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Ranveer Allahbadia : अश्लीलता आप के दिमाग में रहती है

Ranveer Allahbadia :  देश में इन दिनों कोई 9 लाख 50 हजार कंटेंट क्रिएटर हैं जिन में से 1 लाख 15 हजार की कमाई एक से ले कर 10 लाख रुपए महीना तक है. रणवीर इलाहाबादी इन में से एक हैं जिन्हें अब हर कोई जानने लगा है.

रणवीर ने एक शो इंडिया गोट लैटेंट में बतौर जज प्रतिभागियों से कुछ तथाकथित अश्लील सवाल पूछ लिए. हल्ला मचा और ऐसा मचा कि उस के खिलाफ कई एफआईआर दर्ज हो गईं और एक संसदीय समिति भी जांच के लिए गठित कर दी गई.

अश्लीलता का कोई तयशुदा पैमाना नहीं होता लेकिन धर्म के ठेकेदारों को हर वह बात जो धर्म के कारोबार पर अटक करती हो अश्लील लगती है. रणवीर को उतनी लोकप्रियता उस के अश्लील सवालों से कम इन ठेकेदारों के उस के वीडियो वायरल करने से ज्यादा मिली जिस से डर कर उस ने माफी मांगने में ही अपनी भलाई समझी.

लेकिन यह समस्या का हल नहीं है क्योंकि अश्लीलता लोगों के दिमाग में रहती है, उन लोगों के तो दिल में भी रहती है जो इस का विरोध करते रहते हैं. शायद ही नैतिकता के ये कांट्रेक्टर बता पाएं कि वे ऐसे अश्लील कंटैंट देखते ही क्यों हैं.

Hindi Kahani : अधिक्रमण – प्रिया सुनील की कौन सी बात से नाराज थी

Hindi Kahani : ‘‘देखो प्रिया, मैं ने तो हां कर दी,’’ सुनील ने कौफी में चीनी डाल कर चम्मच से हिलाते हुए कहा, ‘‘अब तुम्हारी हां का इंतजार है. कह दो न.’’

‘‘इस में कहना क्या है, मेरी भी हां है,’’ बिना ध्यान दिए सुनील का प्याला उठाते हुए प्रिया ने कहा, ‘‘तुम मेरी मजबूरी जानते तो हो.’’

‘‘भई वाह, पत्नी हो तो ऐसी,’’ सुनील ने हंस कर कहा, ‘‘मैडम, अभी तो आप ने मेरे प्याले पर अधिकार किया है, कल को मेरी जेब पर अधिकार जमा लेंगी और फिर मेरे समूचे जीवन पर तो होगा ही.’’

‘‘क्या मैं ने तुम्हारा प्याला उठा लिया,’’ प्रिया ने आश्चर्य से कहा, ‘‘ओह हां, पता नहीं क्या सोच रही थी.  लो, तुम्हारा प्याला वापस किया.’’

‘‘धन्यवाद,’’ सुनील मुसकराया, ‘‘तो हम तुम्हारी समस्या के बारे में सोच रहे थे.’’

‘‘अब समस्या मेरी है. कुछ मुझे ही सोचना पड़ेगा,’’ प्रिया ने गहरी सांस ले कर कहा.

‘‘बहनजी,’’ सुनील चिढ़ाने के लिए अकसर प्रिया को बहनजी कहता था, ‘‘हर समस्या का कोई न कोई समाधान अवश्य होता है.’’

‘‘तो मां का क्या करूं? पिताजी की असमय मौत के बाद वह मेरे ऊपर पूरी तरह निर्भर हैं,’’ प्रिया ने मेज पर कोहनी टिका कर कहा, ‘‘मैं उन्हें छोड़ नहीं सकती, सुनील.’’

‘‘तो मां को साथ ले आओ,’’ सुनील हंसा, ‘‘इस से बढ़ कर और दहेज क्या हो सकता है.’’

‘‘यह हंसी की बात नहीं है,’’ प्रिया ने गंभीरता से कहा, ‘‘उस घर के साथ मां की इतनी यादें जुड़ी हैं कि वह कभी भी घर छोड़ने को तैयार नहीं होंगी. दूसरी बात, अगर मां हमारे साथ रहने को तैयार हो भी गईं तो क्या तुम्हारे घर वाले इसे कभी स्वीकार करेंगे?’’

‘‘मेरे लिए तो कोई समस्या ही नहीं है,’’ सुनील ने कहा, ‘‘मातापिता तो सांसारिक दुनिया को त्याग कर ऋषिकेश के एक आश्रम में रहते हैं. एक बड़ा भाई है जो शादी कर के चेन्नई में रहने लगा है. मैं अपनी मरजी का मालिक हूं.’’

अचानक प्रिया की आंखों में चमक आ गई, ‘‘तुम मेरी मां से मिलोगे? शायद उन्हें समझा पाओ.’’

सुनील ने मुसकरा कर पूछा, ‘‘बताओ, उन्हें पटाने का कोई नुस्खा है क्या?’’

‘‘शरम करो, अपनी सास के लिए क्या कोई ऐसे कहता है,’’ प्रिया को हंसी आ गई.

‘‘तो फिर कब आना है?’’ सुनील ने पूछा.

‘‘पहले मां से बात कर लूं फिर तुम्हें बता दूंगी.’’

घंटी बजने पर जब दरवाजा खुला तो सुनील चौंक गया. प्रिया ने आज तक उसे यह नहीं बताया था कि घर में बड़ी बहन भी है. बिलकुल प्रिया की शक्ल की.

‘‘नमस्ते, दीदी,’’ सुनील ने कहा, ‘‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं?’’

‘‘हांहां, आओ न, तुम्हारा ही तो इंतजार था,’’ मां ने मुसकरा कर कहा, ‘‘मैं प्रिया की मां हूं.’’

बिलकुल कल्पना से परे, वह एकदम चुस्तदुरुस्त और स्मार्ट लग रही थीं. सुनील ने सोचा था कि मां तो वृद्धा होती हैं. उन के चेहरे पर बुढ़ापा झलक रहा होगा. पर यहां तो सबकुछ उलटा था. मां ने आधुनिक स्टाइल के कपड़े पहने हुए थे. और उन की आंखों में हंसी नाच रही थी.

प्रिया उन के पीछे खड़ी हो शरारत से मुसकरा रही थी, ‘‘जब भी हम दोनों बाजार जाते हैं तो सब हमें बहनें ही समझते हैं. तुम भी धोखा खा गए.’’

सोफे पर बैठते हुए सुनील ने शिकायत की, ‘‘प्रिया, तुम्हें मुझे सतर्क कर देना चाहिए था.’’

‘‘तो फिर क्या करते?’’ प्रिया ने पूछा.

‘‘अरे, मांजी के लिए विदेशी परफ्यूम लाता. साथ में कोई और अच्छा सा उपहार लाता.’’

‘‘ठीक है, तुम मां से बातें करो,’’ प्रिया ने कहा, ‘‘मैं चाय बना कर लाती हूं.’’

कुछ ही देर में सुनील मां से घुलमिल गया. अपने बारे में पूरी जानकारी दी और प्रिया से शादी करने की इच्छा भी जता दी.

‘‘मुझे तो कोई आपत्ति नहीं है,’’ मां ने सहजता से कहा, ‘‘प्रिया ने तुम्हारे बारे में इतना कुछ बता दिया है कि तुम बिलकुल अजनबी नहीं लगे.’’

‘‘तो आप ने मुझे पसंद कर लिया?’’ सुनील ने द्विअर्थी संवाद का सहारा लिया.

‘‘प्रिया की पसंद मेरी पसंद,’’ मां ने भी नहले पर दहला मारा.

सुनील ने प्रिया से आते ही कहा, ‘‘मांजी तो राजी हैं.’’

मां के गले में बांहें डाल कर प्रिया ने पुलकित स्वर में कहा, ‘‘मां, तुम हमारे साथ आ कर रहोगी न?’’

‘‘तुम्हारे साथ?’’ मां ने आश्चर्य से कहा, ‘‘तुम्हारे साथ क्यों रहूंगी?’’

‘‘क्यों, सुनील ने कहा नहीं कि दहेज में मुझे मां चाहिए,’’ प्रिया ने हंसते हुए कहा.

‘‘ऐसी तो हमारे बीच कोई बात नहीं हुई,’’ मां ने कहा.

आत्मीयता से मां का हाथ अपने हाथों में लेते हुए सुनील बोला, ‘‘अरे मां, शादी के बाद आप अकेली थोड़े ही रहेंगी. आप साथ रहेंगी तो प्रिया को भी तसल्ली रहेगी.’’

‘‘साथ रहने में मुझे कोई एतराज नहीं,’’ मां ने थोड़ा हिचकिचा कर कहा, ‘‘लेकिन तुम्हारे घर में…’’

‘‘ओह मां, एक ही बात है,’’ सुनील ने समझाया, ‘‘हम तीनों एकसाथ मेरे घर में रहें या इस घर में, क्या फर्क पड़ता है?’’

तुम्हारे घर में रहना अच्छा नहीं लगेगा,’’ मां ने कहा, ‘‘लोग क्या कहेंगे?’’

थोड़ी देर की बहस के बाद सुनील ने मां को इतना राजी कर लिया कि वह शादी के बाद सुनील के घर कुछ समय रह कर देखेंगी अगर मन नहीं लगा तो सब यहां आ जाएंगे.

बिना धूमधाम के कोर्ट में शादी हो गई. सुनील का घर व कमरा मां ने खुद सजाया था. लगता था सजावट करने में उन्हें विशेष रुचि थी. घर पूरी तरह से मां ने संभाल लिया था.

एक सप्ताह बाद सुनील और प्रिया को अपनेअपने कार्यालय जाना था. प्रिया का दफ्तर सुनील के दफ्तर से अधिक दूर नहीं था. बीच में एक दक्षिण भारतीय रेस्तरां था जहां दोनों का परिचय, दोस्ती व प्रणयलीला का आरंभ हुआ था. उन के जीवन में इस रेस्तरां का विशेष स्थान था.

नाश्ता करने के बाद मां ने दोनों को अपनाअपना टिफनबाक्स पकड़ा दिया.

‘‘आप जितनी अच्छी हैं उतनी ही पाक कला में भी निपुण हैं,’’ सुनील ने टिफनबाक्स लेते हुए कहा, ‘‘मुझे अगर पहले पता होता तो शादी के मामले में इतनी देर न लगाता. यह सारी गलती आप की बेटी की है.’’

प्रिया ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा, ‘‘तुम तो शादी करने को ही राजी नहीं थे. कहते थे न कि ऐसे ही साथ क्यों नहीं रहते?’’

मां ने हंस कर कहा, ‘‘अरेअरे, लड़ो मत. जो कुछ इतने दिनों में तुम ने खोया है वह सब मैं पूरा कर दूंगी.’’

‘‘बहुत चटोरे हैं मां, इन्हें ज्यादा मुंह न लगाओ,’’ प्रिया ने इठला कर कहा, ‘‘अब चलो भी.’’

मां उन्हें जाते हुए देखती रहीं. कहां गए वे दिन जब वह इसी तरह अपने पति को विदा करती थीं. उन के जाने के बाद वह घर की सफाई में लग गईं.

दिन में 2 बार फोन कर के सुनील ने मां से बात कर ली. मां को अच्छा लगा. प्रिया को तो अकसर समय ही नहीं मिलता था और अगर फोन करती भी थी तो केवल अपने मतलब से.

मोटरसाइकिल की आवाज सुनते ही मां ने दरवाजा खोला और दोनों का हंस कर स्वागत किया.

सुनील ने देखा कि मां भी एकदम तरोताजा लग रही थीं. अच्छी साड़ी के साथ हलका सा शृंगार कर लिया था. प्रिया की ओर देखा तो वह दफ्तर से हारीथकी आई थी. बालों की लटें बिखर रही थीं. चेहरे का रंग किसी बरतन की कलई की तरह उतर रहा था.

एक दिन सुनील मां से कह बैठा, ‘‘मां, आप प्रिया को अपनी तरह स्मार्ट रहना क्यों नहीं सिखातीं?’’

प्रिया चिढ़ गई और नाराज हो कर अपने कमरे में चली गई.

थोड़ी देर तक कमरे में से सुनील और प्रिया के बीच झगड़ने की आवाजें आती रहीं.

मां ने आवाज लगाई, ‘‘अरे भई, जल्दी से बाहर आओ. मैं गरमागरम पालक की पकौडि़यां बना रही हूं. बैगन की पकौड़ी भी तो तुम्हें अच्छी लगती हैं. वह भी काट रखा है.’’

सुनील उत्साह से बाहर आया, ‘‘लो, मैं आ गया. मांजी, आप ने तो मेरी कमजोरी पकड़ ली है. वाहवाह, साथ में धनिए की चटनी भी है.’’

हाथमुंह धो कर प्रिया भी बाहर आ गई. उस का क्रोध ठंडा हो गया था लेकिन मुंह फूला हुआ था.

‘‘खाओखाओ,’’ सुनील ने कहा, ‘‘प्रिया, तुम भी मांजी के कुछ गुण सीख लो.’’

‘‘मुझे आता है. वह तो मां ही किचन में नहीं घुसने देतीं.’’

‘‘अरे, अभी बच्ची है,’’ मां ने मुसकरा कर कहा, ‘‘और जब तक मैं हूं उसे कुछ करने की जरूरत क्या है?’’

‘‘मां, मुझे क्षमा करो. मैं भूल गया था. नजरें कमजोर हो गईं लगता है,’’ सुनील ने विनोद से प्रिया को ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, ‘‘सच ही तो, प्रिया अभी बच्ची है.’’

सुनील रोज सुबहशाम मां की प्रशंसा करते नहीं थकता था. लेकिन इस बीच परिस्थिति कुछ ऐसी हो गई कि प्रिया को अंदर से बुरा लगने लगा. फिर भी वह चुप रह कर झगड़ा अधिक न बढ़े इस की चेष्टा करती थी.

एक दिन जब प्रिया नहा कर बाथरूम से बाहर आई तो देखा सुनील मां की गोद में सिर रख कर लेटा हुआ था और मां उस के ललाट पर बाम लगा रही थीं. यह देख कर वह चकित रह गई.

इस बीच मां ने मुसकरा कर सुनील से पूछा, ‘‘कैसा लग रहा है?’’

‘‘बहुत अच्छा,’’ सुनील ने उठने की चेष्टा की.

‘‘लेटे रहो. आराम करो,’’ मां ने उठते हुए कहा, ‘‘प्रिया, एक प्याला गरम चाय बना दे. थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा.’’

‘‘सिर में दर्द था तो मुझ से क्यों नहीं कहा?’’ प्रिया ने शिकायत की, ‘‘मां को नाहक कष्ट दिया. मां, आप ही चाय बना दो. मैं यहां बैठी हूं.’’

कुछ दिनों से प्रिया महसूस कर रही थी कि मां अब छोटेमोटे कामों के लिए उसे ही दौड़ा देती थीं जबकि पहले सारे काम खुद ही करती थीं, उसे हाथ तक नहीं लगाने देती थीं. कहीं मां से ईर्ष्या तो नहीं होने लगी उसे?

