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अपने बच्चे के भविष्य के लिए ऐसे बनाएं 20 लाख का फंड

हर व्‍यक्ति अपने बच्‍चों को बेहतर एजुकेशन दिलाना चाहता है. कई बार लोग पैसों की व्‍यवस्‍था न हो पाने के कारण अपने बच्‍चों को मनचाहे कौलेज या कोर्स में दाखिल नहीं कर पाते हैं. या इसके लिए उनको एजुकेशन लोन या पर्सनल लोन जैसा महंगा लोन लेना पड़ता है.

आज हम आपको ऐसा तरीका बता रहे हैं जिससे आप अपने बच्‍चे के लिए 7 साल में 20 लाख का फंड बना सकते हैं. 20 लाख रुपए आपके बच्‍चे की हायर एजुकेशन में काफी मदद कर सकता है. अगर आप समय रहते ऐसा करते हैं तो पैसों की कमी आपके बच्‍चे के कैरियर में बाधा नहीं बनेगी.

कैसे बनेगा 20 लाख का फंड

7 साल में 20 लाख रुपए का फंड बनाने के लिए आपको सिस्‍टमैटिक इन्‍वेस्‍टमेंट प्‍लान यानी एसआईपी में हर माह 15000 रुपए निवेश करना होगा. अगर आपको 7 साल में आपके निवेश पर 13 फीसदी रिटर्न मिलता है तो 7 साल के बाद आपका कुल फंड 20 लाख रुपए हो जाएगा. लंबी अवधि में एसआईपी म्‍यूचुअल फंड स्कीमों में 15 फीसदी तक रिटर्न मिला है.

हायर एजुकेशन की बढ़ रही है लागत

अगर आपको लगता है कि आपके बच्‍चे की हायर एजुकेशन के लिए यह रकम कम होगी तो आप इसी के हिसाब से मंथली एसआईपी की रकम बढ़ा सकते हैं. इसके अलावा अगर आपका बच्‍चा 2 या 3 साल का है तो आपको उसकी हायर एजुकेशन के लिए फंड बनाने के लिए ज्‍यादा समय मिलेगा. ऐसे में आप कम निवेश में बड़ा फंड बना सकते हैं.

वरना लेना पड़ेगा महंगा लोन

अगर आप अपने बच्‍चे की हायर एजुकेशन के लिए अलग से कोई फंड नहीं बनाते या सेविंग नहीं करते हैं तो हो सकता है आपको एजुकेशन लोन लेना पड़े. या फिर पैसे का इंतजाम करने के लिए पर्सनल लोन जैसा म‍हंगा लोन लेना पड़े.

लोअर मिडिल क्‍लास या मिडिल क्‍लास में बड़े पैमाने पर लोगों को अपने बच्‍चे की हायर एजुकेशल के लिए महंगा लोन लेना पड़ता है. ऐसे में अगर आप समय से प्‍लानिंग के साथ सेविंग करें तो आप इस स्थिति से बच सकते हैं.

खुद बदलो तो दुनिया बदलेगी, नहीं तो फिर…

एक दिलचस्प कहानी है कि एक  बार एक राजा बहुत बीमार हो  गया. बहुत से वैद्यों को दिखाया, पर किसी को उस का रोग समझ नहीं आया. फिर एक वैद्य ने सलाह दी कि राजा उसी सूरत में ठीक हो सकता है अगर वह सिर्फ हरा रंग ही देखे. राजा ने हर चीज हरी करवा दी. महल के रंग से ले कर कपड़े, यहां तक कि खाना भी हरे रंग का ही खाने लगा. एक बार एक साधु वहां से गुजरा और हर ओर हरे रंग का आधिपत्य देख उस ने लोगों से इस का कारण पूछा तो राजा की बीमारी के बारे में उसे पता लगा. यह जान वह राजा के पास गया और बोला, ‘‘महाराज, आप किसकिस चीज को हरे रंग में बदलेंगे? हर चीज को बदलना संभव नहीं है. इस से बेहतर होगा कि आप हरा चश्मा पहन लें, फिर आप को हर चीज हरी ही नजर आएगी.’’

प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का स्वयं वास्तुशिल्पी होता है. वह जैसा चाहता है वैसा ही उस का निर्माण करता है. हालांकि निर्मित करने के बाद कई बार उसे एहसास होता है कि जो उस ने निर्मित किया है वह उसे पसंद नहीं आया है और उस में बदलाव करने के बजाय दूसरों को इस का दोषी ठहराने लगता है. वास्तव में तब तक कुछ नहीं बदलता जब तक कि हम खुद को नहीं बदलते. जिंदगी को देखने का चश्मा ही अगर गलत पहना हो तो खूबसूरत रंग बदरंग लगने स्वाभाविक हैं, फूलों की छुअन में कांटों की चुभन का एहसास होना स्वाभाविक है.

झुंझलाहट घेरे रहती है

अधिकतर लोग दूसरे लोगों के व्यवहार व विचारों की वजह से परेशान व क्रोधित होते रहते हैं और इस तरह वे न सिर्फ अपना समय बरबाद करते हैं बल्कि ऊर्जा भी खर्च करते हैं. अंत में उन के हाथ क्या लगता है, एक खीझ और झुंझलाहट ही न. आखिर हमें ऐसा क्यों लगता है कि हम दूसरों को बदल सकते हैं. दूसरे की भी तो सोच हमारी तरह स्वतंत्र होगी. लेकिन हम यह मानने के बजाय अकसर यही कहते हैं, ‘आखिर वह ऐसा कैसे कह सकता है?’ या ‘वह इतना कठोर कैसे हो सकता है?’ या ‘उसे तो इस बात का एहसास भी नहीं हुआ होगा कि उस ने मुझे कितना दुख पहुंचाया है?’

इस तरह के अनेक जुमले हम कहते और सुनते हैं. हम इसलिए इस तरह  की प्रतिक्रिया करते हैं क्योंकि हम  तार्किक व व्यावहारिक ढंग के बजाय अपनी भावनात्मक जरूरतों के अनुसार भावनात्मक रूप से ही व्यवहार करते हैं. इसलिए जब कोई दूसरा हमारी इन भावनात्मक जरूरतों पर प्रहार करता है तो हम इस तरह से प्रतिक्रिया करते हैं जो दूसरों की नजरों में अनुचित होती है.  पर्सनैल्टी आर्किटैक्ट लैफ्टिनैंट रितु गंगवानी के अनुसार, ‘‘दुनिया में किसी दूसरे इंसान को बदलना या उस से इस बात की अपेक्षा रखना बहुत ही गलत व नकारात्मक स्थितियां उत्पन्न करता है. ऐसा इसलिए क्योंकि हर इंसान अलग है, यहां तक कि जुड़वां बच्चों की सोच, व्यवहार व जीवन जीने के ढंग में अंतर होता है.

‘‘हम सब एक डिजाइनर पीस हैं जिन का हर चीज को देखने का नजरिया दूसरे से अलग होता है. ऐसे में जब हम किसी दूसरे को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश करते हैं तो यह जरूरी नहीं होता कि वह सही ही हो. हर व्यक्ति का चीजों को समझने का नजरिया भिन्न होता है और ऐसे में दूसरे व्यक्ति की सोच से उस का नजरिया टकराए, यह स्वाभाविक सी बात है. रिश्तों में टकराहट न आए या मतभेद न पैदा हों, इस के लिए बेहतर यही होगा कि खुद को बदल लो.’’

