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मंजिल (अंतिम भाग) : सुहास के मन में चल रही थी कैसी उथलपुथल

पूर्व कथा

पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा सुहास को अपने पिता से मिलवाने अपने घर ले आती है तो उस के पिता सहाय साहब सुहास की काम के प्रति लगन देख कर खुश होते हैं.

सुहास व्यापार शुरू कर देता है, लेकिन कई बार काम के लिए बंध कर बैठना उस के लिए मुश्किल हो जाता क्योंकि किसी भी जगह जम कर रह पाना उस के स्वभाव में नहीं था.

अंतत: श्वेता के विवाह का दिन आ जाता है और कुछ ही महीने बाद पुरवासुहास का भी विवाह हो जाता है. पुरवा महसूस कर रही थी कि सुहास का ध्यान समाजसेवा में अधिक रहता है. वह दूसरों की मदद के लिए दुकान पर भी ध्यान न देता.

पुरवा अब निरंतर सुहास को उस की जिम्मेदारी का एहसास कराने की कोशिश करती. शीघ्र ही वह दिन भी आता है जब पुरवा को पता चलता है कि वह मां बनने वाली है. सुहास पापा बनने के सुखद एहसास से झूम उठता है.

थोड़े दिनों बाद पुरवा को पता चलता है कि सुहास पुराना कारोबार खत्म कर कंप्यूटर का कार्य आरंभ करना चाहता है तो वह हैरान हो जाती है और बेचैनी से सुहास के घर लौटने की प्रतीक्षा करने लगती है. लेकिन वह बेला भाभी के पति सागर को अस्पताल ले जाने के कारण रात देर से घर आता है. पुरवा की तबीयत खराब होने पर अस्पताल में भरती कराया जाता है. उस का हालचाल पूछने बेला घर आती है तो पुरवा उस से थोड़ी तीखी बात करती है, तब सुहास पुरवा पर बिगड़ता है. सुहास से नाराज पुरवा अपने मातापिता के साथ मायके चली जाती है. सुहास के व्यवहार को ले कर वह विचारमंथन करती है.

आखिरकार, एक दिन सुहास पुरवा को मनाने ससुराल पहुंच जाता है. पुरवा वापस जाने की शर्त रखती है कि वह घर के गैराज में बुटीक खोलेगी और इस काम में वह उस की मदद करेगा. बुटीक की शुरुआत करने में  सुहास से ज्यादा रजनीबाला पुरवा की मदद करती है. बुटीक निर्माण जोरशोर से शुरू हो जाता है. एक दिन सागर और बेला आते हैं और बताते हैं कि सुहास ने राजनीति ज्वाइन कर ली है, सुन कर सब चौंक जाते हैं.

सुहास घर आता है तब मां राजनीति ज्वाइन करने की बात को ले कर उस से नाराज होती है. लेकिन सुहास सब को समझाता है, पुरवा भी यह सोच कर संतोष कर लेती है शायद सुहास इसी क्षेत्र में सफल हो जाए.

पुरवा के ‘पुरवाई बुटीक’ का उद्घाटन होता है. सुहास वक्त पर नहीं पहुंचता लेकिन देर से आने की माफी मांगते हुए बुटीक के लिए एक बड़ा आर्डर ले कर आता है तो सभी खुश हो जाते हैं.

राजनीति के कार्यक्षेत्र में सुहास का रोमांच बढ़ता जा रहा था. उधर वह दिन भी आता है जब पुरवा प्रसव के लिए अस्पताल में भरती होती है. उसी वक्त पार्टी के नेता भाईजी को चुनावी सरगर्मियों के चलते दूसरी पार्टी के साथ हुई झड़प में गोली लग जाने के कारण सुहास को उन्हें देखने जाना पड़ता है. वापस जब लौटता है तो एक बच्ची का पिता बनने की खुशखबरी मिलती है.

अब सुहास राजनीति में सक्रिय होने लगा था. पुरवा उस का उत्साह व काम करने की लगन देख खुश थी.

सुहास कार्यालय के चौकीदार नारायण, जिस के बेटे की एक किडनी फेल हो गई थी, का दुख देख कर दुखी होता है. पुरवा, सुहास की परेशानी देख रही थी लेकिन सुहास उसे अपने मन के भीतर चल रही उथलपुथल के बारे में कुछ नहीं बताता.

अब आगे…

सुहास ने धीरेधीरे कहना शुरू किया, ‘‘आज मैं आकाश के साथ एड्स के मरीजों की खोजखबर लेने गया…’’

‘‘क्या?’’ पुरवा ने बीच में ही उसे टोक दिया, ‘‘तुम ऐसी जगह भी जाते हो, जरा भी डर नहीं लगता.’’

‘‘मुझे माफ कर दो पुरवा कि मैं ने पहले तुम्हें नहीं बताया. पर तुम जानती हो कि वहां जाने से मुझे कुछ नहीं होगा. यह तो बस, लोगों का वहम है कि उन्हें छूने से ही एड्स हो जाएगा,’’ पुरवा चुप हो गई पर उस के चेहरे पर परेशानी झलक उठी थी. बोली, ‘‘अच्छा, बताओ कि बात क्या है?’’

‘‘पुरवा, वहां एक मरीज की मृत्यु मेरी आंखों के सामने हुई. उस की पत्नी, कैसे बिलखबिलख कर रो रही थी और कह रही थी, ‘क्यों लगाया यह रोग, जनम भर का साथ देने का वादा कर के मुझे अकेला छोड़ गए.’’’

पुरवा लगातार सुहास को देख रही थी और उस के स्वरों के कंपन से उस के भय को महसूस कर रही थी. सुहास बच्चों की तरह बिलख सा रहा था.

‘‘पुरवा, उसी पल मैं ने पहली बार यह महसूस किया कि जीवनसाथी का बिछड़ना कैसा होता है. अकेले ही जाने का दर्द कितना भयानक होता है.’’

यह सब सुन कर पुरवा कुछ सोचने लगी. सुहास निरंतर बोल रहा था, ‘‘जानती हो पुरू, उसी पल सब से पहली बात क्या मेरे मन में उठी, जब तक हम एकदूसरे के साथ होते हैं तो एकदूसरे की परवा नहीं करते हैं. जब बिछड़ जाते हैं तो जीवनसाथी के साथ होने का महत्त्व समझ में आता है.’’

‘‘हां, सुहास, किसी भी दंपती के लिए यह सब से दुखद स्थिति होती है,’’ पुरवा ने कहा.

अचानक सुहास ने उस की हथेली थाम कर कहा, ‘‘पुरवा, वादा करो कि तुम मुझे अकेला छोड़ कर नहीं जाओगी.’’

पुरवा ने उसे एकटक देखा. सामने एक प्रेमी, एक पति सहमे हुए बच्चे की भांति बिलख रहा था. कैसा अंजाना भय था. वह बोली, ‘‘सुहास, यह मिलने- बिछड़ने की बातें कर के तुम अपने उद्देश्य से क्यों भटक रहे हो आज.’’

दोनों की कौफी समाप्त हो गई थी, पर अभी दोनों को और बैठना था अत: सुहास ने कुछ नए स्नैक्स का आर्डर कर दिया. अपनी बात भी धीरेधीरे कहता रहा, ‘‘पुरवा, आज मैं जो इतनी दिशाएं खोज पाया हूं ये सब तुम्हारे ही कारण. जीवन से निरुत्साहित प्राणी को तुम ने नए सपने, नई मंजिल दिखा दी.’’

‘‘ऐसा मत कहो, सुहास. तुम्हारे अंदर कुछ करने का उत्साह तो बराबर था. बस, दिशा निर्धारित करने में समय लग रहा था,’’ पुरवा ने अपनी हथेली से उस की हथेली को सहला दिया. नए स्नैक्स आ चुके थे चीज फिंगर्स और चिकनबर्गर. सुहास ने अपनी प्लेट से पहले पुरवा को खिलाया और फिर स्वयं खाना आरंभ किया.

‘‘मुझे यह नहीं मालूम है कि मैं कितना बड़ा व्यवसायी बन पाऊंगा.  राजनीति में कोई स्थान बना सकूंगा या नहीं पर मेरी सब से बड़ी चाहत किसी के काम आने की आज भी मेरे अंदर पूरे उत्साह से हिलोरे ले रही है.’’

‘‘मैं जानती हूं, सुहास. तुम्हारा यह गुण ही तुम्हें औरों से एकदम अलग एक विशिष्ट व्यक्ति बनाता है. मुझे तुम पर गर्व है.’’

‘‘पुरवा, आज मैं एक बार फिर तुम से वादा करता हूं कि अब मैं तुम्हें कभी निराश नहीं करूंगा. जीवन की किसी भी राह पर तुम्हें शिकायत का अवसर नहीं मिलेगा.’’

पुरवा ने उस के मुख में चीज फिंगर्स रखते हुए कहा, ‘‘एक वादा मैं भी तुम से करती हूं कि प्रत्येक रविवार को बुटीक से और घर से समय निकाल कर मैं भी तुम्हारे साथ ऐसे लोगों की सेवा में साथ चलूंगी जहां आज तक जा नहीं सकी हूं.’’

‘‘सच,’’ सुहास की आंखों में अनोखी चमक कौंध उठी. यह कैसा प्यारा साथ दिया था उसे पुरवा ने. आज तक जिन बातों से प्राय: वह नाराज भी हो जाती थी, आज उसी राह पर वह भी साथ चलना चाहती है. अगर वह एकांत में होता तो अवश्य ही उसे बांहों में भर लेता. प्रसन्नता से झूम कर वह बोला, ‘‘तुम ने तो बिन पिए ही एक नशा सा दे दिया है. इसीलिए अब मुझे अपनी वह बात जिसे बहुत देर से कहना चाह रहा हूं, कहने में बहुत सोचना नहीं पड़ेगा.’’

‘‘कौन सी बात?’’ पुरवा ने अपना स्नैक्स समाप्त करते हुए आश्चर्य से कहा.

‘‘मैं ने तुम्हें नारायण के बेटे के बारे में बताया था न,’’ सुहास ने कहा.

‘‘हां, पर उस के लिए तो तुम चंदा जमा कर रहे थे,’’ पुरवा ने चिंतित सुहास को ध्यान से देखा. लगा कि कुछ गहरी बात उस के मन में उथलपुथल मचा रही है. क्या बात होगी.

सुहास ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘वह चंदा इतना नहीं हो पाया है पुरवा कि उस के बेटे को नई किडनी लगाई जा सके. इकलौता बेटा है उस गरीब का, उस के बुढ़ापे की आशा है वह.’’

‘‘पर सुहास, ऐसे तो जाने कितने लोग होंगे जिन्हें भरी जवानी वाला पुत्र खोना पड़ा होगा, जिन की नईनवेली बहू विधवा हो गई होगी.’’

‘‘हां पुरवा, हजारों, लाखों होंगे. क्या उन में से किसी एक का दुख हम कम नहीं कर सकते हैं? किसी एक को अकाल मृत्यु से हम बचा नहीं सकते हैं?’’

‘‘क्या करना चाहते हो?’’

पुरवा ने व्याकुलता से उसे देखा.

‘‘नाराज मत होना पुरवा, मैं अपनी किडनी उसे देना चाहता हूं.’’

‘‘क्या?’’ पुरवा चौंक पड़ी और स्तब्ध दृष्टि से उसे देखने लगी. बोली, ‘‘तुम्हें क्या हो गया है, सुहास? किसी की जान बचाने के लिए क्या अपनी जान पर खेल जाओगे?’’

‘‘पुरवा, एक किडनी दान करने से कोई समाप्त नहीं हो जाता है. थोड़ी देर पहले तुम ने हर राह पर मेरा साथ देने का वादा किया है.’’

सुहास की बात पर पुरवा की आंखें नम हो गईं. वह निराशा से बोली, ‘‘मानती हूं सुहास कि मैं भी हर राह पर तुम्हारे साथ चलना चाहती हूं पर इस के अतिरिक्त भी तो किसी तरह से उस की सहायता की जा सकती है.’’

‘‘नहीं पुरवा, देख तो लिया कि चंदा तक इकट्ठा नहीं हो पाया,’’ सुहास उदासी से बोला, ‘‘जब मैं ने उस व्यक्ति की पत्नी को बिलखबिलख कर रोते देखा तब सब से पहले तुम्हारा खयाल आया, फिर रोते हुए नारायण का, और तभी मैं ने यह निर्णय ले लिया कि अब मैं अपनी एक किडनी देवेंद्र को दान कर दूंगा.’’

पुरवा की विस्फारित दृष्टि सुहास के चेहरे पर अटक गई. संपूर्ण शरीर पीड़ा की तीव्र लहर से ऐंठने लगा. बोली, ‘‘यह क्या कह रहे हो, सुहास?’’

‘‘मैं बहुत सोचसमझ कर यह बात तुम से कह रहा हूं,’’ सुहास ने अपनी ही धुन में उत्तर दिया.

