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जानिए आखिर कैसा हो नौकर और मालिक का रिश्ता

एक जमाना था जब मालिक और नौकर का रिश्ता वही होता था जो राजा और प्रजा का. तब जीवन बहुत सरल और सादगी वाला था. नौकरों की बेसिक जरूरत खाना, कपड़ा और मकान ही होते थे. वह इन्हीं जरूरतों की पूर्ति के लिए नौकरी करता था.

नौकर अपने मालिक की बहुत इज्जत करता था. वह जमाना ही ऐसा था जब सभी वर्गों के लोग अपने कार्यक्षेत्र से और आमदनी से संतुष्ट रहते थे, कोई किसी से बराबरी नहीं करना चाहता था.

धीरेधीरे समय बदला. नई टैक्नोलौजी के आगमन से भौतिक सुखों की वृद्घि हुई और ये सारे सुख पाने की घरघर में होड़ सी होने लगी. इस के साथ ही इन सुविधाओं की प्राप्ति के लिए नौकरों को मालिक से प्रतिस्पर्धा करने का जैसे अधिकार दे दिया गया है.

यहां तक महसूस किया गया है कि उन को अपने मालिक के ऐशोआराम से ईर्ष्या होने लगी. उन सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए अधिक से अधिक पैसा पाने की लालसा उन की बढ़ती ही चली गई. उन को जो वेतन मिलता है, वह उन चीजों को पाने के लिए पर्याप्त नहीं होता है, इस के लिए वे गलत तरीके से पैसा प्राप्त करने से भी गुरेज नहीं करते हैं.

जब से एकल परिवार का चलन शुरू हुआ है और महिलाओं ने अधिक धन अर्जित करने की लालसा से घर से निकलना आरंभ किया है, मालिक, मालकिन और घरों में कार्य करने वाले नौकरनौकरानियों के बीच पैसे के लालच में अवैध संबंध बनने भी धड़ल्ले से सुनने में आ रहे हैं. इस के कारण उन के बीच गरिमामय रिश्ते तारतार हो रहे हैं और घर की सुखशांति भंग हो रही है.

घर में जवान महिला या पुरुष होेने पर लोग नौकर या नाकरानी रखने में डरने लगे हैं. यहां तक कि छोटे बच्चों की आया रखना भी सुरक्षित नहीं है. मालिक की अनुपस्थिति में अबोध बच्चों से भीख मंगवाने और उन को चुराने की घटनाएं भी खूब हो रही हैं. पैसा इस रिश्ते पर हावी होने लगा है और यह नित्य समाचारों से सिद्ध भी हो रहा है. भौतिक सुखों की आंधी ने मालिक के प्रति नौकर के सम्मानपूर्वक रिश्ते को अस्तित्वहीन ही कर दिया है.

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कुछ घटनाएं

16 अप्रैल, 2018, फरीदाबाद : गाडि़यों की खरीदबिक्री का काम करने वाले व्यवसायी सतविंदर सिंह के औफिस में चोरी व तोड़फोड़ का मामला सामने आया. शिकायत में सतविंदर ने अपने नौकर पर दुकान से मोटा कैश ले कर फरार होने की बात की. इस की तस्दीक सीसी टीवी फुटेज में हो गई. जिस में नौकर को गुल्लक तोड़ कर कैश निकालते व तोड़फोड़ करते देखा गया.

14 अगस्त, 2017, हरिद्वार :  ज्वालापुर कोतवाली क्षेत्र के कटहरा बाजार में ज्वालापुर निवासी अशोक कुमार की हार्डवेयर की दुकान है. दुकान के मालिक ने अहबाबनगर कालोनी में गोदाम बनाया है. दुकान व गोदाम में कर्मचारी काम करते हैं. बताया जाता है कि दुकान के मालिक ने नौकरों को माल चोरी का आरोप लगा कर निकाल दिया था. इसे ले कर नौकरों ने ज्वालापुर पुलिस से शिकायत की जिस में उन्होंने मालिक पर बकाया पैसे न देने का आरोप लगाया था. पुलिस की सूचना पर दुकान के मालिक अशोक कोतवाली पहुंचे जहां मौजूद नौकरों ने हंगामा किया. नौकरों व दुकान के मालिक ने एकदूसरे पर कई आरोप लगाए. बाद में पुलिस ने दोनों को शांत कराया.

22 जुलाई, 2017, रामनगर :  सैलरी के विवाद में नौकर ने मालिक को चाकू मार दिया. बताया गया है कि महल्ला कसेरा लाइन निवासी विशाल अग्रवाल की भारत गैस की एजेंसी है. उस के यहां ग्राम छोई निवासी नरेंद्र कड़ाकोटी गैस वितरित करने का काम करता था. आरोप है कि उसे नौकरी से निकाल दिया गया है. वेतन को ले कर उस का कुछ विवाद चल रहा था. सुबह वह एजेंसी कार्यालय में पहुंचा. वेतन को ले कर उन दोनों के बीच झगड़ा हो गया. इसी दौरान उस ने मालिक के कंधे और पेट पर चाकू से वार कर दिए. इस के बाद वह खुद ही कोतवाली पहुंच गया. मालिक को गंभीर अवस्था में हौस्पिटल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उस ने दम तोड़ दिया.

18 जुलाई, 2017, नोएडा :  राष्ट्रीय राजधानी से सटे नोएडा में एक उच्चवर्गीय सोसाइटी में घरेलू नौकर को ले कर उपजे मनमुटाव ने मालिक और मुसलिम घरेलू नौकरानी के बीच दंगे जैसे हालात पैदा कर दिए थे. ये घरेलू नौकरानियां अधिकतर झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों के पिछड़े इलाकों से आती हैं. गृह सहायिका के रूप में काम करने वाली इन महिलाओं के साथ गालीगलौज, मानसिक, शारीरिक एवं यौन शोषण सामान्य सी बात है.

2 नवंबर, 2013, नोएडा :  नौकरी से निकाले जाने पर एक अकाउंटैंट की ओर से मालिक से 3 लाख रुपए की रंगदारी मांगने का मामला सामने आया. मूलरूप से आगरा के फतेहाबाद निवासी माधव पाराशर सैक्टर-37 स्थित एक रैस्तरां में अकाउंटैंट था. रैस्तरां मालिक जयप्रकाश चौहान ने गलत व्यवहार के चलते माधव पाराशर को कुछ महीने पहले नौकरी से निकाल दिया था. आरोपी नौकरी छोड़ते वक्त जयप्रकाश चौहान की एक चैकबुक, सेल्स टैक्स और सर्विस बुक की रसीदें चुरा कर ले गया था. माधव ने 15 जुलाई से 29 अक्तूबर, 2013 तक पीडि़त के मोबाइल पर कौल कर 3 लाख रुपए की रंगदारी मांगी. उस के मना करने पर उस ने जयप्रकाश चौहान को जान से मारने की धमकी दी.

चूंकि आरोपी के पास रैस्तरां की रसीदें थीं, इसलिए उस ने रैस्तरां को बरबाद करने की धमकियां भी दी थीं. 3 लाख रुपए अपने खाते में डलवाने के लिए माधव ने केनरा बैंक का एक अकाउंट नंबर भी पीडि़त मालिक के मोबाइल पर मैसेज किया. धमकियों से डर कर जयप्रकाश चौहान ने एक बार अकाउंट में 10 हजार रुपए डाल दिए. पर कुछ दिनों बाद माधव फिर से रुपए मांगने लगा. परेशान हो कर पीडि़त ने 31 अक्तूबर को थाना सैक्टर-39 में माधव पाराशर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. इस संबंध में रैस्तरां मालिक की शिकायत पर थाना सैक्टर-39 पुलिस ने आरोपी को अरैस्ट कर लिया है.

24 जून, 2017, हरदोई :  उत्तर प्रदेश के हरदोई में पुलिस ने एक डीजे व्यवसायी की हत्या का खुलासा करते हुए, हत्या में शामिल पत्नी और नौकर को गिरफ्तार किया. पुलिस ने खुलासे में बताया कि नौकर और महिला के बीच अवैध संबंध थे, जिस कारण महिला ने नौकर के साथ मिल कर मालिक की हत्या कर दी.

सितंबर, 2017, पटना :  पूर्णिया का रहने वाला दिलीप चौधरी दुकान चलाता था और उस की दुकान पर रहने वाला नौकर घनश्याम उस के घर आयाजाया करता था. इसी दौरान उस की पत्नी और नौकर के बीच प्रेम हो गया. दोनों शारीरिक संबंध बनाने लगे. एसपी निशांत तिवारी ने बताया, नौकर और मालिक की पत्नी के बीच चल रहे इस अवैध संबंध के कारण मालिक ने नौकर को रंगेहाथ पकड़ा और उस की हत्या कर दी. गिरफ्तारी के बाद सख्ती से पूछे जाने पर आरोपी ने अपना गुनाह कुबूल कर लिया.

तृप्ति लाहिड़ी की किताब ‘मेड इन इंडिया’ देश में घरेलू नौकरों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर संवेदनशील तरीके से सोचने को विवश करती है. लाहिड़ी अपनी इस पुस्तक में कहती हैं कि उदारीकरण के वर्तमान दशक में देश में घरेलू नौकरों की संख्या में 120 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है. इस असंगठित क्षेत्र में कार्यक्षेत्र का दोतिहाई हिस्सा महिलाएं भरती हैं और उन में से अधिकतर झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों के पिछड़े इलाकों से आती हैं. इन में से अधिकतर अल्पायु में ही काम शुरू कर देती हैं और उन्हें सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी कम वेतन दिया जाता है.

नौकरों के लिए न्याय

इन्हें नौकरी देने वाले लोगों में देश के धनाढ्य वर्ग से ले कर नवधनाढ्य होते हैं, जिन में से अधिकतर अभी भी मालिक और नौकर के बीच के पारंपरिक अंतर में विश्वास करते हैं. डिजिटल मीडिया ‘क्वार्ट्ज’ की एशिया ब्यूरो चीफ लाहिड़ी अपनी पुस्तक में वास्तविक जीवन की कहानियों के जरिए घरेलू नौकरों की दशादिशा को बड़ी ही प्रामाणिकता के साथ पेश करती हैं तथा ब्रोकरों व एजेंटों के कारोबार का विस्तार से ब्योरा पेश करती हैं. लाहिड़ी के अनुसार, भारत में घरेलू नौकरों के लिए न्याय हासिल कर पाना बेहद मुश्किल है.

पुस्तक में लाहिड़ी ने बतौर घरेलू नौकर अपने खुद के अनुभव को भी लिखा है. घरेलू नौकरों का क्षेत्र इतना तेज क्यों विकसित हुआ? पहले औरतें घर में रहती थीं, इसलिए अधिकतर घर के सभी कार्य वे स्वयं ही करती थीं, लेकिन अब ऐसा शहरी आबादी के अमीर होने और शहरों में महिलाओं के अधिक संख्या में काम करने के चलते हुआ. स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी. ऐसे में अगर वे उच्चशिक्षा लेना चाहती हैं और शिक्षा हासिल कर नौकरियों में जाती हैं, तो उन्हें घरेलू कामकाज के लिए मदद की जरूरत होती है.

उन का कहना है कि कई संगठनों ने घरेलू नौकरों के इस क्षेत्र को संगठित करने की कोशिशें की हैं, लेकिन इस क्षेत्र के संगठनीकरण की कोशिशें खास सफल नहीं हुईं. इस में 2 सब से बड़ी अड़चनें हैं. लोग अपने आसपास के लोगों द्वारा घरेलू नौकरों को दिए जाने वाले वेतन को ही सही मानते हैं. इसलिए उन्हें घरेलू नौकरों को अधिक वेतन देने के लिए राजी करना बेहद मुश्किल होता है. अगर वे इस के लिए राजी भी होते हैं तो उसी अनुपात में ढेरों काम लेना चाहते हैं.

इस के अलावा गरीबी से परेशान हो कर काम की तलाश में नएनए आए व्यक्तियों द्वारा कम वेतन पर काम करने पर राजी होने के चलते भी सांगठनिक तौर पर अधिक वेतन की मांग करना संभव नहीं हो पा रहा.

