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हे मानस के राजहंस…

अपमानित करने का एक परंपरागत भारतीय तरीका है न बुलाना यानी कि हुक्कापानी बंद करना, जिस का ताजा शिकार या पीडि़त दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं. बीती 25 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के नोएडा को दक्षिण दिल्ली से जोड़ने वाली मजेंटा लाइन मैट्रो का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया जिन्होंने गुजरात में नीच कहे जाने को खूब भुनाया. इस अहम मौके पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जानबूझ कर नहीं बुलाया गया जिस पर आम आदमी पार्टी की तिलमिलाहट व्यक्त भी हुई.

साबित तो हो गया कि भाजपा केजरीवाल से किस हद तक ईर्ष्या रखती है. ताज्जुब इस बात का है कि यहां तो ड्राइवरलैस मैट्रो के उद्घाटन पर बैर छिपाने की जरूरत भी नहीं समझी गई. अब यह दिल्ली की जनता तय करेगी कि यह उस का भी अपमान था या नहीं.

Google के इस नए ऐप से आम आदमी भी बन सकेगा पत्रकार..!

क्या आप भी एक पत्रकार बनना चाहते है, तो आपके इस सपने को साकार करने में गूगल का नया ऐप आपकी मदद करेगा. जी हां गूगल ने एक ऐसा ऐप लौन्च किया है, जिसका इस्तेमाल कर अब हर कोई आसपास की खबरों को अपडेट कर पत्रकार बन सकेगा.

Google ने लोकल खबरों में अपनी जगह बनाने के लिए इस ऐप को लौन्च किया है. इसका नाम Bulletin रखा गया है. इस ऐप के जरिए कोई भी यूजर्स अपने इलाके की खबरें पोस्ट कर सकता है.

Bulletin के जरिए यूजर्स सीधे अपने फोन से फोटो, वीडियो या मैसेज वेब में पोस्ट कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें किसी ब्लौग या वेबसाइट की जरुरत भी नहीं महसूस होगी. Bulletin स्टोरीज पब्लिक रहेंगी और इन्हें गूगल सर्च के जरिए एक्सेस किया जा सकता है.

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गूगल ने अपने एक बयान में कहा, ‘यह एक फ्री और काफी लाइट ऐप है. इसमें आप फोटो, विडियो और टेक्स्ट के माध्यम से अपनी खबरों या अन्य चीजों को सीधे यहां पोस्ट कर पाएंगे. इसके लिए आपको कोई ब्लौग या वेबसाइट बनाने की कोई जरूरत नहीं होगी.’ गूगल ने आगे कहा, ‘यह ऐप आपके द्वारा आपके और आपके समाज के लिए स्टोरीज बनाने के लिए है. इस ऐप को उन स्टोरीज के लिए तैयार किया गया है, जो वेब पर नहीं आ पा रही हैं.

रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रेजेंटेशन के दौरान गूगल के एक प्रतिनिधि ने बताया कि इसमें यूजर्स अपनी स्टोरीज को रियल टाइम में फोटो और वीडियो के साथ पोस्ट कर सकते हैं.

फिलहाल इस ऐप को औकलैंड, कैलिफौर्निया और नैशविल के यूजर्स के लिए उपलब्ध कराया गया है. यहां के लोकल यूजर्स इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.

भूखे भजन न होय गोपाला : आखिर कब समझेगी योगी सरकार

उत्तर प्रदेश की सरकार पूरी तरह से धार्मिक कर्मकांडों के कामों में लगी है. हालांकि हवन और यज्ञ का कोई प्रभाव उत्तर प्रदेश के हालात सुधार नहीं पा रहा है. हत्या, लूट और अपराध के हालात जस के तस हैं. विकास की हालत पहले जैसी नगण्य है. यज्ञ, हवन और कर्मकांड से प्रदेश के हालात भले ही न सुधरे हों पर सरकार वोट हासिल करने में सफल हो रही है. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि प्रदेश में जातीयता को धर्म से जोड़ दिया गया है.

हिंदुत्व के नाम पर छोटीबड़ी जातियां धर्म के झंडे के तले खड़ी नजर आ रही हैं. यही वजह है कि नोटबंदी, जीएसटी, महंगाई, अपराध और बेरोजगारी से परेशानी होने के बाद भी जनता के वोटों से चुनाव दर चुनाव भाजपा को जीत हासिल हो रही है.

सरकार अपने हर काम में धर्म का तड़का लगाने में लगी है. शहरों को बस सेवा के जरिए आपस में जोड़ने तक का काम धर्म के नाम पर किया जा रहा है. सरकार यह दावा कर रही है कि धार्मिक शहरों को आपस में जोड़ने का काम किया जा रहा है जिस से लोगों को तीर्थयात्रा करने में सरलता रहे.

धार्मिक यात्राओं पर पिछली अखिलेश सरकार ने भी जोर दिया था. शायद समाजवादी पार्टी को पिछड़े वर्ग में बढ़ रही धार्मिक सोच का एहसास हो गया हो. लोगों को एक समय के बाद धर्म की बातों से रिझाना संभव नहीं होगा. धर्म से लोगों को कुछ हासिल नहीं हो रहा है.

पूजापाठ और धर्म के बढ़ते प्रयोग के बाद भी उत्तर प्रदेश में न अपराध कम हो रहे हैं और न भ्रष्टाचार. अखिलेश सरकार की ही तरह योगी सरकार भी अपने कामों का केवल प्रचार कर रही है. धरातल पर उस के प्रभाव को देख नहीं पा रही है. अगर पूजापाठ से ही सरकार चलनी होती या धर्म से हालात सुधरने होते तो लोग परेशान नहीं होते. प्रदेश के लोगों को धर्म के प्रभाव में रखने के लिए सरकार मथुरा और अयोध्या को किसी न किसी बहाने चर्चा में रखना चाहती है.

