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Ideology : शादी की दावत में दिखता, विचारधारा का अंतर

Ideology : शादी की दावत में अलगअलग तरह के खाने का इंतजाम खाने वालों की पंसद, विचारधारा और पीढ़ी के अंतर को दिखाता है.

शादी की दावत में अब आने वाले लोगों की पंसद के हिसाब से खाने के स्टाल लगने लगे हैं. शादियों की दावत में पहले शाकाहारी और मांसाहारी खाने का ही अंतर होता था. इन के खाने से इस बात का अंदाजा लगाना सरल हो जाता था कि किस विचारधारा के लोग है. धीरेधीरे रात की दावतों में कहींकहीं शराब का भी इंतजाम होता था. आज भी कौकटेल पार्टी होती है. कौकटेल और नौनवेज अभी भी मुख्यधारा में शामिल नहीं की जाती है. यह कुछ गिनती के लोगों के लिए होती है. शादी की दावत में अब भी विभाजन दिखता है. यह क्षेत्र के हिसाब से होता है.

देशी खाने के साथ ही साथ अब साउथ इंडियन, चाइनीज, मैक्सिकन, इटैलियन और मुगलई खाना भी होता है. हर खाने के अलगलग कांउटर लगते हैं. इन पर खड़ी भीड़ को देख कर समझना सरल होता है कि किस विचार और पीढ़ी के लोग वहां पर होंगे.

ज्यादातर युवा लोग इन कांउटर पर दिखते हैं. जो विचारों के दकियानूसी और रुढ़िवादी नहीं होते हैं. इन के विचार आजाद ख्याल के होते हैं. यह जिस तरह से खाने में नई विचारधारा को जगह देते हैं उसी तरह से अपनी बातचीत और सोच में भी नई विचारधारा को जगह देते हैं.

दकियानूसी और रूढ़िवादी सोच के लोग उसी दालचावल में लगे रहते हैं. उन को लगता है कि चाइनीज, मैक्सिकन, इटैलियन और मुगलई खाने से उन का धर्म न खत्म हो जाएं. जैसे इस तरह के लोग केक खाने से बचते हैं. जब उन को यह बताया जाता है कि केक एगलेस है तो भी वह उस को खाने से बचते हैं. अब चाइनीज व्यंजन को सब से ज्यादा पंसद किया जाता है. इस के स्टाल पर खाने वाले युवा ही दिखते हैं. इन की सोच भी आधुनिक दिखती है.

चाइनीज के मशहूर व्यंजन

शादी की दावत में चाइनीज फूड में कई तरह के लोकप्रिय व्यंजन हैं इन में फ्राइड राइस, नूडल्स, मंचूरियन, स्प्रिंग रोल, मोमोज और चिली पोटैटो प्रमुख हैं. फ्राइड राइस चावल, सब्जियों, अंडा और सोया सौस के साथ बनाया जाता है. नूडल्स में जैसे कि चाउमीन, वेज नूडल्स, और स्पाइसी नूडल्स शामिल हैं. मंचूरियन भी काफी पंसद किया जाता है. इस को सब्जियों, सौस और चिकन या पनीर के साथ बनाया जाता है.

स्प्रिंग रोल सब से ज्यादा पंसद किया. इस को स्टार्टर माना जाता है. जिसे सब्जियों और नूडल्स की फिलिंग के साथ बनाया जाता है. इस के बाद नंबर आता है मोमोज का. इस को सब्जियों, मांस या पनीर के साथ बनाया जाता है और भाप में पकाया जाता है या डीप फ्राइड किया जाता है. चिली पटैटो भी एक स्वादिष्ट और मसालेदार स्नैक्स है जिसे आलू, शिमला मिर्च, प्याज, चिली सौस और सोया सौस के साथ बनाया जाता है. सूप के रूप में ‘स्वीट एंड सौस’ को पंसद किया जाता है.

मैक्सिकन भी बन रही है पंसद

मैक्सिकन फूड भी शादी की दावत का बड़ा हिस्सा हो गया है. यह काफी स्वादिष्ट फूड होता है. जिन में सब से पसंदीदा टैकोस, एनचिलाडास, बरिटोस, क्वेसाडिलास, गुआकामोल, साल्सा, और पिको डी गैलो है. टैकोस नरम या कुरकुरे टार्टिला में विभिन्न तरह की सामग्री जैसे ग्रिल्ड मीट, पनीर, बीन्स और साल्सा के साथ परोसे जाते हैं.

एनचिलाडास टार्टिला को चिकन या पनीर की फिलिंग के साथ लपेटा जाता है, चिली सौस में डुबोया जाता है और फिर बेक किया जाता है. बरिटोस एक बड़े आकार की टार्टिला होती हैं, जिन में विभिन्न तरह की सामग्री जैसे मीट, बीन्स, साल्सा, पनीर और चावल भरे जाते हैं.

क्वेशाडिलास टार्टिला के दो टुकड़ों के बीच पनीर और अक्सर अन्य सामग्री जैसे चिकन, मांस या सब्जियां भर कर बनाया जाता है. इसी तरह से गुआकामोल को एवोकाडो, प्याज, धनिया, मिर्च और नींबू के रस से बनाया जाता है. साल्सा एक प्रकार की चटनी है जो टमाटर, प्याज, मिर्च और धनिया से बनाई जाती है. पिको डी गैलो ताजी किस्म साल्सा है जो टमाटर, प्याज, धनिया और मिर्च से बनाई जाती है.

एलोटे, स्ट्रीट फूड जैसा है जिस में पके हुए मकई के दाने पर मैयोनेज, पनीर, मिर्च और नींबू का रस डाला जाता है. पोसोले सूप है जो मक्का और मांस से बनाया जाता है. चिली रेलेनोस पोब्लानो मिर्च होती है जो मांस, फलों और मेवों से भरी जाती है और फिर बेक की जाती है. टार्टिला सूप टार्टिला के टुकड़े, मांस, सब्जियां और साल्सा से बनता है. टैमल्स मक्का के आटे से बने होते हैं और इस में नमकीन या मीठी फिलिंग होती है.

बिरिया एक स्टू है जो मांस से बनाया जाता है, जो धीरेधीरे पकाया जाता है और फिर साल्सा के साथ परोसा जाता है. मार्गरिटा लोकप्रिय मैक्सिकन कौकटेल है जो टैकीला, नींबू के रस और चीनी से बनाया जाता है. मैक्सिकन भोजन में कई अन्य स्वादिष्ट व्यंजन भी हैं जो लोगों को पसंद आते हैं. शादियों में इन व्यंजनों में मांस यानी मीट का प्रयोग कम किया जाता है. मैक्सिकन फूड में सब्जियों का प्रयोग अधिक होता है. इस को खाने वाले खूब पंसद करते हैं.

सब से ज्यादा पंसद किए जाने वाले इटैलियन फूड

चाइनीज और मैक्सिकन के बाद सब से ज्यादा इटैलियन फूड पंसद किया जाता है. इस में पहले नंबर पर पिज्जा आता है. इस के बाद पास्ता, रिसोट्टो और तिरामिसु शामिल हैं. पिज्जा इटली का सब से प्रसिद्ध व्यंजन है. अब यह दुनियाभर में बहुत लोकप्रिय है. भारत में समोसा के बाद सब से अधिक पिज्जा पंसद किया जाता है. अलगअलग आकार और स्वाद के कारण यह सब को पंसद आते है. इटली में सब से लोकप्रिय पिज्जा मार्गेरिटा है. जो टमाटर सौस, मोजेरेला चीज और ताजी तुलसी से बना होता है. शादियों की दावत में अब यह मौजूद रहता है.

दूसरे नंबर पर पास्ता आता है. पास्ता भी अलगअलग तरह के उपलब्ध है. इन में स्पैगेटी, पेन, फेरफेट्टे प्रमुख है. पास्ता को अलगअलग तरह सौस जैसे कि टमाटर सौस, बेकन सौस, और क्रीम सौस के साथ खाते हैं.

रिसोट्टो चावल से बनाया जाता है. इस को क्रीम, पनीर, और सब्जियों के साथ पकाया जाता है. तिरामिसु इटालियन डेसर्ट है जो स्पंज केक, काफी, मस्कार्पोन चीज और कोको से बनाया जाता है. इन के अलावा जलान्या, रिसोट्टो अला मिलानीज, पास्ता कार्बोनारा, ओसो बुको, पोलेंटा, टार्टेलिनी और ग्नोची जैसे व्यंजन भी है. शादियों में पिज्जा और पास्ता सब से अधिक मिलते हैं.

शादियों में शाकाहारी मुगलई

मुगलई व्यंजनों की बात हो तो ज्यादातर में मीट का प्रयोग होता है. शादी की दावतों में मीट को कम पंसद किया जाता है. इस के बाद भी मुगलई कांउटर जरूर होता है. इन में शाकाहारी व्यंजन परोसे जाते हैं. मुगलई डिश में सब से ज्यादा पसंद की जाने वाली डिश में बिरयानी, मटन रोगन जोश, चिकन कोरमा, मुगलई पराठा, और शाही टुकड़ा है.

बिरयानी को चावल, चिकन या मटन और मसाले के साथ पका कर तैयार किया जाता है. जो लोग मीट नहीं पसंद करते वह वेज बिरयानी बनवाते हैं. जिस में सोयाबीन का प्रयोग किया जाता है.

मटन रोगन जोश एक मसालेदार ग्रेवी में पका व्यंजन होता है. चिकन कोरमा चिकन को दही, काजू और मसालों के साथ पका कर तैयार किया जाता है. मुगलई पराठा एक भरवां पराठा है जिस में मटन कीमा, अंडा और मसालों की स्टफिंग होती है.

शाही टुकड़ा एक किस्म की मिठाई है जिस में ब्रेड, दूध और रबड़ी को घी और मसालों के साथ पकाया जाता है. मुगलई व्यंजनों में कवाब, निहारी, और मुगलई चिकन जो भी लोकप्रिय हैं. शाकाहारी दावतों में भी बिरयानी और शाही टुकड़ा जरूर शामिल होता है.

साउथ इंडियन डिश

शादी की दावत में साउथ इंडियन डिश जरूरी हो गई है. इस में सब से ज्यादा मसाला डोसा पसंद किया जाता है. इस के बाद इडली, सांभर, रसम, वड़ा, पुट्टू और अप्पम भी काफी लोकप्रिय हैं. इडली को भाप में पकाया जाता है. जिसे बाद में सांभर और नारियल की चटनी के साथ परोसा जाता है.

सांभर का प्रयोग हर डिश के साथ होता है. यह एक दाल करी है जो इडली, डोसा, वड़ा और चावल के साथ खाई जाती है. रसम एक मसालेदार और स्वादिष्ट सूप है जो चावल के साथ परोसा जाता है.

वड़ा यह एक तली हुई डिश है जिसे नारियल की चटनी और सांभर के साथ परोसा जाता है. पुट्टू स्टीम्ड राइस केक है जिसे चावल के आटे और नारियल से बनाया जाता है. अप्पम, यह एक तरह का पैनकेक है जिसे नारियल के दूध या कुर्मा के साथ परोसा जाता है. पेसारट्टू मूंग दाल से बना एक डोसा है. शादियों में सब से ज्यादा मसाला डोसा और पनीर डोसा पंसद किया जाता है. इडली और सांभर वड़ा भी पंसद किया जाता है.

शादी की दावत में देशी व्यंजन

उत्तर भारतीय की शादी कम से कम 15 से 20 किस्म की डिश होती हैं. इन की संख्या 25 से 30 और उस से अधिक भी हो सकती है. एक व्यंजन के तमाम स्वाद और प्रकार भी होते हैं. इस की शुरूआत चाट से होती है. इस में पानीपूरी यानि गोलगप्पे सब से पहले पंसद किए जाते हैं.

आलू टिक्की, दही की चटनी और पुदीने के साथ तैयार की जाती है. कचौरी और पापड़ी चाट भी इस का हिस्सा बनने लगी हैं. कचौड़ी को गरम चटपटे आलू के साथ खाते हैं. पापड़ी चाट खस्ते के छोटेछोटे पीस तल कर गोल आकार में काटा जाता है. ठंडे दही, पुदीने और इमली की चटनी के साथ परोसा जाता है.

ढोकला वैसे तो गुजराती डिश है. उत्तर भारत की शादी की दावत में यह प्रमुख रूप से मिलने लगा है. इसे छोले और चावल से बनाया जाता है. हल्का, मीठा और हरी मिर्च के साथ परोसा जाता है. मिनी वेज समोसे, भेलपूरी का प्रयोग स्नैकस के रूप में होता है. यह मीठा, मसालेदार और तीखे स्वाद का मिश्रण होता है.

चाट के बाद पीने के लिए अलगअलग तरह की ड्रिंक भी होते हैं. क्रैनबेरी मिक्सर में कुचली हुई बर्फ, क्रैनबेरी जूस, नींबू का रस और ऊपर से छिड़का हुआ नींबू का छिलका शामिल होता है. रास्पबेरी डाइक्विरी स्वाद को और भी चटपटा बनाने के लिए मुट्ठी भर रास्पबेरी को एक चम्मच कच्ची चीनी और नींबू के साथ मिला कर दिया जाता है.

मल्टीकलर मिक्सर कुछ ताजा ब्लूबेरी और रास्पबेरी, ग्रेनेडिन, क्लब सोडा, नींबू सोडा और अच्छी मात्रा में बर्फ डाल कर तैयार होता है. वर्जिन मोजिटो सब से ज्यादा पंसद किया जाता है. वर्जिन मैंगो मार्गरीटा ताजे कटे आम, बर्फ, नींबू और लाइम सोडा, और दो बड़े चम्मच चीनी मिला कर बनता है.

कई तरह का सलाद शादियों की दावत का सब से बड़ा हिस्सा होता है. अंकुरित मूंग सलाद में अंकुरित मूंग को कटे हुए खीरे, टमाटर, प्याज और धनिया और पुदीना जैसी ताजी जड़ीबूटियों के साथ मिलाया जाता है. कचूंबर सलाद को खट्टे नींबू के रस, चाट मसाला और तीखेपन के लिए हरीमिर्च के स्पर्श से बना यह सलाद बारीक कटे खीरे, टमाटर, प्याज और शिमला मिर्च मिला कर तैयार किया जाता है.

स्टार्टर के रूप में पनीर टिक्का, ग्रिल्ड पनीर के टुकड़ों को कुरकुरे लेटिस, कटे हुए प्याज और शिमला मिर्च के ऊपर रख कर परोसा जाता है. मुख्य खाने में पनीर बटर मसाला में नरम पनीर के टुकड़ों को एक मलाईदार टमाटर आधारित ग्रेवी में पकाया जाता है, जिस में जीरा, धनिया और गरम मसाला जैसे सुगंधित मसाले डाले जाते हैं.

दालमखनी को धीमी आंच पर पकाया जाता है. काली दाल और राजमा को टमाटर, क्रीम और मक्खन की स्वादिष्ट ग्रेवी में पकाया जाता है, तथा इस में दालचीनी, इलायची और लौंग जैसे सुगंधित मसाले मिलाए जाते हैं. वेजिटेबल बिरयानी को सुगंधित बासमती चावल को गाजर, मटर और आलू जैसी सब्जियों, तले हुए प्याज, सुगंधित मसालों और ताजी जड़ीबूटियों के मिश्रण के साथ तैयार किया जाता है.

आलू, करेला, पनीर, अरहर की दाल, से तैयार कई व्यंजन होते हैं. मीठे में गुलाब जामुन, रसमलाई और जलेबी प्रमुख होती है. मीठे में मूंग का हलवा, फ्रूटस केक जैसी डिश भी होती है. हर कोई अपनी विचार पंसद के काउंटर पर जाता है. उस की प्लेट देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह किस क्लास का है.

जिस का मतलब यह है कि शादी की दावत में खाने वालों की प्लेट और उन का कांउटर देख कर समझा जा सकता है कि उन की विचारधारा और सोच क्या है? वह किस तरह की सोच और विचार वाले हैं. प्लेट में खाना रखने को देख कर भी उन की सोच का अंदाजा लगाया जा सकता है.

Financial Tips : मैं गुड़गांव के 2 बीएचके अपार्टमेंट में रहता हूं, 3 बीएचके खरीदना चाहता हूं

Financial Tips : मैं गुड़गांव के 2 बीएचके अपार्टमेंट में रहता हूं, 3 बीएचके खरीदना चाहता हूं, मैं 60 हजार महीना कमाता हूं, लेकिन क्‍या लोन लेना मेरे लिए सही रहेगा, मेरी अभी शादी हुई है ?

जवाब : गुड़गांव जैसे बड़े शहर में हर किसी का सपना होता है कि उस का एक अपना घर हो, जिस में वो अपने परिवार के साथ सुखशांति से रह सके. लेकिन गुड़गांव में अपने बजट में घर खरीदना ऐसा है जैसे कोयले के खान से हीरा निकालना. हालांकि यह काम मुश्किल नहीं है, पर गुड़गांव में जितनी ऊंची अपार्टमेंट्स है उतनी ही ऊंची उन की कीमत भी है. लोग सालों कमा कर घर खरीदने के लिए पैसा जमा करते हैं, फिर भी उन्हें गुड़गांव में घर खरीदने के लिए लोन लेना ही पड़ता है.

आप फिलहाल 2 बीएचके में रह रहे हैं और 3 बीएचके अपार्टमेंट खरीदना चाहते हैं. वहीं आप की मौजूदा आय 60 हजार रूपए प्रति माह है, इस के साथ ही आप की हाल ही में शादी भी हुई है. यह परिस्थिति आप के खर्चों और दायित्वों को प्रभावित कर सकती है. चुकी अपार्टमेंट लेने के लिए आप को लोन लेना ही पड़ेगा, इसलिए लोन लेने से पहले कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करना बहुत जरुरी है.