मालिक और नौकर के वर्तमान रिश्ते को सुधारने के लिए कानून के साथ लोगों की मानसिकता में बदलाव आना अत्यधिक आवश्यक है. पहले जमाने के विपरीत उन को अब बराबरी का दर्जा देना पड़ेगा. वे अपनी मेहनत के बदले वेतन पाते हैं, हम उन को पैसा दे कर उन पर कोई एहसान नहीं करते. उन को अपने से निम्नस्तर का सोचने का हमें कोई अधिकार नहीं है, तभी वे हमें आदर की दृष्टि से देखेंगे.

कुछ बदलाव जरूरी हैं

  • जितना उन को वेतन महीनेभर में मिलता है, उतना तो हम एक बार किसी रैस्तरां का बिल चुकाने में खर्च कर देते हैं. इसलिए जिस तरह हमारे वेतन की पुनरावृत्ति होती है, उसी प्रकार समय के अनुसार उन के वेतन में भी बढ़ोतरी होनी चाहिए. उन के लिए महीने में नियमित छुट्टी के साथ अन्य सुविधाओं के लिए भी वेतन सहित छुट्टी का प्रावधान अति आवश्यक है.
  • नौकर या नौकरानी रखने से पहले उस की पृष्ठभूमि की जानकारी होनी अति आवश्यक है.
  • घर में किशोर लड़का या लड़की हो तो किसी को भी कार्य करने के लिए रखने के बाद उस की गतिविधियों पर पूरा ध्यान रखना आवश्यक है.
  • अबोध बच्चों को आया के हवाले करना बहुत ही अनुचित है. महिलाओं को तभी नौकरी के लिए बाहर जाना चाहिए जब घर का ही कोई सदस्य उस की घर पर देखभाल करने के लिए हो. किसी बच्चे ने अपनी मां से पूछा कि क्या वह अपना कीमती सामान किसी बाहरी व्यक्ति की देखरेख में छोड़ सकती है. उस के मना करने पर उस बच्चे ने बहुत सही प्रश्न किया कि फिर वह अपने सब से कीमती चीज, अपनी बच्चे को किसी की निगरानी में कैसे छोड़ सकती है?

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निर्वासन का दर्द झेलती औरतों की ये कहानी पढ़ी आपने

कर्मों की कार्यशाला में सदियों पक कर संस्कार तैयार होते हैं, जो धीरेधीरे संस्कृति बन जाते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो आज भी मिथिला की नारियां सीता के बताए मार्ग पर चलने को शायद प्रतिबद्ध न होतीं.

सीता ने रावण के आचरण का कड़ा विरोध किया था पर राम के अत्याचार का प्रतिवाद न कर सकीं. अगर उस वक्त सीता ने खुद पर राम द्वारा किए गए अत्याचार का विरोध किया होता तो शायद अच्छा होता. बगैर किसी अपराध के निर्वासन के दंड को चुपचाप स्वीकार कर सीता ने जानेअनजाने नारियों को जो संदेश दिया उस का परिपालन आज भी अनेक सीताएं कर रही हैं.

मिथिला समेत कई नगरों में आज भी ऐसी सीताओं की कमी नहीं है जो प्रतिदिन उपेक्षा, अपमान और अवमानना का विष पीती हुई निर्वासन की पीड़ा भोग रही हैं. ये सीताएं भी अपनों के अत्याचार का विरोध नहीं कर पातीं. खास बात यह है कि छोटीछोटी बातों पर छोड़ दी जाने वाली ऐसी निर्दोष स्त्रियों के प्रति परिवार और समाज की कोई सहानुभूति नहीं होती. झूठे आक्षेप, मारपीट और प्रताड़नाओं को चुपचाप सहते हुए हर हाल में ससुराल में बनी रहने वाली स्त्रियों को ही समाज में श्रेष्ठ मान्यता दी जाती है. अपनों की उपेक्षा और निर्वासन की पीड़ा झेल रही कुछ सीताओं की व्यथाकथा से आप भी रूबरू हों.

शक में ठुकराया

3 बहनों और 2 भाइयों में सब से बड़ी नीतू कुमारी 15 सालों से अपने मायके में रह कर छोड़े जाने का कष्ट झेल रही है. 16 साल की उम्र में पास के गांव में महेंद्र सिंह से उस की शादी हुई थी. शादी के बाद उस का पति उसे अपने साथ दिल्ली ले कर गया जहां वह काम करता था. 2 बच्चे भी हुए. घर पर नीतू पूरे दिन अकेली रहती थी. अकेलेपन से ऊब कर वह कभीकभार पड़ोस के मुसलिम परिवार के साथ घूमनेफिरने जाने लगी. महेंद्र को यह पसंद नहीं आया.

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तीसरी बार जब नीतू गर्भवती थी तो उस का पति बहाने से दोनों बच्चों के साथ उसे उस के मायके पहुंचा कर लौट गया. नीतू आज तक वापस लिवा ले जाने की प्रतीक्षा कर रही है. उस के पति को शक था कि यह तीसरा बच्चा उस का नहीं है. बच्चे के जन्म के एक साल बाद वह एक बार आया था और बेटे को देख कर एक ही दिन में चला गया. फिर कभी वापस नहीं आया. नीतू के बारबार फोन कर के वापस ले चलने की मिन्नतों का जवाब था कि इस तीसरे बच्चे की शक्ल पड़ोस के फिरोज से मिलती है.

लदनियां के सरकारी स्कूल के अध्यापक रमाकांत ठाकुर के 2 बच्चों में सोनी छोटी है. उस से बड़ा एक भाई है. देखने में बेहद खूबसूरत सोनी की शादी घर वालों ने उस के मैट्रिक पास करते ही कर दी थी. पति दिल्ली में नौकरी करता था. साधारण कदकाठी और गहरे रंग के आलोक कुमार पर पत्नी की बेदाग खूबसूरती का ऐसा असर हुआ कि वह दिल्ली से नौकरी छोड़ कर घर पर ही आ कर बैठ गया. एक बेटा होने के बाद मातृत्व की गरिमा से सोनी का रूप और निखर गया.

सोनी चाहती थी कि पति कोई कामधंधा करे पर आलोक चौबीसों घंटे घर में मंडराता, पत्नी के हर क्रियाकलाप पर पैनी नजर रखता. पति की बेकारी से तंग आ कर सोनी 1-2 घरों में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी जिस से कुछ पैसे आने लगे. पर आलोक उस से सारे पैसे ले कर शराब पी जाता. धीरेधीरे घर में क्लेश होने लगा. एक दिन आलोक ने मारपीट कर सोनी को घर से निकाल दिया. पड़ोस के घर में सोनी ने अपने बच्चे के साथ रात काटी. सुबह घर में घुसने की कोशिश की तो पड़ोसी के साथ अनैतिक संबंध का कलंक लगा कर दोबारा मारापीटा.

लाचार सोनी महल्ले के कुछ लोगों से किराए के पैसे मांग कर मायके वापस आ गई. आज दोचार घरों में ट्यूशन पढ़ा कर वह अपना व अपने बेटे का पेट पाल रही है. ध्यान देने वाली बात यह है कि उस के पिता के हिसाब से इस अलगाव के लिए उस की बेटी ही जिम्मेदार है, उसे वापस नहीं आना चाहिए था.

प्रताड़ना का दंश

एक मामला है भागलपुर की सीमा चौधरी के निर्वासन का. समृद्ध परिवार की रूप, गुण और संस्कारों से परिपूर्ण 4 बहनों में सब से बड़ी सीमा की शादी उच्च पद पर आसीन युवक संदीप सुमन से बहुत धूमधाम से की गई थी. पतिपत्नी की आयु में कई सालों का अंतर था. सुहागरात से ही पत्नी को प्रताडि़त करने का जो सिलसिला चला वह कभी अंत न ले सका. गालीगलौज से ले कर हर प्रकार की घरेलू हिंसा का सामना करती सीमा एक बेटे की मां बन गई.

रोजरोज अपमान सहने के बावजूद सीमा ने अपने मायके में यह सब नहीं बताया था. पर एक बार जब वह मायके आई हुई थी तो आदत से मजबूर संदीप ने वहां पर भी उस की पिटाई कर दी. उस दिन घर के लोग वस्तुस्थिति से परिचित हो सके. उन लोगों ने संदीप को समझाने की कोशिश की तो वह पूरे परिवार को बुराभला कहता पत्नी को वहीं छोड़ कर वापस आ गया.

सीमा की बहुत कम उम्र में शादी कर दी गई थी. सो, उस की पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी थी. मायके में रह कर बच्चे को पालने के साथ उस ने अपनी पढ़ाई पूरी की. आज वह सरकारी विभाग में एक उच्च अधिकारी है, पर पति के खौफ से बाहर नहीं निकल पाई है. सालों से कोर्ट में तलाक का केस लटका पड़ा है जो उस के पति की तरफ से किया गया था.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान जब भी उस का सामना अपने पति से होता है, सीमा हाइपरटैंशन समेत कई व्याधियों से पीडि़त हो जाती है और कई दिनों तक दवाई लेने के बाद ही उस की हालत संभलती है. संदीप चूंकि सरकारी सेवा में है, इसलिए दूसरी शादी तो नहीं कर सका पर उस के अनैतिक संबंधों की दुर्गंध समाज में पसरी हुई है.

इसी तरह झंझारपुर की सुनीता. जब वह 13 साल की थी तभी उस की शादी कर दी गई थी. ससुराल आने के 2 दिनों बाद ही उस का पति काम पर वापस चला गया. दोचार महीने में वह कभी दोचार दिनों के लिए आता और फिर वापस चला जाता. दरअसल, वह ससुराल से पूरा दहेज न मिलने के कारण असंतुष्ट व गुस्से में था. वह सुनीता पर मायके से दहेज मांगने के लिए दबाव बनाता था. मायके की आर्थिक हालत देख कर सुनीता कुछ नहीं कह पाती थी.

कुछ ही समय में सुनीता 3 बेटियों की मां बन गई. जब बच्चे थोड़े बड़े हुए तो सुनीता ने पति से उन की पढ़ाई का खर्च मांगा जिसे देने से उस ने साफ मना कर दिया. लाचार हो कर सुनीता ने आसपास के कई घरों में घरेलू काम कर के उन्हें पढ़ायालिखाया. धीरेधीरे सुनीता के पति ने घर आना ही छोड़ दिया. उस की खुद की मां का खर्च भी सुनीता ही उठाती रही.

एक अच्छा रिश्ता मिलने पर सुनीता ने बड़ी लड़की की शादी कर्ज ले कर कर दी, लेकिन 3 महीने में ही उस के पति ने उसे छोड़ दिया. आज सुनीता और उस की बेटी सुबह से रात तक कई घरों में काम करती हैं, तब जा कर पूरे घर का पेट भरता है.

भागलपुर की ही मोती की कहानी थोड़ी अलहदा है. दूधिया गौर वर्ण की मोती ने 8वीं क्लास में ही महल्ले के एक लड़के हर्ष के झांसे में आ कर घर से भाग कर मंदिर में शादी कर ली. गनीमत यह रही कि ससुराल वालों ने मोती को सहर्ष स्वीकार कर लिया.

8-9 साल बहुत अच्छे कटे पर उस के बाद हर्ष छोटीछोटी बात पर कलह करने लगा. दूसरे बच्चे के जन्म के बाद उस ने दूसरे शहर में बिजनैस जमा लिया और घर आना कम कर दिया. मोती बूढ़े सासससुर की सेवा करने के साथसाथ बच्चों को भी संभालती रही. इधर हर्ष ने वहां छिप कर दूसरी शादी कर ली. मोती ने चूंकि घर से भाग कर शादी की थी, इसलिए मायके का आसरा भी खत्म हो गया. सासससुर की सहानुभूति और प्यार तो बहू के साथ है पर बेटे पर उन का कोई वश नहीं. 7 साल हो गए, हर्ष ने पत्नी की खबर नहीं ली. सोनी से पूछने पर कि अगर उस का पति वापस आता है तो क्या वह उसे पहले की तरह स्वीकार कर पाएगी, उस का जवाब था, उस का घर है, उस के बच्चे हैं वह जब चाहे आ सकता है.

