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Bollywood : लवयापा – कमजोर लेखन, निर्देशन व अभिनय

Bollywood : अपने बेटे जुनैद खान की अद्वैत चंदन के निर्देशन में बनी फिल्म ‘लवयापा’ के प्रमोशन के दौरान मिस्टर परफैक्शनिस्ट यानी कि अभिनेता आमीर खान ने प्रण लिया था कि अगर उन के बेटे जुनैद खान की फिल्म ‘लवयापा’ बौक्स औफिस पर सफल हो गई, तो वह हमेशा के लिए सिगरेट पीना छोड़ देंगें. अपने बेटे की फिल्म ‘लवयापा’ को सफल बनाने के लिए आमीर खान व उन की पीआर टीम ने काफी मशक्क्त की. पर शायद आमीर खान भूल गए कि सोशल मीडिया पर हंगामा मचाने मात्र से किसी भी फिल्म को दर्शक मिलने से रहे.

फिल्म के प्रमोशन के लिए आमीर खान ने राज ठाकरे सहित कुछ राजनेताओं से उन के घर जा कर उन से मुलाकात की, राजनेताओं से मुलाकात करने से फिल्म देखने दर्शक सिनेमाघर में आते हैं, यह बात हमें पता नहीं थी. बहरहाल, आमीर खान के बेटे जुनैद खान की फिल्म ’लवयापा’ 7 फरवरी को सिनेमाघर पहुंच चुकी है. मगर आमीर खान के लिए खुश होने की बात है कि उन्हें सिगरेट छोड़ने की जरुरत नहीं पड़ेगी.

फिल्म ‘लवयापा’ इतनी बेतुकी फिल्म है कि पहले दिन यानी कि 7 फरवरी को 50 करोड़ की लागत में बनी यह फिल्म बौक्स औफिस पर महज एक करोड़ रूपए ही एकत्र कर सकी. इतनी बड़ी नाकद्री दोदो नेपोकिड की फिल्म का. जी हां! इस फिल्म में आमीर खान के बेटे जुनैद खान के साथ श्रीदेवी व बोनी कपूर की बेटी तथा जान्हवी कपूर की बहन खुशी कपूर हैं. यह दोनों इस से पहले क्रमशः महाराज और आर्चीज में भी नजर आ चुके हैं.

फिल्म ‘लवयापा’ की कहानी दिल्ली की है. जहां 24 साल के गौरव सचदेवा (जुनैद खान) और बानी शर्मा (खुशी कपूर) एकदूसरे से प्यार करते हैं. दोनों एकदूसरे को बानी बू और गुच्ची बू के नाम से बुलाते हैं. दोनों ही दिनरात मोबाइल पर लगे रहते हैं और एकदूसरे को अपने बारे में पलपल की जानकारी देते रहते हैं. इन दोनों को लगता है कि यह एकदूसरे को बहुत बेहतर समझते हैं. उन के बीच विश्वास की कभी न टूटने वाली डोर है. लेकिन विश्वास कब अविश्वास में बदल जाए, इस की गारंटी तो ईश्वर भी नहीं दे सकते.

हर वक्त फोन पर चिपके रहने वाली आदत से गौरव की मां (गृशा कपूर) बहुत चिढ़ती है. उन्हें लगता है कि घर में गौरव की बहन किरण (तनविका पार्लिकर) की शादी उस के मंगेतर डाक्टर अनुपम (कीकू शारदा) होने वाली है और गौरव का पूरा ध्यान फोन पर है.

उधर बानी के पिता अतुल कुमार शर्मा (आशुतोश राणा) ठहरे अति सख्त पिता. खुद बानी और उन की छेाटी बहन अपने पिता से डरती है. बानी, गुच्ची से उपहार में मिला मोबाइल फोन मौल में हुए कंपटीशन में जीता हुआ बताती है, पर उन के पिता समझ जाते हैं कि वह झूठ बोल रही है. वह सितार अच्छा बजाते हैं. साथ में शुद्ध हिंदी में बातें करते हैं. बानी के पिता उस की शादी के लिए लड़का देख रहे हैं.

एक दिन वह फोन पर गौरव और बानी की प्यार भरी बातें सुन लेते हैं. अब मजबूरन अतुल कुमार शर्मा के आदेश पर बानी को अपना हाथ मांगने के लिए गौरव को अपने पिता के सामने लाना पड़ता है. बानी के पिता गौरव और बानी की शादी से पहले एक शर्त रखते हैं कि उन्हें 24 घंटे के लिए एकदूसरे के साथ अपना फोन एक्सचेंज करना पड़ेगा और उस के बाद ही उन की शादी का फाइनल डिसिजन होगा. मगर जैसे ही वे दोनों फोन एक्सचेंज करते हैं, उन के बीच विश्वास की दीवार ढहने लगती है.

गौरव और बानी को एकदूसरे के बारे में ऐसीऐसी बातें पता चलने लगती हैं, जिस के बारे में उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी. बानी के फोन से गौरव को पता चलता है कि वह इस से पहले किन लड़कों से किस तरह की चैट करती रही है, किन के साथ उस का लव अफेयर रहा है. किस लड़के के साथ वह लंबी ड्राइव पर जा चुकी है आदि. तो वहीं बानी को पता चलता है कि गौरव किस तरह की नीच हरकतें करता रहा है.

बानी व गौरव के फोन की अदलाबदली के बाद दोनों की रिश्तों में में आए तूफान का असर गौरव की बहन किरण और होने वाले जीजा डा. अनुपम (कीकू शारदा) के रिश्ते पर भी पड़ता है. अब एकदूसरे के फोन में छिपी सच्चाई का पता लगने के बाद गौरव और बानी का रिश्ता किस करवट बैठेगा, इस के लिए तो फिल्म ही देखनी पड़ेगी.

फिल्म ‘लवयापा’ के निर्देशक अद्वैत चंदन है, जो कि पिछले तीस वर्षों से आमीर खान के साथ निजी सहायक के रूप में जुड़े हुए हैं. आमीर खान अभिनीत पिछली फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ का निर्देशन कर अद्वैत चंदन ने आमीर खान को भी घर पर बैठा दिया था. ‘लाल सिंह चड्ढा’ बौक्स औफिस पर इस कदर असफल हुई कि आमीर खान ने अभिनय से दूरी बना ली थी और अब वह सिर्फ बतौर निर्माता आगे आ रहे हैं. इस के बाद भी उन्होंने अपने बेटे जुनैद खान की फिल्म के लिए निर्देशक के रूप में अद्वैत चंदन को ही क्यों चुना, इस की वजह तो आमीर खान ही बेहतर बता सकते हैं. लेकिन कड़वा सच यह है कि ‘लवयापा’ एक वाहियात फिल्म है. पटकथा तो गड़बड़ है ही साथ में इस के कुछ संवाद भी बहुत ही ज्यादा घटिया हैं. मसलन आशुतोष राणा का एक जगह संवाद है ’हिसाब और पेशाब बराबर होना चाहिए’ इतना ही नहीं अद्वैत चंदन, जुनैद खान और खुशी कपूर दोनों से अभिनय नहीं करवा सके.

फिल्म ‘लवयापा’ एक मलयालम फिल्म ‘लव टुडे’ का हिंदी रीमेक है. मगर मलयालम में यह फिल्म सिर्फ 5 करोड़ में बनी थी, जबकि ‘लवयापा’ का बजट 100 करोड़ से ऊपर बताया जा रहा है. दूसरी बात इस फिल्म से दोदो नेपोकिड लौंच हुए हैं. ऐेसे में कहानी व विषय वस्तु पर ध्यान देना निहायत जरुरी था. वर्तमान समय में बच्चे से ले कर बूढ़े तक के लिए उन का मोबाइल बहुत अहम है. सभी अपना मोबाइल सीने से लगा कर रखते हैं. जबकि फिल्म की कहानी का आधार ही 24 घंटे के लिए प्रेमी व प्रेमिका के मोबाइल की अदलाबदली है.

वर्तमान समय में जेन जे की नई पीढ़ी अपना मोबइल की अदलाबदली करने से रही तो लोगों को यह कौंसेप्ट ही गले नहीं उतरा जब लोग मूल कथानक के साथ ही रिलेट नहीं कर पा रहे हैं तो वह फिल्म के साथ कैसे रिलेट कर पाएंगे? इसी के साथ फिल्मकार ने इस फिल्म में डीपफेक, बौडीशेमिंग जैसे मुद्दे भी जबरन ठूंस दिए हैं और तो और फिल्म के दूसरे नायक किकू शारदा का किरदार अपने मोबाइल को अपनी मंगेतर से छिपा कर रखने की जो वजह बताता है, वह भी किसी की भी समझ में नहीं आती.

पटकथा लेखक स्नेहा देसाई और निर्देशक अद्वैत चंदन यह भी भूल गए कि आज की नई पीढ़ी का प्यार काफी डे से शुरू और काफी डे पर खत्म हो जाता है. आज की पीढ़ी अपने फोन पर बहुत कुछ चैट करती रहती है, कई बार महज दूसरों को चिढ़ाने के लिए भी. और तो और अब प्रीवेडिंग फोटोशूट का जमाना है और हम प्रीवेडिंग फोटो शूट के कुछ दिन बाद दोनों के अलग होने की खबरें सुन कर चौंकते नहीं हैं. जेन जी के रिश्तों की उलझनों को और गइराई से दर्शाया जाना चाहिए था, पर लेखक व निर्देशक बुरी तरह से चूक गए.

माना कि फिल्म कई जगहों पर कौमेडी और रोमांस का कौम्बो पेश कर मनोरंजन करती हैं. कीकू शारदा और तन्विका पार्लिकार और गौरव के दोस्तों का ट्रैक दिलचस्प है. फिल्म में पेरैंट्स बने गृशा कपूर और आशुतोष राणा के चरित्रों के जरिए आज की जनरेशन को संदेश देते हैं, ‘रिपेयर करना सीखो, रिप्लेस नहीं.’ गुच्ची की मां का किरदार निभा रही ग्रुशा कपूर भी सलाह देते हुए कहती हैं, ’बेटा सेल फोन हर दो साल में बदले जाते हैं, रिश्ते नहीं..’ पर आज की पीढ़ी किसी से भी संदेश नहीं लेना चाहती.

निर्देशक अद्वैत चंदन की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने अपनी फिल्म ‘लवयापा’ में यह दिखाने का साहस किया कि ‘लड़का’ और ‘लड़की’ दोनों के फोन में रहस्य छिपे होते हैं, जो कि उन के बीच के रिश्तों को उथलपुथल कर सकते हैं.

फिल्मकार अद्वैत चंदन ने जेन जेड की छीछालेदर व उन का अपमान करने में अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं रखी. मगर क्या उन्हें नहीं पता कि तमाम बुजुर्ग के मोबाइल में पोर्न क्लिप मौजूद होती हैं, जिन्हें वह अपने व्हाट्सएप ग्रुप में शेअर करते रहते हैं. स्कूल व कालेज में पढ़ाई के दौरान लड़के व लड़कियां अनजाने व नासमझी में अपने दोस्तों के साथ मस्ती में कई कारनामे ऐसे करते रहते हैं, जिन्हें उचित नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन इस का यह अर्थ नहीं है कि आप रिश्तों की बलि चढ़ा दें. फिल्म इस संबंध में चुप्पी साध जाती है.

लेखकों व निर्देशक को तो यह भी पता नहीं कि हर रिश्ते में अंततः समाज आता ही है. दूसरी बात क्या आज की युवा पीढ़ी इतनी मूर्ख है कि वह पूर्व प्रेमी को साथ ले कर वर्तमान प्रेमी से मिलेगी? फिल्म में बौडी शेमिंग का भी मुद्दा उठाया गया है, जिस पर अतीत में कई फिल्में बन चुकी हैं. अभी कुछ समय पहले ही सोनाक्षी सिन्हा की भी इस सब्जेक्ट पर फिल्म आई थी. बौडीशेमिंग को ले कर उपदेशात्मक लंबाचौड़ा कीकू शारदा का भाषण कहानी के प्रवाह में खलल डालने के साथ ही बोर करता है.

एडिटर ने इस फिल्म को एडिटिंग टेबल पर ठीक से कसा ही नहीं. इंटरवल से पहले फिल्म बहुत गड़बड़ है. फिल्म का संगीत भी दोयम दर्जे का है तो वहीं कलाकारों का घटिया अभिनय भी इस रीमेक फिल्म की कमजोर कड़ियों में से एक है.

जुनैद खान के अभिनय में धार की कमी है. इस फिल्म से बेहतर व ‘महाराज’ में नजर आए थे. जुनैद खान के पास न तो आकर्षक स्क्रीन्स प्रजेंस है और न ही उन्हें अच्छे लहजे में बात करना आता है. उन की आवाज गड़बड़ है. वह हंसते ज्यादा हैं, बात कम करते हैं. खुशी कपूर तो अभिनय के लिए तैयार ही नहीं है. खुशी कपूर ओटीटी पर नैटफिलक्स की सीरीज ‘आर्चीज’ से अभिनय जगत में कदम रख चुकी है, इसलिए उम्मीद थी कि कैरियर की दूसरी फिल्म में वह कुछ अच्छा अभिनय कर सकेंगी, पर ऐसा नहीं हुआ.

Deva : साउथ की एक और रीमेक फेल, खतरे में शाहिद कपूर का करियर ?

Deva : देवा फिल्म में एक बार फिर शाहिद कपूर की साउथ रीमेक है. जितना फिल्म का बजट था उस अनुपात में कमाई नहीं कर पाई है.

जनवरी माह के चौथे सप्ताह के हंगामेदार रहने के बाद पांचवें सप्ताह यानी कि 31 जनवरी 2025 को सिर्फ एक फिल्म ‘देवा’ ही प्रदर्शित हुई. जो कि मलयालम फिल्मकार रोशन एंड्यूज की 2013 में प्रदर्शित मलयालम फिल्म ‘मुंबई पुलिस’ का हिंदी रीमेक है. हिंदी रीमेक का निर्देशन भी रोशन एंड्यूज ने ही किया है. इस फिल्म में शाहिद कपूर की मुख्य भूमिका है.

2019 में शाहिद कपूर की फिल्म ‘कबीर सिंह’ ने जबरदस्त कमायी की थी. इस फिल्म के बाद शाहिद कपूर ने ऐलान किया था कि अभिनय में उन का कोई मुकाबला नहीं कर सकता. जबकि ‘कबीर सिंह’ से पहले शाहिद कपूर लगातार 28 असफल फिल्में दे चुके थे. फिल्म ‘कबीर सिंह’ में शाहिद कपूर ने हिंसात्मक प्रवृत्ति और सैक्स के प्रति पागल युवक का किरदार निभाया था. इस किरदार और फिल्म की विषयवस्तु के खिलाफ कई महिला संगठनों ने आवाज भी उठाई थी.

फिल्म ‘कबीर सिंह’ के बाद अब तक शाहिद कपूर की ‘जर्सी’, ‘ब्लडी डैडी’,‘तेरी बाहों में ऐसा उलझा जिया’ फिल्में रिलीज हो चुकी हैं और इन सभी फिल्मों ने बौक्स औफिस पर निर्माताओं को खून के आंसू रुलाया. एक भी फिल्म अपनी लागत वसूल नहीं कर पाई.

