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बनाना फेस मास्क से पाएं दमकती त्व‍चा

केले का पेस्ट त्वचा के लिए काफी फायदेमंद है. इसके पेस्‍ट को लगाने से त्‍वचा पर असमय झुर्रियां नहीं पड़ती. यह स्किन को ग्‍लो करने में भी बड़ा महत्‍वपूर्ण रोल अदा करता है. यहां पर कुछ केले के बने फेस मास्‍क के बारे में बताया जा रहा है जिनका उपयोग कर आप खुदकी त्वचा पर निखार ला सकती हैं.

केला

केले को पीस लें और 10-15 के लिये अपने चेहरे तथा गर्दन पर लगाएं. बाद में ठंडे पानी से धो लें. आप चाहें तो इसके बाद अपने चेहरे पर बरफ भी लगा सकती हैं. केला लगाने से आपका चेहरा ग्‍लो करने लगेगा.

केला और तेल

केले और तेल को आपस में मिलाकर पेस्ट बनाइए. तेल कोई भी हो सकता है, जैसे औलिव औयल या बादाम तेल. इसे 10-15 मिनट तक के लिये चेहरे पर लगाइए और फिर पानी से धो लीजिये.

केला और शहद

केला और शहद दोनों ही अच्‍छे मौइस्‍चोराइजर हैं. आधा केला पीस लें और उसमें 1 चम्‍मच शहद मिलाएं. इसे मिक्‍स कर के अपने चेहरे तथा गर्दन पर लगाएं और 15 मिनट के बाद चेहरा धो लें. इसके बाद चेहरे पर स्‍टीम लें और फिर क्रीम या मौइस्‍चोराइजर लगा कर अपनी स्‍किन को ग्‍लो करते हुए देखें.

केला और दूध

आधा केला लीजिये और उसमें 1 चम्‍मच दूध डालिये. इसे पीस लीजिये और चेहरे पर 15-20 मिनट के लिये लगा लीजिये. इसे लगाने के बाद आपका चेहरा ग्‍लो करेगा और कोमल हो जाएगा.

केला और ओट

एक कटोरे में आधा कप ओट और आ‍धा केला मिला लीजिये. अब इसे अपने चेहरे पर लगाइये और 10 मिनट तक लगा रहने दीजिये, उसके बाद इसे हल्‍के हाथों से पानी से रगड़ कर छुडा़ लीजिये. इससे ब्‍लैकहेड और डेड स्‍किन हट जाएगी.

ऐसे करें लूज स्किन को टाइट

लूज स्‍किन आपकी खूबसूरती को बहुत ही बुरी तरह से बरबाद कर सकती है. अक्सर महिलाओं में 30 की उम्र के बाद यह समस्‍या देखने को मिलती है. क्‍या आपको भी अपने आंखों के नीचे की स्‍किन लूज होती दिखाई दे रही है? और क्‍या यही हाल गर्दन की त्‍वचा का भी है? तो सावधान हो जाइए क्योंकि इसका कारण बुढापा, बीमारी या फिर वेट लौस हो सकता है. अगर आप भी इस तरह की समस्‍या से जूझ रही हैं, तो अपनाइये यहां दिए गए कुछ सरल उपाय.

फेशियल एक्‍सरसाइज

आप कुछ महत्‍वपूर्ण एक्‍सरसाइज से अपनी गर्दन के पास वाली तथा चेहरे की स्‍किन को टाइट कर सकती हैं. ठुड्डी के नीचे की त्‍वचा बड़ी ही जल्‍दी लूज होने लगती है, तो इसके लिये छत की ओर देखें और अपने चेहरे की त्‍वचा को टाइट कर के 30 सेकेंड के बाद छोड़ दें. रोजाना 10 मिनट के लिए यह एक्‍सरसाइज करें.

मसाज

स्‍किन को टाइट करने के लिये तेल जैसे, औलिव औयल, सरसों का तेल आदि प्रयोग करें क्‍योंकि इसमें एंटी औक्‍सीडेंट पाया जाता है. एंटीऔक्‍सीडेंट से चेहरा जवां दिखने लगता है और स्‍किन भी टाइट हो जाती है.

मौइस्चलराइज और हाइड्रेट

शिया बटर, बादाम का तेल, औलिव औयल कुछ बेस्‍ट नेचुरल तेल हैं जो आपकी स्‍किन को कोमल और मुलायम बनाएंगे. अपनी स्‍किन को अंदर से हाइड्रेट करने के लिये खूब सारा पानी पिएं और बाहरी रूप से नम करने के लिये मौइस्चराइजर लगाएं.

कोलैजन के लिये सोया

जैसा की आप जानते हैं कि प्रोटीन हमारी मसल्‍स में ब्‍लौक बनाने का कार्य करती हैं. कोलैजन मसल्‍स में खिचांव पैदा करने के लिये उपयोगी होता है, इसलिये आपको सोया प्रोडक्‍ट खाने चाहिये, जिसमें सोया मिल्‍क और सोया चंक शामिल हों.

विटामिन युक्‍त आहार

ऐसे आहार जो कि विटामिन ‘ए’ से भरे हुए हैं, जैसे गाजर, चुकंदर आदि खाने से आपकी त्‍वचा टाइट हो जाएगी. विटामिन ‘ए’, स्‍किन को अंदर से रिपेयर करती है, तो ऐसे में आपकी स्‍किन के अंदर इलास्‍टिसिटी आती है.

हाई ब्लड प्रेशर है एक खामोश हत्यारा

आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में प्रायः इंसान मानसिक तनाव से ग्रसित रहता हैं. जिस कारण उसे कई मानसिक बीमारियों के साथ ही उच्च रक्तचाप जैसी बीमारी भी अपनी जकड़ में ले लेती हैं. उक्त रक्तचाप ब्लड प्रेशर के होने और उसके निदान से संबंधित कुछ तथ्यों को बता रहे है जाने माने हृदय रोग विशेषज्ञ डा. आर.आर.सिंह.

हमारे शरीर के अंगों को खून पहुंचाने वाली धमनियां हृदय से निकलती है. इन धमनियों में प्रवाहित खून द्वारा लगाया गया दबाव ब्लड प्रेशर कहलाता हैं. ऊपर (सिस्टोलिक) तथा नीचे (डाइस्टोलिक) का ब्लड प्रेशर हृदय के संकुचन तथा विराम अवस्था से जुड़ा हुआ है. आम मनुष्य का ब्लड प्रेशर 120/80 होता हैं. शरीर में ब्लड प्रेशर का नियंत्रण गुर्दो की कार्यक्षमता पर निर्भर करता है शरीर में नमक यानी सोडियम क्लोराइड की मात्रा अधिक होने से ब्लड प्रेशर बढ़ता हैं. यदि सोडियम का शरीर से बाहर निकास घट जाये या इसका सेवन बढ़ जायें तब ब्लड प्रेशर बढ़ने की संभावना रहती हैं.

फिलहाल में प्रकाशित जे.एन.सी. के 6 के अनुसार 120/80 ब्लड प्रेशर सभी उम्र के मनुष्यों के लिए सटीक बताया गया हैं. आम तौर पर 90 प्रतिशत मरीजों में ब्लड प्रेशर का कोई मुख्य कारण नहीं होता हैं. इसे प्राइमरी हाइपरटेंशन कहते हैं. केवल दस प्रतिशत मरीजों में अधिक ब्लड प्रेशर के कारण मौजूद हो सकते हैं. जैसे गुर्दे की बीमारी, गुर्दे की धमनी में रूकावट, कोआर्कटेंशन यानी शरीर की मुख्य धमनी एओरटा में जन्मजात रूकावट, टयूमर या कभी कभी गर्भवती महिलायें.

उक्त रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) होने के संभावना बढ़ती उम्र के साथ अधिकाधिक हो जाती हैं. इसलिए 40 वर्ष की उम्र के बाद समय-समय पर इसकी जांच करवाना आवश्यक है. इस एक ही परिवार के सदस्यों में भी यह अधिक पाया जाता हैं. नमक एवं वसा युक्त भोजन का सेवन मोटापा शिथिल जीवन शैली मानसिक तनाव, मदिरापान, धूम्र पान इत्यादि में भी ब्लड प्रेशर बढ़ाने में सहायक होते हैं. चिंता का विषय है कि आज कल स्कूल जा रहे बच्चों में भी इसकी संख्या बढ़ती पायी जा रही हैं. यह प्रायः खानपान एवं मोटापे से जुड़ा हुआ हैं.

ब्लड प्रेशर के लगातार बढ़े रहने से शरीर में सबसे आवश्यक चार अंगों को क्षति पहुंचती हैं. इनमें हृदय, गुर्दे, मस्तिष्क एवं आंखे प्रमुख हैं. हृदय का फैलना तथा हृदय की धमनी में कोलेस्ट्राल के जमाव से हार्टअटैक होना, हार्ट फेल तथा मौत का कारण बन सकता है गुर्दे का लम्बे अरसे में फेल हो जाना तथा गुर्दा प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ना भी इनमें से एक हैं. मस्तिष्क में धमनी का कट जाना या खून का थक्का बनने से पक्षाघात का असर हो सकता है. गर्भावस्था में ब्लड प्रेशर बढ़े रहने से बच्चे के विकास पर असर पड़ता तथा मां की जान भी खतरे में आ सकती हैं.

डा. आर आर सिंह

ब्लड प्रेशर बढ़ने के प्रायः कोई लक्षण नहीं होते हैं. तथा उपर लिखे लक्षणों से निदान होने तक काफी देर हो चुकी होती हैं. यही कारण है कि ब्लड प्रेशर की समय समय पर जांच कर वाना अति आवश्यक है तथा इसे काबू में रखना और भी अधिक जरूरी हैं. कभी-कभी सिर भारी होना, चिड़ चिड़ापन, अनिद्रा, थकावट, सांस फूलना एवं सुस्ती छायी रहना इसके लक्षण हो सकते हैं.

ब्लड प्रेशर से संबंधित जांचों में खून की जांच, ईसीजी, ईको कार्डियोग्राफी, ट्रेडमिलटेस्ट,आंख के परदे की जांच, गुर्दे की जांच, इत्यादि प्रमुख हैं. नव युवकों एवं वृद्ध मरीजों में ब्लड प्रेशर के कारण पता लगाने के लिए विशेष जांच करवानी चाहिए जैसे गुर्दे की धमनी में रूकावट, ट्यूमर आदि की जांच इन सभी कारणों का इलाज पूर्ण रूप से संभव हैं. अतः पता लगाने की पूरी कोशिश की जाती है.

ब्लड प्रेशर के इलाज में दवाओं के अतिरिक्त इसके सभी ज्ञात कारणों पर काबू पाना नितांत आवश्यक हैं. वजन काबू में रखना, संतुलित आहार, अधिक मदिरापान से परहेज, नमक का सेवन कम, धूम्र पान निषेध एवं मानसिक तनाव में कमी करना आवश्यक हैं. नियमित व्यायाम जैसे दौड़ना, टहलना, तैरना, साइकिल चलाना, सभी से ब्लड प्रेशर कम होता हैं. यौगिक प्रक्रिया से भी ब्लड प्रेशर पर काबू पाना संभव हैं.

आजकल दवाओं के क्षेत्र में काफी नये एवं कारगर फार्मूले आ चुके हैं. इनमें प्रमुख हैं. बीटा ब्लौकर, पेशाब एवं सोड़ियम अधिक निकालने के लिए डाइयूरेटिक, एस इनहिन्द्रिटर तथा कैल्सियम चैनल ब्लौकर इत्यादि. सभी दवायें आम जीवन शैली को कम से कम प्रभावित करती हैं. इन्हें नियम से खाना आवश्यक है, जिससे 28 घंटे में हमेशा ब्लड़ प्रेशर काबू में ही रहें.

गुर्दे की बन्द धमनी एवं कोआर्कटेंशन का समय से निदान एवं उपचार, ब्लड प्रेशर से हमेशा इसका छटकारा दिला सकता हैं. अतः इसकी जांच के इको, अल्ट्रासाउण्ड एवं एचियोग्राफी जैसी जाँचे कराना चाहिए. आजकल बंद धमनियों को तार एवं गुब्बारें की सहायता से खोलकर इनमें स्टेंट लगाया जाता है तथा ब्लड प्रेशर काबू में किया जाता हैं.

अंत में, ब्लड प्रेशर एक बिना लक्षण का रोग हैं. अतः इसे समय समय पर नापना सबसे उचित उपाय है. इससे पहले कि शरीर के प्रमुख अंगो पर इसका असर खतरे की घंटी बजा दे आपकों इसके कुप्रभावों के प्रति अत्यधिक सतर्क रहना चाहिए. दवा नियम से तथा आजीवन लेनी पड़ सकती हैं. इसमें कोई बुराई नहीं हैं. प्राथमिक रोकथाम के तौर तरीके निःसंकोच अपनाने चाहिए.

– डा. आर. आर. सिंह

घर पर ही बनाएं चिली चिकन ड्राई

सामग्री :

– 2 ग्राम लहसुन

– 2 ग्राम अदरक

– 2 हरी मिर्च

– 200 ग्राम शिमला मिर्च (लाल, पीली और हरी)

– 200 ग्राम प्याज

– 50 ग्राम स्प्रिंग अनियन

– ज़रूरत भर रेड चिली सौस

– 1 टेबलस्पून चिली सौस

– 1 टेबलस्पून टमैटो सौस

– 1 टेबलस्पून वाइन विनेगर

-1 टेबलस्पून सोया सौस

– 1 टेबलस्पून विनेगर

–  2 ग्राम अजीनोमोटो

– नमक स्वादानुसार

– 2 ग्राम व्हाइट पेपर

– 250 ग्राम बोनलेस चिकेन

–  1 एग, थोड़ा रिफाइंड औयल

– जरूरत भर मैदा और कौर्नफ्लोर

विधि :

– चिकेन को छोटे टुकड़ों में काट लें

– इन पीसेज पर मैदा, कौर्नफ्लोर, नमक, अजीनोमोटो, व्हाइट पेपर, रेड चिली सौस और अंडा डालकर 5 से 7 मिनट के लिए मैरिनेट होने के लिए रख दें.

–  सौस पैन में तेल गर्म करने के बाद सभी मैरिनेटेड चिकेन को डीप फ्राई कर लें.

–  एक दूसरे पैन में औयल डालें. अब इसमें बारीक कटा हुआ अदरक-लहसुन, हरी मिर्च और शिमला मिर्च डालकर अच्छी तरह चलाएं.

– इसमें थोड़ा सा पानी डालने के बाद बाकी सभी सौस और मसाले डालकर मिलाएं.

