्ट, अमिताभ बच्चन, मौनी रौय और एक्टर नागार्जुन, मुख्य भूमिका में हैं. कहानी शुरू होती है सदियों पहले जहां कुछ महान ऋषिमुनि ज्ञानी हिमालय की शरण में घोर तपस्या कर रहे होते हैं. इस बेहद कड़ी तपस्या से उन्हें मिलता है, एक अनोखा वरदान, जो एक ब्रह्म शक्ति है. इस ब्रह्म शक्ति से अनेक प्रभावशाली अविश्वसनीय अस्त्रों का जन्म होता है.

यह ऐसे अस्त्र हैं जो प्रकृति की विभिन्न शक्तियों से बने और भरे हुए हैं, जैसे वानरास्त्र, नंदी अस्त्र, प्रभा अस्त्र, अग्नि अस्त्र और सब से आखिर में जन्म होता है, उस सब से महान और अत्यंत सर्वशक्तिशाली अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, जिस से और सभी अस्त्रों की शक्ति जुड़ी हुई हैं. इस अस्त्र को, ऋषिमुनियों ने ‘ब्रह्मास्त्र’ नाम दिया. ये आयन मुखर्जी की कल्पना मात्र है, जिसे दर्शकों ने पसंद किया.

कल्कि 2898 एडी

कल्कि 2898 एडी एक डिस्टोपियन (कोई काल्पनिक दुनिया या समाज जहां लोग भयानक जीवन जीते हैं) साइंस फिक्शन, एक्शन फिल्म है, जो हिंदू भगवान विष्णु के आधुनिक अवतार के इर्दगिर्द घूमती है. यह फिल्म महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के छह हजार साल बाद की कहानी है. इस फिल्म में भगवान विष्णु के आधुनिक अवतार की कहानी है, जो दुनिया को बुरी ताकतों से बचाने के लिए धरती पर अवतरित हुए थे. फिल्म में अभिनेता प्रभास मुख्य भूमिका में हैं और अमिताभ बच्चन, कमल हासन, दीपिका पादुकोण, दिशा पाटनी और ब्रह्मानंदम मुख्य भूमिकाओं में शामिल हैं. सिनेमाघरों में राज करने के बाद फिल्म ओटीटी पर भी दर्शकों को पसंद आई है.

कहानी साल 2898 की काशी की है और दुनिया में बस यही एक शहर बचा है. काशी की रचना ही नगरों के विकास के क्रम में सबसे पहले हुई. काशी का कोतवाल, भैरव (प्रभास) को माना जाता है. दक्षिण में नामों के उच्चारण के समय अंतिम शब्द को दीर्घ स्वरूप में बोलने के चलते यहां वह भैरवा है. ये उन दिनों की काशी है, जब गंगा में पानी नहीं है. हवा में औक्सीजन नहीं है और बरसों से किसी ने पानी बरसते देखा नहीं है.

भैरव और बुज्जी की ट्यूनिंग समझाती है कि कहानी में कुल तीन तरह की दुनिया है. एक काम्प्लैक्स जिस का संचालन सुप्रीम यास्किन (कमल हासन) के पास है. वह गर्भवती स्त्रियों के भ्रूण से मज्जा निकाल कर खुद को जीवित रखे हुए है. काशी में भैरव की ऐयाशी चल रही है. इस के अलावा मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स की ब्लैक पैंथर वाली कहानी की वकांडा जैसी एक दुनिया भी यहां है, जो तकनीकी रूप से विकसित और बाकी दुनिया की नजरों से छिपी हुई है. जहां ‘अवतार’ की मां का दुश्मन ही अब मां का रक्षक बन जाता है.

ऐसी फिक्शन वाली धार्मिक फिल्में आज की नई जेनरेशन को प्रभावित करने की खास वजह इन की कहानियों से उन का सरोकार न होना है. ऐसे में फिल्ममेकर ऐसी फिल्मों को वीएफएक्स के जरिए ऐसे दर्शकों को हौल तक लाने में समर्थ होते हैं, जिस का फायदा उन्हें मिलता है और फिल्म बौक्स औफिस पर सफल होती हैं.

Best Short Story : एक रिश्ता एहसास का

Best Short Story : ‘सुधा बारात आने वाली है देखो निधि तैयार हुई की नहीं ……’,हर्ष ने सुधा को आवाज़ लगाते हुए कहा.
सुधा का दिल ये सोच कर बहुत ही ज़ोरों से धडकने लगा की अब मेरी निधि मुझसे दूर हो जाएगी.
सुधा निधि को लेने उसके कमरे की तरफ बढ़ी .निधि को दुल्हन के रूप में देख कर वो एक पल को वहीँ दरवाज़े की ओट में खड़ी हो गयी.

सुधा अपने अतीत की यादों में खो गयी . उसकी यादों का कारवां बरसों पहले जा पहुंचा था. नंदिनी और सुधा बहुत की पक्की दोस्त थी और हो भी क्यूँ न बचपन की दोस्ती जो थी.

जिस शाम सुधा की इंगेजमेंट थी उसी शाम जब नंदिनी सुधा के घर अपने पति हर्ष के साथ आ रही थी तभी उनकी गाडी का बहुत ही भयानक एक्सीडेंट हो गया जिसमे नंदिनी चल बसी.और पीछे छोड़ गयी अपनी हंसती खेलती दुनिया.नंदिनी के दो बच्चे थे विशाल और निधि.दोनों बहुत ही छोटे थे.नंदिनी की मौत के बाद परिवार वालों ने हर्ष से दूसरी शादी का दवाब डाला.
जब सुधा को इस बात का पता चला तो उसने बिना आनाकानी किए हर्ष से शादी के लिए हामी भर दी थी, क्योंकि नंदिनी की असमय मौत के बाद उसे सबसे अधिक चिंता उनके दोनों बच्चों- निधि और विशाल के भविष्य की थी.
नई-नई दुल्हन बनकर आई थी सुधा . अचानक ही उसकी ज़िंदगी में सब कुछ बदल गया था. जिस शख़्स को अब तक अपनी दोस्त के के पति के रूप में देखती आई थी, वो अब उसी की पत्नी बन चुकी थी. चूंकि बच्चे बहुत ही छोटे थे और पहले से ही सुधा से घुले-मिले थे, तो उन्होंने भी उसे अपनी मां के रूप में आसानी से स्वीकार कर पाएंगे.

दूसरी तरफ़ हर्ष का भी वो बहुत सम्मान करती थी. समय बीतता रहा, बच्चों के साथ सुधा ख़ुद भी बच्ची ही बन जाती और खेल-खेल में उन्हें कई बातें सिखाने में कामयाब हो जाती. लेकिन इतना कुछ करने पर भी बात-बात पर उसे ‘सौतेली मां’ का तमगा पहना दिया जाता. अगर बच्चे को चोट लग जाए, तो पड़ोसी कहते, “बेचारे बिन मां के बच्चे हैं, सौतेली मां कहां इतना ख़्याल रखती होगी…” इस तरह के ताने सुनने की आदी हो चुकी थी सुधा, लेकिन सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती, जब अपना ही कोई इस दर्द को और बढ़ा देता. चाहे बच्चों का जन्मदिन हो या कोई अचीवमेंट, हर बार घर के क़रीबी रिश्तेदार यह कहने से पीछे नहीं हटते थे कि आज इनकी अपनी मां ज़िंदा होती, तो कितनी ख़ुश होती.
अचानक सुधा ने अपने अतीत से बहार आकर महसूस किया की निधि ने आकर पीछे से उसकी आँखों को अपने हाथ से ढक लिया .
सुधा ने बिना उसके कहे पहचान लिया की वो निधि है.उसने कहा तैयार हो गयी मेरी राजकुमारी!

“माँ , तुम्हें कैसे पता चला कि ये मैं हूं?” निधि ने हैरान होकर पूछा.
“बेटा , तुम्हारी ख़ुशबू मैं अच्छी तरह से पहचानती हूं. तुम्हारा एहसास, तुम्हारा स्पर्श सब कुछ मुझसे बेहतर कौन समझ सकता है? आख़िर मां हूँ मै तुम्हारी .” सुधा ने निधि का हाथ थामकर कहा.
“क्या हुआ माँ तुम कुछ परेशान लग रही हो ,कोई बात है क्या?किसी ने कुछ कहा.” निधि ने सुधा के गले लगकर पूछा.
सुधा ने आँखों में आंसू भरकर कहा,”निधि मै सही हूँ न ?क्या मेरी परवरिश में तुम्हे कोई कमी तो नहीं लगी.अगर मेरे प्यार में कोई कमी रह गयी हो तो मुझे माफ़ कर देना…”
मां… तुमसे ही मैं ममता की गहराई जान पाई हूं. तुम ऐसा मत सोचो ” निधि ने माँ को गले लगाते हुए कहा.