मजे की बात यह है कि ये स्त्रियां बरसों से निर्वासन का दर्द भोग रही हैं पर पति और परिवार की बदनामी न हो जाए, इसलिए इन्होंने अपने असली नाम और तसवीरें छापने की अनुमति नहीं दी.

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102 नौट आउट : नालायक औलाद को बाहर का रास्ता दिखाएं

गुजराती भाषा के नाटकों की बदौलत बौलीवुड में ‘आंखे’ और ‘‘ओह माई गौड’’ सहित कई बेहतरीन व अति उत्कृष्ट फिल्में आयी हैं, मगर सौम्या जोशी लिखित गुजराती भाषा के नाटक ‘‘102 नौट आउट’’ पर बनी फिल्म ‘‘102 नौट आउट’’ को उत्कृष्ट फिल्म नहीं कहा जा सकता.

मूर्खतापूर्ण हंसाने वाले दृश्यों के साथ रुलाने वाली इस फिल्म के बाक्स आफिस पर कमाल दिखाने की बहुत ज्यादा उम्मीद नजर नहीं आती है. जबकि तीन किरदारों वाली इस फिल्म में अमिताभ बच्चन व ऋषि कपूर जैसे महान कलाकारों के संग जिमित त्रिवेदी हैं.

फिल्म की कहानी मुंबई के एक गुजराती परिवार की है. यह कहानी है 102 वर्षीय दत्तात्रय वखारिया (अमिताभ बच्चन) और उनके 75 वर्षीय बेटे बाबूलाल वखारिया (ऋषि कपूर) की. इनके साथ एक दवा की दुकान पर काम करने वाला युवक धीरु (जिमित त्रिवेदी) भी जुड़ा हुआ है,जो कि हर दिन इन्हे दवा आदि देने आता रहता है. दत्तात्रय ने छह माह के लिए धीरु की विशेष सेवाएं ले रखी हैं.

फिल्म शुरू होती है सूत्रधार से, जो कि फिल्म के किरदारों का परिचय करवाता है. बाबूलाल वखारिया उर्फ बाबू 75 वर्ष के हैं और उन्होंने मान लिया है कि वह बूढे़ हो गए हैं. जिसके चलते बुढ़ापा उन पर झलकने लगा है. अब वह कंधा सीधा करके खडे़ भी नहीं होते हैं. दवाओं पर चल रहे हैं. हर दिन डाक्टर मेहता के पास अपना चेकअप कराने जाते हैं. बहुत कम बोलते हैं. गुपचुप रहते हैं. उनकी जिंदगी में खुशी का कोई नामोनिशान नहीं है. उन्हे लगता है कि वह बहुत जल्द सब कुछ भूल जाते हैं. इसलिए हर जगह उन्होंने लिख रखा है कि क्या करना है. मसलन – बाथरूम में लिखा है – गीजर बंद करें.’ पत्नी चंद्रिका की मौत हो चुकी है. अब बाबू इस उम्मीद में जी रहे हैं कि 21 वर्ष से विदेश में बसा, वहीं शादी कर चुका उनका बेटा अमोल एक न एक दिन अपनी पत्नी व बच्चों को लेकर उनके पास आएगा.

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बाबूलाल वखारिया को अपने पोते पोती का चेहरा देखने की हसरत है. इसी हसरत के चलते वह अपने नालायक बेटे अमोल की हर बात को भुला चुके हैं. वह यह भी याद नहीं करना चाहते कि उनकी पत्नी चंद्रिका पूरे 28 दिन तक बीमार रहीं और बेटे अमोल को याद करती रही, पर अमोल  छुट्टी न मिलने की बात कर भारत नहीं आया.

अपने बेटे बाबूलाल वखारिया की इस आदत व स्वभाव से दत्तात्रय परेशान हैं. वह 102 की उम्र में छब्बीस वर्ष के युवक की तरह जिंदगी जीते हैं और वह चाहते हैं कि उनका बेटा बाबू लाल भी अपने नालायक बेटे को भुलाकर अपनी जिंदगी जिए. दतात्रय हमेशा खुश रहते हैं, फन करते रहते हैं. एक दिन दत्तात्रय को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सच पता चलता है, तब वह एक बूढ़े चीनी का कटआउट लेकर घर पहुंचते है और बताते हैं कि यह चीनी 114 वर्ष तक जिंदा रहा, तो अब दत्तात्रय इसका रिकार्ड तोड़ेंगे.

उसके बाद वह बाबूलाल को बदलने के लिए एक एक कर छह शर्त रखते हैं. शर्त न मानने पर उसे वृद्धाश्रम भेजने की धमकी देते हैं. अब यह छह शर्ते क्या हैं और बाबू लाल में बदलाव आता है या नहीं, इसके लिए फिल्म देखनी पड़ेगी.

फिल्म गुजराती नाटक पर आधारित है. और इंटरवल से पहले फिल्म जिस ढंग से आगे बढ़ती है, उसे देखते हुए दर्शक यही सोचता रहता है कि नाटक को फिल्म में बदलने की क्या जरुरत थी. इंटरवल से पहले फिल्म प्रभावित नहीं करती है. इंटरवल तक फिल्म मूर्खतापूर्ण हास्य चुटकलों के अलावा कुछ नहीं है. मगर इंटरवल के बाद फिल्म सही मायनों में न सिर्फ गति पकड़ती है, बल्कि अति संवेदनशील व भावुकता वाली फिल्म बन जाती है, जो कि हर इंसान को सिखाती है कि महज संपत्ति के लिए मां बाप से रिश्ता रखने वाले बच्चों को घर से बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए.

इतना ही नहीं फिल्म में एक खूबसूरत संवाद है-‘‘औलाद नालायक निकले, तो उसे भूल जाना चाहिए. सिर्फ उसका बचपन याद रखना चाहिए.’’फिल्म की कमजोर कड़ी है बेतुके दृश्यों से भरी पटकथा. फिल्म में एक सीन है, जहां दत्तात्रय अपने बेटे बाबू को हर दिन डाक्टर से मिलने पर रोक लगाने के लिए डाक्टर पर 250 रूपए से भरा बटुआ चुराने का आरोप लगाने की सलाह देता है. यह पटकथा लेखक के खाली दिमाग का परिचायक है. इसी तरह कई जगह पटकथा लेखक की कमजोरी उजागर होती है.

फिल्मकार उमेश शुक्ला यह साबित करने के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं कि तीन पुरुष पात्रों के साथ, बिना हीरोईन के भी बेहतर फिल्म बन सकती है. इंटरवल से पहले तो निर्देशक के तौर पर वह काफी निराश करते हैं, मगर इंटरवल के बाद वह फिल्म पर अपनी पकड़ बनाने में कामयाब होते हैं. फिल्म में पिता पुत्र के बीच के आत्मीय व भावुक संबंध बड़ी खूबसूरती के साथ उकेरे गए हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर दोनों ही अभिनय के महारथी हैं. अमिताभ बच्चन अपने अभिनय से भावनाओं का ऐसा सैलाब उकेरते हैं कि दर्शक हंसने के साथ साथ रोता भी है. मगर उनकी सभी धारणात्मक अति उत्साही प्रकृति एक सीमा के बाद असहनीय हो जाती हैं. इतना ही नहीं अमिताभ बच्चन इस फिल्म में खुद को बार बार दोहराते हुए नजर आए हैं. उन्हे देख दर्शकों को अमिताभ बच्चन की कुछ पुरानी फिल्मों की याद आती रहती है.

बाबूलाल के किरदार को निभाने में ऋषि कपूर को कड़ी मेहनत करने की जरुरत नहीं पड़ी. वह बिना संवादों के, महज अपने चेहरे के भाव से बहुत कुछ कह जाते हैं. अमिताभ बच्चन व ऋषि कपूर बड़ी सहजता से पिता पुत्र के किरदारों में लोगों के दिलों में समा जाते हैं. इन दो महान कलाकारों के साथ ही धीरू का किरदार निभाने वाले अभिनेता जिमित त्रिवेदी ने ठीक ठाक अभिनय किया है. फिल्म में यह तीसरा किरदार भी काफी अहम है, क्योंकि पिता पुत्र के किरदार और उनके बीच हो रही बातचीत को अंतःदृष्टि देने का काम तो धीरू ही करता है, पर जिमित त्रिवेदी घर की बैठक में नाटक करते हुए लगते हैं.

फिल्म में पुराने लोकप्रिय गीतों की कुछ पंक्तियों को नजरंदाज कर दें, तो फिल्म का गीत संगीत साधारण है. कैमरामैन लक्ष्मण उटेकर ने  प्रशंसा बटोरने वाला काम किया है.

एक घंटा 42 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘102 नौट आउट’’ का निर्माण ट्रीटौप इंटरटेनमेंट, बेंचमार्क पिक्चर्स, सोनी पिक्चर्स इंटरटेनमेंट फिल्मस ने मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक उमेश शुक्ला, लेखक सौम्या जोशी, पटकथा लेखक विकास पाटिल,  कैमरामैन लक्ष्मण उटेकर,संगीतकार सलीम सुलेमान और पार्श्व संगीतकार जौर्ज जोसेफ  तथा फिल्म के कलाकार हैं – अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, जिमित त्रिवेदी, धर्मेंद्र गोहिल व अन्य.

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एक और अलगाववाद : धर्म के दुकानदारों को देश की चिंता नहीं

कांजीवरम नटराजन अन्नादुरई के मुख्यमंत्रित्वकाल में तमिलनाडु से पृथक तमिलनाडु बनाने की आवाज तो पिछले 4-5 दशकों में खो गई लेकिन अब कर्नाटक में कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अलग द्राविड़नाडु की मांग कर के देश के विभाजन की बात कर दी है. जब यूरोप के कई देशों, पश्चिम एशिया के देशों, श्रीलंका, दक्षिण अमेरिका के कुछ देशों में ऐसी मांगें उठ रही हों तो इस मांग को हलके में नहीं लेना चाहिए.

मूलतया एक देश की सफलता के पीछे एक बड़े भूभाग में एक अर्थव्यवस्था, एक मुद्रा, एकजैसे कानून, एक जगह से दूसरी जगह जाने की स्वतंत्रता, अलगअलग तरह के लोगों को एक झंडे के नीचे रहना शामिल होता है. लेकिन जब केंद्र सरकार एक तरह के लोगों के लिए काम करने लगे और कुछ इलाकों को लगने लगे कि उन के साथ लगातार भेदभाव हो रहा है, तो अलगाव की आवाज स्वाभाविक तौर पर उठ खड़ी होती है.

ऐसा हम आंध्र प्रदेश के विभाजन में देख चुके हैं जो एक तरह से सीमित था हालांकि वहां भी बीज देश से अलग हो जाने के थे. यह तो तत्कालीन केंद्र सरकार की चतुराई थी कि उस ने सिर्फ राज्यविभाजन से काम चला लिया.

तमिल तो पहले से ही अलग होना चाहते थे. उन का सपना तो भारत के तमिलनाडु और श्रीलंका के जाफना के इलाके को मिला कर नया देश बनाने की है. अब मलयाली, कन्नडि़गा और आंध्री भी ऐसी ही मांग को दोहराने की कोशिश में लगे हैं. कटट्रपंथी जिसे आर्यावर्त्त कहते हैं उस में इस इलाके को हमेशा नीचा सा समझा गया है जहां से केवल गुलाम या दास लाए जाते थे.

भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस अभी इस मांग को गंभीरता से नहीं ले रहीं पर जिस तरह से देश में छटपटाहट का वातावरण बन रहा है और ऊंचनीच की भावना को सरकारी संरक्षण मिल रहा है, यह मांग हिंसक हो सकती है. यह नहीं भूलना चाहिए कि जब खालिस्तान की मांग ने तूल पकड़ा था तो केंद्र सरकार के हौसले पस्त हो गए थे. यह तो कांग्रेस व भाजपा की दूरदर्शिता थी कि राजीव गांधी ने हरचरण सिंह लोंगोवाल से समझौता कर लिया जबकि अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रकाश सिंह बादल से और संकट को सदा के लिए समाप्त कर डाला.

