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नसीरुद्दीन शाह कितना डरे हैं?

देशभक्ति को हिंदूधर्मभक्ति का रूप देने की कोशिश में भाजपा के एक सक्रिय गुट ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि कोई भी जरा सी बात, जो इन के खोखले विचारों की पोल खोलती हो, नहीं कह सकता है, अगर किसी ने कह दी तो गुट वाले बवाल मचा देते हैं. यह हर धर्म की मूल चाल है कि किसी को भी धर्म की खामी निकालने ही न दो. इसी तरह अब देश, हिंदू, आज के शासकों पर कुछ न कहो.

अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के एक बयान कि इस देश में रहने से डर लगता है, पर शोर मच रहा है. नसीरुद्दीन द्वारा कही बात को तोड़मरोड़ कर पेश करने पर.

कोई नसीरुद्दीन को देश छोड़ने की सलाह दे रहा है, कोई उन के लिए पाकिस्तान का टिकट बुक करवा रहा है, कोई उन को गद्दार का सर्टिफिकेट जारी कर रहा है, जैसे कि यह देश सिर्फ इन भगवाभक्तों का ही है.

यह है मूल बयान

नसीरुद्दीन शाह ने जो कहा था वह यह है, ‘‘मुझे फिक्र होती है अपनी औलाद के बारे में सोच कर. क्योंकि उन का मजहब ही नहीं है. मजहबी तालीम मुझे मिली थी. रत्ना को थोड़ी कम मिली थी. हम दोनों ने अपने बच्चों को मजहबी तालीम बिलकुल नहीं दी. मेरा मानना है कि अच्छाई और बुराई का मजहब से कोई लेनादेना नहीं है.

‘‘फिक्र होती है मुझे अपने बच्चों के बारे में, क्योंकि कल को अगर उन को एक भीड़ ने घेर लिया कि तुम हिंदू हो या मुसलमान. उन के पास कोई जवाब ही नहीं होगा. इस बात की फिक्र होती है क्योंकि हालात जल्दी सुधरते तो मुझे नजर नहीं आ रहे. इन बातों से मुझे डर नहीं लगता, गुस्सा आता है. मैं चाहता हूं कि सही सोच वाले इंसान को गुस्सा आना चाहिए, डर नहीं लगना चाहिए.

‘‘हमारा घर है, हमें कौन निकाल सकता है यहां से. यह जहर फैल चुका है और दोबारा इस जिन्न को बोतल में बंद करना बहुत मुश्किल होगा. खुली छूट मिल गई है कानून को अपने हाथों में लेने की. कई इलाकों में हम देख रहे हैं कि एक गाय की मौत को ज्यादा अहमियत दी जाती है एक पुलिस अफसर की मौत के बजाय.’’

समझ नहीं आता कि इस में नसीरुद्दीन शाह ने कौन सी बात गलत कही? और कहां इस में उन्होंने ने कहा कि उन को इस देश में रहने से डर लगता है. और बात कहने का सही वक्त न होना वाली कौन सी बात हो गई?

पूरे बयान में यह कहीं नहीं सुना कि उन्होंने यह कहा हो कि इस देश में डर लगने लगा है. उन्होंने तो अफवाहें उड़ा कर जो मौब लिंचिंग हो रही है, उस पर गुस्सा आने की बात कही है. बच्चों को हिंदू बनाएं या मुलसमान, इस बात पर फिक्र जताई है.

इस में तो नसीरुद्दीन ने उस भीड़ पर चिंता जताई है जो हिंदूमुसलिम की पहचान करती फिर रही है. जो फिक्र नसीरुद्दीन ने जताई है, वह फिक्र या गुस्से का विषय तो हर किसी के लिए है.

भगवाई मीडिया ने भड़काया

अभिनेता नसीरुद्दीन शाह द्वारा कारवां ए मोहब्बत को दिए इंटरव्यू के बाद भाजपा समर्थकों, भगवाइयों और ट्रोलर्स की ट्विटर पर बाढ़ सी आ गई. ठीक वैसे ही जैसे 2014 में आमिर खान द्वारा दिए गए बयान पर लोग उन्हें भारतविरोधी और गद्दार की संज्ञा देने लगे थे.

उत्तर प्रदेश के भगवाई संगठन नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष अमित जानी ने तो अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के बयान की आलोचना करते हुए उन्हें पाकिस्तान का हवाई टिकट भेजने का दावा किया है.

एक न्यूज चैनल ने यह तक कह डाला कि अगर कोई विदेशी कंपनी इस बयान को देखेगी कि भारत का माहौल खराब है, तो वह भारत में निवेश करने से डरेगी.

लिटरेचर फैस्टिवल में हुड़दंग

बयान पर चल रहे विवाद के बीच नसीरुद्दीन शाह को अपनी पत्नी रत्ना पाठक शाह के साथ अजमेर लिटरेचर फैस्टिवल में शामिल होना था. नसीर कार्यक्रम में दोपहर बाद ओपनिंग भाषण देने वाले थे. भाजपा युवा मोर्चा के सदस्य सुबह ही कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गए और उन्होंने वहां विरोधप्रदर्शन व तोड़फोड़ शुरू कर दी. इस से लिटरेचर फैस्टिवल के आयोजक घबरा गए और उन्होंने नसीरुद्दीन शाह के कार्यक्रम को रद्द कर दिया.

इस से पहले नसीरुद्दीन शाह अजमेर के सेंट एंसेलम सीनियर सैकंडरी स्कूल में पहुंचे. दरअसल, इसी स्कूल में नसीरुद्दीन शाह ने बचपन में पढ़ाई की थी. इस दौरान जब पत्रकारों ने उन के बयान पर मचे बवाल पर सवाल किया तो उन्होंने कहा, ‘‘मैं अपने मुल्क, जिस से मैं प्यार करता हूं, जो मेरा घर है,  मैं उस के बारे में बात कर रहा हूं. अपनी फिक्र जाहिर कर रहा हूं. इस में मैं ने कौन सा गुनाह किया?’’