एक दिन उत्साह से सुनील ने कहा, ‘‘चलो, आज दिल्ली हाट चलते हैं. दक्षिण की हस्तकला की प्रदर्शनी है और विशेष व्यंजनों के स्टाल भी लगे हैं.’’

मां ने खुश हो कर कहा, ‘‘हांहां चलो. मेरी तो बहुत इच्छा थी ऐसी प्रदर्शनियां देखने की पर क्या करूं, अकेली जा नहीं सकती और कोई अवसर भी नहीं मिलता.’’

‘‘चलो, प्रिया, झटपट तैयार हो जाओ,’’ सुनील ने आग्रह किया.

प्रिया ने सोचा कि अगर वह नहीं जाएगी तो कोई नहीं जाएगा. इसलिए उस ने कह दिया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है, मैं नहीं जाऊंगी.

‘‘अरे, चल भी,’’ मां ने कहा, ‘‘बाहर चलेगी तो तबीयत ठीक हो जाएगी.’’

‘‘नहीं मां, सारे बदन में दर्द हो रहा है. मैं तो कुछ देर सोऊंगी,’’ प्रिया ने सोचा दर्द की बात सुन कर सुनील कोई गोली खिलाएगा या डाक्टर के पास चलने को कहेगा.

‘‘तो ऐसा करो,’’ सुनील ने कहा, ‘‘तुम आराम करो. मैं मां को ले जाता हूं. वैसे भी मोटरसाइकिल पर 2 ही लोग बैठ सकते हैं.’’

‘‘ठीक है, प्रिया. तू आराम कर,’’ मां ने कहा और तैयार होने चली गईं. प्रिया आश्चर्य से उन्हें देखती रह गई. मां को क्या हो गया है?

कुछ देर बाद मां और सुनील अपनेअपने कमरों से तैयार हो कर बाहर आ गए. आश्चर्य से आंखें फाड़ कर वह दोनों को देख रही थी. मां ने सुनील की दी हुई साड़ी पहन रखी थी. गले और कानों में आभूषण भी थे. लिपस्टिक व पाउडर का भी इस्तेमाल किया था. बगल में छिड़के मादक परफ्यूम से कमरा महक रहा था.

‘‘हाय, हम चलते हैं, अपना खयाल रखना,’’ सुनील ने चलते हुए कहा.

‘‘ठीक है प्रिया, फ्रिज में खिचड़ी रखी है. उसे गरम कर के जरूर खा लेना और आराम करना,’’ मां ने बिना मुड़े कहा.

उन के जाने के बाद प्रिया बहुत देर तक सूनी आंखों से छत को देखती रही और फिर जब अपने पर नियंत्रण न कर पाई तो सिसकसिसक कर रोने लगी. लगता है मां और सुनील के बीच चक्कर चल रहा है. मां कोई इतनी बूढ़ी तो हुई नहीं हैं…इस के आगे प्रिया बस, यही सोच सकी कि क्या यह उस के अधिकारों पर अधिक्रमण है? प्रिया ने सोचा, चलो, मां के व्यवहार का कोई कारण था तो सुनील को क्या हो गया? शादी उस से और प्यार मां से? नहीं, समस्या और परिस्थिति दोनों पर अंकुश लगाना पड़ेगा.

वे लौट कर आए तो बहुत खुश थे. सुनील मां का बारबार हाथ पकड़ लेता था और मां की ओर से कोई आपत्ति भी उसे नजर नहीं आई. इस खुलेआम प्रेम प्रदर्शन को देख कर उस का मन और भी दुखी हो उठा.

‘‘सच प्रिया, बहुत मजा आया. अच्छा होता तुम भी साथ चलतीं. दक्षिण भारतीय खाना तो बड़ा ही स्वादिष्ठ था,’’ सुनील ने हंस कर कहा, ‘‘चलो, फिर सही.’’

मां स्वयं विस्तार से मौजमस्ती का बखान कर रही थीं.

सब अपनीअपनी हांक रहे थे. किसी ने उस से यह तक नहीं पूछा कि उस की तबीयत कैसी है. उस ने कुछ खाया भी या नहीं. क्रोध से प्रिया अंदर ही अंदर उबल रही थी. सोचा, नहीं, यह तमाशा वह और नहीं चलने देगी.

बहुत रात हो गई थी. प्रिया मुंह ढक कर लेटी जरूर थी पर उसे नींद नहीं आ रही थी.

‘‘क्या बात है, प्रिया,’’ सुनील ने पूछा, ‘‘कोई तकलीफ है क्या?’’

‘‘हां, है,’’ प्रिया बिफर पड़ी, ‘‘मां को अपने घर जाना होगा. तुम दोनों का नाटक अब और अधिक बरदाश्त नहीं होता.’’

‘‘यह अचानक तुम्हें क्या हो गया,’’ सुनील ने पूछा. वैसे वह सब समझ रहा था. मां के प्रति वह आकर्षित तो हो गया था, लेकिन कुछ अपराधबोध भी था. इस संकट से उबरना होगा.

‘‘तुम सब समझ रहे हो, इतने मूर्ख नहीं हो,’’ प्रिया ने क्रोध से कहा, ‘‘मां को किसी भी तरह उन के घर छोड़ आओ.’’

‘‘लेकिन साथ रखने की शर्त तो तुम्हारी थी,’’ सुनील ने कहा.

‘‘वह मेरी भूल थी,’’ प्रिया ने कटुता से पूछा, ‘‘तुम मेरे साथ क्या खेल खेल रहे हो? मां को क्यों बहका रहे हो?’’

सुनील उठ कर बैठ गया, ‘‘सुनना चाहती हो तो सुनो. मैं ने मां को हमेशा मां की नजरों से ही देखा है. अगर मेरी मां यहां होतीं तो भी मैं ऐसा ही करता. अभी तक मैं ने कोई अनुचित सोच उन के प्रति मन में कायम ही नहीं की है.’’

‘‘यह तुम कह रहे हो? निर्लज्जता की भी कोई हद होती है,’’ प्रिया ने क्रोध से कहा.

‘‘मैं चाहता था कि तुम अच्छे कपड़े पहनो, ठीक शृंगार करो, स्मार्ट दिखो, लेकिन दिन पर दिन तुम लापरवाह होती गईं, मानो शादी कर ली तो जीवन का लक्ष्य पूरा हो गया. अरे, शादी के पहले भी तो तुम अच्छीखासी थीं,’’ सुनील ने कहा.

‘‘नहीं करता मेरा मन तो…’’ प्रिया का वाक्य अधूरा रह गया.

‘‘वही तो. मेरी कितनी तमन्ना थी कि साथ चलो तो नईनवेली पत्नी लगो, कोई नौकरानी नहीं,’’ सुनील ने कहा, ‘‘और इसीलिए मैं ने यह नाटक किया कि ईर्ष्या के मारे तुम सही दिखने की कोशिश करो, लेकिन तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आया.’’

प्रिया काफी देर तक चुप रही. फिर उस ने पूछा, ‘‘सुनील, तुम सच बोल रहे हो या मुझे बेवकूफ बना रहे हो.’’

‘‘सच, एकदम सच,’’ सुनील ने प्रिया को पास खींचा. मां पानी पीने कमरे से बाहर आई थीं. बेटी और दामाद की बातें कानों में पड़ीं. सुना और चुपचाप दबेपांव अपने कमरे में चली गईं. अगले दिन बहुत स्वादिष्ठ नाश्ता परोसते हुए मां ने मुसकरा कर कहा, ‘‘यहां रहते बहुत दिन हो गए हैं. अब मुझे जाना पड़ेगा.’’

‘‘क्यों, मां?’’ प्रिया ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘अकेली कैसे रहोगी?’’

‘‘आदत तो डालनी पड़ेगी न बेटी,’’ मां ने कहा, ‘‘और फिर तुम लोग तो आतेजाते रहोगे. है न बेटे?’’ प्रिया ने सुना. आज मां ने पहली बार सुनील को बेटा कह कर संबोधन किया था.

Hindi Story : बाहरवाली – हर रोज बुआ घर क्यों आ जाती थी दुखड़ा सुनाने

Hindi Story : बूआ का दुखड़ा सुनना मेरी दिनचर्या में शामिल था. रोज दोपहर में वे भनभनाती हुई चली आतीं और रोना ले कर बैठ जातीं, ‘‘क्या बताऊं सुधा, बेटों को पालपोस कर कितने जतन से बड़ा करो और बहुएं उन्हें ऐसे छीन ले जाती हैं जैसे सब उन्हीं का हो. अरे, हम तो जैसे कुछ हैं ही नही.’’

‘‘आप ने तो जैसे कभी किसी को पलापलाया छीना ही नहीं है, क्यों बूआ?’’ मेरे पति ने अकारण ही हस्तक्षेप कर दिया, ‘‘आप की तीनों बेटियां भी तो किन्हीं के पलेपलाए छीन कर बैठी हैं.’’

मैं ने आंखें तरेर कर पति को मना करना चाहा, मगर अखबार एक तरफ फेंक वे बोलते ही चले गए, ‘‘मेरी मां भी कहती हैं, शादी के बाद मैं सुधा का ही हो कर रह गया हूं. अब तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूं? समझ में नहीं आता, जब बहुओं से इतनी ही जलन होती है तो उन्हें तामझाम के साथ घर लाने की क्या जरूरत होती है?

‘‘बेटे की शादी करने से पहले हर मां को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि अब उसे बेटा किसी और को सौंपना है, जैसे लड़की के मांबाप सोच लेते हैं. एक नया घर बनता है बूआ, लड़के पर जिम्मेदारी पड़ती है. वह भी कई रिश्तों में बंट जाता है. ऐसे में मां का यह सोचना कि वह अभी भी दुधमुंहा बच्चा बन उस का पल्लू थामे ‘राजा बेटा’ ही बना रहे तो यह उस के प्रति अन्याय होगा.’’

‘‘न, न सुधीर, मां का पल्लू क्यों पकड़े बेचारा राजा बेटा, वह हूर जो मिल गईर् है, पल्लू देने को,’’ बूआ ने हाथ झटक दिया.

मैं विषय उलझाना नहीं चाहती थी पर लाख इशारों के बाद भी पति मान नहीं रहे थे. वे बोले, ‘‘हूर लाता कौन है, तुम्हीं तो ठोकबजा कर, सैकड़ों लड़कियां देख अपनी बहू लाई थीं. फिर रोजरोज बहू का रोना ले कर क्यों बैठ जाती हो. उसे आए 2 महीने ही तो हुए हैं. नईनई शादी हुई है, तुम्हें तो बहू को लाड़प्यार से अपने काबू में रखना चाहिए. कभी तुम भी तो किसी की बहू बनी थीं.’’

‘‘लाड़प्यार करे मेरी जूती, मैं पीछेपीछे घूमने वालों में से नहीं हूं. देख सुधीर, मुझे विशू का उस की ससुराल वालों से ज्यादा मेलजोल पसंद नहीं है. 3 दिन से उस का छोटा भाई आया हुआ है. बाहर पढ़ता है न, इसलिए छुट्टियों में बहन के घर चला आया.’’

‘‘तो क्या हुआ, तुम भी 3-3 महीने अपनी बेटियों के घर रह आती हो. वह तो फिर भी छोटा भाई है.’’

‘‘वह…वह… मैं तो इलाज कराने…’’

‘‘इलाज कराने ही सही, पर दामाद ने भरपूर सेवा की, तुम स्वयं ही तो सुनाती रही हो. क्या तुम्हारा दामाद किसी

का पलापलाया बेटा नहीं है? तब तो तुम्हारी समधिन भी तुम्हारी तरह ही चीखतीचिल्लाती होगी?’’

‘‘सुधीर’’, बूआ का चेहरा फक पड़ गया. उन का चेहरा देख मुझे घबराहट होने लगी. मैं कभी बूआ की बातों को काटती नहीं थी. हमेशा यही सोचती, क्यों बुजुर्ग औरत का मन दुखाऊं. दो घड़ी मन हलका कर के भला वे मेरा क्या ले जाती हैं. परंतु पति का उन्हें आईना दिखा देना मुझे अनावश्यक सा लगा.

मेरे पति आगे बोले, ‘‘अपनी बेटी पराए घर में जा कर चाहे जो नाच नचाए, परंतु बहू का ऊंची आवाज में बात करना भी तुम्हें खलता है. अच्छा बूआ, घर में सुखशांति रखने का एक गुरुमंत्र लोगी मुझ से, बोलो?’’

बूआ कुछ न बोलीं, गुस्से से इन्हें घूरती रहीं.

पति बातें करते रहे, परंतु बूआ चली गईं. मुझे अच्छा नहीं लगा, मगर प्रत्यक्ष में मैं मौन ही रही. समय ने अतीत को पीछे धकेल दिया था, परंतु एक घाव सदा मेरे मानसपटल पर हरा रहा. चाहती तो पति को फटकार कर बूआ के अपमान पर नाराजगी प्रकट कर सकती थी, मगर ऐसा किया नहीं. शायद मैं भी बूआ को आईना दिखाना चाहती थी.

यही बूआ थीं जिन्होंने कभी सासुमां का पैर इस घर में जमने नहीं दिया था. मुझे अपनी सास निरीह गाय सी लगी थीं. पता नहीं क्यों, सासुमां ने मुझे कभी अपना नहीं समझा था. बूआ के सामने चुप रहने वाली सासुमां मेरे सामने शेरनी सी बन जाती थीं.

शायद अपने साथ हुए अन्याय का प्रतिकार सासुमां मुझ से लेना चाहती थीं. मुझ से मन की बात कभी न करतीं और जराजरा सी बात मेरे पति के कानों में जा डालतीं, जिस का प्रभाव अकसर हमारी गृहस्थी पर पड़ता. हम आपस में झगड़ पड़ते, जिस की कोई वजह हमारे पास होती ही नहीं थी.

एक शाम मायके से मेरे भाई की सगाई का पत्र आया तो मैं खुशीखुशी अम्मा को सुनाने दौड़ी. पर मेरी प्रसन्नता पर कुठाराघात हो गया. वे गुस्से से बोलीं, ‘बसबस, हमारे घर में मायके की ज्यादा चर्चा करने का रिवाज नहीं है.’

मैं अवाक रह गई और पति के सामने रो पड़ी, ‘इस घर में ब्याह दी गई, इस का अर्थ यह तो नहीं कि मेरा मायका समाप्त ही हो गया.’

उस दिन पहली बार पति को मां पर क्रोध आया था. मेरे मन में अम्मा के लिए संजोया सम्मान धीरेधीरे समाप्त होने लगा. यह सत्य है, अम्मा ने जो कुछ अपनी ससुराल से पाया था, वही मुझे लौटा रही थीं, मगर क्या यह न्यायसंगत था?

तब इन्होंने अम्मा से कहा था, ‘तुम्हें इस तरह नहीं करना चाहिए, अम्मा. तुम बबूल का पेड़ बो कर आम के फल की उम्मीद कैसे कर सकती हो? बिना वजह सुधा का मन दुखाओगी तो घर में सुखशांति कैसे रहेगी? इज्जत चाहती हो तो इज्जत देना भी सीखो, उस की खुशी में भी तो हमें खुश होना चाहिए.’

‘अरे’, विस्फारित आंखें लिए अम्मा मुझे यों घूरने लगीं मानो पति ने मेरी वकालत कर किसी की हत्या जैसा अपराध कर दिया हो. वे तुनक कर बोलीं, ‘यह कल की आई तुझे इतनी प्यारी हो गई, जो मुझे समझाने चला है. जोरू का गुलाम.’