‘‘नहीं सुहास, तुम सोचसमझ कर नहीं कह रहे हो. तुम ने सब के बारे में सोचा पर अपने, मेरे और झंकार के बारे में नहीं सोचा. फिर मां व पापाजी…’’

सुहास ने उस की हथेलियां कस कर पकड़ लीं, ‘‘तुम ने हर कदम पर मेरा साथ देने का वादा किया है पुरवा.’’

‘‘मैं अपना वादा नहीं तोड़ रही हूं सुहास पर किसी की सहायता करने के और भी बहुत से उपाय हैं,’’ पुरवा अपनी पीड़ा से उबरने का प्रयास कर रही थी.

‘‘तुम ने देख तो लिया पुरवा. इतने पैसे इकट्ठे नहीं हो पाए कि उस के लिए किडनी खरीदी जा सके,’’ सुहास अपने निर्णय पर अडिग लग रहा था.

थोड़ी देर पहले जहां फूलों की सुगंध से भरपूर सर्द हवाएं प्यार के झूले पर गुनगुना रही थीं, वहीं दर्द, निराशा की ऊष्मा में डूबी आंधी के आसार उमड़ने लगे थे. पुरवा ने अचानक कहा, ‘‘सुनो सुहास, एक रास्ता है,’’ शायद वह बवंडर को बढ़ने से पहले ही रोकने का प्रयास कर रही थी.

सुहास ने भी किसी उतावले शिशु की तरह उस पर अपनी दृष्टि टिका दी.

पुरवा आगे बोली, ‘‘हम एक चैरिटी शो करेंगे और उस से जो भी आय होगी वह नारायण को दे देना.’’

सुहास के चेहरे पर व्यंग्य की रेखा कौंध उठी, बोला, ‘‘कोई भी कार्यक्रम करने के लिए भी तो पैसा चाहिए और यदि पैसा होता तो मुझे वैसा निर्णय लेना ही नहीं पड़ता,’’ सुहास उठ कर खड़ा हो गया. मेज पर उस ने बिल के रुपए रख दिए तो मजबूरन पुरवा को भी उठना पड़ा.

पुरवा निरंतर कुछ सोच रही थी. वह कार में बैठने से पहले बोली, ‘‘सुहास, चंदे से जो रुपए तुम लोगों ने एकत्र किए थे वे कहां हैं?’’

‘‘वे तो अभी पार्टी आफिस में ही हैं,’’ सुहास ने कार में बैठते हुए कहा.

पुरवा भी अपनी सीट पर बैठ गई और बोली, ‘‘सुनो, सुहास. जब मैं अंधविद्यालय में पढ़ाती थी तब कई बार ऐसे कार्यक्रम करवाए हैं. वहां के प्रिंसिपल साहब का बहुत अच्छेअच्छे कलाकारों से परिचय था. कुछ सहायता हमें वहां से मिल जाएगी, बाकी उन रुपयों से भी सहायता मिल जाएगी.’’

सुहास चुपचाप सुनता रहा. घर पर उतरने के साथ ही पुरवा ने अपनी प्रश्न- वाचक दृष्टि उस पर टिका दी, ‘‘क्या सोच रहे हो, सुहास?’’

बिना कुछ बोले वह अंदर चला गया. मां ने देखते ही कहा, ‘‘आ गए तुम दोनों.’’

‘‘झरना सो गई क्या?’’ सुहास ने तुरंत पूछा. पुरवा ने देखा, सुहास के चेहरे पर वही व्याकुलता थी जो शाम को उस ने देखी थी. जाने क्यों वह मन ही मन मुसकरा उठी. सोचा, बिलकुल बच्चों जैसा स्वभाव है. मां ने कुछ चिंता से कहा, ‘‘कुछ गरम लग रही है.’’

‘‘अरे, मैं फोन करता हूं डाक्टर को.’’

सुहास बोला तो मां ने कहा, ‘‘कर दिया है तुम्हारे पापा ने. अभी आ जाएंगे डाक्टर साहब.’’

पुरवा जा कर झरना के सिरहाने बैठ गई. सुहास ने बेटी के सिर पर प्यार से हाथ फेरा. बोला, ‘‘कैसे हो गया इसे बुखार?’’

‘‘इस तरह परेशान मत हो, सुहास. बच्चों को तो कुछ न कुछ चलता ही रहता है,’’ मां ने समझाया.

उस रात सुहास बहुत ही व्याकुल रहा. जाने कितनी बातें उसे आंदोलित कर रही थीं. परेशान तो पुरवा भी थी पर कुछ कह नहीं पा रही थी. कमरे में गहरी खामोशी थी. उस रात झरना को पालने में नहीं सुलाया था उस ने. दोनों के बीच में वह गहरी नींद सो रही थी. स्याह अंधेरे कमरे में 4 आंखें पलक झपकाना भूल गई थीं. बस, दोनों की व्याकुल सांसें कई एहसास जगा रही थीं.

पुरवा अचानक सुहास के स्पर्श से चौंक गई, सुहास की मद्धिम आवाज स्पर्श में घुलने लगी, ‘‘झरना को हम लोग क्या बनाएंगे?’’

पुरवा अंधेरे में ही मुसकरा दी.

‘‘यह हम उसी पर छोड़ देंगे. अभी से यह सब सोच कर क्यों परेशान हों.’’

शाम की व्यग्रता सुहास के स्पर्श में एक नए रंग में डूबी जा रही थी.

‘‘पुरवा, नाराज हो मुझ से?’’

‘‘नहीं तो,’’ पुरवा समझ गई थी कि उस की बात का उत्तर न दे पाने से भी सुहास व्याकुल है. सुहास कह रहा था, ‘‘मैं तुम्हारी तरह दूरदर्शी नहीं हूं, पुरवा. शायद हर निर्णय मैं बहुत घबराहट में लेता हूं्.’’

‘‘पता नहीं सुहास, पर इतना कह सकती हूं मैं कि भावुकता से भरे हुए फैसले बहुधा ठीक नहीं होते हैं,’’ पुरवा ने प्यार से कहा.

‘‘शायद तुम ठीक कह रही हो. इस तरह भावुकता में बह कर मैं कितनों की जान बचा पाऊंगा.’’

दोनों उठ कर बैठ गए थे. पुरवा ने साइड टेबल की बत्ती जलाई तो सुहास बोला, ‘‘रहने दो, पुरवा. अंधकार में रोशनी की जो किरण तुम ने दिखाई है उसे महसूस करने दो,’’ उस ने सोई हुई झरना के सिर पर प्यार से हाथ फेरा, ‘‘मैं सचमुच भूल गया था कि तुम दोनों के लिए भी मेरा जीवन कितना महत्त्वपूर्ण है.’’

पुरवा ने दोनों हथेलियों में उस के कपोल भर लिए और बोली, ‘‘मैं जानती हूं सुहास, तुम धीरेधीरे अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे हो और एक दिन बहुत सफल भी होगे.’’

सुहास उस के प्यार भरे स्पर्श से भावविभोर हो उठा, ‘‘तुम्हारा विश्वास ही तो मेरी शक्ति है पुरवा. जबजब मैं दिशाहीन हुआ हूं तुम ने मुझे सही राह दिखाई है.’’

‘‘मैं हर पल तुम्हारे साथ हूं सुहास. मैं कल सुबह ही अंधमहाविद्यालय जाऊंगी और हम कल से ही चैरिटी शो के लिए अभियान शुरू कर देंगे,’’ उस एक पल में 2 खामोश दिलों ने जाने कितने सतरंगे सपनों को अपने स्पर्श से जी लिया था.

‘‘मुझे कभी भटकने नहीं देना, पुरवा,’’ सुहास की फुसफुसाहट प्यार की खिलती पंखडि़यों में ओस की बूंद सी समा गई थी.

‘कौन कहता है कि सुहास से प्यार कर के मैं ने कुछ गलत किया,’ पुरवा ने मन ही मन दोहराया और एक नई सुबह की प्रतीक्षा में अंधेरे में छिपे सातों रंगों को महसूस करने का प्रयास करने लगी.

– समाप्त  

दूसरी नागरिकता

आर्थिक अपराधियों नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और विजय माल्या को देश से भाग कर दूसरे देशों में मजे से रहने में उन की दूसरी नागरिकता बड़े काम की रही. दुनिया में कई देश हैं जो चाहे छोटे हों, अपनी नागरिकता कुछ पैसा जमा कराने के बाद आसानी से दे देते हैं. यह अमेरिकियों, यूरोपियों को हमेशा भाता रहा है और अब जब चीनियों, रूसियों और भारतीयों के हाथों में पैसा आया है, वे भी दूसरी नागरिकताएं लपक रहे हैं.

दूसरे देश की नागरिकता असल में केवल बेईमानी कर के भाग जाने वाले नहीं ले रहे, बल्कि बहुत से सफल लोग भारत की गंदगी, खराब शिक्षा, अव्यवस्थित ट्रैफिक, गंदे पानी, दूषित हवा, डर्टी पोलिटिक्स और शायद सब से बड़ी बात धार्मिक कट्टरता के चलते भी ले रहे हैं.

धार्मिक कट्टरता महसूस नहीं होती क्योंकि हम इस में जीने के आदी हो गए हैं पर यह एक ऐसी जकड़न है जो मन और शरीर दोनों को बांध कर रखती है. कानून को कंट्रोल करने की तिकड़म तो भागने वाला जानता है, साथ ही वह यह भी जानता है कि कानून भी कभीकभार पकड़ ही लेता है.

ऐसे में रामायण और महाभारत के पात्रों की तरह वह भी देश से दूर जा कर अपनों के कहर से बचना चाहता है. राम और पांडवों को अपनों के कारण ही वनवास जाना पड़ा था.

यह यूरोप और अमेरिका की विशेषता है कि वे खालीहाथ या थोड़े पैसे ले कर आए लोगों को आज भी शरण देते हैं.

दूसरी नागरिकता वास्तव में एक बचाव है और उसे चाहे जितना गैरकानूनी कहा जाए, वह उस देश की मानवता की निशानी है. यह भगोड़ों को शरण देना कम, बल्कि मूल देश की निकम्मी व्यवस्था की पोल खोलना ज्यादा है. भारतीय अगर कमाई के लिए बाहर जा सकते हैं तो कानूनों की पेचीदगियों से बचने के लिए वे क्यों न जाएं.

दांव पर लगा सुहाग : जब दूसरे की बीवी से लड़ी नजरें

सपा नेता और प्रौपर्टी डीलर चंद्रपाल ने गुंडे दिलीप को न केवल जेल जाने से बचाया बल्कि उसे अपना सुरक्षा गार्ड बना कर साथ भी रख लिया. सुरक्षा के लिए उसे हथियार भी दे दिया. जब दिलीप की नजरें चंद्रपाल की बीवी सोनी से लड़ीं तो दिलीप ने उसी हथियार से चंद्रपाल की हत्या कर दी.

उत्तर प्रदेश के जिला संभल से करीब 25 किलोमीटर दूर है चंदौसी शहर. चंदौसी में देशी घी और मैंथा औयल की मंडियां हैं. जिन की वजह से इस शहर की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनी हुई है. चंदौसी के हनुमान गढ़ी मोहल्ले में चंद्रपाल माली अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सोनी के अलावा एक बेटा था. चंद्रपाल समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता थे. इस के अलावा वह बड़े प्रौपर्टी डीलर भी थे.

बात 14 सितंबर, 2018 की है. शाम के करीब 5 बजे थे तभी कोतवाली प्रभारी विनय कुमार को पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि चंदौसी के हनुमान गढ़ी में रहने वाले सपा नेता चंद्रपाल माली को उन के घर में घुस कर किसी ने गोली मार दी है. यह सूचना मिलते ही कोतवाली प्रभारी विजय कुमार पुलिस टीम के साथ हनुमान गढ़ी स्थित उन के घर पहुंच गए.

वहां जा कर पता चला कि उन्हें अस्पताल ले जाया गया है. इंसपेक्टर विनय कुमार भी अस्पताल पहुंच गए. वहां जानकारी मिली कि 35 वर्षीय चंद्रपाल माली की मौत हो चुकी है. उन्होंने डाक्टरों से बात कर शव अपने कब्जे में ले लिया और इस की सूचना अपने आला अफसरों को दे दी. कुछ ही देर में सीओ कृष्णकांत सरोज वहां पहुंच गए.

सपा नेता चंद्रपाल माली की हत्या की खबर फैलते ही उन के समर्थकों, पार्टी कार्यकर्ताओं और जानपहचान वालों में मातम छा गया. सभी को ताज्जुब हो रहा था कि आखिर ऐसा कौन है, जिस ने घर में घुस कर उन्हें गोली मार दी.

उधर जिला संभल के सपा के जिला अध्यक्ष फिरोज खां ने एसपी यमुना प्रसाद से मिल कर चंद्रपाल माली की हत्या पर दुख जाहिर किया और हत्यारों को जल्द गिरफ्तार करने की मांग की. एसपी ने फिरोज खां को भरोसा दिलाया कि पुलिस टीमें इस काम में लगा दी गई हैं और जल्द ही हत्यारे पुलिस के कब्जे में होंगे.

