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Social Taboo : इसलिए अलग नहीं होते नास्तिकों के श्मशान घाट

Social Taboo : कहने वाले गलत नहीं कहते कि मौत का खौफ आदमी को चैन और सुकून से जीने भी नहीं देता. कैसेकैसे होते हैं ये डर और कौन इन्हें फैलाता है यह जानतेसमझते हुए भी लोग खामोश रहते हैं क्योंकि वे आस्तिक होते हैं लेकिन नास्तिकों को ये डर नहीं सताते जिन के लिए अलग से श्मशान घाट होने लगें तो एक बड़े बदलाव की उम्मीद की जा सकती है.

मृत्यु जीवन का सुखद समापन है या नहीं इस पर बहस की तमाम गुंजाइशें हैं लेकिन मौत का खौफ सिर्फ उन लोगों के सर ज्यादा चढ़ कर बोलता है जो धार्मिक और पूजापाठी हैं. एक नास्तिक के लिए यह सामान्य और जीवन की अंतिम घटना है जिस के बाद कुछ बाकी नहीं रह जाता. आस्तिकों के लिए मौजूदा जिंदगी तो कठोर होती ही है साथ ही मौत के बाद की जिंदगी का खौफ उन्हें चैन से मरने भी नहीं देता. कई बार तो यह इतना ज्यादा होता है कि लोगों को मनोचिक्त्सक की शरण लेना पड़ती है. मौत के डर को मनोविज्ञान की भाषा में थानाटोफोबिया कहते हैं.

बहुत बारीकी से देखें तो इस मृत्युचिंता या डर की जड़ में सिर्फ और सिर्फ धर्म है. जिस ने मौत को ले कर इतने खौफनाक और डरावने किस्सेकहानियां गढ़ रखे हैं कि खासे आदमी का जीना दुश्वार हो जाता है. दुनिया का ऐसा कोई धर्म नहीं है जो मौत का डर दिखा कर पैसे न ऐंठता हो. हिंदू धर्म सहित सभी धर्म मोक्ष की बात प्रमुखता से करते हैं तो उन का इकलौता मकसद मौत पर भी दुकान चलाना ही होता है. महाकुंभ की भगदड़ में जो लोग मारे गए वे भी मोक्ष के लालच में प्रयागराज गए थे जिसे ले कर तरहतरह की बातें खासतौर से धर्म गुरुओं के बीच ज्यादा हुईं.

भय बिन होत न प्रीत

लाइफ आफ्टर डेथ हमेशा से ही मनोविज्ञानियों और दर्शनशास्त्रियों के लिए जिज्ञासा का विषय रहा है. हालांकि ये लोग किसी आधिकारिक या प्रमाणिक निष्कर्ष पर कभी नहीं पहुंच पाए. लेकिन धर्माचार्यों ने कूद कर बता दिया कि आदमी के बहुत से जन्म और योनियां होती हैं जो बहुत तकलीफदेह होती हैं. गरुड़ पुराण में मौत के बाद की जिंदगी का इतना भयावह चित्रण है जिस के श्रवण मात्र से अच्छेअच्छों की रूह कांप उठती है, मसलन मौत के बाद आत्मा को इतने और उतने नरकों से हो कर गुजरना पड़ता है, उन्हें अपनों कर्मों के मुताबिक फल मिलता है, उन्हें तेल के खोलते कड़ाहों में डाला जाता है, हाथी के पैरों के नीचे कुचला जाता है, सांपों से या मलमूत्र से भरे हुए कुए में डाल दिया जाता है और उन के अंगों को लोहे के सरियों से दागा जाता है वगैरह वगैरह .

इस डर से बचने का उपाय भी धर्म बताता है, वह है ब्राह्मण को दानदक्षिणा देते रहना. इस से भी पेट नहीं भरता तो श्राद्ध भी उपलब्ध है जो सालाना किश्त है जिंदगी के बाद की भी. श्मशान किसी की भी जिंदगी का आखिरी पड़ाव होता है पंडेपुजारियों की दुकान वहां भी चालू रहती है. हैरानी की बात यह है कि आमतौर पर ये लोग शव दहन के समय श्मशान में मौजूद नहीं रहते क्योंकि वह अपवित्र स्थान माना जाता है. लेकिन दूसरे दिन ही से इन का मीटर घूमने लगता है जो तीसरे, दसवें और तेरहवें दिन से शुरू हो कर मृतक के वारिसों की जिंदगी तक चलता रहता है और 2 – 3 पीढ़ियां यह धर्म टैक्स भरती रहती हैं. लेकिन उस शख्स को न के बराबर पैसा वह भी एक बार ही मिलता है जो श्मशान में शव का निबटान करता है. यह राशि दो से पांच हजार के बीच होती है. इन लोगों को डोम या फिर चंडाल भी कहा जाता है जो वर्ण व्यवस्था के लिहाज से शुद्र होते हैं.

बदहाल हैं डोम

शव दहन में अहम रोल निभाने वाले इन डोमों का समाज में कोई सम्मान नहीं होता उलटे चांडाल शब्द बतौर गाली इस्तेमाल किया जाता है. लकड़ी ढोने से ले कर शव के पूरी तरह राख होने तक की जिम्मेदारी इसी उपेक्षित की होती है. एक बार लोग परिजन को जला कर जाते हैं तो फिर कभी डोम की तरफ मुड़ कर भी नहीं देखते. तय है इसलिए कि मोक्ष दिलाने या परलोक में सुख सुविधाएं मुहैया कराने के कौपी राईट इस के पास नहीं होते. जो ब्राह्मण शव को छूता तक नहीं उसे जिंदगी भर दानदक्षिणा से नवाजा जाता है. उन का आदर सत्कार किया जाता है, पांवछुए जाते हैं. यह सब महज इसलिए कि वह जाति से ब्राह्मण है और शरीर से आत्मा के फुर्र होने तक जो आज तक किसी ने नहीं देखी की मुक्ति मोक्ष का ठेकेदार होता है. डोम लोगों का रहनसहन और जीवन स्तर बहुत ही दयनीय होता है. दिल्ली के झंडेवालान स्थित श्मशान घाट में जब दिल्ली प्रैस के संवाददाता रोहित सिंह ने वहां शव निबटान करने वाले मुखिया प्रमोद शर्मा से बात की तो उन्होंने खुद को अचारद बताया. उन की बातों से साफ लगा कि शव दाह करने वालों की अपनी अलग परेशानियां हैं. उन्हें बहुत ज्यादा पैसा नहीं मिलता है न तो सरकार को इन की बदहाली से कोई सरोकार होता है और न ही कोई समाजसेवी संगठन कुछ करता है.

वहां लगी रेट लिस्ट के मुताबिक पूरे दाह कर्म के 900 रूपए ही उन्हें मिलते हैं. लकड़ी का पैसा नगर निगम के खाते में चला जाता है. उन के अधीन काम करने वालों को कितना पैसा मिलता होगा इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि बस गुजारा करने लायक. डोम जाति के लोग जिस माहौल में जिंदगी बसर करते हैं उस का भी सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह कतई सहूलियत वाला नहीं होता. जिस श्मशान में लोग शाम ढलने के बाद जाने से भी डरते हैं उस में इन्हें पूरी जिंदगी बिताने का श्राप या भार कुछ भी कहलें ढोना पड़ता है और एवज में इन्हें मृतक के परिजन थैंक्स तक नहीं बोलते क्योंकि ये ब्राह्मण नहीं शूद्र हैं.

बकौल प्रमोद शर्मा कुछ दिन पहले एक हिंदूवादी संगठन के लोग शमसान में रेट लिस्ट टांग गए हैं मानों हम कोई जबरिया वसूली करते हों. शमसान में आमतौर पर कोई धार्मिक कर्मकांड ऐसा नहीं होता जिस में पंडे की उपस्थिति अनिवार्य हो. मृतक के परिजन खुद अगरबत्ती और दिए जला कर शव पर फूलमालाएं और दूसरी पूजन सामग्री चढ़ा देते हैं. उन के साथ आए बुजुर्ग या अनुभवी परिजन क्रियाकर्म के दिशानिर्देश देते रहते हैं. शव दहन के वक्त कोई खास मंत्र नहीं पढ़ा जाता कभीकभार परिजनों के आग्रह पर प्रमोद खुद मंत्रोच्चार कर देते हैं, उन के पास एक किताब भी है जिस में अंतिम संस्कार के तौरतरीके लिखे हुए हैं.

आस्तिक बनाम नास्तिक

धर्म मृत्यु को भी संस्कार इसलिए मानता है ताकि इस के बाद के जीवन की कपोल कल्पनाओं की अहमियत खत्म न हो. अगर आदमी का सब कुछ उस के जलने के साथ खत्म हुआ मान लिया जाए तो धर्म के शोरूम के 80 फीसदी शटर खुदबखुद गिर जाएंगे. क्योंकि लोगों का भरोसा मोक्ष, मुक्ति स्वर्ग, नरक से उठ जाएगा फिर कोई भला क्यों दानदक्षिणा देगा.
लेकिन उन लोगों का क्या जो नास्तिक हैं और किसी भगवान, पूर्व और पुनर्जन्म सहित दैवीय साहित्य पर भरोसा नहीं करते? इस बाबत धर्म खामोश नहीं है वह यह एलान कर देता है कि ऐसे पापियों को तो कुम्भीपाक जैसे दर्जनों नर्कों से हो कर गुजरना पड़ेगा और उन्हें तरहतरह की घोर यंत्रणाए भुगतना पड़ेंगी.

दिक्कत तो यह है कि नास्तिक इन भभकियों से डरते नहीं क्योंकि वे मृत्यु को सहजता से स्वीकार कर चुके होते हैं. और वक्त रहते उस की तैयारियां भी शुरू कर देते हैं. वे मोक्ष मुक्ति के डर से धार्मिक पाखंडों में नहीं पड़ते बल्कि अपने काम में लगे रहते हैं. मौत का ख्याल उन्हें अवसाद में नहीं ले जाता बल्कि एक रोमांच से भर देता है.

जिंदगी के आखिरी दिनों में आस्तिक श्मशान की कल्पना मात्र से कांप उठते हैं. उन के जेहन में बारबार काले भैंसे पर सवार हाथ में फरसा लिए अट्टहास करता कालाकलूटा यमदूत घूम रहा होता है. वे बारबार भगवान से उन पापों की माफी मांग रहे होते हैं जो दरअसल में उन्हें कभी किए ही नहीं होते और अगर किए भी होते हैं तो उन के कोई माने नहीं होते. क्योंकि पाप क्या और पुण्य क्या यह तो धर्म ने तय कर रखा होता है. जिस का निचोड़ यह होता है कि पूजापाठ और दानदक्षिणा के अलावा सब कुछ पाप है.

वे बारबार गंगाजल हलक के नीचे उतार रहे होते हैं, महामृत्युंजय सहित न जाने कितने मंत्रों का जाप कर रहे होते हैं. इन ढकोसलों में उन के परिजन और रिश्तेदार भी प्रमुखता से शामिल रहते हैं. यह कोई प्रार्थना या पश्चाताप नहीं बल्कि वह डर है जो धर्म ने सदियों से दिमाग में ठूंस रखा है और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है. ऐसा और भी बहुत कुछ है जो उन्हें मौत के पहले ही मार देता है.

उलट इस के नास्तिक इन चक्करों में नहीं पड़ता. वह बेखौफ हो कर जिंदगी की आखिरी घड़ी का इंतजार करते कुछ न कुछ कर रहा होता है. अशक्त अगर हो तो पठनचिंतन करता रहता है. उसे इस बात की चिंता या डर नहीं रहता कि मौत के बाद क्या होगा और न ही इस बात की फ़िक्र होती है कि अंतिम यात्रा में कितने लोग शामिल होंगे और उस से भी बड़ा तनाव यह उसे नहीं होता कि मौत के बाद परिजन तेरहवी करेंगे या नहीं, गंगाजली खोलेंगे या नहीं, मृत्युभोज में पकवान बनवाएंगे या नहीं और मुक्ति के ठेकेदार ब्राह्मण समुदाय का भोज कराएंगे या नहीं.
लेकिन एक नास्तिक की इकलौती चिंता यह होती है कि उसे वहीँ जलाया या दफनाया जाएगा जहां धार्मिक और आस्तिक जलाए दफनाए जाते हैं क्योंकि भारत में नास्तिकों के लिए अलग से कहीं श्मशान घाट नहीं हैं. क्या नास्तिकों के लिए अलग से श्मशान घाट होना चाहिए इस सवाल का जवाब देना कठिन है क्योंकि इस बात से किसी लाश को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उस के साथ क्या किया जा रहा है. आप उसे जंगल में फेक दो पानी में बहा दो खेत या घर में गाड़ लो लाश कोई एतराज नहीं जता सकती.

हाल नास्तिक देशों के

नास्तिकों के लिए अलग शव निबटान की व्यवस्था होनी चाहिए क्योंकि वे जिंदगीभर बहुसंख्यक आस्तिकों द्वारा तिरस्कृत किए जाते हैं. उन का हर स्तर पर बहिष्कार कर उन्हें अपमानित किया जाता है. वे अनास्थावादी और अनीश्वरवादी होते हैं इसलिए भी उन के अलग श्मशान घाट होने चाहिए. जानकर हैरानी होती है कि कई देशों में नास्तिकों के लिए अलग से शव निबटान की व्यवस्था होने लगी है. जहां कोई धरमकरम ढोंगपाखंड नहीं होते.

इस का सब से बेहतर उदाहरण चीन है जो नास्तिकों का घोषित देश हो चला है. वहां 90 फीसदी से भी ज्यादा लोग नास्तिक हैं. जिन के लिए अलग से श्मशान घाट हैं जो सरकारी नियंत्रण में रहते हैं. यही हाल स्वीडन का भी है वहां भी नास्तिकों की तादाद चीन जितनी ही है जिन के लिए अलग से श्मशान घाट हैं. जरमनी की लगभग आधी आबादी नास्तिक है उन के लिए भी अलग शमसान घाट हैं. रूस, फ्रांस और जापान में भी नास्तिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है इन देशों में भी नास्तिकों की भावनाओं का सम्मान होने लगा है उन के लिए तेजी से अलग श्मशान घाट बन रहे हैं.

सब से बड़ी झंझट और विरोधाभास अमेरिका में देखने में आ रही है. वहां भी नास्तिकों की तादाद बढ़ रही है लेकिन उन के लिए अभी अलग से श्मशान घाट नहीं हैं. हालांकि वहां धर्म निरपेक्ष अंतिम संस्कार की सुविधा दी जाने लगी है और गैर धार्मिक श्मशान भी यदाकदा दिखने लगे हैं लेकिन अब शायद नहीं दिखेंगे क्योंकि वहां डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति हैं जो चर्चों और पादरियों के इशारे पर नाचते हैं. ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि ज्यादा लोग नास्तिक बनें क्योंकि वे इन की दुकान के लिए खतरा साबित होंगे.

अमेरिका की तरह ब्रिटेन के धर्म गुरु भी हैरान परेशान हैं वजह वहां भी तेजी से गैर धार्मिक या वैकल्पिक शव दहन का क्रेज बढ़ रहा है. एक ताज़ी रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन के लोग गैर पारम्परिक तौरतरीके शव दहन के छोड़ रहे हैं. ये लोग मृत्यु को एक उत्सव के रूप में मनाने लगे हैं जिस में नाच गाना संगीत वगैरह होता है. मानतावादी शव दाह दुनिया भर में लोकप्रिय हो रहा है, इस सोच के लोग भी मानते हैं कि स्वर्ग नरक मोक्ष मुक्ति बकवास बातें हैं. जिंदगी एक बार मिलती है इसलिए जी भर के बिना किसी खौफ के जीना चाहिए और अंतिम क्रिया कर्म भी पाखंड रहित होना चाहिए इन के समारोहों में मृतक की विरासत का जिक्र होता है.

नास्तिकों से डरते हैं शास्त्रधारी

अमेरिका और यूरोप के लोग धार्मिक बंदिशों से आजिज आने लगे हैं जिस का विरोध वे गैर धार्मिक और वैकल्पिक अंत्येष्टि के जरिए प्रदर्शित भी करने लगे हैं. वुड लेंड दफन पद्धति भी वहां तेजी से लोकप्रिय हो रही है. इस की लागत भी कम आती है और यह पर्यावरण के अनुकूल भी है. गैर धार्मिक शव निबटान के नएनए तरीके सामने आ रहे हैं जो ज्यादा से ज्यादा लोगों को चैन से मरने का संदेश देते हैं.

यह बेहद सुखद बदलाव है जिस की कोई आहट भारत में नहीं सुनाई दे रही क्योंकि यहां राम राज्य चल रहा है. इसलिए नास्तिकों की मजबूरी हो चली है कि वे आस्तिकों के श्मशान घाट का ही इस्तेमाल करें. जो मरने के बाद भी उन के साथ ज्यादती और अपमान है जबकि संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि मृतक का सम्मानपूर्वक दाह संस्कार भी एक अधिकार है जिन नास्तिकों को पापी करार दिया जाता है उन की अनदेखी की जा कर उस का प्रचार भी किया जाता है. उन्हें जानबूझ कर श्मशान घाट इस्तेमाल करने दिए जाते हैं जिस से नास्तिकता का रायता श्मशान घाट में ही बह कर सूख जाए.