मथुरा में होली खेलेगी योगी सरकार

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अयोध्या और नैमिषारण्य के बाद मथुरा में होली खेलने का प्लान तैयार किया है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में दीवाली के अवसर पर भव्य दीवाली पूजन का आयोजन किया था. अपने धार्मिक एजेंडे के तहत अयोध्या के बाद सीतापुर जिले के नैमिषारण्य के परिक्रमा स्थल का विकास करने के लिए 100 करोड़ रुपए का बजट भी पास कर दिया. योगी ने कहा कि अयोध्या में सरयू आरती की तरह ही नैमिषारण्य में भी गोमती आरती शुरू हो, सरकार इस में हरसंभव मदद करेगी. मुख्यमंत्री ने कहा कि नदियों का प्रदूषण रोकने के लिए भीतर से इन के प्रति श्रद्घा का भाव आना चाहिए. नदियां अगर नहीं बचेंगी तो न हम बचेंगे और न ही हमारी संस्कृति. मुख्यमंत्री ने कहा कि बिना भेदभाव के सभी तीर्थस्थलों का विकास हमारा लक्ष्य है.

सवाल उठता है कि जिस देश में गंगा को सब से पवित्र नदी का दरजा हासिल हो वह नदी इतनी प्रदूषित क्यों है? कई शहरों में गंगा आरती होती है. हरिद्वार, ऋषिकेश और वाराणसी इन में प्रमुख हैं. इस के बाद भी गंगा इन शहरों में सब से अधिक प्रदूषित नदी है.

राजधानी लखनऊ में गोमती नदी की आरती होती है. आरती जहां होती है उस से कुछ ही दूरी पर गोमती नदी की गंदगी को देखा जा सकता है. नदियों की आरती के जरिए कैसे नदियां प्रदूषणमुक्त हो सकेंगी यह समझा जा सकता है.

उत्तर प्रदेश सरकार केवल धर्म के एजेंडे पर काम कर रही है. मंदिर, नदियां और धार्मिक त्योहारों के बहाने सरकार किसी न किसी तरह से चर्चा में रहना चाहती है. दीवाली और कांवड़ यात्रा के बावजूद अब योगी सरकार धूमधाम से होली मनाने जा रही है.

मथुरा से सरकार के जुड़ने की 2 खास वजहें हैं. पहली वजह, अयोध्या और वाराणसी की ही तरह से मथुरा में मंदिरमसजिद का विवाद है. यहां होली मना कर सरकार जनमानस को यह संकेत देना चाहती है कि वह मथुरा को भी अपने एजेंडे में रखे हुए है. उत्तर प्रदेश में धार्मिक पर्यटन जिन शहरों में होता है उन में मथुरा प्रमुख है. होली एक ऐसा त्योहार है जिस से जनमानस जुड़ा है. इस से सरकार के लिए लोगों को खुद से जोड़ना सरल हो जाएगा.

अयोध्या में दीवाली मनाने और राम की भव्य मूर्ति लगवाने के ऐलान के बाद समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश ने कृष्ण की मूर्ति लगवाने की बात कही थी. योगी सरकार धर्म को ले कर किसी और पार्टी के हाथ में कोई मुद्दा नहीं देना चाहती. गुजरात चुनावों में जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी मंदिर गए तो उन को नकली हिंदू साबित किया जाने लगा. समाजवादी पार्टी कृष्ण को ले कर कोई कदम उठाए उस से पहले भाजपा इस पर अपना हक साबित कर देना चाहती है.

उत्तर प्रदेश में सरकार जिस तरह से धार्मिक प्रपंच का सहारा ले रही है उस से बुनियादी मुद्दे पूरी तरह से हाशिए पर हैं. अयोध्या में दीवाली पूजन, चित्रकूट में मंदाकिनी नदी की आरती, आगरा में ताजमहल का विवाद, कांवड़ यात्रा पर फूलवर्षा, धार्मिक शहरों को प्रमुख पर्यटन क्षेत्र के रूप में प्रचार करना और मुख्यमंत्री के सरकारी आवास को गंगा जल से पवित्र कराना कुछ ऐसे प्रपंच हैं जिन का प्रचार ज्यादा हो रहा है. सरकार इन मुद्दों पर भी केवल बातें ही कर रही हैं. वहां विकास की योजना को ले कर मूलभूत काम नहीं कर रही है.

किसी भी शहर में सड़क, बिजली व पानी का इंतजाम करना ही वहां का विकास करना नहीं होता. लोगों को रोजगार मिले, बेरोजगारी कम हो लोग कामधंधे में लगें इस से ही समाज में अमनचैन आता है. सड़कें कितनी ही अच्छी बन जाएं अगर रोजगार नहीं होगा तो लोग अपराध करेंगे. अयोध्या का सच दीवाली के दिन नहीं दिखा. आयोजन की भव्य चकाचौंध में वह सच कहीं खो गया था.

भाजपा संस्थापक रहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय की अंतोदय की परिकल्पना में भी समाज का वही अंतिम आदमी था. वह उस को ही खुशहाल बनाने की काम कर रहे थे. आजादी के बाद से हर सरकार हर बात में गरीबों के उद्घार की ही बात करती है, बावजूद इस के भारत का गरीब दीयों से तेल एकत्र करता दिखता है. गरीब इसलिए गरीब है क्योंकि उस के पास काम नहीं है. देश में भीख मांगने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. हर जगह ऐसे लोग रोटी के एकएक टुकड़े के लिए संघर्ष करते देखे जा सकते हैं.

अगर धार्मिक प्रपंच को छोड़ कर सरकारों ने बुनियादी सुविधाओं और रोजगार की दिशा में काम किया होता तो गरीबी रेखा से नीचे गुजरबसर करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती नहीं. सरकारी नीतियों से गरीबी रेखा के ऊपर और नीचे के लोग ही नहीं मध्यवर्गीय परिवार भी गरीबी रेखा के करीब पहुंच गए हैं. बच्चे पढ़ रहे हैं लेकिन उन के पास कोई काम नहीं है. सरकारें दिखाने के लिए उन को ट्रेनिंग देने का काम करती हैं. इस से कितने युवाओं को रोजगार मिला यह देखने वाली बात है.