सुधा ने निधि के सर पर हाँथ फेरते हुए कहा,”चलो अब नीचे चले ,बारात आ गयी है और उनको इंतज़ार करवाना ठीक नहीं.” वो हँसते हुए बोली
पर निधि के मन तो तूफ़ान उमड़ रहा था.सुधा के आंसुओं ने उसे अन्दर तक झकझोर कर रख दिया था.वो जान चुकी थी की उसकी माँ के मन में क्या उधेड़बुन चल रही है.
पर उसने अपने आप को शांत किया और सुधा के साथ नीचे आ गयी.
शादी की सारी रश्में पूरी हो चुकी थी .अब विदाई का समय आ चुका था.
निधि अपने परिवार वालों के गले लग कर बहुत रोई .फिर जब वो अपनी माँ के गले लगी तभी पीछे से किसी ने कहा,”आज अगर निधि की सगी माँ जिंदा होती तो वो बहुत खुश होती.”
बस फिर क्या था.निधि तो जैसे इसी मौके के इंतज़ार में थी.
उसने कहा
”ये क्या सगी माँ –सगी माँ लगा रखा है.हमने जबसे होश संभाला, इन्ही को ही देखा, इन्ही को ही पाया. हर क़दम पर साये की तरह इन्होने ने ही ज़िंदगी की धूप से हमें बचाया. अपनी नींदें कुर्बान करके हमें रातभर थपकी देकर सुलाया. फिर भी हर ख़ुशी के मौ़के पर यहां आंसू बहाए जाते हैं कि आज हमारी सगी मां होती, तो ऐसा होता, वैसा होता…
आज इतने बरसों बाद जब मैं पीछे पलटकर देखती हूं, तो एक ही लफ़्ज़ बार-बार मेरे कानों में गूंजता है… सौतेली मां! ताउम्र इस एक शब्द से जंग लड़ती आ रहीं है मेरी माँ … अब तो जैसे ये इनकी पहचान ही बन गया हो. हर बार अग्निपरीक्षा, हर बात पर अपनी ममता साबित करना… जैसे कोई अपराधी हो ये . हर बार तरसती निगाह से सबकी ओर देखती हैं की कहीं से कोई प्रशंसाभरे शब्द कह दे . लेकिन ऐसा होता ही नहीं .
पूरे समाज ने इन्हें कटघरे में खड़ा करके रख दिया है…..पर क्यूँ दें ये सफ़ाई? क्यों करे ख़ुद को साबित…? मां स़िर्फ मां होती है, उसकी ममता सगी या सौतेली नहीं होती… लेकिन कौन समझता है इन भावनाओं को. दो कौड़ी की भी क़ीमत नहीं है इनकी भावनाओं की…

क्या आप सभी जानते है की वो तो अक्सर ख़ुद से इस तरह के सवाल करती रहती है, जिनका जवाब किसी के पास नहीं होता.
इसके बाद निधि रोते हुए सुधा के गले लग गयी और बोली,”माँ मुझे माफ़ कर दो .माँ तुमने जो किया, वो मेरे लिए गर्व की बात है .तुम तो मेरी प्रेरणा हो माँ .शायद मैंने तुम्हारा साथ देने में बहुत देर कर दी .i love you माँ .”
आज सुधा को अपने आप से कोई शिकायत नहीं थी.उसके चेहरे पर एक अजीब सा संतोष था जिसे बयां नहीं किया जा सकता……

Emotional Story : खामोशियां – क्यों पति को इग्नोर कर रही थी रोमा?

Emotional Story : देखने में तो घर में सब सामान्य लग रहा था पर ऐसा था नहीं. रोमा के दिल में एक तूफ़ान सा उठा था. वह कैसे बाहर जाए, सारा दिन तो घर में नहीं बैठ सकती थी, वह भी वन बैडरूम के इस फ्लैट में.

सुजय से बात करने के लिए रोमा को कोई कोना नहीं मिल रहा था. पति रवि कोरोना के टाइम में पूरा दिन घर में रहता, सारा दिन वर्क फ्रौम होम करता. 2 साल का बेटा सोनू खूब खुश था कि मम्मीपापा सारा दिन सामने हैं. पर मां के दिल में उठते तूफ़ान को वह 2 साल का बच्चा कैसे जान पाता.

जैसे ही औफिस के काम से कुछ छुट्टी मिलती, रवि घर के कामों में रोमा का खूब हाथ बंटाता. पर फिर भी रोमा के चेहरे पर चिढ़ और गुस्से के भाव कम होने का नाम ही नहीं ले रहे थे तो उस ने कहा, “रोमा, घर के काम जो भी मुश्किल लग रहे हैं, मुझे बता दिया करो, तुम्हारे चेहरे से तो हंसी जैसे गायब हो गई है.”

रोमा फट पड़ी, “नहीं रहा जाता मुझ से पूरा दिन घर में बंद हो कर.”

“पर डिअर, तुम तो पहले भी घर पर ही रहती थीं न, मैं ही तो औफिस जाता था और मैं तो चुपचाप हूं घर पर, कोई शिकायत भी नहीं करता. तुम्हें और सोनू को देख कर ही खुश हो जाता हूं.”

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रोमा मन ही मन फुंफकारती रह गई. कैसे कहे किसी से कि सुजय से प्यार हो गया है उसे और वह रोज उस से मिलती थी. शाम को जब वह सोनू को ले कर पार्क में जाती, तो वह भी वहीं दौड़ रहा होता. आंखों ही आंखों में उस के सुगठित शरीर को देख कर तारीफ़ कर उठती तो सुजय भी समझ जाता और उसे देख एक स्माइल करता पास से निकल जाता. धीरेधीरे हायहैलो से शुरू हुई बातचीत अब एक अच्छाख़ासा अफेयर बन चुकी थी. सुजय अविवाहित था. वह पास की ही एक बिल्डिंग में अपने पेरैंट्स और एक छोटी बहन के साथ रहता था.

रवि की अनुपस्थिति में रोमा ने एकदो बार सुजय को घर भी बुलाया था. ज्यादातर बातें मिलने पर या फोन पर ही होतीं. रोज मिलना एक नियम बन गया था. अच्छी तरह सजसंवर कर रोज सोनू को ले कर पार्क में जाना और सुजय से बातें करना जैसे रोमा को एक नए उत्साह से भर जाता.

अब लौकडाउन में सबकुछ बंद था. पार्क को बंद कर दिया गया था. सामान लेने के बहाने भी वह बाहर नहीं जा सकती थी. शौप्स बंद थीं. सब सामान औनलाइन आ रहा था. सुजय भी बाहर नहीं निकल रहा था.

सुजय के कभीकभी एकदो मैसेज आते जिन्हें रोमा फौरन डिलीट इसलिए करती कि कहीं रवि देख न ले. रवि रोमा को खुश रखने की बहुत कोशिश कर रहा था. पर रोमा की चिड़चिड़ाहट कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी. रात के अंतरंग पलों में जब रोमा का मन होता तो

रवि का साथ देती, जब सुजय की तरफ मन खिंच रहा होता तो रवि का हाथ झटक देती.

रोमा जानती थी कि रवि एक सादा इंसान है जिस की ख़ुशी पत्नी और बच्चे को खुश देखने में ही है. न रवि में कोई ऐब था, न कोई और बुराई. कमाल की सादगी थी उस में. पर रोमा अलग स्वभाव की लड़की थी जिस ने पेरैंट्स के दबाव में आ कर रवि से शादी कर तो ली थी पर शादी के बाद सुजय से संबंध रखने में जरा भी नहीं हिचकिचाई थी. वह हमेशा रवि पर हावी

रहने की कोशिश करती.

एक दिन रवि ने पूछा, “रोमा, तुम मुझ से शादी कर के खुश तो हो न? आजकल जब से मैं घर

पर हूं, तुम बहुत गुस्से में दिखती हो.”

“शादी तो हो ही गई, अब खुश रहूं या दुखी, क्या फर्क पड़ता है, रोमा ने अनमनी हो कर जवाब दिया तो रवि ने उसे बांहों में भर कर कहा, “मुझे बताओ तो, आजकल क्यों इतना मूड खराब रहता है तुम्हारा?”

“मुझे घर में घुटन हो रही है, मुझे बाहर जाना है.”

“अच्छा,बताओ, कहां जाना है, मैं घुमा कर लाता हूं. पर, सब तो बंद है.”

“तुम्हारे साथ नहीं, अकेले जाने का मन है,” रोमा ने सपाट स्वर में कहा तो रवि उस का मुंह देखता रह गया. रोमा ने उस का बढ़ा हुआ हाथ झटका और बेरुखी से वहां से चली गई.

रवि की कुछ जरूरी मीटिंग थी, वह लैपटौप पर बैठ तो गया पर उस का दिल आज बहुत उदास था. वह सोचने लगा, क्या मिल रहा है उसे अपने पेरैंट्स की पसंद से शादी कर के. रोमा उसे पसंद नहीं करती, यह एहसास उसे होने लगा था. उस के पेरैंट्स रोमा से कुंडली मिलने पर बहुत

खुश हुए थे कि खूब अच्छी जोड़ी रहेगी. पर आज वह अपने मन का दुख किसी से भी शेयर नहीं कर सकता था.