चूंकि यह अधिकार कोई मांगता नहीं इसलिए मिलता भी नहीं. धर्म के ठेकेदार कभी नहीं चाहेंगे कि नास्तिकों के अलग श्मशान घाट हों क्योंकि उन के होने से फटका इन के धंधे पर पड़ेगा और मुमिकन है लोगों की दिलचस्पी इन में बढ़े और वे भी गैर धार्मिक संस्कार प्राथमिकता में रखने लगें. एक सर्वे के मुताबिक भारत में अभी 6 फीसदी लोग नास्तिक हैं लेकिन उन का शव निबटान धार्मिक श्मशान घाटों में ही होता है.

नास्तिकों के अलग श्मशान घाट बनने से नास्तिकता और आस्तिकता के बीच झूल रहे लोगों को नास्तिक श्मशान घाट आकर्षित ही करेंगे जो धर्म के कारोबारियों के बरदाश्त के बाहर की बात होगी. क्योंकि वहां कपाल क्रिया नहीं होगी, शव के मुंह में तुलसी के पत्ते और घी का लौटा नहीं डाला जाएगा, फूल मालाएं नहीं होंगी और सब से बड़ा बदलाव यह दिखेगा कि राम नाम सत्य है का नारा नहीं होगा. शव दहन के बाद न तीसरा चौथा होगा न गंगाजली खुलेगी न मृत्यु भोज होगा और न ही सालाना श्राद्ध वगैरह होंगे, सो उन का न होना ही पंडों के हक में है जो बिना श्मशान घाट जाए माल पुए पूरी खीर का और तरहतरह के दान का मजा लूट रहे हैं.

Online Hindi Story : प्यार के काबिल – जूही और मुकुल को परिवार से क्या सीख मिली

Online Hindi Story : मुकुल और जूही दोनों सावित्री कालोनी में रहते थे. उन के घर एकदूसरे से सटे हुए थे. दोनों ही हमउम्र थे और साथसाथ खेलकूद कर बड़े हुए थे.

दोनों के परिवार भी संपन्न, आधुनिक और स्वच्छंद विचारों के थे, इसलिए उन के परिवार वालों ने कभी भी उन के मिलनेजुलने और खेलनेकूदने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था. इस प्रकार मुकुल और जूही साथसाथ पढ़तेलिखते, खेलतेकूदते अच्छे अंकों के साथ हाईस्कूल पास कर गए थे.

इधर कुछ दिनों से मुकुल अजीब सी परेशानी महसूस कर रहा था. कई दिन से उसे ऐसा एहसास हो रहा था कि उस की नजरें अनायास ही जूही के विकसित होते शरीर के उभारों की तरफ उठ जाती हैं, चाहे वह अपनेआप को लाख रोके. बैडमिंटन खेलते समय तो उस के वक्षों के उभार को देख कर उस का ध्यान ही भंग हो जाता है. वह अपनेआप को कितना भी नियंत्रित क्यों न करे, लेकिन जूही के शरीर के उभार उसे सहज ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं.

जूही को भी यह एहसास हो गया था कि मुकुल की निगाहें बारबार उस के शरीर का अवलोकन करती हैं. कभीकभी तो उसे यह सब अच्छा लगता, लेकिन कभीकभी काफी बुरा लगता था.

यह सहज आकर्षण धीरेधीरे न जाने कब प्यार में बदल गया, इस का पता न तो मुकुल और जूही को चला और न ही उन के परिवार वालों को.

लेकिन यह बात निश्चित थी कि मुकुल को जूही अब कहीं अधिक खूबसूरत, आकर्षक और लाजवाब लगने लगी थी. दूसरी तरफ जूही को भी मुकुल अधिक स्मार्ट, होशियार और अच्छा लगने लगा था. दोनों एकदूसरे में किसी फिल्म के नायकनायिका की छवि देखते थे. बात यहां तक पहुंच गई कि

इस वर्ष वैलेंटाइन डे पर दोनों ने एकदूसरे को न सिर्फ ग्रीटिंग कार्ड दिए, बल्कि दोनों के बीच प्रेमभरे एसएमएस का भी आदानप्रदान हुआ.

इस के बाद तो एकदूसरे के प्रति उन की झिझक खुलने लगी. वे दोनों प्रेम का इजहार तो करने ही लगे साथ ही फिल्मी स्टाइल में एकदूसरे से प्रेमभरी नोकझोंक भी करने लगे. हालत यह हो गई कि पढ़ते समय भी दोनों एकदूसरे के खयालों में ही डूबे रहते. अब किताबों के पन्नों पर भी उन्हें एकदूसरे की तसवीर नजर आ रही थी.

इस के चलते उन की पढ़ाई पर असर पड़ना स्वाभाविक था. इंटर पास करतेकरते उन के आकर्षण और प्रेम की डोर तो मजबूत हो गई, लेकिन पढ़ाई का ग्राफ काफी नीचे गिर गया, जिस का असर उन के परीक्षाफल में नजर आया. नंबर कम आने पर दोनों के परिवार वाले चिंतित तो थे, लेकिन वे नंबर कम आने का असली कारण नहीं खोज पा रहे थे.

इंटर पास कर के मुकुल और जूही ने डिग्री कालेज में प्रवेश लिया तो उन के प्रेम को और विस्तार मिला. अब उन्हें मिलनेजुलने के लिए कोई जगह तलाशने की आवश्यकता नहीं थी. कालेज की लाइब्रेरी, कैंटीन और पार्क गपशप और उन के प्रेम इजहार के लिए उमदा स्थान थे.

इस प्रकार मुकुल और जूही का प्रेम परवान चढ़ता ही जा रहा था. किताबों में पढ़ कर और फिल्में देख कर वे प्रेम का इजहार करने के कई नायाब तरीके सीख गए थे.

इस बार वैलेंटाइन डे के अवसर पर मुकुल ने सोचा कि वह एक नए अंदाज में जूही से अपने प्रेम का इजहार करेगा. यह नया अंदाज उस ने एक पत्रिका में तो पढ़ा ही था, फिल्म में भी देखा था. उस ने पढ़ा था कि इस कलात्मक अंदाज से प्रेमिका काफी प्रभावित होती है और फिर वह अपने प्रेमी के खयालों में ही डूबी रहती है. इस कलात्मक अंदाज को उस ने इस वैलेंटाइन डे पर आजमाने का निश्चय किया. उस ने शीशे के सामने खड़े हो कर उस का खूब अभ्यास भी किया.

सुबहसुबह का समय था. मौसम भी अच्छा था. मुकुल का मन रोमानी था. उस ने हाथ में लिए गुलाब के खिले फूल को निहारा और फिर उसे अपने होंठों पर रख कर चूम लिया. अब उस से रहा न गया. उस ने अपने मोबाइल से जूही को छत पर आने के लिए एसएमएस किया.

जूही तो जैसे तैयार ही बैठी थी. मैसेज पाते ही वह चहकती हुई छत की तरफ दौड़ी. वह प्रेम की उमंग और तरंग में डूबी हुई थी और वैसे भी प्रेम कभी छिपाए नहीं छिपता.

जूही को इस प्रकार छत की ओर दौड़ते देख उस की मम्मी का मन शंका से भर उठा. वे सोचने लगीं, ‘इतनी सुबह जूही को छत पर क्या काम पड़ गया? अभी तो धूप भी अच्छी तरह से नहीं खिली.’ उन की शंका ने उन के मन में खलबली मचा दी. वे यह देखने के लिए कि जूही इतनी सुबह छत पर क्या करने गई है, उस के पीछेपीछे चुपके से छत पर पहुंच गईं.

वहां का दृश्य देख कर जूही की मम्मी हतप्रभ रह गईं. जूही के सामने मुकुल घुटने टेके गुलाब का फूल लिए प्रणय निवेदन की मुद्रा में था. वह बड़े ही प्रेम से बोला, ‘‘जूही डार्लिंग, आई लव यू.’’

जूही ने भी उस के द्वारा दिए गए गुलाब के फूल को स्वीकार करते हुए कहा, ‘‘मुकुल, आई लव यू टू.’’

यह दृश्य देख कर जूही की मम्मी के पैरों तले जमीन खिसक गई, लेकिन छत पर कोई तमाशा न हो, इसलिए वे चुपचाप दबे कदमों से नीचे आ गईं. अब वे बहुत परेशान थीं.

थोड़ी देर बाद जूही भी उमंगतरंग में डूबी हुई, प्रेमरस में सराबोर गाना गुनगुनाती हुई नीचे आ गई. इस समय वह इतनी खुश थी, मानो सारा जहां उस के कदमों में आ गया हो. इस समय उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था.

उस की मम्मी को भी समझ नहीं आ रहा था कि वे उस के साथ कैसे पेश आएं? उन के मन में आ रहा था कि जूही के गाल पर थप्पड़ मारतेमारते उन्हें लाल कर दें. दूसरे ही पल उन के मन में आया कि नहीं,  इस मामले में उन्हें समझदारी से काम लेना चाहिए. उन्होंने शाम को जूही के पापा से ही बात कर के किसी निर्णय पर पहुंचने की सोची. उधर, आज दिनभर जूही अपने मोबाइल पर लव सौंग सुनती रही.

शाम को जब जूही की मम्मी ने जूही के पापा को सुबह की पूरी घटना बताई, तो वे भी सन्न रह गए. फिर भी उन्होंने धैर्य से काम लेते हुए कहा, ‘‘निशा, तुम चिंता मत करो. जूही युवावस्था से गुजर रही है और यह युवावस्था का सहज आकर्षण है. क्या हम ने भी ऐसा ही नहीं किया था?’’

‘‘राजेंद्र, तुम्हें तो हर वक्त मजाक ही सूझता है. यह जरूरी तो नहीं कि जो हम करें वही हमारी संतानें भी करें.’’

‘‘निशा, मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि बच्चों के भविष्य को ध्यान में रख कर कोई कदम ही न उठाया जाए. मैं आज ही मुकुल के पापा से बात करता हूं. बच्चों को समझाने से ही कोई हल निकलेगा.’’

जूही के पापा ने मुकुल के पापा से मिलने का समय लिया और फिर उन से मिलने उन के घर गए. फिर दोनों ने सौहार्दपूर्ण वातावरण में मुकुल और

जूही के प्रेम व्यवहार और उन के भविष्य पर चर्चा की, जिस से वे दोनों कहीं गलत रास्ते पर न चल पड़ें. दोनों ने बातों ही बातों में मुकुल और जूही को सही मार्ग पर आगे बढ़ाने की योजना और नीति बना ली थी.

तब एक दिन मुकुल के पापा ने सही अवसर पा कर मुकुल को अपने पास बुलाया और उस से इस प्रकार बातें शुरू कीं जैसे उन्हें उस के और जूही के बीच पनप रहे प्रेम संबंधों के बारे में कुछ पता ही न हो.

उन्होंने बड़े प्यार से मुकुल से पूछा, ‘‘बेटा मुकुल, आजकल तुम खोएखोए से रहते हो. इस बार तुम्हारे नंबर भी तुम्हारी योग्यता और क्षमता के अनुरूप नहीं आए. आखिर क्या समस्या है बेटा?‘‘

मुकुल के पास इस प्रश्न का कोई सटीक उत्तर नहीं था. कभी वह प्रश्नपत्रों के कठिन होने को दोष देता, तो कभी आंसर शीट के चैक होने में हुई लापरवाही को दोष देता.

‘‘बेटा मुकुल, मुझे तो ऐसा लग रहा है कि तुम अपना ध्यान पढ़ाई में सही से लगा नहीं पा रहे हो. कोई इश्कविश्क का मामला तो नहीं है?’’

यह सुनते ही मुकुल को करंट सा लगा. उस के मुंह से तुरंत निकला, ‘‘नहीं पापा, ऐसी कोई बात नहीं है.’’

‘‘बेटा, यह उम्र ही ऐसी होती है. यदि ऐसा है भी तो कोई बुरी बात नहीं. मुझे अपना दोस्त समझ कर तुम अपनी भावनाओं को मुझ से शेयर कर सकते हो. एक पिता कभी अपने बेटे को गलत सलाह नहीं देगा, विश्वास करो.’’

लेकिन मुकुल अब भी कुछ बताने से झिझक रहा था. उस के पापा उस के चेहरे को देख कर समझ गए कि उस के मन में कुछ है, जिसे वह बताने से झिझक रहा है. तब उन्होंने उस से कहा, ‘‘मुकुल, कुछ भी बताने से झिझको मत. तुम्हारे सपनों को पूरा करने में सब से बड़ा मददगार मैं ही हो सकता हूं. बताओ बेटा, क्या बात है?’’

अपने पापा को एक दोस्त की तरह बातें करते देख मुकुल की झिझक खुलने लगी. तब उस ने भी जूही के साथ चल रही अपनी प्रेम कहानी को सहज रूप से स्वीकार कर लिया.

इस पर उस के पापा ने कहा, ‘‘मुकुल, तुम एक समझदार बेटे हो जो तुम ने सचाई स्वीकार की. मुझे जूही से तुम्हारी

दोस्ती पर किसी भी तरह से कोई भी एतराज नहीं. बस, मैं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि यदि तुम जूही को पाना चाहते हो तो पहले उस के लायक तो बनो.

‘‘तुम जूही को तभी पा सकते हो, जब अपने कैरियर को संवार लो और कोई अच्छी नौकरी व पद प्राप्त कर लो. बेटा, यदि तुम अपना और जूही का जीवन सुखमय बनाना चाहते हो, तो तुम्हें अपना कैरियर संवारना ही होगा अन्यथा जूही के पेरैंट्स भी तुम्हें स्वीकार नहीं करेंगे. इस दुनिया में असफल आदमी का साथ कोई नहीं देता.’’

यह सुन कर मुकुल ने भावावेश में कहा, ‘‘पापा, हम एकदूसरे से सच्चा प्यार करते हैं. कभी हम एकदूसरे से जुदा नहीं हो सकते.’’

‘‘बेटा, तुम दोनों को जुदा कौन कर रहा है? मैं तो बस इतना कह रहा हूं कि यदि तुम जूही से जुदा नहीं होना चाहते तो उस के लिए कुछ बन कर दिखाओ. अन्यथा कितने ही सच्चे प्रेम की दुहाई देने वाले रिश्ते हों, अनमेल होने पर टूट और बिखर जाते हैं. यदि तुम ऐसा नहीं चाहते तो जूही की जिंदगी में खुशबू महकाने के लिए तुम्हें कुछ बन कर दिखाना ही होगा.’’

‘‘पापा, आप की बात मुझे समझ आ गई है. हम जिस चीज को चाहते हैं, उस के लिए हमें उस के लायक बनना ही पड़ता है. नहीं तो वह चीज हमारे हाथ से निकल जाती है.

‘‘अभी तक मैं अपना बेशकीमती समय यों ही गाने सुनने और फिल्में देखने में गवां रहा था. अब मैं अपना पूरा समय अपना कैरियर संवारने में लगाऊंगा. मुझे अपने प्यार के काबिल बनना है.’’

‘‘शाबाश बेटा, अपने इस जज्बे को कायम रखो. अपनी पढ़ाई में पूरा मन लगाओ. अपना कैरियर संवारो. मात्र सपने देखने से कुछ नहीं होता, उन्हें हकीकत में बदलने के लिए प्रयास और परिश्रम करना ही पड़ता है. जूही को पाना चाहते हो तो जूही के काबिल बनो.’’

‘‘पापा, आप ने मेरी आंखें खोल दी हैं. मैं आप से वादा करता हूं कि मैं ऐसा ही करूंगा.’’

‘‘ठीक है बेटा, तुम्हें मेरी सलाह समझ में आ गई. मैं एक दोस्त और मार्गदर्शक के रूप मे तुम्हारे साथ हूं.’’

इसी प्रकार की बातें जूही के पेरैंट्स ने जूही को भी समझाईं. इस का असर जल्दी ही देखने को मिला. मुकुल और जूही एकदूसरे को पाने के लिए अपनाअपना कैरियर संवारने में लग गए. अब वे दोनों अपनी पढ़ाई ध्यान लगा कर करने लगे थे.

जूही और मुकुल के पेरैंट्स भी यह देख कर काफी खुश थे कि उन के बच्चे सही राह पर चल पड़े हैं और अपनाअपना भविष्य उज्ज्वल बनाने में लगे हैं.

Hindi Story Telling : किरचें – सुमन ने अपनी मां के मोबाइल में ऐसा क्या देख लिया

Hindi Story Telling : ट्यूशनके लिए देर हो रही है… यह नेहा की बच्ची अभी तक नहीं आई. फोन करना ही पड़ेगा,’ मन ही मन बड़बड़ाती सुमन फोन की तरफ बढ़ी. ‘‘इस के भी अलग ही नखरे हैं… जब देखो जनाब का मुंह फूला रहता है,’’ सुमन ने डैड पड़े फोन को गुस्से में पटका.