कट्टर भाजपाई व भगवाई सत्ता की आड़ में अपनी विचारधारा थोपने में लगे हैं. इन की करतूतों से तंग आ कर कोई ऐसी बात कह देता है जो इन की पोल खोलती है तो ये उस को खुद ही सजा देने के लिए कानून हाथ में ले लेते हैं. वे कानून, दरअसल, इसलिए हाथ में लेते हैं क्योंकि सत्ता का संरक्षण उन्हें प्राप्त है.

दुकानदारी है रामकथा से वेश्याओं का उद्धार

धर्म के नाम पर पहले लोगों को अपमानित, तिरस्कृत और बहिष्कृत करो, फिर धर्म के ही नाम पर, कीमत ले कर, तरहतरह की दलीलें दे कर गले लगाने का ड्रामा करो. धर्म का पैसा उगाहने और स्वार्थ साधने का यह पुराना फंडा है जिसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने शूद्रों, किन्नरों, बंदरों, भालुओं और रीछों तक पर आजमाया था. और अब मशहूर कथावाचक मोरारी बापू ने अपने आराध्य के पदचिह्नों पर चलते वेश्याओं पर आजमा डाला.

मकसद कहने को भले ही वेश्याओं का उद्धार करना हो लेकिन असल मंशा वेश्याओं से भी दान झटकने और उन्हें धर्म का ग्राहक बनाने की थी क्योंकि उन के पास इफरात से पैसा होता है.

अयोध्या में पिछली 22 से 30 दिसंबर तक संपन्न हुई मोरारी बापू की चर्चित रामकथा की थीम इस बार गणिकाएं थीं, जिन्हें वेश्याएं और सैक्सवर्कर भी कहा जाता है. रामकथा की कथित महिमा वाकई अपरंपार है जिसे सुन कर मानव मात्र तो दूर की बात है, पशुपक्षी, पेड़पौधे और कीड़ेमकोड़े तक तर जाते हैं. मोरारी बापू इस बार वेश्याओं को तारने के लिए इस हद तक उतारु हो आए कि उन के कल्याण के लिए खुद मुंबई के देहव्यापार के लिए मशहूर इलाके कमाठीपुरा जा पहुंचे.

बदनाम इलाके में संत

जब सारी दुनिया अंधेरा कर सोने की तैयारी कर रही होती है तब रात को कमाठीपुरा की जगमगाहट देखने काबिल होती है. वेश्याएं सजधज कर छज्जों और दरवाजों के बाहर खड़ी ग्राहकों को बुला और लुभा रही होती हैं. सस्ते क्रीम, पाउडर और लिपस्टिक से सजीधजी इन वेश्याओं के भीतर कहने को ही एक औरत होती है जिस का काम यानी पेशा पुरुषों को देहसुख देना होता है. देहजीवा कही जाने वाली इन वेश्याओं का समाज में कोई सम्मान न पहले कभी था न आज है और अब अयोध्या में रामकथा सुनने के बाद भी न होगा. ऐसा कहने की कोई ठोस या तार्किक वजह नहीं.

मोरारी बापू 13 दिसंबर की सुबह इस बदनाम इलाके में पहुंचे थे तो वहां खासी हलचल मच गई थी. उन के चरणकमल कमाठीपुरा में पड़ने से पहले ही उन की शिष्यमंडली उस इलाके में प्रचार कर चुकी थी कि भगवान का एक आदमी यहां आने वाला है, गोया कि पिछली रात जो आए थे या पहले जो आते रहे हैं वे शैतान के आदमी थे और भगवान की उन पर चलती नहीं है.

बहरहाल, मोरारी बापू कमाठीपुरा पहुंचे, वहां की वेश्याओं से मिले और उन्हें रामकथा सुनने के लिए अयोध्या आने का आमंत्रण दिया. उन्होंने तुलसीदास का उदाहरण दिया कि उन्होंने एक गणिका वासंती को उस के आग्रह पर रामकथा सुना कर उस का उद्धार किया था. पर वे थोक में वेश्याओं का उद्धार करना चाहते हैं.

वेश्याएं कहीं उद्धारित होने से मना न कर दें, इसलिए मोरारी बापू ने उन के मुंबई से अयोध्या आनेजाने का न केवल किराया दिया, बल्कि अयोध्या में उन के ठहरने व खानेपीने का इंतजाम भी किया.

मौजूदा दौर के इस मशहूर रामकथा वाचक से वेश्याओं ने धरमकरम की कोई बात नहीं की, बल्कि उन्हें हस्ती जान कर वही रोना रोया जिसे वे अकसर समाज कल्याण संस्थाओं, पत्रकारों, शोधार्थियों और नेताओं के सामने रोते रहने की आदी हो गई हैं कि वे बड़ी बदहाली में जी रही हैं. कमाठीपुरा में बुनियादी सहूलियतें नहीं हैं. आएदिन पुलिस वाले तंग करते हैं और उन के बच्चों का कोई सुरक्षित भविष्य नहीं है.

वेश्याओं की इस घोषित दुर्दशा का कोई इलाज मोरारी बापू के पास नहीं था, सिवा इस मूक आश्वासन के कि आओ, अयोध्या में रामकथा सुनो, यह जन्म तो पापों में गया, शायद अगला सुधर जाए. लेकिन मोरारी बापू यह नहीं बता पाए कि वेश्याएं क्यों हैं और हैं भी तो उन्हें नफरत की निगाह से क्यों देखा जाता है.

बदबूदार गलियां

कमाठीपुरा की बदहाली देख कोई भी गैरवेश्यागामी पुरुष द्रवित हो सकता है जहां सुबह तक शराब की दुर्गंध फैली रहती है. वेश्याओं के बच्चे खेलते नजर आते हैं पर उन का वाकई कोई भविष्य नहीं होता. बदबूदार गलियों के इस नर्क के बारे में कई किस्से मशहूर हैं जिन में से एक यह है कि प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता कादर खान ने अपना बचपन यहीं गुजारा था. अपनी बायोपिक में कादर खान ने विस्तार से कमाठीपुरा जैसे इलाकों की जिंदगी का खुलासा किया है.