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रोमा से रुका नहीं गया तो रवि जब एक दिन नहाने गया, उस ने सुजय को फोन मिला दिया. सुजय मीटिंग में था. वह भी घर से काम कर रहा था. वह फोन नहीं उठा पाया. रोमा का दिल बुझ गया. सुजय ने जब वापस उसे फोन किया तो रवि आसपास था. वह फोन नहीं उठा पाई और उसे रवि पर इतनी जोर से गुस्सा आया कि उस ने रवि को नाश्ते की प्लेट इतनी जोर से पटक कर दी कि रवि को गुस्सा आ गया, बोला, “दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा? यह खाना देने की तमीज है तुम्हारी?”

रोमा पर सुजय का भूत सवार था, आवारागर्दियां याद आ रही थीं, चिल्ला कर बोली, “खाना है, तो खाओ वरना मेरी बला से.”

रोमा के इतनी जोर से चिल्लाने पर सोनू डर कर जोर से रो उठा. रवि ने उसे सीने से लगा लिया और चुप करवाने लगा. अभी जो भी हुआ था, रवि को यकीन ही नहीं आ रहा था कि कभी रोमा ऐसे भी बात कर सकती है. वह हैरान था, खामोश था. यह खामोशी अब उसे अंदरअंदर जलाने लगी थी. क्या हुआ है रोमा को, कुछ समझ नहीं आ रहा था.

रोमा का फोन कभी रवि ने चैक नहीं किया था. उस ने रोमा के पर्सनल स्पेस में कभी हस्तक्षेप नहीं किया था. उस ने हमेशा उसे पूरी आज़ादी दी थी. गलती कहां हो रही है जो घर का माहौल इतना खराब होता जा रहा था, यह सोचसोच कर रवि का दिमाग परेशान हो चुका था.

एक दिन लंच कर के रोमा सोनू के साथ सोने के लिए लेटी. रवि लिविंगरूम में काम कर रहा था. रोमा ने सुजय को मैसेज किए. उधर से भी फौरन रोमांस शुरू हो गया. सुजय की बेचैनी देख रोमा को अच्छा लगा पर मिलने की मजबूरी ने रोमा का फिर मूड खराब कर दिया और उसे रवि पर फिर गुस्सा आने लगा कि पता नहीं कितने दिनों तक रवि घर में बैठा रहेगा, कब जाएगा औफिस. थोड़ी देर में फोन रख वह बिना बात के किचन में जा कर खटपट करने लगी. रवि ने इशारा किया कि वह जरूरी मीटिंग में है, शोर न हो. पर रोमा जानबूझ कर और शोर करने लगी. यहां तक कि लिविंगरूम में रखा टी वी भी चला कर बैठ गई. मीटिंग से

उठते ही रवि ने रोमा को डांटा, “यह क्या बदतमीजी है, टीवी अभी देखना जरूरी था?”

“तो कब देखूं? सारा दिन तो घर में डटे हो, कहीं जाते भी नहीं जो थोड़ी देर चैन से जी लूं. सारी प्राइवेसी ख़त्म हो गई मेरी. अपनी मरजी से जी भी नहीं सकती,” यह कहतेकहते रोमा ने रिमोट जोर से सोफे पर पटका तो रवि ने यह सोच कर कि सोनू फिर न रोने लगे, अपनी आवाज धीरे की और समझाया, “क्यों इतनी परेशान हो रही हो, अच्छा, तुम देख लो टीवी, मैं अंदर ही बैठ कर काम कर लूंगा.” यह कह कर रवि अपना लैपटौप उठा कर अंदर जाने लगा तो रोमा ने अंदर जाते हुए कहा, “नहीं, अब मैं आराम करने जा रही हूं.”

हैरानपरेशान रवि सिर पकड़ कर बैठ गया. क्या हो गया है रोमा को, कैसे चलेगा ऐसे. फिर सोचा, शायद घर में रहरह कर सभी को ऐसी ही परेशानी है, वह खुद एडजस्ट कर लेता है हर चीज तो जरूरी तो नहीं कि कोई और परेशान न हो. छोटा बच्चा है, उस के भी काम आदि करने में वह थक जाती होगी. मेड आ नहीं रही है, लखनऊ में केसेस भी काफी हो गए हैं.

कहां इस सोसाइटी में रोमा कितनी ख़ुशी से घूमतीफिरती थी, कहां उस का सबकुछ बंद हो गया. किस पर गुस्सा निकलेगा, मुझ पर ही न, सब रिश्तेदार भी जब फोन पर बातें करते हैं, यही कोरोना की बातें तो रह गई हैं. इंसान खुश भी हो तो किस बात पर. कहीं तो चिढ़ निकलेगी ही न रोमा की. नहीं, ये हालात की ही बात है.

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सबकुछ रोमा के पक्ष में ही सोच कर रवि फिर रोमा के पास जा कर बैठ गया और उस का सिर सहलाने लगा. सोनू सोया हुआ था. सुजय ने अभी चैट शुरू ही की थी कि रवि के आने से उस में विघ्न पड़ गया. रोमा आगबबूला हो गई, गुर्राई, “तुम चैन से मत जीने देना मुझे.”

रवि का चेहरा अपमान से लाल हो गया. क्याक्या सोच कर वह रोमा के पास आया था. चुपचाप उठ कर सोफे पर आ कर लेट गया. आंखों की कोरों से नमी सी बह निकली.

सोसाइटी की हर बिल्डिंग में पार्किंग के एरिया में थोड़ी खुली जगह थी. वहां रात को इक्कादुक्का लोग टहलने के लिए आ जाते. सुजय ने प्रोग्राम बनाया कि रात 9 बजे डिनर के बाद वहां टहलते हुए, दूर से ही सही, एकदूसरे को देखा जा सकता है. और कोई न रहा, तो बातें भी हो सकती हैं. रोमा को यही सब तो चाहिए था. वह चहक उठी. उस दिन रवि से भी कुछ बदतमीजी नहीं की.

रवि ने भी अब खामोशी ओढ़ ली थी. हर समय रोमा का मूड देख कर ही बात करना मुश्किल था. अब वह सिर्फ काम की ही बात करता, सोनू से खेलता और घर के कई काम चुपचाप करता रहता. रोमा डिनर के बाद अकेली टहलने जाने लगी. यह एक नियम सा बन गया. कहां रवि और सोनू को घर से निकलते हुए लंबा टाइम हो जाता, वहां रोमा रोज अब चहकती सी जाने लगी.

रवि ने यह सोच कर तसल्ली कर ली कि चलो, इतने से ही रोमा खुश है, तो अच्छा है. इस का मतलब, यह बस घर में ही परेशान हो रही थी. इस का बाहर जाना बंद हो गया था, इसलिए यह गुस्से में रहती थी. ऐसा तो कोरोना के टाइम में बहुत से लोगों के साथ हुआ

है. चलो, कोई बात नहीं.

सुजय के पेरैंट्स कुछ बीमार चल रहे थे, इसलिए उस ने रोमा को मैसेज किया, “रोमा, कुछ दिन अब फिर नहीं मिलेंगे, मम्मीपापा का ध्यान रखना है. नीचे काफी लोग आने लगे हैं. मैं कहीं कोई इंफैक्शन न ले आऊं, मम्मीपापा को कोई प्रौब्लम न हो जाए, इसलिए घर पर ही रहूंगा अभी. फिर कभी मिलेंगे.”

रोमा को फिर एक झटका सा लगा. उस का मूड खराब हो गया. उसे तो यही लगने लगा था कि लाइफ में जो भी उत्साह है, सब सुजय से है. रवि तो घर में रहरह कर उस की प्राइवेसी को ही भंग करता है. रवि के कारण ही वह फोन पर सुजय से बात भी नहीं कर पाती है. रवि पर वह फिर खूब बरसने लगी. रवि परेशान था. वह कितना चुप रहे, क्या करे, लड़नाझगड़ना उस की फितरत ही नहीं थी. बेहद शांत स्वभाव का इंसान ऐसी स्थिति में खामोश रहना ही हल

समझने लगता है. रवि भी वही कर रहा था.

कुछ दिन ऐसे ही खराब, अनमने से बीते. फिर एक दिन सुजय का मैसेज आया, “रोमा, बहुत बढ़िया मौका है. यहां से थोड़ी दूर की सोसाइटी में हमारा जो फ्लैट किराए पर था, वह किराएदार अपने घर चला गया है. अब वह फ्लैट खाली है. फुली फर्निश्ड है. वहां मिल सकते हैं. कितने दिन हो गए, तुम्हें जीभर देखा भी नहीं, आओगी?”

रोमा ने टाइप किया, “आना है तो बहुत मुश्किल, पर कोशिश करूंगी.”

“अरे, यह मौका जाने दोगी?”

“रवि से क्या कहूंगी? वह वर्क फ्रौम होम करता है, सोनू को भी देखना होता है.”

“यार, ये सब अब तुम देखो, आओ किसी तरह.”

रोमा ने सारा दिमाग लगा दिया कि कैसे निकले घर से, कोई बहाना काम करता नहीं दिख रहा था. बात नहीं बनी तो सारे कोप का भाजन रवि ही बनता चला गया. उस दिन रवि लंच लगाने में हैल्प करने उठा तो रोमा ने कहा, “रहने दो, मैं कर लूंगी.”