अपनी सहेली को फोन करने के लिए सुमन ने मम्मी का मोबाइल उठाया तो उस में एक बिना पढ़ा मैसेज देख कर उत्सुकता से पढ़ लिया. किसी अनजान नंबर से आए इस मैसेज में एक रोमांटिक शायरी लिखी थी. आ गया होगा किसी का गलती से. दिमाग को झटकते हुए उस ने नेहा को फोन लगाया तो पता चला कि उस की तबीयत खराब है. आज नहीं आ रही. इस सारे घटनाक्रम में ट्यूशन जाने का टाइम निकल गया तो सुमन मन मार कर अपनी किताबें खोल कर बैठ गई. मगर मन बारबार उस अनजान नंबर से आए रोमांटिक मैसेज की तरफ जा रहा था. ‘कहीं सचमुच ही तो कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो मम्मी को इस तरह के संदेश भेज रहा है,’ सोच सुमन ने फिर से मम्मी का मोबाइल उठा लिया. 1 नहीं, इस नंबर से तो कई मैसेज आए थे.

तभी बाथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज आई तो सुमन ने घबरा कर मम्मी का मोबाइल यथास्थान रख दिया और किताब खोल कर पढ़ने का ड्रामा करने लगी. जैसे ही मम्मी रसोई में घुसीं सुमन ने तुरंत मोबाइल से वह अनजान नंबर अपनी कौपी में नोट कर लिया. अगले दिन नेहा के मोबाइल पर वह नंबर डाल कर देखा तो किसी डाक्टर राकेश का नंबर था. कौन है डाक्टर राकेश? मम्मी से इस का क्या रिश्ता है? उस ने अपने दिमाग के सारे घोड़े दौड़ा लिए, मगर कोई सूत्र हाथ नहीं लगा.

15 वर्षीय सुमन की मम्मी सुधा एक सिंगल पेरैंट हैं. उस के पापा एक जांबाज और ईमानदार पुलिस अधिकारी थे. खनन और ड्रग माफिया दोनों उन के दुश्मन बने हुए थे. अवैध खनन रोकने के विरोध में एक दिन कुछ बदमाशों ने उन की सरकारी जीप पर ट्रक चढ़ा दिया. जख्मी हालत में अस्पताल ले जाते समय उन की रास्ते में ही मौत हो गई. सुधा ने स्नातक तक की पढ़ाई की थी, इसलिए उन्हें सरकारी नियमानुसार पुलिस विभाग में अनुकंपा के आधार पर लिपिक की नौकरी मिल गई. मांबेटी की आर्थिक समस्या तो दूर हो गई, मगर सुधा के औफिस जाने के बाद सुमन जब स्कूल से घर लौटती तो मां के औफिस से वापस आने तक अकेली रहती. उस की सुरक्षा की चिंता सुधा को औफिस में भी सताती रहती. कुछ समय तक तो सुमन की दादी उस के साथ रही थीं. फिर एक दिन वे भी इस दुनिया से चल दीं. मांबेटी फिर से अकेली हो गईं. बहुत सोचविचार कर सुधा ने अपने घर की ऊपरी मंजिल पर बना कमरा डाक्टर रानू को किराए पर दे दिया. उस की ड्यूटी अकसर नाइट में होती थी. रानू सुधा को दीदी कहती थी और बड़ी बहन सा मान भी देती थी. अब सुधा सुमन की तरफ से बेफिक्र हो कर अपनी नौकरी कर रही थीं. सुमन पढ़ाई में काफी होशियार थी. उस के पापा उसे इंजीनियर बनाना चाहते थे. वह भी उन का सपना पूरा करना चाहती थी, इसलिए स्कूल के बाद शाम को अपनी सहेली नेहा के साथ प्रीइंजीनियरिंग प्रतियोगी परीक्षा की ट्यूशन ले रही थी.

अगले दिन सुबहसुबह ज्यों ही मम्मी के मोबाइल में एसएमएस अलर्ट बजा, स्कूल जाती सुमन का ध्यान अनायास पहले मोबाइल पर और फिर मम्मी के चेहरे की तरफ चला गया. मम्मी को मुसकराते देख उस के चेहरे का रंग उड़ गया. वह ठिठक कर वहीं खड़ी रह गई. ‘‘सुमन, स्कूल की बस मिस हो जाएगी,’’ मम्मी ने चेताया तो चेतनाशून्य सी सुमन मेन गेट की तरफ बढ़ गई.

शाम को सुधा के घर लौटते ही सुमन ने सब से पहले उन का मोबाइल मांगा. आज फिर

3 रोमांटिक शायरी वाले संदेश… ओहो, आज तो व्हाट्सऐप पर मिस्ड कौल भी. ‘कोई मैसेज तो नहीं है व्हाट्सऐप पर… हुंह डिलीट कर दिया होगा,’ सोच सुमन ने नफरत से मोबाइल एक ओर फेंक दिया. सुधा औफिस से लौटते समय उस के मनपसंद समोसे ले कर आई थीं. ओवन में गरम कर के चाय के साथ लाईं तो सुमन ने भूख नहीं है कह खाने से मना कर दिया. सुधा को थोड़ा अटपटा तो लगा, मगर टीनऐज मूड समझते हुए इसे अधिक गंभीरता से नहीं लिया.

कुछ दिनों से सुधा को महसूस हो रहा था कि सुमन उन से खिंचीखिंची सी रह रही है. न उन से बात करती है, न ही किसी चीज की फरमाइश. कुछ पूछो तो ठीक से जवाब भी नहीं देती. कभीकभी तो सुधा को झिड़क भी देती. क्या हो गया है इस लड़की को? शायद पढ़ाई और प्रीइंजीनियरिंग कंपीटिशन का प्रैशर है. सुधा हर तरह से अपनेआप को समझाने का प्रयास करतीं और अधिक से अधिक उस के नजदीक रहने की कोशिश करतीं, मगर जितना वे पास आतीं उतना ही सुमन को अपने से दूर पातीं.

सुधा का माथा तो तब ठनका जब पीटीएम में सुमन की क्लास टीचर ने उन से अकेले में पूछा कि क्या सुमन को कोई मानसिक परेशानी है? किसी लड़केवड़के का कोई चक्कर तो नहीं? आजकल क्लास में पढ़ाई पर बिलकुल ध्यान नहीं देती. बस खोईखोई सी रहती है. जरा सा डांटते ही आंखों में आंसू भर लाती है. साथ ही नसीहत भी दे डाली कि देखिए सुमन के लिए मां और बाप दोनों आप ही हैं. उसे बेहतर परवरिश दीजिए… उसे समय दीजिए… कहीं ऐसा न हो कि वह किसी गलत राह पर चल पड़े और हाथ से निकल जाए.

‘सुमन से बात करनी ही पड़ेगी,’ सोच अपनेआप को शर्मिंदा सा महसूस करती हुई सुधा स्कूल से सीधे औफिस चली गईं. अचानक दोपहर 3 बजे रानू का फोन आया. घबराई हुई आवाज में बोली, ‘‘दीदी आप तुरंत घर आ जाइए.’’ ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘बस आप आ जाइए,’’ कह कर उस ने फोन काट दिया. औफिस से तुरंत परमिशन ले कर सुधा टैक्सी पकड़ घर पहुंच गईं. सामने का दृश्य देख कर उन के होश उड़ गए. सुमन अर्धचेतना अवस्था में बिस्तर पर पड़ी थी. डाक्टर उस के सिरहाने बैठी थी.

‘‘क्या हुआ इसे?’’ सुधा दौड़ कर सुमन के पास पहुंचीं. ‘‘इस ने नींद की गोलियों की ओवरडोज ले ली… वह तो शुक्र है कि मैं फ्रिज से सब्जी लेने नीचे आ गई और इसे इस हालत में देख लिया वरना पता नहीं क्या होता… मैं ने इसे दवा दे कर उलटी करवा दी है. अभी बेहोश है. मगर खतरे से बाहर है,’’ रानू ने सारी बात एक ही सांस में कह डाली.

‘‘मगर इस ने ऐसा कदम क्यों उठाया?’’ दोनों के दिमाग में यही उथलपुथल चल रही थी. तभी सुमन नीम बेहोशी की हालत में बड़बड़ाई, ‘‘मां, प्लीज मुझे अकेला छोड़ कर मत जाओ… पहले पापा, फिर दादी मां और अब तुम भी चली जाओगी तो मैं कहां जाऊंगी…’’

‘‘नहीं मेरी बच्ची… मम्मी तुम्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी… तुम्हीं तो मेरी दुनिया हो,’’ सुधा जैसे अपनेआप को दिलासा दे रही थीं. इसी बीच सुमन को होश आ गया.

‘‘सुमन, यह क्या किया बिटिया तू ने? एक बार भी नहीं सोचा कि तेरे बाद तेरी मां का क्या होगा,’’ सुधा ने उस का सिर प्यार से सहलाते हुए भरे गले से कहा. ‘‘आप ने भी तो नहीं सोचा कि आप की बेटी का क्या होगा…’’ बात अधूरी छोड़ कर सुमन ने नफरत से मुंह फेर लिया.

‘‘मैं ने क्या गलत किया?’’ सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया.

रानू ने कहा, ‘‘सुमन तुम एक बहादुर मां की बहादुर बेटी हो, तुम्हें ऐसी कायरता वाली हरकत नहीं करनी चाहिए थी.’’ ‘‘बहादुर या चरित्रहीन?’’ सुमन बिफर पड़ी.

‘‘चरित्रहीन?’’ सुधा और रानू दोनों को जैसे एकसाथ किसी बिच्छू ने काट लिया हो. ‘‘हांहां चरित्रहीन… क्या आप बताएंगी कि कौन है यह डाक्टर राकेश जो आप को रोमांटिक संदेश भेजता है?’’ सुमन ने जलती निगाहों से सुधा से प्रश्न किया.

‘‘डाक्टर राकेश?’’ सुधा और रानू दोनों ने एकदूसरे की तरफ देखा. सुधा ने कोई जवाब नहीं दिया बस खामोशी से जमीन की तरफ देखने लगीं.

‘‘देखा, कोई जवाब नहीं है न इन के पास,’’ सुमन ने फिर जहर उगला. ‘‘दीदी, आप नीचे जाइए. 3 कप कौफी बना कर लाइए. तब तक हम दोनों बैस्ट फ्रैंड्स बातें करते हैं,’’ रानू ने संयत स्वर में कहा.

रानू ने सुमन का हाथ अपने हाथ में लिया और कहने लगी, ‘‘सुमन, तुम बहुत बड़ी

गलतफहमी का शिकार हो गई हो. इस में सुधा दीदी का कोई दोष नहीं है. चरित्रहीन तुम्हारी मां नहीं, बल्कि डाक्टर राकेश है और उस से तुम्हारी मम्मी का नहीं बल्कि मेरा रिश्ता है. वह मेरा मंगेतर था, मगर मैं ने उस के चरित्र के बारे में कई लोगों से उलटासीधा सुन रखा था. बस अपना शक दूर करने के लिए मैं ने सुधा दीदी का सहारा लिया. उन के मोबाइल से राकेश को कुछ मैसेज भेजे. 3-4 मैसेज के बाद ही जैसाकि हमें शक था उस के रिप्लाई आने लगे. मैं ने जानबूझ कर बात को थोड़ा और आगे बढ़ाया तो उस के चरित्र का कच्चापन सामने आ गया. सचाई सामने आते ही मैं ने अपनी सगाई तोड़ ली. ‘‘सगाई टूटने के बाद तो राकेश और भी गिर गया. उस ने मुझ से तो अपना संबंध खत्म कर लिया, मगर तुम्हारी मम्मी के मोबाइल पर आने वाले उस के संदेश अब रोमांटिक से अश्लील होने लगे. बस 1-2 दिन में हम तुम्हारी मां की इस सिम को बदल कर नई सिम लेने वाले थे ताकि इस राकेश का सारा किस्सा ही खत्म हो जाए, मगर इस से पहले ही तुम ने यह नादानी भरी हरकत कर डाली. पगली एक बार अपनी मां से न सही, मुझ से ही अपने दिल की बात शेयर कर ली होती.’’

‘‘मुझे बहलाने की कोशिश मत कीजिए. मैं जानती हूं आप मम्मी का दोष अपने सिर ले रही हैं. मगर मम्मी का उस से कोई रिश्ता नहीं है तो वे उस के संदेश पढ़ कर मुसकराती क्यों थीं?’’ सुमन को अब भी रानू की बात पर यकीन नहीं हो रहा था. ‘‘वह इसलिए पगली कि जो रोमांटिक मैसेज मैं राकेश को भेजती थी वही मैसेज फौरवर्ड कर के वह तुम्हारी मम्मी वाले मोबाइल पर भेज देता था और दीदी की हंसी छूट जाती थी.’’

तभी सुधा कौफी ले आईं. सुमन उठने की स्थिति में नहीं थी. उस ने बैड पर लेटेलेटे ही अपनी बांहें मां की तरफ फैला दीं. सुधा ने उसे कस कर गले से लगा लिया. मांबेटी के साथसाथ डाक्टर रानू की भी आंखें भर आईं. आंसुओं में सारी गलतफहमी बह गई. मन में चुभी संदेश और अविश्वास की किरचें भी अब निकल चुकी थीं.

Best Hindi Story : छंट गया कुहरा – क्या माधुरी तोड़ पाई वो मोहपाश

Best Hindi Story : विक्रांत को स्कूटर से अंतिम बार जाते हुए देखने के लिए माधुरी बालकनी में जा कर खड़ी हो गई. विक्रांत के आंखों से ओझल होते ही उसे लगा जैसे सिर से बोझ उतर गया हो. अब न किसी के आने का इंतजार रहेगा, न दिल की धड़कनें बढ़ेंगी और न ही उस के न आने से बेचैनी और मायूसी उस के मन को घरेगी. यह सोच कर वह बहुत ही सुकून महसूस कर रही थी.

जब किसी के चेहरे से मुखौटा उतर कर वास्तविक चेहरे से सामना होता है तो जितनी शिद्दत से हम उसे चाहते हैं उसी अनुपात में उस से नफरत भी हो जाती है, एक ही क्षण में दिल की भावनाएं उस के लिए बदल जाती हैं. ऐसा ही माधुरी के साथ हुआ था.

माधुरी के विवाह को 5 साल हो गए थे. विवाह के बाद दिल्ली की पढ़ीलिखी, आधुनिक विचारों वाले परिवार में पलीबढ़ी माधुरी को उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर में रहने से और अपने पति मनोहर के अंतर्मुखी स्वभाव के कारण बहुत ऊब और अकेलापन लगने लगा था.

विक्रांत मनोहर के औफिस में ही काम करना था. अविवाहित होने के कारण अकसर वह मनोहर के साथ औफिस से उस के घर आ जाता था. माधुरी को भी उस का आना अच्छा लगता था. फिर वह अकसर खाना खा कर ही जाता था. खातेखाते वह खाने की बहुत तारीफ करता, जबकि अपने पति के मुंह से ऐसे बोल सुनने को माधुरी तरस जाती थी.

उस के आते ही घर में रौनक सी हो जाती थी. माधुरी उस से किताबों, कहानियों, फिल्मों, सामाजिक गतिविधियों पर बात कर के बहुत संतुष्टि अनुभव करती थी. धीरेधीरे वह उस की ओर खिंचती चली गई. जिस दिन वह नहीं आता तो उसे कुछ कमी सी लगती, मन उदास हो जाता.

धीरेधीरे माधुरी को एहसास होने लगा कि इस तरह उस का विक्रांत की ओर आकर्षित होना मनोहर के प्रति अन्याय होगा, यह सोच कर वह मन से बेचैन रहने लगी. उसे लगने लगा कि जैसे वह कोई अपराध कर रही है, विवाहोपरांत किसी भी परपुरुष से एक सीमा तक ही अपनी चाहत रखना उचित है, उस के बाद तो वह शादीशुदा जिंदगी के लिए बरबादी का द्वार खोल देती है.

सबकुछ समझते हुए भी पता नहीं क्यों वह अपनेआप को उस से मिले बिना रोक नहीं पाती थी. जादू सा कर दिया था जैसे उस ने उस पर. अब तो यह हालत थी कि जिस दिन वह नहीं आता था तो वह अपने पति से उस के न आने का कारण पूछने लगी थी.

एक साथ काम करते हुए मनोहर को आभास होने लगा था कि विक्रांत कुछ रहस्यमय है. औफिस में 1-2 और लोगों से भी उस ने पारिवारिक संबंध बना रखे थे, जिन के घर भी अकसर वह जाया करता था.

धीरेधीरे मनोहर को भी माधुरी का विक्रांत के प्रति पागलपन अखरने लगा था. उस ने माधुरी को कई बार समझाया कि उस का विक्रांत के प्रति इतना आकर्षण ठीक नहीं है. वह अकेला है, पता नहीं क्यों विवाह नहीं करता. उसे तो अपना समय काटना है. लेकिन उस की समझ में नहीं आया और दिनप्रतिदिन उस का आकर्षण बढ़ता ही गया. उस की प्रशंसा भरी बातों में वह उलझती ही जा रही थी. एक तरफ अपराधभावना तो दूसरी ओर उसे न छोड़ने की विवशता. दोनों ने उसे मानसिक रोगी बना दिया था.

मनोहर जानता था कि माधुरी उस के लिए समर्पित है. विक्रांत ने ही अपनी बातों के जाल से उसे सम्मोहित कर रखा है और उस दिन को कोसता रहता था जब वह पहली बार उसे अपने घर लाया था. हर तरह से समझा कर वह थक गया.