एसपी ने यह सूचना आईजी विनोद कुमार सिंह और मुरादाबाद बरेली मंडल के एडीजी प्रेम प्रकाश को भी दे दी. सपा कार्यकर्ताओं के संभावित विरोध प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए एडीजी प्रेम प्रकाश ने एसपी यमुना प्रसाद को चंदौसी शहर में पर्याप्त मात्रा में पुलिस तैनात करने के निर्देश दिए.

घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद इंसपेक्टर विनय कुमार ने मृतक के भाई मनोज माली से पूछताछ की तो उस ने कहा कि गोली की आवाज सुनने के बाद कुछ देर बाद जब वह भाई के कमरे में पहुंचा तो वह लहूलुहान पड़ा था. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया. उस ने इंसपेक्टर को बताया कि उस के भाई की हत्या किसी और ने नहीं बल्कि उस की भाभी सोनी और उस के प्रेमी दिलीप ठाकुर ने मिल कर की है.

मनोज माली की बात सुनने के बाद इंसपेक्टर विनय कुमार के सामने मामले की तसबीर साफ होने लगी. यह बात उन्होंने सीओ कृष्ण कांत सरोज को बताई. इसलिए सीओ सरोज ने मृतक की पत्नी सोनी पर निगरानी रखने को कहा ताकि वह फरार न हो सके.

अगले दिन यानी 15 सितंबर को पुलिस ने जरूरी काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. गोली चंद्रपाल के सीने पर मारी गई थी, लेकिन डाक्टरों ने जब पोस्टमार्टम किया तो उन्हें गोली नहीं मिली. जबकि वह बाहर भी नहीं निकली थी. डाक्टर हैरान थे कि जब गोली शरीर के बाहर नहीं निकली, तो वह गई कहां. उन्होंने पुलिस से कहा कि वह लाश का एक्सरे कराए ताकि गोली की स्थिति पता लग सके. इस पर पुलिस चंद्रपाल माली की लाश का एक्सरे कराने के लिए संभल के जिला अस्पताल ले गई.

संदेह के दायरे में पत्नी

एक्सरे के बाद पता चला कि जो गोली सीने में घुसी थी. वह फेफड़े, दिल, लीवर और छोटी आंत को फाड़ते हुए कूल्हे के ऊपर की हड्डी में जा कर फंस गई थी. एक्सरे होने के बाद पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों ने गोली निकाली. वह गोली .315 बोर की थी.

पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने लाश घर वालों को सौंप दी. मृतक स्थानीय नेता ही नहीं बल्कि शहर का प्रतिष्ठित आदमी था इसलिए शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए अंतिम यात्रा के समय भारी पुलिस बल मौजूद रहा. अंतिम संस्कार के बाद पुलिस ने मृतक की पत्नी सोनी को उसी दिन पूछताछ के लिए थाने बुलाया.

पूछताछ में उस ने बताया कि शाम करीब साढ़े 4 बजे उस के पति अपने नौकर उमेश के साथ घर लौटे थे. उस समय दूसरे कमरे में ट्यूटर सोनू उस के 8 वर्षीय बेटे को ट्यूशन पढ़ा रहा था. वह टौयलेट गई हुई थी. उसी दौरान किसी ने पति को गोली मार दी.

इस के बाद इंसपेक्टर विनय कुमार ने ट्यूटर सोनू और घरेलू नौकर उमेश को थाने बुलाया. सोनू ने बताया कि शोरशराबा और गोली की आवाज सुनने पर जब वह बाहर आया तो चंद्रपाल लहूलुहान हालत में पड़े थे. उन्हें अस्पताल ले जाया गया.

इंसपेक्टर विनय कुमार ने चंद्रपाल के नौकर उमेश से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘शाम करीब 4 बजे मैं मालिक के साथ घर लौटा. मालिक अपने कमरे में चले गए तो मैं दूसरे कमरे में बैठ गया. कुछ देर बाद मैं ने मालिक के कमरे से गोली चलने की आवाज सुनी तो मैं तुरंत उन के कमरे की तरफ दौड़ा. उस कमरे में मालिक फर्श पर लहूलुहान पड़े थे, उन की पत्नी सोनी वहीं खड़ी थी और दिलीप भी था.’’

उमेश ने आगे बताया, ‘‘दिलीप के हाथ में तमंचा देख कर मैं समझ गया कि उसी ने मालिक को गोली मारी है. दिलीप वहां से भागने को हुआ तो मैं ने उसे दबोच लिया. सोनी दिलीप को छुड़ाने लगी, लेकिन मैं ने उसे नहीं छोड़ा. तभी सोनी ने मेरे कंधे पर काट लिया. इस से मेरी पकड़ ढीली हुई तो दिलीप वहां से भाग गया.’’

उमेश ने इंसपेक्टर विनय कुमार को अपना कंधा भी दिखाया, जहां सोनी ने काटा था. उमेश के कंधे पर गहरा घाव था. इस से इंसपेक्टर विनय समझ गए कि सोनी झूठ बोल रही है. यह सब उसी का कियाधरा है. मृतक के भाई ने भी सोनी और उस के प्रेमी दिलीप पर हत्या का आरोप लगाया था.

खुल गया हत्या का राज

इंसपेक्टर विनय कुमार ने सोनी से सख्ती से पूछताछ की तो उसे सच बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा. क्योंकि नौकर उमेश को काटने की बात वह झुठला नहीं सकती थी. सोनी से पूछताछ के बाद उस के पति चंद्रपाल माली की हत्या की जो कहानी सामने आई वह चौंकाने वाली निकली.

चंद्रपाल माली की शादी मुरादाबाद के गोविंदनगर निवासी सोनी के साथ हुई थी. शादी के करीब एक साल बाद सोनी एक बेटे की मां बनी, जिस का नाम देव माली रखा. देव इस समय शहर के ही एक कौन्वेंट स्कूल में कक्षा 3 में पढ़ रहा है.

चंद्रपाल के पिता जगदीश माली जमीनों की खरीदफरोख्त का काम करते थे. चंद्रपाल ने भी पिता के पेशे को अपना लिया. चंदौसी से 25 किलोमीटर दूर संभल कुछ साल पहले ही जिला घोषित हुआ था.

जिला बनने के बाद संभल और आसपास के इलाकों की जमीनों के रेट आसमान छूने लगे थे. चंद्रपाल माली ने शहर में नई जगहों पर जमीनें खरीद कर डाल रखी थीं. वह धीरेधीरे इन जमीनों पर प्लौट काट कर बेच रहे थे.

करीब 6 महीने पुरानी बात है. चंद्रपाल चंदौसी के व्यस्ततम बाजार फव्वारा चौक पर स्थित एक स्टाल पर टिक्की खाने गए थे. फव्वारा चौक चंदौसी शहर की एक ऐसी मशहूर जगह है जहां शहर के संभ्रांत लोग चाट, पकौड़ी, मूंग की दाल, गोल गप्पे आदि खाने के लिए आते हैं. जब चंद्रपाल माली वहां खड़े टिक्की खा रहे थे, तभी अचानक वहां 3 लड़कों ने अचानक अंधाधुंध फायरिंग कर दी, जिस से उधर से गुजरने वाले एक राहगीर को भी कुछ छर्रे लगे.

इतना ही नहीं उस के बाद उक्त तीनों युवकों ने शहर कोतवाली के पास जा कर भी फायरिंग की थी. उन 3 लड़कों में एक दिलीप ठाकुर भी था. पुलिस ने तीनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया था.

चंद्रपाल दिलीप को जानते थे. उस की जांबाजी देख कर वह काफी प्रभावित हुए. पता लगा कर पुलिस फायरिंग करने वाले लड़कों को तलाशने लगी. उन के घरों पर भी दबिश डाली गईं. लेकिन वे अपने घरों से फरार हो चुके थे.

आस्तीन में पाला सांप

दिलीप के घर वालों ने चंद्रपाल से संपर्क किया. उन्होंने उस से दिलीप को बचाने की गुहार लगाई. चंद्रपाल ने अपने प्रभाव से दिलीप की मदद की. उन्होंने दिलीप को जेल जाने से भी बचा लिया. चंद्रपाल को दिलीप ठाकुर बड़ा ही दिलेर लगा था. उन्होंने सोचा कि यह उन के धंधे के लिए उपयुक्त रहेगा, इसलिए वह तभी से उस की आर्थिक मदद भी करने लगे.

एहसान में दबे दिलीप ठाकुर को चंद्रपाल ने अपने साथ मिला लिया. वह बतौर बौडीगार्ड चंद्रपाल माली के साथ रहने लगा. अच्छे वेतन के अलावा वह उसे प्लौट बिकवाने का कमीशन भी देते थे. चूंकि वह हर समय उन्हीं के साथ रहता था, इसलिए उस के खानेपीने का खर्चा भी वही उठाते थे. वह दिलीप ठाकुर को एक तरह से अपने छोटे भाई की तरह मानते थे.

जब से दिलीप ठाकुर ने चंद्रपाल के साथ रहना शुरू किया था, तब से चंद्रपाल के रुआब में इजाफा भी हो गया था. साथ ही उन का बिजनैस भी बढ़ गया था. घटना से पहले चंद्रपाल ने 2 प्लौट अच्छे दामों में बेचे थे, जिस से उन्हें लाखों का फायदा हुआ था. दोनों प्लौट दिलीप ठाकुर ने बिकवाए थे, जिस से उसे भी कमीशन के कई हजार रुपए मिले थे.

इस कमाई से अभियुक्त दिलीप ठाकुर ने एक मोटरसाइकिल खरीदी, अपने लिए ब्रांडेड कपड़े, जूते खरीदे. अब वह और ज्यादा बनठन कर रहने लगा.

चंद्रपाल शाम को जब अपने धंधे से फारिग हो जाते, वह दिलीप के साथ पीनेपिलाने का दौर शुरू कर देते, जो काफी देर तक चलता था.

18 साल का दिलीप ठाकुर बन ठन कर रहता था. एक दिन चंद्रपाल ने अपनी पत्नी को दिलीप की बहादुरी के किस्से सुनाए तो वह दिलीप से बहुत प्रभावित हुई. दिलीप सोनी को भाभी कहता था. कुछ दिनों बाद ही दिलीप ने महसूस किया कि सोनी का झुकाव उस की तरफ बढ़ रहा है.

दिलीप जानता था कि उस के और सोनी के स्तर में जमीन आसमान का अंतर है, इसलिए वह सब कुछ समझने के बाद भी कदम आगे बढ़ाने से डर रहा था. दिलीप के चुप रहने के बाद सोनी ने ही पहल करते हुए दिलीप के साथ हंसीमजाक और शारीरिक छेड़छाड शुरू कर दी. 18 साल के दिलीप ने भी इस खुले औफर का लाभ उठाते हुए आगे कदम बढ़ा दिए. इस का नतीजा यह हुआ कि जल्द ही दोनों के बीच शारीरिक संबंध बन गए.

सोनी दिलीप से उम्र में करीब 16 साल बड़ी थी लिहाजा उस से संबंध बना कर वह बहुत खुश थी. चंद्रपाल को पत्नी की इस करतूत की भनक तक नहीं लगी.

उधर सोनी ने दिलीप ठाकुर को पूरी तरह अपने प्रेमजाल में फांस लिया था. इस के बाद उसे अपने पति से नफरत सी हो गई. बातबात पर पति से झगड़ना आम सी बात हो गई थी.

चंद्रपाल यह बात भी नहीं समझ पा रहे थे कि पहले हर समय उन के साथ रहने वाला दिलीप अब कोई न कोई बहाना बना कर 2-3 घंटे के लिए अपने घर क्यों चला जाता है. वह दिलीप पर नजर रखने लगे.

बहरहाल, इस तरह के संबंध छिपाए नहीं छिपते हैं. आखिर चंद्रपाल माली को एक दिन यह पता चल ही गया कि दिलीप ठाकुर अपने घर ना जा कर उस की पत्नी सोनी से मिलने जाता है.

चंद्रपाल को जब यह बात पता चली तो लगा जरूर दाल में कुछ काला है. उन्होंने पत्नी से पूछा कि दिलीप तुम्हारे पास क्यों आता है. सोनी ने पति से बड़ी ही सफाई से झूठ बोलते हुए कहा कि आप नाहक मेरे ऊपर शक कर रहे हैं, घर का कुछ सामान वगैरह उस से मंगा लेती हूं.

पत्नी की सफाई के बाद भी चंद्रपाल का शक दूर नहीं हुआ. चंद्रपाल ने दिलीप से साफ कह दिया कि मेरे पीछे तुम मेरे घर नहीं जाओगे. अगर गए तो समझ लेना अंजाम बुरा होगा.

अपने घर की गतिविधि पर नजर रखने के लिए चंद्रपाल ने घर में और घर के बाहर सीसीटीवी कैमरे भी लगवा दिए. लेकिन सोनी उन कैमरों के तार काट देती थी. पति के पूछने पर वह कह देती थी कि तार बंदरों ने तोड़ दिए. चंद्रपाल ने दिलीप को जो तमंचा खरीद कर दिया था, वह उस ने वापस मांगा. लेकिन दिलीप ने बहाना बना कर कह दिया कि वह 2-3 दिनों में तमंचा वापस कर देगा.