उसी पल से अम्मा मेरी प्रतिद्वंद्वी बन गईं. कभी रुपए चोरी हो जाने का इलजाम मुझ पर लगता और कभी यह आरोप लगता कि मैं अपनी ननदों की पूरी देखभाल नहीं करती. धीरेधीरे पति ने हस्तक्षेप करना छोड़ दिया. 20

वर्ष बीत जाने पर भी अम्मा मुझे स्वीकार नहीं कर पाईं. पति पर जोरू का गुलाम होने का ठप्पा आज भी लगा है. अम्मा और मैं नदी के 2 किनारों की तरह जीते हैं.

मैं हैरान थी कि मेरी ननदों के घर में अम्मा का पूरा दखल है, मगर मेरे मायके से किसी का आना उन्हें पसंद नहीं. अम्मा, जो स्वयं बूआ और अपनी सास के दुर्व्यवहार से आजीवन अपमानित होती रहीं, क्यों मेरे मन की पीड़ा समझ नहीं पाईं? मैं उन के बेटे की पत्नी हूं, उन की प्रतिद्वंद्वी नहीं.

बूआ तो चली गईं, मगर अपने पीछे कड़वाहट का गहरा धुआं छोड़

गई थीं. पति बुरी तरह झल्ला रहे थे, ‘‘पता नहीं प्रकृति ने स्त्री को ऐसा क्यों बनाया है? 10-10 पुरुष एकसाथ  रह लेते हैं, लेकिन 2 औरतें जब भी साथ रहेंगी, अधिकारों को ले कर लड़ेंगी, विशेषकर अपना बेटा, बहू के साथ बांटने में औरत को बड़ी तकलीफ होती है.’’

‘‘हर घर में तो ऐसा नहीं होता,’’ मैं ने उन्हें टोका.

‘‘हां, सच कहती हो. 10 प्रतिशत घर ऐसे होंगे, जहां सासबहू में तालमेल होता होगा, वरना 90 प्रतिशत तो ऐसे ही हैं, जिन में अमनचैन नहीं है. सास अच्छी है तो बहू नकचढ़ी और कहीं बहू सेवा करने वाली हो, तो सास मेरी मां और बूआ जैसी.

‘‘सत्य तो यह है कि झगड़ा होता ही नहीं, सिर्फ उसे पैदा किया जाता है. भई, सीधी सी बात है, बेटा काबू में रखना हो तो बहू को वश में करो, उस से प्रेम करो, वह वश में रहेगी तो बेटा भी पीछेपीछे खिंचा चला आएगा.’’

‘‘और पति को वश में रखना हो तो क्या बहू को सास को वश में रखना चाहिए, ताकि बेटा, बहू के वश में रहे?’’ मेरी इस बात पर पति हंस पड़े, ‘‘नहीं, ऐसा नहीं है. बहू बाहर से आती है, उसे विश्वास में लेना ज्यादा जरूरी होता है. बेटा तो अपना ही होता है, उस से इतना प्यार बढ़ाने की भला क्या जरूरत होती है.

‘‘मजा तो तब है जब पराई को अपना बनाओ. मगर होता उलटा है. शादी कर के सास अकसर असुरक्षा से घिर जाती है, बेटे पर हाथ कसने लगती है और बस, यहीं से झगड़ा शुरू हो जाता है.’’

‘‘यह सब अपनी अम्मा से भी कहा है कभी?’’

‘‘नहीं कह पाया न, इसीलिए तुम्हें समझा रहा हूं. आने वाले कुछ वर्षों में तुम भी तो सास बनने वाली हो, कुछ समझीं?’’

मैं क्या कहती, सिर्फ हंस कर रह गई कि कौन जाने जब सास बनूंगी, तब मैं कैसी हो जाऊंगी. कहीं मैं भी अपनी बहू को वही न परोसने लगूं, जो मुझे मिलता रहा था.

Emotional Story : कैक्टस के फूल – सावित्री रघुबीर को क्यों डांटती थी

Emotional Story : इंसुलिन ही अब उन की जिंदगी की डोर थी. वैसे भी अब तो सावित्री के साथ जीने की लालसा ने इस कष्ट को सामान्य कर दिया था. उन की इस सिसकारी पर सावित्री ने कहा, ‘‘इतने सालों से इंजेक्शन ले रहे हो, पर सिसकारी भरना नहीं भूले. कोई छोटे बच्चे तो हो नहीं, जो इंजेक्शन लगते ही सिस्स…सिस्स… करने लगते हो.’’

‘‘सावित्री, तुम्हें मैं बड़ा लगता हूं?’’  रघुबीर ने हमेशा की तरह सावित्री से॒कहा.

अब उन के लिए तो सावित्री ही सर्वस्व थीं. एक मित्र, साथी और प्रेमी. हां प्रेमी भी. इसीलिए तो…जबजब सावित्री चश्मा चढ़ी अपनी आंखों को फैला कर इंजेक्शन भरने लगतीं, रघुबीर एकटक उन के चेहरे को ताकते रहते और जब वह इंजेक्शन लगातीं, रघुबीर सिसकारी जरूर भरते. सावित्री को पता था रघुबीर ऐसा जानबूझ कर करते हैं. फिर भी वह यह जरूर कहतीं, ‘‘सच में इंजेक्शन से बहुत दर्द होता है?’’

इस के बाद रघुबीर के ‘न’ के साथ शुरू हुआ संवाद सावित्री की जिंदगी की डोर था.

दसदस साल बीत गए थे रघुबीर और सावित्री को इस वृद्धाश्रम में आए. यहां पहला कदम रखने का दुख अब हृदय के किसी कोने में दब कर रह गया था. जब ये आए थे, तब दोनों के पैर साथ चलते थे और अब हृदय की धड़कन भी साथ चलने लगी थी. जैसे एक की थम जाएगी तो दूसरे की भी.

‘‘मैं भी बैठ जाऊं?’’ सावित्री ने पार्क में लगे झूले पर बैठे रघुबीर से पूछा. पर रघुबीर का ध्यान तो कहीं और था. वह सामने रखे गमले में लगे कैक्टस को एकटक ताक रहे थे.

‘‘मैं भी बैठ जाऊं यहां?’’ सावित्री ने दोबारा पूछा. इस बार भी कोई जवाब नहीं मिला तो सावित्री झूले पर बैठ गईं. थोड़ी देर झूले के साथ मौन भी झूलता रहा. उस ने अचानक पैरों को जमीन पर रख कर झूले को रोक कर पूछा, ‘‘आप केवल कैक्टस को ही क्यों देखते हैं?’’

‘‘मुझे लगता है इस जीवन में मैं ने कैक्टस ही बोए हैं, इसीलिए कैक्टस मुझे अच्छा लगता है. शायद इसी वजह से यहां हूं भी.’’ अचानक झूले के रुकने से रघुबीर जैसे नींद से जगे थे.

‘‘कैक्टस में भी फूल खिलते हैं. हो सकता है यह आश्रम भी तुम्हारे लिए कैक्टस बन जाए.’’ सावित्री ने आशावादी विचार व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘कभीकभी कैक्टस से भी संबंध की शुरुआत हो सकती है.’’

रघुबीर जब से इस आश्रम में आए थे, उन के चेहरे पर उदासी छाई रहती थी. आश्रम में रहने वालों से भी वह बहुत कम बातचीत करते थे. हमेशा अकेले ही बैठे रहते थे. एक दिन रात के 2 बजे सावित्री ने झूले पर बैठे देखा. शायद उस आश्रम में सावित्री ही एक ऐसी थीं, जिन से रघुबीर कभीकभार दोचार बातें कर लिया करते थे. सावित्री ने उन के पास जा कर पूछा, ‘‘इस समय यहां क्या कर रहे हो?’’

‘‘नींद नहीं आ रही थी, इसलिए यहां आ कर बैठ गया.’’ रघुबीर ने जवाब में कहा.

‘‘नींद क्यों नहीं आ रही?’’ सावित्री ने पूछा. शायद वह उन से बातें करना चाहती थीं.

‘‘हर चीज की वजह नहीं होती.’’

‘‘होती तो है. बस हम जानना नहीं चाहते.’’ सावित्री ने रात की हवा में मिली नमी जैसी आवाज में कहा, ‘‘आप अपने मन की बात कह दीजिए, इस से मन हलका हो जाएगा. बात सुन लेने के बाद शायद मैं वजह खोज सकूं.’’

‘‘मैं मेजर डिप्रेशन का रोगी नहीं था.’’ रघुबीर ने रात को खुले आकाश में फैले अनगिनत सितारों को ताकते हुए कहा.

‘‘तो..?’’ सावित्री ने छोटा सा सवाल किया. उन्होंने डिप्रेशन शब्द न सुना हो, ऐसा नहीं था. सावित्री अध्यापिका थीं. स्वभाव से आशावादी. हर परिस्थिति को मुसकराते हुए स्वीकार करती थीं. सावित्री के इस सवाल से रघुबीर उत्तेजित हो कर बोले, ‘‘तो क्या… तो यह कि इसी बीमारी की वजह से आज मैं यहां इस वीरान वृद्धाश्रम में हूं. मैं ने अपने पोते पर हाथ उठा दिया था और जानती हो क्यों?’’ कहते हुए रघुबीर का शरीर कांप रहा था. आंखें चौड़ी और लाल हो गई थीं. उन की आंखों में ठहरी बातें पाला तोड़ कर बह रही थीं.

‘‘केवल…उस से मेरे इंसुलिन की सीरिंज टूट गई थी. मैं…मैं अभी भी उस दृश्य को देख रहा हूं, क्योंकि वह दृश्य मेरी आंखों के सामने नाचता रहता है. वह दृश्य मेरा पीछा नहीं छोड़ता.

उसी की वजह से बेटे ने मुझे अस्पताल में भरती कराया और अस्पताल से सीधे इस वीरान आश्रम में छोड़ गया. मैं ने अपने पोते पर हाथ उठाया?’’ रघुबीर ने यह अंतिम वाक्य इस तरह कहा, जैसे खुद से ही सवाल कर रहे हों. इतना कहतेकहते उन की सांस फूलने लगी थी.

उन्होंने एक लंबी सांस ले कर आगे कहा, ‘‘वह मेरा कितना खयाल रखता था, मेरे साथ कितना खुश रहता था. अपनी दादी के जाने के बाद वही एक सहारा था मेरा. मेरी लाठी था.

आप को पता है, वह रोजाना मेरे साथ मंदिर जाता था. मेरे पास बैठ कर होमवर्क करता था. कोई भी बात होती ‘दादाजी… दादाजी’ कह कर पहले मुझे बताता और मैं ने? मैं ने यह क्या किया? उस की दादी का खालीपन मुझे खा गया. अकेलापन मुझ से सहन नहीं हुआ.’’

इतना कह कर रघुबीर रोने लगे. सावित्री ने भी उन्हें रोने दिया. उन्हें तब तक देखती और उन की बातें सुनती रहीं, जब तक रघुबीर के मन की भड़ास न निकल गई. किसी को इस तरह सुनना भी एक कला है. यह कला सब के पास नहीं होती.

उस रात के बाद सावित्री रघुबीर का खयाल ही नहीं रखने लगीं, बल्कि हर तरह से उन की देखभाल भी करने लगीं. वह उन की देखभाल में कोई कसर नहीं रखती थीं. रोजाना याद कर के उन की दवाएं देना, इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना, सब वही करतीं. दोनों साथ बैठ कर भगवदगीता का पाठ करते, उस का अर्थ समझने के लिए दोनों साथसाथ लंबे समय तक पार्क में टहलते हुए चर्चा करते.

कभीकभी बातों में विरोधाभास होता तो ‘तुम ही सच्चे हो, मैं गलत हूं.’ पर बात खत्म हो जाती. इस तरह दोनों में रसीला झगड़ा भी होता. इस तरह सालों बाद रघुबीर के लिए अब यह वीरान आश्रम रंगबिरंगा, फूलों से हराभरा लगने लगा था.

एक दिन सावित्री का बेटा उन से मिलने आया. उस ने मां से घर चलने को कहा, पर वह घर जाने को राजी नहीं हुईं. उस समय रघुबीर को पता चला कि सावित्री स्वेच्छा से आश्रम में रहने आई थीं. वह तो अपने गांव में ही रहना चाहती थीं, पर उन का बेटा गांव का सब कुछ बेच कर शहर में रहना चाहता था. सावित्री सादगी से जीने की आदी थीं, इसलिए उन्होंने बेटे से कहा था, ‘‘मैं वृद्धाश्रम में रहूंगी.’’

बेटे और बहू ने बहुत समझाया कि समाज में उन की बड़ी बदनामी होगी, पर वह नहीं मानीं और वृद्धाश्रम में रहने आ गई थीं. एकांत उन की प्रवृत्ति थी. वह रहती भी एकांत में ही थीं.

पर सावित्री और रघुबीर को कहां पता था कि वृद्धाश्रम में आने के बाद उन्हें एक साथी मिल जाएगा, जिस से निरंतर बातें की जा सकेंगी, नाराज भी हुआ जा सकेगा और मनाया भी जा सकेगा. इतने सालों से साथ रहतेरहते उन के बीच सात्विक प्रेम का सेतु बंध गया था. दोनों एक बार फिर युवा हो गए थे. उन में फिर से प्रेम हो गया था और जिंदगी एक बार फिर से प्रेममय हो गई थी. प्रेम तो कभी भी कितनी भी बार हो सकता है. पर प्रेम व्यक्ति से नहीं, उस के व्यक्तित्व से होता है.

रघुबीर कभी फूल तोड़ कर सावित्री को देते तो कभी कोई माला बना कर जूड़े में लगाते थे. यह सब करने में वह जरा भी नहीं शरमाते थे. उसी तरह सावित्री भी प्रेमभाव से यह सब स्वीकार करतीं. ऐसा करते हुए वे सहज हंस भी देते. इतना ही नहीं, अब दोनों एक ही थाली में साथसाथ खाना खाने लगे थे. ऐसे में एकदूसरे को खिला भी देते. बस, एक ही कौर में पेट भर जाता.

उन दोनों के प्रेम को देख कर वृद्धाश्रम के लोग तरहतरह की बातें करने लगे थे. पर उन की बातों पर न सावित्री ध्यान दे रही थीं और न रघुबीर. दोनों खुद में ही मस्त थे. लोग कहते, ‘इस उम्र में इन्हें यह सब करते शर्म भी नहीं आती. जिस उम्र में भगवान का नाम लेना चाहिए, इन्हें देखो, ये प्रेम गीत गा रहे हैं.’

शायद उन लोगों को सावित्री और रघुबीर जो कर रहे थे, उस बात पर गुस्सा नहीं था, उन्हें उन दोनों का साथ रहना खल रहा था. उन्हें इस बात तक की ईर्ष्या थी कि उन के साथ ऐसा क्यों नहीं है.

इसी ईर्ष्या की वजह से एक बार सावित्री और रघुबीर की जिंदगी में कैक्टस उग आया था. उन लोगों ने संचालक से शिकायत की कि इस उम्र में ये दोनों यह क्या तमाशा कर रहे हैं? एक वृद्ध ने तो कहा कि अगर किसी ने इन दोनों को एक साथ देख लिया तो आश्रम को लोग जो चंदा देते हैं, देना बंद कर देंगे.