 

रवि कुछ बोला नहीं, चुपचाप प्लेट्स रखता रहा. आजकल वह खामोश होता जा रहा था. कुकर गरम था. जैसे ही वह राइस का कुकर उठा कर लाने लगा, रोमा के दिल में सुजय से न मिल पाने की कसक उस पर इतनी हावी थी कि उस ने चिढ़ कर उसे धक्का सा दे दिया. गरम कुकर रवि के हाथ से छूट कर उस के पैर पर गिरा. वह दर्द से तड़प उठा. रोमा ने एक जलती निगाह उस पर डाली, फिर कुकर उठा टेबल पर जा कर रखा और सोनू को पास रखी चेयर पर बिठाया व अपनी प्लेट में खाना निकाल कर खुद भी खाने लगी और उसे भी खिलाने लगी.

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रवि अब तक अपने पैर पर लगाने के लिए फ्रिज से आइस पैक निकाल कर सोफे पर आ कर बैठ गया. रोमा पर नजर डाली, वह आराम से रवि को अनदेखा कर खाना खाने में बिजी थी. जलन से रवि का बुरा हाल था. बहने को तैयार आंसुओं को बड़ी मुश्किल से रोक रखा था रवि ने. कौन कहता है पुरुष को रोना नहीं आता, आता है जबजब रोमा जैसी पत्नियां इस पर उतर आती हैं कि उन्हें अपनी मौजमस्ती के आगे घर, पति बंधन लगने लगें तब यही होता है. पुरुष के सीने में ऐसी खामोशियों का सागर तूफ़ान मचा रहा होता है जिन की आवाज भी बाहर नहीं आ पाती. इन खामोशियों का शोर बहुत जानलेवा होता है.

बहुत ही बेबस रवि को कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह आराम से खाना खाती रोमा को देखता रह गया. उसे किस बात की सजा मिल रही है, यह वह समझ ही नहीं पा रहा था.

Online Hindi Story : रक्ष – भार्गव और राघव में क्या अंतर था

Online Hindi Story : बाबूजी का असली नाम नरेंद्र कुमार श्रीवास्तव था. वे इलाहाबाद बैंक के बैंक प्रबंधक पद से रिटायर हुए थे. रिटायर होने से पहले वे गीता प्रैस रोड, गांधी नगर, गोरखपुर में बैंक के मुख्यालय में थे. उन्हें ‘बाबूजी’ का उपनाम तब मिला जब वे अल्फांसो रोड पर बैंक में शुरूशुरू में टेलर (क्लर्क) थे. हालांकि उन के पास बीकौम प्रथम श्रेणी की डिग्री थी लेकिन उन्हें एक उपयुक्त नौकरी नहीं मिली और उन्हें टेलर की नौकरी के लिए समझौता करना पड़ा. वे अपने ग्राहकों, सहकर्मियों और अपने वरिष्ठों व मालिकों के साथ सम्मान व मुसकराहट के साथ व्यवहार करते थे. नौकरी से वे खुश थे.

ग्राहक उन के अच्छे स्वभाव व हास्य के कारण उन्हें बाबूजी कहने लगे. बाबूजी को उन का प्यार पसंद आया और उन्हें इस उपनाम से कोई आपत्ति न थी और इस का आनंद लेना शुरू कर दिया क्योंकि इस में प्यार, स्नेह और आशीर्वाद सभी एकसाथ विलीन थे. तो, नरेंद्र ‘बाबूजी’ बन गए. नरेंद्र चूंकि बहुत महत्त्वाकांक्षी और उज्ज्वल व्यक्ति थे, अपने कैरियर में चमकना चाहते थे, इसलिए जब वे काम कर रहे थे, रात्रि कक्षाएं लीं और प्रथम श्रेणी के साथ एमकौम पास किया.

जल्द ही उन का परिवार बढ़ गया, और उन्हें जुड़वां बेटों का आशीर्वाद मिला, जिन के नाम भार्गव और राघव थे. भार्गव राघव से लगभग 2 मिनट बड़ा था और दोनों के बीच जो बंधन था, वह असाधारण था- राघव हमेशा अपने भाई का सम्मान करता था और अपने भाई को बड़े भाई के रूप में संदर्भित करता था. आखिरकार, वे बड़े हुए. अच्छी तरह से शिक्षित हुए. शादी हुई और उन के परिवार में दोदो बच्चे थे, एकएक लड़का और एकएक लड़की. परंतु, घर के दूसरे परिवारों से उन्हें दूर जाना पड़ा.

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भार्गव मुंबई के चेंबूर में स्थित परमाणु ऊर्जा आयोग में अकाउंटैंट था और राघव केरल में एक रिजोर्ट प्रबंधक. राघव ने होटल मैनजमैंट की डिग्री हासिल की थी. जब बाबूजी साठ वर्ष के हुए, तो उन्हें सरकारी नियमों और विनियमों के अनुसार सेवानिवृत्त होना पड़ा. उन्होंने अपने पैतृक घर में सेवानिवृत्त होने का फैसला किया क्योंकि उन की जन्मजात इच्छा उस शहर में रहने की थी जहां उन का जन्म, पालनपोषण हुआ और जहां उन के मातापिता जीवनभर रहे. उन का निवास गोरखपुर के एक मध्यर्गीय क्षेत्र में था और यह बाबूजी की शैली में फिट बैठता था. उन्होंने 2 नौकरों, एक रसोइया और एक ड्राइवर व पुराने पड़ोसियों और परिचित दोस्तों की प्रेमभरी धूमधाम में बड़ी शांति और आराम पाया. ऐसा लगा कि वे संसार के साथ हैं और संन्यास में भी हैं.

पूरे जीवनभर बाबूजी परिवार, दोस्तों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों व जानवरों सहित सभी के प्रति बहुत दयालु थे. एक दिन बाबूजी पोर्च में अपनी सीट पर बैठे थे और एक छोटा सा कुत्ता उन के पास आया. बाबूजी ने उसे प्यार से थपथपाया और उन दोनों में तत्काल एक बंधन बन गया. बाबूजी ने उसे रोटी खिलाई और कुत्ते ने उसे बिजली की गति से खत्म कर दिया क्योंकि वह भूखा लग रहा था. भले ही वह आवारा कुत्ता था, वह वहीं रहता था. वह दिन में ज्यादातर समय बाबूजी के बरामदे में ही रहता था, चाहे बाबूजी अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहें या जब वे बरामदे में भी रहें. वह सफेद धब्बे और छोटे बालों वाला एक सुंदर, भूरा कुत्ता था जो ऐसा लगता था जैसे वह पेशेवर मुंडा था.

कुत्ता हर दिन दिखाई देता था. जब बाबूजी पोर्च पर होते थे तो दोनों को एकदूसरे का साथ भाता था. कुत्ते ने कभी बाबूजी को परेशान नहीं किया, बल्कि उन के लिए सुरक्षात्मक था. वह हर उस व्यक्ति पर भूंकता था जो बाबूजी के पास जाता था जब तक कि बाबूजी यह न इशारा देते कि आगंतुक मित्र है, शत्रु नहीं. वह कुत्ता रोज ही सुबह पोर्च पर दिखाई देता और बाबूजी के साथ बैठता. फिर अंधेरा होने पर चुपचाप घर के साथ वाली गली में, यातायात से दूर, सो जाता.

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नौकरों और पड़ोसियों को उस के होने की आदत हो गई और वे लोग उसे बाबूजी का कुत्ता समझने लगे. चूंकि बाबूजी और नौकर उसे सुबह व शाम को खाना खिलाते थे, वह खुश लग रहा था और आखिरकार एक सुंदर कुत्ते के रूप में बड़ा हुआ, जिस ने कभी किसी को परेशान न किया और बाबूजी को अच्छी संगति प्रदान की. वह बाबूजी के बाहर जाने पर उन के साथ जाता. वह बिना पट्टे के ही उन के साथ चलता था और अपने आसपास के सभी लोगों के साथ दोस्ताना व्यवहार करता था. जो लोग उसे पहचानते थे, वे हमेशा उस कुत्ते की प्रशंसा करते थे.

बाबूजी ने अपने कुत्ते का नाम ‘रक्ष’ (रक्षक से बना) रखा, क्योंकि एक बार उस ने बाबूजी के जीवन को गुंडों के एक झुंड से बचाया था, जो उन के पैसे चोरी करने की कोशिश कर रहे थे. बाबूजी एक एटीएम बूथ से बहुत रुपयों की राशि के साथ बाहर निकल रहे थे कि अचानक 3 गुंडों ने उन्हें पकड़ लिया और उन से पैसे छीनने लगे. एटीएम बूथ में घुसने से पहले ही वे बाबूजी की घात में थे और धीरेधीरे उन का पीछा कर रहे थे. जैसे ही वे बाहर आए, उन्होंने उन पर हमला कर दिया और उन्हें पीटा व उन के पैसे ले कर भागे.