उधर सोनी दिलीप ठाकुर के प्यार में पूरी तरह डूब चुकी थी. दिलीप भी बहुत शातिर था. उस की निगाह चंद्रपाल की प्रौपर्टी और पैसों पर थी. सोनी दिलीप के साथ अपनी नई जिंदगी बसाना चाहती थी. चंद्रपाल माली ने अपनी पत्नी सोनी और दिलीप के संबंधों के बारे में एक दिन अपने छोटे भाई मनोज माली को बता दिया.

14 सितंबर को चंद्रपाल अपने नौकर उमेश के साथ प्रौपर्टी डीलिंग के काम से सुबह ही साइट पर चला गया था. 3 साढ़े 3 बजे चंद्रपाल ने नौकर उमेश से कहा कि अभी मेरी तबीयत ठीक नहीं है, चलो घर चलते हैं. घर पर कुछ देर आराम कर के वापस आ जाएंगे.

शाम 4 बजे चंद्रपाल माली जब अपने घर हनुमान गढ़ी पहुंचे तो उन्होंने दरवाजा खोलने के लिए घर की घंटी बजाई. कुछ देर बाद सोनी ने दरवाजा खोला. पति को देख कर वह चौंकते हुए बोली कि आज इतनी जल्दी कैसे आ गए.

चंद्रपाल ने जवाब में कहा कि आज तबीयत नासाज है. यह सुन कर सोनी बाथरूम में चली गई. चंद्रपाल अपनी शर्ट उतार कर बैडरूम में जा कर लेट गए. उसी समय उन्होंने स्टोररूम में किसी के अंदर होने की आहट सुनी तो स्टोररूम को खोल कर देखा. अंदर दिलीप ठाकुर था. उसे देख कर उन का खून खौल गया. उन्होंने दिलीप ठाकुर को दबोच लिया. दोनों में गुत्थमगुत्था होने लगी. उसी समय सोनी भी वहां आ गई. सोनी ने प्रेमी का पक्ष लेते हुए पति के दोनों हाथ पकड़ कर दिलीप से कहा, ‘‘दिलीप आज इस का काम तमाम कर दो.’’

तभी दिलीप ठाकुर ने तमंचे से चंद्रपाल के सीने में गोली मार दी. गोली लगते ही चंद्रपाल एक तरफ लुढ़क गए. यह वहीं तमंचा था जो चंद्रपाल ने उसे अपनी सुरक्षा के लिए दिया था. गोली की आवाज सुनते ही नौकर उमेश वहां आ गया. माजरा समझ कर उस ने हिम्मत दिखाई और दिलीप को दबोच लिया. प्रेमी को छुड़ाने के लिए सोनी ने उमेश के कंधे में पूरी ताकत से काट लिया, जिस की वजह से उमेश की पकड़ ढीली पड़ गई और दिलीप ठाकुर भागने में कामयाब हो गया.

पुलिस ने सोनी से पूछताछ के बाद उस के प्रेमी दिलीप ठाकुर को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों को न्यायालय में पेश कर के 23 सितंबर को जेल भेज दिया. पुलिस ने उस के पास से हत्या में प्रयुक्त तमंचा भी बरामद कर लिया.?

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शिक्षा व्यवस्था की कमियों को उजागर करती है ‘व्हाय चीट इंडिया’ : इमरान हाशमी

बौलीवुड के ‘सीरियल किसर’ कहे जाने वाले अभिनेता इमरान हाशमी ने एक नई राह पकड़ ली है. पिछले तीन चार वर्षों से वह कंटेंट प्रधान सिनेमा पर ध्यान दे रहे हैं. ‘अजहर’ व अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘‘टाइगर’’ के बाद अब फिल्म ‘‘व्हाय चीट इंडिया’’ की है, जिसमें वह चीटिंग माफिया के सरदार बने हुए हैं. 18 जनवरी को प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘‘व्हाय चीट इंडिया’’ का निर्माण भी इमरान हाशमी ने स्वयं किया है. इतना ही नही अब वह आगे भी फिल्मों का निर्माण करते रहेंगे.

इन दिनों हर कलाकार फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतर रहा है. इसलिए आपने भी व्हाय चीट इंडियासे निर्माता बनने का फैसला कर लिया?

मेरे फिल्म निर्माण में उतरने की वजहें कुछ और हैं. अतीत में कुछ फिल्मों में अभिनय कर मैं संतुष्ट नहीं था. वह फिल्में पटकथा के स्तर पर कुछ अलग थीं, पर बनते बनते कुछ और बन गयी थीं. उन फिल्मों के निर्माण में मैं बहुत ज्यादा योगदान नहीं दे पाया था. क्योंकि मैं सिर्फ कलाकार था. जब आप किसी फिल्म में बतौर कलाकार जुडे़ होते हैं, तो एक सीमा तक ही आप उस फिल्म के निर्माण में अपना योगदान दे सकते हैं. हम कलाकार के तौर पर अपने किरदार को निभाने के साथ साथ डबिंग तक ही सीमित रह जाते हैं.

तो मेरे मन में एक बात आ रही थी कि क्यों ना हम अपने मनमुताबिक फिल्म बनाएं. और उस फिल्म से जुड़े हर विभाग पर हमारी अपनी पकड़ हो. फिर वह फिल्म क्या बनती है, यह अलग बात है. उसे सफलता मिलती है या नहीं, यह अलग बात होगी. लेकिन कम से कम मुझे इस बात की खुशी होगी कि मैंने अपनी मर्जी की फिल्म बनायी. क्योंकि उस फिल्म के निर्माण के समय हमें पता रहेगा कि हम कहां गलत रहे, कहां सही ?

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क्या आप उन फिल्मों के बारे में बताना चाहेंगे, जिनसे आपको खुशी नहीं मिली?

किसी भी फिल्म का नाम लेना उचित नहीं है. लेकिन कुछ फिल्में ऐसी थी, जिनमें मुझे बहुत तकलीफ हुई. स्क्रिप्ट अच्छी थी, पर बन अच्छी नहीं पायी. कुछ फिल्में बन अच्छी गयीं, पर उनकी मार्केटिंग सही नहीं हुई. तो कभी मुझे लगा कि इस फिल्म की एडीटिंग में गड़बड़ी हुई है. इसी के चलते मुझे लगा कि अब खुद फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतरने का समय आ गया है.

फिल्म निर्माता बनने के लिए ‘‘व्हाय चीट इंडिया’’ ही क्यों?

मैं पिछले चार वर्षों से फिल्म निर्माता बनना चाह रहा था. इसके लिए मुझे अच्छी कहानी व पटकथा की तलाश थी. जब इस फिल्म की स्क्रिप्ट मेरे पास आयी, तो पढ़ने के बाद मैंने महसूस किया कि यह कहानी बहुत ही रिलेटेबल है. मुझे महसूस हुआ कि सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, आम लोगों के लिए भी यह फिल्म बहुत जरूरी है, क्योंकि आम बच्चे व उनके माता पिता इन सब चीजों को झेल चुके हैं. अतः मैंने खुद इस फिल्म का निर्माण करने की सोची.

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क्या आपने खुद इस फिल्म के विषय पर रिसर्च किया है?

जब मैं कौलेज में पढ़ाई कर रहा था, तभी इस विषय पर रिसर्च पूरा हो गया था. उसके बाद लेखक व निर्देशक सौमिक सेन ने भी शोध किया. उन्होंने मुझे कई लेख पढ़ने के लिए दिए. मैंने परीक्षाओं के पेपर लीक, चीटिंग माफिया की कार्य पद्धति आदि को लेकर लगातार अखबारों में जो खबरें छप रही थीं, उनका भी गहन अध्ययन किया, जिससे शिक्षा तंत्र को लेकर बहुत सारी चीजें मेरी समझ में आयीं. फिर कुछ मेरे अपने अनुभव थे.

हमारे देश के एज्युकेशन सिस्टम/शिक्षा तंत्र की खामियों के चलते हर बच्चा स्कूल के दिनों मे कंन्फ्यूज रहता है कि वह आगे चलकर क्या पढे़? उसकी समझ में नहीं आता है कि वह विज्ञान, कला व कौमर्स में से किसे चुने? दूसरों की बात क्यों करूं? मैंने खुद कौमर्स में अपने पांच साल बर्बाद कर दिए. मैं तो आर्ट्स में पढ़ाई करना चाह रहा था. यदि उस वक्त मैं आर्ट्स में जाता, तो वह मेरे लिए उचित था. पर मेरे शिक्षक ने मुझसे कह दिया कि कौमर्स ले लो, मैंने ले लिया. अब अभिनय के क्षेत्र में कौमर्स की डिग्री का क्या औचित्य? मेरी ही तरह हर वर्ष लाखों बच्चे कन्फ्यूज होकर गलत पढ़ाई करते हैं.

आपको लगता है कि पूरे शिक्षा तंत्र को बदलने की जरूरत है?

पूरे शिक्षा तंत्र को बदलना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं, कोई शक नहीं. जमीन से लेकर ऊपर तक सब कुछ बदलना पड़ेगा.

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वर्तमान एज्यूकेशन सिस्टम/शिक्षा तंत्र की वजह से जो भी समस्याएं पैदा हो रही हैं, उसके लिए सरकार व बच्चों के माता पिता में से कौन कितना दोषी है?

दोनों बराबर के दोषी हैं. मां बाप अपने सपनों को अपने बच्चों पर जबरन थोपते हैं. बच्चे उन सपनों को पूरा करने के लिए परीक्षा में नकल करते हैं या चीटिंग माफिया का सहारा लेते हैं. इस पर मैंने बहुत गहन अध्ययन किया, तो पाया कि कहीं न कहीं माता पिता अपनी जगह सही भी होते हैं.

देखिए, निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लोग अपने खून पसीने की कमाई के लाखों रुपए अपने बच्चे को पढ़ाने में खर्च करते हैं, तो वह उम्मीद करते हैं कि बच्चा इस काबिल बन जाए कि वह उनके द्वारा उसके शिक्षा पर खर्च की गयी रकम को वापस ला सके. मां बाप चाहते हैं कि उसका बेटा पढ़ लिख कर उनके बुढ़ापे का सहारा बने और नौकरी करके इतना कमा सके कि जो पैसा उसकी पढ़ाई पर खर्च हुआ है, वह ब्याज सहित वापस कर सके. इसलिए हम पूर्णरूपेण मां बाप को दोषी नहीं ठहरा सकते.

एक डौक्टर चाहता है कि उसका बेटा डौक्टर बने, इंजीनियर चाहता है कि उसका बेटा इंजीनियर बने. यहां तक ठीक है. मगर मां बाप गलत यहां हो जाते हैं कि वह यह नहीं सोचते हैं कि उसके बच्चे की रुचि किधर है? यदि मां बाप अपने सपने को पूरा करने के लिए बच्चे को उस दिशा में ले जाते हैं, जहां उसकी रुचि नहीं है. तो इससे मां बाप अपने बच्चे के भविष्य का गलाघोंट देते हैं. मसलन, मुझे अभिनय के क्षेत्र में आना था. यदि मैंने कला की पढ़ाई की होती तो मेरे लिए फायदेमंद होता. तो किसी स्तर पर सरकार भी दोषी है.

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आपके अनुसार शिक्षा तंत्र को सही करने के लिए सरकार को किस तरह के कदम उठाने चाहिए?

देखिए, हमारे देश की जो जीडीपी है, उसका अधिकांश हिस्सा रक्षा क्षेत्र, सार्वजनिक निर्माण व अन्य क्षेत्रों में दिया जाता है. पर एज्युकेशन सिस्टम को बजट बहुत कम दिया जाता है. जहां तक मुझे पता है, हमारी वर्तमान सरकार शिक्षा के लिए 3.50 से 4.4 तक का ही बजट दे रही है, जो कि बहुत कम है. इससे कुछ नहीं होता. क्योंकि जिस तादात में स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है, इससे कुछ नहीं होगा. कम से कम 7 से 9 प्रतिशत बजट शिक्षा के लिए होना चाहिए. जिन देशों में शिक्षा तंत्र को पूरी तरह से बदला गया है, वह ज्यादा उन्नति कर रहे हैं. हमारे यहां उन देशों की तरह उतना बजट शिक्षा को नहीं दे सकते, क्योंकि हमारे यहां और भी समस्याए हैं. पर कम से कम 9 प्रतिशत शिक्षा को दिया जाना चाहिए.