अगर हम होम लोन लेने की योग्यता की बात करें तो बैंक आप की मासिक आय का 40 प्रतिशत तक इएमआई के रूप में स्वीकार करते हैं. इस का साफसाफ मतलब है कि आप की सैलरी से 40 हजार रुपए तक की इएमआई जा सकती है. लेकिन यह अन्य वित्तीय दायित्वों पर भी निर्भर करता है. वहीं आप की मौजूदा बचत अगर कम है और आप ने पहले से कोई बड़ा लोन नहीं ले रखा है तो आप को बैंक 50 से 60 लाख तक का लोन दे सकता है. लेकिन यह बात यही नहीं ख़त्म हो जाती है, लोन लेने के बाद आप को उसे मैनेज भी करना होगा.

गुड़गांव जैसे बड़े शहर में 3 बीएचके अपार्टमेंट खरीदने के लिए कम से कम 70 से 80 लाख रूपए की जरुरत पड़ेगी. इस के साथ ही अपार्टमेंट की कीमत लोकेशन और बिल्डर के अनुसार ज्यादा भी हो सकती है. नामचीन बिल्डर की प्राइम लोकेशन में मौजूद अपार्टमेंट में थ्री बीएचके की कीमत 1 करोड़ रुपए तक हो सकती है. वहीं अगर आप 70 से 80 लाख वाले अपार्टमेंट में थ्री बीएचके लेना चाहते है तो आप को प्रौपर्टी का 20 प्रतिशत डाउन पेमेंट करना होगा.

इस के बाद आप को 50 से 60 लाख रुपए के होम लोन की जरुरत होगी. इस लोन की मासिक इएमआई लगभग 45 से 50 हजार रुपए तक हो सकती है. यह आप की सैलरी का 80 से 90 फीसदी हिस्सा ले लेगी. इस के बाद आप को घर की ग्रोसरी, बिजली, पानी, मेंटेनेंस और अन्य खर्चें भी देने होंगे. यह बहुत ही जोखिम भरा निर्णय साबित होगा.

इस के अतिरिक्त आप की हाल ही में शादी हुई है तो आप के खर्चों में वृद्धि होना स्वाभाविक है. इस के साथ ही मैडिकल इमरजैंसी, अन्य आर्थिक जरूरतें और भविष्य में बच्चों की प्लानिंग भी आप करते हैं तो आप के लिए बचत बहुत मायने रखती है.

ऐसे में 3 बीएचके के लिए होम लोन लेना बुद्धिमानी भरा फैसला बिल्कुल भी नहीं है. फिलहाल आप 2 बीएचके में रह रहे हैं, यह आप की आवश्यकता पूरा कर रही है.

अगर आप 3 बीएचके खरीदने के लिए फिर भी इच्छुक हैं तो आप को बचत ज्यादा करनी होगी. आप को यह ध्यान देना होगा कि आप कैसे और बचत कर सकते हैं. आप को पूरी तरह से फिजूल खर्चों पर रोक लगानी होगी, जो की एक कठोर निर्णय है. कम से कम आप को महीने में अपनी सैलरी से 30 से 40 प्रतिशत तक की बचत करनी होगी. अगर आप 4 से 5 साल लगातार ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं तो आप के पास थ्री बीएचके के लिए डाउन पेमेंट की राशी जमा हो जाएगी. इस के बाद होम लोन लेने पर रकम कम हो जाएगी और ईएमआई का बोझ हल्का रहेगा.

इस के साथ ही एक और विकल्प यह भी हो सकता है कि आप को अपनी सैलरी बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए. अगर आने वाले समय में आप की सैलरी 1 लाख रूपए तक हो जाती है और बचत भी आप अच्छी खासी कर लेते हैं तो होम लोन की ईएमआई आप के लिए आसान रहेगी.

इस के साथ यह भी हमेशा ध्यान रखें कि प्रौपर्टी बजार में उतार चढ़ाव भी आते रहते है सही समय में सही कीमत पर प्रौपर्टी की खरीदारी करना भी महत्वपूर्ण है.

फिलहाल आप के लिए बड़ा होम लोन लेना बहुत ही जोखिम भरा फैसला साबित होगा. अभी आप को भविष्य के लिए बचत करनी जरुरी है. आर्थिक स्तिथि बेहतर होने पर ही थ्री बीएचके अपार्टमेंट लेने का फैसला समझदारी भरा होगा. जल्दबाजी में निर्णय लेने से बचें और अपनी मौजूदा आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन करें.

Hindi Story : चोरी की जिंदगी – अपनेपराए की फर्क समझाती कथा

Hindi Story : प्रेम कुमार, रिटायर्ड सैफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी इतने अच्छे ओहदे की थी कि घर, गाड़ी और बैंकबैलेंस कुछ हद तक ठीकठाक सा था. हालांकि ज्यादातर पैसा उन्होंने पानी की तरह बच्चों पर बहा दिया था.

बच्चों (2 बेटों और एक बेटी) की हर ख्वाहिश पूरी करना उन्हें अच्छे से अच्छा खानाओढ़ना देना, उन्हें अच्छे से अच्छे स्कूल में पढ़ाना और तीनों बच्चों को ऊंचे पदों पर आसीन करना उन का सपना था, जो अब लगभग पूरा हो चुका है.

लगभग इसलिए कि बड़ा बेटा अनिल एमटैक कर के एक आईटी कंपनी में अच्छे ओहदे पर नौकरी करते हुए कंपनी की तरफ से 2 साल के लिए अमेरिका चला गया और बेटी तान्या डबल एमए, बीएड के बाद यूनिवर्सिटी औफ दिल्ली में लैक्चरर थी. लेकिन तीसरी औलाद यानी कि छोटा बेटा सुनील बीए करने के बाद न जाने कितने एंट्रैंस की तैयारियां कर रहा था, न जाने कितने तरह के टैस्ट दे चुका था और न जाने किनकिन कोर्सों के लिए आएदिन पिता से पैसे लेता रहता. कौन जाने कुछ कर भी रहा था या केवल मौजमस्ती में ही सब समय और पैसा बरबाद कर रहा था.

बस, प्रेम कुमारजी को चिंता थी तो केवल सुनील की. हर समय यही कहते, ‘न जाने यह नालायक कुछ करेगा भी कि नहीं. कौन जाने मुंबई जा कर क्या करता है, क्या नहीं.’

बेशक प्रेम कुमार नौकरी के पूरे समय बेंगलुरु में रहे, लेकिन रिटायर होते ही 2 दिनों बाद ही अपने गांव ज्योतिसर (कुरुक्षेत्र के नजदीक) आ पहुंचे. जो खेतीबाड़ी चाचा के बेटों राम लाल और श्याम लाल को आधाआधा पर जोतने के लिए दी थी, उन के बेटे राघव और माधव अब उसे हड़पने की फिराक में थे.

प्रेम कुमार जब भी खेतों में जाते, राघव और माधव उन्हें यह कह कर घर वापस भेज देते कि, ‘बड़े चाचा क्या इस उम्र में भी काम करोगे का?

अरे, हम हैं न ई का देखभाल की खातिर. हम तोहार बच्चे न सही मगर बच्चे जैसन तो हैं न. जाइबे घर जाई के आराम करी के. और हम तो कहत कि आपन कहां ईहा गांम में आपन जिंदगी खराब करेत रहिन. अपन उही सहर में जा के रहो आराम से.’

प्रेम कुमार को थोड़ा अटपटा लगता जब राघव-माधव हर बार खेतों से उन्हें वापस घर भेज देते. वे कमाई के नाम पर हिसाब भी न देते, बस, केवल अनाज उन के घर पहुंचा देते.

अगर कभी प्रेम कुमार पैसों का जिक्र करते कि खर्च के लिए जरूरत है तो कहते, ‘लो भई, बड़े चाचा, अब आप ने के कमी है, थारो तो पेनसन भी आवे है, खर्च तो हमारे न पूरा पड़यो है.’

आखिर एक दिन प्रेम कुमार ने साफ लफ्जों में कह दिया कि अब से वे अपने खेतखलिहान खुद संभालेंगे. उन्हें परेशान होने की आवश्यकता नहीं. इस पर राघव-माधव बिगड़ पड़े. और हो गई आपस में तूतूमैंमैं. यहां तो बात हाथापाई तक आ पहुंची. राघव-माधव बोले, ‘कोण से खेत चाचा? अब तक मेहनत की हम लोगां ने, और अब आप कहो खेत आपने दे दें. फेर हमारा के? जे खेत तो ना मिले अब थाने.’

प्रेम कुमारजी ने रामलाल और श्यामलाल से कहा तो वे बोले, ‘‘भाईसाहब अब बच्चे बड़े हो गए हैं, खुद समझदार हैं, जो कह रहे हैं ठीक ही होगा.’’

गांव में पंचायत बैठाई गई. पंचायत भी राघव-माधव का साथ ही देने लगी, क्योंकि उन दोनों ने पंचायत की जेब पहले से गरम कर रखी थी. प्रेम कुमार ने शहर आ कर पुलिस थाने में कंपलेंट की, लेकिन थाने के चक्कर काटकाट कर प्रेम कुमार की चप्पल घिस गई, मामला ज्यों का त्यों. अब प्रेम कुमार ने कोर्ट केस कर दिया लेकिन राघव-माधव ने पहले से ही अपने पांव इतने फैला रखे थे कि कहीं कुछ भी प्रेम कुमार को बात बनती नजर न आती.

उधर प्रेम कुमार के बड़े बेटे अनिल ने अमेरिका में अमेरिकी लड़की से शादी कर ली और शादी की तसवीरें मातापिता को भेज कर सूचित कर दिया कि उस ने शादी कर ली, और कहा, ‘‘कोई मजबूरी थी, कुछ समय बाद इंडिया आ कर सब बात बताऊंगा.’’

खैर, प्रेम कुमार ने कहा कि, ‘‘ठीक है, बेटा. सफाई देने की जरूरत नहीं. जो किया, ठीक किया.’’

बेटी के लिए कब से रिश्ता ढूंढ़ रहे हैं मगर आजकल हर लड़के वाले इतनी बड़ी बोली बोलते हैं कि प्रेम कुमार सबकुछ बेच कर भी डिमांड पूरी न कर सकें.

तान्या जब भी छुट्टी में घर आती मां से हमेशा यही कहती, ‘‘मां, समझाओ न बाबा को, क्यों परेशान होते हैं. नहीं करनी मुझे शादीवादी. कभी सुना है कि जो गाय बेचता है वह पैसे देता है. गाय बेचने जाओगे तो पैसे ले कर आओगे न.’’

‘‘सुनाजी आप ने, क्या कह रही है तान्या, पता नहीं आजकल के बच्चे पढ़लिख कर कैसी सोच के हो जाते हैं. भला दानदहेज बिना कभी शादी होती है. हां, यह बात अलग है कि लड़के वाले के मुंह थोड़े ज्यादा ही खुल गए हैं.’’

‘‘सब सुन और देख रहा हूं. आजकल बच्चे कुछ अधिक ही सयाने हो गए हैं,’’ प्रेम कुमार को एक और भी चिंता सताए जा रही थी. जो तान्या पतलीदुबली सी छुईमुई सी हुआ करती थी, वह अब आत्मनिर्भर होने के साथसाथ शारीरिक तौर पर भी बदल रही थी. तान्या का बदन गदराया हो गया था. उस की चालढाल बदल गई थी. तान्या के उभार पहले से ज्यादा गदराए हुए हैं जोकि किसी मर्द की छुअन से ही हो सकते हैं (क्योंकि प्रेम कुमार भी तो खेलेखाए हुए हैं अपने वक्त में) लेकिन प्रेम कुमार कुछ कह नहीं रहे बल्कि इसलिए वे जल्द से जल्द तान्या की शादी कर देना चाहते हैं.

एक तान्या की चिंता, दूसरे सुनील की फिक्र. न तो वह किसी एंट्रैंस में क्लीयर हो रहा है, न ही कोई नौकरी मिल रही है, उस पर ये राघव-माधव ने खेतखलिहान पर कब्जा कर लिया.

अनिल को फोन पर बताया कि राघव-माधव खेत अपने कब्जे में ले रहे हैं. कहीं सुनवाई नहीं हो रही. उन की पहुंच बहुत ऊपर तक है.

अनिल ने दोटूक सा जवाब दे कर फोन रख दिया कि, ‘‘मैं यहां विदेश में बैठा क्या कर सकता हूं, सुनील वहां है सुनील से कहिए.’’

सुनील को फोन किया तो बोला, ‘‘पापा, अब तक इन खेतों से क्या बना पाए? ले भी लें अगर तो क्या करेंगे. कौन जोतेगा, कौन देखभाल करेगा?

कुछ लेदे कर समझता कर लो, वही सही रहेगा.’’

‘‘हूं ऊऊ कहता है समझोता कर लो, बापदादा की जमीनजायदाद ऐसे ही छोड़ दूं? कोई बताए जरा इन को तुम ने इसी खेत की रोटी खाई है. भला, डिप्लोमा इंजीनियर की कमाई में इतना कहां जो तुम्हारी हर इच्छा पूरी कर पाता. वह तो इन खेतों की वजह से खुद भी आगे पढ़ता रहा और बच्चों को भी पढ़ा दिया. और आज कहता है, छोड़ दो, क्या मिला इन खेतों से,’’ गुस्से में बड़बड़ाते हुए प्रेम कुमार बाहर चले गए. कुछ दिनों बाद प्रेम कुमार की पत्नी दयावती की अचानक हार्टअटैक से मृत्यु हो गई.

मां की मृत्यु के बाद बेटी अपने पिता को दिल्ली ले आई कुछ दिनों के लिए. बेटी ने खूब सेवा की पिता की, खूब अच्छे से खयाल रखा. लेकिन एक दिन शादी की चर्चा पर बापबेटी में खूब बहस हो गई.

‘‘तान्या, इतनी मुश्किल से ऐसा लड़का मिला है जो कम बजट में शादी के लिए तैयार है, लेकिन अब तुम्हें क्या एतराज है? चाहती क्या है तू? जो बात है, साफसाफ कह. मैं पागल नहीं हूं, दुनिया देखी है मैं ने, सब जानता हूं. जो जिंदगी तू जी रही है न, मैं सब समझता हूं. समय से अपने घर जा और मैं भी चैन की सांस ले सकूं.’’

‘‘पापा, मुझे नहीं करनी शादीवादी इन लड़कों से जिन्हें आप ढूंढ़ढूंढ़ कर ला रहे हैं. अगर आप को मेरी शादी की इतनी फिक्र है तो जहां मैं चाहती हूं वहीं मेरी शादी करा दीजिए. लेकिन मुझे पता है कि आप मेरी पसंद के लड़के को कभी स्वीकार नहीं करोगे, इसलिए मैं ने अब तक आप लोगों से कुछ नहीं बताया. आप लोग जातधर्म के पचड़ों में पड़े रहते हैं.

‘मेरी नजर में अक्षित में कोई कमी नहीं. अच्छा, स्वस्थ, सुंदर लड़का है. आईपीएस औफिसर है. मुझ पर जान लुटाता है और क्या चाहिए. जो कुछ है सब सामने है. मैं आप की तरह चोरी की जिंदगी नहीं जी रही. देखती थी मैं आप को अकसर जब आप मां को अपने बटुए को हाथ तक नहीं लगाने देते थे.

‘‘बालकनी में छिप कर कितनीकितनी देर तक बटुए से तसवीर निकाल कर बिना पलक झपके उसे निहारते रहते, ऐसा महसूस करते जैसे वह आप के सामने है और आप उस से बातें करने लग जाते थे. तब उस समय आप को मां पर बहुत प्यार आता था.

‘‘मैं वह तसवीर कभी नहीं देख पाई थी. यह राज मुझ पर तब खुला जब एक दिन मैं अपनी किसी सहेली के साथ एक प्रोजैक्ट पर काम करने के लिए बाजार सामान लेने गई तब मैं ने आप को देखा, आप शिवानी मैम के घर के बाहर स्कूटर रोक कर इधरउधर चोरों की तरह देख रहे थे जैसे कहीं कोई आप की चोरी न पकड़ ले और फिर आप मैम के घर के अंदर चले गए. तब मुझे समझ आया कि शिवानी मैम मुझे इतना प्यार क्यों करती है. उस चोरी की जिंदगी से तो यह जातपांत से दूर हमारी जिंदगी लाख गुना अच्छी है.’’

‘‘हां, जी है मैं ने चोरी की जिंदगी, इंसान हूं मैं भी, मुझे भी कुछ पल का सुकून चाहिए था. जो मुझे शिवानी की निकटता से मिला. लेकिन तुम्हारी तरह किसी गैरजात से तो रिश्ता नहीं बनाया था मैं ने. कहां हम जमींदार, मैं उच्च कोटि का इंजीनियर और कहां वह नाई का बेटा. क्या बराबरी हमारी और उस की.’’

‘‘वाह पापा, आप के उच्च कोटि वाले इतना मोटा दहेज मांगते हैं कि जिस की किस्तें भरतेभरते इंसान खत्म हो जाए फिर भी किस्तें न खत्म हों. और वह आप के उच्च कोटि वाले, आप के सगे वाले ही आप की जमीन हड़प रहे हैं और आप कोर्टकचहरी के चक्कर काट रहे हैं, जिस से कुछ हासिल होता नजर नहीं आ रहा और आप का वह उच्च कोटि वाला अपना सपूत जो विदेश में न जाने किस से शादी कर के वहीं बस गया.

भारत उसे रास नहीं आ रहा, इसलिए उस ने यहां आना तो दूर, यहां से नाता ही तोड़ लिया और आप का वह उच्च कोटि वाला दूसरा सपूत जो आप से कह रहा है कि कुछ लेदे कर समझोता कर लो, जमीन का क्या करोगे, मैं कुछ नहीं कर सकता.’’

‘‘तू चाहे कुछ भी कह, अपने तो अपने होते हैं और गैर, गैर ही रहेंगे. हो सकता है उस की कोई मजबूरी रही हो. मैं कल ही अनिल से बात करता हूं और चाहे तू कुछ भी कर ले, इस नाई के बेटे से तो तेरी शादी मेरे जीतेजी नहीं होगी. मेरे मरने के बाद जो जी चाहे करते रहना सब के सब.’’
तान्या के पिता बोलते हुए गुस्से से गांव जाने के लिए निकल गए.