दक्षिण में यह समस्या उग्र हो सकती है क्योंकि भाजपा कट्टर हिंदू मठों के सहारे जीत का सपना देख रही है. वह जातियों की राजनीति के तहत वर्णव्यवस्था के आधार पर एकदूसरे को लड़वाने में लगी है. कैंब्रिज एनालिटिका ने स्पष्ट किया है कि देश की पार्टियां उस से फेसबुक पर जमा डेटा के आधार पर जाति का विश्लेषण मांगती हैं क्योंकि जाति के नाम पर वोट मांगना आसान होता है. यही अलगाव बाद में अलग देश की मांग बन जाता है जो यूरोप के यूगोस्लाविया में दिखा और इराक में कुर्दों के साथ दिख रहा है.

चुनाव जीतने के लिए जाति का उपयोग पैट्रोल व माचिस से खेलने के बराबर है. इस बारे में कठिनाई यह है कि गलीगली में मौजूद धर्म के दुकानदारों को देश की नहीं, अपनी दुकानदारी की चिंता रहती है. उन्होंने पहले सदियों तक देश को गुलाम बनवाए रखा, 1947 में टुकड़े करवाए और अब पूरे समाज में ऊंचनीच की खाइयां गहरी पर गहरी करते जा रहे हैं. उन पर न मोहन भागवत का नियंत्रण है न नरेंद्र मोदी का.

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आर्थिक मजबूती आलसी बना देती है : पंकज त्रिपाठी

बौलीवुड में अपनी पहचान बनाने के लिए 14 वर्षों से संघर्ष करते आए अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने ‘निल बटे सन्नाटा’, ‘अनारकली औफ आरा’, ‘न्यूटन’ और ‘फुकरे’ सीरीज जैसी फिल्मों में दमदार अभिनय की बदौलत बौलीवुड में अपनी अलग पहचान बना ली है. गत वर्ष राजकुमार राव व पंकज त्रिपाठी के अभिनय वाली फिल्म ‘न्यूटन’ को भारतीय प्रतिनिधि फिल्म के रूप में औस्कर के लिए भी भेजा गया था. इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए भी चुना गया है. पंकज त्रिपाठी की अभिनय प्रतिभा जिस तरह से निखर कर लोगों के सामने आ रही है, उसी के परिणामस्वरूप उन्हें रजनीकांत, नाना पाटेकर व हुमा कुरैशी के साथ तमिल फिल्म ‘काला’ करने का अवसर मिला, जिस में उन्होंने पुलिस औफिसर का ग्रे किरदार निभाया है.

इस फिल्म का निर्माण धनुष ने किया है. उन की अंतर्राष्ट्रीय फिल्म ‘मैंगो ड्रीम’ नेटफ्लिक्स पर आने वाली है. लंबे संघर्ष के बाद अब आप की गाड़ी ट्रैक पर कैसे आई, इस पर वे कहते हैं, ‘‘हां, ऐसा आप कह सकते हैं. यों तो मैं पिछले 14 वर्षों से बौलीवुड में ईमानदारी से काम करता आया हूं, लेकिन गत वर्ष प्रदर्शित मेरी फिल्मों ‘निल बटे सन्नाटा’, ‘अनारकली औफ आरा’ और ‘न्यूटन’ की वजह से बौलीवुड से जुड़े हर इंसान को मेरा क्राफ्ट व मेरी प्रतिभा समझ में आई. लंबे समय बाद लोगों को मेरा अभिनय पसंद आया है. ‘अनारकली औफ आरा’ में एक और्क्रेस्ट्रा का मालिक नाचता भी है तो ‘फुकरे रिटर्न्स’ में भी यह आदमी मनोरंजन करता है. ‘न्यूटन’ का बीएसफ औफिसर भी पसंद आया. तीनों ही किरदारों में लगता है कि ये किरदार पंकज त्रिपाठी के लिए लिखे गए हैं.

‘‘मुझे लगता है कि मेरी जो क्राफ्ट है, वह आम जनता के साथ फिल्मों से जुड़े लोगों तक भी पहुंची है. जब मैं सड़क से गुजरता हूं तो लोग पहचानते हैं. अभी जब मैं आप का इंतजार कर रहा था तो 3-4 लोग आ कर मेरे साथ सैल्फी ले कर गए. उन में से 2-3 लोग तो वे थे जो यह बोल कर गए कि हम आप के काम से इंस्पायर होते हैं. हर किरदार को देखने के बाद ऐसा लगता है कि हां, यार, अभिनय ऐसा ही होना चाहिए, लोगों को मेरी अभिनय प्रतिभा का एहसास पूरे 12 वर्षों बाद हुआ है.’’ सफलता से मिली स्टारडम को ले कर उन का मानना है, ‘‘मैं खद को स्टार नहीं समझता और स्टार बनने की इच्छा भी नहीं है. मैं तो अपनी पहचान एक अदाकार के रूप में ही चाहता हूं. व्यस्तता बढ़ गई है. अब आलम यह है कि पिछले 4 महीनों के अंदर मैं ने

30 फिल्मों के औफर ठुकराए. अब मुझे अपनी पसंदीदी फिल्में चुनने का अवसर मिल रहा है. पर यह भी सच है कि कुछ अच्छी फिल्में शूटिंग की तारीखों की समस्या के चलते छोड़नी पड़ीं.’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘अब विज्ञापन फिल्मों के भी औफर आ रहे हैं. अब फिल्मकार मेरी तलाश करने लगे हैं. 2018 ऐसा पहला साल है जब मैं दिसंबर तक किसी नई फिल्म की शूटिंग के लिए तारीख नहीं दे सकता. मेरी प्रतिभा को आंक कर ही मुझे रजनीकांत के साथ तमिल फिल्म ‘काला’ में अभिनय करने का मौका मिला.’’

फिल्म ‘काला’ में अपने किरदार व काम करने की वजह को ले कर पंकज बताते हैं, ‘‘इस में मेरा पंकज पाटिल नामक ग्रे शेड्स वाले पुलिस का किरदार है. फिल्म में रजनीकांत के साथ मेरे काफी सीन हैं. फिल्म अच्छी बनी है. मैं ने इस फिल्म को सिर्फ रजनीकांत के साथ कुछ समय बिताने के लिए किया है. रजनीकांत का जो औरा है, उन को ले कर जो चर्चाएं होती हैं, उस से मैं भी प्रभावित हूं. आखिर वे क्या हैं? मैं उन्हें नजदीक से जानना चाहता था. वैसे रजनीकांत के साथ 5 मिनट की कई छोटी मुलाकातें हुई हैं पर मेरे दिमाग में था कि हम कुछ दिन साथ रह कर काम करेंगे, तो उन्हें बेहतर ढंग से जान सकेंगे, इसलिए मुझे रजनीकांत से मिलना था. ‘‘मैं उन से बहुत ज्यादा प्रभावित था. वे सिनेमा के परदे पर बहुत अलग नजर आते हैं, जबकि निजी जीवन में वे जिस तरह से हैं, उसी तरह से नजर आते हैं. उन में कभी कोई बनावटीपन नजर नहीं आया. मुझे हमेशा लगता है कि अभिनेता ही क्यों, किसी भी इंसान, फिर चाहे वह जिस पेशे में हो, को अपने मूल स्वरूप को नहीं भूलना चाहिए.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘एक बार किसी पत्रकार ने मुझ से पूछा कि आप तो जमीनी आदमी हो? तो मैं ने उन से कहा कि जमीनी आदमी होना गलत है क्या? दुनिया में हर इंसान जमीन पर खड़ा है, जिस ने जमीन को छोड़ दिया, उस के लिए खड़ा रहना मुश्किल है. बिना आधार के इंसान कैसे रहेगा.’’ फिल्म ‘न्यूटन’ के औस्कर में रिजैक्ट होने को ले कर पंकज बताते हैं, ‘‘औस्कर बहुत बड़ा गेम है. कई वजहों से ‘न्यूटन’ पिछड़ गई. भारत ने अपनी इस फिल्म को भेजने का निर्णय भी देर से लिया. दूसरी बात, वह फिल्म भी अच्छी थी जिस को औस्कर मिला है. हम ने उस फिल्म को वहां देखा था. ‘शेप औफ वाटर’ भी हम ने देखी थी. विदेशी भाषा के तहत जिसे पुरस्कृत किया गया निसंदेह वह बेहतरीन फिल्म थी.’’

पकंज के मुताबिक, ‘‘मुझे लगता है कि यह सब मार्केटिंग का खेल है. विदेशी भाषा के तहत जिसे पुरस्कृत किया गया वह सोनी पिक्चर्स की फिल्म थी. सोनी पिक्चर्स बहुत बड़ी कंपनी है. अमेरिका में उस का अपना आधार है. दूसरी बात यह है कि तकनीकी स्तर पर हम लोग थोड़ा पीछे हैं. हमारी फिल्म इंडस्ट्री भी ग्रो कर रही है. ‘न्यूटन’ आज से 10 साल पहले नहीं बन सकती थी. वैसे इतने शुष्क व नीरस विषय पर फिल्म बनाने के लिए हिम्मत चाहिए, कथ्य के स्तर पर मुझे हमेशा ऐसा लगता है. पुरस्कार मिलना कोई मापदंड नहीं है. औस्कर एक देश का अवार्ड है. जैसे उन का पैप्सीकोला पूरे देश में बिकता है, वैसे ही औस्कर भी उन का एक अवार्ड है. आप ने हमारे देश में आ कर हमारी लस्सी, सत्तू और नीबूपानी को दबा दिया है. तो क्या हमारा लस्सी, नीबूपानी, कोकाकोला के मुकाबले खराब है? नहीं, हकीकत में कोकाकोला ने बाजारवाद के दौर में नीबूपानी को पछाड़ दिया है. लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि फिल्ममेकिंग कोल्डडिं्रक नहीं है, फिर भी अवार्ड न मिलना कोई समस्या नहीं है. हमारे देश की जनता ने ‘न्यूटन’ देखी, पसंद की. हमारे लिए यही उपलब्धि है. ‘न्यूटन’ से किसी को नुकसान नहीं हुआ. अच्छी कमाई हुई है.’’

‘काला’ के अलावा आने वाली अन्य फिल्मों को ले कर वे बताते हैं, ‘‘ ‘काला’ के अलावा हिंदी में ‘अंगरेजी में कहते हैं’ व ‘ड्राइव’ सहित 6-7 फिल्में आने वाली हैं. फिल्म ‘अंगरेजी में कहते हैं’ में मेरा रोल छोटा मगर जबरदस्त किरदार है. फिल्म भी जबरदस्त है. जिन लोगों ने भी इस फिल्म को देखा है, वे तारीफ कर रहे हैं. जयपुर फिल्म फैस्टिवल में इसे पुरस्कृत किया गया था. कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में यह पुरस्कृत हो चुकी है. इस में अंशुमन झा और संजय मिश्रा भी हैं. एक अंगरेजी भाषा की फिल्म ‘मैंगो ड्रीम्स’ की है, जो कि नेटफ्लिक्स पर आएगी. इस के लिए पिछले दिनों मुझे केपटाउन में पुरस्कृत किया गया था. इस के अलावा श्रद्धा कपूर और राजकुमार राव के साथ हौरर थ्रिलर फिल्म ‘स्त्री’ कर रहा हूं. एक वैब सीरीज ‘मिर्जापुर’ की है, इसे एक्सेल इंटरटेनमैंट ने बनाया है. यह जुलाई में प्रसारित होगी. यह उत्तर प्रदेश पर आधारित अपराध कथा है. पर काफी रोचक है. इस की शूटिंग पूरी हो गई है. अभी पोस्ट प्रोडक्शन का काम चल रहा है.’’