इसके अलावा सरकार को शिक्षा पद्धति में इस तरह बदलाव लाना चाहिए कि पांचवी कक्षा तक बच्चे, उसके घरवालों और शिक्षक को समझ आ जाना चाहिए कि बच्चे की रूचि किस तरफ है? लाखों बच्चे हाईस्कूल पास करने के बाद समझ नहीं पाते हैं कि अब उन्हें क्या पढ़ना चाहिए? हमारी शिक्षा पद्धति में दस साल तक यही पढ़ाया जाता है कि किस राजा ने क्या किया था? यह सब जानकारी होना ठीक है, पर भविष्य में उसका सामना किन चीजों से पड़ेगा, कहां उसको नौकरी मिलेगी? उसका  प्रोफेशन क्या होगा? इन सारी चीजों पर भी ध्यान देना चाहिए. पर हमारे यहां तक दस साल तक तथ्य व आंकडे़ सिखाए जाते हैं, जिनका रोजगार या रोजमर्रा की जिंदगी से कोई संबंध नहीं होता. हमारे देश में बीकौम पास युवक अपने घर का इलेक्ट्कि फ्यूज ठीक नहीं कर सकता.

हमारे देश में कला/आर्ट की पढ़ाई को महत्व ही नहीं दिया गया है. मैं कह रहा हूं कि कौमर्स ने मेरे पांच साल बर्बाद कर दिए. यदि अन्य विषयों के साथ हमें फिल्म मेकिंग, एक्टिंग आदि की शिक्षा मिलती, तो बात कुछ और होती. मेरी राय में पांचवी कक्षा से ही बच्चों को वोकेशनल ट्रेनिंग देना शुरू कर देना चाहिए. रट्टा मारने वाली शिक्षा पद्धति को बंद कर देना चाहिए. प्रोजेक्ट वगैरह की बात की जानी चाहिए.

यूरोप वगैरह में बहुत अलग तरह की शिक्षा है. अब भविष्य में शिक्षा इस ढंग से होगी कि हर बच्चे के हाथ में मोबाइल या लैपटौप होगा. वह घर पर बैठकर ही पढ़ाई कर लेगा. स्कूल व कौलेज वह सिर्फ टीचर के साथ डिस्कस करने के लिए जाएगा. कौलेज में वह शिक्षक के साथ बैठकर केस स्टडी करेगा. यानी कि प्रैक्टिकल ज्ञान कौलेज व स्कूल में मिलेगा.

आपने फिल्म ‘‘व्हाय चीट इंडिया’’ में किस मुद्दे पर ज्यादा जोर दिया है?

मेरी फिल्म कहती है कि पूरी शिक्षा पद्धति/ शिक्षा तंत्र खराब है, जिसे ऊपर से नीचे तक बदलने की जरूरत है. शिक्षा का फंडामेंटल ही खराब है. रट्टा मारकर परीक्षा पास करने की पद्धति ही गलत है. इसके साथ ही हर राज्य में चीटिंग माफिया बहुत तेज हैं. हमारी फिल्म उस पर भी बात करती है. यह चीटिंग माफिया काफी पैसे कमाते हैं. पेपर लीक करते हैं. परीक्षा कोई देता है, नाम किसी का होता है. कई बच्चों के लिए तो डौक्टर व इंजीनियर परीक्षा देने जाते हैं.

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चीटिंग माफिया की मदद से जो बच्चे परीक्षा पास करते हैं, उनसे देश को किस तरह का नुकसान होता है?

चीटिंग माफिया की मदद से विजेता बने बच्चे जिस प्रोफेशन में जाते हैं, वहां भी वह चीटिंग ही करते हैं. इसी वजह से हमारे देश में हर विभाग में भ्रष्टाचार है. तो भ्रष्ट समाज की शुरुआत चीटिंग माफिया की मदद से परीक्षा पास करने वाले लोगों से होती है.

पर चीटिंग माफिया को तो राजनेता व सरकार का वरद हासिल होता है?

आपने एकदम सही कहा. इसमें कोई दो राय नहीं है. सरकार से जुड़े लोग भी इस तरह के धंधे को कहीं न कहीं सपोर्ट करते ही हैं. हमारे देश में तमाम फर्जी कौलेज हैं, जिन्हें सरकारी मदद मिल रही है. सरकारी फंड से चलने वाले कई कौलेज व विश्वविद्यालय फर्जी डिग्रियां बेच रहे हैं. कई लोगों को तो बड़ी बड़ी नौकरी इसलिए मिल जाती है, क्योंकि वह किसी न किसी राजनेता के रिश्तेदार होते हैं. तो कई बार कुछ लोगों को नौकरी इसलिए मिलती है कि राजनेता का अपना वोट बैक बन जाए.

तो आपकी फिल्म सच्चाई बयां कर रही है?

जी हां! हमने बहुत गहन शोध कार्य करके फिल्म बनाई है. शिक्षा क्षेत्र से जुडे़ तमाम लोगों से हमने बात की है. यह पूरी तरह से तथ्यपरक व सच्ची फिल्म है. मेरी पूरी फिल्म सच पर आधारित है. हमने कई जगहों से जानकारी इकट्ठा कर फिल्म में जोड़ा है.

फिल्म में आपका अपना किरदार क्या है?

फिल्म में मेरा नाम राकेश सिंह उर्फ रौकी है. उत्तर प्रदेश में वह चीटिंग माफिया का कर्ताधर्ता है. वह कई तरह के घोटालों से जुड़ा हुआ है. लोगों को फर्जी ढंग से पास करवाना, लोगों को फर्जी नौकरी दिलवाना, फर्जी डिग्री, फर्जी प्रमाणपत्र दिलवाना उसका काम है.

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फिल्म ‘‘व्हाय चीट इंडिया’’ के प्रदर्शन के बाद देश या समाज में किस तरह की चर्चाएं शुरू होंगी?

हमारी फिल्म में एक बहुत बड़ा खुलासा है, जिसको लेकर लोग चर्चा करेंगे कि हमारे देश में यह क्या हो रहा है? बहुत से विद्यार्थियों को हमारी फिल्म से कई चीजें पता चलेंगी. पर जो चीटर हैं, उन्हे तो वह सब पता है, जो हमारी फिल्म में दिखाया गया है. यदि हमारे देश में हमारी फिल्म में उठाए गए मुद्दे पर बहस शुरू हो गयी, तो भी शिक्षा जगत में बदलाव आ जाएगा. यह जरूरी भी है.

देखिए, आप देश में चाहे जितने पुल बना लें, चाहे जितनी सड़के बना लें, उसका कोई फायदा नहीं, यदि आप देश के बच्चे का भविष्य ना बना सके. उन्हें अच्छी शिक्षा न दे सके.

फिल्म में हीरोइन के तौर पर नई अदाकारा श्रेया धनवंतरी क्यों?

हमने अपनी फिल्म को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में फिल्माया है. फिल्म को औथेटिंक बनाने के लिए हमने वहां के स्थानीय कलाकारों को भी इस फिल्म से जोड़ा है. श्रेया धनवंतरी दिल्ली में ही रही हैं, तो उत्तर प्रदेश की भाषा से वह बाखूबी परिचित हैं. मेरा किरदार लखनऊ का रहने वाला है, तो मुझे भी श्रेया से कुछ मदद मिली.

पिछली बार आपने कहा था कि आप कैंसर पर एक डौक्यूमेंटरी फिल्म बनाने वाले हैं. उसकी क्या स्थिति है?

मुझे याद है. पर मैं अभी तक बना नहीं पाया. देखिए, डौक्यूमेंटरी बनाना आसान नहीं है. क्योंकि इसमें पांच छह गाने, प्रेम कहानी वगैरह मनोरंजन नहीं होता है. ऐसे में इसके लिए धन जुटाना भी आसान नहीं है. मैंने कैंसर को ही लेकर एक किताब लिखी थी, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया. खुशी की बात है कि इस किताब के छह सात रीप्रिंट आ चुके हैं. यह हिंदी, बंगला और दक्षिण की भाषाओं में अनुवादित भी हुई है. पर हम इस पर डौक्यूमेंटरी भी बनाएंगे. किताब में मैंने यही बताया कि आप कैंसर से किस तरह से लड़ सकते हैं.

इसमें मैंने साफ लिखा है कि आपके किसी रिश्तेदार या किसी दोस्त को कैंसर है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह अछूत हो गया. कैंसर का मतलब यह नहीं है कि उसकी मौत होना तय है. कैंसर को आप सिर्फ दवाईयों से ही नहीं, अपने खानपान आदि से भी ठीक कर सकते हैं.

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सिनेमा में जो बदलाव आया है,उसको लेकर क्या सोचते हैं?

सिनेमा बहुत अच्छे दौर से गुजर रहा है. अलग अलग विषयों पर फिल्में बन रही हैं. दर्शक भी पसंद कर रहा है. सिनेमा में आए बदलाव का ही कारण है कि हम ‘व्हाय चीट इंडिया’ फिल्म बना पाए हैं. आज से दस साल पहले इस तरह की फिल्म का बनना असंभव था. अब तो सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्मों को भी धन मिल जाता है. पहले सिर्फ चार पांच जौनर की ही फिल्में बन रहीं थी. पहले स्टार सिस्टम बहुत ताकतवर था, पर अब वह भी टूट चुका है. अब आप नए कलाकारों को लेकर भी फिल्म बना सकते हैं, बशर्तें कहानी में दम हो.

इसके बाद कौन कौन सी फिल्में आ रही हैं?

एक फिल्म ‘‘फादर्स डे’’ है. इसके अलावा जून में प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘‘द बौडी’’ है. मैं बतौर निर्माता एक फिल्म शुरू करने वाला हूं, जिसका नाम तय नहीं है. यह प्रेम कहानी के साथ रोमांचक फिल्म होगी. एक वेब सीरीज कर रहा हूं.

आया डस्की ब्यूटी का जमाना

बौलीवुड की कई हिरोईने ऐसी हैं जिनका कलर थोड़ा दबा हुआ यानी डस्‍की है, लेकिन फिर भी वो देखने में खूबसूरत, स्‍मार्ट और ग्लैमरस लगती हैं. फिर चाहे बात हो बिपाशा की, गौरी खान की या फिर चित्रागंदा सिंह की, ये सभी हिरोइने डस्‍की ब्यूटी हैं. इसलिए अगर आप भी थोड़ी डस्की हैं तो इसमें कोई परेशान होने वाली बात नहीं है. आप भी चाहें तो खुद को ग्‍लैमरस दिखा सकती हैं. जानना चाहती हैं कैसे, तो पढिये कुछ शानदार टिप्‍स.

फाउंडेशन

मेकअप करते समय अच्‍छी फिनिशिंग के लिये क्रीम बेस या लिक्‍विड वाला फाउंडेशन प्रयोग करें. वही फाउंडेशन लें जो आपके चेहरे के रंग पर सही बैठता हो. ताकि आपके चेहरे की खूबसूरती निखर कर सामने आए. स्किन टोन से लाइट कलर लेने पर फाउंडेशन त्वचा पर अच्छी तरह से मिक्स नहीं हो पाता और देखने में भद्दा लगता है.

पाउडर

अगर आपकी स्‍किन डस्‍की के साथ औयली है तो, आपको हल्का सा पाउडर अपनी त्वचा पर लगाना चाहिये वो भी बड़े ब्रश के साथ. यह आपके चेहरे पर निखार लाता है.

ब्‍लशर

इसके लिए हमेशा लाइट और सौफ्ट कलर के रंगों का चुनाव करना चाहिये. रोज डीप औरेंज और कोरल ब्‍लश एक अच्‍छा चुनाव होता है. अगर आपको लगता है कि आपका ब्‍लश अच्‍छा नहीं लग रहा है तो, क्रीम बेस वाला ब्‍लश प्रयोग करें

लिप कलर

हल्‍के रंगों का चुनाव न करें इसकी जगह पर बरगंडी, ब्राउन, रेड और प्‍लम कलर लगाएं. इसके ऊपर से कोई शाइन करने वाला लिप ग्लौस स लगा लें. इससे आपका चेहरा देखने में काफी ग्लैमरस लगता है.

आई शैडो

आपके लिये बाजार में ब्रोन्‍ज, कौपर, ब्राउन या फिर नेवी ब्‍लू कलर के कई अच्‍छे शेड्स मौजूद हैं. इनका प्रयोग आपकी डस्की ब्यूटी के लिए एक अच्छा विकल्प है.

आई ब्रो

कोशिश करें कि अपनी आई ब्रो को शेप में रखें. अगर डस्‍की रंग है तो आईब्रोज को पतला रखें इससे आपकी आंखें गहरी लगेंगी.

आईलाइनर

काजल लगाने से अच्‍छा है कि आप काला या नीले रंग का अच्‍छा सा आईलाइनर लगाएं. मोटी लाइने आपके आंखों के लुक को हाइलाइट करेंगी.

नेल पौलिश

यह एक गलत धारणा है कि डार्क कलर डस्‍की स्‍किन पर सूट नहीं करता. नेल पौलिश के कलर के मामले में बैंगनी, चमकीला ब्रोन्‍ज, फार्रेस्‍ट ग्रीन आदि रंग आपकी स्‍किन टोन से खूब मैच करेगें.

हेयर कलर

हेयर कलर के लिये भी डार्क कलर का ही फंडा प्रयोग कीजिये. बरगंडी, चैरी या गार्नेट आदि आप पर खूब सूट करेगा.

