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Hindi Kahani : देवर – मंजू के सामने कैसे आई उस के देवर की असलियत

Hindi Kahani : प्रदीप को पति के रूप में पा कर मंजू के सारे सपने चूरचूर हो गए. प्रदीप का रंग सांवला और कद नाटा था. वह मंजू से उम्र में भी काफी बड़ा था. मंजू ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, मगर थी बहुत खूबसूरत. उस ने खूबसूरत फिल्मी हीरो जैसे पति की कल्पना की थी.

प्रदीप सीधासादा और नेक इनसान था. वह मंजू से बहुत प्यार करता था और उसे खुश करने के लिए अच्छेअच्छे तोहफे लाता था. मगर मंजू मुंह बिचका कर तोहफे एक ओर रख देती. वह हमेशा तनाव में रहती. उसे पति के साथ घूमनेफिरने में भी शर्म महसूस होती. मंजू तो अपने देवर संदीप पर फिदा थी. पहली नजर में ही वह उस की दीवानी हो गई थी.

संदीप मंजू का हमउम्र भी था और खूबसूरत भी. मंजू को लगा कि उस के सपनों का राजकुमार तो संदीप ही है. प्रदीप की नईनई नौकरी थी. उसे बहुत कम फुरसत मिलती थी. अकसर वह घर से बाहर ही रहता. ऐसे में मंजू को देवर का साथ बेहद भाता. वह उस के साथ खूब हंसीमजाक करती.

संदीप को रिझाने के लिए मंजू उस के इर्दगिर्द मंडराती रहती. जानबूझ कर वह साड़ी का पल्लू सरका कर रखती. उस के गोरे खूबसूरत बदन को संदीप जब चोर निगाहों से घूरता तो मंजू के दिल में शहनाइयां बज उठतीं. वह चाहती कि संदीप उस के साथ छेड़छाड़ करे मगर लोकलाज के डर और घबराहट के चलते संदीप ऐसा कुछ नहीं कर पाता था.

संदीप की तरफ से कोई पहल न होते देख मंजू उस के और भी करीब आने लगी. वह उस का खूब खयाल रखती. बातोंबातों में वह संदीप को छेड़ने लगती. कभी उस के बालों में हाथ फिराती तो कभी उस के बदन को सहलाती. कभी चिकोटी काट कर वह खिलखिलाने लगती तो कभी उस के हाथों को अपने सीने पर रख कर कहती, ‘‘देवरजी, देखो मेरा दिल कैसे धकधक कर रहा है…’’ जवान औैर खूबसूरत भाभी की मोहक अदाओं से संदीप के मन के तार झनझना उठते. उस के तनबदन में आग सी लग जाती. वह भला कब तक खुद को रोके रखता. धीरेधीरे वह भी खुलने लगा.

देवरभाभी एकदूसरे से चिपके रहने लगे. दोनों खूब हंसीठिठोली करते व एकदूसरे की चुहलबाजियों से खूब खुश होते. अपने हाथों से एकदूसरे को खाना खिलाते. साथसाथ घूमने जाते. कभी पार्क में समय बिताते तो कभी सिनेमा देखने चले जाते. एकदूसरे का साथ उन्हें अपार सुख से भर देता. दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगीं. संदीप के प्यार से मंजू को बेहद खुशी मिलती. हंसतीखिलखिलाती मंजू को संदीप बांहों में भर कर चूम लेता तो कभी गोद में उठा लेता. कभी उस के सीने पर सिर रख कर संदीप कहता, ‘‘इस दिल में अपने लिए जगह ढूंढ़ रहा हूं. मिलेगी क्या?’’

‘‘चलो देवरजी, फिल्म देखने चलते हैं,’’ एक दिन मंजू बोली. ‘‘हां भाभी, चलो. अजंता टौकीज में नई फिल्म लगी है,’’ संदीप खुश हो कर बोला और कपड़े बदलने के लिए अपने कमरे में चला गया.

मंजू कपड़े बदलने के बाद आईने के सामने खड़ी हो कर बाल संवारने लगी. अपना चेहरा देख कर वह खुद से ही शरमा गई. बनठन कर जब वह निकली तो संदीप उसे देखता ही रह गया. ‘‘तुम इस तरह क्या देख रहे हो देवरजी?’’ तभी मंजू इठलाते हुए हंस कर बोली.

अचानक संदीप ने मंजू को पीछे से बांहों में भर लिया और उस के कंधे को चूम कर बोला, ‘‘बहुत खूबसूरत लग रही हो, भाभी. काश, हमारे बीच यह रिश्ता न होता तो कितना अच्छा होता?’’ ‘‘अच्छा, तो तुम क्या करते?’’ मंजू शरारत से बोली.

‘‘मैं झटपट शादी कर लेता,’’ संदीप ने कहा. ‘‘धत…’’ मंजू शरमा गई. लेकिन उस के होंठों पर मादक मुसकान बिखर गई. देवर का प्यार जताना उसे बेहद अच्छा लगा.

खैर, वे दोनों फिल्म देखने चल पड़े. फिल्म देख कर जब वे बाहर निकले तो अंधेरा हो चुका था. वे अपनी ही धुन में बातें करते हुए घर लौट पड़े. उन्हें क्या पता था कि 2 बदमाश उन का पीछा कर रहे हैं.

रास्ता सुनसान होते ही बदमाशों ने उन्हें घेर लिया और बदतमीजी करने लगे. यह देख कर संदीप डर के मारे कांपने लगा. ‘‘जान प्यारी है तो तू भाग जा यहां से वरना यह चाकू पेट में उतार दूंगा,’’

एक बदमाश दांत पीसता हुआ संदीप के आगे गुर्राया. ‘‘मुझे मत मारो. मैं मरना नहीं चाहता,’’ संदीप गिड़गिड़ाने लगा.

‘‘जा, तुझे छोड़ दिया. अब फूट ले यहां से वरना…’’ ‘‘मुझे छोड़ कर मत जाओ संदीप. मुझे बचा लो…’’ तभी मंजू घबराए लहजे में बोली.

लेकिन संदीप ने जैसे कुछ सुना ही नहीं. वह वहां से भाग खड़ा हुआ. सारे बदमाश हो… हो… कर हंसने लगे. मंजू उन की कैद से छूटने के लिए छटपटा रही थी पर उस का विरोध काम नहीं आ रहा था.

बदमाश मंजू को अपने चंगुल में देख उसे छेड़ते हुए जबरदस्ती खींचने लगे. वे उस के कपड़े उतारने की फिराक में थे. ‘‘बचाओ…बचाओ…’’ मंजू चीखने लगी.

‘‘चीखो मत मेरी रानी, गला खराब हो जाएगा. तुम्हें बचाने वाला यहां कोई नहीं है. तुम्हें हमारी प्यास बुझानी होगी,’’ एक बदमाश बोला. ‘‘हाय, कितनी सुंदर हो? मजा आ जाएगा. तुम्हें पाने के लिए हम कब से तड़प रहे थे?’’ दूसरे बदमाश ने हंसते हुए कहा.

बदमाशों ने मंजू का मुंह दबोच लिया और उसे घसीटते हुए ले जाने लगे. मंजू की घुटीघुटी चीख निकल रही

थी. वह बेबस हो गई थी. इत्तिफाक से प्रदीप अपने दोस्त अजय के साथ उसी रास्ते से गुजर रहा था. चीख सुन कर उस के कान खड़़े हो गए.

‘‘यह तो मंजू की आवाज लगती है. जल्दी चलो,’’ प्रदीप अपने दोस्त अजय से बोला. दोनों तेजी से घटनास्थल पर पहुंचे. अजय ने टौर्च जलाई तो बदमाश रोशनी में नहा गए. बदमाश मंजू के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहे थे. मंजू लाचार हिरनी सी छटपटा रही थी.

प्रदीप और अजय फौरन बदमाशों पर टूट पड़े. उन दोनों ने हिम्मत दिखाते हुए उन की पिटाई करनी शुरू कर दी. मामला बिगड़ता देख बदमाश भाग खडे़ हुए, लेकिन जातेजाते उन्होंने प्रदीप को जख्मी कर दिया. मंजू ने देखा कि प्रदीप घायल हो गया है. वह जैसेतैसे खड़ी हुई और सीने से लग कर फूटफूट कर रो पड़ी. उस ने अपने आंसुओं से प्रदीप के सीने को तर कर दिया.

‘‘चलो, घर चलें,’’ प्रदीप ने मंजू को सहारा दिया. उन्हें घर पहुंचा कर अजय वापस चला गया. मंजू अभी भी घबराई हुई थी. पर धीरेधीरे वह ठीक हुई.

‘‘यह क्या… आप के हाथ से तो खून बह रहा है. मैं पट्टी बांध देती हूं,’’ प्रदीप का जख्म देख कर मंजू ने कहा. ‘‘मामूली सा जख्म है, जल्दी ठीक हो जाएगा,’’ प्रदीप प्यार से मंजू को देखते हुए बोला.

मंजू के दिल में पति का प्यार बस चुका था. प्रदीप से नजर मिलते ही वह शरमा गई. वह मासूम लग रही थी. उस का प्यार देख कर प्रदीप की आंखें छलछला आईं. बीवी का सच्चा प्यार पा कर प्रदीप के वीरान दिल में हरियाली छा गई. वह मंजू को अपनी बांहों में भरने के लिए मचल उठा.

इतने में मंजू का देवर संदीप सामने आ गया. वह अभी भी घबराया हुआ था. बड़े भाई के वहां से जाने के बाद संदीप ने अपनी भाभी का हालचाल पूछना चाहा तो मंजू ने उसे दूर रहने का इशारा किया. ‘‘तुम ने तो मुझे बदमाशों के हवाले कर ही दिया था. अगर मेरे पति समय पर न पहुंचते तो मैं लुट ही गई थी. कैसे देवर हो तुम?’’ जब मंजू ने कहा तो संदीप का सिर शर्म से झुक गया.

इस एक घटना ने मंजू की आंखें खोल दी थीं. अब उसे अपना पति ही सच्चा हमदर्द लग रहा था. वह अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया.

Best Hindi Story : लाइकेन – काम वाली गीता की अनोखी कहानी

Best Hindi Story : पटना से दिल्ली की द्वारका कालोनी के इस घर में शिफ्ट हुए 8 दिन हो गए थे. घर पूरी तरह सैट हो कर चमक रहा था. लेकिन मैं अस्तव्यस्त, बेरौनक हुई जा रही थी. वजह वही जो हर तबादले के बाद झेलती आई हूं. अच्छी कामवाली मिल नहीं पा रही थी. कुछ मुझे पसंद नहीं आ रही थीं, कुछ को मेरा ‘एक घर एक बाई’ वाला फार्मूला रास नहीं आ रहा था.

‘‘नहीं जी, एक घर से कैसे पेट भरेगा? 5 जगह काम करती हूं तो

5 जगह चायनाश्ता, तीजत्योहार में कपड़े, गिफ्ट वगैरह मिलते हैं.’’

‘हुंह, एक घर के काम का समय तो इन्हें एक घर से दूसरे घर जाने में ही निकल जाता है, यह उन्हें नहीं दिखता. ऊपर से 5 जगह दौड़ने में पैर घिसते हैं, थकान होती है, 5 जगह बातें सुननी पड़ती हैं, वह नहीं,’ कुढ़ती हुई मैं बुदबुदाई.

शादी के बाद जब मैं आई थी तो इन बाइयों ने उस वक्त भी मेरी नाक में दम कर रखा था. एक तो उम्र कम, फिर साफसफाई की बीमारी. वे हम से हैंडल ही नहीं हो पातीं.

‘‘आज वहां जल्दी जाना है. कल आप के यहां देर से आऊंगी. उन के यहां सामान ज्यादा है. बस, सामनेसामने पोंछा लगाना पड़ता है. आप के खाली घर में तो सफाई करने में ही थक जाती हूं. आप बरतन देखदेख कर जमवाती हैं. अरोड़ा मैम तो सोई रहती हैं, मैं सारा काम निबटा आती हूं.’’

सुनसुन कर मैं परेशान हो जाती. मैं तो अरोड़ा मैडम नहीं बन सकती. उस दिन उन के यहां गई थी. किचन का सिंक सड़ांध मार रहा था. जिस कप में चाय लाई, वह भी चिपचिपा था. मुझ से तो चाय पी ही नहीं गई.

फिर उन का भेदिये जैसा सवाल, ‘जमुना आप के यहां बरतन जमाती है? कपड़े मशीन में डालती है? शाम को किचन व हौल में पोंछा लगाती है?’ ‘हां’ बोलने पर जमुना शाम को मुंह फुलाए घुसती, ‘आप ने अरोड़ा मैडम को क्या बतलाया, अब वे भी सब काम करवाएंगी. अगर गलती से ना बोलो तब वे मैडम नाराज, ‘आप पैसा ज्यादा दे कर यहां का रेट बिगाड़ रही हैं.’

थक कर मैं ने एक अलग कामवाली रखने का निर्णय लिया. इस के लिए भले ही मुझे दोगुना या तीनगुना पैसे देने पड़े. अपने दूसरे खर्चों में मैं कटौती कर लूंगी.

इतवार की सुबह थी. सब अलसाए से सो रहे थे. मैं झाड़ू लगा रही थी कि तभी दरवाजे की घंटी बजी.

‘‘बिट्टू, दरवाजा खोलो, दूध वाला होगा.’’

साहबजादे कुनमुनाते हुए उठे और दिन होता तो मजाल था वह उठ जाए. वह तो अभी काम के ओवरलोड की वजह से मैं फुलचार्ज रहती थी. कभी भी किसी पर फट सकती थी, इसी कारण सब डरे रहते.

‘‘मम्मा, अनूप अंकल आए हैं.’’

अनूप, इन का ड्राइवर. आज इस वक्त, कहीं इन्हें आज भी तो नहीं जाना है. मेरा नाश्ता भी नहीं बना. इसी उधेड़बुन में बाहर आई.

‘‘नमस्ते मैडम, यह गीता है. काम ढूंढ़ रही है. बिहार की ही है, पास की ही बस्ती में रहती है.’’

अनूप ने ‘बिहार की ही है’ पर जोर देते हुए कहा. जैसे बिहार का नाम सुनते ही मैं किसी को भी सिरआंखों पर बैठा लूंगी.

‘‘नमस्ते आंटी,’’ आवाज सुन कर मैं ने उस की तरफ देखा, लंबी, छरहरी, सांवली सी, बड़ीबड़ी आंखों में हलका काजल, संवरी भौंहें, करीने से कढ़े बाल, सुंदर व कीमती सूट पहने 25-26 साल की लड़की मुसकराती हुई खड़ी थी.

‘यह कामवाली है,’ मैं ने मन ही मन सोचा और तब मुझे ध्यान आया कि मैं एक फटीचर नाइटी में अब तक हाथ में झाड़ू लिए खड़ी थी.

हड़बड़ा कर मैं ने झाड़ू नीचे पटकी. शुक्र है कि अनूप ने मुझ से पहले बात कर ली, नहीं तो ये तो मुझे बाई ही समझ बैठती.

अनूप को विदा कर गीता को भीतर बुलाया. रसोई में चाय उबल रही थी. उस के लिए भी थोड़ा पानी डाला. एक कप इन्हें कमरे में दे आई, 2 कप चाय उसे लाने को कह मैं सोफे पर बैठ गई.

‘‘एक ही घर में काम करना होगा,’’ मैं ने अपनी शर्त सुनाई.

‘‘हां जी, मैं तो एक घर से ज्यादा कर भी नहीं सकती. अपने घर का भी तो काम रहता है. वो तो क्या है कि  बाहर निकलने से थोड़ा मन भी बदल जाता है और थोड़ी कमाई भी हो जाती है,’’ बिलकुल दिल्ली वाले अंदाज में उस ने जवाब दिया.

‘‘शादी हो गई?’’

‘‘और क्या, 3 बच्चे हैं.’’

‘‘क्या, 3 बच्चे! कब हुई शादी, कितनी उम्र है तुम्हारी?’’

‘‘आंटी, हमारे यहां बेटी को 16 साल से ज्यादा कोई नहीं रखता. बहुत शिकायत होती है. मेरी शादी 15 वर्ष में हुई. 17 में गौना. 18 में बेटी. 2-2 साल के अंदर

2 और बेटे. 10 साल की बेटी है मेरी. यहां शहरों में 30-30 साल तक सब लड़की को घर में बैठाए रखते हैं,’’ कहती हुई उस ने ऐसा मुंह बनाया जैसे किसी ने उस के मुंह में पूरा नीबू निचोड़ दिया हो.

