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Hindi Story Telling : मातहत – क्या नेहा को मिल पाया रमेश से छुटकारा

Hindi Story Telling : मां की खराब सेहत ने नेहा को अत्यधिक चिंता में डाल दिया. डाक्टर ने आवश्यक परीक्षण के लिए शाम को बुलाया था. छोटी बहन कनिका को आज ही दिल्ली लौटना था. वे साशा के साथ बैठ कर सभी आवश्यक कार्यक्रमों की रूपरेखा तय कर रही थीं.

तभी रमेश का फोन आया, ‘‘मैडम, मैं आप की गाड़ी सागर ले जाऊं? आप तो अभी यहीं हैं.’’

‘‘हां, मैं यहीं हूं. लेकिन मेरी मां बहुत बीमार हैं. गाड़ी तुम्हें कैसे दे सकती हूं? मुझे जरूरत है,’’ नेहा बोली.

‘‘लेकिन मुझे दोस्त की शादी में सागर जाना है. बताया तो था आप को.’’

‘‘बताया था, लेकिन मैं ने गाड़ी सागर ले जाने की अनुमति तो नहीं दी थी… यह कहा था कि यदि मुझे ज्यादा दिन रुकना पड़ा तो तुम गाड़ी वापस बालाघाट ले जाना. बहरहाल मैं अधिक दिन नहीं रुक रही हूं.’’

‘‘लेकिन मैं ने आप के कारण सागर के टिकट कैंसिल करा दिए. अब क्या करूं?’’

‘‘रमेश मैं ने साफ कहा था कि मां के पास ज्यादा दिन रुकने की स्थिति में गाड़ी वापस भेज दूंगी. लेकिन गाड़ी सागर ले जाने की बात तो नहीं हुई थी… वैसे भी उधर की सड़क कितनी खराब है, तुम्हें मालूम है… मैं गाड़ी नहीं दे सकती. मां को चैकअप के लिए ले जाने के अलावा और बीसियों काम हैं,’’ नेहा का मूड बिगड़ गया.

नेहा को दफ्तर में ही मां की बीमारी की सूचना मिली थी और वे बलराज से बात कर ही रही थीं कि रमेश ने सुन लिया और झट से बोल पड़ा, ‘‘मैडम, मैं आप को छुट्टी की दरख्वास्त देने आया था. सागर जाना है दोस्त की शादी में. अब आप कार से भोपाल जा रही हैं तो मैं भी साथ चलूं? अकेला ही हूं. बीवीबच्चे अंकल के घर में ही हैं अभी… उन्हें वापस भी लाना है.’’

नेहा ने स्वीकृति दे दी यह सोच कर कि वह उन का मातहत है. साथ ले जाने में क्या बुराई है? वैसे भी वे अकेली जाएंगी कार में. बच्चों को साथ नहीं ले जाया जा सकता. उन की पढ़ाई का नुकसान होगा और फिर क्या पता वहां कितने दिन रुकना पड़े.

नागपुर पहुंचने पर रमेश ने कहा, ‘‘मैडम, कुछ देर के लिए मेरे घर चलिए न. मम्मीपापा से मिल लूंगा… आप भी थोड़ा आराम कर लेंगी.’’

‘‘आराम नहीं… वैसे मिलने चलना है तो चलो… रुकेंगे नहीं,’’

नेहा ने कार रुकवा कर थोड़ी मिठाई खरीद ली. आखिर वे बौस हैं. खाली हाथ उस के घर जाते क्या अच्छा लगेगा?

घर के लोग बैठक में जमा हो कर बातचीत में व्यस्त हो गए थे. रमेश ने किसी से नेहा का परिचय नहीं कराया. जाने उन लोगों ने क्या समझा हो. मिठाई का डब्बा उन्होंने एक बच्चे के हाथ में पकड़ा दिया. चाय आने पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक लेने से मना कर दिया. फिर वे रास्ते भर अपने विचारों में खोई रहीं.

‘सारे भाईबहन अपने जीवन में व्यवस्थित हैं, पर पिता की मृत्यु के बाद से मां ही अव्यवस्थित हो गई हैं. वे किसी एक जगह जम कर नहीं रहतीं. जहां भी रहती हैं, बच्चे उन की सुविधाओं का पूरा ध्यान रखते हैं. उन के कमरे में ही टीवी, टैलीफोन, म्यूजिक सिस्टम और लिखनेपढ़ने का सारा इंतजाम रहता है. वे खूब लिखती हैं- अंगरेजी, हिंदी, बंगला तीनों भाषाओं में.

जो वैविध्यपूर्ण जीवन उन्होंने अपने ब्रिगेडियर पिता और कर्नल पति के सान्निध्य में जिया, उस के अलावा स्वतंत्रता संग्राम के दिनों की स्मृतियों और घटनाओं को शब्दों में पिरोती रहती हैं. पर कभी कुछ छपवाया नहीं आज तक. घर में किसी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया.

वे कितना मधुर गाती हैं इस उम्र में भी. चर्चा, परिचर्चाएं उन्हें अपार सुख देती हैं, पर आजकल किस के पास फुरसत है इतनी कि बैठ कर उन्हें सुनें? शायद भीतर का अकेलापन अब निगल रहा है उन्हें. भौतिक सुविधाएं आत्मिक प्रसन्नता तो नहीं दे सकतीं न? ऐसे में उन्हें कुछ हो गया तो?’ सोच नेहा घबरा उठी थीं.’

भोपाल पहुंचने पर रमेश को उस के अंकल के यहां छोड़ने शाहपुरा जाना पड़ा. रात हो चुकी थी. उस ने कार से सामान उतारते हुए चाय के लिए रुकने का आग्रह किया था पर नेहा टाल गई. दरवाजा खुलते ही उस की पत्नी, आंटीअंकल सब बाहर आ गए. रमेश ने तब भी उन से किसी का परिचय नहीं करवाया. पत्नी से भी नहीं. बहुत अजीब लगा था उन्हें.

तब उन्होंने खुद ही संकेत करते हुए पूछ लिया था, ‘‘ये तुम्हारी…’’

‘‘पत्नी है दिशा,’’ लेकिन नेहा का परिचय पत्नी को देने की आवश्यकता नहीं समझी उस ने. उसे छोड़ने के बाद वे मां के घर चली आईं और अब वह गाड़ी मांग रहा था ताकि पत्नी व बच्चों के साथ शान से दोस्त की शादी में जा सके.

कितना खुदगर्ज है यह आदमी? नेहा का मन खिन्न हो गया. रमेश दफ्तर में कभी उन्हें अभिवादन नहीं करता. वह सोचता है कि यह नौकरी कर के वह एहसान कर रहा है… वह तो क्लास वन के लायक है… इतनी काबिलीयत है उस में. दिन ही खराब थे वरना आईएएस की लिखित परीक्षा में तो निकल गया था, मौखिकी में ही रह गया… फिर भी अपनेआप को आईएएस औफिसर से कम नहीं समझता.

नेहा को महसूस हुआ कि अपने मातहत पुरुषों से कभी निजी या घरपरिवार की परिस्थितियों पर चर्चा नहीं करनी चाहिए. वैसे भी महिला बौस को वे अमूमन गंभीरता से नहीं लेते. उन के अधीन काम करना वे अपनी तौहीन समझते हैं. लाख महिला सशक्तीकरण की बातें की जाएं, विश्व महिला दिवस मनाया जाए, नारी स्वतंत्रता के नारे लगाए जाएं, पुरुष आसानी से स्त्री की सत्ता थोड़े ही स्वीकार कर लेगा.

साशा ने नेहा को गंभीर देख कर टोका, ‘‘छोडि़ए भी, नाहक क्यों मूड बिगाड़ती हैं अपना? कनिका दीदी नहा कर आती ही होंगी. खाने की मेज पर चलें? उन्हें शताब्दी से निकलना है. अभी 12 बजे हैं.’’

नेहा ने घड़ी पर निगाह डाली. शताब्दी ऐक्सप्रैस दोपहर 2 बजे निकलती है. कितनी तेजी से बीत रहा है समय. पंख लगा कर उड़ रहा हो मानो…अभी तो मिल कर जी तक नहीं भरा और बिछुड़ना होगा… उन्होंने ठंडी सांस ली. अगले ही क्षण टैलीफोन की घंटी बज उठी.

‘‘मैडम, कब निकलना है वापस बालाघाट? मुझे रिंग कर दीजिएगा,’’ रमेश कह रहा था.

नेहा बुरी तरह खीज उठीं. बोलीं, ‘‘देखो रमेश तुम्हारी छुट्टी सिर्फ आज तक है. कल रविवार है. तुम सोमवार को जौइन कर लेना. मेरा अभी कुछ तय नहीं वापस जाने का.’’

‘‘लेकिन मैं तो आया ही इसलिए हूं कि आप के साथ लौट जाऊंगा कार से. आप ही की वजह से मैं ने वापसी के भी टिकट कैंसिल करा दिए हैं.’’

‘‘रमेश, मैं अपनी बीमार मां को देखने आई हूं यहां, कोई पिकनिक मनाने नहीं. अपनी सहूलत से वापस जाऊंगी,’’ कह कर उन्होंने फोन काट दिया.

‘यह आदमी तो पीछे ही पड़ गया. उस के बात करने का अंदाज तो देखो… कहता है, आप की वजह से टिकट कैंसिल कराए. टिकट कराए कब थे? झूठ की भी हद होती है,’ सोच नेहा भीतर ही भीतर उबल पड़ीं.’’

‘‘दीदी, अपने मातहतों को ज्यादा मुंह लगाना अच्छा नहीं होता. उसे आप का तनिक भी लिहाज नहीं. वह तो ऐसे बात कर रहा है जैसे आप उस की बौस नहीं, वह आप का बौस हो… ऐसे ढीठ आदमी को सपरिवार साथ ले कर वापस जाएंगी आप?’’

साशा के इस कथन से नेहा क्षुब्ध हो उठीं. बोलीं, ‘‘अब क्या करूं? वह रईसी तो बहुत झाड़ता है. कह रहा था कि उस के अंकल तो हैलीकौप्टर खरीदना चाहते हैं पर सरकार अनुमति नहीं दे रही है… दोस्त को ठाट दिखाने और झूठी शान बघारने के लिए मेरी गाड़ी से सपत्नीक शादी में सागर जाना चाहता था. शायद पत्नी पर रोब गांठने के लिए कह दिया हो कार से लौटेंगे… अब कार्यक्रम गड़बड़ाने से खीज रहा… जब मैं ने कह दिया कि तुम जौइन कर लेना, तो इस का मतलब है मैं उस के साथ वापस नहीं जाऊंगी. फिर भी फोन करने का दुस्साहस किया. ढिठाई की हद है.’’

‘‘आप नाहक कार से आईं,’’ कनिका ने खाने की मेज पर नजर डालते हुए कहा.

‘‘अरे, कर्नल साहब घर में होते तो ट्रेन से ही आना पड़ता. वे तो 10 दिनों के लिए हैदराबाद में हैं इसलिए मैं ने सोचा…’’

सहसा मां की उपस्थिति से सब का ध्यान उन पर केंद्रित हो गया. साशा ने उन्हें आहिस्ता से कुरसी पर बैठाया, खाने की मेज पर मां का सान्निध्य कितना सुखद लगता है… पर ऐसा संयोग अब कम ही होता है. शादी के बाद सब बेटियां एकत्र नहीं हो पातीं. मां अब ज्यादा चलतीफिरती नहीं. वे जल्दी ही थक जाती हैं. अब तो बीमारी के कारण वे आग्रहपूर्वक अपने हाथों से बना कर कुछ नहीं खिला पातीं.

नेहा स्टेशन पर कनिका को विदा कर लौटीं तो मन बहुत उदास हो गया. शाम को साशा के साथ मां को डाक्टर को दिखाने ले गईं तो वहां भीड़ थी. एक बार फिर प्रतीक्षा के क्षणों में चर्चा के दौरान रमेश छाया रहा.

घर लौटने पर साशा ने उखड़े स्वरों में कहा, ‘‘मैं तो तंग आ गई इस रमेश पुराण से.

दीदी, आप उस के साथ हरगिज नहीं लौटेंगी. उसे मोबाइल पर स्पष्ट शब्दों में कह दीजिए… वह कोई उम्मीद न करे.’’

‘‘लेकिन साशा, वह दफ्तर में कहता फिरेगा… मैडम ने धोखा दिया.’’

‘‘तो कहता फिरे.’’

‘‘इस बार चली जाती हूं. आइंदा उसे कभी साथ ले कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’

‘‘बरदाश्त कर लेंगी उस के कुनबे को पूरे 12 घंटे?’’

‘‘हां, यह बात तो है. मन मार कर चुपचाप बैठे रहना होगा.’’

‘‘तो फिर उसे मना कर दीजिए,’’ कह साशा ने उन्हें मोबाइल फोन थमा दिया.

‘‘लेकिन साशा, मैं तो कह ही चुकी हूं कि मेरे वापस जाने का अभी तय नहीं… तुम सोमवार को जौइन कर लेना,’’ नेहा बोलीं.

‘‘तो एक बार और कह दीजिए. वह बेवकूफ है,’’ साशा बेहद गुस्से में थी.

तभी अचानक मां की आवाज सुनाई दी.

‘‘अच्छा, थोड़ी देर बाद कह दूंगी, कह कर नेहा मां के पास चली गईं.’’

मां बहुत उदास थीं. उन के आग्रह पर वे 2 दिन और रुक गईं. तय किया कि रात को सफर शुरू करेंगी. बलराज खापी कर दिन भर सो लेगा ताकि रात को परेशानी न हो.

मां की तीमारदारी से संबंधित सारी हिदायतें शीतल और साशा को देने के बाद नेहा कुछ निश्चिंत थीं. अब सूटकेस में अपना सामान रख रही थीं, तभी कौलबैल बजी. द्वार पर रमेश खड़ा था.

‘‘सोचा, फोन कर के आप को परेशान करना ठीक नहीं, इसलिए घर चला आया पूछने. कब निकलना है? मैं भी रुक गया हूं. सोचा, अर्जित अवकाश ले लूंगा. दरअसल, दिशा भी यही चाहती है कि आप के साथ ही लौटें,’’

वह बोला.

‘‘उफ,’’ कह नेहा ने दोनों हाथों से अपना सिर थाम लिया.

Online Hindi Story : मिलीभगत – आखिर उमाकांतजी के साथ क्या हुआ?

Online Hindi Story : प्रिया ने अपना 10वां जन्मदिन ससुराल में मनाया. उस की सास शारदा और जेठानी सीमा ने मिल कर स्वादिष्ठ भोजन तैयार किया था. प्रिया का पति आरक्षित पद पर लगा था और अच्छी कमाई कर रहा था.

खाने में प्रिया के भैयाभाभी ही शामिल हो पाए. उस के पापा की तबीयत ठीक न होने के कारण मां भी नहीं आ पाई थी.

सीमा का छोटा भाई रवि इत्तफाक से लंच के समय आ गया था. उस ने भी सब के साथ भोजन किया.

खाना खाने के बाद सब से पहले प्रिया के ससुर उमाकांतजी सर्दी की धूप का आनंद लेने पास के बाग में चले गए.

रवि कई सालों से बेकार था, इधरउधर घूमता रहता था. उन के जाने के चंद मिनटों बाद रवि विदा हो गया. उस के जाने के करीब 15 मिनट बाद प्रिया ने घर में हंगामा खड़ा कर दिया. प्रिया को घर के अपने रिश्तेदारों द्वारा चोरी करने का अंदेशा था.

‘‘मेरा 20 हजार रुपए का मोबाइल चोरी चला गया है,’’ गुस्से और घबराहट के कारण प्रिया ने लगभग चिल्लाते हुए सब को चौंका दिया था. उसे जेठानी और जेठ पर शक था.

‘‘तुम ने कहीं इधरउधर रख दिया होगा. चोरी जाने की बात मुंह से मत निकालो,’’  उस के पति नीरज ने उसे समझाया. उसे भी अपने बड़े भाई से कोई खास प्रेम न था क्योंकि सब का बचपन अभावों में गुजरा था.

‘‘मैं ने आप के फोन से अपने फोन का नंबर मिलाया है. मेरे फोन की घंटी बज ही नहीं रही है. उस का सिम कार्ड निकाल लिया गया है और यह काम कोई चोर ही करेगा न.’’

‘‘हो सकता है फोन की बैट्री खत्म हो गई हो.’’

‘‘मैं ने सुबह ही उसे फुल चार्ज किया था. फोन चोरी किया गया है और मैं इस मामले में चुप नहीं बैठूंगी. पुलिस में रिपोर्ट करने से भी मैं हिचकिचाने वाली नहीं.’’

प्रिया ने यह धमकी अपनी जेठानी सीमा की तरफ क्रोधित नजरों से देखते हुए दी थी. इस कारण सीमा का पारा फौरन चढऩा शुरू हो गया.

‘‘तुम किसी पर चोर होने का शक कर रही हो, प्रिया?’’ बड़ी कठिनाई से अपने गुस्से को नियंत्रित रखते हुए सीमा ने अपनी देवरानी से सवाल किया.

‘‘जिन पर मुझे शक नहीं है वो हैं मेरे भैयाभाभी, मम्मीपापा और नीरज. ये लोग मेरा फोन नहीं चुराएंगे.’’

‘‘यानी कि तुम्हारी नजरों में मेरे पति और मैं चोर हो सकते हैं?’’

‘‘रवि भी आया था यहां.’’

‘‘मेरे भाई को या हमें चोर कहा तो अच्छा नहीं होगा, प्रिया,’’ सीमा का चेहरा गुस्से से लाल हो उठा.

‘‘चोर का पता पुलिस लगा ही लेगी, भाभी. मुझे इस मामले में आप से कोई बहस नहीं करनी है. वैसे, तुम्हें या भैया को भी मैं चोर नहीं मान रही हूं.