दूसरों को दोष न दें

किसी दूसरे व्यक्ति के व्यवहार या सोच को बदलने के लिए कोई जादू की छड़ी नहीं है, इसलिए जब आप यह कहते हैं कि काश उस ने ऐसा न किया होता या मुझे यकीन नहीं होता कि वह ऐसा कर सकता है तो यह कहने से पहले अपने विचारों पर अंकुश लगा कर कुछ पल ठहरें और दूसरे के नजरिए से उस के व्यवहार को परखें. तब आप स्वयं ही किसी के व्यवहार या सोच के बारे में निर्णय लेना बंद कर देंगे. जिस दिन आप दूसरों के नजरिए का फैसला करना छोड़ अपनी सोच के बारे में निर्धारण करना शुरू कर देंगे उसी दिन से दुनिया आप के लिए बदली हुई और खूबसूरत हो जाएगी.

सीनियर साइकोलौजिस्ट डा. भावना बर्मी के अनुसार, ‘‘आज व्यक्ति का मनोविज्ञान या सोच बाहरी स्थितियों द्वारा ज्यादा नियंत्रित होती है और आंतरिक स्थितियों द्वारा कम. लोग चाहने लगे हैं कि उन की जिम्मेदारियां कोई दूसरा पूरी कर दे और खुद जिम्मेदारियों से बचे रहना चाहते हैं. इस की वजह है कि आजकल तनाव व असुरक्षा का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ गया है और सैल्फएस्टीम का स्तर घट गया है. यही कारण है कि खुद को बदलने की जिम्मेदारी भी वे दूसरों पर डाल देते हैं.’’

रखें सही सोच

अगर हम नाखुश हैं तो इस का सीधा सा अर्थ है कि हम कुछ गलत कर रहे हैं और हल ढूंढ़ने के बजाय चीजों को और उलझा रहे हैं. छोटे परदे की अभिनेत्री राजश्री ठाकुर का मानना है कि अगर आप सही हैं तो मुश्किलों का हल खुद ही मिल जाता है. वे कहती हैं, ‘‘हर इंसान अपनी स्थिति के हिसाब से जीता है और किसी दूसरे के हिसाब से खुद को बदलना उस के लिए मुश्किल होता है इसलिए जब दूसरे उस से बदलने की अपेक्षा रखते हैं तो गलतफहमियां पैदा हो जाती हैं और संबंध टूटने के कगार पर आ खड़े होते हैं.

‘‘सही यही रहता है कि दूसरे की स्थितियों के अनुसार सामंजस्य बिठाया जाए. नजरिया बदलते ही चीजें अलग दिखाई देने लगती हैं. नकारात्मक चीजें सकारात्मक लगने लगती हैं और लोगों में कमियों की जगह खूबियां नजर आने लगती हैं. हम में से हर किसी ने इस बात का अनुभव कभी न कभी अवश्य किया होगा, पर फिर भी जब अपेक्षाएं हम पर हावी होने लगती हैं तो हम दूसरों को बदलने की कोशिश में लग जाते हैं और दुनिया को खराब मान अपने को ही नहीं, अपने आसपास के लोगों को भी दुखी करते रहते हैं. सही सोच सही दिशा दिखाती है तब दुनिया बदली हुई और अपने हिसाब की भी लगने लगती है.’’

खुद का विश्लेषण जरूरी

डा. बर्मी का कहना है, ‘‘हमें खुद का विश्लेषण करना चाहिए. हमें अपनी कमजोरियों के साथसाथ अपनी ताकत व उन क्षेत्रों के बारे में भी जानना होगा जहां सुधार करने की आवश्यकता है. आकलन करने के लिए दिल और दिमाग में संतुलन होना चाहिए और साथ ही एक क्रमबद्ध जीवनशैली भी. गहराई से अपना आकलन करने से ही हम सही दिशा में बढ़ सकते हैं और सकारात्मक नजरिया पा सकते हैं. जैसे ही हमारा अपने प्रति दृष्टिकोण बदल जाएगा, दुनिया अच्छी लगने लगेगी. जिंदगी एक आईने की तरह होती है, हम जिस तरह से उसे देखते हैं, वह उसी रूप में वापस हमारे पास आती है.’’

लिहाजा, बेहतरी के लिए जब किसी और को बदलना संभव न हो तो स्वयं को बदलना ही एकमात्र विकल्प है. खराब से खराब स्थिति में भी उसे उपयोगी व अनुकूल बनाने के लिए केवल अपने नजरिए को बदलने की आवश्यकता होती है. आप की सोच तय करती है कि चीजें कैसा आकार लेंगी. फिर नकारात्मक सोच रखने का क्या फायदा? बल्कि जब आप सकारात्मक ढंग से सोचने लगते हैं और अपनी गलतियों की जिम्मेदारी खुद लेने लगते हैं तो कई बार हार व निराशा भी आप के पक्ष में काम करने लगती है. जिम्मेदारी लेने का अर्थ ही है अपनी परेशानियों व दुखों के लिए दुनिया को दोष देना बंद कर देना. दुनिया को अपने अनुसार ढालने के बजाय अपने विचारों को बदलें. आप की सोच सकारात्मक ढंग में ढलती जाएगी और दुनिया से भी कोई शिकायत नहीं रहेगी.

मैं निर्देशक के अनुसार चलती हूं : जश्न अग्निहोत्री

अभिनय को अपना सबकुछ मानने वाली अभिनेत्री जश्न अग्निहोत्री दिल्ली की हैं. एयर होस्टेज के पद पर काम करने वाली जश्न को हिंदी फिल्में देखने का शौक बचपन से था, पर उन्होंने कभी अभिनय के बारें में सोचा नहीं था. काम के दौरान बौलीवुड के कुछ मौडल कौर्डिनेटर ने उसे अभिनय की सलाह दी और औडिशन के लिए बुलाया. वह मौडल बनी और उसी दौरान उन्हें मधुर भंडारकर ने अपनी फिल्म ‘इंदू सरकार’ में एक गाने के लिए चुना गया. उनका काम छोटा था, पर सबने उनकी तारीफ की.

यहीं से उनकी फिल्मों की जर्नी शुरू हुई. अभिनय के अलावा वह एक ट्रेंड क्लासिकल डांसर भी हैं. उन्होंने हिंदी ,पंजाबी और तेलगू फिल्मों में काम किया है. उनकी पंजाबी फिल्म ‘चन तारा’ रिलीज हो चुकी है, जिसमें उन्होंने डबल रोल किया है. अपनी जर्नी को लेकर वह जश्न बहुत खुश हैं. पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश.

JashnAgnihotri

प्र. आप इंडस्ट्री में कैसे आई ? किससे प्रेरणा मिली?

मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं मौडल या एक्ट्रेस बनूंगी, मैं पहले एयर होस्टेज थी. फ्लाइट में कुछ लोग ऐसे मिले जो मौडल कौर्डिनेटर थे और उन्होंने मुझे कहा कि मेरा फेस अच्छा है. मेरी हंसी चार्मिंग है, ऐसा सुनते-सुनते मेरे अंदर अभिनय की इच्छा पैदा हुई.

प्र. पहली बार कब अभिनय के बारे में सोचा? दिल्ली से मुंबई कैसे आना हुआ?

