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इन शब्दों को मिलाकर बनता है देश का बजट, जानें विस्तार से

बजट की प्रिंटिंग शुरू हो गई है. वित्त मंत्री अरुण जेटली देश का आम बजट 1 फरवरी को पेश करेंगे. आम आदमी से लेकर इंडस्ट्री को इस बार के बजट से काफी उम्मीदें हैं. हालांकि, बजट आने के बाद ही पता चलेगा कि ये कितना उम्मीदों पर खरा उतरता है. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि बजट में कुछ ऐसे शब्दों की प्रयोग किया जाता है, जिनका मतलब बहुत ही कम लोगों को पता होता है. आइए, जानते हैं बजट से जुड़े कुछ ऐसे शब्द जिनके बारे में बहुत कम लोगों को ही पता होता है.

जानिए कौन से हैं ये शब्द

सेंट्रल प्लान आउटले (Central plan outlay)

यह बजटीय योजना का वह हिस्सा होता है, जिसके तहत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के लिए संसाधनों का बंटवारा किया जाता है.

डायरेक्ट टैक्स (Direct tax)

डायरेक्ट टैक्स वह टैक्स होता है, जो व्यक्तियों और संगठनों की आमदनी पर लगाया जाता है, चाहे वह आमदनी किसी भी स्रोत से हुई हो, जैसे निवेश, वेतन, ब्याज आदि. इनकम टैक्स, कौरपोरेट टैक्स आदि डायरेक्ट टैक्स के तहत ही आते हैं.

इनडायरेक्ट टैक्स (Indirect tax)

ग्राहकों द्वारा सामान खरीदने और सेवाओं का इस्तेमाल करने के दौरान उन पर लगाया जाने वाला टैक्स इनडायरेक्ट टैक्स कहलाता है. कस्टम्स ड्यूटी और एक्साइज ड्यूटी आदि इनडायरेक्ट टैक्स के तहत ही आते हैं.

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कस्टम्स ड्यूटी और एक्साइज ड्यूटी (Custom Duty and Excise Duty)

कस्टम्स ड्यूटी वह चार्ज होता है जो देश में आयात होने वाले सामानों पर लगाया जाता है. एक्साइज ड्यूटी वह चार्ज होता है जो देश के भीतर बनाए जाने वाले सामानों पर लगाया जाता है.

आम बजट और अंतरिम बजट (Union Budget and Interim Budget)

बजट सरकार के सालाना खर्च का ब्यौरा होता है. इसके जरिए सरकार की प्राप्तियों और खर्च का लेखा-जोखा पेश किया जाता है. चुनाव वाले साल के दौरान अंतरिम बजट पेश किया जाता है, अन्यथा केंद्र सरकार हर साल आम बजट पेश करती है.

अनुदान मांगें

बजट में शामिल सरकार के खर्चों के अनुमान को लोक सभा अनुदान की मांग के रूप में पारित करती है. हर मंत्रालय की अनुदान की मांगों को सिलसिलेवार तरीके से लोक सभा से पारित कराया जाता है.

लेखानुदान मांगें

बजट को संसद में पारित कराने में लंबा समय लगता है और ऐसे में सरकार एक अप्रैल से पहले पूरा बजट पारित नहीं करा पाती. इस स्थिति में अगले वित्त वर्ष के शुरुआती दिनों के खर्च के लिए सरकार संसद की मंजूरी लेती है. इन मांगों को लेखानुदान मांगें कहते हैं.

योजनागत व्यय और गैर योजनागत व्यय

सरकारी व्यय को दो हिस्सों में बांटा जाता है- प्लान्ड एक्सपेंडिचर (योजनागत व्यय) और नौन प्लान्ड एक्सपेंडिचर (गैर योजनागत व्यय). इनमें से योजनागत व्यय का एस्टिमेट विभिन्न मंत्रालयों और योजना आयोग द्वारा मिल कर बनाया जाता है. इसमें मोटे तौर पर वे सभी व्यय आते हैं, जो विभिन्न विभागों द्वारा चलाई जा रही योजनाओं पर किया जाता है.

गैर योजनागत व्यय के दो हिस्से होते हैं- गैर योजनागत राजस्व व्यय और गैर योजनागत पूंजीगत व्यय. गैर योजनागत राजस्व व्यय में जो व्यय आते हैं, उनमें शामिल हैं- ब्याज की अदायगी, सब्सिडी, सरकारी कर्मचारियों को वेतन की अदायगी, राज्य सरकारों को अनुदान, विदेशी सरकारों को दिए जाने वाले अनुदान आदि. गैर योजनागत पूंजीगत व्यय में शामिल हैं- रक्षा, पब्लिक इंटरप्राइजेज को दिया जाने वाला कर्ज, राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और विदेशी सरकारों को दिया जाने वाला कर्ज.

पूंजीगत व्यय और राजस्व व्यय

कैपिटल एक्सपेंडिचर या कैपेक्स (पूंजीगत व्यय) किसी सरकार द्वारा किया जाने वाला वह व्यय होता है, जो भविष्य के लिए लाभ का सृजन करता है. कैपेक्स का इस्तेमाल संपत्तियां या इक्विपमेंट आदि खरीदने के लिए किया जाता है. इसके अलावा विभिन्न इक्विपमेंट के अपग्रेडेशन के लिए भी इसका उपयोग होता है. सरकार के रेवेन्यू अकाउंट से खर्च होने वाली राशि को रेवेन्यू एक्सपेंडिचर (राजस्व व्यय) कहा जाता है. इसमें सरकार के रोजमर्रा के खर्च शामिल होते हैं.

सब्सिडी (Subsidies)

किसी सरकार द्वारा व्यक्तियों या समूहों को नकदी या कर से छूट के रूप में दिया जाने वाला लाभ सब्सिडी कहलाता है. भारत जैसे कल्याणकारी राज्य (वेलफेयर स्टेट) में इसका इस्तेमाल लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए किया जाता है. भारत सरकार ने आजादी के बाद से अब तक विभिन्न रूपों में लोगों को सब्सिडी दी है, चाहे वह डीजल सब्सिडी हो या फूड सब्सिडी.

राजस्व कर (Tax revenue)

कोई सरकार टैक्स लगा कर जो रेवेन्यू हासिल करती है, उसे टैक्स रेवेन्यू कहा जाता है. सरकार विभिन्न प्रकार के टैक्स लगाती है, ताकि वह योजनागत और गैर योजनागत व्यय के लिए धन एकत्र कर सके. यह सरकार की आय का प्राथमिक और प्रमुख स्रोत है.

गैर राजस्व कर (Non tax revenue)

नौन टैक्स रेवेन्यू वह राशि है, जो सरकार टैक्स के अतिरिक्त अन्य साधनों से एकत्र करती है. इसमें सरकारी कंपनियों के विनिवेश से मिली राशि, सरकारी कंपनियों से मिले लाभांश और सरकार द्वारा चलाई जाने वाली विभिन्न आर्थिक सेवाओं के बदले मिली राशि शामिल होती है.

चालू खाते का घाटा (Current account deficit)

चालू खाते का घाटा यानी करंट अकाउंट डे‍फिसिट देश में विदेशी मुद्रा की कुल आवक व निकासी का अंतर बताता है. विदेशी मुद्रा की आवक निर्यात, पूंजी बाजार में निवेश, प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश और विदेश रह रहे लोगों द्वारा स्‍वदेश भेजे गए पैसे यानी रेमिटेंस के जरिए होती है. जब विदेशी मुद्रा की निकासी आवक से ज्‍यादा होती है, तो घाटा होता है.

राजस्व घाटा (Revenue Deficit)

राजस्व घाटे का मतलब सरकार की अनुमानित राजस्व प्राप्ति और व्यय में अंतर होता है. किसी वित्त वर्ष के लिए सरकार राजस्व प्राप्ति और अपने खर्च का एक अनुमान लगाती है. लेकिन जब उसका व्यय उसके अनुमान से बढ़ जाता है, तो इसे राजस्व घाटा कहा जाता है.

वित्तीय घाटा (Fiscal Deficit)

वित्तीय घाटा बताता है कि किसी वित्त वर्ष के दौरान सरकार की कुल आमदनी (उधार को छोड़ कर) और कुल खर्च का अंतर कितना है. वित्तीय घाटे के बढ़ने का मतलब है कि सरकार की उधारी बढ़ेगी. यहां ये भी समझना जरूरी है कि अगर उधारी बढ़ेगी तो ब्याज की अदायगी भी बढ़ेगी. ब्याज का बोझ बढ़ने से सरकार के राजस्व घाटे पर नकारात्मक असर पड़ेगा.

प्राथमिक घाटा (Primary Deficit)

देश के वित्तीय घाटे और ब्याज की अदायगी के अंतर को प्राथमिक घाटा कहते हैं. प्राथमिक घाटे के आंकड़े से इस बात का पता चलता है कि किसी भी सरकार के लिए ब्याज अदायगी कितनी बड़ी या छोटी समस्या है.

राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit)

आय और खर्च के अंतर को दूर करने के लिए हर साल सरकार की ओर से लिया जाने वाला अतिरिक्त कर्ज राजकोषीय घाटा कहलाता है. देखा जाए तो राजकोषीय घाटा घरेलू कर्ज पर बढ़ने वाला अतिरिक्त बोझ ही है.

