‘सोचा ना था’, ‘जब वी मेट’, ‘लव आज कल’, ‘रौक स्टार’ और ‘तमाशा’ जैसी फिल्मों के सर्जक इम्तियाज अली अब दूसरी शादी की तैयारी कर रहे हैं. सूत्रों के अनुसार उनकी नई प्रेमिका मास्टरशेफ आस्ट्रेलिया सीजन 6 की प्रतियोगी सराह टाड हैं, जिनका उत्तरी गोवा में ‘25 सीट आस्ट्रेलियन’ नाम से रेस्टारेंट हैं.
इम्तियाज अली के साथ साथ सराह टाड की भी यह दूसरी शादी होगी. इम्तियाज अली ने सबसे पहले फिल्मकार प्रीति अली से शादी की थी, जिनसे उनकी बेटी इदा अली है. पर प्रीति अली से इम्तियाज का 2012 में तलाक हो गया था. उधर सराह टाड की पहली शादी भारतीय मूल के देविंदर घरचा से हुई थी. जिनसे उनका एक बेटा है. सराह का भारत में अपना घर भी है.
सूत्रों की माने तो अब इम्तियाज अली व सराह टाड एक दूसरे से इस कदर प्यार करते हैं कि दोनों के जल्द ही विवाह बंधन में बंधने की खबरें उड़ रही हैं. इम्तियाज अली व सराह की प्रेम कहानी पिछले साल इम्तियाज अली के जन्म दिन पर सामने आयी थी, जब सराह ने इम्तियाज के साथ अपनी तस्वीर इंस्टाग्राम पर पोस्ट करते हुए उन्हे शुभकामनाएं दी थी.
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बहुत दिनों से खबर आ रही है कि अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर और आनंद आहूजा 8 मई को शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं. अंततः उनकी शादी को लेकर चली आ रही अटकलों को सोनम व आनंद आहुजा के परिवार ने खत्म कर दिया है. दोनों परिवारों की तरफ से जारी विज्ञप्ति के अनुसार सोनम कपूर और आनंद आहूजा की शादी 8 मई को मुंबई में होगी और इसके लिए दोनों परिवारों ने पूरे इंतजाम भी कर लिए हैं.
बता दें कि दोनों परिवारों में शादी को लेकर कई दिनों से तैयारियां चल रही थीं, लेकिन तारीख का ऐलान नहीं किया था. लेकिन अब दोनों परिवारों ने मिलकर शादी की तारीख का ऐलान करते हुए कहा कि यह उनके लिए खुशी और गर्व का विषय है. शादी 8 मई को मुंबई में होगी. हम गुजारिश करते हैं कि हमारे परिवारों की निजता का सम्मान किया जाए.
जानकार बताते हैं कि कोरियोग्राफर फराह खान, सोनम की शादी के संगीत फंक्शन की कोरियोग्राफी कर रही हैं. सोनम की चचेरी बहन जाह्नवी कपूर अपनी मां श्रीदेवी के गाने पर डांस करेंगी, जबकि अर्जुन कपूर और रणवीर सिंह के साथ अनिल कपूर ‘माई नेम इज लखन’ पर डांस करते दिखेंगे.
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ब्रायन चार्ल्स लारा आज 49 साल के हो गए हैं. लारा अपनी बेहतरीन बल्लेबाजी के लिए खासे मशहूर रहे हैं. कैरिबियाई सलामी बल्लेबाज ब्रायन लारा के नाम 11,953 टेस्ट और 10,405 वनडे रन दर्ज हैं. यूं तो सचिन तेंदुलकर के नाम क्रिकेट के सबसे ज्यादा रिकौर्ड दर्ज हैं, लेकिन ब्रायन लारा ने क्रिकेट की दुनिया में ऐसे रिकौर्ड दर्ज किए हैं, जिन्हें आज तक कोई बल्लेबाज तोड़ नहीं पाया है. लारा के नाम टेस्ट और फर्स्ट क्लास मैचों की सबसे बड़ी पारी खेलने का अनूठा रिकौर्ड दर्ज है. लारा दुनिया के इकलौते ऐसे बल्लेबाज हैं, जिन्होंने नाबाद 400 और 500 रन बनाने का अनोखा कारनामा किया है.
अगर दुनिया में इस युग के तीन क्रिकेटर चुनने हों तो ब्रायन लारा, सचिन तेंदुलकर, रिकी पोंटिंग के नाम उनमें शामिल होंगे. क्रिकेट की दुनिया में ‘भगवान’ का दर्जा हासिल करने वाले सचिन तेंदुलकर को तो निर्विवाद रूप से सबसे बेहतर बल्लेबाज माना जाता है लेकिन लारा और पोंटिंग में फैन्स यह बहस करते रहे हैं कि इन दोनों में से श्रेष्ठ कौन है. हालांकि, जिन्होंने ब्रायन लारा को खेलते हुए देखा है वे अपने आप को भाग्यशाली मानते हैं. आइए एक नजर डालते हैं ब्रायन लारा से जुड़ी कुछ दिलचस्प किस्सों पर.
एक अधूरा सपनाः ब्रायन लारा अपने परिवार के 11 बच्चों में से दसवें नंबर पर हैं. उनके पिता बंटी का उन्हें एक क्रिकेटर बनाने में बड़ा योगदान है. 2012 में जब लारा को आईसीसी ‘हौल औफ फेम’ में शामिल किया गया तो लारा ने कहा था, ‘आज जिस इंसान को आप ‘हाल औफ फेम’ जैसा सम्मान पाते देख रहे हैं, उसे उनके पिता बंटी ने तराशा है. उन्होंने ही यह सुनिश्चित किया कि मैं एक सफल क्रिकेटर और इंसान बन सकूं.’ पिता की मृत्यु लारा के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी. उनकी मृत्यु 1989 में उस वक्त हो गई थी, जब लारा ने टेस्ट डेब्यू भी नहीं किया था. लारा चाहते थे कि उनके पिता अपने बेटे की उपलब्धियों को देख सकें लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं था. उनका यह सपना अधूरा रह गया.
300वां वनडे नहीं खेल पाए लाराः लारा ने 299 एकदिवसीय मैचों के बाद अपने वनडे करियर को अलविदा कह दिया. 2007 में वर्ल्ड कप के दौरान पहले चरण में ही बाहर हो गई वेस्ट इंडीज टीम के बाद ही लारा ने संन्यास की घोषणा कर दी थी. वेस्ट इंडीज क्रिकेट बोर्ड और उनके प्रशंसकों ने उन्हें 300वां मैच खेलने के लिए प्रेरित किया लेकिन लारा अपने फैसले पर अडिग रहे. लारा चाहते तो कुछ समय और क्रिकेट खेल सकते थे लेकिन इस महान क्रिकेटर की विदाई कुछ इसी अंदाज में हुई. एक मैच पहले तक किसी को नहीं पता था कि वह संन्यास लेने वाले हैं. उन्होंने क्रिकेट के तीनों फोरमेट से संन्यास ले लिया. दिलचस्प बात है कि लारा ने अपने वन डे करियर में लेग ब्रेक गेंदबाजी से 4विकेट भी लिए.
सिडनी प्रेमः सचिन तेंदुलकर की तरह ही ब्रायन लारा की पहली औस्ट्रेलिया यात्रा यादगार रही. यहां उन्होंने एक शानदार पारी खेली. सचिन ने पर्थ में 114 रनों की पारी खेली थी और लारा ने सिडनी में 277 रनों की पारी खेली. सिडनी में खेली लारा की दो पारियों ने यह घोषणा कर दी थी कि एक जीनियस का औस्ट्रेलिया में आगमन हुआ है. 1996 में लारा की बेटी पैदा हुई तो लारा ने उसका नाम सिडनी रखा.
एक विश्व रिकौर्डः 1994 में लारा ने 375 रनों की पारी खेली. मैच के दूसरे दिन का खेल खत्म होने पर लारा 320 पर नाबाद थे. वह विश्व रिकौर्ड बनाने से महज 46 रन दूर थे. लारा को उस रात नींद नहीं आई. वह सुबह चार बजे उठ गए. नर्वसनेस के कारण वह फिर नहीं सो पाए. लारा ने शीशे के सामने खड़े होकर अभ्यास किया. वह तब तक अभ्यास करते रहे जब तक उनकी बल्लेबाजी नहीं आ गई. लारा ने 347 और 365 के स्कोर पर गलत शौट खेले. गेंदबाजों को समझ नहीं आ रहा था कि कहां गेंद फेंकी जाए. अंत में लारा की पारी 375 पर समाप्त हुई.
501 नाबाद पर नर्वस हुए थे लाराः डरहम के खिलाफ 501 नाबाद की पारी में लारा को शुरू में ही जीवनदान मिला था. अपनी इस पारी के बारे में लारा ने कहा था कि ये पारी दर्शकों को खुश करने के लिए थी. मैच के अंतिम दिन दर्शकों की संख्या 8 से 10 हजार के बीच हो गई थी. लारा नर्वस हो रहे थे, लेकिन वह तेज गति से रन बनाते जा रहे थे. लारा 497 पर थे. वह हनीफ मोहम्मद के 499 के रिकौर्ड तोड़ने से महज दो रन पीछे थे. एक गेंद उनके हेलमेट से टकराई लेकिन अगली ही गेंद पर लारा ने चौका जड़कर 501 रन पूरे कर लिए.
लारा की सर्वश्रेष्ठ पारीः 1999 की औस्ट्रेलिया के खिलाफ घरेलू सीरीज लारा के लिए कठिन दौर था. पैसों को लेकर बोर्ड से उनका विवाद चल रहा था. वेस्ट इंडीज औस्ट्रेलिया के खिलाफ पहली पारी में 51 रनों पर आउट हो गया, लेकिन ब्रिगटाउन में लारा ने 213 रनों की शानदारा पारी खेली. वेस्ट इंडीज 10 विकेट से मैच जीत गया. लारा अपनी इस पारी को बेस्ट बताते हैं. जबकि लारा 400, 375, 501 और 153 रनों की पारियां भी खेल चुके थे. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि जमैका में औस्ट्रेलिया के खिलाफ बनाए 213 रन मेरी बेस्ट पारी है.
लारा की दूसरी बेस्ट पारीः विस्डन ने अगले ही मैच में लारा की 153 रनों की पारी को बेस्ट बताते हैं. इस पारी को डौन ब्रेडमैन की 1937 एशेज के दौरान बनाए गए 270 रनों की पारी के बाद दूसरी सर्वश्रेष्ठ पारी बताया गया है. लारा ने इस पारी में अंत तक बल्लेबाजी की और टीम को एक विकेट से जीत दिलाई. एक समय वेस्ट इंडीज का स्कोर 5विकेट पर 105रन था. टीम को जीतने के लिए 308 रन बनाने थे. शायद इसी वजह से विस्डन ने लारा की इस पारी को सर्वश्रेठ बताया है.