मैंने अभिनय के बारे कभी नहीं सोचा था. मैं दिल्ली की हूं और मुझे अपना काम अच्छा लग रहा था, लेकिन मैंने मौडलिंग के बारे में अवश्य सोचा था. काम के दौरान एक मौडल कौर्डिनेटर ने अपना कार्ड दिया और मुझे औडिशन के लिए बुलाया. फिर मुझे जब मुंबई फ्लाइट के साथ नाईट स्टे करने का मौका मिलता था, औडिशन देने चली जाती थी. इससे मुझे थोडा-थोडा काम मिलना शुरू हुआ.

ऐसा करते-करते फिल्मों के लिए भी औडिशन देने के लिए जाती रही. मैंने आज तक 100 से भी अधिक विज्ञापनों में काम किया है. ऐसे ही मुझे मधुर भंडारकर मिले और फिल्म ‘इंदु सरकार’ के एक गाने के लिए मेरा स्क्रीन टेस्ट लिया. मैं चुन ली गयी और फिल्मों की यात्रा शुरू हुई. मैंने ‘जीनियस’ फिल्म में भी काम किया है. इसके बाद एक मैंने पंजाबी फिल्म की है, जिसमें मैंने डबल रोल किये हैं. इस फिल्म के बाद मुझे काफी सराहना मिली और आगे अच्छा काम करने के बारे में सोचती हूं.

JashnAgnihotri

प्र. नये कलाकार को एक सही फिल्म मिलना कितना मुश्किल होता है?

नये कलाकार को अच्छा काम मिलना मुश्किल होता है, ऐसे में अगर भूमिका छोटी होने पर भी इफेक्टिव हो, तो उसे करना पसंद करती हूं, क्योंकि ऐसी बड़ी फिल्म का हिस्सा बनने से आपको बड़े कलाकार के साथ काम करने और सीखने का मौका मिलता है. कई बार ये छोटी सी भूमिका फिल्म को आगे बढ़ने में मदद करती है. इसलिए मैं वैसी ही भूमिका को खोजती हूं.

प्र. अच्छी नौकरी को छोड़कर आप फिल्मों में अभिनय के लिए आई, कितना रिस्की और संघर्ष था?

सुरक्षित जीवन से असुरक्षित क्षेत्र में आना मेरी अपनी पसंद है और मुझे इसमें अधिक अच्छा लग रहा है. इसके अलावा मुझे अधिक संघर्ष नहीं करने पड़े, क्योंकि जान पहचान से मुझे कुछ काम मिले थे. मेरा फिल्मी बैकग्राउंड नहीं है, पर लाइफ ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है. यहां आते ही मौडलिंग शुरू हुई, फिर थोड़े-थोड़े अभिनय का काम भी मिलना शुरू हो गया था.

JashnAgnihotri

प्र. परिवार का सहयोग कितना था?

पहले जब मैंने बताया तो वे थोड़े नाराज़ हुए थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यहां शोषण काफी होता है, इंडस्ट्री में लड़कियों को सम्मान नहीं मिलता आदि, लेकिन मेरी यात्रा को देखने के बाद वे अब खुश हैं और मेरे काम की सराहना करते हैं.

प्र. अभिनय को लेकर आपने कुछ मापदंड बनाये हैं?

नहीं, मैंने कोई मापदंड नहीं बनाये हैं, जैसी भूमिका होगी, मैं वैसा ही करना चाहती हूं. मैं निर्देशक के अनुसार चलती हूं.

JashnAgnihotri

प्र. क्या कभी आपको कास्टिंग काउच का सामना करना पड़ा?

नहीं, मुझे कभी सामना नहीं करना पड़ा. मेरी यात्रा बहुत अच्छी रही है और मैं अपने काम से बहुत संतुष्ट हूं.

प्र. कोई खास ड्रीम प्रोजेक्ट, जो आप करना चाहें?

मैं मधुबाला और माधुरी दीक्षित की बायोपिक में अभिनय करना चाहती हूं. मुझे इसकी बहुत चाहत है. इसके अलावा मैं निर्देशक साजिद नाडियाडवाला, संजय लीला भंसाली और नीरज पांडे के साथ काम करना चाहती हूं.

JashnAgnihotri

प्र. ‘मी टू’ के बारें में आपकी सोच क्या है?

ये कैम्पेन अच्छा है, लेकिन इसे कानून की सहायता से सुलझाना चाहिए, पहले मीडिया के द्वारा नहीं, क्योंकि क्या सही क्या गलत है, इसे कानून की नजर से देखना चाहिए और गलती होने पर सजा भी मिलनी चाहिए.

प्र. आप कितनी फूडी हैं?

मैं पंजाबी हूं और पंजाबी सारे भोजन मुझे पसंद हैं. मैं सब खाती हूं, लेकिन वर्कआउट भी करती हूं. मैं दिल्ली के सभी जगहों के छोले-भठूरे खाकर बड़ी हुई हूं.

JashnAgnihotri

प्र. आप कितनी फैशनेबल हैं?

मुझे फैशन बहुत पसंद है और हर तरह के परिधान पहनती हूं. मैं अपनी डिजाइनर खुद हूं. पर्सनल लाइफ में मैं बहुत साधारण हूं, लेकिन अगर शूट हो, तो उसके हिसाब से सबकुछ करती हूं.

प्र. तनाव होने पर क्या करती हैं?

वर्कआउट करती हूं, इससे सारा तनाव निकल जाता है.

JashnAgnihotri

प्र. समय मिलने पर क्या करती हैं?

मैं सारे अखबार पढ़ती हूं, डांस करती हूं और दोस्तों से मिलती हूं.

प्र. सबसे बेस्ट कौम्प्लीमेंट क्या है?

निर्देशक मधुर भंडारकर ने मेरे काम की तारीफ की थी.

प्र. इंडस्ट्री में अपने आप को बनाये रखने के लिए क्या करती हैं?

मुझे जो काम मिलता है, उसे मैं खुशी से और अच्छा करने की कोशिश करती हूं.

JashnAgnihotri

प्र. आउटसाइडर होने से मुश्किलें आई?

मुश्किलें आई, पर मैं उस पर अधिक ध्यान नहीं देती. खुद कैसे ग्रो करना है, उसपर विश्वास करती हूं.

प्र. किस तरह की फिल्में देखकर आप बड़ी हुई?

मैंने बचपन में धर्मेन्द्र और राजेश खन्ना की फिल्में बहुत देखी है, क्योंकि मेरी मां और नानी उनकी फैन थी. उसमें मुझे राजेश खन्ना की फिल्म ‘आनंद’ और ‘अमर प्रेम’ आदि बहुत पसंद हैं. अभी के फिल्मों में गिप्पी ग्रेवाल की फिल्में देखी हैं. इसके अलावा फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ भी बहुत पसंद आई.

प्र. वेब सीरीज में करने की इच्छा है?

अभी मैंने एक वेब सीरीज की है और आगे भी करना चाहती हूं.

ये 5 तरीके अपनाएं और फर्जी एप को कहें बाय बाय

डाटा चोरी की घटनाएं सामने आने के बाद हर कोई अपने पर्सनल मोबाइल डाटा के प्रति सतर्क हो गया है. अब कोई थर्ड पार्टी एप डाउनलोड करते समय हम दुविधा में रहते हैं कि एप डाउनलोड करें या नहीं.