वैब सीरीज के बढ़ते बाजार व उस के भविष्य पर पंकज सोचते हैं, ‘‘वैब सीरीज को अभी 2 साल का समय देना पड़ेगा, तभी इस के भविष्य को ले कर कुछ स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है. फिलहाल वैब सीरीज बन बहुत अच्छी रही हैं. धीरेधीरे प्रसारित भी हो रही हैं. लगभग हर बड़ा प्रोडक्शन हाउस वैब सीरीज बना रहा है. ‘‘मैं स्वयं इस साल तकरीबन 4 वैब सीरीज करने वाला हूं. 2 वर्षों में जब ये सारी वैब सीरीज प्रसारित होंगी, तब भविष्य पता चलेगा. मैं आप को बता दूं कि मैं ने एक सीरियल ‘पाउडर’ किया था, जोकि 2010 में सोनी टीवी पर प्रसारित हुआ था. उस वक्त इसे दर्शक नहीं मिले थे. 15 दिनों पहले नेटफ्लिक्स ने उसे खरीद कर प्रसारित करना शुरू किया. अब सोशल मीडिया पर ‘पाउडर’ को ले कर मुझे कई तरह के संदेश मिल रहे हैं. लोग ‘पाउडर’ में मेरे काम की तारीफ भी कर रहे हैं. फायदा यह हुआ कि डिजिटल प्लेटफौर्म की वजह से ‘पाउडर’ खोया नहीं.’’

वे आगे बताते हैं, ‘‘वैब सीरीज एक ऐसा डिजिटल प्लेटफौर्म है जिसे आप सब्सक्राइब कर घर बैठ कर देख सकते हैं. मोबाइल, टीवी या कंप्यूटर पर देख सकते हैं. जब आप के पास वक्त हो, तब देख सकते हैं. इस तरह कंटैंट आप की जेब में पहुंच गया है. सिनेमा देखने के लिए आप को तय समय पर टिकट खरीद कर सिनेमाघर के अंदर जाना पड़ता है. इंटरनैट की दुनिया बढ़ रही है, गति बढ़ रही है. इस से लगता है कि आने वाला वक्त डिजिटल मीडिया का है. इस से सिनेमा की गुणवत्ता भी अच्छी होगी. इस के अलावा वैब सीरीज पर कोई सैंसरशिप नहीं है. कुछ कहानियों में बेवजह सैंसर अड़ंगा लगाता है. कलात्मक प्रतिबंध लग जाते हैं. यदि कहानी में अपराधी किस्म के किरदार हैं तो वे अच्छी भाषा में बात नहीं करेंगे, गालीगलौज ही तो करेंगे.’’ वैब सीरीज में सैक्स के ओवर एक्सपोजर पर वे कहते हैं, ‘‘कुछ लोग सनसनी फैलाने के लिए ऐसा कर रहे हैं पर यह सफल नहीं है. पिछले वर्ष प्रदर्शित सभी एडल्ट सैक्स कौमेडी की फिल्में असफल हुईं. देखिए, इंटरनैट की वजह से लोगों के हाथ में पोर्नोग्राफी पहुंच गई है. ऐसे में वे फिल्म या वैब सीरीज सैक्स के लिए नहीं देखना चाहते. अब लोगों को कंटैंट चाहिए, अच्छी परफौर्मेंस चाहिए.’’

निजी जिंदगी में आए बदलाव को ले कर पंकज बताते हैं, ‘‘सच कहूं तो बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है. एक बड़ी गाड़ी ले ली है, क्योंकि घर में कुत्ता आ गया है, तो गाड़ी की जरूरत थी. आर्थिक रूप से थोड़ा सुरक्षित हूं. अब मुझे कोई फिल्म महज पैसे के लिए करने की जरूरत नहीं रही. अब मैं अपनी कला पर ज्यादा ध्यान दे पा रहा हूं. हां, एक बदलाव यह हुआ कि पहले मैं बिजली का बिल भरने, टिकट खरीदने, इनकम टैक्स व जीएसटी भरने, निर्माता को शूटिंग के लिए तारीख देने जैसे हर काम किया करता था, वह सब अब मुझ से नहीं हो पा रहा है. इस के लिए मैं ने प्रोफैशनल लोगों को रख लिया है. इंसान के तौर पर मुझ में कोई बदलाव नहीं हुआ.’’ वे बताते हैं, ‘‘आर्थिक मजबूती आने के बाद कलाकार मकान व गाड़ी की ईएमआई भरने व हर माह घरखर्च की चिंता से मुक्त हो जाता है. इस से वह अपने अभिनय पर ज्यादा ध्यान दे पाता है. हालांकि, अभाव व तकलीफों में कला ज्यादा बेहद रची जाती है. दुनिया में जहांजहां अच्छा लिटरेचर कायम हुआ है, वह तभी हुआ, जब देश संकट में था. जब आदमी अभावग्रस्त होता है तो वह कुछ बेहतर रचनात्मक काम करने का संघर्ष करता है. उस वक्त वह ज्यादा जागरूक रहता है. उस के अंदर कुछ करने की बेचैनी होती है. अमूमन पैसा या आर्थिक मजबूती आने पर हम थोड़ा आलसी हो जाते हैं. पर मैं जागरूक हूं कि यह जो दौर मेरे जीवन में आया है, यदि मैं इस का सही उपयोग करने के बजाय आलस्य दिखा कर, बड़े होटलों में बैठ कर महंगी शराब पीने लगा, तो गलत हो जाएगा. मेरा मानना है कि कलाकार का कला के प्रति फोकस विचलित नहीं होना चाहिए. कलाकार के लिए धन सिर्फ भौतिक सुखसुविधा दे सकता है, संतुष्टि तो अभिनय में ही मिलेगी.’’

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रेप..रेप..रेप, नहीं संभल रही भाजपा से सत्ता

उन्नाव कांड और कठुआ कांड पर समूचा देश सकते में है. जो गुस्सा निर्भया बलात्कार मामले में देखा गया, वैसा ही आक्रोश देशभर में उबल रहा है. घटनाओं के विरोध में महिला संगठन, छात्र संगठन और सामाजिक संगठन सड़कों पर कैंडल मार्च कर रहे हैं. जगहजगह धरना दे कर पीडि़ताओं को न्याय दिलाने की मांग की जा रही है. दोनों अमानवीय घटनाओं में सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा अपराधियों के बचाव में खड़े हो कर न्याय की राह में आड़े आने का रवैया हैरान कर देने वाला था. अपराधियों के साथ भगवा सत्ता और हिंदू संगठनों के समर्थन का खतरनाक रूप सामने आया है. शुरू में भाजपा सरकार की जिस तरह से जयजयकार हो रही थी, 4 वर्ष होतेहोते अब उस के प्रति लोगों में आक्रोश देखा जाने लगा है. सरकार कई मोरचों पर असफल रही है. क्या भाजपा से सत्ता संभल नहीं रही है? देश में अराजक तत्त्वों का बोलबाला बढ़ रहा है और सरकार उन के आगे असहाय बनी दिख रही है. तमाम मंत्रालय निकम्मे साबित हो रहे हैं.

कुकर्मियों का बचाव कठुआ की घटना को लें. जम्मूकश्मीर के कठुआ जिले के सरन गांव की 8 वर्षीया आमना (बदला हुआ नाम) का पहले अपहरण हुआ. उसे करीब एक सप्ताह तक एक मंदिर में बंधक बना कर रखा गया. उस का यौनशोषण किया गया और फिर बेरहमी से मार डाला गया. अबोध आमना अल्पसंख्यक गुर्जर बकरवाल समुदाय की लड़की थी. अपराध शाखा द्वारा दायर आरोपपत्र के अनुसार यह जघन्य कांड अल्पसंख्यक समुदाय को इलाके से हटाने के लिए रची गई सोचीसमझी साजिश थी. मामले में 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. अफसोस और शर्म की बात है कि मामला सामने आने के बाद हिंदू संगठनों ने तिरंगा ले कर भारत माता की जय बोलते हुए अपराधियों के समर्थन में सड़कों पर जुलूस निकाला. जुलूस में राज्य सरकार में शामिल भाजपा के

2 मंत्री भी शरीक थे जिन के खिलाफ हल्ला मचने पर पार्टी द्वारा उन से इस्तीफा देने को कहा गया. इस बर्बर कांड को ले कर सोशल मीडिया पर जो गुस्सा निकल रहा है, उस में क्या हिंदू, क्या मुसलमान, क्या सिख यानी इंसाफ के लिए उमड़े आक्रोश के सामने तमाम धर्मों की दीवारें ढह गईं. हर धर्म, वर्ग, जाति के लोगों द्वारा आमना के साथ हुए बर्बर अत्याचार के लिए दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिए जाने की मांग की जा रही है.

विधायक का खौफ उन्नाव की घटना भी ऐसी ही है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक युवती के साथ बलात्कार के मामले में भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का नाम भी है. उन के अलावा 3 अन्य आरोपी हैं. मृतक की बेटी का आरोप है कि विधायक और उस के साथी लोगों ने उस के साथ गैंगरेप किया. दरअसल, ये लोग लड़की के परिवार से रंजिश रखते थे. उन को नीचा दिखाने व सबक सिखाने के लिए सालभर पहले रेप किया था.

अपने साथ हुए दुष्कर्म को ले कर लड़की मुकदमा लिखाने के लिए दरदर भटक रही थी. विधायक का नाम मुकदमे में लिखने को पुलिस तैयार नहीं हुई तो लड़की ने कोर्ट जा कर मुकदमा दर्ज कराया. जब कोर्ट के जरिए यह मुकदमा लिखा गया तो विधायक ने मुकदमा वापस लेने के लिए उस के पिता को पीटा और जेल भिजवा दिया, जहां उस की मौत हो गई. पूरे घटनाक्रम को देखें तो विधायक की धौंस पता चलती है. पद का घमंड

लखनऊ से 56 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के माखी गांव की पीडि़ता (बदला हुआ नाम कविता) के पिता और दोनों चाचा 15 साल पहले कुलदीप सिंह सेंगर के करीबी हुआ करते थे. कविता की 3 बहनें और 1 भाई है. एक ही जाति के होने के कारण उन में आपसी तालमेल भी बेहतर था. वे एकदूसरे के सुखदुख में साझीदार होते थे. दोनों ही परिवार माखी गांव के सराय थोक इलाके के रहने वाले थे. कविता के ताऊ सब से दबंग थे. कुलदीप सिंह सेंगर ने कांग्रेस से अपनी राजनीति शुरू की. चुनावी सफर में कांग्रेस का सिक्का कमजोर था तो वे विधानसभा का पहला चुनाव बसपा यानी बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लड़े और 2002 में पहली बार उन्नाव की सदर विधानसभा सीट से विधायक बने.

कुलदीप के विधायक बनने के बाद कविता के परिवारजनों के साथ कुलदीप का व्यवहार बदलने लगा. जहां पूरा समाज कुलदीप को विधायकजी कहने लगा था, वहीं कविता के ताऊ कुलदीप को उन के नाम से बुलाते थे. कुलदीप अपनी छवि को बचाने के लिए इस परिवार से दूरी बनाने लगे. कविता के पिता और उन के दोनों भाइयों को यह लगा कि कुलदीप के भाव बढ़ गए हैं. वे किसी न किसी तरह से कुलदीप को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहे. यह मनमुटाव बढ़ता गया. एक तरफ जहां कविता का परिवार कुलदीप का विरोध कर रहा था वहीं कुलदीप अपना राजनीतिक सफर बढ़ाते गए. कविता के ताऊ के ऊपर करीब एक दर्जन मुकदमे माखी और दूसरे थानाक्षेत्रों में दर्ज थे. करीब 10 वर्षों पहले उन्नाव शहर में भीड़ ने ईंटपत्थरों से हमला कर के कविता के ताऊ को मार दिया. कविता के परिवार के लोगों ने इस घटना का जिम्मेदार विधायक कुलदीप को ही माना था. कविता के ताऊ की मौत के बाद उस के चाचा उन्नाव छोड़ कर दिल्ली चले गए. वहां उन्होंने अपना इलैक्ट्रिक वायर का बिजनैस शुरू किया. उन के ऊपर

10 मुकदमे दर्ज थे. कविता के पिता अकेले रह गए. उन के ऊपर भी 2 दर्जन मुकदमे दर्ज थे. नशा और मुकदमों का बोझ उन को बेहाल कर चुका था. कुलदीप ने 2007 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर बांगरमऊ विधानसभा से जीता और 2012 में भगवंतनगर विधानसभा से चुनाव जीता. 2017 के विधानसभा चुनाव में कुलदीप ने भाजपा का साथ लिया और बांगरमऊ से विधायक बन गए. विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के परिवार की कविता के परिवार से रंजिश बनी रही. उन्नाव जिले की पहचान दबंगों वाली है. यहां अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की बहुतायत है. माखी गांव बाकी गांवों में से संपन्न माना जाता है. यहां कारोबार भी दूसरों की अपेक्षा अच्छा चलता है.