– अब फ्राइड चिकेन डालें और 1 मिनट तक पकाएं.

– ऊपर से बारीक कटा स्प्रिंग अनियन डालकर गर्मागर्म सर्व करें.

मंजिल (भाग-11) : सुहास को देख आखिर क्यों खुश थी पुरवा

पूर्व कथा

पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा सुहास को अपने पिता से मिलवाने अपने घर ले आती है तो उस के पिता सहाय साहब सुहास की काम के प्रति लगन देख कर खुश होते हैं.

सुहास व्यापार शुरू कर देता है, लेकिन कई बार काम के लिए बंध कर बैठना उस के लिए मुश्किल हो जाता क्योंकि किसी भी जगह जम कर रह पाना उस के स्वभाव में नहीं था.

अंतत: श्वेता के विवाह का दिन आ जाता है और कुछ ही महीने बाद पुरवासुहास का भी विवाह हो जाता है. पुरवा महसूस कर रही थी कि सुहास का ध्यान समाजसेवा में अधिक रहता है. वह दूसरों की मदद के लिए दुकान पर भी ध्यान न देता.

पुरवा अब निरंतर सुहास को उस की जिम्मेदारी का एहसास कराने की कोशिश करती. शीघ्र ही वह दिन भी आता है जब पुरवा को पता चलता है कि वह मां बनने वाली है. सुहास पापा बनने के सुखद एहसास से झूम उठता है.

थोड़े दिनों बाद पुरवा को पता चलता है कि सुहास पुराना कारोबार खत्म कर कंप्यूटर का कार्य आरंभ करना चाहता है तो वह हैरान हो जाती है और बेचैनी से सुहास के घर लौटने की प्रतीक्षा करने लगती है. लेकिन वह बेला भाभी के पति सागर को अस्पताल ले जाने के कारण रात देर से घर आता है, पुरवा की तबीयत खराब होने पर अस्पताल में भरती कराया जाता है. उस का हालचाल पूछने बेला घर आती है तो पुरवा उस से थोड़ी तीखी बात करती है, तब सुहास पुरवा पर बिगड़ता है. सुहास से नाराज पुरवा अपने मातापिता के साथ मायके चली जाती है. सुहास के व्यवहार को ले कर वह विचारमंथन करती है.

आखिरकार एक दिन सुहास पुरवा को मनाने ससुराल पहुंच जाता है. पुरवा वापस जाने की शर्त रखती है कि वह घर के गैराज में बुटीक खोलेगी और इस काम में वह उस की मदद करेगा. बुटीक की शुरुआत करने में  सुहास से ज्यादा रजनीबाला पुरवा की मदद करती है. बुटीक निर्माण जोरशोर से शुरू हो जाता है. एक दिन सागर और बेला आते हैं और बताते हैं कि सुहास ने राजनीति ज्वाइन कर ली है, सुन कर सब चौंक जाते हैं.

सुहास घर आता है तब मां राजनीति ज्वाइन करने की बात को ले कर उस से नाराज होती है. लेकिन सुहास सब को समझाता है, पुरवा भी यह सोच कर संतोष कर लेती है शायद सुहास इसी क्षेत्र में सफल हो जाए.

पुरवा के ‘पुरवाई बुटीक’ का उद्घाटन होता है. सुहास वक्त पर नहीं पहुंचता लेकिन देर से आने की माफी मांगते हुए बुटीक के लिए एक बड़ा आर्डर ले कर आता है तो सभी खुश हो जाते हैं.

राजनीति के कार्य क्षेत्र में सुहास का रोमांच बढ़ता जा रहा था. उधर वह दिन भी आता है जब पुरवा प्रसव के लिए अस्पताल में भरती होती है. उसी वक्त पार्टी के नेता भाईजी को चुनावी सरगर्मियों के चलते दूसरी पार्टी के साथ हुई झड़प में गोली लग जाने के कारण सुहास को उन्हें देखने जाना पड़ता है. वापस जब लौटता है तो एक बच्ची का पिता बनने की खुशखबरी मिलती है.

अब सुहास राजनीति में सक्रिय होने लगा था. पुरवा उस का उत्साह व काम करने की लगन देख खुश थी.

अब आगे…

नारायण से कई दिनों से सुहास की भेंट नहीं हो रही थी. उस दिन सुबहसुबह भेंट हो गई तो इस ने पूछ लिया, ‘‘अब कैसा है देवेंद्र?’’

नारायण की आंखों में आंसू झिलमिला उठे. बोला, ‘‘अपनी तो किस्मत खराब है बाबू.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रहे हो, नारायण.’’

‘‘क्या कहें बाबूजी. कहते हैं किडनी खराब है. बड़ा महंगा इलाज कराना पड़ेगा.’’

‘‘अरे,’’ सुहास चौंक पड़ा, बोला, ‘‘हां, नारायण, डायलेसिस पर रखा तो भी खर्चा, नई किडनी लगेगी तब तो बहुत भारी खर्चा होगा.’’

नारायण हिचकी लेले कर रोने लगा, इकलौते बेटे को खोने का दर्द उस की आंखों में स्पष्ट दिखाई दे रहा था. सुहास ने उस का दुख स्पष्ट महसूस किया. उसे समझाते हुए धीरेधीरे कहा, ‘‘नारायण, धैर्य से काम लो. दुख के बाद सुख आता है. कोई न कोई राह अवश्य निकल आएगी.’’

‘‘क्या मालूम बाबू साहब. हम गरीबों के लिए तो कोई राह नहीं होती है.’’

‘‘ऐसा नहीं है, नारायण, साहस और धैर्य से सब ठीक हो जाएगा. हम पार्टी वालों का भी तो कुछ फर्ज बनता है. तुम परेशान मत हो.’’

सुहास आगे बढ़ा तो सोच में पड़ गया. कहने को तो उस ने दिलासा देने को कुछ भी कह दिया है पर क्या पार्टी वाले सचमुच कुछ करेंगे. आकाश तो हमेशा मजाक में कहता है कि राजनीति में लोग जेब भरते हैं, जेब खाली नहीं करते हैं.

कई बार सुहास ने इन बातों पर भी विचार किया है. क्या वह एक अकेला व्यक्ति इस भ्रष्ट समाज से युद्ध कर पाएगा? वह राजनीति में देश के लिए कुछ अच्छा कर पाने की चाहत में आया है, पर क्या यह सचमुच इतना आसान है. शायद इसी का उत्तर उसे नहीं मिल पाता है. और इसीलिए वह समाज सेवा में गंभीरता से व्यस्त हो चला है. सुहास ने कई बार पुरवा को बताना चाहा कि वह एड्स के मरीजों की सेवा के लिए भी सप्ताह में एक दिन अवश्य जाता है, पर उसे कुछ भी बताने का साहस नहीं जुटा पा रहा है. जानता है कि पुरवा यह सुन कर डर जाएगी. अपने साथी की जान किसे नहीं प्यारी होती है.

कार्यालय पहुंचते ही आकाश मिल गया. बहुत परेशान लग रहा था.

‘‘क्या बात है, आकाश?’’ सुहास ने पूछ लिया.

‘‘अरे, ये अपोजीशन वाले हार की खीज उतारने के लिए नएनए हथकंडे अपनाते हैं,’’ आकाश ने परेशानी से कहा.

‘‘हुआ क्या?’’ सुहास उस की बात न समझते हुए बोला.

‘‘वही, व्यर्थ को बदनाम करने के लिए भाईजी के यहां रेड डलवा दी.’’

‘‘क्या?’’ सुहास भी परेशान हो उठा.

‘‘होगा कुछ नहीं, भाईजी जैसे साफसुथरी छवि वाले व्यक्ति का कुछ बुरा नहीं होने वाला है.’’

सुहास उसे ध्यान से देखने लगा. उसे आरंभ से ही यह मालूम है कि आकाश भाईजी के बहुत निकट है. दोनों कोरीडोर में साथसाथ चलने लगे. आकाश ही बताता रहा कि भाईजी ने कैसे युवावस्था से ही समाज सेवा में अपना तनमनधन सब लगा दिया था. राजनीति में भी आए तो बस, इसीलिए ताकि भ्रष्ट समाज से लड़ने के लिए स्वयं को ताकतवर बना सकें.

‘‘ये जो 2-3 संस्थाओं से तुम्हारा परिचय हुआ है इन की नींव भाईजी ने ही रखी थी,’’ आकाश ने बताया.

सुहास ने उसे हौसला देते हुए कहा, ‘‘कुछ नहीं होगा भाईजी को. गोली खा कर भी वह विजयी हुए इसीलिए कुछ लोगों में खलबली मच गई होगी.’’

यही बातें जब पुरवा को उस ने बताईं तो वह घबरा गई. बोली, ‘‘सुहास, कहीं राजनीति में जा कर तुम ने कोई गलती तो नहीं की है.’’

सुहास मुसकरा दिया और बोला, ‘‘जो हमेशा मुझे उत्साह दिलाती थी वही स्वयं डर रही है आज,’’ पुरवा को अपने निकट खींचते हुए सुहास ने पूरे विश्वास से कहा, ‘‘अब मैं कहीं से अपने कदम वापस मोड़ने वाला नहीं हूं. उस पलायनवादी सुहास को भुला दो, पुरू.’’

पुरवा ने सुहास की आंखों में एक नई ज्योति देखी थी. कुछ कर गुजरने की ललक थी उन में. धीरे से बोली, ‘‘सुहास, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं. तुम्हारे हर स्वप्न व हर निर्णय में तुम्हारे बराबर ही खड़ी रहूंगी,’’ दोनों की आंखों में एक मौन समझौता था जो अच्छीबुरी हर परिस्थिति में हमकदम होने की शक्ति से भरपूर था.

सुनहरी धूप भरे लान में पापा बहुत देर से अकेले बैठे थे. थोड़ी देर में मां झंकार को गोद में ले कर वहां आ गईं और साथ वाली ईजीचेयर पर बैठ गईं. पापा ने झंकार को अपनी गोद में लेते हुए कहा, ‘‘सुहास चला गया?’’

‘‘हां, गया, पुरवा अपने बुटीक पर चली गई.’’

दोनों थोड़ी देर झंकार के साथ खेलते रहे फिर अचानक पापा ने कहा, ‘‘सब बच्चे अपनेअपने ठिकाने से लग गए, अब बुढ़ापा चैन से गुजारने की बात सोची जा सकती है.’’

‘‘चैन से तो पहले भी गुजर रही थी,’’ मां ने हंस कर कहा, ‘‘हां, अवकाश लेने के बाद आप का मन नहीं लग रहा था सो झंकार के आ जाने से वह भी लग गया है.’’

‘‘वह तो ठीक है पर सुहास की तरफ से मन बहुत अशांत था,’’ पापा ने कहा, ‘‘सभी बच्चे अच्छी नौकरी कर अपनी गृहस्थी संभाल रहे थे. बस, यही एक गैर जिम्मेदार बेटा था.’’

‘‘हां, चिंता तो रहती ही है, पर पुरवा बहुत समझदार है. संभाल लिया है सबकुछ. अब तो कभीकभी मेरे हाथ पर भी अपनी दुकान की आय से कुछ न कुछ रखता है और सारे काम मन लगा कर करने लगा है.’’

‘‘पुरवा ने तो तुम्हें भी संभाल लिया है अपनी पुरवाई थमा कर,’’ पापा ने मुसकरा कर एक आंख दबा दी तो मां भी हंसने लगीं. बोलीं, ‘‘कभी सोचा नहीं था कि इस उम्र में मैं इतनी लगन से कुछ कर पाऊंगी. लेकिन पुरवा ने जीने का एक अनोखा मकसद थमा दिया है.’’

‘‘काश, ऐसा ही एक मकसद पुरवा मुझे भी थमा देती तो बुढ़ापा चैन से कट जाता.’’

‘‘है न मकसद,’’ अचानक पुरवा का स्वर सुन कर दोनों चौंक उठे. वह मुसकराती हुई निकट आ गई और झंकार को गोद में उठा लिया. पास पड़ी कुर्सी खींच कर बैठते हुए बोली, ‘‘पापा, आप का समय ठीक से नहीं गुजरता है न. आप माली को एक किनारे खड़ा करिए और स्वयं इस लान की देखभाल शुरू कर दीजिए. घास है, पेड़पौधे हैं. इन की कटाई, सफाई, पानी, गुड़ाई वगैरह कितने काम हैं जो आप का समय चुटकी में व्यतीत कर देंगे.’’

पापा अचानक गंभीर हो गए. धीरे से बोले, ‘‘अपनी इतनी होनहार बहू को समझने में हमें कितना समय लग गया. बेटा, तुम ने न सिर्फ सुहास को संभाला है बल्कि हम सब को भी बहुत अच्छी तरह संभाल लिया है.’’

‘‘ये कैसी बातें कर रहे हैं, पापा. आप दोनों ने जो हमें हमारे अनेक अवगुणों के साथ संभाले रखा उस के लिए तो हम उम्र भर नतमस्तक रहेंगे.’’

जाने कैसी खुशी ने उन के दिलों में प्रवेश किया जो अचानक तीनों की आंखों में छलक उठी थी.

रात बहुत हो गई थी पर सुहास का कहीं पता नहीं था. 2-3 बार मां आ कर पूछ चुकी थीं पर पुरवा का एक ही उत्तर था, ‘‘मां, आप चिंता मत करिए. सुहास अवश्य कहीं जरूरी काम में फंस गए होंगे.’’

‘‘पहले ही क्या कम लापरवाह था. अब तो राजनीति का, पार्टी के काम का भी बहाना मिल गया है,’’ मां ने चिंतित स्वर में कहा था.

पुरवा झंकार को सुला कर एक बार फिर से सुहास को फोन मिलाने लगी थी पर तभी सुहास आ गया. आते ही बोला, ‘‘सौरी पुरू, आज बहुत देर हो गई.’’

‘‘मां परेशान हो रही हैं,’’ पुरवा ने कहा.

सुहास ने टाई खोल कर फेंकी और कोट उतारते हुए बोला, ‘‘तुम्हें बताना भूल गया था कि भाईजी के यहां छोटी- मोटी पार्टी थी. वह रेड का मामला झूठा निकला, किसी ने उन्हें फंसाने की चाल चली थी इसीलिए…’’

‘‘तो मोबाइल क्यों बंद कर रखा था,’’ पुरवा ने कुछ क्रोध से कहा.

‘‘दरअसल, पुरवा पार्टी में जाने से पहले हम लोग नारायण के बेटे के पास चले गए थे. अस्पताल में सेल बंद कर दिया था फिर याद ही नहीं रहा,’’ सुहास ने झंकार को प्यार करना चाहा तो पुरवा ने टोक दिया.