इन्हीं लोगों की बातों में आ कर संचालक ने रघुबीर और सावित्री को फोन कर के सारी बात बताई. रघुबीर के घर से तो कोई जवाब नहीं आया, कहा गया कि आप को उन के बारे में जो निर्णय लेना हो, लीजिए.

हम लोगों से कोई मतलब नहीं है. जबकि सावित्री का बेटा तो उन्हें घर ले जाना चाहता था. पर इस बार भी उन्होंने मना कर दिया. तब बेटे ने कहा, ‘‘मुझे पता नहीं था कि मम्मी इसलिए अकेली रहना चाहती थीं.’’

अंत में निर्णय लिया गया कि किसी भी तरह रघुबीर और सावित्री को आश्रम से बाहर करना है. और किया भी वही गया. निर्णय सुन कर दोनों में से किसी ने भी कारण नहीं पूछा. उन्होंने तो तय कर लिया था, कुछ भी हो, दोनों साथ रहेंगे.

आर्थिक रूप से वे सुदृढ़ थे ही, केवल शरीर से ही कमजोर थे. लेकिन दोनों के मन मजबूत थे, इसलिए तन की चिंता नहीं थी. वे खुश थे, दोनों एकदूसरे की सांस थे.

सावित्री ने आश्रम के गेट से निकलते हुए कहा, ‘‘आगे का रास्ता अब शायद कैक्टस के फूल की तरह होगा.’’

सावित्री और रघुबीर एकदूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ते गए, बिना किसी परवाह के अनंत प्रेम की यात्रा पर…

Best Hindi Story : जाल – संजीव अनिता से शादी के लिए क्यों मना कर रहा था

Best Hindi Story : बरखा खूबसूरत भी थी और खुशमिजाज भी. पहले ही दिन से उस ने अपने हर सहयोगी के दिल में जगह बना ली. सब से पक्की सहेली वह अनिता की बनी क्योंकि हर कदम पर अनिता ने उस की सहायता की थी. जब भी फालतू वक्त मिलता  दोनों हंसहंस कर खूब बातें करतीं.

उन दिनों अनिता का प्रेमी संजीव 15 दिनों की छुट्टी पर चल रहा था. इन दोनों की दोस्ती की जड़ों को मजबूत होने के लिए इतना समय पर्याप्त रहा.

संजीव के लौटने पर अनिता ने सब से पहले उस का परिचय बरखा से कराया.

‘‘क्या शानदार व्यक्तित्व है तुम्हारा, संजीव,’’ बरखा ने बड़ी गर्मजोशी के साथ जब संजीव से हाथ मिलाया तब ये तीनों अपने सारे सहयोगियों की नजरों का केंद्र बने हुए थे.

‘‘थैंक यू,’’ अपनी प्रशंसा सुन संजीव खुल कर मुसकराया.

‘‘अनिता, इतने स्मार्ट इंसान को जल्दी से जल्दी शादी के बंधन में बांध ले, नहीं तो कोई और छीन कर ले जाएगी,’’ बरखा ने अपनी सहेली को सलाह दी.

‘‘सहेली, तेरे इरादे तो नेक हैं न?’’ नाटकीय अंदाज में आंखें मटकाते हुए अनिता ने सवाल पूछा, तो कई लोगों के सम्मिलित ठहाके से हौल गूंज उठा.

पहले संजीव और अनिता साथसाथ अधिकतर वक्त गुजारते थे. अब बरखा भी इन के साथ नजर आती. इस कारण उन के  सहयोगियों को बातें बनाने का मौका मिल गया.

‘‘ये बरखा बड़ी तेज और चालू लगती है मुझे तो,’’ शिल्पा ने अंजु से अपने मन की बात कह दी थी, ‘‘वह अनिता से ज्यादा सुंदर और आकर्षक भी है. मेरी समझ से भूसे और

चिंनगारी को पासपास रखना अनिता की बहुत बड़ी मूर्खता है.’’

‘मेरा अंदाजा तो यह है कि संजीव को अनिता ने खो ही दिया है. उस का झुकाव बरखा की तरफ ज्यादा हो गया है, यह बात मुझे तो साफ नजर आती है, ’’ अंजु ने फौरन शिल्पा की हां में हां मिलाते हुए बोली.

अनिता से इस विषय पर गंभीरता से बात सुमित्राजी ने एक दिन अकेले में की. तब बरखा और संजीव कैंटीन से समोसे लाने गए हुए थे.

‘‘तुम संजीव से शादी कब कर रही हो?’’ बिना वक्त बरबाद किए सुमित्रा ने मतलब की बात शुरू की.

‘‘आप को तो पता है कि संजीव पहले एम.बी.ए. पूरा करना चाहता है और उस में अभी साल भर बाकी है,’’ अनिता ने अपनी बात पूरी कर के गहरी सांस छोड़ी.

‘‘यही कारण बता कर 2 साल से तुझे लटकाए हुए है. मैं पूछती हूं कि वह शादी कर के क्या आगे नहीं पढ़ सकता है?’’

‘‘मैडम जब मैं ने 2 साल इंतजार कर लिया है तो 1 साल और सही.’’

‘‘बच्चों जैसी बातें मत कर,’’ सुमित्रा तैश में आ गईं, ‘‘मैं ने दुनिया देखी है. संजीव के रंगढंग ठीक नहीं लग रहे हैं मुझे. उसे बरखा के साथ ज्यादा मत रहने दिया कर.’’

‘‘मैडम, आप इस के बारे में चिंतित न हों. मुझे संजीव और बरखा दोनों पर विश्वास है.’’

‘यों आंखें मूंद कर विश्वास करने वाला इंसान ही जिंदगी में धोखा खाता है, मेरी बच्ची.’’

‘उन के आपस में खुल कर हंसनेबोलने का गलत अर्थ लगाना उचित नहीं है, मैडम. बरखा तो अपने को संजीव की साली मानती है. अपने भावी जीवनसाथी या छोटी बहन पर शक करने को मेरा मन कभी राजी नहीं होगा.’’

‘‘देख, साली को आधी घर वाली दुनिया कहती ही है. तुम ध्यान रखो कि कहीं बरखा तुम्हारा पत्ता साफ कर के पूरी घर वाली ही न बन जाए,’’ अनिता को यों आगाह कर के सुमित्रा खामोश हो गईं, क्योंकि संजीव और बरखा कैंटीन से लौट आए थे.

संजीव और बरखा के निरंतर प्रगाढ़ होते जा रहे संबंध को ले कर कभी किसी ने अनिता को चिंतित, दुखी या नाराज नहीं देखा. उस के हर सहयोगी ने हंसीमजाक, व्यंग्य या गंभीरता का सहारा ले कर उसे समझाया, पर कोई भी अनिता के मन में शक का बीज नहीं बो पाया. जो सारे औफिस वालों को नजर आ रहा था, उसे सिर्फ अनिता ही नहीं देख पा रही थी.

पहले पिक्चर देखने, बाजार घूमने या बाहर खाना खाने तीनों साथ जाते थे. फिर एक दिन बरखा और संजीव को मार्केट में घूमते शिल्पा ने देखा. उस ने यह खबर अनिता सहित सब तक फैला दी.

खबर सुनने के बाद अनिता के हावभाव ने यह साफ दर्शाया कि उसे दोनों के साथसाथ घूमने जाने की कोई जानकारी नहीं थी. उस ने सब के सामने ही संजीव और बरखा से ऊंची आवाज में पूछा, ‘‘कल तुम दोनों मुझे छोड़ कर बाजार घूमने क्यों गए?’’

‘‘तेरा बर्थडे गिफ्ट लाने के लिए, सहेली,’’ बरखा ने बड़ी सहजता से जवाब दिया, ‘‘अब ये बता कि हम सब को परसों इतवार को पार्टी कहां देगी?’’

बरखा का जवाब सुन कर अनिता ने अपने सहयोगियों की तरफ यों शांत भाव से मुसकराते हुए देखा मानो कह रही हो कि तुम सब बेकार का शक करने की गलत आदत छोड़ दो.

अनिता तो फिर सहज हो कर हंसनेबोलने लगी, पर बाकी सब की नजरों में बरखा की छवि बेहद चालाक युवती की हो गई और संजीव की नीयत पर सब और ज्यादा शक करने लगे.

बरखा ने अनिता के जन्मदिन की पार्टी का आयोजन अपने घर में किया.

‘‘आप सब को मैं अपने घर लंच पर बुलाना चाहती ही थी. मेरे मम्मीपापा सब से मिलना चाहते हैं. अनिता के जन्मदिन की पार्टी मेरे घर होने से एक पंथ दो काज हो जाएंगे,’’ ऐसा कह कर बरखा ने सभी सहयोगियों को अपने घर बुला लिया.

बरखा के पिता के बंगले में कदम रखते ही उस के सहयोगियों को उन की अमीरी का एहसास हो गया. बंगले की शानोशौकत देखते ही बनती थी.

बड़े से ड्राइंगहौल में पार्टी का आयोजन हुआ. वहां कालीन हटा कर डांसफ्लोर बनाय गया था. खानेपीने की चीजें जरूरत से ज्यादा थीं. घर के 2 नौकर सब की आवभगत में जुटे हुए थे.

पार्टी के बढि़या आयोजन से अनिता बेहद प्रसन्न नजर आ रही थी. बरखा और उस के मातापिता को धन्यवाद देते उस की जबान थकी नहीं.

‘‘ये मेरे जन्मदिन पर अब तक हुई 24 पार्टियों में बैस्ट है,’’ कहते हुए अनिता को जब भी मौका मिलता वह भावविभोर हो बरखा के गले लग जाती.

इस अवसर पर उन के सहयोगियों की पैनी दृष्टियों ने बहुत सी चटपटी बातें नोट की थीं. यह भी साफ था कि जो ऐसी बातें नोट कर रहे थे. वह सब अनिता की नजरों से छिपा था.

बंगले का ठाठबाट देख कर संजीव की नजरों में उभरे लालच के भाव सब ने साफ पढ़े. बरखा के मातापिता के साथ संजीव का खूब घुलमिल कर बातें करना उन्होंने बारबार देखा.

अनिता से कहीं ज्यादा संजीव बरखा को महत्त्व दे रहा था. वह उसी के साथ सब से ज्यादा नाचा. किसी के कहने का फिक्र न कर वह बरखा के आगेपीछे घूम रहा था.

अनिता से उस दिन किसी ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि कोई भी उस की खुशी को नष्ट करने का कारण नहीं बनना चाहता था.

वैसे उस दिन के बाद से किसी को अनिता को समझाने या आगाह करने की जरूरत नहीं पड़ी. संजीव ने सब तरह की लाजशर्म त्याग कर बरखा को खुलेआम फ्लर्ट करना शुरू कर दिया.

बेचारी अनिता ही जबरदस्ती उन दोनों के साथ चिपकी रहती. उस की मुसकराहट सब को नकली प्रतीत होती. वह सब की हमदर्दी की पात्र बनती जा रही थी, लेकिन अब भी क्या मजाल कि उस के मुंह से संजीव या बरखा की शिकायत में एक शब्द भी निकल आए.

‘‘तुम सब का अंदाज बिलकुल गलत है. संजीव मुझे कभी धोखा नहीं देगा, देख लेना,’’ उस के मुंह से ऐसी बात सुन कर लगभग हर व्यक्ति उस की बुद्धि पर खूब तरस खाता.

जन्मदिन की पार्टी के महीने भर बाद स्थिति इतनी बदल गई कि संजीव को बरखा के रूपजाल का पक्का शिकार हुआ समझ लिया गया. अनिता की उपस्थिति की फिक्र किए बिना संजीव खूब खुल कर बरखा से हंसताबोलता. ऐसा लगता था कि उस ने अनिता से झगड़ा कर के संबंधविच्छेद करने का मन बना लिया था.

लेकिन सब की अटकलें धरी की धरी रह गई जब अचानक ही बड़े सादे समारोह में संजीव ने अनिता से शादी कर ली. बरखा उन की शादी में शामिल नहीं हुई. वह अपनी मौसी की बेटी की शादी में शामिल होने के लिए 20 दिन की छुट्टी ले कर मुंबई गई हुई थी.

यों जल्दीबाजी में संजीव का अनिता से शादी करने का राज किसी की समझ में नहीं आया.

लोगों के सीधा सवाल पूछने पर संजीव मुसकान होंठों पर ला कर कहता, ‘‘बरखा से हंसनेबोलने का मतलब यह कतई नहीं था कि मैं अनिता को धोखा दूंगा. आप सब ऐसा सोच भी कैसे सके? अरे, अनिता में तो मेरी जान बसती है और अब मैं उस से दूर रहना नहीं चाहता था.’’

अनिता की खुशी का ठिकाना नहीं था. उस से कोई बरखा के साथ संजीव का जिक्र करता तो वह खूब हंसती.

‘‘अरे, तुम सब बेकार की चिंता करते थे. देखो, न तो मेरी छोटी बहन जैसी सहेली ने और न ही मेरे मंगेतर ने मुझे धोखा दिया. मुझे अपने प्यार पर पूरा विश्वास था, है और रहेगा.’’

उसे शुभकामनाएं देते हुए लोग बड़ी कठिनाई से ही अपनी हैरानी को काबू में रख पाते. संजीव और बरखा का चक्कर क्यों अचानक समाप्त हो गया, इस का कोई सही अंदाजा भी नहीं लगा पा रहा था.

दोनों सप्ताह भर का हनीमून शिमला में मना कर लौटे. बरखा ने फोन कर के अनिता को बता दिया कि वह शाम को दोनों से मिलने आ रही है.

उस के आने की खबर सुन कर संजीव अचानक विचलित नजर आने लगा. अनिता की नजरों से उस की बेचैनी छिपी नहीं रही.

‘‘किस वजह से टैंशन में नजर आ रहे हो, संजीव?’’ कुछ देर बाद हाथ पकड़ कर जबरदस्ती अपने सामने बैठाते हुए अनिता ने संजीव से सवाल पूछ ही लिया.

बहुत ज्यादा झिझकते हुए संजीव ने उस से अपने मन की परेशानी बयान की.

‘‘देखो, तुम बरखा की किसी बात पर विश्वास मत करना… वह तुम्हें उलटीसीधी बातें बता कर मेरे खिलाफ भड़काने की कोशिश कर सकती है,’’ बोलते हुए संजीव बड़ा बेचैन नजर आ रहा था.

‘‘वह ऐसा काम क्यों करेगी, संजीव? मुझे पूरी बात बताओ न.’’

‘‘वह बड़ी चालू लड़की है, अनिता. तुम उस के कहे पर जरा भी विश्वास मत करना.’’

‘‘पर वह ऐसा क्या कहेगी जिस के कारण तुम इतने परेशान नजर आ रहे हो?’’

‘‘उस दिन उस ने पहले मुझे उकसाया… मेरी भावनाओं को भड़काया और फिर… और फिर…’’ आंतरिक द्वंद्व के चलते संजीव आगे नहीं बोल सका.

‘‘किस दिन की बात कर रहे हो? क्या उस दिन की जब तुम उसे घर छोड़ने गए थे क्योंकि उसे स्टेशन जाना था?’’