योगी राज के लिए फांस विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के मामले को देखें तो पूरी बात साफ हो जाती है. सत्ता की हनक में अपना विरोध करने वाले के साथ विधायक कुलदीप सेंगर ने जो कुछ किया, वह अब योगी राज के गले में फांस बन गई है. उन्नाव से ले कर राजधानी लखनऊ तक केवल पुलिस ही नहीं, जेल और अस्पताल तक में जिस तरह से विधायक के विरोधी के साथ बरताव हुआ, वह किसी कबीले की घटना से कम नहीं है. पहले अपने विरोधी की पिटाई पानी डालडाल कर की जाती है. मरणासन्न अवस्था में उस के खिलाफ मुकदमा कायम करा कर पुलिस की मिलीभगत से जेल भेज दिया जाता है. घायल को ले कर पुलिस सरकारी अस्पताल जाती है जहां उस का इलाज करने के बजाय उसे जेल भेज दिया जाता है. घायल को जेल में सही इलाज नहीं मिलता जिस से वह तड़पतड़प कर मर जाता है.

विधायक की धौंस तो पूरे देश को सुनाई देने लगी. सरकार ने पहले बचाव किया. जब जनता से ले कर कोर्ट तक सरकार की नीयत पर सवाल उठने लगे तब दबाव में पूरा मामला सीबीआई को सौंपना पड़ा. सत्ता के आते ही योगी राज में भाजपाइयों की धौंस बढ़ गई है. ऐसे सीन फिल्मों में देखने को मिल सकते हैं. पुलिस से ले कर जेल और अस्पताल तक के लोग विधायक की धौंस के आगे नतमस्तक बने रहे. जेल में जाने के दूसरे ही दिन घायल की मौत हो जाती है, मौत के बाद जागी सरकार के दबाव में पुलिस विभाग ने अपने कर्मचारियों को भले ही सस्पैंड कर दिया हो पर जिला जेल और अस्पताल के लोगों को कोई सजा नहीं दी गई है. अपना दामन बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी बना दी है.

बलात्कार का अनकहा सच कविता के साथ हुए बलात्कार के मसले पर जो जानकारी सामने आई उस के अनुसार जून, 2017 में राखी (बदला हुआ नाम) नामक महिला कविता को ले कर विधायक कुलदीप के पास गई. विधायक ने उसे बंधक बना लिया उस के साथ बलात्कार किया गया. बलात्कार का आरोप विधायक के भाई और साथियों पर लगा. घटना के 8 दिनों के बाद कविता औरया जिले के पास मिली. कविता और उस के पिता ने इस बात की शिकायत थाने में की. पुलिस ने 3 आरोपी युवकों को जेल भेज दिया. घटना में विधायक का नाम शामिल नहीं हुआ.

एकतरफा कार्यवाही 3 अप्रैल, 2018 को विधायक के छोटे भाई ने कविता के पिता के साथ मारपीट का मुकदमा वापस लिए जाने के लिए कहा. कविता और उस के परिवारजनों ने पुलिस में मुकदमा लिखाया. इस के साथ ही साथ विधायक के लोगों की तरफ से भी मुकदमा लिखाया गया. पुलिस ने क्रौस एफआईआर दर्ज कीं और केवल कविता के पिता को जेल भेज दिया. कविता का आरोप है कि जेल में विधायक के लोगों ने उस के पिता की खूब पिटाई की.

8 अप्रैल को कविता अपने परिवारजनों के साथ राजधानी लखनऊ आई और सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कालीदास मार्ग स्थित आवास पर पहुंच गई. यहां उस ने आत्मदाह करने की कोशिश की. पुलिस ने उस को पकड़ लिया. गौतमपल्ली थाने में कविता को रखा गया. वहां से पूरे मामले की जांच करने के लिए एसपी, उन्नाव से कहा गया. इस बीच जेल में ही कविता के पिता की मौत हो गई. पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में पिटाई और घाव में सैप्टिक हो जाने से मौत होने की पुष्टि हुई. पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर चोट के 14 निशान पाए गए.

योगी की मजबूरी कविता के पिता की जेल में मौत के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई. विपक्षी दलों में समाजवादी पार्टी से ले कर कांग्रेस तक ने सरकार पर आरोप लगाने शुरू कर दिए. खुद विधायक कुलदीप सिंह सेंगर मुख्यमंत्री से मिलने गए. लेकिन उन्होंने विधायक से मुलाकात नहीं की. विधायक को यह संदेश दिया गया कि वे जांच में सहयोग करें. सरकार की सख्ती के बाद कविता के पिता से मारपीट के आरोपी विधायक के भाई अतुल सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. कविता ने इस के बाद भी अपनी लड़ाई जारी रखी है. निकम्मी साबित होती सरकार

दोनों मामलों को ले कर पूरे देश में भाजपा की किरकिरी हो रही है. शुरू में भाजपा सरकार द्वारा विकास की जो योजनाएं पेश की गईं अब उन का जिक्र ही नहीं है. स्वच्छता अभियान फेल हो गया. राजधानी दिल्ली में चारों ओर बेशुमार गंदगी का आलम देखा जा सकता है. ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ नारे की धज्जियां उड़ रही हैं. विश्व के देशों की भ्रष्टाचार लिस्ट में भारत उसी जगह पर विराजमान है. बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ता जा रहा है. हिंदुत्व उन्माद देश के युवाओं को निगल रहा है. उन में नशाखोरी बढ़ती जा रही है. कृषि में कोई सुधार होता नहीं दिखता. किसानों की आय दोगुनी करने की बात की जा रही है पर कैसे होगी, ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है, यह नहीं बताया जा रहा. उलटे, किसानों का गुस्सा और बढ़ रहा है. किसानों की आत्महत्याओं की दर घटने का नाम नहीं ले रही. युवा रोजगार के लिए सड़कों पर उतरे दिखाईर् पड़ रहे हैं. महिलाएं सुरक्षा के लिए आंदोलनरत हैं. विद्यार्थियों की परीक्षाओं के पेपर सुरक्षित नहीं हैं. politics in india

स्टार्टअप, स्टैंडअप इंडिया, न्यू इनोवेशन, प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना जैसी ललचाने वाली स्कीमों की अब चर्चा ही नहीं है. इन सब के अलावा जिन चीजों का सब से अधिक विकास हुआ, वे हैं सामाजिक वैमनस्यता, जातीय व धार्मिक विभाजन और गहरा हुआ, घृणाहिंसा कभी गोरक्षा के नाम पर तो कभी वंदेमातरम के नाम पर. जातीय अस्मिता, धर्म, संस्कृति, लव जिहाद, आरक्षण विरोध, दलितों पर हिंसा जैसे मामलों को ले कर देश में नफरत का माहौल पैदा किया गया. ऐसे मामलों में सरकार कोई नियंत्रण नहीं कर पाई. उलटा, सरकार इन के समर्थन में खड़ी नजर आई.

अपराधियों को सत्ता का कवच यह आश्चर्य की बात नहीं है कि कठुआ से उन्नाव तक अन्याय की घटनाएं हावी हैं और सत्ता प्रतिष्ठान का अहंकार न्याय की राह रोक रहा है. बलात्कार मामलों को ले कर भाजपा सरकार और उस के हिंदू संगठन अपराधियों के बचाव में आ खड़े हुए. असल में समूची हिंदुत्व संस्कृति ही स्त्रियों के यौनशोषण की समर्थक और उस की स्वतंत्रता की विरोधी रही है. यकीन न हो तो प्राचीन गं्रथ उठा कर देख लीजिए.

धर्म अमानवीय अपराधों पर कवच बना हुआ है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यों ही पूर्व गृहराज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद को अपनी शिष्या के साथ बलात्कार का मामला वापस नहीं ले लिया. पीड़ित शिष्या राष्ट्रपति से आरोपी स्वामी के खिलाफ वारंट जारी करने की मांग करे तो करे, योगी सरकार तो धर्म राह पर है. दोषी तो स्त्रियां हैं, उन्हें नरक का द्वार, पाप की गठरी, मर्द के लिए भोग्या करार दिया गया है. भाजपा इसी सोच की ही तो पोषक है. मोदी और योगी के राज में गायों को बचाने के लिए मनुष्यों की जानें ले लेने और स्त्री की अस्मत व जान की तुच्छ कीमत मानने वाली संस्कृति की पैराकारी ही तो की जा रही है. असल में धर्मों में श्रम की नहीं, निकम्मेपन की पैरवी है. भाजपा सरकार वही कर रही है. रामराज्य का यूटोपिया प्रचारित किया जा रहा है.

अक्षम मंत्रालय, अकर्मण्य मंत्री सरकार के तमाम मंत्री निकम्मे साबित हो रहे हैं. वित्त मंत्री बीमार हैं. विदेश मंत्री लाचार हैं. बैंकों का अरबों रुपया ले कर फ्रौड कारोबारी देश से भागे जा रहे हैं. तिजोरी के रक्षक होने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक के बाद एक मामले सामने आने पर चुप्पी साधे हैं.

विदेश मंत्री का काम सिर्फ इतना दिखाई देता है कि वे विदेश में फंसे किसी भारतीय नागरिक को देश में बुलाने के साधन मुहैया करा दें. कानून मंत्री मजबूर दिखते हैं. उन के सामने पहली बार देश की सर्वोच्च न्याय संस्था में मतभेद उभर कर जगजाहिर हो रहे हैं. न्याय व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है. समूचा न्यायतंत्र भ्रष्टाचार में जकड़ चुका है. संवैधानिक न्याय व्यवस्था पर सरकार के नियंत्रण की मंशा उजागर हो रही है. न्यायाधीशों की नियुक्ति से ले कर फैसलों तक पर शक और सच उजागर हो रहे हैं. सूचना प्रसारण मंत्री फेक न्यूज के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रस्ताव ला रही हैं. सरकार प्रैस नाम की संस्था को मजबूत करने के बजाय उसे सैंसर करना चाह रही है. पत्रकारिता के मूल्यों को रौंदा जा रहा है.politics in india

महिला रक्षा मंत्री की कोई कामयाबी अब तक कहीं प्रदर्शित नहीं हुई. गृहमंत्री से आंतरिक सुरक्षा नहीं संभल रही. वे केवल कड़ी कार्यवाही का आश्वासन देते सुनाई पड़ते हैं. फर्जी मुठभेड़ों के बल पर तमगे बांटे जा रहे हैं. मानव संसाधन विकास मंत्रालय से शिक्षक, छात्र, अभिभावक सब परेशान हैं. पेपर लीक हो रहे हैं. स्कूलों, कालेजों, यूनिवर्सिटियों में अध्यापक नहीं हैं, अध्यापक हैं तो पढ़ाईर् नहीं है. निचले वर्गों के साथ भेदभाव है. शिक्षा संस्थानों को 5 हजार साल पुरानी हिंदू गुरुकुल, आश्रमों की शिक्षा पद्धति का अड्डा बनाया जा रहा है. कहा जाता है कि तमाम मंत्रालयों का काम प्रधानमंत्री कार्यालय देखता है. पर लगता नहीं कि पीएमओ समूचे देश को संभाल पा रहा है. पीएमओ ने सारे मंत्रियों को अकर्मण्य बना दिया है. वोट की खातिर

धर्म के एजेंडे के अनुसार ऐसे काम होते दिख रहे हैं जो देश और समाज के हित में नहीं हैं. भाजपा सीधेसीधे पौराणिक व्यवस्था थोपना चाहती है. वोटों की खातिर भाजपा पिछड़ों और दलितों को अपनाना तो चाहती है पर इन्हें वर्णव्यवस्था के तहत पिछड़ा और दलित बनाए रख कर. सामाजिक स्तर पर उसे जातियों और उपजातियों के विभाजित हिंदू ही स्वीकार्य हैं. हिंदू एकता उस के लिए राजनीतिक मुद्दा है, सामाजिक मुद्दा नहीं, इसलिए पिछड़ों और दलितों में राजनीतिक एका तो करा दिया जाता है पर सामाजिक एकता नहीं हो पाती. (देखें अगला लेख : दलित आक्रोश) विकास कहां

देश में विकास इसलिए नहीं हो पा रहा क्योंकि भाजपा की संघी सोच श्रम को नीचा मानती आई है और जो श्रम करने वाला वर्ग है यानी पिछड़े और दलित, वे खुद भी ब्राह्मण बनना चाह रहे हैं. क्या हम वैसी संस्कृति पर गर्व कर सकते हैं जो इंसान को बांटती हो, उन्हें एकदूसरे से छोटा करार देती हो, जैंडर भेदभाव रखती हो और विकास से दूर जा रही हो. भाजपा के सत्ता संभालनेचलाने में नाकाम होने के पीछे उस की सदियों पुरानी सडि़यल और निकम्मेपन की सोच है. नई और मेहनत करने की सोच सिकुड़ती जा रही है जबकि जाहिलों का जमावड़ा बढ़ रहा है. निठल्ले साधुओं को मंत्री बनाया जा रहा है जो इस देश के लिए घातक ही तो है. ऐसे में विकास कहां से होगा, सामाजिक समरसता कहां से आएगी.