अगले दिन प्रेम कुमार ने अनिल को फिर से फोन किया. अनिल के कोई जवाब न देने पर दोतीन दिनों तक फोन करते रहे. आखिर एक दिन अनिल ने साफ कह दिया, ‘‘पापा, मुझे डिस्टर्ब मत किया कीजिए. अपनी समस्याएं आप सुलझाइए.’’

इधर तान्या ने अक्षित को पापा की जमीन की सारी कहानी बताई. अक्षित की पहुंच और रुतबा काफी अच्छा था, इस वजह से जमीन का फैसला जल्दी हो गया और प्रेम कुमारजी को उन की जमीन मिल गई. अब प्रेम कुमार को एहसास हो गया था कि कौन अपना है और कौन पराया. कौन उच्च कोटि का है और कौन छोटा. इंसान कर्मों से उच्चता को प्राप्त होता है न कि जातबिरादरी या धर्म से.

Hindi Kahani : नक्काशी – मनुष्य जीवन की एक विशिष्ट कहानी

Hindi Kahani : जीवन से बहुत अधिक अपेक्षा न रख कर हमेशा अगर हम यह मान कर चलें कि जो भी होगा वह मुझ से है और सबकुछ नवीन और सहज होगा तो हमारी पूरी सोच और दृष्टिकोण रूपांतरित हो जाते हैं. जीवन को अपने हाथ में रख कर यदि आप सोचते हैं कि आप चमत्कारिक रूप से सब अपने हिसाब से कर लेंगे तो आप के हाथ केवल निराशा आएगी. जिंदगी को बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार करें, वरना गांभीर्य और बोझिलता बहुत बढ़ जाएगी और यह घाटे का सौदा है.

अपनी डायरी में ये सब लिख कर अनामिका उठीं और खिड़की पर आ गईं. मैक्लोडगंज अभी जाग रहा था. दूर धौलाधार की चोटियां आकाश को गहराई तक भेद रही थीं. उगता हुआ सूरज अपनी उच्चतम प्रकाष्ठा में, अपनी नरम किरणें पहाड़ों पर बिखेर रहा था. ठंडी और स्फूर्तिदायक हवा एकदम साफ थी. सड़कों पर लामा मठों की तरफ आजा रहे थे. ये वही लोग थे जो बर्बर और असभ्य चीनियों से बचते हुए इस क्षेत्र में आ कर बस गए थे लेकिन ऐसा नहीं है कि ये सब भाग कर आए थे, बल्कि इन के प्रशिक्षण और आस्थाएं ऐसी थीं कि यदि जरूरत पड़े तो ये बर्बर यातनाएं भी सह सकते थे पर कभीकभी पवित्र वस्तुएं, अभिलेख, गोपनीय लेखन और परंपरा को बचाने के लिए भाग कर आने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. उन को ध्यान से देखती हुई अनामिका अपने जीवन की घटनाओं को याद कर रही थीं. आखिर वे भी तो सब छोड़ कर आई थी.

सुबह के 8 बज चुके थे. वे दिन की शुरुआत चाय से करती हैं. उन को नौर्लिंग रैस्तरां की चाय ही पसंद है, इसलिए वे अपने होम स्टे से निकल कर दस कदम दूर बने इस छोटे से रैस्तरां में आ गईं. अनामिका को देख कर वहां के स्टाफ ने ‘ताशी डेलेक’ बोल कर उन का अभिवादन किया और चाय बनवाने चला गया. आजकल अनामिका बहुत से प्रयोग कर रही थीं. परंपरागत भारतीय चाय को छोड़ कर वे मक्खन वाली नमकीन तिब्बती चाय पीती हैं.

अपने जीवन के साथ भी उन्होंने ऐसा ही कुछ प्रयोग किया है. वे 55 साल की महिला हैं और तलाकशुदा हैं. अद्वितीय तेज और शीतलता की मूर्ति, जैसे सूरज और चंद्रमा एक हो गए हों. 5 वर्षों पहले उन्होंने तलाक ले लिया था, जबकि घर, परिवार और रिश्तेदार यह बात हजम नहीं कर पा रहे थे कि जब उस घर में सारी जिंदगी गुजार दी तो अब इस उम्र में तलाक लेने का क्या औचित्य था?

लेकिन अनामिका एक प्रेम और सम्मानरहित रिश्ते को ढोती रही थीं. उस हद से ज्यादा अमीर व्यक्ति को, जिसे समाज उन का पति कहता था, उसे अनामिका की मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक जरूरतों का एहसास तक नहीं था और स्वभाव में क्रूरता व गुस्सा अलग से था. अपने बेटे को पढ़ालिखा कर अनामिका ने बड़ा किया और जब वह विदेश चला गया तो अनामिका ने खुद को उस सोने के पिंजरे से आजादी दिलाई, जिस में उन का साथ सिर्फ उन के बेटे ने दिया था.

तब से अनामिका ‘सोलो ट्रैवलर’ बन कर अकेली भारत दर्शन कर रही हैं और पिछले कुछ महीनों से यहां मैक्लोडगंज में ‘कुंगा होम स्टे’ में रुकी हुई हैं. एक नया शौक उन में जागा है और वह है फोटोग्राफी का. उन के बेटे ने अमेरिका से ही निकोन का कैमरा भेजा है, जिसे अनामिका खूब इस्तेमाल करती हैं. इतनी देर में चाय आ गई और अनामिका भी अपने खयालों की दुनिया से बाहर आ गईं.

उन के पास वाली कुरसी पर मयंक गुप्ता बैठे उन की तरफ देख कर मुसकरा रहे थे. अनामिका कुछ झिझक गईं क्योंकि उन को नहीं पता चला कि मयंक गुप्ता कब से उन के पास बैठे थे. मयंक गुप्ता दिल्ली यूनिवर्सिटी से रिटायर्ड प्रोफैसर हैं. उन की पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी. सब बच्चे शादीशुदा थे. अब जीवन के इस पड़ाव पर अपने अन्य दोस्तों की तरह उन्होंने घर में बैठने की अपेक्षा ‘यायावरी’ को चुना. वे पिछले कुछ महीनों से यहां मैक्लोडगंज में एक किराए के घर में रह रहे हैं. दोनों रोज इस वक्त चाय पीते हैं. इन की मुलाकात इसी नौर्लिंग रैस्तरां में हुई थी.

मयंक गुप्ता अनामिकाजी को ‘बंडल औफ कौन्ट्राडिक्शन’ कहते थे. उन के हिसाब से मृदु स्वभाव वाली अनामिका के अंदर एक विद्रोही स्त्री भी रहती है.

मयंक गुप्ता ने अनामिका के मौन को देखते हुए चुप रहना ही बेहतर समझ और चुपचाप कौफी पीने लगे.

फिर मनचाहा विश्राम ले कर अनामिका ने उन की ओर देखा.

‘‘आप की नक्काशी सीखने की क्लास कैसी चल रही है?’’ वे बोलीं.

‘‘अच्छी चल रही है. यह ऐसा विषय है जिसे मैं पसंद करता हूं. तिब्बती लोगों में खास बात यह है कि ये लकड़ी को बरबाद नहीं करते. धारदार चाकू से लकड़ी काट कर सुंदर कलाकृति बना देते हैं.’’

‘‘जीवन भी तो ऐसा ही है प्रोफैसर गुप्ता, एक औब्जेक्ट पर दृश्य तत्त्वों की नियुक्ति और एक अप्रत्यक्ष वस्तु को खोजने के लिए उपक्रम करना,’’ अनामिका कुछ गंभीर हो कर बोलीं.

‘‘जीवन का इस तरह अन्वेषण करना एक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा है, अनामिका. बाकी सबकुछ निरर्थक ही नहीं बल्कि खंडित भी है.

वास्तव में, जीवन जिया कैसे जाता है, बेहतर दशाएं क्या हो सकती हैं, ये सब हमारे समाज ने हमें कभी सिखाया ही नहीं है. नक्काशी करना और जीवन को जीना एकसमान है. बस, दोनों को पूरी मर्यादा और गरिमा के साथ किया जाए तो अच्छा पैटर्न बन कर सामने आता है.

अनामिका को मयंक गुप्ता ज्यादा ही प्रबुद्ध और विनम्र लगते थे. 6 फुट से भी लंबे मयंक गुप्ता पर्वत समान अडिग, गहन रूप से शांत और सहज प्रकृति के व्यक्ति थे. उन के स्वभाव में एक नरमी थी जो मिस अनामिका को अपनी शादीशुदा जिंदगी में कभी नहीं मिली थी.

‘‘और आज का ‘थौट औफ द डे’ क्या है?’’ अनामिका ने बात बदलते हुए मज़ाकिया लहजे में पूछा.

‘‘आज लामा सोग्याल नक्काशी सिखाते हुए बता रहे थे कि एक महत्त्वपूर्ण सूत्र यह भी है कि अपने पूरे अस्तित्व के साथ संपूर्णता पाने का प्रयत्न करें, मतलब जीवन की अनंत व स्वाभाविक भव्यता के बीच जीने के प्रयत्न करना.’’

‘‘हां, क्योंकि सबकुछ अस्थायी है, प्रोफैसर गुप्ता,’’ अनामिका बोलीं.

बाहर सैलानियों की चहलकदमी बढ़ गई थी. कुछ विदेशी पर्यटक नौर्लिंग में इकट्ठा होना शुरू हो गए थे. इस वक्त रैस्तरां में जो इजराइली संगीत बज रहा था उस की धुन अनामिका को विशेष प्रिय थी. जब हम फुरसत में होते हैं तो संगीत अपनी उपस्थिति बहुत अलौकिक तरीके से दर्ज करवाता है.

दोनों संगीत सुनते रहे और कुछ देर बाद विदा ली.

मयंक गुप्ता अनामिका की आंखों की तरलता देखते रहते थे और मन में सोचते रहते थे कि अनामिकाजी जैसे सरल लोग बाहर से भी और भीतर से भी इतने सुंदर क्यों होते हैं. अनामिका इतनी अद्भुत थीं कि पिछले 2 महीनों से हर पल उन को उन्हीं का खयाल बना रहता था. अब तो नौर्लिंग में सुबह की कौफी पीने के लिए आना और अनामिकाजी से बातें करना, जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन रहा था.

अनामिका एक घंटे की ध्यान की क्लास के लिए वहां से 2 किलोमीटर दूर धर्मकोट के तुषिता सैंटर जाती थीं.

आज भी वे उस तरफ सड़क पर पैदल चलती जा रही थीं. यह इलाका भारत का हिस्सा तो बिलकुल भी नहीं लगता था और यही बात इस को विशिष्ट बनाती थी. बीचबीच में मठों से घंटों की आवाज और हवाओं में लाल चंदन की धूप की खुशबू दिव्यता का एहसास करवाती.

कुछ तिब्बती महिलाएं वहां से गुजर रही थीं, जो अब अनामिका को पहचानने लग गई थीं. सब उन को ‘ताशीडेलेक’ बोल कर अभिवादन करती हुई आगे गुजर रही थीं. तिब्बती महिलाएं भड़कीले लाल, नीले, पीले वस्त्र पहनती हैं लाल मूंगा और हरे फिरोजा पत्थर की मालाओं के साथ, जो अनामिका को बहुत पसंद थे.

अब अनामिका तुषिता सैंटर के सामने थीं. बांसुरी, तुरही, घडि़याल की आवाजें आ रही थीं. इस का मतलब कि सुबह का ध्यान सत्र शुरू होने वाला था. आकाश नीला, विस्तृत और सुंदर दिख रहा था. बादल के छोटेछोटे टुकड़े तैर रहे थे

जैसे किसी पेंटर ने एक बड़े कैनवास पर सफेद रंग का ब्रश फेर दिया हो. अंदर धातु के अगरदान रखे हुए थे जिन से तेज खुशबूदार धुआं ऊपर की ओर उठ रहा था. कुछ लोग प्रार्थनाचक्र घुमा रहे थे. अनामिका ने भी चक्र घुमाया और अंदर चली गईं.

अगले दिन मयंक गुप्ता नौर्लिंग नहीं आए, न ही उन्होंने फोन किया. अनामिका उन का इंतजार करती रहीं और फिर सुबह के सत्र के लिए तुषिता की तरफ चली गईं. वापस आते वक्त वे मयंक गुप्ता को फोन मिलाने का सोचने लगीं लेकिन बाद में फोन वापस बैग में डाल कर उन के घर की तरफ मुड़ गईं. अनामिका को फोन का उपयोग असहज कर देता था, इस का कारण उन को भी नहीं पता था. फोन उन्होंने सिर्फ अपने बेटे से बात करने के लिए ही रखा था.

अंत में वे मयंक गुप्ता के घर के सामने खड़ी थीं. दरवाजा उन के तिब्बती सहायक जामयांग ने खोला और मिस अनामिका सीधे मयंक गुप्ता के कमरे की तरफ चली गईं. कमरे के अंदर चीजें व्यवस्थित थीं. फर्श और दीवारों पर लकड़ी का काम था और अनेक मक्खन के दीये जल रहे थे. सबकुछ साफ, सुंदर और रोशन.

मयंक गुप्ता कोई किताब पढ़ रहे थे और वह भी इतने ध्यान से कि उन को अनामिका के वहां होने तक का एहसास न हुआ. वहां तरहतरह की किताबें थीं, ‘दि सर्मन औन दि माउंट’, ‘राबिया-बसरी के गीत’, ‘मैडम ब्लीवट्स्कीन की सेवन पोर्टलस एफ समाधि’ इत्यादि. दूसरी तरफ टेबल पर नक्काशी का सामान- छेनी, गोज और कुछ अलगअलग आकार के लकड़ी के टुकड़े पड़े थे. बहुत ही कलात्मक और बौद्धिक शौक थे मयंक गुप्ता के.

‘प्रोफैसर गुप्ता,’ अनामिकाजी धीमे से बोलीं.

मयंक गुप्ता एकदम से चौंक गए. उन को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अनामिका उन के कमरे में, उन के सामने खड़ी थीं.

अनामिका को सही से पता था कि मयंक गुप्ता उन को किस रूप में देखते हैं, लेकिन फिर भी मयंक गुप्ता के सान्निध्य में जो नरमी और आत्मीयता उन को मिलती थी वह बहुत अमूल्य और अनोखी थी. चट्टान जैसे मजबूत लेकिन जल की तरह तरल मयंक गुप्ता के मन में कई बार अनामिका का हाथ पकड़ कर बैठने की इच्छा उठती थी लेकिन उन्होंने कभी कोशिश नहीं की. वैसे भी, प्रेम कोई निश्चित प्रयास नहीं है, इस में सहज भाव से डूबना होता है, समाहित होना होता है.

‘‘आप आज आए नहीं, मैं इंतजार कर रही थी.’’

‘‘ओह, मेरा इंतजार. दरअसल मैं आज नक्काशी की क्लास भी नहीं गया. कोई खास वजह नहीं है. बस, मन ही नहीं था.’’

‘‘क्या पढ़ रहे थे आप?’’

‘‘आजकल विश्व साहित्य पढ़ रहा हूं. सुबह से निजार कब्बानी की कविताओं में डूबा हुआ था.’’

‘‘अच्छा. लेकिन मैं ने कभी उन के बारे में नहीं सुना. आप उन की कोई पंक्ति सुनाइए जो आप को सब से ज्यादा पसंद हो.’’

‘‘हां जरूर, अनामिका.’’

इतनी देर में जामयांग चाय ले कर आ गया और वे दोनों वहीं डाइनिंग टेबल पर बैठ गए. मयंक गुप्ता ने चाय का एक घूंट पिया और कविता कहनी शुरू की.

‘‘मैं कोई शिक्षक नहीं हूं, जो तुम्हें सिखा सकूं कि कैसे किया जाता है प्रेम. मछलियों को नहीं होती शिक्षक की जरूरत, जो उन्हें सिखाता हो
तैरने की तरकीब और पक्षियों को भी नहीं, जिस से कि वे सीख सकें उड़ान के गुर. तैरो खुद अपनी तरह से, उड़ो खुद अपनी तरह से, प्रेम की कोई पाठ्यपुस्तक नहीं होती.’’ अनामिकाजी कहीं खो गई थीं और मयंक गुप्ता एकदम चुप हो गए.

‘‘बहुत ही सुंदर है. कविताओं के सम्मोहन उन के काम आते हैं जिन को इन की जरूरत है. लेकिन ज्यादातर लोग तो अंधी दौड़ में शामिल हैं,’’ अनामिकाजी कुछ सोचते हुए बोलीं.

‘‘जरूरत से ज्यादा बौद्धिकता और आधुनिकता ने हमारे स्वाभाविक मृदु भाव छीन लिए हैं, अनामिका.’’

‘‘जी, समाज हर बात को ‘इंटैलेक्चुअल लैंस’ से ही देखता है और भाव जगत को देखनेसमझने की कोशिश कोई नहीं करता.’’

मयंक गुप्ता अनामिका को ध्यान से देख रहे थे और उन की आंखों में जो गूढ़ सांकेतिक भाषा थी, मिस अनामिका समझ पा रही थीं.

‘‘भाव जगत एक विस्तृत विषय है- एक आदिम अवस्था, सामाजिक तो बिलकुल भी नहीं.’’ मयंक गुप्ता चाय पीते हुए बोले.

‘‘और, शब्द केवल संकेत दे सकते हैं. प्रेम जैसे विस्तृत विषय को केवल जिया जा सकता है, जाना नहीं जा सकता,’’ अनामिका बोलीं.

मयंक जैसे किसी नए लोक में थे- यथार्थ और स्वप्न के पार की कोई दुनिया. दोनों एकदूसरे को देख रहे थे और जामयांग उन दोनों को. वह खाने में त्सम्पा बना कर लाया था.

मयंक कुछ सहज हुए और मजाक में बोले कि तिब्बती लोग जीवन के पहले खाने से अंतिम खाने तक त्सम्पा और चाय पर ही निर्भर रहते हैं. उस के बाद दोनों घंटों बैठे बातें करते रहे और फिर अनामिका वापस होम स्टे आ गईं.