एक रिकौर्ड जो कोई नहीं तोड़ पाया: ब्रायन लारा ने इंटरनेशनल क्रिकेट में कई महान पारियां खेलीं, लेकिन इनमें उनकी एक पारी ऐसी रही जिसे आजतक कोई नहीं खेल पाया है. यानि लारा ने इस पारी को खेलकर एक ऐसा रिकौर्ड बनाया है, जिसे आज तक कोई बल्लेबाज नहीं तोड़ पाया है. 12 अप्रैल, 2004 को इंग्लैंड के खिलाफ एंटिगुआ में लारा ने टेस्ट क्रिकेट की सबसे बड़ी पारी का रिकौर्ड बनाया था. इस पारी में उनके बल्ले से नाबाद 400 रन निकले थे. उन्होंने औस्ट्रेलियाई बल्लेबाज मैथ्यू हेडन के 380 रनों के रिकौर्ड को भी तोड़ दिया था. इस पारी में लारा ने 582 गेंदें खेली थीं, जिसमें 43 चौके और 4 छक्के शामिल थे.
मास्टर शिल्पकारः ब्रायन लारा बचपन में जब अभ्यास करते थे तो खिलाड़ियों की जगह मिट्टी के बर्तन सजा दिया करते थे. इस तरह उन्होंने क्रिकेट को गढ़ा है. उस समय उनकी टीम में विवियन रिचर्डस, क्लाइव लायड, राय फ्रैडरिक जैसे खिलाड़ी थे. तब भी उनके जेहन में यही रहता था कि लारा दुनिया का सबसे बेहतरीन बल्लेबाज है. 2003 में एक मैच को गंभीरता से देखने के बाद एडम गिलक्रिस्ट ने एक मजेदार कहानी बताई थी. एक फील्डर को मिडविकेट से हटा कर प्वाइंट पर लगा दिया गया था. उस एरिया में एक अन्य फील्डर भी था. लारा के मुंह से निकला ‘मिसटेक’. यह शब्द गिलक्रिस्ट ने सुन लिया. अगली ही गेंद पर लारा ने मिडविकेट के ऊपर से शानदार छक्का लगाया. तब गिलक्रिस्ट ने उन्हें औफ साइड में हिट करने की चुनौती दी. लारा ने औफ साइड पर दो लगातार चौके लगाकर इस चुनौती की स्वीकार किया. लारा को मैदान पर खड़े फील्डर हमेशा मिट्टी के बर्तनों की तरह लगते थे और वह हमेशा उनके बीच से शौट मारते थे. यह उनकी कलात्मकता थी.
लारा ने कभी शादी नहीं की: लारा का पत्रकार लीजेल रावेदास से लंबे समय तक प्रेम चला. दो बच्चे भी हुए लेकिन लारा ने अपने जीवन में कभी शादी नहीं की. वेस्ट इंडीज में दो खेल सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं बीच क्रिकेट और बीच फुटबौल. लारा दोनों ही खेल पसंद करते हैं और खेले भी हैं.
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आजादी के 70 वर्षों बाद आज भी दलित समुदाय जातिगत भेदभाव के खिलाफ न्याय पाने के लिए आक्रोशित है. अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को ले कर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित और आदिवासी संगठनों का गुस्सा पहली बार व्यापक स्तर पर सामने आया.
2 अप्रैल को आयोजित किया गया भारत बंद हिंसा में बदल गया. देशभर में प्रदर्शन हुए. इस दौरान उत्तर भारत के कई राज्यों में हुए उपद्रवों के दौरान एक दर्जन लोगों की जानें चली गईं और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ. राज्यों में फैली हिंसा पर काबू पाने के लिए सुरक्षा बल तैनात किए गए.
दलितों के इस आंदोलन के विरोध में दूसरी जातियां अब आरक्षण के विरोध में आंदोलन की तैयारी में हैं. ऐसे में दलितों, पिछड़ों और सवर्णों के बीच मौजूदा दरारेें और चौड़ी दिखने लगी हैं.
दरअसल, महाराष्ट्र में शिक्षा विभाग के स्टोरकीपर ने राज्य के तकनीकी शिक्षा निदेशक सुभाष काशीनाथ महाजन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि महाजन ने अपने मातहत 2 अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही किए जाने पर रोक लगा दी, जिन्होंने उस की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में जातिसूचक टिप्पणी की थी.
पुलिस ने जब दोनों अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए उन के वरिष्ठ अधिकारी महाजन से इजाजत मांगी तो वह नहीं दी गई. इस पर पुलिस ने महाजन पर भी केस दर्र्ज कर लिया.
5 मई, 2017 को काशीनाथ महाजन एफआईआर खारिज कराने कोर्ट पहुंचे पर हाईकोर्ट ने उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया. बाद में महाजन ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.
सुप्रीम कोर्ट ने महाजन के खिलाफ दर्ज एफआईआर को हटाने का आदेश देते हुए अनुसूचित जाति/जनजाति एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक का आदेश भी दिया था. यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत की भी मंजूरी दे दी थी. महाजन का तर्क था कि अगर किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के खिलाफ ईमानदार टिप्पणी करना अपराध होगा तो इस से काम करना मुश्किल हो जाएगा.
गाइडलाइन जार
सुप्रीम कोर्ट के जज ए के गोयल और यू यू ललित की पीठ ने गाइडलाइन जारी करते हुए कहा कि संसद में यह कानून बनाते समय यह विचार नहीं आया होगा कि अधिनियम का दुरुपयोग भी हो सकता है. देशभर में ऐसे कई मामले सामने आए जिन में अधिनियम का दुरुपयोग हुआ है.
नई गाइडलाइन के तहत सरकारी कर्मचारियों को भी रखा गया है. यदि कोई सरकारी कर्मचारी अधिनियम का दुरुपयोग करता है तो उस की गिरफ्तारी के लिए विभागीय अधिकारी की अनुमति लेनी जरूरी होगी. यदि कोई अधिकारी इस गाइडलाइन का उल्लंघन करता है तो उसे विभागीय कार्यवाही के साथ कोर्ट की अवमानना की कार्यवाही का भी सामना करना होगा. आम लोगों की गिरफ्तारी जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की लिखित अनुमति के बाद ही होगी.
इस के अलावा पीठ ने देश की सभी निचली अदालतों के मजिस्ट्रेटों को भी गाइडलाइन अपनाने को कहा है. उस में एससीएसटी एक्ट के तहत आरोपी की अग्रिम जमानत पर मजिस्टे्रट विचार करेंगे और अपने विवेक से जमानत मंजूर या नामंजूर करेंगे.
अब तक इस एक्ट में यह होता था कि अगर कोई जातिसूचक शब्द कह कर गालीगलौज करता है तो इस में तुरंत मामला दर्ज कर गिरफ्तारी की जा सकती थी. मामले की जांच अब तक इंस्पैक्टर रैंक के पुलिस अधिकारी ही करते थे. ऐसे मामलों में अदालत अग्रिम जमानत नहीं देती थी. नियमित जमानत केवल हाईकोर्ट द्वारा ही दी जाती थी.
सरकार की मंशा पर संदेह
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ विरोधप्रदर्शन शुरू हो गए. दलित संगठनों और कानूनी जानकारों ने कहा कि इस फैसले से वंचित समुदाय के लोगों की आवाज कमजोर होगी. दलित संगठनों और कई राजनीतिक दलों की ओर से केंद्र सरकार से इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की गई. मामले ने जब तूल पकड़ा तो सरकार जागी और मामले पर पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई. पुनर्विचार याचिका पर कोर्ट ने तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया और आगे की तारीख मुकर्रर कर दी.
सरकार की मंशा पर संदेह हुआ कि अगर वह वास्तव में दलितों के साथ है तो हल्ला मचने से पहले ही क्यों नहीं उस ने पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की बात की.
दरअसल, सरकार ने इस मामले में एससीएसटी के पक्ष को नहीं रखा जो इस देश की आबादी का एकचौथाईर् है. इस केस में जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उस का पक्ष जानने की कोशिश की थी और इसे वरिष्ठ कानूनी अधिकारी की जगह एडिशनल सौलिसीटर जनरल मनिंदर सिंह को भेजा था तो उन्होंने मामले में सरकार के पक्ष या कानून का बचाव करने के बजाय एक केस के हवाले से यह कहा कि ऐसे मामले में अग्रिम जमानत दिए जाने में कोर्ट बाधा नहीं है.
यह बात कानून के प्रावधान के खिलाफ थी. यहां सरकार के प्रतिनिधि को कानून का बचाव करना चाहिए था. उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने की दर बहुत कम है. ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला देना पड़ा कि अग्रिम जमानत मिलेगी और चूंकि सरकार कह चुकी है कि फर्जी मामले भी होते हैं, ऐसे में अदालत ने कहा कि प्रारंभिक जांच के बिना गिरफ्तारी नहीं होगी.
फैसले पर सवाल
फैसले पर सवाल उठ रहे हैं. केस दर्ज होने के बाद गिरफ्तारी से छूट मिली तो अपराधियों का निकलना आसान हो जाएगा. सरकारी अफसरों के मामले में अपौइंटिंग अथौरिटी की मंजूरी में भेदभाव होगा.
इस एक्ट के सैक्शन 18 के तहत ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है. ऐसे में यह छूट दी जाती है तो फिर अपराधियों के लिए बच निकलना आसान हो जाएगा. इस के अलावा सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अपौइंटिंग अथौरिटी की मंजूरी को ले कर भी दलित संगठनों का कहना है कि उस में भेदभाव किया जा सकता है.
साफ है कि इस फैसले से एससीएसटी एक्ट 1989 के प्रावधान कमजोर हो जाएंगे. अदालत के आदेश से लोगों में कानून का भय खत्म होगा और कानून का उल्लंघन ज्यादा हो सकता है. भय खत्म हो जाएगा और न्याय नहीं मिल पाएगा. कैसे पता चलेगा कि मामले निष्पक्षता व ईमानदारी से निबटाए गए हैं.
पहले न्याय व्यवस्था पुराणों, स्मृतियों पर आधारित थी जो जातिगत भेदभाव से पूर्ण थी. आज संविधान बनने के 7 दशकों बाद भी न्यायिक फैसले एससीएसटी तबके को भेदभाव, छुआछूत का दंश झेलने से मुक्ति दिलाने वाले नहीं हो रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला भी ऐसा ही है.
दलित की शिकायत की जांच करने वाला पुलिस अधीक्षक क्या भेदभाव नहीं करेगा? जमानत पर फैसला लेने वाला जज क्या भेदभाव से रहित होगा? ऐसे में दलित को न्याय कहां मिलेगा? पुरानी व्यवस्था और मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में क्या फर्क रह जाएगा?