संयोग से उसी वक्त मेरी 17 वर्षीय बेटी धीगड़ी सी कानों में ईयर फोन लगाए गुनगुनाती हुई बाथरूम से बाहर निकली. उसे अभी इस वक्त गीता के सामने हाफपैंट और टौप में देख कर मैं ही बुरी तरह सकपका गई. शीघ्रता से बात खत्म कर के मैं ने उसे काम समझाया और बाथरूम में जा घुसी. इस लड़की की सजधज ने तो हमारे अंदर भी एक हीनभावना भर दी. पता नहीं काम कैसे करवाऊंगी.

जितनी उत्कृष्ट थी उस की साजसज्जा उतना ही उत्कृष्ट था उस का पहनावा. गजब की पसंद थी उस की. साड़ी हो या सलवारकमीज, एक बार नजर ठहर ही जाती थी. घर का पूरा काम करने के बाद भी मजाल है कि उस की साड़ी की एक भी मांग इधरउधर हो जाए. उस के कारण मुझे अपनेआप को बहुत बदलना पड़ा.

बच्चे मजाक भी करते, ‘‘पापा 26 साल में मां की आदत नहीं सुधार पाए लेकिन गीता ने 36 दिनों में ही उन्हें सुधार दिया, जय हो गीता की.’’

गीता को काम करते हुए 2 महीने ही हुए थे. देवरदेवरानी बच्चों के साथ आए. सुबहसुबह हौल में पूरा परिवार इकट्ठा धमाचौकड़ी मचा रहा था, तभी गीता दाखिल हुई. देवर सोफे पर लेटे थे, हड़बड़ा कर उठ बैठे. मैं आंखों से उन्हें मना कर रही थी तब तक उन्होंने हाथ जोड़ कर उसे नमस्ते कर दिया. सब अपनी हंसी दबाए बैठे रहे. बाद में तो बच्चों ने जम कर उन की खिंचाई की.

ऐसे तो गीता पर दोनों वक्त खाना बनाने के साथसाथ सुबह नाश्ते की भी जिम्मेदारी थी, लेकिन इन्हें साढ़े 8 बजे निकलना होता और दीपू की स्कूल बस तो 8 बजे ही आ जाती थी. इसी कारण सुबह मुझे रसोई में घुसना पड़ता. गीता ने सब्जी काट कर मुझे पकड़ाई और आटा निकालने गई तब तक मैं ने एकतरफ सब्जी छौंकी, दूसरी तरफ चाय चढ़ा दी.

‘‘आज फिर उस ने मारपीट की,’’ गीता बोली.

‘‘बच्चों ने?’’ मैं ने सहजता से पूछा.

‘‘नहीं, मेरे आदमी ने, पुलिस पकड़ कर ले गई.’’

‘‘क्या, अब क्या होगा?’’ मेरे स्वर में चिेंता थी.

‘‘होगा क्या, मालिक जाएंगे छुड़ाने. साल में 3 बार का यही धंधा है.’’ गूंधे आटे को मुट्ठी से और चोट दे कर मुलायम करती हुई उस ने बेफिक्री से कहा.

‘‘मालिक कौन?’’

‘‘वही, जिन के यहां रहती हूं.’’

‘‘किराए में रहती हो?’’

‘‘हां, यही समझ लीजिए. उन के दोनों बच्चों की देखभाल, घर का काम, खानाकपड़ा सब करती हूं.’’

‘‘तब उन की बीवी क्या करती है?’’ मैं ने चिढ़ते हुए पूछा.

‘‘नहीं है. 5 साल पहले मर गई. शुरूशुरू में गांव से बूढ़ी मां आई थी, मन नहीं लगा. तब से मैं ही संभाल रही हूं.’’

हमें दिल्ली आए 2 साल हो गए थे. बेटे का नामांकन एनआईटी वारंगल में हो गया था. बेटी यहीं एमकौम कर रही थी. हम लोगों को गीता की आदत सी हो गई थी, धीरेधीरे उस ने घर की पूरी जिम्मेदारी जो संभाल ली थी. उस की बेटी बड़ी हो गई थी, वह अपने घर का काम कर लेती थी.

जीवन में पहली बार कामवाली का ऐसा सुख मिला था. मैं अपने एनजीओ को पूरा समय दे पा रही थी.

रात का खाना निबटा कर किचन समेटा और सोने ही जा रही थी कि फोन आया, ‘‘आंटी, 20-30 हजार रुपए चाहिए.’’

‘‘30 हजार रुपए?’’ मैं ने चौंकते हुए पूछा. कम से कम 20 हजार रुपए तो देना ही होगा. प्लीज आंटी, बहुत जरूरी हैं. मालिक को दिल का दौरा पड़ा है. उन को अस्पताल में भरती करवा कर आ रही हूं. एक सप्ताह के  अंदर औपरेशन होगा.

‘‘ठीक है, देखती हूं,’’ कह कर मैं ने फोन काटा. राकेश से बिना पूछे मैं उसे आश्वस्त नहीं कर सकती थी. हालांकि 5 हजार के हिसाब से 3-4 महीने में ही पैसा चुकता कर देगी. पहले भी एकदो बार वह 4-5 हजार रुपए ले गई थी. कभी बच्चे के ऐडमिशन के लिए या किसी शादीब्याह में जाने के लिए. लेकिन 4-5 दिनों के अंदर ही लौटा जाती थी. राकेश पहले तो 20 हजार रुपए पर थोड़ा झिझके, मेरे समझाने पर 10 हजार रुपए देने को तैयार हुए. अपने पैसों में से छिपा कर 10 हजार रुपए मिला कर मैं ने दूसरे दिन उसे बुलवा कर पूरे 20 हजार रुपए दे दिए.

गीता तो आज पहचान में ही नहीं आ रही थी. शृंगारविहीन, कुम्हलाया चेहरा, पपड़ी पड़े होंठ, बिना कंघी किए बाल, सूजी आंखें. लगता था रातभर सोई नहीं थी. उस का ऐसा रूप पहली बार देख रही थी मैं. थोड़ा आश्चर्य भी हुआ, माना कि मकानमालिक अच्छा है, इन लोगों का खयाल भी रखता है, फिर भी है तो पराया ही. उस के लिए इतनी चिंता. उस दिन जब पति जेल गया तो यह बिलकुल सामान्य थी मानो कुछ हुआ ही न हो.

बहरहाल, 15 दिनों के लिए उस ने ही एक बाई ढूंढ़ कर लगा दी थी. मैं ने गीता को एक महीने की छुट्टी दे दी. महीनेभर बाद पुरानी गीता लौट आई. वही मुसकराता चेहरा, वही साजशृंगार.

‘‘कैसे हैं तुम्हारे मकानमालिक?’’

‘‘हां आंटी, अब ठीक हैं. कल से काम पर जाने लगे हैं. शुक्र है, सबकुछ समय रहते हो गया. मालिक के दोस्त का मैडिकल कालेज में कोई रिश्तेदार है, उस ने बहुत सहायता की वरना इतनी जल्दी औपरेशन कहां हो पाता.’’

‘‘तुम ने तो बहुत किया उस के लिए. पैसे से ले कर देखभाल, सेवासुश्रूषा तक. इतना तो अपने भी नहीं करते. उस के घर से कोई आया था?’’ न चाहते हुए भी मेरे स्वर में थोड़ा व्यंग्य आ गया था.

अचानक उस का हंसता चेहरा मुरझा गया. वह चुपचाप उठ कर अपने काम में लग गई. पोंछा लगातेलगाते मेरे पास आ कर बैठ गई, ‘‘आंटी, अब आप से क्या छिपाऊं. मैं मालिक के ही साथ रहती हूं.’’ इस बात को कहने के लिए इतनी देर में उस ने अपने को मानसिकरूप से तैयार किया था.

इन 3 सालों में इस सच का अंदाजा कुछकुछ मुझे हो ही गया था.

‘‘शादी कर ली है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘फिर तुम्हारा पति?’’

‘‘वो भी वहीं रहता है. मालिक की मां जब गांव चली गई, मैं ने उन का काम करना शुरू किया. पहले चौकाबरतन, फिर खाना बनाना. मैं बहुत कष्ट में थी. अच्छे खातेपीते घर की लड़की हूं. मायके में जमीनजायदाद है. पिताजी की गांव में किराने की दुकान है.

‘‘लड़का दिल्ली में नौकरी करता है. इसी बात पर शादी हो गई. 3 बच्चे हो गए. यहां आने पर असलियत पता चली. तीन कमाता तेरह पी जाता है. घर में एक पैसा भी नहीं देता. ऊपर से रात में पिटाई करता. बच्चे भूख से बिलबिलाते थे. अंत में घर के पास में ही बन रही सोसायटी में ठेकेदारी में काम करने लगी. वहां भी स्थिति अच्छी नहीं थी. पूरे 8 घंटे काम, ठेकेदार की गंदी हरकतें, भद्दी गालियां. मिस्त्री का घिनौना स्पर्श, फिर भी पैसे मिल रहे थे, बच्चे पल रहे थे.

‘‘एक दिन मेरी बेटी किसी काम से हमारे पास आई. एक मजदूर उस का हाथ पकड़ने लगा. मैं ने गुस्से में पास रखे डंडे से उस के हाथ पर जोर से मारा. हंगामा हो गया. उसी वक्त मालिक वहां से गुजर रहे थे. उन्होंने सब को डांटडपट कर भगाया. मैं लगातार रोए जा रही थी.

‘‘यहां क्यों काम करती हो?’’

‘‘क्या करूं? बच्चे खाएंगे क्या?’’

‘‘खाना बनाना आता है?’’

‘‘बचपन से तो वही करती आई हूं. करम फूट गए थे जो यहां आई.’’

‘‘कल सुबह स्कूल के बगल वाले मकान में आना, चावला मैनेजर का नाम पूछोगी, कोई भी बता देगा.’’

‘‘दूसरे दिन सुबह जो गई, तो वहीं की रह गई. पूरे दिन काम कर के रात का खाना बना कर लौट आती थी. बच्चे बगल वाले सरकारी स्कूल में जाते थे. उन्हें दिन का खाना वहां मिल जाता था. शाम को मालिक कहते कि बच्चों को यहीं बुला कर खिला दिया करो.

‘‘उस रोज खाना बना कर मैं बरतन मांज रही थी कि बेटी दौड़ती हुई आई, ‘अम्मा, बाबू को पुलिस पकड़ कर ले गई. बिलावल के साथ मारपीट कर रहा था.’

2 दिनों तक मैं दौड़ती रही. पुलिस कुछ नहीं सुन रही थी. अंत में मालिक ही छुड़वा कर लाए. उसे भी बगीचे की सफाई, घर की रखवाली के लिए रख लिया. जो मनुष्य अपनी बीवीबच्चों का, खुद अपना भी ध्यान नहीं रख सकता तो घर की क्या रखवाली करता. आंगन की तरफ पिछवाड़े में एक कमरा था, वहीं पड़ा रहता. बाद में हम लोग भी थोड़ीबहुत गृहस्थी के सामान के साथ वहीं रहने लगे.

‘‘दोपहर में बच्चे स्कूल गए हुए थे. सब काम निबटा कर सोचा कि थोड़ा सुस्ता लूं. कमरे में घुसी तो देखती हूं कि मेरा आदमी मेरी एकमात्र अमानत मेरे बक्से का ताला तोड़ कर सारा सामान इधरउधर कर के कुछ ढूंढ़ रहा है. बेटी कितने दिनों से पायल के लिए जिद कर रही थी, मैं ने जोड़जाड़ कर 1 हजार रुपए जमा किए थे, उसे रूमाल में बांध कर बक्से में रखते हुए उस ने शायद देख लिया था.

‘‘बेटी के शौक पर पानी फिरते देख मैं जोर से चिल्लाई, क्या खोज रहे हो? वह बोला, ‘तुम से मतलब?’

‘‘‘मेरा बक्सा है, सामान मेरा है, तब मतलब किस को होगा,’ मैं ने कहा.

‘‘‘ठहर, अभी बतलाता हूं किस का सामान है, हक जताती है,’ एक भद्दी गाली देते हुए वह मुझ पर झपटा.

‘‘मैं पलट कर भागने के लिए मुड़ी ही थी कि मेरे कान की बाली उस की उंगलियों में फंस गई. उस ने जोर से खींचा. बाली उस के हाथों में चली गई और मेरे कान से खून बहने लगा.

‘‘शोर सुन कर मालिक आ गए थे. उन्होंने उसे धक्का दे कर अलग किया. मेरी हालत देख कर उन्होंने कहा, ‘इस आदमी के साथ कैसे रह लेती हो.’ बक्से से रुपए और मेरी सोने की एक बाली ले कर वह भाग गया.

‘‘20 दिनों के बाद वह लौटा. कुछ दिनों तक तो गेट पर बैठा रहता था, बाद में मालिक के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगा. रहने की अनुमति तो उन्होंने दे दी लेकिन एक शर्त रखी कि मेरे ऊपर कभी हाथ उस ने उठाया तो वे उसे पुलिस को सौंप देंगे. वह तैयार हो गया लेकिन उस दिन के बाद से मैं ने अपने कमरे में जाना छोड़ दिया. फिर कब और कैसे मालिक के कमरे में मैं रहने लगी, पता ही नहीं चला.

‘‘दोनों को सहारे की जरूरत थी. पति से मैं ऊब चुकी थी. उस ने मार, तिरस्कार, दुख के सिवा मुझे दिया ही क्या था. आंटी, पतिपत्नी का संबंध तो समाज बनाता है. यह कोई खून का संबंध तो होता नहीं. अगर पति सातों वचनों में से एक भी नहीं निभाए तो क्या केवल पत्नी की ही जिम्मेदारी है कि उस के दिए सिंदूर को लगाए जीवनभर मरती रहे. पत्नी अगर कुल्टा होती है, बांझ होती है, लंगड़ी या लूली हो जाए, तो पति उसे तुरंत छोड़ देता है. फिर क्यों एक पत्नी उस की सारी यातनाओं को सहतेसहते मर जाए. औरत को भी तो जीने का हक है.

‘‘मालिक तो सच में बहुत अच्छे इंसान हैं. बच्चों के कारण ही उन्होंने शादी नहीं की. जिस ने मुझे जीवन दिया, मेरे बच्चों के मुंह में निवाला दिया, मेरे भविष्य की चिंता की, उस के प्रति मैं पूरी वफादार हूं. अब मेरा अपने आदमी के साथ कोई संबंध नहीं है.’’

‘‘आदमी कुछ नहीं कहता है?’’ मैं ने आश्चर्य से जानना चाहा.

‘‘शुरूशुरू में उस ने होहल्ला किया. अड़ोसपड़ोस वालों को जुटा लाया. लेकिन मैं शेरनी जैसी तन कर खड़ी हो गई, ‘खबरदार, मालिक को कोई कुछ बोला तो. यह मेरा पति जब पूरी रात मुझे मारता था, घर से निकाल देता था तब तुम लोग कहां थे? मेरे बच्चे भूख से छटपटाते थे, तब किसी ने उन का पेट क्यों नहीं भरा? जब मेरे साथ दुनिया वाले बदसुलूकी करते क्यों नहीं कोई मेरी रक्षा करने को आगे आया? उस वक्त तो मेरी मजबूरी का सब मजा लेते थे, खुद भी मुझे गिराने और नोचने की ताक में रहते थे. अब मुझे किसी की चिंता नहीं है. न अपने पति की, न समाज की. जिस को जो करना है, मैं निबट लूंगी सब से. मगर मालिक को बीच में मत घसीटना.’ पता नहीं कहां से मुझ में इतनी हिम्मत आ गई थी.

‘‘असल में अब मुझे मालिक का सहारा था, लगता था कुछ होगा तो वे संभाल लेंगे. पहले किस के भरोसे पर हिम्मत करती. आदमी ने भी बाद में समझौता कर लिया. कपड़ा वगैरह उसे मालिक दे देते हैं. कोई जिम्मेदारी नहीं, बैठेबिठाए खानाकपड़ा मिल रहा है स्वार्थी को. उसे यह सौदा अच्छा ही लगा.’’

बहुत ही सहजता से गीता ने अपनेआप को एक पत्नी, एक मां और रक्षिता में बांट लिया था. उस की बातें प्र्रवाहित थीं, ‘‘आंटी, औरत शादी ही इसलिए करती है कि उसे एक सुरक्षित छत, मजबूत सहारा और निश्चित भविष्य मिले. मुझे भी यही चाहिए था और कोई लालच मुझे नहीं था.

‘‘एक दिन तो मालिक ने अपनी पत्नी की सारी साडि़यां, गहने वगैरह भी मुझे थमा दिए थे. उन की साडि़यां तो मैं पहनती हूं, लेकिन गहने मैं ने जिद कर के बैंक के लौकर में रखवा दिए. इन पर उन की बेटी और बहू का ही हक है. उन्होंने मुझे सहारा दिया. मुझे और कुछ नहीं चाहिए.