मयंक गुप्ता को ले कर अनामिका के विचार उदार थे और वे यह भी जानती थीं कि प्रोफैसर का उन के प्रति आकर्षण स्वाभाविक और विशुद्ध है. प्रेम सामाजिक नहीं, अस्तित्वगत है. इतना व्यापक कि हर रूप में बांटा जा सकता है. जीवन और प्रेम भी कभी तार्किक हुए हैं भला?

उन दोनों का ऐसे ही मिलना चलता रहा और हिमपात के दिन आ गए. पूरी धौलाधार हिमपात के दिनों में बर्फ की चमकती पोशाक पहन लेती थी. जीवन में पहली बार रुई जैसी नर्म ताजा बर्फ के फूल आसमान से झरते हुए अनामिकाजी देख रही थीं और खुद को अकल्पनीय दुनिया में पा रही थीं. उस दिन अनामिका कुदरत के इस तिलिस्म को देखने दूर तक चली गईं और धर्मकोट के ऊपरी शिखर पर जा कर अचंभित हो गईं. बर्फबारी रुकी हुई थी और बहती हुई ठंडी हवा के शोर में एक नई आवाज भी सुनाई दे रही थी, मठों से संगीत की आवाज. ध्वज जोरजोर से लहरा रहे थे. दूर की पहाडि़यों में जो दरारें थीं, उन में बर्फ ऐसे भर गई थी जैसे घाव भरते हैं.

अनामिका ने खूब तसवीरें लीं और मयंक गुप्ता के घर की तरफ चल पड़ीं. मयंक स्वास्थ्य कारणों से बर्फबारी के कारण बाहर नहीं आ रहे थे.

पिछले तीनचार दिनों से वे घर में ही थे. उन के पास जाते ही अनामिका पहाड़ों और बर्फ की सुंदरता का बखान करने लगीं और गरमजोशी से मयंक को तसवीरें दिखाने लगीं. वे 55 साल की महिला नहीं, बिलकुल बच्चे जैसी लग रही थीं और मयंक गुप्ता उन को अनवरत देखते, सुनते जा रहे थे, जबकि खोए वे अपने खयालों में थे.

प्रेम में दूसरा ही सबकुछ हो जाता है, खुद से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण. ‘मैं’ का विसर्जन हो जाता है, बचता है सिर्फ ‘होना’, मयंक गुप्ता यह महसूस कर पा रहे थे. उन की आंखें अप्रत्याशित कारणों से नम हो उठीं और उन्होंने मिस अनामिका के कंधे पर हाथ रख दिया. यह पहली बार हुआ था. इस छुअन से अनामिका अपनी तिलिस्मी दुनिया से बाहर यथार्थ में आ गईं और उन की सिसकी निकल गई. यह वह आत्मीय स्पर्श था जो उन्हें आजीवन नहीं मिला था.

वे दोनों देर तक चुपचाप बैठे रहे. अनामिका जान चुकी थीं कि जीने के लिए नियम या सामाजिक बंधन नहीं बल्कि अनाम प्रेम चाहिए.
मयंक गुप्ता के हाथ उन के सिर और कंधे को सहलाते रहे और अनामिका देर तक रोती रहीं. 30 साल की चट्टान जैसी कठोर शादीशुदा जिंदगी की दुखद, निरर्थक और भयावह यादें आज खुद को प्रत्यक्ष रूप से उद्घाटित कर रही थीं.

‘‘यदि मेरे साथ चलने पर तुम्हारी जिंदगी में कोई खुशी आ सकती है तो मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूं, अनामिका. हम अगला आने वाला जीवन एकसाथ गुजार सकते हैं.’’

अनामिका कुछ संभली और उन्होंने अपने आंसू पोंछे.

वे मुसकराती हुई बोलीं, ‘‘प्रोफैसर गुप्ता, मैं सारा जीवन खंडित वार्त्तालाप करती आई हूं लेकिन अब इतने सालों बाद मुझे मेरे अंदर के स्वर स्पष्ट भाषा में निर्देश दे रहे हैं कि अब मुझे किसी भी तरह के बंधन की नहीं, बल्कि स्वतंत्रता की जरूरत है. मैं आप के प्यार के साथ मुक्त हो कर जीना चाहती हूं जैसे एक दिन आप ने कविता में बोला था कि तैरो खुद अपनी तरह से, उड़ो खुद अपनी तरह से.’’

मयंक चुप रहे. कुछ पलों के बाद गरिमा के साथ उन्होंने अनामिका की बात को मुसकराते हुए मौन समर्थन दिया. जीवन की वास्तविकता एक हद पर जा कर हम से शब्द छीन लेती है. विशुद्ध प्रेम के उज्ज्वल प्रकाश में निराशा का एक कतरा भी नहीं रहता और एक गहरी समझ का उदय होता है.

उस दिन अनामिका ने अपने अगले ट्रैवल डैस्टिनेशन के बारे में भी बात की. हिमाचल के पहाड़ों पर लंबा समय गुजार देने के बाद अब वे जंगलों की तरफ जाना चाहती थीं और आखिरकार एक महीने बाद वे चली भी गईं.

इस बात को एक साल बीत चुका था और अनामिका इन दिनों सुंदरवन के जंगलों में फोटोग्राफी कर रही थीं.

मयंक और वे लगातार फोन और चिट्ठियों के माध्यम से संपर्क में बने रहते थे और एक बार दोनों की मुलाकात जिम कार्बेट में हुई थी जब अनामिका ने मयंक को जंगल सफारी के लिए बुलाया था. पत्रों में वे मयंक को अपने नएनए अनुभव बतातीं और मयंक उन को ‘थौट औफ द डे’.

आज मयंक अपनी किताबों में डूबे हुए थे कि जामयांग उन के पास एक कोरियर ले कर आया. मयंक खुशी से उछल पड़े, यह अनामिका ने भेजा था. जल्दीजल्दी उन्होंने खोला तो उस में मयंक की जिम कार्बेट वाली एक फ्रेम्ड तसवीर निकली, जो मयंक को भी याद नहीं था कि अनामिका ने कब खींची थी और साथ में एक पत्र तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की तरफ से एक एंट्री पास था. बिना वक्त गंवाए मयंक ने चिट्ठी पढ़नी शुरू की तो पता चला कि इस साल का ‘एमेच्योर फोटोग्राफर औफ द ईयर’ का पुरस्कार मिस अनामिका को मिलने जा रहा था और अनामिका ने उन को उस कार्यक्रम के लिए अगले हफ्ते दिल्ली बुलाया था.

मयंक की आंखों में चमक आ गई. वे सोचने लगे कि अनामिका ने स्वतंत्र जीवन की अमर और अंतहीन प्रकृति को पा लिया था. सालों की गहन विनयशीलता, कष्ट, सादगी और संयम मनुष्य की मनोवृत्ति की नक्काशी कर के कैसे बदल देते हैं, अनामिका को देख कर समझ आ रहा था.

लेखक – अनुजीत

Best Hindi Story : खुशी का गम

Best Hindi Story : मेरे बेटे आकाश की आज शादी है. घर मेहमानों से भरा पड़ा है. हर तरफ शादी की तैयारियां चल रही हैं. यद्यपि मैं इस घर का मुखिया हूं, लेकिन अपने ही घर में मेरी हैसियत सिर्फ एक मूकदर्शक की बन कर रह गई है. आज मेरे पास न पैसा है न परिवार में कोई प्रतिष्ठा. चूंकि घर के नौकरों से ले कर रिश्तेदारों तक को इस बात की जानकारी है, इसलिए सभी मुझ से बहुत रूखे ढंग से पेश आते हैं.

बहुत अपमानजनक है यह सब लेकिन मैं क्या करूं? अपने ही घर में उस अपमानजनक स्थिति के लिए मैं खुद ही तो जिम्मेदार हूं. फिर मैं किसे दोष दूं? क्या खुशी, मेरी पत्नी इस के लिए जिम्मेदार है? अंदर से एक हूक सी उठी. और इसी के साथ मन ने कहा, ‘उस ने तो तुम्हें पति का पूरा सम्मान दिया, पूरा आदर दिया, लेकिन तुम शायद उस के प्यार, उस के समर्पण के हकदार नहीं थे.’

खुशी एक बहुत कुशल गृहिणी है जिस ने कई सालों तक मुझे पत्नी का निश्छल प्यार और समर्पण दिया. पर मैं ही नादान था जो उस की अच्छाइयां कभी समझ नहीं पाया. मैं हमेशा उस की आलोचना करता रहा. उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त करता रहा. अपने प्रति उस के लगाव को हमेशा मैं ने ढोंग समझा.

मैं सारा जीवन मौजमस्ती करता रहा और वह मेरी ऐयाशियों को घुटघुट कर सहती रही, मेरे अपमान व अवमाननापूर्ण व्यवहार को सहती रही. वह एक सीधीसादी सुशील महिला थी और उस का संसार सिर्फ मैं और उस का बेटा आकाश थे. वह हम दोनों के चेहरों पर मुसकराहट देखने के लिए कुछ भी करने को हमेशा तैयार रहती थी लेकिन मैं अपने प्रति उस की उस अटूट चाहत को कभी समझ न पाया.

मैं कब विगत दिनों की खट्टीमीठी यादों की लहरों में बहता चला गया. मुझे पता भी नहीं चला था.

उन दिनों मैं कालिज में नयानया आया था. वरिष्ठ छात्र रैगिंग कर रहे थे. एक दिन मैं कालिज में अभी घुसा ही था कि एक दूध की तरह गोरी, अति आकर्षक नैननक्श वाली लड़की कुछ घबराई और परेशान सी मेरे पास आई और सकुचाते हुए मुझ से बोली, ‘आप बी.ए. प्रथम वर्ष में हैं न, मैं भी बी.ए. प्रथम वर्ष में हूं. वह जो सामने छात्रों का झुंड बैठा है, उन लोगों ने मुझ से कहा है कि मैं आप का हाथ थामे इस मैदान का चक्कर लगाऊं. अब वे सीनियर हैं, उन की बात नहीं मानी तो नाहक मुझे परेशान करेंगे.’

‘हां, हां, मेरा हाथ आप शौक से थामिए, चाहें तो जिंदगी भर थामे रहिए. बंदे को कोई परेशानी नहीं होगी. तो चलें, चक्कर लगाएं.’
मेरी इस चुटकी पर शर्म से सिंदूरी होते उस कोमल चेहरे को मैं देखता रह गया था. मैं अब तक कई लड़कियों के संपर्क में आ चुका था लेकिन इतनी शर्माती, सकुचाती सुंदरता की प्रतिमूर्ति को मैं ने पहली बार इतने करीब से देखा था.

उस के मुलायम हाथ को थामे मैं ने पूरे मैदान का चक्कर लगाया था और फिर ताली बजाते छात्रों के दल के सामने आ कर मैं ने उस का कांपता हाथ छोड़ दिया था कि तभी उस ने नजरें जमीन में गड़ा कर मुझ से कहा था, ‘आई लव यू’, और यह कहते ही वह सुबकसुबक कर रो पड़ी थी और मैं मुसकराता हुआ उसे छोड़ कर क्लास में चला गया था.

बाद में मुझे पता चला था कि उस सुंदर लड़की का नाम खुशी था और वह एक प्रतिष्ठित धनाढ्य परिवार की लड़की थी. उस दिन के बाद जब कभी भी मेरा उस से सामना होता, मुझ से नजरें मिलते ही वह घबरा कर अपनी पलकें झुका लेती और मेरे सामने से हट जाती. उस की इस अदा ने मुझे उस का दीवाना बना दिया था. मैं क्लास में कोशिश करता कि उस के ठीक सामने बैठूं. मैं उस का परिचय पाने और दोस्ती करने के लिए बेताब हो उठा था.

मेरे चाचाजी की लड़की नेहा, जो मेरी ही क्लास में थी, वह खुशी की बहुत अच्छी सहेली थी. मैं ने नेहा के सामने खुशी से दोस्ती करने की इच्छा जाहिर की और नेहा ने एक दिन मुझ से उस की दोस्ती करा दी थी. धीरेधीरे हमारी दोस्ती बढ़ गई और खुशी मेरे बहुत करीब आ गई थी.

मैं जैसेजैसे खुशी के करीब आता जा रहा था, वैसेवैसे मुझे निराशा हाथ लगती जा रही थी. मैं स्वभाव से बेहद बातूनी, जिंदादिल, मस्तमौला किस्म का युवक था लेकिन खुशी अपने नाम के विपरीत एक बेहद भावुक किस्म की गंभीर लड़की थी.

कुछ ही समय में वह मेरे बहुत करीब आ चुकी थी और मैं उस की जिंदगी का आधारस्तंभ बन गया था, लेकिन मैं उस के नीरस स्वभाव से ऊबने लगा था. वह मितभाषी थी, जब भी मेरे पास रहती, होंठ सिले रहती. जहां मैं हर वक्त खुल कर हंसता रहता था, वहीं वह हर वक्त गंभीरता का आवरण ओढे़ रहती.

दिन गुजरने के साथ जैसेजैसे उस के व्यक्तित्व का यह पहलू मेरे सामने आ रहा था वैसेवैसे उस के प्रति मेरा मोहभंग होता जा रहा था. जहां वह मानसिक रूप से दिन पर दिन मेरे करीब आती जा रही थी, वहीं मैं जानबूझ कर अपने को उस से दूर करता जा रहा था, क्योंकि मैं जानता था कि उस के और मेरे रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है. मुझे एहसास होता जा रहा था कि यदि हम ने शादी कर ली तो मैं उस के साथ कभी सुखी नहीं रह पाऊंगा. यह सोच कर मैं ने धीरेधीरे उस से मिलना कम कर दिया. लेकिन नेहा से मुझे पता चला कि मेरे इस रवैये से वह बहुत दुखी और परेशान रहने लगी थी, क्योंकि वह मुझ से भावनात्मक तौर पर जुड़ चुकी थी.

नेहा ने तो मुझे यह भी बताया कि अगर मैं खुशी से शादी नहीं करूंगा तो वह अपनी जान दे देगी, लेकिन किसी और लड़के से शादी नहीं करेगी. नेहा की इस बात से मैं परेशान हो गया था, और एक दिन खुशी को मैं ने अपने और उस के विरोधाभास के बारे में बताया कि हम दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर होने की वजह से वह कभी मेरे साथ सुखी नहीं रह पाएगी. इसलिए बेहतर यही होगा कि हम अपने रास्ते अलग कर लें.

मेरी इस बात को सुन कर खुशी बहुत रोई थी और उस दिन घर जा कर उस ने अपने दोनों हाथों की नसें काट कर खुदकुशी करने का प्रयास किया था.

उस दिन खुशी के घर वालों को मेरी और खुशी की दोस्ती के बारे में पता चल गया. अगले ही दिन उस के घर वाले उस की और मेरी शादी का प्रस्ताव ले कर मेरे मातापिता से मिले थे.

नेहा ने मेरी और खुशी की दोस्ती के बारे में पहले ही मेरे मातापिता को सबकुछ बता दिया था, सो मेरे मातापिता ने मेरी राय बिना पूछे उस से मेरा रिश्ता पक्का कर दिया था. बाद में मैं ने अपने मातापिता से इस रिश्ते को तोड़ने की लाख मिन्नतेंकीं लेकिन उन्होंने मेरी बातों पर ध्यान नहीं दिया और आखिरकार मेरी शादी खुशी से हो गई.

विवाह के बाद खुशी ने मुझे वे सारी खुशियां दी थीं जिन की एक पति को अपने पत्नी से अपेक्षा होती है. शादी के बाद के पहले 2-3 वर्ष बहुत अच्छे बीते. वक्त के साथ मैं एक प्यारे से बेटे का पिता बन गया था. उस को गोद में उठा कर मैं बेपनाह खुशियों से भर जाता. उसे लाड़दुलार कर मुझे बहुत सुकून मिलता लेकिन लगभग 3 सालों के विवाहित जीवन के बाद हमारे दांपत्य जीवन में कुछ ठहराव सा आने लगा था. हमारे संबंधों में एकरसता और ऊब की शुष्कता पसरती जा रही थी.

मैं शुरू से ही रसिक स्वभाव का था. नईनई लड़कियों से दोस्ती करना मेरा प्रिय शगल था.

गुवाहाटी में मेरा काफी पुराना अच्छा- खासा साडि़यों का शोरूम था. मुझे व्यापार के लिए अधिक समय नहीं देना पड़ता था, पुराने कर्मचारी मेरी दुकान बहुत अच्छी तरह से संभाल रहे थे. गुवाहाटी के अलावा शिलांग में भी मेरा साडि़यों का एक बड़ा शोरूम था, सो मैं सप्ताह में एक बार शिलांग जरूर जाया करता था. वहां कई लड़कियां मेरी मित्र थीं. शिलांग में एक दोस्त के यहां मेरा परिचय फ्लोरेंस नाम की एक खासी जाति की लड़की से हुआ था. पहली ही नजर में वह लड़की मेरी निगाहों में चढ़ गई थी. उस से पहले मैं जितनी खासी लड़कियों के संपर्क में आया वे सब महज कागजी गुडि़याएं थीं, जिन के जीवन का उद्देश्य सिर्फ मौजमस्ती तथा सैरसपाटा हुआ करता था, लेकिन फ्लोरेंस बेहद जिंदादिल और बिंदास होने के साथसाथ मानसिक रूप से बहुत परिपक्व थी. वह कभी अर्थहीन बातें नहीं करती थी. उस का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था.

एक दिन बातों ही बातों में फ्लोरेंस ने मुझे बताया कि वह एक अच्छी नौकरी की तलाश में है, क्योंकि वह कंपनी, जिस में वह काम कर रही थी, उस की शिलांग की शाखा बंद होने वाली थी.