‘‘हां.’’

‘‘जब तुम उस के घर पहुंचे, तब उस के मम्मीपापा घर में नहीं थे. तब अपने कमरे में ले जा कर उस ने पहले तुम्हारी भावनाओं को भड़काया और जब तुम ने उसे बांहों में भरना चाहा, तो नाराज हो कर तुम्हें उस ने खूब डांटा, यही बताना चाह रहे हो न तुम मुझे?’’ उस के चेहरे को निहारते हुए अनिता रहस्यमयी अंदाज में हौले से मुसकरा रही थी.

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि वह फोन कर के पहले ही तुम्हें मेरे खिलाफ भड़का चुकी है,’’ गुस्सा दर्शाने का प्रयास कर रहे संजीव का चेहरा पीला भी पड़ गया था.

‘‘मेरे प्यारे पतिदेव, न उस ने मुझे भड़काने की कोशिश की है और न ही मुझे आप से कोई नाराजगी या शिकायत है. सच तो यह है कि मैं बरखा की आभारी हूं,’’ अनिता की मुसकराहट और गहरी हो गई.

‘‘ये क्या कह रही हो?’’ संजीव हैरान हो उठा.

‘‘देखिए, बरखा ने अगर आप के गलत व्यवहार की सारी जानकारी मुझे देने की धमकी न दी होती… और इस कारण आप के मन में मुझे हमेशा के लिए खो देने का भय न उपजा होता, तो क्या यों झटपट मुझ से शादी करते?’’ यह सवाल पूछने के बाद अनिता खिलखिला कर हंसी तो संजीव अजीब सी उलझन का शिकार बन गया.

‘‘मैं ने कभी तुम से शादी करने से इनकार नहीं किया था,’’ संजीव ने ऊंची आवाज में सफाई सी दी.

‘‘मुझे आप के ऊपर पूरा विश्वास है और सदा रहेगा,’’ अनिता ने आगे झुक संजीव के गाल पर प्यार भरा चुंबन अंकित कर दिया.

‘‘मुझ से तुम्हें भविष्य में कभी वैसी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा, अनिता,’’ संजीव ने उस से फौरन वादा किया.

‘‘उस तरफ से मैं बेफिक्र हूं क्योंकि किसी तितली ने कभी तुम्हारे नजदीक आने की कोशिश की तो मैं उस का चेहरा बिगाड़ दूंगी,’’ अचानक ही अनिता की आंखों में उभरे कठोरता के भाव संजीव ने साफ पहचाने और इस कारण उस ने अपने बदन में अजीब सी झुरझुरी महसूस की.

‘‘क्या बरखा से संबंध समाप्त कर लेना हमारे लिए अच्छा नहीं रहेगा?’’ उस ने दबे स्वर में पूछा.

‘‘वैसा करने की क्या जरूरत है हमें, जनाब?’’ अनिता उस की आंखों में आंखें डाल कर शरारती ढंग से मुकराई, ‘‘मुझे आप और अपनी छोटी बहन सी प्यारी सहेली दोनों पर पूरा विश्वास है. फिर उसे धन्यवाद देने का यह तो बड़ा गलत तरीका होगा कि मैं उस से दूर हो जाऊं.’’

संजीव ने लापरवाही से कंधे उचकाए पर उस का मन बेचैन व परेशान बना ही रहा. बाद में बरखा उन के घर आई तो वह संजीव के लिए सुंदर सी कमीज व अनिता के लिए खूबसूरत बैग उपहार में लाई थी. वह संजीव के साथ बड़ी प्रसन्नता से मिली. कोई कह नहीं सकता था कि कुछ हफ्ते पहले दोनों के बीच बड़ी जोर से झगड़ा हुआ था.

अनिता और बरखा पक्की, विश्वसनीय सहेलियों की तरह मिलीं. जरा सा भी खिंचाव दोनों के व्यवहार में संजीव पकड़ नहीं पाया.

जल्दी ही वह भी उन के साथ सहजता से हंसनेबोलने लगा. वैसे वह उन की मानसिकता को समझ नहीं पा रहा था क्योंकि उस के हिसाब से उन दोनों को उस से गहरी नाराजगी व शिकायत होनी चाहिए थी.

‘जो कुछ उस दिन बरखा के घर में घटा, वह कहीं इन दोनों की मिलीभगत से फैलाया ऐसा जाल तो नहीं था जिस में फंस कर उसे अनिता से फटाफट शादी करनी पड़ी?’ अचानक ही यह सवाल उस के मन में बारबार उठने लगा और उस का दिल कह रहा था कि जवाब ‘ऐसा ही हुआ है’ होना चाहिए.

लेखिका : गोपिका चाचरा

Romantic Story : प्यार एक एहसास

Romantic Story : पिता की 13वीं से लौटी ही थी सीमा. 15 दिन के लंबे अंतराल के बाद उस ने लैपटौप खोल कर फेसबुक को लौग इन किया. फ्रैंड रिक्वैस्ट पर क्लिक करते ही जो नाम उभर कर आया उसे देख कर बुरी तरह चौंक गई.

‘‘अरे, यह तो शैलेश है,’’ उस के मुंह से बेसाख्ता निकल गया. समय के इतने लंबे अंतराल ने उस की याद पर धूल की मोटी चादर बिछा दी थी. लैपटौप के सामने बैठेबैठे ही सीमा की आंखों के आगे शैलेश के साथ बिताए दिन परतदरपरत खुलते चले गए.

दोनों ही दिल्ली के एक कालेज में स्नातक की पढ़ाई कर रहे थे. शैलेश पढ़ने में अव्वल था. वह बहुत अच्छा गायक भी था. कालेज के हर सांस्कृतिक कार्यक्रम में वह बढ़चढ़ कर भाग लेता था. सीमा की आवाज भी बहुत अच्छी थी. दोनों कई बार डुएट भी गाते थे, इसलिए अकसर दोनों का कक्षा के बाहर मिलना हो जाता था.

एक बार सीमा को बुखार आ गया. वह 10 दिन कालेज नहीं आई तो शैलेश पता पूछता हुआ उस के घर उस का हालचाल पूछने आ गया. परीक्षा बहुत करीब थी, इसलिए उस को अपने नोट्स दे कर उस की परीक्षा की तैयारी करने में मदद की. सीमा ने पाया कि वह एक बहुत अच्छा इनसान भी है. धीरेधीरे उन की नजदीकियां बढ़ने लगीं. कालेज में खाली

समय में दोनों साथसाथ दिखाई देने लगे. दोनों को ही एकदूसरे का साथ अच्छा लगने लगा था. 1 भी दिन नहीं मिलते तो बेचैन हो जाते. दोनों के हावभाव से आपस में मूक प्रेमनिवेदन हो चुका था. इस की कालेज में भी चर्चा होने लगी.

यह किशोरवय उम्र ही ऐसी है, जब कोई प्रशंसनीय दृष्टि से निहारते हुए अपनी मूक भाषा में प्रेमनिवेदन करता है, तो दिल में अवर्णनीय मीठा सा एहसास होता है, जिस से चेहरे पर एक अलग सा नूर झलकने लगता है. सारी दुनिया बड़ी खूबसूरत लगने लगती है. चिलचिलाती गरमी की दुपहरी में भी पेड़ के नीचे बैठ कर उस से बातें करना चांदनी रात का एहसास देता है.

लोग उन्हें अजीब नजरों से देख रहे हैं, इस की ओर से भी वे बेपरवाह होते हैं. जब खुली आंखों से भविष्य के सपने तो बुनते हैं, लेकिन पूरे होने या न होने की चिंता नहीं होती. एकदूसरे की पसंदनापसंद का बहुत ध्यान रखा जाता है. बारिश के मौसम में भीग कर गुनगुनाते हुए नाचने का मन करता है. दोनों की यह स्थिति थी.

पढ़ाई पूरी होते ही शैलेश अपने घर बनारस चला गया, यह वादा कर के कि वह बराबर उस से पत्र द्वारा संपर्क में रहेगा. साल भर पत्रों का आदानप्रदान चला, फिर उस के पत्र आने बंद हो गए. सीमा ने कई पत्र डाले, लेकिन उत्तर नहीं आया. उस जमाने में न तो मोबाइल थे न ही इंटरनैट. धीरेधीरे सीमा ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया और कर भी क्या सकती थी?

सीमा पढ़ीलिखी थी तथा आधुनिक परिवार से थी. शुरू से ही उस की आदत रही थी कि वह किसी भी रिश्ते में एकतरफा चाहत कभी नहीं रखती. जब कभी उसे एहसास होता कि उस का किसी के जीवन में अस्तित्व नहीं रह गया है तो स्वयं भी उस को अपने दिल से निकाल देती थी. इसी कारण धीरेधीरे उस के मनमस्तिष्क से  शैलेश निकलता चला गया. सिर्फ उस का नाम उस के जेहन में रह गया था. जब भी ‘वह’ नाम सुनती तो एक धुंधला सा चेहरा उस की आंखों के सामने तैर जाता था, इस से अधिक और कुछ नहीं.

समय निर्बाध गति से बीतता गया. उस का विवाह हो गया और 2 प्यारेप्यारे बच्चों की मां भी बन गई. पति सुनील अच्छा था, लेकिन उस से मानसिक सुख उसे कभी नहीं मिला. वह अपने व्यापार में इतना व्यस्त रहता कि सीमा के लिए उस के पास समय ही नहीं था. वह पैसे से ही उसे खुश रखना चाहता था.

15 साल के अंतराल पर फेसबुक पर शैलेश से संपर्क होने पर सीमा के मन में उथलपुथल मच गई और अंत में वर्तमान परिस्थितियां देखते हुए रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट न करने में ही भलाई लगी.

अभी इस बात को 4 दिन ही बीते होंगे कि  उस का मैसेज आ गया. किसी ने सच ही कहा है कि कोई अगर किसी को शिद्दत से चाहे तो सारी कायनात उन्हें मिलाने की साजिश करने लगती है और ऐसा ही हुआ. इस बार वह अपने को रोक नहीं पाई. मन में उस के बारे में जानने की उत्सुकता जागी. मैसेज का सिलसिला चलने लगा, जिस से पता लगा कि वह पुणे में अपने परिवार के साथ रहता है. फिर मोबाइल नंबरों का आदानप्रदान हुआ.

इस के बाद प्राय: बात होने लगी. उन का मूक प्रेम मुखर हो उठा था. पहली बार शैलेश की आवाज फोन पर सुन कर कि कैसी हो नवयौवना सी उस के दिल की स्थिति हो गई थी. उस का कंठ भावातिरेक से अवरुद्ध हो गया था.

उस ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘अच्छी हूं. तुम्हें मैं अभी तक याद हूं?’’

‘‘मैं भूला ही कब था,’’ जब उस ने प्रत्युत्तर में कहा तो, उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं.

उस ने पूछा, ‘‘फिर पत्र लिखना क्यों छोड़ दिया?’’

‘‘तुम्हारा एक पत्र मां के हाथ लग गया था, तो उन्होंने भविष्य में

तुम्हारामेरा संपर्क में रहने का दरवाजा ही बंद कर दिया और मुझे अपना वास्ता दे दिया था. उन का इकलौता बेटा था, क्या करता.’’

उस ने सीमा से कभी भविष्य में साथ रहने का वादा तो किया नहीं था, इसलिए वह शिकायत भी करती तो क्या करती. एक ऐसा व्यक्ति जिस ने अपने प्रेम को भाषा के द्वारा कभी अभिव्यक्त नहीं किया था, उस का उसे शब्दों का जामा पहनाना उस के लिए किसी सुखद सपने का वास्तविकता में परिणत होने से कम नहीं था. यदि वह उस से बात नहीं करती तो इतनी मोहक बातों से वंचित रह जाती.

समय का अंतराल परिस्थितियां बदल देता है, शारीरिक परिवर्तन करता है, लेकिन मन अछूता ही रह जाता है. कहते हैं हर इनसान के अंदर बचपना होता है, जो किसी भी उम्र में उचित समय देख कर बाहर आ जाता है.

उन की बातें दोस्ती की परिधि में तो कतई नहीं थीं. हां मर्यादा का भी उल्लंघन कभी नहीं किया. शैलेश की बातें उसे बहुत रोमांचित करती थीं. बातों से लगा ही नहीं कि वे इतने सालों बाद मिले हैं. फोन से बातें करते हुए उन्होंने उन पुराने दिनों को याद कर के भरपूर जीया. कुछ शैलेश ने याद दिलाईं जो वह भूल गई थी, कुछ उस ने याद दिलाई. ऐसे लग रहा था जैसेकि वे उन दिनों को दोबारा जी रहे हैं.

15 सालों में किस के साथ क्या हुआ वह भी शेयर किया. आरंभ में इस तरह बात करना उसे अटपटा अवश्य लगता था, संस्कारगत थोड़ा अपराधबोध भी होता था और यह सोच कर भी परेशान होती थी कि इस तरह कितने दिन रिश्ता निभेगा.

इसी ऊहापोह में 5-6 महीने बीत गए. दोनों ही चाहते थे कि यह रिश्ता बोझ न बन जाए. यह तो निश्चित हो गया था कि आग लगी थी दोनों तरफ बराबर. पहले यह आग तपिश देती थी, लेकिन धीरेधीरे यही आग मन को ठंडक तथा सुकून देने लगी. उन की रस भरी बातें उन दोनों के ही मन को गुदगुदा जाती थीं.

एक बार शैलेश ने एक गाने की लाइन बोली, ‘‘तुम होतीं तो ऐसा होता, तुम यह कहतीं…’’

उस की बात काटते हुए सीमा बोली, ‘‘और तुम होते तो कैसा होता…’’

कभी सीमा चुटकी लेती, ‘‘चलो भाग चलते हैं…’’

शैलेश कहता, ‘‘भाग कर जाएंगे कहां?’’

एक दिन शैलेश ने सीमा को बताया कि औफिस के काम से वह बहुत जल्दी दिल्ली आने वाला है. आएगा तो वह उस से और उस के परिवार से अवश्य मिलेगा. यह सुन कर उस का मनमयूर नाच उठा. फिर कड़वी सचाई से रूबरू होते ही सोच में पड़ गई कि अब सीमा किसी और की हो चुकी है.

क्या इस स्थिति में उस का शैलेश से मिलना उचित होगा? फिर अपने सवाल का उत्तर देते हुए बुदबुदाई कि ऊंह, तो क्या हुआ? समय बहुत बदल गया है, एक दोस्त की तरह मिलने में बुराई ही क्या है… सुनील की परवाह तो मैं तब करूं जब वह भी मेरी परवाह करता हो. खुश रहने के लिए मुझ भी तो कोई सहारा चाहिए. देखूं तो सही इतने सालों में उस में कितना बदलाव आया है. अब वह शैलेश के आने की सूचना की प्रतीक्षा करने लगी थी.’’

अंत में वह दिन भी आ पहुंचा, जिस का वह बेसब्री से इंतजार कर रही थी. सुनील बिजनैस टूअर पर गया हुआ था. दोनों बच्चे स्कूल गए हुए थे. उन्होंने कनाट प्लेस के कौफी हाउस में मिलने का समय निश्चित किया. वह शैलेश से अकेले घर में मिल कर कोई भी मौका ऐसा नहीं आने देना चाहती थी कि बाद में उसे आत्मग्लानि हो.