तमन्ना भाटिया पर स्टोर के कर्मचारी ने फेंका जूता, और फिर हुआ ऐसा…

बौलीवुड और दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम करने वाली अदाकारा तमन्ना भाटिया पर एक शख्स ने जूता फेंक दिया, जिसे धर दबोचा गया है. हैदराबाद के हिमायत नगर में तमन्ना रविवार (28 जनवरी) को एक ज्वैलरी स्टोर का उद्घाटन करने पहुंची थीं तभी उन्हें इस असहज स्थिति का सामना करना पड़ गया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पुलिस ने आरोपी को दबोचने में देर नहीं की. पुलिस के मुताबिक स्टोर के एक 31 वर्षींय कर्मचारी ने तमन्ना पर जूता फेंका था.

नारायनगुडा पुलिस थाने के इंस्पेक्टर बी रविंदर ने मीडिया को बताया कि जब तमन्ना स्टोर से बाहर आ रही थीं तभी मुशीराबाद के रहने वाले बीटेक ग्रेजुएट करीमुल्ला ने उनके ऊपर जूता उछाल दिया. जूता हालांकि तमन्ना को न लगकर स्टोर के एक कर्मचारी को लगा.

इस्पेक्टर ने बताया कि आरोपी करीमुल्ला ने पूछताछ में बताया कि वह तमन्ना की हाल की कुछ फिल्मों में किए गए उनके किरदारों से निराश था, जिसकी वजह से उन पर जूते से हमला कर दिया. जिस कर्मचारी को जूता लगा था उसने करीमुल्ला के खिलाफ संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कराया है.

तमन्ना भाटिया भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे बड़ी फिल्मों में से एक साबित हुई ‘बाहुबली’ के दोनों भागों में नजर आई थीं. तमन्ना हिन्दी फिल्मों के अलावा तमिल और तेलुगू फिल्मों में काम करती हैं. कई फिल्मों में वह अपना लोहा मनवा चुकी हैं. दक्षिण के अलावा हिन्दी पट्टी में भी तमन्ना के भारी तादाद में प्रशंसक हैं. हिन्दी फिल्मों में वह पहले से स्थापित कई दिग्गज हीरोइनों को टक्कर देती नजर आती हैं. हाल ही में तमन्ना एक विज्ञापन में दक्षिण के शाही अंदाज में नजर आई थीं. इस पर उन्होंने कहा था कि उन्हें शाही अंदाज हमेशा से लुभाता है.

तमन्ना फिलहाल अपनी आने वाली तेलुगू फिल्म ‘ना नूवे’ को लेकर व्यस्त चल रही हैं. इस फिल्म के लिए वह खास ‘टैंगो डांस सीख रही हैं. इसकी जानकारी तमन्ना ने एक इंटरव्यू में दी थी. फिल्म में तमन्ना के साथ कलाकार नंदमूरि कल्याण राम मुख्य भूमिका में नजर आएंगे. फिल्म में तमन्ना मीरा नाम की रेडियो जौकी की भूमिका निभाती नजर आएंगी. तमन्ना ने 2005 में महज 15 वर्ष की उम्र में फिल्म ‘चांद सा रोशन चेहरा’ से फिल्मों में डेब्यू किया था. इसी साल उन्होंने तेलुगू फिल्म ‘श्री’ से दक्षिण के सिनेमा में कदम रखा था.

परिणीति ने शेयर की स्ट्रैच मार्क की फोटो, लोगों ने दिये ऐसे रिएक्शन

आमतौर पर लोग अपनी कमियों को सोशल मीडिया पर छिपाते हैं. ढेर सारे फिल्टर और फोटोशौप की मदद से वह खुद को और भी ज्यादा खूबसूरत दिखाते हैं. बौलीवुड अभिनेत्रियों को भी अक्सर अपने बौडी टाइप और फिगर के चलते खासतौर पर सोशल मीडिया पर आलोचना का सामना करना पड़ता है.

लेकिन एक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा अपनी कमियां छिपाने से बिल्कुल नहीं डरती हैं, इसका अंदाजा आप उनकी लेटेस्ट तस्वीर से लगा सकते हैं. हाल ही में परिणीति चोपड़ा ने इंस्टाग्राम पर अपनी एक पोस्ट की जिसमें वो सन ग्लासेस लगाए नजर आ रही हैं और उन्होंने ब्लैक रंग के क्रौप टौप को डैनिम जैकेट के साथ कैरी किया है.

इस तस्वीर में यूं तो परिणीति काफी खूबसूरत लग रही हैं लेकिन इस तस्वीर में उनकी कमर के स्ट्रैच मार्क्स दिख रहे हैं. परिणीति की इस तस्वीर को लोगों के मिक्स रिएक्शन मिले हैं. जहां कुछ फैंस इसे एक साहसिक कदम बता रहे हैं तो वहीं कुछ इसकी आलोचना भी कर रहे हैं. लेकिन परिणीति चोपड़ा ने जिस अंदाज में अपने स्ट्रैच मार्क्स को फ्लौट किया है वो वाकई काबिले तारीफ है.

अपने स्ट्रेच मार्क्स छिपाने की जगह दिखाने पर फैन्स उनकी खूब तारीफ कर रहे हैं. तेजी से वायरल हो रही परिणीति चोपड़ा की इस तस्वीर को एक दिन में 6 लाख से ज्यादा लाइक्स और 3 हजार से ज्यादा कमेंट्स मिल चुके हैं.

ऐसा पहली बार नहीं है जब परिणीति चोपड़ा को फैंस या सोशल मीडिया पर किसी प्रकार की आलोचना का समाना करना पड़ रहा है. इससे पहले वो अपने मोटापे के लिए भी आलोचनाओं का शिकार चुकी हैं. साल 2011 में फिल्म ”लेडीज वर्सेस रिकी बहल” से बौलीवुड में डेब्यू करने वाली परिणीति ने कुल 9 फिल्मों में काम किया है. शुरूआत में परिणीति को अपने मोटापे और ड्रैसिंग सेंस की वजह से काफी आलोचनाओं का समाना करना पड़ा था जिसके बाद परिणीति ने फिल्म ‘किल दिल (2014)’ के बाद परफेक्ट और फिट बौडी पाने के लिए 3 साल का ब्रेक लिया था.

दरअसल, परिणीति अपने वजन और मोटापे को लेकर अक्सर सवालों के घेरे में रही हैं. इस वजह से उन्होंने वजन घटाने के लिए इलाज शुरू किया था. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, परिणीति ने आस्ट्रिया में डीटौक्स का सहारा लेकर वजन घटाया.

बता दें कि आखिरी बार फिल्म ‘गोलमाल 4 (2017)’ में नजर आईं परिणीति जल्द ही अक्षय कुमार के साथ फिल्म ‘केसरी’ और अर्जुन कपूर के साथ फिल्म ‘संदीप और पिंकी फरार’ में दिखाई देंगी.

शरदकालीन बदलाव के हिसाब से कुछ इस तरह अपनाएं एसेसरीज

शरदकाल में आप की अलमारी में नई ताजगी तो आ ही जाएगी, साथ ही एसेसरीज में भी कई बदलाव आ जाएंगे. पिछले साल के मफलरों से इतर सोचिए और उन एसेसरी ट्रैंड्स को अपनाने को तैयार हो जाइए जो सर्दी के मौसम को मजेदार बना देंगे.

मौसम की भविष्यवाणी करने वालों के मुताबिक, चारों ओर चमक बिखरी है. गले के हार से ले कर अंगूठियों तक, हरेक चमक में मौसम का मिजाज छिपा है. लाइमरोड की इनहाउस स्टाइलिस्ट नताशा टेटे ने सब से ज्यादा फैशनेबल एसेसरीज की लिस्ट तैयार की है जिन में औटम अपील है.

शहरी हो गई पाजेब

अब पायल निकाल लीजिए. ये ट्रैंड कर रही हैं. हालांकि आप को मौजूदा कलैक्शन में कुछ चीजें जोड़नी होंगी :

रोज गोल्ड ग्लोरी :  एंकलेट वर्ल्ड में समकालीन रंग सिर चढ़ कर बोल रहे हैं. पाउडर पिंक ड्रैस के साथ गुलाबी सुनहरी पायल पहनें तो इस औटम में आप के हलके रंग की पोशाकों के साथ एसेसरीज का जलवा देखते ही बनेगा.

चार्म्ड टू परफैक्शन :  मनमोहक पायल तो रहनी ही रहनी है. ये सुंदर और शानदार हैं. इस ठंड में ये आप के कैजुअल काफतान और डेनिम अटायर्स को पूरी तरह अनोखा बना सकती हैं. आप चाहें तो इसे आदिवासी जनजीवन की प्रतिकृतियों वाली मैक्सी पोशाकों, टैटर्ड शौर्ट्स और टी डुओज के साथ भी पहन सकती हैं.