‘‘चोरी मेरे भाई ने भी नहीं की है.’’

‘‘फिर कहां है मेरा मोबाइल?’’ प्रिया के इस चुभते सवाल का सीमा फौरन कोई जवाब नहीं दे पाई थी.

प्रिया के भैया प्रमोद और भाभी वंदना साफ नाराज और परेशान नजर आ रहे थे. पर उन्होंने खामोश रहना ही बेहतर समझा. प्रमोद और वंदना भी साधारण हैसियत के ही थे पर प्रिया अब पति की मोटी वेतनवाली जौब के कारण खुश थी.

दिखावे के लिए नीरज ने प्रिया को डांटना शुरू कर दिया, ‘‘जब संभाल कर नहीं रख सकती हो, तो तुम्हें इतना महंगा मोबाइल खरीदना ही नहीं चाहिए था. हर चीज तुम्हें महंगी और अव्वल दर्जे की चाहिए, पर देखभाल करने के नाम पर तुम बहुत ही लापरवाह हो.’’

‘‘जिन पर विश्वास हो उन्हें चीजें चुराने से कैसे रोका जा सकता है. हां, आगे देखती हूं कि कोई बाहर का आदमी मेरी किसी चीज को कैसे छूता है.’’ प्रिया अपने पति से उलझने को भी तैयार हो गई.

‘‘नीरज, इसे फालतू बोलने से रोको. रवि ईमानदार लडक़ा है. प्रिया का उसे चोर समझना मुझे पसंद नहीं आ रहा है. उस की नौकरी नहीं लगी, तो मतलब यह तो नहीं कि वह चोर है,” नवीन ने अपने छोटे भाई को गंभीर लहजे में हिदायत दी.

इस बार वंदना ने वार्त्तालाप में हिस्सा लेते हुए कहा, ‘‘हम तो अभी यहीं हैं. आप लोग हमारी तलाशी ले लीजिए. बाद में कोई हमें शक के दायरे में घसीटे, यह हमें बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा.’’

‘‘जिस की तलाशी होनी चाहिए थी, वह तो जा चुका है,’’ प्रिया की इस बात ने सारे मामले में आग में घी डालने जैसा काम किया था.

सीमा भडक़ कर बोली, ‘‘मुझे तो इस मामले में तुम ननद-भाभी की मिलीभगत साफ नजर आ रही है. मोबाइल के चोरी होने का झूठा इलजाम मेरे भाई पर लगा कर तुम लोग यह लड़ाईझगड़ा क्यों कर रहे हो, मुझे पता है.’’

‘‘क्या कहना चाह रही हैं आप?’’ वंदना सीमा से उलझने को तैयार हो गई.

‘‘जैसे तुम लड़झगड़ कर अपनी ससुराल से अलग हुई थी, वही काम अब प्रिया करे, यही चाहती हो तुम.’’

‘‘आप बिलकुल बेसिरपैर का इलजाम मुझ पर लगा रही हैं. जरा सोचसमझ कर बोलिए, नहीं तो हम इस घर में फिर कभी कदम नहीं रखेंगे.’’

शारदा ने किसी अन्य के बोलने से पहले ही ऊंची आवाज में सब से शांत होने की प्रार्थना की, पर उन की बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

सिवा प्रमोद के हर व्यक्ति इस झगड़े में भागीदारी कर रहा था. शिकायत, नाराजगी, गुस्से व नफरत के भावों ने कमरे का माहौल बेहद दूषित कर दिया था. किसी को फ्रिक नहीं थी कि उस वक्त कड़वी, तीखी व जहरीली जबान से वे जो जख्म दूसरों के दिलों पर लगा रहे थे, वह शायद कभी न भरे.

अपनी देवरानी और उस की भाभी से उलझते हुए अचानक सीमा अपने माथे पर हाथ मारते हुए दुखी लहजे में बोली, ‘‘पता नहीं किस मनहूस घड़ी में इस घर का रिश्ता तुम्हारे घर से जुड़ा था. तुम्हारे आने से घर की सुखशांति हमेशा के लिए नष्ट हो गई है.’’

प्रिया से पहले उस के भाई प्रमोद ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया प्रकट की, ‘‘इतने ही दुखी हो अगर आप सब मेरी बहन से, तो अलग कर दीजिए उसे घर से. जो अच्छा घर मिला है वह नवीन की वजह से ही है.’’

‘यही तो प्रिया चाहती है,’’ सीमा चुभते लहजे में बोली, ‘‘अपनी पगार के घमंड के कारण इस ने कभी इस घर को अपना घर नहीं समझा. कभी बड़ों की इज्जत नहीं की. यह तो सोच कर ही आई थी कि जल्दी से जल्दी अलग हो जाएगी.’’

‘‘भाभी, सचाई तो यह है कि मैं आप को पहले दिन से ही कभी फूटी आंख नहीं भाई. मुझ से जलती रही हैं आप,’’ प्रिया की आंखों से नफरत के भाव झलके.

प्रमोद ने खड़े हो कर ऊंची आवाज में शारदा से कहा, ‘‘आंटी, आज यह बिलकुल साफ हो गया है कि आप की दोनों बहुएं साथसाथ कभी सुखशांति से नहीं रह पाएंगी. मेरी सलाह है कि आप प्रिया और नीरज को घर से अलग कर दें.’’

‘‘तुम्हारे कहने से दे दी हम ने इन्हें अलग होने की इजाजत,’’ पार्क से लौटे उमाकांत की गंभीर आवाज ने कमरे में उपस्थित हर व्यक्ति को चौंका कर चुप कर दिया था.

उमाकांतजी के पूछने पर प्रिया ने अपने कीमती मोबाइल के चोरी हो जाने की बात उन्हें बता दी. उमाकांत भी बेचारे से थे. उन्हें छोटी सी पैंशन मिलती थी.

‘‘तुम ने रवि पर शक क्यों किया? क्या उस ने पहले कभी हमारे घर से कुछ चुराया है?’’ उमाकांतजी ने सवाल किया.

“रवि के अलावा और कौन चोर हो सकता है?” प्रिया दब कर चुप नहीं रही और अपना शक उन्हें बता दिया. कमाऊ पति की पत्नी का गरूर तो आ ही जाता था. जितनी आमदनी नवीन की थी, घर में किसी की नहीं थी.

‘‘नीरज, क्या इस बात को मुद्दा बना कर तुम घर से अलग होना चाहते हो?’’ उमाकांतजी ने अपने छोटे बेटे से सीधेसीधे यह सवाल पूछ लिया.

नीरज ने झिझकते हुए जवाब दिया, ‘‘पापा, रोजरोज के झगड़ों की जड़ काटने का हमें यह ही तरीका समझ आता है.’’

‘‘इस कारण तुम्हारी मां और मुझे जो दुख होगा, उस पर गौर किया है तुम ने?’’

‘‘पापा, ये लोग आसपास ही तो रहेंगे.’’

‘‘पर दिलों के बीच दूरियां तो बढ़ ही जाएंगी. दोनों भाई साथ रह कर तो एकदूसरे के काम आते ही रहोगे. कभी झगड़ा होगा, तो कभी प्यार से हंसनेबोलने के मौके भी तो मिलेंगे. तुम दोनों नौकरी करते हो. कल को तुम्हारे बच्चों की देखभाल सीमा से बेहतर कौन करेगा? तुम दोनों के कारण यह घर आर्थिक रूप से ज्यादा मजबूत हो सकता है. मेरी समझ से तुम्हारा घर से अलग होना ठीक नहीं है,’’ उन्होंने अपने छोटे बेटे को गंभीर लहजे में साथ रहने के फायदे गिनाए.

नीरज के बजाय उस के साले ने जवाब दिया, ‘‘अंकल, आप की सब बातें ठीक हैं पर सचाई तो यह है कि हर इंसान अपनीअपनी झंझटों में उलझा हुआ है. किसी दूसरे का किसी दूसरे से उस का खून का रिश्ता भी हो सकता है. भला करने का न उस के पास समय है, न इच्छाशक्ति. इस मामले में नीरज मुझ से बात करता रहा है. मेरी मानें तो आप बड़े भाई भाभी को घर से अलग हो ही जाने दें. इसी में सब की भलाई है.’’

‘‘तुम क्या कहते हो, नवीन?’’ उमाकांतजी ने बड़े बेटे से पूछा.

‘‘किसी की बातों में आ कर नीरज को घर नहीं छोडऩा चाहिए,” नवीन ने भाईपना जताते हुए अपनी राय बता दी.’’

‘‘तुम्हारी राय क्या है?’’ वे अपनी पत्नी की तरफ घूमे.

‘‘अगर ये दोनों बहुए प्रेम से मिलजुल कर नहीं रह सकती हैं, तो बड़ी बहू को जाने दो,’’ शारदा का गला भर आया.

कुछ देर सोचविचार करने के बाद उमाकांतजी ने अपना फैसला सुना दिया, ‘‘मेरी समझ से प्रिया अलग होने का पक्का मन बना चुकी है. किसी को जबरदस्ती रोकना रातदिन के क्लेश को निमंत्रण देना होगा. ठीक है प्रिया, तुम दोनों अलग हो सकते हो.’’

वे थकेहारे अंदाज में उठ कर जाने लगे तो नवीन ने परेशान से लहजे में कहा, ‘‘पापा, नया फ्लैट किराए पर लेने के लिए मुझे रुपयों की जरूरत पड़ेगी.’’

‘‘मेरे पास तो बैंक में कुछ है नहीं. और यह बात तुम सब को मालूम भी है. यह मकान भी नीरज की बदौलत है. हम लोग तो पहले कच्चे मकानों में रहते थे.’’

‘‘लेकिन अंकल, यह तो सोचिए कि नवीन नया मकान किराए पर कैसे लेगा,’’ प्रमोद ने उत्तेजित हो कर पूछा.

‘‘यह सब सोचना मेरी समस्या नहीं है,” उमाकांतजी ने रुखाई से जवाब दिया.

सीमा और नवीन को अब आफत नजर आने लगी. नीरज ने कई कंपीटिशनों में आरक्षण का फायदा ले कर ऊपरी कमाई वाली नौकरी पा ली थी. उधर, सीमा को सदा लगता था कि वह जेठानी है और प्रिया या नीरज के एहसानों को मानने को वह तैयार न थी.

उसे समझ आ रहा था कि प्रिया ने यह नाटक खेला है पर वह कर क्या सकती थी. उस ने अपने पुराने मोबाइल से रवि को सारी बात बताई तो रवि को समझ आया कि वह तो मोहरा था. उस ने कहा, ‘‘दीदी, आप 4 दिन का समय मांग लो, फिर मैं देखता हूं क्या कर सकता हूं.’’

रवि कोई गुंडा-चोर तो नहीं था पर उस के दोस्तों में से कुछ शातिर थे. उस ने उन के साथ मिल कर एक प्लान बनाया.

2 दिनों बाद सुबहसुबह दरवाजे पर 5-7 पुलिसमेन खड़े थे. एक ने कहा, ‘‘नीरज कौन है, उसे बुलाओ.”

नवीन बाहर आया और बोला, “इंस्पैक्टर साहब, बात क्या है?”

इंस्पैक्टर अकड़ कर बोला, ‘‘तू कौन?’’

नवीन ने कहा, ‘‘मैं नीरज का बड़ा भाई हूं.’’

इंस्पैक्टर घुडक़ा, ‘‘तो फिर नीरज को भेज न. उस के खिलाफ वारंट है.’’

वारंट का नाम सुनते ही सब के चेहरे पर हवाइयां उडऩे लगीं. नीरज की ऊपर की कमाई थी, यह सब को मालूम था. किस ने शिकायत की होगी, यह पता नहीं चल सकता.

नीरज निकल कर आया. इंस्पैक्टर ने कहा, ‘‘तो तुम हो नीरज. बच्चू चलो अब थाने, आगे की बात वहीं होगी.’’

इतने में नवीन बोल पड़ा, ‘‘इंस्पैक्टर साहब, आप कुछ देर तो रुकिए. इसे कपड़े बदलने दें. नाश्ता कर ले, आप सब लोग भी नाश्ता तो कर लें.’’

इंस्पैक्टर ने कहा, ‘‘हमारा फर्ज तो यही है कि मुजरिम को देखते ही गिरफ्तार कर लें पर तुम कहते हो तो नाश्ता करने देते हैं.’’

सब के लिए नाश्ता बनने लगा. 5 लोग पुलिस वाले थे.

इतने में रवि भागता हुआ आया, पूछा, ‘‘क्या हुआ, आप लोग कौन हैं?’’

इंस्पैक्टर रुखार्ई से बोला, “अबे तू कौन. क्यों कानूनी काम में दखल दे रहा है?”

नवीन ने साले को सारी बात बताई. वह बोला, ‘‘ठीक है, मैं अभी आया.’’ और वह बाहर जा कर बात करने लगा.

फिर अंदर आ कर इंस्पैक्टर से बोला, ‘‘आप रामकुमार यादव, एसआई हैं न.’’

इंस्पैक्टर ने कहा, ‘‘हां, तो?’’

रवि ने फोन इंस्पैक्टर को देते हुए कहा, ‘‘प्लीज बात कर लें.’’

इंस्पैक्टर ने बात शुरू की, फिर वह खड़ा हो कर बात करने लगा. ‘‘जी, जनाब, जी नहीं. जी हां, हमें क्या मालूम था कि अपने लोग हैं. ठीक है जनाब.”

फोन लौटाते हुए उस ने कहा, ‘‘प्रिया कौन है?’’ प्रिया पीछे खड़ी थी. उसे अंदाजा नहीं था कि नीरज की ही मुसीबत आ जाएगी.

‘‘जी, मैं,’’ हकलाती हुई वह बोली.

‘‘तुम्हारा मोबाइल चोरी हुआ है न.’’

‘‘जी हां, 2 दिनों से नहीं मिल रहा. नीरज और प्रिया दोनों एकसाथ बोले.’’

‘‘तो ठीक है, मुझे तलाशी लेने दो. वह भी ऊपर की कमाई का रहा होगा न. तुम दोनों का कमरा कौन सा है?’’

अब तो प्रिया रोने लगी दहाड़े मारमार कर. कभी इस भगवान को याद करती, कभी उस अल्लाह को. उसे यही सिखाया गया था कि पूजा करने से आफत खत्म हो जाती है.

इंस्पैक्टर आराम से परोसे परांठे खाने लगा था. बाकी 4 भी यही कर रहे थे.

थूक अटक कर फिर प्रिया बोली, ‘‘मेरा मोबाइल चोरी नहीं हुआ है.’’ सोफे के नीचे से निकाल कर उस ने दिखाया.

इंस्पैक्टर ने बिना देखे कहा, ‘‘लो भई, हमारा नाश्ता हो गया, तुम्हारा मोबाइल  मिल गया. दहिया साहब की रवि से जानपहचान की वजह से यह मामला भी रफादफा कर देंगे.”

अब नीरज फट पड़ा, ‘‘तुम भी अजीब औरत हो. किसी पर इलजाम लगा कर इतनी साजिश कैसे कर सकती हो. जाओ, रवि से माफी मांगो.’’ नीरज के गुस्से को भांप कर प्रिया फौरन उठी और अपनी जेठानी और रवि से माफी मांगने के लिए उन के कमरे की तरफ  बढ़ गई.

प्रमोद के इशारे पर वंदना भी प्रिया के पीछेपीछे ड्राइंगरूम से अंदर की ओर चली गई. उन के बाहर जाते ही माहौल बदल गया. उमाकांतजी ने अपने दोनों हाथ हवा में विजयी अंदाज में उठाए और प्रसन्न स्वर में कहा, “हमारी योजना सफल हो गई.” प्रमोद अपनी बहन से बोला, “छोटी भाभी की अलग होने की जिद अब ख़त्म हो जाएगी. लेकिन हां, हमआप सभी को इस बात का बहुत ध्यान रखना होगा कि प्रिया या अन्य किसी बाहरी व्यक्ति को हमारी मिलीभगत का पता न चले. मेरा दांव काम आया, यह बड़ी बात है.

उमाकांतजी ने उठ कर प्रमोद को गले से लगाया और आभार प्रकट किया, “बेटा, तुम बहुत समझदार इंसान हो. तुम साथ न देते तो हमारा संयुक्त परिवार टूट जाता. वक्त के साथ रिश्तों में बदलाव आता है. मुझे यकीन है कि आने वाले समय में प्रिया भी हम सब के साथ प्यार व अपनेपन की मजबूत डोर से बंध जाएगी. तुम उस की बिलकुल फ़िक्र मत करना. वह और उस का हित इस घर में पूरी तरह सुरक्षित है.”

उमाकांत और शारदा से आशीर्वाद लेने के बाद प्रमोद नवीन और नीरज से गले मिला. सभी के दिलों में ख़ुशी, संतोष और सुरक्षा को दर्शाने वाली मुसकान उन सभी के होंठों पर नाच रही थी.

Emotional Story : अंधेरे की छाया – किसने महेंद्र व प्रमिला की मदद की?

Emotional Story : महेंद्र सिंह ने अपनी पत्नी प्रमिला के कमरे में झांक कर देखा. अंदर पासपड़ोस की 5-6 महिलाएं बैठी थीं. वे न केवल प्रमिला का हालचाल पूछने आई थीं बल्कि उस से इसलिए भी बतिया रही थीं कि उस की दिलजोई होती रहे. जब से प्रमिला फालिज की शिकार हुई थी, महल्ले के जानपहचान वालों ने अपना यह रोज का क्रम बना लिया था कि 2-4 की टोलियों में सुबह से शाम तक उस का मन बहलाने के लिए उस के पास मौजूद रहते थे. पुरुष नीचे बैठक में महेंद्र सिंह के पास बैठ जाते थे औैर औरतें ऊपर प्रमिला के कमरे में फर्श पर बिछी दरी पर विराजमान रहती थीं.