धीरेधीरे माधुरी को विक्रांत से रिश्ता रखना तनाव अधिक खुशी कम देने लगा था. जिस रिश्ते का भविष्य सुरक्षित न हो, उस का यह परिणाम होना स्वाभाविक है, लेकिन वह उस से रिश्ता तोड़ने में अपने को असमर्थ पाती थी. ऊहापोह में 3 साल बीत गए. इस बीच वह एक चांद सी बेटी की मां भी बन गई थी.

अचानक एक दिन माधुरी के साथ ऐसी घटना घटी जिस ने उस के पूरे वजूद को ही हिला कर रख दिया. मनोहर के औफिस जाते ही विक्रांत औफिस में ही काम करने वाले रमनजी की बेटी नेहा, उम्र यही कोई 20 वर्ष होगी को उस के घर ले कर आया. पूर्व परिचित थी और अकसर वह माधुरी के घर आती रहती थी.

विक्रांत का भी उस परिवार से घनिष्ठ संबंध था. विक्रांत आते ही बिना किसी भूमिका के बोला, ‘‘इस का गर्भपात करवाना है. इस के साथ बलात्कार हुआ है…’’

1 मिनट को माधुरी को लगा जैसे कमरे की दीवारें उस की आंखों के सामने घूम रही हैं. जब उस ने इस बात की पुष्टि की तब जा कर माधुरी को विश्वास हुआ. इस से पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि विक्रांत जो कह रहा है वह सच है.

डाक्टर मित्र ने कहा, ‘‘10 दिन भी देर हो जाती तो गर्भपात नहीं हो सकता था… पर एक बार के बलात्कार से कोई लड़की गर्भवती नहीं होती, ये सब फिल्मों में ही होता है… इस के जरूर किसी से शारीरिक संबंध हैं.’’

यह सुन माधुरी का माथा ठनका कि अरे, जिस तरह विक्रांत को उस के चेहरे के हावभाव से नेहा के लिए परेशान देख रही हूं. वह सामान्य नहीं है. मैं तो सोच रही थी कि कितना भला है जो एक लड़की की मदद कर रहा है, पर अब डाक्टर के कहने पर मुझे कुछ शक हो रहा है कि यह क्यों नेहा को ले कर इतना परेशान है… तो क्या… उस ने मुझे अपनी परेशानी से मुक्ति पाने के लिए मुहरा बनाया है… उसे पता है कि मेरी एक डाक्टर फ्रैंड भी है… और यह भी जानता है कि मैं उस की मदद के लिए हमेशा तत्पर हूं. वह मन ही मन बुदबुदाई और फिर गौर से नेहा और विक्रांत का चेहरा पढ़ने लगी.

गर्भपात होते ही विक्रांत का तना चेहरा कितना रिलैक्स लग रहा था. उस के बाद वह माधुरी को साधिकार यह कह कर गायब हो गया था कि वह उसे उस के घर पहुंचा दे और किसी को कुछ न बताए. माधुरी का शक यकीन में बदल गया था.माधुरी ने अपनी डाक्टर फ्रैंड की मदद से नेहा से हकीकत उगलवाने की ठान ली.

डाक्टर ने कड़े शब्दों में पूछा, ‘‘सच बता कि यह किस का बच्चा था?’’

उस ने पहले तो कुछ नहीं बताया. बस यह कहती रही कि कालेज के रास्ते में किसी ने उस के साथ बलात्कार किया था. लेकिन जब माधुरी ने उस से कहा कि सच बोलेगी तो वह उस की मदद करेगी नहीं तो उस की मां को सब बता देगी, तब वह धीरेधीरे कुछ रुकरुक कर बोली, ‘‘यह बच्चा विक्रांत अंकल का था. मैं उन की बातों से प्रभावित हो कर उन्हें चाहने लगी थी. उन्होंने मुझ से विवाह का वादा कर के मुझे समर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया,’’ और वह रोने लगी.

‘‘उफ, अंकल के रिश्ते को ही विक्रांत ने दागदार कर दिया. कितना विश्वासघात किया उस ने उस परिवार के साथ, जिस ने उस पर विश्वास कर के अपने घर में प्रवेश करने की अनुमति दी. जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया,’’ माधुरी यह अप्रत्याशित बात सुन कर बिलकुल सकते की हालत में थी. उस के दिमाग में विचारों का तूफान उठ रहा था. उस का मन विक्रांत के प्रति घृणा से भर उठा.

माधुरी का उतरा चेहरा देख कर उस की डाक्टर फ्रैंड थोड़ा मुसकराई और फिर बोली, ‘‘तू तो ऐसे परेशान है जैसे तेरे साथ ही कुछ गलत हुआ है?’’

‘‘तू सही सोच रही है…मेरा भी मानसिक बलात्कार उस ने किया है. अब मेरी आंखें खुल चुकी हैं. इतना गिरा हुआ इंसान कोई हो सकता है, मैं सोच भी नहीं सकती. मैं ने अपने जीवन के 3 साल उस के जाल में फंस कर बरबाद कर दिए.’’ माधुरी ने उसे भारी मन से बताया.

प्रतिक्रियास्वरूप उसे मुसकराते देख कर उसे अचंभा हुआ और फिर प्रश्नवाचक नजरों से उस की ओर देखने लगी तो वह बोली, ‘‘मैं सारी कहानी कल ही तुम तीनों के हावभाव देख कर समझ गई थी. आखिर इस लाइन में अनुभव भी कोई चीज है. तुझे पता है मेरे पति नील मनोवैज्ञानिक हैं. उन से मुझे बहुत जानकारी मिली है. ऐसे लोग बिल्ली की तरह रास्ता देख लेते हैं और वहीं शिकार के लिए मंडराते रहते हैं, शारीरिक शोषण के लिए कुंआरी लड़कियों को विवाह का झांसा दे कर अपना स्वार्थ पूरा करते हैं…विवाहित से ऐसी आशा करना खतरनाक होता है, इसलिए उन्हें मानसिक रूप से सम्मोहित कर के अपने टाइम पास का अड्डा बना लेते हैं…

‘‘उन्हें पता होता है कि स्त्रियां अपनी प्रशंसा की भूखी होती हैं, इसलिए इस अस्त्र का सहारा लेते हैं. ऐसे रिश्ते दलदल के समान होते हैं. जिस से अगर कोई समय रहते नहीं ऊबरे तो धंसता ही चला जाता है. शुक्र है जल्दी सचाई सामने आ गई, वरना….’’ माधुरी अवाक उस की बातें सुनती रही और उस की बात पूरी होने से पहले ही उस के गले से लिपट कर रोने लगी.

माधुरी ने थोड़ा संयत हो कर अपनी आवाज को नम्र कर के नेहा से पूछा, ‘‘जब इतना कुछ हो गया है तो तुम्हारा विवाह उस से करवा देते हैं. तुम्हारी मां से बात करती हूं.’’

‘‘नहीं…मैं उन से नफरत करती हूं, उन्होंने नाटक कर के मुझे फंसाया है. उन के और लड़कियों से भी संबंध हैं…उन्होंने मुझे खुद बताया है, प्लीज आप किसी को मत बताइएगा. उन्होंने कहा है कि यदि मैं किसी को बताऊंगी तो वे मेरे फोटो दिखा कर मुझे बदनाम कर देंगे,’’ और उस ने रोते हुए हाथ जोड़ दिए.

‘‘ठीक है, जैसा तुम कहोगी वैसा ही होगा,’’ माधुरी ने उसे सांत्वना दी.

अस्पताल से माधुरी नेहा को अपने घर ले आई, उस के आराम का पूरा ध्यान रखा. फिर उसे समझाते हुए बोली, ‘‘तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है, मैं हूं न. तुम्हें अपनी मां को सबकुछ बता देना चाहिए ताकि उस का तुम्हारे घर आना बंद हो जाए. नहीं तो वह हमेशा तुम्हें ब्लैममेल करता रहेगा. वह तुम्हारे फोटो दिखाएगा तो उस का भी तो नाम आएगा. फिर उस की नौकरी चली जाएगी, इसलिए वह कदापि ऐसा कदम नहीं उठा सकता. सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए तुम्हें धमका रहा है. तुम अपनी मां से बात नहीं कर सकती तो मैं करती हूं.’’ माधुरी से अधिक उस की पीड़ा को और कौन समझ सकता था.

माधुरी की बात सुन कर नेहा को बहुत हिम्मत मिली. वह उस से लिपट कर देर तक रोती रही.

माधुरी ने नेहा की मां को फोन कर के अपने घर बुलाया और फिर सारी बात बता दी. पूरी बात सुन कर उस की मां की क्या हालत हुई यह तो भुक्तभोगी ही समझ सकता है. माधुरी के समझाने पर उन्होंने नेहा को कुछ नहीं कहा पर उन को क्या पता कि जब वह खुद ही उस की बातों के जाल में फंस गई तो नेहा की क्या बात…

वे रोते हुए बोलीं, ‘‘आप प्लीज किसी को मत बताइएगा, नहीं तो इस से शादी कौन करेगा? आप का एहसान मैं जिंदगीभर नहीं भूलूंगी.

अब मेरे घर के दरवाजे उस के लिए हमेशा के लिए बंद.’’

माधुरी ने उन्हें आश्वस्त कर के बिदा किया. उन के जाने के बाद वह पलंग पर लेट कर फूटफूट कर बच्चों की तरह रोने लगी. पूरे दिन का गुबार आंसुओं में बह गया. अब वह बहुत हलका महसूस करने लगी. उसे लगा कि उस के जीवन पर छाया कुहरा छंट गया है, सूर्य की किरणें उस के लिए नया सबेरा ले कर आई हैं.

अब माधुरी शाम को अपने पति मनोहर के आने का बेसब्री से इंतजार करने लगी.

पति के आते ही उस ने सारी बात बताते हुए कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो, मैं भटक गई थी.’’

‘‘तुम्हारी इस में कोई गलती नहीं. मैं जानता था देरसबेर तुम्हारी आंखें जरूर खुलेंगी. देखो विवाह को एक समझौता समझ कर चलने में ही भलाई है. हर चीज चाही हुई किसी को नहीं मिलती. मुझे भी तो तुम्हारी यह मोटी नाक नहीं अच्छी लगती तो क्या मैं सुंदर नाक वाली ढूंढ़ूं…’’

अभी उस की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि वह खिलखिला कर हंस पड़ी. फिर पति के गले से लिपट कर खुद को बहुत सुरक्षित महसूस कर रही थी.

अगले दिन विक्रांत मनोहर के साथ आया. माधुरी उस के सामने नहीं आई तो वह सारी स्थिति समझ थोड़ी देर बाद लौट गया.

Romantic Story : कैनवास – सुलिवान मैडम का कैसा व्यक्तित्व था

Romantic Story : ‘‘अलका, आज नो स्कूल डे की मौज ले,’’ शमीका मोबाइल पर खुशी जाहिर कर रही थी.

‘‘मतलब क्या है तेरा?’’ मैं असमंजस में थी.

‘‘अरे सुन, आज सुबहसुबह राजन सर की हार्टअटैक से मौत हो गई. सो, आज छुट्टी है स्कूल की,’’ शमीका ने खुशी जाहिर की.

‘‘यह ठीक है कि राजन सर को हम पसंद नहीं करते, मगर इस पर खुश होना ठीक नहीं शमीका. यह गलत है. एक तो वे नौजवान थे और उन की फैमिली भी थी. प्लीज, ऐसा मत बोल,’’ मैं ने शमीका को समझने की कोशिश की.

‘‘हेलो यार, छोटीछोटी गलतियों पर सारे लड़कों के सामने हम लड़कियों को ‘डम्ब’ और ‘डंकी’ कहते थे, तब,’’ शमीका बड़बड़ाती रही अपनी रौ में. मैं ने फोन काट दिया.

ठीक है हमारे इंग्लिश टीचर राजन सर थोड़ा ज्यादा ही रूड थे और खासकर लड़कियों को अकसर नीचा दिखाते थे, मगर इस का मतलब यह तो नहीं कि उन की एकाएक डैथ हो जाए और हम खुश हों. उन के बारे में सुन कर दिल भारी हो गया. अभी कुछ दिनों पहले ही तो उन्होंने अपनी लाड़ली बेटी रिम्पी का पहला बर्थडे मनाया था और उस की फोटो अपने फेसबुक प्रोफाइल में डाली थी. उस बच्ची के लिए मैं उदास थी.

मेरा इंग्लिश मीडियम स्कूल एक को-एड स्कूल था और मेरे क्लास के सारे साथी 11-13 उम्र वर्ग से थे जब सारे लड़केलड़कियों के तनमन में अजीब सी सनसनाहट शुरू हो जाती है और एकदूसरे के लिए अजीब अजीब खयाल उठना शुरू हो जाता है.

जब लड़कों में ईगो बढ़ने लगता है और उन की सोच में ऐंठन आने लगती है. वहीं लड़कियां आईने के सामने ज्यादा समय अपने को सजानेसंवारने में लगाती हैं. यहां तक कि  स्कूल यूनिफौर्म में भी अपने को घुमाफिरा कर चोरीचोरी ये समझने की कोशिश करती हैं कि क्लास के लड़के उन के लुक्स और उभरते शरीर को देख कर नर्वस होते हैं या नहीं. लड़के और लड़कियों के बीच एकदूसरे से बेहतर साबित करने का मौन कंपीटिशन चलता रहता है. प्रौब्लम यह भी है कि जबतब किसी का भी किसी पर क्रश हो जाता है.

खैर, 2 दिनों तक स्कूल बंद रहने के बाद फिर सोमवार को स्कूल खुला. हिंदी और मैथ के पीरियड्स के बाद थर्ड पीरियड इंग्लिश का था और हम निश्चिंत थे कि यह पीरियड औफ ही रहेगा तो हम शोरगुल मचाने लगे थे. जब हमारा उत्पात और शोर चरम पर था तो एकाएक शांति छा गई.

एक बहुत ही सुंदर और सौम्य लेडी, जो उन दिनों अपनी उम्र के तीसरे दशक के आसपास थी, अपनी हाई हील की खटखट की आवाज करती हुई क्लास में पधारीं. उन के बदन के ज्वारभाटा, लहराते हुए लंबे व खुले बाल और काजल खींची हिरणी सी आखें उन के चारों तरफ एक आभा फैला रही थीं. बड़े सलीके से पहनी हुई उन की सुनहरी बूटीदार मैरून साड़ी, पूरे शबाब के साथ उभरे सीने पर रखा हुआ, मोतियों का नैकलैस, डीप रैड लिपस्टिक और डस्की त्वचा एक अजीब सी मादकता पैदा कर रही थी.

हां, यही वे मिसेज अम्बर सुलिवान थीं जो हमारे दिवंगत राजन सर की जगह हमें इंग्लिश पढ़ाने के लिए नियुक्त की गई थीं.

मिसेज सुलिवान के रूप और पर्सनैलिटी का जादू मेरे ऊपर तुरंत चढ़ गया. मैं उन्हें देखती ही रही और मन ही मन अपनी जवानी के दिनों में वैसी ही बनने की ठान ली. मैं ने चोर निगाहों से क्लास के सब से मवाली लड़कों- रोहन, अदीब और पीयूष की तरफ देखा. वे सब भी बिलकुल डंब हो गए थे. उन की हालत देख कर मैं मन ही मन इतनी खुश हुई कि पूछो मत.

मैडम की पर्सनैलिटी से वे क्लीनबोल्ड हो कर भीगी बिल्ली बन गए थे. एक और जोर का बिजली का झटका तब लगा जब उन्होंने अपनी गजब की सुरीली आवाज में हम लोगों को विश किया. वैसे ही अपने मादक रूपरंग से वे किसी को भी मार सकती थीं, ऊपर से ऐसी जलतरंग सी आवाज. क्लास के हम सारे 40 लड़के व लड़कियां तत्काल ही मिसेज सुलिवान के प्यार में डूब गए.

इस के बाद उन्होंने अपने बारे में थोड़ी सी जानकारी दी और फिर ‘द फाउंटेन’ कविता को इतने रसीले अंदाज में पढ़ाया कि सारे शब्द भाव बन कर हमारे दिल में उतर गए. नोट लेने की जरूरत ही नहीं पड़ी. पूरे समय तक क्लास में पिनड्रौप साइलैंस बना रहा और हम पीरियड खत्म होने की घंटी बजने के साथ ही होश में आए.

जब मिसेज सुलिवान क्लास छोड़ कर जाने लगीं तो 80 आंखें उन की अदाओं पर चिपकी हुई थीं. वाह, कुदरत ने भी क्या करिश्मा किया है. रूप और गुणों से मैडम को बेइंतहा लैस किया है.

फोर्थ पीरियड अब फिजिकल ट्रेनिंग का था. जैसे ही पीटी टीचर की विस्सल बजी, हम सब तरतीब से लाइन में खड़े हो गए. हमारे पीटी टीचर मिस्टर असलम एकदम रफटफ लंबेतगड़े और बिलकुल गुलाबी रंगत के थे. उन्हें भी हम खूब पसंद करते थे मगर उस की एक दूसरी वजह थी. उन्हें इंग्लिश में बोलना निहायत पसंद था और उन की बेधड़क इंग्लिश भी ऐसी थी कि बड़ेबड़े अंग्रेजीदां लोगों को भी अपनी भाषा बोली रिसेट करने की जरूरत पड़ जाए.