1983 में प्रदर्शित श्याम बेनेगल कृत वेश्या प्रधान फिल्म ‘मंडी’ में भी बदनाम बस्तियों का सटीक चित्रण है कि कैसे राजाश्रय में रह रही वेश्याओं का इस्तेमाल राजनेता अपने स्वार्थ व पैसों के लिए करते हैं. इस फिल्म की मुख्य पात्र रुक्मणिबाई को शबाना आजमी ने सजीव किया था.

इन सब बातों या कहानियों से वेश्याओं का कोई भला नहीं हुआ. हुआ इतना भर कि लोगों ने उन की जिंदगी को दिलचस्पी से देखा और मान लिया कि इन का कुछ नहीं हो सकता क्योंकि ये भी शूद्रों की तरह अपने पूर्वजन्म के पापों का फल भुगत रही हैं, इसे ही प्रारब्ध कहते हैं.

यही साबित करने मोरारी बापू कमाठीपुरा पहुंचे थे. ऐसा कर उन्होंने कोई जोखिम नहीं उठाया था, बल्कि अपने धर्म के धंधे की ब्रैंडिंग की थी और खुद को कलियुग का तुलसीदास साबित करने की कोशिश की थी.

रामकथा सुनाने का शौक उन्हें है, तो वे कमाठीपुरा में भी उसे पूरा कर सकते थे. उद्धार किसी स्थान विशेष का मुहताज नहीं होता, क्योंकि बकौल रामकथा, राम अगर हैं तो सब जगह हैं और नहीं हैं तो फिर कहीं नहीं हैं.

लेकिन असल मंशा ग्राह?की और भीड़ बढ़ाने की थी, जिस में वे कामयाब रहे.

अयोध्या में कमाठीपुरा

अपने धंधे का प्रचारप्रसार कर मोरारी बापू अयोध्या वापस पहुंचे तो वहां उम्मीद के मुताबिक प्रायोजित विरोध उन का स्वागत कर रहा था. अयोध्या निवासियों ने वेश्याओं को बुलाए जाने का विरोध किया और धर्म के कुछ छोटेमोटे ठेकेदारों ने भी एतराज दर्ज कराया.

इस से हल्ला और मचा, और लोगों की उत्सुकता साल 2018 के आखिरी धार्मिक इवैंट रामकथा में और बढ़ गई. नतीजतन, भीड़ उम्मीद के मुताबिक आई. अब यह तय कर पाना मुश्किल नहीं है कि भीड़ रामकथा सुनने आई थी या इन वेश्याओं को देखने जो आम लोगों के आकर्षण का केंद्र हमेशा से रही हैं.

अपनी रामकथा में मोरारी बापू ने कैसे गणिका थीम को भुनाया, इस के पहले यह जान लेना जरूरी है कि इस रामकथा में वेश्याओं को आमंत्रित किए जाने का विरोध भी बड़े पैमाने पर हुआ था. धर्मसेना के अध्यक्ष संतोष दुबे, जो विवादित ढांचा ढहाए जाने के मुख्य अभियुक्तों में से एक हैं, का कहना था कि पवित्र नगर अयोध्या में सैक्सवर्कर्स को आमंत्रित कर के मोरारी बापू इस शहर को अपवित्र करना चाहते हैं. अगर उन्हें समाजसुधार के काम करने हैं तो उन्हें इस प्रकार के  आयोजन नक्सली और रैडलाइट इलाकों में जा कर करना चाहिए.

वेश्याओं के अयोध्या आने से आहत एक हिंदूवादी नेता प्रवीण शर्मा ने तो मोरारी बापू की शिकायत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कर डाली जो खुद बेचारे हनुमान को दलित कहने पर तरहतरह की आलोचनाएं पहले से ही झेल रहे थे. इसलिए इस संवेदनशील मसले पर वे खामोश रहे.

अयोध्या के डांडिया मंदिर के महंत भरत व्यास ने भी मोरारी बापू के इस कृत्य की आलोचना करते कहा कि एक ऐसे शहर, जो धार्मिक नगरी के लिए प्रसिद्ध हो और जहां भगवान राम का जन्म हुआ हो, में सैक्सवर्कर्स का जमावड़ा ठीक नहीं, इस से लोगों में गलत संदेश जाएगा. अयोध्या आध्यात्मिक नगरी है, न कि समाजसुधार का केंद्र. मोरारी बापू को समाजसुधार करना है तो कहीं और करें, कथा करनी हो, तभी अयोध्या आएं.

इन 2-3 बयानों से ही धर्म का वास्तविक चेहरा सामने आ गया जिस से उम्मीद है कमाठीपुरा से अयोध्या लाई गई 200 वेश्याओं को समझ आ गया होगा कि उन्हें दरअसल अपमानित करने और उन की हैसियतऔकात व सामाजिक स्थिति बताने के लिए वहां ले जाया गया था.

वेश्याओं की तुलना नक्सलियों से की गई और यह भी कहा गया कि उन के आने से अयोध्या अपवित्र हो गई. अगर शहरों की पवित्रता वेश्याओं के न आने से ही है तो काशी, मथुरा, प्रयागराज और उज्जैन जैसे धार्मिक शहर तो मुद्दत से अपवित्र हैं क्योंकि वहां वेश्याएं इफरात से हैं.

इन बयानों की बाबत मोरारी बापू ने न तो वेश्याओं से माफी मांगी और न ही किसी तरह का खेद जाहिर किया. उलटे, वेश्याओं के लिए 11 लाख रुपए की घोषणा कर दी थी, ठीक वैसे ही जैसे किसी रेल हादसे में मृतकों और घायलों को सरकार मुआवजा देती है. मोरारी बापू की गुहार पर देखते ही देखते देशविदेश से करोड़ों रुपए इकट्ठा हो गए. पर यह भारीभरकम राशि किस माध्यम से वेश्याओं तक पहुंचाई जाएगी, यह पूरे तौर पर स्पष्ट नहीं किया गया.

ये वेश्याएं कमाठीपुरा में रोज इसी तरह से अपमानित होती हैं. इन के ग्राहक, दलाल और पुलिस वाले इन्हें रंडी कहते हैं. इन से हफ्तावसूली करने वाले गुंडों के हौसले बुलंद रहते हैं. अगर वेश्याएं उन्हें हफ्ता न दें तो ये लोग इस इलाके में इतना आतंक मचा देते हैं कि ग्राहक मारे डर के कमाठीपुरा की तरफ झांकते नहीं, जिस से वेश्याओं की आमदनी मारी जाती है.