ऐसे हालात में शाहिद कपूर को अपने कैरियर को पटरी पर लाने के लिए ‘देवा’ से काफी उम्मीदें थीं. पर साढ़े 300 करोड़ रूपए के बजट में बनी फिल्म ‘देवा’ पूरे 7 दिन के अंदर महज 28 करोड़ रूपए ही एकत्र कर सकी. इस में से निर्माता की जेब में महज 10 करोड़ रूपए ही आएंगे. यह बौक्स आफिस आंकड़े निर्माता ने दिए हैं जबकि फिल्म इंडस्ट्री व ट्रेड पंडितों के अनुसार यह आंकड़ा महज 20 करोड़ रूपए ही हैं. यानी कि ‘देवा’ बुरी तरह से असफल हो चुकी है. इसी के साथ शाहिद कपूर का कैरियर भी सवालों के घेरे में आ गया है.

फिल्म ‘देवा’ की असफलता के लिए लोग पूरी तरह से शाहिद कपूर को ही दोषी ठहरा रहे हैं. क्योंकि उन्होंने ऐन वक्त पर फिल्म ‘देवा’ का कलायमैक्स व अपने किरदार में बदलाव कर फिल्म को बरबाद कर डाला. फिल्म में देवा एक ऐसा पुलिस अफसर है जो कि अपने सहकर्मी पुलिस आफसर की हत्या कर देता है.

मूल मलयालम फिल्म में इस की वजह यह बताई गई है कि देवा एक ‘हिजड़ा’ है. यह बात केवल एक पुलिस अफसर को ही पता थी, जिस ने देवा को धमकी दी थी कि वह यह सच पुलिस विभाग में उजागर कर देगा. तो यह बात उजागर होती, उस से पहले ही सच जानने वाले पुलिस अफसर की देवा ने हत्या कर दी थी. मगर शाहिद कपूर ने हिजड़े का किरदार निभाने से इंकार करते हुए इसे बदलवा कर यह करवाया कि उस पुलिस अफसर ने उसे घूस लेते हुए देख लिया था, इसलिए उस की हत्या कर दी.

यह बात किसी भी दर्शक के गले नहीं उतरी क्योंकि वह पुलिस अफसर देवा का अति प्रिय देास्त भी था. ऐसे में घूस लेत देखेने मात्र से उस की हत्या करना लोगों के गले नहीं उतरी और फिल्म को दर्शक नसीब नहीं हुए. इस के अलवा भी फिल्म में काफी कमियां हैं.

उधर 60 करोड़ रूवए की टिकटें निर्माता व कलाकारों द्वारा खरीदे जाने के बाद भी ‘स्काई फोर्स’ 15 दिन में 100 करोड़ का ही आंकड़ा छू पाई है. 60 करोड़ घटाने पर यह 40 करोड़ हो जाते हैं. जबकि इस फिल्म क बजट 380 करोड़ रूपए है.

Valentine’s Special : दूरदर्शिता- विवेक क्यों माधुरी से दूर हो गया?

Valentine’s Special : रो रो कर माधुरी अचेत हो गई थी. समीप बैठी रोती कलपती मां ने उस का सिर अपनी गोद में रख लिया और उसे झकझोरने लगीं, ‘‘होश में आ, बेटी.’’ एक महिला दौड़ कर गिलास में पानी भर लाई. कुछ छींटे माधुरी के मुंह पर मारे तो धीरेधीरे उस ने आंखें खोलीं. वस्तुस्थिति का ज्ञान होते ही वह फिर विलाप करने लगी थी, ‘‘तुम मुझे छोड़ कर नहीं जा सकते. मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी. मां, उन्हें उठाओ न. मैं ने तो कभी किसी का बुरा नहीं किया, फिर मुझ पर यह कहर क्यों टूटा? क्यों मुझे उजाड़ डाला…’’ उसे फिर गश आ गया था.

आंगन में बैठी मातमपुरसी करने आईं सभी महिलाओं की आंखें नम थीं. हादसा ही ऐसा हुआ था कि जिस ने भी सुना, एकबारगी स्तब्ध रह गया. माधुरी का पति विवेक व्यापार के सिलसिले में कार से दूसरे शहर जा रहा था. सामने से अंधी गति से आते ट्रक ने इतनी बुरी तरह से रौंद डाला था कि कार के साथसाथ उस का शरीर भी बुरी तरह क्षतविक्षत हो गया. ट्रक ड्राइवर घबरा कर तेजी से वहां से भाग निकलने में सफल हो गया.

धुरी ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘गुडि़या सोई हुई है,’’ बड़ी बहन ने धीरे से कहा.

‘‘उसे दूध…’’‘‘मैं ने पिला दिया है.’’

कुछ न करने की मजबूरी से तड़प रहे थें

बड़ी बहन बंबई से आई थी. उस का पति व इकलौता 5 वर्षीय बेटा भी साथ था. विवेक की असमय दर्दनाक मृत्यु से पूरा परिवार भीतर तक हिल गया था. मांबाप अपने सीने पर पत्थर रख बेटी को विदा करते हैं. अगर वही कलेजे का टुकड़ा 2 वर्षों में ही उजड़ कर उन की आंखों के समक्ष आ खड़ा हो तो मांबाप की कारुणिक मनोदशा को सहज ही समझा जा सकता है. पिछले 10 दिनों से रोरो कर उन के आंसू भी सूख चुके थे. बेटी के जीवन में अकस्मात छा गए घटाटोप अंधेरे से वे बुरी तरह विचलित हो गए थे. बेबसी, लाचारी और कुछ न कर पाने की अपनी मजबूरी से वे स्वयं भीतर ही भीतर तड़प रहे थे.

2 वर्ष पहले ही तो माधुरी दुलहन बन विदा हुई थी. क्या उस का रंगरूप था और क्या उस में गुण थे. एक भरीपूरी गुणों और सुंदरता की वह खान थी. रंगरूप ऐसा कि देखने वाला पलभर ठहरने के लिए विवश हो जाए, वह डाक्टर थी. स्वभाव इतना मृदु कि घर वाले उस पर फख्र करते. कभी गुस्से में तो किसी ने देखा ही नहीं था. अपने स्नेह, प्रेम, विश्वास, अपनत्व के लबालब भरे प्याले से वह विवेक को पूरी तरह संतुष्ट रखे हुए थी.

‘सच कहूं माधुरी, तुम्हें पा कर मेरा जीवन धन्य हो गया,’ अकसर विवेक कहता रहता.माधुरी मंदमंद मुसकराती तो वह उसे आलिंगनबद्ध कर प्रेम की फुहार कर देता. तब वह भी तो तृप्त हो जाती थी. कभीकभार हलकी सी तकरार, नोकझोंक भी होती लेकिन वह उन के प्रेम में कमी या दरार न बन कर टौनिक का ही काम करती.एक दिन माधुरी ने कहा था, ‘आज रवींद्र नाट्यगृह में रंगोली की प्रदर्शनी लगी है. चलो, देख कर आते हैं.’

‘अरे भई, हमें रंगोली से क्या लेनादेना. इस के बजाय कोई फिल्म देख आते हैं. रीगल सिनेमाघर में एक बढि़या अंगरेजी फिल्म लगी है,’ विवेक ने टालते हुए कहा.

‘ऊंह, तुम्हें तो मेरी पसंद से मतलब ही नहीं. हर बार अपनी ही मरजी चलाते हो,’ माधुरी के स्वर में रोष था.

‘कौन सी मरजी चलाई है मैं ने? क्या पिछली बार तुम्हारी पसंद का नाटक देखने नहीं गए थे? उस दिन भी तुम्हारे कहने से फिल्म का प्रोग्राम रद्द किया था…’

‘अच्छा बाबा, बस करो. अब और सूची मत पढ़ो. जो तुम्हारी मरजी हो, करो.’ विवेक चुपचाप कपड़े बदल कर पलंग पर जा लेटा. शायद कुछ खफा हो गया था. माधुरी भी दूसरी ओर मुंह कर के लेट गई. खाना मेज पर पड़ापड़ा ठंडा हो गया. आधा घंटा बीत गया था.

माधुरी सोच रही थी, ‘झूठा, बेईमान, मुझ से हमेशा कहता है कि तुम कभी नाराज मत होना. मैं तुम्हारा मुसकराता चेहरा ही सदा देखना चाहता हूं. तुम्हें छेड़े बिना मुझे तो नींद ही नहीं आती. तुम तो जानती हो, मैं तुम्हारे बगैर रह नहीं सकता.

‘अब घंटेभर से मैं इधर मुंह किए पड़ी हूं तो पूछा तक नहीं कि क्यों नाराज हो? खाना खाया या नहीं? अब कैसे नींद आ रही है मुझे छेड़े बिना? सभी मर्द एक जैसे होते हैं, मतलबी. अपने स्वार्थ के लिए बीवी की तारीफें, खुशामदें करते हैं, मिमियाते हैं और काम निकल जाने पर फिर शेर बन जाते हैं.?

विवेक ने पलट कर देखा, ‘क्या हुआ?’

‘मेरा सिर. घंटेभर से उधर मुंह किए पड़े हो और अब पूछ रहे हो क्या हुआ? न खाना खाया…’ शेष शब्द हलकी सी रुलाई में खो गए.

‘ओह, तो तुम्हें भूख लगी है. फिर इतनी देर से क्यों नहीं कहा?’ विवेक ने उस के आंसुओं से भरे चेहरे को चुंबनों से सराबोर कर दिया, ‘अब तो खुश हो. कल रंगोली देखने चलेंगे. चलो, अब खाना खाते हैं, नाराजगी खत्म.’

फिर खाना गरम कर दोनों ने खाया. ऐसे ही रूठने, मनाने में साल मानो पलों में बीत गया था. घर में ही खोली गई माधुरी की डिस्पैंसरी अच्छी चलने लगी थी. गुडि़या के आ जाने से उन के प्रेम की डोर और दृढ़ हो गई. नाजुक, रुई सी मुलायम गुडि़या को उठाते वक्त विवेक नाटकीय घबराहट दिखाता, ‘भई, मुझे तो इसे उठाने में डर लगता है. गुडि़या रानी, जल्दी से बड़ी हो जाओ. फिर तुम्हारे साथ तुतलाने, बतियाने, खेलने में बड़ा मजा आएगा. तुम भी अपनी मां जैसे नकली रूठनेमनाने के अभिनय करोगी?’ कहते हुए वह माधुरी की ओर शरारत से देखता तो वह भी नकली क्रोध से कहती, ‘अच्छा, तो मेरी नाराजगी आप को नकली लगती है, ठीक है अब असली…’‘न बाबा, न, मैं ने तो मजाक किया था. सचमुच रूठने की बात मत करना.’

सचमुच की नाराजगी तो विवेक ने ही जाहिर कर दी थी. उस से रूठ कर कितनी दूर चला गया था. उस ने तो कभी स्वप्न में भी इस तरह उजड़ने की कल्पना न की थी.

पिछले 10 दिनों में जब भी माधुरी की चेतना लौटती, यही लगता कि अभी विवेक शरारत से मुसकराते हुए सामने आ खड़ा होगा, ‘देखा, कैसे बुद्धू बनाया तुम्हें. मैं सचमुच में थोड़े ही मरा था. वह तो झूठमूठ अभिनय कर रहा था, तुम्हें तंग करने के लिए.’

माधुरी के चेहरे पर हलकी सी राहत और आंखों में चमक, मुसकराहट देख बड़ी बहन सशंकित हो उठती, ‘‘क्या हुआ, माधुरी?’’

फिर वस्तुस्थिति का भान होते ही वह बहन से लिपट आर्तनाद कर उठती, ‘‘दीदी, मैं क्या करूं? कैसे जिंदगी गुजारूंगी उन के बिना? मेरी गुडि़या अनाथ हो गई…’’ और इस विलाप में वह फिर बेसुध हो जाती.

मां, पिताजी, दीदी, जीजाजी, विवेक की मां, भैयाभाभी देर रात तक बैठते, माधुरी के भविष्य के बारे में विचारविमर्श करते. कोई ठोस निर्णय लेने से पहले माधुरी की राय तो आवश्यक थी ही, पर उस से पहले सर्वसम्मति से किसी निर्णय का आधार तो बनाना था.

‘‘गुडि़या को माधुरी की बड़ी बहन को सौंप दिया जाए. उस के एक ही बेटा है, गुडि़या वहां भली प्रकार से पल जाएगी. माधुरी अपनी डिस्पैंसरी देखती रहे. फिर जहां जब कोई सुपात्र मिले तो पुनर्विवाह…’’ माधुरी की मां ने धीरेधीरे संकोच के साथ अपने विचार प्रस्तुत कर दिए.

‘‘यह कैसे संभव है?’’ विवेक की मां कुछ तेजी से बोलीं, ‘‘फिर गुडि़या के बगैर माधुरी कैसे रह पाएगी?’’

दीदी, जीजाजी अब तक आपस में काफी गुफ्तगू कर चुके थे. दीदी बोलीं, ‘‘हम गुडि़या को बाकायदा गोद लेने के लिए तैयार हैं.’’

‘‘माधुरी को हम समझा लेंगे. यह तो निश्चित है कि गुडि़या के कारण उस के पुनर्विवाह में अड़चनें आएंगी और यह भी उतना ही सच है कि अपनी ममता को मारने के लिए वह कदापि तैयार नहीं होगी. विवेक के प्रेम की निशानी वह खोना नहीं चाहेगी, पर जीवन में कभीकभी ऐसे निर्णय लेने के लिए विवश होना पड़ता है जिन्हें हमारा मन कहीं गहरे तक स्वीकारने की इजाजत नहीं देता,’’ डबडबा आई आंखों को पल्लू से पोंछते हुए मां ने कहा.

‘‘अगर माधुरी इस निर्णय के लिए तैयार हो तो ठीक है,’’ विवेक की मां के स्वर में निराशा थी, ‘‘लेकिन लोग क्या कहेंगे? समाज द्वारा उठाए गए सवालों, लोगों की चुभती बातों, तानों, उठती उंगलियों…इन सब का सामना…’’ अपनी शंका भी जाहिर कर दी उन्होंने. साथ ही, यह भी कहा, ‘‘हमें लोगों की जबानों या नजरों से अधिक अपनी बेटी के भविष्य की चिंता है. लोग 2 दिन बोल कर चुप हो जाएंगे.’’

माधुरी के सामने उस के भविष्य की भूमिका बांधते हुए मां ने ही धीरेधीरे झिझकते हुए टुकड़ों में अपनी बात को रखा. परंतु वह सुनते ही बिफर पड़ी, ‘‘आप लोग मेरी गुडि़या मुझ से छीनना चाहते हैं. पति तो पहले ही साथ छोड़ गए…’’

काफी वक्त लगा था उसे सहज होने में. मां ने फिर बड़े धैर्य से उसे समझाया था. साथ ही, दीदी, विवेक की मां, भाभी ने भी अपनी सहमति प्रकट की और पहाड़ सी जिंदगी का हवाला देते हुए निर्णय को स्वीकारने की राय दी.

तेरहवीं के बाद जब गुडि़या को दीदी की गोद में डाला गया तो इस अद्भुत लाचार व दूरदर्शी फैसले पर जहां घर के सदस्यों की आंखें नम थीं, वहीं समाज में तेजी से कानाफूसी आरंभ हो गई थी. पति व बेटी की जुदाई की दोहरी पीड़ा से व्यथित माधुरी की रोती, थकान से बोझिल आंखें पलभर को मुंद गई थीं और सभी यंत्रणाओं से पलभर के लिए उस ने नजात पा ली थी.