अदालत का कहना था कि दलित एक्ट का दुरुपयोग होता है. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में जातिसूचक गालीगलौज के 11,060 मामलों की शिकायतें सामने आई थीं. इन में से दर्ज हुई शिकायतों में केवल 935 झूठी पाईर् गईं.
इस के विपरीत, दहेज एक्ट, चोरी, लूटपाट, मानहानि, धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने जैसे कानूनोें का अधिक दुरुपयोग होता है. अगर ऐसा है तो सभी मामलों में एकसमान आदेश होने चाहिए.
दलित आंदोलनों का इतिहास
वैसे तो दलित आंदोलन महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, बिहार में अलगअलग तौर पर चलता आया है पर दलितों की इतने व्यापक स्तर पर एकजुटता 1932 के बाद पहली बार दिखाईर् दी है. हालांकि इस से पहले 1927 में महाड में अछूतों द्वारा मनुस्मृति की प्रति जलाने की घटना बड़ी थी. मनुस्मृति जलाने के बाद महाड में अछूतों की सभा में संकल्प लिया गया कि न तो कोई अछूत हिंदुओं के मृत पशुओं की खाल उतारेगा और न ही उसे उठाएगा.
दक्षिण भारत में भी दलित आंदोलन की शुरुआत रामास्वामी नायकर पेरियार ने की थी. उन्होंने देखा कि ब्राह्मण दलितों का शोषण कर रहे हैं और उन्हें बदतर जीवन जीने पर मजबूर कर रहे हैं. पेरियार ने ईश्वर की समाप्ति, धर्म का खात्मा, ब्राह्मण का बहिष्कार करने का संदेश दिया था. दक्षिण भारत में उन का आंदोलन दलितों को राजनीतिक व सामाजिक अधिकार दिलाने में कामयाब माना गया. आजादी से पहले 1930 में ही उन्होंने कह दिया था कि भारत में समाजवादी गणतंत्र होना चाहिए.
इस से पहले महाराष्ट्र में हिंदू धर्म की व्यवस्था के खिलाफ ज्योतिराव फुले ने आंदोलन किया. महिला शिक्षा की शुरुआत फुले ने ही की. अंबेडकर ने उन्हीं से सीख ले कर दलित आंदोलन को ऊंचाई पर पहुंचाया.
समयसमय पर दलित आक्रोश उभर कर सामने आता रहा है. आज भी भेदभाव कम नहीं हुआ है. एक सामाजिक अध्ययन में कहा गया है कि दलित समुदाय आज भी छत्तीस तरह के बहिष्कारों का सामना कर रहा है. इन में विवाह में घोड़ी पर चढ़ना, मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक कुंओं, तालाबों, नलों से पानी भरना, ब्राह्मणों के बराबर आसन पर बैठना, मूंछें रखना, नाई से बाल कटवाना, चाय की दुकान पर अलग गिलास, स्कूलों में अलग पहचान जैसे मामले आएदिन सामने आते हैं.
पिछले दिनों हुए खैरलांजी, रोहित वेमुला, ऊना कांड, सहारनपुर कांड जैसे दलित उत्पीड़न के मामलों से यह साबित हुआ है कि संविधान बनने के 70 वर्षों बाद आज भी दलितों के साथ असमानता, अन्याय और भेदभाव वाला व्यवहार कायम है. 1950 में जब हम ने संवैधानिक गणतंत्र को अपनाया था तब सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और धार्मिक रूप से बहिष्कृत जाति के लोगों को कुछ विशेष अधिकार मिले थे पर सामाजिक रूप से प्रताड़ना झेलने के साथ दलितों को सरकारी संस्थानों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
कई दशकों बाद 2 अप्रैल को दलित वर्गों का हजारों साल का गुस्सा सड़कों पर उतर आया. यह इतिहास का सब से बड़ा दलित आंदोलन माना जा रहा है. दलितों में स्वाभाविक रूप से सवर्ण तबकों का सामना करने का साहस नहीं है, लेकिन इस आंदोलन ने इस मिथक को तोड़ा है. यह आंदोलन पहले ही हो जाना चाहिए था. जो काम मुसलमान नहीं कर पाए, दलितों ने कर दिखाया. दलित आंदोलन से हिंदू समाज में दरारें और साफ उभर आईं. संघ ने जो सेना खड़ी की है उस का प्रतिफल तो निकलना ही था.
इन दशकों में संविधान ने दलितों को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक रूप से मजबूत किया है. सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला व इस तरह के फैसले दरअसल कानून को कमजोर करने की कवायद हैं.
शिक्षा व्यवस्था में संघी विचारधारा पूरी तरह से कामयाब दिख रही है. इतिहास से ले कर सिलेबस तक मनमुताबिक बदले जा रहे हैं. अब ज्यूडिशियरी में भी संघ की समान विचारधारा वाले निर्णय नजर आने लगे हैं. बराबरी की व्यवस्था वाले संविधान पर धर्म की गैरबराबरी वाली भेदभाव की व्यवस्था थोपी जाती है, तो न्याय कहां होगा? सदियों से चले आ रहे भेदभाव के खिलाफ बने कानूनों को कमजोर करने की कोशिशें की जा रही हैं.
2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की जनसंख्या में 20.14 प्रतिशत आबादी दलितों की है. एससीएसटी वर्गों के 131 सदस्य संसद में हैं. इस बड़े वर्ग से जुड़े इस मामले से हर दल का हित है. इसी कारण कांग्रेस समेत बड़े विपक्षी दलों ने इस आंदोलन को समर्थन दिया. भाजपा के सब से ज्यादा सांसद इन्हीं वर्गों से हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दलितों को पक्ष में करने के लिए पिछले कुछ समय से बहुत जतन कर रहे हैं. भाजपा द्वारा अंबेडकर की मूर्तियां लगाई जा रही हैं. दलितों को हिंदू मंदिरों में प्रवेश कराने के प्रयास किए जा रहे हैं पर भाजपा और संघ समर्थित लोगों की दलितों के प्रति अपनी कट्टर पौराणिक मानसिकता बदल नहीं पाई और समयसमय पर नफरत हिंसा के रूप में जाहिर होती रही है.
आज की दलित युवा पीढ़ी पढ़ रही है. उस में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक चेतना आई है. यह युवा पीढ़ी अब मानने को तैयार नहीं है कि वह सवर्णों के अधीन उसी तरह काम करे जैसा पुराणों में बताया गया है. वह अब खुल कर इस मानसिकता का विरोध करने लगी है. सीधेसीधे हिंदू धर्म के खिलाफ बगावत पर उतर आई है.
हिंदू समाज की भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते आज भी आएदिन अधिकांश दलित बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हो रहे हैं. सवर्ण समाज आज दलितों को बराबरी का हक देने के पक्ष में नहीं है. आरक्षण के विरोध की आवाज इसलिए बुलंद की जा रही है क्योंकि सवर्र्ण और पिछड़े वर्ग की बराबरी पर अब दलित समाज आ रहा है. वह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तौर पर मजबूत बन रहा है.
दलितों के लिए पैरवी
यूरोप में हुए पुनर्जागरण आंदोलन से कोई सबक न तो सवर्र्ण समाज ने लिया और न ही दलित वर्गों ने. पुनर्जागरण आंदोलन के बाद मानवीय मूल्यों का महिमामंडन हुआ. ज्ञानार्जन का प्रकाश फैला. मानवीय मूल्य यूरोप की क्रांति के आदर्श बने. इन आदर्शों के जरिए ही यूरोप में एक ऐसे समाज की रचना की गई जिस में मानवीय मूल्योें को प्राथमिकता दी गई. यह अलग बात है कि औद्योगिकीकरण के चलते इन मूल्यों की जगह यूरोप में पूंजीवाद ने ले ली पर इस के बावजूद, मानवीय अधिकारों को सब से पहले कानूनी मान्यता दी गई.
इस का सीधा असर भारत पर पड़ा. भारतीय संविधान की प्रस्तावना से ले कर सभी अनुच्छेद इन्हीं अधिकारों की रक्षा करते नजर आते हैं. भारत में दलितों की कानूनी लड़ाई लड़ने का जिम्मा सब से मजबूत रूप में अंबेडकर ने उठाया. अंबेडकर ने सब से पहले दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की पैरवी की. अंबेडकर ने भारतीय समाज के तब के स्वरूप का विरोध और समाज के सब से पिछड़े व तिरस्कृत लोगों के अधिकारों की बात की. राजनीतिक और सामाजिक रूप से इस का विरोध हुआ. यहां तक कि महात्मा गांधी भी वंचित वर्गों के अधिकारों की मांगों के विरोध में उतर आए थे.
अंबेडकर ने मांग की थी कि दलितों को अलग प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. यह दलित राजनीति में आज तक की सब से सशक्त और प्रबल मांग थी. देश की आजादी का बीड़ा उठाने वाली कांग्रेस की सांसें भी इस मांग पर अटक गई थीं. कारण साफ था कि समाज के तानेबाने में लोगों का सीधा स्वार्थ निहित था और कोई भी इस तानेबाने में जरा सा भी बदलाव नहीं करना चाहता था.
महात्मा गांधी विरोधस्वरूप आमरण अनशन पर बैठ गए. उन के लिए यह सब से बड़ा हथियार था. अंबेडकर अपनी मांग से हटना नहीं चाहते थे पर उन पर हर ओर से दबाव पड़ा. गांधी भी टस से मस नहीं हुए. आखिर अंबेडकर को ही झुकने पर मजबूर किया गया. अंत में पूना पैक्ट के नाम से एक समझौते में दलितों के अधिकारों की मांग को धर्म की दुहाई दे कर खत्म कर दिया गया. बाद में आरक्षण की व्यवस्था की गई. यह आरक्षण सवर्णों और दलितों के बीच हुए पूना पैक्ट समझौते का परिणाम था.
असल में यह दलितों का हिंदू धर्र्म के खिलाफ वंचितों का विद्रोह जैसा है जो सैकड़ों साल बाद भी न्याय, सम्मान और बराबरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं पर खुद दलित वर्ग हिंदू धर्म के दलदल में घुसने के लिए लालायित है. उधर, सवर्ण लोग इन का न तो मंदिरों में प्रवेश स्वीकार करने को तैयार हैं, न बराबर का मानने को. संविधान में समानता के अधिकार के बावजूद यह तबका सवर्णों की पौराणिक सोच से आजाद नहीं हो पाया है.
जातिव्यवस्था की यह जहरीली सोच खत्म नहीं होगी. इस की जड़ें किताबों में नहीं, दिमागों में गहरे तक हैं. देश की मौजूदा सरकार इन जड़ों को और सींच रही है.