उसे लग रहा था कि इतने दिन बाद उस को देख कर कहीं वह भावनाओं में बह कर कोई गलत कदम न उठा ले, जिस की उस के संस्कार उसे आज्ञा नहीं देते थे. शैलेश को देख कर उसे लगा ही नहीं कि वह उस से इतने लंबे अंतराल के बाद मिल रही है. वह बिलकुल नहीं बदला था. बस थोड़ी सी बालों में सफेदी झलक रही थी. आज भी वह उसे बहुत अपना सा लग रहा था. बातों का सिलसिला इतना लंबा चला कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था.

इधरउधर की बातें करते हुए जब शैलेश ने सीमा से कहा कि उसे अपने वैवाहिक जीवन से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन उस की जगह कोई नहीं ले सकता तो उसे अपनेआप पर बहुत गर्व हुआ.

अचानक शैलेश को कुछ याद आया. उस ने पूछा, ‘‘अरे हां, तुम्हारे गाने के शौक का क्या हाल है?’’

बात बीच में काटते हुए सीमा ने उत्तर दिया, ‘‘क्या हाल होगा. मुझे समय ही नहीं मिलता. सुनील तो बिजनैस टूअर पर रहते हैं और न ही उन को इस सब का शौक है.’’

‘‘अरे, उन को शौक नहीं है तो क्या हुआ, तुम इतनी आश्रित क्यों हो उन पर? कोशिश और लगन से क्या नहीं हो सकता? बच्चों के स्कूल जाने के बाद समय तो निकाला जा सकता है.’’

सीमा को लगा काश, सुनील भी उस को इसी तरह प्रोत्साहित करता. उस ने तो कभी उस की आवाज की प्रशंसा भी नहीं की. खैर, देर आए दुरुस्त आए. उस ने मन ही मन निश्चय किया कि वह अपनी इस कला को लोगों के सामने उजागर करेगी.

उस को चुप देख कर शैलेश ने कहा, ‘‘चलो, हम दोनों मिल कर एक अलबम तैयार करते हैं. सहकर्मियों की तरह तो मिल सकते हैं न. इस विषय पर फोन पर बात करेंगे.’’

सीमा को लगा उस के अकेलेपन की समस्या का हल मिल गया. दिल से वह शैलेश के सामने नतमस्तक हो गई थी.

फिर से बिछड़ने का समय आ गया था. लेकिन इस बार शरीर अलग हुए थे केवल, कभी न बिछड़ने वाला एक खूबसूरत एहसास हमेशा के लिए उस के पास रह गया था, जिस ने उस की जिंदगी को इंद्रधनुषी रंग दे कर नई दिशा दे दी थी. इस एहसास के सहारे कि वह इतने सालों बाद भी शैलेश की यादों में बसी है. वह शैलेश का सामीप्य हर समय महसूस करती थी. दूरी अब बेमानी हो गई थी.

Love Story : एक रिश्ता प्यारा सा – माया और रमन के बीच क्या रिश्ता था?

Love Story : “अरे रमन जी सुनिए, जरा पिछले साल की रिपोर्ट मुझे फॉरवर्ड कर देंगे, कुछ काम था” . मैं ने कहा तो रमन ने अपने चिरपरिचित अंदाज में जवाब दिया “क्यों नहीं मिस माया, आप फरमाइश तो करें. हमारी जान भी हाजिर है.

“देखिए जान तो मुझे चाहिए नहीं. जो मांगा है वही दे दीजिए. मेहरबानी होगी.” मैं मुस्कुराई.

इस ऑफिस और इस शहर में आए हुए मुझे अधिक समय नहीं हुआ है. पिछले महीने ही ज्वाइन किया है. धीरेधीरे सब को जानने लगी हूं. ऑफिस में साथ काम करने वालों के साथ मैं ने अच्छा रिश्ता बना लिया है.

वैसे भी 30 साल की अविवाहित, अकेली और खूबसूरत कन्या के साथ दोस्ती रखने के लिए लोग मरते हैं. फिर मैं तो इन सब के साथ काम कर रही हूं. 8 घंटे का साथ है. मुझे किसी भी चीज की जरूरत होती है तो सहकर्मी तुरंत मेरी मदद कर देते हैं. अच्छा ही है वरना अनजान शहर में अकेले रहना आसान नहीं होता.

दिल्ली के इस ब्रांच ऑफिस में मैं अपने एक प्रोजेक्ट वर्क के लिए आई हुई हूं. दोतीन महीने का काम है. फिर अपने शहर जयपुर वाले ब्रांच में चली जाऊंगी. इसलिए ज्यादा सामान ले कर नहीं आई हूं.

मैं ने लक्ष्मी नगर में एक कमरे का घर किराए पर ले रखा है. बगल के कमरे में दो लड़कियां रहती हैं. जबकि मेरे सामने वाले घर में पतिपत्नी रहते हैं. शायद उन की शादी को ज्यादा समय नहीं हुआ है. पत्नी हमेशा साड़ी में दिखती है. मैं सुबहसुबह जब भी खिड़की खोलती हूं तो सामने वह लड़का अपनी बीवी का हाथ बंटाता हुआ दिखता है. कभीकभी वह छत पर एक्सरसाइज करता भी दिख जाता है.

उस की पत्नी से मेरी कभी बात नहीं हुई मगर वह लड़का एकदो बार मुझे गली में मिल चुका है. काफी शराफत से वह इतना ही पूछता है,” कैसी हैं आप ? कोई तकलीफ तो नही यहां.”

“जी नहीं. सब ठीक है.” कह कर मैं आगे बढ़ जाती.

इधर कुछ दिनों से देश में कोरोना के मामले सामने आने लगे हैं. हर कोई एहतियात बरत रहा है. बगल वाले कमरे की दोनों लड़कियों के कॉलेज बंद हो गए. दोनों अपने शहर लौट गई .

उस दिन सुबहसुबह मेरे घर से भी मम्मी का फोन आ गया,” बेटा देख कोरोना फैलना शुरु हो गया है. तू घर आ जा.”

“पर मम्मी अभी कोई डरने की बात नहीं है. सब काबू में आ जाएगा. यह भी तो सोचो मुझे ऑफिस ज्वाइन किए हुए 1 महीना भी नहीं हुआ है. इतनी जल्दी छुट्टी कैसे लूं? बॉस पर अच्छा इंप्रेशन नहीं पड़ेगा. वैसे भी ऑफिस बंद थोड़े न हुआ है. सब आ रहे हैं.”

“पर बेटा तू अनजान शहर में है. कैसे रहेगी अकेली? कौन रखेगा तेरा ख्याल?”

“अरे मम्मी चिंता की कोई बात नहीं. ऑफिस में साथ काम करने वाले मेरा बहुत ख्याल रखते हैं. सरला मैडम तो मेरे घर के काफी पास ही रहती है. उन की फैमिली भी है. 2 लोग हैं और हैं जिन का घर मेरे घर के पास ही है. इसलिए आप चिंता न करें. सब मेरा ख्याल रखेंगे.”

“और बेटा खानापीना… सब ठीक चल रहा है ?”

“हां मम्मा. खानेपीने की कोई दिक्कत नहीं है . मुझे जब भी कैंटीन में खाने की इच्छा नहीं होती तो सरला मैडम या दिवाकर सर से कह देती हूं. वे अपने घर से मेरे लिए लंच ले आते हैं. ममा डोंट वरी. मैं बिल्कुल ठीक हूं. गली के कोने में ढाबे वाले रामू काका भी तो हैं. मेरे कहने पर तुरंत खाना भेज देते हैं. ममा कोरोना ज्यादा फैला तो मैं घर आ जाऊंगी. आप चिंता न करो .”

उस दिन मैं ने मां को तो समझा दिया था कि सब ठीक है. मगर मुझे अंदाज भी नहीं था कि तीनचार दिनों के अंदर ही देश में अचानक लॉकडाउन हो जाएगा और मैं इस अनजान शहर में एक कमरे में बंद हो कर रह जाऊंगी. न घर में खानेपीने की ज्यादा चीजें हैं और न ही कोई रेस्टोरेंट ही खुला हुआ है .

मैं ने सरला मैडम से मदद मांगी तो उन्होंने टका सा जवाब दे दिया,” देखो माया अभी तो अपने घर में ही खाने की सामग्री कब खत्म हो जाए पता नहीं . अभी न तुम्हारा घर से निकलना उचित है और न हमारे घर में ऐसा कोई है जो तुम्हें खाना दे कर आए. आई एम सॉरी. ”

“इट्स ओके .” बस इतना ही कह सकी थी मैं. इस के बाद मैं ने दिवाकर सर को फोन किया तो उन्होंने उस दिन तो खाना ला कर दे दिया मगर साथ में अपना एक्सक्यूज भी रख दिया कि माया अब रोज मैं खाना ले कर नहीं आ सकूंगा. मेरी बीवी भी तो सवाल करेगी न.

“जी मैं समझ सकती हूं . मुझे उन की उम्मीद भी छोड़नी पड़ी. अब मैं ने रमन जी को फोन किया जो हर समय मेरे लिए जान हाजिर करने की बात करते रहते थे. उन का घर भी लक्ष्मी नगर में ही था. हमेशा की तरह उन का जवाब सकारात्मक आया. शाम में खाना ले कर आने का वादा किया. रात हो गई और वह नहीं आए. मैं ने फोन किया तो उन्होंने फोन उठाया भी नहीं और एक मैसेज डाल दिया, सॉरी माया मैं नहीं आ पाऊंगा.

अब मेरे पास खाने की भारी समस्या पैदा हो गई थी. किराने की दुकान से ब्रेड और दूध ले आई. कुछ बिस्किट्स और मैगी भी खरीद ली. चाय बनाने के लिए इंडक्शन खरीदा हुआ था मैं ने. उसी पर किसी तरह मैगी बना ली. कुछ फल भी खरीद लिए थे. दोतीन दिन ऐसे ही काम चलाया मगर ऐसे पता नहीं कितने दिन चलाना था. 21 दिन का लॉकडाउन था. उस के बाद भी परिस्थिति कैसी होगी कहना मुश्किल था.

उस दिन मैं दूध ले कर आ रही थी तो गेट के बाहर वही लड़का जो सामने के घर में रहता है मिल गया. उस ने मुझ से वही पुराना सवाल किया,” कैसी हैं आप? सब ठीक है न? कोई परेशानी तो नहीं?”

“अब ठीक क्या? बस चल रहा है. मैगी और ब्रेड खा कर गुजारा कर रही हूं .”

“क्यों खाना बनाना नहीं जानती आप?

उस के सवाल पर मैं हंस पड़ी.

“जानती तो हूं मगर यहां कोई सामान नहीं है न मेरे पास. दोतीन महीने के लिए ही दिल्ली आई थी. अब तक ऑफिस कैंटीन और रामू काका के ढाबे में खाना खा कर काम चल जाता था. मगर अब तो सब कुछ बंद है न. अचानक लॉक डाउन से मुझे तो बहुत परेशानी हो रही है.”

“हां सो तो है ही. मेरी वाइफ भी 5-6 दिन पहले अपने घर गई थी. 1 सप्ताह में वापस आने वाली थी. संडे मैं उसे लेने जाता तब तक सब बंद हो गया. उस के घरवालों ने कहा कि अभी जान जोखिम में डाल कर लेने मत आना. सब ठीक हो जाए तो आ जाना. अब मैं भी घर में अकेला ही हूं.”

“तो फिर खाना?”

“उस की कोई चिंता नहीं. मुझे खाना बनाना आता है. ” उस के चेहरे पर मुस्कान खिल गई.

“क्या बात है! यह तो बहुत अच्छा है. आप को परेशानी नहीं होगी.”

“परेशानी आप को भी नहीं होने दूंगा. कल से मैं आप के लिए खाना बना दिया करूंगा. आप बिल्कुल चिंता न करें. कुछ सामान लाना हो तो वह भी मुझे बताइए. आप घर से मत निकला कीजिए. मैं हूं न.”

एक अनजान शख्स के मुंह से इतनी आत्मीयता भरी बातें बातें सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा.” थैंक यू सो मच “मैं इतना ही कह पाई.

अगले दिन सुबहसुबह वह लड़का यानी अमर मेरे लिए नाश्ता ले कर आ गया. टेबल पर टिफिन बॉक्स छोड़ कर वह चला गया था. नाश्ते में स्वादिष्ट पोहा खा कर मेरे चेहरे पर मुस्कान खिल गई. मैं दोपहर का इंतजार करने लगी. ठीक 2 बजे वह फिर टिफिन भर लाया. इस बार टिफिन में दाल चावल और सब्जी थे. मैं सोच रही थी कि किस मुंह से उसे शुक्रिया करूं. अनजान हो कर भी वह मेरे लिए इतना कुछ कर रहा है.

मैं ने उसे रोक लिया और कुर्सी पर बैठने का इशारा किया. वह थोड़ा सकुचाता हुआ बैठ गया. मैं बोल पड़ी ,” आई नो एक एक अनजान, अकेली लड़की के घर में ऐसे बैठना आप को अजीब लग रहा होगा. मगर मैं इस अजनबीपन को खत्म करना चाहती हूं. आप अपने बारे में कुछ बताइए न. मैं जानना चाहती हूं उस शख्स के बारे में जो मेरी इतनी हेल्प कर रहा है.”

“ऐसा कुछ नहीं माया जी. हम सब को एकदूसरे की सहायता करनी चाहिए.” बड़े सहज तरीके से उस ने जवाब दिया और फिर अपने बारे में बताने लगा,

“दरअसल मैं ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूं. मेरठ में मेरा घर है . स्कूल में हमेशा टॉप करता था. मगर घर के हालात ज्यादा अच्छे नहीं थे. सो इंटर के बाद ही मुझे नौकरी करनी पड़ी. करोल बाग में मेरा ऑफिस है. वाइफ भी मेरठ की ही है. बहुत अच्छी है. बहुत प्यार करती है मुझ से. हम दोनों की शादी पिछले साल ही हुई थी. दिल्ली आए ज्यादा समय नहीं हुआ है.”

“बहुत अच्छे. मैं भी दिल्ली में नई हूं. हमारे इस ऑफिस का एक ब्रांच जयपुर में भी है. वही काम करती थी मैं. यहां एक प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए आई हुई हूं .अगर प्रमोशन मिल गया तो शायद हमेशा के लिए भी रहना पड़ जाए.”

अच्छा जी अब आप खाना खाएं. देखिए मैं ने ठीक बनाया है या नहीं.”

आप तो बहुत स्वादिष्ट खाना बनाते हैं. सुबह ही पता चल गया था. कह कर मैं हंस पड़ी. वह भी थोड़ा शरमाता हुआ मुस्कुराने लगा था. मैं खाती रही और वह बातें करता रहा.

अब तो यह रोज का नियम बन गया था. वह 3 बार मेरे लिए खाना बना कर लाता. मैं भी कभीकभी चाय बना कर पिलाती. किसी भी चीज की जरूरत होती तो वह ला कर देता . मुझे निकलने से रोक देता.

मेरे आग्रह करने पर वह खुद भी मेरे साथ ही खाना खाने लगा. हम दोनों घंटों बैठ कर दुनिया जहान की बातें करते.