क्रिस्टल एड टू :  टू रिंगकमएंकलेट तो सुपर ट्रैंडी है. अगर आप को इंडोवैस्टर्न लुक भाता है तो क्रिस्टल स्टडेड पायल निश्चितरूप से भाएगा. आप इसे कढ़ाई वाले ईवनिंग गाउन के साथ पहन सकती हैं. आप इसे सभी एथनिक अटायर्स के साथ भी पहन सकती हैं.

सुर्खियों में नैकलैस

औटम के मौसम का असर नैकलैस की दुनिया पर पहले ही दिख चुका है और ज्वैलरी बौक्स के मुकाबले नए चलन हावी हो रहे हैं. विभिन्न रंगों के स्टोन से ले कर क्लासिक चेन तक, नैकलैस वर्ल्ड इन सब से संपूर्ण है.

लेयर्ड राइट :  पतला लेकिन प्रभावी लेयर्ड नैकलैस के लिए पिछले सीजन का लगाव इस बार फिर से लोकप्रिय हो रहा है. स्टोन्स, स्पाइक्स, चार्म्स के साथसाथ फ्रिंज्ड पेंडेंट, लेयर्ड नैकलैस हर किसी को भा रहे हैं. ये आप की कामकाजी ड्रैस और रेगुलर टौप के साथ पहने जाने के लिए श्रेष्ठ हैं.

बल्की स्टोन चेन  :  औटम के मौसम में चेन कुछ मोटे लोगों के लिए ‘क्लासिक और क्लासी’ है. स्टोन से सजी चेन इस मौसम में लोकप्रिय हैं. ये आप के डीप नैक वाले पहनावे के लिए उपयुक्त हैं.

अर्बन ट्राइबल स्टेटमैंट पीस :  हिंट अर्बन चार्म के साथ ट्राइबल स्टेटमैंट पीस का चलन बढ़ रहा है. यह आप की बेल-स्लीव्ड ड्रैस और रिप्ड टैंक टीज के साथ फ्लोवर चाइल्ड वाइब्स के लिए अनुकूल है.

स्वयं की ईयररिंग्स 

इस बार ईयररिंग (कान की बाली) के संबंध में काफी कुछ नया देखने को मिल रहा है. आप कुछ सौलिड मेटालिक पेयर के साथसाथ कुछ रीडिफाइंड ट्राइबल टौप्स देखेंगी.

कौपर गोल्ड हूप  :  हूप ईयररिंग्स कैटलौग में फिर से छाई हुई हैं और यह पहले से बेहतर हैं. यह स्टाइलिश हैं और इन्हें पहन कर आप कहीं भी जा सकती हैं.

ट्राइबल ऐंड टेसेल्ड  :  लटकन बालियां इस सीजन में प्रत्येक बोहो ब्रेन के लिए उपयुक्त ज्वैलरी हैं. रस्टिक रेड से ले कर नौटी नियोन में, इस मौसम में इंद्रधनुषी बहार है. यदि आप के पास खुद के सौलिड इंसेंबल्स हैं, तो कलरफुल टेसेल्ड ईयररिंग्स आप के लुक में निश्चित तौर पर चारचांद लगा देंगी.

तो फिर अब अपने व्यक्तित्व को जादुई लुक प्रदान करें.

संगृहीत नहीं होता वीर्य, इसके तमाम पहलुओं को युवाओं को समझना जरूरी है

आलोक के सासससुर व मातापिता परेशान हो गए. आलोक की बीवी उस के घर आने को तैयार नहीं थी. उसे बहुत समझाया, मगर वह मानी नहीं. इस की पूरी पड़ताल की गई. तब सचाई का पता चला कि आलोक अपनी बीवी के साथ हमबिस्तरी करने से दूर भागता था, इस कारण उस की बीवी उस के पास रहना नहीं चाहती थी.

आलोक के दोस्तों से बात करने पर पता चला कि आलोक अपनी ताकत नहीं खोना चाहता था. इस कारण वह अपनी बीवी से दूर भागता था.

उस का कहना था, ‘‘वीर्य बहुत कीमती होता है. उसे नष्ट नहीं करना चाहिए. इस के संग्रह से ताकत बढ़ती है.’’ यह जान कर आलोक के मातापिता ने अपना सिर पीट लिया.

ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जिन में हमें इस बात का पता चलता है कि यह भ्रम कितनी व्यापकता से फैला हुआ है, इस भ्रम की वजह से कई खुशहाल परिवार उजड़ जाते हैं. इन उजड़े हुए अधिकांश परिवारों के व्यक्तियों का मानना होता है कि वीर्य संगृहीत किया जा सकता है. क्या इस के संग्रह से ताकत आती है? क्या वाकई यह भ्रम है या यह हकीकत है. हम यहां इस को समझने का प्रयास करते हैं.

आलोक के मातापिता समझदार थे. वे आलोक को डाक्टर के पास ले गए. डाक्टर यह सुन कर मुसकराया. उन्होंने आलोक से कहा, ‘‘तुम्हारी तरह यह भ्रम कइयों को होता है.’’

डाक्टर ने आलोक को कई उदाहरण दे कर समझाया तब उस की समझ में आया कि उस ने वास्तव में एक भ्रम पाल रखा था, जिस के कारण उस का परिवार टूटने की कगार पर पहुंच गया था. उस के परिवार और उस की खुशहाल जिंदगी को डाक्टर साहब और उस के मातापिता ने अपनी सूझबूझ से बचा लिया. नतीजतन, वह आज अपनी बीवी और 2 बच्चों के साथ खुशहाल जिंदगी जी रहा है.

शरीर विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञान के अपने नियम हैं. उन के अपने सिद्धांत हैं. वे उन्हीं का पालन करते हैं. नियम कहता है कि वीर्य को संगृहीत नहीं किया जा सकता है. जिस तरह एक भरे हुए गिलास में और पानी नहीं भरा जा सकता है वैसे ही वीर्यग्रंथि में एक सीमा के बाद और वीर्य नहीं भरा जा सकता है. यदि शरीर में वीर्य बनना जारी रहा तो वह किसी न किसी तरह शरीर से बाहर निकल जाता है.

वीर्य का गुणधर्म है बहना

वीर्य शरीर से बहने और बाहर निकलने के लिए शरीर में बनता है. वह किसी न किसी तरह बहेगा ही. यदि आप हमबिस्तरी कर के पत्नी के साथ आनंददायक तरीके से बहा दें तो ठीक से बह जाएगा, यदि ऐसा नहीं करोगे तो वह स्वप्नदोष के जरिए बह कर निकल जाएगा.

वीर्य का कार्य प्रजनन चक्र को पूरा करना होता है. बस, वहीं उस का कार्य और वही उस की उम्र होती है. उस में उपस्थित शुक्राणु औरत के शरीर में जाने और वहां अंडाणु से मिल कर शिशु उत्पन्न करने के लिए ही बनते हैं. उन की उम्र 2 से 3 दिन के लगभग होती है. यदि उस दौरान उन का उपयोग कर लिया जाए तो वे अपना कार्य कर लेते हैं अन्यथा वे मृत हो जाते हैं.

मृत शुक्राणु अन्य शुक्राणु को मारने का काम भी करते हैं. इसलिए इस को जितना बहाया जाए, शरीर में उतने स्वस्थ शुक्राणु पैदा होते हैं. शरीर मृत शुक्राणुओं को शरीर से बाहर निकालता रहता है. इस से शरीर की क्रिया बाधित नहीं होती है.

शरीर को ताकत यानी ऊर्जा वसा और कार्बोहाइड्रेट से मिलती है. हम शरीर की मांसपेशियों को जितना मजबूत करेंगे, हम उतने ताकतवर होते जाएंगे. यही शरीर का गुणधर्म है. इसी वजह से शारीरिक मेहनत करने वाला 40 किलो का एक हम्माल 100 किलोग्राम की बोरी उठा लेता है जबकि 100 किलोग्राम का एक व्यक्ति 40 किलोग्राम की बोरी नहीं उठा पाता. इसलिए यह सोचना कि वीर्य संग्रह से ताकत आती है, कोरा भ्रम है.

इस ट्रिक से आपका मेमोरी कार्ड बन जाएगा फोन की इंटरनल मेमोरी

आपको याद होगा पहले स्मार्टफोन कम इंटरनल मेमोरी के साथ आते थे. उस समय फोन की मेमोरी को माइक्रो एसडी कार्ड के जरिए बढ़ाया जाता था. एसडी कार्ड से मेमोरी तो बढ़ जाती थी लेकिन कार्ड खराब होने या इसके खो जाने पर आपका डाटा लौस हो जाता था.

मेमोरी कार्ड में आपका महत्वपूर्ण डाटा होता था और आप काफी परेशान होते थे. इसके बाद मोबाइल निर्माता कंपनियों ने इंटरनल मेमोरी को बढ़ा दिया. अब अधिकतर फोन ज्यादा इंटरनल मेमोरी के साथ बाजार में आ रहे हैं. हालांकि इनमें से कुछ में माइक्रो एसडी कार्ड का भी विकल्प होता है.