वे लोग प्रमिला एवं महेंद्र की प्रत्येक छोटीबड़ी जरूरतों का ध्यान रखते थे. महेंद्र को पिछले 3-4 महीनों के दौरान उसे कुछ कहना या मांगना नहीं पड़ा था. आसपास मौजूद लोग मुंह से निकलने से पहले ही उस की जरूरत का एहसास कर लेते थे और तुरंत इस तरह उस की पूर्ति करते थे मानो वे उस घर के ही लोग हों. उस समय भी 2 औरतें प्रमिला की सेवाटहल में लगी थीं. एक स्टोव पर पानी गरम कर रही थी ताकि उसे रबर की थैली में भर कर प्रमिला के सुन्न अंगों का सेंक किया जा सके. दूसरी औरत प्रमिला के सुन्न हुए अंगों की मालिश कर रही थी ताकि पुट्ठों की अकड़न व पीड़ा कम हो. कमरे में झांकने से पहले महेंद्र सिंह ने सुना था कि प्रमिला वहां बैठी महिलाओं से कह रही थी, ‘‘तुम देखना, मेरा गौरव मेरी बीमारी का पत्र मिलते ही दौड़ादौड़ा चला आएगा. लाठी मारे से पानी जुदा थोड़े ही होता है. मां का दर्द उसे नहीं आएगा तो किस को आएगा? मेरी यह दशा देख कर वह मुझे पीठ पर उठाएउठाए फिरेगा. तुरंत मुझे दिल्ली ले जाएगा और बड़े से बड़े डाक्टर से मेरा इलाज कराएगा.’’ महेंद्र के कमरे में घुसते ही वहां मौन छा गया था. कोई महिला दबी जबान से बोली थी, ‘‘चलो, खिसको यहां से निठल्लियो, मुंशीजी चाची से कुछ जरूरी बातें करने आए हैं.’’ देखतेदेखते वहां बैठी स्त्रियां उठ कर कमरे के दूसरे दरवाजे से निकल गईं. महेंद्र्र ऐेनक ठीक करता हुआ प्रमिला के पलंग के समीप पहुंचा. उस ने बिस्तर पर लेटी हुई प्रमिला को ध्यान से देखा.

शरीर के पूरे बाएं भाग पर पक्षाघात का असर हुआ था. मुंह पर भी हलका सा टेढ़ापन आ गया था और बोलने में जीभ लड़खड़ाने लगी थी. महेंद्र प्रमिला से आंखें चार होते ही जबरदस्ती मुसकराया था और पूछा था, ‘‘नए इंजेक्शनों से कोई फर्क पड़ा?’’ ‘‘हां जी, दर्द बहुत कम हो गया है,’’ प्रमिला ने लड़खड़ाती आवाज में जवाब दिया था और बाएं हाथ को थोड़ा उठा कर बताया था, ‘‘यह देखो, अब तो मैं हाथ को थोड़ा हरकत दे सकती हूं. पहले तो दर्द के मारे जोर ही नहीं दे पाती थी.’’ ‘‘और टांग?’’ ‘‘यह तो बिलकुल पथरा गई है. जाने कब तक मैं यों ही अपंगों की तरह पलंग पर पड़ी रहूंगी.’’ ‘‘बीमारी आती हाथी की चाल से है औैर जाती चींटी की चाल से है. देखो, 3 महीने के इलाज से कितना मामूली अंतर आया है, लेकिन अब मैं तुम्हारा और इलाज नहीं करा सकता. सारा पैसा खत्म हो चुका है. तमाम जेवर भी ठिकाने लग गए हैं. बस, 50 रुपए और तुम्हारे 6 तोले के कंगन और चूडि़यां बची हैं.’’ ‘‘हां,’’ प्रमिला ने लंबी सांस ली, ‘‘तुम तो पहले ही बहुत सारा रुपया गौरव और उस के बच्चों के लिए यह घर बनाने में लगा चुके थे. पर वे नहीं आए. अब मेरी बीमारी की सुन कर तो आएंगे. फिर मेरा गौरव रुपयों का ढेर…’’ ‘‘नहीं, मैं और इंतजार नहीं कर सकता,’’ महेंद्र बाहर जाते हुए बोला, ‘‘तुम इंतजार कर लो अपने बेटे का. मैं डा. बिहारी के पास जा रहा हूं, कंपाउंडर की नौकरी के लिए…’’ ‘‘तुम करोगे वही जो तुम्हारे मन में होगा,’’ प्रमिला चिढ़ कर बोली, ‘‘आने दो गौरव को, एक मिनट में छुड़वा देगा वह तुम्हारी नौकरी.’’ ‘‘आने तो दें,’’ महेंद्र बाहर निकल कर जोर से बोला, ‘‘लो, सलमा बाजी और उन की बहुएं आ गई हैं तुम्हारी सेवा को.’’ ‘‘हांहां तुम जाओ, मेरी सेवा करने वाले बहुत हैं यहां. पूरा महल्ला क्या, पूरा कसबा मेरा परिवार है. अच्छी थी तो मैं इन सब के घरों पर जा कर सिलाईकढ़ाई सिखाती थी. कितना आनंद आता था दूसरों की सेवा में. ऐसा सुख तो अपनी संतान की सेवा में भी नहीं मिलता था.’’ ‘‘हां, प्रमिला भाभी,’’ सलमा ने अपनी दोनों बहुओं के साथ कमरे में आ कर आदाब किया और प्रमिला की बात के जवाब में बोली, ‘‘तुम से ज्यादा मुंशीजी को मजा आता था दूसरों की खिदमत में.

अपनी दवाओं की दुकान लुटा दी दीनदुखियों की सेवा में. डाक्टरों का धंधा चौपट कर रखा था इन्होंने. कहते थे गौरव हजारों रुपया महीना कमाता है, अब मुझे दुकान की क्या जरूरत है. बस, गरीबों की खिदमत के लिए ही खोल रखी है. वरना घर बैठ कर आराम करने के दिन हैं.’’ ‘‘ठीक कहती हो, बाजी,’’ प्रमिला का कलेजा फटने लगा, ‘‘क्या दिन थे वे भी. कैसा सुखी परिवार था हमारा.’’ कभी महेंद्र और प्रमिला का परिवार बहुत सुखी था. दुख तो जैसे उन लोगों ने देखा ही नहीं था. जहां आज शानदार गौरव निवास खड़ा है वहां कभी 2 कमरों का एक कच्चापक्का घर था. महेंद्र का परिवार छोटा सा था. पतिपत्नी और इकलौता बेटा गौरव. महेंद्र की स्टेशन रोड पर दवाओं की दुकान थी, जिस से अच्छी आय थी. उसी आय से उन्होंने गौरव को उच्च शिक्षादीक्षा दिला कर इस योग्य बनाया था कि आज वह दिल्ली में मुख्य इंजीनियर है. अशोक विहार में उस की लाखों की कोठी है. वह देश का हाकी का जानामाना खिलाड़ी भी तो था. बड़ेबडे़ लोगों तक उस की पहुंच थी और आएदिन देश की विख्यात पत्रपत्रिकाओं में उस के चर्चे होते रहते थे. गौरव ने दिल्ली में नौकरी मिलने के साथ ही अपनी एक प्रशंसक शीला से शादी कर ली थी. महेंद्र व प्रमिला ने सहर्ष खुद दिल्ली जा कर अपने हाथों से यह कार्य संपन्न किया था. शीला न केवल बहुत सुंदर थी बल्कि बहुत धनवान एवं कुलीन घराने से थी. बस, यहीं वे चूक गए. चूंकि शादी गौरव एवं शीला की सहमति से हुई थी, इसलिए वे महेंद्र और प्रमिला को अपनी हर बात से अलग रखने लगे. यहां तक कि शीला शादी के बाद सिर्फ एक बार अपनी ससुराल नसीराबाद आई थी.

फिर वह उन्हें गंवार और उन के घर को जानवरों के रहने का तबेला कह कर दिल्ली चली गई थी. पिछले 15 वर्षों में उस ने कभी पलट कर नहीं झांका था. महेंद्र और प्रमिला पहले तो खुद भी ख्ंिचेखिंचे रहे थे, लेकिन जब उन के पोता और पोती शिखा औैर सुदीप हो गए तो वे खुद को न रोक सके. किसी न किसी बहाने वे बहूबेटे के पास दिल्ली पहुंच जाते. गौरव और शीला उन का स्वागत करते, उन्हें पूरा मानसम्मान देते. लेकिन 2-4 दिन बाद वे अपने बड़प्पन के अधिकारों का प्रयोग शुरू कर देते, उन के निजी जीवन में हस्तक्षेप करना शुरू कर देते. वे उन्हें अपने फैसले मानने और उन की इच्छानुसार चलने पर विवश करते. यहीं बात बिगड़ जाती. संबंध बोझ लगने लगते और छोटीछोटी बातों को ले कर कहासुनी इतनी बढ़ जाती कि महेंद्र और प्रमिला को वहां से भागना पड़ जाता. प्रमिला और महेंद्र आखिरी बार शीला के पिता की मृत्यु पर दिल्ली गए थे. तब शिखा और सुदीप क्रमश: 10 और 8 वर्ष के हो चुके थे.

उन के मन में हर बात को जानने और समझने की जिज्ञासा थी. उन्होंने दादादादी से बारबार आग्रह किया था कि वे उन्हें अपने कसबे ले जाएं ताकि वे वहां का जीवन व रहनसहन देख सकें. गौरव के दिल में मांबाप के लिए बहुत प्यार व आदर था. उस ने घर ठीक कराने के लिए शीला से छिपा कर मां को 10 हजार रुपए दे दिए ताकि शीला को बच्चों को ले कर वहां जाने में कोई आपत्ति न हो. परंतु प्रमिला की असावधानी से बात खुल गई. सासबहू में महाभारत छिड़ गया और एकदूसरे की शक्ल न देखने की सौगंध खा ली गई. परंतु नसीराबाद पहुंचते ही प्रमिला का क्रोध शांत हो गया. वह पोतापोती और गौरव को नसीराबाद लाने के लिए मकान बनवाने लगी. गृहप्रवेश के दिन वे नहीं आए तो प्रमिला को ऐसा दुख पहुंचा कि वह पक्षाघात का शिकार हो गईर् औैर अब प्रमिला को चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा दीख रहा था.

महेंद्र डा. बिहारी के यहां से लौटा तो अंधेरा हो चुका था. पर घर का दृश्य देख कर वह हक्काबक्का रह गया. प्रमिला का कमरा अड़ोसपड़ोस के लोगों से भरा हुआ था. प्रमिला अपने पलंग पर रखी नोटों की गड्डियां उठाउठा कर एक अजनबी आदमी पर फेंकती हुई चीख रही थी, ‘‘ले जाओ इन को मेरे पास से और उस से कहना, न मुझे इन की जरूरत है, न उस की.’’ आदमी नोट उठा कर बौखलाया हुआ बाहर आ गया था. उसे भीतर खड़े लोगों ने जबरदस्ती बाहर धकेल दिया था. कमरे से कईकई तरह की आवाजें आ रही थीं. ‘‘जाओ, भाई साहब, जाओ. देखते नहीं यह कितनी बीमार हैं.’’ ‘‘रक्तचाप बढ़ गया तो फिर कोई नई मुसीबत खड़ी हो जाएगी. जल्दी निकालो इन्हें यहां से.’’ और 2 लड़के उस आदमी को बाजुओं से पकड़ कर जबरदस्ती बाहर ले गए. वह अजनबी महेंद्र से टकरताटकराता बचा था. महेंद्र ने भी गुस्से में पूछा था, ‘‘कौन हो तुम?’’ ‘‘मैं गौरव का निजी सहायक हूं, जगदीश. साहब ने ये 50 हजार रुपए भेजे हैं और यह पत्र.’’ महेंद्र ने नोटोें को तो नहीं छुआ, लेकिन जगदीश के हाथ से पत्र ले लिया. पत्र को पहले ही खोला जा चुका था और शायद पढ़ा भी जा चुका था. महेंद्र ने तत्काल फटे लिफाफे से पत्र निकाल कर खोला. पत्र गौरव ने लिखा था: पूज्य पिताजी एवं माताजी, सादर प्रणाम, आप का पत्र मिला. माताजी के बारे में पढ़ कर बहुत दुख हुआ. मन तो करता है कि उड़ कर आ जाऊं, मगर मजबूरी है. शीला और बच्चे इसलिए नहीं आ सकते, क्योंकि वे परीक्षा की तैयारी में लगे हैं. मैं एशियाड के कारण इतना व्यस्त हूं कि दम लेने की भी फुरसत नहीं है. बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर ये चंद पंक्तियां लिख रहा हूं. मैं समय मिलते ही आऊंगा. फिलहाल अपने सहायक को 50 हजार रुपए दे कर भेज रहा हूं ताकि मां का उचित इलाज हो सके. आप ने लिखा है कि आप ने हर तरफ से पैसा समेट कर नए मकान के निर्माण में लगा दिया है, जो बचा मां की बीमारी खा गईर्.

यह आप ने ठीक नहीं किया. बेकार मकान बनवाया, हम लोगों के लिए वह किसी काम का नहीं है. हम कभी नसीराबाद आ कर नहीं बसेंगे. मां की बीमारी पर भी व्यर्थ खर्च किया. पक्षाघात के रोग का कोई इलाज नहीं है. मैं ने कईर् विशेषज्ञ डाक्टरों से पूछा है. उन सब का यही कहना है मां को अधिकाधिक आराम दें. यही इलाज है इस रोग का. मां को दिल्ली लाने की भूल तो कभी न करें. यात्रा उन के लिए बहुत कष्टदायक होगी. रक्तचाप बढ़ गया तो दूसरा आक्रमण जानलेवा सिद्ध होगा. एक्यूपंक्चर विधि से भी इस रोग में कोई लाभ नहीं होता. सब धोखा है… महेंद्र इस से आगे न पढ़ सका. उस का मन हुआ कि उस पत्र को लाने वाले के मुंह पर दे मारे. लेकिन उस में उस का क्या दोष था. उस ने बड़ी कठिनाई से अपने को संभाला और जगदीश को पत्र लौटाते हुए कहा, ‘‘आप उस से जा कर वही कहिए जो उसे जन्म देने वाली ने कहा है. मेरी तरफ से इतना और जोड़ दीजिए कि हम तो उस के लिए मरे हुए ही थे, आज से वह हमारे लिए मर गया.

काश, वह पैदा होते ही मर जाता.’’ जगदीश सिर झुका कर चला गया. महेंद्र प्रमिला के कमरे में घुसा. उस ने देखा कि वहां सब लोग मुसकरा रहे थे. प्रमिला की आंखें भीग रही थीं, लेकिन उस के होंठ बहुत दिनों के बाद हंसना चाह रहे थे. महेंद्र ने प्रमिला के पास जाते हुए कहा, ‘‘तुम ने बिलकुल ठीक किया, पम्मी.’’ तभी बिजली चली गई. कमरे में अंधेरा छा गया. प्रमिला ने देखा कि अंधेरे में खड़े लोगों की परछाइयां उस के समीप आती जा रही हैं. कोई चिल्लाया, ‘‘अरे, कोई मोमबत्ती जलाओ.’’ ‘‘नहीं, कमरे में अंधेरा रहने दो,’’ प्रमिला तत्काल चीख उठी, ‘‘यह अंधेरा मुझे अच्छा लग रहा है. कहते हैं कि अंधेरे में साया भी साथ छोड़ देता है. मगर मेरे चारों तरफ फैले अंधेरे में तो साए ही साए हैं. मैं हाथ बढ़ा कर इन सायों का सहारा ले सकती हूं,’’ प्रमिला ने पास खड़े लोगों को छूना शुरू किया, ‘‘अब मुझे अंधेरे से डर नहीं लगता, अंधेरे में भी कुछ साए हैं जो धोखा नहीं हैं, ये साए नहीं हैं बल्कि मेरे अपने हैं, मेरे असली संबंधी, मेरा सहारा…यह तुम हो न जी?’’ ‘‘हां, पम्मी, यह मैं हूं,’’ महेंद्र ने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘तुम्हारे अंधेरों का भी साथी, तुम्हारा साया.’’ ‘‘तुम नौकरी करना डा. बिहारी की. रोगियों की सेवा करना. अपनी संतान से भी ज्यादा सुख मिलता है परोपकार में. मुझे संभालने वाले यहां मेरे अपने बहुत हैं. मैं निचली मंजिल पर सिलाई स्कूल खोल लूंगी, मेरे कंगन औैर चूडि़यां बेच कर सिलाई की कुछ मशीनें ले आना औैर पहियों वाली एक कुरसी ला देना.’’ ‘‘पम्मी.’’ ‘‘हां जी, मेरा एक हाथ तो चलता है. ऊपर की मंजिल किराए पर उठा देना. वह पैसा भी मैं अपने इन परिवार वालों की भलाई पर खर्च करना चाहती हूं. हमारे मरने के बाद हमारा जो कुछ है, इन्हें ही तो मिलेगा.’’ एकाएक बिजली आ गई. कमरे में उजाला फैल गया. सब के साथ महेंद्र ने देखा था कि प्रमिला अपने एक हाथ पर जोर लगा कर उठ बैठी थी. इस से पहले वह सहारा देने पर ही बैठ पाती थी. महेंद्र ने खुशी से छलकती आवाज में कहा, ‘‘पम्पी, तुम तो बिना सहारे के उठ बैठी हो.’’ ‘‘हां, इनसान को झूठे सहारे ही बेसहारा करते हैं.