इस बीच मम्मी का जब भी फोन आता और वह चिंता करतीं तो मैं उन्हें समझा देती कि सब अच्छा है. मम्मी जब भी खाने की बात करतीं तो मैं उन्हें कह देती कि सरला मैडम मेरे लिए खाना बना कर भेज देती हैं. कोई परेशानी की बात नहीं है.

इधर अमर की वाइफ भी फोन कर के उस का हालचाल पूछती. चिंता करती तो अमर कह देता कि वह ठीक है. अपने अकेलेपन को टीवी देख कर और एक्सरसाइज कर के काट रहा है.

हम दोनों घरवालों से कही गई बातें एकदूसरे को बताते और खूब हंसते. वाकई इतनी विकट स्थिति में अमर का साथ मुझे मजबूत बना रहा था. यही हाल अमर का भी था. इन 15- 20 दिनों में हम एकदूसरे के काफी करीब आ चुके थे. और फिर एक दिन हमारे बीच वह सब हो गया जो उचित नहीं था.

अमर इस बात को ले कर खुद को गुनहगार मान रहा था. मगर मैं ने उसे समझाया,” तुम्हारा कोई दोष नहीं अमर. भूल हम दोनों से हुई है. पर इसे भूल नहीं परिस्थिति का दोष समझो. यह भूल हम कभी नहीं दोहराएंगे. मगर इस बात को ले कर अपराधबोध भी मत रखो. हम अच्छे दोस्त हैं और हमेशा रहेंगे. एक दोस्त ही दूसरे का सहारा बनता है और तुम ने हमेशा मेरा साथ दिया है. मुझे खुशी है कि मुझे तुम्हारे जैसा दोस्त मिला.”

मेरी बात सुन कर उस के चेहरे पर से भी तनाव की रेखाएं गायब हो गई और वह मंदमंद मुस्कुराने लगा.

Illegal Migrants : अवैध प्रवासी मामला, 56 इंची सीना ट्रंप के सामने क्यों नहीं तना ?

Illegal Migrants : अमेरिका, कनाडा आदि देशों में अनेक देशों के लोग वैध या अवैध रूप से काम करने के लिए पहुंचते हैं. इन्हें एजेंट ले कर जाते हैं. अवैध रूप से रहने वाले पकड़े भी जाते हैं और वापस भी भेजे जाते हैं मगर देश की जनता ने इस से पहले कभी भी किसी भी सरकार के समय ऐसा दृश्य नहीं देखा कि भारत के लोग हथकड़ी व बेड़ियों में जकड़े किसी दूसरे देश के सैनिक विमान में ठूंस कर वापस किए गए हों.

5 फरवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी सेना के विमान में 104 प्रवासी भारतीयों को जंजीरों में जकड़ कर भारत वापस भेजा. बिलकुल ऐसे जैसे वे कोई खूंखार अपराधी या आतंकी हों. अमेरिका, कनाडा, मैक्सिको आदि जगहों पर करोड़ों की संख्या में अलग अलग देशों के लाखों नागरिक काम करने और पैसा कमाने की इच्छा से रह रहे हैं. इन में अधिकांश ऐसे हैं जिन के पास वहां रहने के लिए पर्याप्त दस्तावेज नहीं हैं. इन्हें एजेंट्स द्वारा वहां ले जाया जाता है. एजेंट्स लाखों रुपए ले कर अवैध तरीकों से इन देशों में उन को एंट्री दिलवा देते हैं.

भारत में भी ऐसे लोगों की भरमार है जो एजेंट्स द्वारा अच्छी कमाई का लालच दे कर यहां लाए जाते हैं. बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार के लाखों लोग भारत में अवैध तरीके से रह रहे हैं. यहां रहते हुए ये कुछ जरूरी मगर फर्जी दस्तावेज एजेंटों के माध्यम से बनवा लेते हैं. कुछ ऐसी ही स्थिति अमेरिका, कनाडा में रहने वाले प्रवासियों की है. पैसा कमाना और परिवार को ठीक से पालने की ख्वाहिश उन्हें वहां ले जाती है. मगर वे कोई ऐसे खूंखार अपराधी नहीं हैं जिन्हें जेल की सलाखों में ठूंस कर रखा जाए, प्रताड़ित किया जाए, उन्हें खानेपीने को न दिया जाए, बाथरूम तक न जाने दिया जाए या जंजीरों में बांध कर उन के देश वापस भेजा जाए.

भारतीय नागरिकों की इस तरह देश वापसी शर्मनाक तो है ही, उस से भी ज्यादा शर्मनाक है अमेरिकी सैनिक विमान को इस तरह चुपचाप अपनी जमीन पर उतरने देना. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आखिर वह साहस क्यों नहीं दिखा सके जो कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने दिखाया?

कोलंबिया के भी अनेक नागरिक अवैध रूप से अमेरिका में रह रहे हैं, इन में से कइयों को गिरफ्तार कर डिटेंशन सेंटर में रखा गया था. जब उन्हें अमेरिकी सैनिक विमान से कोलंबिया भेजने की कवायद अमेरिका ने की तो कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने उस विमान को अपनी धरती पर उतरने की इजाजत नहीं दी. उन्होंने अमेरिकी अधिकारियों से बात की और फिर अपने नागरिकों को सम्मान के साथ वापस लाने के लिए अपना यात्री विमान अमेरिका भेजा.

कोलंबिया के नागरिकों के विमान से उतरने की तस्वीरें इंटरनेट पर हैं. उन के चेहरे मास्क से ढके हुए हैं मगर उन के पैरों और कमर में कोई जंजीरें और हाथों में हथकड़ी नहीं लगी है. कोलंबिया के राष्ट्रपति ने अपनी पोस्ट में लिखा – अमेरिका से आने वाले हमारे साथी आजाद हैं. वे सम्मान के साथ उस जमीन पर वापस आ गए हैं जहां उन्हें प्यार किया जाता है. हम उन के लिए आसान क्रेडिट प्लान तैयार करेंगे. प्रवासी अपराध नहीं हैं. वे स्वतंत्र हैं. वे काम करना चाहते हैं और जीवन में तरक्की करना चाहते हैं.

किसी भी देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को यही करना चाहिए जो कोलंबिया के राष्ट्रपति ने किया. लेकिन अमेरिका द्वारा भारतीयों के अपमान और प्रताड़ना पर हमारे प्रधानमंत्री खामोश रहे. यही नहीं अमेरिकी विमान को इस तरह पंजाब के हवाई अड्डे पर उतारा गया ताकि राष्ट्रीय मीडिया उन प्रवासियों तक पहुंच कर उनके साथ हुए व्यवहार को उजागर न कर सके.

गौरतलब है कि जिस दिन दिल्ली में विधानसभा चुनाव था और जिस दिन प्रधानमंत्री मोदी कुंभ स्नान के लिए प्रयागराज के संगम तट पर थे, अमेरिकी विमान को उस दिन पंजाब में उतारा गया. यानी जिस दिन देश भर का मीडिया इन दो महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को कैप्चर करने में जुटा था, उस दिन चुपके से अमेरिकी सैन्य विमान को पंजाब में उतारा गया. देश की जनता और मीडिया की नजरों से बचा कर यात्रियों को विमान से उतार कर एक स्थान पर एकत्रित किया गया और उसके बाद उन्हें फटाफट उन के शहरों को रवाना कर दिया गया.

इस खबर के बाहर आने के बाद गोदी मीडिया सरकार की इस शर्मनाक हरकत को बैलेंस करने के लिए बताता रहा कि कैसे अमेरिका ने सिर्फ भारत नहीं मैक्सिको, कोलंबिया, ग्वाटेमाला के अवैध माइग्रेंट भी भेजे. यानी मोदी सरकार की कमजोरी छिपाने के लिए भारत को मैक्सिको और ग्वाटेमाला की कतार में खड़ा करते वक़्त गोदी मीडिया को रत्ती भर शर्म नहीं आई. भारत ने अमेरिका के सैनिक विमान को भारत की जमीन पर क्यों उतरने दिया, इस सवाल पर अभी तक चुप्पी पसरी हुई है.

उल्लेखनीय है कि अमेरिका में लैटिन अमेरिकी प्रवासियों की संख्या सब से अधिक है. लैटिन अमेरिका से अमेरिका आने वाले ज़्यादातर लोग मैक्सिको और मध्य अमेरिका से आते हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका की आबादी में 17.6% लोग हिस्पैनिक या लातीनी हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, 1 फरवरी, 2025 तक लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र की आबादी 66 करोड़ 67 लाख 45 हजार 551 थी.

यह आबादी दुनिया की कुल आबादी का 8.14% है. अर्जेंटीना, बोलीविया, ब्राजील, चिली, कोलंबिया, इक्वाडोर, पैराग्वे, पेरू, उरुग्वे, और वेनेजुएला जैसे दक्षिण अमेरिकी देश और क्यूबा, डोमिनिकन गणराज्य, और प्यूर्टो रिको जैसे कुछ कैरेबियाई देश लैटिन अमेरिकी देश कहलाते हैं जिन की अधिकांश आबादी अमेरिका में बसती है.

इस के बाद यहां चीन के लोग प्रवासी के तौर पर बसते हैं. खुद अमेरिकी सरकार के मुताबिक उन की संख्या 28,000 के ऊपर है यानी हमारे करीब 18,000 के डेढ़ गुना से ज्यादा, लेकिन ट्रंप की हिम्मत नहीं है कि उन को हाथों में हथकड़ी और पांवों में बेड़ियां डाल कर किसी मुजरिम की तरह अपने सैनिक विमान में भर के चीन भेज दे. वह चीन से डरता है क्योंकि चीन अपने नागरिकों के साथ अपने देश में चाहे जैसा बर्ताव करे मगर देश के बाहर किसी अन्य देश में वह अपने नागरिकों के सम्मान को देश का सम्मान मानता है.

यदि उस का कोई नागरिक किसी देश में किसी गलत कार्य के लिए पकड़ा भी जाता है तो कानूनी सीमा के भीतर ही उस के खिलाफ कार्रवाई होती है. यह चीन का रौब है. कानूनी सीमा के बाहर जा कर यदि किसी चीनी नागरिक के साथ किसी प्रकार का कोई दुर्व्यवहार होता है तो चीन दुर्व्यवहार करने वाले देश के नागरिकों को पकड़ के अपनी जेलों में बंद कर देता है. सम्मानित कूटनीतिक जर्नल फौरेन पौलिसी की पिछली साल की रपट कहती है कि चीनी जेलों में 5,000 से ज्यादा विदेशी कैदी हैं और इन में सब से ज्यादा अमेरिकी हैं.

चीन अमेरिका को अपनी धौंस में रखता है. चीनी राष्ट्रपति शी जिंगपिंग अपने राष्ट्र और अपने नागरिकों के सम्मान को सर्वोपरि रखते हैं. उन्होंने ‘दोस्त ट्रंप’ जैसा उद्घोष भी कभी नहीं किया मगर ‘दोस्त ट्रंप’ का उद्घोष करने वाले अपने प्रधानमंत्री मोदी और उन के नागरिकों को ट्रंप ने जिस तरह अपमानित किया उस के बाद भी मोदी यदि उन्हें दोस्त कहें तो यह दोस्ती नहीं उन का डर है. कूटनीति की ज़रा सी भी समझ रखने वाले बता सकते हैं कि क्या यह बराबरी का व्यवहार है ? दोस्ती का व्यवहार है ? भारतीयों के हाथों में पैरों में और कमर में जंजीरें बांधी गईं, क्या यह शर्मनाक नहीं?

ब्राजील के नागरिकों को हथकड़ियां पहनाई गई तो ब्राजील सरकार ने इस की निंदा की. वहां की मीडिया रिपोर्ट से पता चलता है की ब्राजील की सरकार ने ट्रंप प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगा है कि ब्राजील के 88 अवैध प्रवासियों के मूल अधिकारों का अपमान क्यों किया गया? इस तरह मैक्सिको ने एक अमेरिकी सैन्य विमान को लैंड करने से रोक दिया. इस विमान में 80 मैक्सिकन नागरिक थे. भारत ने कुछ इस तरह का किया होता तो हमारी छाती भी गर्व से फूल जाती.

देश की जनता ने इससे पहले कभी भी किसी भी सरकार के समय ऐसा दृश्य नहीं देखा कि भारत के लोग किसी हथकड़ी व बेड़ियों में किसी दूसरे देश के सैनिक विमान में ठूंस कर वापस किए गए क्योंकि वे अवैध तरीके से उस देश में घुसने का प्रयास कर रहे थे या रह रहे थे.

अमृतसर-पंजाब के संत रविदास अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अमेरिका से भेजे यात्रियों तक मीडिया ना पहुंच पाए इस के पूरे इंतजाम थे क्योंकि सरकार भी जानती है कि यह मामला किसी भी देश के लिए शर्मनाक है. यही वजह है कि अमेरिकी विमान के अंदर की तस्वीरें, प्रवासी भारतीयों की तस्वीरें, उन के बयान आदि मीडिया के पास नहीं हैं. सिर्फ इतनी जानकारी है कि विमान में 79 पुरुष, 25 महिलाएं और 12 नाबालिग बच्चे थे. ये तमाम लोग पंजाब के अलावा गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से थे. विमान में 11क्रू मेंबर और 45 अमेरिकी अधिकारी थे.

इन यात्रियों में 33 लोग गुजरात से थे, वही गुजरात जिसे मोदी सरकार विकास का मौडल बताते नहीं थकती है. अगर गुजरात में सचमुच विकास की लहर चल रही है तो गुजरात से लोग अवैध रास्तों से अमेरिका में काम करने या बसने के लिए क्यों जा रहे हैं? अब जब वे बेड़ियों व हथकड़ियों में जकड़ कर भेजे गए हैं तो उन्हें अपने ही देश में छुपा कर रखा जा रहा है. ताकि कोई इन्हें देख न ले. गुजरात की सच्चाई बाहर न आ जाए.

बेरोजगारी की समस्या से सिर्फ गुजरात नहीं जूझ रहा है. यह समस्या पूरे देश में कैंसर की तरह फैली हुई है, मगर प्रधानमंत्री मोदी हमारे विश्वगुरु होने का ढोल पीटते नहीं थकते हैं. अगर मोदी सरकार ने रिकौर्ड स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा कर दिए हैं और भारत सब से तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यस्था बन गई है तो इस तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को छोड़ने के लिए करोड़ों लोग क्यों मजबूर हैं? क्या भारत में उन के लिए जौब नहीं है?

अमेरिका में सात लाख 25 हज़ार अवैध भारतीय प्रवासी हैं. हाल के वर्षों में कनाडा की सीमा से भी बिना दस्तावेज़ वाले भारतीय कामगारों ने अमेरिका में दाखिल होने की कोशिश की. पिछले साल 30 सितंबर तक अमेरिकी बौर्डर पेट्रोल पुलिस ने कनाडा बौर्डर से 14 हज़ार से ज़्यादा भारतीयों को गिरफ़्तार किया, जो अवैध रूप से अमेरिका में घुसने की कोशिश कर रहे थे. अमेरिका में भारत के जितने अवैध प्रवासी हैं, उनमें ज्यादातर पंजाब और गुजरात के हैं.