डस्‍की स्‍किन वालों को अपने ब्‍यूटी प्रोडक्‍ट पर बहुत ध्‍यान देना चाहिये, उन्‍हें वही रंग चुनने चाहिये जो उनकी स्‍किन टोन से मैच खाते हों. यदि आपको सही शेड्स और सही ब्रश इस्‍तमाल करना आ गया तो, आप अपनी सुंदरता को निखार सकती हैं. तो अगर आपकी भी स्‍किन टोन डस्‍की है तो, आप भी ऊपर दिए गए मेकअप टिप्स अपनाकर सुंदर, क्‍यूट, सिंपल और आर्कषक दिख सकती हैं.

ज्योतिषी के जाल में मौत : रचना के साथ आखिर ऐसा क्या हुआ

खबर मिलते ही मंडावर थानाप्रभारी मुरलीधर नागर ने जिप्सी का रुख बाघेर घाटी की तरफ मोड़ दिया. उस वक्त मंगलवार 30 अक्तूबर, 2018 की रात के ढाई बजे थे. नागर उस समय रात्रि गश्त पर थे. जब वह मेगा हाइवे से गुजर रहे थे, उन्हें हेडकांस्टेबल सुरेश कुमार के जरिए सूचना मिली थी कि चूनाभाटी के पास किसी महिला का शव पड़ा हुआ है.

चूनाभाटी बाघेर घाटी की तलहटी वाला तकरीबन वीरान इलाका था. उन्हें चूनाभाटी पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा. जिप्सी की हैडलाइट में ही उन्हें सड़क किनारे पड़ा हुआ महिला का शव दिखाई दे गया. शव पूरी तरह खून से सना हुआ था.

वीराने में पड़े उस शव का नागर ने बड़ी बारीकी से निरीक्षण किया. महिला 35-40 की उम्र की थी. लगता था कि उस का गला किसी धारदार चाकू से रेता गया था. पेट और सीने पर भी ताबड़तोड़ वार किए गए थे. शव से अभी भी खून रिस रहा था. लग रहा था कि उस की हत्या को ज्यादा समय नहीं हुआ था. वहां पास की झाडि़यों में खून से सना चाकू भी पड़ा था.

थानाप्रभारी मुरलीधर नागर ने करीब की बस्ती के लोगों को रात में ही जगा कर शव की शिनाख्त कराने की कोशिश की लेकिन इस काररवाई का कोई नतीजा नहीं निकला. थानाप्रभारी ने गश्ती दल के सिपाहियों को आसपास के इलाके में देखने को कहा, तो बाघेर घाटी में ही करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर एक लाल रंग की कार दुर्घटनाग्रस्त हालत में पाई गई.

सिपाहियों की सूचना पर थानाप्रभारी नागर कार के पास गए. उन्होंने कार की तलाशी ली तो उस में एक महिला का आधार कार्ड मिला. आधार कार्ड सूरत के शगुन विला अपार्टमेंट, वीआईपी रोड निवासी 38 वर्षीय रचना जयराज मोदी का था.

आधार कार्ड बना शिनाख्त का माध्यम

कार की ड्राइविंग सीट और उस के बराबर वाली सीट इस तरह उखड़ी हुई थी, जैसे वहां कुश्ती लड़ी गई हो. सीटों पर बिखरा हुआ खून इस बात की तस्दीक कर रहा था कि जिस महिला की लाश चूनाभाटी में मिली है, उस का इस कार से जरूर कोई संबंध होगा.

सुबह होने पर उन्होंने मौके पर की जाने वाली जरूरी काररवाई की. फिर शव को पोस्टमार्टम के लिए झालावाड़ के एसआरजी अस्पताल भिजवा दिया. उन्होंने लाश मिलने की जानकारी एसपी आनंद शर्मा को भी दे दी. साथ ही कार में मिले आधार कार्ड पर लिखे फोन नंबर पर फोन किया तो गीता मोदी से बात हुई. बातचीत में गीता मोदी ने बताया कि रचना मोदी उन की बेटी है और वह कल सुबह कानपुर जाने के लिए कार से निकली थी.

यह जानकारी मिलने पर गीता मोदी घबरा गईं कि फोन पुलिस ने किया है. नागर साहब ने गीता मोदी को झालावाड़ पहुंचने को कहा. अगले दिन वह अपने भाई मिलन मोदी और भाभी रेशमा मोदी को ले कर झालावाड़ के एसआरजी अस्पताल पहुंच गईं. पुलिस ने लाश को मोर्चरी में रखवा दिया था.

पुलिस ने उन लोगों को लाश दिखाई तो वे फफक कर रोने लगे. इस के बाद पुलिस ने मृतका की मां गीता मोदी से पूछताछ की तो जानकारी मिली कि सूरत के अलघाण इलाके में रहने वाली रचना मोदी का 4 साल पहले गुजरात के ही रांदेर निवासी अरुण दलाल से ब्याह हुआ था.

अरुण पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट था. रचना का दांपत्य जीवन करीब 2 साल ही ठीकठाक रह पाया, उस के बाद पतिपत्नी के बीच खटपट होने लगी. रिश्तों में खटास बढ़ गई तो रचना पति का घर छोड़ कर सूरत में अपने मायके जा कर रहने लगी. इस बीच वह एक बेटी की मां भी बन चुकी थी.

करीब 2 साल पहले दोनों का तलाक हो गया था. तलाक के बाद अरुण ने दूसरा विवाह कर लिया था. अब तक उन की बेटी तरुणा 3 साल की हो चुकी थी. अरुण ने तरुणा को रचना को नहीं सौंपा तो रचना ने भी इस के लिए जोरजबरदस्ती नहीं की थी.

रचना लंबे समय से शेयर मार्केट का काम कर रही थी. उस ने सूरत के मजूरा गेट इलाके में अपना औफिस बना रखा था, लेकिन नियमित रूप से औफिस जाने के बजाय वह हफ्ते- 10 दिन ही औफिस जाती थी. वह भी तब जब किसी कंपनी के चैक के आने की खबर हो अथवा किसी कंपनी को चैक भिजवाना हो. अलबत्ता ज्यादातर अपना कारोबारी काम घर पर ही करती थी.

रचना के पिता कनाडा में जौब करते थे, इसलिए उस की मां गीता मोदी भी कनाडा में ही अपने पति के साथ रहती थीं. रचना सूरत में अपने मामा मिलन मोदी के साथ रह कर अपना कारोबार करती थी. इन दिनों रचना की मां गीता मोदी सूरत आई हुई थीं. इस प्रकरण में गीता मोदी ने सूरत निवासी ज्योतिष गुरु कृष्णकांत रावल उर्फ कन्नू महाराज के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवा दी.

रिपोर्ट दर्ज कर के पुलिस ने केस की जांच शुरू कर दी. एसपी आनंद शर्मा ने इस मामले का खुलासा करने के लिए एएसपी आशाराम चौधरी और सीओ खानपुर के निर्देशन में एक जांच दल का गठन कर दिया. इस टीम में थानाप्रभारी मुरलीधर नागर, हैडकांस्टेबल सुरेश कुमार, कांस्टेबल चंद्रेश, जितेंद्र कुमार आदि को शामिल किया गया.

मां परेशान थीं फोन न मिलने पर

थानाप्रभारी नागर ने रचना की मां गीता मोदी से पूछताछ की तो उन्होंने बताया, ‘‘करीब एक हफ्ते पहले ही मैं कनाडा से आई थी. मुझे पता था कि रचना शेयर ट्रेडिंग करती है. इस सिलसिले में उस का अकसर बाहर आनाजाना होता था. 29 अक्तूबर, 2018 की सुबह 10 बजे के लगभग वह यह कह कर घर से निकली थी कि उसे दर्शन के लिए कानपुर के मकनपुर मदारशाह बाबा की दरगाह पर जाना है. तब मैं ने उस के 2 बैग अपार्टमेंट के नीचे खड़ी कार में जा कर रखे थे और उस को बेस्ट औफ जर्नी कहते हुए विदा किया था.

‘‘रचना कानपुर पहुंची या नहीं, यह जानने के लिए मैं ने रात करीब 8 बजे उस के मोबाइल पर 2 बार फोन भी लगाया, लेकिन हर बार नौट रीचेबल आता रहा. आशंकाएं घुमड़ने लगीं तो रात पौने 10 बजे मैं ने फिर उसे काल लगाई. उस ने काल रिसीव कर के इतना ही कहा कि वह अभी कार ड्राइव कर रही है. थोड़ी देर बाद बात करेगी.’’

रचना ने यह भी बताया था कि ज्योतिष गुरु कृष्णकांत रावल उर्फ कन्नूभाई भी उस के साथ हैं, इसलिए फिक्र की कोई बात नहीं है. इस के बाद लाख कोशिशों के बावजूद उस का फोन नहीं मिला.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में कई बातें चौंकाने वाली थीं. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रचना के पैर और शरीर के अन्य हिस्सों पर आए जख्मों का जिक्र भी किया गया था. इस से इस बात का भी पता लग रहा था कि मृतका ने हमलावर से संघर्ष कर के अपने आप को बचाने के लिए हरसंभव कोशिश की थी.

रचना की मां ने पुलिस अधिकारियों को यह भी बताया कि लाश के पास से जो चाकू बरामद हुआ था, वह रचना का था और वह उस चाकू को हमेशा अपनी ड्राइविंग सीट के नीचे छिपा कर रखती थी.

यह रहस्योद्घाटन पुलिस के लिए हैरान कर देने वाला था. क्या रचना को जान का खतरा था, जो वह अपनी सुरक्षा का इंतजाम कर के चलती थी?’ इस के जवाब में गीता मोदी ने सिर्फ इतना ही कहा कि शायद ऐसी कोई बात हो. लेकिन रचना ने घर में कभी भी ऐसा कोई जिक्र नहीं किया.

चौंकाने वाली बात यह थी कि हमलावर को कैसे पता था कि रचना ऐसा कोई चाकू अपने पास रखती है. और तो और उसे चाकू रखने की जगह की भी जानकारी थी. यह जानकारी तो उस के किसी करीबी को हो सकती थी. इस के अलावा पुलिस के गले यह बात भी नहीं उतर रही थी कि जब रचना के साथ ज्योतिष गुरु कन्नुभाई था तो उस की मौजूदगी में अज्ञात हमलावर कैसे रचना पर वार करने में कामयाब हो गया?

शुरुआती पूछताछ में मृतका के मामा मिलन मोदी ने यह कह कर थानाप्रभारी मुरलीधर नागर को चौंकाया कि करीब 20 दिन पहले उन के पास कन्नूभाई रावल नाम के शख्स का फोन आया था. रावल अपने आप को ज्योतिषी बता रहा था और मुझ से रचना के पिता का नंबर मांग रहा था. उस का कहना था कि कुछ दिनों से रचना परेशान सी लग रही है.

कन्नूभाई आया शक के दायरे में

मिलन मोदी का कहना था कि जब मैं ने उस से पूछा कि आप मुझे बताइए रचना को क्या परेशानी है? लेकिन उस ने कोई जवाब देने के बजाय फोन ही डिसकनेक्ट कर दिया. मैं ने जब इस बारे में रचना से पूछा तो उस ने इस बात से ही इनकार कर दिया कि वह ऐसे किसी ज्योतिषी को जानती है. उलटा उस ने ही मुझ से सवाल किया कि मामा, मैं अपनी परेशानी आप को बताऊंगी या किसी ज्योतिषी को.

थानाप्रभारी ने अब तक की तहकीकात का ब्यौरा उच्चाधिकारियों को दे दिया. इस पर एसपी आनंद शर्मा ने थानाप्रभारी से कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या का वक्त रात के 10 और साढ़े 10 बजे के बीच का बताया गया है.

रचना और उस की मां गीता मोदी के बीच आखिरी बातचीत 9 बज कर 40 मिनट पर हुई थी और उस समय रचना के साथ ज्योतिषी कन्नूभाई भी था. जबकि आप ने लाश ढाई बजे बरामद की थी. यानी वारदात के करीब सवा 4 घंटे बाद. अब कन्नूभाई गायब है और रचना की मां ने भी कन्नूभाई के खिलाफ ही रिपोर्ट दर्ज करवाई है. लिहाजा जल्दी से जल्दी कन्नूभाई को गिरफ्तार करने की कोशिश करो. हर सवाल का जवाब उसी से मिलेगा.

एसपी के निर्देश पर पुलिस टीम ने अगले दिन पहली नवंबर को बाघेर घाटी स्थित अमझार माताजी के मंदिर के पास से ज्योतिष गुरु कृष्णकांत के. रावल उर्फ कन्नूभाई को गिरफ्तार कर लिया. कन्नूभाई ने शुरुआती नानुकुर के बाद अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

आरोपी कन्नूभाई ने पूछताछ के दौरान जो खुलासा किया, उस के मुताबिक रचना से उस की जानपहचान पिछले 5 साल से थी. वह उस के घर भी आताजाता था.

52 वर्षीय कन्नूभाई सूरत के महिधरपुरा जिला स्थित फलिया हरिपुरा गांव का रहने वाला था. सूरत में वह ज्योतिष गुरु के रूप में चर्चित था.