मैं इस आशा में पड़ी रही कि कोई आएगा, मुझे अपनी पीठ पर उठा कर ले जाएगा औैर दुनिया के बड़े से बड़े डाक्टर से मेरा इलाज कराएगा. मेरा यह झूठा सहारा खत्म हो चुका है. मुझे सच्चा सहारा मिल चुका है…अपनी हिम्मत का सहारा. फिर मुझे किस बात की कमी है? मेरा इतना बड़ा परिवार जो खड़ा है यहां, जो जरा से पुकारने पर दौड़ कर मेरे चारों ओर इकट्ठा हो जाता है.’’ यह सुन कर महेंद्र की छलछलाई आंखें बरस पड़ीं. उसे रोता देख कर वहां खड़े लोगों की आंखें भी गीली होने लगीं. महेंद्र आंसुओं को पोंछते हुए सोच रहा था, ‘ये कैसे दुख हैं, जो बूंद बन कर मन की सीप में टपकते हैं और प्यार व त्याग की गरमी पा कर खुशी के मोती बन जाते हैं.

Hindi Kahani : मेरा बच्चा मेरा प्यार – मिस्टर ऐंड मिसेज कोहली को कैसे हुआ एहसास

Hindi Kahani : ‘‘बच्चे का रक्त दूषित है,’’ वरिष्ठ बाल विशेषज्ञ डा. वंदना सरीन ने लैबोरेटरी से आई ब्लड सैंपल की रिपोर्ट पढ़ने के बाद कहा. एमबीबीएस कर रहे अनेक प्रशिक्षु छात्रछात्राएं उत्सुकता से मैडम की बात सुन रहे थे. जिस नवजात शिशु की ब्लड रिपोर्ट थी वह एक छोटे से पालने के समान इन्क्यूबेटर में लिटाया गया था. उस के मुंह में पतली नलकी डाली गई थी जो सीधे आमाशय में जाती थी. बच्चा कमजोरी के चलते खुराक लेने में अक्षम था. हर डेढ़ घंटे के बाद ग्लूकोस मिला घोल स्वचालित सिस्टम से थोड़ाथोड़ा उस के पेट में चला जाता था. इन्क्यूबेटर में औक्सीजन का नियंत्रित प्रवाह था. फेफड़े कमजोर होने से सांस न ले सकने वाला शिशु सहजता से सांस ले सकता था.

बड़े औद्योगिक घराने के ट्रस्ट द्वारा संचालित यह अस्पताल बहुत बड़ा था. इस में जच्चाबच्चा विभाग भी काफी बड़ा था. आयु अवस्था के आधार पर 3 बड़ेबड़े हौल में बच्चों के लिए 3 अलगअलग नर्सरियां बनी थीं. इन तीनों नर्सरियों में 2-4 दिन से कुछ महीनों के बच्चों को हौल में छोटेछोटे थड़ेनुमा सीमेंट के बने चबूतरों पर टिके अत्याधुनिक इन्क्यूबेटरों में फूलों के समान रखा जाता था. तीनों नर्सरियों में कई नर्सें तैनात थीं. उन की प्रमुख मिसेज मार्था थीं जो एंग्लोइंडियन थीं. बरसों पहले उस के पति की मृत्यु हो गई थी. वह निसंतान थी. अपनी मातृत्वहीनता का सदुपयोग वह बड़ेबड़े हौल में कतार में रखे इनक्यूबेटरों में लेटे दर्जनों बच्चों की देखभाल में करती थी. कई बार सारीसारी रात वह किसी बच्चे की सेवाटहल में उस के सिरहाने खड़ी रह कर गुजार देती थी. उस को अस्पताल में कई बार जनूनी नर्स भी कहा जाता था.

मिसेज मार्था के स्नेहभरे हाथों में कुछ खास था. अनेक बच्चे, जिन की जीने की आशा नहीं होती थी, उस के छूते ही सहजता से सांस लेने लगते या खुराक लेने लगते थे. अनेक लावारिस बच्चे, जिन को पुलिस विभाग या समाजसेवी संगठन अस्पताल में छोड़ जाते थे, मिसेज मार्था के हाथों नया जीवन पा जाते थे. मिसेज मार्था कई बार किसी लावारिस बच्चे को अपना वारिस बनाने के लिए गोद लेने का इरादा बना चुकी थी. मगर इस से पहले कोई निसंतान दंपती आ कर उस अनाथ या लावारिस को अपना लेता था. मिसेज मार्था स्नेहपूर्वक उस बच्चे को आशीष दे, सौंप देती. वरिष्ठ बाल विशेषज्ञ डा. वंदना सरीन दिन में 3 बार नर्सरी सैक्शन का राउंड लगाती थीं. उन को मिसेज मार्था के समान नवशिशु और आंगनवाटिका में खिले फूलों से बहुत प्यार था. दोनों की हर संभव कोशिश यही होती कि न तो वाटिका में कोई फूल मुरझाने पाए और न ही नर्सरी में कोई शिशु. डा. वंदना सरीन धीमी गति से चलती एकएक इन्क्यूबेटर के समीप रुकतीं, ऊपर के शीशे से झांकती. रुई के सफेद फाओं के समान सफेद कपड़े में लिपटे नवजात शिशु, नरमनरम गद्दे पर लेटे थे. कई सो रहे थे, कई जाग रहे थे. कई धीमेधीमे हाथपैर चला रहे थे.

‘‘यह बच्चा इतने संतुलित ढंग से पांव चला रहा है जैसे साइकिल चला रहा है,’’ एक प्रशिक्षु छात्रा ने हंसते हुए कहा. ‘‘हर बच्चा जन्म लेते ही शारीरिक क्रियाएं करने लगता है,’’ मैडम वंदना ने उसे बताया, ‘‘शिशु की प्रथम पाठशाला मां का गर्भ होती है.’’ राउंड लेती हुई मैडम वंदना उस बच्चे के इन्क्यूबेटर के पास पहुंचीं जिस की ब्लड सैंपल रिपोर्ट लैब से आज प्राप्त हुई थी.

‘‘बच्चे को पीलिया हो गया है,’’ वरिष्ठ नर्स मिसेज मार्था ने चिंतातुर स्वर में कहा.

‘‘बच्चे का रक्त बदलना पड़ेगा,’’ मैडम वंदना ने कहा.

‘‘मैडम, यह दूषित रक्त क्या होता है?’’ एक दूसरी प्रशिक्षु छात्रा ने सवाल किया. ‘‘रक्त या खून के 3 ग्रुप होते हैं. ए, बी और एच. 1940 में रक्त संबंधी बीमारियों में एक नया फैक्टर सामने आया. इस को आरएच फैक्टर कहा जाता है.’’ सभी इंटर्न्स और अन्य नर्सें मैडम डा. वंदना सरीन का कथन ध्यान से सुन रहे थे. ‘‘किसी का रक्त चाहे वह स्त्री का हो या पुरुष का या तो आरएच पौजिटिव होता है या आरएच नैगेटिव.’’

‘‘मगर मैडम, इस से दूषित रक्त कैसे बनता है?’’ ‘‘फर्ज करो. एक स्त्री है, उस का रक्त आरएच पौजिटिव है. उस का विवाह ऐसे पुरुष से होता है जिस का रक्त आरएच नैगेटिव है. ऐसी स्त्री को गर्भ ठहरता है तब संयोग से जो भ्रूण मां के गर्भ में है उस का रक्त आरएच नैगेटिव है यानी पिता के फैक्टर का है. ‘‘तब मां का रक्त गर्भ में पनप रहे भू्रण की रक्त नलिकाओं में आ कर उस के नए रक्त, जो उस के पिता के फैक्टर का है, से टकराता है. और तब भ्रूण का शरीर विपरीत फैक्टर के रक्त को वापस कर देता है. मगर अल्पमात्रा में कुछ विपरीत फैक्टर का रक्त शिशु के रक्त में मिल जाता है.’’ ‘‘मैडम, आप का मतलब है जब विपरीत फैक्टर का रक्त मिल जाता है तब उस को दूषित रक्त कहा जाता है?’’ सभी इंटर्न्स ने कहा.

‘‘बिलकुल, यही मतलब है.’’

‘‘इस का इलाज क्या है?’’

‘‘ट्रांसफ्यूजन सिस्टम द्वारा शरीर से सारा रक्त निकाल कर नया रक्त शरीर में डाला जाता है.’’

‘‘पूरी प्रक्रिया का रक्त कब बदला जाएगा?’’

‘‘सारे काम में मात्र 10 मिनट लगेंगे.’’ ब्लडबैंक से नया रक्त आ गया था. उस को आवश्यक तापमान पर गरम करने के लिए थर्मोस्टेट हीटर पर रखा गया. बच्चे की एक हथेली की नस को सुन्न कर धीमेधीमे बच्चे का रक्त रक्तनलिकाओं से बाहर निकाला गया. फिर उतनी ही मात्रा में नया रक्त प्रविष्ट कराया गया. मात्र 10 मिनट में सब संपन्न हो गया. सांस रोके हुए सब यह क्रिया देख रहे थे. रक्त बदलते ही नवशिशु का चेहरा दमकने लगा. वह टांगें चलाने लगा. सब इंटर्न्स खासकर वरिष्ठ नर्स मिसेज मार्था का उदास चेहरा खिल उठा. शिशु नर्सरी के बाहर उदास बैठे बच्चे के मातापिता मिस्टर ऐंड मिसेज कोहली के चेहरों पर चिंता की लकीरें थीं. ‘अभी मौजमेला करेंगे, बच्चा ठहर कर पैदा करेंगे,’ इस मानसिकता के चलते दोनों ने बच्चा पैदा करने की सही उम्र निकाल दी थी. मिस्टर कोहली की उम्र अब 40 साल थी. मिसेज कोहली 35 साल की थीं. पहला बच्चा लापरवाही के चलते जाता रहा था.

प्रौढ़ावस्था में उन को अपनी क्षणभंगुर मौजमस्ती की निरर्थकता का आभास हुआ था. बच्चा गोद भी लिया जा सकता था. परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया था क्योंकि उन्हें अपना रक्त चाहिए था. उन दोनों के मन में कई तरह के सवाल घूम रहे थे. एक पल उन्हें लगा कि पता नहीं उन का बच्चा बचेगा कि नहीं, उन का वंश चलेगा या नहीं? उन्हें आज अपनी गलती का एहसास हो रहा था कि काश, उन्होंने अपनी मौजमस्ती पर काबू किया होता और सही उम्र में बच्चे की प्लानिंग की होती. हर काम की एक सही उम्र होती है. इसी बीच शिशु नर्सरी का दरवाजा खुला. वरिष्ठ नर्स मिसेज मार्था ने बाहर कदम रखा और कहा, ‘‘बधाई हो मिस्टर कोहली ऐंड मिसेज कोहली. आप का बच्चा बिलकुल ठीक है. कल अपना बच्चा घर ले जाना.’’

दोनों पतिपत्नी ने उठ कर उन का अभिवादन किया. वरिष्ठ नर्स ने उन को अंदर जाने का इशारा किया. पति ने पत्नी की आंखों में झांका, पत्नी ने पति की आंखों में. दोनों की आंखों में एकदूसरे के प्रति प्यार के आंसू थे. दोनों ने बच्चे के साथसाथ एकदूसरे को पा लिया था.

Best Short Story : मैं नहीं हारी – मीनाक्षी को क्यों हुआ मर्द की कमी का एहसास

Best Short Story : ‘’छोड़ दीजिए मुझे,‘‘ आखिर मीनाक्षी गिड़गिड़ाती हुई बोली.

‘‘छोड़ दूंगा, जरूर छोड़ दूंगा,’’ उस मोटे पिलपिले खूंख्वार चेहरे वाले व्यक्ति ने कहा, ‘‘मेरा काम हो जाए फिर छोड़ दूंगा.’’

वह व्यक्ति मीनाक्षी को कार में बैठा कर ले जा रहा था जब वह सहेली के यहां से रात 11 बजे पार्टी से निबट कर अकेली अपने घर जाने के लिए सुनसान सड़क पर औटो की प्रतीक्षा कर रही थी तभी काले शीशे वाली एक कार न जाने कब उस के पास आ कर खड़ी हो गई. वह संभले तब तक कार का दरवाजा खुला और उसे खींच कर कार में बैठा लिया गया. कार अपनी गति से दौड़ रही थी. यह सब अचानक उस के साथ हुआ. जब वह सहेली के यहां से निकली थी, तो उस ने अपने पति धर्मेंद्र को फोन किया था, ‘‘मैं निकल रही हूं,‘‘ तब धर्मेंद्र ने कहा था, ‘‘मैं आ रहा हूं तुम्हें लेने. तुम वहीं रुकना.’’

उस ने इनकार करते हुए कहा था, ‘‘नहीं धर्मेंद्र, मत आना लेने. मैं आ जाऊंगी. औरत को भी खुद पर निर्भर रहने दो. मैं औटो कर के आ जाऊंगी.‘‘

सच, अकेली औरत का रात को घर से बाहर निकलना खतरे को न्योता देना था. इस संदर्भ में कई बार वह धर्मेंद्र को कहती थी कि औरत को अकेली रहने दो. मगर आज उस के जोश की हवा निकल गई थी. उस को किडनैप कर लिया गया था. वह व्यक्ति उस के साथ क्या करेगा? वह उस व्यक्ति से गिड़गिड़ाते हुए बोली, ‘‘मुझे छोड़ दीजिए, मैं आप के हाथ जोड़ती हूं.’’

‘‘मैं तुम्हें छोड़ दूंगा. यह बताओ तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘मीनाक्षी.’’

‘‘पति का नाम?’’

‘‘धर्मेंद्र.’’

‘‘क्या करता है, वह?’’

‘‘नगर निगम में लेखाधिकारी हैं.’’

‘‘उस सुनसान सड़क पर क्या कर रही थी?’’

‘‘सहेली के यहां पार्टी में गई थी. औटो का इंतजार कर रही थी.’’

‘‘झूठ बोल रही है, एक सभ्य औरत रात को अकेली नहीं घूमती. यदि घूमती भी है तो साथ में कोई पुरुष होता है. यह क्यों नहीं कहती कि ग्राहक ढूंढ़ रही थी. निश्चित ही तू वेश्यावृत्ति करती है.’’

‘‘नहींनहीं… मैं वेश्यावृत्ति नहीं करती. मैं सभ्य घराने की महिला हूं.’’

‘‘बकवास बंद कर, यदि सभ्य घराने की होती तो रात को अकेली यों सड़क पर न घूमती. तुझ जैसी सभ्य घराने की औरतें पैसों के लिए आजकल चुपचाप वेश्यावृत्ति करती हैं,’’ उस व्यक्ति ने यह कह कर उसे वेश्या घोषित कर दिया.

वह पछता रही थी कि अकेली रात को क्यों बाहर निकली. फिर भी साहस कर के वह बोली, ‘‘अब आप को कैसे समझाऊं?’’

‘‘मुझे समझाने की कोई जरूरत नहीं. मैं तुझ जैसी औरतों को अच्छी तरह जानता हूं. तुम अपने पति को धोखा दे कर धंधा करती हो. पति को कह दिया, सहेली के यहां जा रही हूं. आज मैं तुम्हारा ग्राहक हूं, समझी,’’ कह कर उस ने कस कर मीनाक्षी का हाथ पकड़ लिया.

अब इस के चंगुल से वह कैसे निकले. कैसे कार से बाहर निकले. उस के भीतर द्वंद्व चलने लगा. इस समय उस के पांव पूरी तरह खुले थे. बस, पांवों का ही इस्तेमाल कर सकती है. उस ने चौराहे के पहले स्पीडब्रेकर को देख उस की जांघों के बीच जम कर लात दे मारी. खिड़की से टकरा कर उस का हाथ छूट गया. तत्काल उस ने दरवाजा खोला और कूद पड़ी.

जिस सड़क पर वह गिरी वहां 3-4 लोग खड़े थे. इस तरह फिल्मी दृश्य देख कर वे हतप्रभ रह गए. वे दौड़ कर उस के पास आए. उसे चोट तो जरूर लगी, मगर वह सुरक्षित थी. उन में से एक व्यक्ति बोला, ‘‘उस कार वाले ने गिराया.’’

‘‘नहीं,’’ वह हांफती हुई बोली.

‘‘क्या खुद गिरी?’’ दूसरे व्यक्ति ने पूछा.

‘‘हां,’’ कह कर उस ने केवल सिर हिलाया.

‘‘मगर क्यों गिरी?’’ तीसरे ने पूछा.

‘‘उस व्यक्ति ने मेरा किडनैप किया था.’’

‘‘कहां से किया?’’ चौथे व्यक्ति ने पूछा.

‘‘आजाद चौक से,’’ उस ने उत्तर दे कर सड़क की तरफ उस ओर देखा कि कहीं कार पलट कर तो नहीं आ रही है. उसे तसल्ली हो गई कि कार चली गई है तब उस ने राहत की सांस ली.

‘‘मगर उस व्यक्ति ने तुम्हारा किडनैप क्यों किया?’’ पहले व्यक्ति ने उस की तरफ शरारत भरी नजरों से देखा. उस की आंखों में वासना झलक रही थी.

‘‘उस्ताद, यह भी कोई पूछने की बात है कि इस परी का किडनैप क्यों किया होगा.’’

दूसरा व्यक्ति लार टपकाते हुए बोला, ‘‘भला हो, उस कार वाले का, जो इसे यहां पटक गया.’’

सड़क पर सन्नाटा था. इक्कादुक्का दौड़ते वाहन सड़क पर पसरे सन्नाटे को तोड़ रहे थे. उस ने देखा कि वह उन चारों के बीच घिर गई है, ‘इन की नीयत भी ठीक नहीं लगती. यदि इन्होंने भी वही हरकत की तो…’ सोच कर वह सिहर उठी.

‘‘कहां रहती हो?’’ तीसरे व्यक्ति ने पूछा.