‘‘जगाओ मत, बड़ी मुश्किल से सोई है.’’

सुबह खाने की मेज पर पापा और मां भी जल्दी ही आ गए और आते ही कहा, ‘‘कल बहुत देर कर दी. कुछ खास बात तो नहीं थी.’’

‘‘हां, मम्मा,’’ सुहास ने डबलरोटी में मक्खन लगाते हुए कहा, ‘‘शाम को तो भाईजी की पार्टी में चला गया, फिर अस्पताल जाना पड़ा.’’

‘‘अस्पताल क्यों?’’ पापा ने चौंक कर पूछा और दलिया का डोंगा उठा लिया.

तब तक पुरवा ने कटलेट की प्लेट सजा दी थी. सुहास प्रसन्न हो गया. अपनी प्लेट में कटलेट रखते हुए उस ने कहा, ‘‘हमारे यहां एक चौकीदार है, नारायण. उस के इकलौते बेटे की एक किडनी फेल हो गई है. उस का दुख देखा नहीं जाता पापा.’’

‘‘हूं,’’ पापा ने दलिया खाते हुए कहा, ‘‘कुछ तो कर ही रहे होगे तुम,’’ पापा उस का स्वभाव जानते थे इसीलिए पूछ लिया.

‘‘हां, पापा. हम सब ने चंदा इकट्ठा करना शुरू किया है पर कितना होगा यह अभी समझ नहीं आ रहा है.’’

‘‘देखो,’’ पापा ने नैपकिन से हाथ पोंछते और उठते हुए कहा, ‘‘कुछ थोड़ा- बहुत हम लोग भी दे सकते हैं. क्यों पुरवा?’’ पापा ने जब पुरवा की ओर देखा तो वह सकपका उठी. पर इन बातों का परिणाम यह हुआ कि सुहास जब दुकान के लिए चला तो पापा व पुरवा ने उसे 5-5 हजार के चेक थमा दिए. सुहास ने चेक थामते हुए कहा, ‘‘कल भाईजी ने भी 10 हजार का चेक दिया है. कुछ मैं भी देने वाला हूं. अभी दुकान पर जा कर पता चलेगा कि मैं कितने का चेक दे सकता हूं.’’

‘‘सुहास, हम लोग हर नेक काम में तुम्हारे साथ हैं,’’ पुरवा ने कहा तो मां- पापा ने भी मुसकरा कर सहमति में सिर हिला दिया.

आकाश कई दिन से रुपए देने से बच रहा था. उस दिन सुहास ने उसे देखते ही कहा, ‘‘आकाश, इस तरह तो हम लोग नारायण के बेटे को नहीं बचा पाएंगे.’’

‘‘बचा तो हम वैसे भी नहीं पाएंगे, सुहास,’’ आकाश ने कहा.

‘‘यह क्या कह रहे हो. उस का इकलौता बेटा है देवेंद्र,’’ सुहास ने असीम दुख से कहा.

‘‘इस तरह भावुकता से काम लोगे तो राजनीति क्या खाक करोगे,’’ आकाश ने मुसकराते हुए 2 हजार का चेक उसे थमा दिया.

‘‘किस ने कहा तुम से कि राजनीतिज्ञ भावुक नहीं होते हैं. मैं अपनी ही पार्टी में कई लोगों के नाम गिनवा सकता हूं.’’

‘‘लेकिन कोरी भावुकता से भी देश नहीं चलता है,’’ आकाश ने सफाई दी. सुहास ने चेक जेब में रख लिया. धीरे से बोला, ‘‘इनसानियत ताक पर रख कर भी देश नहीं चलता है, लेकिन आकाश, हम यहां देश की नहीं नारायण की समस्या सुलझाने की तलाश में आए हैं.’’

आकाश ने उस की तरफ बेचारगी से देखा और कहा, ‘‘जितना कर सकते हैं हम लोग कर रहे हैं. ऐसे तो हर गली में नारायण से भी अधिक दुखी लोग मिल जाएंगे, लेकिन हम उन सब के लिए क्या कर सकते हैं.’’

सुहास भी सोच में डूब गया. शायद इतने लोग मिल कर भी देवेंद्र को बचा नहीं सकते हैं.

‘‘सुनो, सुहास, अपनी बाकी की संवेदना बचा कर मेरे साथ चलो. आज एड्स के मरीजों की दवाइयां पहुंचानी हैं,’’ आकाश ने कहा तो सुहास जैसे सोते से जाग गया. बोला, ‘‘चलो, पहले भाईजी से मिल लें फिर चलते हैं.’’

संध्या की सुनहरी चूनर धीरेधीरे क्षितिज में डूब रही थी. पुरवा उस शाम वैसे ही बुटीक में देर से पहुंची थी, ऊपर से वहां पहुंचते ही सुहास का फोन आ गया. सुहास ने फोन पर कहा, ‘‘पुरू, आज शाम हम कैफे में मिल सकते हैं?’’

पुरवा उस की आवाज के कंपन और इस विचित्र से प्रश्न को सुन कर चौंक गई. लग रहा था जैसे बहुत पुरानी दुनिया में लौट गया है सुहास और उस से कैफे में मिलने की आज्ञा मांग रहा है. अपनी सोच से बाहर निकल कर बोली, ‘‘क्या बात है, सुहास. तुम कुछ परेशान से लग रहे हो.’’

‘‘बस, तुम उसी कैफे में पहुंच जाना जहां हम बहुत पहले मिला करते थे,’’ सुहास ने फोन बंद कर दिया तो पुरवा को चिंता होने लगी. ऐसी क्या बात हो गई होगी जो वह घर पर नहीं करना चाहता है. हालांकि अब सुहास ने कई बातों से उसे तनावमुक्त कर दिया था. अपनी दुकान पर भी पूरा ध्यान देने लगा था. हर माह वहां की आय भी घर लाता था. उस का और झंकार का भी पूरा ध्यान रखता था. शेष अपनी रुचि के अनुसार समाजसेवा और नए शौक राजनीति के लिए भी पर्याप्त समय निकाल लेता था. अब पुरवा को उस की कोई भी गतिविधियां किसी अन्य के माध्यम से नहीं बल्कि स्वयं उस से ही पता चलती रहती थीं पर यह विचित्र सा प्रस्ताव उसे स्तंभित कर गया था.

सुहास के निश्चित किए समय पर पुरवा कैफे पहुंच गई. वहां बैठ कर उसे अतीत की बहुत सी यादें सताने लगीं. कैसे आनंद से भरे दिन थे वह. कोई तनाव नहीं…कोई चिंता नहीं. बस, फूल की मानिंद खिले हुए कुछ सपने जो हर पल आंखों में बंद रहते थे. और उन्हीं सपनों से पनपता हुआ प्यार का सैलाब. पुरवा का मन हुआ कि वह आंखें मूंद कर वापस उसी अतीत में गुम हो जाए. पर तभी सुहास आ गया. आते ही बोला, ‘‘ज्यादा देर तो नहीं बैठना पड़ा?’’

पुरवा मुसकरा दी. उस की आंखों ने कहा, ‘इस की तो मुझे आदत है,’ पर बोली, ‘‘बैठो.’’

सुहास ने बैठते ही कौफी का आर्डर दिया.

‘‘क्या बात है, सुहास, बहुत परेशान से हो?’’ पुरवा ने अधीरता से पूछा.

सुहास ने अपनी व्याकुल दृष्टि उस पर टिका दी. उस की हथेलियां अपने हाथों में समेट कर बोला, ‘‘आज मुझे बहुत दिनों बाद एहसास हुआ कि तमाम राहों पर भागतेभागते मैं प्यार की डगर पर चलना भूल ही गया था.’’

पुरवा ने धीरे से उस के हाथों को थपथपा दिया. बोली, ‘‘ऐसा नहीं है सुहास. मुझे खुशी है कि तुम अब एक जिम्मेदार प्राणी बन गए हो. मैं तो यही चाहती हूं कि तुम जीवन के हर क्षेत्र में खूब सफलता प्राप्त करो.’’

कौफी आ गई थी, साथ में चीज सैंडविच. सुहास ने एक सैंडविच उठा कर पुरवा के मुख की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जो कुछ भी हूं मैं आज उस के पीछे तुम्हारी दी हुई प्रेरणा ही तो साथ रही है.’’

पुरवा ने पहले की तरह सैंडविच का कोना अपने दांतों से काट लिया और अपने हाथों में ले कर सुहास के अधरों से लगा दिया. दोनों को लगा, यह एक वही पल है जिसे वे दोनों बहुत पीछे छोड़ आए हैं. सुहास ने भावुक स्वर में कहा, ‘‘पुरू, आज मैं ने जीवन की कड़वी सचाई बहुत निकट से देखी है और तब से ही मेरा मन अशांत है.’’

‘‘वह तो लग ही रहा है,’’ पुरवा ने कौफी का घूंट भर लिया. सुहास ने फिर कहा, ‘‘पुरवा, जीवन की इस राह पर मुझे अकेला छोड़ कर कभी मत जाना. मैं जी नहीं पाऊंगा.’’

‘‘यह क्या बोल रहे हो सुहास. मुझे क्या हुआ है?’’ पुरवा उस की आंखों में समाए विचित्र से भय को पढ़ने की चेष्टा करने लगी.

-क्रमश:

संगीता का मारक संगीत : उस ने आखिर कैसे शिकार किया

18 सितंबर, 2018 को ज्योंज्यों दिन चढ़ता जा रहा था, त्योंत्यों कामता की चिंता भी बढ़ती जा रही थी. उस के मन में तरहतरह की आशंकाएं उठने लगी थीं. दरअसल, गांव में बीती रात को गणेश पूजा का आयोजन था. इस पूजा में शामिल होने के लिए कामता के पिता विश्राम सिंह भी गए थे. कार्यक्रम खत्म हो जाने के बाद पासपड़ोस के सब लोग घर वापस लौट आए थे, लेकिन विश्राम सिंह नहीं लौटे थे.

कामता की समझ में नहीं आ रहा था कि उस के पिता कहां चले गए और घर क्यों नहीं लौटे. उस ने पूजास्थल और गांव का कोनाकोना छान मारा, जो लोग पूजा कार्यक्रम में गए थे. उन से भी पिता के बारे में पूछा, पर विश्राम सिंह का कुछ पता नहीं चल सका.

जब शाम तक विश्राम सिंह का कोई पता नहीं चला तो कामता अपने दोस्त विजय कोरी को साथ ले कर शाम करीब 5 बजे थाना महाराजपुर जा पहुंचा और इंसपेक्टर रविशंकर त्रिपाठी को पिता के लापता होने की जानकारी दे दी.

इंसपेक्टर रविशंकर त्रिपाठी ने 62 वर्षीय विश्राम सिंह की गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद इस मामले की जांच एसआई धर्मपाल सिंह को सौंप दी.

एसआई धर्मपाल सिंह अपने साथ कांस्टेबल राजा सिंह, ओमप्रकाश और नीरज को साथ ले कर विश्राम सिंह के गांव रूमा पहुंच गए. वहां उन्होंने परिवार वालों व गांव के लोगों से विश्राम सिंह के बारे में पूछताछ की. उन सभी ने बताया कि विश्राम सिंह गणेश उत्सव में दिखाई दिए थे.

वह शराब के नशे में कार्यक्रम में नाच भी रहे थे. लेकिन कार्यक्रम खत्म होने के बाद कहां गए, इस का किसी को पता नहीं था. लोगों से बात करके पुलिस थाने लौट आई. वह दिन ही नहीं, अगला दिन भी बीत गया लेकिन विश्राम सिंह का कुछ पता नहीं चला. पिता के गायब होने से कामता का बुरा हाल था.

हवा ने दी सूचना

22 सितंबर, 2018 की सुबह पुरवाई चल रही थी. तभी गांव के लोगों को बदबू का अहसास हुआ. लोग समझ नहीं पा रहे थे कि बदबू कहां से आ रही है. लोग सोचने लगे कि कोई कुत्ता मर गया होगा. पर बदबू ऐसी थी कि सांस लेनी मुश्किल हो रही थी.

इसी बीच लोगों ने महसूस किया कि बदबू शायद गांव के पूर्वी छोर पर स्थित कुएं से आ रही है. वह कुआं रामभरोसे के खेत पर था, जो सूख गया था. लोगों ने जब उस कुएं में झांक कर देखा तो हैरान रह गए, क्योंकि उस में एक लाश पड़ी थी.

कुएं में लाश पड़ी होने की बात कुछ ही देर में पूरे गांव में फैल गई. फिर तो देखतेदेखते वहां भीड़ जुट गई. इसी भीड़ में कामता भी जा पहुंचा. लोग कुएं में झांकते और बदबू की वजह से नाक पर रूमाल रख कर दूर हट जाते. कामता ने भी कुएं में झांक कर देखा. चूंकि लाश औंधे मुंह पड़ी थी, इसलिए वह भी नहीं पहचान पाया कि लाश किस की है.

चूंकि उस के पिता कई दिनों से लापता थे, सो उस के मन में तरहतरह के विचार आने लगे. कामता के पास एसआई धर्मपाल सिंह का फोन नंबर था. उस ने उन्हें फोन कर के कुएं में किसी आदमी की लाश पड़ी होने की जानकारी दी.

सूचना मिलते ही एसआई धर्मपाल सिंह साथी पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. कुएं में झांकने के बाद उन्होंने गांव के युवकों से कुएं में उतरने के लिए कहा, लेकिन तेज बदबू की वजह से कोई भी तैयार नहीं हुआ.

तब उन्होंने सरसौल कस्बे से 2 जमादारों को बुलवाया. उन्हें किसी तरह राजी कर के एसआई धर्मपाल सिंह ने कुएं में उतारा और रस्सी के सहारे लाश कुएं से बाहर निकाल ली. वह लाश विश्राम सिंह की ही थी.

अपने पिता की लाश देख कर कामता फूटफूट कर रो पड़ा. उस की पत्नी संगीता भी दहाड़ मार कर रो रही थी, यह बात दीगर थी कि उस की आंखों से एक भी आंसू नहीं निकल पा रहा था. दरोगा धर्मपाल सिंह ने विश्राम सिंह का शव कुएं से बरामद होने की सूचना थानाप्रभारी इंसपेक्टर रविशंकर त्रिपाठी को दे दी. वह भी मौके पर पहुंच गए. इंसपेक्टर रविशंकर त्रिपाठी ने यह बात एसएसपी अनंतदेव त्रिपाठी और एसपी (देहात) प्रद्युम्न सिंह को भी दी.