बाबूजी की नाक, कुहनी, घुटने लहूलुहान हो गए. बूथ में मौजूद गार्ड खर्राटें ले रहा था, शोर सुन कर उस की नींद खुल गई. वैसे भी, बूथ को जल्दी से बंद करने व ग्राहकों की सुरक्षा करने के लिए उसे प्रशिक्षित ही नहीं किया गया था. बाबूजी दयनीय पीड़ा में थे, उन को हौस्पिटल ले ज़ाया गया. उन्हें 19 टांके लगवाने पड़े. वे पूरे एक सप्ताह तक निष्क्रिय रहे.

उधर, रक्ष ने तीनों बदमाशों का पीछा कर उन्हें धर दबोचा और वे पैसे छोड़ कर अपनी जान बचाने की कोशिश करते रहे. कुत्ते ने उन पर तब तक हमला किया जब तक कि पुलिस ने तीनों गुंडों को कुत्ते से नहीं बचाया. बाद में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. कुत्ते के काटने के कारण उन्हें 14-14 इंजैक्शनों के साथ इलाज करवाना पड़ा.

बाबूजी के पड़ोसियों सहित अन्य लोगों को बचाने के लिए रक्ष के बारे में और भी कहानियां हैं. इस घटना के बाद कुत्ता ‘रक्ष’ बन गया और बाबूजी जब उसे रक्ष कह कर संबोधित करते तो वह उन के पास आ जाता. उस को पता लग गया था की अब उस का नाम रक्ष है.

अब जब भी बाबूजी खरीदारी करने जाते तो वे निश्चिंत रहते क्योंकि रक्ष उन के साथ होता. रक्ष दुकान के बाहर बैठ कर बाबूजी के आने तक प्रतीक्षा करता था और उन के साथ घर जाता था जब तक कि बाबाजी सुरक्षित घर न पहुंच जाते.

एक बार, पोर्च सीट से उठने के बाद बाबूजी ने देखा कि उन का रूमाल गायब था. उन्होंने इधरउधार खोजा, परंतु नहीं मिला. उन्होंने सोचा कि कहीं छोड़ दिया होगा और उस के बाद ज्यादा ध्यान नहीं दिया. दूसरी बार उन्होंने अपने जूते से एक मोजा खो दिया. फिर उसे भी तुच्छ समझ कर वे इस के बारे में भूल गए. उन्हें थोड़ी चिंता हुई कि शायद वे चीजों को भूलने लगे हैं- सोचा कि शायद वे बूढ़े हो रहे हैं. आखिर वे 65 साल की उम्र के आगे बढ़ चुके थे.

जीवन सामान्यतया और शांति से चल रहा था. बाबूजी को अपनी पत्नी की बड़ी याद आती थी. लेकिन वे खुद को सांत्वना देते कि प्रकृति से कोई नहीं लड़ सकता. कोई कितनी भी कोशिश करे, होनी को नहीं टाल सकता और जीवन तो जीना ही है.

बाबूजी के बच्चे कभीकभार उन से मिलने आते थे और हो सका तो वे अपने पोतेपोतियों की संगति का आनंद लेते थे. उन के दोनों पुत्रों ने उन्हें उन के साथ रहने की पेशकश की. उन दोनों के बीच समय बांटे. उन्होंने इस प्रस्ताव पर लंबे समय तक गंभीर और गहन विचार कर फैसला किया कि वे अपने पुश्तैनी घर में अपने नौकरों के साथ ही रहेंगे. बच्चों की अपनी ज़िंदगी है. उन की पत्नियां भी नौकरीपेशे वाली थीं और उन के जीवन में वे हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे. उन्होंने सोचा कि वे खुश हैं. उन के लिए यह ही काफी सुकून देने वाला था कि उन के बेटों का प्रस्ताव गंभीर था और मन की शांति थी कि उन के पास विकल्प था कि वे उन के साथ रह सकते हैं अगर अपने दम पर जीने में असमर्थ हों तो.

उन के पास मित्र, सुविधाएं, स्वतंत्रता, वांछनीय संगति और गतिविधियां थीं और सब से अच्छी बात यह थी कि कोई दायित्व न था. उन्होंने ने खुद को अपने जीवनसाथी की कंपनी के बिना रहने में सक्षम बनाया था, भले ही वह हर समय उन के विचारों में थी. उन्होंने सोचा कि कभीकभी यादों को संजोने के लिए अंतराल भर देता है. बाबूजी ने यह भी महसूस किया कि रक्ष की संगति और वह मौन और समर्पित प्रेम, जो उस ने उन्हें कम अपेक्षा के साथ दिया था, उन के स्वार्थहीन जीवन के लिए पर्याप्त था. विरले ही, लेकिन निश्चितरूप से बाबूजी राजनीति और धर्म व अन्य मामलों के बारे में अपनी कुंठाओं को बाहर निकालते. और रक्ष सौ प्रतिशत सहमत होता. जैसेजैसे प्रकृति ने अपनी भूमिका निभाना जारी रखा, बाबूजी बूढ़े हो गए और प्राकृतिक प्रक्रियाएं अपना काम करने लगीं. वे सही खाना खाते, व्यायाम करते और सकारात्मक सोचते, लेकिन प्रकृति को कोई नहीं हरा सकता. उन की वार्षिक चिकित्सा परीक्षा के बाद डाक्टर ने उन से कहा कि वे चौथे चरण के लिवर कैंसर से ग्रसित हैं. यह एक भयंकर, घातक व तेजी से बढ़ता कैंसर है. वे इस के कारण होने वाले दर्द को कम करने के लिए पूरी कोशिश करें और शरीर को ज़्यादा विश्राम दें. यह कैंसर लाइलाज है और रोगी के पाचनतंत्र के साथसाथ मानसिक स्थिरता पर भी भारी पड़ता है.

बाबूजी आश्चर्यचकित थे क्योंकि वे कभी भी जोखिमभरे कार्यों में लिप्त नहीं हुए. वे जीवनभर शाकाहारी रहे थे. उन्होंने कभी शराब नहीं पी, धूम्रपान नहीं किया. उन्होंने नियमितरूप से व्यायाम किया और जीवनभर एक सुरक्षित कार्यालय की नौकरी की. उसी दोपहर, बाबूजी रक्ष के साथ पोर्च पर बैठे थे, सुबह का आनंद ले रहे थे, लेकिन चिंतित थे. उसी समय धोबी नियमित तरीके से गंदे कपड़े मांगने के लिए दरवाजे पर आया कि वह धो सके और उन्हें वापस कर सके. बाबूजी कपड़े बाहर छोड़ कर धोबी को भुगतान करने के लिए पैसे लेने चले गए. धोबी भी समय बचाने के लिए अगले घर से कपड़े लाने के लिए निकल गया. जब वह वापस आया तो बाबूजी ने उसे भुगतान दिया और उस से कपड़े गिनने के लिए कहा.

बाबूजी ने धोबी को देने के लिए 20 कपड़े इकट्ठे किए थे. और, हमेशा की तरह, धोबी ने केवल 19 कपड़ों की गिनती की. बाबूजी ने उस से बारबार गिनने के लिए कहा और अपने सामने देखा पर केवल 19 कपड़े थे. बाबूजी यह सुनिश्चित करने के लिए अंदर गए कि कुछ भी गलती से गिरा तो नहीं था. लेकिन कुछ भी न मिला. उन को कपड़े के गायब होने की नहीं, बल्कि अपनी मानसिक क्षमता के बारे में चिंता हुई. लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया. धोबी को जाने दिया.

जैसे ही वे वापस सीट पर बैठे, रक्ष दौड़ता हुआ आया और उन की बगल में बैठ गया. वह जीभ से हांफ रहा था, फुफकार रहा था. बाबूजी को आराम करने के बाद, उन्हें मानसिक उथलपुथल हुई और इस बारे में बहुत मानसिक स्ट्रैस हुआ कि क्या उन्हें अपनी बीमारी के बारे में अपने बेटों को सूचित करना चाहिए या उन्हें अभी थोड़े समय के बाद करना चाहिए या एक पत्र या ईमेल या कौल द्वारा ऐसा करना चाहिए. उन्होंने फैसला किया कि उन्हें बुलाना सब से अच्छा है.

राघव और भार्गव दोनों आए. वे बुरी खबर सुन कर चौंक गए. उन्हें इस तरह के आघात का कभी अनुभव नहीं था. वे रोना बंद नहीं कर पा रहे थे. उन दोनों ने डाक्टर और बाबूजी के मानसिक तनाव व मानसिक दर्द को कम करने के बारे में सलाह मांगी. डाक्टर ने बहुत मदद की और उन्हें सलाह दी कि वे उन्हें अपनी पसंद के अनुसार काम करने दें और उन के लिए कम से कम तनाव का माहौल बनाएं और उन के सामने बीमारी के बारे में ज्यादा बात न करें.

कुछ हफ़्ते बाद वे अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए अपनेअपने घर चले गए और उन्हें हर दिन फोन करने का वादा किया और उन से उन के साथ खुल कर बात करने व जितनी जल्दी हो सके उन्हें बुलाने का वादा किया अगर उन्हें उन की जरूरत है.