आंकड़े नहीं दिखाते विकास

कौशल विकास को ले कर पूरे देश में बड़े जोरशोर से काम हो रहा है. कौशल विकास प्रशिक्षण पाए लोगों में से कितनों को रोजगार से जोड़ा जा सका, इस का सच सामने रखना चाहिए. सरकारी आंकड़े पूरा सच नहीं दिखाते. ऐसे में सरकार को सामाजिक आंकड़ों को भी देखना चाहिए.

जिस अध्योध्या के विकास के लिए पूरी तरह से सरकार एकजुट है, कम से कम वहां तो रामराज कायम दिखना चाहिए. राम को आदर्श मानने वाले नेता क्या कभी रात में अपनी पहचान बदल कर अयोध्या की गलियों का सच देखने गए हैं. मंत्री के लिए अफसर रैड कारपेट बिछा कर सबकुछ ठीक होने का दावा हमेशा करते हैं. नेता की जिम्मेदारी होती है कि रैड कारपेट को हटा कर नीचे छिपे सच को देखे.

कागज में धर्म की नगरी को पर्यटन का दरजा देने से वहां का भला नहीं होने वाला. अखिलेश सरकार के समय भी नैमिषारण्य और मिश्रिख को पर्यटन का दरजा दिया गया था. सड़कें बनीं, बसें चलीं, विज्ञापन छपे, इस के बाद भी यहां के हालात नहीं बदले. आज भी यहां के लोगों के पास कोई रोजगार नहीं है.

कांवड़ यात्रा के दौरान सरकार की तमाम सुविधाओं के बाद भी कांवड़ यात्रा करने वाले रास्ते भर परेशान और लोगों से मदद मांगते दिखे. सरकार ने कांवड़ मार्ग पर पुष्प वर्षा का वादा किया पर यह पुष्प कांवड़ यात्रा करने वालों के सफर को सुखद नहीं बना पाए.

धर्म के नाम पर जनता को बहुत समय तक मुद्दों से दूर नहीं रखा जा सकता है. जरूरत इस बात की है कि बेरोजगारों के लिए काम के अवसर बढ़ाए जाएं. जब तक लोगों के लिए रोजगार नहीं होगा भुखमरी बनी रहेगी. न मजदूर खुश होगा न किसान. वह ऐसे ही दीयों के बचे तेल से अपने घर की सब्जी छौंकने के इंतजाम  करता रहेगा. सरकार कितने भी किसानों के लोन माफ कर दे कुछ ही दिनों में फिर से वही हालात बन जाएंगे.

धार्मिक प्रपंच में जुटे लोग इस तथ्य को समझ लें कि इसी देश में कहा गया है कि ‘भूखे भजन न होय गोपाला’ इस का अर्थ है कि अगर कोई भूखा है तो वह किसी भी तरह से न तो धार्मिक प्रवचन कर सकता है और न ही सुन सकता है.

जिस समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दीप जला कर अयोध्या में खुशियों की दीवाली मना रहे थे उस दौरान भूखे पेट रहने वालों की नजर उन दीयों पर रही होगी. वह सोच रहे होंगे कि दीये कितनी जल्दी बुझ जाएं जिस से दीयों का तेल उन के लिए बचा रहे. उन की असल खुशी दीयों के जलने से नहीं दीयों के बुझने से थी. उन की भूख जलने वाले दीयों से नहीं बुझे दीयों से बुझी जिन से उन को सब्जी बनाने के लिए तेल मिल सका. अयोध्या की ऐसी दीवाली के सच को समझ कर समाज के अंतिम आदमी की खुशहाली से समाज में बदलाव होगा. भूखे पेट तो धर्म की चर्चा भी नहीं होती.

राजनीति व कर्मकांड : बंद हो भूमिपूजन का सरकारी ड्रामा

बात स्वच्छ भारत अभियान के साथसाथ सरकारी भूमिपूजनों की भी पोल खोलती हुई है. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कुछ माह पहले भोपाल के कोलार इलाके में सीवेज नैटवर्क बिछाने के लिए समारोहपूर्वक एक और भूमिपूजन कर डाला था. इस का मतलब आम लोगों ने यही लगाया था कि अब जल्द या देरसवेर ही सही, सीवेज नैटवर्क का काम शुरू हो जाएगा. पर हैरत तब हुई जब यह उजागर हुआ कि 115 करोड़ रुपए का सीवेज नैटवर्क बिछाने के बाबत किसी कंपनी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई यानी टैंडर ही नहीं हुआ.

फिर मुख्यमंत्री ने किस बाबत भूमिपूजन किया था, इस सवाल का जवाब अब कभी शायद ही मिले लेकिन यह बात भी इस हास्यास्पद वाकिए के बाद उभर कर आई कि शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्रियों और विधायकों को निर्देश दे दिए हैं कि चुनाव सिर पर हैं, ऐसे में भूमिपूजनों, शिलान्यासों और लोकार्पणों का सिलसिला रुकना नहीं चाहिए. दरअसल, इस से लगता है कि काम हो रहे हैं और सरकार को मुफ्त का प्रचारप्रसार भी मिलता है.

भूमिपूजन नाम से ही स्पष्ट है कि यह एक धार्मिक कृत्य या कर्मकांड है जिसे देशभर के नेता बड़ी श्रद्धा व आस्था से करते हैं सिर्फ इसलिए कि इस से उन की इमेज चमकी हुई दिखती है और सरकारी पैसे से पूजापाठ, पाखंडों का माहौल परवान चढ़ता होता है. जनप्रतिनिधियों को जनता को लुभाने का सब से आसान रास्ता पूजापाठ का ही लगता है. यही वह विकास है जो आजादी के बाद से उत्तरोत्तर हो रहा है. फर्क इतनाभर आया है कि पहले इसे कांग्रेस करती थी, अब भाजपा कर रही है.