फ्लोरेंस ने जैसे ही मुझे यह बताया मैं ने उसे अपने शिलांग वाले साड़ी के शोरूम में मैनेजर के पद पर रख लिया था. अब जैसेजैसे मैं उस के संपर्क में आ रहा था, मेरा उस के प्रति खिंचाव बढ़ता ही जा रहा था. दूसरी लड़कियां जहां मेरी अमीरी और आकर्षक व्यक्तित्व की वजह से मेरे आसपास तितलियों की तरह मंडराया करती थीं वहीं फ्लोरेंस मुझ से पर्याप्त दूरी बनाए रखती, जिस की वजह से मैं उस की ओर शिद्दत से खिंचता जा रहा था.

इधर उस की ओर मेरे खिंचाव का एक कारण और था. फ्लोरेंस के नाम कई एकड़ जमीन थी. अगर मैं फ्लोरेंस से रिश्ता कायम कर लेता तो मैं उस की जमीन का मालिक बन जाता. सो जमीन के लालच में मैं उस से रिश्ता कायम करना चाहता था और एक दिन मुझे वह मौका मिल गया जिस की मुझे चाहत थी.

उस दिन फ्लोरेंस मेरे पास बहुत खराब मूड में आई और मेरे कुरेदने पर रो पड़ी. मुझ से बोली, ‘मेरे भाई बहुत जल्लाद हैं. हम खासियों में मां परिवार की मुखिया होती है. बेटियां वंश आगे चलाती हैं. बेटियों को ही मां की जमीनजायदाद मिलती है. मैं अपनी मां की इकलौती बेटी हूं. इसलिए मां की सारी जमीन मुझे मिली है. मेरे दोनों भाइयों की निगाहें मेरी जमीन पर उगने वाले फलों से होने वाली आमदनी पर गड़ी हुई हैं.

‘मैं तो नौकरी पर आ जाती हूं तो मेरे भाई ही खेतों में मजदूरों से काम करवाते हैं. खेती से होने वाली आमदनी पर अपना नियंत्रण रखने के लिए मेरे भाई मेरी शादी एक निकम्मे, नाकारा खासी आदमी से कराने पर जोर दे रहे हैं.’

उसे इस तरह रोते देख मैं ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और उस से बोला, ‘अरे, मेरे होते हुए तुम क्यों चिंता करती हो? मैं तुम्हारे भाइयों से बातें करूंगा और उन्हें धमकाऊंगा. तुम बिलकुल भी मत डरो. मेरे होते हुए कोई तुम पर अपनी मरजी नहीं थोप सकेगा.’

यह कह कर मैं ने उसे चूमना शुरू कर दिया. तब फ्लोरेंस ने मेरे चंगुल से छूटने के लिए बहुत हाथपांव मारे लेकिन उस दिन मेरे ऊपर उस का नशा इस कदर हावी था कि मैं ने उस की एक न सुनी और आखिरकार कुछ प्यार और कुछ जोरजबरदस्ती करते हुए मैं ने उसे आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया. उस दिन मैं ने महसूस किया कि मेरी इस जबरदस्ती से फ्लोरेंस बहुत अधिक नाराज नहीं थी. धीरेधीरे वह मुझे दिलोजान से चाहने लगी थी.

फ्लोरेंस के शोख बिंदास व्यक्तित्व के सामने खुशी का सीधासादा व्यक्तित्व मुझे नीरस लगने लगा था. फ्लोरेंस बातें करने में इतनी वाक्पटु थी कि मामूली बात को भी वजनदार और आकर्षक बना कर सामने रखती. मुझे उस से महज बातें करना बहुत अच्छा लगता था.

अब व्यापार के काम के बहाने मैं हफ्तों फ्लोरेंस के घर पड़ा रहता था. धीरेधीरे शिलांग के साडि़यों के शोरूम की पूरी बागडोर उस ने अपने हाथों में ले ली थी. इधर मुझे यह खुशखयाली भी रहने लगी कि फ्लोरेंस की सारी जमीन अब मेरी है. मैं ही उस का असली मालिक हूं.

फ्लोरेेंस से मेरे संबंधों की खबर खुशी और मेरे परिवार वालों को लग गई थी जिस की वजह से खुशी बहुत दुखी रहने लगी थी. मैं जब भी घर जाता, वह मुझ से कहती, ‘देखो, तुम क्यों उस खासी युवती को इतनी अहमियत दे रहे हो? क्या मुझे और मेरे बेटे को तुम्हारा साथ, तुम्हारा वक्त नहीं चाहिए? आज तुम मानो या न मानो पर देखना, एक दिन वह खासी औरत तुम्हारा साडि़यों का शोरूम हड़प लेगी. तुम ने यहां का शोरूम भी नौकरों के भरोसे छोड़ दिया है. वहां की आमदनी पहले से आधी रह गई है. तुम क्यों अपना सर्वनाश करने पर तुले हुए हो?’

खुशी की बातें सुन कर मैं गुस्से में भर उठा था और उस को चांटा मार कर घर से बाहर निकल आया था.

उसी दिन मैं शिलांग चला गया था. समय पंख लगा कर उड़ता चला गया और मेरा बेटा बड़ा हो चला था. जैसेजैसे वह समझदार होता जा रहा था, वह भी मुझ से दूर होता जा रहा था. मैं उसे अपने करीब लाने की भरसक कोशिश करता, पर वह मुझ से हमेशा अनमना सा रहता और अजनबियों की तरह पेश आता.

फ्लोरेंस से भी मेरा एक बेटा था जिसे मैं बेहद प्यार करता था. जैसेजैसे वह बड़ा हो रहा था वह भी मेरे नियंत्रण से बाहर होता जा रहा था.
इधर पिछले कुछ सालों से खुशी का कुछ दूसरा ही रूप मुझे देखने को मिल रहा था. गुवाहाटी वाला साडि़यों का शोरूम अब खुशी संभाल रही थी. उस के देखभाल करने के बाद वहां की बिक्री लगभग दोगुनी हो गई थी.

अब मेरा बेटा आकाश भी बड़ा हो चला था और कालिज के बाद वह भी शोरूम में बैठने लगा था, लेकिन एक बात जो मुझे खाए जा रही थी वह यह कि खुशी के प्रति मेरे अवमाननापूर्ण व्यवहार के प्रतिक्रियास्वरूप वह मुझ से बहुत कटाकटा सा रहने लगा था और दुकान की तिजोरी की चाबी भी वह अपने पास रखने लगा था. इस वजह से मैं रुपएपैसे के मामले में उन का मोहताज हो गया था. जब कभी मुझे रुपएपैसों की जरूरत होती, खुशी ही मुझे थोड़ेबहुत रुपए दे देती. इस तरह रुपयों के लिए पूरी तरह खुशी पर निर्भर होने की वजह से मेरे आत्मसम्मान को बहुत ठेस पहुंची थी और मुझ में धीरेधीरे हीनता की भावना घर करती जा रही थी.

उधर जिस जमीन के लालच में मैं ने फ्लोरेंस से रिश्ता जोड़ा था, उस जमीन के कागजों की फ्लोरेंस ने मुझे हवा तक नहीं लगने दी. न जाने वह उन्हें कहां छिपा कर रखती थी. उस पर कई महीनों से फ्लोरेंस से मेरी गंभीर अनबन चल रही थी. वह मुझ पर बहुत जोर डाल रही थी कि मैं खुशी को तलाक दे कर उस से अदालत में शादी कर लूं. लेकिन मैं खुशी को तलाक नहीं देना चाहता था. शायद इस की वजह यह थी कि मैं खुशी से भावनात्मक रूप से बहुत जुड़ा हुआ था. इस वजह से फ्लोरेंस और मुझ में झगड़ा बढ़ता ही गया और एक दिन फ्लोरेंस और उस के बेटे हनी ने मिल कर शिलांग वाले साडि़यों के शोरूम पर पूरी तरह से अपना कब्जा जमा लिया था. मैं जब भी शिलांग वाले शोरूम में जाता, हनी मुझे तिजोरी को हाथ तक न लगाने देता.

अब मुझे एहसास होने लगा था कि फ्लोरेंस के साथ रिश्ता कायम कर के मैं ने जिंदगी के हर क्षेत्र में नुकसान उठाया था. फ्लोरेंस की वजह से मैं ने खुशी और आकाश की उपेक्षा और अवहेलना की. मैं ने अपनी पत्नी की उपेक्षा की जिस की वजह से मेरे बेटे ने मुझे कभी पिता का आदरमान नहीं दिया और मैं अपने ही घर में बेगाना बन कर रह गया.

फ्लोरेंस से रिश्ता रखने की वजह से मेरे परिवार वालों ने मुझे पुश्तैनी संपत्ति से बेदखल कर उसे खुशी और आकाश के नाम कर दिया था. मेरी लापरवाही के चलते मेरा गुवाहाटी का शोरूम भी खुशी और आकाश के कब्जे में चला गया था. अब मुझे एहसास हो रहा था कि मैं जिंदगी की लड़ाई में बुरी तरह से हार गया था.

एक वक्त था जब कुदरत ने मुझे दुनिया की हर नियामत बख्शी थी. सुशील पत्नी, एक प्यारा सा बेटा, चलता हुआ व्यापार, सामाजिक प्रतिष्ठा, लेकिन मैं ने यह सबकुछ अपनी ही बेवकूफी से गंवा दिया था. शायद यही मेरी गलतियों की सजा है, लेकिन अब मुझे अपनी गलतियों का एहसास हो चला है और इस के लिए मैं खुशी और आकाश से माफी मांगूंगा. फ्लोरेंस से अपने सारे संबंध हमेशा के लिए तोड़ लूंगा. दोबारा से शोरूम में बैठ कर व्यापार संभालूंगा. खुशी बहुत अच्छी है. वह जरूर मुझे माफ कर देगी.

शोरूम में बैठ कर काम संभालने के खयाल ने मुझे बहुत सुकून दिया था. फिर भी मन के एक कोने में कहीं यह डर छिपा हुआ था कि क्या आकाश और खुशी मुझे फिर से व्यापार संभालने देंगे? क्या वे दोनों मेरी पिछली भूलों को नजरअंदाज कर पाएंगे?

इसी डर और आशंका के साथ मैं शोरूम पर पहुंचा और खुशी से बोला, ‘खुशी, मैं ने पूरी जिंदगी तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया. अपने गलत आचरण से तुम्हारे दिल को बहुत दुखाया. मैं वादा करता हूं कि पुरानी भूलों को अब कभी नहीं दोहराऊंगा. मैं ने फ्लोरेंस और हनी से सारे रिश्ते तोड़ लिए हैं. बस…तुम मुझे एक बार माफ कर दो.’

खुशी तो कुछ नहीं बोली लेकिन आकाश बोल पड़ा, ‘अब आप को अपनी गलतियों का एहसास हो रहा है. मेरी मां ने कितने दिन और कितनी रातें आप की वजह से रोरो कर गुजारी हैं, यह मैं ने अपनी आंखों से देखा है और अब आप माफी मांग रहे हैं. नहीं, बिलकुल नहीं. आप हमारी माफी के बिलकुल भी हकदार नहीं हैं. इतने सालों तक हम ने बिना आप के सहारे के अकेले, अपने दम पर जिंदगी जी है, आगे भी जी लेंगे.

अब आप कारोबार संभालने की बात कर रहे हैं, जबकि पहले आप ने ही सारा कारोबार चौपट कर दिया था. यह शोरूम बंद होने के कगार पर आ पहुंचा था. आप यहां से जाइए, हम दोनों की जिंदगी में अब आप की कोई जगह नहीं है.’

आकाश की इन कड़वी पर सच बातों को सुन कर मेरा दिल बैठ गया और मैं ने हताश कदमों व टूटे दिल से वापस लौटने के लिए कदम बढ़ाए थे कि तभी खुशी बोल पड़ी, ‘आकाश बेटा, पापा से ऐसा नहीं कहते. गलतियां किस से नहीं होतीं? पापा को अपनी गलतियों का एहसास हो गया, यही बहुत है. सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते. हां, पर अब आप को मेरी एक बात माननी पडे़गी कि आप भविष्य में फ्लोरेंस और हनी से कोई रिश्ता नहीं रखेंगे और न उन से मिलने शिलांग जाएंगे.’

‘खुशी, अगर तुम्हें मेरी बातों पर यकीन है तो मैं तुम्हारी कसम खा कर कहता हूं कि भविष्य में मैं उन से कोई संबंध नहीं रखूंगा. मैं ने उन से हमेशाहमेशा के लिए अपने रिश्ते तोड़ लिए हैं.’

यह सुन कर खुशी के चेहरे पर संतुष्टि के भाव परिलक्षित हुए. फिर अपनी कुरसी से उठते हुए उस ने मुझ से कहा, ‘यह जगह आप की है. आप आइए, यहां बैठिए.’

मैं एक बार फिर खुशी की अच्छाइयों के सामने नतमस्तक हो गया था. मुझ में एक बार फिर से जिंदगी जीने की तमन्ना जाग उठी थी.

लेखिका – रेणु दीप

Romantic Story : टूटी हुई लड़ियां – सना की जिंदगी की लड़ियां क्या फिर से जुड़ पाईं

Romantic Story : सना की अम्मी कमरे से सूटकेस उठा लाईं और उस में रखा सामान बाहर निकालने लगीं. ये रहे सातों सूट, यह रहा लहंगा, यह कुरती, यह चुन्नी, यह रहा बुरका, यह मेकअप का सामान और यह रहा नेकलेस…

नेकलेस का केस हाथ में आना था कि उन्हें गुस्सा आ गया और बोलीं, ‘‘कंजूस मक्खीचूस, कितना हलका नेकलेस है. एक तोले से भी कम वजन का होगा.’’

सना के अब्बू बोल पड़े, ‘‘सना की अम्मी, वे लोग कंजूस नहीं हैं, बड़े चालाक किस्म के इनसान हैं. यह सोने का हार सना के मेहर में होता न और मेहर पर सिर्फ लड़की का हक होता है, इसलिए इतना हलका बनवा कर लाए. जिन की नीयत में खोट होता है, वे ही ऐसा करते हैं… इसलिए कि कोई अनबन हो जाए, मंगनी टूट जाए या फिर तलाक हो जाए, तो ज्यादा नुकसान नहीं होता. हार वापस मिला तो मिला, न मिला तो न सही…’’

सना के अब्बू ने थोड़ा दम लिया, फिर अपने दोस्त अबरार से बोले, ‘‘अबरार भाई, यह सारा सामान उठा कर ले जाइए और उन के यहां पटक आइए…’’ अबरार सोचविचार में गुम थे. कहां तो उन्हें हज पर जाने का मौका मिलने वाला था, अब कहां वे पचड़े में पड़ गए. शादी कराना कोई आसान काम है? नेकियां भी मिलती हैं, जिल्लत भी. निबट जाए तो अच्छा, नहीं तो बड़ी फजीहत.

सना के अब्बू दोबारा बोले, ‘‘अबरार भाई, कहां खो गए? सामान उठाइए और ले जाइए.’’

अबरार चौंक पड़े, फिर सामान सूटकेस में रखने लगे.

सना के अब्बू कुछ याद करते हुए फिर बोले, ‘‘और हां, उन्होंने यह जो 10 हजार रुपए भिजवाए हैं, इन्हें भी लेते जाइए, उन के मुंह पर मार देना. बड़े गैरतमंद बनते हैं. हमें मुआवजा दे रहे हैं… 10 हजार रुपए ही खर्च हुए हैं हमारे… मंगनी में कमोबेश 50 हजार रुपए खर्च हुए हैं.’’

सना की अम्मी बोलीं, ‘‘मंगनी में पूरे 50 लोग आए थे. मंगनी क्या पूरी बरात थी. आप तो थे ही… आप ने सबकुछ देखा है… हम ने कोई कोरकसर रख छोड़ी थी भला? ऐसा क्या था, जो हम ने न बनवाया हो? बिरयानी, कोरमा, कबाब, खीर और शीरमाल भी. ऊपर से सागसब्जी सो अलग…’’

कमरे का दरवाजा पकड़े खड़ी सना सिसक पड़ी. उस के गुलाबी मखमली गालों पर आंसू मोतियों की तरह लुढ़क आए. मंगनी के दिन कितनी धूमधाम थी. उस की होने वाली सास और जेठानी आई थीं और ननद भी.

सभी को उस की ससुराल से आया सामान दिखाया गया. कुछ ने तारीफ की, तो कुछ ने मुंह बिचका दिया. इतने नाम वाले बनते हैं और इतना कम सामान. कम से कम 11 सूट तो होते ही. खाली हार उठा लाए. न झुमके हैं, न नथ और न ही अंगूठी.

सना की ननद ने उसे लहंगाकुरती पहनाई थी. चुन्नी सिर पर डाली थी. सब ने मिलजुल कर उसे सजायासंवारा था. माथे पर टीका, गले में नेकलेस, कानों में झुमके और नाक में एक छोटी सी नथ पहनाई थी.

नथ, टीका और झुमके सना की अम्मी ने उस के लिए जबतब बनवाए थे, ताकि शादी में गहनों की कमी न रहे.

सना की नजर सामने रखे सिंगारदान पर पड़ गई. आईने में अपना अक्स देख कर उसे शर्म आ गई थी. वह किसी शहजादी से कम नहीं लग रही थी. उस की अम्मी उस की बलाएं लेने लगी थीं. सास और ननद को अपनी पसंद पर गर्व होने लगा था, पर जेठानी जलभुन गई थी. उस का बस चले तो वह यह रिश्ता होने ही न दे.

वह घर में अपने से ज्यादा खूबसूरत औरत नहीं चाहती थी. उस का मान जो कम हो जाएगा. सभी लोग देवरानी की तारीफ करेंगे और फिर यह पढ़ीलिखी भी तो है. उस की तरह अंगूठाटेक तो नहीं है.

उस दिन से सना बहुत खिलीखिली सी रहने लगी थी. सुबहशाम सजनेसंवरने लगी थी, मंगनी में आए सूट पहनपहन कर देखने लगी थी कि किस सूट में वह कैसी लगती है. हार भी पहन कर देखती थी, फिर खुद शरमा जाती थी.