Valentine’s Special : भीगी पलकों में गुलाबी ख्वाब

Valentine’s Special : मालविका की गजल की डायरी के पन्ने फड़फड़ाने लगे. वह डायरी छोड़ दौड़ी गई. पति के औफिस जाने के बाद वह अपनी गजलों की डायरी ले कर बैठी ही थी कि ड्राइंगरूम के चार्ज पौइंट में लगा उस का सैलफोन बज उठा.

फोन उठाया तो उधर से कहा गया, ‘‘मैं ईशान बोल रहा हूं भाभी, हम लोग मुंबई से शाम तक आप के पास पहुंचेंगे.’’

42 साल की मालविका सुबह 5 बजे उठ कर 10वीं में पढ़ रहे अपने 14 वर्षीय बेटे मानस को स्कूल बस के लिए  रवाना कर के 49 वर्षीय पति पराशर की औफिस जाने की तैयारी में मदद करती है. नाश्तेटिफिन के साथ जब पराशर औफिस के लिए निकल जाता और वह खाली घर में पंख फड़फड़ाने के लिए अकेली छूट जाती तब वह भरपूर जी लेने का उपक्रम करती. सुबह 9 बजे तक उस की बाई भी आ जाती जिस की मदद से वह घर का बाकी काम निबटा कर 11 बजे तक पूरी तरह निश्चिंत हो जाती.

इस वक्त शेरोशायरी, गीतगजलों की लंबी कतारें उस के मनमस्तिष्क में आ खड़ी होती हैं. अपने लिखे कलामों को धुन में बांधने की धुन पर सवार हो जाती है वह. नृत्य में भी पारंगत है मालविका और नृत्य कलाओं की प्रस्तुति से ले कर गीत गजलों के कार्यक्रमों में अकसर हिस्सा लेती है. वह अपने शहर में एक नामचीन हस्ती है और अपनी दुनिया में उस के फैंस की लिस्ट बड़ी लंबी है.

गजलों के फड़फड़ाते पन्नों को बंद कर उस ने डायरी को टेबल की दराज के हवाले किया और जल्द ही अपने चचेरे देवर ईशान व उस की नवेली पत्नी रिनी के स्वागत की तैयारी में लग गई.

लगभग सालभर पहले चचेरे देवर 34 साल के ईशान की शादी हुई थी. तब पराशर इन की शादी में चंडीगढ़ गए थे. लेकिन मालविका नहीं जा पाई थी, बेटे का 9वीं कक्षा का फाइनल एग्जाम था. अब ईशान पत्नी रिनी के साथ उस के मायके होते हुए लक्षदीप से मुंबई और फिर नागपुर आ रहे थे.

मालविका ने पराशर को फोन पर सूचना दी और आइसक्रीम व बुके लाने को कहा. वैसे यह पराशर के मूड पर निर्भर करता है कि वह मालविका के सु झाव पर गौर करेगा या नहीं.

देवर ईशान और उस की पत्नी 28 साल की रिनी के आने से घर रंग और रौनक से भर गया था. मालविका का बेटा मानस अपनी कोचिंग और पढ़ाई के बीच थोड़ाबहुत हायहैलो करने का ही समय निकाल पाता, लेकिन भैया पराशर का रिनी को ले कर अतिव्यस्त हो जाना कभीकभी ईशान को हैरत में डाल रहा था. ईशान रहरह कर मालविका की ओर तिरछी निगाहों से देखने लगा था और मालविका?

16 सालों से अपने पति को लगातार सम झती हुई भी मालविका जैसे अनबू झ मकड़जाल में उल झी हुई थी. कौन कोशिश करे इन उल झे जालों को हटाने की? मालविका को तो इस की इजाजत ही नहीं थी. हां, बिना इजाजत मालविका को कोई भी निर्णय लेने का यहां अधिकार नहीं था.

हां, उल झनों के मकड़जाल हट सकते थे अगर मालविका पराशर की बात मान ले. लेकिन यह संभव नहीं. अवहेलना, ईर्ष्या, व्यंग्य, हिंसा  झेल कर भी मालविका ने अपने मौनस्वर को किस तरह जिंदा रखा है, यह वही जानती है. खैर, रिनी मदमस्त हिरनी सी खूब खेल रही है पराशर के साथ.

चंडीगढ़ में नारी मुक्ति आंदोलन और बेटी बचाओ एनजीओ की प्रैसिडैंट है वह. आजादी का उपयोग करने में इतनी बिंदास है कि मालविका को खुद पर तरस हो आता. क्या वह दूसरों के मुकाबले ज्यादा घुटी हुई सी नहीं रहती. कुछ ज्यादा संत्रस्त?

पराशर यों तो अच्छीभली नौकरी में है, देखनेभालने में भी स्मार्ट है लेकिन उस की एक ही परेशानी है मालविका.

ईशान जब से आया है, हर प्रकार की मौजमस्ती, खानपान, घूमनेफिरने के बीच एक और चीज जो सब से ज्यादा महसूस कर रहा था वह यह कि पराशर मालविका को ले कर काफी अशांत था. वह जानने को आतुर था कि मालविका जैसी सुंदर, सुघड़, मितभाषी स्त्री के प्रति भी किसी पुरुष में आक्रोश हो सकता है. फिजी से आते वक्त एक मधुर मजाकिया माहौल की कल्पना उस के जेहन में बसी थी, लेकिन यहां माहौल इतना तनावभरा होगा, उस के खयालों में भी नहीं रहा था.

साउथ पैसिफिक ओशन के देश फिजी से वह आया था जहां उस के पिता डाक्टर और मां एक मौल की मालकिन है. वह खुद भी वहां सरकारी अस्पताल में डाक्टर है. चंडीगढ़ में उस की शादी एक वैबसाइट के माध्यम से हुई थी और रिनी के साथ तालमेल बैठाने की उस की कोशिश जारी थी.

शादी के एक साल बाद भारत के रिश्तेदारों से मिल कर अगले 10 दिनों में उन के वापस जाने का प्रोग्राम था. इस लिहाज से 4 दिन ही बचे थे और इन दिनों मालविका ईशान को अपने किसी तनाव के घेरे में नहीं लेना चाहती थी लेकिन पराशर का असामान्य व्यवहार बारबार मालविका के प्यारे मेहमान को असमंजस में डाल देता था.

34 साल का ईशान 42 साल की भाभी से अब धीरेधीरे बहुत खुल चुका था. ईशान को इस के पहले मालविका ने 2 बार ही देखा था. पहली दफा उस से जब मुलाकात हुई थी. तब मालविका की शादी हुए 3 साल ही हुए थे और वह 27 की तथा ईशान 19 साल का था. उस वक्त सालभर का मानस मालविका को कितना तंग करता था और वह किस तरह  झल्लाती थी, यह बोलबोल कर ईशान मालविका को आज खूब चिढ़ा रहा था.

पराशर ने इस मौके को गंवाना नहीं चाहा. ईशान का भाभी के प्रति नम्र रुख पराशर को भी सम झ आ ही रहा था, कहा, ‘‘अब भी क्या कम है? न बच्चे में रुचि है न पति में. सारा दिन नाच, गाना और चाहने वाले.’’

ईशान से रहा नहीं गया. उस ने कहा, ‘‘क्यों भैया, सारा दिन तो सबकुछ मैनेज करने में ही बिता रही हैं भाभी, एकएक को खुश करने पर तुली हैं. अब कोई किसी भी कीमत पर खुश न हो तो भाभी भी क्या करें. अगर इस के बाद समय निकाल कर कुछ क्रिएटिव कर रही हैं तो यह तो गौरव की बात हुई न? रिनी भी तो चंडीगढ़ में महिलाशक्ति की नेत्री है. आप इस बारे में क्या कहेंगे?’’

पराशर के लिए रिनी एक मनोरंजन मात्र थी. अकसर ऐसा ही होता भी है और स्त्री सोचती है वह कितनी महत्त्वपूर्ण है जो एक पुरुष अपनी पत्नी को बेबस छोड़ उसे तवज्जुह दे रहा है. खैर, पराशर ने बात घुमा दी, ‘‘चलो, तुम लोगों को यहां का प्रसिद्ध बाजार घुमा दूं.’’

रिनी मचल उठी, ईशान को सुने बिना ही कह पड़ी, ‘‘चलो, चलें.’’

‘‘अरे, भाभी से तो पूछो,’’ ईशान रिनी से यह कहते हुए जरा तल्ख हो चुका था.

मालविका जानती थी कि पराशर उसे कतई साथ ले जाना नहीं चाहेगा. उस ने खुद ही कहा, ‘‘मु झे घर पर काम है, तुम सब जाओ.’’

कार पराशर ने ड्राइव की और तीनों साथ गए. लेकिन आधी दूरी पर जा कर ईशान ने कहा, ‘‘भैया, आप मु झे यहां उतार दें, मु झे बैंक में कुछ जरूरी काम है, आप लोकेशन बता जाइए. मेरा काम होते ही मैं वहां आ कर आप को कौल कर लूंगा.’’

पराशर फिलहाल रिनी को ले कर वक्त बिताने में ज्यादा उत्सुक था और साथ ही उस के लिए यह राहत की बात थी कि ईशान और मालविका अकेले साथ नहीं हैं.

मालविका बेमिसाल हुस्न की मलिका थी. गुलाब सी खूबसूरत गालों से भोर की लाली सा नूर  झरता था. सुगठित देहयष्टि में तरुणी सी लचक, नृत्य की मुद्रा में जैसे सर्वश्रेष्ठ शिल्पी की किसी नायाब कलाकृति सी नजर आती थी वह.

कौन किसे देखे, कौन किसे देख कर ज्यादा मुग्ध हो जाए? ईशान भी क्या कम स्मार्ट, जहीन और खूबसूरत नौजवान था. 6 फुट की बलिष्ठ कदकाठी में वह एक बोलती आंखों वाला स्मार्ट प्रोफैशनल था, जिस के साथ देखनेभालने में बेहद मौडर्न, सुंदर रिनी का अच्छा मैच था.

मालविका आज हफ्तेभर बाद अपनी डायरी के पन्ने पलट रही थी कि ईशान को वापस आया देख वह अवाक रह गई.

‘‘क्या हुआ, तुम अकेले? गए नहीं उन के साथ?’’

‘‘बरदाश्त करो थोड़ी देर, पराशर भैया और रिनी का अकेले घूमना.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘क्या नहीं हुआ भाभी.’’

ईशान मालविका के पास आ कर सोफे पर बैठ गया. उस के हाथ पर अपना हाथ यों रखा जैसे वह उस का संबल हो, फिर शांति से पूछा, ‘‘मालविका, हां, नाम ही सही रहेगा. इस मामले में मैं तुम्हारी राय नहीं मांगूंगा क्योंकि मै जानता हूं तुम संस्कारों की दुहाई दोगी और हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाएंगे.’’

मालविका बेहद उल झन वाली स्थिति में आ गई थी,  उस ने झिझकते हुए पूछा, ‘‘आखिर क्या कहना चाह रहे हो तुम ईशान?’’

‘‘तुम्हें क्या हुआ मालविका, मु झे बताओ. भैया क्यों तुम से खफाखफा रहते हैं? तुम इतनी खूबसूरत हो, मितभाषी, सब का दिल जीत लेने वाली, गीत नृत्य में माहिर हो, फिर क्यों भैया अकसर व्यंग्य कसते रहते हैं, जैसे उन के अंदर बहुत क्रोध जमा है तुम्हारे लिए?’’

‘‘ईशान यह दुविधा मेरे लिए आग का दरिया है और इस में डूबे रहना मेरा समय.’’

‘‘आप इतनी टैलेंटेड और खूबसूरत हो, क्यों सहती हो इतना?’’

‘‘मानस के लिए, उसे मैं टूटे घरौंदे का पंख टूटा पंछी नहीं बनाना चाहती.’’

‘‘तुम ने जो सोचा है, वह एक मां का दृष्टिकोण है.’’

‘‘मैं अभी सब से पहले मां ही हूं ईशान.’’

‘‘और तुम खुद?’’

‘‘तुम जैसा प्यारा दोस्त अगर साथ रहे, तो खुद को भी धीरेधीरे सम झने लगूंगी.’’

‘‘मालविका, मैं कब से तुम से यही कहने वाला था. हम अब से पक्के दोस्त. तुम मु झे अपनी सारी परेशानी बताओगी और घुटन से खुद को मुक्त रखोगी. मैं जानता हूं तुम कितनी अकेली हो. अपने मायके में तुम इकलौती बेटी थी और अब तुम्हारे मातापिता रहे नहीं. मैं यह भी सम झता हूं कि तुम्हारी पहचान की वजह से तुम बाहर अपना दुख किसी से सा झा भी नहीं कर पाती होगी, कितनी घुटती होगी तुम. मालविका, आज तुम्हें जानने के लिए मैं ने भैया के साथ रिनी को भी अकेला छोड़ देना पसंद कर लिया.’’

मालविका की आंखों से टपटप आंसू उस की गोद में गिरने लगे, जैसे सालों से धरी रखी ग्लानि अब तोड़ चुकी थी अपनी सीमाएं.

‘‘ये बड़ी उल झन भरी बातें हैं,  तुम कैसे सम झोगे ईशान. तुम तो अभी बच्चे हो.’’

‘‘अब कान खींच लूंगा तुम्हारा, सम झी. हमारी दोस्ती के बीच अब कभी भी उम्र को मत लाना.’’

आंसुओं के बीच मालविका की आंखों में वैसी ही चमक उठी जैसी बारिश के बाद कई बार दिखती है. निगाहें मिलीं दोनों की और छोटीछोटी सम झ की बड़ी सी जगह बन गई.

‘‘तो बताओ.’’

हक से यह कहा ईशान ने तो मालविका ने मुंह खोला, ‘‘पराशर खुद बहुत हैंडसम और अच्छी नौकरी में हैं, मगर वे स्वीकार नहीं पाते कि उन के रहते कोई मेरी प्रशंसा करे. रिश्तेदार, जानपहचान वाले या मेरे परिचितअपरिचित फैंस. मैं अपना काम और नाम छोड़ कर सिर्फ उन के हाथों की कठपुतली बन जाऊं, तो शायद उन का दिल पसीजे. दरअसल, पराशर में प्रतिद्वंद्विता और तुलना करने की भावना हद से ज्यादा है जो उन्हें कभी चैन की सांस लेने नहीं देती. जब तक वे मेरा आत्मविश्वास नहीं तोड़ते उन का आत्मविश्वास नहीं गढ़ता. रातें मेरी कभी खुद की नहीं रहतीं, वे अपनी मरजी थोप कर मु झे कमतर का एहसास कराने की कोशिश करते हैं.’’

मालविका बोलते हुए अचानक रुक गई, शायद ज्यादा खुल जाने की झिझक ने उस के शब्दों को रोक लिया.

‘‘यानी, तुम्हारी इच्छा या अनिच्छा का कोई मोल नहीं, जो वे चाहें. पतिपत्नी में रिश्ता तो बराबरी का होता है.’’

‘‘परेशानी और भी है, सोच यह भी है कि अगर स्त्री कुछ अपनी खुशी के लिए कर रही है, जिस से समाज में उस की पहचान बनती है तो वह स्वार्थी और क्रूर है, क्योंकि वह अपने लिए समय निकालती है. जिस पति की ऐसी सोच रहे वह पत्नी को प्यार और सम्मान किस तरह दे सकेगा? तुम्ही बताओ ईशान.’’