दलितों को मुक्ति तभी मिलेगी जब वे धर्म से मुक्त हो जाएंगे. जिस हिंदू धर्म ने दलितों के साथ भेदभाव किया, उन्हें सम्मान, न्याय से वंचित रखा, दलित आज उसी दलदल में घुसने का प्रयास कर रहे हैं. यह उन का आत्मघाती रास्ता है.
धर्म के नाम पर देश में जो हालात बन रहे हैं वे तालिबान, इसलामिक स्टेट के जिहादियों से अलग नहीं हैं. देश में अलगअलग वर्गों में बंटे समाज का विभाजन और गहरा हो रहा है. इसे पाटने के बजाय दरारें और चौड़ी की जा रही हैं. देश आगे चलने के बजाय 400 साल पीछे लौट रहा है.
दलित अगर धर्म को पूरी तरह त्याग कर शिक्षा की ओर उन्मुख होंगे, तो ही उन का सही उद्धार हो पाएगा.
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दिल्ली के रहने वाले प्रेम कुमार ने उत्तर प्रदेश में नैमिषारण्य का बहुत नाम सुना था. उत्तर प्रदेश सरकार के प्रचारप्रसार में भी नैमिषारण्य तीर्थ का बहुत जिक्र था. दिसंबर माह में प्रेम कुमार दिल्ली से 5 दिन की छुट्टी ले कर उत्तर प्रदेश घूमने गए तो अपने सफर की शुरुआत उन्होंने नैमिषारण्य से करना तय किया. कोहरे के कारण दिल्ली से लखनऊ पहुंचने में काफी समय लग गया.
लखनऊ में रात रुकने के बाद अगले दिन सुबह उन्होंने बस द्वारा नैमिषारण्य का सफर शुरू किया. लखनऊ के कैसरबाग बस स्टेशन से सुबह 7 बजे की बस मिल गई. 3 घंटे बाद बस ने नैमिषारण्य पहुंचा दिया. बस से उतरते ही दानदक्षिणा और भीख मांगने वालों ने उन्हें घेर लिया. प्रेम कुमार की पत्नी ने कहा कि दर्शन करने से पहले स्नान हो जाए. ऐसे में उन लोगों को धर्मशाला में एक कमरा लेना पड़ा. नैमिषारण्य में मंदिर के आसपास कोई अच्छा होटल या धर्मशाला उन लोगों को नहीं मिली. मजबूरी में एक साधारण धर्मशाला में कमरा लेना पड़ा.
कमरे में इंडियन स्टाइल का बाथरूम था. बड़ी मुश्किल से प्रेम कुमार और उन की पत्नी स्नान कर पाए. वहां से वे मंदिर पहुंचे तो प्रसाद खरीदने के लिए दुकानों में लोग उन को अपनी ओर खींचने लगे.
प्रेम कुमार की समझ में नहीं आ रहा था कि कहां और किस दुकान से प्रसाद खरीदें. लोगों से बचतेबचाते वे एक साफसुथरी दिखने वाली दुकान पर गए और प्रसाद के बारे में पूछा तो छत्र वाला प्रसाद कम से कम 51 रुपए का था. जब तक प्रेम कुमार 51 रुपए का प्रसाद देने को कहते तब तक दुकानदार ने 51-51 रुपए का प्रसाद प्रेम कुमार और उन की पत्नी को पकड़ा दिया.
प्रसाद ले कर आगे बढ़े तो वहां कुछ पंडों ने उन्हें घेर लिया. उन का प्रस्ताव था कि वे उन्हें पूरा नैमिषारण्य घुमा देंगे, हर मंदिर का माहात्म्य समझा देंगे, जो दक्षिणा देना चाहें दे देना. प्रेम कुमार जानते थे कि इन के चक्कर में पड़ कर ठगे जाएंगे. वे पंडों का चक्कर छोड़ कर खुद ही मंदिर दर्शन के लिए चल पड़े.
प्रेम कुमार को यह समझ नहीं आया कि प्रसाद में मिले छत्र को चढ़ाने के लिए 501 रुपए देने की क्या जरूरत? वे बोले कि छत्र नहीं चढ़ाना है. पतिपत्नी दोनों ऐसे ही प्रसाद चढ़ा कर चले आए. मंदिर से बाहर निकलते ही उन्हें एक बार फिर भीख मांगने वालों की लंबी लाइन से जूझना पड़ा. वहां से बचतेबचाते वे धर्मशाला पहुंचे और राहत की सांस ली.
प्रेम कुमार को यह नहीं लग रहा था कि कहीं घूमने आए और मन को शांति मिली हो. धर्मस्थलों में पंडेपुजारियों की लूट से वे व्यथित थे. जिस तरह का प्रचार नैमिषारण्य को ले कर सुना था वह पूरा होता नहीं दिखा.
सैरसपाटा नहीं चढ़ावा व स्नान
धार्मिक पर्यटन को पर्यटन का दर्जा देना ठीक नहीं है. असल में यहां पंडों की लूट होती है. लोगों के मन में किस्सेकहानियों के जरिए यह भर दिया जाता है कि धार्मिक पर्यटन से सुखशांति मिलती है. असल में यहां पंडों की दुकानें हैं जो हर तरह से पर्यटकों को लूटती हैं.
प्रसाद की दुकानों से ले कर धर्मशालाओं में ठहरने तक में ये पंडे तथाकथित भगवान के नाम पर पैसा लेते हैं. यहां के बाजारों व खानेपीने की दुकानों में इन लोगों का अधिकार होता है. पैसा लेने के बाद भी ये लोग इन जगहों के विकास के लिए कुछ नहीं करते हैं. कई बार इन जगहों पर बदइंतजामी का आलम यह होता है कि भगदड़ में सैकड़ों लोगों की जान चली जाती है.
ऐसी जगहों पर नदी, तालाब या कुंड में नहाने की परंपरा होती है. इस के बारे में बताया जाता है कि यहां नहाने से शरीर पवित्र हो जाता है, जबकि पानी इतना गंदा होता है कि यहां नहाने से त्वचा रोगों का खतरा बढ़ जाता है. मंदिर ही नहीं, दरगाहों में भी चढ़ावे के नाम पर लूट होती है.
51 रुपए से ले कर 501 रुपए तक के प्रसाद में एक ही तरह की चीजें होती हैं. बाहर हम 10 रुपए का पानी भी देखभाल कर खरीदते हैं, लेकिन प्रसाद के नाम पर हम यह देखते ही नहीं कि दुकानदाररूपी पंडे क्या दे रहे हैं और हम क्या चढ़ा रहे हैं. असल में इन जगहों पर पर्यटन नहीं होता, लोग धार्मिक डर की वजह से यहां आते हैं. पर्यटन का मतलब यह होता है कि हम जहां जा रहे हैं वहां के लोगों, संस्कृति, रहनसहन, पहनावा और खानपान को देखें व समझ सकें.
अंधभक्तिभरी सरकारी नीति
उत्तर प्रदेश में हर सरकार केवल ऐसे शहरों में सुविधाओं को बढ़ाती है जहां मंदिर होते हैं. वह ऐसा कर के धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करती है. योगी सरकार भी धार्मिक शहरों के विकास की बात कर रही है जहां पर्यटकों को पंडेपुजारियों और भीख मांगने वालों के अलावा कुछ नहीं मिलता है.
उत्तर प्रदेश में धार्मिक पर्यटन से जुड़े 3 सर्किट पहले से बने हैं. इन में बौद्ध, रामायण और कृष्ण हैं. इस के तहत कुशीनगर, अयोध्या और मथुरा का विकास हो रहा है. अब सरकार की धार्मिक पर्यटन से जुड़े कुछ और क्षेत्रों का विकास करने की योजना बनी है. इस में सूफी, फ्रीडम स्ट्रगल, कांवड़ और शक्तिपीठ प्रमुख हैं.
सरकार ने इस के लिए 500 करोड़ रुपए का बजट रखा है. सरकार पर केवल हिंदू धार्मिक स्थलों के विकास का आरोप न लगे, इसलिए फ्रीडम स्ट्रगल, सूफी और जैन सर्किट को जोड़ा गया है.
ब्रज सर्किट का नाम बदल कर कृष्ण सर्किट कर दिया गया है. इस से ब्रज का विकास होगा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ब्रज तीर्थ विकास परिषद का गठन किया है. अवध क्षेत्र के लिए भी यह मांग हो रही है. इस के अलावा धार्मिक महत्त्व वाले सरकारी शहरों में मथुरा, वाराणसी, वृंदावन, चुनार, विंध्याचल, देवा शरीफ, नैमिषारण्य, सारनाथ, कपिलवस्तु, श्रावस्ती, कौशांबी, महोबा, चित्रकूट, कांलिजर, झांसी, देवगढ़ और चरखारी शामिल हैं.
बड़े शहरों में आगरा, लखनऊ, वाराणसी को हैरिटेज जोन बनाया गया है. सरकार बरसाने की होली, अयोध्या के दीपोत्सव और इलाहाबाद के कुंभ को बढ़ावा देना चाहती है. उत्तर प्रदेश जनसंख्या के लिहाज से देश का सब से बड़ा राज्य है. यहां हर तरह का पर्यटन होता है. इस के बाद भी घरेलू पर्यटन के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर है. विदेशी पर्यटन को देखें तो उत्तर प्रदेश तीसरे नंबर पर है. उत्तर प्रदेश से पहले तमिलनाडु और महाराष्ट्र का नंबर आता है.
उत्तर प्रदेश मेें सब से अधिक विदेशी पर्यटक आगरा स्थित ताजमहल को देखने आते हैं. इस के बावजूद सरकार ताजमहल पर ध्यान नहीं दे रही है. उत्तर प्रदेश से जब उत्तराखंड अलग हुआ, उस के बाद से यहां पर्यटन के नाम पर केवल धार्मिक पर्यटन को ही बढ़ावा दिया गया, जबकि दक्षिण भारत ने अपने चहुंमुखी पर्यटन को बढ़ावा दिया. आज वहां देश का सब से अधिक पर्यटक जाता है.
दोहरा खर्च बड़ी परेशानी
आम शहरों में केवल आनेजाने व रहने पर खर्च करना होता है जबकि धार्मिक शहरों में इस के अलावा, पंडेपुजारियों को दानदक्षिणा देने पर भी खर्च करना पड़ता है.
धार्मिक शहर ऐसे बसे हैं कि वहां भीड़, जाम और गंदगी भरी होती है. ऐसे में पर्यटकों को गंदगी का सामना भी करना पड़ता है.
पंडेपुजारी धर्म का डर दिखा कर लूटने के रास्ते बनाते हैं. इस से लोगों को मजा कम, परेशानी ज्यादा होती है.