एक से बढ़ कर एक भूमिपूजन

शिवराज सिंह चौहान औसतन हफ्तेभर में एक भूमिपूजन जरूर करते हैं लेकिन उन के मंत्रिमंडल के एक वरिष्ठ मंत्री उमाशंकर गुप्ता तो भूमिपूजन मंत्री के नाम से ही पहचाने जाने लगे हैं जो हर दूसरे दिन कोई न कोई भूमिपूजन करते हैं.

उमाशंकर गुप्ता जैसे दर्जनभर मंत्री भूमिपूजन के लिए कुख्यात हो चले हैं अब तक ये कितने भूमिपूजन कर चुके हैं, यह तो शायद ये भी न बता पाएं लेकिन क्रिकेट की तरह रिकौर्डों के नजरिए से देखें तो शिवराज सिंह मंत्रिमंडल के ही एकदूसरे वरिष्ठ सदस्य गोपाल भार्गव ने तो पिछले विधानसभा चुनाव में भूमिपूजन का रिकौर्ड ही बना डाला था.

सागर के नजदीक अपने विधानसभा क्षेत्र रहली में गोपाल भार्गव ने एक ही दिन में 2,551 भूमिपूजनों का रिकौर्ड बना कर सब को चौंका दिया था. तब इस रिकौर्ड को गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड में शामिल करने के बाबत भी हंसीमजाक हुआ था. अब गंगा उलटी बह रही है, कहा यह जा रहा है कि 5 वर्षों के शासनकाल में 2,551 भूमिपूजनों और शिलान्यासों में से 30 फीसदी काम भी पूरे नहीं हुए हैं जबकि इन की लागत 300 करोड़ रुपए से भी ज्यादा आई थी.

उमाशंकर गुप्ता और गोपाल भार्गव जैसे मंत्रियों ने हालांकि अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि जिस किसी ने विकास कार्यों या निर्माण कार्यों के भूमिपूजन किए हैं, वे निर्धारित समयसीमा में किए जाएं. लेकिन यह कहनेभर की बात है. ऐसा होना क्यों संभव नहीं है, यह शिवराज सिंह के कोलार वाले भूमिपूजन की हकीकत से समझा जा सकता है कि सीवेज नैटवर्क बिछाने के लिए कोई कंपनी आगे आई ही नहीं थी, लेकिन फिर भी हड़बड़ाहट में उन्होंने भूमिपूजन कर डाला था.

जाहिर है भूमिपूजन एक धार्मिक लत है जिस में कोई अहम और बड़ा प्रोजैक्ट हो तो केंद्रीय मंत्री बुला लिए जाते हैं और बात जब अरबों की परियोजनाओं की हो तो फिर प्रधानमंत्री इस के लिए उपयुक्त माने जाते हैं.

राजस्थान के उदयपुर में भी कुछ माह पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 हजार करोड़ रुपए की परियोजनाओं का शुभारंभ किया था. इस में दिलचस्प बात नरेंद्र मोदी द्वारा डिजिटल भूमिपूजन किया जाना थी.

सरकारी भूमिपूजनों का अपना अलग स्लैब होता है, उसी के हिसाब से नेता बुलाए जाते हैं. बड़े भूमिपूजनों में पंडित भी बड़ा बुलाया जाता है. चूंकि बड़े पंडे की दक्षिणा भी ज्यादा होती है, इसलिए यह खर्च अब ठेकेदारों से कराया जाने लगा है. पूजन सामग्री भी इन्हीं से मंगाई जाने लगी है, जिन का मकसद पूजा के बहाने अधिकारियों व नेताओं की निगाह में चढ़ना होता है.

बाद में यही ठेकेदार भूमिपूजन के अपने खर्च में पांचगुना पैसा किसी भी मद में बिल में लगा देते हैं, जो सहर्ष पास हो जाता है. यानी अगर एक भूमिपूजन में ठेकेदार ने 20 हजार रुपए खर्च किए हैं तो काम मिल जाने पर वह उस का मुनाफा 80 हजार रुपए और वसूलता है.

जाहिर है भूमिपूजन एक तरह से भ्रष्टाचार और हेरफेर की एक स्वीकृत वजह और बुनियाद है जिस पर धर्म का ठप्पा लगा होने से कोई एतराज नहीं जताता. संविधान में कहीं नहीं लिखा कि सरकारी विकास कार्यों का भूमिपूजन किया जाए और उस का खर्च संबंधित विभाग या फिर ठेकेदार या फिर दोनों संयुक्त रूप से उठाएं.

सरकारी कार्यक्रमों में भूमिपूजनों पर खुलेआम जिन करोड़ों रुपयों की बरबादी होती है, वह जनता का पैसा है.

भगवान भरोसे विकास कार्य

भूमिपूजन को धर्म के नजरिए से देखें तो मान्यता यह है कि इस के करने से निर्माण कार्य में कोई दैवीय विघ्न यानी बाधा नहीं आती. भूमिपूजन की शुरुआत और कलश स्थापना पान के पत्तों व गणेश पूजा से होती है. पंडे के मंत्रोच्चार के बाद आमंत्रित नेता प्रतीकात्मक रूप से 1-2 बार फावड़ा या कुदाल जमीन पर चला देता है. इस के बाद नारियल फोड़ा जाता है फिर मावे से बनी मिठाई का प्रसाद वितरण किया जाता है. पूजन का अंत भगवान की जय से ही होता है.

यानी विकास कार्य योजनाओं से नहीं, बल्कि भगवान की कृपा और इच्छा से होते हैं. इस अलोकतांत्रिक परंपरा को क्यों ढोया जा रहा है, इस सवाल का जवाब कोई स्पष्ट रूप से देने को तैयार नहीं होता. सिवा इस के, चूंकि ऐसा होता आ रहा है, इसलिए हर्ज क्या है.