‘‘लड़कियों को देख उन से ऐसा व्यवहार करते, जिस से मैं परेशान होऊं. जतलाने की यही मंशा रहती है कि चाहें तो वे अभी भी बहुतकुछ कर सकते हैं, लड़कियां अब भी उन के पीछे दीवानी हो सकती हैं, अर्थात मु झे भ्रम न हो कि लोग मेरे ही दीवाने हैं. क्या कहूं ऐसे बचकानेपन को. मैं ने उन्हें माफ करना सीख लिया है.’’

‘‘मालविका, तुम अपनी प्यारी सी दोस्ती मु झे दोगी? मैं एहसान मानूंगा तुम्हारा. तुम इतनी गुणी होते हुए भी कितनी सिंपल हो, तुम से बहुतकुछ सीखना है मु झे. जिंदगी को तुम्हारे नजरिए से जानना है मु झे. एक सुकूनभरा एहसास मैं भी दे पाऊंगा तुम्हें, ऐसा भरोसा दिलाता हूं. हमेशा रिश्ता लेने और देने का ही नहीं होता, कभी यह बिन कुछ लिएदिए आपस में खोए रहने का भी होता है. तुम कितनी अकेली हो, दोस्ती वाला यह हाथ थाम लो मालविका. मैं तुम्हारे दिल को थाम लूंगा.’’ ईशान ने अपना हाथ मालविका की ओर बढ़ा दिया था.

‘‘एक अच्छा दोस्त जो आप के दर्द का सा झीदार भी हो, बहुत मुश्किल से मिलता है. लेकिन तुम्हें संभाल कर कैसे रखूं ईशान? तुम जो मु झ से कितने छोटे हो. पराशर भी कभी नहीं चाहेंगे कि मैं तुम से संपर्क रखूं और फिर रिनी? उसे क्यों पसंद होगी हमारी दोस्ती?’’

‘‘तो मालविका तुम अभी भी उल झी हुई हो. सामाजिक संपर्क में मैं तुम्हारा देवर हूं. लेकिन जहां दोस्ती का संबंध सब से ऊंचा होता है वहां रिश्तों की थोपी हुई पाबंदियां माने नहीं रखतीं. रही बात पराशर भैया और रिनी की, तो एक बात का उत्तर दो, तुम्हें उत्तर खुद ही मिल जाएगा. पराशर भैया क्या तुम्हारे दिल के राजदार हैं? क्या उन्होंने तुम्हें यह अधिकार दिया है? क्या वे तुम्हारे दिल के हमदम हैं? उन का वास्ता तुम्हारे शरीर से है, तुम से नहीं. घुटघुट कर बच्चे को बड़ा कर तो लिया, अब बाकी जिंदगी में एक अच्छी सी दोस्ती को भी अपनाना नहीं चाहोगी? जहां तक रिनी की बात है, तो वह आज की मौडर्न प्रोफैशनल लड़की है और उस के खुद के पक्के व अच्छे पुरुष दोस्त हैं.

‘‘मालविका, जैसे तुम अपने रचना संसार को पराशर भैया के न चाहते हुए भी जिंदा रखे हुए हो, क्योंकि तुम जानती हो कि तुम सही कर रही हो, उसी तरह हमारी दोस्ती को खुद के दिलदिमाग के सुकून के लिए जीने का हक दो. बात है हम दोनों अपनेअपने पार्टनर के साथ सच्चे और अच्छे रहें और इस के लिए शादी से अलग रिश्तों में भी सम झ कर चलें. सब की अपनी जिंदगी के माने हैं और शादी से वे माने खत्म नहीं होते.’’

कम बोलने वाला ईशान इतना बोल कर एकदम चुप हो गया. थक कर बेबस सा मालविका की ओर देखने लगा.

मालविका बोली, ‘‘यानी, अब मेरे मन के रेगिस्तान में एक नखलिस्तान पैदा हो गया है और मै आसानी से उस में दो घड़ी बिता सकती हूं,’’ मालविका ने ईशान के हाथ पर अपना हाथ रख दिया था. ईशान अब संतुष्ट था. 2 दिनों बाद जब ईशान और रिनी ने फिजी के लिए फ्लाइट पकड़ी तब ढेर सारी अच्छीबुरी बातों के बीच एक बात बहुत अच्छी थी कि मालविका के पास मुसकराने की एक बेहतरीन वजह हो गई थी. इन भीगी सी पलकों में एक गुलाबी सा ख्वाब पैदा हो गया था जो बड़ी आसानी से अब उसे सहलाता, बहलाता और वह बेवजह ही मुसकराने लगती.

Love Story : एक दोस्त है मेरा – रिया और उस अजनबी का क्या संबंध था?

Love Story : मैं बैडरूम की खिड़की में बस यों ही खड़ी बारिश देख रही थी. अमित बैड पर लेट कर अपने फोन में कुछ कह रहे थे. मैं ने जैसे ही खिड़की से बाहर देखते हुए अपना हाथ हिलाया, उन्होंने पूछा, ‘‘कौन है?’’

मैं ने कहा, ‘‘पता नहीं.’’

‘‘तो फिर हाथ किसे देख कर हिलाया?’’

‘‘मैं नाम नहीं जानती उस का.’’

‘‘रिया, यह क्या बात कर रही हो? जिस का नाम भी नहीं पता उसे देख कर हाथ हिला रही हो?’’

मैं चुप रही तो उन्होंने फिर कुछ शरारत भरे स्वर में पूछा, ‘‘कौन है? लड़का है या लड़की?’’

‘‘लड़का.’’

‘‘ओफ्फो, क्या बात है, भई, कौन है, बताओ तो.’’

‘‘दोस्त है मेरा.’’

इतने में तो अमित ने झट से बिस्तर छोड़ दिया. संडे को सुबह 7 बजे इतनी फुर्ती. तारीफ की ही बात थी, मैं ने भी कहा, ‘‘वाह, बड़ी तेजी से उठे, क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं, देखना था उसे जिसे देख कर तुम ने हाथ हिलाया था. बताती क्यों नहीं कौन था?’’

अब की बार अमित बेचैन हुए. मैं ने उन के गले में अपनी बांहें डाल दीं, ‘‘सच बोल रही हूं, मुझे उस का नाम नहीं पता.’’

‘‘फिर क्यों हाथ हिलाया?’’

‘‘बस, इतनी ही दोस्ती है.’’ अमित कुछ समझते नहीं, गरदन पर झटका देते हुए बोले, ‘‘पता नहीं कैसी बात कर रही हो, जान न पहचान और हाथ हिला रही हो हायहैलो में.’’

‘‘अरे उस का नाम नहीं पता पर पहचानती हूं उसे.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘बस यों ही आतेजाते मिल जाता है. एक ही सोसायटी है, पता नहीं कितने लोगों से आतेजाते हायहैलो हो ही जाती है. जरूरी तो नहीं कि सब के नाम पता हों.’’

‘‘अच्छा ठीक है. मैं फ्रैश होता हूं, नाश्ता बना लो,’’ अमित ने शायद यह टौपिक यहीं खत्म करना ठीक समझा होगा.

संडे था, मैं अमित और बच्चों की पसंद का नाश्ता बनाने में व्यस्त हो गई. बच्चों को कुछ देर से ही उठना था.

नाश्ता बनाते हुए मेरी नजर बाहर सड़क पर गई. वह शायद कहीं से कुछ रैडीमेड नाश्ता पैक करवा कर ला रहा था. हां, आज उस की पत्नी आराम कर रही होगी. उस की नजर फिर मुझ पर पड़ी. वह मुसकराता हुआ चला गया.

10 साल पहले हम अंधेरी की इस सोसायटी के फ्लैट में आए थे. हमारी बिल्डिंग के सामने कुछ दूरी पर जो बिल्डिंग है उसी में उस का भी फ्लैट है. मैं तीसरी फ्लोर पर रहती हूं और वह 5वीं पर. जब हम शुरूशुरू में आए थे तभी वह मुझे आतेजाते दिख जाता था. पता नहीं कब उस से हायहैलो शुरू हुई थी, जो आज तक जारी है.

इन 10 सालों में भी न तो मुझे उस का नाम पता है, न शायद उसे मेरा नाम पता होगा. दरअसल, ऐसा कोई रिश्ता है ही नहीं न कि मुझे उस का नाम जानने की जरूरत पड़े. बस समय के साथ इतना जरूर हुआ कि मेरी नजर उस की तरफ उस की नजरें मेरी तरफ अब अनजाने में नहीं, इरादतन उठती हैं, अब तो उस का इकलौता बेटा भी 10-12 साल का हो रहा है. मैं अनजाने में ही उस का सारा रूटीन जान चुकी हूं.

दरअसल मेरे बैडरूम की खिड़की से पता नहीं उस के कौन से कमरे की खिड़की दिखती है. बस, साल भर पहले ही तो जब उसे खिड़की में खड़े अचानक देख लिया तभी तो पता चला कि वह उसी फ्लैट में रहता है. पर उस के बाद जब भी महसूस हुआ कि वह खिड़की में खड़ा है, तो मैं ने फिर नजरें उधर नहीं उठाईं. अच्छा नहीं लगता न कि मैं उस की खिड़की की तरफ दिखूं.

हां, इतना होता है कि वह जब भी रोड से गुजरता है, तो एक नजर मेरी खिड़की की तरफ जरूर उठाता है और अगर मैं खड़ी होती हूं तो हम एकदूसरे को हाथ हिला देते हैं और कभीकभी यह भी हो जाता है कि मैं सोसायटी के गार्डन में सैर कर रही हूं और वह अपनी पत्नी और बेटे के साथ आ जाए तब भी वह पत्नी की नजर बचा कर मुसकरा कर हैलो बोलता है, तो मैं मन ही मन हंसती हूं.

अब मुझे उस का सारा रूटीन पता है. सुबह 7 बजे वह अपने बेटे को स्कूल बस में बैठाने

जाता है. फिर उस की नजर मेरी किचन की तरफ उठती है. नजरें मिलने पर वह मुसकरा देता है. साढ़े 9 बजे उस की पत्नी औफिस जाती है.

10 बजे वह निकलता है. 3 बजे तक वह वापस आता है. फिर अपने बेटे को सोसायटी के ही डे केयर सैंटर से लेने जाता है. उस की पत्नी लगभग7 बजे तक आती है.

मेरे बैडरूम और किचन की खिड़की से हमारी सोसायटी की मेन रोड दिखती है. घर में सब हंसते हैं. अमित और बच्चे कहते हैं, ‘‘सब की खबर रहती है तुम्हें.’’

बच्चे तो हंसते हैं, ‘‘कितना बढि़या टाइमपास होता है आप का मौम. कहीं जाना भी नहीं पड़ता आप को और सब को जानती हैं आप.’’

इतने में अमित की आवाज आ गई,

‘‘रिया, नाश्ता.’’

‘‘हां, लाई.’’ हम दोनों ने साथ नाश्ता किया. हमारी 20 वर्षीय बेटी तनु और 17 वर्षीय राहुल 10 बजे उठे. वे भी फ्रैश हो कर नाश्ता कर के हमारे साथ बैठ गए.

इतने में तनु ने कहा, ‘‘आज उमा के घर मूवी देखने सब इकट्ठा होंगे, वहीं लंच है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘कौनकौन?’’

‘‘हमारा पूरा ग्रुप. मैं, पल्लवी, निशा, टीना, सिद्धि, नीरज, विनय और संजय.’’

अमित बोले, ‘‘नीरज, विनय को तो मैं जानता हूं पर अजय कौन है?’’

‘‘हमारा नया दोस्त.’’

अमित ने मुझे छेड़ते हुए कहा, ‘‘ठीक है बच्चों पर कभी मम्मी का दोस्त देखा है?’’

राहुल चौंका, ‘‘क्या?’’

‘‘हां भई, तुम्हारी मम्मी का भी तो एक दोस्त है.’’

तनु गुर्राई, ‘‘पापा, क्यों चिढ़ा रहे हो मम्मी को?’’

राहुल ने कहा, ‘‘उन का थोड़े ही कोई दोस्त होगा.’’

अमित ने बहुत ही भोलेपन से कहा, ‘‘पूछ लो मम्मी से, मैं झूठ थोड़े ही बोल रहा हूं.’’

दरअसल, हम चारों एकदसूरे से कुछ ज्यादा ही फ्रैंक हैं. युवा बच्चों के दोस्त बन कर ही रहते हैं हम दोनों इसलिए थोड़ाबहुत मजाक, थोड़ीबहुत खिंचाई हम एकदूसरे की करते ही रहते हैं.

तनु थोड़ा गंभीर हुई, ‘‘मौम, पापा झूठ बोल रहे हैं न?’’

मैं पता नहीं क्यों थोड़ा असहज सी हो गई, ‘‘नहीं, झूठ तो नहीं है.’’

‘‘मौम, क्या मजाक कर रहे हो आप लोग, कौन है, क्या नाम है?’’

मैं ने जब धीरे से कहा कि नाम तो नहीं पता, तो तीनों जोर से हंस पड़े. मैं भी मुसकरा दी.

राहुल ने कहा, ‘‘कहां रहता है आप का दोस्त मौम?’’

‘‘पता नहीं,’’ मैं ने पता नहीं क्यों झूठ बोल दिया. इस बार मेरे घर के तीनों शैतान हंसहंस कर एकदूसरे के ऊपर गिर गए. वह सामने वाले फ्लैट में रहता है, मैं ने जानबूझ कर नहीं बताया. मुझे पता है अमित की खोजी नजरें फिर सामने वाली खिड़की को ही घूरती रहेंगी. बिना बात के अपना खून जलाते रहेंगे.

तनु ने कहा, ‘‘पापा, आप बहुत शैतान हैं, मम्मी को तो कुछ भी नहीं पता फिर दोस्त कैसे हुआ मम्मी का.’’

‘‘अरे भई, तुम्हारी मम्मी उस की दोस्त हैं. तभी तो उस की हैलो का जवाब दे रही थीं, हाथ हिला कर.’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम तीनों के दोस्त हो सकते हैं, मेरा क्यों नहीं हो सकता? आज तुम्हारे पापा ने किसी को हाथ हिलाते देख लिया, उन्हें चैन ही नहीं आ रहा है.’’

तीनों फिर हंसे, ‘‘लेकिन हमें हमारे दोस्तों के नाम तो पता हैं.’’

मैं खिसिया गई. फिर उन की मस्ती का मैं ने भी दिल खोल कर आनंद लिया. इतने में मेड आ गई, तो मैं उस के साथ किचन की सफाई में व्यस्त हो गई.

आज मेरे हाथ तो काम में व्यस्त थे पर मन में कई विचार आजा रहे थे. मुझे उस का नाम नहीं पता पर उसे आतेजाते देखना मेरे रूटीन का एक हिस्सा है अब. बिना कुछ कहेसुने इतना महसूस करने लगी हूं कि अगर उस की पत्नी उस के साथ होगी तो वह हाथ नहीं हिलाएगा. बस धीरे से मुसकराएगा. बेटे को बस में बैठा कर मेरी किचन की तरफ जरूर देखेगा. उस की कार तो मैं दूर से ही पहचानती हूं अब. नंबर जो याद हो गया है.

उस की पार्किंग की जगह पता है मुझे. यह सब मुझे कुछ अजीब तो लगता है पर यह जो ‘कुछ’ है न, यह मुझे अच्छा लगता है. मुझे दिन भर एक अजीब से एहसास से भरे रखता है. यह ‘कुछ’ किसी का नुकसान तो कर नहीं रहा है.

मैं जो अपने पति को अपनी जान से ज्यादा प्यार करती हूं, उस में कोई रुकावट, कोई समस्या तो है नहीं इस ‘कुछ’ से. यह सच है कि जब अमित और बच्चों के साथ होती हूं तो यह ‘कुछ’ विघ्न नहीं डालता हमारे जीवन में.