मंत्रालयों की बात–ढाक के तीन पात

नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री कार्यालय) प्रधानमंत्री कार्यालय में 400 से ऊपर अधिकारी हैं. इन में प्रमुख प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा, नैशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजीत कुमार डोभाल, एडिशनल प्रिंसिपल सैक्रेटरी प्रमोद कुमार मिश्रा, सैक्रेटरी भास्कर खुल्बे, स्पैशल सैक्रेटरी (प्रोजैक्ट मौनिटरिंग गु्रप) अनिल गुप्ता, एडिशनल सैक्रेटरी तरुण बजाज, व अरविंद कुमार शर्मा, प्राइवेट सैक्रेटरी राजीव टोपनो व संजीव सिंगला. दावा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय तमाम मंत्रालयों के कामकाज की मौनिटरिंग व उन में समन्वय का काम देखता है. भारीभरकम फौज के बावजूद देश कहां जा रहा है, बताने की जरूरत नहीं है.

राजनाथ सिंह (गृह मंत्रालय) देश की आंतरिक सुरक्षा की हालत बदतर, अपराध चरम पर, पाकिस्तान को लताड़ते रहना, देश में गृहयुद्ध जैसे हालात.

सुषमा स्वराज (विदेश मंत्रालय) सीरिया बंधक प्रकरण में पेंच, नीतिगत असफलता, विदेशी दौरे बेनतीजा व चीन के साथ तालमेल में कमियां, प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों से लगता है विदेश मंत्रालय उन्हीं के पास है, यह विदेश मंत्रालय का कामकाज दर्शाने के लिए काफी है.

अरुण जेटली (वित्त मंत्रालय) देशभर के एटीएम कैश के अभाव में हैं. बैंक मनमानी कर रहे हैं. देश का पैसा चुरा कर लोग विदेशों में ऐश कर रहे हैं. भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता खत्म की. सरकारी बैंकों को निजी हाथों में देने के प्रयास.

निर्मला सीतारमन (रक्षा मंत्रालय) सीमा पर आएदिन होती हिंसक झड़पों में सैनिक शहीद होते हैं. देश की सीमाएं सुरक्षित नहीं हैं. सेना के अंदरुनी विवाद भी जगजाहिर हैं. राफेल सौदे जैस भ्रष्टाचार की गूंज. हथियारों के मामलों में विदेशी निर्भरता कायम.

नितिन गडकरी (जहाजरानी, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय) हाईवे और आम सड़कों की खस्ता हालत जबकि मनमाने टोल टैक्स जनता को सड़कों पर ला रहे हैं. परिवहन व ट्रैफिक की बदतर हालत मंत्रालय का रिपोर्टकार्ड बता रही है.

रविशंकर प्रसाद (कानून, न्याय, संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय) कानून व न्याय व्यवस्था में हताशापूर्ण स्थिति. सुप्रीम कोर्ट के जजों में मतभेद. फैसलों और जजों की नियुक्तियों में मनमरजी.

जगत प्रकाश नड्डा (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय) स्वच्छ पानी, सस्ता इलाज उपलब्ध नहीं है. सरकारी अस्पतालों की हालत नरक जैसी है. निजी अस्पतालों में महंगा इलाज. देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है.

उमा भारती (पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय) गंगा बचाओ अभियान के नाम पर सरकार का करोड़ों का बजट बरबाद हुआ. न गंगा साफ हुई न पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था सुधरी. गंगा सफाई की अभी तक कोई कारगर योजना ही नहीं बनी. कारखानों, कैमिकल, चमड़ा उद्योगों का गंदा पानी नदी में जाने से रोकने में विफलता.

रामविलास पासवान (उपभोक्ता मामला, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय) देश का उपभोक्ता ठगा जा रहा है. मनमाने टैक्स वसूले जा रहे हैं. मिलावटखोरी, ब्लैकमेलिंग. खाद्य सामग्रियों की गुणवत्ता खराब है. क्या यही काम है इस मंत्रालय का?

गिरिराज सिंह (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय) देश के सूक्ष्म, लघु व मध्यम कारोबार दम तोड़ चुके हैं. सारी कारीगरी व हस्तकला गतिविधियां मरणासन्न हैं.

मेनका गांधी (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय) महिलाओं के साथ बढ़ते अपराध, लिंग परीक्षण जारी. बच्चियों के साथ भेदभाव, आज भी जस के तस हैं.

जुएल उरांव (जनजातीय मामलों का मंत्रालय) आदिवासी सरकार व नक्सलियों के बीच पिस रहा है. मुख्यधारा से दूर जनजातीय लोगों के नाम पर बना मंत्रालय खानापूर्ति भर है.

थावरचंद गहलोत (सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय) सामजिक खाई चौड़ी होती जा रही है. दलितों के लिए कोई योजना नहीं. उन में आक्रोश बढ़ता जा रहा है. अंबेडकर का केवल जाप किया जा रहा है. खाप पंचायतों सरीखी संस्थाएं पूरे देश में अपना कानून चलाती हैं. सामाजिक न्याय कहां है?

राधा मोहन सिंह (कृषि मंत्रालय) किसान आत्महत्या कर रहा है, फसलों के उचित दाम नहीं मिलते किसानों को. लफ्फाजी ज्यादा, काम कुछ नहीं. किसान मंत्रालय खामोश.

प्रकाश जावड़ेकर (मानव संसाधन विकास मंत्रालय) शिक्षा प्रणाली पूरी तरह सरकारी बनाम निजी स्कूलों के बीच पिस रही है. सुधार के बजाय हालात बिगड़ रहे हैं. स्कूलों की मनमानी, कोचिंग व्यवस्था से जनता त्रस्त है. बारबार पेपर लीक की घटनाओं में वृद्धि, शिक्षा नीति में धर्म की घुसपैठ, इतिहास बदलने की सनक.

स्मृति ईरानी (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय) अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश के प्रयास, तकनीकी मोरचे पर दूसरे देशों पर निर्भरता व सैंसरशिप का शिकंजा.

पीयूष गोयल (रेल मंत्रालय) रेल दुर्घटनाएं, यात्रा के दौरान अपराध, खानपान से ले कर अन्य सुविधाओं की खस्ताहालत इस मंत्रालय की पोल खोल रही है.

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एक साल पहले मेरे चेहरे पर काफी पिंपल्स निकले थे. अब पिंपल्स तो खत्म हो गए हैं, लेकिन उन के निशान रह गए हैं. मैं क्या करूं.

सवाल
एक साल पहले मेरे चेहरे पर काफी पिंपल्स निकले थे. अब पिंपल्स तो खत्म हो गए हैं, लेकिन उन के निशान रह गए हैं. इन से छुटकारा पाने के लिए क्या करूं?

जवाब
पिंपल्स के निशानों को जाने में थोड़ा वक्त लग जाता है. आप घर पर इन दागधब्बों को कम करने के लिए स्क्रब बना सकती हैं. इस के लिए मसूर की दाल को दरदरा पीस लें. फिर उस में मुलतानी मिट्टी व पुदीने का रस मिला कर पेस्ट बना लें. इस स्क्रब के नियमित इस्तेमाल से निशान जल्दी कम नजर आने लगेंगे.

वैसे इन निशानों से पूरी तरह छुटकारा पाने के लिए आप किसी अच्छे कौस्मौटिक क्लिनिक में जा कर लेजर थेरैपी करवा सकती हैं. इस थेरैपी में लेजर की किरणों से त्वचा को रीजनरेट कर के नया रूप दिया जाता है. उस के बाद यंग स्किन मास्क से त्वचा को निखारा जाता है. ये थेरैपी लगभग 3-4 सिटिंग्स में पूरी होती है और इस से निशानों को लगभग 75% तक दूर किया जा सकता है.

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मुंहासों से हैं परेशान तो अपनाइये ये उपाय

मुंहासे यानी की पिंपल्स की समस्या से काफी लोग परेशान रहते हैं. यह एक प्रकार की सूजन है जो तब होती है जब त्वचा की तेल ग्रन्थियां बैक्टीरिया से ग्रस्त हो जाती हैं. यह तैलीय त्वचा वाले लोगों में ज्यादा होती है, पर ऐसे भी कई लोग हैं जिनकी त्वचा तैलीय नहीं होती पर इसके बावजूद भी उनके चेहरे पर मुहांसे हो जाते है. किशोरावस्था में मुहांसे होना स्वाभाविक है पर कई बार उस अवस्था को पार करने के बाद भी मुहांसों की समस्या बरकरार रहती है.

मुंहासों के कारण

तेल ग्रंथियों से तेल का अधिक उत्सर्जन त्वचा के छिद्रों को बंद कर मुंहासों को जन्म देता है. शारीरिक और हार्मोन में बदलाव सिबेसियस ग्रंथि को उत्तेजित करता है जिससे अधिक तेल का उत्पादन होता है. कुछ डेयरी उत्पादों में उच्च मात्रा में कैल्शियम और चीनी पाया जाता है जो मुंहासों को विकसित करता है. एस्ट्रोजेन युक्त दवाइयां भी मुंहासे का कारण है. मेकअप उत्पादों में शामिल रसायनों को ठीक से साफ न करने के कारण भी मुंहासे होते हैं.

अगर आपके चेहरे पर भी हैं मुंहासे और उसके अनचाहे दाग तो घबराइये नहीं क्योंकि आज हम आपको बताएंगे कुछ ऐसे उपाय जिससे आप इस समस्या से आसानी से छुटकारा पा सकेंगी.

पिम्पल के उपाय

मसूर की दाल

मसूर की दाल का प्रयोग पिम्पल हटाने के उपाय के रूप से किया जाता है. मसूर की दाल को पानी में भिगो कर पीस लें और इस पेस्ट में 1 चुटकी हल्दी मिलाकर चेहरे में लगायें. इसे रोजाना चेहरे पर लगाने से चेहरे का रंग साफ होता है और पिम्पल के दाग भी चले जाते हैं.

हल्दी बेसन का फेस मास्क

2 चम्मच बेसन में ¼ चम्मच पीसी हुई हल्दी मिला लें. इसमें गुलाब जल और कच्चा दूध मिलाकर पेस्ट बना लें. अगर आपकी त्वचा अधिक तैलीय है तो दूध की जगह पानी का इस्तेमाल करें. इसे चेहरे में रोजाना लगायें. इससे पिम्पल की समस्या में जल्दी राहत मिलेगी.

बर्फ

अगर आप मुहांसों से छुटकारा पाना चाहती हैं तो बर्फ के कुछ टुकड़े लें और इसे अपने मुहांसों पर लगाएं. इससे आपके मुहांसों वाले भाग में रक्त का संचार तेज होता है. आप बर्फ के टुकड़ों को कपडे में लपेटकर मुहांसों पर लगा सकती हैं.