लेकिन शायद ही आपको ये पता हो कि आप फोन के मेमोरी कार्ड को इंटरनल मेमोरी बना सकते हैं. यहां हम आपको ऐसी ट्रिक बताने जा रहे हैं, जिसकी मदद से आप अपने फोन की इंटरनल मेमोरी को बढ़ा सकते हैं इसके लिए आपको कोई ऐप डाउनलोड करने की जरूरत नहीं है. यह आप कुछ सिंपल स्टेप में फोन की सेटिंग में बदलाव कर ऐसा कर सकते हैं.

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ऐसे बढ़ाए इंटरनल मेमोरी

हम जो ट्रिक आपको बताने जा रहे हैं उसके माध्यम से आपके फोन की इंटरनल मेमोरी और SD कार्ड मेमोरी एक ही हो जाएगी. ऐसा करने पर फोन की सभी चीजें आपकी इंटरनल मेमोरी में सेव हो जाएंगी. ऐसा होने पर आपको ज्यादा मेमोरी यूज करने को मिल जाएगी. फोन की मेमोरी फुल होने पर आपको मीडिया फाइल्स को SD कार्ड में मूव नहीं करना होगा. इसके लिए आपको ये स्टेप फौलो करने होंगे.

यह करना होगा

फोन की इंटरनल मेमोरी और माइक्रो एस डी कार्ड की मेमोरी को एक करने के लिए सबसे पहले स्मार्टफोन की Settings में जाकर Storage पर टैप करें. अब इसमें आपको Portable Storage (पोर्टेबल स्टोरेज) का औप्शन मिलेगा, उस पर टैप करें. इसके बाद फोन में नया पेज ओपन होगा जिसमें आप टौप पर दिखाई दे रहे तीन डौट को टैप करें. अब फिर से Settings का औप्शन दिखेगा, उस पर टैप करें. Settings में जाने के बाद Format as internal पर टैप करें.

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इसके बाद आपको Erase & Format पर टैप करना होगा और आगे की प्रोसेस फौलो करते जाएं. ऐसा करने से पहले अपना डाटा सेव करके रख लें. ताकि डाटा के डिलीट होने का कोई चांस न रहे. इस प्रोसेस के पूरा होने पर इंटरनल स्टोरेज SD Card की स्टोरेज ले लेगी. अब आप जो भी ऐप और गेम इंस्टौल करेंगे वो इंटरनल स्टोरेज में सेव होंगे.

सत्ता को बेलगाम होने से नियंत्रित कर सकता है मजबूत विपक्ष

प्रांतीय विधानसभाओं और संघीय संसद के चुनावों के छह सप्ताह बाद जाकर नेपाली कांग्रेस ने यह जानने के लिए कार्यसमिति की बैठक बुलाई कि आखिरकार उसकी करारी शिकस्त के पीछे की वजह क्या रही? लेकिन इस बैठक में कोई सार्थक बहस की बजाय सबने अपना आक्रोश ही व्यक्त किया.

पार्टी के पूर्व महासचिव प्रकाशमान सिंह ने आरोप लगाया कि मौजूदा पार्टी अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा किसी से बिना सलाह-मशविरा किए मनमाने तरीके से पार्टी चला रहे हैं, तो वहीं देउबा ने प्रकाशमान सिंह को चेतावनी दी कि अगर उन्होंने सार्वजनिक रूप से उनके विरुद्ध बोला, तो उनके खिलाफ ‘अनुशासनात्मक कार्रवाई’ की जाएगी. आश्चर्य की बात नहीं कि पार्टी अध्यक्ष अन्य नेताओं के निशाने पर आ गए हैं.

गगन थापा ने बुजुर्ग नेताओं से यह अपील की कि वे ‘अब सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लें’ और पार्टी के नौजवान नेताओं को नेतृत्व सौंप उनके अभिभावक की भूमिका संभालें. इसी हफ्ते एक इंटरव्यू में पार्टी के वरिष्ठ नेता शेखर कोईराला ने चुनावों में नेपाली कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के लिए कई कारण गिनाए थे. उन्होंने कहा था कि इस पराजय की जिम्मेदारी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को स्वीकार करनी चाहिए.

कांग्रेस के नेता अपनी पार्टी के लोकतांत्रिक इतिहास की दुहाई देते कभी नहीं थकते, फिर भी अपनी हार की समीक्षा के लिए बैठक बुलाने में उसे इतना लंबा समय लगा. यह बताता है कि इस पार्टी के नेता किसी बदलाव के विचार के प्रति कितने उदासीन हैं? आम धारणा यही है कि देउबा और वे तमाम लोग, जो पार्टी के आंतरिक विमर्श से खुद को बचाने की जुगत में हैं, वे यथास्थिति बनाए रखने के लिए वह सब कुछ करेंगे, जो वे कर सकते हैं.

पार्टियां आती हैं और जाती हैं, अनेक लोकतांत्रिक देशों का इतिहास इसका साक्षी है. लेकिन नेपाली कांग्रेस को लेकर चिंता किसी गुट के हितों से नहीं, बल्कि नेपाली लोकतंत्र की सेहत से जुड़ी है. आखिरकार एक मजबूत विपक्ष ही सत्ता को बेलगाम होने से नियंत्रित कर सकता है, न कि कमजोर और बिखरा हुआ.

सांड़ों की दुर्दशा : गायों को बचाने वालों को सांड़ों की परवाह ही नहीं

दरअसल, मुझे इस शानदार जानवर को देख कर अफसोस होता है, जिसे सांड़ कहते हैं. मैं जब अलवर के एक बैंक मेले में थी तो देखा कि एक सांड़ बिना किसी का कोई नुकसान किए घुस आया. हर स्टाल वाले, जो सिर्फ बैंकिंग की जानकारी दे रहे थे, उसे मार कर भगाने लगे. राह चलते भी उसे मारने लगे. चौकीदार उसे अपने डंडे से हटाते रहे. वह सिर्फ अपने को बचाने की कोशिश करता रहा. हालांकि उस के साइज के हिसाब से यह कोई आसान न था. अंतत: वह मेले के मैदान से कुछ घाव लिए निकल गया.

सांड़ सब्जी मंडियों में जाते हैं ताकि फेंकी गई सब्जियां, पत्ते और फल खा सकें. पर उन्हें खाना खिलाने की जगह उन पर लाठियां चलाई जाती हैं और कई बार तेजाब तक डाल दिया जाता है. बिना तेजाब के जख्म वाले सांड़ को ढूंढ़ना ही मुश्किल है. गौरक्षक के लिए जाना जाने वाले शहर गोरखपुर की म्यूनिसिपल कमेटी उन्हें पकड़ कर बाड़ों में बंद करती है, लेकिन वहां खाने को कुछ नहीं मिलता. कुछ दिन बाद वे दम तोड़ देते हैं.

गौशाला में भी जगह नहीं

गौशालाएं सांड़ों को नहीं रखतीं. इसीलिए वे गलियों में घूमते रहते हैं और हर रोज पीटे जाते हैं. कुछ को रात को पकड़ कर बूचड़खानों के हवाले कर दिया जाता है. गायों को तो लोग खाना खिला देते हैं पर सांड़ों को खिलाने का कोई रिवाज नहीं है. वे शिव के वाहन के रूप में पूजे जाते हैं पर उन का और उपयोग नहीं है. वे गायों की तरह दूध भी नहीं देते.

अगर मादा गाय को दूध के लिए पालापोसा जाता है तो नर चौपाए को बैल के रूप में ही स्वीकार किया जाता है. जब उस के अंडकोषों को पत्थरों से बेरहमी से कुचल कर खसिया कर दिया जाए ताकि खेतों या बैलगाड़ी में इस्तेमाल करा जा सके. वह गायों को गर्भवती नहीं बना सकते. 4 साल के ऊपर के नर बछड़े कहीं देखने को नहीं मिलेंगे. जहां सांड़ों की पूजा होती है वहां भी उन्हें मारा जाता है.

गायों के गर्भाधान के लिए शुक्राणु वाला सीमन अब खास तरह के सांड़ों से जमा किया जाता है, जिन्हें बांध कर इसी काम के लिए दवाइयां दे कर तैयार करा जाता है और कृत्रिम गर्भाधान से गायों को गर्भवती बनाया जाता है. सांड़ एक आकर्षक प्राणी है पर मरजी का मालिक है. वह अब इसी गुण या अवगुण कहिए का शिकार हो रहा है और शिवभक्त भी नहीं बचा रहे हैं.

तीन तलाक : फैसले से इतर भी हैं कई फसाद

बीती 22 नवंबर को एक बार फिर जब यह चर्चा आम हुई कि सरकार तीन तलाक को ले कर या तो पुराने कानून में संशोधन करेगी या फिर सिरे से नया कानून बनाएगी तो लोगों को सहसा याद आया कि इस मसले पर कुछ दिन पहले ही तो खासा हंगामा मचा था, लेकिन फिर बात आईगई हो गई.

मगर इस बार इस खबर का कोई असर आम लोगों पर नहीं हुआ कि सरकार एक बार में तीन तलाक का रिवाज खत्म कर नए कानून में क्याक्या बदलाव करेगी और उस से मुसलिम महिलाओं को क्या हासिल होगा. यह जरूर लोगों ने सोचा कि क्या अब तलाक के लिए मुसलिम दंपतियों को भी अदालतों की खाक छानते हुए कानूनी सजा जिसे रहम कहा जा रहा है भुगतनी पड़ेगी?