‘‘औरत भले ही अपनी आजादी के लिए आंदोलन करती हो, आदमी पर आरोप लगाती हो कि उस को घर में बांध कर कैद कर के रखा है लेकिन आंटी, अगर हमें एकदम खुला भी छोड़ दिया जाए तो कुछ दिन तो यह आजादी हमें अच्छी लगेगी, आकाश में उड़ने का गुमान भी होगा लेकिन बाद में थक कर हमारे पंख टूट जाएंगे, बिखर जाएंगे. औरत को एक आधार, एक सहारा चाहिए ही. उसे बंधन पसंद है, उस की आदत है, उस का स्वभाव है यह.’’

मैं अवाक नारी सशक्तीकरण की धज्जियां उड़ाती उस की बातें सुन रही थी. अगर ईमानदारी से हर स्त्री अपने मन को टटोले तो क्या गीता गलत कह रही थी? यह एक महिला के सहज उदगार की व्याख्या थी. शायद हर स्त्री के भीतर दिल एकसा ही धड़कता है, उस की भावनाएं एकजैसी होती हैं. शिक्षा से भले ही उन के विचार बदल जाएं, भावनाएं नहीं बदलतीं. समाज के खोखले मापदंड के हिसाब से गीता की सोच, उस का चरित्र भले ही गलत हो, लेकिन मुझे तो वह किसी दृष्टिकोण से गलत नहीं लगी.

वनस्पति विज्ञान में एक पौधा होता है लाइकेन. कवक और शैवाल का मिला सत्य. उस पौधे में मौजूद कवक बाहरी आघातों से पौधे की रक्षा करता है जबकि शैवाल अपने हरे रंग के कारण प्रकाश संश्लेषण कर के पौधे को भोजन प्रदान करता है. दोनों एकदूसरे पर आश्रित, एकदूसरे से लाभान्वित. इस संबंध को सिम बायोसिस कहते हैं. गीता और मालिक का संबंध भी तो सिम बायोसिस ही है लाइकेन की तरह.

Love Story : फैसला – कैसा था शादीशुदा रवि और तलाकशुदा सविता का प्यार

Love Story : मैं अपने सहयोगियों के साथ औफिस की कैंटीन में बैठा था कि अचानक सविता दरवाजे पर नजर आई. खूबसूरती के साथसाथ उस में गजब की सैक्स अपील भी है. जिस की भी नजर उस पर पड़ी, उस की जबान को झटके से ताला लग गया.

‘‘रवि, लंच के बाद मुझ से मिल लेना,’’ यह मुझ से दूर से ही कह कर वह अपने रूम की तरफ चली गई.

मेरे सहयोगियों को मुझे छेड़ने का मसाला मिल गया. ‘तेरी तो लौटरी निकल आई है, रवि… भाभी तो मायके में हैं. उन्हें क्या पता कि पतिदेव किस खूबसूरत बला के चक्कर में फंसने जा रहे हैं… ऐश कर ले सविता के साथ. हम अंजू भाभी को कुछ नहीं बताएंगे…’ उन सब के ऐसे हंसीमजाक का निशाना मैं देर तक बना रहा.हमारे औफिस में तलाकशुदा सविता की रैपुटेशन बड़ी अजीब सी है. कुछ लोग उसे जबरदस्त फ्लर्ट स्त्री मानते हैं और उन की इस बात में मैं ने उस का नाम 5-6 ऐसे पुरुषों से जुड़ते देखा है, जिन्हें सीमित समय के लिए ही उस के प्रेमियों की श्रेणी में रखा  जा सकता है. उन में से 2 उस के आज भी अच्छे दोस्त हैं. बाकियों से अब उस की साधारण दुआसलाम ही है.

सविता के करीब आने की इच्छा रखने वालों की सूची तो बहुत लंबी होगी, पर वह इन दिलफेंक आशिकों को बिलकुल घास नहीं डालती. उस ने सदा अपने प्रेमियों को खुद चुना है और वे हमेशा विवाहित ही रहे हैं. मैं तो पिछले 2 महीनों से अपनी विवाहित जिंदगी में आई टैंशन व परेशानियों का शिकार बना हुआ था. अंजू 2 महीने से नाराज हो कर मायके में जमी हुई थी. अपने गुस्से के चलते मैं ने न उसे आने को कहा और न ही लेने गया. समस्या ऐसी उलझी थी कि उसे सुलझाने का कोई सिरा नजर नहीं आ रहा था. मेरा अंदाजा था कि सविता ने मुझे पिछले दिनों जरूरत से ज्यादा छुट्टियां लेने की सफाई देने को बुलाया है. तनाव के कारण ज्यादा शराब पी लेने से सुबह टाइम से औफिस आने की स्थिति में मैं कई बार नहीं रहा था. लंच के बाद मैं ने सविता के कक्ष में कदम रखा, तो उस ने बड़ी प्यारी, दिलकश मुसकान होंठों पर ला कर मेरा स्वागत किया.

‘‘हैलो, रवि, कैसे हो?’’ कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए उस ने दोस्ताना लहजे में वार्त्तालाप आरंभ किया.

‘‘अच्छा हूं, तुम सुनाओ,’’ आगे झूठ बोलने के लिए खुद को तैयार करने के चक्कर में मैं कुछ बेचैन हो गया था.

‘‘तुम से एक सहायता चाहिए.’’

अपनी हैरानी को काबू में रखते हुए मैं ने पूछा, ‘‘मैं क्या कर सकता हूं तुम्हारे लिए?’’

‘‘कुछ दिन पहले एक पार्टी में मैं तुम्हारे एक अच्छे दोस्त अरुण से मिली थी. वह तुम्हारे साथ कालेज में पढ़ता था.’’

‘‘वह जो बैंक में सर्विस करता है?’’

‘‘हां, वही. उस ने बताया कि तुम बहुत अच्छा गिटार बजाते हो.’’

‘‘अब उतना अच्छा अभ्यास नहीं रहा है,’’ अपने इकलौते शौक की चर्चा छिड़ जाने पर मैं मुसकरा पड़ा.

‘‘मेरे दिल में भी गिटार सीखने की तीव्र इच्छा पैदा हुई है, रवि. प्लीज कल शनिवार को मुझे एक अच्छा सा गिटार खरीदवा दो.’’

बड़े अपनेपन से किए गए सविता के आग्रह को टालने का सवाल ही नहीं उठता था. मैं ने उस के साथ बाजार जाना स्वीकार किया, तो वह किसी बच्चे की तरह खुश हो गई.

‘‘अंजू मायके गई हुई है न?’’

‘‘हां,’’ अपनी पत्नी के बारे में सवाल पूछे जाने पर मेरे होंठों से मुसकराहट गायब हो गई.

‘‘तब तो तुम कल सुबह नाश्ता भी मेरे साथ करोगे. मैं तुम्हें गोभी के परांठे खिलाऊंगी.’’

‘‘अरे, वाह. तुम्हें कैसे मालूम कि मैं उन का बड़ा शौकीन हूं?’’

‘‘तुम्हारे दोस्त अरुण ने बताया था.’’

‘‘मैं कल सुबह 9 बजे तक पहुंचूं?’’

‘‘हां, चलेगा.’’

सविता ने दोस्ताना अंदाज में मुसकराते हुए मुझे विदा किया. मेरे आए दिन छुट्टी लेने के विषय पर चर्चा ही नहीं छिड़ी थी, लेकिन अपने सहयोगियों को मैं सच्ची बात बता देता, तो वे मेरा जीना मुश्किल कर देते. इसलिए उन से बोला, ‘‘ज्यादा छुट्टियां न लेने के लिए लैक्चर सुन कर आ रहा हूं.’’ यह झूठ बोल कर मैं अपने काम में व्यस्त हो गया. पिछले 2 महीनों में वह पहली शुक्रवार की रात थी जब मैं शराब पी कर नहीं सोया. कारण यही था कि मैं सोते रह जाने का खतरा नहीं उठाना चाहता था. सविता के साथ पूरा दिन गुजारने का कार्यक्रम मुझे एकाएक जोश और उत्साह से भर गया था. पिछले 2 महीनों से दिलोदिमाग पर छाए तनाव और गुस्से के बादल फट गए थे. कालेज के दिनों में जब मैं अपनी गर्लफ्रैंड से मिलने जाता था, तब बड़े सलीके से तैयार होता था. अगले दिन सुबह भी मैं ढंग से तैयार हुआ. ऐसा उत्साह और खुशी दिलोदिमाग पर छाई थी, मानो पहली डेट पर जा रहा हूं. सविता पर पहली नजर पड़ी तो उस के रंगरूप ने मेरी आंखें ही चौंधिया दीं. नीली जींस और काले टौप में वह बहुत आकर्षक लग रही थी. उस पल से ही उस जादूगरनी का जादू मेरे सिर चढ़ कर बोलने लगा. दिल की धड़कनें बेकाबू हो चलीं. मैं उस के इशारे पर नाचने को एकदम तैयार था. फिर हंसीखुशी के साथ बीतते समय को जैसे पंख लग गए. कब सुबह से रात हुई, पता ही नहीं चला.

सविता जैसी फैशनेबल, आधुनिक स्त्री से खाना बनाने की कला में पारंगत होने की उम्मीद कम होती है, लेकिन उस सुबह उस के बनाए गोभी के परांठे खा कर मन पूरी तरह तृप्त हो गया. प्यारी और मीठीमीठी बातें करना उसे खूब आता था. कई बार तो मैं उस का चेहरा मंत्रमुग्ध सा देखता रह जाता और उस की बात बिलकुल भी समझ में नहीं आती.

‘‘कहां हो, रवि? मेरी बात सुन नहीं रहे हो न?’’ वह नकली नाराजगी दर्शाते हुए शिकायत करती और मैं बुरी तरह झेंप उठता.

मैं ने उसे स्वादिष्ठ परांठे खिलाने के लिए धन्यवाद दिया तो उस ने सहजता से मुसकराते हुए कहा, ‘‘किसी अच्छे दोस्त के लिए कुकिंग करना मुझे पसंद है. मुझे भी बड़ा मजा आया है.’’

‘‘मुझे तुम अपना अच्छा दोस्त मानती हो?’’

‘‘बिलकुल,’’ उस ने तुरंत जवाब दिया.

‘‘कब से?’’

‘‘इस सवाल से ज्यादा महत्त्वपूर्ण एक दूसरा सवाल है, रवि.’’

‘‘कौन सा?’’

‘‘क्या तुम आगे भी मेरे अच्छे दोस्त बने रहना चाहोगे?’’ उस ने मेरी आंखों में गहराई से झांका.

‘‘बिलकुल बना रहना चाहूंगा, पर क्या मुझे कुछ खास करना पड़ेगा तुम्हारी दोस्ती पाने के लिए?’’

‘‘शायद… लेकिन इस विषय पर हम बाद में बातें करेंगे. अब गिटार खरीदने चलें?’’ सवाल का जवाब देना टाल कर सविता ने मेरी उत्सुकता को बढ़ावा ही दिया.

हमारे बीच बातचीत बड़ी सहजता से हो रही थी. हमें एकदूसरे का साथ इतना भा रहा था कि कहीं भी असहज खामोशी का सामना नहीं करना पड़ा. हमारे बीच औफिस से जुड़ी बातें बिलकुल नहीं हुईं. टीवी सीरियल, फिल्म, खेल, राजनीति, फैशन, खानपान जैसे विषयों पर हमारे बीच दिलचस्प चर्चा खूब चली. उस ने अंजू से जुड़ा कोई सवाल मुझ से पूछ कर बड़ी कृपा की. हां, उस ने अपने भूतपूर्व पति संजीव से अपने संबंधों के बारे में, मेरे बिना पूछे ही जानकारी दे दी.

‘‘संजीव से मेरा तलाक उस की जिंदगी में आई एक दूसरी औरतके कारण हुआ था, रवि. वह औरत मेरी भी अच्छी सहेली थी,’’ अपने बारे में बताते हुए सविता दुखी या परेशान बिलकुल नजर नहीं आ रही थी.

‘‘तो पति ने तुम्हारी सहेली के साथ मिल कर तुम्हें धोखा दिया था?’’ मैं ने सहानुभूतिपूर्ण लहजे में टिप्पणी की.

‘‘हां, पर एक कमाल की बात बताऊं?’’

‘‘हांहां.’’

‘‘मुझे पति से खूब नाराजगी व शिकायत रही. पर वंदना नाम की उस दूसरी औरत के प्रति मेरे दिल में कभी वैरभाव नहीं रहा.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘वंदना का दिल सोने का था, रवि. उस के साथ मैं ने बहुत सारा समय हंसतेमुसकराते गुजारा था. यदि उस ने वह गलत कदम न उठाया होता तो वह मेरी सब से अच्छी दोस्त होती.’’

‘‘लगता है तुम्हें पति से ज्यादा अपनी जिंदगी में वंदना की कमी खलती है?’’

‘‘अच्छे दोस्त बड़ी मुश्किल से मिलते हैं, रवि. शादी कर के एक पति या पत्नी तो हर कोई पा लेता है.’’

‘‘यह तो बड़े पते की बात कही है तुम ने.’’

‘‘कोई बात पते की तभी होती है जब उस का सही महत्त्व भी इंसान समझ ले. बोलबोल कर मेरा गला सूख गया है. अब कुछ पिलवा तो दो, जनाब,’’ बड़ी कुशलता से उस ने बातचीत का विषय बदला और मेरी बांह पकड़ कर एक रेस्तरां की दिशा में बढ़ चली.

उस के स्पर्श का एहसास देर तक मेरी नसों में सनसनाहट पैदा करता रहा. सविता की फरमाइश पर हम ने एक फिल्म भी देख डाली. हौल में उस ने मेरा हाथ भी पकड़े रखा. मैं ने एक बार हिम्मत कर उस के बदन के साथ शरारत करनी चाही, तो उस ने मुझे प्यार से घूर कर रोक दिया. ‘‘शांति से बैठो और मूवी का मजा लो रवि,’’ उस की फुसफुसाहट में कुछ ऐसी अदा थी कि मेरा मन जरा भी मायूसी और चिढ़ का शिकार नहीं बना.

लंच हम ने एक बढि़या होटल में किया. फिर अच्छी देखपरख के बाद गिटार खरीदने में मैं ने उस की मदद की. उस के दिल में अपनी छवि बेहतर बनाने के लिए वह गिटार मैं उसे अपनी तरफ से उपहार में देना चाहता था, पर वह राजी नहीं हुई.

‘‘तुम चाहो तो मुझे गिटार सिखाने की जिम्मेदारी ले सकते हो,’’ वह बोली तो उस के इस प्रस्ताव को सुन कर मैं फिर से खुश हो गया.

जब हम सविता के घर वापस लौटे, तो रात के 8 बजने वाले थे. उस ने कौफी पिलाने की बात कह कर मेरी और ज्यादा समय उस के साथ गुजारने की इच्छा पूरी कर दी. वह कौफी बनाने किचन में गई तो मैं भी उस के पीछेपीछे किचन में पहुंच गया. उस के नजदीक खड़ा हो कर मैं ऊपर से हलकीफुलकी बातें करने लगा, पर मेरे मन में अजीब सी उत्तेजना लगातार बढ़ती जा रही थी. अंजू के प्यार से लंबे समय तक वंचित रहा मेरा मन सविता के सामीप्य की गरमाहट को महसूस करते हुए दोस्ती की सीमा को तोड़ने के लिए लगभग तैयार हो चुका था. तभी सविता ने मेरी तरफ घूम कर मुझे देखा. उस ने जरूर मेरी प्यासी नजरों को पढ़ लिया होगा, क्योंकि अचानक मेरा हाथ पकड़ कर वह मुझे ड्राइंगरूम की तरफ ले चली.

मैं ने रास्ते में उसे बांहों में भरने की कोशिश की, तो उस ने बिना घबराए मुझ से कहा, ‘‘रवि, मैं तुम से कुछ खास बातें करना चाहती हूं. उन बातों को किए बिना तुम को मैं दोस्त से प्रेमी नहीं बना सकती हूं.’’ उसे नाराज कर के कुछ करने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता था. मैं अपनी भावनाओं को नियंत्रण में कर के ड्राइंगरूम में आ बैठा और सविता बेहिचक मेरी बगल में बैठ गई.

मेरा हाथ पकड़ कर उस ने हलकेफुलके अंदाज में पूछा, ‘‘मेरे साथ आज का दिन कैसा गुजरा है, रवि?’’

‘‘मेरी जिंदगी के सब से खूबसूरत दिनों में से एक होगा आज का दिन,’’ मैं ने सचाई बता दी.

‘‘तुम आगे भी मुझ से जुड़े रहना चाहोगे?’’

‘‘हां… और तुम?’’ मैं ने उस की आंखों में गहराई तक झांका.