सितंबर माह की एक सुहानी सुबह बाबूजी को सांस लेने में तकलीफ महसूस हुई और वे उठ नहीं पाए. उन्होंने अपने नौकर को बुलाया, जिस ने तुरंत एम्बुलैंस को फोन किया और उन्हें अस्पताल पहुंचाया. लेकिन बाबूजी को एम्बुलैंस के कर्मचारियों द्वारा उन्हें पुनर्जीवित करने के प्रयासों के बावजूद उन्होंने एम्बुलैंस में ही दम तोड़ दिया. उन्हें बड़ा घातक दिल का दौरा पड़ा था और वे डिफिब्रिलेशन द्वारा भी उन्हें पुनर्जीवित न कर सके.

सभी उचित संस्कारों के बाद बेटे वापस आए और बाबूजी के दाह संस्कार की तैयारी की. बाबूजी ने अपनी पत्नी की तरह ही पालदारों द्वारा श्मशान घाट ले जाने की इच्छा व्यक्त की थी. श्मशान घाट उन के घर से करीब 3 मील की दूरी पर था. जब पाल वाले चल रहे थे, भार्गव ने देखा कि रक्ष भी अपनी जीभ बाहर लटकाए हुए, हांफते हुए उन का पीछा कर रहा था. भार्गव ने उसे बुलाया और वापस जाने का इशारा किया, लेकिन रक्ष ने उस की बात अनसुनी कर दी.

उन्होंने अर्थी चलना जारी रखा और जब वे सभी श्मशान घाट पहुंचे व संस्कार के लिए तैयार हुए, तो वह बैठे हुए – बहुत करीब लेकिन पर्याप्त जगह छोड़ कर, उदास चेहरे और फटी आंखों के साथ बाबूजी के अवशेषों के दहन को घूर रहा था. पूरे संस्कार के दौरान, भार्गव ने देखा कि भीड़ में बाकी सभी लोगों की तरह रक्ष की आंखों से आंसू की धारा बह रही थी.

दहन की रस्म के बाद सभी लोग कारों से घर लौट आए, रक्ष 3 मील दौड़ कर बाबूजी के घर पहुंचा. सभी थके हुए और उदास थे और अपने साधारण भोजन के बाद सभी रात को विश्राम के लिए चले गए. रक्ष भी दौड़भाग कर थक गया था और निश्चय ही दुख में था. सब बहुत जल्दी सो गए. भार्गव सो न सका और कुछ ताजी हवा लेने के लिए बाहर आया. तब उस ने देखा कि रक्ष अभी भी पोर्च पर था, शांति से सो रहा था.

यह एक असामान्य घटना, क्योंकि रक्ष आमतौर पर सोने के लिए गली में चला जाता था, राघव को अजूबी लगी कि सोते समय रक्ष पर एक सफेद कपड़ा था. जब उस ने गौर से देखा तो ऐसा लग रहा था कि यह बाबूजी की सफेद गंजी है. रक्ष उसे कस कर दबोचे सो रहा था. इसे देख भार्गव की आंखों में आंसू आ गए और एक क्षणभंगुर विचार उस के दिमाग में कौंध गया- क्या रक्ष बाबूजी की गंजी पकड़ कर सो रहा है या बाबूजी का असीमित स्नेह रक्ष को पकड़े है?- उस दिन, बाद में, भार्गव और राघव घर के साथ वाली में गए और एक कोने में, उन्हें एक घोंघा छेद मिला, जहां रक्ष ने बाबूजी के रूमाल, उन के जुर्राब और अन्य सामान को साथ रखा था, जिसे रक्ष हमेशा बाबूजी की सुगंध लिए संजोता रहा था. उन्हें जलन हुई कि रक्ष के पास कुछ ऐसा है जो उन के पास नहीं हो सकता, लेकिन वे इस बात से संतुष्ट थे कि उन के पास उस की सुखद यादें हमेशा संजोने के लिए हैं.

Hindi Kahani : वृत्त – चतुर्वेदी जी अनिल को क्या समझाना चाह रहे थें

Hindi Kahani : “अरे सुमन जी, आज तो आप ने पूरे घर को ही खुशबू की चाशनी में डूबो दिया है. हम से तो रहा न गया, इसलिए चले आए आप की जादुई दुनिया में. वैसे, अब बता भी दीजिए कि हम्म… तो अपने लाल की ख्वाहिश पूरी की जा रही है, समोसे बनाए जा रहे हैं. वही तो हम कहें कि इतनी सुगंध किस पकवान की है जिस ने हमारी नाक को अपने जाल में फंसा लिया है.”

“अच्छाअच्छा, ठीक है, बहुत मस्का लगा लिया. मैं जानती हूं यह सब आप मुझे खुश करने के लिए कह रहे हैं. वैसे भी, इन बूढ़े हाथों में अब वह बात नहीं जो सालों पहले हुआ करती थी, वरना जिस खुशबू ने दूसरे कमरे में जा कर आप की नाक को बंदी बना लिया है वह मेरे करीब तक न आई. अब तो इन हाथों में बस इतनी ही जान बची है कि वे मैदा को बेल कर, उस में आलू डाल कर तेल में तल सकें, स्वाद मिलाने का काम तो बहुत पहले ही बंद हो गया.”

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मेरी पत्नी ने मेरी बातों का जवाब देते हुए उपरोक्त बात कही. उन की बातों में ऐसी मासूमियत थी कि मैं उन जवाब दिए बिना रह न पाया, “देखिए मिसेज सुमन चतुर्वेदी, आप को मेरी पत्नी की बुराई करने का कोई हक नहीं है. बेहतर यह होगा कि आप मेरे और मेरी पत्नी के बीच में न आएं. मैं ने अपनी पत्नी की बुराई करने का हक जब खुद को नहीं दिया तो आप को कैसे दे दूं.”

मेरी बात सुन वे फूलों की तरह खिलखिला उठीं और मुसकराते हुए कहा, “वैसे मिस्टर चतुर्वेदी, आप की जानकारी के लिए बता दूं कि मिसेज चतुर्वेदी आप की पत्नी है और मैं ही मिसेज चतुर्वेदी हूं.” यह कह कर वे और जोरजोर से हंसने लगीं.

आज बहुत दिनों बाद मैं ने अपनी पत्नी को इतना खुश देखा था. और तभी मैं ने कहा, “वैसे, आप को एक बात बता दूं, आप के हाथ भले ही समय के साथ बूढ़े हो गए हों पर आप के हाथों का स्वाद और भी जवान हो गया है.” मेरा इतना कहते ही वे शरमा गईं और दूसरी ओर मुंह फेर लिया. तभी मुझे खुराफात सूझी और मैं ने व्यंग्य करते हुए कहा, “वैसे, झुर्रियों वाले चेहरे को मैं ने पहली बार शरमाते हुए देखा है.”

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मेरे यह कहते ही वे गुस्से में मेरी और मुड़ीं, “यह सही नहीं है चतुर्वेदी जी, पहले अंतरिक्ष की सैर करा दो, फिर जमीन पर धम्म से गिरा दो.”

“और जो आप अपने मुंह से अपनी झूठी बुराई कर के मेरे मुंह से अपनी तारीफ करवाती हो, वह सही है?” मैं ने उन्हें शक की निगाहों से देखते हुए कहा. वे मंदमंद मुसकाने लगीं. तभी मैं ने उन से शिकायत करते हुए कहा, “भई, यह बढ़िया है, बेटे को बना दो राजा, दिनरात उस की सेवा करो. और तो और, साहबजादे के लिए समोसे भी बनाए जा रहे हैं. हम पर तो कोई ध्यान ही नहीं देता. हम इतने दिनों से महरी बनाने को कह रहे हैं पर वह नहीं बनाई गई. बेटे ने जो एक बार समोसे बनाने को कह दिया, तो वह तो उसी दिन बनाए जाएंगे.”

“अरे, नहींनहीं, उस ने बनाने को नहीं बोला. वह तो मेरा मन हुआ, तो उस के लिए बना दिए,” पत्नी जी ने ने कहा.

“तो यह तो और भी शिकायत करने की बात है. यहां हम बोलबोल कर थक गए और उसे बिना बोले ही समोसे मिल गए. वाह… वैसे, यह बताने की कृपा करेंगी कि उस की इतनी देखभाल क्यों की जा रही है.” मेरे ये शब्द उन के दिल में तीर की भांति चुभ गए और उन्होंने आंसूभरी आंखों से मुझे देखा. उन की आंख में दर्द साफ झलक रहा था. मैं सब समझ गया और मैं ने नजरें झुका लीं.

उन्होंने कहा, “वे अनिल को खाने के लिए बुलाने जा रही और वहां से जाने लगीं, तभी मैं ने उन्हें रोका और कहा, “मैं अनिल को खाने के लिए बुलाने जा रहा हूं.”