कानून में दिचलस्पी रखने वालों को जरूर इस बात पर हैरत है कि अगर सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में विधेयक लाती भी है तो उस का क्या हश्र होगा और यह विधेयक कानून में कब तक बदल पाएगा. तब तक क्या मुसलिम महिलाएं दुविधा की स्थिति में रहेंगी और पुरुष पहले की तरह तीन तलाक का चाबुक चलाते रहने को स्वतंत्र होंगे? वजह केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर का यह कहना था कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक बताया है, इसलिए नए कानून की जरूरत नहीं है.

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यह था फैसला

22 अगस्त, 2017 को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बैंच ने 5-2 के बहुमत से कहा था कि एकसाथ तीन तलाक कहने की प्रथा यानी तलाक ए विद्दत शून्य असंवैधानिक और गैरकानूनी है. बैंच में शामिल न्यायाधीशों ने सरकार को 6 महीनों में कानून बनाने का निर्देश दिया था. इस के लिए सरकार ने मंत्री स्तरीय कमेटी भी बना डाली जो तय नहीं कर पा रही है कि इस रिवाज में किस तरह के संशोधन करे या फिर नया मसौदा तैयार कराए, जिस से तीन तलाक के दाग धो कर मुसलिम महिलाओं को एक बेहतर विकल्प दिया जा सके.

जैसे ही यह कथित ऐतिहासिक फैसला आम हुआ था तो देश मानो थम सा गया. घरों में, चौराहों पर, दफ्तरों में, स्कूलकालेजों में, रेलों और बसों में हर कहीं तीन तलाक की चर्चा थी. हर कोई अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए ऐसे किसी उपयुक्त पात्र को ढूंढ़ रहा था जिसे अपनी मूल्यवान राय से अवगत करा कर अपनी बुद्धिमानी के झंडे गाड़े जा सकें.

बात थी भी कुछ ऐसी ही. आखिर सुप्रीम कोर्ट ने औरतों के हक को मारती 14 सौ साल पुरानी एक कुप्रथा महज 28 मिनट के फैसले से एक झटके में जो खत्म कर दी थी. कुछ घंटों से ले कर अगले 3 दिनों तक देश का माहौल बड़ा गरम रहा. जिन्हें कोई श्रोता नहीं मिला उन्होंने अपनी बात सोशल मीडिया पर साझा की. व्हाट्सऐप और फेसबुक पर तीन तलाक नाम की कुप्रथा से संबंध रखते हुए नएनए विचार प्रसारित हो रहे थे, जिन का सार सिर्फ इतना था कि औरत जीत गई, मजहब हार गया.

मजहब यानी इसलाम

चारों तरफ पसरती उत्तेजना और रोमांच देख महसूस यह हो रहा था मानो यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं, बल्कि भारतपाकिस्तान के बीच चल रहा वन डे क्रिकेट मैच था, जिस के आखिरी ओवर में आखिरी गेंद पर भारत को जीत के लिए 5 रन चाहिए थे और बैट्समैन ने छक्का मारने का करिश्मा कर दिखाया और भारत मैच जीत गया. लिहाजा खूब जश्न मना. तरहतरह के कमैंट्स और तजरबे इधर से उधर झूला झूलते रहे.

जिन्होंने बारीकी से माहौल देखा उन्होंने एक अजीब बात यह महसूस की कि वाकई मुसलमानों के  चेहरे उतरे हुए हैं. मसजिदों में नमाज पढ़ कर निकल रहे लोग चिंतन और चिंता की मुद्रा में थे और लगभग सिर झुकाए चल रहे थे. टीवी चैनलों पर शरीयत का हवाला देते हुए कट्टरपंथी मुसलमानों की दलीलें गैरमुसलमानों की सुधारवादी दहाड़ों के आगे सुनाई ही नहीं दे रही थीं.

सुनने लायक सुनाई दे रहा था तो बस इतना कि हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं लेकिन तीन तलाक के जिस तरीके को सुप्रीम कोर्ट ने नाजायज ठहराया है वह दरअसल में शरीयत के मुताबिक है ही नहीं. फिर आवाजें आईं जिन में प्रमुख शब्द थे इद्दत, खुला, हवाला, वक्फा और भी न जाने क्याक्या. इस ऐतिहासिक फैसले पर मुसलमानों से ज्यादा हिंदुओं ने खुशी जताई. सब से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई देने वालों में 2 नाम उल्लेखनीय थे और वे थे भाजपा सांसद व अभिनेता परेश रावल और अभिनेता अनुपम खेर. तीसरा उल्लेखनीय नाम पाकिस्तानी मूल की नायिका सलमा आगा का था, जिन्होंने करीब 35 साल पहले बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘निकाह’ में मुख्य भूमिका निभाई थी. यह नीलोफर नाम की एक ऐसी युवती की कहानी थी जिसे पहला शौहर तलाक दे देता है तो वह कालेज के जमाने के एक दोस्त से दूसरी शादी कर लेती है. लेकिन एक गलतफहमी के चलते दूसरा शौहर भी तलाक देने पर उतारू हो जाता है. इस पर नीलोफर तीन तलाक को ले कर अंदर तक तीखे और कुरेदते सवाल करती है. सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं को विस्तार दिया है.

इधर 23 अगस्त, 2017 के अखबार भी उन नायिकाओं की चर्चा से भरे पड़े थे, जिन्होेंने तीन तलाक की प्रथा के खिलाफ मुकदमे दायर कर रखे थे. इन में भी सुपरस्टार थी शायरा बानो नाम की महिला, जिस ने फैसले के बाद प्रतिक्रिया दी थी कि मुसलिम महिलाओं में तो शादी के बाद से ही तलाक का डर बैठ जाता है. अब वे खौफ के साए में जीने के बजाय आजाद हो कर जिएंगी.

गुलामी से बदतर यह आजादी

शायरा का उत्साह स्वाभाविक बात है पर वह जिस आजादी का हवाला दे रही है वह दरअसल में एक ऐसी गुलामी है, जिस में फंस कर औरत छटपटाती ही रहती है.

कल्पना करें कि ‘निकाह’ की नीलोफर हिंदू होती तो क्या होता. होता यह कि वह घुटती रहती और पति की ज्यादतियां बरदाश्त करती रहती और जब बरदाश्त की हदें जवाब दे जातीं तो क्रूरता और तलाक का मुकदमा ठोंकने अदालत चली जाती.

फिर होता यह कि उसे सालोंसाल यह साबित करने में लग जाते कि पति वाकई क्रूर है. वह अपने व्यवसाय में व्यस्त है, इसलिए पत्नी को वक्त नहीं दे पाता, जिस से झल्लाई पत्नी एक दिन उसे सैक्स के अपने अधिकार से वंचित कर देती है तो वह और झल्ला उठता है. इस के बाद क्लाइमैक्स में पति महसूस करता है कि पत्नी ने मेहमानों के सामने उस के खानदान की नाक कटवा दी है. तब वह तलाक तलाक तलाक कह कर उसे जिंदगी और घर दोनों से निकाल देता है.

तीन तलाक नाम की कुप्रथा के बंद होने के बाद नीलोफर की स्थिति क्या होती? वह होस्टल में ही रहती और पराए मर्दों की बुरी नजरों को झेलती अपनी दास्तां डायरी में लिखती रह जाती.

भोपाल के एक वरिष्ठ अधिवक्ता हरिशंकर तिवारी (बदला नाम) आमतौर पर इंश्योरैंस और क्लेम संबंधी मुकदमे लेते हैं. उन की साली सारिका (बदला नाम) की शादी 2002 में केंद्र सरकार के एक कर्मचारी से हुई थी. दोनों परिवारों की समाज में अपनी प्रतिष्ठा थी. लिहाजा सभी को उम्मीद थी कि दोनों की पटरी अच्छी बैठेगी.

जैसाकि आमतौर पर होता है शादी के बाद डेढ़दो साल तो ठीक गुजरे पर उस के बाद दोनों में खटपट होने लगी. सारिका ने महसूस किया कि पति देवेंद्र (बदला नाम) अपनी मां और बहनों पर ज्यादा ध्यान देता है और उन्हीं के कहने में है. इस पर उस ने धीरेधीरे अपना एतराज दर्ज कराना शुरू किया जो 1 साल बाद ही रोजरोज की कलह में तबदील हो गया.

सारिका चाहती थी कि देवेंद्र जैसे ही शाम को दफ्तर से घर आए तो पहले बैडरूम में आ कर उस के पास बैठे, जबकि अपनी आदत के मुताबिक देवेंद्र दफ्तर से आ कर पहले ड्राइंगरूम में आ कर मां के पास बैठ कर बतियाता था. इस दौरान कालेज में पढ़ रही दोनों बहनें भी उन के पास आ बैठती थीं.

एकाध साल तो सारिका भी सब के साथ ड्राइंगरूम में बैठी पर उस के बाद उस ने अपना डेरा बैडरूम में जमा लिया. शुरूशुरू में देवेंद्र ने उस के इस बदलते व्यवहार के बारे में पूछा तो वह बहाने बना कर बात को टाल गई, लेकिन फिर जवाब देने लगी कि तुम्हें क्या, तुम तो जा कर बैठो अपनी बहनों और मां के पास. बीवी तो नौकरानी होती है, उस की कीमत क्या.