‘‘मैं भी,’’ उस ने नजरें हटाए बिना जवाब दिया, ‘‘लेकिन अंजू के विषय में सोचे बिना हम अपने संबंधों को मजबूत आधार नहीं दे सकते.’’

‘‘अंजू को बीच में लाना जरूरी है क्या?’’ मेरा स्वर बेचैनी से भर उठा.

‘‘तुम उसे दूर रखना चाहोगे?’’

‘‘हां.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘वह तुम्हें मेरी प्रेमिका के रूप में स्वीकार नहीं करेगी.’’

‘‘और तुम मुझे अपनी प्रेमिका बनाना चाहते हो?’’

‘‘क्या तुम ऐसा नहीं चाहती हो?’’ मेरी चिढ़ बढ़ रही थी.

कुछ देर खामोश रहने के बाद उस ने गंभीर लहजे में बोलना शुरू किया, ‘‘रवि, लोग मुझे फ्लर्ट मानते हैं और तुम्हें भी जरूर लगा होगा कि मैं तुम्हें अपने नजदीक आने का खुला निमंत्रण दे रही हूं. इस बात में सचाई है क्योंकि मैं चाहती थी कि तुम मेरा आकर्षण गहराई से महसूस करो. ऐसा करने के पीछे मेरी क्या मंशा है, मैं तुम्हें बताऊंगी. पर पहले तुम मेरे एक सवाल का जवाब दो, प्लीज.’’

‘‘पूछो,’’ उस को भावुक होता देख मैं भी संजीदा हो उठा.

‘‘क्या तुम अंजू को तलाक देने का फैसला कर चुके हो?’’

‘‘बिलकुल नहीं,’’ मैं ने चौंकते हुए जवाब दिया.

‘‘मुझे तुम्हारे दोस्त अरुण से मालूम पड़ा कि अंजू तुम से नाराज हो कर पिछले 2 महीने से मायके में रह रही है. तुम उसे वापस क्यों नहीं ला रहे हो?’’

‘‘हमारे बीच गंभीर मनमुटाव चल रहा है. उस को अपनी जबान…’’

‘‘मुझे पूरा ब्योरा बाद में बताना रवि, पर क्या तुम्हें उस की याद नहीं आती है?’’ सविता ने मुझे कोमल लहजे में टोक कर सवाल पूछा.

‘‘आती है… जरूर आती है, पर ताली एक हाथ से तो नहीं बज सकती है, सविता.’’

‘‘तुम्हारी बात ठीक है, पर मिल कर साथ रहने का आनंद तो तुम दोनों ही खो रहे हो न?’’

‘‘हां, पर…’’

‘‘देखो, कुसूरवार तो तुम दोनों ही होंगे… कम या ज्यादा की बात महत्त्वपूर्ण नहीं है, रवि. इस मनमुटाव के चलते जिंदगी के कीमती पल तो तुम दोनों ही बेकार गवां रहे हो या नहीं?’’

‘‘तुम मुझे क्या समझाना चाह रही हो?’’ मेरा मूड खराब होता जा रहा था.

‘‘रवि, मेरी बात ध्यान से सुनो,’’ सविता का स्वर अपनेपन से भर उठा, ‘‘आज तुम्हारे साथ सारा दिन मौजमस्ती के साथ गुजार कर मैं ने तुम्हें अंजू की याद दिलाने की कोशिश की है. उस से दूर रह कर तुम उन सब सुखसुविधाओं से खुद को वंचित रख रहे हो जिन्हें एक अपना समझने वाली स्त्री ही तुम्हें दे सकती है.

‘‘मेरा आए दिन ऐसे पुरुषों से सामना होता है, जो अपनी अच्छीखासी पत्नी से नहीं, बल्कि मुझ से संबंध बनाने को उतावले नजर आते हैं

‘‘मेरे साथ उन का जैसा रोमांटिक और हंसीखुशी भरा व्यवहार होता है, अगर वैसा ही अच्छा व्यवहार वे अपनी पत्नियों के साथ करें, तो वे भी उन्हें किसी प्रेमिका सी प्रिय और आकर्षक लगने लगेंगी.

‘‘तुम मुझे बहुत पसंद हो, पर मैं तुम्हें और अंजू दोनों को ही अपना अच्छा दोस्त बनाना चाहूंगी. हमारे बीच इसी तरह का संबंध हम तीनों के लिए हितकारी होगा.

‘‘तुम चाहो तो मेरे प्रेमी बन कर सिर्फ आज रात मेरे साथ सो सकते हो. लेकिन तुम ने ऐसा किया, तो वह मेरी हार होगी. कल से हम सिर्फ सहयोगी रह जाएंगे.

‘‘तुम ने दोस्त बनने का निर्णय लिया, तो मेरी जीत होगी. यह दोस्ती का रिश्ता हम तीनों के बीच आजीवन चलेगा, मुझे इस का पक्का विश्वास है.’’

‘‘बोलो, क्या फैसला करते हो, रवि? अंजू और अपने लिए मेरी आजीवन दोस्ती चाहोगे या सिर्फ 1 रात के लिए मेरी देह का सुख?’’

मुझे फैसला करने में जरा भी वक्त नहीं लगा. सविता के समझाने ने मेरी आंखें खोल दी थीं. मुझे अंजू एकदम से बहुत याद आई और मन उस से मिलने को तड़प उठा.

‘‘मैं अभी अंजू से मिलने और उसे वापस लाने को जा रहा हूं, मेरी अच्छी दोस्त.’’ मेरा फैसला सुन कर सविता का चेहरा फूल सा खिल उठा और मैं मुसकराता हुआ विदा लेने को उठ खड़ा हुआ.

Romantic Story : नया सवेरा – गरिमा और शिशिर के प्यार के बीच में कौन आ रहा था

Romantic Story : “अरे वाह, शिशिर, फ्लैट तो बहुत खूबसूरत है. और देखो न, यहां खिड़की से बाहर का दृश्य कितना सुंदर दिख रहा है,” गरिमा फ्लैट के अंदर दाखिल होते ही चहकती हुई बोलती है.

शिशिर और गरिमा दोनों एकदूसरे को चाहते थे. अभी ज्यादा समय नहीं गुजरा था जब दोनों के मन में प्रेम की कोंपले फूटी थीं. दोनों एक ही कंपनी में कार्यरत थे. शिशिर कंपनी का पुराना एंप्लौय था जबकि गरिमा ने कुछ महीने पहले ही जौइन किया था. 24 वर्षीया गरिमा में अल्हड़पन और शोखियां भरी थीं. उस में खूबसूरती के साथ टैलेंट भी था लेकिन वह कुछ ज्यादा ही भावुक थी, शायद, स्त्री होना उस का कारण हो क्योंकि लोग कहते हैं न, महिलाएं बहुत भावुक होती हैं.

दूसरी तरफ शिशिर 30 वर्ष की उम्र पार कर चुका था. वह काम तथा जीवन दोनों में काफी प्रोफैशनल सा व्यक्तित्व रखता था. वह दिल की सुनता मगर कभीकभी उस का दिमाग दिल पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखता था. दोनों साथ काम करते हुए कब प्यार की जंजीर में उलझे, उन्हें पता न चला.

शिशिर लुधियाना के एक छोटे से गांव से आया था. दिल्ली में रहते हुए उस ने कालेज की पढ़ाई पूरी की और फिर एक कंपनी में अच्छी पोस्ट पर नौकरी करने लगा. वह अपने दोस्तों के साथ किराए के कमरे में रहता था. लेकिन अब उस ने कुछ पैसे जमा कर लिए थे तो एक छोटा सा फ्लैट खरीदने की तमन्ना ने जोर पकड़ा और आज वह गरिमा के साथ फ्लैट देखने आया था.

गरिमा रांची की रहने वाली थी. वह पढ़ने में बहुत तेज थी, इसीलिए सकौलरशिप के माध्यम से दिल्ली में कालेज की पढ़ाई पूरी करने आई थी. बीकौम पूरा होते ही उस ने अपना खर्च निकालने के खयाल से कंपनी में एक छोटी सी नौकरी करना शुरू किया था. दिल्ली जैसे शहर में रहने पर खर्चे थोड़े अधिक थे और उस के क्लर्क पिता जो रुपए भेजते उस में गरिमा का पूरा महीना नहीं चल पाता था.

शिशिर गरिमा को बहुत भोली समझता था लेकिन गरिमा अपने इमोशनल के कारण भोली दिख रही थी.

“गरिमा, अब हम दोनों इस फ्लैट में साथ रहेंगे. तुम अपना गर्ल्स होस्टल छोड़ देना.”

“साथ, अभी से? पहले तुम्हारे व्यक्तित्व को थोड़ा अच्छे से जान लूं, फिर शादी के बंधन में बंध जाऊं, तब. फिलहाल तो जनाब इस फ्लैट को खरीदने का काम कर लीजिए,” गरिमा ने मुसकराते हुए कहा.

“क्या यार, तुम भी न, देश की राजधानी में रह कर आज की लाइफ से दूर हो. यहां के कल्चर में नहीं देख रही हो, लोग एकदूसरे के साथ रहने के लिए शादी का इंतजार नहीं करते?”

“लेकिन मैं इस सोच को सही नहीं मानती.”

“अच्छा देखो, तुम ने भी तो कहा न कि तुम मुझे और अधिक जानना चाहती हो. तो फिर मुझे बेहतर जानने के लिए मेरे साथ रहना और जरूरी हो जाता है,” शिशिर ने गरिमा को कन्विंस करने के खयाल से कहा.

“अच्छा, जब समय आएगा तब देखा जाएगा. अब चलो,” गरिमा ने कहा.

फ्लैट देख कर दोनों वहां से चले गए. कुछ दिनों बाद शिशिर को फ्लैट की चाबी मिल गई. उस के फ्लैट में थोड़ा सा रिनोवेशन का काम था, जिसे शिशिर ने करवाना शुरू कर दिया था. कभीकभी गरिमा भी फ्लैट पर काम देखने चली जाया करती थी.

औफिस में लंचब्रेक हो गया. गरिमा कैंटीन की तरफ बढ़ रही थी कि शिशिर ने रोका, “चलो, किसी होटल में लंच लेते हैं.”

“नहीं, फिर कभी. पास की कैंटीन में ही ठीक है. होटल गई तो औफिस लौटने में देर हो जाएगी.”

“अच्छा, शाम में चलते हैं. शौपिंग के साथ रात का खाना बाहर,” शिशिर ने कहा.

“शौपिंग, बात क्या है? आज तो मेरा जन्मदिन भी नहीं है,” गरिमा ने शरारती अंदाज में कहा.

“फ्लैट पूरी तरह तैयार है. उस में कुछ नए फर्नीचर रखवाने हैं. वहां सब तुम्हारी पसंद का होगा, इसलिए शौपिंग करने चलना है,” कहते हुए शिशिर गरिमा को पास खींच लेता है.

दोनों खुश थे. शिशिर नए फ्लैट में शिफ्ट हो गया था. गरिमा ने शुरुआत में साथ रहने को मना कर दिया था लेकिन शिशिर के प्यार की आगे उसे झुकना पड़ा. अब वे दोनों अपने नए आशियाने में एकसाथ रहने लगे. गरिमा का एमकौम में एडमिशन हो गया था. साथ ही, उस ने पार्टटाइम जौब को करना जारी रखा.

इधर, शिशिर और गरिमा को साथ रहते 6 महीने से ऊपर हो गए. शुरुआत के दिन तितलियों के पंख से भी अधिक खूबसूरत और हलके थे. उन हलके रंगीन दिनों में दोनों स्वयं को बेहद खुशहाल जोड़ी मानने लगे थे. गरिमा को भी लगने लगा कि शायद शिशिर ही वह व्यक्ति है जिस के साथ वह आजीवन खुश रह सकती है. लेकिन बाद के दिनों में उस के भ्रमजाल के धागे एकएक कर टूटने लगे.

शनिवार का दिन था. शिशिर जगा तो देखा कि सुबह के 9 बज गए हैं. देररात तक वह लैपटौप पर जमा हुआ था, इस कारण सुबह इतनी देर से उस की आंख खुली. लेकिन पर्याप्त नींद न लेने के कारण अभी भी सिर भारी लग रहा था.

“यार, जरा एक कप हौट कौफी पिला दो, सिर कुछ हलका हो,” शिशिर ने गरिमा को आवाज लगाई.

बैडरूम से निकलते हुए गरिमा सामने दिख गई, “अरे, सुबह कहां के लिए तैयार हो गईं, आज तो कालेज की छुट्टी है?”

“कालेज की छुट्टी है मगर काम की नहीं. आज एक स्पैशल काम मिला है. यदि मैं इस में सफल हो गई तो एक बड़ी कंपनी में मुझे बड़ी पोस्ट मिल जाएगी. फिर तो अपनी अच्छीखासी सैलरी होगी,” गरिमा चहकती हुई बोली.

“अच्छा, ठीक है. जरा कौफी पिला दो और मेरा नाश्ता भी रेडी रखो.”

“सौरी शिशिर, जल्दी में हूं. औफिस समय से पहुंचना जरूरी है. तुम मैनेज कर लो और हां, लौटने में देर होगी. मैं डिनर कर के आऊंगी, मेरा इंतजार मत करना. ओके बाय…,” कहती हुई गरिमा तेज कदमों से बाहर निकल गई.

शिशिर मन ही मन खीझ कर रह गया. इन 6 महीनों में वह युवक से गृहस्थ पुरुष की भूमिका में आ गया था. गृहस्थ पुरुष जो घर के काम और जिम्मेदारियों को स्त्री का केंद्र मानता था. पुरुष की दुनिया बाहर थी और घर की जवाबदेही स्त्री के जिम्मे. हालांकि शिशिर के इस परिवर्तन में कुछ हद तक गरिमा की भी भूमिका थी. चंचल चहकती रहने वाली गरिमा मध्यवर्गीय परिवार से थी जहां छोटीछोटी बात या काम को ले कर तनाव करना उस ने नहीं सीखा था. इसलिए सामान्य नारीत्व को जीते हुए वह घर के कामों को निबटा दिया कर देती थी. लेकिन शिशिर पर इस का बुरा प्रभाव पड़ा. वह अपने दायित्व को कम करने लगा तथा पुरुषत्व के अहंकार को मन पर हावी करने लगा.

गरिमा ने अपनी स्किल और टैलेंट की बदौलत कंपनी में अच्छी पोस्ट प्राप्त कर ली थी. अब उस का पार्टटाइम जौब अच्छी फिक्स्ड नौकरी बन गई. गरिमा की व्यस्तता बढ़ गई थी. उसे एमकौम भी कंप्लीट करना था और अपनी नौकरी पर भी पूरा फोकस करना था. ऐसे में वह शिशिर या दैनिक कार्य में पहले की तरह समय नहीं दे पा रही थी. वह शिशिर को आज के समय की सोच का युवक समझती थी. मगर शायद यह उस का भ्रम था. क्योंकि शिशिर के व्यवहार में कुछ हद तक परिवर्तन आने लगा था. गरिमा अपनी व्यस्तता के कारण थोड़ी सी कम जिम्मेदार हो गई थी. उसे लगता, शिशिर उस की परिस्थिति समझेगा और उसे सहयोग व स्नेह देगा लेकिन यहां बात इस के उलट थी.

शिशिर बातबात पर गरिमा पर खीझ जाता. तेज आवाज में बोल देता. उस के कपड़ेजूते इधरउधर होते तो इस के लिए भी वह गरिमा पर ही गुस्सा होता- “देख रहा हूं, किसी भी चीज का तुम्हें खयाल नहीं रहा. मेरे प्रति तुम्हारा प्यार कम होता जा रहा है,” शिशिर उबल रहा था.

“यह क्या कह रहे हो, सुशील. भला काम के आधार पर तुम मेरे प्यार को कैसे माप सकते हो? तुम देख रहे हो न कि मैं कितनी मेहनत कर रही हूं. मेरे खुद के भी खानेसोने का सही रूटीन नहीं है. मेरी पढ़ाई पूरी हो जाए, उस के बाद सिर्फ मेरा जौब ही रहेगा न. फिर तुम्हें शिकायत नहीं होगी. पूरा समय दूंगी.”

“अच्छा, तुम लड़कियां भी न कुछ ज्यादा ही महत्त्वाकांक्षी होती हो. अरे जौब कर रही हो तो पढ़ाई छोड़ो और यदि पढ़ाई जारी रखना है तो जौब बाद में कर लेना. जब संभल नहीं रहा तो चारचार जगह पैरहाथ क्यों चलाती हो?”

“संभल नहीं रहा… सुनो, मैं तो अपनी लाइफ, पढ़ाई, नौकरी सबकुछ संभाल रही हूं. तुम अपनी देखो, खुद को ही संभाल नहीं पा रहे हो. मैं तुम्हारे व्यवहार से घबरा कर अपनी अभिलाषा और सपनों को नहीं छोड़ सकती,” कहती हुई गरिमा गुस्से में कमरे में चली जाती है.