इन समस्याओं, परेशानियों या शोषण की बाबत भी कहने को मोरारी बापू के पास कुछ नहीं था. हां, उन्होंने वेश्याओं को देवी, शगुन, गुरु और अप्सराएं जरूर कह दिया जो सोने के फ्रेम में मढ़ी हुई हैं. एक प्रचलित उदाहरण उन्होंने बंगाल का भी दे डाला कि वहां दुर्गा मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी गणिका के घर से ही आती है.

एक बात जरूर उन्होंने ईमानदारी से स्वीकारी कि सफेदपोश लोग भी इन के पास आते हैं, लेकिन उन में सच बोलने और कुबूलने की हिम्मत नहीं है.

वेश्याएं हैं ही क्यों

मोरारी बापू की रामकथा से इन वेश्याओं का कोई भला या उद्धार नहीं हुआ है, बल्कि उन्हें अयोध्या में अपमानित ही होना पड़ा है.

जाहिर है वे देहव्यापार की जरूरत से सहमत हैं और उस का प्रचारप्रसार कर बैठे हैं. मोरारी बापू की नजर में दुनिया में कोई महान संस्कृति है तो वह हिंदू संस्कृति ही है. फिर इस में देहव्यापार क्यों है और लोग क्यों उस में लिप्त होते हुए, भोगते हुए इस की बुराई करते हैं, यह वे शायद ही बता पाएं.

हिंदू संस्कृति में हर पुरानी परंपरा को महान कहा जाता है. फिर इस में वेश्याओं का क्या काम और ये पतिताएं क्यों कही जाती हैं, जबकि ये समाज का अनिवार्य हिस्सा हैं और वैदिककाल से हैं. इस पर भी मोरारी बापू खामोश रहे कि वेश्याएं कभी सैनिकों, तो कभी साधुसंतों की हवस मिटाने के काम भी आती थीं. धर्म के नाम पर कमउम्र लड़कियों को देवदासी कौन बनाता है, इस सच को भी वे पचा और छिपा गए.

देश की लाखोंकरोड़ों वेश्याएं अब रामनाम पर दान करेंगी और अपनी बदहाली की वजह अपने कर्मों को मान कर चुपचाप अपने धंधे में लग जाएंगी. यही उन की नियति है जिस का इलाज किसी रामकथा में नहीं.

‘मंडी’ फिल्म का अंत आज की प्रासंगिकता है जिसे प्रतीकात्मक रूप से दिखाया गया है कि रुक्मणिबाई हमेशा एक पिंजरा अपने पास रखती है जिस में एक तोता बंद रहता है. यही राज वेश्याओं का है. वे धर्म और समाज के बनाए पिंजरे में कैद हैं, जिस से आजाद होने की कोशिश करती हैं तो उन के पर कुतर दिए जाते हैं.

ऐसे में यह कहा जा सकता है कि कमाठीपुरा में उन से मिलने, फिर अयोध्या बुला कर उन्हें रामकथा सुनाने के ड्रामे के पीछे मोरारी बापू का मकसद वेश्याओं को शिष्ट तरीके से यह एहसास कराना था कि वे पापिन और पतिता हैं तो वे इस में कामयाब रहे हैं.

पनीर भुर्जी बनाने की रेसिपी

सामग्री-

– पनीर (250 ग्राम कद्दूकस किया हुआ)

– हरे मटर के दाने (1/2 कप)

– टमाटर (02 बारीक कटे हुए)

– शिमला मिर्च  (02 नग बारीक कटे हुए)

– धनिया पत्ती (02 बड़े चम्मच कटी हुई)

– हरी मिर्च  (02 बारीक कटी हुई)

– अदरक (1/2 इंच कद्दूकस किया हुआ)

– हल्दी पाउडर (01 छोटा चम्मच)

–  मिर्च पाउडर (स्वादानुसार)

– धनिया पाउडर (1/2 चम्मच)

– जीरा (1/4 छोटा चम्मच)

– तेल (01 बड़ा चम्मच)

– नमक (स्वादानुसार)

पनीर भुर्जी बनाने की विधि :

– सबसे पहले पैन में तेल डालकर गरम करें, फिर उसमें जीरा चटकायें.

– इसके बाद पैन में हरी मिर्च, अदरक, धनिया पाउडर, हल्दी पाउडर डालें और मसाले को हल्का सा भून लें.

– इसके बाद पैन में हरी मटर डालें और चलाकर 2 मिनट के लिये ढ़क दें.

– 2 मिनट के बाद या मटर के मुलायम हो जाने के बाद पैन में टमाटर, शिमला मिर्च, लाल मिर्च पाउडर     और नमक डालें और अच्छी तरह से चला लें.

– अब इसे फिर से ढ़क दें और 2 मिनट तक पकने दें.

– 2 मिनट बाद पैन को चेक करें और सब्जियों के नरम हो जाने पर उसमें मैश किया हुआ पनीर डालें और  अच्छी तरह से मिक्स कर लें.

– इसके बाद पैन में कटा हुआ धनिया डालें और चलाकर गैस बंद कर दें.

– अब पनीर की भुर्जी तैयार है, इसे प्लेट में निकालें और रोटी या पराठे के साथ सर्व करें.

शादी से एक सप्ताह पहले अपनाएं ये ब्राइडल ब्यूटी टिप्स

हर दुल्‍हन अपनी शादी के दिन यानी अपनी जिंदगी के सबसे खास दिन पर सबसे सुंदर दिखने की चाहत रखती है. जैसे-जैसे शादी का दिन नजदीक आता है, वैसे-वैसे उसकी उलझन बढ़ती जाती है कि वह क्‍या करें और सबसे खूबसूरत दिखे. शादी के दौरान शौपिंग आदि करने के लिए बार-बार बाहर निकलने से लड़की का रंग हल्‍का पड़ जाता है और शाइन खत्‍म हो जाती है. इसके लिए जरूरी है कि 7 दिनों की एक चेकलिस्‍ट तैयार की जाएं और उसी के अनुसार त्‍वचा की देखभाल की जाएं.