‘‘अरे बेवकूफ, कार वाले ने हमारे लिए फेंका है और तू पूछ रहा है कहां रहती हो,’’ चौथे ने तीसरे को डांटते हुए कहा, ‘‘अरे, यह तो हम चारों की द्रौपदी है. चलो, ले चलो.‘‘

वह समझ गई, उन की नीयत में खोट है. एक गुंडे से उस ने पिंड छुड़ाया. अब 4 गुंडों के बीच फंस गई है. यहां से निकलना मुश्किल है. वह एक औरत है. उसे यहां भी बहादुरी दिखानी है. उसे इस जगह अब झांसी की रानी बनना है. इन गुंडों को सबक सिखाना है. वे चारों गुंडे उसे देख कर लार टपका रहे थे. ‘मीनाक्षी असली परीक्षा की घड़ी तो अब है. यदि इन से बच गई तो समझ लो जीत गई. गुंडों से लड़ना पड़ेगा. इन्होंने औरत को अबला समझ रखा है. बन जा सबला.’ वे चारों गुंडे कुछ करें इस के पहले ही वह बोली, ‘‘खबरदार, जो मुझे हाथ लगाया?’’

‘‘हम तुझे हाथ कहां लगाएंगे? हम तो 4 पांडव हैं. तू तो खुद हमें समर्पण करेगी?‘‘

वह व्यक्ति आगे बढ़ा तो वह पीछे हटी. और उस ने रास्ते की धूल उठा कर उस की आंखों में फेंकी और भाग ली. वे चारों उस के पीछेपीछे थे. वह हांफती हुई दौड़ रही थी. उस में गजब की ताकत आ गई थी. अगर आदमी में हौसला है तो सबकुछ पा सकता है. मीनाक्षी ने देखा, सामने से एक औटो आ रहा है. उसे हाथ से रोकती हुई बोली, ‘‘भैया, रुको.’’

औटो वाला जब तक रुके तब तक वे बहुत पास आ चुके थे. मगर तब तक वह भी औटो में बैठ चुकी थी. औटो वाले ने भी मौके की नजाकत देखते हुए तेज रफ्तार से औटो बढ़ा दिया. एक मिनट यदि औटो लेट हो जाता तो वे गुंडे उसे पकड़ चुके होते. वे थोड़ी देर तक औटो के साथ दौड़ते रहे, मगर थक कर चूर हो गए. अब औटो उन की पहुंच से दूर हो चुका था. उस ने राहत की सांस ली. औटो वाला बोला, ‘‘किधर जाना है?’’

‘‘आजाद चौक तक, बहुतबहुत धन्यवाद भैया, आप ने मेरी जान बचा ली.’’

‘‘लेकिन वे लोग कौन थे?‘‘

‘‘मुझे नहीं मालूम कौन लोग थे वे सब,’’ घबराती हुई मीनाक्षी कहतकहते चुप हो गई. उस ने सोचा औटो वाला कहीं और न ले जाए. आगे मीनाक्षी असलियत बता कर अपने को गिराना नहीं चाहती थी. औटो सड़क पर दौड़ रहा था. अब उन के बीच सन्नाटा पसरा हुआ था. वह उस की हर गतिविधि पर नजर रखे हुए थी. उस के भीतर एक दहशत भी थी. औटो में अकेली बैठी है. एकएक मिनट एकएक घंटे के बराबर लग रहा था. चेहरे पर भय की रेखाएं थीं. मगर, वह उसे बाहर ला कर अपने को कमजोर नहीं दिखाना चाहती थी. अंतत: उस का बंगला आ गया. उस ने औटो रुकवाया. ड्राइवर से किराया पूछा.

’’50 रुपए,’’ ड्राइवर के कहने के साथ ही उस ने पर्स में से 50 का नोट निकाल कर दे दिया. फिर उसे धन्यवाद दिया और भाग कर भीतर पहुंच गई.

धर्मेंद्र बोले, ‘‘बहुत देर कर दी, मीनाक्षी?’’

‘‘हां, धर्मेंद्र आज गुंडों के बीच मैं बुरी तरह से फंस गई थी, मगर उन का सामना किया, लेकिन मैं हारी नहीं,’’ यह कहते समय उस के चेहरे पर संतोष के भाव थे.

धर्मेंद्र घबरा गए और बिना रुके एकदम बोल पड़े, ‘‘झूठ बोल रही हो, तुम. गुंडों से क्या मुकाबला करोगी, इतनी ताकत है एक औरत में.’’

‘‘ताकत थी तभी तो सामना किया,’’ कह कर उस ने संक्षिप्त में सारी कहानी धर्मेंद्र को सुना दी. धर्मेंद्र आश्वस्त हो गए और उसे अपनी बांहों में भर लिया.

Arvind Kejriwal : आप का अंत ?

Arvind Kejriwal :  देश में इस वक़्त दो ही बड़ी पार्टियां हैं – कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी. इन दोनों ही पार्टियों की अपनीअपनी विचारधारा है, जिस पर यह चलती हैं. सालों सत्ता से दूर होने के बावजूद अपनी विचारधारा के दम पर ही ये वापस सत्ता में लौट आती हैं. लेकिन कुकुरमुत्तों की तरह अचानक उग आई पार्टियों के पास अपनी कोई सशक्त विचारधारा नहीं होती है. नतीजा पांचदस साल सत्ता में रह कर वे ऐसी गायब होती हैं कि उन का नामलेवा भी कोई नहीं बचता.

27 साल बाद भाजपा का सूखा कटा और येनकेनप्रकारेण दिल्ली की सल्तनत उस के हाथ लगी. दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में से 48 उस के खाते में आ गईं जबकि 10 साल से शासन कर रही आम आदमी पार्टी 22 पर ही सिमट गई और 1998 के बाद 15 साल तक दिल्ली पर राज कर चुकी कांग्रेस ने तीसरी बार जीरो का हैट्रिक रचा.

आम आदमी पार्टी को 10 प्रतिशत का नुकसान

दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की 71 प्रतिशत स्ट्राइक रेट के साथ 40 सीटें बढ़ीं जबकि आम आदमी पार्टी को 40 सीटों का नुकसान हुआ. भारतीय जनता पार्टी ने 2020 के मुकाबले 9 प्रतिशत वोट शेयर में भी इजाफा पाया जबकि आम आदमी पार्टी को 10 प्रतिशत का नुकसान हुआ. कांग्रेस को भले एक भी सीट नहीं मिली मगर अब की चुनाव में उस का वोट शेयर भी 2 प्रतिशत बढ़ा है.

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में कई बार क्षेत्रीय पार्टियां बड़े जोरशोर से बढ़ती नजर आती हैं. जनता के बीच से अचानक उठ कर एक व्यक्ति पार्टी बना कर उस को बढ़त देता है. जनता को लगता है कि यह अपने बीच से निकला अपनी ही तरह का ऐसा आदमी है जो उस के तमाम दुखों और जरूरतों को समझता है, फिर कुछ साल बाद अचानक वही जनता उस व्यक्ति और उस की पार्टी को इतनी जोर से पटखनी देती है कि वह अपनी अंतिम सांसे लेता प्रतीत होता है. और जनता फिर राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों में आना भविष्य ढूंढने लगती है. कुछ ऐसा ही सा दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद होता दिखा. ऐसा ही उत्तर प्रदेश में हुआ यहां कई क्षेत्रीय पार्टियां अब अपनी अंतिम सांसे ले रही हैं.

देश में इस वक्त दो ही बड़ी पार्टियां हैं – कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी. इन दोनों ही पार्टियों की अपनी अपनी विचारधारा है, जिसपर यह चलती हैं. सालों सत्ता से दूर होने के बावजूद अपनी विचारधारा के दम पर ही ये वापस सत्ता में लौट आती हैं. लेकिन कुकुरमुत्तों की तरह अचानक उग आई पार्टियों के पास अपनी कोई सशक्त विचारधारा नहीं होती है. नतीजा पांचदस साल सत्ता में रह कर वे ऐसी गायब होती हैं कि उन का नामलेवा भी कोई नहीं बचता.

10 साल बाद जनता ने अपने दिल से निकाल दिया

आम आदमी पार्टी को शुरू करने से ले कर उसे अर्श तक पहुंचाने का श्रेय अरविंद केजरीवाल को जाता है तो अब पार्टी को अर्श से फर्श तक लाने का ठीकरा भी उन्हीं के सिर फूटा है. दिल्ली विधानसभा चुनाव में न केवल आम आदमी पार्टी को बड़ी हार मिली बल्कि खुद पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल भी अपनी नई दिल्ली विधानसभा सीट नहीं बचा पाए.

कट्टर ईमानदार के नैरेटिव से जनता के दिल में जगह बनाने वाले केजरीवाल को 10 साल बाद जनता ने अपने दिल से निकाल दिया. वे ईमानदारी का सर्टिफिकेट लेने जनता की अदालत में गए पर जनता ने उन्हें और उन के सभी सिपहसालारों को आइना दिखा दिया. दरअसल जन-कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर ‘फ्री’ ‘फ्री’ ‘फ्री’ सुनतेसुनते दिल्ली के लोगों के कान पक चुके थे. लोग जमीन पर भी काम चाहते थे, जो 10 वर्षों में जितना गाया गया उतना हुआ नहीं. उलटे विपक्ष द्वारा घोटालों की बातों को इतना जोरशोर से उछाला गया कि जनता को लगने लगा कि हो न हो कुछ न कुछ तो हुआ है.

एक समय था जब केजरीवाल की पार्टी ने अपनी जीत से सभी राजनीतिक दलों को चौंका दिया था, लेकिन उसी पार्टी को ऐसी बुरी हार का सामना करना पड़ा कि भविष्य में वह फिर सत्ता में आएगी इस उम्मीद पर गहरा कुहासा छा गया है. अभी तो 8 विधायक आम आदमी पार्टी से भाजपा में गए. आने वाले दिनों में पार्टी में एकजुटता की जगह और ज्यादा फूट नजर दिखाई देगी. सत्ता की लोलुपता के चलते कई आप नेताओं को भाजपा और कांग्रेस से जुड़ते दिखाई देंगे.

पार्टी ने वो कौन सी गलतियां कीं

सवाल उठता है कि केजरीवाल और उन की पार्टी ने वो कौन सी गलतियां कीं, जिन के कारण उन्हें ये हार झेलनी पड़ी? जबकि आम आदमी पार्टी ने बीते 10 सालों में कई क्षेत्रों में ऐसे काम किए जिन से दिल्ली की जनता को बहुत राहत मिली. केजरीवाल ने मोहल्ला क्लिनिक, विश्वस्तरीय स्कूल, मुफ़्त बिजली और मुफ़्त पानी जैसी योजनाओं के माध्यम से एक मज़बूत वोट बैंक तैयार किया.

इस फ्री सेवा से निचले तबके को और निम्न माध्यम वर्ग को तो काफी राहत मिली. लेकिन जैसेजैसे इस वर्ग से ऊपर जाते हैं, सवाल उठने लगते हैं कि दिल्ली की स्थिति कैसी है. दिल्ली की हालत अच्छी नहीं थी और आम आदमी पार्टी के पास यह दिखाने के लिए कुछ नहीं था कि उन्होंने इस दौरान दिल्ली में कोई सुधार किया है, चाहे वह ट्रैफिक जाम हो, अत्यधिक प्रदूषित हवा हो या पानी की समस्या हो.

जनता के लिए काम करने की इच्छा से वे राजनीति में आए हैं, इस बात को बारबार कह कर केजरीवाल ने अपनी पार्टी को कट्टर ईमानदार पार्टी की पहचान दी, मगर शराब घोटाले का जो दाग उन के दामन पर लगा, भले उस में अभी तक कोई दोषी न पाया गया और न कोई पुख्ता सबूत जांच एजेंसियों के पास हैं, बावजूद इस के भाजपा ने आप की ईमानदार छवि के खिलाफ माहौल बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और वह जनता के दिमाग में यह बात बिठाने में सफल रही कि दाल में कुछ काला है. ईमानदार छवि के पीछे कुछ ना कुछ घोटाला है.

उपराज्यपाल ने  पार्टी को ठीक से काम नहीं करने दिया

केजरीवाल और उन की पार्टी की दूसरी गलती यह थी कि वह पूरे वक़्त टकरावपूर्ण और पीड़ित की राजनीति करते रहे. 2013 में विक्टिम कार्ड खेलने के बाद 2015 में जनता ने उन्हें बड़ी जीत दिलाई, लेकिन उस के बाद से वह लगातार यह संदेश देते रहे कि केंद्र सरकार और एलजी उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं. अगर आप बारबार यह कहते हैं कि आप एक सेट सिस्टम के साथ काम नहीं कर पा रहे हैं, तो लोग भी सोचने लगे कि फिर आप घर पर बैठें, क्योंकि इसी सिस्टम के साथ शीला दीक्षित ने भी काम किया था और वह एक सफल मुख्यमंत्री रहीं.

हालांकि यह बात सच है कि दिल्ली के उपराज्यपाल ने आम आदमी पार्टी को कभी ठीक से काम नहीं करने दिया. अनेक योजनाओं की फाइलें जिन में जनता के हित के कई काम निर्धारित किए गए थे, एलजी लम्बेलम्बे समय तक अपने नीचे दबाये बैठे रहे. हर काम के लिए आप पार्टी को बारबार हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. नगर निगम भी लम्बे समय तक भाजपा के चंगुल में रहा, जिस के चलते शहरी व्यवस्थाएं ठीक करने में आम आदमी पार्टी को खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. मगर ये बातें बारबार जनता के सामने रोने से अंततः जनता भी उकता गई. उस ने भी सोचा कि जब सत्ता में बैठी पार्टी के हाथ पैरों में इतनी बेड़ियां पड़ी हैं तो क्यों न सत्ता में वह पार्टी आ जाए जो स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम है.

ऐसे में जब भारतीय जनता पार्टी ने यह ऐलान किया कि केजरीवाल की पार्टी ने जनता के हित में जो बिजलीपानी, स्वास्थ्य और परिवहन सेवा की जो फ्री योजनाएं चला रखी हैं, वह बंद नहीं की जाएंगी और उन के अलावा और भी कई योजनाएं लाने की गारंटी दी तो जनता ने भी एक रोंदू पार्टी को छोड़ भाजपा के खाते में ही अपना अमूल्य वोट डाल दिया. भाजपा ने आठवें वेतन आयोग की घोषणा और कर में छूट का ऐलान कर नौकरीपेशा वर्ग को साधा. जहां झुग्गी वहां मकान और सीलिंग में राहत देने का ऐलान तो खुद नरेंद्र मोदी ने किया. लोगों ने इसे मोदी की गारंटी माना. पेयजल की समस्या और टूटी सड़कों ने दिल्ली की छवि पर जो दाग लगा रखा था, उसे भी भाजपा ने बहुत जोरशोर से उठाया. और सब से ऊपर उस ने केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेताओं को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेज कर बीच के समय में विकास के तमाम कार्यों को रुकवा दिया. इस दौरान को नई योजना आप पार्टी दिल्ली के लोगों के लिए लागू नहीं कर सकी. उसके बाद जब केजरीवाल पर अपने लिए शीशमहल बनवाने का आरोप भाजपा ने लगाया तो उनकी आम आदमी वाली छवि भी दरक गई.

आप और कांग्रेस मिल कर चुनाव लड़ते तो  सीटें 37 हो जातीं

केजरीवाल से तीसरी और सब से बड़ी गलती यह हुई कि इस चुनाव में अपनी काबिलियत को उन्होंने ओवर एस्टीमेट किया. उन्होंने पहले ही यह रुख़ अपनाया कि हमें किसी की जरूरत नहीं है, कोई गठबंधन नहीं चाहिए, हम अकेले ही यह चुनाव लड़ेंगे. जबकि कांग्रेस इस विचारधारा के साथ तैयार थी कि गठबंधन कर लिया जाए, जैसा कि लोकसभा चुनाव में किया गया था.

कांग्रेस दिल्ली में जीरो थी, वह अब की चुनाव में भी जीरो ही रही. लेकिन आम आदमी पार्टी को उस ने जरूर हवा दिया. 14 सीटों पर आम आदमी पार्टी की हार का अंतर, कांग्रेस को मिले वोटों से कम है. यानी अगर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस मिल कर चुनाव लड़ते तो दिल्ली में गठबंधन की सीटें 37 हो जातीं और भाजपा 34 सीटों पर ही सिमट जाती. गौरतलब है कि यहां बहुमत के लिए मात्र 36 सीटों की दरकार थी.

केजरीवाल को दूरदर्शिता से काम लेना चाहिए था

केजरीवाल का अहम आड़े न आता तो राहुल गांधी से बातचीत कर यह आप की जीत सुनिश्चित की जा सकती थी. कांग्रेस वैसे भी दिल्ली में अभी वह ताकत हासिल नहीं कर पाई है तो शीला दीक्षित के वक़्त में थी. उस ताकत और एकजुटता को वापस पाने में अभी कई दशक लग सकते हैं. केजरीवाल को दूरदर्शिता से काम लेना चाहिए था, जिस में वे नाकाम रहे.

इस चुनाव में आम आदमी पार्टी के कई बड़े नेता चुनाव हार गए हैं. खुद अरविंद केजरीवाल नई दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी के प्रवेश वर्मा से 4000 से अधिक वोट से हारे हैं. जंगपुरा सीट से आप उम्मीदवार मनीष सिसोदिया और पटपड़गंज सीट से आप उम्मीदवार अवध ओझा भी हार गए हैं. ऐसे में अब आम आदमी पार्टी के भविष्य को ले कर सवाल उठ रहा है कि दिल्ली हारने के बाद अरविंद केजरीवाल अब अपनी पार्टी को कैसे आगे बढ़ाएंगे.