घटनास्थल का निरीक्षण कर पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही थी कि विश्राम सिंह की हत्या कर शव को कुएं में फेंका गया था या वह नशे की हालत में कुएं में गिरे थे. बहरहाल, पुलिस ने जरूरी काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपत राय अस्पताल भेज दी.

निकला हत्या का मामला

अगले दिन थानाप्रभारी इंसपेक्टर रविशंकर त्रिपाठी को जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो वह चौंके. क्योंकि उस में बताया गया था कि विश्राम सिंह की हत्या गला घोंट कर की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली.

विश्राम सिंह की हत्या किस ने और क्यों की? इस की जानकारी के लिए एसआई धर्मपाल सिंह ने सब से पहले मृतक के बेटे कामता व उस की पत्नी संगीता से पूछताछ की. दोनों ने बताया कि पिताजी की न तो किसी से रंजिश थी और न ही जमीन, मकान का कोई विवाद था. उन की बस एक ही कमजोरी थी कि किसी के भी कहने से शराब पी लेते थे.

इस के बाद धर्मपाल सिंह ने गांव के कुछ लोगों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि उन के घर में विजय कोरी का ज्यादा आनाजाना था. कोरी उन के बेटे कामता प्रसाद का दोस्त है. विजय कोरी भी गणेश उत्सव में मौजूद था और उस समय वह भी नशे में था.

विजय कोरी पुलिस के संदेह के घेरे में आया तो दरोगा धर्मपाल सिंह ने उसे थाने बुलवा लिया. थाने में जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने यह तो स्वीकार किया कि कामता उस का दोस्त है और उस के घर आनाजाना है. किंतु विश्राम सिंह की हत्या करने से वह साफ मुकर गया. उस ने अफसोस जताते हुए कहा, ‘‘विश्राम चाचा सीधेसादे और अच्छे स्वभाव के थे. वह उसे अपने बेटे की तरह मानते थे. उन की मौत से उसे बेहद दुख हुआ.’’

दरोगा धर्मपाल सिंह को भी लगा कि शायद विजय सच बोल रहा है, इसलिए उन्होंने उस की बातों पर विश्वास कर के उसे घर भेज दिया. विजय थाने से घर तो आ गया लेकिन उस के बाद वह परेशान रहने लगा. वह सोचने लगा कि आज तो वह झूठ बोल कर पुलिस से बच गया. लेकिन कल सच्चाई सामने आ गई तो वह पकड़ा जाएगा और जेल की हवा खानी पड़ेगी.

पुलिस के डर और जेल जाने के भय से विजय कोरी गांव से फरार हो गया. उधर दरोगा धर्मपाल सिंह ने कांस्टेबल राजा सिंह को इस केस की सुरागरसी के लिए लगा दिया था. राजा सिंह ने सादे कपड़ों में रूमा गांव में डेरा डाल दिया. राजा सिंह ने चोरीछिपे लोगों से जानकारी हासिल की तो चौंकाने वाली बात सामने आई.

पता चला कि मृतक विश्राम सिंह की बहू संगीता से विजय कोरी के नाजायज संबंध हैं. इन संबंधों का विश्राम सिंह विरोध करने लगे थे. शायद इसी विरोध के चलते उन की हत्या हुई है. पकड़े जाने के डर से विजय गांव से ही फरार हो गया है.

इस के बाद विजय पूरी तरह से संदेह के घेरे में आ गया था. उसे पकड़ने के लिए पुलिस ने ताबड़तोड़ छापेमारी शुरू कर दी. लेकिन वह पुलिस को नहीं मिला. संभवत: विजय को पुलिस काररवाई की सारी जानकारी मिल रही थी. पुलिस की इस काररवाई से विजय कोरी घबरा गया. इसी घबराहट में उस ने कानपुर-इलाहाबाद रेलवे ट्रैक पर ट्रेन से कट कर आत्महत्या कर ली. यह बात 5 अक्तूबर, 2018 की है.

संगीता आई निशाने पर

जांच अधिकारी धर्मपाल सिंह को जब विजय के आत्महत्या करने की जानकारी मिली तो उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि विश्राम सिंह की हत्या उसी ने की थी. हत्या के रहस्य की जानकारी उस की प्रेमिका संगीता को जरूर रही होगी, यह सोच कर धर्मपाल महिला कांस्टेबल आरती व सोनी पाल को साथ ले कर संगीता के घर पहुंच गए.

संगीता उस समय घर पर ही मौजूद थी. उस वक्त वह मोबाइल फोन पर किसी से बात कर रही थी. पुलिस को देख कर संगीता घबरा गई और अटकते हुए बोली, ‘‘साहब, हमारे ससुर के कातिल का कुछ पता चला?’’

‘‘हां, चल गया है.’’ धर्मपाल सिंह ने उसे घूरते हुए कहा.

‘‘कौन है वह?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘थाने चलो, वहां तुम्हें सब पता चल जाएगा.’’ कह कर एसआई धर्मपाल ने महिला पुलिस को इशारा किया. महिला कांस्टेबल आरती व सोनी पाल ने संगीता को हिरासत में ले लिया और थाने ले आईं.

थाने ला कर जब संगीता से पूछताछ की तो वह घडि़याली आंसू बहा कर उन्हें गुमराह करने लगी. लेकिन जब उस से सख्ती की गई तो वह टूट गई और ससुर विश्राम सिंह की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. एसपी (देहात) प्रद्युम्न सिंह भी थाने आ गए थे. उन के सामने संगीता ने स्वीकार किया कि उस ने अपने प्रेमी विजय कोरी के साथ मिल कर ससुर की हत्या की थी.

हत्या के बाद शव को उन दोनों ने कुएं में फेंक दिया था. संगीता ने घर में छिपा कर रखा गया वह अंगौछा भी बरामद करा दिया, जिस से विश्राम का गला घोंटा गया था. संगीता से पूछताछ के बाद प्यार से ले कर ससुर का गला घोंटने तक की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

संगीता उत्तर प्रदेश के जिला कन्नौज के गांव गबडहा के रहने वाले दीपनारायण की बेटी थी. खेतीकिसानी कर के गुजरबसर करने वाले दीपनारायण के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे तथा 2 बेटियां थीं, जिन में संगीता सब से छोटी थी. वह अपने अन्य भाईबहनों से पढ़नेलिखने के अलावा हर मामले में तेज थी.

संगीता जवान हुई तो दीपनारायण ने उस की शादी कानपुर के रूमा गांव निवासी कामता प्रसाद के साथ कर दी. कामता प्रसाद के पिता विश्राम सिंह केस्को (कानपुर इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कंपनी) में संविदा कर्मचारी थे. कामता सीधासादा युवक था. संगीता जैसी सुंदर, कर्मठ, व्यवहारकुशल पत्नी पा कर वह निहाल हो गया था.

संगीता की सास रमा की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए ससुराल आते ही उस ने घर की सारी जिम्मेदारी संभाल ली थी. पति के साथसाथ वह ससुर का भी पूरा खयाल रखती थी. बहू की इस सेवा से विश्राम सिंह भी खुश थे. वह अपनी कमाई का आधा पैसा बहू को दे देते थे. संगीता का जीवन हंसीखुशी से बीत रहा था.

लेकिन संगीता ने अपने जीवन में जो मौजमजे के सपने देखे थे, कामता के साथ पूरे नहीं हो पाए थे. पति की सीमित आय से उस की इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती थीं.

बाद में कामता प्रसाद को लगने लगा कि संगीता बहुत महत्त्वाकांक्षी औरत है, क्योंकि वह उस से तरहतरह की फरमाइश करने लगी थी. खेतीकिसानी से गुजरबसर करने वाला कामता संगीता की फरमाइशें पूरी नहीं कर पाता था.

पति की मजबूरी समझने के बजाय संगीता उस से झगड़ा करने लगी थी. संगीता के इसी स्वभाव की वजह से दोनों के दांपत्य जीवन में कटुता आ गई थी. इन्हीं विषम परिस्थितियों में समय आगे खिसकता रहा.

दोस्त ने दोस्ती की आड़ में लगाई सेंध

कामता का बचपन का दोस्त था विजय कोरी. उस का घर गांव के पूर्वी छोर पर था. विजय के पिता सियाराम जाजमऊ स्थित एक टेनरी में काम करते थे. उन को अच्छा वेतन मिलता था. विजय अच्छाखासा पढ़ालिखा था. लेकिन उस पर नेता बनने का भूत सवार था. इसी के मद्देनजर उस ने बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम लिया था. अपनी पार्टी का वह जोरदार प्रचार करता था, इसलिए स्थानीय नेताओं में उस की पैठ बन गई थी.

नेताओं से सांठगांठ के चलते ही उस ने सरसौल क्षेत्र से पार्षद का टिकट हासिल कर लिया था. टिकट मिलने के बाद चुनाव प्रचार में जुट गया. इसी दौरान विजय का कामता के घर आनाजाना होने लगा. तभी उस की नजर कामता की खूबसूरत बीवी संगीता पर पड़ी.

पहली ही नजर में संगीता विजय के दिल में रचबस गई. चुनाव में संगीता व उस के पति कामता ने विजय का खूब प्रचार किया. उसी दौरान विजय और संगीता की नजदीकियां बढ़ती गईं. संगीता भी विजय में दिलचस्पी लेने लगी थी.

हालांकि विजय पार्षद का चुनाव हार गया था, लेकिन वह संगीता को जीतने में कामयाब हो गया था. वह संगीता के यहां कभी खाली हाथ नहीं आता था. कभी उस के हाथ में चिकन की थैली होती तो कभी संगीता के लिए उपहार. संगीता भी उसे चाहने लगी थी.

एक दिन मौका मिलने पर जब विजय ने संगीता को अपनी बांहों में बांध कर उस की उन्मादी आंखों में झांका तो संगीता भी उसे मना नहीं कर पाई. उस की मौन स्वीकृति मिलते ही विजय बेकाबू हो गया.

संगीता भी सब कुछ भूल कर उस की बांहों में झूल गई. इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. फिर तो चोरीछिपे उन का यह खेल खेला जाने लगा. ऐसे संबंध चाहे कितने भी चालाकी से क्यों न बनाए जाएं, एक न एक दिन जगजाहिर हो ही जाते हैं.

धीरेधीरे विजय और संगीता के अवैध संबंधों को ले कर पासपड़ोस में तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. जब इस की भनक कामता को लगी तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ. कामता ने इस बाबत संगीता से बात की तो वह तुनक कर बोली, ‘‘विजय तुम्हारा दोस्त है. तुम्हीं उस के साथ महफिल जमाते हो. अगर तुम्हें शक है तो उसे घर आने को मना कर दो.’’

‘‘संगीता, मैं तुम पर शक नहीं कर रहा हूं. ऐसी बातें पासपड़ोस के लोग कर रहे हैं.’’ कामता ने कहा.

‘‘पड़ोसियों की बातों पर ध्यान मत दो, क्योंकि वे सब हम से जलते हैं. विजय हमारी आर्थिक मदद करता है. हमारे छोटेमोटे काम भी कर देता है, इसलिए पड़ोसी कानाफूसी करते हैं और बदनाम कर रहे हैं.’’ संगीता ने पति को समझाया.

संगीता ने जिस संजीदगी से बात कही, उस पर कामता ने सहज ही विश्वास कर लिया. पर उस के मन में शक का कीड़ा कुलबुलाता रहा. अत: वह संगीता व अपने दोस्त विजय पर कड़ी नजर रखने लगा.

उस ने विजय से कह भी दिया कि वह घर में तभी आए, जब वह घर में मौजूद हो. विजय समझ गया कि कामता को उस पर शक हो गया है. अत: वह संगीता से मिलने में सावधानी बरतने लगा.

लेकिन सावधानी के बावजूद एक दिन विश्राम सिंह ने बहू संगीता को विजय के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. उस रोज विश्राम सिंह ने घर में हंगामा खड़ा कर दिया. उन्होंने दोनों को खूब खरीखोटी सुनाई और विजय को अपमानित कर के भगा दिया.

कामता के सामने आई हकीकत

शाम को जब कामता घर आया तो उस ने बहू की करतूत उसे बताई. कामता को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन कुछ सोचने के बाद उस ने संगीता को इज्जत का वास्ता दे कर समझाया और सही रास्ते पर चलने की नसीहत दी.

पति और ससुर की नसीहतों का संगीता पर कोई असर नहीं हुआ. क्योंकि संगीता के बहके कदम पतन की राह पर इतने आगे निकल चुके थे कि उस का लौटना मुश्किल था. विश्राम सिंह रिटायर केस्को कर्मी थे. अत: पूरे दिन घर पर ही रहते थे. वह भी बहू पर कड़ी नजर रखने लगे थे. कड़ी निगरानी से संगीता और विजय के मिलन में अड़चन पड़ने लगी थी. कई बार संगीता विजय को दरवाजे से ही लौटा चुकी थी.

विश्राम सिंह के विरोध को कम करने के लिए विजय ने एक नया तरीका निकाला. वह जानता था कि विश्राम शराब के शौकीन हैं. अत: जब वह आता तो शराब की बोतल साथ लाता. पहले वह झुक कर विश्राम के पैर छूता और फिर कहता कि चाचा तुम्हारे लिए दवाई (शराब) लाया हूं, चाहो तो ले लो. मैं भी तुम्हारा साथ दूंगा.

फिर दोनों बैठ कर शराब पीते. विजय जानबूझ कर विश्राम सिंह को ज्यादा पिला देता ताकि वह सुधबुध खो बैठें. विश्राम के बेसुध होते ही विजय संगीता के बिस्तर पर पहुंच जाता था.

एक दिन संगीता ने कहा, ‘‘विजय, अब ससुर का विरोध दिनबदिन बढ़ता जा रहा है. किसी दिन उस ने हम दोनों को फिर देख लिया तो हंगामा खड़ा कर देगा. कोई ऐसा रास्ता निकालो, जिस से हमें मिलने में कोई डर न हो.’’

‘‘अगर तुम मेरा साथ दो, तो एक रास्ता है.’’

‘‘क्या?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘बुड्ढे को ठिकाने लगाना पड़ेगा.’’ विजय ने कहा.

‘‘ठीक है लगा दो ठिकाने, मैं तुम्हारा साथ दूंगी.’’