शिशिर गुस्से में हौल में ही पड़ा रहा. सुबह गरिमा उठ कर अपने रूटीन वर्क में लग गई. रविवार का दिन था तो उस ने सोचा, आज थोड़ा सा रिलैक्स टाइम बिता लूंगी. लेकिन शिशिर की बात उसे अब भी चुभ रही थी. शिशिर ने रात का खाना भी नहीं खाया था. सुबह उठा तो पेट भूख का एहसास करा रहा था. उस ने गरिमा को सौरी बोला. ‘सौरी’ शब्द सुन कर गरिमा ने भी लंबी सांस खींची.‌ उस ने समझा, शिशिर को रात वाले बातव्यवहार पर शर्मिंदगी है. बात सही थी, शिशिर को एहसास हुआ कि वह कुछ ज्यादा बोला. लेकिन यह एहसास थोड़े समय के लिए ही था. शिशिर यदाकदा गरिमा को तल्ख बात बोल ही देता था. एक रोवाबदार पति की भांति उस पर अपना शिकंजा कसता. गरिमा कुछ हद तक न चाहते हुए भी आपसी तालमेल को बरकरार रखने की चेष्टा कर रही थी.

प्रेम व खिंचाव के मिश्रणभरे माहौल में साथ रहते हुए एक साल बीत गया. गरिमा को कंपनी की तरफ से प्रोफैशनल टूर के लिए जाना था. वह तैयारियां करने लगी. शिशिर को उस का जाना खल रहा था. वह गरिमा के लिए कुछ ज्यादा हीं पजैसिव होने लगा था. अब उसे गरिमा का ज्यादा स्वच्छंद रहना चुभता था. वह बोल पड़ा, “मैं अच्छाखासा कमा लेता हूं, फिर तुम्हें यों काम के पीछे भागने की क्या जरूरत है, छोड़ो यह सब?”

“शिशिर, यह तुम बोल रहे हो? तुम तो देश की राजधानी में रहने वाले आज के युवा हो?”

“हां, मगर मुझे तुम्हारा यों बाहर लोगों के साथ रहना अच्छा नहीं लगता. मैं तो, बस, तुम्हें अपने दिल में ही कैद कर के रखना चाहता हूं,” कहते हुए शिशिर ने गरिमा को बांहों में भरना चाहा लेकिन गरिमा ने उस की बांहें झटक दीं.

“इसे दिल में नहीं, घर में कैद करना कहते हैं, शिशिर. तुम दकियानूसी सोच की तरफ बढ़ रहे हो.”

“तुम जो समझो मगर मुझे तुम्हारा टूर पर जाना अच्छा नहीं लग रहा. छोड़ो न…”

“नहीं,” गरिमा बीच में ही बोल पड़ी, “मैं ने तुम्हारे साथ कितना एडजस्ट किया है. छोटीछोटी बातों को इग्नोर कर के तुम्हारे साथ खुशीखुशी रहने का प्रयास करती रही. लेकिन अब नहीं. मैं औफिस टूर पर अवश्य जाऊंगी और मेरे आने का इंतजार न करना.”

“मतलब?” शिशिर समझ न सका.

“मतलब यही कि अब मैं समझ चुकी हूं कि जिंदगी सिर्फ भावनाओं पर टिकी नहीं होती. उसे समझदाररूपी दृढ़ स्तंभ की भी आवश्यकता होती है और अब मेरी समझदारी कह रही है कि मुझे तुम से दूर हो जाना चाहिए.”

“गरिमा, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. तुम मेरे प्यार को यों छोड़ नहीं सकतीं. शीघ्र ही हम दोनों वैवाहिक बंधन में बंध जाएंगे.”

“वैवाहिक बंधन? मैं ने ठीक ही कहा था कि शादी से पहले एकदूसरे को अच्छी तरह जान लेना चाहिए. कुछ महीनों के साथ में ही मैं तुम्हें जान चुकी हूं. मैं भावुक हूं, बेवकूफ नहीं. लिवइन में रहना मेरे जीवन का एक गलत फैसला रहा.”

“मैं ने तुम्हें खुशियों के उजाले दिए,” शिशिर ने कहा.

“तुम्हारे साथ बिताए गए समय में चंद खुशी जबकि स्याह घनी रात अधिक मिली. लेकिन मैं अपने अस्तित्व को इस रात के अंधेरे में खोने नहीं दूंगी. मैं जा रही हूं अपने जीवन को नए सिरे से जीने के लिए. मुझे एहसास हो रहा है कि नया सवेरा मेरा इंतजार कर रहा है,” कहती हुई गरिमा अपना सामान पैक करती है और शिशिर का साथ छोड़ कर निकल पड़ती है अपनी मेहनत और अपने सपनों को नूतन सुखद दिन से मिलवाने के लिए.

लेखिका- रेखा भारती 

Hindi Story : तुम डरना मत राहुल – क्या राहुल को मिल सके अपने जवाब

Hindi Story : सारा ने कालेज जाने के लिए तैयार अपने बेटे राहुल को प्यारभरी नजरों से निहारते हुए कहा, ‘‘नर्वस क्यों हो बेटा. मेहनत तो की है न, एग्जाम अच्छा होगा, डोंट वरी.’’ राहुल ने मां से मायूसी से कहा, ‘‘पता नहीं मां, देखते हैं.’’

औफिस के लिए निकलते जय ने राहुल से कहा, ‘‘आओ बेटा, आज मैं तुम्हें कालेज छोड़ देता हूं.’’ ‘‘नहीं पापा, रहने दीजिए, मुझे अजय को भी उस के घर से लेना है, उस की स्कूटी खराब है, मैं अपनी स्कूटी ले जाऊंगा तो आने में भी हमें आसानी रहेगी.’’

‘‘ठीक है, औल द बैस्ट,’’ कह कर जय औफिस के लिए निकल गए. सारा ने भी स्नेहपूर्वक बेटे को विदा किया और उस के बाद वह घरेलू कामों में लग गई. वह घर के काम तो कर रही थी पर उस का मन राहुल में अटका था. सारा और जय के अंतर्जातीय प्रेमविवाह को 25 साल हो गए थे. दोनों के बीच न तो धर्म कभी मुद्दा बना, न ही दोनों ने कभी लोगों की परवा की. दोनों का मानना था कि प्रेम से अनजान लोग इंसान के दिलोदिमाग को धर्म के बंधन में बांधते रहते हैं. धर्म को एक किनारे रख दोनों ने कोर्टमैरिज कर वैवाहिक जीवन की मजबूत नींव रख ली थी. लेकिन 21 वर्षीय राहुल कुछ समय से धर्म के बारे में भ्रमित था, उस के सवाल कुछ ऐसे होते थे, ‘मां, कौन सी सुप्रीम पावर सच है? हर धर्म अपने को बड़ा मानता है, पर वास्तव में बड़ा कौन सा है?’

सारा और जय अभी तक तो हलकेफुलके ढंग उसे जवाब दे देते थे लेकिन अब सारा को बात कुछ गंभीर लग रही थी, राहुल इस विषय पर बहुत सोचने लगा था. धर्म से जुड़ी हर बात पर उस का एक तर्क होता था. न कभी सारा ने इसलाम धर्म की बात की थी और न ही जय ने कभी वेदपुराण व पंडितों की. दोनों, बस, जीवन की राह पर एकदूसरे के साथ प्यार से आगे बढ़ रहे थे. जय उच्च पद पर कार्यरत था जबकि सारा एक अच्छी हाउसवाइफ थी.

राहुल के बारे में यों ही सोचतेसोचते सारा का पूरा दिन निकल गया और राहुल शाम को परीक्षा दे कर घर भी आ गया. वह खुश था, उस का एग्जाम बहुत अच्छा हुआ था. दोनों मांबेटे ने साथ खाना खाया और राहुल फिर सारा के पास ही लेट गया. राहुल को गंभीर देख सारा ने पूछा, ‘‘क्या सोच रहे हो बेटे?’’ ‘‘वही सब मां.’’

सारा सचेत हुई, ‘‘क्या?’’ ‘‘बस, यही कि मैं जब अजय को लेने गया तो वह पूजा कर रहा था. उस की मम्मी ने उसे तिलक लगाया, उस का मीठा मुंह करवाया और उसे शुभकामनाएं दीं. लेकिन इतना कुछ करने के बाद भी अजय के अधिकांश सवाल तो छूट ही गए और काफी कुछ उसे आया भी नहीं. वह काफी उदास था, कह रहा था कि इतना पूजापाठ किया, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला. पर आप ने तो यह सब नहीं किया, फिर भी मेरा एग्जाम अच्छा हुआ. मां, आखिर उस का इतना पूजापाठ करने का क्या फायदा हुआ. क्यों नहीं सुनी गई उस की. वैसे, मैं मन ही मन काफी डरा हुआ था, हमेशा की तरह आप मुझे ऐसे ही भेज रही थीं पर मेरा एग्जाम बहुत अच्छा हुआ, मां.’’

सारा आज बेटे के मन की सारी दुविधा दूर करने के लिए तैयार थी, ‘‘वह इसलिए बेटा, तुम ने बहुत मेहनत की और सफलता हमेशा मेहनत से ही मिलती है, इन सब ढोंगों

से नहीं.’’ ‘‘पर मां, हम लोग तो कभी कोई पूजापाठ नहीं करते, मेरे अन्य दोस्तों के यहां तो अलग ही माहौल होता है. आरिफ तो रातरात भर जाग कर इबादत करता है और कैरेन हर संडे चर्च जरूर जाती है चाहे कुछ हो जाए. अजय का हाल तो मैं ने अभी आप को बता ही दिया है. मां, आप को डर नहीं लगता कि हम लोगों के साथ कुछ बुरा न हो जाए? कहीं जो एक सुप्रीम पावर है, वह हम से नाराज न हो जाए.’’

‘‘कौन सी सुप्रीम पावर की बात कर रहे हो बेटा? यह सब, बस, धर्म का डर है जो पीढि़यों से हमारे परिवार वाले हमारे अंदर बिठाते चले गए. राहुल, यह हमारे अंदर बैठा धर्म का बस एक डर है जो हमें इन अंधविश्वासों को मानने के लिए मजबूर करता है. तुम कभी डरना मत. बस, सचाई और मेहनत से आगे बढ़ते चलो.’’ ‘‘पर मां, धर्म भी तो सच बोलने के लिए कहता है.’’

‘‘सचाई धर्म की नहीं, समाज की मांग है कि हम सच बोलें, अच्छे रास्ते पर चलें. बस, हमारा यही कर्तव्य है. धर्म के नाम पर नहीं, बल्कि समाज की बेहतरी के लिए सचाई, मेहनत और ईमानदारी के रास्ते पर चलना है?’’ ‘‘पर मां, डर नहीं लगता कि हमारे साथ कुछ बुरा न हो जाए, हमारे सामने कोई परेशानी आएगी तो फिर हम किस से मदद मांगेंगे, कौन सुनेगा हमारी?’’

‘‘कोई परेशानी आएगी तो हिम्मत रख कर उस का सामना कर लेना. जो लोग धार्मिक अंधविश्वासों में अपना समय बरबाद कर रहे हैं, क्या उन के साथ कुछ बुरा नहीं होता? उन्हें कभी कोई दुख नहीं होता? धर्म इंसान को कायर, डरपोक बना रहा है, उसे आगे बढ़ने के बजाय पीछे ढकेलता है. ‘‘तुम्हें याद है न, 5 साल पहले तुम्हारे पापा की तबीयत बहुत खराब हो गई थी. उन्हें हमें अस्पताल में ऐडमिट करना पड़ा था. मैं तो कहीं पूजा करने नहीं भागी. यही सोचा था कि जय शहर के एक अच्छे अस्पताल में भरती हैं और अच्छे डाक्टर्स उन का इलाज कर रहे हैं, वे जल्दी ठीक हो जाएंगे. और ठीक हुए भी. उस समय उन को अच्छे इलाज की ही जरूरत थी और वह उन्हें मिला तो जय कितनी जल्दी ठीक हो गए थे, याद है न तुम्हें राहुल?’’

‘‘हां मां, आप की फ्रैंड्स घर आ कर कहती थीं कि आप के ग्रह खराब हैं, आप को कुछ पूजा वगैरह करवानी चाहिए, लेकिन तब आप कितने आराम से कहती थीं, सब ठीक हो जाएगा, तुम लोग परेशान न हो.’’ और राहुल हंस पड़ा तो सारा भी मुसकरा दी. राहुल आगे बोला, ‘‘पता है मां, मेरे सारे दोस्त मुझ से पूछते रहते हैं कि तुम लोग किस धर्म को मानते हो, लेकिन मैं उन्हें हंस कर टाल देता हूं, बता ही नहीं पाता किसी धर्म के बारे में.’’

‘‘बेटा, बता देना अपने दोस्तों को कि हम लोग आधुनिक विचारधारा वाले हैं. हमारा एक ही धर्म है इंसानियत का. कर्म करते रहने का. मेरे मातापिता व्यावहारिक हैं और बिना किसी धर्म को माने भी हमें जीवन में सबकुछ मिल रहा है. हमारे जीवन में भी वही सुखदुख लगे रहते हैं जो आप लोगों के जीवन में आते हैं. उन्हें बता देना कि हम ने ऐसा कुछ नहीं खोया है जोकि किसी धर्म के अंधविश्वासों के बंधन में बंध कर उन्हें मिल गया या हमारा कोई भारी नुकसान हो गया.’’ सारा ने अब हंसते हुए राहुल से कहा, ‘‘उन के बच्चे धर्म के विश्वास का सहारा ले कर भी फेल होते हैं और तुम ने इन बेकार बातों पर आंख मूंद कर विश्वास किए बिना पिछले साल कालेज में टौप किया है. तुम्हें पता ही है, हमारे सारे रिश्तेदार भी हमें नास्तिक, बेकार कह कर ताने मारते हैं, पर हमारे किसी भी सवाल का जवाब उन के पास नहीं होता.’’

राहुल ने हंसते हुए मां के गले में बांहें डाल दीं, ‘‘पर मेरी मां के पास हर सवाल का जवाब है. आई प्रौमिस, मां, मेरे मन में अब कोई डर नहीं रहेगा.’’

‘‘वैरी गुड, दैट्स लाइक आवर सन.’’ राहुल का मन हलका हो गया था. वह अगले एग्जाम की तैयारी के बारे में सोचने लगा था. सारा खुश थी कि उस ने अपने बेटे को वही सीधा, उचित रास्ता दिखाया है जिस पर वह और जय 25 सालोें से चल रहे हैं. अब उन का बेटा भी बिना किसी दुविधा के, बिना किसी शंका के उस रास्ते पर उन के साथ था, यह उन के लिए काफी खुशी की बात थी.

Social Issue : भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता

Social Issue : किसी भी देश  की प्रगति उस की आर्थिक समानता से लगाई जाती है. भारत में एक तरफ अमीरों की संख्या बढ़ रही है तो दूसरी ओर गरीबों की संख्या बढ़ रही है. भारत में 5 साल में अमीरों की संख्या 26 गुना बढ़ गई है. दूसरी तरफ 80 लाख से अधिक परिवारों को मुफ्त भोजन देना पड़ रहा है. नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में 1 करोड़ डौलर से अधिक संपत्ति वालों की संख्या 85,698 पहुंच गई. देश में अब 191 अरबपति हैं. इस से देश में अमीरी और गरीबी की बढ़ती खाई को समझा जा सकता है.

रियल एस्टेट परामर्श कंपनी नाइट फ्रैंक द्वारा जारी ‘द वैल्थ रिपोर्ट-2025’ के अनुसार, एक करोड़ डौलर (लगभग 87 करोड़ रुपए) से अधिक संपत्ति रखने वाले भारतीयों की संख्या 2024 में 85,698 तक पहुंच गई है. यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में 6 फीसदी अधिक है. इस के अलावा भारत में अरबपतियों की संख्या बढ़ कर 191 हो गई है. यह पिछले वर्ष की तुलना में 26 फीसदी अधिक है.

देश में महंगे मकानों, गाड़ियों में चलने वालों की संख्या बढ़ रही है, दूसरी तरफ अभी भी बहुत सारे लोगों के पास रहने के लिए मकान नहीं है. उन को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान देने पड़ रहे हैं. किसानों को 5 सौ रुपए प्रतिमाह किसान सम्मान निधि के मिल रहे हैं. जहां का किसान 5 सौ रुपए प्रतिमाह सम्मान निधि पा कर खुश हो, उस देश की तरक्की को समझा जा सकता है. देश में बढ़ रही आर्थिक असमानता आने वाले दिनों में खतरनाक हो जाएगी.