तलाकशुदा रचना नितिन नामक युवक को एकतरफा चाहती थी. जबकि नितिन उस से कतराने की कोशिश में रहता था. रचना का ज्योतिषी के डेरे पर आनेजाने का मकसद था कि वह कोई ऐसी जुगत करे ताकि नितिन उस पर लट्टू हो जाएं.

कन्नूभाई उसे कई बार कानपुर स्थित मकनपुर मदारशाह बाबा की दरगाह पर भी ले गया था. उस का कहना था कि बाबा के दर्शन से उस की मुराद पूरी हो जाएगी. इस के लिए कन्नूभाई रचना से अच्छीखासी रकम भी झटक चुका था, लेकिन प्रेमी से मिलन तो दूर उसे रचना की तरफ देखना भी कबूल नहीं था.

पिछले कई दिनों से रचना महज इसीलिए तनाव में थी और बराबर कन्नूभाई पर दबाव बनाए हुए थी कि वह किसी भी तरह उस के प्रेमी से मिलवाने में सहयोग करे. कन्नूभाई को रचना के इस दबाव से कोई परेशानी नहीं थी. अलबत्ता परेशानी उस की धमकी को

ले कर थी कि अगर उस ने प्रेमी से नहीं मिलवाया तो वह लोगों के बीच उस की पोल खोल देगी कि वह कोई ज्योतिष नहीं जानता. इस से लोगों में उस के प्रति गलत मैसेज जाएगा.

कन्नूभाई का कहना था कि उस ने 20 दिन पहले रचना के मामा मिलन मोदी से कनाडा में रहने वाले रचना के पिता का मोबाइल नंबर मांगा था, ताकि उन की बेटी की खुराफात की बात बता सके. लेकिन मामा फोन नंबर बताने के बजाए उलटा सवालजवाब पर उतर आया था. उधर रचना का दबाव था कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था.

रचना की धमकियों ने कन्नूभाई को किया परेशान

अंतत: रचना की धमकियों से छुटकारा पाने के लिए कन्नूभाई ने यह कह कर मकनपुर के मदारशाह बाबा की दरगाह पर चलने को तैयार कर लिया कि वहां जा कर बाबा से खास अरदास करेंगे ताकि काम बन जाए.

असल में कन्नूभाई को मदारशाह बाबा की दरगाह जाने के बहाने रचना का काम तमाम करना था. दरगाह जाने के लिए रचना 30 अक्तूबर को अपने घर से सुबह 10 बजे अपनी कार से निकली.

रास्ते में उस ने कन्नूभाई को भी कार की अगली सीट पर बैठा लिया. लेकिन जब कन्नूभाई दरगाह जाने के बजाए इधरउधर भटकाने लगा तो रचना को उस की नीयत में खोट नजर आया.

कन्नूभाई चूंकि योजनाबद्ध तरीके से रचना को खत्म करना चाहता था, लिहाजा उस ने ड्राइविंग सीट के नीचे छिपा कर रखा रचना का चाकू पहले ही अपने कब्जे में ले लिया था. कभी रचना के मुंह से निकल गया होगा कि वह आत्मरक्षा के लिए हमेशा अपनी सीट के नीचे एक चाकू छिपा कर रखती है.

कार जब मेगा हाइवे पर पहुंची तो कन्नूभाई ने रचना से मंडावर घाटी की तरफ चलने को कहा. यही बात रचना को खटक गई. रचना ने उस से पूछा भी कि हमें जाना तो दरगाह पर है फिर मंडावर घाटी चलने का क्या मतलब? कन्नूभाई इस बात का मुनासिब जवाब नहीं दे सका तो रचना उस पर भड़क गई.

लेकिन कन्नूभाई तो पहले ही योजना बनाए बैठा था, उस ने रचना की गरदन पकड़ कर डैशबोर्ड से भिड़ा दी. रचना ने कन्नूभाई की गिरफ्त से निकलने की कोशिश की तो कन्नूभाई ने उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार करने शुरू कर दिए. इस के बावजूद रचना ने अपने बचाव के लिए काफी संघर्ष किया.

गाड़ी की स्टीयरिंग से रचना की पकड़ पहले ही छूट चुकी थी, नतीजतन गाड़ी पूरी रफ्तार से भीमसागर की दीवार से टकरा गई. धमाके के साथ गाड़ी की ड्राइविंग सीट से लगी सीट वाला दरवाजा खुला और कन्नूभाई बाहर की तरफ गिर गया. तब तक रचना दम तोड़ चुकी थी.

यह इत्तफाक ही था कि कार ऐसी जगह दुर्घटनाग्रस्त हुई थी, जहां दूरदूर तक कोई नहीं था. कुछ देर बाद कन्नूभाई के होशोहवास ठिकाने आए तो रचना की हालत देख कर उस के हाथपांव फूल गए. उस ने लहूलुहान रचना को हिलाडुला कर देखा तो समझ गया कि वह मर चुकी है.

अब उसे पहला खयाल लाश ठिकाने लगाने का आया. लाश को कन्नूभाई किसी वीरान इलाके में फेंकना चाहता था ताकि जल्दी किसी की निगाहों में न आए. लेकिन पुलिस का गश्ती दल इत्तफाक से उधर से गुजर और सब से पहले इस बात की पुलिस को ही खबर लगी.

कन्नूभाई के होश इस कदर फाख्ता हो चुके थे कि ज्यादा दूर जाने के बजाय उस ने अमझार माता के मंदिर को ही छिपने का सुरक्षित ठिकाना समझ लिया. जहां से पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पार्टी के लिए ऐसे होंगी तैयार तो ठहर जाएंगी सबकी निगाहे

किसी भी नाईट पार्टी की भीड़ में हर व्यक्ति खास लगना चाहता है और हो भी क्यों न? यही तो मौका होता है,जब आप रोजमर्रा की जिंदगी से हटकर कुछ नया करने की कोशिश करते हैं. यहां हम आपके व्यक्तित्व की खूबसूरती की बात कर रहे हैं, जो आपके परिधान, गहने, हेयर स्टाइल, मेकअप आदि पर निर्भर होता है.

इस दिन व्यक्ति एक नए रूप में सबके सामने जाने की कोशिश करता है. इस बारें में ‘द शहनाज़ हुसैन ग्रुप इंडिया’ की फाउंडर शहनाज़ हुसैन बताती हैं कि नये लुक से आपकी इमेज भी सबके सामने बदल जाती है और आपका कौन्फिडेंस लेवल भी बढ़ जाता है. महिलाओं को पार्टी में नए लुक के लिए कुछ बातों पर ध्यान रखना आवश्यक है.

हेयर स्टाइल बदलें,  इसके लिए फैंसी हेयर एक्सेसरीज, रिबंस, फ्लावर्स, आदि से बालों को सजाएं या हर्बल हेयर मस्कारा से कलर स्ट्रिक्स बनाएं. बालों को शैम्पू और कंडीशनर करने के बाद खुला छोड़ दें आदि सभी प्रकार के बदलाव आपके लुक को बदल सकती हैं

लंबे बाल हमेशा ही फैशन में रहता है, इसके अलावा कर्ल्स और नैचुरल वेव्स सौफ्ट लुक देती है, पोनी टेल भी अच्छा हेयर स्टाइल है, साथ ही कैजुअल नौट और जुड़ा भी ग्लैमरस लुक दे सकती है.

मेकअप में सबसे जरुरी होता है सही फाउंडेशन का चुनाव करना, जो आपके स्किन टोन के हिसाब से होने की जरुरत होती है, गोल्डन टच फाउंडेशन के साथ गोल्डन पाउडर भी प्रयोग किया जा सकता है. रात के मेकअप के लिए यह सुंदर दिखता है, इसके अलावा गोल्ड डस्ट का भी प्रयोग एक्स्ट्रा चमक के लिए किया जा सकता है.

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फाउंडेशन को सही तरीके से चेहरे, माथे ,नाक और गालों पर लगाने के बाद, भींगे स्पांज से अच्छी तरह उपर की दिशा में स्ट्रोक के साथ मिला लें, साथ ही आंखों के पलकों पर भी लगायें, गर्दन और कान पर भी उसी शेड को स्प्रेड करें, ताकि मेकअप में एक रूपता बनी रहे.

रात के मेकअप ब्लशर का प्रयोग अवश्य करें, थोडा समय दें ताकि चेहरे पर मेकअप ग्लो करें, गर्मी के मौसम में पाउडर ब्लशर अधिक अच्छा रहता है, इसे उंगलियों की पोरों से चिक बोन पर डौट लगाकर, ब्रश से अच्छे से ब्लेंड करें.

लिप लाइनर का प्रयोग कभी न करें,ब्रश से लिपस्टिक लगायें, गुलाबी रंग के कोई भी लिपस्टिक के शेड गर्मी में अच्छे दिखते है,लाल रंग का ट्रेंड हमेशा चलता रहता है. लेकिन रात के पार्टी में गुलाबी के अलावा, कोरल और डार्क पिंक रंग भी लगा सकती हैं.

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नाईट आई मेकअप के लिए शाइन और ग्लौस का प्रयोग करें, ब्राउन, ब्रोंज और गोल्ड आई शेडो, आखों पर लगाने से सुन्दरता और बढ़ जाती है. स्मोकी लुक को देने के लिए स्पंज से थोडा सा स्मज कर दें,  आई लाइनर ब्लैक और ब्राउन ही इस मौसम के लिए उपयुक्त होता है. इसके अलावा सिल्वर या शिमरिंग ब्रोंज और कौपर रंग के आई शेडो भी लगाया जा सकता है, इसके बाद मस्कारा दो या तीन बार पलकों पर लगायें, लेकिन हर बार मस्कारा लगाने के थोड़ी देर बाद पलकों पर ब्रश अवश्य फेर लें.

इसके आगे शहनाज़ कहती हैं कि आज पुरुष भी पार्टी में अच्छा दिखने के लिए प्रयास करते हैं और इसके लिए वे तरह तरह के लुक को अंजाम देते रहते हैं. इसे सही रूप देने के लिए कुछ बातों पर पुरुषों को अवश्य ध्यान देना चाहिए, जो निम्न है:

सबसे पहले अपने बालों पर ध्यान दें,  जो अच्छी तरह पार्टी से दो-तीन दिन पहले ही कट कर लेनी चाहिए, इसके बाद शैम्पू और कंडीशनर से अच्छी तरह साफ़ कर लें, इसे और अधिक चमकदार दिखने के लिए हेयर सिरम का प्रयोग कर सकते हैं, इसके अलावा हेयर क्रीम, जेल आदि से भी इसकी चमक को बढ़ाया जा सकता है.

आजकल दाढ़ी रखने का स्टाइल है, चेक कर लें कि इसे ग्रूमिंग या ट्रिमिंग की जरुरत है या नहीं, माइल्ड शैम्पू लेकर दाढ़ी को धो लें, अगर दाढ़ी छोटी है तो फेसवाश से भी इसे धो सकते हैं. अब जेल बेस्ड प्रोडक्ट को लेकर दाढ़ी पर लगा लें, ताकि उसकी चमक बनी रहे, अगर आप क्लीन शेव करते हो तो पार्टी से तुरंत पहले एक शेव अवश्य कर लें, इससे आपका लुक फ्रेश और क्लीन रहेगा. पुरुष भी अपने स्किन टोन के हिसाब से थोड़ी मैट फाउंडेशन लगा सकते है, अगर चेहरे पर किसी प्रकार के दाग धब्बे है तो फाइन ब्रश से उस पर अलग से लगाकर कौम्पैक्ट पाउडर लगा सकते हैं, इसे लगाते समय ध्यान रखे कि दाढ़ी और मुछों पर न लगे.

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आंखों के अच्छी लुक के लिए आई ब्रोंज को सही शेप ट्वीजर से दें, डार्क ग्रे या डार्क ब्राउन आई शेडो आंखों के पोरों पर लगाया जा सकता है, इससे नैचुरल लुक मिलता है. लिप को स्मूदर बनाने के लिए लिपबाम का प्रयोग करना अच्छा होता है,परफ्यूम की जगह कोलोन का प्रयोग करें, क्योंकि कोलोन की खुश्बू माइल्ड होने के साथ-साथ फ्रेशनेस का एहसास कराती है.

इसके अलावा मुस्कान को बिखेरना कभी न भूलें, जो आपके व्यक्तित्व में सबसे अधिक निखार लाती है.

साल भर लीजिए गन्ने के रस का स्वाद

गन्ने का रस आमतौर पर गन्ने के सीजन में ही मिलता था. सड़कों पर ठेला गाडि़यों पर इस को बेचने का काम होता है. गन्ने का रस निकालने वाली मशीनें कई तरह की होती हैं. इन में कुछ को बिजली की मोटर से चलाया जाता है, तो कुछ को हाथ से भी चलाया जाता है. गन्ने को ठीक तरह से धोने के बाद मशीन में डाला जाता है, जिस से उस का रस निकलता है. गन्ने के रस को और स्वादिष्ठ बनाने के लिए उस में नीबू, पुदीना और काला नमक मिलाया जाता है. अब सड़कों की जगह पर जूस की बड़ीबड़ी दुकानों पर भी गन्ने का रस मिलने लगा है. जूस की बड़ी दुकानों में गन्ने को छील कर उस का जूस निकाला जाता है. अब यह साल भर मिलने लगा है. सड़कों पर जो गन्ने का रस 5 से 10 रुपए प्रति गिलास मिलता है, बड़ी जूस की दुकानों पर वह 40 रुपए प्रति गिलास बिकता है.