सना सपने देखने लगी कि उस की बरात गाजेबाजे के साथ बड़ी ही धूमधाम से आ रही है. वह दुलहन बनी बैठी है. बड़े सलीके से उस का सिंगार किया गया है. हाथपैरों में मेहंदी तो एक दिन पहले ही लगा दी गई थी. लहंगा, कुरती और चुन्नी में वह किसी हूर से कम नहीं लग रही है.

कभी सना सोचती, कैसा है उस का हमसफर? मोबाइल फोन की वीडियो क्लिप में तो बिलकुल फिल्मी हीरो जैसा लगता है. खूबसूरत तो बहुत है, उस की सीरत कैसी है? पढ़ालिखा है. सरकारी नौकरी करता है, तो उस की सोच भी अच्छी ही होगी.

यह वीडियो क्लिप सना का छोटा भाई बना कर लाया था. वह इसी वीडियो क्लिप को देखा करती थी और तरहतरह की बातें सोचा करती थी.

उधर सना के मंगेतर आफताब का हाल भी कुछ अलग न था. मंगनी वाले दिन जब सना का बनावसिंगार किया गया था, तो उस की ननद ने भी उस की वीडियो क्लिप बना ली थी और जब से आफताब ने इस क्लिप को देखा था, वह बेताब हो उठा था. सना से बातें करने की कोशिश करने लगा था, पर सना को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था.

अलबत्ता, जब सास और ननद के फोन आते, तो सना सलामदुआ कर लिया करती थी, पर आफताब से नहीं. उसे बहुत अजीब सा लग रहा था.

एक दिन जब सना अपनी ननद से बातें कर रही थी, तो बातें करतेकरते उस की ननद ने मोबाइल फोन आफताब को पकड़ा दिया था.

कुछ देर सना यों ही बातें करती रही. सास और जेठानी की खैरियत पूछती रही, फिर उसे लगा कि उधर उस की ननद नहीं कोई और है. उस ने फोन काटना चाहा, पर आफताब बोल पड़ा, ‘सना, प्लीज फोन मत काटना, तुम्हें मेरी कसम है…’

इतना सुनना था कि सना का रोमरोम जैसे खिल उठा. वह बेसुध सी हो गई. फिर आफताब ने क्या कहा, क्या उस ने जवाब दिया, उसे कुछ पता नहीं.

फिर उस दिन से यह सिलसिला ऐसा चला कि दिन हो या रात, सुबह हो या शाम दोनों एकदूसरे से बातें करते नहीं थकते थे. बातें भी क्या… एकदूसरे की पसंदनापसंद की. कौनकौन से हीरोहीरोइन पसंद हैं? फिल्में कैसी अच्छी लगती हैं? टैलीविजन सीरियल कौनकौन से देखते हैं? सहेलियां कितनी हैं और बौयफ्रैंड कितने हैं?

बौयफ्रैंड का नाम पूछने पर सना नाराज हो जाती और गुस्से में कहती, ‘‘7 बौयफ्रैंड्स हैं मेरे. शादी करनी है तो करो, वरना रास्ता पकड़ो…’’

यह सुन कर आफताब को मजा आ जाता. वह लोटपोट हो जाता. फिर सना को मनाने लगता. प्यारमुहब्बत का इजहार और वादे होने लगते.

इस तरह बहुत ही हंसीखुशी से दिन गुजर रहे थे. अब तो बस शादी का इंतजार था. शादी भी ज्यादा दूर न थी. कमोबेश 2 महीने रह गए थे. शादी की तैयारियां शुरू हो गई थीं.

एक दिन अबरार सना के घर आए. वे कुछ परेशान से थे. सना की अम्मी ने पूछा, ‘‘क्या बात है अबरार भाई? आप कुछ परेशान से लग रहे हैं?’’

‘‘परेशानी वाली बात ही है भाभी,’’ असरार बोले.

‘‘क्या बात है? बताइए भी.’’

अबरार ने धीरे से कहा, ‘‘लड़के ने मोटरसाइकिल की मांग की है.’’

यह सुन कर सना की अम्मी को हंसी आ गई, ‘‘बड़ा नादान लड़का है. यह भी कोई कहने की बात है… क्या हम इतने गएगुजरे हैं कि मोटरसाइकिल भी नहीं देंगे.’’

शाम को जब सना के अब्बू घर आए और उन्हें यह बात पता चली, तो उन्हें बड़ा अफसोस हुआ. वे बोले, ‘‘सना की अम्मी, लड़के वाले बहुत लालची किस्म के लग रहे हैं.’’

बात आईगई हो गई. धीरेधीरे समय गुजरता रहा. इधर एक बात और हुई. आफताब का फोन आना बंद हो गया. सना को चिंता हुई. क्या वह बीमार है? बीमार होता, तो पता चलता. कहीं बाहर गया है? बाहर कहां जाएगा. वैसे तो दिन हो या रात, दम ही नहीं लेता था. पर अब. अब उसे चैन कैसे पड़ रहा है. आज कितने दिन हो गए हैं उस से बातें किए हुए?

आखिरकार सना ने उस का फोन नंबर मिलाया. उधर से काल रिसीव नहीं की गई. उस ने दोबारा फोन मिलाया. फिर नहीं रिसीव की गई. इस के बाद फोन बिजी बताने लगा. सना पर उदासी छा गई. वह बारबार मोबाइल फोन की ओर हसरत भरी नजरों से देखती. शायद अब आफताब का फोन आए. शायद अब. कभीकभी जब किसी और का या फिर कंपनी का फोन आता, वह खुश हो कर दौड़ पड़ती, अगले ही पल निराश हो जाती.

आखिर में उस ने एक एसएमएस टाइप किया, ‘प्लीज, आफताब बात करो. इतना मत सताओ. तुम्हें मेरी कसम.’ कई दिन गुजर गए, उधर से न तो एसएमएस आया और न ही काल हुई.

इसी बीच एक दिन अबरार का आना हुआ. आज फिर वे कुछ परेशान से थे. पूछने पर वे बोले, ‘‘कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि लड़के वालों की मरजी क्या है?’’

यह सुनते ही सना के अब्बूअम्मी डर गए. अबरार ने बताया, ‘‘लड़के की मां कह रही थीं कि उन के बेटे के रिश्ते अब भी आ रहे हैं. एक लड़की वाले तो कार देने को तैयार हैं…’’

इतना सुनना था कि सना के अब्बू उठ खड़े हुए. वे गुस्से से कांपने लगे, ‘‘अबरार भाई, मैं उन के हथकडि़यां लगवा दूंगा… उन का लालच दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. अरे, उन का लड़का सरकारी नौकरी करता है… बैंक में मुलाजिम है… तो हमारी लड़की भी कोई जाहिल नहीं है.’’

अबरार भाई सकते में आ गए. वे उठ खड़े हुए और सना के अब्बू को समझाने लगे, ‘‘गफ्फार भाई, ऐसा मत बोलिए, ठंडे दिमाग से काम लीजिए. गुस्से में सब बिगड़ जाता है.’’

‘‘क्या खाक ठंडे दिमाग से काम लें… क्या आप को नहीं लगता कि सबकुछ बिगड़ रहा है… वे मंगनी तोड़ने के मूड में हैं. उन्हें हम से बड़ी मुरगी मिल गई है.’’

‘‘आप ठीक फरमा रहे हैं. शायद उन्हें हम से ऊंची पार्टी मिल गई है.’’

‘‘तो क्या ऐसी हालत में मैं हाथ पर हाथ धरे बैठा रहूंगा… जेल भिजवा दूंगा उन्हें… समझ क्या रखा है?’’

‘‘गफ्फार भाई, जरा सोचिए, अगर आप ने ऐसा किया, तो बड़ी बदनामी होगी…’’

‘‘बदनामी, किस की बदनामी?’’

‘‘आप की, लोग कहेंगे कि लड़की का बाप हो कर लड़के वालों को हथकड़ी लगवाता है… जेल भिजवाता है… सना बिटिया के लिए रिश्ते आने बंद हो जाएंगे. लड़की वालों को बड़े सब्र से काम लेना पड़ता है.’’

‘‘तो क्या किया जाए?’’

‘‘इस से पहले कि वे मंगनी तोड़ें, हम उन के रिश्ते को लात मार देते हैं… इस से वे बदनाम हो जाएंगे कि दहेज में गाड़ी मांग रहे थे. उन्हें रिश्ता ढूंढ़े नहीं मिलेगा. हमारी सना बेटी के लिए हजारों रिश्ते आएंगे. आखिर उस में क्या कमी है? खूबसूरत है और खूब सीरत भी. अभी उस की उम्र ही क्या हुई है.’’ फिर एक दिन लड़के वालों की तरफ से 3-4 लोग आए. इन लोगों में उन के यहां की मसजिद के इमाम साहब भी थे और अबरार भी. बैठ कर तय हुआ कि दोनों पक्ष एकदूसरे का सामान वापस कर दें और लड़की वाले का मंगनी के खानेपीने में जो खर्च हुआ है, उस का मुआवजा लड़के वाले दें.

सना की अम्मी कमरे के अंदर से बोलीं, ‘‘दिखाई में हम लोग लड़के को सोने की अंगूठी पहना आए थे और 5 हजार रुपए नकद भी दिए थे. मिठाई और फल भी ले गए थे, सो अलग…’’

‘‘यही कहा जा रहा है कि जो भी दियालिया है, वह एकदूसरे को वापस कर दें. मिठाई और फल तो लड़के वाले भी लाए होंगे?’’ इमाम साहब बोले. सना की अम्मी बोलीं, ‘‘वे ठहरे लड़के वाले, वे भला क्यों लाने लगे मिठाई और फल. बिटिया को सिर्फ 251 रुपल्ली पकड़ा गए थे, बस…’’

आज अबरार मंगनी का वह सारा सामान जो लड़के के यहां से आया था, लेने आए थे और साथ में 15 हजार रुपए भी लाए थे. 10 हजार रुपए मुआवजे के और 5 हजार रुपए जो लड़की वाले लड़के को दे आए थे. सोने की अंगूठी भी ले कर आए थे.

अबरार जब सूटकेस उठा कर चलने लगे, तो सना बोली, ‘‘अंकल, एक चीज रह गई है, वह भी लेते जाइए.’ ‘‘वह क्या है बेटी? जल्दी से ले आइए,’’ वे बोले.

‘‘अंकल, आप सूटकेस मुझे दे दीजिए, मैं इसी में रख दूंगी,’’ सना ने उन से सूटकेस लेते हुए कहा सना कमरे के अंदर गई. सूटकेस बिस्तर पर रखा और कैंची उठाई. शाम को जब सूटकेस आफताब के घर पहुंचा, तो उस के घर की औरतें उसे खोल कर देखने लगीं कि सारे कपड़े, मेकअप का सामान और नेकलेस है भी या नहीं सूट तो सारे दिखाई पड़ रहे हैं. बुरका भी है, लहंगा, कुरती और चुन्नी भी. बचाखुचा मेकअप का सामान भी है.

‘‘यह क्या…’’ आफताब की भाभी चीख पड़ीं, ‘‘यह लहंगा तो कई जगह से कटा हुआ है.’’

दोबारा देखा, लहंगा चाकचाक था. कुरती उठा कर देखी, वह भी कई जगह से कटीफटी थी. सारे के सारे सूट उठाउठा कर देख डाले. सब के सब तारतार निकले. नकाब का भी यही हाल था. जल्द से नेकलेस उठा कर देखा. उस की भी लडि़यां टूटी हुई थीं.

Best Short Story : अनोखा पहलवान – आखिर क्या खास था उस पहलवान में

Best Short Story : बगदाद के खलीफा को कुश्ती करवाने का बड़ा शौक था. वह हर वर्ष कुश्ती प्रतियोगिता आयोजित करता था और जो पहलवान जीतता उसे कीमती भेंट दे कर सम्मानित करता था. उस के अपने दरबार में भी 5 नामी पहलवान थे. इस बार कुश्ती प्रतियोगिता के सभी मुकाबले जीतने वाले शाही पहलवान अली जुनैद को ले कर काफी चर्चा हो रही थी. निर्णायकों ने जब उसे सर्वश्रेष्ठ पहलवान घोषित किया, तो खलीफा की खुशी का ठिकाना न रहा, किंतु तभी जनता ने निर्णायकों पर पक्षपात का आरोप लगाया.

यह सुन कर खलीफा के कान खड़े हो गए. उस ने खीज कर घोषणा करवा दी, ‘‘शाही पहलवान जुनैद सर्वश्रेष्ठ है. अगर किसी को शक है तो 5 दिन के भीतर उसे चुनौती दे तो प्रतियोगिता दोबारा होगी. पर ध्यान रहे, चुनौती देने वाला यदि हार गया तो उस का कत्ल करा दिया जाएगा और यदि जीत गया तो उसे स्वर्ण मुद्राओं से भरी थैली भेंट की जाएगी.’’ इस घोषणा से बगदाद शहर में तहलका मच गया. दूरदराज के इलाकों से आए पहलवान अपने खेमे उखाड़ कर वापस जाने लगे. बाकी खेमों में भी एकदम सन्नाटा छा गया.

जुनैद पहलवान दाएं पैर में जंजीर बांध कर शहर भर में घूमा, पर उस के पीछे घिसटती जंजीर को किसी ने नहीं दबाया. जुनैद पहलवान मस्ती में झूमता हुआ गलीगली घूम रहा था. उस के पीछे बच्चों के झुंड किलकारियां मारते, तालियां पीटते चल रहे थे. धूल उड़ रही थी. तभी एक घर के पास पहलवान ने ठिठक कर पीछे देखा. उस के पांव की जंजीर को दबाने वाला व्यक्ति निर्भय पीछे खड़ा मुसकरा रहा था. वह काफी कमजोर और वृद्ध था पर उस का साहस कमाल का था. उस ने पहलवान से बात की और उस के उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा. पहलवान गंभीर हो गया. वह उस मरियल से आदमी की कही बात पर गंभीरता से सोचविचार कर रहा था.

‘‘अच्छा, मुझे मंजूर है. मैं आप से कुश्ती लडं़ूगा,’’ पहलवान ने जैसे उस की चुनौती स्वीकार कर ली. बच्चों ने ठहाके लगाए. बड़ा शोर मचाया. सभी जानते थे कि निर्भय अपनी मौत को बुला रहा है. यह बात आग की तरह पूरे शहर में फैल गई. सिर पर पांव रख कर भागने को तैयार पहलवान भी ठहर गए. खलीफा भी हैरान था. आखिर कुश्ती का दिन निश्चित हुआ. खौफनाक तूफान को एक नन्हे दीपक से भिड़ते देखने भीड़ जमा हुई. भय और कुतूहल का माहौल था.

निश्चित समय पर शाही पहलवान अली जुनैद मुसकराता हुआ मैदान में आया. खलीफा अपने साथियों के साथ पहले ही जम गया था. कनातों के पीछे से शाही दरबार की औरतें यह नजारा देख रही थीं. जब सींकिया पहलवान मैदान में आया तो उसे देखते ही दर्शकों ने भारी शोर मचाया, पर वह बहुत अकड़ कर चल रहा था. शाही पहलवान से हाथ मिला कर उस ने अखाड़े में नाटकीय उछलकूद शुरू कर दी. लोग हंसने लगे. कोई बोला, ‘‘भला यह मरने पर क्यों उतारू है?’’ तो किसी ने कहा, ‘‘पागल लगता है.’’

निर्णायकों ने इशारा किया. दर्शकों ने दम साध लिया. इस से पहले कि शाही पहलवान अपना दांव लगाता, उस सींकिया पहलवान ने शाही पहलवान को चित्त कर दिया और उछल कर उस की छाती पर बैठ गया. खलीफा का चेहरा उतर गया. सभी अविश्वास से एकदूसरे का मुंह देखने लगे. पर होनी सब के सामने थी. तभी ऐलान हुआ, शाही पहलवान कुश्ती हार गया.

खलीफा क्रोधित हो उठा. उस ने शाही पहलवान को बुलाया और बहुत फटकारा. पहलवान सिर झुका कर खामोश खड़ा था. ‘‘तुम बोलते क्यों नहीं? मेरी बात का जवाब दो. तुम हार कैसे गए?’’ ‘‘क्या जवाब दूं. मैं कुश्ती हार गया क्योंकि मैं पहलवान ही नहीं, एक इंसान भी हूं. इस व्यक्ति ने मुझे बताया था कि वह बहुत गरीब है. 3 साल से उस के खेत में एक दाना भी अन्न नहीं उगा. घर में कुंआरी बहन बैठी है. अगर वह यह प्रतियोगिता जीत जाए तो ईनाम में मिलने वाले धन से वह अपनी समस्या सुलझा लेगा,’’ जुनैद ने बताया.

खलीफा अली जुनैद की उदारता से हक्काबक्का रह गया. ‘‘पर तुम इस की सहायता अपने पास जमा धन से भी तो कर सकते थे. खजाने से काफी रकम मिलती है तुम्हें?’’ खलीफा ने पूछा. ‘‘हुजूर मेरे पास एक कौड़ी भी जमा नहीं है. जो मिलता है मैं गरीबों में बांट देता हूं,’’ पहलवान ने कहा. ‘‘शाबाश,’’ खलीफा ने लपक कर पहलवान को गले लगा लिया. फिर वह गरीब तो खैर मालामाल हुआ ही पहलवान की झोली भी मुहरों से भर दी गई.

Love Story : भरमजाल – रानी के जाल में कैसे फंस गया रमेश

Love Story : आज पार्क जा कर जौगिंग करने में मेरा बिलकुल भी मन नहीं लगा. हालांकि, रमेश को छोड़ कर बाकी सभी दोस्त थे, मगर रमेश से मेरी कुछ ज्यादा ही पटती थी. 25 सालों से हम दोनों एकसाथ इस पार्क में जौगिंग करने आते रहे हैं. कुछ तो वैसे ही रमेश का न होना मुझे एक अधूरेपन का एहसास करा रहा था और कुछ दोस्तों ने जब उस के बारे में उलटीसीधी बात करनी शुरू की, तो मेरा मन और भी परेशान हो गया.