मंदिरों की भीड़ में शांति कम, परेशानी ज्यादा होती है, जेबकतरी से ले कर लूट तक की घटनाएं घटने लगी हैं.
धार्मिक शहरों की भीड़ में भगदड़ होने से अकसर कई तरह की दुर्घटनाएं घट जाती हैं.
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इच्छामृत्यु के बाबत आखिरकार सुप्रीम कोर्ट अब इस बात के लिए तैयार हो गया है कि आम लोगों को जीने के साथ मरने का भी मौलिक अधिकार है. यह एक किस्म से उस की अब तक की सोच का यूटर्न है. कुछ लोग इसे नागरिक आजादी की चरम निजता का सम्मान मान रहे हैं, तो कुछ लोगों की नजर में यह बेहद खौफनाक फैसला है.
सुप्रीम कोर्ट के जानेमाने वकील और स्त्रियों, बच्चों तथा तमाम वंचित तबकों के मानवाधिकारों की हमेशा वकालत करने वाले अरविंद जैन इच्छामृत्यु पर शुरू से ही लगातार अपनी सुचिंतित प्रतिक्रिया व्यक्त करते रहे हैं. पेश हैं सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक कहे जाने वाले फैसले के बाद उन से हुई विस्तृत बातचीत के महत्त्वपूर्ण अंश-
सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु का जो ऐतिहासिक फैसला दिया है, जिस में जीवन के साथ मृत्यु को भी गरिमापूर्ण बनाने की बात कही जा रही है, उस के बारे में क्या कहेंगे?
यह बेहद खतरनाक फैसला है. खासकर इस माने में हम देश को दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, पुणे और कोलकाता की नजर से ही नहीं देखें. बीमारियां और खासकर लाइलाज बीमारियां सिर्फ इन शहरों में ही नहीं होतीं, गांव में भी, कसबों में भी, ऐसे दूरदराज के इलाकों में भी जहां तमाम मैडिकल सुविधाएं हैं ही नहीं, वहां भी होती हैं, जिन से जूझने के बजाय हम उन के मुकाबले जीवन को ही खत्म कर देने का सरल विकल्प ढूंढ़ लाए हैं. यह पलायन है. यह इंसान की गरिमा और उस के जज्बे का अपमान है.
देश के बड़े हिस्से में तो लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम भी नहीं है, वहां तो लोग इस फैसले की आड़ में मामूली सी बीमारियों को भी लाइलाज बता कर जीवन को निबटा देंगे. जरा, कोई सुप्रीम कोर्ट से पूछें जहां आज तक एक सुविधासंपन्न हौस्पिटल नहीं पहुंचा, उन जगहों, उन इलाकों में मृत्यु के फैसले को न्यायोचित ठहराने वाला मैडिकल बोर्ड कहां से आएगा? क्या इतने डाक्टर देश में हैं जो हर इच्छामृत्यु को जांचपरख सकें कि मरने वाले की इच्छा से ही या सही मानो में ऐसा जीवन खत्म हुआ है, जिस के बचने की कोई उम्मीद नहीं थी.
हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने देश के दूरदराज इलाकों में या कहना चाहिए महानगरों के बाहर के इलाकों में डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट को मौत को सही या गलत ठहराने का अधिकार दे दिया है. यह इंसान की गरिमा का कितना बड़ा अपमान है कि एक औफिसर किसी की मौत को जायज या नाजायज ठहराने वाला बन जाता है.
इच्छामृत्यु के इस अधिकार से कहीं समाज में अराजकता की स्थिति तो नहीं पैदा हो जाएगी?
मेरा इस मामले में बिलकुल साफ कहना है कि इस वक्त राज्य के पास मैडिकल सुविधाएं डाक्टर, दवाई, खर्चे, पैसा है नहीं. सरकार आप को बचा नहीं सकती. आप के जीवन की रक्षा नहीं कर सकती. इसलिए कोई मरे, समाज मरे, देश मरे राज्य की बला से.
लेकिन यह फैसला राज्य यानी सरकार नहीं कर रही, यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आया है, जो कि एक स्वतंत्र न्यायिक संस्था है?
बेसिकली न्यायपालिका के मुखौटे में यह राज्यसत्ता का ही पौलिटिकल बिल है, मैं ऐसा मानता हूं. यहां राज्य नहीं चाहता या उस के पास संसाधन नहीं है या वह संसाधनों को राफेल खरीदने में खर्च करना चाहता है. मैडिकल ऐक्सपैंसेज या दूसरे वैलफेयर ऐक्सपैंसेज के लिए उस के पास कोई जगह नहीं है?
या कहें उस की इच्छा नहीं है अथवा उस की प्राथमिकता में नहीं है?
यस, उस की प्राथमिकता में ही नहीं है. वह कहता है हां, ठीक है यार, जब इस का कुछ होना ही नहीं है, बचना है नहीं, इस को मरना ही मरना है, तो इस को लाइफ सपोर्ट सिस्टम में लगा कर इतने डाक्टर, इतनी दवाएं क्यों बरबाद करें.
न्यायिक एथिक्स की दृष्टि से इच्छामृत्यु का यह निर्णय कितना खतरनाक है?
देखिए, मृत्युदंड के बारे में सुप्रीम कोर्ट की सोच है कि रेयरैस्ट औफ रेयर मामले में ही मृत्युदंड दिया जा सकता है, वह भी तब जबकि जिन्हें मृत्युदंड दिया जाना है, वे जघन्यतम अपराधी हैं. फिर भी, सुप्रीम कोर्ट मृत्युदंड देने से बचता है. अब निर्भया कांड के अपराधियों को ही लें, छोटी अदालत से, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें मृत्युदंड हो चुका है. फिर भी अभी तक उन को फांसी नहीं हुई. कहने का मतलब वहां तो आप रिव्यू भी करेंगे, प्रीव्यू भी करेंगे और अगर सजा देने में 5-10 साल की देरी हो गई तो उसे आजीवन कैद में परिवर्तन भी करेंगे यानी पहले तो रेयरैस्ट औफ रेयर केस में फांसी देंगे, फिर इस फैसले को 5-10 साल एक्जिक्यूट नहीं करेंगे, फिर डिले होने के नाम पर फांसी को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर देंगे.
छोटी बच्चियों से रेप के मामले में आज तक सिवा धनंजय चटर्जी और जुम्मन खां के किसी और को मौत की सजा नहीं हुई. दहेज हत्याओं के मामले में पहले फांसी हो सकती थी और छोटी अदालतों तथा हाईकोर्ट ने ऐसे कुछ फैसले भी दिए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें आजीवन कैद में बदल दिया. एक भी फांसी दहेज हत्याओं के मामले में आज तक नहीं हुई. 1986 में तो इन्होंने कानून ही बदल दिया कि दहेज हत्याओं के मामले में मुकदमा 302 में नहीं, बल्कि धारा 304बी में चलेगा. जिस में अधिकतम सजा आजीवन कैद ही हो सकती है. इस तरह देश के सारे दहेज हत्यारों को सुप्रीम कोर्ट ने फांसी से बचा लिया. यहां तक कि आतंकवादियों की भी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदला गया है.
जब जिन लोगों ने अपराध किए हैं, वह भी बर्बर अपराध किए हैं, अगर उन लोगों को फांसी की सजा नहीं देना चाहते क्योंकि फांसी की सजा देने के बाद कोर्ट उसे पलट नहीं सकता, इसलिए बहुत सोचसमझ कर मृत्युदंड का निर्णय लिया जाता है. सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, दुनिया के तमाम बड़े देशों ने तो इसी बात को ध्यान में रख कर फांसी की सजा ही खत्म कर दी है. तो ऐसे में किसी को भी इच्छामृत्यु का अधिकार दे देना, यह तो बहुत खतरनाक है.
क्या ऐसे फैसलों के पीछे माहौल की भी कोई भूमिका होती है, आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने इस इच्छामृत्यु के फैसले को इतनी सहजता से कैसे दे दिया है?
बेसिकली आज यानी साल 2018 में समाज की 2 ही मानसिक स्थितियां हैं या तो मर जाऊं या किसी को मार दूं यानी किसी की हत्या कर दूं या आत्महत्या कर लूं. आदमी इतना परेशान है कि वह कुछ भी कर सकता है.
आप की बातों से तो लगता है कि यह एक बेहद निराश माहौल का निराशा से भरा बेहद घातक फैसला है?
यस.
यह तो समाज के लिए बहुत घातक है?
यस. चूंकि ये लोग आइवरी टावर में बैठे हुए हैं, समाज से इन का कोई सरोकार नहीं है, समाज से कोई कंसर्न नहीं है, समाज से कोई संवाद नहीं है, इसलिए ये समझते हैं, बस यही दुनिया है, यही समाज है और यही हकीकत है. यही जीरो ग्राउंड रियलिटी है. चलो ऐसा कर देते हैं, चलो वैसा कर देते हैं, चलो मरना है मर जाओ, यार. बस, वसीयत लिख देना. अरे, वसीयत नहीं लिखा, घरपरिवार के तो लोग हैं? वो नहीं हैं तो फ्रैंड्स की कंसैंट ले लो. बुलाओ इन 4 डाक्टरों को. भाई देखो, यह बचेगा या नहीं बचेगा? नहीं बच सकता तो हटाओ यह लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम. खत्म करो. इतना पैसा नहीं है सरकार के पास, वह भी जिस का कोई फायदा न हो. इफरात में न डाक्टर हैं, न दवाईयां हैं और न पैसा है.
इस से तो बहुत खतरनाक निष्कर्ष निकल रहा है. कहां तो इसे गरिमापूर्ण मौत का नाम दिया जा रहा है, जबकि इस से तो लगता है कि यह जीवन की गरिमा खत्म करने वाला है?
वो तो हो ही रहा है. जो लोग सत्ता में बैठे हैं चाहे राजनीतिक सत्ता में हों, चाहे न्यायिक सत्ता में, उन के लिए सारी दुनिया अच्छी है. ये लोग आम जनता के दृष्टिकोण से समाज को देख ही नहीं सकते. ये तमाम बड़े अफसरों के बेटे, नेताओं के बेटे, राष्ट्रपति के बेटे, मुख्यमंत्रियों के बेटे, बड़े घरानों के बेटे, बड़े वकीलों के बेटे, बड़े भूतपूर्व जजों के बेटेबेटियां, यही सब पीढ़ी दर पीढ़ी शासक हैं. बाप भी सुप्रीम कोर्ट जज होता है, बाद में बेटा भी. ऐसे क्लास के सामने जीवन और मृत्यु के सवाल आ कर खड़े ही नहीं होते. इन के लिए मृत्यु की दूरदूर तक कल्पना ही नहीं होती. दुख क्या होता है, ये क्या जानें.