आइए कुछ जरूरी बातें जानें जिससे हमारी दुविधा खत्म हो. किसी भी थर्ड पार्टी एप को डाउनलोड करते समय अगर हम सामान्य बातों का ख्याल रखेंगे तो थर्ड पार्टी एप के खतरों से बच सकेंगे.

  1. एप के नाम पर दें विशेष ध्यान

किसी भी एप्लीकेशन को डाउनलोड करते समय उस एप के नाम पर विशेष ध्यान दें. अधिकतर देखा जाता है कि फर्जी एप का नाम किसी लोकप्रिय एप के नाम की नकल करके रखा जाता है.

इससे ऐसी एप के डाउनलोड किए जाने की संभावना बढ़ जाती है. एन के नाम की स्पेलिंग, एप के लोगो के रंग और डिजायन पर ध्यान दें, कई बार फर्जी एप और असली एप के डिजायन में बेहद मामूली अंतर होता है.

  1. डेवलपर के नाम को पढ़ें

एक ही नाम की एक से अधिक एप गूगल स्टोर पर मिल जाएंगी. ऐसे में अगर आप एप को डाउनलोड करना चाहते हैं तो बड़ी दुविधा होती है कि कौन सी एप्लीकेशन असली है. इसके लिए एप के डि्क्रिरशन में जाकर डेवलपर के नाम को ध्यान से पढ़ें.

कई फर्जी एप बनाने वाले डेवलपर तो असली एप के डेवलपर के नाम की भी नकल कर लेते हैं. इसलिए ध्यान दें कि कहीं डेवलपर के नाम के आगे कोई विशेष संकेत या अक्षर न लिखा हो. साथ ही अक्षरों के बीच में गैप न दिया गया हो. अगर ऐसा है तो संभावना है कि नकली एप बनाने वाले डेवलपर ने यूजर्स को धोखा देने के लिए यह किया हो.

  1. रिव्यू और रेटिंग पर दें ध्यान

प्ले स्टोर पर मौजूद सभी एप्लीकेशन पर पब्लिक फीडबैक सिस्टम होता है, यानी आम यूजर उस एप पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं. आप जब भी कोई नई एप डाउनलोड करना चाहते हैं तो पहले रिव्यू को ध्यान से पढ़ें. अगर रिव्यू सकारात्मक हों तब ही एप को डाउनलोड करें.

  1. एंटीवायरस का करें प्रयोग

अपने फोन को किसी भी फर्जी एप के खतरे से दूर रखने के लिए किसी विश्वसनीय एंटीवायरस का प्रयोग करें. एंटीवायरस होने पर फोन उस एप को डाउनलोड करने पर आपको चेतावनी देगा.

  1. थर्ड पार्टी एप स्टोर से रहें दूर

जब भी आपको कोई एप डाउनलोड करनी हो तो किसी भी थर्ड पार्टी एप स्टोर से उसे डाउनलोड करने से बचें. अगर आप एंड्रायड यूजर हैं तो गूगल प्ले स्टोर से ही एप डाउनलोड करें, क्योंकि वहां सभी एप की स्क्रूटिनिंग की जाती है.

राम रहीम पर कोर्ट ने नहीं किया कोई रहम

16 साल पुराने एक हत्याकांड में आज एक ऐसा फैसला आया है जिस का बहुत से लोगों को बेसब्री से इंतजार था. यह फैसला हरियाणा के एक बेखौफ पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड से जुड़ा था जिस में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को अदालत ने कुसूरवार ठहराया है.

पंचकूला, हरियाणा की विशेष सीबीआई कोर्ट के जज जगदीप सिंह ने हत्या के इस केस में राम रहीम समेत 4 आरोपियों को कुसूरवार माना. अब राम रहीम और बाकी कुसुरवारों को 17 जनवरी को सजा सुनाई जाएगी.

हरियाणा में सिरसा के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में 2 जनवरी को सीबीआई कोर्ट ने आरोपी गुरमीत राम रहीम, निर्मल, कुलदीप और कृष्ण लाल को कोर्ट में पेश होने के आदेश दिए थे. यह फैसला जज जगदीप सिंह ने सुनाया है. साध्वी यौन शोषण मामले में भी उन्होंने ही राम रहीम को सजा सुनाई थी.

कौन थे रामचंद्र छत्रपति

साध्वी यौन शोषण मामले में जो चिट्ठियां लिखी गई थीं, उन्हीं के आधार पर रामचंद्र छत्रपति ने अपने अखबार में खबरें छापी थीं. ऐसा होने पर पहले तो रामचंद्र छत्रपति पर दबाव बनाया गया लेकिन जब वे उन धमकियों के आगे नहीं झुके तो 24 अक्तूबर, 2002 को उन पर जानलेवा हमला कर दिया गया. इस के बाद 21 नवंबर, 2002 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में उन की मौत हो गई थी.

ऐसे की गई थी हत्या

मोटरसाइकिल पर आए कुलदीप ने रामचंद्र छत्रपति को गोली मारी थी जिन की बाद में मौत हो गई थी. मोटरसाइकिल पर कुलदीप के साथ निर्मल भी था. जिस पिस्तौल से रामचंद्र पर गोलियां चलाई गई थीं, उस का लाइसेंस डेरा सच्चा सौदा के मैनेजर कृष्ण लाल के नाम पर था जबकि गुरमीत राम रहीम पर इस हत्या की साजिश रचने का आरोप था.

फिलहाल राम रहीम 2 साध्वियों से यौन शोषण के मामले में 20 साल की सजा जेल में काट रहा है.

चूंकि इस फैसले पर सब की नजर थी इसलिए इस सुनवाई के मद्देनजर हरियाणा पुलिस ने रोहतक की सुनारिया जेल और सिरसा शहर में सुरक्षा के इंतजाम कड़े कर दिए गए थे. सिरसा में हरियाणा पुलिस की 12 कंपनियां डेरा सच्चा सौदा से सिरसा शहर तक तैनात की गईं.  इस के अलावा 10 डीएसपी, 12 इंस्पेक्टर लगाए गए. डेरा सच्चा सौदा को 14 पुलिस नाकों से घेरा गया. डेरे में सभी गतिविधियां बंद की गईं और उन्हें आदेश दिए गए कि डेरे की वीडियोग्राफी करवाई जाए.

वोट में छलकेगा ‘जीएसटी’ का दर्द

जिस जीएसटी यानि गुड्स एंड सर्विस टैक्स पर केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली एक कदम भी पीछे हटने को तैयार नहीं थे, उसमें वही सुधार अमल में ला रहे हैं जिन्हें कभी हवा में उड़ा देते थे. केंद्रीय वित्तमंत्री की यह अकड़पन 5 राज्यों में भाजपा की हार और 2019 के लोकसभा चुनाव के चलते कमजोर पड़ी है. अब वित्तमंत्री को मध्यम और कमजोर वर्ग के कारोबारियों की चिंता सता रही है. जीएसटी परिषद की 32वीं बैठक में छोटे कारोबारियों को राहत देने के लिये 40 लाख तक के सालाना व्यापार वाले कारोबारियों को जीएसटी के बाहर कर दिया गया है. पहले यह सीमा 20 लाख थी. सरकार के इस फैसले से 50 फीसदी कारोबारी जीएसटी से बाहर हो जायेंगे.

अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष संदीप बंसल कहते हैं ‘केन्द्र सरकार जीएसटी को लेकर जो बदलाव कर रही है, उसका कारोबार पर बहुत असर नहीं पड़ेगा. जीएसटी का लाभ अगर कारोबारी और जनता को देना है तो जीएसटी की अधिकतम दर 15 फीसदी से अधिक ना हो. डीजल, पेट्रोल और रसोई गैस सहित अल्कोहल को जीएसटी के दायरे में लाया जाये. जीएसटी में लिखापढ़त की परेशानी भरी व्यवस्था को सरल किया जाये. केन्द्र सरकार की कारोबारी विरोधी नीति ने पिछले सालों में जिस तरह से नुकसान पहुंचाया है, छोटा कारोबारी उससे उबर नहीं पाया है. ऐसे में कारोबारी भाजपा से नाराज हैं और ऐसे दिखावे वाले प्रयासों से उसके साथ जुटने को तैयार नहीं हैं.’

केन्द्र सरकार को कारोबारियों की हालत का अंदाजा नहीं है. इसकी सबसे बडी वजह यह भी है कि भाजपा में कारोबारी नेताओं को हाशिये पर डाल दिया गया है. कारोबारियों पर पकड़ रखने वाला, उनकी परेशानी को सुनने और समझने वाला कोई नेता अब भाजपा में नहीं है. ऐसे में सरकार के फैसलों में कारोबारियों की भूमिका खत्म हो गई है. कारोबारियों की परेशानियों से सरकार को अवगत कराने वाला तंत्र टूट गया है. दूसरे कारोबारी नेता जो भी सुझाव देते हैं भाजपा उनको बाहरी मानकर उनके सुझाव को अपनी आलोचना मान कर नकार देती है.

ऐसे में कारोबारियों का दर्द बाहर ही नहीं आ पा रहा है. कारोबारी वर्ग भाजपा का मुख्य जनाधार होता था. उसे यह उम्मीद थी कि भाजपा की सरकार उनके हित में कानून बनायेगी. भाजपा सरकार के नोटबंदी, जीएसटी और भ्रष्टाचार पर काबू ना पाने के प्रयासों का सबसे अधिक प्रभाव कारोबारियों पर पड़ा है. कारोबारियों की हालत खराब है. टैक्स व्यवस्था को सरल करने के नाम पर लाया गया जीएसटी सबसे ज्यादा उलझाने वाली कर प्रणाली साबित हुई है. चुनाव को देखकर केंद्र सरकार कारोबारियों को खुश करने के लिये जो प्रयास कर रही है उसके कारगर होने की हालत कम ही है.

भाजपा अभी भी यह नहीं मान रही है कि 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में हार का प्रमुख कारण जीएसटी, नोटबंदी, मंहगाई जैसे मुद्दे है. ऐसे में वह सुधारवादी कदम केवल दिखावे के लिये उठा रही है. इससे कारोबारी तबका खुश होने वाला नहीं है. आमचुनाव में उसका दर्द वोट के रूप में झलकेगा जो पार्टी के लिये सुखद परिणाम लेकर नहीं आयेगा.

द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर : अति घटिया प्रचार फिल्म

रेटिंग : डेढ़ स्टार

हम बार बार इस बात को दोहराते आए हैं कि सरकारें बदलने के साथ ही भारतीय सिनेमा भी बदलता रहता है. (दो दिन पहले की फिल्म ‘उरी : सर्जिकल स्ट्राइक’ की समीक्षा पढ़ लें.) और इन दिनों पूरा बौलीवुड मोदीमय नजर आ रहा है. एक दिन पहले ही एक तस्वीर सामने आयी है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फिल्मकार करण जोहर के पूरे कैंप के साथ बैठे नजर आ रहे हैं. फिल्मकार भी इंसान हैं, मगर उसका दायित्व अपने कर्तव्य का सही ढंग से निर्वाह करना होता है. इस कसौटी पर फिल्म ‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ के निर्देशक विजय रत्नाकर गुटे खरे नहीं उतरते. उन्होंने इस फिल्म को एक बालक की तरह बनाया है. इस फिल्म से उनकी अयोग्यता ही उभरकर आती है. ‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ एक घटिया प्रचार फिल्म के अलावा कुछ नहीं है. इस फिल्म के लेखक व निर्देशक अपने कर्तव्य के निर्वाह में पूर्णरूपेण विफल रहे हैं.

2004 से 2014 तक देश के प्रधानमंत्री रहे डा. मनमोहन सिंह के करीबी व कुछ वर्षों तक उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की किताब ‘‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ पर आधारित फिल्म ‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ में भी तमाम कमियां हैं. फिल्म में डा. मनमोहन सिंह का किरदार निभाने वाले अभिनेता अनुपम खेर फिल्म के प्रदर्शन से पहले दावा कर रहे थे कि यह फिल्म पीएमओ के अंदर की कार्यशैली से लोगों को परिचित कराएगी. पर अफसोस ऐसा कुछ नहीं है. पूरी फिल्म देखकर इस बात का अहसास होता है कि पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह अपने पहले कार्यकाल में संजय बारू और दूसरे कार्यकाल में सोनिया गांधी के के हाथ की कठपुतली बने हुए थे. पूरी फिल्म में उन्हे बिना रीढ़ की हड्डी वाला इंसान ही चित्रित किया गया है.

‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ में तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को शुरुआत में ‘सिंह इज किंग’ कहा गया. पर धीरे धीरे उन्हे अति कमजोर, बिना रीढ़ की हड्डी वाला इंसान, एक परिवार को बचाने में जुटे महाभारत के भीष्म पितामह तक बना दिया गया, जिसने गांधी परिवार की भलाई के लिए देश के सवालों के जवाब देने की बजाय चुप्पी साधे रखी. फिल्म में डा. मनमोहन सिंह की इमेज को धूमिल करने वाली बातें ही ज्यादा हैं.

फिल्म की कहानी पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार व करीबी रहे संजय बारू (अक्षय खन्ना) के नजरिए से है. कहानी 2004 के लोकसभा चुनावों में यूपीए की जीत के साथ शुरू होती है. कुछ दलों द्वारा उनके इटली की होने का मुद्दा उठाए जाने के कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी (सुजेन बर्नेट) स्वयं प्रधानमंत्री/पीएम बनने का लोभ त्यागकर डा. मनमोहन सिंह (अनुपम खेर) को पीएम पद के लिए चुनती हैं. उसके बाद कहानी में प्रियंका गांधी (अहाना कुमार), राहुल गांधी (अर्जुन माथुर), अजय सिंह (अब्दुल कादिर अमीन), अहमद पटेल (विपिन शर्मा), लालू प्रसाद यादव (विमल वर्मा), लाल कृष्ण अडवाणी (अवतार सैनी), शिवराज पाटिल (अनिल रस्तोगी), पी वी नरसिम्हा राव (अजित सतभाई), पी वी नरसिम्हा राव के बड़े बेटे पी वी रंगा राव (चित्रगुप्त सिन्हा), नटवर सिंह सहित कई किरदार आते हैं.

संजय बारू, जो पीएम के मीडिया सलाहकार हैं, लगातार पीएम की इमेज को मजबूत बनाते जाते हैं. वैसे भी संजय बारू ने मीडिया सलाहकार का पद स्वीकार करते समय ही शर्त रख दी थी कि वह हाई कमान सोनिया गांधी को नहीं, बल्कि सिर्फ पीएम को ही रिपोर्ट करेंगें. इसी के चलते पीएमओ में संजय बारू की ही चलती है, इससे अहमद पटेल सहित कुछ लोग उनके खिलाफ हैं. यानी कि उनके विरोधियों की कमी नहीं है. पर संजय बारू पीएम में काफी बदलाव लाते हैं. वह उनके भाषण लिखते हैं.