इस के बाद दोनों ने विश्राम सिंह की हत्या की योजना बनाई. योजना बन जाने के बाद विजय और संगीता सही मौके का इंतजार करने लगे. उधर सीधासादा कामता पत्नी की कुटिल चाल को समझ नहीं पाया. वह संगीता के चरित्र पर तो संदेह करता ही था पर खुल कर विरोध नहीं कर पाता था. जब कभी वह विरोध की हिम्मत जुटाता तो संगीता उस के विरोध को अपनी चपल बातों से ही दबा देती थी. वैसे भी वह पति पर हावी रहती थी.

बुना गया हत्या का जाल

17 सितंबर, 2018 को गांव में गणेश पूजा थी. गणेश पूजा का आयोजन गांव के पश्चिमी किनारे स्थित एक इंटर कालेज के मैदान में किया गया था. कुछ नामी कलाकार भी कार्यक्रम में आए थे. अत: शाम से ही लोग कालेज के मैदान में जुटने लगे थे. विजय ने इसी अवसर का फायदा उठा कर विश्राम को ठिकाने लगाने की सोची.

रात लगभग 8 बजे विजय शराब की बोतल ले कर विश्राम सिंह के पास पहुंचा. उस ने कहा, ‘‘चाचा, गणेश पूजा में नहीं चलोगे? सुना है कि वहां कई नामी कलाकार आए हैं.’’

‘‘सुना तो मैं ने भी है, लेकिन मेरा शरीर टूट रहा है. मैं नहीं जा पाऊंगा.’’ विश्राम सिंह ने कहा.

‘‘चाचा, बदन टूटने की दवा मैं साथ लाया हूं. इसे पी लो, फिर बदन नहीं टूटेगा.’’ कहते हुए विजय ने शराब की बोतल खोली. फिर दोनों ने शराब पी. विश्राम सिंह को शराब पिलाने के बाद विजय चला गया.

कुछ देर बाद विश्राम सिंह ने खाना खाया और गणेश पूजा पंडाल में पहुंच गए. इधर विजय ने मोबाइल से संगीता से बात की और कहा कि आज अपने बीच के कांटे को निकाल फेंकना है. तुम भी पंडाल आ जाओ.

कामता उस समय घर पर ही था. वह दिन भर का थकामांदा था, सो चारपाई पर जा कर लेट गया. थोड़ी सी देर में उसे नींद आ गई. संगीता ने एक नजर खर्राटे भर रहे पति पर डाली और बाहर की कुंडी लगा कर पूजा पंडाल पहुंच गई. वहां उस ने विजय से योजना पूछी.

पूजा पंडाल में गणेश वंदना चल ही रही थी कि विश्राम सिंह नशे की हालत में नाचने लगे. कार्यक्रम आयोजकों ने उन्हें रोका और पंडाल से बाहर कर घर जाने को कहा. विश्राम सिंह पंडाल से बाहर आए तो विजय सामने आ कर बोला, ‘‘चाचा, आप ज्यादा नशे में हो. चलो, घर छोड़ देता हूं.’’

विजय विश्राम सिंह को ले कर चला तो निगाहें गड़ाए बैठी संगीता भी पीछे से आ गई. दोनों विश्राम सिंह को घर के बजाय गांव के पूर्वी छोर पर स्थित कुएं के पास ले गए. यहां विजय ने विश्राम को जमीन पर गिरा दिया. इस के बाद विश्राम के गले में पड़े अंगौछे से उन का गला घोंटने लगा.

विश्राम सिंह हाथपैर चलाने लगे तो संगीता ने उन के पैर दबोच लिए. कुछ देर तड़पने के बाद विश्राम सिंह शांत हो गए. इस के बाद दोनों ने शव को उठा कर कुएं में फेंक दिया. फिर इत्मीनान से दोनों अपनेअपने घर चले गए.

अगले दिन सुबह जब कामता को पिता की सुध आई तो उस ने उन की खोज शुरू की. न मिलने पर उस ने थाने में गुमशुदगी दर्ज करा दी. 4 दिन बाद जब गांव में बदबू फैली तो लोग कुएं पर पहुंचे और थाना महाराजपुर पुलिस को सूचना दी.

7 अक्तूबर, 2018 को पुलिस ने अभियुक्त संगीता को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी. दूसरे अभियुक्त विजय ने आत्महत्या कर ली थी. अत: पुलिस ने उस की फाइल बंद कर दी थी.

  • कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

उमा और सुषमा की घोषणा

पिछले 5 सालों में उमा भारती और सुषमा स्वराज के मंत्री पद पर रहते हुए भी अपने कार्यालयों या संसद में चाहे कोई विशेष योगदान न रहा हो पर फिर भी 2019 के लोकसभा चुनावों को न लड़ने की उन की खुल्लमखुल्ला घोषणा, वह भी 2018 में 5 राज्यों के चुनावों से पहले, कर देना यह साफ कर देता है कि भाषणबाजी के राज का असर कम हो रहा है.

केंद्र सरकार के पूरे होते कार्यकाल के दौरान देश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ताली बजाते भाषण लगभग हर रोज सुने. 17 घंटे काम करने वाले कहे जाने वाले प्रधानमंत्री जितने घंटे भाषणों में लगाते थे, वे कम कर दिए जाएं तो कार्यालय में बैठ कर योजनाओं पर विचार करने के लिए कितने घंटे बचते होंगे, अंदाजा लगाया जा सकता है.

दूसरे बहुत बोलने वाले अरुण जेटली, जो राज्यसभा में आए, पर 2013 में भाजपा में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का समर्थन करने के बदले दूसरे सर्वोच्च स्थान पर बैठे हैं, भी ज्यादा बोलते रहे हैं. वे यह बखान जरूर करते रहे कि भारत दुनिया का सब से तेजी से बढ़ने वाले देशों में से है पर वे यह नहीं बताते थे कि 1,800 डौलर के 7 प्रतिशत और 9,000 डौलर के 6 प्रतिशत में कितना अंतर होता है. भारत की प्रतिव्यक्ति आय 1,800 डौलर है, चीन की 9,000 और अमेरिका की 59,000 डौलर. अगर चीन 6 प्रतिशत से और अमेरिका

3 प्रतिशत से बढ़ रहा है तो भारत हर साल कितना पिछड़ता जाएगा, इस का अंदाजा अगर वित्तमंत्री नहीं लगाते और बताते, तो या तो वे पद के लायक नहीं या फिर झूठ बोलते हैं.

सुषमा स्वराज और उमा भारती ने समझ लिया है कि भाजपा का भविष्य ऐसे ही लोगों के हाथों में रहेगा जो बड़बोले हैं. पिछले 5 सालों में धर्म के व्यापार के अलावा सारे व्यापार ठप हुए हैं. ऐसे माहौल में पार्टी चाहे न छोड़ी जाए, कम से कम चुनावी जद्दोजेहद से तो बचा जाए.

एक व्यक्ति पर केंद्रित भाजपा गांधी परिवार को चाहे कितना कोस ले, कांग्रेस में फिलहाल ज्यादा सक्रिय नेता हैं. फिर दूसरी पार्टियों के तो नेता हैं ही, जिन में ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, चंद्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, महबूबा मुफ्ती, लालू प्रसाद यादव शामिल हैं. इस के मद्देनजर ही इन दोनों भाजपाई महिला नेताओं ने सोचा कि क्यों जोखिम लिया जाए.

बाघिन अवनि का विवादास्पद अंत : क्यों मारा गया अवनि को

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में 2 नवंबर, 2018 की आधी रात को रालेगांव की बाघिन टी-1 को गोली मार दी गई. इस बाघिन को अवनि के नाम से जाना जाता था. 5 साल की अवनि ने इसी साल जनवरी में 2 शावकों को जन्म दिया था. करीब 10-10 महीने के ये दोनों शावक मां की मौत के बाद बेसहारा हो गए.

कहा जाता है कि बाघिन अवनि आदमखोर हो चुकी थी. करीब 2 साल में यह बाघिन 13 लोगों का शिकार कर चुकी थी. जिला यवतमाल के रालेगांव, पांढरकवड़ा और कलंब तहसील के करीब 25 गांवों में इस बाघिन का आंतक था. बाघिन अवनि को जंगल में तलाश करने के लिए करीब 2 महीने से वन विभाग और गैरसरकारी लोगों की टीमें युद्धस्तर पर जुटी हुई थीं. हालांकि पकड़ने का अभियान 10 महीने से चल रहा था.

बाघिन को ढूंढने के लिए मध्य प्रदेश के कान्हा नैशनल पार्क से 4 और नागपुर के ताड़ोबा से एक हाथी लाया गया था. थर्मल ड्रोन से भी उसे पकड़ने की कोशिश की गई. हैदराबाद से शार्प शूटर नवाब शफात अली खान को बुलाया गया.

देश के जानेमाने गोल्फर ज्योति रंधावा की भी सेवाएं ली गईं. जंगल में 100 से ज्यादा ट्रैप कैमरे लगाए गए, साथ ही 52 जगह प्रेशर इंप्रेशन पैड लगाए गए. जगहजगह बकरियों और घोड़ों को बांध कर मचान बनाए गए. दिल्ली से पैरा मोटर भी मंगवाई गई, लेकिन सभी कोशिशें नाकाम रहीं.

अवनि को आकर्षित करने के लिए नर बाघ के मूत्र का छिड़काव किया गया. बाघबाघिन के मूत्र की गंध एकदूसरे को आकर्षित करती है. नर बाघ मूत्र की गंध के सहारे ही मादा की तलाश करता है, जबकि मादा उस गंध के सहारे चलती हुई नर को ढूंढती है. इस के अलावा अमेरिका से मंगाए गए बाघबाघिन के मूत्र की गंध वाले विशेष रसायन सिवेटोन का भी जंगल में जगहजगह पर छिड़काव किया गया.

इन सब का परिणाम यह निकला कि  अवनि मारी गई. बाघिन अवनि की मौत के दूसरे दिन 3 नवंबर को उस का शव नागपुर के गोरेवाड़ा रेस्क्यू सेंटर लाया गया. वहां पशु चिकित्सकों की टीम ने अवनि के शव का पोस्टमार्टम किया. बाद में उस के शव को जला दिया गया.

अवनि की मौत पर यवतमाल जिले के उन गांवों के लोगों ने खुशी मनाई, जो उस से आतंकित थे. वहीं वन्यजीव और पर्यावरण प्रेमियों ने बाघिन को मारने का विरोध किया. इन लोगों ने कई जगह प्रदर्शन किए.

विरोध की कहानी से पहले हम आप को बाघिन अवनि के बारे में बताते हैं.

यवतमाल जिले के रालेगांव जंगल के पांढरकवड़ा इलाके में सब से पहले सन 2015 में करीब एक साल की मादा शावक वन विभाग की नजर में आई थी. उस समय इस का नाम टी-1 रखा गया. बाद में वनकर्मियों और वन्यजीव प्रेमियों ने इस बाघिन का निक नेम अवनि रख दिया. यह बाघिन जंगल के करीब 15-20 किलोमीटर के दायरे में विचरण करती थी.

कहा जाता है कि अवनि ने सब से पहले पहली जून, 2016 को 60 साल की एक बुजुर्ग महिला सोनाबाई भोसले को अपना शिकार बनाया था. सोनाबाई का शव कपास के एक खेत में पड़ा मिला था. इस के करीब 3 महीने बाद बाघिन ने 3 और 4 सितंबर को लगातार 2 दिन 2 लोगों का शिकार किया. उसी साल 30 अक्तूबर को चौथा इंसान इस नरभक्षी के हमले का शिकार हो कर मौत की नींद सो गया.

इस के बाद कई महीनों तक बाघिन अवनि ने न तो किसी इंसान का शिकार किया और न ही वन विभाग को बाघिन की कोई खैरखबर मिली. जुलाई, 2017 में इस बाघिन ने पांचवां इंसानी शिकार किया. फिर लगातार हर महीने वह एक इंसान को शिकार बनाती रही. अगस्त, 2017 में नरभक्षी बाघिन की ओर से किया गया छठा शिकार सामने आया. सितंबर में सातवें, अक्तूबर में आठवें और दिसंबर 2017 में नरभक्षी के नौवें इंसानी शिकार का पता चला.

नरभक्षी बाघिन के लगातार हमलों और उस के मुंह इंसान का खून लग जाने से पांढरकवड़ा जंगल के आसपास बसे करीब 2 दरजन गांवों में दहशत बढ़ती गई. बाघिन के खौफ से फारेस्ट रेंज के आसपास के गांवों के लोग घर से निकलने में डरने लगे. इस से उन के खेतीकिसानी के काम भी प्रभावित हुए.

जनवरी, 2018 में नरभक्षी बाघिन ने रालेगांव तहसील के लोणी गांव के रहने वाले 70 साल के रामजी को मार डाला. उस दिन शाम के समय रामजी ने अपने 2 एकड़ के खेत में गेहूं की फसल को नीलगाय और जंगली सूअरों से बचाने के लिए आग जला रखी थी,

तभी बाघिन टी-1 अचानक निकल कर आई और झपट्टा मार कर रामजी को खींच ले गई. जब एक चरवाहे ने देखा कि बाघिन रामजी को गरदन से उठा कर ले जा रही है, तो उस ने अपनी लाठी बाघिन की ओर फेंकी.

इस पर बाघिन ने मरणासन्न रामजी को छोड़ दिया और उस चरवाहे को खा जाने वाली नजरों से देखते हुए गुर्राई. इस के बाद बाघिन फिर से रामजी की गरदन को मुंह में दबोच कर ले गई. कुछ दूर ले जा कर उस ने रामजी को छोड़ दिया, लेकिन तब तक वह मर चुका था.

बाघिन के लगातार हमलों से आसपास के लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा था. रामजी की मौत को ले कर ग्रामीणों ने रास्ता जाम कर दिया. साथ ही विरोध प्रदर्शन करते हुए वन अधिकारियों व सरकारी वाहनों पर पथराव भी किया. स्थानीय लोगों की ओर से जोरशोर से नरभक्षी बाघिन को मारने की मांग की जाने लगी.

इस के बाद महाराष्ट्र के प्रधान मुख्य वन्यजीव संरक्षक ए.के. मिश्रा ने बाघिन टी-1 अवनि को नरभक्षी मान कर देखते ही गोली मारने के आदेश जारी कर दिए. वन्यजीव प्रेमियों और ऐक्टिविस्ट जैरील बनाइत सहित कई स्वयंसेवी संगठनों ने वन विभाग के इस आदेश को बौंबे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ में याचिका दायर कर के चुनौती दी. याचिका में कहा गया कि बाघिन अवनि गर्भवती हो सकती है, इसलिए उसे नहीं मारा जाए.