एक दिन उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘यू नो, आई हैव टू डौटर्स एंड बोथ आर गर्ल्स. आई डोंट हैव अ सन.’’ (तुम्हें पता है मेरी दो जुड़वां बेटियां हैं और दोनों लड़कियां हैं. मेरा कोई लड़का नहीं है). उन की बात खत्म होते ही हंसी का फौआरा छूट गया. हमारी हंसी रुके ही न.

असलम सर बेचारे अपना मासूम सा चेहरा लिए यह समझने की कोशिश में थे कि उन्होंने ऐसी कौन सी बात कह दी कि बच्चों को इतना आनंद आ गया. मगर कुछ भी हो, न उन की स्पोकन इंग्लिश छूटी और न ही उन के आत्मविश्वास में कमी आई. हम लोगों ने भी कभी उन को चिढ़ाया नहीं, उन से लगाव जो था.

इसी तरह एक बार टीचर्स डे के अवसर पर प्रार्थना सभा में ही उन्होंने अपनी भारी आवाज में ऐलान किया-‘‘ब्रिंग योर पेरैंट्स टुमारो, एस्पेशली योर फादर्स एंड मदर्स.’’ (कल अपने पेरैंट्स को साथ लाना, खासतौर पर अपने माता और पिता को). अब पूरी असेंबली में हीही हुहु मच गई और प्रिंसिपल मैडम का चेहरा लाल हो गया. स्थिति संभालने के लिए सुलिवान मैडम आगे आईं और अपनी चुस्त इंग्लिश व मोहक मुसकान से सब को चुप कराया. असलम सर तब भी चौड़े हो कर हंस रहे थे.

मजे की बात यह हुई कि अब तक लगभग पूरे शहर को पता चल गया था कि असलम सर बुरी तरह सुलिवान मैडम पर फिदा हैं और सुलिवान मैडम के दिल में भी असलम सर के लिए कुछकुछ होता है. किसी भी बहाने से एकदूसरे के करीब बैठते हैं और तुर्रा तो यह कि असलम सर उन से इंग्लिश में ही बात करते हैं. हालांकि दोनों ही शादीशुदा थे और दोनों के बच्चे भी थे मगर दिल ने कब दुनियावी रोकटोक को माना है.

हुआ यह कि मैडम सुलिवान के 29वें बर्थडे के दिन असलम सर ने स्कूल के कौरिडोर के दूसरे छोर से ही ऊंची आवाज में मैडम को विश किया- ‘‘हैप्पी बर्थडे मैडम, मे गौड ब्लास्ट यू.’’ (हैप्पी बर्थ डे मैडम, ईश्वर आप को फाड़ें). जब सारे टीचर्स और स्टूडैंट्स इस पर खुल कर हंसने लगे, मैडम ने ?ोंपती हुई मुसकरा कर अपनी भारी पलकें ?ाका लीं. जाहिर है, असलम सर ने कभी ‘ब्लेस्स’ और ‘ब्लास्ट’ के अंतर पर ध्यान नही दिया.

हर एक बीते दिन के साथ ही हम सब बच्चे जवान हो रहे थे. मेरी कुछ सहेलियों ने तो ‘नारित्व’ का पहला पड़ाव भी छू लिया था और उन का चहकनामचलना भी एकाएक शांत हो गया था. अब उन की आंखें क्लास के लड़कों में कुछ और चीज की तलाश करने लगी थीं.

प्रकृति का अपना एक षड्यंत्र है. क्यूपिड का अदृश्य तीर तनमन में सुनामी लाता ही है. कितनी ही बार हम लोगों ने गौर किया है कि असलम सर की चोर निगाहें सुलिवान मैडम के स्तनों और साटन की साड़ी में लिपटी नितंबों पर अटकी हुई हैं. सही में असलम सर की इस बेबसी पर हमें दया आती थी.

उसी साल क्रिसमस डे के ठीक पहले सुलिवान मैडम ने सूचित किया कि वे अपने गृहनगर त्रिवेंद्रम लौट रही हैं क्योंकि उन्हें वहां के संत जोसफ कालेज में लैक्चरर की नौकरी मिल गई है. उन की इस छोटी सी सूचना ने हम लोगों को अंदर तक हिला दिया और असलम सर के तो दिल के हजार टुकड़े लखनऊ की सड़कों पर बिखर गए. सुलिवान मैडम ने अपने सौम्य व्यवहार और आकर्षक व्यक्तित्व से पूरे स्कूल के वातावरण में एक अजीब सी रौनक ला दी थी.

प्रिंसिपल से ले कर चपरासी तक उन के मुरीद हो चुके थे. इन कई महीनों की सर्विस में न तो उन्होंने कोई छुट्टी ली थी और न ही किसी से नाराज हुई थीं. खैर, जो होता है वह तो हो कर रहता है. वह दिन भी आ ही गया जब उन का फेयरवैल होना था.

असलम सर ने बड़ी मेहनत से अपने दिल में बसे समस्त आवेग और रचनात्मकता उड़ेल कर सुलिवान मैडम के लिए तैयार किया गया एक बड़ा सा ग्रीटिंग कार्ड और लालपीले गुलाबों से सजा एक गुलदस्ता ला कर उन्हें गिफ्ट किया. स्वाभाविक था कि सब में यह जिज्ञासा थी कि उस में उन्होंने कैसे अपने दिल की जबां को व्यक्त किया है.

हम सब ने उस कार्ड के अंदर ताकझांक की और पाया कि सुनहरे ग्लिटर से लिखा था, ‘‘मैरी क्रिसमस, डियर सुलिवान मैडम.’’ (क्रिसमस से विवाह करें, प्रिय सुलिवान मैडम). हम सब ने चुपचाप अपनी हंसी दबा ली.

असलम सर ने कभी ‘मेरी’ और ‘मैरी’ के बीच का अंतर न समझ था. सुलिवान मैडम ने बड़ी नजाकत के साथ कार्ड को स्वीकार किया, टैक्स्ट को पढ़ा और संयत ढंग से मुसकरा कर असलम सर को थैंक्स कहा.

फेयरवैल के बाद सुलिवान मैडम ने असलम सर को एक खाली क्लासरूम में एकांत में बुलाया और कार्ड के लेखन में हुई गलती को बड़े प्रेम से समझाया और हौले से उन के गाल पर एक चुंबन दे दिया. मैडम की तरफ से असलम सर के लिए यह एक छोटा सा गुडबाई रिटर्न गिफ्ट था. असलम सर की बड़ीबड़ी आंखों से सावन की धार बह निकली. क्यूपिड का खेल इसी तरह ओवर हो गया. हम में से कुछ शरारती बच्चे, जो खिड़की की ओट से इस छोटी सी घटना के रोमांटिक एंड का नजारा देख रहे थे, अपने आंसुओं को रोक नहीं पाए और दबे कदमों से वहां से भाग लिए.

आज जब मैं खुद अपना 29वां जन्मदिन मनाने की तैयारी कर रही हूं, एक सफल जर्नलिस्ट के रूप में शोहरत कमा चुकी हूं. मेरे मन के कैनवास पर असलम सर की स्पोकन इंग्लिश के साथसाथ सुलिवान मैडम के उज्ज्वल व्यक्तित्व की अमिट छाप, उन की हर अदा और पढ़ाने का अंदाज, उन का रोमांस और हर पल में उन की उपस्थिति मुझे प्रेरित कर रही है.

आज मैं जो कुछ भी हूं और आगे जीवन में जो कुछ भी हासिल करूंगी, उस में मेरी चहेती सुलिवान मैडम का योगदान और आशीर्वाद दोनों रहेंगे.

Hindi Story : विरोधाभास – सबीर अहमद के चरित्र की क्या थी असलियत

Hindi Story : मुजफ्फरपुर आए 2-3 दिन हो चुके थे. अभी मैं दफ्तर के लोगों को जानने, समझने, स्थानीय राजनीति की समीक्षा करने में ही लगा हुआ था. मेरा विभाग गुटबंदी का शिकार था. यूनियन 3 खेमों में बंटी थी और हर खेमा अपनी प्रमुखता और दूसरे की लघुता प्रमाणित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ता था. 3 गेंदों को एकसाथ हवा में उछालने वाला जादूगर बिस्मार्क मुझे रहरह कर याद आता था.

अचानक, ‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं,’ का स्वर मेरे कानों में पड़ा. मैं काफी देर से फाइलों में उलझा हुआ था. इस स्वर में निहित विनम्रता तथा संगीतमय खनक ने मेरा ध्यान बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लिया. मैं ने गरदन ऊपर उठाई और चेहरे पर थोड़ी सी मुसकान ला कर कहा, ‘‘हांहां, आइए.’’

‘‘नमस्कार, सर. आप कैसे हैं?’’ आगंतुक सबीर अहमद ने बुलबुल की तरह चहकते हुए कहा.

मैं ने हाथ के संकेत से उसे बैठने का इशारा कर दिया था. वह शायद संकेतों की भाषा में माहिर था. मुसकराते हुए मेरे सामने रखी कुरसियों में से एक पर बैठ गया.

‘‘मैं ठीक हूं. आप कैसे हैं, मि. अहमद?’’ मैं ने पूछा.

‘‘सर, पहली बात तो यह कि आप मुझे ‘मि. अहमद’ न कहें. यह बेहद औपचारिक लगता है. मेरी इल्तिजा है, मेरा अनुरोध है कि आप मुझे सबीर ही कहें. आप से हर मामले में छोटा हूं, उम्र में, नौकरी में, पद में, प्रतिष्ठा में…’’

‘‘बसबस, आगे कुछ मत कहिए, सबीर साहब. तारीफ जब सीमा लांघने लगती है तो उस में चापलूसी की बू आ जाती है, जो कहने और सुनने वाले, यानी दोनों के लिए नुकसानदेह होती है,’’ मैं ने प्यार से मुसकराते हुए कहा तो सबीर ने बड़ी अदा से सिर झुका कर आंखें बंद कर हथेलियों को माथे से सटाया.

मैं ने कहा, ‘‘और दूसरी बात क्या है?’’

‘‘सर, दूसरी बात यह है कि आप बड़े चिंतित लग रहे हैं, पर ऊपर से सामान्य दिख रहे हैं. कृपया इसे चापलूसी न समझें. अगर आप मुझे अपने छोटे भाई की जगह दें तो मुझे बहुत खुशी होगी.’’

पता नहीं क्यों, सबीर के स्वर में मुझे सचाई की झलक महसूस हुई और मैं ने घंटी बजा कर चपरासी को बुला कर कहा, ‘‘2 कौफी…’’

चपरासी के जाने के बाद मैं ने गहरी सांस ली. अंदर की सारी परेशानी मानो थोड़ी देर के लिए बाहर निकल गई.

‘‘मैं गुडि़या और डौली के दाखिले को ले कर बहुत परेशान हूं. महिला कालेज में कई बार जा चुका हूं, पर रिसैप्शनिस्ट हर बार एक ही जवाब देती है कि सीट नहीं है. बेचारी लड़कियां नाउम्मीद सी हो गई हैं,’’ मैं ने कहा.

‘‘सर, आप बेफिक्र रहें, समझ लें कि यह काम हो गया. मैं वाइस चांसलर को जानता हूं. उन से कह कर यह काम करा लूंगा. बस, इस नाचीज को 24 घंटे की मुहलत दे दें और दोनों बेटियों के कागजात भी मुझे दे दें,’’ उस ने इतमीनान से कहा.

‘‘शुक्रिया, दोस्त. अगर यह काम हो गया तो मैं चैन की सांस ले सकूंगा,’’ मैं ने कहा.

तभी कौफी आ गई और सबीर मुझे कौफी पर कई शेर सुनाता चला गया. उस की आवाज तो दिलकश थी ही, शेरों का चयन भी उम्दा था. मैं ने उस की खूब तारीफ की. थोड़ी देर बाद मुसकराता हुआ वह कागजात ले कर चला गया.

अगले दिन वह दोपहर के भोजन के समय मेरे घर पर आ गया. मुझे देखते ही बोला, ‘‘सर, दाखिला हो गया. यह रही रसीद और ये रहे बाकी पैसे.’’

डौली और गुडि़या, जो बेमन से खाना सजा रही थीं, यह बात सुनते ही उछल पड़ीं.

‘‘यह तुम्हारे सबीर चाचा हैं. इन्होंने ही इस काम को करवाया,’’ मैं ने बेटियों से कहा तो दोनों ने उन्हें धन्यवाद दिया. पत्नी ने अपनी खुशी का इजहार, ‘सबीर भाईसाहब, खाना खा कर ही जाइएगा,’ कह कर किया.

सबीर ने पहले तो इनकार किया, पर मां, बेटियां उस पर इतनी मेहरबान थीं कि बिना खिलाए जाने ही नहीं दिया.

2 दिनों बाद रविवार था. मैं बरामदे में बैठा अखबार पढ़ रहा था. अचानक सबीर को जीप से उतरते देखा. ‘यह तो मोटरसाइकिल सवार है, जीप से कैसे?’ मैं अभी सोच ही रहा था कि ड्राइवर ने पीछे से 2 गैस सिलिंडर उतारे और सबीर के निर्देश पर भीतर ले आया.

उसी समय मेरी पत्नी भी बाहर आ गई. गैस सिलिंडर देख कर वह बहुत प्रसन्न हुई. शायद मैं ने उसे बहुत कम मौकों पर इतना पुलकित देखा था. वह खिलखिलाती हुई बोली, ‘‘वाह, भाईसाहब, वाह, स्टोव से पीछा छुड़ाने का लाखलाख शुक्रिया.’’

सबीर नए दूल्हे की तरह शरमाता हुआ बोला, ‘‘इस में शुक्रिया काहे का, मालूम होता तो यह काम पहले ही हो जाता.’’

‘‘पर तुम्हें गैस के लिए किस ने और कब कहा?’’ मैं ने परेशान होते हुए पूछा.

‘‘मैं ने कहा था जब उस दिन आप स्नानघर में घुसे हुए थे. इन्होंने पूछा, ‘और कोई सेवा?’ और मैं ने अपना दुखड़ा सुना दिया,’’ जवाब पत्नी ने दिया

‘‘पर यह सब करनेकराने की क्या जरूरत थी, 2-4 माह स्टोव पर ही…’’ मैं ने पत्नी पर नाराजगी उतारते हुए कहा, ‘‘तुम यूनियन वालों को नहीं जानतीं, वे लोग हंगामा खड़ा कर देंगे कि क्षेत्रीय प्रबंधक स्टाफ को अपना घरेलू नौकर समझते हैं. बनीबनाई इज्जत धूल में मिल जाएगी.’’

‘‘सर, मैं ने आप से प्रार्थना की थी कि मुझे अपना छोटा भाई समझें. क्या भाभीजी का छोटामोटा काम आप के भाई नहीं करते? क्या घर वाले एकदूसरे पर एहसान करते हैं?’’ उस ने दुखी स्वर में कहा.

‘‘माफ करना, भई, मेरा इरादा तुम्हें दुख पहुंचाना नहीं था, पर…’’ कहतेकहते मैं रुक गया. मुझे शब्द ही नहीं मिल रहे थे.

‘‘परवर कुछ नहीं, सर, डीएम का पीए मेरा भाई है, उसी से कह कर महीनों का काम कुछ दिनों में करवा लिया, वरना गैस एजेंसी वाले तो ऐसा चक्कर डालते हैं कि कभीकभी 2 साल भी लग जाते हैं. मैं आखिर किस मर्ज की दवा हूं…’’

मेरा परिवार सबीर पर फिदा था. पत्नी तो उसे घर का सदस्य ही समझती थी. चंद दिनों में उस ने राशनकार्ड भी बनवा दिया. घर की हर जरूरत, हर समस्या वह ‘भाभीजी’ यानी मेरी श्रीमती की इच्छानुसार पूरी करवाता.

सबीर की निकटता ने मुझे यूनियन के झगड़ों से भी मुक्त कर दिया था. वह सभी गुटों का काम करता, करवाता. सब के बच्चों के दाखिले और शादीब्याह वगैरा में मदद करता. वह सब की आंखों का तारा, हरदिल अजीज सबीर भाई था.

वह औफिस के काम में भी बहुत चुस्त था. जो सूचना चाहिए, सबीर अहमद मिनटों में दे देता. औफिस के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तो वह जान ही था. अकसर मैं सोचता, ‘प्रकृति ने इस आदमी में एकसाथ इतने गुणों को भर दिया है कि सामने वाला न चाहते हुए भी खुद को इस पर निर्भर मानता है.’

वह मोतिहारी में क्षेत्राधिकारी था. मुजफ्फरपुर से मोतिहारी की दूरी 80-85 किलोमीटर है, पर उस के लिए यह सामान्य सी बात थी.

मैं अभी मोतिहारी गया भी नहीं था, सारे क्षेत्राधिकारी महीने में 1-2 बार मुख्यालय आते और आवश्यक जानकारी दे जाते.

एक दिन सबीर ने प्रार्थनापत्र देते हुए कहा, ‘‘सर, मैं ने मोतिहारी में किराए का मकान ले लिया है, गांव से पत्नी और बच्चों को ले आया हूं. सरकारी नियमों के अनुसार, मकान में दफ्तर रखने पर किराया मिल जाता है, आप निरीक्षण कर लेते और ओसीआर यानी औफिस कम रैजीडैंस प्रमाणपत्र दे देते तो मुझे प्रतिमाह 15 सौ रुपए मिल जाते.’’