Rahul Gandhi : कट्टरता की नहीं, विचारधारा की लड़ाई

Rahul Gandhi : कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने गुजरात प्रदेश की राजधानी अहमदाबाद में अपने निकाय स्तर से नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित की रहे थे. इस पूरे भाशण में राहुल गांधी ने खुलकर अपनी बात कही. राहुल के भाषण का एक हिस्सा निकाल कर एक नया नैरेटिक गढ़ने का काम विरोधियों ने शुरू कर दिया. भाषण के एक हिस्से के आधार पर ही राहुल गांधी की आलोचना शुरू कर दी.

असल में राहुल गांधी ने वह बात खुल कर कही है जो कांग्रेस का बड़ा नेता कभी नहीं कह पाया. चाहे वह जवाहर लाल नेहरू हो या इंदिरा गांधी या फिर राजीव गांधी ही क्यो न रहे हो. कांग्रेस का जब से गठन हुआ उस में पौराणिकवाद को मानने वालों की बड़ी संख्या रही है. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल और डाक्टर राजेन्द्र कुमार जैसे नेता पौराणिकवाद की सोच थे.

देश के आजाद होने के बाद जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बने तो कई ऐसे मसले आए जहां जवाहर लाल नेहरू के विचार इन कांग्रेस के नेताओं से नहीं मिलते थे. खासतौर पर धर्म को ले कर जैसे राममंदिर का मसला था. जब अयोध्या के राममंदिर में मूर्तियां प्रगट होने की घटना हुई तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पंत ने प्रधानमंत्री नेहरू की बात मानने इनकार कर दिया. नेहरू चाहते थे कि मंदिर में रखी गई मूर्तियों को हटाया जाए. कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पंत ने इस बात से इंकार कर दिया.

सोमनाथ के मंदिर का जीर्णोधार को ले कर भी नेहरू के विचार अलग थे. वह इस बात से खुश नहीं थे कि राष्ट्रपति राजेन्द्र कुमार वहां गए थे. हिंदू विवाह अधिनियम जिस के आधार पर आज सवर्ण महिलाएं आजादी का अनुभव कर रही है उस को लागू करते समय नेहरू का विरोध हुआ था. कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को पौराणिकवाद की सोच रखने वाले नेताओं के दवाब में तमाम काम करने पड़े. नेहरू, इंदिरा और राजीव का राजनीतिक कद इतना बड़ा था कि पौराणिक सोच वाले नेता प्रभावी नहीं हो पाते थे.

राहुल गांधी ने जब से राजनीति में कदम रखा है कांग्रेस पहले जैसी ताकत में नहीं रही है. 2004 से 2014 तक यूपीए की सरकार थी. जिस की अगुवा कांग्रेस भले ही थी, लेकिन वह सहयोगी दलों के सहारे सरकार चला रही थी. 2014 से 2025 में कांग्रेस विपक्ष में है और उस की खराब हालत है. 2014 और 2019 के दो लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पास नेता विपक्ष बनने लायक भी सांसद नहीं थे. 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को थोड़ी सफलता मिली. राहुल गांधी नेता पतिपक्ष बन गए. इस के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ही हार ने पार्टी के मनोबल को तोड़ दिया है.

राहुल गांधी कितना भी कहें कि उन पर चुनावी हारजीत का प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन राजनीतिक दल होने के नाते कांग्रेस को हर चुनाव का सामना करना पड़ता है. ऐसे में राहुल गांधी चाहे या न चाहे उन के हर कदम हर फैसले को चुनावी कसौटी से गुजरना ही पड़ेगा. गुजरात में राहुल गांधी ने जो कहा वह अपनी पार्टी के बीच कहने में नेता संकोच करते हैं. राहुल गांधी यह कहने का साहस कर सके इस से पार्टी कार्यकर्ता बेहद खुश है. गुजरात में 2 साल के बाद विधानसभा के चुनाव है. ऐसे में कांग्रेस के कार्यकर्ता खुश है उन को लग रहा है कि अब पार्टी में बदलाव होगा.

कांग्रेस नेता अहमद पटेल की बेटी मुमताज पटेल ने कहा है कि “राहुल गांधी को ऐसे लोगों की पहचान करनी चाहिए. ऐसे बहुत लोग हैं जो अपने स्वार्थ के लिए, पार्टी में आरामदायक पोजिशन पर बैठे हैं वो लोग नहीं चाहते कि नए लोग, नए चेहरे आगे आएं. अंदर से भी महसूस होता है कि हमें रोका जा रहा है. राहुल गांधी पार्टी के भीतर ऐसे लोगों की पहचान करेंगे जो दूसरों को काम करने का मौका नहीं देते. मैं राहुल गांधी से आग्रह करती हूं तो वो पहचानिए कौन वो ऐसे लोग हैं जो सही लोगों को आप की पार्टी के साथ जुड़ने नहीं देते हैं, जो ईमानदार लोगों को जुड़ने नहीं देते हैं. मैं उम्मीद करती हूं कि ऐसे लोगों को पहचानेंगे और कांग्रेस से उन को बाहर करेंगे.”

क्या थी राहुल गांधी की पूरी बात ?

राहुल गांधी गुजरात के अहमदाबाद में पार्टी कार्यकर्ताओं और निकाय चुनाव के पूर्व उम्मीदवारों की एक सभा को संबोधित कर रहे थे. राहुल गांधी ने गुजरात में कहा ‘यहां कांग्रेस पार्टी के कुछ लोग बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं, उन्हें पार्टी से निकाल देना चाहिए. गुजरात में कांग्रेस का नेतृत्व बंटा हुआ है और वो गुजरात को रास्ता दिखा नहीं पा रहा. यहां के नेतृत्व में दो तरह के लोग हैं, कुछ वो हैं जो जनता के साथ खड़े हैं और जिन के दिल में कांग्रेस की विचारधारा है और दूसरे वो हैं जो जनता से कटे हुए हैं और इस में से आधे बीजेपी से मिले हुए हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘कांग्रेस रेस के घोड़े को बारात में भेज देती है और बारात के घोड़े को रेस में भेज देती है. पार्टी में नेताओं की कमी नहीं है लेकिन वे बंधे हुए हैं. अगर सख्त कार्रवाई करनी पड़े और 30 से 40 लोगों को निकालना पड़े तो, निकाल देना चाहिए. कांग्रेस के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को सीधे जनता से जुड़ना पड़ेगा, तभी जनता उन पर यकीन करेगी.’

वे अपनी बात जारी रखते हैं, ‘गुजरात में 30 साल से कांग्रेस की सरकार नहीं बन सकी है, इस बार उन का इरादा इस स्थिति को बदलने का है. यहां विपक्ष के पास 40 फीसदी वोट हैं यहां विपक्ष छोटा नहीं है. अगर गुजरात के किसी भी कोने में दो लोगों को आप खड़ा कर देंगे तो उस में से एक बीजेपी का और दूसरा कांग्रेस का निकलेगा. यानी दो में से एक हमारा, एक उन का होगा. लेकिन हमारे मन में है कि कांग्रेस के पास दम नहीं है. अगर गुजरात में हमारा वोट पांच फीसदी बढ़ जाएगा तो भाजपा वहीं खत्म हो जाएगी. तेलंगना में हम ने 22 फीसदी वोट बढ़ाया है, यहां तो सिर्फ 5 फीसदी की जरूरत है.‘

वे आगे कहते हैं, ‘गुजरात की जनता को पार्टी नेतृत्व नया विकल्प नहीं दे पा रही है. कांग्रेस को उस का ओरिजिनल नेतृत्व गुजरात ने दिया है और उस नेतृत्व ने हमें सोचने का तरीका, लड़ने का तरीका और जीने तरीका दिया. गुजरात नया विकल्प चाह रहा है, लेकिन कांग्रेस पार्टी उसे दिशा नहीं दिखा पा रही है. चाहे हमारे जनरल सेक्रेटरी हों, चाहे हमारे पीसीसी अधयक्ष हों, कांग्रेस पार्टी जनता को दिशा नहीं दिखा पा रही है. यह सच्चाई है, और इसे कहने में मुझे कोई शर्म या डर नहीं है. गुजरात के नेतृत्व में दो तरह के लोग हैं, इस में बंटवारा है. एक तरह के लोग हैं जो जनता के साथ खड़े हैं और जिन के दिल में कांग्रेस की विचारधारा है. और दूसरे वो हैं जो जनता से कटे हुए हैं, इन में से आधे भाजपा से मिले हुए हैं.

‘कांग्रेस पार्टी में नेताओं की कमी नहीं है. डिस्ट्रिक्ट लेवल, ब्लौक लेवल, सीनियर लेवल नेता हैं, बब्बर शेर हैं. मगर पीछे से चेन लगी हुई है और बब्बर शेर बंधे हुए हैं सब. एक बार मेरी मीटिंग हो रही थी. शायद मध्य प्रदेश का डेलिगेशन था एक. वहां पर एक कार्यकर्ता खड़ा हुआ और कहा कि राहुल जी आप एक काम कर दीजिए. उस ने कहा दो तरह के घोड़े होते हैं. एक होता है रेस का और एक होता है शादी का. कांग्रेस पार्टी रेस के घोड़े को बारात में डाल देती है और बारात के घोड़े को रेस में डाल देती है.

‘अब गुजरात की जनता देख रही है. कह रही है कि भैया कांग्रेस पार्टी ने रेस में बारात का घोड़ा डाल दिया. अगर हमें रिश्ता बनाना है तो हमें दो काम करने हैं. पहला काम, जो दो ग्रुप हैं हमें उन्हें अलग करना पड़ेगा. अगर हमें सख्त कार्रवाई करनी पड़े और 30 से 40 लोगों को निकालना पड़े, तो निकाल देना चाहिए. बीजेपी के लिए अंदर से ए लोग काम कर रहे हैं, बाहर से काम करने दीजिए.

‘जीतने हारने की बात छोड़ दीजिए, जो हमारे नेता हैं, अगर उन का हाथ कटे को उस में से कांग्रेस का खून निकलना चाहिए. ऐसे लोगों के हाथ में संगठन का कंट्रोल होना चाहिए. जैसे ही हम यह करेंगे जनता हम से जुड़ेगी और हमें उन के लिए दरवाजे खोलने होंगे. कांग्रेस की उसी विचारधारा पर लौटना होगा, जो गुजरात की विचारधारा है. वही विचारधारा जो गुजरात की जनता, महात्मा गांधी जी और सरदार पटेल जी ने कांग्रेस को सिखाई है.’

विरोधियों ने बनाया मुद्दा

भाजपा नैरेटिव गढ़ने में माहिर है. उस ने राहुल गांधी के पूरे बयान से एक लाइन निकाल कर उस पर बहस को केन्द्रित करने में सफल रही. आज राजनीति विचारधारा से दूर लाभहानि को देख कर की जाती है. पहले यह समाजसेवा होती थी अब यह कैरियर है. इस में पूंजी का निवेश किया जा रहा है. पैसे का प्रभाव तो बढ़ा ही है पैसे वालो का भी प्रभाव बढ़ गया है. यह पूरी दुनिया में हो रहा है. भारत में नरेन्द्र मोदी के पीछे ‘अडानी और अंबानी’की ताकत है तो अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप के पीछे एलन मस्क जैसे पैसे वाले लोग हैं. नेताओं को अब सत्ता चाहिए. सत्ता के लिए वह पार्टी और विचारधारा को दरकिनार करने में नहीं चूकते हैं.

राहुल गांधी ऐसे नेता हैं जो चुनावी नफानुकसान नहीं देखते हैं. वह पार्टी की विचारधारा को सब से उपर मानते हैं. वह चाहते हैं कि कांग्रेस सही मायनों में भाजपा का विकल्प बनी रहे. वह खुद को भाजपा या उस के नेताओं की आलोचना तक सीमित नहीं रखते हैं. वह सावरकर बनाम गांधी और कांग्रेस बनाम संघ की बात करते हैं. विपक्ष के नेता अपनी सीमित सोच तक केवल भाजपा का विरोध ही कर पा रहे हैं. अब यह देखना है कि राहुल गांधी ने जो कहा उस हिसाब से वह कितना काम करते हैं. इस के लिए कांग्रेस कितनी तैयार है.

कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत कहती हैं, ‘भाजपा से लड़ना है तो बिना समझौते के लड़ना है. राहुल गांधी विचारधारा की लड़ाई लड़ रहे हैं. राहुल गांधी ने पूरी मुस्तैदी से कहा है कि अगर हमें भाजपा से लड़ना है तो बिना संशय के लड़ना है, बिना समझौते के लड़ना है, जिस निडरता से वो लड़ते हैं. मुझे लगता है कि अगर आप के मन में जरा सा भी संशय है या भय है तो आप इस लड़ाई में उन के सिपहसालार नहीं हो सकते. वो सही कह रहे हैं.’

कांग्रेस प्रवक्ता सुरेन्द्र राजपूत कहते हैं कि ‘राहुल गांधी ने कभी सत्ता की राजनीति नहीं की. वह विचारधारा की राजनीति करते हैं. कट्टरवाद के खिलाफ जो काम वह कर रहे हैं उसे दूसरा नेता नहीं कर सकता. इस वजह से भाजपा ही नहीं संघ भी राहुल गांधी से डरता है. भाजपा को कोई सत्ता से हटा सकता है तो वह केवल कांग्रेस ही है. राहुल से डर कर ही भाजपा उन के खिलाफ नैरेटिव चलाती है.’

कहां चूक रहे हैं राहुल गांधी ?

राहुल गांधी सोचते तो बहुत अच्छा हैं. उस दिशा पर वह काम भी करते हैं. इस के बाद भी उन की दिशा में भटकाव है. कभी वह सनातनी बन मंदिरमंदिर भटकने लगते हैं. अपना जनेउ दिखाने और गोत्र बताने लगते हैं. कभी पूरी तरह से वामपंथी बन जाते हैं. इस के बाद वह महाकुंभ और राममंदिर भी नहीं जाते हैं. राहुल गांधी को एक रास्ता तय करना होगा. राजनीति दो धाराओं के बीच फंसी है एक तरफ धर्म ग्रंथ है तो दूसरी तरफ संविधान. 2024 के चुनाव में राहुल गांधी ने संविधान का हाथ पकड़ा तो उन को सफलता भी मिली. वह भाजपा को 400 पार से रोकने में सफल रहे. संसद भवन में फिर वह शंकर की फोटो लहराने लगे.

एससी, ओबीसी और महिलाएं राहुल गांधी के बेहद करीब खुद हो पाते हैं. वह लोग राहुल गांधी की सब से बड़ी ताकत है. राहुल गांधी के पास वोट है पर नेता नहीं हैं. 12-15 सालों में कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़ कर चले गए. राहुल गांधी इन्ही के बारे में कह रहे थे. राहुल गांधी को एससी, ओबीसी और महिलाओं को समझाना पड़ेगा कि उन को जो मिल रहा है वह केवल संविधान के कारण ही मिल रहा है. राहुल इन के लिए कुछ करना चाहते हैं. भाजपा इन को आगे दिखा तो सकती है लेकिन असल ताकत वह अपने हाथ ही रखेंगे. पौराणिकवाद में फंस कर कांग्रेसियों का विचार भाजपाई होता जा रहा है. गुजरात कांग्रेस के नेता इस पर कितना खरे उतरते हैं यह देखने वाली बात है. राहुल गांधी ने जो कहा है उसे कर के दिखाना पड़ेगा, अन्यथा कांग्रेस को फायदा नहीं होगा.

Lifestyle : घर को न बनाएं कैमिस्ट शौप

Lifestyle : ‘बेटा मुझे डाक्टर के पास ले चलो, मेरा ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया है.’ सुदर्शन लाल ने बेटे के ऑफिस से लौटते ही फरमान सुनाया.

‘कितना है ब्लड प्रेशर?’ अमित ने पिता से पूछा.

‘160/100’ सुदर्शन लाल ने जवाब दिया.

‘कब चेक किया था?’

‘दोपहर में.’

‘चलिए मैं एक बार फिर चेक कर लेता हूं.’ अमित ने पिता की अलमारी से ब्लड प्रेशर नापने वाला इंस्ट्रूमेंट निकालते हुए कहा.
सुदर्शन लाल का ब्लड प्रेशर 120/80 निकला. अमित बोला, “पापा, आप का बीपी तो बिलकुल ठीक है.”

“पर दोपहर में तो 160/100 था. यानी बीपी फ्लकचुएट कर रहा है. बेटा डाक्टर को दिखा ही लेते हैं.”

“पापा, बीपी बिलकुल ठीक है. बेकार में डाक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं है. 800 रुपये फीस ले लेगा कर 800 की दवाई लिख देगा, जबकि आप बिलकुल ठीक हैं.”