हर्ज यह है कि इस में जनता के पैसे की इफरात से बरबादी होती है और सरकारी तौर पर अंधविश्वासों व पंडावाद को बढ़ावा मिलता है.

भूमिपूजन में अगर कोई दम होता तो पुलियाएं गिरती नहीं, हैंडपंप खराब नहीं पड़े होते और सरकारी इमारतों से पानी नहीं टपक रहा होता. ऐसे वाकिए और हादसे जब होते हैं तो हर कोई सरकार और ठेकेदार को घटिया निर्माण के बाबत कोसता है लेकिन भूमिपूजन को दोष कोई नहीं देता. इसी धार्मिक मानसिकता का फायदा नेता और जनप्रतिनिधि खूब उठाते हैं.

कोई उन्नीस नहीं

मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता के के मिश्रा की मानें तो भूमिपूजन जनता से टैक्स की शक्ल में वसूले गए पैसों की बरबादी है. सरकार सस्ती वाहवाही भूमिपूजन के जरिए लूटती है. सरकार को इस फुजूलखर्ची पर रोक लगानी चाहिए.

के के मिश्रा जैसे तेजतर्रार नेता इस सवाल पर बगलें झांकते नजर आते हैं कि यह रिवाज तो कांग्रेस के शासनकाल के दौरान भी था और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह भी सरकारी तौर पर खूब भूमिपूजन करते थे.

भूमिपूजन अगर एक तरह से धर्म या राजनीति का हिस्सा है तो कांग्रेस भी इस में कभी पीछे नहीं रही. गुजरात चुनाव के दौरान जब राहुल गांधी वहां के मंदिरों में गए थे तो इस पर खूब हायहाय मची थी. मुद्दा तिलक या जनेऊ भी था पर सच यह भी था कि इस से राहुल गांधी और कांग्रेस की कमजोरी ही उजागर हुई थी.

जरूरत इस बात की है कि अब आम लोग ही सरकारी भूमिपूजनों पर एतराज जताएं कि विकास कार्य हों पर उन का धार्मिकीकरण न किया जाए क्योंकि इस में सिर्फ पैसे की बरबादी होती है और किसी को कुछ हासिल नहीं होता.

विदर्भ की जीत के माने

विदर्भ की टीम ने पहली बार रणजी ट्रौफी चैंपियन के फाइनल मुकाबले में जबरदस्त खेल का प्रदर्शन दिखाते हुए ऋषभ पंत और गौतम गंभीर से भरी दिल्ली की टीम को मात दे दी और ट्रौफी अपने नाम कर ली. इंदौर के होलकर स्टेडियम में खेले गए इस मुकाबले में सब से खास बात यह रही कि 83 साल में पहली बार विदर्भ ने रणजी चैंपियनशिप जीती.

दिल्ली ने पहले बल्लेबाजी करते हुए पहली पारी में 295 रन बनाए, जिस के जवाब में उतरी विदर्भ की टीम ने 547 रनों का विशाल स्कोर खड़ा कर दिया. विदर्भ को 252 रनों की बढ़त मिल गई. इस के बाद अपनी दूसरी पारी में दिल्ली की टीम 280 रनों पर औलआउट हो गई. इस तरह अब दिल्ली को मात्र 28 रनों की बढ़त मिली. जवाब में विदर्भ की टीम ने मात्र 5 ओवर में 1 विकेट के नुकसान पर 29 रन बना लिए.

दिलचस्प बात यह है कि यह वही विदर्भ है जहां का जिक्र ज्यादातर तब होता है जब किसानों की आत्महत्याओं की खबरें आती हैं. इस इलाके के किसान बदहाली से आजिज आ कर आत्महत्या करते रहे हैं. ऐसे इलाके में इस टूर्नामैंट की जीत की खबर एक खुशनुमा बात है.

आतंक पर बेअसर धौंस

‘‘जब तक पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंक फैलाना और सैनिकों पर फायरिंग बंद नहीं करता, तब तक दोनों देशों के बीच क्रिकेट सीरीज की कोई संभावना नहीं है,’’ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के इस बयान से आम लोगों को कोई खास हैरत नहीं हुई. जब भी सीमापार से पाकिस्तान अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देता है तबतब राजनीति गरमाने के लिए ऐसी बयानबाजी करना आम बात है.

पाकिस्तान के साथ क्रिकेट न खेलने की बयानबाजी से यह जताने की कोशिश की जाती है कि आतंकी गतिविधियां अब बरदाश्त के बाहर हो चली हैं और क्रिकेट न खेलना ही इस का एकलौता हल है.

यह दीगर बात है कि पाकिस्तान ने कभी इन सियासी धमकियों को संजीदगी से लेना तो दूर की बात है, भारत के साथ क्रिकेट खेलने तक की कोई उत्सुकता या पेशकश नहीं की है. फिर ऐसे बयानों के माने क्या रह जाते हैं? इस सवाल का जबाब भी उतना ही बेमानी है जितना यह कि पाकिस्तान अपनी बेजा हरकतों से न पहले कभी बाज आया था न अब उस से यह उम्मीद करनी चाहिए.

दरअसल, यह सियासी क्रिकेट है जिस की पिच पर दोनों देशों के नेता ऐसी निरर्थक बयानबाजी कर सनसनी फैलाने की कवायद करते रहते हैं. विलाशक आतंक एक गंभीर समस्या है लेकिन क्रिकेट न खेला जाना इस का हल होता तो बात कभी की बन चुकी होती. अब तो क्रिकेट अपनेआप में एक धर्म बन चुका है. जब भी भारतपाकिस्तान आमनेसामने होते हैं तबतब इस का रोमांच शबाब पर होता है और लोग हारजीत को स्टेडियम से हट कर सरहद से जोड़ कर देखने लगते हैं.