‘‘ठीक है, पता मेरे ड्राइवर को बता दो. मैं अगले सप्ताह मोतिहारी कार्यालय का निरीक्षण करने आऊंगा तो यह कार्य भी कर दूंगा.’’

‘‘शुक्रिया, सर,’’ कहता हुआ वह उठ खड़ा हुआ. थोड़ी देर बाद उस की मोटरसाइकिल के स्टार्ट होने की आवाज आई, जो धीरेधीरे दूर होती चली गई.

मैं ने पान की पीक थूकने के लिए खिड़की का परदा उठाया. आसमान पर हलकेहलके बादल तैर रहे थे, धूप की चमक फीकी हो रही थी, जो कि वर्षा आने का संकेत था. मौसम तेजी से बदल रहा था, जो कि स्वास्थ्य के लिए बुरा था.

मोतिहारी में सबीर का मकान ढूंढ़ना नहीं पड़ा. चांदमारी महल्ले के मोड़ पर ही सबीर मुझे पान की एक दुकान पर मिल गया. फिर अपने मकान पर ले गया. बाहर नेमप्लेट पर लिखा था, ‘सबीर अहमद, फील्ड औफिसर, इफको.’

वह मुझे बैठक में ले गया. कमरे को दफ्तर कहना ज्यादा श्रेष्ठ था. एक बड़ी सी मेज व 6 कुरसियां लगी थीं. मेज पर मेरे विभाग का कैलेंडर रखा था, डायरी थी, फाइलें थीं और कागज आदि थे. दीवार पर विभागीय मोनोग्राम लटका हुआ था. एक कोने में सोफासैट था, हम उस पर बैठ गए.

थोड़ी देर बाद 8-9 वर्ष की प्यारी सी गुडि़या कौफी ले कर आई. उस ने सलीके से ‘नमस्ते, अंकल,’ कहा और ट्रे मेज पर रख कर बाहर चली गई. सबीर ने हंस कर कहा, ‘‘बड़ी शरमीली बिटिया है.’’

मैं ने कहा, ‘‘नहीं, बड़ी प्यारी बिटिया है.’’

इस पर हम दोनों हंस पड़े.

सबीर फाइलें लाता रहा, मुझे दिखाता रहा और अपने बारे में भी बताता रहा. उस ने कहा कि एक कमरे में उस की गर्भवती बहन रह रही है, जो प्रसव के लिए आई है, दूसरे में उस का परिवार है. बैठक को औफिस बना लिया है. एक स्टोर, रसोई और भोजनकक्ष है.

कुछ देर बाद वह भीतर गया और जल्दी ही लौट कर बोला, ‘‘सर, खाना तैयार है, अम्मी बुला रही हैं.’’

निरीक्षण के दौरान उस के घर खाना खाना मेरे अुनसार गलत कार्य था. मैं ने मना कर दिया, मगर उस के पैने तर्कों के आगे मेरे सिद्धांत फीके लग रहे थे. वह मां की ममता का वास्ता दे रहा था, ‘‘अम्मी बहुत दुखी हो जाएंगी. वे कह रही हैं कि हम मुसलमान हैं, इसलिए हमारे घर का खाना…’’

अंत में मुझे भोजन के लिए उठना ही पड़ा. पता नहीं मन की किस भावना ने मुझे खाने से ज्यादा उस की भावना के प्रति नतमस्तक कर दिया. रसोई सामने थी. एक बूढ़ी, विधवा औरत वहां मौजूद थी. मैं ने ‘प्रणाम, माताजी,’ कहा तो उन्होंने ‘जीते रहो, भैया,’ कह कर ममता का सागर उड़ेल दिया. खाना शाकाहारी व बेहद स्वादिष्ठ था. 2 स्त्रियां दूसरे कमरे में दिखीं, मगर मैं ने सोचा ‘परदे की वजह से शायद वे सामने नहीं आईं.’

चलते समय वह बच्ची फिर आई और ‘नमस्ते, अंकलजी, फिर कभी आएइगा,’ कह कर अपने नन्हे हाथों से बायबाय कर गई.

मैं संतुष्ट था, उस का मकान वास्तव में 15 सौ रुपए के लायक था, उस में दफ्तर मौजूद था ही, परिवार भी रहता था. मैं ने तुरंत ही ओसीआर रिपोर्ट पटना भेज दी. कुछ दिनों बाद उस की स्वीकृति भी आ गई और सबीर को हर माह 15 सौ रुपए मिलने लगे.

लगभग 4-5 महीने बाद मेरे बड़े भाई की लड़की की शादी मोतिहारी में होनी तय हुई. लड़का तो दिल्ली में नौकरी करता था. पर उस के मातापिता मोतिहारी में ही रहते थे. भैया को केवल उन का नाम और चांदमारी महल्ला ही पता था. अचानक बादलों में जैसे बिजली कौंध गई, सबीर का खयाल आते ही मैं स्फूर्ति से भर उठा.

ड्राइवर ने मोतिहारी में सबीर के मकान के आगे गाड़ी रोकी. मैं अभी गाड़ी से उतर भी नहीं पाया था कि सबीर की नन्ही सी प्यारी सी, बिटिया ने ‘नमस्ते, अंकल,’ कहा.

मैं ने बिस्कुट का पैकेट बच्ची को पकड़ाते हुए कहा, ‘‘बेटा, पापा घर पर हैं?’’

‘‘जी हां.’’ थोड़ी देर में एक सज्जन अंदर से आए. लंबा कद और आंखों पर चश्मा. मैं ने पूछा, ‘‘सबीर घर पर हैं क्या?’’

वे हैरानी से बोेले, ‘‘कौन सबीर?’’

मैं ने प्रत्युत्तर में पूरी दास्तान सुनाते हुए कहा, ‘‘आप सबीर को नहीं जानते?’’

‘‘अच्छाअच्छा, सबीर साहब, देखिए, उस दिन एक रोज के लिए यह घर उन्होंने एक हजार रुपए किराए पर लिया था. मेरी ‘नेमप्लेट’ उतारी गई और उन की पहचान टांगी गई और नौकरानी ने मां बन कर खाना खिलाया. मेरी बेटी ने उन की बेटी की भूमिका निभाई. बस, खेल खत्म पैसा हजम.’’

मैं ने वितृष्णा से कहा, ‘‘शर्म आनी चाहिए.’’

वे छूटते ही बोले, ‘‘किसे? मुझे या सबीर साहब को? अरे साहब, यह सब इस बिहार में दाल में नमक के बराबर भी नहीं, समुद्र में एक चम्मच चीनी मिलाने जैसा है. यहां आएदिन घोटाले हो रहे हैं, मंत्री अरबों लूट रहे हैं तो सरकारी कर्मचारी हरिश्चंद्र क्यों बने रहें?’’

मैं वापस चल पड़ा. नुक्कड़ पर पान वाले से आ कर पता पूछा. आज उस से अंतिम फैसला करना है. मैं गुस्से से उबल रहा था. मेरा विश्वास, मेरी ईमानदारी को सबीर ने दांव पर लगा दिया था.

पान वाले ने उस का नाम सुनते ही कहा, ‘‘हां साहब, जानते हैं हम. उन्हें हम ही क्या, इस शहर का हर पान वाला एक उम्दा इंसान समझता है. बड़े रईस आदमी हैं, मोतिहारी के चांदमारी में भी एक मकान है, चकिया में स्वयं रहते हैं. पीपराकोड़ी में उन का विशाल फार्महाउस है, वहां मेरा भाई दरबान है, हुजूर.’’

‘स्वयं चकिया में, फार्महाउस पीपराकोठी में और पता चांदमारी का. वाह रे सबीर, क्या गुल खिलाया है तुम ने,’ मैं ने मन ही मन भन्नाते हुए कहा. मूड खराब हो चुका था. सो, लौट जाने का निर्णय किया.

अचानक मैं ने ड्राइवर से पीपराकोठी फार्महाउस चलने को कहा. ज्यादा परेशानी नहीं हुई. मुख्य सड़क से 14-15 किलोमीटर अंदर झखराग्राम में उस का फार्महाउस मिल गया. दरबान को उस के भाई का हवाला दिया तो उस ने विशाल फाटक खोल दिया. अंदर किले सा दृश्य था. चमचमाती सड़क और सुंदर सा गैस्टहाउस. गैस्टहाउस के पीछे एक विशाल गोदाम और वहां खड़े दर्जनों ट्रक. मैं ने वहां खड़े एक व्यक्ति से कहा, ‘‘मैं सीबीआई इंस्पैक्टर राणा हूं.’’

फार्महाउस में इफको खाद में नदी की बारीक रेत मिलामिला कर 1 टन खाद को 3 टन बनाया जा रहा था और करोड़ों रुपए गैरमामूली तौर पर कमाए जा रहे थे. पूछताछ से ज्ञात हुआ कि इस काले व्यापार में मंत्री महोदय भी बराबर के हिस्सेदार हैं. मैं सबीर के चरित्र के इस विरोधाभास पर हतप्रभ था.

Love Story : प्यार था या कुछ और – क्यों शंकर और प्रमिला की नौकरी छूट गई?

Love Story : प्रमिला और शंकर के बीच अवैध संबंध हैं, यह बात रामनगर थाने के लगभग सभी कर्मचारियों को पता था. मगर इन सब से बेखबर प्रमिला और शंकर एकदूसरे के प्यार में इस कदर खो गए थे कि अपने बारे में होने वाली चर्चाओं की तरफ जरा भी ध्यान नहीं जा रहा था.

शंकर थाने के इंचार्ज थे तो प्रमिला एक महिला कौंस्टेबल थी. थाने के सर्वेसर्वा अर्थात इंचार्ज होने के कारण शंकर पर किसी इंस्पैक्टर, हवलदार या स्टाफ की उन के सामने चूं तक करने की हिम्मत नहीं होती थी.

थाने की सब से खूबसूरत महिला कौंस्टेबल प्रमिला थाने में शेरनी बनी हुई थी, क्योंकि थाने का प्रभारी उस पर लट्टू था और वह उसे अपनी उंगलियों पर नचाती थी.

जिन लोगों के काम शंकर करने से मना कर देते थे, वे लोग प्रमिला से मिल कर अपना काम करवाते थे.
प्रमिला और शंकर के अवैध रिश्तों से और कोई नहीं मगर उन के परिजन जरूर परेशान थे. प्रमिला 1 बच्चे की मां थी तो शंकर का बड़ा बेटा इस वर्ष कक्षा 10वीं की परीक्षा दे रहा था.

मगर कहते हैं न कि प्रेम जब परवान चढ़ता है तो वह खून के रिश्तों तक को नजरअंदाज कर देता है. प्रमिला के घर में अकसर इस बात को ले कर पतिपत्नी के बीच झगड़ा होता था मगर प्रमिला हर बार यही दलील देती थी कि लोग उन की दोस्ती का गलत अर्थ निकाल रहे हैं. थाना प्रभारी जटिल केस के मामलों में या जहां महिला कौंस्टेबल का होना बहुत जरूरी होता है तभी उसे दौरों पर अपने साथ ले जाते हैं. थाने की बाकी महिला कौंस्टेबलों को यह मौका नहीं मिलता है इसलिए वे लोग मेरी बदनामी कर रहे हैं. यही हाल शंकर के घर का था मगर वे भी बहाने और बातें बनाने में माहिर थे. उन की पत्नी रोधो कर चुपचाप बैठ जाती थीं.

शंकर किसी न किसी केस के बहाने शहर से बाहर चले जाते थे और अपने साथ प्रमिला को भी ले जाते थे. अपने शहर में वे दोनों बहुत कम बार साथसाथ दिखाई देते थे ताकि उनके अवैध प्रेम संबंधों को किसी को पता न चलें. लेकिन कहते हैं न कि खांसी और प्यार कभी छिपाए नहीं छिपता, इन के साथ भी यही हो रहा था.

एक दिन शाम को प्रमिला अपने प्रेमी शंकर के साथ एक फिल्म देख कर रात देर से घर पहुंची तो उस के पति ने हंगामा खड़ा कर दिया. दोनों में जम कर हंगामा हुआ.

प्रमिला के घर में घुसते ही अमित ने गुस्से से कहा,”प्रमिला, तुम्हारा चालचलन मुझे ठीक नहीं लग रहा है. पूरे मोहल्ले में तुम्हारे और डीएसपी शंकर के अवैध संबंधों के चर्चे हो रहे हैं. तुम्हें शर्म आनी चाहिए. 1 बच्चे की मां हो कर तुम किसी पराए मर्द के साथ गुलछर्रे उड़ा रही हो…”

अमित की बात बीच में ही काटती हुई प्रमिला ने शेरनी की दहाड़ती हुई बोली,”अमित, बस करो, मैं अब और नहीं सुन सकती… तुम मेरे पति हो कर मुझ पर ऐसे घिनौने लांछन लगा रहे हो, तुम्हें शर्म आनी चाहिए. मेरे और थाना प्रभारी के बीच दोस्ताने रिश्ते हैं. कई बार जटिल और महिलाओं से संबंधित मामलों में जब दूसरी जगह जाना पड़ता है तब वे मुझे अपने साथ ले जाते हैं, जिस के कारण बाकी के लोग मुझ से जलते हैं और मुझे बदनाम करते हैं.

“अमित, तुम्हें एक बात बता दूं कि तुम्हारी यह दो टके की मास्टर की नौकरी से हमारा घर नहीं चल रहा है. तुम्हारी तनख्खाह से तो राजू के दूध के 1 महीने का खर्च भी नहीं निकलता है…समझे. फिर तुम्हारे बूढ़े मांपिता भी तो हमारी छाती पर बैठे हुए हैं, उन की दवाओं का खर्च कहां सा आता है, यह भी सोचो.

“अमित, पैसे कमाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, कई पापड़ बेलने पड़ते हैं. थाना प्रभारी के साथ मेरे अच्छे संबंधों की बदौलत मुझे ऊपरी कमाई में ज्यादा हिस्सा मिलता है, फिर मैं उन के साथ अकसर दौरे पर जाती हूं तो तब टीएडीए आदि का मोटा बिल भी बन जाता है. यह सब मैं इस परिवार के लिए कर रही हूं. तुम कहो तो मैं नौकरी छोड़ कर घर पर बैठ जाती हूं, फिर देखती हूं तुम कैसे घर चलाते हो?“

अमित ने ज्यादा बात बढ़ाना उचित नहीं समझा. वह जानता था कि प्रमिला से बहस करना बेकार है. वह प्रमिला को जब तक रंगे हाथों नहीं पकड़ लेता तब तक वह उस पर हावी ही रहेगी. अमित के बुजुर्ग पिता ने भी उसे चुप रहने की सलाह दी. वे जानते थे कि घर में अगर रोजाना कलह होते रहेंगे तो घर का माहौल खराब हो जाता है और घर में सुखशांति भी नहीं रहती है.

उन्होंने अमित को समझाते हुए कहा,”बेटा अमित, बहू से झगड़ा मत करो, उस पर अगर इश्क का भूत सवार होगा तो वह तुम्हारी एक भी बात नहीं सुनेगी. इस समय उलटा चोर कोतवाल को डांटने वाली स्थिति बनी हुई है. जब उस की अक्ल ठिकाने आएगी तब सबकुछ ठीक हो जाएगा.

“बेटा, वक्त बड़ा बलवान होता है. आज उस का वक्त है तो कल हमारा भी वक्त आएगा.“

अपने उम्रदराज पिता की बात सुन कर अमित ने खामोश रहने का निर्णय ले लिया.

एक दिन जब प्रमिला अपने घर जाने के लिए रवाना हो रही थी, तभी उसे शंकर ने बुलाया.

“प्रमिला, हमारे हाथ एक बहुत बड़ा बकरा लगने वाला है. याद रखना किसी को खबर न हो पाए. कल सुबह 4 बजे हमारी टीम एबी ऐंड कंपनी के मालिक के घर पर छापा डालने वाली है. कंपनी के मालिक सुरेश का बंगला नैपियंसी रोड पर है. हम आज रात उस के बंगले के ठीक सामने स्थित होटल हिलटोन में ठहरेंगे. मैं ने हम दोनों के लिए वहां पर एक कमरा बुक कर दिया है. टीम के बाकी सदस्य सुबह हमारे होटल में पहुंचेंगे, इस के बाद हमारी टीम आगे की काररवाई के लिए रवाना हो जाएगी. तुम जल्दी से अपने घर चली जाओ और तैयारी कर के रात 9 बजे सीधे होटल पहुंच जाना, मैं तुम्हें वहीं पर मिलूंगा.“

“यस सर, मैं पहुँच जाऊंगी…” कहते हुए प्रमिला थाने से बाहर निकल गई.

सुबह ठीक 4 बजे सायरन की आवाज गूंज उठी. 2 जीपों में सवार पुलिसकर्मियों ने एबी कंपनी के बंगले को घेर लिया. गहरी नींद में सो रहे बंगले के चौकीदार हडबड़ा कर उठ गए. पुलिस को गेट पर देखते ही उनकी घिग्घी बंध गई. चौकीदारों ने गेट खोल दिया. कंपनी के मालिक सुरेश के घर वालों की समझ में कुछ आता इस से पहले पुलिस ने उन सब को एक कमरे में बंद कर के घर की तलाशी लेनी शुरू कर दी.