उसके बाद पीएम का मीडिया के सामने आत्म विश्वास से लबरेज होकर आना, अमेरिकी राष्ट्रति बुश के साथ न्यूक्लियर डील पर बातचीत, इस सौदे पर लेफ्ट का सरकार से अलग होना, समाजवादी पार्टी का समर्थन देना, पीएम को कटघरे में खड़े किए जाना, पीएम के फैसलों पर हाई कमान का लगातार प्रभाव, पीएम और हाई कमान का टकराव, विरोधियों का सामना जैसे कई दृश्यों के बाद कहानी उस मोड़ तक पहुंचती है, जहां न्यूक्लियर मुद्दे पर पीएम डा. मनमोहन सिंह स्वयं इस्तीफा देने पर आमादा हो जाते हैं. पर राजनीतिक परिस्थितियों के चलते सोनिया उनको इस्तीफा देने से रोक लेती हैं. उसके बाद हालात ऐसे बदलते हैं कि संजय बारू अपना त्यागपत्र देकर सिंगापुर चले जाते हैं, मगर डा. मनमोहन सिंह से उनके संपर्क में बने रहते हैं.

उसके बाद की कहानी बड़ी तेजी से घटित होती है, जिसमें डा. मन मोहन सिंह पूरी तरह से हाई कमान सोनिया व गांधी परिवार के सामने समर्पण भाव में ही नजर आते हैं. अहमद पटेल भी उन पर हावी रहते हैं. फिर आगे की कहानी में उनकी जीत के अन्य पांच साल दिखाए गए हैं, जो एक तरह से यूपीए सरकार के पतन की कहानी के साथ कोयला, 2 जी जैसे घोटाले दिखाए गए हैं. फिल्म में इस बात का चित्रण है कि प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह स्वयं इमानदार रहे, मगर उन्होंने हर तरह के घोटालों को परिवार विशेष के लिए अनदेखा किया. फिल्म उन्हे परिवार को बचाने वाले भीष्म की संज्ञा देती है. पर फिल्म की समाप्ति में 2014 के चुनाव के वक्त की राहुल गांधी व वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाएं दिखायी गयी हैं.

फिल्म के लेखक व निर्देशक दोनों ने बहुत घटिया काम किया है. फिल्म सिनेमाई कला व शिल्प का घोर अभाव है. पटकथा अति कमजोर है. इसे फीचर फिल्म की बजाय ‘डाक्यू ड्रामा’ कहा जाना चाहिए. क्योंकि फिल्म में बीच बीच में कई दृश्य टीवी चैनलों के फुटेज हैं. एडीटिंग के स्तर भी तमाम कमियां है. फिल्म में पूरा जोर गांधी परिवार की सत्ता की लालसा, सोनिया गांधी की अपने बेटे राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की बेसब्री, डा मनमोहन सिंह के कमजोर व्यक्तित्व व संजय बारू के ही इर्द गिर्द है.

डा. मनमोहन सिंह को लेकर अब तक मीडिया में जिस तरह की खबरें आती रही हैं, वही सब कुछ फिल्म का हिस्सा है, जबकि संजय बारू उनके करीबी रहे हैं, तो उम्मीद थी कि डा मनमोहन सिंह की जिंदगी के बारे में कुछ रोचक बातें सामने आएंगी, पर अफसोस ऐसा कुछ नहीं है. फिल्म में इस बात को भी ठीक से नहीं चित्रित किया गया कि अहमद पटेल किस तरह से खुरपैच किया करते थे. कोयला घोटाला, 2 जी घोटाला आदि को बहुत सतही स्तर पर ही उठाया गया है. फिल्म में सभी घोटालों पर कपिल सिब्बल की सफाई देने वाली प्रेस कांफ्रेंस भी मजाक के अलावा कुछ नजर नहीं आती.

कमजोर पटकथा व कमजोर चरित्र चित्रण के चलते एक भी चरित्र उभर नहीं पाया. कई चरित्र तो महज कैरीकेचर बनकर रह गए हैं. फिल्म के अंत में बेवजह ठूंसे गए राहुल गांधी व नरेंद्र मोदी की चुनाव प्रचार की सभाओं के टीवी फुटेज की मौजूदगी लेखकों, निर्देशक व फिल्म निर्माताओं की नीयत पर सवाल उठाते हैं. पूरी फिल्म एक ही कमरे में फिल्मायी गयी नजर आती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो संजय बारू के किरदार में अक्षय खन्ना ने काफी शानदार अभिनय किया है. मगर पटकथा व चरित्र चित्रण की कमजोरी के चलते अनुपम खेर अपने अभिनय में खरे नहीं उतरते, बल्कि कई जगह उनका डा. मनमोहन सिंह का किरदार महज कैरीकेचर बनकर रह गया है. किसी भी किरदार में कोई भी कलाकार खरा नहीं उतरता. फिल्म का पार्श्वसंगीत भी सही नहीं है.

एक घंटे 50 मिनट की अवधि की फिल्म ‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ का निर्माण सुनील बोहरा व धवल गाड़ा ने किया है. संजय बारू के उपन्यास पर आधारित फिल्म के निर्देशक विजय रत्नाकर गुटे, लेखक विजय रत्नाकर गुटे, मयंक तिवारी, कर्ल दुने व आदित्य सिन्हा, संगीतकार सुदीप रौय व साधु तिवारी, कैमरामैन सचिन कृष्णन तथा कलाकार हैं – अनुपम खेर, अक्षय खन्ना, सुजेन बर्नेट, अहाना कुमार, अर्जुन माथुर, अब्दुल कादिर अमीन, अवतार सैनी, विमल वर्मा, अनिल रस्तोगी, दिव्या सेठ, विपिन शर्मा, अजीत सतभाई, चित्रगुप्त सिन्हा व अन्य.

लोकसभा चुनाव से पहले राजनीतिक फिल्मों से उठ रहे हैं सवाल

हमारे देश में केंद्र में सरकार बदलते ही भारतीय सिनेमा भी बदलता रहा है. मगर चुनावी वर्ष में जिस तरह का सिनेमा भारतीय दर्शकों को देखने को मिलने वाला है, उससे यह सवाल उठना लाजमी है कि फिल्मकारों पर दबाव डालकर सरकार परस्त फिल्में बनवायी गयी हैं या फिल्मकारों ने अपने विवेक से केंद्र सरकार के आगे घुटने टेकते हुए सरकार परस्त फिल्में बना डाली? यह अहम सवाल है? क्योंकि अब तक एक ही वर्ष में और वह भी महज चंद माह के अंदर इस कदर राजनैतिक फिल्में कभी नहीं आयी.

मगर आगामी लोकसभा चुनाव से पहले यानी कि जनवरी 2019 से अप्रैल 2019 के बीच प्रधानंमत्री नरेंद्र मोदी पर चार बायोपिक फिल्मों के अतिरिक्त ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ (11 जनवरी), ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ (11 जनवरी ), ‘दीन दयाल : एक युग पुरुष’, ‘ठाकरे’ (25 जनवरी), ‘मणिकर्णिका’ (25 जनवरी), ‘बटालिन 609’ (11 जनवरी), ‘72 घंटे’ (18 जनवरी), ‘मेरे प्यारे प्रधानमंत्री’ (8 मार्च), ‘रोमियो अकबर वाल्टर’ (15 मार्च), ‘‘केसरी’’ ( 21 मार्च) गुजराती भाषा की फिल्म ‘नमो सौने गामो’, एनटीरामाराव की बायोपिक जैसी फिल्में प्रदर्शित होने वाली हैं.