‘‘4 महीने बाद 60वां जन्मदिन होने वाला था रमेश का. उम्र के इस पड़ाव पर ऐसा काम करते हुए उसे जरा भी शर्म नहीं आई. देखने में कितना धार्मिक लगता था और काम देखो कैसा किया. सारा समाज थूथू कर रहा है उस पर,’’ एक दोस्त ने कहा. दूसरे दोस्त ने नाकभौं सिकोड़ते हुए कहा, ‘‘मुझे तो भाभीजी पर तरस आ रहा है. अच्छा हुआ दोनों लड़कों ने घर से निकाल दिया ऐसे बाप को…’’

इस से ज्यादा सुनने की ताकत मुझ में नहीं थी. ‘‘कुछ काम है…’’ कह कर मैं वापस घर आ गया और रमेश के बारे में सोचने लगा. रमेश और मेरी कारोबार के सिलसिले में एकदूसरे से जानपहचान हुई थी. यह जानपहचान कब दोस्ती और फिर गहरी दोस्ती में बदल गई, पता ही नहीं चला.

रमेश बहुत ही साफदिल, अपने काम में ईमानदार और सामाजिक इनसान था. उस के इन्हीं गुणों के चलते हमारी दोस्ती इतनी बढ़ी कि 25 साल तक हम रोजाना एकसाथ जौगिंग करने जाते रहे. हम दोनों अपनी सारी बातें जौगिंग के दौरान ही कर लेते थे. कई बार तो दूसरे दोस्त हमें लैलामजनू कह कर चिढ़ाते थे.

इतने सालों में रमेश ने अपना कारोबार काफी बढ़ा लिया था. ट्रांसपोर्ट के कारोबार के साथ ही अब उस ने दिल्ली के पौश इलाके में पैट्रोल पंप भी खोल लिया था. एक तरफ लक्ष्मी उस पर पैसा बरसा रही थी, वहीं दूसरी तरफ उस की सुंदर सुशील पत्नी ने 2 बेटे उस की गोद में दे कर दुनिया का सब से अमीर इनसान बना दिया था.

जिंदगी ने अच्छी रफ्तार पकड़ ली थी, मगर सब से अमीर आदमी सुखी भी हो, ऐसा जरूरी नहीं होता. वह लालच के ऐसे दलदल में धंसता चला जाता है कि जब तक उसे एहसास होता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है. 2 साल पहले बाजार में गिरावट आई, तो सभी के कारोबार ठप हो गए. रमेश किसी भी तरह कारोबार को चलाना चाहता था. उस ने अपने पैट्रोल पंप पर पैट्रोल भरने के लिए लड़कियां रख लीं और वाकई उस के पैट्रोल पंप की कमाई पहले से काफी ज्यादा बढ़ गई.

ग्राहक वहां पैट्रोल लेने के बहाने लड़कियां देखने ज्यादा आने लगे. अब रमेश हर तीसरे महीने पहली लड़की को हटा कर किसी नई और खूबसूरत लड़की को काम पर रखता. मुझे उस की इस सोच से नफरत हुई. मैं ने उसे समझाने की कोशिश भी की, तो उस ने कहा ‘आल इज फेयर इन बिजनेस’.

मैं अपनी आंखों से देख रहा था कि पैसा कैसे एक सीधेसादे इनसान की अक्ल मार देता है. ज्यादातर उस के मैनेजर ही इन लड़कियों को काम पर रखते थे. पर वे लड़कियां काम कैसा कर रही हैं, यह देखने के लिए रमेश कभीकभार अपने पैट्रोल पंप पर ही पैट्रोल भरवाने चला जाया करता था.

उन्हीं दिनों एक लड़की रानी, उस के पैट्रोल पंप पर काम करने आई. एक शाम को मैं उसी की गाड़ी में काम के सिलसिले में उस के साथ गया था. उस दिन रमेश ने पहली बार रानी को देखा था. गठे हुए बदन की लंबीपतली थोड़ी सांवली सी थी वह, उम्र यही होगी कोई 23-24 साल यानी रमेश के बेटे से भी छोटी उम्र की थी.

रमेश ने मैनेजर को बुला कर पूछा, तो उस ने बताया कि यह नई लड़की है रानी, अपना काम भी बखूबी कर रही है. उस के बाद रमेश और मैं वापस आ गए. 3 महीने बाद मैनेजर का रमेश के पास फोन आया कि रानी आप से मिलना चाहती है. वह काम से हटने को तैयार नहीं है. उसे समझाने की बहुत कोशिश की, मगर कहती है कि एक बार मालिक से मिलवा दो, फिर चली जाऊंगी.

रमेश ने कहा, ‘‘उसे मेरे दफ्तर भेज देना.’’

दफ्तर आते ही रानी रमेश के पैरों में गिर गई और लगी जोरजोर से रोने, ‘‘मालिक, मुझे काम से मत निकालो. मेरे घर में कमाने वाली सिर्फ मैं ही हूं. बाप शराबी है. वह पैसे के लिए मुझे बेच देगा. 3 महीने से आधी तनख्वाह उस के हाथ में रख देती थी, तो शांत रहता था. बड़ी मुश्किल से अच्छी नौकरी और अच्छे लोग मिले थे. मैं आप के सब काम कर दिया करूंगी, ओवरटाइम भी करूंगी. उस के पैसे भी चाहे मत देना, पर मुझे काम से मत निकालो.’’ रमेश ने 1-2 बार उस से कहा भी कि उठो, ऐसे पैरों में मत गिरो, मगर वह पैरों को पकड़े रोती रही. आखिरकार रमेश को ही उसे उठाना पड़ा और मानना पड़ा कि वह उसे काम से नहीं निकालेगा.

ऐसा सुनते ही रानी ने रमेश का हाथ चूम लिया. 60 साल के बूढ़े रमेश के अंदर कमसिन रानी के चुंबन से एक सिहरन सी दौड़ गई. रानी के जाने के बाद भी रमेश उसी के बारे में सोचता रहा. वह खुद को उस की तरफ खिंचता हुआ महसूस कर रहा था. 1-2 बार उस ने अपने इन विचारों को झटका भी कि वह यह क्या सोच रहा है. मगर रानी का गठीला बदन और उस का चुंबन रहरह कर उसे उस से मिलने को बेचैन कर रहे थे.

उस दिन के बाद से रमेश अकसर अपने पैट्रोल पंप पर जाने लगा. पहले वह वहां बैठता नहीं था. अब उस ने वहां बैठना भी शुरू कर दिया था. रानी के दफ्तर आने वाली बात रमेश ने मुझे बताई थी और जब उस ने अपनी उस सोच के बारे में मुझे बताया, तभी मैं ने उसे समझाने की कोशिश की, ‘‘तुम रानी से दूर ही रहो. फिसलने की कोई उम्र नहीं होती. कीचड़ में कितना धंस जाओगे, खुद तुम्हें भी पता नहीं चलेगा.’’

मेरे समझाने के बाद से रमेश ने मुझ से रानी के बारे में बातें करना बंद कर दिया, मगर मैं बरसों पुराना दोस्त था उस का, उस की बदलती हरकतों को बखूबी देख पा रहा था. अगले 3 महीने का समय भी इसी तरह निकल गया. अब रमेश ने रानी को बुला कर कहा, ‘‘देखो, अब मुझे तुम्हें यहां से हटाना होगा, नहीं तो बाकी की लड़कियां भी यही मांग करेंगी कि हमें भी काम से मत हटाओ.’’

‘‘मगर, मैं कहां जाऊंगी मालिक?’’ ‘‘शहर से बाहर निकल कर हमारा एक फार्म हाउस है, वहां उस घर की देखभाल के लिए किसी की जरूरत है. मैं तुम्हें वहां नौकरी दे सकता हूं. चौबीस घंटे वहीं रहना होगा. खानापीना सब हम देंगे और तनख्वाह अलग.’’

रानी ने खुशीखुशी हां भर दी. अब रानी फार्म हाउस में काम करने लगी. कभीकभी रमेश अपने दोस्तों को वहां ले जाता, तो रानी खाना भी बना देती थी सब के लिए.

रानी हर काम में माहिर थी. फार्म हाउस पूरा चमका दिया था उस ने. रमेश को यह देख कर बहुत अच्छा लगा. एक बार कहीं बाहर से आते हुए रमेश फार्म हाउस पर चला गया. वहां जा कर पता चला कि चौकीदार छुट्टी पर है. तब रानी ही गेट खोलने आई. चायपानी, नाश्ता सब दे दिया और जाने लगी, तो रमेश ने पूछा, ‘‘तुम्हें यहां कोई दिक्कत तो नहीं है?’’

‘‘जितना चाहा था, उस से भी ज्यादा मिल गया मालिक. आप की वजह से ही मैं आज इज्जत की जिंदगी जी रही हूं, नहीं तो मेरा बाप कब का मुझे बेच देता,’’ कहतेकहते वह रोने लगी. रमेश ने उस के आंसू पोंछे, तो रानी ने रमेश का हाथ पकड़ लिया, ‘‘सर, आप बहुत ही अच्छे इनसान हैं. आजकल अपने कर्मचारियों के बारे में कौन सोचता है.’’ और फिर से उस का हाथ चूमने लगी और बोली, ‘‘आप तो मेरे लिए सबकुछ हैं.’’

उस चुंबन की सिहरन ने रमेश के हाथों वह काम करवा दिया, जो रानी उस से कराना चाहती थी. उस के बाद से तो रमेश का हर हफ्ते का यही काम हो गया. वह हर हफ्ते काम का बहाना बना कर फार्म हाउस आ जाता. रानी ने उसे अपनी बातों में इस कदर उलझा लिया था कि अब रमेश को अपने घर और बीवीबच्चों की भी चिंता नहीं थी. इस बीच रमेश ने मुझ से मिलनाजुलना बंद कर दिया था. फिर अचानक एक दिन भाभी (रमेश की पत्नी) का फोन आया कि रमेश ने दूसरी शादी कर ली है.

यह सुन कर मैं हक्काबक्का रह गया. मुझे यह तो अंदाजा था कि कुछ गलत हो रहा है, मगर इस हद तक होगा, यह नहीं सोचा था. शादी की उम्र तो उस के बेटों की थी, ऐसे में जब उन्हें अपने बाप की करतूत का पता चला, तो उन्होंने उन्हें घर से निकाल दिया.

रमेश ने पार्क आना बंद कर दिया. आता भी किस मुंह से. इतने सालों से कमाई इज्जत पल में मिट्टी में मिल गई. सारा समाज रमेश पर थूथू कर रहा था. शादी के 6 महीने बाद ही रानी ने एक बच्चे को जन्म दे दिया. रमेश रानी के साथ फार्म हाउस में ही रह रहा था. एक दिन अचानक रात में रमेश मुझ से मिलने आया. वह जानता था कि उस की हरकत से मैं भी बहुत नाराज हूं.

मेरे कुछ कहने से पहले ही वह बोला, ‘‘मुझे मालूम है कि तुम मेरी शक्ल भी नहीं देखना चाहते, पर एक बार मेरी बात सुन लो. मैं यही चाहता हूं और कुछ नहीं. तुम्हारी माफी भी नहीं.’’ फिर रमेश ने शुरू से आखिर तक सारी बातें मुझे बताईं. रमेश ने यह भी बताया कि यह बच्चा उस का है ही नहीं. मगर रमेश ने रानी के साथ संबंध बनाए थे, उस का वीडियो रानी के आशिक ने चुपके से बना लिया था. रमेश पर शादी करने का दबाव डाला गया.

‘‘शादी के बाद ही उसे सारी सचाई का पता चल गया था. रानी ने सिर्फ पैसों के लिए उसे फंसाया था. यह उस की और उस के आशिक की सोचीसमझी चाल थी,’’ यह सब कह कर रमेश फूटफूट कर रोने लगा और मेरे घर से चला गया. मैं तो यह सुन कर सन्न सा बैठा रह गया. अपने दोस्त की जिंदगी अपनी आंखों के सामने बरबाद होते हुए देख रहा था. जिसे रमेश प्यार समझ रहा था, वह केवल एक भरमजाल था. उस ने अपनी इज्जत, परिवार, दोस्तों को तो खोया ही, साथ ही उस प्यार से भी इतना बड़ा धोखा खाया.

काश, वह पहले ही समझ जाता, तो इतने सालों से कमाई हुई उस की इज्जत पर इतना बड़ा कलंक तो नहीं लगता. वह इतना समझता कि 60 साल की उम्र प्यार करने के लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए होती है.

Best Short Story : अलविदा काकुल – क्या कागज की नाव सा था उनका रिश्ता?

Best Short Story : पेरिस का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा चार्ल्स डि गाल, चारों तरफ चहलपहल, शोरशराबा, विभिन्न परिधानों में सजीसंवरी युवतियां, तरहतरह के इत्रों से महकता वातावरण… काकुल पेरिस छोड़ कर हमेशाहमेशा के लिए अपने शहर इसलामाबाद वापस जा रही थी. लेकिन अपने वतन, अपने शहर, अपने घर जाने की कोई खुशी उस के चेहरे पर नहीं थी. चुपचाप, गुमसुम, अपने में सिमटी, मेरे किसी सवाल से बचती हुई सी. पर मैं तो कुछ पूछना ही नहीं चाहता था, शायद माहौल ही इस की इजाजत नहीं दे रहा था. हां, काकुल से थोड़ा ऊंचा उठ कर उसे सांत्वना देना चाहता था. शायद उस का अपराधबोध कुछ कम हो. पर मैं ऐसा कर न पाया. बस, ऐसा लगा कि दोनों तरफ भावनाओं का समंदर अपने आरोह पर है. हम दोनों ही कमजोर बांधों से उसे रोकने की कोशिश कर रहे थे.

तभी काकुल की फ्लाइट की घोषणा हुई. वह डबडबाई आंखों से धीरे से हाथ दबा कर चली गई. काकुल चली गई. 2 वर्षों पहले हुई जानपहचान की ऐसी परिणति दोनों को ही स्वीकार नहीं थी. हंगरी के लेखक अर्नेस्ट हेंमिग्वे ने लिखा है कि ‘कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जैसे बरसात के दिनों में रुके हुए पानी में कागज की नावें तैराना.’ ये नावें तैरती तो हैं, पर बहुत दूर तक और बहुत देर तक नहीं. शायद हमारा रिश्ता ऐसी ही एक किश्ती जैसा था.

टैक्निकल ट्रेनिंग के लिए मैं दिल्ली से फ्रांस आया तो यहीं का हो कर रह गया. दिलोदिमाग में कुछ वक्त यह जद्दोजेहद जरूर रही कि अपनी सरकार ने मुझे उच्चशिक्षा के लिए भेजा था. सो, मेरा फर्ज है कि अपने देश लौटूं और देश को कुछ दूं. लेकिन स्वार्थ का पर्वत ज्यादा बड़ा निकला और देशप्रेम छोटा. लिहाजा, यहीं नौकरी कर ली. शुरू में बहुत दिक्कतें आईं. अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने वाले फ्रैंच समुदाय में किसी का भी टिकना बहुत कठिन है. बस, एक जिद थी, एक दीवानगी थी कि इसी समुदाय में अपना लोहा मनवाना है. जैसा लोकप्रिय मैं अपनी जनकपुरी में था, वैसा ही कुछ यहां भी होना चाहिए.

पहली बात यह समझ आई कि अंगरेजी से फ्रैंच समुदाय वैसे ही भड़कता है जैसे लाल रंग से सांड़. सो, मैं ने फ्रैंच भाषा पर मेहनत शुरू की. फ्रैंच समुदाय में अपनी भाषा, अपने देश, अपने भोजन व सुंदरता के लिए ऐसी शिद्दत से चाहत है कि आप अंगरेजी में किसी से पता भी पूछेंगे तो जवाब यही मिलेगा, ‘फ्रांस में हो तो फ्रैंच बोलो.’ पेरिस की तेज रफ्तार जिंदगी को किसी लेखक ने केवल 3 शब्दों में कहा है, ‘काम करना, सोना, यात्रा करना.’ यह बात पहले सुनी थी, यकीन यहीं देख कर आया. मैं कुछकुछ इसी जिंदगी के सांचे में ढल रहा था, तभी काकुल मिली.

काकुल से मिलना भी बस ऐसे था जैसे ‘यों ही कोई मिल गया था सरेराह चलतेचलते.’ हुआ ऐसा कि मैं एक रैस्तरां में बैठा कुछ खापी रहा था और धीमे स्वर में गुलाम अली की गजल ‘चुपकेचुपके रातदिन…’ गुनगुना रहा था. कौफी के 3 गिलास खाली हुए और मेरा गुनगुनाना गाने में तबदील हो गया. मेज पर उंगलियां भी तबले की थाप देने लगी थीं. पूरा आलाप ले कर जैसे ही मैं ‘दोपहर… की धूप में…’ तक पहुंचा, अचानक एक लड़की मेरे सामने आ कर झटके से बैठी और पूछा, ‘वू जेत पाकी?’

‘नो, आई एम इंडियन.’ ‘आप बहुत अच्छा गाते हैं, पर इस रैस्तरां को अपना बाथरूम तो मत समझिए’.

‘ओह, माफ कीजिएगा,’ मैं बुरी तरह झेंप गया.

काकुल से दोस्ती हो गई, रोज मिलनेजुलने का सिलसिला शुरू हुआ. वह इसलामाबाद, पाकिस्तान से थी. पिताजी का अपना व्यापार था. जब उन्होंने काकुल की अम्मी को तलाक दिया तो वह नाराज हो कर पेरिस में अपनी आंटी के पास आ गई और तब से यहीं थी. वह एक होटल में रिसैप्शनिस्ट का काम देखती थी. ज्यादातर सप्ताहांत, मैं काकुल के साथ ही बिताने लगा. वह बहुत से सवाल पूछती, जैसे ‘आप जिंदगी के बारे में क्या सोचते हैं?’