कुछ दिन ऐसे ही कट गए. लेकिन सारिका की जिद और अहं ने देवेंद्र का जीना दुश्वार कर दिया. अब दोनों तरफ से तरहतरह के आरोप लगने लगे. फिर एक दिन बगैर किसी को बताए सारिका अपने मायके चली गई. उस के इस अप्रत्याशित कदम से हकबकाए देवेंद्र को जब उस के ससुर ने बताया कि सारिका उन के यहां है तो उसे बेफिक्री भी हुई और सारिका की इस बेजा हरकत पर गुस्सा भी आया. अत: उस ने तय कर लिया कि अब वह अपनी तरफ से कोई पहल नहीं करेगा.

अब दोनों में बोलचाल भी बंद हो गई. सारिका के पिता ने दुनिया देखी थी. दुखी बेटी की तकलीफ सुन वे सारा माजरा भांप गए. उन्होंने बेटी को समझाया भी कि जराजरा सी बातों पर ससुराल छोड़ना बुद्धिमानी की बात नहीं. कुछ दिनों में ही सारिका के कसबल ढीले पड़ने लगे. अब वह चाहती थी कि देवेंद्र उसे लेने मायके आए. इधर खुद को बेइज्जत महसूस कर रहे देवेंद्र ने ससुर से साफसाफ कह दिया कि उस का घर है जब चाहे आए, अपनी मरजी से गई है, इसलिए वह लेने नहीं आएगा.

सारिका के घर वाले भी उसे समझासमझा कर हार गए. सारिका ने उन से स्पष्ट कह दिया, ‘‘अगर मैं आप लोगों को भार लगने लगी हूं तो किसी वूमंस होस्टल में रहने चली जाती हूं. पेट भरने के लिए किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू कर देती हूं.’’

बात कैसे भी नहीं बन रही थी. तय हुआ कि जब दोनों साथ नहीं रह सकते या रहने को तैयार नहीं, तो तलाक के अलावा कोई विकल्प नहीं. इस बाबत पहले महज धौंस देने की गरज से देवेंद्र को कानूनी नोटिस भेजा गया, तो उस का पारा 7वें आसमान पर जा पहुंचा और उस ने कानूनी भाषा में ही वकील के जरीए जवाब दिया.

अब सुलह की रहीसही गुंजाइश भी खत्म हो गई थी. सारिका जब वापस नहीं आई तो देवेंद्र ने भी तलाक का मुकदमा ठोंक दिया. शुरू में तो सारिका तलाक के नाम से डरी, लेकिन इस से ज्यादा वह कुछ और नहीं सोच सकी कि देवेंद्र अगर उसे चाहता होता तो मुकदमा दायर न करता. जरूर मां और बहनों के बहकावे में आ कर उस ने यह किया है.

अब अदालत में मुकदमा चल रहा है  आरोपप्रत्यारोप लग रहे हैं. बात रिश्तेदारी में आम हो गई है और समाज के लोग तलाक के एक और मुकदमे का लुत्फ उठा रहे हैं.

सारिका घरगृहस्थी के बंधन से आजाद है. ऐसी आजादी की उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी, जिस में आएदिन दिखावे की हमदर्दी और पीठ पीछे ताने और हजार तरह की बातें हैं. घर वाले भी पहले सा खयाल नहीं रखते. उस ने एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर ली है. किसी भी तरह वह अदालत में यह साबित करना चाहती है कि दांपत्य की इस टूटन और मुकदमे की वजह वह नहीं, बल्कि देवेंद्र की बहनें और मां हैं. हरिशंकर तिवारी को समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें क्या नहीं.

‘निकाह’ फिल्म की नीलोफर और सारिका की हालत में कोई खास फर्क नहीं है. बस उस की वजह अलग है. एक परित्यक्ता या तलाक का मुकदमा लड़ रही महिला की जिंदगी कितनी नीरस, उबाऊ और यंत्रणादायक होती है इस का अंदाजा सारिका को देख कर लगाया जा सकता है. देवेंद्र जैसा कोई भी पुरुष उस वक्त तक दूसरी शादी नहीं कर सकता जब तक उस का पहली पत्नी से तलाक न हो जाए.

कैसे बैठेगी पटरी

फैसला तीन तलाक के रिवाज पर आया है, जिस में महिलाओं की स्थिति का कहीं जिक्र नहीं है, न ही इस बात का उल्लेख है कि जब कोई पतिपत्नी वजहें कुछ भी हों साथ नहीं रह सकते तो कोई कानून क्या कर लेगा.

तलाक के लाखों मुकदमे अदालतों में चल रहे हैं. इन में हिंदू महिलाओं के ज्यादा हैं, मुसलमान महिलाओं के कम. वजह अब तक तीन तलाक की प्रथा थी, जिस के खत्म होने से फर्क इतना आने की संभावना है कि वे अपना पक्ष अदालत में रख सकेंगी, लेकिन शौहर को वापस पा सकेंगी इस सवाल का जवाब सारिका जैसी औरतें दें तो वह न में ही होगा.

बात हिंदू या मुसलिम की नहीं, बल्कि औरत की की जाए तो समझ आता है कि समस्या तलाक का तरीका कम पतिपत्नी में पटरी न बैठना औरतों की बदहाली की वजह ज्यादा है. तलाक एक झटके में हो या उस का मुकदमा सालोंसाल चले वे किसी भी कीमत पर पति को हासिल नहीं कर सकतीं.

पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक दबावों के चलते कितने दंपती नर्क की सी जिंदगी जीने को मजबूर हैं, इस का ठीकठीक आंकड़ा शायद ही कोई दे पाए. लेकिन इस के उदाहरण हर कहीं आसानी से मिल जाते हैं यानी विवाद, अलगाव और तलाक सामान्य बात है, जिस का संबंध पतिपत्नी में किसी वजह से आपसी समझ और तालमेल न होना है तो तीन तलाक के रिवाज के बंद होने पर बातों के बताशे फोड़ना एक धार्मिक जिद भर नजर आती है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मुसलमान गुस्से में हैं.

भोपाल में 10 सितंबर, 2016 को आल इंडिया मुसलिम पर्सनल लौ बोर्ड की मीटिंग में धर्म और समाज के ठेकेदारों ने दोहराया कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले की इज्जत करते हैं पर अपने मजहब और शरीयत में किसी तरह का दखल बरदाश्त नहीं करेंगे. यह बात कतई हैरानी की नहीं थी कि उन्होंने यह बात महिला प्रतिनिधियों के मुंह से भी कहलवा ली.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार को निर्देश दिया था कि वह 6 महीनों में मुसलिम तलाक पर कानून बनाए और वह ऐसा नहीं करती है या नहीं कर पाती है तो उस का हालिया फैसला ही कानून माना जाएगा. इस निर्देश के मद्देनजर सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में विधेयक पेश कर सकती है पर इस में बात सिर्फ मुसलिम महिलाओं की होगी, हिंदू महिलाओं की दुर्दशा पर भी सरकार संवैधानिक स्तर पर ध्यान दे तो वास्तव में वाहवाही और आभार उसे तीन तलाक पर पहल करने से भी ज्यादा मिलेगा.

देश के बुद्धिजीवी वर्ग और आकाओं ने इस फैसले को समान नागरिक संहिता की दिशा में बढ़ता सार्थक कदम बताया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुसलिम बहनों को बधाई दे डाली. परेश रावल और अनुपम खेर जैसे हिंदूवादी अभिनेताओं की कथित खुशी यह है कि मुसलिम महिलाओं को तीन तालक से छुटकारा मिल गया. जबकि हकीकत क्या है यह हर कोई समझ रहा है. इन्हें और इन जैसे लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं कि तलाक की त्रासदी भुगतते पतिपत्नियों को इस से क्या हासिल होगा. तलाक तो तलाक है, फिर चाहे वह फटाफट वाला हो यह लंबा खिंचने वाला. दोनों ही स्थितियों में पतिपत्नी कुछ नहीं कर पाते. उन्हें किसी भी कीमत या शर्त पर एकदूसरे से छुटकारा चाहिए होता है.

बात तब बिगड़ती है जब कोई एक पक्ष तलाक न देने की जिद पर अड़ जाता है. अब अगर मुसलिम महिलाओं को अदालत जाने का हक मिला तो वे भी सारिका की तरह पेशी दर पेशी अपनी एडि़यां अदालत की देहरी पर रगड़ेंगी, लेकिन तलाक इतना आसान काम नहीं जितना वे समझ रही होंगी.

इन की अनदेखी क्यों

तीन तलाक पर सुप्रीम कोेर्ट का फैसला आने के बाद भी इस के मामले आने जारी रहे तो एक बार फिर केंद्र सरकार की तरफ से 1 दिसंबर को ये संकेत दिए गए कि महज एक बार में बोल कर तीन तलाक देने वाले शौहर को तीन साल की सजा हो सकती है और तीन तलाक अपराध की श्रेणी में माना जाएगा, जिस में पति को जमानत भी नहीं मिलेगी.