ऐसा नहीं है कि वह बहुत ही हैंडसम है. उस से कहीं ज्यादा हैंडसम अमित हैं और उस की पत्नी भी मुझ से ज्यादा सुंदर है पर फिर भी यह जो ‘कुछ’ है न इस बात की खुशी देता है कि हां, एक दोस्त है मेरा जिस का नाम मुझे नहीं पता और उसे मेरा. बस कुछ है जो अच्छा लगता है.

Hindi Kahani : हिमशिला – मां चुपचाप उसकी ओर क्यों देख रही थी?

Hindi Kahani : उस ने टैक्सी में बैठते हुए मेरे हाथ को अपनी दोनों हथेलियों के बीच भींचते हुए कहा, ‘‘अच्छा, जल्दी ही फिर मिलेंगे.’’

मैं ने कहा, ‘‘जरूर मिलेंगे,’’ और दूर जाती टैक्सी को देखती रही. उस की हथेलियों की गरमाहट देर तक मेरे हाथों को सहलाती रही. अचानक वातावरण में गहरे काले बादल छा गए. ये न जाने कब बरस पड़ें? बादलों के बरसने और मन के फटने में क्या देर लगती है? न जाने कब की जमी बर्फ पिघलने लगी और मैं, हिमशिला से साधारण मानवी बन गई, मुझे पता ही नहीं चला. मेरे मन में कब का विलुप्त हो गया प्रेम का उष्ण सोता उमड़ पड़ा, उफन पड़ा.

मेरी उस से पहली पहचान एक सैमिनार के दौरान हुई थी. मुख पर गंभीरता का मुखौटा लगाए मैं अपने में ही सिकुड़ीसिमटी एक कोने में बैठी थी कि ‘हैलो, मुझे प्रेम कहते हैं,’ कहते हुए उस का मेरी ओर एक हाथ बढ़ा था. मैं ने कुछकुछ रोष से भरी दृष्टि उस पर उठाई थी, ‘नमस्ते.’ उस के निश्छल, मुसकराते चेहरे में न जाने कैसी कशिश थी जो मेरे बाहरी कठोर आवरण को तोड़ अंतर्मन को भेद रही थी. मैं उस के साथ रुखाई से पेश न आ सकी. फिर धीरेधीरे 3 दिन उस के बिंदास स्वभाव के साथ कब और कैसे गुजर गए, मालूम नहीं. मैं उस की हर अदा पर मंत्रमुग्ध सी हो गई थी. सारे दिनों के साथ के बाद अंत में अब आज विदाई का दिन था. मन में कहींकहीं गहरे उदासी के बादल छा गए थे. उस ने मेरे चेहरे पर नजरें गड़ाए हुए मोहक अंदाज में कहा, ‘अच्छा, जल्दी ही फिर मिलेंगे.’

उस के हाथों की उष्णता अब भी मेरे तनबदन को सहला रही थी. मुझे आश्चर्य हो रहा था कि क्या मैं वही वंदना हूं, जिसे मित्रमंडली ने ‘हिमशिला’ की उपाधि दे रखी थी? सही ही तो दी थी उन्होंने मुझे यह उपाधि. जब कभी अकेले में कोई नाजुक क्षण आ जाता, मैं बर्फ सी ठंडी पड़ जाती थी, मुझ पर कच्छप का खोल चढ़ जाता था. पर क्या मैं सदा से ही ऐसी थी? अचानक ही बादलों में बिजली कड़की. मैं वंदना, भोलीभाली, बिंदास, जिस के ठहाकों से सारी कक्षा गूंज उठती थी, मित्र कहते छततोड़, दीवारफोड़ अट्टहास, को बिजली की कड़क ने तेजतेज कदम उठाने को मजबूर कर दिया. तेज कदमों से सड़क मापती घर तक पहुंची. हांफते, थके हुए से चेहरे पर भी प्रसन्नता की लाली थी. दरवाजा मां ने ही खोला, ‘‘आ गई बेटी. जा, जल्दी कपड़े बदल डाल. देख तो किस कदर भीग गई.’’

‘‘अच्छा मां,’’ कह कर मैं कपड़े बदलने अंदर चली गई.

मेरे हाथ सब्जी काट रहे थे पर चारों ओर उसी के शब्द गूंज रहे थे, ‘बधाई, वंदनाजी. आप के भाषण ने मुझे मुग्ध कर लिया. मन ने चाहा कि गले लगा लूं आप को, पर मर्यादा के चलते मन मसोस कर रह जाना पड़ा.’ उस के गले लगा लूं के उस भाव ने मेरे होंठों पर सलज्ज मुसकान सी ला दी. मां चौके में खड़ी कब से मुझे देख रही थीं, पता नहीं. पर उन की अनुभवी आंखों ने शायद ताड़ लिया था कि कहीं कुछ ऐसा घटा है जिस ने उन की बेटी को इतना कोमल, इतना मसृण बना डाला है.

‘‘बीनू, कौन है वह?’’

मैं भावलोक से हड़बड़ा कर कटु यथार्थ पर आ गई,  ‘‘कौन मां? कोई भी तो नहीं है?’’

‘‘बेटी, मुझ से मत छिपा. तेरे होंठों की मुसकान, तेरी खोईखोई नजर, तेरा अनमनापन बता रहा है कि आज जरूर कोई विशेष बात हुई है. बेटी, मां से भी बात छिपाएगी?’’

मैं ने झुंझला कर कहा, ‘‘क्या मां, कोई बात हो तो बताऊं न. और यह भी क्या उम्र है प्रेमव्रेम के चक्कर में पड़ने की.’’ मां चुपचाप मेरी ओर निहार कर चली गईं. उन की अनुभवी आंखें सब ताड़ गई थीं. मैं दाल धोतेधोते विगत में डूब गई थी. कालेज से आई ही थी कि मां का आदेश मिला, ‘जल्दी से तैयार हो जाओ. लड़के वाले तुम्हें देखने आ रहे हैं.’

‘मां, इस में तैयार होने की क्या बात है? देखने आ रहे हैं तो आने दो. मैं जैसी हूं वैसी ही ठीक हूं. गायबैल भी क्या तैयार होते हैं अपने खरीदारों के लिए?’

पिताजी ने कहा, ‘देख लिया अपनी लाड़ली को? कहा करता था कालेज में मत पढ़ाओ, पर सुनता कौन है. लो, और पढ़ाओ कालेज में.’

मैं ने तैश में आ कर कहा, ‘पिताजी, पढ़ाई की बात बीच में कहां से आ गई?’

मां ने डपटते हुए कहा, ‘चुप रह, बड़ों से जबान लड़ाती है. एक तो प्रकृति ने रूप में कंजूसी की है, दूसरे तू खुद को रानी विक्टोरिया समझती है? जा, जैसा कहा है वैसा कर.’ इस से पहले मेरे रूपरंग पर किसी ने इस तरह कटु इंगित नहीं किया था. मां के बोलों से मैं आहत हो उन की ओर देखती रह गई. क्या ये मेरी वही मां हैं जो कभी लोगों के बीच बड़े गर्व से कहा करती थीं, ‘मैं तो लड़केलड़की में कोई फर्क ही नहीं मानती. बेटी के सुनहले भविष्य की चिंता करते हुए मैं तो उसे पढ़ने का पूरा मौका दूंगी. जब तक लड़कियां पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाएंगी, समाज से दहेज की बुराई नहीं जाने की.’

आज वही मां मेरे रूपरंग पर व्यग्ंय कर रही हैं, इसलिए कि मेरा रंग दबा हुआ सांवला है, मेरे बदन के कटावों में तीक्ष्णता नहीं है, मुझे रंगरोगन का मुलम्मा चढ़ाना नहीं आता, आज के चमकदमक के बाजार में इस अनाकर्षक चेहरे की कीमत लगाने वाला कोई नहीं. आज मैं एक बिकाऊ वस्तु हूं. ऐसी बिकाऊ वस्तु जिसे दुकानदार कीमत दे कर बेचता है, फिर भी खरीदार खरीदने को तैयार नहीं. ये सब सोचतेसोचते मेरी आंखों में आंसू भर आए थे. मैं ने अपनेआप को संयत करते हुए हाथमुंह धोया, 2 चोटियां बनाईं, साड़ी बदली और नुमाइश के लिए  खड़ी हो गई. दर्शकों के चेहरे, मुझे देख, बिचक गए.

औपचारिकतावश उन्होंने पूछा, ‘बेटी, क्या करती हो?’

‘जी, मैं बीए फाइनल में हूं.’

मुझे ऊपर से नीचे तक भेदती हुई उन की नजरें मेरे जिस्म के आरपार होती रहीं, मेरे अंदर क्रोध का गुबार…सब को सहन करती हुई मैं वहां चुपचाप सौम्यता की मूर्ति बनी बैठी थी. एकएक पल एकएक युग सा बीत रहा था. मैं मन ही मन सोच रही थी कि ऐसा अंधड़ उठे…ऐसा अधंड़ उठे कि सबकुछ अपने साथ बहा ले जाए. कुछ बाकी न रहे. अंत में मां के संकेत ने मेरी यातना की घडि़यों का अंत किया और मैं चुपचाप अंदर चली गई.

‘रुक्मिणी, उन की 2 लाख रुपए नकद की मांग है. क्या करें, अपना ही सोना खोटा है. सिक्का चलाने के लिए उपाय तो करना ही पड़ेगा न. पर मैं इतने रुपए लाऊं कहां से? भविष्य निधि से निकालने पर भी तो उन की मांग पूरी नहीं कर सकता.’ मां ने लंबी सांस भरते हुए कहा, ‘जाने भी दो जी, बीनू के बापू. यही एक लड़का तो नहीं है. अपनी बेटी के लिए कोई और जोड़ीदार मिल जाएगा.’ फिर तो उस जोड़ीदार की खोज में आएदिन नुमाइश लगती और इस भद्दे, बदसूरत चेहरे पर नापसंदगी के लेबल एक के बाद एक चस्पां कर दिए जाते रहे. लड़के वालों की मांग पूरी करने की सामर्थ्य मेरे पिताजी में न थी.

देखते ही देखते मैं ने बीए प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर लिया और मां के सामने एमए करने की इच्छा जाहिर की. पिताजी तो आपे से बाहर हो उठे. दोनों हाथ जोड़ कर बोले, ‘अब बस कर, बीए पढ़ कर तो यह हाल है कि कोई वर नहीं फंसता, एमए कर के तो हमारे सिर पर बैठ जाएगी.’ मेरी आंखों में आंसू झिलमिला उठे. मां ने मेरी बिगड़ी बात संवारी,‘बच्ची का मन है तो आगे पढ़ने दीजिए न. घर बैठ कर भी क्या करेगी?’ रोज ही एक न एक आशा का दीप झिलमिलाता पर जल्दी ही बुझ जाता. मां की उम्मीद चकनाचूर हो जाती. आखिर हैं तो मातापिता न, उम्मीद का दामन कैसे छोड़ सकते थे.

मैं ने अब इस आघात को भी जीवन की एक नित्यक्रिया के रूप में स्वीकार कर लिया था. पर इस संघर्ष ने मुझे कहीं भीतर तक तोड़मरोड़ दिया था. मेरी वह खिलखिलाहट, वे छतफोड़, दीवार तोड़ ठहाके धीरेधीरे बीते युग की बात हो गए थे. मेरे विवाह की चिंता में घुलते पिताजी को रोगों ने धरदबोचा था. नियम से चलने वाले मेरे पिताजी मधुमेह के रोगी बन गए थे, पर मेरे हाथ में कुछ भी न था. मैं अपनी आंखों के सामने असहाय सी, निरुपाय सी उन्हें घुलते देखती रहती थी. अपनी लगन व मेहनत से की पढ़ाई से मैं एमए प्रथम वर्ष में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो गई. फाइनल में पहुंची कि एक दिन ट्रक दुर्घटना में पिताजी के दोनों पैर चले गए. मां तो जैसे प्रस्तर शिला सी हो गईं. घर की दोहरी जिम्मेदारी मुझ पर थी. मैं पिताजी का बेटा भी थी और बेटी भी. मैं ने ट्यूशनों की संख्या बढ़ा ली. पिताजी को दिलासा दिया कि जयपुरी कृत्रिम पैरों से वे जल्द ही अपने पैरों पर चलने में समर्थ हो सकेंगे. सब ठीक हो जाएगा. एमए उत्तीर्ण करते ही मुझे कालेज में नौकरी मिल गई.

धीरेधीरे जिंदगी ढर्रे पर आने लगी थी. मेरे तनाव कम होने लगे थे. कभी किसी ने मुझ से मित्रता करनी चाही तो ‘भाई’ या ‘दादा’ के मुखौटे में उसे रख कर अपनेआप को सुरक्षित महसूस करती. किसी की सहलाती हुई दृष्टि में भी मुझे खोट नजर आने लगता. एक षड्यंत्र की बू सी आने लगती. लगता, मुझ भद्दी, काली लड़की में किसी को भला क्या दिलचस्पी हो सकती है?

और उस पर मांपिताजी की नैतिकता के मूल्य. कभी किसी सहकर्मी को साथ ले आती तो पिताजी की आंखों में शक झलमला उठता और मां स्वागत करते हुए भी उपदेश देने से नहीं चूकतीं कि बेटा, बीनू के साथ काम करते हो? बहुत अच्छा. पर बेटा, हम जिस परिवार में, जिस समाज में रहते हैं, उस के नियम मानने पड़ते हैं. हां, मैं जानती हूं बेटा, तुम्हारे मन में खोट नहीं पर देखो न, हम तो पहले ही बेटी की कमाई पर हैं, फिर दुनिया वाले ताने देते हैं कि रोज एक नया छोकरा आता है. बीनू की मां, बीनू से धंधा करवाती हो क्या?

मां के उपदेश ने धीरेधीरे मुझे कालेज में भी अकेला कर दिया. खासकर पुरुष सहकर्मी जब भी देखते, उन के मुख पर विद्रूपभरी मुसकान छा जाती. मुझे मां पर खीझ होने लगती थी. यह नैतिकता, ये मूल्य मुझ पर ही क्यों आरोपित किए जा रहे हैं? मैं लोगों की परवा क्यों करूं? क्या वे आते हैं बेवक्त मेरी सहयता के लिए? बेटी की कमाई का ताना देने वालों ने कितनी थैलियों के मुंह खोल दिए हैं मेरे सामने? एक अकेले पुरुष को तो समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता? ये दोहरे मापदंड क्यों?

कई बार मन विद्रोह कर उठता था. इन मूल्यों का भार मुझ से नहीं उठाया जाता. सब तोड़ दूं, झटक दूं, तहसनहस कर दूं, पर मांपिताजी के चेहरों को देख मन मसोस कर रह जाती. वंदनाजी, आप हमेशा इतने तनाव में क्यों रहती हैं? मैं जानता हूं, इस कठोर चेहरे के पीछे स्नेहिल एक दिल छिपा हुआ है. उसे बाहर लाइए जो सब को स्नेहिल कर दे. ‘वंदनाजी नहीं, बीनू’ मेरे मुंह से सहसा निकल गया. प्रेम शायद मेरे दिल की बात समझ गया था.