ओह, तो यह वर्ग इच्छामृत्यु के रोमांच का सुख लेना चाहता है?
हां.
इस समय जिस तरह का खतरनाक माहौल है, भीड़, बिना किसी खौफ के, जिस की चाहे हत्या कर देती है, कहीं यह उसी रास्ते का अगला कदम तो नहीं है?
मैं ने कहा न, हमारी जीने की इच्छाएं खत्म की जा रही हैं. सच पूछो तो मुझे भी मरने में कोई दिक्कत नहीं है, सारा रोना जीने का है. जीने में दिक्कत है. मुझे मरने से डर नहीं लगता, जीने में डर लगता है. पूरे समाज का यही हाल है. तो पहले तो ऐसी स्थितियां पैदा कर दो कि लोग जीने से डरने लगें और फिर मरने का अधिकार दे दो. लोग सहजता से सोचने लगेंगे, चल यार, मर जाते हैं.
देश की 73 फीसदी संपत्ति पर देश के एक फीसदी लोगों का कब्जा है. लोगों के पास खाने को रोटी नहीं है, पीने को पानी नहीं है. हां, मौत का सुख है. यह यों ही नहीं है कि किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला बढ़ता जा रहा है लेकिन उन की मौतें आंकड़े बन कर रह गई हैं. महिलाओं की आत्महत्याओं का सिलसिला हाल के सालों में काफी ज्यादा बढ़ा है. ऐसा हो भी क्यों न, किसी को अगर किसी हौस्पिटल में एडमिट कराना हो तो बड़े से बड़े नेता की सिफारिश चाहिए. डाक्टर नहीं है, दवाएं नहीं हैं. पिछले 4 वर्षों में पूरे देश में एक हौस्पिटल नहीं बना, एक कालेज नहीं बना. यह सब क्या हो रहा है. ऐसे में राज्य सरकार हो, न्यायपालिका हो, या साधनसंपन्न वर्ग, ये तीनोंचारों वर्ग जो आम लोगों के कंधों पर बैठे हैं, वे समझते हैं कि आम लोगों को मरने दो न यार, हमें क्या लेना.
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भारतीय जनता पार्टी की तारीफ करनी चाहिए कि जम्मू के कठुआ और उत्तर प्रदेश के उन्नाव में अपने समर्थकों को बलात्कार जैसे आरोप से बचाने के लिए वह जीजान से जुटी रही. जिसे 2 गायों के अपनेआप मर जाने पर दलितों और मुसलमानों पर कहर ढाने में देर नहीं लगती उस पार्टी की अपनों को बचाने की संस्कृति ही भारतीय जनता पार्टी को ‘उत्तम’ पार्टी बना रही है.
2002 में नरेंद्र मोदी की गुजरात संहार में भूमिका की आज तक पार्टी पूरी तन्मयता से रक्षा कर रही है. जैसे ही यह मामला उठाया जाता है, तुरंत पार्टी के सारे नेताओं को 1984 के दंगे याद आ जाते हैं और वे कहने लगते हैं कि कांग्रेस द्वारा किसी को 1984 के दंगों में सजा न देने का अर्थ है कि देश का कानून ऐसा है कि जो सत्ता में है वह गलत कर ही नहीं सकता, वह गुनाहगार हो ही नहीं सकता.
यही जम्मू के कठुआ और उत्तर प्रदेश के उन्नाव के मामलों में हुआ. अगर आम लोगों ने यह कांड किया होता तो प्राथमिकी लिखने से पहले अभियुक्त गिरफ्तार हो चुका होता पर चूंकि इस मामले में अपराधियों ने भाजपाई रक्षाकवच धारण कर रखा था, सो, पार्टी, सरकार, पुलिस, अदालत सब चुप रहे.
अपनी सत्ता के दौरान कांग्रेस अपनों को यदाकदा गिरफ्तार होने देती थी, और तभी उस में इतने निष्ठावान सदस्य कहां हैं जो मरने तक पार्टी के साथ रहें. भाजपा तो कहती है कि जो एक बार भाजपाधर्म ग्रहण कर ले वह सब पापों से ऊपर
हो गया और गरीबअमीर, चोरीडकैती, किडनी खरीद, बैंक लोन, अपनों को टैंडर देने जैसे छोटे अपराध वैसे ही शुद्ध हो जाते हैं जैसे राम का बालि को पेड़ की आड़ से तीर मारना या भीम का कृष्ण के कहने पर दुर्योधन की जांघ पर गदा वार करना था.
जनता के दबाव में सरकार ने यदि इन बलात्कारों के अपराधियों को गिरफ्तार भी किया है तो वे अपने ‘पुण्यों’ के बल पर जरूर ही किसी न किसी तरह मुक्ति पा जाएंगे, गवाह मुकर जाएंगे, जमानतें मिल जाएंगी, जज बारबार बदल दिए जाएंगे. हमारे पुराणों में ये सब तरकीबें बाकायदा दी गई हैं जो हमारी धार्मिक धरोहर हैं. ये आज भी विधिवत प्रवचनों में, धारावाहिकों में, फिल्मों में, धार्मिक पुस्तकों में दोहराई जाती हैं.
राजनीति करनी है तो भारतीय जनता पार्टी में करो. इसी में सुरक्षा मिलती है. कुसमय में यही किसी शिखंडी को आगे खड़ा कर बचाती है. कांग्रेस में क्या रखा है, वह तो दबाव में झुक जाती है और गुनहगारों को सजा हो जाने देती है. पार्टी सही चुनें जो खाए व खाने दे.
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मध्य प्रदेश में आदिवासियों की तादाद सवा करोड़ से भी ज्यादा है और इन में से अधिकांश राज्य की लाइफलाइन कही जाने वाली नर्मदा नदी के किनारे रहते हैं. कहनेसुनने को तो ये आदिवासी बड़े सरल व सहज हैं पर इन का एक बड़ा ऐब खुद को हिंदू न मानने की जिद है.
पिछले साल फरवरी में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत आदिवासी बाहुल्य जिले बैतूल गए थे, तो वहां के आदिवासियों ने साफतौर पर सार्वजनिक एतराज यह जताया था कि वे हिंदू किसी भी कीमत पर नहीं हैं, लेकिन संघ से जुड़े लोग आएदिन उन्हें हिंदू बनाने व साबित करने पर उतारू रहते हैं, इसे बरदाश्त नहीं किया जाएगा.
तब आदिवासी संगठनों की अगुआई कर रहे एक आदिवासी शिक्षक कगू सिंह उइके ने इस प्रतिनिधि को बताया था कि आदिवासी हिंदुओं की तरह पाखंडी नहीं हैं और न ही मूर्तिपूजा में भरोसा करते हैं. ऐसे कई उदाहरण इस आदिवासी नेता ने गिनाए थे, जो यह साबित करते हैं कि वाकई आदिवासी हिंदू नहीं हैं, यहां तक की शादी के फेरे भी इस समुदाय में उलटे लिए जाते हैं. इन में शव को दफनाया जाता है, जबकि हिंदू धर्म में शव को जलाए जाने की परंपरा है.
तमाम शिक्षित और जागरूक आदिवासियों को डर यह है कि आरएसएस और भाजपा उन्हें हिंदू करार दे कर उन की मौलिकता खत्म करने की साजिश रच रहे हैं, जिस से आदिवासियों की पहचान खत्म करने में सहूलियत रहे और धर्म व राजनीति में उन का इस्तेमाल किया जा सके. उधर, संघ का दुखड़ा यह है कि ईसाई संगठन आदिवासियों को लालच व सहूलियत दे कर उन्हें अपने धर्म में शामिल कर रहे हैं, जो हिंदुत्व के लिए बड़ा खतरा है.
ये तीनों ही बातें सच हैं और इस बाबत कोई रत्तीभर भी झूठ नहीं बोल रहा है. ईसाई मिशनरियां आजादी के पहले से इन जंगलों में घुस कर जानवरों की सी जिंदगी जी रहे आदिवासियों के लिए स्वास्थ्य व शिक्षा मुहैया कराती रही हैं. अब यह हिंदुओं की कमजोरी या खुदगरजी रही कि वे कभी आदिवासियों के नजदीक नहीं गए, उलटे उन्हें शूद्र व जंगली कह कर दुत्कारते ही रहे. आदिवासी खुद को ईसाई धर्म में ज्यादा सहज और फिट महसूस करते हैं तो इस की कई वजहें भी हैं, एक लंबा ऐतिहासिक व धार्मिक विवाद इन वजहों की वजह है. यह विवाद द्रविड़ों और आर्यों का संघर्ष है, जो अब नएनए तरीकों से सामने आता रहता है. आदिवासी खुद को देश का मूल निवासी और बाकियों को बाहरी मानते हैं.
ये करेंगे कमाल
इस पूरे फसाद में आरएसएस ने कभी या अभी भी हथियार नहीं डाले हैं, इस की ताजी मिसाल हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा 5 संतों को राज्यमंत्री का दर्जा देना है. चुनावी साल के लिहाज से विवादित और चर्चित ये गैरजरूरी नियुक्तियां निश्चित ही एक जोखिमभरा फैसला है, जो हर किसी को चौंका रहा है और हर कोई अपने स्तर पर कयास भी लगा रहा है.
साधुसंतों को राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने की एक बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि इन पांचों ने शिवराज सिंह की चर्चित व विवादित नर्मदा यात्रा से जुड़े घोटाले उजागर करने की धौंस दी थी, इसलिए उन का मुंह बंद करने के लिए शिवराज सिंह के पास यही इकलौता रास्ता बचा था. बात एक हद तक सही भी है कि बीती 28 मार्च को इंदौर के गोम्मटगिरि में संत समुदाय की एक अहम मीटिंग में इस आशय का फैसला ले कर उसे सार्वजनिक भी किया गया था. इन संतों ने ऐलान किया था कि 1 अप्रैल से 15 मई तक वे नर्मदा घोटाला यात्रा निकालेंगे. यह धौंस पूर्वनियोजित इस लिहाज से लग रही है कि भारीभरकम खर्च के अलावा कोई घोटाला हुआ होता तो वह विपक्ष और मीडिया से छिपा नहीं रह पाता.
जिन 5 संतों को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है उन में सब से बड़ा नाम चौकलेटी चेहरे वाले युवा संत भय्यू महाराज का है, जिन के दरबार में देशभर के दिग्गज नेता आ कर माथा टेकते हैं. दूसरे 4 हैं-कंप्यूटर बाबा, नर्मदानंद, हरिहरानंद और महंत योगेंद्र. इन पांचों में कई बातें समान हैं. मसलन, इन सभी ने कम उम्र में ही खासी दौलत व शोहरत हासिल कर ली है. इन पांचों का सीधा कनैक्शन भगवान से है और अहम बात यह कि इन पांचों का नर्मदा नदी के घाटों और निकटवर्ती इलाकों पर अच्छा दबदबा है, यानी इन का बड़ा भक्तवर्ग यहीं है.