पहला दिन : बौडी पर ब्‍लीच करवा लें. इस दिन बौडी पर ब्‍लीच करवाने से आपके समय का सदउपयोग हो जाएगा और आपकी बौडी में चमक भी आ जाएगी. दिलो-दिमाग दोनों शांत हो जाएंगे. बौडी पर औयल मसाज भी करवा सकती हैं. इससे आपको तनाव नहीं होगा और आपका मन शांत रहेगा.

दूसरा दिन : अपनी बौडी की स्‍कीन को स्‍क्रब करें और मसाज करवाएं. इससे त्‍वचा की ड्राईनेस दूर होगी और वह शाइन करने लगेगी. इसके अलावा, हेड मसाज भी जरूर करवाएं.

तीसरा दिन : इस दिन बौडी वैक्‍स करवा लें. इससे त्‍वचा नाजुक हो जाएगी. वैक्‍स करवाने से स्‍कीन में चमक भी आती है. बौडी के अलावा, बालों पर भी ध्‍यान दें. हेयर कलर करवा लें. दो शेड, वो भी ब्‍लैक, ब्राउन जैसे करवाएं जो किसी भी हेयरस्‍टाइल को बनाने में अच्‍छे लगेगें. अगर आप बहुत जौली है और कुछ हटकर करना चाहती हैं तो एक – आध लट रेड कलर की भी करवा सकती हैं.

चौथा दिन : बालों में स्‍पा करवा लें. इसके बाद इनमें डीप कंडीशनिंग करवाएं. बालों के बाद चेहरे पर ध्‍यान दें. ब्‍लीच करवाएं, ताकि चेहरे में चमक आ जाएं. अपर लिप और आईब्रो भी चार दिन पहले ही बनवा लें, इससे शादी के दिन तक सही शेप आ जाएगा.

पांचवा दिन : शादी की रस्‍में और रिवाज शुरू हो चुके है और आज आपको मेंहदी लगने वाली है. ऐसे में बौडी मसाज लें. ताकि आपके शरीर और दिमाग को आराम मिल जाएं. मैनीक्‍योर और पैडीक्‍योर करवा लें. अगर आपको अपने बालों को कट देना है तो आज ही दे दें, ताकि शादी के दिन तक वह सही दिखें.

छठा दिन : इस दिन आपका फ्रेश दिखना और चेहरे का ग्‍लो करना जरूरी होता है. इस दिन कई दुल्‍हन हैवी मेकअप करने से बचती हैं. इंगेजमेंट के दिन हल्‍की ड्रेस पहनें, बालों को नया लुक दें और लाइट मेकअप करवाएं. हाथों पर खास ध्‍यान दें. उन्हे अच्‍छे से मौश्‍चर कर लें ताकि वह ड्राई न लगें. नेल आर्ट बनवा लें ताकि नाखुन भी सुंदर दिखें.

सातवां दिन : आपके सपनों का दिन आ गया. अपनी नई जिंदगी की शुरूआत करने वाले दिन आप अपने बालों को धुलें, उन्‍हे नैचुरली सुखने दें और ब्राइडल मेकअप करवाएं. अपने नाखूनों पर अच्‍छा सा पेंट लगवाएं.

पत्नियों और बेटियों की जासूसी करवाने वाला ऐप क्यों नहीं हटा रहा गूगल

गूगल प्ले-स्टोर पर लाखों ऐप्स मौजूद हैं, लेकिन सऊदी सरकार का यह ऐप अभी कई हाई-प्रोफाइल लोगों के निशाने पर है. ट्विटर पर लोग #DropTheAPP लिखकर इस ऐप को गुलामी का टूल बता रहे हैं.

अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता काकस वाइस चेयर कैथरीन क्लार्क ने भी ट्वीट करते हुए इस ऐप को पितृसत्तात्मक हथियार बताया है. साथ ही #Apple और #Google को टैग करते हुए इस खतरनाक ऐप की सुविधा को बंद करने की बात कही है.

रिपब्लिक पार्टी की नेता कैरोलीन मलोनी ने भी कैथरीन क्लार्क की बातों को समर्थन देते हुए #DropTheAPP से ट्वीट किया है. मंगलवार को अमेरिकी सीनेटर रॉन विडेन ने ऐपल के सीईओ टिम कुक और गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई को पत्र लिखकर मांग की कि वे ऐप स्टोर और Google Play से इस ऐप को तुरंत हटा दें.

आखिर इस ऐप का क्यों हो रहा है विरोध?

ऐप का नाम है- एब्शर( Absher). यह ऐप सऊदी के पुरुषों को यह अनुमति देता है कि वह अपनी पत्नियों और बेटियों की जासूसी कर सकें. इस ऐप के जरिए घर के पुरुष यह पता लगाते हैं कि उनके घर कि महिला कहां हैं. महिलाएं अगर एयरपोर्ट पर अपने पासपोर्ट का इस्तेमाल करती हैं, तो उसकी जानकारी तक उनके पति के मोबाइल में पहुंच जाती है.

एक तरह से यह महिलाओं को ट्रैक, उनकी यात्रा को प्रतिबंधित और उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. ताज्जुब की बात यहां ये है कि इसे बनवाने वाली कोई और नहीं, सऊदी सरकार है.

Google/Apple के ऐप स्टोर पर उपलब्ध यह ऐप सऊदी अरब को अपने गार्जियनशिप लॉ को लागू करने में मदद करता है. गार्जियनशिप लॉ महिलाओं को पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना यात्रा करने की अनुमति नहीं देता है.

गूगल और ऐपल को क्यों घसीट रहे हैं लोग?

क्योंकि ऐपल के ऐप स्टोर और गूगल के प्लेस्टोर में यह ऐप मौजूद है. दुनियाभर की कई महत्वपूर्ण संस्थाएं जैसे ह्यूमन राइट्स वॉच, एमनेस्टी इंटरनेशनल, महिला अधिकारों की एक्टिविस्ट यासमीन मोहम्मद ने गूगल और ऐपल को पत्र लिखकर इस ऐप को हटाने की मांग की है.