पर सुदर्शन लाल को लगा कि बेटा पैसे बचाने के लिए ऐसा कह रहा है. दूसरे दिन खुद ही डाक्टर के पास चले गए और दवा लिखवा लाए.

ऐसे बहुतेरे बुजुर्ग हैं, और युवा भी हैं जो इस भय से ग्रस्त रहते हैं कि उन के शरीर में कुछ गड़बड़ है. ये भय कोरोना महामारी के बाद बहुत ज्यादा बढ़ गया है. जरा सी खांसी आई तो लोग समझने लगते हैं कि कंजेशन हो गया और फेफड़े संक्रमित हो गए हैं. फिर वे खुद को नेबुलाइज करने में लग जाते हैं. सुबह शाम नेबुलाइजर में दवा डाल डाल कर सांस के साथ खींचने लगते हैं.

पहले खांसी जुकाम होने पर मां किचन में रखे गरम मसालों का काढ़ा बना कर पिला देती थी. सारा जुकाम बह जाता था. या सरसों के तेल में अजवाइन जला कर छाती और पीठ की मालिश कर देती थी और खांसी छूमंतर हो जाती थी. साथ खेलने-पढ़ने वाले कुछ लड़कों की नाक तो बारहों महीने बहती थी, मगर कोई चिंता नहीं. तब कहां थे नेबुलाइजर? न इस बात का डर कि फेफड़े जाम हो जाएंगे. यह डर तो कोरोना ने पैदा किया और लोगों में नेबुलाइजर और स्टीमर खरीद कर घर में भर लिए. बड़े बुजुर्ग कहते थे मौसम बदलने पर सर्दी खांसी तो हो ही जाती है. चार पांच दिन में अपनेआप ठीक भी हो जाती है. मगर हम छींक आते ही घबरा उठते हैं.

जिन्हें शुगर की बीमारी है, या नहीं भी है, वे भी हर दिन अपना शुगर चेक करते दिखाई देते हैं. बाजार में शुगर चेक करने की अनेकों कंपनियों की मशीने धड़ाधड़ बिक रही हैं. किसी की शुगर थोड़ी हाई क्या हुई बस केमिस्ट शौप से शुगर चेक करने की मशीन और स्ट्रिप्स खरीद लाए और लगे उस पर खून के कतरे गिराने.

अमित के पिता पहले महीने में एक बार अपने फैमिली डाक्टर के पास जाते थे और वो उन का बीपी शुगर सब चेक कर देता था. उन्हें कभी इस के लिए दवा खाने की जरूरत नहीं पड़ी. डाक्टर का कहना था कि यह दोनों चीजें कुछ काम ज्यादा होती रहती हैं. खाने पीने से इसे कंट्रोल कर सकते हैं. आप चिंता में हैं, कहीं से लम्बी दूरी चल कर आ रहे हैं या मौसम गरम हो तो बीपी थोड़ा ऊपर हो जाता है. तनाव ख़त्म होने पर और मन शांत होने पर वह अपनेआप सामान्य हो जाता हो जाता है. यह बिलकुल वैसा ही है जैसे दौड़ लगा कर आने पर हार्ट बीट बढ़ जाती है और आराम करने पर सामान्य हो जाती है. इसी तरह खाना खाने के बाद या अधिक मीठी चीज खाने के बाद ब्लड शुगर थोड़ा बढ़ जाता है. मगर इसका मतलब यह नहीं कि आप डाक्टर के पास भागे चले जाएं या सुबह शाम बीपी शुगर चेक करते रहें.

पहले घरों में बमुश्किल एक थर्मामीटर हुआ करता था. कभी किसी को बुखार आ गया तो नाप लिया ताकि डाक्टर को बता सकें. मगर आज बीपी की मशीन, शुगर की मशीन, नेबुलाइजर, औक्सीजन नापने की मशीन, वजन तोलने की मशीन, स्टीमर, इलैक्ट्रिक हौट वाटर बैग्स, मसाज इंस्ट्रूमेंट, डिजिटल थर्मामीटर, ग्लूकोमीटर और ना जाने किन किन मैडिकल उपकरणों से हम ने अपने घर की अलमारियों को भर लिया है. जैसे घर न हुआ कैमिस्ट की दुकान हो गई. अब खरीदा है तो इन का प्रयोग भी करते हैं और तनाव पाल कर सचमुच बीमार पड़ जाते हैं.

अभिषेक के पिताजी कैमिस्ट हैं. अभिषेक कभीकभी उन के साथ दुकान पर बैठता था. उस के पास फार्मा की कोई डिग्री नहीं है फिर भी उस ने बाप को बढ़िया कमाई कर के दी. दरअसल अभिषेक के पिता तो बस दवाएं बेचते थे मगर अभिषेक ने कोरोना के टाइम पर अनेकों तरह के मेडिकल इंस्ट्रूमेंट्स से अपनी केमिस्ट की दुकान भर ली और दोगुने दामों पर बेच कर खूब कमाई की. कोरोना के टाइम पर लोगों का डाक्टर्स और पैथलैब्स तक जाना मुश्किल था तो अभिषेक ने अपने ग्राहकों के बीच नएनए मैडिकल उपकरणों का बखान कर आपदा में अवसर खोज लिया. सोशल मीडिया पर खूब एक्टिव रहने वाले अभिषेक ने औनलाइन ग्राहक भी खूब बना लिए. हर बीमारी की जांच के लिए उस के पास कोई ना कोई इंस्ट्रूमेंट मौजूद था. उस के पिता तो उसका बिज़नेस कौशल देख कर हतप्रभ थे. कोरोना काल के बाद अभिषेक ने मैडिकल इंस्ट्रूमेंट्स के होलसेल का काम शुरू कर दिया है.

अभिषेक जैसों के चक्कर में ही अमित के पिता जैसे लोग फंसते हैं और अपना पैसा और मन की शांति दोनों खोते हैं. अमित के पिता जी शारीरिक रूप से बिलकुल फिट हैं. मगर सारा दिन यूट्यूब पर विभिन्न इन्फ्लुएंसर्स के द्वारा प्रचारित की जा रही स्वास्थ्य सम्बन्धी बातें देख सुन कर खुद को बीमार समझने लगे हैं. दुनियाभर के मैडिकल उपकरण खरीद कर उन्होंने अपने बेडरूम की अलमारी में भर लिए हैं और आएदिन अपना शुगर, बीपी, औक्सीजन, वजन आदि नापते रहते हैं. सैर कर के आएंगे और बीपी चेक करने बैठ जाएंगे. ऐसे में बीपी तो बढ़ा हुआ दिखना ही है. इस से वे तनावग्रस्त हो जाते हैं और खुद को बीमार समझने लगते हैं.

होम मैडिकल उपकरणों का बाजार लगातार बढ़ रहा है. इस की एक वजह यह है कि अब लोगों की औसत उम्र बढ़ गई है. पहले जहां 60 – 65 साल तक लोग जीते थे वहीं अब 80 – 85 साल जीवन प्रत्याशा हो गई है. यानी समाज में बुजुर्गों की संख्या में इजाफा हो रहा है. पहले की अपेक्षा अब लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा भी ज्यादा है. इस के अलावा अनेक लोग बुढ़ापे में अकेला जीवन जी रहे हैं. फिर यूट्यूब और फेसबुक ने लोगों की सोच समझ को बुरी तरह प्रभावित किया है. खासकर बूढ़े लोगों की. सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स की बातों को वे बिलकुल सत्य समझने लगते हैं. सोशल मीडिया पर आने वाले विज्ञापनों के जरिए उन्हें नएनए उत्पादों के बारे में जानकारियां हासिल हो रही हैं. ऐसे में वे सोचते हैं कि डाक्टर के पास जा कर बारबार शरीर का चेकअप कराने से बेहतर है उपकरण खरीद कर घर में ही सारे टेस्ट कर लो. बहुतेरे लोग तो टेस्ट करने के बाद सोशल मीडिया पर ही दवाएं भी खोज लेते हैं. यह स्थिति काफी खतरनाक है.

Love Story : यही प्यार है – अखिलेश और रीमा की बेइंतहा मोहब्बत की कहानी

Love Story : दिसंबर का पहला पखवाड़ा चल रहा था. शीतऋतु दस्तक दे चुकी थी. सूरज भी धीरेधीरे अस्ताचल की ओर प्रस्थान कर रहा था और उस की किरणें आसमान में लालिमा फैलाए हुए थीं. ऐसा लग रहा था मानो ठंड के कारण सभी घर जा कर रजाई में घुस कर सोना चाहते हों. पार्क लगभग खाली हो चुका था, लेकिन हम दोनों अभी तक उसी बैंच पर बैठे बातें कर रहे थे. हम एकदूसरे की बातों में इतने खो गए थे कि हमें रात्रि की आहट का भी पता नहीं चला. मैं तो बस, एकाग्रचित्त हो अखिलेश की दीवानगी भरी बातें सुन रही थी.

‘‘मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं रीमा, मुझे कभी तनहा मत छोड़ना. मैं तुम्हारे बगैर बिलकुल नहीं जी पाऊंगा,’’ अखिलेश ने मेरी उंगलियों को सहलाते हुए कहा.

‘‘कैसी बातें कर रहे हो अखिलेश, मैं तो हमेशा तुम्हारी बांहों में ही रहूंगी, जिऊंगी भी तुम्हारी बांहों में और मरूंगी भी तुम्हारी ही गोद में सिर रख कर.’’

मेरी बातें सुनते ही अखिलेश बौखला गया, ‘‘यह कैसा प्यार है रीमा, एक तरफ तो तुम मेरे साथ जीने की कसमें खाती हो और अब मेरी गोद में सिर रख कर मरना चाहती हो? तुम ने एक बार भी यह नहीं सोचा कि मैं तुम्हारे बिना जी कर क्या करूंगा? बोलो रीमा, बोलो न.’’ अखिलेश बच्चों की तरह बिलखने लगा.

‘‘और तुम… क्या तुम उस दूसरी दुनिया में मेरे बगैर रह पाओगी? जानती हो रीमा, अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो क्या कहता,’’ अखिलेश ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘यदि तुम इस दुनिया से पहले चली जाओगी तो मैं तुम्हारे पास आने में बिलकुल भी देर नहीं करूंगा और यदि मैं पहले चला गया तो फिर तुम्हें अपने पास बुलाने में देर नहीं करूंगा, क्योंकि मैं तुम्हारे बिना कहीं भी नहीं रह सकता.’’

अखिलेश का यह रूप देख कर पहले तो मैं सहम गई, लेकिन अपने प्रति अखिलेश का यह पागलपन मुझे अच्छा लगा. हमारे प्यार की कलियां अब खिलने लगी थीं. किसी को भी हमारे प्यार से कोई एतराज नहीं था. दोनों ही घरों में हमारे रिश्ते की बातें होने लगी थीं. मारे खुशी के मेरे कदम जमीन पर ही नहीं पड़ते थे, लेकिन अखिलेश को न जाने आजकल क्या हो गया था. हर वक्त वह खोयाखोया सा रहता था. उस का चेहरा पीला पड़ता जा रहा था. शरीर भी काफी कमजोर हो गया था.

मैं ने कई बार उस से पूछा, लेकिन हर बार वह टाल जाता था. मुझे न जाने क्यों ऐसा लगता था, जैसे वह मुझ से कुछ छिपा रहा है. इधर कुछ दिनों से वह जल्दी शादी करने की जिद कर रहा था. उस की जिद में छिपे प्यार को मैं तो समझ रही थी, मगर मेरे पापा मेरी शादी अगले साल करना चाहते थे ताकि मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर लूं. इसलिए चाह कर भी मैं अखिलेश की जिद न मान सकी.

अखिलेश मुझे दीवानों की तरह प्यार करता था और मुझे पाने के लिए वह कुछ भी कर सकता था. यह बात मुझे उस दिन समझ में आ गई जब शाम को अखिलेश ने फोन कर के मुझे अपने घर बुलाया. जब मैं वहां पहुंची तो घर में कोई भी नहीं था. अखिलेश अकेला था. उस के मम्मीपापा कहीं गए हुए थे. अखिलेश ने मुझे बताया कि उसे घबराहट हो रही थी और उस की तबीयत भी ठीक नहीं थी इसलिए उस ने मुझे बुलाया है.

थोड़ी देर बाद जब मैं उस के लिए कौफी बनाने रसोई में गई, तभी अखिलेश ने पीछे से आ कर मुझे आलिंगनबद्ध कर लिया, मैं ने घबरा कर पीछे हटना चाहा, लेकिन उस की बांहों की जंजीर न तोड़ सकी. वह बेतहाशा मुझे चूमने लगा, ‘‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता रीमा, जीना तो दूर तुम्हारे बिना तो मैं मर भी नहीं पाऊंगा. आज मुझे मत रोको रीमा, मैं अकेला नहीं रह पाऊंगा.’’

मेरे मुंह से तो आवाज तक नहीं निकल सकी और एक बेजान लता की तरह मैं उस से लिपटती चली गई. उस की आंखों में बिछुड़ने का भय साफ झलक रहा था और मैं उन आंखों में समा कर इस भय को समाप्त कर देना चाहती थी तभी तो बंद पलकों से मैं ने अपनी सहमति जाहिर कर दी. फिर हम दोनों प्यार के उफनते सागर में डूबते चले गए और जब हमें होश आया तब तक सारी सीमाएं टूट चुकी थीं. मैं अखिलेश से नजरें भी नहीं मिला पा रही थी और उस के लाख रोकने के बावजूद बिना कुछ कहे वापस आ गई.

इन 15 दिन में न जाने कितनी बार वह फोन और एसएमएस कर चुका था. मगर न तो मैं ने उस के एसएमएस का कोई जवाब दिया और न ही उस का फोन रिसीव किया. 16वें दिन अखिलेश की मम्मी ने ही फोन कर के मुझे बताया कि अखिलेश पिछले 15 दिन से अस्पताल में भरती है और उस की अंतिम सांसें चल रही हैं. अखिलेश ने उसे बताने से मना किया था, इसलिए वे अब तक उसे नहीं बता पा रही थीं.

इतना सुनते ही मैं एकपल भी न रुक सकी. अस्पताल पहुंचने पर मुझे पता चला कि अब उस की जिंदगी के बस कुछ ही क्षण बाकी हैं. परिवार के सभी लोग आंसुओं के सैलाब को रोके हुए थे. मैं बदहवास सी दौड़ती हुई अखिलेश के पास चली गई. आहट पा कर उस ने अपनी आंखें खोलीं. उस की आंखों में खुशी की चमक आ गई थी. मैं दौड़ कर उस के कृशकाय शरीर से लिपट गई.

‘‘तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं अखिलेश, सिर्फ ‘कौल मी’ लिख कर सैकड़ों बार मैसेज करते थे. क्या एक बार भी तुम अपनी बीमारी के बारे में मुझे नहीं बता सकते थे? क्या मैं इस काबिल भी नहीं कि तुम्हारा गम बांट सकूं?‘‘

‘‘मैं हर दिन तुम्हें फोन करता था रीमा, पर तुम ने एक बार भी क्या मुझ से बात की?’’

‘‘नहीं अखिलेश, ऐसी कोई बात नहीं थी, लेकिन उस दिन की घटना की वजह से मैं तुम से नजरें नहीं मिला पा रही थी.’’

‘‘लेकिन गलती तो मेरी भी थी न रीमा, फिर तुम क्यों नजरें चुरा रही थीं. वह तो मेरा प्यार था रीमा ताकि तुम जब तक जीवित रहोगी मेरे प्यार को याद रख सकोगी.’’

‘‘नहीं अखिलेश, हम ने साथ जीनेमरने का वादा किया था. आज तुम मुझे मंझधार में अकेला छोड़ कर नहीं जा सकते,’’ उस के मौत के एहसास से मैं कांप उठी.

‘‘अभी नहीं रीमा, अभी तो मैं अकेला ही जा रहा हूं, मगर तुम मेरे पास जरूर आओगी रीमा, तुम्हें आना ही पड़ेगा. बोलो रीमा, आओगी न अपने अखिलेश के पास’’,

अभी अखिलेश और कुछ कहता कि उस की सांसें उखड़ने लगीं और डाक्टर ने मुझे बाहर जाने के लिए कह दिया.

डाक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद अखिलेश को नहीं बचाया जा सका. मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई थी. मेरा तो सुहागन बनने का रंगीन ख्वाब ही चकनाचूर हो गया. सब से बड़ा धक्का तो मुझे उस समय लगा जब पापा ने एक भयानक सच उजागर किया. यह कालेज के दिनों की कुछ गलतियों का नतीजा था, जो पिछले एक साल से वह एड्स जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहा था. उस ने यह बात अपने परिवार में किसी से नहीं बताई थी. यहां तक कि डाक्टर से भी किसी को न बताने की गुजारिश की थी.