सूत्रों की माने तो इन सभी फिल्मों में कहीं न कहीं नरेंद्र मोदी स्वयं नजर आएंगे और इन फिल्मों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महिमा मंडन भी नजर आ सकता है अथवा भाजपा सरकार की नीतियों, विचारधारा अथवा कट्टर हिंदूवाद सहित देशभक्ति को दर्शाया गया है.

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11 जनवरी को एक साथ तीन फिल्में ‘‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’’, ‘‘बटालियन 609’’ और ‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ प्रदर्शित होने वाली हैं. इनमें से ‘‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’’ और ‘‘बटालियन 609’’ फिल्में 29 सितंबर 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक पर हैं. इस सर्जिकल स्ट्राइक को वर्तमान केंद्र सरकार ने ही अंजाम दिया था. इसलिए स्वाभाविक तौर पर इन दोनों ही फिल्मों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नजर आएंगे.

फिल्म ‘‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’’ में नरेंद्र मोदी के किरदार को अभिनेता रजित कपूर ने निभाया है. फिल्म निर्देशक आदित्य धर ने बहुत ही संतुलित फिल्म बनायी है और बेवजह सरकार या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महिमा मंडन करने की बजाय सेना के जवानों की वीरता और उनके कर्तव्य निर्वाह पर ही ज्यादा जोर दिया है. पर ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’’ में नरेंद्र मोदी के साथ साथ राजनाथ सिंह, अरुण जेटली व मनोहर पर्रीकर के किरदार भी नजर आएंगे.

तो वहीं फिल्म ‘‘बटालियन 609’’ में के के शुक्ला ने नरेंद्र मोदी का किरदार निभाया है. के के शुक्ला से पहले कई समाचार चैनलों में भी नरेंद्र मोदी का किरदार निभा चुके हैं. जबकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की किताब ‘‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ पर इसी नाम से बनी राजनीतिक फिल्म को लेकर बवाल मचा हुआ है. सूत्रों का दावा है कि इस फिल्म में कहीं न कहीं कांग्रेस सरकार व उनके दिग्गज नेताओं की आलोचना की गयी है. इस फिल्म में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवानी की भूमिका में अवतार सैनी नजर आएंगे. सभी कांग्रेसी चिल्ला रहे हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव के समय उनकी छवि खराब करने के लिए यह फिल्म लायी जा रही है.

18 जनवरी को प्रदर्शित हो रही फिल्म ‘‘72 घंटे’’ में 1962 के भारत चीन युद्ध की पृष्ठभूमि में शहीद राइफल मैन जसवंत सिंह रावत के जीवन की कहानी है, जिसमें देशभक्ति की बात की गयी.

25 जनवरी को एक साथ दो फिल्में ‘‘ठाकरे’’ और ‘‘मणिकर्णिका’’ प्रदर्शित होंगी. फिल्म ‘‘ठाकरे’’ तो शिवसेना प्रमुख रहे बाला साहेब ठाकरे के जीवन पर है, इसमें पूणरुपेण कट्टर हिंदूवाद का चित्रण है. सूत्रों का दावा है कि शिवसेना के साथ साथ भाजपा भी इस फिल्म को लोकसभा चुनाव के वक्त अपने अपने हिसाब से भुनाने का प्रयास कर सकती है. जबकि ‘‘मणिकर्णिका’’ में देशभक्ति व हिंदूवाद की बात की गयी है, जिसका फायदा भाजपा अपने हिसाब से उठाना चाहती है. फिल्म ‘‘मणिकर्णिका’’ के निर्माण से भाजपा के राज्यसभा सांसद सुभाष चंद्र गोयल की कंपनी ‘जी स्टूडियो’ भी जुड़ी हुई है.

8 मार्च को प्रदर्शित होने वाली राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म ‘‘मेरे प्यारे प्रधानमंत्री’’ में औरतों के साथ बलात्कार की पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शौचालय बनाओ अभियान व स्वच्छता अभियान का भी चित्रण है, जिसका फायदा भाजपा जरुर उठाना चाहेगी.

15 मार्च को प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘‘रोमियो अकबर वौल्टर’’ में रा एजेंट बने जौन अब्राहम देशभक्ति की बात करने वाले हैं. जिसका फायदा सभी राजनैतिक पार्टियां अपने अपने हिसाब से उठाने वाली हैं.

21 मार्च को अक्षय कुमार के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘केसरी’’ आएगी. इस पीरियाडिक, ऐतिहासिक ओर देशभक्ति से परिपूर्ण फिल्म ‘‘केसरी’’ की कहानी 1897 के सारागढ़ी युद्ध की है, जहां 21 सिख जवानों ने दस हजार अफगान सैनिकों का लोहा लेते हुए विजय पताका फहराई थी. करण जोहर व अक्षय कुमार द्वारा निर्मित इस फिल्म के निर्देशक अनुराग सिंह हैं.

अप्रैल माह में ही पंडित दीन दयाल उपाध्याय के जीवन पर धीरज मिश्रा फिल्म ‘‘दीनदयालःएक युगपुरुष’’ लेकर आ रहे हैं, जिसे मनोज गिरी ने निर्देर्शित किया है. ज्ञातब्य है कि ‘भारतीय जनता पार्टी’ के मूल जन्म वाली पार्टी ‘‘भारतीय जनसंघ’’ के जन्मदाता पंडित दीन दयाल उपाध्याय थे, जिनके नाम पर ही उत्तर प्रदेश सरकार ने मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन किया है.

अप्रैल माह में ही गुजराती भाषा की फिल्म ‘‘नमो  सौने गामे’’ भी प्रदर्षित होगी, जो कि नरेंद्र मोदी पर है. इसमें जब नरेंद्र मोदी गुजरात में थे, तो उस वक्त के उनके कार्यों के साथ नरेंद्र मोदी का महिमा मंडन किया गया है. फिल्म के निर्देशक के अमार हैं तथा फिल्म में नरेंद्र मोदी का किरदार लालजी देवरिया ने निभाया है, जो कि खुद को नरेंद्र मोदी का भक्त बताते हैं. यह फिल्म पांच वर्ष पहले ही बन गयी थी, पर अब इसे प्रदर्शित किया जाएगा.

भाजपा को जवाब देने की कांग्रेस की तैयारी

सूत्र बता रहे हैं कि गुजरात में भाजपा द्वारा सरदार वल्लभ भाई पटेल का जमकर महिमा मंडन किए जाने के बाद अब इसका जवाब देने के लिए कांग्रेस देश के पहले रक्षामंत्री रहे सरदार बलदेव सिंह की बायोपिक फिल्म बनवा रही है, जिसे वह लोकसभा चुनाव से पहले ही प्रदर्शित कराना चाहती है. सूत्रों की माने तो इस फिल्म में इस बात का चित्रण होगा कि देश की तमाम रियासतों के भारत विलय में सरदार पटेल के साथ सरदार बलदेव सिंह का भी योगदान था.