वन विभाग ने हाईकोर्ट में कहा कि नरभक्षी बाघिन को पकड़ने के लिए अभियान चलाया जा रहा है. इस पर हाईकोर्ट ने 31 जनवरी, 2018 को वन विभाग के शूटआउट और्डर को अलग कर दिया और केवल पकड़ने का औपरेशन जारी रखने की अनुमति दी.

वन विभाग नरभक्षी बाघिन अवनि को पकड़ने के प्रयास में जुट गया. फरवरी के दूसरे पखवाड़े में बाघिन अवनि 2 नवजात शावकों के साथ नजर आई. शावकों के साथ दिखाई देने पर वन विभाग का बाघिन को पकड़ने का अभियान धीमा हो गया.

बाद में कुछ महीनों तक शांति बनी रही. वन विभाग का बाघिन अवनि को पकड़ने का अभियान भी ढीला पड़ चुका था. फिर अचानक अगस्त महीने की 4 तारीख को नरभक्षी ने एक और इंसान का शिकार कर लिया. इस के बाद 10 अगस्त और फिर 28 अगस्त को 2 लोग नरभक्षी के शिकार बने. इस तरह 13 लोगों का शिकार किए जाने पर वन विभाग ने बाघिन अवनि को देखते ही गोली मारने और उस के दोनों शावकों को पकड़ने का आदेश दोबारा जारी कर दिया.

वन्यजीव प्रेमियों एवं स्वयंसेवी संगठनों ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी. इस पर वन विभाग ने हाईकोर्ट को बताया कि बाघिन टी-1 अब तक 13 लोगों को अपना शिकार बना चुकी है. बाघिन को ट्रैप करने के लिए लगाए कैमरों और वन संरक्षण की टीम ने इस की पुष्टि की है. बाघिन के साथ उस के 2 शावक भी हैं.

मां को मानव का शिकार करते देख कर इन शावकों के भी बड़े होने पर नरभक्षी होने की आशंका है. अगर ऐसा हुआ तो इंसान और वन्यजीवों के बीच स्थिति खतरनाक हो जाएगी. सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने 6 सितंबर को यह याचिका खारिज कर दी.

हाईकोर्ट में याचिका खारिज होने पर वन्यजीव प्रेमियों ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली. किसी बाघिन को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पहली बार इस तरह की याचिका दाखिल की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद 11 सितंबर को आदेश दिया कि अगर लोगों के हित में वनरक्षकों को नरभक्षी बाघिन को गोली मारने को मजबूर होना पड़े तो वह दखल नहीं देगा, लेकिन पहले बाघिन को बेहोश करने की कोशिश होनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद वन विभाग ने अगले ही दिन से युद्धस्तर पर नरभक्षी बाघिन अवनि को तलाशने का अभियान छेड़ दिया. इस अभियान में वन विभाग के करीब 200 अधिकारियों और कर्मचारियों को शामिल किया गया.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अवनि को पकड़ने की कोशिश वन विभाग ने रालेगांव तहसील के लोणी गांव के जंगल में बेस कैंप बनाया. विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों ने लगभग साढे़ 6 हजार हेक्टेयर के जंगल में नरभक्षी बाघिन अवनि को तलाशने का काम शुरू किया. वन विभाग ने हैदराबाद से शार्पशूटर नवाब शफात अली को बुलाया. शफात अली कई दिनों तक अवनि की तलाश में जुटे रहे, लेकिन बाघिन नहीं मिली.

इस के बाद नवाब के दोस्त और देश के नामी गोल्फर ज्योति रंधावा के इटैलियन डौग्स बुलाए गए. रंधावा दिल्ली से अपने केन कार्स प्रजाति के 2 डौग्स को ले कर हवाईजहाज से नागपुर आए. इस बीच नवाब शफात अली और रंधावा का वन्यजीव प्रेमियों की ओर से विरोध होने लगा. सोशल मीडिया पर उन के खिलाफ हमले बढ़े तो शफात अली और रंधावा वापस चले गए.

वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपने स्तर पर बाघिन की तलाश शुरू की लेकिन कमर तक खड़ी जंगली घास इस में बाधक बनने लगी. इस का हल भी निकाला गया. बाघिन की तलाश के लिए मध्य प्रदेश से 4 प्रशिक्षित हाथी मंगवाए गए. ये चारों हाथी आपस में भाई थे. 5वां हाथी नागपुर के ताड़ोबा से मंगाया गया.

इस बीच ताड़ोबा से लाया हाथी 2 अक्तूबर को जंजीर तोड़ कर कैंप से 30 किलोमीटर दूर चहांद गांव की ओर भाग निकला. इस हाथी ने 30 साल की एक महिला अर्चना मोरेश्वर कुलसंगे को कुचल कर मार डाला. इस के अलावा एक बुजुर्ग को जख्मी कर दिया.

बाद में हाथी को किसी तरह काबू किया गया. इस घटना के बाद बाघिन की तलाश के लिए बुलाए गए सभी पांचों हाथियों को वापस भेज दिया गया.

बाद में वन विभाग ने हैदराबाद से शार्पशूटर नवाब शफात अली के बेटे असगर अली को बाघिन की तलाश के लिए बुला लिया. असगर अली कई दिनों तक नरभक्षी बाघिन अवनि की तलाश में जुटे रहे. 2 नवंबर की शाम उन्हें अवनि के ताजा फुटमार्क मिले. अब तक अवनि को पकड़ने के अभियान पर लगभग 6 करोड़ रुपए खर्च हो चुके थे.

यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि राष्ट्रपति के पास लगाई गई दया याचिका पर फैसला आने से पहले ही अवनि का अंत हो गया. दरअसल, कुछ वन्यजीव प्रेमियों ने अवनि को बचाने के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के पास याचिका भेजी थी. इस में बाघिन को मारने के आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया गया था.

अवनि को बचाने के लिए याचिकाकर्ताओं ने अमेरिका की बिग कैट रेस्क्यू का उदाहरण दिया, जिस में आदमखोर हो चुके शेर, बाघ और तेंदुओं को रखा जाता है. भारत में बिग कैट रेस्क्यू अभियान 2 सामाजिक कार्यकर्ता सुप्रिया सिंह और नीतू जे चला रही हैं. वह एक एनजीओ अर्थ ब्रिगेड फाउंडेशन से भी जुड़ी हैं.

कहानी शफात अली खां की हैदराबाद के शिकारी नवाब शफात ने महाराष्ट्र के चंद्रपुर में अब तक 3 बाघ, 10 तेंदुए, कुछ हाथियों सहित अन्य वन्यजीव और जंगली सूअर मारे हैं. शफात पर सवाल इसलिए उठे कि वह भले ही महाराष्ट्र के वन विभाग की ओर से ऐसे मामलों के लिए अधिकृत शार्पशूटर हैं. लेकिन नवाब के गृह राज्य तेलंगाना के साथ कनार्टक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों ने उन पर बैन लगा रखा है.

6 महीने पहले यवतमाल जिले के पांढरकवड़ा इलाके में ही एक औपरेशन के दौरान वन विभाग के साथ जालसाजी करने को ले कर शफात के बयान की जांच चल रही है. उन पर आरोप है कि उन्होंने शिकार से पहले वन्यजीव को बेहोश करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवा 50 हजार रुपए में बेच दी थी.

कई साल पहले कर्नाटक पुलिस ने शफात को देशद्रोहियों को हथियार सप्लाई करने के आरोप में गिरफ्तार किया था. कर्नाटक की सीआईडी ने भी शफात को अवैध शिकार के मामले में गिरफ्तार किया था.

बाघिन अवनि को गोली मारने वाले शफात के बेटे असगर अली पर भी सवाल उठ रहे हैं. वजह यह कि असगर अली इस के लिए अधिकृत नहीं था. वह रात को जंगल में गया और अवनि को मार दिया. नैशनल टाइगर कंजरवेशन अथौरिटी की गाइडलाइन कहती है कि सूर्योदय से पहले और सूर्योदय के बाद बाघ पर गोली नहीं चलाई जा सकती.

रात को वन्यजीव को ट्रंकुलाइज भी नहीं किया जा सकता. बताया जा रहा है कि बाघिन को पौइंट 300 विन राइफल से मारा गया, जिस की बुलेट का व्यास 7.62 एमएम और वजन 11.50 ग्राम होता है. एनटीसीए की गाइडलाइंस में इस कैलिबर के उपयोग की अनुमति नहीं है.

सोशल एक्टिविस्ट जैरील बनाइत का आरोप है कि अवनि को बेहोश किए बिना ही मार दिया गया. यह सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों की अवहेलना है. उन्होंने वन विभाग के खिलाफ हाईकोर्ट में जाने का भी ऐलान किया है.

वन्यजीव प्रेमी अवनि को बचाने की कोशिश में लगे लोगों की अपील के बावजूद महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने अवनि को मारने का आदेश दिया. मुनगंटीवार बाघों को मारने के लिए हमेशा से हैदराबाद के शूटर शफात अली खान को बुलाते रहे हैं. इस बार उन के बेटे असगर अली को बुलाया. असगर अली बाघ को मारने के लिए अधिकृत नहीं थे. वन विभाग ऐसे बाघ को पकड़ने के लिए प्रतिबद्ध था.

बाद में मेनका गांधी ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिख कर कहा कि राज्य के वन मंत्री थोड़ी संवेदना और धैर्य रखते तो अवनि को बचाया जा सकता था. मेनका ने अवनि की मौत के लिए वन मंत्री मुनगंटीवार को जिम्मेदार बताते हुए पद से हटाने का भी अनुरोध किया.

अवनि की मौत पर राजनीतिक रूप से आलोचना होने और देशविदेश में बवाल मचने पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले की जांच के आदेश दिए, जबकि केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र सरकार से अवनि को मारने की घटना की रिपोर्ट मांगी.

फडणवीस ने कहा कि बाघिन को मारने की खुशी नहीं है. वन विभाग ने अवनि को मारने का फैसला तब लिया, जब वह 13 लोगों की जान ले चुकी थी. उस ने वनकर्मियों पर भी हमला किया था. बाघिन को मारने के लिए शिकारी असगर अली की मदद लेने के मामले की भी जांच कराई जाएगी.

दूसरी ओर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने मेनका की टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि केंद्रीय मंत्री के पास मामले की कम जानकारी है. वह चाहें तो इस की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे सकती हैं.

सवाल इस बात पर भी उठ रहे हैं कि क्या बाघिन अवनि वास्तव में नरभक्षी थी. यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि अवनि द्वारा 13 लोगों की जान लेने का दावा किया जा रहा है, जबकि मारे गए लोगों में से केवल 3 शवों के पोस्टमार्टम हुए. इन में भी यह पुष्टि नहीं हुई कि इन लोगों को अवनि ने ही शिकार बताया था. अब सुखद बात यह है कि अवनि के दोनों शावकों के पैरों के निशान चिकली वेडसी मार्ग पर बेंबला नहर के पास दिखाई दिए हैं.

फिल्म निर्माता और वरिष्ठ पत्रकार प्रीतीश नंदी ने हाल ही में एक लेख में अवनि की मौत के पीछे के कारणों को रेखांकित किया है. उन्होंने इस बाघिन की मौत को चूना, कोयला, डोलामाइट जैसे खनिजों के लिए संरक्षित वनभूमि पर कब्जे के प्रयास का नतीजा बताया है. इस की वजह से यह जंगल अतिक्रमण की चपेट में आता रहा है.

सरकार ने मात्र 40 करोड़ रुपए में 500 हेक्टेयर वनभूमि उद्योगपति अनिल अंबानी को बेच दी. इस से वहां की जमीन की वास्तविक कीमत का अंदाजा होता है.

अब उस जंगल में एक और सीमेंट प्लांट के साथ पावर प्लांट भी आकार ले रहा है. अब कई दूसरे उद्योगपति भी जंगल पर कब्जे के लिए कतार में हैं. अवनि को शायद लगा हो कि ये घुसपैठिए जंगल में क्यों आ रहे हैं, वह तो इस जंगल को अपना घर ही समझती थी.

पहले देश में विभिन्न स्थानों पर अवनि को बचाने के लिए प्रदर्शन किए गए. बाद में अवनि की मौत को ले कर मुंबई, दिल्ली, चेन्नै, कोलकाता, हैदराबाद, पुणे, जयपुर ही नहीं टोरंटो, लास एंजिलिस, न्यूयार्क आदि शहरों में प्रदर्शन कर लोगों ने अपने गुस्से का इजहार किया. मुंबई में हुए प्रदर्शन में कई फिल्म कलाकारों सहित अभिनेता संजय दत्त की बहन प्रिया दत्त ने भी हिस्सा लिया.

अवनि की मौत भले ही विवादों में घिरी हुई है लेकिन इस से सबक लेने की जरूरत है. अवनि के दोनों शावक उस के साथ रहे थे, इसलिए इन्होंने मां के साथ इंसानी मांस का स्वाद चखा या नहीं, यह कहना मुश्किल है. लेकिन अगर इन्हें जल्दी ही पकड़ कर पुनर्वासित नहीं किया गया तो दोनों शावक भी आदमखोर बन सकते हैं.

नेक नहीं था हरनेक : आखिर कैसी थी पैसे की भूख

‘‘हैलो, आप गुड़गांव पुलिस कंट्रोल रूम से बोल रहे हैं?’’ एक आदमी ने घबराई हुई आवाज में फोन पर पूछा.

‘‘हां, यह पुलिस कंट्रोल रूम ही है. आप बताएं, क्या कहना चाहते हैं.’’ ड्यूटी औफिसर ने कहा.

‘‘साहब, आप गुड़गांव से ही बोल रहे हैं न?’’ फोन करने वाले ने संतुष्टि के लिए पूछा.

‘‘हां, हम गुड़गांव से ही बोल रहे हैं.’’ ड्यूटी औफिसर ने संजीदगी से जवाब दिया.

‘‘साहब, मैं पंजाब के लुधियाना से रूपेंदर सिंह बोल रहा हूं.’’ फोन करने वाले ने कहा, ‘‘साहबजी, बात यह है कि मेरे रिश्तेदार हरनेक सिंह ढिल्लन ने अपनी बीवी को मार डाला है और खुद भी सुसाइड करने जा रहा है.’’ एक ही बार में उस ने अपनी बात कह डाली. फिर बोला, ‘‘साहब जी, हरनेक को बचा लीजिए.’’

‘‘रूपेंदर सिंह जी, पहले यह बताएं कि आप के रिश्तेदार रहते कहां हैं?’’ ड्यूटी औफिसर ने सवाल किया.

‘‘साहब, वह गुड़गांव के डीएलएफ फेज-2 में जे ब्लौक में रहता है.’’