यूएस की सीनेटर रॉन विडेन ने गूगल और ऐपल के सीईओ टिम कुक और सुंदर पिचाई को पत्र लिखकर कहा, ‘अमेरिकी कंपनियों को सऊदी सरकार की पितृसत्ता को सक्षम या सुविधाजनक नहीं बनाना चाहिए, उन्होंने महिलाओं पर नियंत्रण की सऊदी प्रणाली को अपमानजनक बताया और इसे जल्द से जल्द हटाने की मांग की.

वहीं ह्यूमन राइट्स वॉच के लिए मध्य पूर्व शोधकर्ता रोथना बेगना ने कहा कि इस तरह के ऐप महिलाओं के खिलाफ भेदभाव सहित मानवाधिकारों के हनन की सुविधा देते हैं.

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने तो यहां तक कह दिया कि यह ऐप महिलाओं की आजादी को खतरे में डाल रहा है, इसलिए गूगल और ऐपल इसे अपने प्लेटफॉर्म से तुरंत हटाएं.

इन शिकायतों का जवाब देते हुए कुक ने कहा कि वे गंभीरता के साथ इसका हल निकालेंगे. अंतरराष्ट्रीय कानून निर्माताओं, समूह, एक्टिविस्ट के दबाव में गूगल ऐप की जांच के लिए तैयार हो गया है. गूगल यह निर्धारित करने के लिए ऐप की समीक्षा करेगा कि यह उसकी नीतियों के अनुरूप है या नहीं. इस जांच में ऐपल भी शामिल है.

इन 5 चीजों के लिए भारत पर आश्रित है पाकिस्तान

हम सब ये बात जानते हैं कि भारत और पाकिस्‍तान के बीच रिश्ते हमेशा से तनाव भरे रहे हैं लेकिन पुलवामा आतंकी हमले के बाद हालात कुछ ज्यादा ही बिगड़ गए हैं. जी हां, तभी तो अब भारत सरकार ने पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा भी वापस ले लिया है. वैसे देखा गया है कि पाकिस्तान दुनिया में अपनी हेकड़ी दिखाता है, लेकिन हकीकत में अभी भी बहुत से प्रोडक्‍ट के लिए वो भारत पर आश्रित है.

चलिए जानते हैं 5 ऐसी चीजों के बारे में जिनके लिए पाकिस्तान भारत पर डिपेंड है.

  1. कॉटन

पाकिस्‍तान कॉटन को लेकर भारत पर डिपेंड है. जी हां, वित्त वर्ष 2018-19 में अप्रैल-नवंबर के बीच भारत ने पाकिस्तान को 2,684 करोड़ रुपए के कॉटन का एक्सपोर्ट किया, जो एक साल पहले की समान अवधि से लगभग 10 % ज्यादा है. इसके अलावा अगर वित्त वर्ष 2017-18 की बात करें तो यह आंकड़ा लगभग 3503 करोड़ रुपए रहा था.

  1. ऑर्गनिक केमिकल्स

वित्त वर्ष 2018-19 में अप्रैल-नवंबर के दौरान भारत ने पाकिस्तान को 2224 करोड़ रुपए का एक्सपोर्ट किया, जो बीते साल की समान अवधि की तुलना में लगभग 50 % ज्यादा है. वहीं वित्त वर्ष 2017-18 में यह आंकड़ा 2029 करोड़ रुपए रहा था.

  1. प्लास्टिक संबंधी समान

प्लास्टिक और इससे बने सामान के लिए भी पाकिस्तान भारत पर ही आश्रित है. जी हां, वित्त वर्ष 2018-19 में भारत ने अप्रैल-नवंबर के दौरान 583 करोड़ रुपए के प्लास्टिक और उससे बने सामान का एक्सपोर्ट किया, जो बीते साल की तुलना में लगभग 20 % ज्यादा था.

  1. चमड़ा या डाइंग एक्सट्रैक्ट्स, पिगमेंट्स और अन्य कलरिंग मैटर, पेंट, पुट्टी, इंक

बता दें कि इस वित्त वर्ष में अप्रैल-नवंबर के दौरान कलरिंग, पेंट आदि से जुड़े सामान का 510 करोड़ रुपए का एक्सपोर्ट हुआ था, जो एक साल पहले समान अवधि की तुलना में लगभग 25 % ज्यादा था. वहीं पिछले वित्त वर्ष यानि 2017-18 में आंकड़ा 525 करोड़ रुपए रहा था.

  1. न्यूक्लियर रिएक्टर्स, बॉयलर्स, मशीनरी एंड मैकेनिकल अप्लायंसेज, उनसे जुड़े उपकरण

मालूम हो कि वर्तमान वित्त वर्ष में अप्रैल-नवंबर के दौरान इन आइटम्स का 413 करोड़ रुपए का एक्सपोर्ट किया गया, जो पिछले साल पहले समान अवधि की तुलना में लगभग 15 % ज्यादा था.

मयंक मार्कंडेय : पहले थे तेज गेंदबाज़, अब बन गए स्पिनर

ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध टी-20 और एकदिवसीय सीरीज के लिए टीम इंडिया का ऐलान किया गया है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने टी-20 में एक नए चेहरे मयंक मार्कंडेय को जगह दी गई है. 21 वर्षीय मयंक को भारत-ए की तरफ से खेलते हुए इंग्लैंड लॉयंस के खिलाफ 5 विकेट लेने के तुरंत बाद ही अपने प्रदर्शन का ईनाम मिल गया. वे आईपीएल फ्रैंचाइजी मुंबई इंडियंस से भी खेल चुके हैं.

कम लोगों को ही इस बात का पता होगा कि अपनी लेग स्पिन में बड़े-बड़े बल्लेबाजों को उलझाने वाला यह फिरकी गेंदबाज पंजाब अंडर-14 में खेलने के दौरान तेज गेंदबाजी किया करता था. अगर उनके कोच ने उन्हें सही सलाह न दी होती तो, वो आज भी तेज गेंदबाजी ही कर रहे होते. हो सकता है कि तब वे इतना कामयाब नहीं होते. यह कहना खुद मयंक मार्कंडेय का है. उन्होंने मीडिया को बताया है कि ‘बाली सर (मुनीष बाली) ने मुझसे कहा कि तेज गेंदबाज बनने का सपना छोड़ दे. मेरी फिजिक भी बहुत अच्छी नहीं थी. उनकी यही सलाह मेरे लिए वरदान साबित हुई.’