‘बीनू, इस बार दिल्ली आओ तो अपने कार्यक्रम में 4 दिन बढ़ा कर आना. वे 4 दिन मैं तुम्हारा अपहरण करने वाला हूं.’ प्रेम की ये रसीली बातें मेरे कानों में गूंज उठतीं और मैं अब तक की तिक्तता को भूल सी जाती. मेरे अंतर की स्रोतस्विनी का प्रवाह उमड़ पड़ने को व्याकुल हो उठा है. उसे अब अपना लक्ष्य चाहिए ‘प्रेम का सागर.’ नहींनहीं, अब वह किसी वर्जना, किसी मूल्य के फेर में नहीं अटकने वाली. वह तो उन्मुक्त पक्षी के समान अपने नीड़ की ओर उड़ना चाहती है. कोई तो है इस कालेभद्दे चेहरे की छिपी आर्द्रता को अनुभूत करने वाला. आज बादल भी तो कितनी जोर से बरस रहे हैं. बरसो…बरसो…बरसो न मेरे प्रेमघन…मेरा पोरपोर भीग जाए ऐसा रस बरसो न मेरे प्रेमघन.

Best Hindi Story : विश्वास – राजीव ने अंजू से क्यों की पैसों की डिमांड?

Best Hindi Story : उस शाम पहली बार राजीव के घर वालों से मिल कर अंजू को अच्छा लगा. उस के छोटे भाई रवि और उस की पत्नी सविता ने अंजू को बहुत मानसम्मान दिया था. उन की मां ने दसियों बार उस के सिर पर हाथ रख कर उसे सदा सुखी और खुश रहने का आशीर्वाद दिया होगा. वह राजीव के घर मुश्किल से आधा घंटा रुकी थी. इतने कम समय में ही इन सब ने उस का दिल जीत लिया था.

राजीव के घर वालों से विदा ले कर वे दोनों पास के एक सुंदर से पार्क में कुछ देर घूमने चले आए. अंजू का हाथ पकड़ कर घूमते हुए राजीव अचानक मुसकराया और उत्साहित स्वर में बोला, ‘‘इनसान की जिंदगी में बुरा वक्त आता है और अच्छा भी. 2 साल पहले जब मेरा तलाक हुआ था तब मैं दोबारा शादी करने का जिक्र सुनते ही बुरी तरह बिदक जाता था लेकिन आज मैं तुम्हें जल्दी से जल्दी अपना हमसफर बनाना चाहता हूं. तुम्हें मेरे घर वाले कैसे लगे?’’

‘‘बहुत मिलनसार और खुश- मिजाज,’’ अंजू ने सचाई बता दी. ‘‘क्या तुम उन सब के साथ निभा लोगी?’’ राजीव भावुक हो उठा.

‘‘बड़े मजे से. तुम ने उन्हें यह बता दिया है कि हम शादी करने जा रहे हैं?’’ ‘‘अभी नहीं.’’

‘‘लेकिन तुम्हारे घर वालों ने तो मेरा ऐसे स्वागत किया जैसे मैं तुम्हारे लिए बहुत खास अहमियत रखती हूं.’’ ‘‘तब उन तीनों ने मेरी आंखों में तुम्हारे लिए बसे प्रेम के भावों को पढ़ लिया होगा,’’ राजीव ने झुक कर अंजू के हाथ को चूमा तो वह एकदम से शरमा गई थी.

कुछ देर चुप रहने के बाद अंजू ने पूछा, ‘‘हम शादी कब करें?’’ ‘‘क्या…अब मुझ से दूर नहीं रहा जाता?’’ राजीव ने उसे छेड़ा.

‘‘नहीं,’’ अंजू ने जवाब दे कर शर्माते हुए अपना चेहरा हथेलियों के पीछे छिपा लिया. ‘‘मेरा दिल भी तुम्हें जी भर कर प्यार करने को तड़प रहा है, जानेमन. कुछ दिन बाद मां, रवि और सविता महीने भर के लिए मामाजी के पास छुट्टियां मनाने कानपुर जा रहे हैं. उन के लौटते ही हम अपनी शादी की तारीख तय कर लेंगे,’’ राजीव का यह जवाब सुन कर अंजू खुश हो गई थी.

पार्क के खुशनुमा माहौल में राजीव देर तक अपनी प्यार भरी बातों से अंजू के मन को गुदगुदाता रहा. करीब 3 साल पहले विधवा हुई अंजू को इस पल उस के साथ अपना भविष्य बहुत सुखद और सुरक्षित लग रहा था. राजीव अंजू को उस के फ्लैट तक छोड़ने आया था. अंजू की मां आरती उसे देख कर खिल उठीं.

‘‘अब तुम खाना खा कर ही जाना. तुम्हारे मनपसंद आलू के परांठे बनाने में मुझे ज्यादा देर नहीं लगेगी,’’ उन्होंने अपने भावी दामाद को जबरदस्ती रोक लिया था. उस रात पलंग पर लेट कर अंजू देर तक राजीव और अपने बारे में सोचती रही.

सिर्फ 2 महीने पहले चार्टर्ड बस का इंतजार करते हुए दोनों के बीच औपचारिक बातचीत शुरू हुई और बस आने से पहले दोनों ने एकदूसरे को अपनाअपना परिचय दे दिया था. उन के बीच होने वाला शुरूशुरू का हलकाफुलका वार्त्तालाप जल्दी ही अच्छी दोस्ती में बदल गया. वे दोनों नियमित रूप से एक ही बस से आफिस आनेजाने लगे थे.

राजीव की आंखों में अपने प्रति चाहत के बढ़ते भावों को देखना अंजू को अच्छा लगा था. अपने अकेलेपन से तंग आ चुके उस के दिल को जीतने में राजीव को ज्यादा समय नहीं लगा. ‘‘रोजरोज उम्र बढ़ती जाती है और अगले महीने मैं 33 साल का हो जाऊंगा. अगर मैं ने अभी अपना घर नहीं बसाया तो देर ज्यादा हो जाएगी. बड़ी उम्र के मातापिता न स्वस्थ संतान पैदा कर पाते हैं और न ही उन्हें अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पूरा समय मिल पाता है,’’ राजीव के मुंह से एक दिन निकले इन शब्दों को सुन कर अंजू के मन ने यह अंदाजा लगाया कि वह उस के साथ शादी कर के घर बसाने में दिलचस्पी रखता था.

उस दिन के बाद से अंजू ने राजीव को अपने दिल के निकट आने के ज्यादा अवसर देने शुरू कर दिए. वह उस के साथ रेस्तरां में चायकौफी पीने चली जाती. फिर उस ने फिल्म देख कर या खरीदारी करने के बाद उस के साथ डिनर करने का निमंत्रण स्वीकार करना भी शुरू कर दिया था. उस शाम पहली बार उस के घर वालों से मिल कर अंजू के मन ने बहुत राहत और खुशी महसूस की थी. शादी हो जाने के बाद उन सीधेसादे, खुश- मिजाज लोगों के साथ निभाना जरा भी मुश्किल नहीं होगा, इस निष्कर्ष पर पहुंच वह उस रात राजीव के साथ अपनी शादी के रंगीन सपने देखती काफी देर से सोई थी.

अगले दिन रविवार को राजीव ने पहले उसे बढि़या होटल में लंच कराया और फिर खुशखबरी सुनाई, ‘‘कल मैं एक फ्लैट बुक कराने जा रहा हूं, शादी के बाद हम बहुत जल्दी अपने फ्लैट में रहने चले जाएंगे.’’

‘‘यह तो बढि़या खबर है. कितने कमरों वाला फ्लैट ले रहे हो?’’ अंजू खुश हो गई थी. ‘‘3 कमरों का. अभी मैं 5 लाख रुपए पेशगी बतौर जमा करा दूंगा लेकिन बाद में उस की किस्तें हम दोनों को मिल कर देनी पड़ेंगी, माई डियर.’’

‘‘नो प्रौब्लम, सर, मुझ से अभी कोई हेल्प चाहिए हो तो बताओ.’’ ‘‘नहीं, डियर, अपने सारे शेयर आदि बेच कर मैं ने 5 लाख की रकम जमा कर ली है. मेरे पास अब कुछ नहीं बचा है. जब फ्लैट को सजानेसंवारने का समय आएगा तब तुम खर्च करना. अच्छा, इसी वक्त सोच कर बताओ कि अपने बेडरूम में कौन सा रंग कराना पसंद करोगी?’’

‘‘हलका आसमानी रंग मुझे अच्छा लगता है.’’ ‘‘गुलाबी नहीं?’’

‘‘नहीं, और ड्राइंग रूम में 3 दीवारें तो एक रंग की और चौथी अलग रंग की रखेंगे.’’ ‘‘ओके, मैं किसी दिन तुम्हें वह फ्लैट दिखाने ले चलूंगा जो बिल्डर ने खरीदारों को दिखाने के लिए तैयार कर रखा है.’’

‘‘फ्लैट देख लेने के बाद उसे सजाने की बातें करने में ज्यादा मजा आएगा.’’ ‘‘मैं और ज्यादा अमीर होता तो तुम्हें घुमाने के लिए कार भी खरीद लेता.’’

‘‘अरे, कार भी आ जाएगी. आखिर यह दुलहन भी तो कुछ दहेज में लाएगी,’’ अंजू की इस बात पर दोनों खूब हंसे और उन के बीच अपने भावी घर को ले कर देर तक चर्चा चलती रही थी. अगले शुक्रवार को रवि, सविता और मां महीने भर के लिए राजीव के मामा के यहां कानपुर चले गए. अंजू को छेड़ने के लिए राजीव को नया मसाला मिल गया था.

‘‘मौजमस्ती करने का ऐसा बढि़या मौका फिर शायद न मिले, स्वीटहार्ट. तुम्हें मंजूर हो तो खाली घर में शादी से पहले हनीमून मना लेते हैं,’’ उसे घर चलने की दावत देते हुए राजीव की आंखें नशीली हो उठी थीं. ‘‘शटअप,’’ अंजू ने शरमाते हुए उसे प्यार भरे अंदाज में डांट दिया.

‘‘मान भी जाओ न, जानेमन,’’ राजीव उत्तेजित अंदाज में उस के हाथ को बारबार चूमने लगा. ‘‘तुम जोर दोगे तो मैं मान ही जाऊंगी पर हनीमून का मजा खराब हो जाएगा. थोड़ा सब्र और कर लो, डार्लिंग.’’

अंजू के समझाने पर राजीव सब्र तो कर लेता पर अगली मुलाकात में वह फिर उसे छेड़ने से नहीं चूकता. वह उसे कैसेकैसे प्यार करेगा, राजीव के मुंह से इस का विवरण सुन अंजू का तनबदन अजीब सी नशीली गुदगुदी से भर जाता. राजीव की ये रसीली बातें उस की रातों को उत्तेजना भरी बेचैनी से भर जातीं. अपने अच्छे व्यवहार और दिलकश बातों से राजीव ने उसे अपने प्यार में पागल सा बना दिया था. वह अपने को अब बदकिस्मत विधवा नहीं बल्कि संसार की सब से खूबसूरत स्त्री मानने लगी थी. राजीव से मिलने वाली प्रशंसा व प्यार ने उस का कद अपनी ही नजरों में बहुत ऊंचा कर दिया था.

‘‘भाई, मां की जान बचाने के लिए उन के दिल का आपरेशन फौरन करना होगा,’’ रवि ने रविवार की रात को जब यह खबर राजीव को फोन पर दी तो उस समय वह अंजू के साथ उसी के घर में डिनर कर रहा था.

मां के आपरेशन की खबर सुन कर राजीव एकदम से सुस्त पड़ गया. फिर जब उस की आंखों से अचानक आंसू बहने लगे तो अंजू व आरती बहुत ज्यादा परेशान और दुखी हो उठीं. ‘‘मुझे जल्दी कानपुर जाना होगा अंजू, पर मेरे पास इस वक्त 2 लाख का इंतजाम नहीं है. सुबह बिल्डर से पेशगी दिए गए 5 लाख रुपए वापस लेने की कोशिश करता हूं. वह नहीं माना तो मां ने तुम्हारे लिए जो जेवर रखे हुए हैं उन्हें किसी के पास गिरवी…’’

‘‘बेकार की बात मत करो. मुझे पराया क्यों समझ रहे हो?’’ अंजू ने हाथ से उस का मुंह बंद कर आगे नहीं बोलने दिया. ‘‘क्या तुम मुझे इतनी बड़ी रकम उधार दोगी?’’ राजीव विस्मय से भर उठा.

‘‘क्या तुम्हारा मुझ से झगड़ा करने का दिल कर रहा है?’’ ‘‘नहीं, लेकिन…’’

‘‘फिर बेकार के सवाल पूछ कर मेरा दिल मत दुखाओ. मैं तुम्हें 2 लाख रुपए दे दूंगी. जब मैं तुम्हारी हो गई हूं तो क्या मेरा सबकुछ तुम्हारा नहीं हो गया?’’ अंजू की इस दलील को सुन राजीव ने उसे प्यार से गले लगाया और उस की आंखों से अब ‘धन्यवाद’ दर्शाने वाले आंसू बह निकले.

अपने प्रेमी के आंसू पोंछती अंजू खुद भी आंसू बहाए जा रही थी. लेकिन उस रात अंजू की आंखों से नींद गायब हो गई. उस ने राजीव को 2 लाख रुपए देने का वादा तो कर लिया था लेकिन अब उस के मन में परेशानी और चिंता पैदा करने वाले कई सवाल घूम रहे थे:

‘राजीव से अभी मेरी शादी नहीं हुई है. क्या उस पर विश्वास कर के उसे इतनी बड़ी रकम देना ठीक रहेगा?’ इस सवाल का जवाब ‘हां’ में देने से उस का मन कतरा रहा था. ‘राजीव के साथ मैं घर बसाने के सपने देख रही हूं. उस के प्यार ने मेरी रेगिस्तान जैसी जिंदगी में खुशियों के अनगिनत फूल खिलाए हैं. क्या उस पर विश्वास कर के उसे 2 लाख रुपए दे दूं?’ इस सवाल का जवाब ‘न’ में देते हुए उस का मन अजीब सी उदासी और अपराधबोध से भी भर उठता.

देर रात तक करवटें बदलने के बावजूद वह किसी फैसले पर नहीं पहुंच सकी थी. अगले दिन आफिस में 11 बजे के करीब उस के पास राजीव का फोन आया:

‘‘रुपयों का इंतजाम कब तक हो जाएगा, अंजू? मैं जल्दी से जल्दी कानपुर पहुंचना चाहता हूं,’’ राजीव की आवाज में चिंता के भाव साफ झलक रहे थे. ‘‘मैं लंच के बाद बैंक जाऊंगी. फिर वहां से तुम्हें फोन करूंगी,’’ चाह कर भी अंजू अपनी आवाज में किसी तरह का उत्साह पैदा नहीं कर सकी थी.

‘‘प्लीज, अगर काम जल्दी हो जाए तो अच्छा रहेगा.’’ ‘‘मैं देखती हूं,’’ ऐसा जवाब देते हुए उस का मन कर रहा था कि वह रुपए देने के अपने वादे से मुकर जाए.

लंच के बाद वह बैंक गई थी. 2 लाख रुपए अपने अकाउंट में जमा करने में उसे ज्यादा परेशानी नहीं हुई. सिर्फ एक एफ.डी. उसे तुड़वानी पड़ी थी लेकिन उस का मन अभी भी उलझन का शिकार बना हुआ था. तभी उस ने राजीव को फोन नहीं किया.

शाम को जब राजीव का फोन आया तो उस ने झूठ बोल दिया, ‘‘अभी 1-2 दिन का वक्त लग जाएगा, राजीव.’’ ‘‘डाक्टर बहुत जल्दी आपरेशन करवाने पर जोर दे रहे हैं. तुम बैंक के मैनेजर से मिली थीं?’’