‘‘ठीक है, हम पुलिस भेजते हैं.’’ ड्यूटी औफिसर ने रूपेंदर सिंह को भरोसा दिया. यह 20 अक्तूबर की बात है. समय रहा होगा सुबह के करीब 10 बजे का.

फोन पर रूपेंदर सिंह से मिली सूचना के आधार पर पुलिस कंट्रोल रूम ने डीएलएफ थाने को सूचना दी.

सूचना मिलने के कुछ ही देर बाद डीएलएफ थानाप्रभारी विष्णु प्रसाद कुछ पुलिस जवानों के साथ फेज-2 के जे ब्लौक के लिए रवाना हो गए. पुलिस 10 मिनट में मौके पर पहुंच गई. जे ब्लौक में पहुंच कर पुलिस ने हरनेक सिंह ढिल्लन के मकान के बारे में पूछताछ की. 2-4 लोगों से पूछताछ के बाद पुलिस को हरनेक सिंह के मकान का पता चल गया.

वह 3 मंजिला कोठी थी. कोठी के बाहर पुलिस को ऐसा कुछ नजर नहीं आया जिस से यह लगता कि अंदर किसी ने हत्या कर के खुद सुसाइड कर लिया हो. पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला हरनेक सिंह दूसरी मंजिल पर रहता है.

पुलिस दूसरी मंजिल पर पहुंची तो उसे हरनेक सिंह के घर के अंदर एक भयावह दृश्य से रूबरू होना पड़ा. बैड पर एक बुजुर्ग महिला की लाश पड़ी थी. उस का गला रेता गया था. गला रेतने के कारण खून पूरे बिस्तर पर फैला हुआ था. इसी कमरे में एक बुजुर्ग पड़ा हुआ था. उस की कलाई की नसें कटी हुई थीं और खून रिस कर बह रहा था.थानाप्रभारी ने बैड पर पड़ी बुजुर्ग महिला की नब्ज टटोल कर देखी. उस में जीवन के कोई लक्षण नहीं थे. इस के बाद बुजुर्ग की नब्ज देखी तो चलती मिली थी, वह अर्धमूर्छित था.

पुलिस ने बुजुर्ग से उस का नाम पूछा तो उस ने हरनेक सिंह ढिल्लन बताया. पुलिस उस से कुछ और पूछताछ करती, इस से पहले ही हरनेक सिंह फिर से अचेत हो गया.

पुलिस के लिए किसी भी तरह हरनेक सिंह की जान बचाना जरूरी था. हाथ की नसें काट लिए जाने से उस का काफी खून बह चुका था. थानाप्रभारी ने 2 सिपाहियों को हरनेक सिंह के मकान पर छोड़ा और खुद उन्हें अस्पताल ले गए. अस्पताल के डाक्टरों ने अविलंब हरनेक का उपचार शुरू कर दिया. समय पर इलाज मिल जाने और डाक्टरों के प्रयास से उस की जान बच गई.

रहस्यमय मामला

जब यह सुनिश्चित हो गया कि हरनेक सिंह की जान बच जाएगी तो थानाप्रभारी विष्णु प्रसाद ने उस की कोठी पर जांचपड़ताल शुरू की. आसपड़ोस के लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि मरने वाली बुजुर्ग महिला का नाम गुरमेल कौर था. अभी प्राथमिक जांच चल ही रही थी कि डीएलएफ के सहायक पुलिस आयुक्त करण गोयल भी वहां पहुंच गए.

एसीपी गोयल ने घटनास्थल की स्थिति देखनेसमझने के बाद थानाप्रभारी को वहां एकत्र लोगों की मौजूदगी में घर की तलाशी लेने और गुरमेल की हत्या व हरनेक सिंह के सुसाइड का प्रयास करने के कारणों का पता लगाने के दिशानिर्देश दिए. मौके की आवश्यक काररवाई के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया.

गुड़गांव पुलिस को गुरमेल कौर की हत्या और हरनेक सिंह के सुसाइड करने की सूचना लुधियाना के रूपेंदर सिंह ने दी थी. इसलिए पुलिस ने रूपेंदर सिंह से फोन पर बात की तो उस ने बताया कि वह हरनेक सिंह का रिश्तेदार है.

सुबह करीब 9 बज कर 40 मिनट पर हरनेक सिंह ने फोन कर के उस से कहा था कि मैं ने गुरमेल को मार डाला है और खुद सुसाइडकरने जा रहा हूं.

रूपेंदर सिंह ने पुलिस को बताया कि हरनेक सिंह की बात सुन कर वह काफी घबरा गया था. वह गुड़गांव से दूर लुधियाना में था और किसी भी तरह हरनेक सिंह की जान नहीं बचा सकता था. इसलिए उस ने गुड़गांव पुलिस को फोन कर के मामले की जानकारी दे दी थी.

पुलिस ने जांचपड़ताल की तो हरनेक सिंह के कमरे से एक सुसाइड नोट मिला. यह सुसाइड नोट वसीयत के रूप में लिखा गया था. इस में हरनेक सिंह ने अपनी कोठी, बैंक बैलेंस समेत तथा अन्य संपत्तियों का बंटवारा बेटे और बेटी के अलावा एक रिश्तेदार के बीच करने की बात लिखी थी. सुसाइड नोट में हरनेक सिंह ने यह भी लिखा था कि मृत्यु के बाद उस की आंखें, किडनी, फेफड़े और हार्ट दान कर दिया जाए.

पुलिस ने हरनेक सिंह के बेटेबेटी के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि बेटा मनजीत सिंह आस्ट्रेलिया के शहर सिडनी में रहता है. वहां वह किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में अधिकारी है. हरनेक सिंह की बेटी कनाडा में अपने परिवार के साथ रहती थी. पुलिस ने हरनेक सिंह के बेटे और बेटी को फोन कर के इस घटना की सूचना दे दी.

हरनेक सिंह के बच्चे विदेश में रहते थे, उन का कोई ऐसा करीबी रिश्तेदार भी नहीं था, जो गुड़गांव में रहता हो. इसलिए पुलिस ने हरनेक की पत्नी गुरमेल का शव अस्पताल के फ्रिजर में रखवा दिया ताकि बेटे के आने पर पोस्टमार्टम कराया जा सके. हरनेक सिंह के बेटे मनजीत सिंह ने पुलिस से कहा कि वह अर्जेंट में कोई फ्लाइट पकड़ कर जल्द से जल्द भारत पहुंच जाएगा.

पुलिस ने हरनेक सिंह के बारे में उस के घर के आसपास रहने वालों से पूछताछ की तो पता चला कि वह मूलरूप से लुधियाना का रहने वाला था और वहां की एक आटोमोबाइल कंपनी में अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुए थे. बाद में वह पत्नी गुरमेल कौर के साथ डीएलएफ फेज-2 के जे ब्लौक की इस कोठी में रहने लगा था, जो उन की अपनी थी. यह कोठी उस ने 10-11 साल पहले खरीदी थी.

आसपास के लोगों ने पुलिस को बताया कि हरनेक सिंह किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करता था. लेकिन उस की पत्नी गुरमेल कौर पड़ोसियों से बोलतीचालती भी थीं और घुलीमिली भी थीं. पतिपत्नी रोजाना सुबह मौर्निंग वौक पर पार्क जाते थे. वहां गुरमेल कौर अन्य महिलाओं के साथ योगा करती थीं. बाद में पतिपत्नी आपस में बातें करते हुए पार्क से घर लौट आते थे.

पड़ोसियों से पूछताछ में पुलिस के सामने यह बात जरूर आई कि हरनेक सिंह और उस की पत्नी गुरमेल 4-5 दिनों से परेशान नजर आ रहे थे. बीच में एकदो दिन के लिए वह बाहर भी चले गए थे, जिस की वजह से मौर्निंग वौक पर नहीं जा पाए थे.

उधर, अस्पताल में भरती हरनेक सिंह की हालत खतरे से बाहर तो हो गई थी, लेकिन वह पुलिस को बयान देने की स्थिति में नहीं था. फलस्वरूप इस बात का खुलासा नहीं हो सका कि हरनेक सिंह ने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया था.

ऐशोआराम की जिंदगी में ऐसा कदम क्यों?

हरनेक सिंह के पास पैसे की कोईकमी नहीं थी. उस की काफी अच्छी कोठी थी. बेटी कनाडा में अच्छे से सैटल थी और बेटा आस्ट्रेलिया की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अधिकारी था. सुसाइड नोट में परेशानी की कोई वजह भी नहीं लिखी थी. ऐसी स्थिति में कोई ठोस वजह सामने नहीं आने पर पुलिस ने यही माना कि हरनेक सिंह ने अकेलेपन से परेशान हो कर पत्नी को मौत की नींद सुलाने के बाद खुद भी जान देने का फैसला किया होगा.

दूसरे दिन पंजाब से रूपेंदर सिंह और कुछ अन्य रिश्तेदार गुड़गांव आ गए. रूपेंदर सिंह की शिकायत पर पुलिस ने 21 अक्तूबर को हरनेक सिंह के खिलाफ पत्नी की हत्या और सुसाइड नोट के प्रयास का मामला दर्ज कर लिया. साथ ही पुलिस इस मामले से जुड़े कारणों की तलाश में जुटी रही.

पुलिस को इस बारे में या तो हरनेक सिंह से जानकारी मिल सकती थी या फिर उस के बेटे मनजीत सिंह से. लेकिन परेशानी यह थी कि दूसरे दिन भी शाम तक हरनेक सिंह पुलिस को बयान दर्ज कराने की स्थिति में नहीं आया. वहीं, हरनेक का बेटा मनजीत भी आस्ट्रेलिया से शाम तक गुड़गांव नहीं पहुंचा था.

मनजीत सिंह से पुलिस की बात हुई तो उस ने देर रात तक गुड़गांव पहुंचने की बात कही थी.

इस बीच, पुलिस को पता चला कि हरनेक सिंह के संबंध जसकरण सिंह से रहे हैं. जसकरण उस का अच्छा परिचित था. जसकरण गुड़गांव के सेक्टर-29 इलाके के सरस्वती विहार में रहता था. वह 14 अक्तूबर से लापता था. जसकरण की पत्नी मनजीत कौर ने इस संबंध में 16 अक्तूबर को सेक्टर 29 पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

इस रिपोर्ट में उस ने बताया था कि जसकरण 14 अक्तूबर को हरनेक सिंह से मिलने जाने के लिए घर से स्कूटी ले कर गया था, लेकिन वापस नहीं लौटा था. जसकरण के लापता होने में उस के परिवार वालों ने हरनेक सिंह का हाथ होने की आशंका जताई थी.

जसकरण के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज होने पर सेक्टर-29 पुलिस ने एक दिन हरनेक सिंह के घर जा कर उस से पूछताछ की थी, लेकिन हरनेक सिंह ने इस बात से साफ इनकार कर दिया कि जसकरण के लापता होने से उस का कोई ताल्लुक है. हरनेक सिंह ने सेक्टर-29 थाना पुलिस के सामने यह बात जरूर कबूल की थी कि जसकरण 14 अक्तूबर को उस से मिलने आया था.

जसकरण का मामला सामने आने पर डीएलएफ थाना पुलिस कई एंगलों से इस मामले की जांचपड़ताल करने में जुट गई. पुलिस ने हरनेक सिंह के मकान के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो पता चला कि जसकरण सिंह 14 अक्तूबर को हरनेक सिंह के घर आया जरूर था, लेकिन वहां से वापस नहीं लौटा था.

कहां गया जसकरण

इस पर गुड़गांव पुलिस के आला अफसरों ने एक बार फिर हरनेक सिंह के मकान का जायजा लिया और पड़ोसियों से पूछताछ की. हरनेक सिंह के मकान से पुलिस को जसकरण की स्कूटी मिल गई. पुलिस ने वह स्कूटी अपने कब्जे में ले ली. अब पुलिस इस बात की जांच में जुट गई कि जसकरण का इस घटना से क्या संबंध था.

जांचपड़ताल चल ही रही थी कि मनजीत सिंह अपनी पत्नी किरणवीर कौर के साथ आस्ट्रेलिया से गुड़गांव आ गया. वह 22 अक्तूबर को पुलिस के साथ अपने पिता के मकान पर गया. कुछ देर वहां रुकने के बाद वह अपने दोस्त के घर चला गया.

पुलिस की पूछताछ में मनजीत सिंह ने बताया कि पिता से उस की करीब 2 साल से बोलचाल नहीं थी. हां, वह अपनी मां गुरमेल से फोन पर रोजाना बात करता था.

मनजीत ने पुलिस को बताया कि उस के पिता के पास डीएलएफ फेज-2 के जे ब्लौक की कोठी के अलावा अन्य कोई प्रौपर्टी नहीं है. इस कोठी में भी केवल दूसरी मंजिल का फ्लैट ही उन का अपना है, बाकी दोनों तल दूसरों के हैं. मनजीत ने पिता के लुधियाना स्थित पैतृक गांव में भी कोई संपत्ति नहीं होने की बात बताई.

मनजीत ने पिता के लिखे सुसाइड नोट पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि उन के पास कोई संपत्ति थी ही नहीं तो बंटवारा किस बात का होता. मनजीत ने सुसाइड नोट की हैंड राइटिंग को ठीक से पहचानने से मना कर दिया. मनजीत से पिता द्वारा की गई उस की मां की हत्या के कारणों के बारे में पूछा तो वह कोई कारण नहीं बता सका.

मनजीत ने इतना जरूर बताया कि उस के पिता अच्छे आदमी नहीं थे, लेकिन वह बुरेआदमी कैसे थे, इस बारे में वह कोई संतोषप्रद जवाब नहीं दे सका. कुल मिला कर पुलिस को हरनेक के बेटे मनजीत से गुरमेल कौर की हत्या और पिता के खुदकुशी के प्रयास तथा उन की परेशानी के कारणों के बारे में कोई महत्त्वपूर्ण सुराग नहीं मिल सका.

जरूरी पूछताछ के बाद पुलिस ने मनजीत सिंह से अस्पताल जा कर अपने पिता को देख आने को कहा, लेकिन मनजीत ने साफ मना कर दिया. एकदो रिश्तेदारों ने भी मनजीत से पिता को देख आने की बात कही, लेकिन उस ने किसी की बात नहीं मानी.

बाद में पुलिस ने मनजीत की मौजूदगी में घटना के तीसरे दिन 22 अक्तूबर को गुरमेल कौर के शव का पोस्टमार्टम कराया. पोस्टमार्टम के बाद गुरमेल का शव मनजीत को सौंप दिया गया. मनजीत अंतिम संस्कार के लिए अपनी मां का शव लुधियाना ले गया.