इसलिए शराब पीना छोड़ रहे हैं छत्तीसगढ़ के आदिवासी नेता

खबर वाकई में अच्छी है कि छतीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने शराब पीना छोड़ दिया है और अब वे चाहते हैं कि आदिवासी बाहुल्य इस राज्य में शराबबंदी लागू की जाये. देखा जाये तो यह बयान बताता है कि सही मानों में अब वे नेता बन रहे हैं नहीं तो इस आईएएस अधिकारी को चाणक्य कहे जाने वाले नेता अर्जुन सिंह राजनीति में लाये थे. मकसद था शुक्ला बंधुओं को हाशिये पर धकेलना, क्योंकि आदिवासी समुदाय के अजीत जोगी ही अर्जुन सिंह की राह आसान कर सकते थे जो कि उन्होंने की भी.

गुजरे कल के इस वाकये का यह जिक्र बताता है कि अजीत जोगी ने कभी जमीनी राजनीति नहीं की, इसलिए हालिया विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस महज 5 सीटें ले जा पाई, यानि एक तरह से जनता ने इस धारणा को तथ्य में बदल दिया कि छत्तीसगढ़ के थोपे गए मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल औसत से गया गुजरा था. हार के बाद अजीत जोगी को शायद यह बात समझ आ रही है इसलिए वे शराब के नुकसान गिना रहे हैं.

बकौल अजीत जोगी शराब आदिवासियों की दुश्मन है, बात में वजन लाते उन्होंने बताया कि आदिवासियों को शराब के नशे में धुत रखने की साजिश की एक वजह यह भी है कि देश के सबसे रईस इस राज्य की प्राकृतिक संपदा को बाहरी लोग आसानी से लूट सकें. एक और उदाहरण देते उन्होंने बताया कि 200 एकड़ जमीन का मालिक एक किसान शराब में बर्बाद हो गया. अजीत जोगी के मुताबिक शराब का सबसे बड़ा नुकसान औरतों को उठाना पड़ता है, वे वेवक्त विधवा हो जाती हैं.

खुद अपना उदाहरण देते उन्होंने बताया कि वे भी खूब शराब पीते थे, विदेश जाते थे तब भी पीते थे और आदिवासी समुदाय में पैदा लोग तो बचपन से ही इस बुरी लत के आदी हो जाते हैं. जब उनके मन में कुछ बन जाने का ख्याल आया तो उन्होंने शराब छोड़ दी क्योंकि कुछ बनने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा शराब है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से आग्रह करते उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में शराबबंदी लागू की जाये.

आबकारी मंत्री भी थे पियक्कड़

अजीत जोगी के बाद शराब छोड़ने का ऐलान करने वाले दूसरे अहम नेता राज्य के आबकारी मंत्री कवासी लखमा हैं, जिनका शराब पीते फोटो मंत्री पद की शपथ लेते ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. कवासी लखमा अनपढ़ हैं, उन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, लेकिन बस्तर की कोंटा सीट से वे लगातार पांच बार से विधायक चुने जा रहे हैं. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2003 के चुनाव में उन्हें रिकार्ड 52 फीसदी वोट मिले थे.

गौंड आदिवासी समुदाय के इस विधायक की मानें तो उनकी तीन पीढ़ियों से कोई स्कूल नहीं गया है और पिछड़ापन इतना है कि उनके पिता नहीं जानते कि विधायकी का मतलब क्या होता है इसलिए वे उन्हें खेत में हल जोतने और बीड़ी बनाने की सलाह देते रहते हैं. बस्तर में दादी संबोधन से मशहूर कवासी लखमा जब मंत्री बनाए गए थे तो खूब हल्ला मचा था, हालांकि कहने वालों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री को लेकर भी तंज कसे थे और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की शिक्षा और विवादित डिग्री का जिक्र किया था, जिक्र उमा भारती का भी हुआ था.

प्रियंका गांधी ने ट्वीट कर कवासी लखमा को मंत्री बनाए जाने का स्वागत करते एक जमीनी नेता को इसका हकदार बताया था जो कई विदेश यात्राएं भी कर चुका है और बेबाकी से सवालों के तार्किक और तथ्यात्मक जबाब देता है.

अब मंत्री बन जाने के बाद वे काफी कुछ कर गुजरने की बातें कर रहे हैं और शराब से भी तौबा करने का ऐलान कर चुके हैं तो उन्हें इस पर खरा उतरना भी दिखाना होगा. कवासी लखमा और अजीत जोगी जैसे आदिवासी नेता बेहतर जानते हैं कि उनके समुदाय के पिछड़ेपन और बदहाली की एक बड़ी वजह शराब है. इस समुदाय में खासतौर से छत्तीसगढ़ में बच्चा मां का दूध छोड़ते ही भट्टी में पकी कच्ची (शराब) मुंह से लगा लेता है. ऐसे में वह न तो अपने अधिकार जान पाता और न ही तालीम की अहमियत समझ पाता.

शहरी व्यापारी और सरकारी मुलाजिम भी चाहते हैं कि आदिवासी शराब के नशे में धुत रहें, जिससे वे अपनी खुदगरजी पूरी कर सकें. इस इलाके में आदिवासी हितों की बात करना एक फैशन भर है, पर इस बार बात सुखद है कि 2 दिग्गज आदिवासी नेताओं ने शराब छोडने की पहल की है और उसके नुकसान भी गिनाए हैं. अब जरूरत इस पहल को मुहिम में तब्दील करने की है जिसकी उम्मीद सबसे पहले मीडिया से करना स्वभाविक बात है.

मुंहासों से बचने के लिए अपनाएं ये 5 उपाय

अगर चेहरे पर मुंहासे हो जाए तो वह देखने में भद्दें लगते हैं. अक्सर लोग मुंहासे हटाने के लिए चेहरे पर नाखून का प्रयोग करते हैं लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. इससे मुंहासे चेहरे पर दाग धब्बे छोड़ जाते हैं. इसलिए मुंहासों को दबाने और फोड़ने की बजाय इन पर दवाई लगाना शुरू करें. इसके अलावा अगर आप कई उपाय अपनाकर थक चुके हैं तो यहां दिए गए कुछ टिप्स आपके काम आ सकते हैं.

  • जब आप बाहर दिन बिताकर आये तो घर पर मुहं जरूर धोएं, ताकि चेहरे से धूल मिट्टी आदि सब साफ हो जाए.
  • ज्यादा धोने और रगड़ने से त्वचा में जलन पैदा हो सकती है. इसके अलावा चेहरे को बार बार न छुएं. इससे बैक्टीरिया का संक्रमण हो सकता है.
  • मेकअप प्रोडक्‍ट संभल कर खरीदें. इस प्रकार के मेकअप प्रोडक्‍ट्स का इस्तेमाल करें जिन पर ‘नौन कोमेड़ोजेनिक’ का लेबल लगा हो.
  • सप्ताह में एक बार एंटी एक्ने मास्क का इस्तेमाल करें.
  • माथे और कमर में होने वाले मुंहासों का मुख्य कारण डैंड्रफ भी हो सकते हैं. स्किन स्पेशलिस्ट द्वारा सुझाये गए एंटी डैंड्रफ शैम्पू का इस्तेमाल करें. तंग कपड़े न पहने यदि आपको मुंहासे हैं तो टाईट और शरीर से चिपकने वाले कपड़े पहनने से बचें.
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