मेरे कदमों तले जमीन खिसक गई. मुझे अपने पागलपन की वह रात याद आ गई जब मैं ने अपना सर्वस्व अखिलेश को समर्पित कर दिया था.

आज उस की 5वीं बरसी है और मैं मौत के कगार पर खड़ी अपनी बारी का इंतजार कर रही हूं. मुझे अखिलेश से कोई शिकायत नहीं है और न ही अपने मरने का कोई गम है, क्योंकि मैं जानती हूं कि जिंदगी के उस पार मौत नहीं, बल्कि अखिलेश मेरा बेसब्री से इंतजार कर रहा होगा.

मैं ने अखिलेश का साथ देने का वादा किया था, इसलिए मेरा जाना तो निश्चित है परंतु आज तक मैं यह नहीं समझ पाई कि मैं ने और अखिलेश ने जो किया वह सही था या गलत?

अखिलेश का वादा पक्का था, मेरे समर्पण में प्यार था या हम दोनों को प्यार की मंजिल के रूप में मौत मिली, यह प्यार था. क्या यही प्यार है? क्या पता मेरी डायरी में लिखा यह वाक्य मेरा अंतिम वाक्य हो. कल का सूरज मैं देख भी पाऊंगी या नहीं, मुझे पता नहीं.

Romantic Story : टीसता जख्म – उमा के व्यक्तित्व पर अनवर ने कैसा दाग लगाया

Romantic Story : अचानक उमा की आंखें खुलती हैं. ऊपर छत की तरफ देखती हुई वह गहरी सांस लेती है. वह आहिस्ता से उठती है. सिरहाने रखी पानी की बोतल से कुछ घूंट अपने सूखे गले में डालती है. आंखें बंद कर वह पानी को गले से ऐसे नीचे उतारती है जैसे उन सब बातों को अपने अंदर समा लेना चाहती है. पर, यह हो नहीं पा रहा. हर बार वह दिन उबकाई की तरह उस के पेट से निकल कर उस के मुंह में भर आता है जिस की दुर्गंध से उस की सारी ज्ञानेंद्रियां कांप उठती हैं.

पानी अपने हलक से नीचे उतार कर वह अपना मोबाइल देखती है. रात के डेढ़ बजे हैं. वह तकिए को बिस्तर के ऊंचे उठे सिराहने से टिका कर उस पर सिर रख लेट जाती है.

एक चंदन का सूखा वृक्ष खड़ा है. उस के आसपास मद्धिम रोशनी है. मोटे तने से होते हुए 2 सूखी शाखाएं ऊपर की ओर जा रही हैं, जैसे कि कोई दोनों हाथ ऊपर उठाए खड़ा हो. बीच में एक शाखा चेहरे सी उठी हुई है और तना तन लग रहा है. धीरेधीरे वह सूखा चंदन का पेड़ साफ दिखने लगता है. रोशनी उस पर तेज हो गई है. बहुत करीब है अब… वह एक स्त्री की आकृति है. यह बहुत ही सुंदर किसी अप्सरा सी, नर्तकी सी भावभंगिमाएं नाक, आंख, होंठ, गरदन, कमर की लचक, लहराते सुंदर बाजू सब साफ दिख रहे हैं.

चंदन की खुशबू से वहां खुशनुमा माहौल बन रहा है कि तभी उस सूखे पेड़ पर उस उकेरी हुई अप्सरा पर एक विशाल सांप लिपटा हुआ दिखने लगता है. बेहद विशाल, गहरा चमकीला नीला, हरा, काला रंग उस के ऊपर चमक रहा है. सारे रंग किसी लहर की तरह लहरा रहे हैं. आंखों के चारों ओर सफेद चमकीला रंग है. और सफेद चमकीले उस रंग से घिरी गोल आंख उस अप्सरा की पूरी काया को अपने में समा लेने की हवस लिए हुए है. रक्त सा लाल, किसी कौंधती बिजली से कटे उस के अंग उस काया पर लपलपा रहे हैं.

वह विशाल सांप अपनी जकड़ को घूमघूम कर इतना ज्यादा कस रहा है कि वह उस पेड़ को मसल कर धूल ही बना देना चाह रहा है. तभी वह काया जीवित हो जाती है. सांप उस से दूर गिर पड़ता है. वह एक सुंदर सी अप्सरा बन खड़ी हो जाती है और सांप की तरफ अपनी दृष्टि में ठहराव, शांति, आत्मविश्वास और आत्मशक्ति से ज्यों ही नजर डालती है वह सांप गायब हो जाता है और उमा जाग जाती है. सपने को दोबारा सोच कर उमा फिर बोतल से पानी की घूंट अपने हलक से उतारती है. अब उसे नींद नहीं आ रही.

भारतीय वन सेवा के बड़े ओहदे पर है उमा. उमा को मिला यह बड़ा सा घर और रहने के लिए वह अकेली. 3 तो सोने के ही कमरे हैं जो लगभग बंद ही रहते हैं. एक में वह सोती है. उमा उठ कर बाहर के कमरे में आ जाती है. बड़ी सी पूरे शीशे की खिड़की पर से परदा सरका देती है. दूरदूर तक अंधेरा. आईजीएनएफए, देहरादून के अहाते में रोशनी करते बल्ब से बाहर दृश्य धुंधला सा दिख रहा था. अभीअभी बारिश रुकी थी. चिनार के ढलाव से नुकीले पत्तों पर लटकती बूंदों पर नजर गड़ाए वह उस बीते एक दिन में चली जाती है…

उन दिनों वह अपनी पीएचडी के अध्ययन के सिलसिले में अपने शहर रांची के बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (कांके) आई हुई थी. पूरा बचपन तो यहीं बीता उस का. झारखंड के जंगलों में अवैध खनन व अवैध जंगल के पेड़ काटने पर रोक व अध्ययन के लिए जिला स्तर की कमेटी थी. आज उमा ने उस कमेटी के लोगों को बातचीत के लिए बुलाया था. उसे जरा भी पता नहीं था, उस के जीवन में कौन सा सवाल उठ खड़ा होने वाला है.

मीटिंग खत्म हुई. सारे लोग चाय के लिए उठ गए. उमा अपने लैपटौप पर जरूरी टिप्पणियां लिखने लग गई. तभी उसे लगा कोई उस के पास खड़ा है. उस ने नजर ऊपर की. एक नजर उस के चेहरे पर गड़ी हुई थी. आप ने मुझे पहचाना नहीं?

उमा ने कहा, ‘सौरी, नहीं पहचान पाई.’ ‘हम स्कूल में साथ थे,’ उस शख्स ने कहा.

‘क्षमा करें मेरी याददाश्त कमजोर हो गई है. स्कूल की बातें याद नहीं हैं,’ उमा ने जवाब दिया.

‘मैं अनवर हूं. याद आ रहा है?’

अनवर नाम तो सुनासुना सा लग रहा है. एक लड़का था दुबलापतला, शैतान. शैतान नहीं था मैं, बेहद चंचल था,’ वह बोला था.

उमा गौर से देखती है. कुछ याद करने की कोशिश करती है…और अनवर स्कूल के अन्य दोस्तों के नाम व कई घटनाएं बनाता जाता है. उमा को लगा जैसे उस का बचपन कहीं खोया झांकने लगा है. पता नहीं कब वह अनवर के साथ सहज हो गई, हंसने लगी, स्कूल की यादों में डूबने लगी.

अनवर की हिम्मत बढ़ी, उस ने कह डाला, ‘मैं तुम्हें नहीं भूल पाया. मैं साइलेंट लवर हूं तुम्हारा. मैं तुम से अब भी बेहद प्यार करता हूं.’

‘यह क्या बकवास है? पागल हो गए हो क्या? स्कूल में ही रुक गए हो क्या?’ उमा अक्रोशित हो गई.

‘हां, कहो पागल मुझे. मैं उस समय तुम्हें अपने प्यार के बारे में न बता सका, पर आज मैं इस मिले मौके को नहीं गंवाना चाहता. आइ लव यू उमा. तुम पहले भी सुंदर थीं, अब बला की खूबसूरत हो गई हो.’

उमा झट वहां से उठ जाती है और अपनी गाड़ी से अपने आवास की ओर निकल लेती है. आई लव यू उस के कानों में, मस्तिष्क में रहरह गूंज रहा था. कभी यह एहसास अच्छा लगता तो कभी वह इसे परे झटक देती.

फोन की घंटी से उस की नींद खुलती है. अनवर का फोन है. वह उस पर ध्यान नहीं देती. फिर घड़ी की तरफ देखती है, सुबह के 6 बज गए हैं. इतनी सुबह अनवर ने रिंग किया? उमा उठ कर बैठ जाती है. चेहरा धो कर चाय बनाती है. अपने फोन पर जरूरी मैसेज, कौल, ईमेल देखने में लग जाती है. तभी फिर फोन की घंटी बज उठती है. फिर अनवर का फोन है.

‘हैलो, हां, हैलो उठ गई क्या? गुडमौर्निंग,’ अनवर की आवाज थी.

‘इतने सवेरे रिंग कर दिया,’ उमा बोली.

‘हां, क्या करूं, रात को मुझे नींद ही नहीं आई. तुम्हारे बारे में ही सोचता रहा,’ अनवर बोला.

‘मुझे अभी बहुत काम है, बाद में बात करती हूं,’ उमा ने फोन काट दिया.

आधे घंटे बाद फिर अनवर का फोन आया.

‘अरे, मैं तुम से मिलना चाहता हूं.’

‘नहींनहीं, मुझे नहीं मिलना है. मुझे बहुत काम है,’ और उस ने फोन जल्दी से रख दिया.

आधे घंटे बाद फिर अनवर का फोन आया और वह बोला, ‘सुनो, फोन काटना मत. बस, एक बार मिलना चाहता हूं, फिर मैं कभी नहीं मिलूंगा.’

‘ठीक है, लंच के बाद आ जाओ,’ उमा ने अनवर से कहा.

लंच के समय कमरे की घंटी बजती है. उमा दरवाजा खोलती है. सामने अनवर खड़ा है. अनवर बेखौफ दरवाजे के अंदर घुस जाता है.

‘ओह, आज बला की खूबसूरत लग रही हो, उमा. मेरे इंतजार में थी न? तुम ने अपनेआप को मेरे लिए तैयार किया है न?’

उमा बोली, ‘ऐसी कोई बात नहीं है? मैं अपने साधारण लिबास में हूं. मैं ने कुछ भी खास नहीं पहना.’

अनवर डाइनिंग रूम में लगी कुरसी पर ढीठ की तरह बैठ गया. उमा के अंदर बेहद हलचल मची हुई है पर वह अपनेआप को सहज रखने की भरपूर कोशिश में है. वह भी दूसरे कोने में पड़ी कुरसी पर बैठ गई. अनवर 2 बार राष्ट्रीय स्तर की मुख्य राजनीतिक पार्टी से चुनाव लड़ चुका था, लेकिन दोनों बार चुनाव हार गया था. अब वह अपने नेता होने व दिल्ली तक पहुंच होने को छोटेमोटे कार्यों के  लिए भुनाता है. उस के पास कई ठेके के काम हैं. बातचीत व हुलिया देख कर लग रहा था कि वह अमीरी की जिंदगी जी रहा है. अनवर की पूरी शख्सियत से उमा डरी हुई थी.

‘उमा, मैं तुम से बहुत सी बातें करना चाहता हूं. मैं तुम से अपने दिल की सारी बातें बताना चाहता हूं. आओ न, थोड़ा करीब तो बैठो प्लीज,’ अनवर अपनी कुरसी उस के करीब सरका कर कहता है, ‘तुम भरपूर औरत हो.’

अचानक उमा का बदन जैसे सिहर उठा. अनवर ने उस का हाथ दबा लिया था. अनवर की आंखें गिद्ध की तरह उमा के चेहरे को टटोलने की कोशिश कर रही थीं. उमा ने झटके से अपना हाथ खींच लिया.

‘मैं चाय बना कर लाती हूं,’ कह कर उमा उठने को हुई तो अनवर बोल उठा.

‘नहींनहीं, तुम यहीं बैठो न.’

उमा पास रखी इलैक्ट्रिक केतली में चाय तैयार करने लगी. तभी उमा को अपने गले पर गरम सांसों का एहसास हुआ. वह थोड़ी दूर जा कर खड़ी हो गई.

‘क्या हुआ? तुम ने शादी नहीं की पर तुम्हें चाहत तो होती होगी न,’ अनवर ने जानना चाहा.

‘कैसी बकवास कर रहे हो तुम,’ उमा खीझ कर बोली.

‘हम कोई बच्चे थोड़े हैं अब. बकवास तो तुम कर रही हो,’ अनवर भी चुप नहीं हुआ और उस के होंठ उमा के अंगों को छूने लगे. उमा फिर दूर चली गई.

‘अनवर, बहुत हुआ, बस करो. मुझे यह सब पसंद नहीं है,’ उमा ने संजीगदी से कहा.

‘एक मौका दो मुझे उमा, क्या हो गया तुम्हें, अच्छा नहीं लगा क्या?  मैं तुम से प्यार करता हूं. सुनो तो, तुम खुल कर मेरे साथ आओ,’ उस ने उमा को गोद में उठा लिया. अनवर की गोद में कुछ पल के लिए उस की आंखें बंद हो गईं. अनवर ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और उस पर हावी होने लगा. तभी बिजली के झटके की तरह उमा उसे छिटक कर दूर खड़ी हो गई.

‘अभी निकलो यहां से,’ उमा बोल उठी.

अनवर हारे हुए शिकारी सा उसे देखता रह गया.

उमा बोली, ‘मैं कह रही हूं, तुम अभी जाओ यहां से.’

अनवर न कुछ बोला और न वहां से गया तो उमा ने कहा, ‘मैं यहां किसी तरह का हंगामा नहीं करना चाहती. तुम बस, यहां से चले जाओ.’

अनवर ने अपना रुमाल निकाला और चेहरे पर आए पसीने को पोंछता हुआ कुछ कहे बिना वहां से निकल गया. उमा दरवाजा बंद कर डर से कांप उठी. सारे आंसू गले में अटक कर रह गए. अपने अंदर छिपी इस कमजोरी को उस ने पहली बार इस तरह सामने आते देखा. उसे बहुत मुश्किल से उस रात नींद आई.

फोन की घंटी से उस की नींद खुली. फोन अनवर का था.

‘मैं बहुत बेचैन हूं. मुझे माफ कर दो.’

उमा ने फोन काट कर उस का नंबर ब्लौक कर दिया. फिर दोबारा एक अनजान नंबर से फोन आया. यह भी अनवर की ही आवाज थी.

‘मुझे माफ कर दो उमा. मैं तुम्हारी दोस्ती नहीं खोना चाहता.’

उमा ने फिर फोन काट दिया. वह बहुत डर गई थी. उमा ने सोचा कि उस के वापस जाने में 2 दिन बाकी हैं. वह बेचैन हो गई. किसी तरह वह खुद को संयत कर पाई.

कई महीने बीत गए. वह अपने कामों में इतनी व्यस्त रही कि एक बार भी उसे कुछ याद नहीं आया. हलकी याद भी आई तो यही कि वह जंग जीत गई है.

‘जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग

चंदन विष व्याप्त नहीं, लपटे रहत भुजंग.’

एक दिन अचानक एक फोन आया. उस तरफ अनवर था, ‘सुनो, मेरा फोन मत काटना और न ही ब्लौक करना. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पा रहा है. बताओ न तुम कहां हो? मैं तुम से मिलना चाहता हूं. मैं मर रहा हूं, मुझे बचा लो.’

‘यह किस तरह का पागलपन है. मैं तुम से न तो बात करना चाहती हूं और न ही मिलना चाहती हूं,’ उमा ने साफ कहा.

‘अरे, जाने दो, भाव दिखा रही है. अकेली औरत. शादी क्यों नहीं की, मुझे नहीं पता क्या? नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली चली हज को. मजे लेले कर अब मेरे सामने सतीसावित्री बनती हो. तुम्हें क्या चाहिए मैं सब देने को तैयार हूं,’ अनवर अपनी औकात पर उतर आया था.

ऐसा लगा जैसे किसी ने खौलता लावा उमा के कानों में उडे़ल दिया हो. उस ने फोन काट दिया और इस नंबर को भी ब्लौक कर दिया. यह परिणाम बस उस एक पल का था जब वह पहली बार में ही कड़ा कदम न उठा सकी थी.

इस बात को बीते 4 साल हो गए हैं. अनवर का फोन फिर कभी नहीं आया. उमा ने अपना नंबर बदल लिया था. पर आज भी यह सपना कहीं न कहीं घाव रिसता है. दर्द होता है. कहते हैं समय हर घाव भर देता है पर उमा देख रही है कि उस के जख्म रहरह कर टीस उठते हैं.

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