बड़ा खिलाड़ी निकला 77 साल का हरनेक

अस्पताल के डाक्टरों से इजाजत मिलने पर पुलिस ने हरनेक सिंह से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि लापता होने से पहले जसकरण आखिरी बार उस के घर आया था, इसलिए उस के परिवार वाले उस पर संदेह कर रहे हैं. पुलिस ने भी इस मामले में उस से पूछताछ की थी. जसकरण के घर वालों ने भी उस के घर आ कर हंगामा किया था.

हरनेक ने पुलिस को बताया कि जसकरण ने उस से 40 लाख रुपए उधार ले रखे थे. उस के लापता होने से वह खुद परेशान था. जसकरण को गायब करने के आरोपों और उधार दी गई रकम की वापसी न होने की आशंका से वह परेशानी और तनाव में था.

इसी के चलते उस ने पहले 72 साल की अपनी पत्नी गुरमेल की हत्या की, और बाद में खुद अपनी जान देने का प्रयास किया. पुलिस ने हरनेक सिंह के बयान के आधार पर आईपीसी की धारा 302 और 309 के तहत 77 साल के हरनेक सिंह को 24 अक्तूबर को गिरफ्तार कर लिया.

अगले दिन 25 अक्तूबर को पुलिस ने हरनेक सिंह को अदालत में पेश कर के 2 दिन के रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि के दौरान पुलिस ने हरनेक से कड़ाई से पूछताछ की तो एक ऐसे राज का पता चला, जिस से पुलिस अधिकारी भी हैरान रह गए. हरनेक सिंह से पूछताछ में जो कहानी सामने आई वह इस तरह थी—

हरनेक सिंह ने अपने दोस्त जसकरण सिंह से सोने के व्यापार के सिलसिले में करीब 50 लाख रुपए उधार लिए थे. तय समय गुजर जाने के बाद भी हरनेक ने जब उधार की रकम वापस नहीं की तो जसकरण उस से अपनी रकम का तकाजा करने लगा. इस बीच हरनेक के मन में खोट आ गया था. वह जसकरण से उधार ली गई रकम वापस नहीं लौटाना चाहता था.

इस के लिए हरनेक ने जसकरण की हत्या करने का फैसला कर लिया. साथ ही उस ने जसकरण के शव को ठिकाने लगाने की योजना भी बना ली. इस काम में हरनेक ने अपने एक पुराने नौकर जगदीश कुमार को सहयोग देने के लिए राजी किया. उत्तराखंड के चमोली का रहने वाला जगदीश पैसों के लालच में जसकरण की हत्या में सहयोग करने को तैयार हो गया.

करीब 38 वर्षीय जगदीश को हरनेक सिंह 2004 से जानता था. दरअसल, हरनेक सिंह पहले गुड़गांव के फेज-2 और सुशांत लोक-1 में 3 पेइंग गेस्ट हौस्टल संचालित करता था. इन पीजी हौस्टल के लिए हरनेक ने जगदीश को कुक के रूप में नौकरी पर रख रखा था.

बाद में हरनेक ने पेइंग गेस्ट हौस्टल का अपना काम बंद कर दिया. इस से जगदीश बेरोजगार हो गया तो हरनेक ने उसे एक एजेंट के माध्यम से दिल्ली में नौकरी पर रखवा दिया. दिल्ली में नई नौकरी पर जगदीश का मन नहीं लगा तो वह वापस हरनेक के पास आया. हरनेक ने उसे पैसों का लालच दे कर जसकरण की हत्या के लिए तैयार कर लिया.

पूरी साजिश रच कर हरनेक सिंह ने 14 अक्तूबर को अपने दोस्त जसकरण को उधार के पैसे देने के लिए घर बुलाया. जसकरण जब डीएलएफ फेज-2 में हरनेक सिंह के घर पहुंचा. उस समय जगदीश भी वहां था. हरनेक की पत्नी गुरमेल उस समय किसी काम से बाजार गई थी.

दोस्त को लगाया ठिकाने

हरनेक सिंह पहले तो जसकरण से कुछ देर तक घरगृहस्थी और पैसों की बातें करता रहा. इस दौरान जसकरण और हरनेक सिंह में झगड़ा भी हुआ. झगड़े की आवाजें पड़ोसियों ने भी सुनी थीं.

झगड़े के दौरान मौका मिलने पर हरनेक ने जगदीश के सहयोग से जसकरण की गला घोंट कर हत्या कर दी. इस के बाद हरनेक सिंह बाजार गया और मांस काटने वाली छुरी खरीद कर लाया.

हरनेक सिंह ने घर आ कर जगदीश की मदद से जसकरण के शव के करीब 20-25 टुकड़े किए. इन टुकड़ों को दोनों ने प्लास्टिक की 2 बड़ी थैलियों में भर दिया. बाद में जगदीश वहां से चला गया. गुरमेल घर लौटी, तो हरनेक ने उसे जसकरण की हत्या करने की बात बता दी. जसकरण की हत्या कर दिए जाने की बात जान कर गुरमेल बुरी तरह डर गईं. लेकिन वह क्या कर सकती थीं. गुरमेल ने इस बात के लिए हरनेक सिंह से झगड़ा भी किया.

उसी दिन शाम को हरनेक सिंह पत्नी गुरमेल के साथ पंजाब जाने के लिए अपनी सैंट्रो कार ले कर घर से निकल पड़ा. कार में उस ने जसकरण के शव के टुकड़ों की दोनों थैलियां भी रख ली थीं. गुड़गांव से पंजाब के रास्ते में हरनेक को जहां भी मौका मिला, जसकरण के शव के टुकड़े फेंक दिए.

बाद में 16 अक्तूबर की सुबह हरनेक और उस की पत्नी गुड़गांव अपने घर लौट आए. घर आ कर हरनेक ने अच्छी तरह से धुलाई कराई ताकि जसकरण की हत्या का कोई निशान बाकी न रह पाए.

हरनेक ने भले ही जसकरण की हत्या कर उस के शव को टुकड़ों में बांट कर ठिकाने लगा दिया था, लेकिन उसे खुद के पकड़े जाने का डर सताने लगा था. इस का कारण यह था कि जसकरण के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने उस से पूछताछ की थी. पुलिस उस से फिर से पूछताछ कर के घर की तलाशी ले सकती थी.

हरनेक को डर था कि जसकरण की हत्या का राज खुलने पर पुलिस उसे पकड़ कर ले जाएगी. इस पर उस ने पत्नी गुरमेल के साथ मिल कर सामूहिक आत्महत्या करने की योजना बनाई, लेकिन गुरमेल ने आत्महत्या करने से साफ इनकार कर दिया. इस से हरनेक सिंह को यह शक हो गया कि कहीं पत्नी ही उस का राज किसी के सामने न उगल दे.

हरनेक की खतरनाक साजिश

इस पर हरनेक सिंह ने एक और खतरनाक साजिश रची. उस ने 20 अक्तूबर की सुबह जब गुरमेल बैड पर सो रही थीं, गला काट कर उन की हत्या कर दी. इस के बाद हरनेक ने मामले को दूसरा रूप देने के लिए एक सुसाइड नोट लिखा. इस में अपनी संपत्ति के बंटवारे और जसकरण को मोटी रकम उधार देने की बात भी लिखी थी.

सुसाइड नोट लिख कर हरनेक ने लुधियाना में रहने वाले अपने रिश्तेदार रूपेंदर सिंह को फोन किया और उसे पत्नी की हत्या करने तथा खुद के सुसाइड करने की बात बताई. इस के बाद हरनेक ने अपने हाथ की नसें काट लीं. रूपेंदर सिंह की सूचना पर गुड़गांव पुलिस समय पर उस के घर पहुंच गई और हरनेक की जान बचा ली.

बाद में पुलिस ने हरनेक सिंह को फिर से रिमांड पर लिया और उस की निशानदेही पर पंजाब के लुधियाना की दोराहा नहर और कुछ अन्य जगहों से धड़ व बाजू सहित जसकरण के शव के टुकड़े बरामद किए. हरनेक ने जसकरण का सिर और एक बाजू भाखड़ा बांध में फेंक दी थी, उन का पता नहीं चल सका.

फरीदाबाद पुलिस ने दिल्ली के अलीपुर बौर्डर से जसकरण की एक टांग व कपड़े बरामद किए.

तीसरी बार रिमांड पर ले कर की गई पूछताछ के बाद पुलिस ने जसकरण की हत्या में हरनेक का सहयोग करने के आरोप में एक नवंबर को जगदीश को भी गिरफ्तार कर लिया. उसे उत्तराखंड के चमोली में उस के घर से पकड़ा गया.

जगदीश ने जसकरण की हत्या के लिए हरनेक से 2 लाख रुपए लिए थे. 2 नवंबर को पुलिस ने हरनेक सिंह को अदालत पर पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

इसे विडंबना कहेंगे कि 77 साल की उम्र में हरनेक सिंह ने करीब 50 लाख रुपए की रकम हड़पने के लिए पहले तो अपने ही दोस्त की हत्या कर दी और फिर पूरी कू्रूरता से उस के शव के टुकड़ेटुकड़े कर के यहांवहां फेंक दिए. अपने इस अपराध को छिपाने के लिए हरनेक ने अपनी ही पत्नी को भी मार डाला और खुद भी आत्महत्या का प्रयास किया.

जसकरण की जान केवल इसलिए चली गई कि वह विदेश में सोने का व्यापार करना चाहता था. इस के लिए हरनेक के कहने पर उस ने उसे करीब 30 लाख रुपए उधार दे दिए थे. हरनेक ने कनाडा में रहने वाली अपनी बेटी के जरिए उसे विदेश में सोने का व्यापार चमकाने का लालच दिया था. इस के लिए जसकरण ने अपना फ्लैट भी बेच दिया था.

एक बस के सफर ने बदल दी इस क्रिकेट खिलाड़ी की जिंदगी

बेहतरीन ‘स्लिप फिल्डर’ और आक्रामक बल्लेबाज के बाद शानदार कप्तान और एक सफल कोच बनकर भारतीय क्रिकेट में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व कप्तान अजीत वाडेकर के क्रिकेट करियर की शुरुआत एक बस के सफर से हुई थी.

वाडेकर को इस बात का इल्म भी नहीं था कि यहां से उनका एक बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी बनने का सफर शुरू होने जा रहा है, क्योंकि वह इंजीनियर बनने की राह पर थे.

एक इंटरव्यू में वाडेकर ने अपने जीवन की कई अनछुए पहलुओं पर चर्चा की थी. आपको बता दें कि मुंबई के एक अस्पताल में पिछले साल अगस्त माह के दौरान वाडेकर का लंबी बीमारी के कारण निधन हो गया था. वह 77 साल के थे.

क्रिकेट करियर की शुरुआत के बारे में पूछे जाने पर रोमांचक कहानी सुनाते हुए वाडेकर ने कहा था कि वह भारत के पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी बालू गुप्ते के साथ बस में एलिफिंस्टोन कौलेज जा रहे थे.

उन्होंने कहा, “हम दोनों एक ही कौलेज में थे. वह मुझे दो साल सीनियर थे और आर्ट्स में थे और मैं साइंस में था. मैंने क्रिकेट भी नहीं खेला था. मुझे तो इंजीनियर बनना था.”

वाडेकर ने कहा, “बालू मेरे पड़ोसी थे और इसीलिए, हम एक ही बस से कौलेज जाते थे. एक दिन उन्होंने मुझे कहा ‘अजीत क्या तुम हमारी कौलेज क्रिकेट टीम के 12वें खिलाड़ी बनोगे?’ उनकी प्लेइंग इलेवन बेहतरीन थी, लेकिन उनके पास मैदान पर पानी ले जाने वाला खिलाड़ी नहीं था. उन्होंने कहा कि मुझे इसके लिए एक दिन के तीन रुपये भी मिलेंगे. 1957 में तीन रुपयों की कीमत बहुत होती थी. यहीं से मैंने क्रिकेट में कदम रखा.”

पूर्व भारतीय खिलाड़ी वाडेकर ने इसके बाद कौलेज में क्रिकेट खेलना शुरू किया और वहां उनकी मुलाकात सुनील गावस्कर के अंकल माधव मंत्री से हुई. अपनी पढ़ाई के बाद वह काफी देरी से अभ्यास के लिए मैदान पर पहुंचते थे. माधव ने वाडेकर को नेट पर बल्लेबाजी करने के लिए कहा. इसके बाद उन्होंने कौलेज टीम के कप्तान को कहा कि वाडेकर टीम में नियमित रूप से खेलते रहेंगे. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

वाडेकर ने 1958-59 में मुंबई में प्रथम श्रेणी क्रिकेट में डेब्यू किया था. इसके बाद, सन 1966 में वेस्टइंडीज के खिलाफ उन्होंने टेस्ट करियर की शुरुआत की थी. उन्होंने एक क्रिकेट खिलाड़ी के तौर पर भारतीय टीम के लिए खेले गए 37 टेस्ट मैचों में 2,113 रन बनाए. इसमें 14 अर्द्धशतक और एक शतकीय पारी शामिल है. इसके अलावा, वाडेकर ने भारतीय टीम के लिए दो वनडे मैच भी खेले.

आक्रामक बल्लेबाज के रूप में पहचाने जाने वाले वाडेकर की कप्तानी में भारत ने 1971 में पहली बार इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के खिलाफ सीरीज जीती थी. उनके ही नेतृत्व में 24 अगस्त 1971 को भारतीय टीम ने इंग्लैंड को 4 विकेट से हराया था. यह इंग्लैंड की धरती पर भारत की पहली टेस्ट जीत थी.

इससे पहले 1968 में न्यूजीलैंड दौरे पर भारतीय टीम के लिए पहले टेस्ट मैच में वाडेकर ने दोनों पारियों में (80 और 71) सबसे अधिक रन बनाए थे. इस मैच में भारत ने पांच विकेट से जीत हासिल की थी. इसके बाद वेलिंग्टन में खेले गए तीसरे टेस्ट मैच में वाडेकर की ओर से खेली गई शानदार 143 रनों की पारी के दम पर भारत ने टेस्ट सीरीज में दूसरा मैच जीता था.

वाडेकर की बदौलत भारत ने चौथे टेस्ट मैच में बाजी मारते हुए न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरीज 3-1 से अपने नाम की.

भारत सरकार ने वाडेकर को 1967 में अर्जुन पुरस्कार से नवाजा था. इसके बाद 1972 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. बीसीसीआई ने उन्हें 2011 में सीके नायडू लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाजा.

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