नर्मदा नदी की परिक्रमा अगर कोई करे, तो वह राज्य की 230 विधानसभा सीटों में से 100 की नब्ज टटोल कर बता सकता है कि सियासी बहाव किस पार्टी की तरफ है. अपनी नर्मदा यात्रा के दौरान ही शिवराज सिंह को यह एहसास हो गया था कि उन की इस धार्मिक तामझाम वाली यात्रा में आदिवासियों ने कोई दिलचस्पी नहीं ली है, इस के बाद भी वे संतुष्ट थे कि कुछ आदिवासी तो उन की तरफ झुकेंगे ही.
शिवराज सिंह और आरएसएस का मकसद आदिवासी ही थे और हैं, जो इस बार धार्मिक कारणों के चलते भाजपा से बिदकने लगे हैं. जब बैतूल में मोहन भागवत का विरोध हुआ था, तभी समझने वाले समझ गए थे कि इस दफा आदिवासी इलाकों में भगवा दाल नहीं गलने वाली. लिहाजा, संघ ने भी इन इलाकों से अपनी गतिविधियां समेट ली थीं. राज्य सरकार ने नर्मदा किनारे के इलाकों में पौधारोपण और जलसंरक्षण जैसे उबाऊ मसलों पर जागृति लाने के लिए एक विशेष समिति गठित कर इन पांचों को उस का सदस्य बनाते हुए राज्यमंत्री का दर्जा भी दे डाला, तो किसी को इस की वजह शिवराज सिंह की डोलती नैया लगी, तो किसी को इस फैसले के पीछे उन की सियासी लड़खड़ाहट नजर आई.
संयोग से यह फैसला उस वक्त लिया गया जब सुप्रीम कोर्ट के एससी एसटीएक्ट में बदलाव या ढील के खिलाफ दलितों ने सड़कों पर आ कर विरोध जताया था और देशव्यापी हिंसा में कोई डेढ़ दर्जन लोग मारे गए थे. सर्वाधिक हिंसा और मौतें भी मध्य प्रदेश में ही हुई थीं. दलितों ने अदालत से ज्यादा नरेंद्र मोदी की सरकार को दोषी करार दिया था. ऐसे में पूरी भाजपा थर्रा उठी थी और डैमेज कंट्रोल में जुट गई थी. इस हिंसक प्रदर्शन से एक अहम बात यह भी उजागर हुई थी कि दलितों का भाजपा से मोहभंग हो चुका है.
इन बातों से चिंतित और हैरानपरेशान शिवराज सिंह को सहारा अगर आदिवासी वोटों में दिख रहा है तो उन्होंने उन्हें अपने पाले में खींचने के लिए इन पांडवों को जिम्मेदारी सौंप एक तीर से चार निशाने साधने की कोशिश ही की है.
भाजपा की धर्म की राजनीति से अब आम लोग चिढ़ने लगे हैं, फिर पहले से ही चिढ़े बैठे आदिवासियों को ये संत रिझा पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा. भाजपा के राज में साधुसंतों की मौज ज्यादा रहती है और उन्हें दानदक्षिणा भी ज्यादा मिलती है. अब तो संत मंत्री बन गए हैं, लिहाजा, उन का रुतबा और बढ़ा है. अब वे किसी घोटाले की बात नहीं कर रहे और न ही सरकार से मिलने वाली 7,500 रुपए की पगार की उन्हें दरकार है, जो उन का शायद एक मिनट का भी खर्च पूरा न कर पाए.
इन संतों को चाहिए थे अफसरों के झुके सिर और आगेपीछे हिफाजत में लगी पुलिस और यह सब इन्हें मिल रहा है तो वे आदिवासियों को हिंदू होने के फायदे भी समझाएंगे और यह भी बताएंगे कि हनुमान, शबरी, केवट, सुग्रीव और अंगद आदिवासी होते हुए भी रामभक्त थे और कैसे राम ने उन का उद्धार किया था. अब नर्मदा किनारे रोपे गए 6 करोड़ पेड़ गिनने के बजाय नर्मदा के घाटों पर पूजापाठ, यज्ञहवन और आरती व प्रवचन होंगे, क्योंकि इन संतों का तो पेशा ही यही है. लपेटे में अगर आया तो वह गरीब आदिवासी होगा, जो हिंदू धर्म के कर्मकांडों और पाखंडों का न तो आदी है, न ही पहले कभी इस से सहमत हुआ था.
ऐसे खुली संतों की पोल
अपने भक्तों को लोभ, मोह, व्यभिचार और ईर्ष्या से दूर रहने के उपदेश पिलाते रहने वाले संतसाधु खुद कैसे इन दुर्गुणों की गिरफ्त में रहते हैं, यह 5 संतों को राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने के बाद तुरंत साबित हो गया. 5 अप्रैल को भोपाल में प्रदेशभर के साधुसंत इकट्ठा हुए और जम कर नए संत मंत्रियों को लताड़ते नजर आए.
साधुसंतों की सर्वोगा संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने संतों को मंत्री का दर्जा दिए जाने पर विरोध जताते तरहतरह की बातें कहीं. मसलन, साधुसंतों का दर्जा तो मंत्री से कहीं ऊपर होता है, उन्हें सरकारी प्रलोभनों में नहीं आना चाहिए, इस से समाज में साधुसंतों का सम्मान घटेगा.
दरअसल, विरोध प्रदर्शन कर रहे ये साधु खुद इस चिढ़ और ईर्ष्या का शिकार थे कि उन्हें क्यों मंत्री नहीं बनाया गया. उधर, मंत्री बने बाबा लोग भी ऊटपटांग हरकतें करते अपनी खुशी जताते रहे. कंप्यूटर बाबा सरकारी रैस्ट हाउस की छत पर धूनी रमा कर लोगों का ध्यान खींचने में लगे रहे तो एक और संत नर्मदानंद ने दावा कर डाला कि उन के यज्ञ के चलते ही भाजपा सत्ता में आ पाई थी और इस बार भी वे यज्ञ करेंगे.
दोफाड़ हो गए बाबाओं ने तो खूब धमाल किया, लेकिन मुख्यंत्री शिवराज सिंह इस बेहूदे फैसले को ले कर दिक्कतों से घिरते नजर आ रहे हैं. एक नागरिक रामबहादर वर्मा द्वारा दायर याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उन से इस बाबत सफाई मांगी तो 12 अप्रैल को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी उन्हें नागपुर तलब कर खूब लताड़ लगाई कि साधुसंतों को सड़कों पर क्यों आना पड़ा.
शिवराज सिंह चौहान वाकई बधाई के पात्र हैं जिन्होंने साधुसंतों की पोल खोलने में अंजाने में ही सही, सटीक भूमिका निभाई. हालांकि मंत्री दर्जा न मिलने से खफा साधुसंत खुलेआम उन का और भाजपा का विरोध करने लगे हैं और कांग्रेस भी इन व्यथित व बेचैन संतों की महत्त्वाकांक्षाओं को खूब हवा दे रही है.
अच्छा तो यह होता कि सभी साधुसंतों को राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया जाता. इस से सर्वधर्म समभाव का राग अलापने वाले साधुसंतों में आपस में फूट नहीं पड़ती. सरकारी खजाने पर जरूर बोझ पड़ता, जिसे आम भक्तों से वसूला जाना हर्ज की बात नहीं जो वैसे ही साधुसंतों को चढ़ावा देदे कर उन्हें करोड़पति बना चुके हैं. जल्दबाजी में शिवराज सिंह को यह ध्यान नहीं रहा कि एकाध दलित संत को भी यह दर्जा दे देते तो शायद नाराज दलितवर्ग उन की तरफ झुकता. देखना दिलचस्प होगा कि 5 संतों के आशीर्वाद पर सौपचास संतों का श्राप भारी पड़ता है या नहीं.
VIDEO : कलरफुल स्ट्रिप्स नेल आर्ट
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महिलाएं या लड़कियां पुरुषों से क्या चाहती हैं? इस सवाल ने कई सालों से दुनिया को परेशान कर रखा है. कई किताबों, पेपर, ब्लॉग्स, कलाकारों के सेमिनार, फिल्मों, कला और संगीत हर एक ने अपने-अपने ढंग से इस विषय पर अपनी बात रखी है.
अगर हम पुरुषों की पत्रिकाओं पर विश्वास करें, तो महिलाओं को अपने पसंदीदा पुरुष के साथ सेक्स करना ही उनकी सबसे बड़ी चाहत है. अगर हम महिलाओं की पत्रिकाओं पर विश्वास करें, तो महिलाओं को पुरुषों में कई बातें अच्छी लगती हैं, जिनकी वें दीवानी होती हैं.
जाहिर है, विज्ञान ने भी इस सवाल के जवाब ढूंढ़ने के लिए कई प्रयास किए होंगे. कई अध्ययनों से और प्रयासों के बाद इस बात का निष्कर्ष निकला है कि आखिर महिलाओं को पुरुषों में सबसे ज्यादा क्या पसंद आता है. इन अध्ययनों से जो नतीजे निकले वे काफी चौकाने वाले रहें हैं.
बढ़ी हुई दाढ़ी या बीर्ड
पिछले साल अप्रैल में विकास और मानव व्यवहार में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं को बढ़ी दाढ़ी वाले पुरुष ज्यादा आकर्षित करते हैं, विशेष रूप से 10 दिन पुरानी दाढ़ी. जबकि इस अध्ययन में पुरुषों ने पूरी तरह से क्लीन सेव को अधिक रेटिंग दी, लेकिन महिलाओं को क्लीन सेव वाले पुरुष कम पसंद आए.
ऑयल, लेदर, प्रिंटर इंक
Daz नाम कि एक साबुन कंपनी बनाने वाली कंपनी ने 2,000 लोगों को शामिल कर एक सर्वेक्षण किया जिसमें यह बात सामने आई कि ब्रिटिश महिलाओं को लेदर, ऑयल, पेंट, और प्रिंटर इंक की गंध से उत्तेजना होती है. जबकि पुरुष लिपस्टिक, बेबी लोशन या की खुशबू से अधिक उत्तेजित होते हैं.