प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, भारत से बड़े पैमाने में लोग अवैध तरीके से अमेरिका पहुंचते हैं. भारतीय कानून प्रवर्तन अधिकारियों के आंकड़ों का हवाला देते हुए खुद विदेश मंत्री जयशंकर ने सदन में कहा कि 2009 में 734, 2010 में 799, 2011 में 597, 2012 में 530 और 2013 में 550 निर्वासित किए गए. 2014 में जब एनडीए सरकार सत्ता में आई तो 591 निर्वासित किए गए, इस के बाद 2015 में 708 निर्वासित किए गए. 2016 में कुल 1,303 निर्वासित किए गए, 2017 में 1,024, 2018 में 1,180 लोग वापस भेजे गए. सब से अधिक निर्वासन 2019 में देखा गया जब 2,042 अवैध भारतीय अप्रवासियों को देश वापस भेजा गया. 2020 में निर्वासन संख्या 1,889 थी, 2021 में 805, 2022 में 862, 2023 में 670 और पिछले साल 1,368 और इस साल अब तक 104 भारतीयों को वापस भारत भेजा गया है. मगर यह पहली बार है कि भारतीय नागरिक बेड़ियों में जकड़ कर भेजे गए. दोस्त ट्रंप की ऐसी दोस्ती मोदी को मुबारक.

Film Review : ‘द मेहता बौयज’ पिता और उनके जवान बेटेबेटी के रिश्‍तों की कहानी, मूवी देख कर रो देंगे

Film Review : द मेहता बौयज
रेटिंग – 2 स्टार

ब्रह्मांड के सब से अधिक महत्वपूर्ण और अति जटिल पितापुत्र के रिश्तों पर अतीत में कई पारिवारिक कमर्शियल फिल्में बन चुकी हैं, जहां व्यवसायिकता हावी रही है और उन सभी फिल्मों में मेलोड्रामा की बहुतायत रही है. दर्शक फिल्म देखते हुए रोए या न रोए, मगर फिल्म के परदे पर किरदारों की आंखों से आंसू जबरन टपकते रहे हैं. पर अब अभिनेता से निर्देशक, सह निर्माता व सहलेखक बने बोमन ईरानी पितापुत्र के रिश्ते पर एक सहज फिल्म ‘द मेहता ब्यौयज’ ले कर आए हैं.

शिकागो, टोरंटो, साउथ एशियन, जरमनी, बर्लिन, इफ्फी आदि इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवलों में धाक जमाने के बाद अब यह फिल्म सात फरवरी से अमेजान प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है. फिल्म शुरू होते ही इस बात का अहसास हो जाता है कि इस फिल्म का अंत क्या होगा, इस के बावजूद दर्शक फिल्म पर से अपनी निगाहें हटाना नहीं चाहता. यह है बोमन ईरानी के निर्देशन व अभिनय का जादू. यह फिल्म जटिल रिश्तों की ऐसी सूक्ष्म पड़ताल करती है कि आप अपने रिश्तों पर पुनर्विचार करने को प्रेरित हो जाते हैं.

फिल्म ‘‘द मेहता ब्यौयज’ की कहानी नवसारी गुजरात में लोगों को टाइपिंग सिखातेसिखाते शिव मेहता (बोमन ईरानी) ने अपने बेटे अमय मेहता ( अविनाश तिवारी) को आर्किटैक्ट बना दिया. आर्किटैक्ट की पढ़ाई पूरी करने के बाद अमय मेहता मुंबई में आ कर बस गया. फिल्म शुरु होती है एक आत्मविश्वासी वास्तुकार/आर्किटैक्ट अमय (अविनाश तिवारी) के साथ जो बिस्तर पर लेटा हुआ छत से देख रहा है. वह अपनी कंपनी के अति महत्वाकांक्षी परियोजना के साथ संघर्ष कर रहा है. वह अपनी मां की मृत्यु की खबर से टूट जाता है. क्योंकि वह सिर्फ अपनी मां से प्यार करता था.

इधर कंपनी के मालिक (सिद्धार्थ बसु) को अमय से बहुत कुछ अनूठा चाहिए. अमय मुंबई में रह रहा है, लेकिन अभी भी अपने पैरों पर नहीं खड़ा है, वह मुंबई में अपने टूटेफूटे फ्लैट में ही रह रहा है. जारा (श्रेया चौधरी) स्नेह और आक्रोश के मिश्रण के साथ अमय से कहती है कि उस के अंदर टैलेंट है, मगर जारा को नहीं पता कि उस का पाला एक ऐसे पुरुष से हुआ है जो वह काम नहीं करेगा या नहीं कर सकता है जो उसे करना है, जहां वह चाहता है.

जारा गोंसाल्विस (श्रेया चौधरी), अमय को समझाती है कि दुनिया में औसत लोगों की ही भरमार है, और अमेय में टैलेंट की कमी नहीं है. जिस औफिस में अमय कार्यरत है, वहां पर जहांगीर इंस्टीट्यूट के लिए भारतीयता की पहचान दिलाने वाले नक्शे की जरूरत है. जारा चाहती है कि अमय अपने टैलेंट को उजागर कर सभी की बोलती बंद कर दे. इसी बीच अमय की मां की मौत हो जाती है. अमय अपने घर नवसारी पहुंचता है, जहां उस की बहन अनु मेहता पटेल ( पूजा सरुप ) अमेरिका से पहले ही आ चुकी है. भाईबहन आपस में बात करते हैं, जिस से यह एहसास होता है कि पिता व बेटे के बीच बहुत ज्यादा मधुर संबंध नहीं है.

पिता व पुत्र दोनों ही दो विपरीत ध्रुवों की तरह हैं. दोनों एकदूसरे को दिल से बहुत चाहते हैं. पर लोगों के साथ ही अनु को भी ऐसा नहीं लगता. नवसारी से वापस मुंबई आने से पहले बहन अनु के कहने पर अपने पिता से मिलने उन के कमरे में जा कर बताता है कि वह मुंबई वापस जा रहा है. तब पिता शिव बिस्तर से उठ कर अमय के पास तक तो आते हैं, पर गले नहीं लगा पाते. अनु बता चुकी है कि अब शिव उन के साथ अमेरिका जा रहे हैं.

अनु व शिव सामान बांध कर मुंबई से अमेरिका के लिए प्लेन पकड़ने के लिए मुंबई एयरपोर्ट पर पहुंचते हैं. एयरपोर्ट पर अमय भी पहुंच जाता है. पर कुछ समस्या के चलते शिव की टिकट दो दिन बाद की है और अनु रुक नहीं सकती. क्योंकि अमेरिका में उस के बच्चे अकेले हैं. मजबूरन अमय अपनी बहन अनु से वादा करता है कि वह पिता शिव को अपने साथ अपने मकान पर ले जाएगा और दो दिन बाद उन्हें प्लेन में बैठा देगा.

अमय के घर में पहुंचते ही मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है. इस बारिश के वक्त शिव के हाथ के बनाए गरमागरम नूडल्स खाते हुए बापबेटे टीवी पर चार्ली चैपलिन की फिल्म देखते हुए पहली बार हंसते हैं. यहीं से पितापुत्र के बीच की बर्फ पिघलनी शुरू होती है. इस के बाद क्या होता है यह जानने के लिए तो फिल्म देखनी ही पड़ेगी.

पीढ़ियों के बीच मतभेद आम बात है. हर पिता अपने बेटे को अपने हिसाब से कुछ बनाना चाहता है, अकसर बेटे भी अपने पिता की सोच के अनुरूप बनना चाहते हैं, पर समय के साथ कहीं न कहीं इसी बात पर पितापुत्र के बीच मतभेद/मनभेद अथवा पैसे को ले कर भेद भी हो जाते हैं, जिस के चलते रिश्ते कैसे बनतेबिगड़ते हैं, इसे बड़ी चतुराई व सहजता के साथ बिना उपदेशात्मक भाषणबाजी के बोमन ईरानी ने अपनी इस फिल्म में पिरोया है.

कहानी की भावनात्मक गहराई हर दर्शक को उस के आसपास के रिश्तों या घटनाओं की याद दिलाती है. पिता और बेटे का तनावपूर्ण रिश्ता हो या भाईबहन का सहज संबंध, आप को लगता है, ऐसे चरित्र आप के अपने जीवन में भी हैं. फिल्म जितनी मार्मिक है, उतनी ही मनोरंजक भी. फिल्म में शिव की पत्नी शिवानी को नहीं दिखाया गया है, मगर शिव की पत्नी शिवानी के व्यक्तित्व को शिवानी के न होने पर शिव, अमय व अनु की जिंदगी पर पड़ने वाले असर से समझा जा सकता है.

पिता अपने अनुभवों व उम्र के आधार पर सदैव इस अकड़ में रहता है कि वह सब कुछ जानता है. तो वहीं बेटे को अक्सर पिता का जब देखो तब ‘ज्ञान’ बांटते रहना अच्छा नहीं लगता. यह बात भी इस फिल्म से उजागर होती है. बोमन ईरानी ने अपनी फिल्म में सिर्फ पितापुत्र के रिश्ते की बात नहीं की है, बल्कि भाईबहन के रिश्ते की भी बात की है.

इस फिल्म में अनु व अमय के बीच का रिश्ता देख कर हर भारतीय रिलेट कर पाएगा, क्योंकि इसी तरह के रिश्ते हर भारतीय परिवार में भाईबहन के बीच नजर आते हैं. मगर लेखक व निर्देशक ने पिता व पुत्र के बीच की दूरियों पर बहुत कम कहा है. बोमन ईरानी ने फिल्म में बेवजह नाटकीयता परोसने से बचते नजर आए हैं. मगर फिल्म में एक आर्किटैक्ट की कारपोरेट कंपनी का जो माहौल दिखाया गया है, वैसा इन दिनों किसी भी कारपोरेट औफिस में नजर नहीं आता.

मुंबई शहर का परिदृश्य फिल्म में और पिता और पुत्र के बीच के रिश्ते में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ ही रूपक की तरह भी है. शिव का अपने बेटे अमय से गया वाक्य, ‘‘सभी शहर एक जैसे दिखते हैं. भारत, भारत जैसा नहीं दिखता’’ बहुत कुछ कह जाता है.

बोमन ईरानी ने फिल्म में कुछ कमाल के दृश्य रचे हैं. मसलन, पिता को घर में न पा कर उन की तलाश में अमय का निकलना और फिर कमर तक सड़क पर भरे पानी में पिता को सामान लाते देखने वाला सीन कमाल है. यह फिल्म आप को एक बेटी की बेबसी से रूबरू कराती है जो, अपने पिता को पूरी जिंदगी समेटते हुए देखती है, लेकिन उस के पास कोई विकल्प नहीं है. पर फिल्म का क्लाइमैक्स कमजोर होते हुए भी आंखों से आंसू टपका देता है.

शिव मेहता के किरदार में बोमन ईरानी छा गए हैं. पत्नी के निधन के बाद आत्मनिर्भर पति बनने का प्रयास हो, अपने घर की हर एक यादगार चीज छोड़ कर अमेरिका जाना हो या फिर मन में बेटे की चिंता के बावजूद चेहरे पर सख्ती बनाए रखने वाले दृश्य हों, उन्होंने उसे बेहतरीन ढंग से निभाया है.

इस फिल्म के असली हीरो वही है. उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि वह चाहे जितनी जिम्मेदारी एक साथ संभाल लें, पर अभिनय में उन का कोई सानी नहीं है. अनु के छोटे किरदार में भी पूजासरुप अपनी छाप छोड़ जाती है. एयरपोर्ट पर दो मिनट के दृश्य में तो वह दर्शक की आंखें गीली कर जाती हैं. अमय मेहता के किरदार में अविनाश तिवारी का काम अच्छा ही है. लेकिन कुछ दृश्यों में वे कमजोर पड़ गए हैं. जारा के किरदार में श्रेया चौधरी के हिस्से करने को कुछ खास आया नहीं, पर वह ठीकठाकसुंदर लगी हैं.

Delhi Elections : आम आदमी पार्टी की हार के मायने

Delhi Elections : दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार पर यह दुख तो है कि देश में ईमानदारी, बिना जातिधर्म का बक्सा लिए सिर्फ प्रशासनिक सुधारों की बात करने वाली एक पार्टी का खात्मा सा हो गया है पर यह भी साफ है कि आम आदमी पार्टी अपने घोषित उद्द्येश्य से कब की बाहर निकल चुकी थी और जनता से अपना प्यार खो बैठी थी.

2019 और 2025 के बीच आम आदमी पार्टी जनता के लिए नहीं, अपने फैलाव की ज्यादा सोच रही थी और तभी भारतीय जनता पार्टी के उपराज्यपाल एक के बाद एक तीर व गोलियां उस पर चला रहे थे और कोई उन्हें रोक नहीं रहा था. केंद्र सरकार ने एकएक कर के आप के मंत्रियों को गिरफ्तार किया और आम आदमी को उस से फर्क नहीं पड़ा. ‘आप’ अपने को बचाने में लगी रही पर जनता केंद्र सरकार की मनमानी के खिलाफ खड़ी नहीं हुई. आम आदमी पार्टी के नेताओं ने कभी बेईमानी की थी या नहीं, यह तो कभी पता नहीं चलेगा पर आम जनता को कभी इन गिरफ्तारियों पर दुख नहीं हुआ वरना तो अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर पूरी दिल्ली हिल जानी चाहिए थी.

भारतीय जनता पार्टी अरविंद केजरीवाल की विधानसभा को जीत लेने के बावजूद लोकसभा की सारी सीटें जीत रही थी. 2019 में जीती और 2024 में भी. केजरीवाल को अपनी राजनीति में जो बदलाव करना चाहिए था वह न ला कर वे अपनी पार्टी के पैर उन राज्यों में फैलाने लगे जहां मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस का सीधे था. नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के क्लब में होते हुए भी वे कांग्रेस के दोस्त न बन सके और दिल्ली में अपनी मौजदूगी के कारण मोदी की आंखों की किरकिरी बने रहे.

पार्टी को मजबूत करने की जगह वे पूजापाठी कार्यक्रम अपनाने लगे. लोगों को हरिद्वार, अयोध्या, इलाहाबाद की तीर्थयात्राएं कराने लगे. पार्टी को जो पैसा दिल्ली में मिलता था उस का उपयोग दूसरे राज्यों के चुनावों में खर्च करने लगे. उन्हें पंजाब में सफलता मिल गई तो वे फूल कर कुप्पा हो गए पर अपनी गिरफ्तारी पर जनता की चुप्पी का कोई इशारा उन्होंने नहीं समझा.

 

आम आदमी पार्टी का प्रयोग अभी असफल नहीं हुआ क्योंकि इस चुनाव में भी उसे 43 फीसदी वोट मिले हैं. 22 सीटें जीत कर व दमखम वाली पार्टी है पर पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल की खुद की नई दिल्ली की सीट की हार उन्हें और उन की पार्टी का भविष्य संदेह में डाल रही है. भारतीय जनता पार्टी का दिल्ली में राज कोई नया सवेरा लाएगा, ऐसी उम्मीद न करें. राज तो वैसा ही चलेगा जैसा दूसरे भाजपाशासित राज्यों में चल रहा है. बस, इतना फर्क होगा कि अब उपराज्यपाल आराम फरमाएंगे और भाजपा के मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के आदेशों को अक्षरश: मानेंगे.

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