शहद

शहद एक बेहतरीन उत्पाद है जो पिंपल्स पर तुरंत असर करता है. शहद में रुई के फाहे डुबोकर मुहांसों वाली त्वचा पर लगाएं. इसे आधे घंटे तक रखें और गुनगुने पानी से धो लें.

नींबू

सौंदर्य एवं स्वास्थ्य को बरकरार रखने में नींबू आपकी काफी मदद करता है. इसमें विटामिन सी की काफी मात्रा होती है, अतः इससे मुहांसे काफी जल्दी सूखते हैं.

चावल

रातभर एक कप चावल को भिगोयें. सुबह पानी को छानकर बचे अनाज को पीसकर लेप बना लें. इसमें कुछ बूंदें नींबू रस की मिला लें. इस लेप को कील मुंहासों पर लगाकर 20 मिनट रखने के बाद धो दें.

सूखे संतरे के छिलके

सूखे संतरे के छिलके के पाउडर में पानी मिलाकर लेप बनायें और मुहासों पर लगायें.

लहसुन

अगर आपको पिम्पल की समस्या बहुत दिनों से है और यह कील आदि के रूप में चेहरे पर दिखाई दे रही हो तो ऐसे मुंहासों के प्राकृतिक इलाज में लहसुन का प्रयोग फायदेमंद है. कुछ लहसुन की कलियों को पीसकर उसका रस निकाल लें और इसमें 3 से 4 बूंदें नींबू के रस की मिलाकर मुंहासों वाली जगह पर लगा कर 10 मिनट तक रखें. इसको बाद चेहरा धो लें. इस उपाय को आप हफ्ते में दो बार करें.

भाप

प्रभावित जगह पर भाप देने से त्वचा के रोमछिद्र खुल जाते हैं. इससे त्वचा को सांस लेने में आसानी होती है. यह एक बेहतरीन प्रक्रिया है जिसकी वजह से त्वचा की सारी गन्दगी एवं अतिरिक्त तेल जो कील मुंहासो के रूप में चेहरे पर जमा होते हैं, कम हो जाते हैं. इससे त्वचा के सारे संक्रमण भी ठीक हो जाते हैं. इसके लिए एक बड़ा पात्र लें तथा पानी को उबालें. पानी उबल जाने के बाद उस बर्तन को अपने चेहरे के सामने रखें तथा चेहरा नीचे झुकाएं, जिससे भाप आपके चेहरे पर आए. अब अपने चेहरे को गुनगुने पानी से धोएं तथा चेहरे पर तेल मुक्त मौस्चराइजर लगाएं. अगर इसका प्रयोग रोजाना किया जाए तो चेहरे के मुंहासे आसानी से दूर हो सकते हैं.

नीम

नीम की पत्तियों के पाउडर और हल्दी को एक साथ मिलाकर लगाने से आप मुंहासों से छुटकारा पा सकती हैं.

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सस्ते हुए एलपीजी गैस सिलेंडर, कौमर्शियल के दाम भी घटे

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच आम आदमी के लिए राहत की खबर है. रसोई गैस की कीमतों में लगातार कटौती हो रही है, इससे महंगाई के मोर्चे पर थोड़ी राहत मिल रही है. तेल कंपनियों ने एक बार फिर LPG सिलेंडर के दाम घटाए हैं. इंडियन औयल की तरफ से जारी नई कीमतों के मुताबिक मई के लिए सब्सिडी वाले LPG सिलेंडर के दाम में हल्की कटौती हुई है. लेकिन, बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर और 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर पर थोड़ी ज्यादा राहत मिली है.

3 रुपए तक सस्ता हुआ सिलेंडर

इंडियन औयल की वेबसाइट के मुताबिक, आज से दिल्ली में बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर का दाम 650.50 रुपए, कोलकाता में 674 रुपए, मुंबई में 623 रुपए और चेन्नई में 663 रुपए हो गया है. दिल्ली में इसकी कीमत में 3 रुपए की कटौती हुई है. वहीं, कोलकाता और मुंबई में 2-2 रुपए और चेन्नई में 50 पैसे कम किए गए हैं.

लगातार 5वें महीने घटे दाम

बिना सब्सिडी वाले सिलेडंर के दाम घटने से 1 करोड़ से ज्यादा घरों को फायदा पहुंचेगा क्योंकि इतने लोग अपनी सब्सिडी त्याग चुके हैं. लगातार 5 महीने से सरकारी की तरफ से बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर के दाम घटाए जा रहे हैं. 5 महीने में दिल्ली में बिना सब्सिडी वाला सिलेंडर 96.50 रुपए, कोलकाता में 92 रुपए, मुंबई में 96 रुपए और चेन्नई में 93 रुपए सस्ता हुआ है.

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कमर्शियल सिलेंडर के भी घटे दाम

19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की बात करें तो आज से दिल्ली में उसका दाम 1167.50 रुपए, कोलकाता में 1212 रुपए, मुंबई में 1119 रुपए और चेन्नई में 1256 रुपए हो गया है. अप्रैल में दिल्ली में इसका दाम 1176 रुपए, कोलकाता में 1220.50 रुपए, मुंबई में 1128 रुपए और चेन्नई में 1264.50 रुपए था.

सब्सिडी वाले सिलेंडर में भी हल्की कटौती

सब्सिडी वाले सिलेंडर की कीमतों में हालांकि बहुत मामूली कटौती हुई है, आज से दिल्ली में इसका दाम 491.21 रुपए, कोलकाता में 494.23 रुपए, मुंबई में 488.94 रुपए और चेन्नई में 479.42 रुपए हो गया है.

हर महीने बदलते हैं दाम

बिना सब्सिडी वाली कुकिंग गैस के दाम हर माह बदलते हैं. जबकि पेट्रोल और डीजल के दाम की रोज समीक्षा की जाती है.

अन्‍य कंपनियां मानती हैं ये भाव

देश में हिन्‍दुस्‍तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन भी इन आयल और गैस की आपूर्ति करने वाली कंपनी हैं. लेकिन यह इंडियन औयल के दाम को मान लेती हैं.

अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर करते हैं दाम

दरअसल, केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 से एलपीजी के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर कर दिए थे. इसके तहत तेल कंपनियां हर महीने की अंतिम तिथि को एलपीजी के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार के दामों के अनुसार संशोधित करती हैं. सोमवार रात तेल कंपनियों की ओर से एलपीजी की निर्धारित नई दरों से गैस एजेंसियों को अवगत करा दिया गया है. गैर सबसिडी वाले गैस सिलेंडर में दो रुपए की रियायत दी गई है.

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व्हाट्सऐप पर आने वाले हैं कई नए फीचर्स, क्या आपको है इसकी जानकारी

दुनिया के सबसे बड़े सोशल मैसेंजिग ऐप व्हाट्सऐप को लेकर फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने एक बड़ी घोषणा की है. फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने एक कान्फ्रेंस के दौरान कहा कि व्हाट्सऐप में जल्द ही ग्रुप वीडियो कौलिंग का फीचर आएगा. जो अगले महीने तक लाइव कर दिया जाएगा. इस वीडियो कौलिंग फीचर के अपडेट के बाद ग्रुप में अधिकतम 4 लोग और पर्सनल चैट में 3 लोगों को शामिल किया जा सकेगा. बता दें कि व्हाट्सऐप ने एक साल पहले वीडियो कौलिंग का फीचर जारी किया था जो कि भारत में काफी लोकप्रिय है.

खबरों के मुताबिक ग्रुप वीडियो कौलिंग के अलावा व्हाट्सऐप में स्टीकर्स के भी अपडेट मिलने वाले हैं. इतना ही नहीं व्हाट्सऐप ने एक बार फिर से अपने बीटा यूजर्स के लिए नया अपडेट भी जारी किया है. इस नए फीचर की मदद से ग्रुप एडमिन तय कर सकेगा कि ग्रुप का कौन-सा मेंबर ग्रुप का डिस्क्रिप्शन (इन्फो) बदल सकेगा और कौन नहीं. अभी तक व्हाट्सऐप ग्रुप का डिस्क्रिप्शन ग्रुप में मौजूद कोई भी सदस्य चेंज कर सकता है लेकिन नए अपडेट के बाद ऐसा नहीं होगा. दरअसल इस फीचर के जरिए कंपनी व्हाट्सऐप ग्रुप एडमिन को ज्यादा पावरफुल बनाने की कोशिश कर रही है.

बता दें कि अभी हाल ही में व्हाट्सऐप ने यूजर्स को डिलीट किए गए फोटो, वीडियो और मैसेज डाउनलोड करने का विकल्प दिया था. हालांकि इसकी मदद से आप केवल मीडिया फाइल ही डाउनलोड कर सकेंते हैं, टेक्स्ट मैसेज नहीं. साथ ही बता दें कि आप वही मीडिया डाउनलोड कर सकेंगे जिन्हें आपने चैट से डिलीट नहीं किया है.

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पेट्रोल डीजल भरवाने पर अब आपको मिलेगा कैशबैक औफर

पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर अक्सर लोगों के मन में होता है कि ये कब सस्ती होंगी. लेकिन सस्ता होने के बजाए पेट्रोल के दाम सातवें आसमान पर हैं. लगातार पेट्रोल की कीमतें बढ़ रही हैं. अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से पेट्रोल मंहगा हुआ है, तो वहीं रोजाना पेट्रोल-डीजल की कीमतें तय होने का भी असर इस पर पड़ा है. लेकिन, अब चिंता करने की जरूरत नहीं. आपको पेट्रोल पर आपको बड़ा कैशबैक मिल रहा है. इसके लिए आपको बस एक खास तरीके का इस्तेमाल करना होगा.

क्या है पेट्रोल पर कैशबैक का औफर

पेट्रोल की पेमेंट औनलाइन करने पर आपको छूट मिलती है. लेकिन, यही पेमेंट अगर आप मोबिक्विक वौलेट से करेंगे तो आपको बड़ा कैशबैक मिलेगा. जी हां कंपनी ने पेट्रोल के लिए खास स्कीम चलाई है. जिसमें शाम 6 बजे से लेकर रात 9 बजे के बीच पेट्रोल भरवाने पर आपको सुपरकैश औफर मिलेगा. इसमें 10% कैशबैक का औफर है.

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कब तक मिलेगा कैशबैक

मोबिक्विक ने यह औफर 28 मार्च 2018 को निकाली है. इस औफर की वैधता 1 जून 2018 तक है. औफर का फायदा उठाने के लिए आपको कम से कम 50 रुपए का पेट्रोल डलवाना होगा. हालांकि, इसका फायदा आप हफ्ते में सिर्फ दो बार उठा सकते हैं.

कैसे मिलेगा फायदा

औफर का फायदा उठाने के लिए आपको कोई कूपन कोड नहीं चाहिए. बल्कि पेट्रोल पंप पर पेमेंट के वक्त सिर्फ क्यूआर (QR) कोड स्कैन करना होगा. इसके बाद आपने जितनी राशि का पेट्रोल डलवाया है उतना अमाउंट एंटर करना होगा. हालांकि, कंपनी ने इसके लिए अधिकतम 50 रुपए के कैशबैक की कैप लगाई है. कैशबैक आने पर उसका इस्तेमाल आप दूसरी बार पेट्रोल डलवाने पर कर सकते हैं. इसके लिए आपको कम से कम 200 रुपए का पेट्रोल डलवाना होगा.

कैशबैक के अलावा भी छूट

पेट्रोल डलवाने पर आपको वौलेट में कैशबैक तो मिलेगा ही, साथ ही 0.75% की औनलाइन पेमेंट छूट का भी फायदा मिलेगा. यह फायदा आपके वौलेट में 7 वर्किंग डेज में क्रेडिट कर दिया जाएगा. वहीं, कैशबैक के लिए आपको सिर्फ 24 घंटे का इंतजार करना होगा. जो सीधे मोबिक्विक वौलेट में क्रेडिट होगा.

कंपनी ने इसके लिए पेट्रोल पंप आउटलेट की लिस्ट भी अपने ऐप और वेबसाइट पर जारी कर रखी है.

VIDEO : कलरफुल स्ट्रिप्स नेल आर्ट

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