मयंक ने बताया है कि शुक्रवार को आए एक कॉल ने उनकी जिंदगी बदल दी. कुछ ही पलों में उनके मोबाइल पर 300 मेसेज आ गए और 42 मिस्डकॉल भी. इस बारे में उन्होंने कहा कि- मत पूछो. मैं उस समय होटल में था और मेरा फोन बजने लगा. मुझे ऐसी कॉल की आशा नहीं थी. मैं अब भी चकित हूं. कुछ समय लगेगा सबकुछ ठीक होने में, किन्तु मैं इस पल को जिंदगीभर नहीं भूलूंगा.

सोनम कपूर के नाम बदलने का सच क्या है?

अपने प्रेमी आनंद आहूजा के संग विवाह रचाने के बाद सोनम कपूर ने अपना नाम बदलकर सोनम के आहूजा कर लिया था. लेकिन अब एक बार फिर सोनम कपूर ने इंस्टाग्राम और ट्वीटर पर अपना नाम बदलकर जोया सिंह सोलंकी करने का ऐलान किया है. इससे हर कोई हतप्रभ है.

पर सोनम कपूर का नाम बदलने का यह मसला पूरी तरह से 5 अप्रैल को प्रदर्शन के लिए तैयार फिल्म ‘‘द जोया फैक्टर’’ के प्रचार से जुड़ा है. सोनम कपूर ने फिल्म ‘‘द जोया फैक्टर’’ में दलकीर सलमान के साथ अभिनय किया है. इस फिल्म में सोनम के किरदार का नाम जोया सिंह सोलंकी है.

अनुजा चौहान के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित फिल्म ‘‘द जोया फैक्टर’’ की कहानी एक राजपूत लड़की जोया सिंह सोलंकी की है, जो कि अपनी विज्ञापन एजेंसी में काम करते हुए एक क्रिकेटर से मिलती है और 2010 विश्व कप क्रिकेट के दौरान जोया उस क्रिकेटर की लक्की चार्म बन जाती है.

यानी कि अपनी नई फिल्म के प्रचार के लिए सोनम ने अपने नाम बदलने का यह ऐलान इंस्टाग्राम व ट्वीटर पर किया है.

कैसी हो फिटनैस किट

फिटनैस हर वर्ग के और हर उम्र के लोगों के लिए जरूरी है. आजकल तरहतरह की बीमारियां पैदा हो रही हैं, जिन में से कई बीमारियां सिर्फ फिटनैस को मेंटेन करने से खत्म हो सकती हैं. डायबिटीज, हाई ब्लडप्रैशर, अस्थमा, हड्डियों से जुड़ी बीमारियां ऐसी हैं जो खराब जीवनशैली व खानपान के चलते हर आयुवर्ग व लिंग के लोगों को उम्र से पहले ही बूढ़ा बना रही हैं. इसलिए आज किसी भी इलाज या परहेज से ज्यादा जरूरी है ऐक्सरसाइज करना. अगर आप जिम नहीं जा सकते तो एक फिटनैस किट अपने पास रखें जो आप को ऐक्सरसाइज करने में मददगार साबित हो. फिटनैस किट में क्या होना चाहिए और इसे मेंटेन कैसे रखें, यह भी जानना बेहद जरूरी है.

फिटनैस पाने के लिए हर उम्र के व्यक्ति को कुछ चीजों का खासतौर पर ध्यान रखना चाहिए, जैसे कि उचित तरह के जूते. जूतों का चयन सूझबूझ से करना चाहिए. उदाहरण के लिए आजकल जूते बनाने वाली कंपनियां खेल व ऐक्सरसाइज के अनुसार जूतों का तकनीकी तौर पर निर्माण करती हैं.

एक फिटनैस किट में सब से पहले सही तरह के जूते होना बहुत जरूरी है. सही जूतों के पहनने से घुटनों में या दूसरे जोड़ों में गलत असर नहीं पड़ता. इसी तरह एक अच्छी टीशर्ट, लोअर जिस का कपड़ा पसीने को सोखने वाला हो, होना चाहिए. फिटनैस वाले कपड़े, जिन को फिटनैस अटायर भी कहते हैं, आरामदायक होने चाहिए.

फिटनैस किट में तौलिया, पानी की बोतल, ग्लूकोस, गरम पट्टी, दास्ताने आदि भी होने चाहिए. सब से महत्त्वपूर्ण इन सब में पानी की भरी हुई बोतल है क्योंकि ऐक्सरसाइज करते समय शरीर से पसीने के साथ काफी महत्त्वपूर्ण मिनरल तत्त्व भी निकल जाते हैं, जिन की पूर्ति पानी या ग्लूकोस का पानी पीने से हो जाती है.

फिटनैस किट ले कर जिम या खेल के मैदान में जाने वाला व्यक्ति फिटनैस या खेल के प्रति अपनी अनुशासनशीलता दिखाता है. फिटनैस किट में फिटनैस करने वाले के स्तर के अनुसार कुछ क्रीम्स व स्प्रे भी होने जरूरी हैं, जैसे वौलिनी, आयोडैक्स. जरूरत पड़ने पर इन्हें प्राथमिक उपचार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. कई बार हैवी वेट उठाने या बौडी स्ट्रेच करने से नसों या जोड़ों में खिंचाव आ जाता है, तब इन की जरूरत पड़ती है.

यदि हम फिटनैस घर पर या अपने दफ्तर या फिर किसी ऐसी जगह कर रहे हैं जहां जगह कम है तो फिटनैस किट में स्किपिंग रोप भी रखें. इसे रस्सी कूदना कहते हैं. यह काफी महत्त्वपूर्ण व्यायाम है.

फिटनैस किट में आप पुशअप्स (डंड) करने के लिए ग्रिप रख सकते हैं. इस के अलावा कलाइयों की मांसपेशियों को सुडौल बनाने के लिए पाम ग्रिप्स भी रख सकते हैं. और भी कई ऐक्सरसाइज टूल्स होते हैं जो उम्र, स्वास्थ्य, वजन व फिटनैस गोल के हिसाब से तय होते हैं.