लगता ऐसा है जैसे क्रिकेट का मैच जंग का आगाज है और इसी में फैसला होना है कि कौन किस पर भारी है. हकीकत में क्रिकेट तो नेता खेल रहे होते हैं जिन्हें यह एहसास रहता है कि भारतपाकिस्तान के बीच के मैच हद से ज्यादा रोमांचक होते हैं, इस खेल में दोनों देश एकदूसरे के परंपरागत प्रतिद्वंदी होते हैं और हारजीत को सीधे राष्ट्रीयता से जोड़ कर देखते हैं.

ऐसे बयान अकसर तभी दिए जाते हैं जब नेता हताश हो चुके होते हैं. सुषमा स्वराज के इस बयान से संदेश तो यही गया कि अब सरकार के पास कहने और करने को कुछ बचा नहीं है. क्रिकेट न खेलने की धौंस सरकार का आखिरी हथियार होती है. अब तो विदेश मंत्री यह भी कह रही हैं कि किसी न्यूट्रल वेन्यू यानी तीसरे देश में भी भारत पाकिस्तान के साथ क्रिकेट नहीं खेलेगा.

इस एकतरफा बहिष्कार से न तो आतंक की समस्या हल होने वाली है और न ही पाकिस्तान की सेहत पर कोई फर्क पड़ने वाला. हां, इतना जरूर है कि क्रिकेट प्रेमियों ने मान लिया है कि अब लंबे समय तक क्रिकेट का रोमांच उन्हें देखने को नहीं मिलेगा और इस में अगर कोई देशहित छिपा है तो वे हालात सुधरने तक सब्र कर लेंगे.

लेकिन अहम बात यह है कि क्रिकेट की आड़ में राजनीति होती है जिस से किसी को कुछ हासिल नहीं होता. ऐसे बयान पहले भी आते रहे हैं और आगे भी आते रहेंगे, जिन का कोई कूटनीतिक महत्त्व भी नहीं होता और न ही दुश्मन देश के हौसले पस्त होते हैं.

गौरतलब है कि भारत व पाकिस्तान के बीच बीते 5 वर्षों से कोई क्रिकेट सीरीज नहीं खेली गई है. इस के बाद भी सीमापार आतंकी गतिविधियां यथावत हैं तो जाहिर है कि क्रिकेट न खेलने की धमकी एक सियासी टोटका है जिसे सुनने के लिए हर भारतीय हमेशा तैयार रहता है.

IPL-11 नीलामी : किसे किसने खरीदा, एक क्लिक में पढ़ें पूरी लिस्ट

IPL के 11वें सीजन के लिए 27 और 28 जनवरी को बेंगलुरु में प्लेयर्स की आक्शन हुई. इस नीलामी में कुल 169 प्लेयर्स को 8 अलग-अलग टीमों ने खरीदा. इस दौरान कई प्लेयर्स ऐसे रहे, जो पहले राउंड में नहीं बिके, लेकिन दूसरे राउंड में उन्हें किसी ना किसी टीम ने खरीद लिया. हालांकि इसके बाद भी कई बड़े प्लेयर्स ऐसे रह गए, जिन्हें खरीदने में किसी ने भी दिलचस्पी नहीं दिखाई.

लोकेश राहुल और मनीष पांडे जैसे भारतीय खिलाडिय़ों पर शनिवार को आईपीएल की नीलामी में फ्रेंचाइजी ने काफी धनराशि खर्च की जबकि इंग्लैंड के हरफनमौला बेन स्टोक्स सबसे महंगे बिके. फ्रेंचाइजियों ने घरेलू खिलाडिय़ों को अधिक तवज्जो दी जिससे अधिकांश भारतीय खिलाडियों के लिए अच्छी बोली लगी. इंडियन प्रीमियर लीग नीलामी के पहले दिन बिके खिलाडियों की सूची इस प्रकार है.

चेन्नई सुपर किंग्स

केदार जाधव (7.80 करोड़ रुपए), ड्वेन ब्रावो (6.40 करोड़ रुपए), कर्ण शर्मा (5 करोड़ रुपए), शेन वाटसन (4 करोड़ रुपए), अंबाती रायडू (2.20 करोड़ रुपए), हरभजन सिंह (2 करोड़ रुपए), फाफ डु प्लेसिस (1.60 करोड़ रुपए), इमरान ताहिर (1 करोड़ रुपए).

दिल्ली डेयरडेविल्स

ग्लेन मैक्सवेल (9 करोड़ रुपए), कागिसो रबादा (4.20 करोड़ रुपए), अमित मिश्रा (4 करोड़ रुपए), विजय शंकर (3.20 करोड़ रुपए), राहुल तेवतिया (3 करोड़ रुपए), मोहम्मद शमी (3 करोड़ रुपए) , गौतम गंभीर (2.80 करोड़ रुपए), कौलिन मुनरो (1.90 करोड़ रुपए), जेसन राय (1.50 करोड़ रुपए), पृथ्वी शॉ (1.20 करोड़ रुपए), अवेश खान (70 लाख रुपए) और हर्षल पटेल (20 लाख रुपए).

किंग्स इलेवन पंजाब

लोकेश राहुल (11 करोड़ रुपए), रविचंद्रन अश्विन (7.60 करोड़ रुपए), आरोन फिंच (6.20 करोड़ रुपए), मार्कस स्टोइनिस (6.20 करोड़ रुपए), करुण नायर (5.60 करोड़ रुपए), अंकित सिंह राजपूत (3 करोड़ रुपए), डेविड मिलर (3 करोड़ रुपए), युवराज सिंह (2 करोड़ रुपए), मयंक अग्रवाल (1 करोड़ रुपए).

कोलकाता नाइट राइडर्स

क्रिस लिन (9.60 करोड़ रुपए), मिशेल स्टार्क (9.40 करोड़ रुपए), दिनेश कार्तिक (7.40 करोड़ रुपए), रॉबिन उथप्पा (6.40 करोड़ रुपए), कुलदीप यादव (5.80 करोड़ रुपए), पीयूष चावला (4.20 करोड़ रुपए), नीतीश राणा (3.40 करोड़ रुपए), कमलेश नागरकोट्टी (3.20 करोड़ रुपए), शुभमान गिल (1.80 करोड़ रुपए), इशांक जग्गी (20 लाख रुपए).