मैं जैसे ही जीने चढ़ने के लिए मुड़ा, उन्होंने अपनी साड़ी से आंसू पोंछ लिए. मैं आहिस्ताआहिस्ता अपने कमजोर पैरों से जीने चढ़ने लगा. मुझे डर लग रहा था पर इस बात का नहीं कि मेरे पैर मेरा वजन न सह पाएंगे और मैं गिर पडूंगा बल्कि इस बात से जरूर डरा हुआ था कि मैं अपने बेटे के उदास चेहरे का सामना कैसे करूंगा. अपने हंसतेखेलते अनिल को यों गुमसुम पड़ा कैसे देखूंगा. यह सब सोचसोच कर मेरा दिल बैठा जा रहा था. फिर भी मैं साहस जुटा कर जीने चढ़ने लगा. जैसे ही मैं ऊपर पहुंचा, मैं ने अपने आंसू पोंछ लिए और उस के कमरे की ओर बढ़ने लगा. उस के कमरे के नजदीक पहुंचा, तो मेरा दिल एक बार फिर उदास हो गया.

कमरे से रोशनी की एक किरण तक नहीं आ रही थी. उन चारदीवारों में कुछ भी देखना बहुत मुश्किल प्रतीत हो रहा था. इसलिए जैसे ही मैं अंदर पहुंचा, मैं ने कमरे की लाइट जला दी. मुझे देख वह चौंक गया. वह जल्दी से उठा और अपनी आंखों पर ताले लगाने लगा ताकि उस का एक भी आंसू मेरे सामने न निकल पड़े. मैं एक बार फिर से टूट गया.

मेरे बूढ़े हाथों में अब इतनी ताकत नहीं कि हर बार टूट कर खुद को फिर से समझ सकूं. वह भले ही अपने आंसू छिपा ले पर उस का पिता हूं मैं, उस की नसनस से वाकिफ हूं. इस से तो पहले ही अच्छा था मेरा बेटा, कम से कम अपने पिता से गले लग कर रो तो लिया करता था.

अब बड़ा हो गया है न वह. मैं एक पल के लिए सोच में डूब गया, यह कैसी परिस्थिति है जहां एक पिता और पुत्र अपनेअपने आंसू रोके हुए एकदूसरे के सामने खड़े हैं पर एकदूसरे को गले लगा कर रो नहीं सकते. मैं यह सब सोच ही रहा था कि तभी अनिल ने कहा, “पापा, आप यहां? कुछ चाहिए था आप को ?” मैं एकदम चौक गया, “हूं, हममम्… खाना बन गया है, आ कर खा लो.” मैं ने लड़खड़ाती जबान से कहा और वहां से चला आया. अगर थोड़ी देर और रुकता तो रो पड़ता.

आखिर कौन सा पिता अपने बेटे को अवसाद के दलदल में फंसा हुआ देख सकता है. मैं तो केवल उस तक रस्सी पहुंचा कर उसे इस दलदल से बाहर निकालने का प्रयत्न कर सकता हूं, पर बाहर निकलना उसे है. उसे उस रस्सी को पकड़ना होगा. पर शायद अब वह खुद से हार चुका है. वह उस रस्सी को पकड़ना ही नहीं चाहता. यह सोचतेसोचते मैं कब नीचे आ गया, पता ही न लगा.

मेरे कदमों की आवाज से सुमन रसोई से बाहर आ गईं. उन की उम्मीदभरी निगाहें मुझे और ज्यादा परेशान कर रही थीं. इसलिए, मैं चुपचाप अपनी झुकी हुई निगाहें ले कर खाने की मेज पर बैठ गया. एक मां अपना उदास चेहरा ले वापस रसोई में सब के पेट भरने का इंतजाम करने लगी. पर अभी भी उन की उम्मीद उन के साथ थी. वे इस उम्मीद में थीं कि कम से कम आज तो उन का बेटा अपने मनपसंद समोसों को मेज़ पर सजा देख पेट भर कर खाना खा लेगा.

पर जिस अनिल को मैं ऊपर देख कर आया था उस का खाना खाने का कोई इरादा नहीं लग रहा था. मेरे सामने एक मां थी जो अपने बेटे के लिए मेज़ पर समोसों को सजा रही थी पर उन थालियों में केवल समोसे नहीं थे, थे उस के जज्बात, उस के बूढ़े हाथों की मेहनत, उस का प्यार और शायद उस की आखिरी उम्मीद. पर मैं तो यह भी यकीन के साथ नहीं कह सकता था कि आज उस का बेटा खाना खाने आएगा भी या नहीं.

मेरी सारी उम्मीदें तो पहले ही टूट चुकी थीं पर मैं नहीं चाहता था कि एक मां की उम्मीदें टूटें क्योंकि मैं जानता हूं कि कितना दुख होता है उम्मीद टूटने पर. पर इन सब की जड़ एक शब्द है मेरे बेटे का अवसाद में जाना, मेरी पत्नी की आंखों में दुख का समाना, मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फिर जाना आदि सब एक शब्द की वजह से हैं- ‘नौकरी’.

मेरा बेटा करीब 32 साल का होने को आया है पर उस की आज तक सरकारी नौकरी नहीं लगी. पर मेरे बेटे को दुख न होता और न ही मुझे होता, अगर वह पढ़ाई न करता, अच्छे से तैयारी न करता. उस ने तो जीजान लगा दी थी. उस का कमरा ही पुस्तकालय बन चुका था और केवल नाम का ही नहीं, उस में हर एक किताब मिल जाती थी जो भी चाहिए. वह रात को 2-2, 3-3 बजे तक न सोता था. बस, पढ़ता रहता था. उस की लगन व मेहनत आज उस के किसी काम नहीं आ रही है.

यह सब उस दिन शुरू हुआ था जब उस का पीएससी का परिणाम आने वाला था. उस दिन हम सब अपने हंसतेखेलते अनिल के साथ इसी मेज पर बैठ कर उस की परीक्षा के परिणाम के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे. पूरे घर में शांति थी. अनिल ने हम से बड़े आत्मविश्वास से कहा था, ‘देखना मम्मी, देखना पापा, इस बार तो मेरा चयन हो कर ही रहेगा.’ उस समय उस की वाणी में जो जोश व उत्साह था उस ने हमें भी यकीन दिला दिया कि हां, लगातार 3 बार असफलता का मुंह देखने के बाद इस बार मेरा बेटा जरूर सफल होगा. हम ने बहुत उम्मीदें जोड़ ली थीं उस परिणाम से. परंतु जैसे ही उस के परिणाम सामने आए, मेरा बेटा बहुत उदास हो गया.

उस दिन पहली बार उस ने अवसाद के दलदल में अपना पहला कदम रखा था. वह उस रात कुछ भी न बोला. उस दिन मुझे भी बहुत बड़ा झटका लगा था. उस दिन घर में 3 लोग थे. पर मेरा घर किसी खंडर की भांति लग रहा था. सब निराश थे. पर हम में से कोई भी इस बात का जिम्मेदार अनिल को नहीं मान रहा था. पर उस दिन जातेजाते उस ने मुझ से एक बात बोली थी, ‘मुझे माफ कर दो, पापा. मैं आप के लिए कुछ भी न कर सका.’ उस के बाद हम ने अपने पहले वाले अनिल को खो दिया.

उसे लगता है कि उस ने हमारी उम्मीद तोड़ी है, वह हमारे लिए कुछ नहीं कर सका. पर मैं उसे कैसे बताऊं कि… एक बार फिर जब मैं ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों को तलाशा तो मैं ने अपना शब्दकोश खाली पाया. मैं अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर सकता. इतना कहूंगा कि मेरा दर्द वही माली समझ सकता है जिस ने बड़े प्यार से अपने बाग को फूलों से सजाया पर उस ने अपनी आंखों से अपने फूलों को मुरझाते हुए देखा हो. पर मुझे अपनेआप पर पूरा भरोसा है कि मैं ने अपने बेटे को इतना काबिल बनाया है कि उसे जीवनयापन करने के लिए दूसरों का सहारा न लेना पड़े. मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी अनिल नीचे आ गया.

उसे देख हम दोनों बहुत खुश हुए और उस के लिए थाली में गरमागरम समोसे रख दिए. पर समोसों को जितना मेरा पुराना अनिल प्यार करता था उतना शायद नया नहीं. इसलिए उस के चेहरे के भाव समोसे देख कर भी न बदले. अचानक मुझे वह दिन याद आ गया जब सुमन ने उस के लिए समोसे बनाए थे और वह सारे खा गया था. सुमन को, बस, एक ही समोसा मिल पाया था, हाहाहा… वह दिन याद कर के आज भी मेरी हंसी छूट जाती है. उस दिन समोसे देख कर अनिल के मुंह पर जो इंद्रधनुष के सात रंग विराजे थे वे न जाने कहां गुम हो गए. तभी सुमन ने मुझे विचारों की नींद से जगाते हुए कहा, “अरे आप भी खाइए न.”

“हूं..हूं..हां,” मैं ने हड़बड़ाहट में कहा. पर जैसे ही मैं ने समोसे का पहला कौर खाया, मैं तो मंत्रमुग्ध हो गया. “समोसे तो लाजवाब बने हैं,” मुझ से तारीफ किए बिना रहा न गया और मैं बोल पड़ा.

मेरी बात सुन सुमन मुसकरा पड़ीं और कहा, “पर लगता है हमारे अनिल को अच्छे नहीं लगे.” यह बात सुन अनिल ने कहा, “अरे…” वह कुछ कहता कि उस से पहले ही उस के फोन की घंटी बज गई. उस ने फोन उठाया और कहा, “अरे अतुल, कैसे हो?” फोन अतुल का था जो अनिल का पक्का दोस्त था.