कई गन्ना किसान अब अपने खेत में लंबे समय तक गन्ना रखते हैं ताकि बेमौसम गन्ना बेच कर मुनाफा कमा सकें. रसदार प्रजाति के गन्ने की मांग जूस के लिए सब से ज्यादा होती है. गन्ने का जूस बेचने के लिए केवल जूस निकालने की मशीन, गन्ना और एक छोटी अच्छी जगह की जरूरत होती है. लखनऊ में ‘गन्नेवाला’ नाम से जूस की एक दुकान है, जिस में साल भर गन्ने और दूसरी किस्म के जूस मिलते हैं. दरअसल, समय के साथसाथ लोगों को गन्ने के जूस के फायदे पता चलने लगे हैं, जिस की वजह से साल भर गन्ने के जूस की मांग रहती है. केवल एक जगह पर ही नहीं, शहर के दूसरे हिस्सों में भी बेमौसम गन्ने के जूस की खपत होती है. ऐसे में गन्ने के जूस का कारोबार बढ़ने लगा है, जिस से गन्ना किसानों को ज्यादा फायदा होने की संभावना बढ़ गई है. अब गन्ने की खेती केवल चीनी, खांडसारी और गुड़ पर ही निर्भर नहीं रह गई है. गन्ने का जूस नई संभावना के रूप में देखा जा रहा है. जानकार लोगों का कहना है कि गन्ने का जूस जिस तरह से फायदेमंद होता है, उस से इस का प्रचलन दिनोंदिन बढ़ता जाएगा. यह एक अच्छे कारोबार के रूप में उभरेगा. गन्ने के रस को बेचने में दोगुना मुनाफा होता है. ऐसे में इस को बेचने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है.

थकान से भरे दिन में 1 गिलास गन्ने का रस मिल जाए तो आप को स्वाद भरी ताजगी मिल जाती है. गन्ने का रस बहुत ही सेहतमंद और गुणकारी पेय है. इस में कैल्शियम, पोटैशियम, आयरन, मैग्नीशियम और फास्फोरस जैसे जरूरी पोषक तत्त्व पाए जाते हैं. इन से हड्डियां मजबूत बनती हैं और दांतों की समस्या भी कम होती है. गन्ने के रस के ये पोषक तत्त्व शरीर में खून के बहाव को भी सही रखते हैं. वहीं इस रस में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों से लड़ने की ताकत भी होती है.

गन्ने का रस पीने के फायदे

गन्ने के रस में मौजूद कैल्शियम, पोटैशियम, आयरन और मैग्नीशियम की मात्रा इस के स्वाद को क्षारीय मतलब खारा करती है. इस रस में मौजूद ये तत्त्व कैंसर से बचाते हैं. गन्ने का रस कई तरह के कैंसर से लड़ने में मददगार है. प्रोस्टेट और स्तन कैंसर से लड़ने में भी इसे कारगर माना जाता है.

हाजमा ठीक रखता है

गन्ने के रस में पोटैशियम की अधिक मात्रा होने की वजह से यह शरीर के पाचनतंत्र के लिए बहुत फायदेमंद है. यह रस हाजमा सही रखने के साथसाथ पेट में संक्रमण होने से भी बचाता है. गन्ने का रस कब्ज की समस्या को भी दूर करता है.

पहले वनडे के टैस्ट में भारत फेल

ऑस्ट्रेलिया का सिडनी बड़ा जल्दी रंग बदल गया. चौथे टैस्ट मैच में खराब मौसम ने भारत को जीतने नहीं दिया था और अब पहले वनडे मैच में इसी मौसम ने मेजबानों का खूब साथ दिया.

जब भारत टॉस हारा था तब विराट कोहली ने दबी जबान में कहा था कि वे भी इस सपाट पिच पर पहले बल्लेबाजी करते पर ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि बाद में फ्लड लाइट में गेंद के स्विंग होने के पूरेपूरे आसार थे.

लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने भी शुरुआत में कोई झंडे नहीं गाड़े थे. कप्तान आरोन फिंच की खराब फॉर्म बरकरार रही और वे 6 के निजी स्कोर पर भुवनेश्वर कुमार का शिकार हुए. इस के बाद उस्मान ख्वाजा और एलेक्स करे ने संभल कर खेलना शुरू किया पर जल्दी ही एलेक्स करे 24 रन बना कर आउट हो गए. कुलदीप यादव ने यह विकेट भारत को दिलाई थी.

तब लग रहा था कि ऑस्ट्रेलिया इस पिच का उतना फायदा नहीं उठा पाएगी क्योंकि तब उस्मान ख्वाजा बहुत धीमा खेल रहे थे. पर उन का शॉन मार्श ने खूब साथ दिया और दोनों ने धीरेधीरे ही सही अपनेअपने 50 रन पूरे किए.

जब ऑस्ट्रेलिया का उस्मान ख्वाजा के रूप में तीसरा विकेट गिरा तो उस ने 28.2 ओवर में 133 रन बना लिए थे. जल्दी ही शॉन मार्श भी पवेलियन लौट गए. तब तक लग रहा था कि ऑस्ट्रेलिया ज्यादा लंबा स्कोर नहीं बना पाएगी. पर पीटर हैंड्सकॉम्ब और मार्कस स्टोइनिस के इरादे ही कुछ और थे. उन्होंने मैच का रुख ही पलट दिया. आखिरी के साढ़े 12 ओवर में उन्होंने 102 ठोंक डाले. इस में ग्लेन मैक्सवेल के नाबाद 11 रन भी शामिल थे. पीटर हैंड्सकॉम्ब ने 73 रन बनाए जबकि मार्कस स्टोइनिस ने नाबाद 47 रन जोड़े. इस तरह ऑस्ट्रेलिया ने 5 विकेट खो कर बटोरे कुल 288 रन.

भारत की ओर से भुवनेश्वर कुमार और कुलदीप यादव को 2-2 विकेट मिले, जबकि एक विकेट रविंद्र जडेजा के खाते में गया.

बाद में विराट कोहली के डर और फ्लड लाइट ने अपना कमाल दिखाया. अभी भारत के 4 रन भी नहीं बने थे कि महेंद्र सिंह धौनी क्रीज पर आ चुके थे. इस से पहले शिखर धवन, विराट कोहली और अंबाती रायडू बतौर बल्लेबाज मैदान पर आए तो थे पर बुरी तरह नाकाम हो कर पवेलियन जा चुके थे. अब सारा दारोमदार रोहित शर्मा और एमएस धौनी पर था कि वे मैच को किस हद तक लड़ने लायक बना सकते हैं.

इस के बाद रोहित और धौनी ने संभलते हुए तकरीबन 28 ओवर तक बल्लेबाजी की और अहम 137 रन जोड़े. जब धौनी 96 गेंदों पर 51 रन बना कर खेल रहे थे तब जैसन बेहरनड्रॉफ ने उन्हें पगबाधा आउट कर दिया. याद रहे कि धौनी ने 15 इंटरनैशनल पारियों के बाद यह फिफ्टी बनाई थी जो उन के कैरियर की दूसरी सब से धीमी फिफ्टी थी.

एमएस धौनी के बाद दिनेश कार्तिक रोहित शर्मा का साथ निभाने आए, लेकिन वे भी 21 गेंद खेल कर 12 के निजी स्कोर पर जे रिचर्डसन की गेंद पर बोल्ड हो गए.

दिनेश कार्तिक के बाद रविंद्र जडेजा आए लेकिन वे भी 8 रन बना कर आउट हो गए. इस बीच रोहित शर्मा ने अपने कैरियर का 22वां शतक जड़ा. उन्होंने अपनी पारी में 129 गेंदों का सामना किया जिस में 10 चौके और 6 छक्के जड़े. पर वे भी तेजी से रन बनाने के चक्कर में 133 रन पर आउट हो गए. बाद में भुवनेश्वर कुमार ने नाबाद 29 रन बनाए पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी और भारत को 34 रन से शिकस्त झेलनी पड़ी.

इस जीत के साथ ऑस्ट्रेलियाई टीम ने 3 मैचों की इस वनडे सीरीज में 1-0 की बढ़त बना ली है. अगला मैच 15 जनवरी को एडिलेड में खेला जाएगा.

मान अपमान को भूल आपस में मिले ‘बुआ और बबुआ’

जून 1995 को लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड में मिले अपमान को भूल कर बसपा नेता मायावती ने समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो अखिलेश यादव ने अपने समर्थकों को कड़ा संदेश देते कहा कि मायावती का अपमान मेरा अपमान है. मायावती ने मुलायम सिह यादव के भाई शिवपाल यादव को भाजपा का एजेंट करार दिया. पूरे प्रकरण में मायावती ने मुलायम सिंह यादव का नाम नहीं लिया.

दोस्ती की गर्मजोशी दोनों ही दलों के बीच कब तक कायम रहेगी, यह देखने वाली बात है. अखिलेश यादव को इस बात का अंदेशा है कि सामाजिक रूप से पिछडे शायद ही दलितों के साथ बेहतर तालमेल बना सके, इसलिये उन्होंने अपने समर्थक को संदेश देते कहा कि ‘मायावती का अपमान मेरा अपमान है’.

1993 में सपा-बसपा की दोस्ती की नींव मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने रखी थी. अखिलेश यादव ने उस समय राजनीति में अपने कदम भी नहीं रखे थे. मुलायम और कांशीराम की ही तरह मायावती और अखिलेश यादव भी मिले. लखनऊ के पांच सितारा होटल ताज महल के क्रिस्टल हौल में आयोजित इस प्रेस कांफ्रेंस में जयभीम जय समाजवाद का नारा लिखा हुआ था. मायावती और अखिलेश की इस साझा प्रेस कांफ्रेंस को लेकर राजनीतिक और मीडिया जगत में जबरदस्त आकर्षण था. दोहपर 12 बजे से शुरू हुई इस कांफ्रेंस में 10 बजे से ही लोग पंहुचने लगे थे.

जब अखिलेश यादव ने मायावती का फूलों का गुलदस्ता देकर स्वागत किया तो 23 साल की दुश्मनी दोस्ती में बदलती नजर आई. मायावती और अखिलेश ने लोकसभा सीटों के बंटवारे का गणित समझाते कहा कि बराबर की हैसियत रखते हुये दोनों ही दल 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे.

मायावती ने अपने भाषण को भाजपा पर केन्द्रित रखा और कहा ‘गुरू चेला यानि मोदी और शाह की नींद उडाने वाली यह कांफ्रेंस है. आज उत्तर प्रदेश सहित देश की सवा सौ करोड जनता परेशान है. साथ चुनाव लड़ने का फैसला क्रांति संदेश देने वाला फैसला है. भाजपा ने बेईमानी से सरकार बनाई है. जन विरोधी पार्टी को रोकने के लिय हम एक हुये है. नोटबंदी और जीएसटी का फैसला बिना सोचे समझे किया गया. देश में अघोषित इमरजेंसी लगी है. राफेल घोटाले में भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ेगी.’

भले ही कांग्रेस के 2 नेताओं के चुनाव लड़ने के लिये सपा-बसपा गठबंधन ने लोकसभा की 2 सीटों पर अपने प्रत्याशी ना उतारने का संकेत दिया हो पर कांग्रेस पर हमले से भी मायावती पीछे नहीं हटी. मायावती ने कहा कि, ‘कांग्रेस से गठबंधन से कोई खास फायदा नहीं होने वाला था. कांग्रेस का वोट ट्रांसफर नहीं होता. हमारा वोट ट्रांसफर हो जाता है. इससे कांग्रेस जैसी पार्टी को लाभ हो जाता है पर हमारी पार्टी को लाभ नहीं होता. 1996 में हमने और 2017 में सपा ने कांग्रेस से दोस्ती की पर उसका लाभ नहीं मिला. कांग्रेस ने खुलकर तो भाजपा ने अघोषित इमरजेंसी लगाई. कांग्रेस ने भी बोफोर्स का घोटाला किया था.’

सपा-बसपा का गठबंधन लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव के आगे भी चलेगा. यह बात भी मायावती ने कही. मायावती के बाद अखिलेश यादव ने अपनी बात रखी और कहा कि सपा-बसपा मिलकर भाजपा को भगाने का काम करेंगे. भाजपा की कार्यशैली से भगवान भी दुखी है. भाजपा ने भगवान को भी जाति में बांट दिया. भाजपा धर्म की आड में देश का विनाश कर रही है. अखिलेश यादव की बातचीत में यह साफ हो गया कि धर्म को लेकर सपा-बसपा हिन्दुत्व को लेकर आगे चलेगी. सपा-बसपा के लिये समाजिक रूप से दलित पिछड़ों को एक साथ लाना सबसे बड़ी चुनौती होगी.

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