पावर एक ग्लू की तरह होता है जो लोगों को जोड़ता है, एकजुट रखता है. कांग्रेस में भी यही दिक्कत है, वह जब तक पावर में थी सभी नेता साथ थे, लेकिन जैसे ही पार्टी पावर से बाहर आई, उस के कई दिग्गज भाजपा में शामिल हो गए. भाजपा की राजनीति अब यही कोशिश करेगी कि कैसे आम आदमी पार्टी को इतना कमजोर कर दिया जाए कि वह फिर कभी सिर न उठा सके. आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों द्वारा आप नेताओं को पुनः परेशान कर जेल में ठूंसने की कवायद शुरू होगी. लिहाजा अरविंद केजरीवाल के लिए आगे का रास्ता काफी मुश्किल भरा रहेगा.

Hindu-Muslim : अलगाव का भ्रमजाल

Hindu-Muslim :  जो काम आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी ने हिंदूमुसलिम, हिंदूमुसलिम कर के भारत में मौजूद गरीब बंगलादेशियों के साथ किया वैसा अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने अपने अंधभक्तों के साथ मिल कर अमेरिका में दक्षिणी अमेरिका या कहीं और से बिना कानूनी रास्ते आए लोगों के साथ किया था. ट्रंप और मोदी की जीत के पीछे यह अलगाव की भावना बहुत ज्यादा कारगर रही है.

भारत अब बंगलादेश में आग झेल रहा है और वहां के हिंदुओं पर लगातार अत्याचार बढ़ रहे हैं. यही नहीं, अब पाकिस्तानी सैनिक अफसर ढाका लौटने लगे हैं जिन्हें इंदिरा गांधी ने सेना भेज कर 1971 में मुश्किल से बंगलादेश के इलाके से हटा कर पाकिस्तान के 2 टुकड़े कराए थे.

अब रिपब्लिकन पार्टी में मौजूद ऊंची जातियों के ब्राह्मण भारतीय मूल के नेताओं को बुराभला कहने वाले रिपब्लिकन मागा हैं. अमेरिका में डैमोक्रेटिक व रिपब्लिकन पार्टियों के भारतीय व अन्य लैटिनों व विदेशी मूल के सांसदों, विधायकों के खिलाफ मागा ग्रुपों ने जंग छेड़ दी है.

डोनाल्ड ट्रंप ने देशीविदेशी की आग जला कर जीत का जश्न तो मना लिया पर यह आग अब उन्हीं के अपने लोगों, जिन में एलन मस्क भी शामिल हैं जो अमेरिका से बाहर के हैं, को खाने लगी है. अमेरिका का तानाबाना उसी तरह कमजोर होने लगा है जैसे भारत का हुआ है. दोनों बड़ी लोकतांत्रिक शक्तियां अपने नेताओं के कारण आज संकट में हैं और यह संकट और बिगड़ेगा, सुधरेगा नहीं, क्योंकि इनफौर्मेशन टैक्नोलौजी के जरिए कट्टरपंथी झूठ, सफेद झूठ, कोरा झूठ बुरी तरह फैला रहे हैं.

यह वह आग है जो भारत में 1850 के बाद लगाई गई थी जिस में दयानंद सरस्वती भी शामिल थे और जिस का परिणाम 1947 में सामने आया. यही आग हिटलर ने यहूदियों के बारे में लगाई जिस का परिणाम पहले तो जरमनी की अविश्वसनीय जीत रही है लेकिन फिर बिलकुल विनाश रहा.

डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी की पार्टियों के पदचिह्नों पर दुनिया के बहुत से देशों की पार्टियां चल रही हैं जिन्हें अपने अलग रंग, भाषा, धर्म, जाति, मूल देश के पड़ोसी से बेबात की नाराजगी है. ये सब पार्टियां भूल रही हैं कि उन के देश की प्रगति में हजार जोखिम ले कर आए कुछ सस्ते मजदूर तो कुछ दक्ष होशियार लोगों का खास योगदान है. उन का देश वह न होता जो है. अब ये लोग नहीं आते.

अमेरिका में बिना कागजों के घुसे लोगों ने कारखानों में, औफिसों में, घरों में, खानों में, खेतों में मुश्किल काम सस्ते में किए जिस का फायदा पूरे अमेरिका ने उठाया. जरमनी की पहले विश्व युद्ध से पहले महानता वहां के यहूदी ही थे जिन्हें हिटलर ने थोक में मारा. भारत में बंगलादेशियों ने फटेहाल रह कर सस्ते में काम कर उत्पादन का खर्च घटाया.

जो भारतीय कागजों के सहारे अमेरिका पहुंचे, अब अपना गिरगिटी रंग बदल रहे हैं और अमेरिकियों का साथ देने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन मागा कट्टरवादी डोनाल्ड ट्रंप को भगवान नहीं मानते, सिर्फ जरिया मानते हैं अपना श्रेष्ठ रंग दिखाने के लिए.

रंगभेद करने वाले चर्चों के पिट्ठू ये गोरे अमेरिका को नष्ट कर दें, तो कोई बड़ी बात नहीं. अमेरिकी कल्चर आज नशेड़ी, निकम्मा हो गया है. वह उस महानता को अब नहीं पा सकता जिस का उसे दंभ है, बिना बाहरी लोगों के.

 

Best Hindi Story : अंधविश्वास

Best Hindi Story : रिया के चेहरे पर आज एक अजीब सी चमक थी. आंखें हंस रही थीं और होंठ गुनगुना रहे थे. जैसे हर लड़की के मन में अपनी ससुराल के, पति के और घरपरिवार के सपने पलते हैं वैसे ही रिया ने भी कुछ ख्वाब पाल रखे थे.

21वीं सदी की पढ़ीलिखी, तेज़तर्रार लड़की रिया आसमान में उड़ रही थी. जैसी सोच रखी थी वैसी ही ससुराल पाई थी. सुखी, संपन्न और सब से महत्त्वपूर्ण घर के सारे लोग पढ़ेलिखे व प्रबुद्ध थे. रिया का मानना था कि पढ़ेलिखे लोगों से तालमेल बिठाना सहज हो जाता है. मानसिक खटराग नहीं होता और ज़िंदगी आसान बन जाती है.

ससुरजी नामी वकील है, सासुजी एमकौम तक पढ़ी बहुत बड़ी समाज सेविका है, देवर एमसीए की पढ़ाई कर रहा है, ननद फैशन डिज़ाइनर है और पति आरव एमबीए तक पढ़ा हुआ एक बड़ी कंपनी में मैनेजर है. सगाई और शादी के बीच ज़्यादा समय नहीं था तो रिया ने ससुराल देखा नहीं था. बस, वीडियो पर आरव ने घर दिखा दिया था. बढ़िया शानदार बंगला था.

सगाई के बाद 2 महीने में ही शादी हो गई तो ससुराल वालों से ज़्यादा जानपहचान का मौका नहीं मिला रिया को. पर रिया को लगा, मेरा स्वभाव सरल और हसमुख है, सो, सब को चुटकी में अपना बना लूंगी, समझ लूंगी और घुलमिल जाऊंगी. ससुराल के सारे मैंबर्स पढ़ेलिखे, समझदार हैं तो दिक्कत नहीं होगी.
शादी भी निबट गई और रिया आरव का हाथ थामे एक नए जीवन की नींव रखने जा रही थी. पर यह क्या, रिया ने गाड़ी से उतर कर दहलीज़ पर कदम रखा कि आश्चर्य में पड़ गई और दिल को धक्का भी लगा. घर के गेट पर एक काला पुतला लटक रहा था, दूसरी ओर नीबूमिर्ची और बीच में लोहे की यू आकार की कोई चीज़ लगी हुई थी.

रिया को अजीब लगा कि पढ़ेलिखे, समझदार लोग भी ऐसी चीज़ों को मानते हैं यह जानकर. पर रिया चुप रही. अभी तो पहला कदम रखा था ससुराल में, तो सवालजवाब करना उचित नहीं समझा उस ने.

सारी रस्में ख़त्म कर के घर के भीतरे पहुंची तो रिया को और झटका लगा. घर में तरहतरह की अजीब चीज़ें देख कर. छोटा कछुआ, कहीं बाम्बू तो कहीं पिरामिड. और तो सब ठीक पर आते ही रिया की सासुजी ने आरव और रिया की नीबू, नमक और लालमिर्च से नज़र उतार कर उस की ननद से बोला कि जा कर चार रस्ते पर फेंक आ. रिया को एक और शोक लगा. मन में पढ़ेलिखे लोगों की जो परिभाषा बिठा रखी थी वह ध्वस्त हो गई. पर अभी कुछ भी पूछने का समय नहीं था, सो चुपचाप रिया सब का अनुसरण करती रही.

सारी रस्में निबट गईं. आरव का हाथ थामे वह अपने बेडरूम में आई. पूरे रूम में बुरी नज़र से बचाने वाले हर टोटके मौजूद थे. रिया को बेचैनी होने लगी मानो पढ़ेलिखे लोगों के बीच न हो कर कोई झाडफूंक वाले बाबा के घर में आ गई हो. थकीहारी, सोचतेसोचते कब नींद आ गई उसे, पता नहीं चला.

सुबह उठी, नहाधो कर नीचे आई तो सासुमां ने कहा, “रिया तुम और आरव करुणानिधि स्वामी के आश्रम जा कर उन के आशीर्वाद ले कर आओ, बाबाजी की कृपा बनी रहेगी.” रिया का दिमाग हिल गया साक्षात द्वारिकाधीश को न पाय लागूं जो जीवनआधार है, ऐसे बाबाजी को क्यों नमूं. हे प्रकृति, छोटे से मोबाइल में हर चीज़ अपडेट करने वाले खुद की सोच को अपडेट करना कब सीखेंगे. पर शादी के पहले ही दिन आरव को नाराज़ करना नहीं चाहती थी रिया तो बेमन से गई आश्रम.

बाबाजी के चेहरे पर रिया को देख कर जो भाव बदले उसे देख कर रिया के दिमाग में आग लग गई. भगवाधारी बाबा के ठाट देख कर रिया को ताज्जुब हुआ. आलीशान कोठी में हर आधुनिक सुखसुविधा मौजूद थी. बाबा के आशीर्वाद लेने के लिए लोगों का तांता लगा था. और वहां उपस्थित भीड़ में कोई भी अनपढ़गंवार नहीं लग रहा था. सभी अच्छे घर के समझदार व पढ़ेंलिखे लोग थे.

रिया सोचने लगी, एक तरफ़ हम चंद्रयान भेज रहे हैं और एक तरफ़ अंधश्रद्धा को हवा दे रहे हैं. कब सुधरेगा समाज. बेमन से बाबा को प्रणाम किया तो बाबा ने आशीर्वाद देने के बहाने रिया के गालों को कुछ यों छुआ कि रिया के तनमन में आग लग गई. मैं गाड़ी में हूं बोल कर पैर पटकते निकल गई.

क्या सोचा था ससुराल वालों के बारे में और क्या निकले. यह बाबा कौन सा भगवान है, महज़ हमारे जैसा इंसान ही तो है, इतना अंधविश्वास और अंधभक्ति. क्या मैं छोटी बच्ची हूं जो बैड टच को न समझ पाऊं. लंपट, कैसे सहला रहा था मेरे गाल. रिया को आरव पर इतना गुस्सा आया था लेकिन सही समय पर बात करूंगी, सोच कर चुप रही.
हर छोटीबड़ी बात के लिए बाबा, ज्योतिष और टोटके… रिया तिलमिला उठती थी. पर रिश्ता बचाने की जद्दोजेहद में आहिस्ताआहिस्ता रिया ससुराल वालों के साथ एडजस्ट करने की पूरी कोशिश कर रही थी. फिर भी हर रोज़ कोई न कोई बात ऐसी हो जाती कि मन आहत हो जाता. 21वीं सदी की पढ़ीलिखी रिया खुद को बहुत मुश्किल से इस अंधविश्वासभरे वातावरण में ढाल रही थी.

धीरेधीरे समय बीतते शादी को एक साल हो गया एक डेढ़ महीने से रिया की तबीयत ठीक नहीं रहती, उलटियां आना, जी मिचलना, चक्कर आना वगैरह. रिपोर्ट करवाने पर पता चला रिया मां बनने वाली है. आज घर में कितनी खुशी का माहौल था. रिया की प्रैग्नैंसी रिपोर्ट पौज़िटिव आई थी. रिया की सास ने आरव को बताया कि बाबाजी कुछ मंत्र बोल कर भभूत देते हैं, उस भभूत को खाने से बेटा पैदा होता है. पहले तो आरव भी भड़का कि ये सब अंधविश्वास है, मैं नहीं मानता.

मां के रोज़रोज़ के दबाव ने और कुछ बेटे की चाह की भीतरी लालसा ने उसे उकसाया. सो, आरव भी रिया पर दबाव ड़ालने लगा, “रिया मेहरबानी कर के मान जाओ न, मां का दिल रख लो. सुनो, मुझे बेटे की चाह नहीं, बस, मां की खुशी के लिए चलते हैं न बाबा के पास. सिर्फ़ कुछ भभूत ही तो खानी है तुम्हें. अगर इतनी सी बात से बेटे का मुंह देखने को मिलता है तो क्या बुराई है.”

रिया गुस्से से कांप उठी, “आरव, बीज को बोये डेढ़ महीना हो गया. जो बोया है वही उगेगा. क्या खेतों में ज्वार बोने के बाद किसी भभूत के छिड़काव से गेहूं उगते हैं. पढ़ेलिखे हो कर बच्चों जैसी बातें मत करो, मैं नहीं जाऊंगी किसी बाबा के पास.”

पर रिया की सास के दिमाग में बाबाजी का भूत और पोते की चाह ने रिया के खिलाफ़ बगावत का बिगुल बजा दिया था. सो, वह सुबह से शाम तक रिया को प्रताड़ित करने का एक बहाना नहीं छोड़ती थी. और इस बात को ले कर घर में हो रहे झगड़े व तनाव के आगे रिया को झुकना पड़ा, बेमन से खाती रही भभूत. उस की सास सब के सामने इतराती रहती देखना, हमारे घर गुलाब जैसा बेटा ही आएगा. और बेटे के सपने देखने लगी. घर में भी सब के मन में यह बात बैठ गई कि बेटा ही होगा.
इतने में नौ महीने बीत गए और एक काली बरसाती रात में रिया को दर्द उठा और अस्पताल ले जाना पड़ा. बाहर सब बेटे की प्रतीक्षा में बैठे थे कि अभी खुशखबरी आएगी. रिया की सास ने नर्स से बोला, “जल्दी से मेरे गुलाब जैसे पोते को ले आना मेरी गोद में.”
बारिश का मौसम था. बिजली ज़ोर से कड़की और नर्स ने आ कर एक और बिजली गिराई, “माताजी, गुलाब नहीं, जूही खिली है आप के आंगन में.” सब के दिल बैठ गए, यह क्या हो गया.

आरव ने जैसेतैसे दिल बहलाया और बोला, “कोई बात नहीं. बेटी तो लक्ष्मी का रुप होती है.” लेकिन रिया की सास हारने को तैयार नहीं, बोली, “बहू ने श्रद्धा से भभूत खाई होती तो जरूर बेटा होता. खैर, अगली बार ढ़ंग से खिलाऊंगी, पर देख आरव, बेटी बोझ होती है, तू इस का कुछ इंतज़ाम कर दे और अगली बार मुझे पोता ही चाहिए और उस के लिए तेरी दूसरी शादी भी करवानी पड़ी तो भी करवा दूंगी, हां.”

अब आरव का धैर्य जवाब दे गया. उस ने उसी समय मां को सख्त़ शब्दों में डांट दिया, “मां, अब बस भी कीजिए. आप के अंधविश्वास ने मेरे मन में भी बेटेबेटी में फ़र्क का बीज बो दिया. मेरी बेटी मेरा अभिमान होगी. अब आप मुझे बख़्श दीजिए और आप भी ऐसे ढोंगी बाबाओं के चक्कर से नज़ात पाइए, अपनी सोच बदलिए. हम 21वीं सदी में जी रहे हैं.

“रिया और अपनी बच्ची के साथ मैं अलग हो जाऊं, उस से पहले सुधर जाइए. आप जैसे स्वभाव वाली सास की वजह से ही कहावत पड़ी होगी कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है.”

पर आज रिया खुश थी अपनी चांद सी बेटी को पा कर और आरव को एक अंधविश्वास से बाहर निकलता देख कर. दूसरे दिन अख़बार की हैडलाइन पढ़ कर रिया की सास चौंक उठी, ‘शहर में संन्यास आश्रम वाले गुरुजी करुणानिधि स्वामी नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार केस में गिरफ़्तार.” सासुमां दौड़ते हुए नम आँखों से पोती को गोद में उठा कर खिलाने लगी, मेरी गुड़िया मेरा अभिमान और रिया को गले लगा कर बोली, “धन्यवाद बेटी जो तुम ने हमें इतनी प्यारी पोती का उपहार दिया.”
रिया को आज अपने सपनों का घर, परिवार मिल गया. आरव ने कहा सैल्फ़ी तो बनती है और छोटे से स्क्रीन में संयुक्त परिवार एकसाथ हंसतेमुसकराते झिलमिलाने लगा.

‘‘Sky Force : अक्षय की बजाय वीर पहाड़िया का किरदार हीरो होना चाहिए, मगर…’’

Sky Force : रेटिंग: दो स्टार
एक साल पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर 25 जनवरी 2024 को देशभक्ति के नाम पर फिल्म ‘‘फाइटर’’ प्रदर्शित हुई थी, इस बकवास फिल्म ने बौक्स औफिस पर पानी नही मांगा था. इस वर्ष गणतंत्र दिवस के मौके पर 24 जनवरी को फिल्म ‘‘स्काई फोर्स’’ प्रदर्शित हुई है. ‘फाइटर’ और ‘स्काई फोर्स’ में कोई बहुत ज्यादा अंतर नही है, फर्क सिर्फ इस बात का है कि अनमने तरीके से ‘स्काई फोर्स ’में 1965 के भारत व पाक युद्ध के समय शहीद हुए एयरफोर्स स्क्वार्डन लीडर एबी देवैया से जुड़ी सत्य घटना को जोड़ने के. इस हिसाब से तो इस फिल्म का हीरो वीर पहाड़िया को होना चाहिए था, मगर फिल्म का हीरो अक्षय कुमार हैं.