‘हम बचपन में सांपसीढ़ी खेल खेलते थे, मेरे खयाल से जिंदगी भी बिलकुल वैसी है…कहां सीढ़ी है और कहां सांप, यही इस जीवन का रहस्य है और यही रोमांच है,’ मैं ने अपना फलसफा बताया. ‘आप के इस खेल में मैं क्या हूं, सांप या सीढ़ी?’ बड़ी सादगी से काकुल ने पूछा.

‘मैं ने कहा न, यही तो रहस्य है.’ मैं ने लोगों को व्यायाम सिखाना शुरू किया. मेरा काम चल निकला. मुझे यश मिलना शुरू हुआ. मैं ज्यादा व्यस्त होता गया. काकुल से मिलना बस सप्ताहांत पर ही हो पाता था.

कम मिलने की वजह से हम आपस में ज्यादा नजदीक हुए. एक इतवार को स्टीमर पर सैर करते हुए काकुल ने कहा, ‘मैं आप को आई एल कहा करूं?’

‘भई, यह ‘आई एल’ क्या बला है?’ मैं ने अचकचा कर पूछा. ‘आई एल, यानी इमरती लाल, इमरती हमें बहुत पसंद है. बस यों जानिए, हमारी जान है, और आप भी…’ सांझ के आकाश की सारी लालिमा काकुल के कपोलों में समा गई थी.

‘एक बात पूछूं, क्या पापामम्मी को काकुल मंजूर होगी?’ उस ने पूछा. मैं ने पहली बार गौर किया कि मेरे पापामम्मी को अंकल, आंटी कहना वह कभी का छोड़ चुकी है. मुझे भी नाम से बुलाए उसे शायद अरसा हो गया था.

‘काकुल, अगर बेटे को मंजूर, तो मम्मीपापा को भी मंजूर,’ मैं ने जवाब दिया. काकुल ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया और अपनी आंखें बंद कर लीं. शायद बंद आंखों से वह एक सजीसंवरी दुलहन और उस का दूल्हा देख रही थी. इस से पहले उस ने कभी मुझ से शादी की इच्छा जाहिर नहीं की थी. बस, ऐसा लगा, जैसे काकुल दबेपांव चुपके से बिना दरवाजा खटखटाए मेरे घर में दाखिल हो गई हो.

मैं ज्यादा व्यस्त होता गया, सुबह नौकरी और शाम को एक ट्रेनिंग क्लास. पर दिन में काकुल से फोन पर बात जरूर होती. अब मैं आने वाले दिनों के बारे में ज्यादा गंभीरता से सोचता कि इस रिश्ते के बारे में मेरे पापामम्मी और उस के पापा, कैसी प्रतिक्रया जाहिर करेंगे. हम एकदूसरे से निभा तो पाएंगे? कहीं यह प्रयोग असफल तो नहीं होगा? ऐसे ढेर सारे सवाल मुझे घेरे रहते. एक दिन काकुल ने फोन कर के बताया कि उस के अब्बा के दोस्त का बेटा जावेद, कुछ दिनों के लिए पेरिस आया हुआ है. हम कुछ दिनों के लिए आपस में मिल नहीं पाएंगे. इस का उसे बहुत रंज रहेगा, ऐसा उस ने कहा.

धीरेधीरे काकुल ने फोन करना कम कर दिया. कभी मैं फोन करता तो काकुल से बात कम होती, वह जावेदपुराण ज्यादा बांच रही होती. जैसे, जावेद बहुत रईस है, कई देशों में उस का कारोबार फैला हुआ है. अगर जावेद को बैंक से पैसे निकालने हों तो उसे बैंक जाने की कोई जरूरत नहीं. मैनेजर उसे पैसे देने आता है. उस की सैक्रेटरी बहुत खूबसूरत है. उस का इसलामाबाद में खूब रसूख है. वह कई सियासी पार्टियों को चंदा देता है. जावेद का जिस से भी निकाह होगा, उस का समय ही अच्छा होगा. मुझे बहुत हैरानी हुई काकुल को जावेद के रंग में रंगी देख कर. मैं ने फोन करना बंद कर दिया.

जैसे बर्फ का टुकड़ा धीरेधीरे पिघल कर पानी में तबदील हो जाता है, उसी तरह मेरा और काकुल का रिश्ता भी धीरेधीरे अपनी गरमी खो चुका था. रिश्ते की तपिश एकदूसरे के लिए प्यार, एक घर बसाने का सपना, एकदूसरे को खूब सारी खुशियां देने का अरमान, सब खत्म हो चुका था. इस अग्निकुंड में अंतिम आहुति तब पड़ी जब काकुल ने फोन पर बताया कि उस के अब्बा उस का और जावेद का निकाह करना चाहते हैं. मैं ने मुबारकबाद दी और रिसीवर रख दिया.

कई महीने गुजर गए. शुरूशुरू में काकुल की बहुत याद आती थी, फिर धीरेधीरे उस के बिना रहने की आदत पड़ गई. एक दिन वह अचानक मेरे अपार्टमैंट में आई. गुमसुम, उदास, कहीं दूर कुछ तलाशती सी आंखें, उलझे हुए बाल, पीली होती हुई रंगत…मैं उसे कहीं और देखता तो शायद पहचान न पाता. उसे बैठाया, फ्रिज से एक कोल्ड ड्रिंक निकाल कर, फिर जावेद और उस के बारे में पूछा.

‘जावेद एक धोखेबाज इंसान था, वह दिवालिया था और उस ने आस्ट्रेलिया में निकाह भी कर रखा था. समय रहते अब्बा को पता चल गया और मैं इस जिल्लत से बच गई,’ काकुल ने जवाब दिया. ‘ओह,’ मैं ने धीमे से सहानुभूतिवश गरदन हिलाई. चंद क्षणों के बाद सहज भाव से पूछा, ‘‘कैसे आना हुआ?’’

‘मैं आज शाम की फ्लाइट से वापस इसलामाबाद जा रही हूं. मुझे विदा करने एअरपोर्ट पर आप आ पाएंगे तो बहुत अच्छा लगेगा.’ ‘मैं जरूर आऊंगा.’

शायद वह चाहती थी कि मैं उसे रोक लूं. मेरे दिल के किसी कोने में कहीं वह अब भी मौजूद थी. मैं ने खुद अपनेआप को टटोला, अपनेआप से पूछा तो जवाब पाया कि हम 2 नदी के किनारों की तरह हैं, जिन पर कोई पुल नहीं है. अब कुछ ऐसा बाकी नहीं है जिसे जिंदा रखने की कोशिश की जाए. अलविदा…काकुल…अलविदा…

Hindi Story : सौतेले लोग – कौशल के जीवन में कैसा था सौतेले रिश्ते का प्रवेश

Hindi Story : कौशल के जीवन में जैसे कोई सुनामी आ गई थी. वे अपने दफ्तर के दौरे पर थे. पत्नी अंकिता बच्चों को स्कूल भेज कर घर की साफसफाई कर रही थी. आज जाने उसे क्या सूझा था कि उस ने घर को धो डालने का प्लान बना लिया था. जैसे ही उस ने पाइप लगा कर कमरे में पानी डाला, अचानक बिजली आ गई. उसे आहट भी नहीं हुई होगी कि बिजली उस की मौत का पैगाम ले कर आई है. कमरे में कूलर लगा था और उसी के करैंट में वह बिलकुल स्याह हो चुकी थी. पूरा घर अंदर से बंद था. लगभग 3 बजे जब दोनों बच्चे स्कूल से आए और दरवाजा खोलने की कोशिश की तो पता ही नहीं चला अंदर क्या हुआ है. अड़ोसीपड़ोसी इकट्ठे हो गए. दरवाजा खुला तो कौशल को फोन से सारी बातें बताई गईं. पुलिस बुलाई गई. ससुराल से ले कर स्वजनों तक खबर करैंट की भांति दौड़ गई.

2 मासूम बच्चे 3 साल की बेटी और 5 साल का बेटा. सभी सहमे और डरे हुए थे. नियति को तो जो करना था उस ने अपना खेल, खेल लिया था. कौशल उजड़ गए थे. न बच्चे संभलते, न गृहस्थी, न नौकरी. दोनों बच्चों को उन्होंने ननिहाल भेज दिया था. तब उन्हें अपनी मां की बड़ी याद आई थी. एक वर्ष पहले ही उन की मौत हुई थी. वे होतीं तो बच्चे आज बिना घरघाट के नहीं रहते. कौशल का सबकुछ लुट चुका था. दिमाग और दिल से भी वे डर गए थे. पत्नी का नीलावर्ण उन की आंखों से दूर नहीं हो पा रहा था. कौशल की नजर अब अखबारों में छपने वाले वैवाहिक विज्ञापनों और मैरिज पोर्टल्स पर भी जाती पर उन की नैया को दोबारा कौन पार उतारेगा, कहीं आस न बंधती. ड्यूटी पर जाते तो दोनों बच्चों का मासूम चेहरा याद आता. पत्नी का स्नेह याद आता. सोचते कि अब जाने कैसे होंगे दोनों.

वे जब भी ससुराल जाते, उन्हें दोनों बच्चों के रूखे बाल दिखाई देते और उन के भोले प्रश्न उन्हें अंदर से कुरेद देते, पापा, ‘आप हम लोगों के साथ क्यों नहीं रहते? मम्मी रहतीं तो हम लोग आप के पास ही होते न.’ उन्हें बच्चों से अलग रहना इसलिए भी नहीं भाता कि ये उन के अक्षरज्ञान का समय था. मां नहीं है और पिता भी इतनी दूर. इस से वे तड़प जाते. हजार कोशिशों के बाद जो रिश्ते मिलते, उन में संदेह ज्यादा जबकि संभावना कम दिखाई देती. एक टीचर उन से ब्याह के लिए राजी थी. उस का नाम था कला. उस से कौशल कुमार ने शादी से संबंधित बातें कीं. वह बहुत ही व्यस्त टीचर थी. स्कूल में पढ़ाने के बाद भी बच्चों के 3 बैच उस से ट्यूशन पढ़ने आते. उस के लिए शादी सामान्य सी बात थी. क्या हुआ, आप के 2 बच्चे हैं तो वे भी मेरे साथ मेरे ही स्कूल में पढ़ लेंगे. मैं शादी के लिए राजी हूं, पर नौकरी छोड़ पाना मेरे लिए संभव नहीं होगा.

कौशल कला की नौकरी छोड़ने वाली बात को दिल से लगा बैठे थे. बच्चों के लिए मां ढूंढ़ रहे थे. पर मां कहां मिली. वह तो मास्टरनी ही होगी. टुकुरटुकुर बेचारे बिना मुंह के बच्चे देखते रह जाएंगे. ‘मम्मा खीर बनाओ,’ बेटा तो मम्मी से पीले चावल की फरमाइश करता था. बच्चे नहीं खाते तो पत्नी सुबह ही पुआपूरी बना कर खिला देती थी. अब सिर्फ उंगली पकड़ कर तीनों भागते ही नजर आएंगे. उन की आंखों के कोर भीग गए.

कौशल की चिंता जायज थी. एक जीवन खुशियों से भरा था, दूसरा डरावना महसूस हो रहा था. 2 नादान मासूम बच्चे और हजार प्रश्नों से घिरे कौशल. किसी ने उन्हें दूसरी लड़की का पता भी बताया पर मालूम हुआ उस के तो विवाहपूर्व ही प्रेमप्रसंग काफी चर्चे में हैं. वह भी कौशल से ब्याह करना चाहती थी. इस विषय पर पूछे जाने पर उस ने बड़ी बेबाकी से कहा, इतने दिनों तक ब्याह नहीं हुआ तो थोड़ाबहुत तो चलता है और आप कौन सा मुझ से पहली शादी करने वाले हैं, आप के साथ मुझे आप के बच्चों को भी तो संभालना पड़ेगा. कौशल उस की बातों से दुखी हो गए. वे जानबूझ कर विवाह के लिए कैसे हां करते. उस के चरित्र का प्रभाव बच्चों पर भी पड़ेगा. इतने बोल्ड तो कौशल नहीं हो पाते. उन्हें लगता वे मर जाते तो पत्नी कुछ भी कर के बच्चों को पाल लेती पर वे अकेले 2 बच्चों की नैया पार नहीं लगा सकते. वे अपने दोस्तों के घर भी जाते तो उन के लिए सिर्फ संवेदना दी जाती.

उन्हें तो जीवन चाहिए था. एक खुशगवार घर का, एक मुसकराती पत्नी का, 2 हंसतेखेलते बच्चों के विकास का. पता नहीं वे कुछ समझ नहीं पा रहे थे. उन्हें अपने विधुर जीवन पर तरस आता. अंकिता और दोनों बच्चों की तसवीर ले कर वे घंटों रो लेते पर जीवन का हल नहीं दिखाई पड़ता. कईकई दिनों तक वे छुट्टियां ले कर बिना खाए घर में ही रह जाते. न किसी से मिलते न बातें करते. अखबार के विज्ञापन में पत्नी ढूंढ़ते. इसी तलाश में वे गरीब से गरीब घर की लड़कियों को भी देख आए थे. विधवा और छोड़ दी गई महिलाओं के साथ भी वे गठबंधन को राजी थे पर कुछ न कुछ फेरे सामने आते ही गए. विधवा स्त्री भी 2 बच्चों के पिता के नाम पर तैयार नहीं हुई थी. एक महिला तो कौशल से पूछ बैठी थी, पत्नी दुर्घटना में मरी या मारा था. कौशल टूट चुके थे. हालांकि वे बच्चों के लिए सौतेली मां नहीं लाना चाहते थे. यह उन के जीवन की मजबूरी थी. उन्होंने मन को कड़ा किया और एक विवाह प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी. जीवन की मजबूरियों ने उन्हें बहुत मजबूर किया था. इस बार अनामिका से विवाह की सहमति उन्होंने दे दी.

कौशल एक अच्छे इंसान थे. अनामिका उन के सामने दुबली सी आम लड़की थी. उस ने उन की मजबूरियों को सुना था, जाना था और अपनी सहमति दे दी थी. विवाह हो गया. अनामिका ने गृहस्थी संभाल ली. सभी कहते थे, ‘सौतेली मां बच्चों का खयाल नहीं रखेगी, अपनी ही सुखसुविधाओं का खयाल रखेगी.’ वर्षों की धारणा को अनामिका ने मिट्टी में मिला दिया था. बेटी को उस ने कंठहार बना लिया था. बेटे को भी वह पूरी देखरेख में रखती. कौशल का अब समय अच्छा था कि उन्हें अनामिका जैसी पत्नी मिली थी. खानापीना, झाड़ूबुहारू, बरतनकपड़े और आखिर में पति के पांव दबा कर सोना उस की आदत थी. कौशल के घर वाले दबाव बनाते कि एक कामवाली बाई को क्यों नहीं रखते. बच्चों के लिए ट्यूटर क्यों नहीं रखते. पत्नी को मशीन क्यों बनाया है. कईर् बार उन्होंने अनामिका से कहा पर उस ने कहा कि वह सारे दिन घर में क्या करेगी.

वे कहते थे कि घर अनामिका का अधिकार क्षेत्र है, वही जाने कैसे घर चलाना है. अनामिका भी तुरंत कौशल के पक्ष में खड़ी हो जाती. मुझे सारे काम करने पसंद हैं. मैं कर पाती हूं, फिर क्या जरूरत है इन सब की. धीरेधीरे बच्चे पढ़ने लगे. नौकरी में आ गए. अनामिका वैसे ही सेवाभाव से कार्यरत रही. पुरानी मान्यताएं और परंपराएं उस के सामने गलत साबित होती गईं. समझ में नहीं आता किस के कैसे रूप हैं. घर वालों को लगता कौशल ही सौतेला व्यवहार कर रहे हैं. पर उन्हें खाना मिलता है. बच्चे खुशीखुशी पढ़ाई कर रहे हैं. जब सबकुछ दिखाई पड़ रहा है तो कोई चाहे जैसे अपनी गृहस्थी चलाए. सब के रिश्ते तो सौतेले ही हैं. बच्चे मां को आदर देना सीख गए थे. कोई काम बिना बताए नहीं करते.

दूसरों को गृहस्थी में टांग अड़ाने की न तो गुंजाइश थी, न जरूरत. इसलिए सभी मन मसोस कर चुप रहते. तभी पड़ोस में मदन भैया की अचानक मौत हो गई. सुना था कि उन्होंने अपनी पत्नी के मरने के बाद दूसरा विवाह किया था जबकि उन के 4 बच्चे थे. पर मदन भैया की दूसरी पत्नी बीमारी का ऐसा स्वांग रचती कि बेचारे मदन भैया ही खाना बना कर पत्नी व बच्चों को खिलाते.

पैसों के लिए भी तकरार होती. इसी बीच मदन भैया को हार्टअटैक हो गया. अब पत्नी सौतेले बच्चों से बातें भी नहीं करती. कैसे चलेगी गृहस्थी उन पांचों की. मदन भैया के क्रियाकर्म के बाद सौतेले लोग क्या कहेंगे, समझ में नहीं आया पर अनामिका की सेवा, उस की कर्तव्यनिष्ठा ने सारे रिश्तों को मात दे दी थी.

अनामिका से जब मुलाकात हुई तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘दीदी, हर कोई अपनाअपना वर्तमान बनाता है. क्या फर्क पड़ता है अगर मैं सुबह से शाम तक खटती हूं. ऐसा तो हर मां करती है. मेरी मां भी किया करती थीं. फिर मेरा तो परिवार ही छोटा है.’ तब लगने लगा कि कौशल मेरी नजरों में, पत्नी के साथ जो सौतेला व्यवहार करता है वह सौतेला नहीं, बल्कि मोहब्बत से भरा अपनापन है. मैं अपने नजरिए से उन का अपनापन नहीं जान पाई थी. आखिर, मैं भी कितना जानती थी अनामिका और कौशल को. पर मुझे उन के बीच सौतेलापन दिखाई पड़ता था. पर अब लगा, सौतेले लोगों को समझ पाना इतना भी आसान नहीं. सचमुच जीवन जीना एक कला है, सभी इसे समझ नहीं पाते.

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