‘‘मां को किस अस्पताल में भरती कराया है?’’ अंजू ने उस के सवाल का जवाब न दे कर विषय बदल दिया. ‘‘दिल के आपरेशन के मामले में शहर के सब से नामी अस्पताल में,’’ राजीव ने अस्पताल का नाम बता दिया.

अपनी मां से जुड़ी बहुत सी बातें करते हुए राजीव काफी भावुक हो गया था. अंजू ने साफ महसूस किया कि इस वक्त राजीव की बातें उस के मन को खास प्रभावित करने में सफल नहीं हो रही थीं. उसे साथ ही साथ यह भी याद आ रहा था कि पिछले दिन मां के प्रति चिंतित राजीव के आंसू पोंछते हुए उस ने खुद भी आंसू बहाए थे.

अगली सुबह 11 बजे के करीब राजीव ने अंजू से फोन पर बात करनी चाही तो उस का फोन स्विच औफ मिला. परेशान हो कर वह लंच के समय उस के फ्लैट पर पहुंचा तो दरवाजे पर ताला लटकता मिला. ‘अंजू शायद रुपए नहीं देना चाहती है,’ यह खयाल अचानक उस के मन में पैदा हुआ और उस का पूरा शरीर अजीब से डर व घबराहट का शिकार बन गया. रुपयों का इंतजाम करने की नए सिरे से पैदा हुई चिंता ने उस के हाथपैर फुला दिए थे.

उस ने अपने दोस्तों व रिश्तेदारों के पास फोन करना शुरू किया. सिर्फ एक दोस्त ने 10-15 हजार की रकम फौरन देने का वादा किया. बाकी सब ने अपनी असमर्थता जताई या थोड़े दिन बाद कुछ रुपए का इंतजाम करने की बात कही. वह फ्लैट की बुकिंग के लिए दी गई पेशगी रकम वापस लेने के लिए बिल्डर से मिलने गया पर वह कुछ दिन के लिए मुंबई गया हुआ था.

शाम होने तक राजीव को एहसास हो गया कि वह 2-3 दिन में भी 2 लाख की रकम जमा नहीं कर पाएगा. हर तरफ से निराश हो चुका उस का मन अंजू को धोखेबाज बताते हुए उस के प्रति गहरी शिकायत और नाराजगी से भरता चला गया था. तभी उस के पास कानपुर से रवि का फोन आया. उस ने राजीव को प्रसन्न स्वर में बताया, ‘‘भाई, रुपए पहुंच गए हैं. अंजूजी का यह एहसान हम कभी नहीं चुका पाएंगे.’’

‘‘अंजू, कानपुर कब पहुंचीं?’’ अपनी हैरानी को काबू में रखते हुए राजीव ने सवाल किया. ‘‘शाम को आ गई थीं. मैं उन्हें एअरपोर्ट से ले आया था.’’

‘‘रुपए जमा हो गए हैं?’’ ‘‘वह ड्राफ्ट लाई हैं. उसे कल जमा करवा देंगे. अब मां का आपरेशन हो सकेगा और वह जल्दी ठीक हो जाएंगी. तुम कब आ रहे हो?’’

‘‘मैं रात की गाड़ी पकड़ता हूं.’’ ‘‘ठीक है.’’

‘‘अंजू कहां हैं?’’ ‘‘मामाजी के साथ घर गई हैं.’’

‘‘कल मिलते हैं,’’ ऐसा कह कर राजीव ने फोन काट दिया था. उस ने अंजू से बात करने की कोशिश की पर उस का फोन अभी भी बंद था. फिर वह स्टेशन पहुंचने की तैयारी में लग गया.

उसे बिना कुछ बताए अंजू 2 लाख का ड्राफ्ट ले कर अकेली कानपुर क्यों चली गई? इस सवाल का कोई माकूल जवाब वह नहीं ढूंढ़ पा रहा था. उस का दिल अंजू के प्रति आभार तो महसूस कर रहा था पर मन का एक हिस्सा उस के इस कदम का कारण न समझ पाने से बेचैन और परेशान भी था.

अगले दिन अंजू से उस की मुलाकात मामाजी के घर में हुई. जब आसपास कोई नहीं था तब राजीव ने उस से आहत भाव से पूछ ही लिया, ‘‘मुझ पर क्यों विश्वास नहीं कर सकीं तुम, अंजू? तुम्हें ऐसा क्यों लगा कि मैं मां की बीमारी के बारे में झूठ भी बोल सकता हूं? रुपए तुम ने मेरे हाथों इसीलिए नहीं भिजवाए हैं न?’’ अंजू उस का हाथ पकड़ कर भावुक स्वर में बोली, ‘‘राजीव, तुम मुझ विधवा के मनोभावों को सहानुभूति के साथ समझने की कोशिश करना, प्लीज. तुम्हारे लिए यह समझना कठिन नहीं होना चाहिए कि मेरे मन में सुरक्षा और शांति का एहसास मेरी जमापूंजी के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है.

‘‘तुम्हारे प्यार में पागल मेरा दिल तुम्हें 2 लाख रुपए देने से बिलकुल नहीं हिचकिचाया था लेकिन मेरा हिसाबी- किताबी मन तुम पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं करना चाहता था. ‘‘मैं ने दोनों की सुनी और रुपए ले कर खुद यहां चली आई. मेरे ऐसा करने से तुम्हें जरूर तकलीफ हो रही होगी…तुम्हारे दिल को यों चोट पहुंचाने के लिए मैं माफी मांग रही…’’

‘‘नहीं, माफी तो मुझे मांगनी चाहिए. तुम्हारे मन में चली उथलपुथल को मैं अब समझ सकता हूं. तुम ने जो किया उस से तुम्हारी मानसिक परिपक्वता और समझदारी झलकती है. अपनी गांठ का पैसा ही कठिन समय में काम आता है. हमारे जैसे सीमित आय वालों को ऊपरी चमकदमक वाली दिखावे की चीजों पर खर्च करने से बचना चाहिए, ये बातें मेरी समझ में आ रही हैं.’’ ‘‘अपने अहं को बीच में ला कर मेरा तुम से नाराज होना बिलकुल गलत है. तुम तो मेरे लिए दोस्तों व रिश्तेदारों से ज्यादा विश्वसनीय साबित हुई हो. मां के इलाज में मदद करने के लिए थैंक यू वेरी मच,’’ राजीव ने उस का हाथ पकड़ कर प्यार से चूम लिया.

एकदूसरे की आंखों में अपने लिए नजर आ रहे प्यार व चाहत के भावों को देख कर उन दोनों के दिलों में आपसी विश्वास की जड़ों को बहुत गहरी मजबूती मिल गई थी.

Emotional Story : नेकी वाला पेड़ – क्यों उसकी 30 वर्ष की पुरानी यादें ताजा हो गई ?

Emotional Story : टन, टन, टन… बड़ी बेसब्री से दरवाजे की घंटी बज रही थी. गरमी की दोपहर और लौकडाउन के दिनों में ये थोड़ा असामान्य लग रहा था. जैसे कोई मुसीबत के समय या फिर आप को सावधान करने के लिए बजाता हो, ठीक वैसी ही घंटी बज रही थी. हम सभी चौंक उठे और दरवाजे की ओर लपके.

मैं लगभग दौड़ते हुए दरवाजे की ओर बढ़ी. एक आदमी मास्क पहने दिखाई दिया. मैं ने दरवाजे से ही पूछा, ‘‘क्या बात है?‘‘

वह जल्दी से हड़बड़ाहट में बोला, ‘‘मैडम, आप का पेड़ गिर गया.‘‘

‘‘क्या…‘‘ हम सभी जल्दी से आंगन वाले गेट की ओर बढ़े. वहां का दृश्य देखते ही हम सभी हैरान रह गए.

‘‘अरे, ये कब…? कैसे हुआ…?‘‘

पेड़ बिलकुल सड़क के बीचोंबीच गिरा पड़ा था. कुछ सूखी हुई कमजोर डालियां इधरउधर टूट कर बिखरी हुई थीं. पेड़ के नीचे मैं ने कुछ छोटे गमले क्यारी के किनारेकिनारे लगा रखे थे, वे उस के तने के नीचे दबे पड़े थे. पेड़ पर बंधी टीवी केबल की तारें भी पेड़ के साथ ही टूट कर लटक गई थीं. घर के सामने रहने वाले पड़ोसियों की कारें बिलकुल सुरक्षित थीं. पेड़ ने उन्हें एक खरोंच भी नहीं पहुंचाई  थी.

गरमी की दोपहर में उस समय कोई सड़क पर भी नहीं था. मैं ने मन ही मन उस सूखे हुए नेक पेड़ को निहारा. उसे देख कर मुझे ३० वर्ष पुरानी सारी यादें ताजा हो आईं.

हम कुछ समय पहले ही इस घर में रहने को आए थे. हमारी एक पड़ोसन ने लगभग ३० वर्ष पहले एक छोटा सा पौधा लगाते हुए मुझ से कहा था, ‘सारी गली में ऐसे ही पेड़ हैं. सोचा, एक आप के यहां भी लगा देती हूं. अच्छे लगेंगे सभी एकजैसे पेड़.‘

पेड़पौधे मुझे खुद भी बहुत प्रिय थे, तो मैं ने उन का शुक्रिया अदा किया.

पेड़ धीरेधीरे बड़ा होने लगा. कमाल का पेड़ था. हमेशा हराभरा रहता. छोटे सफेद फूल खिलते, जिन की तेज गंध कुछ अजीब सी लगती थी. गरमी के दिनों में लंबीपतली फलियों से छोटे हलके उड़ने वाले बीज सब को बहुत परेशान करते. सब के घरों में बिन बुलाए घुस जाते और उड़ते रहते. पर ये पेड़ सदा हराभरा रहता तो ये सब थोड़े दिन चलने वाली परेशानियां कुछ खास मायने नहीं रखती थीं.

मैं ने पता किया कि आखिर इस पौधे का नाम क्या है? पूछने पर वनस्पति शास्त्र के एक प्राध्यापक ने बताया कि इस का नाम ‘सप्तपर्णी‘ है. एक ही गुच्छे में एकसाथ सात पत्तियां होने के कारण इस का ये नाम पड़ा.

मुझे उस पेड़ का नाम ‘सप्तपर्णी‘ बेहद प्यारा लगा. साथ ही, तेज गंध वाले फूलों की वजह से आम भाषा में इसे लोग ‘लहसुनिया‘ भी कहते हैं. सचमुच पेड़ों और फूलों के नाम उन की खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं. उन के नाम लेते ही हमें वो दिखाई पड़ने लगते हैं, साथ ही हम उन की खुशबू को भी महसूस करने लगते हैं. मन को कितनी प्रसन्नता दे जाते हैं.

ये धराशायी हुआ ‘सप्तपर्णी‘ भी कुछ ऐसा ही था. तेज गरमी में जब भी डाक या कोरियर वाला आता तो उन्हें अकसर मैं इस पेड़ के नीचे खड़ा पाती. फल या सब्जी बेचने वालेे भी इसी पेड़ की छाया में खड़े दिखते. कोई अपनी कार धूप से बचाने के लिए पेड़ के ठीक नीचे खड़ी कर देता, तो कभी कोई मेहनतकश कुछ देर इस पेड़ के नीचे खड़े हो कर सुस्ता लेता. कुछ सुंदर पंछियों ने अपने घोंसले बना कर पेड़ की रौनक और बढ़ा दी थी. वे पेड़ से बातें करते नजर आते थे. टीवी केबल वाले इस की डालियों में अपने तार बांध कर चले जाते. कभीकभी बच्चों की पतंगें इस में अटक जातीं तो लगता जैसे ये भी बच्चों के साथ पतंगबाजी का मजा ले रहा हो.

दीवाली के दिनों में मैं इस के तने के नीचे भी दीपक जलाती. मुझे बड़ा सुकून मिलता. बच्चों ने इस के नीचे खड़े हो कर जो तसवीरें खिंचवाई थीं, वे कितनी सुंदर हैं. जब भी मैं कहीं से घर लौटती तो रिकशे वाले से बोलती, ‘भइया, वहां उस पेड़ के पास वाले घर पर रोक देना. लगता, जैसे ये पेड़ मेरा पता बन गया था. बरसात में जब बूंदें इस के पत्तों पर गिरतीं तो वो आवाज मुझे बेहद प्यारी लगती. ओले गिरे या सर्दी का पाला, ये क्यारी के किनारे रखे छोटे पौधों की ढाल बन कर सब झेलता रहता.

30 वर्ष की कितनी यादें इस पेड़ से जुड़ी थीं. कितनी सारी घटनाओं का साक्षी ये पेड़ हमारे साथ था भी तो इतने वर्षों से… दिनरात, हर मौसम में तटस्थता से खड़ा.

पता नहीं, कितने लोगों को सुकून भरी छाया देने वाले इस पेड़ को पिछले २ वर्ष से क्या हुआ कि ये दिन पर दिन सूखता चला गया. पहले कुछ दिनों में जब इस की टहनियां सूखने लगीं, तो मैं ने कुछ मोटी, मजबूत डालियों को देखा. उस पर अभी भी पत्ते हरे थे.

मैं थोड़ी आश्वस्त हो गई कि अभी सब ठीक है, परंतु कुछ ही समय में वे पत्ते भी मुरझाने लगे. मुझे अब चिंता होने लगी. सोचा, बारिश आने पर पेड़ फिर ठीक हो जाएगा, पर सावनभादों सब बीत गए, वो सूखा ही बना रहा. अंदर ही अंदर से वो कमजोर होने लगा. कभी आंधी आती तो उसे और झकझोर जाती. मैं भाग कर सारे खिड़कीदरवाजे बंद करती, पर बाहर खड़े उस सूखे पेड़ की चिंता मुझे लगी रहती.

पेड़ अब पूरा सूख गया था. संबंधित विभाग को भी इस की जानकारी दे दी गई थी.

जब इस के पुनः हरे होने की उम्मीद बिलकुल टूट गई, तो मैं ने एक फूलों की बेल इस के साथ लगा दी. बेल दिन ब दिन बढ़ती गई. माली ने बेल को पेड़ के तने और टहनियों पर लपेट दिया. अब बेल पर सुर्ख लाल फूल खिलने लगे.

यह देख मुझे अच्छा लगा कि इस उपाय से पेड़ पर कुछ बहार तो नजर आ रही है… पंछी भी वापस आने लगे थे, पर घोसलें नहीं बना रहे थे. कुछ देर ठहरते, पेड़ से बात करते और वापस उड़ जाते. अब बेल भी घनी होने लगी थी. उस की छाया पेड़ जितनी घनी तो नहीं थी, पर कुछ राहत तो मिल ही जाती थी. पेड़ सूख जरूर गया था, पर अभी भी कितने नेक काम कर रहा था.

टीवी केबल के तार अभी भी उस के सूखे तने से बंधे थे. सुर्ख फूलों की बेल को उस के सूखे तने ने सहारा दे रखा था. बेल को सहारा मिला तो उस की छाया में क्यारी के छोटे पौधे सहारा पा कर सुरक्षित थे. पेड़ सूख कर भी कितनी भलाई के काम कर रहा था. इसीलिए मैं इसे नेकी वाला पेड़ कहती. मैं ने इस पेड़ को पलपल बढ़ते हुए देखा था. इस से लगाव होना बहुत स्वाभाविक था.