इस प्रकार का सेक्स
योनि की संवेदनशीलता पर साल 1984 में किए गये अध्ययन में कोलंबिया के शोधकर्ताओं की एक टीम ने 16 वेश्याओं और 32 आम महिलाओं पर टेस्ट किया. हैली, जो एक चिकित्सक और सेक्सोलॉजी की प्रोफेसर थी, उन्होंने यौनकर्मियों को सेक्स के साथ एक विशेष प्रकार का फ्रिक्शन दिया और मारी लाडी, जो एक मनोचिकित्सक थीं उन्होंने आम महिलाओं को सेक्स के दौरान इस विशेष फ्रिक्शन से दूर रखा. परिणाम यह रहा कि आठ आम महिलाओं कि तुलना में तीन-चौथाई से अधिक वेश्याओं को इस फ्रिक्शन कि वजह से ऑरगम हुआ.
पुरुषों की गंध
अध्ययन के मुताबिक, महिलाओं को डियोडोरेंट लगाने वाले पुरुष आकर्षक नजर आते हैं. ऐसे में यह शोध आपके लिए मददगार साबित हो सकता है. यूनिवर्सिटी ऑफ स्टरलिंग के मनोवैज्ञानिकों ने इस अध्ययन के लिए 130 महिलाओं और पुरुषों को फोटोग्राफ्स दिखाई और उनसे इन फोटोज के आधार पर मैस्क्यलिनटी और फेमनिनिटी का अंदाजा लगाने को कहा. उसके बाद 239 पुरुषों और महिलाओं को अपोजिट सेक्स की गंध के आधार पर उन्हें जज करने को कहा गया. विशेषज्ञों ने पाया कि महिलाएं, पुरुषों की गंध के प्रति ज्यादा आकर्षित होती हैं. वहीं पुरुषों को भी सुगंध लगाने वाली महिलाएं ज्यादा भाती हैं.
हर काम युवा जल्दबाजी में करना चाहते हैं. युवा ऊर्जा और जोश की यह खासीयत भी है कि गरम खून और उत्साह से भरी यह पीढ़ी हर काम को खुद करना जानती है. प्रेम भी युवा खुल कर करते हैं. समाज की सीमाओं से परे इन के रिश्ते दकियानूसी दौर को पार कर चुके हैं और सैक्स संबंधों के लिए किसी से परमिशन नहीं लेनी पड़ती. एक शोध में पाया गया कि शारीरिक संसर्ग की गुणवत्ता बोझिल होने से रिश्ते बोझ लगने लगते हैं और युवा भूल जाते हैं कि असल रोमांस क्या है. आजकल युवाओं में बढ़ती थकान, दबाव या निराशा के कारण अपनी गर्लफ्रैंड के साथ सैक्सुअल रिलेशन बोझिल होते जा रहे हैं, जिस का नकारात्मक असर उन के रिश्ते पर भी दिखता है.
युवकयुवती के बीच अगर सैक्स संबंधों में मधुरता है तो दोनों के रिश्तों में नई ऊर्जा का भी संचार होता है, लेकिन अगर सैक्स संबंध ही बोझिल हो चुके हैं तो रिश्ता भी बोझिल हुआ समझो. आइए, जानते हैं कि सैक्स संबंधों की बोझिलता दूर कर किस तरह युवा अपने रिलेशन में नई जान फूंक सकते हैं :
खुल कर करें इजहार
डौन युवाओं के बीच अगर सैक्स में डिजायर्स नहीं है तो रिश्ते में भी ऊष्मा नहीं आएगी. ज्यादातर युवतियां अपने साथी से संकोचवश सैक्स के बारे में अपनी फीलिंग्स छिपाती हैं, जिस के चलते उन्हें उस तरह का सैक्सुअल प्लेजर नहीं मिल पाता जिस की उन्हें चाहत होती है. मन की बात मन में ही रह जाती है. पार्टनर के सामने खुल न पाने के चलते सैक्स संबंध बोझिल लगने लगते हैं. अगर आप चाहते हैं कि रिश्तों में रोमांस का तड़का लगा रहे तो अपनी डिजायर्स पार्टनर से शेयर करें, जो अच्छा लग रहा है, उसे बताएं और बुरी फीलिंग्स को भी छिपाएं नहीं. अपने साथी के साथ हर बात शेयर करें और सैक्सुअल रिलेशन बनाते समय संकोच को किनारे कर उस का पूरा आनंद लें, आप पाएंगे कि रिश्तों की खोई ऊष्मा वापस आ रही है.
जराजरा टचमी… टचमी…
स्पर्श प्रेम और सैक्स का सब से अहम टूल होता है. एक स्पर्श अंगअंग में गुदगुदी भर सकता है जबकि गलत तरीके से किया गया स्पर्श मन को घृणा से भर देता है. सैक्स संबंध बनाते समय अगर अपने साथी को स्पर्श करने की कला आप को आती है तो सैक्स का आनंद कई गुणा बढ़ जाता है. सैक्स ऐक्सपर्ट मानते हैं कि स्पर्श का प्यार और सैक्स से गहरा रिश्ता है. इस के पीछे वजह है कि स्किनटूस्किन कौंटैक्ट से आप का औक्सिटोसिन लैवल बढ़ेगा. इस से आप रिलैक्स महसूस करेंगी और अपने पार्टनर के और करीब जाएंगी. थोड़ा तन से छेड़छाड़ और तन से तन का स्पर्श ही कामइच्छा को जागृत करता है. स्पर्श से कामइच्छा में इजाफा होता है और संबंधों में प्रगाढ़ता आती है. पार्टनर को प्रेमस्पर्श देना सब से कारगर तरीका है. पार्टनर का मूड बनाने के लिए कान के पीछे, आंखों पर किस भी कर सकते हैं.
शरारती बातें और चाइनीज फुसफुस
सैक्स एक कला है और इस में जितने प्रयोग किए जाएं यह उतनी निखरती है. इसलिए जब भी आप सैक्स संबंध बनाएं नए प्रयोग आजमाने से हिचकें नहीं. जब भी आप को मौका मिले पार्टनर को फोन मिलाएं और रोमांटिक तथा शरारत भरी बातें करें साथ ही उन्हें हिंट दें कि शाम को जब आप दोनों की मुलाकात होगी, तो क्या सरप्राइज मिलने वाला है. इशारा सैक्स को ले कर हो तो ज्यादा मजेदार होगा. अगर और प्लेजर खोज रहे हैं तो कान में फुसफुस वाला गेम भी खेल सकते हैं. इसे चाइनीजविस्पर गेम कहा जाता है. इस खेल को कइयों ने बचपन में खेला होगा. इस में नौटी बातों का तड़का लगा कर खेलेंगे तो मजा दोगुना हो जाएगा. जब अपने पार्टनर के साथ यह खेल खेलें तो उस के कानों में कुछ सिडक्टिव बातें कहें.
माहौल हो खुशनुमा
सैक्स कहीं भी और कभी भी करने वाली क्रिया नहीं है. जिस तरह खाना बिना भूख और स्वाद के गले नहीं उतरता, बेस्वाद लगने लगता है, ठीक उसी तरह सैक्स भी जबरन या गलत मूड और माहौल में करने से बेहद नीरस लगने लगता है. जिस से कई बार रिश्ते बोझिल लगने लगते हैं. सैक्स में माहौल और मूड जरूरी फैक्टर्स हैं. पुराने समय में तरहतरह के इत्र का इस्तेमाल होता था, क्योंकि सुगंध का सैक्स से रोचक रिश्ता है. महकता बदन और मदहोश करने वाली सुगंध से सैक्स की डिजायर और बढ़ जाती है. इसलिए अपने कमरे या जहां भी सैक्स करते हैं, वहां का माहौल खुशनुमा बना लें, कमरा सजाएं. कमरे का इंटीरियर बदलें. कमरे की लाइट डिम हो और रोमांटिक म्यूजिक चला हो, फिर दिनभर की थकान दूर करने के लिए पार्टनर की मसाज करें.
रोल प्ले और साथ में बाथ
रोजरोज एक ही काम करने से उस में बोझिलता आना स्वाभाविक है. हर रिश्ता कुछ नया और एडवैंचर्स की मांग करता है. कई बार उस के लिए खुद को बदलना भी पड़ता है. सैक्सुअल रिलेशन में इसी काम को रोल प्ले भी कहते हैं. इस में कुछ फिक्शन और नौन फिक्शन किरदारों को मिला कर एक किरदार बना लें और अपने साथी के साथ सैक्स के दौरान उस किरदार में रहें. आप पाएंगे कि आप को सैक्स की कुछ अलग अनुभूति हो रही है और नया रोमांचकारी अनुभव भी मिलेगा. पार्टनर के साथ एक रोमांटिक कहानी बनाएं, दोनों रोल बांट लें और बैडरूम में रोल प्ले करें या फिर रोल निभाएं, जो आप निभाना चाहते हैं. एकदूसरे के करीब आने का यह क्रिएटिव तरीका है. साथ ही अपनी सैक्स अपील उभारने के लिए ट्रांसपेरैंट ड्रैसेज और इरोटिक लिंजरी का सहारा लेने से भी सैक्स में तड़का लगता है. सैक्स ड्राइव बढ़ाने के लिए यह भी एक नायाब तरीका हो सकता है. बाथरूम में अच्छा परफ्यूम स्प्रे करें. बाथटब में एकसाथ बाथ लें.
स्ट्रैसफ्री सैक्स, पोर्न की लत और हैल्दी फूड
युवाओं में काम की टैंशन, नौकरी का तनाव और थकान सैक्स को बेमजा करते हैं. लिहाजा, रिश्ते भी अपना आकर्षण खोने लगते हैं. इसलिए किसी भी तरह खुद को रिलैक्स करिए तभी स्वस्थ सैक्स का मजा ले सकेंगे. जब स्ट्रैसफ्री रहेंगे तभी अपने साथी की डिजायर समझेंगे और उसे सैक्स का पूरा आनंद दे सकेंगे वरना सैक्स तो होता है, लेकिन एकतरफा और अधूरा सा रहता है, जिस में एक साथी असंतुष्ट रहता है. जिस का गुस्सा उस रिश्ते को खराब भी कर सकता है. सैक्स का स्वस्थ खाने और हैल्थ से भी कनैक्शन है. वैसे तो स्वास्थ्य के लिहाज से भी यही सलाह दी जाती है. यहां भी हम यही सुझाव देंगे. यदि आप सैक्स करना चाहते हैं तो कम खाना खाएं या फिर घंटेभर पहले खाना खा लें. इस से बैड पर आप को आलस नहीं आएगा.
पोर्न की लत को ले कर सैक्स ऐक्सपर्ट्स का कहना है कि एक सीमा तक पोर्न देखना रिलेशनशिप के लिए अच्छा है. लेकिन शोध बताते हैं कि सैक्स में आती बोझिलता के चलते रिश्तों की गर्माहट खत्म हो रही है, जिस के नतीजे ब्रेकअप के रूप में सामने आ रहे हैं.
VIDEO : कलरफुल स्ट्रिप्स नेल आर्ट
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