प्रमिला को सुरेश के परिवार की महिला सदस्यों को संभालने का जिम्मा सौंपा गया था.

करीब 2 घंटे तक पूरे बंगले की तलाशी जारी रही. छापे के दौरान पुलिस ने बहुत सारा सामान जब्त कर लिया.

कंपनी का मालिक सुरेश बड़ी खामोशी से पुलिस की काररवाई को देख रहा था. वह भी पहुंचा हुआ खिलाड़ी था, उसे पता था कि शंकर एक नंबर का भ्रष्ट पुलिस अधिकारी है. उसे छापे में जो गैरकानूनी सामान मिला है उस का आधा तो शंकरऔर उस के साथी हड़प लेंगे, फिर बाद में शंकर की थोड़ी जेब गरम कर देगा तो वह मामले को रफादफा भी कर देगा.

बंगले पर छापे के दौरान मिले माल के बारे में सुन कर थाने के अन्य पुलिस वालों के मुंह से लार टपकने लगी. शंकर ने सभी के बीच माल का जल्दी से बंटवारा करना उचित समझा. बंटवारे को ले कर उन के अर्दली और कुछ कौंस्टबलों में झगड़ा भी शुरू हो गया. शंकर ने अपने अर्दली और अन्य कौंस्टबलों को समझाया मगर उन के बीच लड़ाई कम होने के बजाय बढ़ती ही गई.

शंकर ने छापे में मिला हुआ कुछ महंगा सामान उसी होटल के कमरे में छिपा कर रखा था. इधर बंटवारे से नाराज अर्दली और 2 कौंस्टेबल शंकर से बदला लेने की योजना बनाने लगे.

उन्होंने तुरंत अपने इलाके के एसपी आलोक प्रसाद को सारी घटना की जानकारी दी. उन्हें यह भी बताया कि शंकर और प्रमिला हिलटोन होटल में रूके हुए हैं.

उन्हें रंगे हाथ पकड़ने का यह सुनहरा मौका है. एसपी आलोक प्रसाद को यह भी सूचना दी गई कि कंपनी मालिक के घर पर पड़े छापे के दौरान बरामद माल का एक बड़ा हिस्सा शंकर और प्रमिला ने अपने कब्जे में रखा था, जो उसी होटल में रखा हुआ है.

एसपी आलोक प्रसाद अपनी टीम के साथ तुरंत होटल हिलटोन पर पहुंच गए. इस मौके पर कंपनी के मालिक के साथसाथ शंकर की पत्नी और प्रमिला के पति को भी होटल पर बुला लिया गया ताकि शंकर और प्रमिला के बीच के अवैध संबंधों का पर्दाफाश हो सके.

एसपी आलोक प्रसाद ने डुप्लीकैट चाबी से होटल के कमरे का दरवाजा खुलवाया, तो कमरे में शंकर और प्रमिला को बिस्तर पर नग्न अवस्था में सोए देख कर सभी हैरान रह गए.

एसपी को सामने देख कर शंकर की हालत पतली हो गई. वह बिस्तर से कूद कर अपनेआप को संभालते हुए उन्हें सैल्यूट करने लगा.

शंकर के सैल्यूट का जवाब देते हुए आलोक प्रसाद ने व्यंग्य से कहा,”शंकर पहले कपड़े पहन लो, फिर सैल्यूट करना. यह तुम्हारे साथ कौन है? इसे भी कपड़े पहनने के लिए कहो…”

प्रमिला की समझ में कुछ नहीं आया कि यह सब क्या हो रहा है. वह दौड़ कर बाथरूम में चली गई.

कुछ देर के बाद आलोक प्रसाद ने सभी को अंदर बुलाया. शंकर की पत्नी तो भूखी शेरनी की तरह शंकर पर झपटने लगी. वहां मौजूद लोगों ने किसी तरह बीचबचाव किया.

आलोक प्रसाद ने प्रमिला के पति की ओर मुखातिब होते हुए कहा,”अमित, अपनी पत्नी को बाथरूम से बाहर बुला दो, बहुत देर से अंदर बैठी है, पसीने से तरबतर हो गई होगी…”

“प्रमिला बाहर आ जाओ, अब अपना मुंह छिपाने से कोई फायदा नहीं है, तुम्हारा मुंह तो काला हो चुका है और तुम्हारी करतूतों का पर्दाफाश भी हो चुका है,“ अमित तैश में आ कर कहा.

प्रमिला नजरें और सिर झुकाते हुए बाथरूम से बाहर आई. उसे देखते ही अमित आगबबूला हो उठा और वह प्रमिला पर झपटने के लिए आगे बढ़ा, मगर उसे भी समझा कर रोक दिया गया.

“अमित, अब पुलिस अपना काम करेगी. इन दोनों को इन के अपराधों की सजा जरूर मिलेगी…” कहते हुए आलोक प्रसाद शंकर के करीब पहुंचे  और उन के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले,”शंकर, कंपनी मालिक के घर छापे के दौरान जब्त माल कहां है? जल्दी से बाहर निकालो. कोई भी सामान छिपाने की तुम्हारी कोशिश नाकाम होगी, क्योंकि इस वक्त हमारे बीच कंपनी का मालिक भी मौजूद है.”

शंकर ने प्रमिला को अंदर से बैग लाने को कहा. प्रमिला चुपचाप एक बड़ा सूटकेस ले कर आई.

भारीभरकम सूटकेस देख कर आलोक प्रसाद ने एक इंस्पैक्टर से कहा,”सूटकेस अपने कब्जे में ले लो और इन दोनों को पुलिस स्टैशन ले कर चलो. अब आगे की काररवाई वहीं होगी.“

सिर झुकाए हुए शंकर और प्रमिला एक कौंस्टेबल के साथ कमरे से बाहर निकल गए हैं.

एसपी आलोक प्रसाद शंकर और प्रमिला को रोक कर बोले,”आप दोनों एक बात याद रखना, जो आदमी अपने परिवार को धोखे में रख कर उस के साथ अन्याय करता है, अनैतिक संबंधों में लिप्त हो कर अपने परिवार की सुखशांति भंग करता है और जो अपनी नौकरी के साथ बेईमानी करता है, उसे एक न एक दिन बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है.”

वे दोनों सिर झुकाए चुपचाप खङे थे. उन्हें पता था कि अब आगे न सिर्फ उन की नौकरी छिन जाएगी, बल्कि जेल भी जाना होगा.
लालच और वासना ने दोनों को मुंह दिखाने लायक नहीं छोङा था.

Religion : स्टूडैंट्स पर गिद्ध दृष्टि

Religion : ऋषिकेश में एक स्कूल के प्रबंधकों द्वारा कुछ माह पहले लड़कियों को तिलक लगा कर स्कूल आने पर प्रतिबंध लगाए जाने पर कट्टरपंथी, अनुमान के अनुसार, हल्ला मचा रहे हैं. ये वही कट्टरपंथी हैं जो मुसलिम लड़कियों के हिजाब पहन कर स्कूल आने पर प्रतिबंध की मांग करते हुए अपने दोगलेपन पर कतई शर्मिंदा नहीं होते. तिलक, क्रौस, हिजाब, सिर पर चुन्नी, स्कल कैप असल में स्कूलों में ही नहीं, हर पब्लिक प्लेस में फ्रांस की तरह बैन होनी चाहिए. धर्म ने अपने भक्तों से सदियों से कहा है कि अपनी पहचान न केवल बना कर रखो, उसे पब्लिक में जाहिर भी करो. ऐसा इसलिए कि उन पर हमले हों और वे फिर उसी धर्म की शरण में आएं जिस ने ऐसे विभाजनकारी आदेश जारी किए थे. समाज में बंटवारों से धर्म को बड़ा लाभ होता है क्योंकि मार खाए भक्त या मरने वाले दूसरे धर्म के भक्त दोनों पिटने या पीटने के बाद धर्म की दुकान में शरण के लिए अवश्य जाते हैं. अपना धर्म अपनी जेब में रहना चाहिए. अगर अंधविश्वासी ही हैं तो उस का सार्वजनिक प्रदर्शन तो न करें.

धर्म एक मानसिक बीमारी है जिस के वायरस को मंदिर, मसजिद, चर्च, गुरुद्वारे रातदिन अपने भक्तों में फैलाते हैं और फिर इलाज के लिए कोई प्रवचन के लिए बुलाता है, कोई अरदास के लिए तो कोई दुआ पढ़ने के लिए. एक बात सब में सामान्य है कि सब अपने गढ़े सर्वशक्तिमान चमत्कारी भगवान के इकलौते एजेंट होने के बावजूद भक्तों से पैसा भी देने को कहते हैं और शरीर से कुकर्म करने को भी कहते हैं. यह ब्रेन वाशिंग बचपन से ही चालू हो जाती है क्योंकि धर्म के दुकानदार अच्छी तरह समझते हैं कि वयस्क होने के बाद लोगों को बहकाना आसान नहीं है. भारत में 800 साल मुसलमानों का राज रहा पर अविभाजित भारत में आज भी 12 करोड़ से ज्यादा हिंदू हैं क्योंकि जो बचपन से हिंदू धर्म के रस में डूबा रहा उसे बदलना आसान नहीं था. स्कूलों को हर धर्म अपनी पहली ट्रेनिंग यूनिट मानता है. इसीलिए हर धर्म ने धड़ाधड़ स्कूल अपनी धार्मिक दुकान के साथ खोले हैं.

हर धर्मस्थल के आसपास एक स्कूल दिख जाएगा जहां अगली पीढ़ी के पुजारी भी तैयार होते हैं और मरनेमारने के लिए सैनिक व भक्त भी. स्कूलों का पहला उद्देश्य धर्म की सेवा करना होता है, ज्ञान व हुनर पा कर जीवन को सुखद बनाना नहीं. यह तो पिछले 300 सालों में कुछ बिगडै़ल विचारकों की देन है कि उन्होंने विज्ञान, तकनीक, विचारों की विभिन्नता, फिलौसफी, इतिहास, चिकित्सा के क्षेत्रों की पढ़ाई शुरू की. अब धर्म के दुकानदार फिर लग गए हैं कि स्कूलों में ही खुली हवा को बंद कर दिया जाए. वे इस में सफल हो भी रहे हैं.

Congress : शासन, समाज और सत्ताधारी

Congress : क्या कांग्रेस मुक्त भारत का भारतीय जनता पार्टी का सपना पूरा हो सकता है? संभव नहीं है लेकिन ‘एक देश एक चुनाव’ के सहारे भाजपा लंबी योजना पर काम जरूर कर रही है. कांग्रेस और भाजपा में यह खास फर्क है कि कांग्रेसी आज की समस्याओं को दूर करने की सोचते हैं जबकि भाजपाई आज समस्याएं पैदा करते हैं ताकि उस के दलदल में 10-15 साल बाद कमल के फूल खिलें.कांग्रेस ने इंडिया ब्लौक बना कर भारतीय जनता पार्टी को मई-जून 2024 के चुनावों में धीमा तो कर दिया पर बाद में हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव जीत कर भाजपा ने न केवल अपनी खोई जमीन कुछ पा ली, बल्कि उस ने इंडिया गठबंधन को तोड़ भी डाला है.कांग्रेस आज फिर अकेली रह गई है? क्या यह अकेला चना दांत तोड़ सकेगा? क्या भाजपा ऐसी पार्टी है जिसे कंट्रोल में रखना जरूरी है? क्या कांग्रेस भाजपा से किसी भी तरह से बेहतर है? इस तरह के सवालों से मतदाता अगले साल के कुछ विधानसभाओं के चुनावों में रूबरू होंगे.यह सच है कि चुनाव से नेता बदलते हैं, प्रशासन नहीं. सभी पार्टियों की शासन व्यवस्था अब लगभग एक जैसी है. सभी पार्टियां अमीरों को संरक्षण देती हैं, गरीबों को लूटती हैं. सभी पार्टियों का कर ढांचा एक सा है. सभी पार्टियों की पुलिस एक सी ब्लडी है. सभी पार्टियां वादे करती हैं, ऐसे वादे भी जो पूरे नहीं किए जा सकते.फिर कांग्रेस की सरकार या कांग्रेस मुक्त सरकार का फर्क क्या है? फर्क यह है कि कौन सी पार्टी सिर्फ शासन चलाने के लिए आती है और कौन सी शासन के साथ समाज को भी चलाने को आती है.

आज अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की सरकार शासन के साथ समाज चलाने को तैयार बैठी है. वह गोरों का राज वापस लाना चाहती. ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के नारे का असली मतलब ‘मेक अमेरिका व्हाइट ग्रेट अगेन’ है. वह कालों, ब्राउन, पीलों, मुसलिमों, हिंदुओं को रहने तो देना चाहती है लेकिन दूसरी श्रेणी के लोगों की तरह. वहां अब एक पैरेलल सरकार, जो ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का संक्षिप्त नाम है ‘मागा’ बन कर खड़ी हो गई है.ठीक उसी तरह भारत में हिंदुत्ववादी भगवा गमछाधारियों की फौज खड़ी है जो भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर चल रही है या भारतीय जनता पार्टी को अपने इशारों पर चला रही है. कांग्रेस और अन्य दल इन के रास्ते में अड़चन हैं. जो पार्टियां भाजपा के साथ हैं उन्हें एहसास है कि उन्हें ये भगवाधारी किसी भी दिन हड़प सकते हैं.जो अमेरिका और भारत में हो रहा है, वह अब बंगलादेश में भी हो रहा है.

ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान में हो चुका है. कट्टरवादियों की भीड़ का शासन एक नई पद्धति है जो कम्युनिस्टों और नाजियों से प्रेरित है. यह अब दुनिया के बहुत से देशों में पनप रही है. अमेरिका की डैमोक्रेटिक पार्टी, यूरोपीय देशों की सत्ताधारी पार्टियां आज भयभीत हैं.ये सब कट्टरवादी पार्टियां वर्षों की प्लानिंग के बाद निकली हैं. पहले कुछ विचारकों ने बीज बोए, फिर दूसरी पीढ़ी ने छोटे पेड़ों को सींचा, अब तीसरी पीढ़ी के आने पर जहरीले फल देने वाले ये कांटेदार पेड़ सारी जगह फैल रहे हैं. कुछ देशों में इन पर कंट्रोल किया जा रहा है पर इन के फूल इतने आकर्षक हैं कि लोग इन की ओर आकर्षित होते हैं और फिर मदमस्त हो जाते हैं.कांग्रेस मुक्त नारा इसीलिए गढ़ा गया था कि इन की सोच को समाप्त कर दो हिटलर के यहूदियों के बारे में फाइनल सौल्यूशन के कदम की तरह. इस का अंत क्या होगा, इस की चिंता इन कट्टरधारियों के सिरमौर को नहीं होती.

भारत में इसी कट्टर सोच के कारण 2000 साल शकों, हूणों, मुगलों, अफगानों, अंगरेजों, फ्रांसीसियों ने राज किया. कट्टरों को इस की चिंता नहीं क्योंकि समाज पर उन का नियंत्रण लगातार बना रहा.अब ये सरकार और परिवार दोनों पर नियंत्रण चाहते हैं. जनता को इस योजना की समझ आएगी, यह मुश्किल है क्योंकि संवाद के माध्यमों पर इन कट्टरपंथियों का हर देश में पूरा कब्जा है. भारत समेत इन सब देशों की पीडि़त जनता इसे अपना प्रारब्ध मान कर सहन करेगी, चुपचाप.

Romantic Story : फोम का गद्दा – शौकीन मिजाज वाणी को आखिर कैसा पति मिला

Romantic Story : वाणी बहुत उत्साहित थी. विवाह के 2 महीने बाद ही उस का यह पहला जन्मदिन था. अनुज से प्रेमविवाह के बाद वह जीवन में हर तरह से सुखी व संतुष्ट थी जबकि वाणी उत्तर भारतीय ब्राह्मण परिवार से थी जबकि अनुज मारवाड़ी परिवार से था. दोनों एक कौमन फ्रैंड की बर्थडे पार्टी में मिले थे. सालभर की दोस्ती के बाद दोनों परिवारों की सहर्ष सहमति के बाद दोनों 2 महीने पहले ही विवाहबंधन में बंध गए थे. अनुज मुंबई में विवाह से पहले फ्रैंड्स के साथ फ्लैट शेयर करता था. विवाह के बाद अब मुलुंड में उस ने फ्लैट ले लिया था.

आज वाणी अपने बर्थडे के बारे में ही सोच रही थी कि अच्छा है, परसों बर्थडे का दिन इतवार है, पूरा दिन खूब ऐंजौय करेंगे. उसे विवाह से पहले का अपना पिछला बर्थडे भी याद आ गया. पिछले बर्थडे पर जब वाणी ने अनुज को डिनर करवाया तो वह मन ही मन अच्छे गिफ्ट की उम्मीद कर रही थी. आखिरकार अनुज की नईनई गर्लफ्रैंड थी. पर अनुज ने जब उसे जेब से एक फूल निकाल कर दिया तो उस का मन बुझ गया था. मन में आया था, कंजूस, मारवाड़ी.