परंतु आज इसे यों धरती पर चित्त पड़े देख कर मेरा मन बहुत उदास हो गया. लगा, जैसे आज सारी नेकी धराशायी हो कर जमीन पर पड़ी हो. पेड़ के साथ सुर्ख लाल फूलों वाली बेल भी दबी हुई पड़ी थी. उस के नीचे छोटे पौधे वाले गमले तो दिखाई ही नहीं दे रहे थे. मुझे और भी ज्यादा दुख हो रहा था.

घंटी बजाने वाले ने बताया कि अचानक ही ये पेड़ गिर पड़ा. कुछ देर बाद केबल वाले आ गए. वे तारें ठीक करने लगे. पेड़ की सूखी टहनियों को काटकाट कर तार निकाल रहे थे.

यह मुझ से देखा नहीं जा रहा था. मैं घर के अंदर आ गई, परंतु मन बैचेन हो रहा था. सोच रही थी, जंगलों में भी तो कितने सूखे पेड़ ऐसे गिरे रहते हैं. मन तो तब भी दुखता है, परंतु जो लगातार आप के साथ हो वो आप के जीवन का हिस्सा बन जाता है.

याद आ रहा था, जब गली की जमीन को पक्की सड़क में तबदील किया जा रहा था, तो मैं खड़ी हुई पेड़ के आसपास की जगह को वैसा ही बनाए रखने के लिए बोल रही थी. लगा, इसे भी सांस लेने के लिए कुछ जगह तो चाहिए. क्यों हम पेड़ों को सीमेंट के पिंजड़ों में कैद करना चाहते हैं. हमें जीवनदान देने वाले पेड़ों को क्या हम इतनी जमीन भी नहीं दे सकते? हमारे धर्मपुराणों में पेड़ लगाने और उन का पूजन करने की कितनी कथाएं हैं. बड़ेबुजुर्गों ने भी पेड़ लगाने के महत्व को समझाया है.

बचपन में मैं अकसर अपनी दादी से कहती कि ये आम का पेड़, जो आप ने लगाया है, इस के आम आप को तो खाने को मिलेंगे नहीं.

यह सुन कर दादी हंस कर कहतीं कि ये तो मैं तुम सब बच्चों के लिए लगा रही हूं. उस समय मुझे ये बात समझ में नहीं आती थी, पर अब स्वार्थ से ऊपर उठ कर हमारे पूर्वजों की परमार्थ भावना समझ आती हैं. क्यों न हम भी कुछ ऐसी ही भावनाएं अगली पीढ़ी को विरासत के रूप में दे जाएं.

मैं ने पेड़ के आसपास काफी बड़ी क्यारी बनवा दी थी. दीवाली के दिनों में उस पर भी नया लाल रंग किया जाता तो पेड़ और भी खिल जाता.

पर आज मन व्यथित हो रहा था. पुनः बाहर गई. कुछ देर में ही संबंधित विभाग के कर्मचारी भी आ गए. वे सब काम में जुट गए. सभी छोटीबड़ी सूखी हुई सारी टहनियां एक ओर पड़ी हुई थीं. मैं ने पास से देखा, पेड़ का पूरा तना उखड़ चुका था. वे उस के तने को एक मोटी रस्सी से खींच कर ले जा रहे थे.

आश्चर्य तो तब हुआ, जब क्यारी के किनारे रखे सारे छोटे गमले सुरक्षित थे. एक भी गमला नहीं टूटा था. जातेजाते भी नेकी करना नहीं भूला था ‘सप्तपर्णी‘. लगा, सच में नेकी कभी धराशायी हो कर जमीन पर नहीं गिर सकती.

मैं उदास खड़ी उन्हें उस यादों के दरख्त को लेे जाते हुए देख रही थी. मेरी आंखों में आंसू थे.

पेड़ का पूरा तना और डालियां वे लेे जा चुके थे, पर उस की गहरी जड़ें अभी भी वहीं, उसी जगह हैं. मुझे पूरा यकीन है कि किसी सावन में उस की जड़ें फिर से फूटेंगी, फिर वापस आएगा ‘सप्तपर्णी‘.

Illegal Migrants : प्रवासी भारतीयों के मामले में प्रधानमंत्री मोदी खामोश क्यों हैं?

Illegal migrants : ट्रंप प्रशासन ने 205 ‘अवैध भारतीय प्रवासियों’ को भारत वापस भेजा है. आरोप हैं कि उन्हें अपराधियों की तरह जंजीरों में बांध कर सेना विमान से वापस भेजा गया. मामला गंभीर और राष्ट्रीय शर्म का रहा मगर प्रधानमंत्री मोदी ने चुप्पी साधी रखी.

भारत ही क्या सारी दुनिया में यह गवाही है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गहरे संबंध हैं. टीवी ख़बरों में तो यह खूब प्रचारित किया जाता है कि उन के बीच ऐसे संबंध हैं कि डोनाल्ड ट्रंप नरेंद्र मोदी का कहना मानते हैं.

नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ते रहे हैं बहुत कुछ वैसी ही शैली ट्रंप ने भी अपनाई. इस से यह संदेश और भी मजबूत हो गया कि दोनों ही नेताओं में बड़ी अच्छी ट्यूनिंग है, एकदूसरे को समझते हैं मगर जिस तरह डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही भारत के प्रति कड़ा रुख अपनाया है वह बताता है कि दोनों के ही संबंध कितने छत्तीसी हैं.

दरअसल, अमेरिका में अवैध प्रवासियों का निर्वासन एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन कर सामने है. इस लेख में, हम इस मुद्दे का विस्तृत विश्लेषण करेंगे और इस के पीछे के कारणों और परिणामों को समझने का प्रयास करेंगे.

अमेरिका में अवैध प्रवासियों की संख्या लंबे समय से एक महत्वपूर्ण मुद्दा रही है. अनुमानों के अनुसार, अमेरिका में लगभग 11 मिलियन अवैध प्रवासी रहते हैं, जिन में से अधिकांश मैक्सिको और अन्य लैटिन अमेरिकी देशों से आए हैं. डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद, अमेरिकी सरकार ने अवैध प्रवासियों के प्रति सख्त नीति अपनाई है. ट्रंप प्रशासन ने अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिन में सीमा सुरक्षा को मजबूत करना, अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए डेटाबेस का उपयोग करना और अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए अधिक अधिकारियों को नियुक्त करना शामिल है.

अब 205 भारतीय नागरिकों को ले कर सी-17 विमान सैन एंटोनियो, टैक्सास भारत आ गया है. जिस से देश में सकते के हालात हैं. हर बात में प्रतिक्रिया देने वाले नरेंद्र मोदी एवं विदेश मंत्री जयशंकर तो मानो खामोश हैं.

दरअसल, अमेरिकी सरकार की इस कार्रवाई का परिणाम यह होगा कि अवैध प्रवासी अपने देश वापस जाएंगे. लेकिन इस कार्रवाई का विरोध भी हो रहा है, खास कर उन लोगों द्वारा जो अवैध प्रवासियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं, उन का तर्क है कि अवैध प्रवासी भी मानव हैं और उन्हें भी सम्मान और अधिकार मिलने चाहिए.

अमेरिकी सरकार की अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने की कार्रवाई एक जटिल मुद्दा है, जिस में कई पक्ष और विपक्ष हैं. जबकि यह कार्रवाई अवैध प्रवास को रोकने के लिए एक कदम हो सकती है, लेकिन इस का परिणाम यह भी हो सकता है कि अवैध प्रवासी अपने देश वापस जाएंगे और उन के अधिकारों का उल्लंघन होगा.

भारत की प्रतिक्रिया इस मुद्दे पर मिलीजुली बनी हुई है. एक ओर, भारत सरकार ने अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर अमेरिकी सरकार के साथ सहयोग करने की बात कही है. दूसरी ओर, विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कदम की आलोचना की है, यह कह कर कि यह कदम अवैध प्रवासियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है.

इस मुद्दे पर आम लोगों की प्रतिक्रिया भी मिलीजुली है. कुछ लोगों का मानना है कि अवैध प्रवासी भारत की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा हैं, जबकि अन्य लोगों का मानना है कि उन्हें मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए और उन्हें वापस भेजने से पहले उन के मामलों की समीक्षा की जानी चाहिए.

ऐसा लगता है, इस मामले में अमेरिका चीन के रास्ते पर चल रहा है. दोनों देशों की आव्रजन नीतियां और उन के कार्यान्वयन में काफी अंतर है. अमेरिका में, राष्ट्रपति ट्रंप ने अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए सख्त नीतियों का प्रस्ताव किया है, जबकि चीन में आव्रजन नीतियां अधिक सख्त और प्रतिबंधात्मक हैं. चीन में अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए “विशेष कानून” और नियम हैं.

हालांकि अमेरिका और चीन की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां भी अलगअलग हैं, जो उन की आव्रजन नीतियों को प्रभावित करती हैं. मगर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका लोकतंत्र का हिमायती है मानवाधिकार का प्रहरी माना जाता है. और वह ऐसा कदम उठाएगा यह कोई सोच भी नहीं सकता था.

मगर अब शीघ्र ऐसे मामलों में सरकार को कई कदम उठाने चाहिए. सब से पहले, उन्हें अमेरिकी सरकार के साथ बातचीत करनी चाहिए और अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर एक समझौता करना चाहिए जो भारतीय नागरिकों के हितों की रक्षा करें.

इस के अलावा, भारत सरकार को अवैध प्रवासियों के परिवारों को सहायता प्रदान करनी चाहिए जो भारत में रहते हैं. सरकार को उन्हें आर्थिक सहायता, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करनी चाहिए.

सरकार को अवैध प्रवास को रोकने के लिए भी कदम उठाने चाहिए. उन्हें सीमा सुरक्षा को मजबूत करना चाहिए और अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए तकनीकी उपायों का उपयोग करना चाहिए.

यही नहीं सरकार को अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाना चाहिए. उन्हें लोगों को अवैध प्रवास के खतरों और इस के परिणामों के बारे में बताना चाहिए. इन कदमों से सरकार अवैध प्रवासियों के मुद्दे का समाधान कर सकती है और भारतीय नागरिकों के हितों की रक्षा कर सकती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संबंधों में पिछले कुछ समय में काफी उतारचढ़ाव देखा गया है.

उल्लेखनीय है कि ट्रंप प्रशासन ने यूएसएआईडी को बंद करने की घोषणा की थी, जिस से भारत को मिलने वाली वित्तीय सहायता पर असर पड़ सकता था. लेकिन भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति के कारण, इस का प्रभाव न्यूनतम रहा.

कुल मिला कर, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के संबंधों में उतारचढ़ाव विचित्र रहे हैं, जहां नरेंद्र मोदी अपने संबंधों को कुछ ज्यादा बढ़ाचढ़ा कर दिखाते हैं, वहीँ आज हकीकत आईना दिखा रही है.

Fraud : आरूषि निशंक के बहाने फिल्मी दुनिया में ठगी की कहानी

Fraud : आज कल ठगी की खूब घटनाएं देखने को मिल रही हैं. इस के लिए ठग अलगअलग तरह की तरकीबें आजमा रहे हैं. आम लोग तो इस का शिकार हैं ही ख़ास लोग भी इस से बच नहीं पाए हैं.

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की पुत्री आरुषि निशंक के साथ एक बड़ा धोखाधड़ी का मामला सामने आया है. मुंबई के दो फिल्म निर्माताओं, वरुण प्रमोद कुमार बागला और मानसी वरुण बागला ने आरुषि को एक फिल्म में प्रमुख भूमिका देने और फिल्म के निर्माण में निवेश करने के नाम पर 4 करोड़ रुपए ठग लिए.

आरुषि ने कोतवाली पुलिस थाने में दर्ज कराई अपनी शिकायत में बताया कि फिल्म निर्माताओं ने उन्हें अपनी एक हिंदी फिल्म में एक प्रमुख भूमिका देने की पेशकश की और फिल्म से होने वाली आय से मोटा हिस्सा देने का वायदा कर उन्हें फिल्म के निर्माण में 5 करोड़ रुपए का निवेश करने का लालच दिया.

आरुषि ने बताया कि उन पर भरोसा कर के उन्होंने अपनी फर्म ‘हिमश्री फिल्म्स’ के जरिए आरोपियों को 2 करोड़ रुपए दे दिए. बाद में उन्होंने थोड़ाथोड़ा कर के फिल्म निर्माताओं को और धन दिया और इस प्रकार उन्होंने उन्हें कुल चार करोड़ रुपए दे दिए.

आरुषि ने बताया, बाद में आरोपियों ने उन्हें सूचित किया कि फिल्म में उन की जगह किसी और अभिनेत्री को ले लिया गया है और इस की शूटिंग पूरी हो चुकी है. अपने साथ ठगी का अहसास होने पर आरुषि ने निर्माताओं से उन का धन लौटाने को कहा लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार करते हुए उन्हें धमकी भी दी.

मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी के मुताबिक इस संबंध में दर्ज शिकायत के आधार पर आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता के तहत धन वसूली, ठगी, धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश और धमकी की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. उन्होंने बताया कि मामले की विवेचना शुरू कर दी गई है. फिल्मी दुनिया में कई चर्चित ठगी के मामले सामने आए हैं. यहां कुछ घटनाएं प्रस्तुत हैं:

प्रीति जिंटा का ठगी का मामला : प्रीति जिंटा ने अपने एक पूर्व मित्र पर ठगी का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि उन के मित्र ने उन्हें 2 करोड़ रुपये का चूना लगाया था.

शिल्पा शेट्टी का ठगी का मामला : शिल्पा शेट्टी ने अपने एक पूर्व मैनेजर पर ठगी का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि उन के मैनेजर ने उन्हें 1 करोड़ रुपये का चूना लगाया था.

सोनू सूद का ठगी का मामला : सोनू सूद ने अपने एक पूर्व बिजनैस पार्टनर पर ठगी का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि उन के बिजनैस पार्टनर ने उन्हें 5 करोड़ रुपए का चूना लगाया था.

राखी सावंत का ठगी का मामला : राखी सावंत ने अपने एक पूर्व प्रेमी पर ठगी का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि उन के प्रेमी ने उन्हें 1 करोड़ रुपए का चूना लगाया था.

कंगना रनौत का ठगी का मामला : कंगना रनौत ने अपने एक पूर्व मैनेजर पर ठगी का आरोप लगाया था. कहा था कि उन के मैनेजर ने उन्हें 2 करोड़ रुपए का चूना लगाया था.

इन मामलों से यह पता चलता है कि फिल्मी दुनिया में ठगी के मामले बहुत आम हैं. दिलीप कुमार, राज कपूर और देवानंद जैसे प्रसिद्ध अभिनेताओं के बारे में ठगी की घटनाओं की जानकारी नहीं मिलती है. हालांकि, उस समय की कुछ चर्चित फिल्म अभिनेत्रियों के साथ ठगी की घटनाएं हुईं थीं.

उस समय की कुछ चर्चित फिल्म अभिनेत्रियों में से एक मीना कुमारी थीं. उन्हें एक बार एक ठग ने 50,000 रुपए का चूना लगाया था. यह घटना 1950 के दशक में हुई थी.

एक अन्य उदाहरण में अभिनेत्री नरगिस का नाम आता है. उन्हें एक बार एक ठग ने 1 लाख रुपए का चूना लगाया था. यह घटना 1940 के दशक में हुई थी.

इन घटनाओं से यह पता चलता है कि उस समय की फिल्म अभिनेत्रियों को भी ठगी का अकसर सामना करना पड़ता था.

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