अतुल अकसर हमारे घर आताजाता रहता था, इसलिए हम दोनों भी उस से अच्छे से घुलमिल गए थे. बड़ा ही नेकदिल लड़का है वह. अपने बेटे के मुंह से अतुल का नाम सुन हम दोनों बहुत खुश हुए, सोच रहे थे कि चलो, अतुल से बात कर के हमारे बेटे का मन तो बहलेगा. तभी अनिल बोला, “अच्छा, यह तो खुशी की बात है. हां, मैं जरूर आऊंगा.” वह यह सब कह तो रहा था पर उस के चेहरे के भाव कुछ और ही कह रहे थे. अनिल ने फोन रख दिया.

उस के फोन रखते ही मैं ने पूछा, “बेटा, अतुल क्या कह रहा था?” मेरी बात सुन उस ने भारी आवाज में कहा, “आज अतुल पापा बन गया. भाभी ने एक नन्ही परी को जन्म दिया है.” यह कह कर वह दोबारा जीने चढ़ने लगा. पर हम में से किसी की भी हिम्मत न हुई कि उसे रोक ले.

अचानक मुझे वह दिन याद आ गया जब अनिल के लिए हम लड़की देखने गए थे. पूरे रास्ते में वह हम से लड़की के बारे में ही पूछता रहा. बढ़िया तैयार हो कर गया था वह. उस दिन बहुत खुश था क्योंकि जिस लड़की की तसवीर हमारे पास थी वह बेहद खूबसूरत थी, रसोई के सारे काम आते थे उस को. और तो और, वह सरकारी नौकरी भी करती थी. वह बिलकुल वैसी ही थी जैसी मेरे बेटे को चाहिए थी. वह ड्राइवर से बारबार कह रहा था, ‘जरा जल्दी चलाओ न.’ पर जब हम वहां पहुंचे तो वह घबरा गया.

वह बारबार फोन में देख रहा था. कहीं बाल तो नहीं बिगड़े, कहीं सूट गंदा तो नहीं है, सब जांच रहा था. अंदर जाते वक्त उस ने अपनी मम्मी का हाथ पकड़ लिया. जैसे ही उस ने लड़की के पिता यानी अपने ससुर को देखा तो सीना तान के चलने लगा. उस की हरकतें देख हंसी नहीं रुक रही थी पर जैसे ही लड़की बाहर आई तो शर्म के मारे लाल पड़ गया था. उस की कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी.

आखिरकार लड़की को ही पूछना पड़ा था, ‘क्या हम अकेले में बात कर सकते हैं?’ हम सब की हंसी छूट पड़ी थी. पर शायद यह कुछ पलों की ही मेहमान थी क्योंकि कुछ देर बाद वह लड़की गुस्से से तिलमिलाते हुए बाहर आई और हमारा बेटा उस के पीछे भागतेभागते. वह आते ही बोली, ‘पापा, मैं ने आप को कहा था न कि मेरे सामने उसी लड़के को लाइएगा जो सरकारी नौकरी करता हो, तो फिर इस बेरोजगार को मेरे सामने ला कर खड़ा क्यों कर दिया? क्या आप मेरे जीवन की डोर उस के हाथ में सौंपना चाहते हैं जो अभी तक खुद के पैरों पर खड़ा तक नहीं हुआ है?

उस की बातों से हम सब समझ गए थे कि क्या हुआ था. उस की बातों से ही पता लग गया था कि वह कितनी मूर्ख और बदतमीज लड़की थी. हम वहां से फौरन उठे और अपने बेटे को साथ ले कर चले आए. गाड़ी में वह बहुत गुमसुम था, तो उसे समझाने के लिए मैं ने उस से कहा, ‘जो हुआ, अच्छा हुआ. कम से कम हम अपने घर की जिम्मेदारी एक मूर्ख को तो देने से बचे.’ तभी सुमन ने भी मेरी हां में हां मिलाते हुए कहा, ‘और नहीं तो क्या. हमारे बेटे के लिए तो इस से भी अच्छीअच्छी लड़कियां इंतजार कर रही होंगी.’ तब जा कर अनिल ने हम से कहा था, ‘उस ने गलत क्या किया. वह भी तो अपनी जिंदगी के बारे में सोच रही थी.’ यह कह कर वह अपनी मां के कंधे पर सिर रख कर सो गया. पर उस की बात सही भी तो थी.

उस दिन जो गाड़ी में सोया वह हमारा पुराना अनिल था और शाम को जो जागा वह नया अनिल. कि तभी अचानक मेरी नज़र सुमन की ओर गई. वे रोते हुए उन समोसों को निहार रही थीं. शायद जो दृश्य मेरी आंखों के सामने न चाहते हुए भी आ गए थे, वे सुमन की आंखों में भी समा गए. अब बस. अब मुझ से अपने घर की इतनी बुरी दशा नहीं देखी जा रही. मैं अभी के अभी जाऊंगा और अनिल को समझाऊंगा. मैं ने अपनी बचीकुची हिम्मत उठाई और एक बार फिर से जीने चढ़ने लगा.

मेरी पत्नी सुमन अभी भी उस के खयालों में गुम थी, इसलिए मुझे देख न पाई. जल्दी ही मैं ऊपर था. मैं अनिल के कमरे में गया और उसे आदेश देते हुए कहा, “अनिल, मेरे साथ छत पर चलो.” मुझे वहां पा कर वह पहले तो सकपका गया, फिर मेरी बात का उत्तर देते हुए बाहर न जाने के बहाने बनाने लगा, “पापा, देखो न, कितना अंधेरा है बाहर.”

“वह तो तेरे कमरे में भी है,” मैं ने उस के बहाने को खारिज करते हुए कहा.

“बाहर मच्छर काटेंगे न,” उस ने फिर से बहाना बनाया.

“कल ही महल्ले में मच्छर मारने की दवाई छिड़की गई थी. आधे तो उस से मर गए और आज धूप से,” मैं ने इस बार भी उस का बहाना खारिज कर दिया.

“तो बाहर कितनी गरमी है,” उस ने एक और बहाना तैयार कर लिया.

“बाहर ताजी हवा भी तो चल रही है,” मैं ने उस की गरमी भगाते हुए कहा.

“मुझे तो नहीं लगता,” उस ने एक और बहाना मुझे थमा दिया.

“जब बाहर चलोगे तब पता चलेगा न,” अब उस के बहानों का पिटारा खाली हो गया और न चाहते हुए भी मेरे साथ छत पर आना पड़ा. यह मेरी हिम्मत बढ़ाने को काफी था. हम एकसाथ छत पर टहलने लगे. कुछ देर तक हम यों ही चुपचाप टहलते रहे. मैं उसे समझाना चाहता था पर कैसे, यह समझ में नहीं आ रहा था. मैं कुछ भी कहने का प्रयास करता तो शब्द खुदबखुद गायब हो जाते. ऐसे में मैं अपने अंश को कैसे समझाऊं, मुझे समझ में नहीं आ रहा था. मैं अपने विचारों में इतना खो गया कि कब अनिल आसमान को निहारने में व्यस्त हो गया, पता ही न लगा. मैं ने सोचा, चलो कुछ तो ऐसा है जिस ने अनिल का ध्यान आकर्षित किया. मैं उस के पास जा कर खड़ा हो गया और पूछा, “क्या देख रहे हो बेटा?” मेरी बात सुन उस ने उदासीभरे स्वर में कहा, “शायद मेरी भविष्य में चांद लिखा ही नहीं है.”

“पर ये तारे भी तो कितने खूबसूरत हैं,” मेरे मन में एक विचार आया, मैं ने सोच लिया कि इस से अच्छा मौका शायद मुझे फिर न मिले. मेरा वाक्य सुन वह बोला, “क्यों, आप को चांद पसंद नहीं है?” मैं ने उसे प्यार से समझाया, “बेटा, पूरा चांद तो महीने में एक बार आता है और ईद का चांद, वह तो पूरे साल में एक बार आता है. पर तारे चादर बन कर पूरे आसमान को ढक लेते हैं. ऐसा ही हमारी जिंदगी में होता है. ये बड़ीबड़ी खुशियां ईद की चांद की तरह होती हैं और छोटी इन तारों की तरह. बड़ी खुशियां चांद की तरह हमारी जिंदगी में एकदो बार ही आती हैं पर छोटीछोटी खुशियां चादर की भांति हमारी पूरी जिंदगी ढक लेती हैं. चांद तो महीने में बस एक बार दिखाई देता है पर तारे हर रोज निकलते हैं. यही जीवन का ‘व्रत’ है. मेरी बात सुन वह बिना कुछ बोले दरवाजे की ओर जाने लगा. मुझे लगा मैं ने अपना आखिरी मौका भी खो दिया. पर फिर भी, मैं ने अपना बचाकुचा साहस समेटा और पूछा, “कहां जा रहे हो, बेटा?” वह मुड़ा और उस ने कहा, “समोसे ठंडे हो रहे हैं.”

लेखिका- काव्या कटारे

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