वाणी का उतरा चेहरा देख अनुज ने पूछा था, ‘क्या हुआ? तुम्हें फूल पसंद नहीं है?’ वाणी ने मन में कुछ नहीं रखा था, साफसाफ बोली थी, ‘बस, फूल. मुझे लग रहा था तुम मेरे लिए कुछ स्पैशल लाओगे, हमारी नईनई दोस्ती है.’

‘अरे, तभी तो. अभी दोस्ती ही तो है. मैं ने सोचा अभी तुम्हारे लिए कुछ स्पैशल ले लूं और थोड़े दिनों बाद किसी भी कारण से यह दोस्ती न रहे, तो?’

वाणी चौंकी थी, ‘मतलब तुम्हारा गिफ्ट बेकार चला जाएगा, फिर?’

‘हां, भई, मारवाड़ी हूं. ऐसे ही फ्यूचर पक्का हुए बिना गिफ्ट में पैसे थोड़े ही लुटाऊंगा. मैं ने तो आज तक किसी लड़की को गिफ्ट नहीं दिया.’

‘ओह, मेरा मारवाड़ी बौयफ्रैंड, दिल का कितना साफ है,’ उस समय तो यही सोचा था वाणी ने और आज वह उस की पत्नी है. अब देखना है क्या गिफ्ट देगा वह बर्थडे पर. वाणी को इतवार का इंतजार था.

इतवार की सुबह वाणी को बांहों में भर किस करते हुए अनुज ने उसे बर्थडे विश किया. वाणी बहुत अच्छे मूड में थी. वह अनुज की बांहों में सिमटती हुई बोली, ‘‘अनुज, मैं बहुत खुश हूं, विवाह के बाद मेरा पहला बर्थडे है.’’

‘‘हां, डियर, मैं भी बहुत खुश हूं. रुको, तुम्हारा गिफ्ट लाया,’’ अनुज अलमारी की तरफ बढ़ते हुए बोला, ‘‘आंखें बंद रखना, जब कहूंगा तभी खोलना.’’

आंखें बंद कर मन ही मन वाणी कल्पनाओं में खो गई. काश, डायमंड रिंग हो, गोल्ड चेन, स्टाइलिश ब्रेसलैट, कोई मौडर्न ड्रैस या लेटैस्ट घड़ी या मोबाइल? यही सब अपनी पसंद तो है, वह अनुज को बताती रहती है. मन ही मन खूबसूरत कल्पनाओं में डूबी वाणी को हाथ पर किसी पेपर का एहसास हुआ. अनुज ने कहा, ‘‘खोलो आंखें, तुम्हारा बर्थडे गिफ्ट.’’

वाणी जैसे आसमान से जमीन पर गिरी. एक पेपर उलटापुलटा देखा. अनुज ने गर्वित स्वर में कहा, ‘‘तुम्हारे नाम से एफडी करवा दी है, डार्लिंग. यही गिफ्ट है तुम्हारा.’’

वाणी के तनबदन में आग लग गई, ‘‘यह मेरा बर्थडे गिफ्ट है, रियली?’’

‘‘हां, डार्लिंग, पर मेरा रिटर्न गिफ्ट?’’ कहता हुआ शरारत से अनुज मुसकराया, तो वाणी ने कहा, ‘‘अभी नहीं, पर सच में यही गिफ्ट है मेरा?’’

‘‘हां, चलो, अब तैयार हो जाओ, नाश्ता बाहर ही करेंगे, मूवी देख कर लौटेंगे,’’ कहता हुआ अनुज एक बार और वाणी के गाल पर किस करता हुआ फ्रैश होने चला गया.

गुस्से के मारे वाणी के आंसू बह चले. पेपर फेंक दिया. बाथरूम में शावर की बौछार में आंसू बहते रहे, इतना कंजूस. क्या करूंगी इस के साथ. मुझे तो हर चीज का शौक है. अब लाइफ कैसे ऐंजौय करूंगी. यह तो एफडी और शेयर के अलावा कुछ सोच ही नहीं सकता. सिर्फ इस के प्यार में कब तक हर खुशी ढूंढ़ती रहूंगी. अरे, कौन पति बर्थडे गिफ्ट में एफडी पकड़ाता है. पर हां, उस के बर्थडे पर खुश तो हो रहा है. पर ऐसे तो नहीं चलेगा न. प्यार तो बहुत करता है और गिफ्ट की बात पर गुस्सा दिखाऊंगी तो लालची, छोटी सोच की लगूंगी, नहीं. इस मारवाड़ी लोहे को सिर्फ प्यार से ही फोम का गद्दा बनाना पड़ेगा. शावर की बौछार से रोतेरोते हंस पड़ी वाणी. थोड़ी देर पहले की सारी चिढ़, गुस्सा हवा हो चुका था.

वह स्वभाव से बहुत शांत और खुशमिजाज थी. मन ही मन बहुत कुछ सोच चुकी थी. गिफ्ट जैसी चीज पर थोड़ी ही मन में कटुता रखेगी. पर हां, इस का इलाज उस ने सोच लिया था, इसलिए अब वह खुश थी.

दोनों ने बाहर जा कर रैस्टोरैंट में साउथ इंडियन नाश्ता किया. वाणी को यहां आना अच्छा लगता था. अनुज को याद था, यह देख कर वाणी खुश हुई. वाणी के मायके और ससुराल से सब ने बर्थडे विश किया था. सब के गिफ्ट के बारे में पूछने पर उस का दिल बुझ गया था. पर्सनल कह कर बात हंसी में टाल दी थी. फिर दोनों ने मूवी देखी. थोड़ा घूमफिर कर दोनों वापस आ गए.

दिन बहुत अच्छा रहा था, पर कोई भी गिफ्ट न पाने की कसक थी वाणी के मन में. फिर समय के साथसाथ वाणी ने स्पष्टतया महसूस कर लिया था कि अनुज के प्यार में कमी नहीं है, पर जहां पैसे की बात आती है, वह बहुत सोचता है. एक भी पैसा कहीं फालतू खर्च हो जाता तो सारा दिन कलपता और कहीं दो पैसे बच जाते तो बच्चों की तरह खुश हो जाता है.

उस की हर बात में नफानुकसान की बात होती. कई बार वाणी मन ही मन बुरी तरह चिढ़ जाती, पर वह अपने बर्थडे पर सोच ही चुकी थी कि कैसे अनुज के साथ घरगृहस्थी चलानी है कि झगड़े भी न हों और उस का मन भी दुखी न हो.

अपने बर्थडे के दिन से ही उस के मन में एक डायमंड रिंग लेने की इच्छा थी. आसपास की नई बनी सहेलियों से अंदाजा ले कर पास ही स्थित मौल के एक ज्वैलरी शोरूम में गई और एक नाजुक सी, सुंदर रिंग खरीद कर खुद ही खुश हो गई. उस के पास क्रैडिट कार्ड था ही.

क्रैडिट कार्ड का मैसेज सीधा अनुज के पास पहुंचा तो कार्ड पर्स में डालने से पहले ही अनुज का फोन आ गया, ‘अरे, क्या खरीदा?’ वह इस बात से बहुत चिढ़ती थी कि अनुज ने सब जगह अपना ही नंबर दिया हुआ था. वह जब भी कहीं शौपिंग करती, पेमैंट करते ही अनुज का फोन आ जाता कि क्या ले लिया? अब भी अनुज ने पूछा, ‘‘अरे, ज्वैलरी शौप पर क्या कर रही हो?’’

‘‘वही डियर, जो सब करते हैं.’’

‘‘अरे, जल्दी बताओ, क्या ले लिया?’’

‘‘डायमंड रिंग.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘घर आओ तो बताऊंगी.’’

शाम को अनुज ने घर में घुसते ही पहला सवाल किया, ‘‘अरे, रिंग कैसे खरीद ली? मुझे बताया भी नहीं?’’

‘‘सांस तो ले लो, डियर, खरीदनी तो बर्थडे पर ही थी पर तुम ने एफडी ले ली,’’ अनुज के गले में बांहें डाल दी वाणी ने, ‘‘सब सहेलियां बारबार पूछ रही थीं कि क्या लिया, क्या लिया, तुम्हारी इज्जत भी तो रखनी थी.’’

वाणी की नईनई सहेलियों या किसी और परिचित के सामने अपनी अच्छी इमेज बनाने का बहुत शौक था अनुज को. उस की कोई तारीफ करता था तो वह और उत्साहित हो जाता था. यह जानती थी वाणी, इसलिए उस ने दांव आजमाया था. ठंडा पड़ गया अनुज, ‘‘हां, ठीक है ले ली. अच्छा, अब दिखाओ तो.’’ उंगली में पहनी हुई अंगूठी सामने दिखाती हुई वाणी का चमकता चेहरा देख अनुज भी मुसकरा कर बोला, ‘‘बहुत सुंदर है.’’

वाणी हंसी, ‘‘यह भी अच्छा इन्वैस्टमैंट है, डियर, खुशी का, प्यार का.’’ अनुज भी हंस पड़ा तो वाणी ने चैन की सांस ली.

वाणी को अनुज से कोई और शिकायत नहीं थी सिवा इस के कि रुपएपैसे के मामले में वह बड़ा हिसाबकिताब रखता था. अब वाणी को भी अच्छी तरह से समझ आ गया था कि ऐसे जीवनसाथी के साथ कैसे खुश रहना है. वह कई तरीके आजमाती, सब में लगभग सफल ही रहती. अनुज को प्यारभरे पलों में अपने दिल की बातें भी कहती रहती, ‘‘अनुज, मुझे वह चीज अच्छी लगती है जो मुझे आज खुशी देती है. 50 साल बाद मुझे कोई बचत खुशी देगी, उस इंतजार में मैं अपनी यह उम्र, ये शौक, ये खुशियों के दिन तो खराब नहीं करूंगी न.’’

वाणी अब यह उम्मीद नहीं करती थी कि अनुज सरप्राइज में उसे कोई गिफ्ट या कुछ भी और ला देगा. उस जैसे कंजूस पति के साथ कैसे निभाना है, यह वह जान ही चुकी थी.

एक बार दोनों में अकारण ही बहस हो गई. अनुज गुस्से में जोरजोर से बोलने लगा, वाणी को भी गुस्सा आया था पर वह चिल्लाई नहीं. गुस्से में चुपचाप बैठी रही. अनुज गुस्से में ही औफिस का बैग उठा कर निकलने लगा तो वाणी ने संयत स्वर में कहा, ‘‘घर की दूसरी चाबी ले कर जाना.’’

चलता हुआ ठिठक गया अनुज, गुर्राया, ‘‘क्यों?’’

‘‘मुझे बाहर जाना है.’’

‘‘कहां?’’

‘‘मैं ने सोच लिया है जबजब तुम बेवजह, गुस्सा कर ऐसे जाओगे उसी दिन जी भर कर शौपिंग कर के आऊंगी. अपना मूड मैं शौपिंग कर के ठीक करूंगी.’’ अनुज के गुस्से की तो सारी हवा निकल गई. बैग टेबल पर रखा और वाणी के कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया, मुसकरा दिया, ‘‘ठीक है, अच्छा, सौरी.’’

वाणी भी जोर से हंस पड़ी. मन में सोचा, चलो, यह पैंतरा भी काम आया. मतलब अब हमारा झगड़ा कभी नहीं होगा. वह बोली, ‘‘सचमुच, जब भी तुम गुस्सा होंगे, मैं शौपिंग पर चली जाऊंगी.’’

‘‘ऐसा जुल्म मत करना, मेरी जान, खर्च करने में बंदा बहुत कमजोर दिल का है, जानती हो न.’’

‘‘जानती हूं, तभी तो कहा है.’’ उस के बाद हंसतेमुसकराते अनुज औफिस चल दिया. वाणी अकेले में भी बहुत हंसी, यह तो अच्छा इलाज है इस का. पैसे खर्च करने के नाम से तो इस का सारा गुस्सा हवा हो जाता है.

एक दिन फिर बातोंबातों में वाणी ने कहा, ‘‘अनुज, पता है पत्नियों के रहनसहन, उन की लाइफस्टाइल से उन के पतियों का स्टैंडर्ड पता चलता है?’’

‘‘हां, यह तो है.’’

‘‘इसलिए मैं अच्छा पहनती, खातीपीती हूं, मेरे पति का इतना अच्छा काम है, मैं क्यों मन मार कर रहूं. मैं अच्छी तरह रहूंगी तो आसपास पड़ोसियों और मेरी सहेलियों को भी तुम्हारे पद, आय का अंदाजा मिलेगा. वैसे, मुझे दिखावा पसंद नहीं है, फिर भी तुम्हारी इज्जत रखना, तुम्हारी तारीफ सुनना अच्छा लगता है मुझे,’’ कहतेकहते वाणी अनुज की प्रेममयी बातें, उस का खुशमिजाज स्वभाव, पूरी तरह से अनुज प्रभावित था वाणी से. वाणी के स्वभाव की सरलता उसे अच्छी लगती.

वाणी भी खुश थी पर अनुज को बदलना भी इतना आसान नहीं था. उसे अपने ऊपर बहुत संयम रखना पड़ता. एक शर्ट लेने के लिए भी, एक जगह पसंद आने पर भी अनुज कई ब्रैंडेड शोरूम में भटकता कि सेल, डिस्काउंट कहां ज्यादा है. मौल में उस के पीछे इधरउधर भटकती हुई वाणी चिढ़ जाती, पर चुप रहती. उस की एक शर्ट की शौपिंग में भी वह थकहार जाती. वह अनुज के साथ होने पर अपनी शौपिंग बहुत ही कम करती. बाद में अकेली या किसी फ्रैंड के साथ आती. जो मन होता, खरीदती और अनुज की कंजूसी से भरे सवालों के जवाब प्यारभरी होशियारी से बखूबी देती.

अनुज कुछ कह न पाता. अनुज का बर्थडे आया, तो अपने जोड़े हुए पैसों से वह अनुज के लिए एक शर्ट और परफ्यूम ले आई. अनुज को परफ्यूम्स बहुत पसंद थे. पर अच्छे परफ्यूम्स बहुत महंगे होते हैं, इसलिए अपने लिए खरीदता ही नहीं था. कभी एक लिया था तो उसे भी बहुत कंजूसी से खास मौके पर ही लगाता था. वाणी को इस बात पर बहुत हंसी आती थी.

एक बार अनुज को चिढ़ाया भी था, ‘अपने इस परफ्यूम को बैंक के लौकर में क्यों नहीं रखते?’ अनुज इस मजाक पर बहुत हंसा था. अनुज वाणी के लिए गिफ्ट्स देख कर बहुत खुश हुआ. वाणी को अच्छे डिनर के लिए ले गया.

नया विवाह, रोमांस, उत्साह, प्यारभरी तकरार का एक साल हुआ तो मैरिज एनिवर्सिरी का पहला सैलिबे्रशन भी वाणी ने खूब उत्साह से प्लान किया. अब वह कुछ चीजों में अनुज से सलाह भी नहीं लेती थी. अपने लिए एक सुंदर साड़ी और अनुज के लिए एक घड़ी ले कर आई जिसे देख कर वह बहुत खुश हुआ. कीमत सुन कर मुंह तो उतरा क्योंकि सरप्राइज के लिए वाणी कार्ड का इस्तेमाल नहीं करती थी, नकद दे कर खरीदती थी. इसलिए अनुज को पहले से कोई अंदाजा नहीं हो पाता था, पर औफिस से आते ही वाणी को बांहों में भर लिया, ‘‘वाणी, पता है सब को घड़ी इतनी पसंद आई कि पूछो मत.’’

वाणी मुसकराई, ‘‘गिफ्ट्स अच्छे लगते हैं न, डियर?’’

‘‘हां,’’ कहता हुआ अनुज हंस दिया.

फिर आया विवाह के बाद वाणी का दूसरा बर्थडे. इस बार कोई उम्मीद, कल्पना नहीं थी वाणी के मन में, हमेशा की तरह उस ने सोच रखा था कि वह खुद ही कुछ ले लेगी अपने लिए. इस बार भी उसे सैल्फ सर्विस करनी पड़ेगी. वह मन ही मन इस बात पर हंसती रहती थी कि कंजूस पति के साथ उसे ‘सैल्फ सर्विस’ ही करनी पड़ती है. बर्थडे वाले दिन वाणी सुबह सो कर उठी तो अनुज ने उसे विश किया. फिर आंखें बंद करने के लिए कहा. वाणी ने इस बार फिर आंखें बंद कीं. इस बार कल्पना में एफडी, शेयर मार्केट का इन्वैस्टमैंट या कोई हैल्थ पौलिसी या कोई इंश्योरैंस लगता है.

‘‘अब आंखें खोलो,’’ अनुज के कहने पर वाणी ने आंखें खोली तो उसे अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ, सामने बैड पर एक खूबसूरत साड़ी और एक ब्रेसलैट रखा था. वह ‘थैंक्यू, यह तुम ही हो न,’ कह कर हंसती हुई अनुज से लिपट गई, उसे जोर से बांहों में भर लिया.

‘‘चलो, अब मेरा रिटर्न गिफ्ट?’’ शरारत से अनुज ने उसे देखा तो उस की बातों का मतलब समझती हुई वाणी का चेहरा गुलाबी हो गया. वह उस के सीने में छिपती चली गई. वह हैरान थी. मारवाड़ी लोहा प्यार से एक साल में ही फोम का गद्दा जो बन चुका था.

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