यकीनन मुसलिम महिलाओं के हक में यह भी सार्थक पहल है कि वे कानून बनने तक तलाक की प्रक्रिया के दौरान गुजाराभत्ता भी मांग सकती हैं और चाहे तो नाबालिग बच्चों की सरपरस्ती भी हासिल कर सकती हैं.

अदालत, सरकार और मंत्री स्तरीय कमेटी के लिए यह एक अच्छा मौका है कि वे हिंदू महिलाओं की परेशानियों के बारे में भी विचार करें खासतौर से उन पहलुओं पर जो असंवैधानिक हैं और रिवाज या प्रथा हैं, जिन के चलते हिंदू महिलाओं को मुसलिम महिलाओं से कम दुश्वारियों का सामना नहीं करना पड़ता.

जन्मकुंडली मिलान कर शादी करना और न मिलने पर प्रस्ताव का खारिज होना कोई संवैधानिक बात नहीं है. इसी तरह संविधान में कहीं उल्लेख नहीं है कि मांगलिक लड़की को मंगल की दशा के चलते रिजैक्ट कर दिया जाए. ये रिवाज सदियों से चले आ रहे हैं, जो सीधेसीधे धार्मिक दोष के दायरे में आते हैं.

जिस तरह सरकार मुसलिम महिलाओं के हक में संविधान का हवाला बारबार दे रही है उस के दायरे में तो दहेज भी आता है. दहेज कानूनन अपराध होने के बाद भी खुलेआम चलन में है और हर साल लाखों महिलाएं इस की बलि चढ़ जाती हैं. उन की क्या गलती है? अब यह नए सिरे से अदालत और सरकार के लिए तय करना जरूरी हो चला है, जिस से हिंदू महिलाओं को भी राहत मिले. रिवाज तो व्रत और उपवास का भी महिलाओं के भले का नहीं. एक हिंदू महिला पति, पुत्र और ससुराल के भले और सलामती के लिए पचासों तरह के व्रत रखती है.

सरकारें हिंदू पर्वों के आयोजनों पर पानी की तरह पैसा बहाती हैं. यह बात भी संविधान में कहीं नहीं लिखी कि वे जनता के पैसे का मनमाना दुरुपयोग धार्मिक कृत्यों व आयोजनों में करें. फिर इस पर चुप्पी और खामोशी क्यों?

मंत्री स्तरीय कमेटी को धार्मिक पूर्वाग्रह छोड़ते इन विसंगतियों और खामियों को भी नए कानून में शामिल करना चाहिए ताकि जिस से न केवल हिंदू महिलाएं, बल्कि आम लोगों को भी राहत मिले जो तमाम धार्मिक ढोंगों, पाखंडों को रिवाज मानते हुए कुछ बोल नहीं पाते. अदालत इन पर भी खुद संज्ञान ले कर सरकार को निर्देशित कर सकती है. अगर वह ऐसा करेगी तो कुछ कट्टरवादियों को छोड़ कर आम लोग उस की पहल का स्वागत ही करेंगे जैसा तीन तलाक के मामले में मुसलिम समुदाय ने किया.

वापस ‘निकाह’ फिल्म की तरफ चलें तो नायिका की दूसरी शादी इसलिए जल्दी हो गई थी कि वह एक तलाकशुदा स्त्री थी. कोई कानूनी अड़चन उस में नहीं थी. अगर मुकदमा चल रहा होता तो वह इतनी आसानी से दूसरी शादी नहीं कर पाती. यहां मकसद तीन तलाक की हिमायत करना नहीं, बल्कि यह बताना है कि सालोंसाल चलते तलाक के मुकदमों से दोनों पक्षकारों को कितना और कैसाकैसा नुकसान होता है. कोई भी कानून सुधार के लिए बने स्वागत योग्य है पर कानन जिंदगी से खिलवाड़ न कर पाए इस का खयाल रखा जाना भी जरूरी है और तलाक के मामलों में ऐसा तभी होता है जब किसी एक पक्ष को कानून से खिलवाड़ करने की सहूलत मिल जाती है.

ऐसे ढेरों समाचार मिल जाएंगे जिन में विवाहितों के प्रति दूसरे पक्ष ने हिंसक अपराध किया, जिस की वजह काननी पेंच है, जो तलाक की मियाद की गारंटी नहीं लेता. न्याय के लिए बने कानून की चौखट पर लोग महज इसलिए नहीं जाते कि वहां तो अंधेर से भी ज्यादा देर है. ऐसे कानून पर भी पुनर्विचार होना जरूरी है.

तीन तलाक के मसले पर अदालत ने खुद संज्ञान लिया था. उस में किसी शायरा या शाहबानो ने एतराज दर्ज नहीं कराया था. अदालत को चाहिए कि वह इस बात पर भी संज्ञान ले कि देर से मिला न्याय अन्याय नहीं तो क्या है. पतिपत्नी कानूनी देरी के डर के चलते घुट कर जीते हों तो यह भी कानूनी खामी नहीं तो क्या है?

फैसले पर जश्न मना रहे लोगों को भी इस खामी पर पहल करनी चाहिए कि कई देवेंद्र और सारिका तलाक के मुकदमे के लंबे खिंचने के कारण दूसरी शादी कर चैन की जिंदगी जीने की बात सोच ही नहीं पा रहे. उन्हें खुश रहने का मौका क्यों नहीं मिलना चाहिए?

कैसे हो तलाक

जब तक विवाह व्यवस्था है तब तक तलाक भी होते रहेंगे, इसलिए बेहिचक कहा जा सकता है कि अप्रिय स्थितियों में तलाक कोई हिचक या शर्म की बात नहीं. शर्म की बात है तलाक की प्रक्रिया. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पीछे मंशा विलाशक महिलाओं के भले की है पर उस से भला होगा ऐसा लगता नहीं.

फसाद और परेशानियों की एक जड़ खुद कानून भी है. तलाक के मुकदमे सालोंसाल क्यों चलते हैं, इस संवेदनशील सवाल का जवाब देने की जिम्मेदारी भी कानूनविदों को लेने की हिम्मत दिखानी चाहिए. क्यों एक महिला और पुरुष शादी करने की सजा और मानसिक यंत्रणा सालोंसाल भुगतते हैं? क्यों अपनी जिंदगी के सुनहरे दिन गंवाने को मजबूर होते हैं? इस बात पर न जाने कब कोई अदालत विचार करेगी.

जाहिर है, अब एक ऐसे कानून या व्यवस्था की जरूरत कहीं ज्यादा है, जिस में तलाक जल्दी और वक्त पर हो. इस दौर के ढेरों नवदंपतियों की तो हालत यह है कि शादी की पहली वर्षगांठ भी वे मना नहीं पाते और मुंह उठाए कोर्ट पहुंच जाते हैं. उन्हें समझाने के नाम पर साथ रहने को क्यों मजबूर किया जाता है? इस से उन के बीच का बैर और बढ़ता है और वे जल्दी तलाक चाहने के लिए एकदूसरे पर मनगढ़ंत आरोप लगाने लगते हैं और फिर उन्हें सच साबित करने पर उतारू हो आते हैं.

बेशक तलाक एक झटके में और एकतरफा नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह 2 जिंदगियों का सवाल होता है, लेकिन तलाक की मियाद ज्यादा लंबी भी इस लिहाज से नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह 2 जिंदगियों का सवाल होता है.

बेहतर होगा कि सुधार, अच्छे पारिवारिक और सामाजिक माहौल के लिए तलाक के मुकदमों के फैसले की अधिकतम समय सीमा हालात कुछ भी हों 2 साल रखी जाए. इस में मुवक्किलों को नादान समझते या समझौते की उम्मीद में उन का वक्त जाया न किया जाए. कानून और अदालतों को यह गारंटी लेनी और देनी होगी कि तलाक का कोई भी मुकदमा

2 साल से ज्यादा नहीं चलेगा और अगर चलता है तो मुकदमे के तीसरे साल के पहले दिन से ही विवाह विच्छेद हो गया माना जाएगा.

इस व्यवस्था में किसी का कोई नुकसान नहीं है. अगर पतिपत्नी को वाकई कोई गलतफहमी है या सुलह की गुंजाइश दिखती है तो यह मियाद काफी है. पति या पत्नी में से कोई भी एक पक्ष महज दूसरे को सबक सिखाने या नीचा दिखाने के लिए तलाक के मुकदमे को लंबा खींचे यह सहूलत उन से छीनी जानी चाहिए. तभी लोग सुकून से रह पाएंगे, क्योंकि अगर तलाक के बाद भी वे साथ रहना चाहें तो बगैर किसी हलाला जैसे रिवाज के रह सकते हैं. कोई उन्हें रोक नहीं सकता. ठीक उसी तरह जैसे विवाद, मतभेद या कलह होने पर उन्हें कोई साथ रहने को मजबूर नहीं कर सकता.