मुंबई इंडियंस

क्रुणाल पंड्या (8.80 करोड़ रुपए), ईशान किशन (6.2 करोड़ रुपए), कीरोन पोलार्ड (5.40 करोड़ रुपए), पैट कमिंस (5.40 रुपए), सूर्यकुमार यादव (3.20 करोड़ रुपए), मुस्तफिजुर रहमान (2.20 करोड़ रुपए).

राजस्थान रायल्स

बेन स्टोक्स (12.50 करोड़ रुपए), संजू सैमसन (8 करोड़ रुपए), जोफ्रा आर्चर (7.2 करोड़ रुपए), जोस बटलर (4.40 करोड़ रुपए), अजिंक्य रहाणे (4 करोड़ रुपए), डार्सी शॉर्ट (4 करोड़ रुपए), राहुल त्रिपाठी (3.40 करोड़ रुपए), स्टुअर्ट बिन्नी (50 लाख रुपए).

रायल चैलेंजर्स बेंगलूरु

क्रिस वोक्स (7.40 करोड़ रुपए), युजवेन्द्र सिंह चहल (6 करोड़ रुपए), उमेश यादव (4.20 करोड़ रुपए), ब्रेंडन मैकुलम (3.60 करोड़ रुपए), नवदीप सैनी (3 करोड़ रुपए), क्विंटन डि कौक (2.80 करोड़ रुपए), कौलिन डि ग्रैंडहोमे (2.20 करोड़ रुपए), मोईन अली (1.70 करोड़ रुपए), मनन वोहरा (1.10 करोड़ रुपए), कुलवंत खेजरोलिया (85 लाख रुपए) और अनिकेत चौधरी (30 लाख रुपए).

सनराइजर्स हैदराबाद

मनीष पांडे (11 करोड़ रुपए), राशिद खान (9 करोड़ रुपए), शिखर धवन (5.20 करोड़ रुपए), रिद्धिमान साहा (5 करोड़ रुपए), सिद्धार्थ कौल (3.8 करोड़ रुपए), दीपक हुड्डा (3.6 करोड़ रुपए), सैयद खलील अहमद (3 करोड़ रुपए), केन विलियमसन (3 करोड़ रुपए), कार्लोस ब्रेथवेट (2 करोड़ रुपए), शाकिब अल हसन (2 करोड़ रुपए), यूसुफ पठान (1.90 करोड़ रुपए), बासिल थम्पी (95 लाख रुपए) , टी नटराजन (40 लाख रुपए) और रिकी भुई (20 लाख रुपए).

खास बातें

– साल 2018 के लिए हुई IPL नीलामी में 8 अलग-अलग टीमों ने मिलकर करीब 432 करोड़ रुपए खर्च किए और 169 प्लेयर्स को खरीदा.

– शनिवार को हुई पहले दिन की नीलामी में 78 क्रिकेटर्स बिके थे, वहीं रविवार को 91 क्रिकेटर्स के लिए बोलियां लगीं.

– भारत की ओर से जयदेव उनादकट सबसे ज्यादा कीमत पाने वाले प्लेयर रहे. उन्हें राजस्थान ने 11.5 करोड़ रुपए में खरीदा.

– दो राउंड तक अनसोल्ड रहे क्रिस गेल को तीसरे राउंड में किंग्स इलेवन पंजाब टीम ने 2 करोड़ में खरीद लिया.

– नीलामी के दूसरे दिन 20 लाख की बेस प्राइस वाले गौतम कृष्णप्पा 31 गुना ज्यादा कीमत पर सोल्ड हुए.

– श्रीलंकाई क्रिकेटर और IPL हिस्ट्री में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले लसिथ मलिंगा को इस सीजन के लिए किसी टीम ने नहीं खरीदा. मलिंगा के नहीं बिकने के पीछे उनकी उम्र, उनका खराब फार्म और लगातार चोटिल होने को वजह माना जा रहा है.

पहले दिन नहीं बिकने वाले खिलाड़ी

जेम्स फाकनर, जोश हेजलवुड, मिशेल जौनसन, मुरली विजय, क्रिस गेल, जौनी बैयरस्टो, हाशिम अमला, जो रूट, एडम जम्पा, पार्थिव पटेल, सैम बिलिग्स, सैमुएल बद्री, टिम साउथी, मिशेल मैकलेनघन, लसिथ मलिंगा, मार्टिन गुप्टिल, नमन ओझा, इशांत शर्मा, ईश सोढ़ी, बेन मैकडरमोट, अंकुश बैंस, आदित्य तारे, निखिल शंकर नाइक, सिद्धेश दिनेश लाड, शिवम दुबे, जितेश शर्मा, विष्णु विनोद, शेल्डन जैक्सन, प्रशांत चोपड़ा, हिमांशु राणा और रजनीश गुरबानी.

जीवन का सफर

नश्तर चुभाचुभा के मेरी जान ली गई

कर के इक साजिश मेरी पहचान ली गई

वो सच का फरिश्ता मुसकराता था बहुत

इसी के चलते उस की मुसकान ली गई

सचाई उस की बन गई आंख की किरकिरी

तभी तो उस को उड़ाने की ठान ली गई

उस की मदद को आया कोई न सामने

उस पर हरेक बंदूक तान दी गई

जीवन के सफर में रहा वह प्यासा सदा

मौत से पहले मंशा उस की मान ली गई.