मतलब इस फिल्म में इतना घालमेल है कि दर्शक की समझ में ही नही आता कि वह कहां फंस गया. क्या सिनेमाई स्वतंत्रता के नाम पर लेखकों व निर्देशकों ने जबरदस्त तरीके से तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की है? क्या यह फिल्म अंधभक्ति वाला राष्ट्रवाद परोसती है? लेखकों व निर्देशकों को किस मजबूरी के तहत कथ्य व तथ्य के साथ छेड़छाड़ करने के साथ ही किरदारों के नाम भी बदलने पड़े, पता नहीं. फिल्म की शुरूआत में सबसे पहले लंबाचौड़ा डिस्क्लेमर/अस्वीकृतिकरण दिया गया है, जिसे अति कम समय में पढ़ पाना संभव नही हुआ. इसलिए इस में क्याक्या कहा गया है, पता नही.

खैर, सबसे पहले बात फिल्म के नाम को ले कर ही की जाए. फिल्म देखते हुए दर्शक की समझ में आता है कि 1965 के युद्ध के समय पाकिस्तान द्वारा भारत के एयरफोर्स के एयरबेस पर किए गए हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए जिस मिशन की घोषणा हुई थी, उसे ‘स्काई फोर्स’ मिशन कहा गया. पर जब हम ने इस पर शोध किया तो हमें 1965 से 1971 के बीच भारत व पाक ने जितने भी मिशन चलाए, उन के जो नाम नजर आए, उन में ‘स्काई फोर्स’ का कहीं जिक्र नही है.

मतलब यह नाम ही फर्जी है. अगर सोशल मीडिया पर यकीन किया जाए, तो पोलिश वीडियो गेम के ऊपर से यह नाम रखा गया है. 1965 के युद्ध में एयरफोर्स स्क्वाड्रन लीडर ए.बी. देवैया शहीद हो गए थे, जिन की यह कहानी बताई जा रही है, पर फिल्म में उन का नाम बदल कर टीके विजया उर्फ टैबी कर दिया गया. वहीं दूसरे किरदारों के नाम भी बदले गए हैं.

शहीद स्क्वाड्रन लीडर अज्जामदा बोप्पय्या देवैया उर्फ एबी देवैया कौन थे?

1965 के भारत व पाक युद्ध के दौरान स्क्वाड्रन लीडर ए.बी. देवैया, जो स्टैंडबाय पर थे, ने अपने साथियों पर संकट देख कर वह अपने नेता के सीधे आदेशों की अवज्ञा करता है और एक ऐसे विमान में उड़ान भरता है जो उड़ने लायक नहीं है. वह अपने उड़ान कौशल व साहस के बल पर अपने आठ वीर साथियों को बचाने में सफल रहते हैं. मगर खुद दुश्मन देश में शहीद हो जाते हैं.

लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि वह ‘कार्रवाई में लापता’ थे, और 1979 में अंग्रेजी लेखक जौन फ्रिकर की पुस्तक बैटल फौर पाकिस्तान- द एयर वार औफ 1965 के प्रकाशित होने तक देवैया के भाग्य का विवरण ज्ञात नहीं हुआ. उस के पास देवैया के एयरबेस के ग्रुप कैप्टन ओ.पी. तनेजा के प्रयासों के बाद देवैया 1988 में महावीर चक्र से मरणोपरांत सम्मानित होने वाले पहले और एकमात्र भारतीय वायु सेना अधिकारी बने.

फिल्म ‘स्काई फोर्स’ में स्क्वाड्रन लीडर ए.बी. देवैया का नाम बदल कर टीके विजया उर्फ टैबी तथा ग्रुप कैप्टन ओपी तनेजा का नाम बदल कर ओके आहुजा कर दिया गया है. टीके विजया के किरदार में वीर पहाड़िया और ओके आहुजा के किरदार में अक्षय कुमार है. इस हिसाब से इस फिल्म का हीरो तो वीर पहाड़िया के किरदार को होना चाहिए, मगर फिल्मकार ने अक्षय कुमार के किरदार को हीरो बना दिया.

यह कहानी तब की है जब देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे. ‘जय जवान, जय किसान’ सबसे लोकप्रिय नारा था. भारत के पास तब, बस दो किमी रडार शक्ति वाले लड़ाकू विमान थे और पाकिस्तान के पास अमरीका से दहेज में मिले 25 किमी रडार शक्ति वाले 12 लड़ाकू विमान थे.

फिल्म ‘स्काई फोर्स’ की कहानी शुरू होती है 1971 में, जब पाकिस्तान की वायु सेना ने अचानक भारत के एयरबेस पर हमला कर दिया. भारतीय बलों ने जवाबी हमले में एक पाकिस्तानी पायलट अहमद हुसैन (शरद केलकर) को पकड़ लिया था. भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर के.ओ. आहूजा (अक्षय कुमार) अहमद से पूछताछ करने के लिए पहुंचते हैं. इस पूछताछ में उन्हें पता चलता है कि 1965 के सरगोधा हमले के बाद अहमद को सम्मानित किया गया था.

आहूजा के मन में यहीं से संदेह पैदा होता है और पहला सुराग भी हाथ लगता है. फिर कहानी 6 साल पीछे यानी कि 1965 में पहुंच जाती है. 1965 के युद्ध में दोनों देशों द्वारा हवाई हमलों का पहला उदाहरण था. पाकिस्तान को 12 एफ -104 स्टारफाइटर जेट मिले थे, जिन्हें भारत के फोलैंड नैट और डसौल्ट मिस्टर के बेड़े से बेहतर माना जाता था. हालांकि, ग्रुप कैप्टन के.ओ. आहूजा (अक्षय कुमार) का मानना है कि मशीन नहीं, बल्कि पायलट हवाई युद्ध का नतीजा तय करता है.

1965 में जब विंग कमांडर ओ. आहूजा आदमपुर एयरबेस पर पोस्टेड दिखाए जाते हैं जहां अपने साथियों को युद्ध के लिए ट्रेनिंग देते हैं. इन में टी. विजया (वीर पहाड़िया) और अन्य शामिल हैं. विजया में आहूजा को अपना वीरगति को प्राप्त हो चुका भाई नजर आता है. विजया एक रिबेल युवा अधिकारी है, जिस में देश के लिए कुछ भी कर गुजरने का जुनून है.

5 सितंबर 1965 में भारतीय एयरबेस पर पाकिस्तान हमला करता है, जिस में कई जवान मारे जाते हैं. इस के बाद भारत बदले की आग में झुलसता है और अपने कमजोर हवाई जहाजों की मदद से सात सितंबर की सुबह पाकिस्तानी एयरफोर्स से लोहा लेता है. सरगोधा में एकत्रित पाकिस्तान के मौडर्न और नई तकनीक वाले एयरक्राफ्ट्स को नष्ट करने के लिए स्काई फोर्स औपरेशन के नाम से अहूजा की अगुवाई में प्लान किया जाता है.

भारत इस में सफलता हासिल करता है, लेकिन एक साथी इस मिशन में गुमशुदा हो जाता है. यह कोई और नहीं बल्कि टी विजया है. अब आहूजा उसे ढूंढने की कोशिश करने के लिए हर संभव प्रयास करता है. इस बीच, टैबी की पत्नी, गीता (सारा अली खान) की उम्मीदें अपने पति को पाने के लिए आहूजा पर टिकी हैं. टैबी को खोजने की कोशिश करते समय, आहूजा को पता चलता है कि उस के लापता साथी ने अपने साथी सैनिकों की रक्षा के लिए न केवल अपनी जान जोखिम में डाली है, बल्कि विमानन इतिहास और प्रौद्योगिकी की दिशा भी बदल दी.

चारचार लेखकों ने मिल कर फिल्म की स्क्रिप्ट का बंटाधार कर डाला. उपदेशात्मक लहजे और अंधराष्ट्रवाद के कारण यह फिल्म दर्शकों के साथ जुड़ नही पाती. फिल्म में बात शहीद व देशभक्ति की ही हो रही है, मगर किसी तरह भावनाएं जुड़ नहीं पाती हैं.

फिल्म की स्क्रिप्ट कच्ची सड़क पर बैल गाड़ी के चलने की तरह हिचकोले ले कर चलती रहती है. फिल्म की कहानी के सेंटर में बहादुर व देश के लिए शहीद होने के लिए तत्पर वीर है. फिल्म के अंदर वीरता, भावुकता, राष्ट्वाद का होना लाजमी है और इस तरह की कहानी व दृश्यों के साथ भावावेश में दर्शकों को जुड़ना चाहिए, मगर ऐसा हो नही पाता.

इंटरवल से पहले तो फिल्म काफी गड़बड़ है. स्क्रिप्ट लेखकों की मूर्खता के चलते खराब लेखन, मूर्खतापूर्ण चरित्र चित्रण और नीरस अभिनय के अलावा कुछ नही है. चारचार लेखक मिल कर भी युद्धबंदी पाकिस्तानी सैनिक अहमद हुसैन के कैरेक्टर को ठीक से लिख ही नही पाए. इंटरवल के बाद जब आहूजा, विजया की खोज के लिए प्रयास शुरू करते हैं, तब कुछ रोमांच पैदा होता है और दर्शक भी इमोशनल हो कर फिल्म के साथ जुड़ते हैं.

लेखकों की सोच का दिवालियापन मिसाल के तौर पर फिल्म में एक संवाद है, जब टैबी पहली बार पिता बनने वाले हैं, तब आहूजा उस की पत्नी गीता से कहते हैं कि एक अच्छे पायलट को बेटी का आशीर्वाद मिलेगा. मतलब यहां भी लिंग भेद की बात. यह संवाद सुन कर एक बात यह भी उभरती है कि क्या वह वायु सेना अधिकारी जो बेटे पैदा करते हैं, वह बुरे पायलट हैं?

फिल्म के निर्देशकों में से एक संदीप केलवानी की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है. इस से पहले वह बुरी तरह से असफल रही ‘भोला’ और ‘रनवे 34 ’ फिल्मों का लेखन कर चुके हैं, ऐसे में उन से क्या उम्मीद की जाए. दूसरे निर्देशक अभिषेक अनिल कपूर इस से पहले ‘स्त्री’ और ‘बाला’ के वक्त निर्देशक अमर कौशिक के सहायक थे.

शुरुआती एक्शन दृश्यों में वीर पहाड़िया के अंदर दृढ़विश्वास की कमी का अहसास होता है और विमानन विशेषज्ञ टी.के. विजया उर्फ टैबी (वीर पहाड़िया) के दुस्साहसी हवाई युद्धाभ्यास, विशेष रूप से वायुगति की खामियां निकाल सकते हैं. एक दृश्य, जहां वह जमीन से महज कुछ फीट ऊपर उड़ते हुए घाटी के बीच एक आश्चर्यजनक स्टंट करते हैं, अविश्वसनीय लगता है. इस के लिए तो निर्देशक ही जिम्मेदार हैं.

भावनात्मक दृश्य तो नीरस नजर आते हैं. फिल्म में एक दृश्य है, जब विजया के घर वापस न लौटने के छह माह बाद उस के संबंध में बिना किसी पुख्ता जानकारी के अक्षय कुमार और निम्रत कौर स्क्रार्व्डन लीडर विजया की पत्नी गीता यानी कि अभिनेत्री सारा अली खान के घर पहुंचते हैं. उस वक्त अपनी रोती हुई छह माह की बेटी को गोद में लिए गीता जिस तरह से आहूजा व उन की पत्नी को चले जाने के लिए कहती है, इस सीन को सही ढंग से लिखा ही नही गया.

यह सीन ऐसा है, जहां इमोशन उभरना चाहिए और दर्शक की आंखों से आंसू बहने चाहिए. मगर घटिया तरीके से लिखे गए इस सीन का दर्शक पर कोई असर नही होता. महज सरकार परस्ती के लिए बेटी को ले कर जो सीन व संवाद लिखे गए हैं, वह अपना सही प्रभाव छोड़ने की बजाय गलत इशारा ही करते हैं.

शहीद देवैया के साथ ही 1965 व 1971 का युद्ध रीयल घटना है, मगर इस कहानी को लेखकों ने इस तरह पेश किया है कि फिल्म देखते हुए दर्शकों को अंग्रेजी फिल्म ‘टौप गन’ की याद आती है. क्या एयरफोर्स के किसी जांबाज को कौकरोच उपनाम देना सही है, इस का जवाब तो लेखकों के पास नही होगा?

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी तो यह है कि शहीद स्क्वाड्रन लीडर अज्जामदा बोप्पय्या देवैया उर्फ एबी देवैया से आम दर्शक परिचित नही है. फिल्म के प्रमोशन के दौरान लेखक, निर्देशक, कलाकार सोशल मीडिया पर व्यस्त रहे या एयरपोर्ट पर खड़े हो कर फोटो खिंचवा कर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते रहें. और इन में से किसी ने भी शहीद स्क्वाड्रन लीडर अज्जामदा बोप्पय्या देवैया के बारे में बात नहीं की.

युद्ध पर बनी फिल्म में फाइटर विमान, युद्ध बहादुर एयरपायलट व वीरता सब कुछ है, पर इस से फिल्म दर्शनीय नही हो जाती. आज का दर्शक जागरूक है, उसे पता है कि यह सब तो वीएफएक्स व सीजेआई का कमाल है. जब इन लड़ाकू विमानों की उड़ानों की अति हो जाती है तो वह दर्शक उब महसूस करने लगता है. फिर भी फिल्म के अंतिम 20 मिनट दर्शकों को भावनात्मक रूप से अपने साथ जोड़ते हैं. तो वहीं फिल्म के अंतिम दृश्य में जब विजया के परिवार को ‘महावीर चक्र’ दिया जाता है, तो दर्शक की आंखें गीली हो जाती हैं.

फिल्म के कुछ संवाद और कुछ दृश्य अत्यधिक उपदेशात्मक लगते हैं तो कुछ संवाद खलते है. मसलन एक संवाद है, जब संवाद आहूजा एक पाकिस्तानी अधिकारी को अपना परिचय ‘तेरा बाप, हिंदुस्तान’ कह कर देते हैं. लेखकों की सोच होगी कि इस डायलौग पर थिएटर तालियों से गूंजेगा, पर ऐसा नही हुआ.

कुल मिला कर यह फिल्म शहीद देवैया के अटूट साहस के साथ न्याय करने में विफल रही है. लेखक व निर्देशक का वीर पहाड़िया की बजाय अक्षय कुमार के किरदार को हीरे बनाने के चक्कर में कहानी व पटकथा का बंटाधार कर डाला.

ग्रुप कमांडर आहूजा के किरदार में अक्षय कुमार ने बता दिया कि वह बदलने से रहे. वह हर दृश्य में चिरपरिचित अंदाज में सपाट सा चेहरा लिए तन कर खड़े रहते हैं. लगातार 17 असफल फिल्में देते आ रहे अक्षय कुमार को ले कर आलोचकों ने कितनी बार कहा है कि अक्षय को अभिनेता के रूप में खुद को बदलने की जरूरत है.

पर वह एक ही रट लगाए हुए हैं- ‘‘हम नहीं सुधरेंगे..’’ कम से कम अक्षय कुमार को चाहिए कि वह तीनचार माह फिल्मों से दूरी बना कर थिएटर करते हुए अपने अंदर की अभिनय क्षमता को नए सिरे से तलाशें.

शहीद विजया के किरदार में वीर पहाड़िया की तो यह पहली फिल्म है. वह महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे की बेटी के बेटे हैं. उन के पिता बहुत बड़े उद्योगपति हैं. वीर पहाड़िया के हिस्से ऐसे दृश्य कम ही आए हैं, जहां उन की अभिनय क्षमता का आकलन किया जा सके. पर शहीद देवैया के किरदार के लिए जिस तरह का जुनून कलाकार के अंदर चाहिए, उस का वीर पहाड़िया में घोर अभाव नजर आता है.

शहीद विजया की पत्नी के कैरेक्टर में सारा अली खान के हिस्से भी करने को कुछ ज्यादा रहा ही नहीं. सारा अली खान का किरदार सिर्फ एक चिंतित और गर्भवती पत्नी तक सीमित है. देवैया और उन की पत्नी सुंदरी दक्षिण भारत से थे, लेकिन गीता के किरदार में सारा अली खान दक्षिण भारतीय नजर ही नही आती.

दूसरी बात सारा अली खान की निजी जिंदगी में वीर पहाड़िया पूर्व प्रेमी रहे हैं, इस के बावजूद सिनेमा के परदे पर दोनों के बीच एक भी दृश्य में भावनात्मक जुड़ाव न होना खटकता है. निम्रत कौर के हिस्से भी कुछ करने को नही आया. अहमद हुसैन के छोटे किरदार में शरद केलकर अपनी छाप छोड़ जाते हैं.

अक्षय कुमार अपनी हरकतों से अपना करियर तो डुबा ही रहे हैं, पर लगता है कि अब उन्होंने सिनेमा को भी खत्म करने का मन बना लिया है. तभी तो फिल्म ‘स्काई फोर्स’ देखने के लिए दर्शकों को टिकट के दाम पर तीन दिन यानी कि 24,25 ओर 26 जनवरी को 250 रूपए की छूट दी जा रही है. यदि टिकट 250 रूपए तक की है, तो एकदम फ्री. पर यह रकम सिनेमा घर मालिक को कौन देगा? स्वाभाविक तौर पर निर्माता या कलाकार ही देगा. आज ‘स्काई फोर्स’ के निर्माता व कलाकार अरबपति हैं, पर छोटी फिल्म का निर्माता क्या करेगा. यह बहुत बड़ा खतरा है, जिस पर हर इंसान को बात करनी चाहिए.