धर्मों की मनमानी के खिलाफ एकजुट हों औरतें

हजारों वर्षों से सभी धर्मों के पूंजीवादी ठेकेदारों ने जिस तरह अपने स्वार्थ और अहंसिद्धि के लिए औरतों को धर्मपालन के नाम पर मानसिक रूप से जड़ बनाया है, उन्हें अपराधभावना में डुबो कर उन का मनोबल तोड़ा है, वह आज 21वीं सदी में भी साफ दिखता है. सिर्फ दिखता ही नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी लड़कियां धर्म के वशीभूत हो खुद स्टौकहोम सिंड्रोम से ग्रस्त हो चुकी हैं.

40 साल पहले स्टौकहोम में बैंक डकैती करने वालों ने कुछ लोगों का अपहरण कर लिया था. इन पर अत्याचार भी किए. बाद में ये अपहृत लोग जीने की मजबूरी में इन डकैतों को ही बचाने में लगे थे. इन्होंने हर उस मदद करने वाले का विरोध किया जो इन डकैतों को सजा दिलाने का प्रयास करता. बस इसी कुंद पड़ी डरी हुई मानसिकता को साइकोलौजी के जानकार स्टौकहोम सिंड्रोम कहते हैं और आज धर्म की गुलामी करतीं वे सारी आरतें इसी सिंड्रोम की शिकार हैं. वे उसी धर्म और उस की मनमानी का सहारा ढूंढ़ती हैं, जो वास्तव में उन के सम्मानपूर्ण न्यायोचित वजूद के खिलाफ है.

समझें धर्म की असलियत

धर्म जो धारण करे, पालन करे, कर्तव्य को प्रेरित करे वह धर्म व्यक्तिगत उत्थान के लिए अपने आचरण को विवेक की कसौटी पर कसने को कहता है, मगर इस धर्म का कहीं कोई नामोनिशान न आज है न कभी था.

धर्म जीवन का भय दिखा कर जीवन को लूटता है, प्रियजन के विनाश का भय दिखा कर प्रियजन का ही सर्वनाश करता है, धनसंपत्ति के लुट जाने का भय दिखा कर गरीब से गरीब तक का धन लूट लेने में संकोच नहीं करता और यह सारा खेल खेलते हैं धर्म के पृष्ठपोषक, पूंजीवादी, भोगी, हठी, धर्म के बड़ेबड़े दुकानदार, ठेकेदार-पोप, मौलवी, पंडे, भिक्षु.

औरत सर्वाधिक निशाने पर

औरत के जन्म के बाद से ही उसे धर्म के नाम पर बहलाना और भड़काना दोनों शुरू हो जाता है. उस के पैरों में पायलें भी पहनाई जाती हैं, तो वे बेडि़यां ही बनती हैं. उस के माथे पर सिंदूर भी लगाया जाता है तो वह जिंदगी भर की गुलामी ही बन जाता है.

पगपग पर औरत को मनाही, रोज कुछ न कुछ बाधाओं और बंधनों में उस का गुजारा, हजार तरह के व्रतउपवास सब तो जैसे उस की ही जिम्मेदारी हैं वरना नरक का डर. हां, बहलाने के लिए साजशृंगार का झुनझुना अवश्य पकड़ाया जाता है उसे.

बेचारी औरतें सजनेसंवरने की खुशी में मानसिक, शारीरिक गुलामी की बात भूल झुनझुने को ही असली खुशी मान बैठती हैं.

धर्म ने क्या दिया औरतों को

बचपन की दहलीज लांघते ही धर्म के बड़ेबड़े राक्षस मनलुभावन छद्मवेश में उस के सामने आते हैं. उस का कुंडली मिलान करना है, क्योंकि वह विवाह के लायक हो गई है या फिर शादी के लिए उसे सैकड़ों इसलामी धार्मिक कानूनों से गुजरना है, क्योंकि वह औरत है और औरत अपने पुरुष आकाओं की गुलामी के लिए पैदा हुई है.

कुंडली मिलान और औरत

हिंदू धर्मशास्त्र में ज्योतिष विद्या का बड़ा चलन है. यह आसमान के ग्रहनक्षत्र का विचार कर मनुष्य पर उस के प्रभाव तथा तदनुरूप निराकरण की व्यवस्था का दावा करता है. बात पहले तो यह दीगर है कि लाखोंकरोड़ों मील दूर ग्रहों का प्रभाव यदि मनुष्य पर पड़ता है भी तो उस प्रभाव को बदलने की ताकत एक इंसान के रूप में ज्योतिषी में कितनी है? क्या वह इतना ताकतवर है कि उस के झांसे में आ कर हजारोंलाखों रुपए खर्च कर दिए जाएं कि उस ने कहा है कि सब ठीक कर देगा.

ज्योतिष यह बात तो मानता ही है कि व्यक्ति को उस के कर्मों का फल प्राप्त होता है, तो उस फल को एक ज्योतिषी ने अपने उपायों से कमज्यादा करने की ताकत कैसे पाई? बिना ईश्वर को माने ज्योतिष नहीं होता, तो क्या ज्योतिषी ईश्वर से भी ज्यादा ताकतवर है? फिर वह तो ईश्वर से बड़ा शक्तिमान साबित हो जाता है, जो मनुष्य जीवन की सारी गतियों और काल के गर्भ में समाए सारे संकेतों को नकार और सुधार सकता है?

ऐसे किसी शास्त्र पर भरोसा करने के बाद जिन्हें सब से ज्यादा इस चक्की में पिसना होता है वे हैं औरतें.

कैसी कैसी यातनाएं

कुंडली मिलान के नाम पर अकसर औरतें बलिकाठ में फंसाई जाती हैं. अब उन समस्याओं को दूर करने के लिए तरहतरह के खर्चीले उपायों के साथ उन पर जुल्म भी ढाए जाते हैं. परिवार उन्हें उन की कमियां बता कर ताने मारता है और वे भी इन्हें सच मान कर तरहतरह के व्रतउपवास द्वारा खुद को तकलीफ में डालती हैं. वे जिंदगी की उड़ान को बाधित कर काल्पनिक कथनों के पीछे अपनी ऊर्जा और उन्नति नष्ट करती रहती हैं.

दरअसल, ये सारी मान्यताएं और थोपी गई बाध्यताएं औरत की चरम गुलामी की प्रतीक हैं. दुख की बात है कि वे खुद ही आंखों पर पट्टी बांधे इन का पालन करती हैं और नई पीढि़यों पर भी इन्हें थोपती जाती हैं.

होने वाले पति के घर में ऐन शादी के मौके पर किसी की मृत्यु हो गई तो कन्या का दोष, अपशकुनी. घर में कोई लंबी बीमारी से पीडि़त है, तो घर की कन्या का दोष. परिवार में आर्थिक नुकसान हो गया तो कन्या में ऐब. मनमुताबिक वर नहीं मिल रहा है तो कन्या में ग्रहदोष. पति की आर्थिक या शारीरिक परेशानी है तो पत्नी में खोट. ससुराल वालों की तकलीफ का कारण बहू की कुंडली में दोष.

अब इन के लिए सारे उपचार जो पंडितजी बताएंगे कौन झेलेगा? बहन, पत्नी, बहू, कन्या यानी औरत.

धर्म कोई भी हो औरत की स्थिति में कोई खास अंतर नहीं है. इसलामी कानून के मुताबिक शादी को 2 व्यक्तियों औरतमर्द के मेलमिलाप और प्रेम का बंधन कहा गया है और न निभे तो आपसी विचारों से दोनों के अलग होने की बात भी स्वीकारी गई है. लेकिन हर घर में धर्म की ही आड़ में औरतों की दयनीय दशा सामने आ रही है. धर्म का भय दिखा कर मुसलिम औरतों को उन के साथ हो रहे अन्याय को इसलाम के प्रति कुरबान होना बताया जाता है. बौद्घिक चेतना के अभाव में औरतें अपने आकाओं द्वारा उन के प्रति किए गए अत्याचारों को धार्मिक बंधन के नाम पर स्वीकारती हैं.

आडंबरों के प्रचार में टीवी की भूमिका

पैसों की बाढ़ में टीवी चैनल वालों का विवेक बह जाता है. आज जो आशाराम जेल में है, उस के लच्छेदार भाषणों का प्रसारण इसी टीवी पर होता था. करोड़ों में बिक जाते हैं दृश्य माध्यमों के नीतिशास्त्र. इन के अंधप्रचार ने सब से ज्यादा नुकसान किया है घर में टीवी के सामने बैठी प्रवचन और अनर्गल सुनती औरतों का.

बाबाओं की भक्ति में अंधी हो चुकी औरतों का हुजूम दुनिया भर की अतार्किक, अबौद्घिक बातों पर सिर हिलाता और जयकारे लगाता रहता है. जबकि ज्ञान उन्हीं से लेना चाहिए जो सही माने में स्वयं अपने जीवन में उसे उतार चुके हों.

देश के विकास में भागीदारी औरत और मर्द दोनों के ही मानसिक, बौद्घिक उत्थान से संभव है. इस के लिए धर्म की अंधी गली से निकल देश भर की सभी औरतों को ज्ञान और विवेक की छत्रछाया में अन्याय के खिलाफ एक ही प्रकार के दर्द को साझा करते हुए एकजुट होना होगा. यही वह रास्ता है, जो औरत की वास्तविक आजादी को मंजिल तक ले जाएगा.

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