– हरीश कुमार ‘अमित’

आईपीएल नीलामी के बीच कोहली ने सहवाग को ये क्या कह दिया

इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के 11 सीजन के लिए हुई नीलामी के दूसरे दिन यानी रविवार को जयदेव उनादकट सबसे महंगे प्लेयर साबित हुए हैं. राजस्थान रौयल्स ने जयदेव को 11 करोड़ 50 लाख रुपए में खरीदा है. जहां इस वक्त बेंगलुरु के आईटीसी गार्डेनिया होटल में आईपीएल की नीलामी की जा रही है तो वहीं इंडियन क्रिकेट टीम साउथ अफ्रीका के दौरे पर है.

दक्षिण अफ्रीका और भारत की क्रिकेट टीमों के बीच तीन टेस्ट मैचों की सीरीज खत्म हो चुकी है. इस सीरीज पर अफ्रीका ने 2-1 से कब्जा किया है. अब 1 फरवरी से दोनों टीमों के बीच 6 वनडे मैचों की सीरीज खेली जानी है. टीम इंडिया भले ही हजारों मील दूर है, लेकिन हर क्रिकेटर की नजर इस वक्त बेंगलुरु में हो रही आईपीएल की नीलामी पर टिकी हुई है. कप्तान विराट कोहली की नजरें भी नीलामी पर ही रही होंगी.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, जोहान्सबर्ग के होटल से निकलते वक्त विराट कोहली ने पूर्व क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग के बारे में कुछ ऐसा कहा है, जो आपको काफी हैरान करेगा. रिपोर्ट के मुताबिक, कोहली को “वीरू पा पागल हो गए हैं.” कहते हुए सुना गया. हालांकि, यह साफ है कि कोहली ने यह बात बेहद हल्के मूड में कही.

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कोहली ने ऐसा क्यों कहा इसके बारे में ठीक तरह से कुछ जानकारी तो नहीं है, लेकिन कहा जा रहा है कि इसका कनेक्शन आईपीएल नीलामी से हो सकता है. किंग्स इलेवन पंजाब की टीम का चयन करने के लिए वीरेंद्र सहवाग भी मौजूद हैं. नीलामी के पहले दिन पंजाब ने लगातार पांच खिलाड़ियों पर बोली लगाई तो सभी हैरान रह गए. सहवाग ने तो ट्वीट करके टीम की को-ओनर प्रीति जिंटा पर चुटकी ली कि महिलाएं जब शौपिंग करने जाती हैं तो सब कुछ खरीदना चाहती हैं.

वहीं, टीम पंजाब ने राहुल को शनिवार के दिन 11 करोड़ रुपए में खरीदा. ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि कोहली ने सहवाग के लिए यह बात केएल राहुल को खोने की वजह से कही है या कुछ और कारण है. दरअसल, केएल राहुल इससे पहले रौयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की तरफ से आईपीएल खेलते थे, तो ऐसा भी हो सकता है कि विराट कोहली को केएल राहुल के टीम में ना होना अखर रहा हो. इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि कोहली ने यह बात पंजाब की ओर से लिए जा रहे फैसलों को लेकर कही हो.

बता दें कि नीलामी के पहले दिन पंजाब ने केएल राहुल को 11 करोड़ रुपए में खरीदा तो वहीं मनीष पांडे को भी सनराइजर्स हैदराबाद ने 11 करोड़ रुपए में खरीदा. पहले दिन राहुल और मनीष पांडे सबसे महंगे बिकने वाले भारतीय खिलाड़ी बने. इसके अलावा इंग्लैंड के हरफनमौला खिलाड़ी बेन स्टोक्स अब तक के सबसे महंगे खिलाड़ी बने. उन्हें राजस्थान ने 12.50 करोड़ रुपए में खरीदा.

अगर आपको चाहिए सस्ता रेल टिकट, तो ऐसे करें बुक

अगर आप अक्सर ही ट्रेन से सफर करते हैं, उसके किराए को लेकर चिंतित हैं और अब रेल में सफर करना धीरे-धीरे महंगा पड़ता जा रहा है, तो चिंता छोड़ दीजिए. ऐसा इसलिए क्योंकि आज हम आपको रेलवे टिकट बुकिंग से जुड़ी एक खुशखबरी देने जा रहा हैं.

रेलवे टिकट बुकिंग को लेकर नई प्रणाली लाने पर विचार कर रही है. इस सिस्टम के तहत अगर आप रेल सफर के लिए एडवांस में टिकट बुक कराएंगे तो आने वाले समय में टिकट सस्ता हो सकता है. दरअसल, रेलवे ने एयरलाइंस की तर्ज पर ही ट्रेनों में ग्रेडेड डिस्काउंट सिस्टम लागू करने की तैयारी की है. सब ठीक रहा तो यह योजना जल्द ही लागू की जा सकती है.

इस योजना के लागू होने के बाद आपको पहले से रेल सफर के लिए टिकट बुकिंग करने पर कम किराया देना होगा, वहीं जितनी देर से बुकिंग करेंगे आपको किराया उतना ही ज्यादा चुकाना होगा. ठीक उसी प्रकार जिस तरह हवाई जहाज की सीटें कम होते जाने पर आपको ज्यादा किराया चुकाना पड़ता है.

रेलवे बोर्ड को यह सुझाव किराया पुनरीक्षण समिति ने दिया है. इसमें यह कहा गया है कि सफर के लिए एडवांस टिकट बुक कराने वालों को 20 से लेकर 50 प्रतिशत तक की छूट किराये में दी जा सकती है. ऐसे में किसी ट्रेन में सीटें बुक होते जाने पर किराया बढ़ता जाएगा.

हालांकि पहला चार्ट बन जाने के बाद (ट्रेन चलने से चार घंटे पहले) तक सीट खाली रहने पर एक बार फिर किराया घटाया जाएगा. हवाई जहाज में भी ऐसा ही होता है. खाली सीटों के बदले कुछ भी किराया वसूल करने की यह योजना रेलवे भी लागू करेगा. हालांकि दिल्ली और मुंबई रूट पर ट्रैफिक बहुत अधिक होने से यात्रियों को इसका लाभ मिलना मुश्किल है.

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