Home Tips : कैसे रखें साफसुथरा और सुगंधित घर

Home Tips : साफसुथरा और सुगंधित घर बनाए रखने के लिए खुद को काम करना होगा. अब यह काम बेहद सरल हो गया है. जानिए क्या है तरीका.

घर की पुताई लेबर की जगह पर खुद करें. नए समय में अब यह कठिन काम नहीं रह गया है. पुताई से पहले यह समझ लें कि कलर किस किस तरह के आने लगे हैं. उन का सही इस्तेमाल करने से ही घर में चमक आएगी.

आज कल घरों की पेंटिंग के लिए अलगअलग तरह के कलर का प्रयोग किया जाता है. पेंट के प्रकार से ही मजदूरी तय होती है. अगर डिस्टेंपर पेंट कराना है तो लेबर चार्ज 10 रुपए प्रति वर्ग फीट से 12 रूपए के बीच आती है. इमल्शन पेंट 12-60 रुपए प्रति वर्ग फुट, एनेमल पेंट 80 रुपए प्रति वर्ग फीट, लस्टर पेंट 26-30 रुपए प्रति वर्ग फुट, टेक्सचर पेंट 80 -200 रुपए प्रति वर्ग फुट लेबर चार्ज होता है. पेंट के अलावा पुट्टी और प्राइमर जैसे जरूरी सामानों की जरूरत होती है. पुट्टी एक तरह का सफेद सीमेंट होता है. जो पानी से भी बचाव करता है. अगर दीवारों की सतह उबड़खाबड़ है तो यह उसे ठीक कर देता है. आमतौर पर एक किलो पुट्टी 15 स्क्वेयर फुट से 35 प्रति वर्ग फुट तक कवरेज कर देती है.

प्राइमर यह मटेरियल पेंट के लिए बेस का काम करता है और उस के लुक में भी इजाफा करता है. मार्केट में अलगअलग तरह के प्राइमर उपलब्ध हैं, लिहाजा कीमत अलग हो सकती है. एक लीटर प्राइमर में 210-270 प्रति वर्ग फुट का एरिया कवर हो जाता है. पुट्टी का इस्तेमाल करने से पहले पेंट को बेहतर तरीके से चिपकाने के लिए प्राइमर का एक कोट अच्छा रहता है. मजदूरी की लागत सामान के लिए किए गए खर्च का लगभग डेढ़ गुना होती है. मजदूरी पर छोटेबड़े शहर का भी असर रहता है.

किन कंपनियों के पेंट्स का करें इस्तेमाल

सब से अच्छे किस्म के पेंट डूलैक्स पेंट्स, बर्जर पेंट्स, नेरोलैक पेंट्स, एशियन पेंट्स, इंडिगो पेंट्स, निप्पोन पेंट्स और शालीमार पेंट्स कंपनियों के आते हैं. बाजार में इन के मिलतेजुलते नामों के पेंट भी आते हैं. यह कीमत में कम होते हैं. कई बार दुकानदार भी इस किस्म के पेंट्स को बेच देते हैं. अब बड़ीबड़ी पेंट्स कंपनियां खुद पुताई के पहले पूरी जानकारी देने का काम करने लगी हैं. सही कंपनी के पेंटस को ही चुनिए.

एशियन पेंट्स के सब से अधिक पंसद किए जाने वाले पेंट्स में रोयल, एप्को लाइट इमल्शन, ट्रैक्टर डिस्टेंपर और कई अन्य शामिल हैं. नेरोलैक पेंट्स में सब से लोकप्रिय ब्रांड कंसाई नेरोलैक पेंट्स है. इस के अलावा इम्प्रेशन अल्ट्रा एचडी, इम्प्रेशन अल्ट्रा फ्रेश, इम्प्रेशन 24 कैरेट, इम्प्रेशन मेटैलिक फिनिश और कई अन्य सामान ब्रांड हैं.
बर्जर पेंट में सब से लंबे समय तक चलने वाला ग्लौस और सेमी ग्लौस पेंट है. डूलैक्स पेंट्स के पर्ल ग्लो और डूलैक्स वेलवेट टच सहित विभिन्न प्रकार के इंटीरियर पेंट प्रदान करते हैं. इस के अलावा डूलैक्स वेदरशील्ड और पेंट है. इस में दीवार पुट्टी, ऐक्रेलिक प्राइमर, पानी आधारित सीमेंट प्राइमर आदि शामिल हैं.

शालीमार पेंट्स चाय, कौफी और केचप जैसे आम घरेलू दागों के लिए को खत्म करने की क्षमता वाले रंग बनाने के कारण सब से अधिक पंसद किया जाता है. इंडिगो पेंट्स में प्राइमर, डिस्टेंपर, इमल्शन और डिस्टेंपर सहित पानी आधारित पेंट्स है. जौनसन और निकोल्सन पेंट्स के पेंटस भी खूब पंसद किए जाते हैं. यह सब से पुरानी पेंटस कंपनी है.

क्या है पेंट्स की कीमत

पेंट्स की कीमत कंपनी और कलर पर निर्भर करती है. रिटेलर और थोक दुकानदार के पास अलगअलग कीमत मिल सकती है. कई दुकानदार एमआरपी से कम दाम पर भी बेच देते हैं. इन का मार्जिन अधिक होता है. पेंट्स कंपनियां अधिक से अधिक पेंटस बेचने के लिए औफर देती रहती है. ऐसे में पेंट्स की कीमत अलगअलग हो सकती है.

प्लास्टिक पेंट की कीमत को देखें तो 1 लीटर एशियन पेंट्स 70 रूपए से, डूलैक्स 110 रूपए से, नेरोलैक 192 रूपए से शुरू होता है. ब्रांड के हिसाब से कीमत बदल जाती है. 20 लीटर के एशियन प्लास्टिक पेंट की कीमत डूलैक्स पेंट की कीमत 20 लीटर से अलग है. बर्जर सिल्क ग्लैमआर्ट प्लास्टर दीवारों के लिए फिनिश पेंट की कीमत 1 लीटर के लिए 799 रुपए है. बर्जर वालमास्टा बाहरी पेंट की कीमत 1 लीटर के लिए 355 रुपए है. बर्जर इंस्ट्रूमेंट्स बर्जर इंटीरियर ऐक्रेलिक वाल पेंट की कीमत 1 लीटर के लिए 619 रुपए है. बर्जर पेंट्स लक्सोल हाई-ग्लौसस इनेमल पेंट की कीमत 1 लीटर के लिए 500 रुपए है. औल बाउंड की कीमत सब से कम होती है. 2 लीटर की कीमत 350 रूपए है.

कैसे जाने पेंटिंग का बजट

1,000 स्क्वायर फीट के 2 बीएचके फ्लैट को पेंट करने के लिए 30 से 45 लीटर पेंट की आवश्यकता होती है. डिस्टेंपर पेंट का एक कोट लगभग 10 रुपए प्रति वर्ग फुट होता है. इमल्शन पेंट का एक कोट लगभग 15 रुपए प्रति वर्ग फुट होता है. 1,000 स्क्वायर फीट के 2 बीएचके फ्लैट में डिस्टेंपर पेंट की कुल लागत लगभग 10,000 रुपए और इमल्शन पेंट की कुल लागत लगभग 15,000 रुपए होगी. छत को छोड़ कर. पेंट करने योग्य एरिया की कैलकुलेशन सरल है. सब से पहले, जगह की लंबाई और चैड़ाई को आपस में गुणा करें जिस से आप को कुल एरिया मिलेगा. इस में दरवाजे या खिड़कियां जैसे उस हिस्से को घटा दें, जिसे पेंट नहीं करना है. इस तरह से पेंट करने के लिए सही एरिया मिल जाएगा.

खुद करें पुताई

पुताई के लिए घर के अंदर का काम घर के लोग खुद कर सकते हैं. अगर 4 लोग हैं और वह अपनाअपना कमरा बांट लें तो मनोरंजन के साथ पुताई कर सकते हैं. घर के बाहर की दीवारें ऊंची होती है. ऐसे में वह काम जानकार का करना ही ठीक रहता है. घर के अंदर कमरों का काम सरल होता है. ऐसे में अगर आप के पास समय है तो खुद पुताई का काम कर सकते हैं. वैसे भी जब पुताई होती है तो घर के लोग भी काम पर लगे होते हैं.

घर के अंदर की पुताई करना अब सरल काम रह गया है क्योंकि इस के कई सरल तरीके सामने आ गए हैं. घर के बाहर की पुताई कठिन काम होता है. बाहरी दीवारों वाले पेंट की कीमत कम होती है. इसे लगाना ज्यादा बोझिल और समय लेने वाला होता है क्योंकि इस के लिए मचान और दीवारों के लेवल की सीढ़ियों की जरूरत होती है.

आजकल पेंट तैयार आते हैं. इन में केवल पानी मिला कर पुताई की जा सकती है. पुताई के लिए ब्रश और रोलर आने लगे हैं. रोलर का प्रयोग अधिक होता है. दीवार साफ करने के लिए रेगमाल का प्रयोग किया जाता है. दीवारों पर किए जाने वाले रंग अलगअलग किस्म के होते हैं. डिस्टेंपर पेंट में पानी में मिला कर पुताई की जाती है. इमल्शन पेंट पानी या औयल बेस्ड होता है. यह तेजी से सूखता है और शानदार फिनिश देता है. इमल्शन पेंट काफी समय तक चलता है और इस पर लगे दागधब्बों को डिटरजेंट सोल्यूशन के साथ एक कपड़े से साफ कर सकते हैं. ऐसे कुछ पेंट्स में एंटी फंगल के गुण भी होते हैं. इस को प्लास्टिक इमल्शन पेंट और एक्रेलिक इमल्शन पेंट की केटेगरी में बांटा जाता है.

एनेमल पेंट का प्रयोग ऐसी सतहों पर किया जाता है जहां काफी ज्यादा लोग आतेजाते हों. गंदगी ज्यादा होती हो, क्योंकि ये लंबे समय तक चलते हैं. इन की सफाई करना भी बेहद आसान होता है. इन से ग्लौसी इफैक्ट भी मिलता है. ये पानी और दाग से भी निपट लेते हैं. इस का प्रयोग आमतौर पर धातु और लकड़ी की सतह पर किया जाता है. लस्टर पेंट तेल या पानी आधारित होता है. यह मोती की तरह चिकनी फिनिशिंग देता है. लस्टर पेंट को आप बारबार वाश कर सकते हैं. यह सूखने के बाद भी कुछ समय के लिए गंध छोड़ते हैं.

टैक्सचर पेंट का प्रयोग उन दीवारों पर किया जाता है, जिन्हें घर में स्पैशल टच दिया जाता है. इस को लगाने के लिए खास तरह के औजार जैसे चाकू, रोलर, ब्रश, खुरपी और पुट्टी जैसी सामग्री का इस्तेमाल होता है. जो थ्रीडी टैक्सचर बनाने में काम आते हैं. आमतौर पर टैक्सचर पेंट विशालकाय होते हैं और एक अलग तरह की फील देते हैं. टैक्सचर पेंट बेहद महंगा होता है. सामान्य लोग इस का प्रयोग कम करते हैं. स्नोसेम एक खास सीमेंट पेंट है जो पानी, गरमी और रोशनी से भी बचाता है. इसे पानी मिलाने पर यह न तो झड़ता है और न ही उखड़ता है.

सीमेंट पेंट बाहरी दीवारों पर रिसाव और गंदगी को रोकने के लिए पानी आधारित सीमेंट पेंट का उपयोग किया जाता है. यह पेंट दीवारों को सजाने और सुरक्षा देने के लिए अच्छा है क्योंकि यह सीमेंट जैसा दिखता है. यह सूरज की किरणों, बारिश, गरमी और नमी से दीवारों को बचाता है. मैटेलिक पेंट में चमक होती है. क्योंकि इस के आधार में धातु के टुकड़े और कांच जोड़े जाते हैं. इस पेंट में मुख्य रूप से आयरन औक्साइड होता है, जिसे मेटल फ्लेक या पौलीक्रोमैटिक भी कहा जाता है. इसे खासतौर पर एक्सेंट दीवारों पर इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि यह दीवारों को गहराई और चमक देता है. पेंट लगाने के बाद, सतह पर एक हल्की, रेशमी चमक दिखती है.

हमेशा अच्छी क्वालिटी और ब्रांडेड पेंट ही खरीदें. ये दीवारों की रक्षा करने का काम करते हैं. पानी से बचाने वाला प्रोडक्ट घर के बाहरी हिस्से पर लगाना चाहिए, ताकि नमी या पानी का रिसाव रोका जा सके. यह दीवारों और नींव को बारिश और नमी से बचाता है. घर के बाहर के लिए रंग चुनते वक्त दो रंग से ज्यादा नहीं चुनने चाहिए. घर की खिड़कियों और ग्रिलों को पेंट करके जंग को रोकें, जिस से भविष्य में पेंटिंग की लागत बच जाएगी.

कैसे करें पुताई

डार्क रूम को गहरे रंगों और रोशनीदार कमरे को हल्के रंगों से पुतवाना चाहिए. पुताई करने से पहले दीवारों के छेद भरने का काम शुरू करें. दीवारों पर बहुत सारी धूल और मलबा चिपक जाता है. इसे गीले कपड़े से साफ कर सकते हैं या वैक्यूम कर सकते हैं. यदि गहरे रंग के स्थान पर हल्का रंग लगा रहे हैं तो पहले प्राइमर करें. पेंट का काम शुरू होने से पहले फर्नीचर को हटा दें या तिरपाल से ढक दें. पुताई में रंग और कूची का साथ बहुत पुराना हो गया है, अब जमाना ब्रश और रोलर का है जिस से रंग करना बेहद सरल होता है. इस के अलावा अब कमरे की पुताई के लिए अच्छी सीढ़ी भी आने लगी है.

पुताई करते समय कपड़े खराब न हों इस के लिए कपड़ों के ऊपर पहनने के लिए किट आने लगी है. हाथ खराब न हो तो ग्लब्स यानी दस्तानों का प्रयोग किया जा सकता है. जूते भी अलग किस्म के आते हैं. जल्दी दीवारें खराब न हो केवल सफाई से काम चल जाए इस के लिए नियमित कार्यों के भाग के रूप में, पेंट की गई दीवारों को कम से कम हर महीने धूलमिट्टी साफ करनी चाहिए और मकड़ी के जाले हटाने चाहिए. महीने में दो बार तो और भी बेहतर होगा. हर हफ्ते दरवाजे के हैंडल और लाइट स्विच के आसपास के दाग और गंदगी को साफ करना चाहिए.

पुताई के लिए जरूरी सामाग्री

पुताई करने के लिए सब से पहले एक बाल्टी, कपड़ा, स्टेप स्टूल या सीढ़ी, मीठा सोडा चाहिए. पुताई के लिए सब से पहले धूल हटाएं, दीवार के उपर से शुरू करते हुए, धूल और मकड़ी के जाले को हटाने का काम करें. हमेशा मजबूत स्टूल या सीढ़ी का उपयोग करें. दीवार से धूल हटाने के लिए डस्टिंग ब्रश से वैक्यूम करें. पहले कपड़े या वैक्यूम क्लीनर से दीवारों को साफ करें. बेहतर होगा कि दीवारों को धो दें. पहले यह देख लें कि बिजली बंद हो और लाइट स्विच और आउटलेट प्लेट के आसपास की जगहों को सावधानीपूर्वक साफ करें. इन जगहों को ज्यादा गीला न होने दें.

पेंट करने के लिए कूची और ब्रश की जगह पर रोलर आने लगा है. इस में छोटे हैंडल और बड़े हैंडल वाले रोलर आते हैं. इन की वजह से कलर करना सरल हो गया है. जमीन से ही ऊंची दीवार पर कलर कर सकते हैं. रोलर में लगा हैंडल बड़ा होता है. बड़े हैंडल वाले रोलर की कीमत 500 से 900 रूपए के बीच होती है. बड़े हैंडल में छोटाबड़ा करने की सुविधा भी होती है. इस की मदद से सीढ़ी पर चढ़ कर पेंट करने का खतरा लेने की जरूरत नहीं है.
पुताई करने से पहले दीवार को ठीक करने के लिए ब्रश और रोलर के साथ मिलने लगे हैं. रोलर के सहारे कैमिकल को दीवार पर लगा कर छोड़ने से कुछ समय में दीवारें ठीक हो जाती हैं. इस के बाद पेंट्स कर सकते हैं.

स्प्रे पेंटिंग की टैक्नोलौजी भी आ गई है. पेंट्स के डिब्बे के आगे स्प्रे मशीन लगी होती है. स्प्रे करने से ही रंग दीवारों पर सही तरह से फैल जाता है. दीवार पर पुट्टी लगाने के लिए साधरण पत्ती की जगह पर हैंडल वाली पट्टी 200 रूपए की आ गई है. इस से पुट्टी लगाने में हाथ को खतरा नहीं होता है. हाथों को रंगों से नुकसान न हो इस के लिए ग्लब्स का प्रयोग कर सकते हैं. रबर से बने दस्ताने 300 रूपए जोड़े की कीमत वाले होते हैं. जिस तरह से खाना बनाने वाले शेफ एप्रेन पहनते हैं उसी तरह के एप्रेन और पहनने वाली किट भी आती है. जिस से पुताई करते हुए भी आप स्टाइलिश दिख सकते हैं. इस तरह से पुताई शुरू करें. खुद से पुताई करने से बचत और लगाव दोनों होता है. ऐसे में बिना झिझक अपने घर की पुताई करें.

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