किट की मेंटिनैस की बात करें तो जूते जल्दी बदलें ताकि पैरों को दिक्कत न हो. फिटनैस किट का हर सामान फ्रैश व मजबूत होगा तो आप की हैल्थ भी स्ट्रौंग होगी और आप होंगे मिस्टर फिट.

इस तरह आप की तकरीबन पूरी फिटनैस किट तैयार हो जाती है.

:हरीश शर्मा, हैल्थ ऐंड फिटनैस कंसल्टैंट, इक्वलीब्रियम प्रो-जिम, एशियन हौस्पिटल

प्रियंका-प्रलय से धीमी पड़ी मोदी-सुनामी

नजरें लक्ष्य पर… कोशिश चुनाव साधने की… चुनौती बिखरे संगठन को एकजुट रखने की… सहज-आत्मीय माहौल… चेहरे पर मुस्कान… कोई तल्खी नहीं… सधी आवाज और बातचीत एकदम अपनों जैसी… इन विशेषताओं के साथ आखिर प्रियंका गांधी वाड्रा भारतीय राजनीति के मैदान में उतर ही पड़ीं. सालों से पर्दे के पीछे रह कर काम करने वाली प्रियंका को राजनीति में प्रत्यक्ष उतारने की मांग बहुत लंबे समय से हो रही थी, मगर निजी कारणों का हवाला देकर इतने सालों तक उन्हें इससे अलग रखा गया. एक तो उनके बच्चे छोटे थे और दूसरा भाई राहुल गांधी का करियर डांवाडोल था. अब ऐसे वक्त में उनकी एंट्री हुई है, जब बच्चे भी समझदार हो गये हैं और राहुल गांधी भी ‘पप्पू’ वाली छवि तोड़ कर बतौर पार्टी-अध्यक्ष कांग्रेस की झोली में तीन राज्यों की सरकारें डाल चुके हैं.

सदन के भीतर-बाहर जहां राहुल अब धाराप्रवाह भाषण करते हैं, वहीं उनके अचानक अटैक या प्यार की झप्पी से प्रधानमंत्री मोदी तक हतप्रभ रह जाते हैं. इसलिए अब ऐसा कहना कि प्रियंका के आने से राहुल का करियर चौपट हो जाएगा, गलत है.

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो प्रियंका के आने के बाद 2019 में कांग्रेस दोहरी मजबूती के साथ चुनाव मैदान में उतर रही है. एक और एक ग्यारह की ताकत के साथ राहुल-प्रियंका 2019 की लोकसभा के लिए चुनावी मैदान में हैं. अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी और महासचिव के रूप में प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस कार्यकर्ता और नेता हृदय से स्वीकारते हैं.

सिक्के के दो पहलू – कांग्रेस और गांधी

अब ये आलोचना की बात हो या प्रशंसा की कि आज कांग्रेस का मतलब है गांधी-परिवार. इस परिवार के बिना कांग्रेस की कल्पना नहीं की जा सकती है. कांग्रेस और गांधी परिवार को एक करने का श्रेय जाता है इंदिरा गांधी को, मगर एक वक्त वह भी था जब इंदिरा गांधी और कांग्रेस अलग-अलग थे. यह वक्त था जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद का. जब तक नेहरू जिंदा थे तब तक सरकार पर उनका एकछत्र राज था. उनके आगे कांग्रेस का वही हाल था, जो आज मोदी के आगे भाजपा का है.

नेहरू ने इंदिरा को सक्रिय राजनीति से हमेशा दूर रखा था. उनकी मौत के बाद भारत की राजनीति में एक शून्य पैदा हो गया. तब शुरू हुई नेहरू के उत्तराधिकारी की खोज. तब इंदिरा गांधी कहीं किसी गिनती में नहीं थीं. उस वक्त के. कामराज कांग्रेस अध्यक्ष हुआ करते थे. वे तमिलनाडु से थे और दक्षिण भारत की निचली जाति के प्रभावशाली नेता थे. मगर उनके दिमाग में भी इंदिरा का नाम नहीं था. तब प्रधानमंत्री पद के जो दो मजबूत दावेदार थे वह थे – मोरारजी देसाई और लाल बहादुर शास्त्री.

मोरारजी देसाई को ज्यादातर कांग्रेसी पसंद नहीं करते थे क्योंकि वे बड़े जिद्दी और अड़ियल किस्म के व्यक्ति थे, उनके विपरीत लाल बहादुर काफी शांत और सौम्य थे. कांग्रेसी नेताओं ने एकमत से प्रधानमंत्री के रूप में लालबहादुर शास्त्री को चुना, बिल्कुल वैसे ही जैसे सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को चुना था. मगर शास्त्री जी मनमोहन सिंह नहीं बन पाये. यह कहानी कभी आगे, पहले इंदिरा की बात करें कि कैसे उनकी एंट्री कांग्रेस में हुई और कैसे कांग्रेस और गांधी परिवार एक दूसरे के पर्यायवाची हो गये.

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दरअसल लालबहादुर शास्त्री ने ही पहली बार इंदिरा गांधी को अपने कैबिनेट में जगह दी थी. शास्त्रीजी इंदिरा की तेजी को समझते थे और जानते थे कि बाहर रह कर वह ज्यादा खतरनाक साबित होंगी, लिहाजा अपनी कैबिनेट में शामिल करके उन्होंने इंदिरा को कम महत्व वाले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का मंत्री बना दिया. मगर इंदिरा को यह पद भाया नहीं. वे भीतर ही भीतर अपने समर्थकों का गुट बनाने में जुट गयीं.

उसी दौरान शास्त्री जी चाहते थे कि वह तीन मूर्ति भवन स्थित प्रधानमंत्री आवास में शिफ्ट हो जाएं, जहां जवाहरलाल नेहरू बतौर प्रधानमंत्री रहते थे, लेकिन इंदिरा ने इसमें अडंगा लगा दिया. वे चाहती थीं कि तीन मूर्ति भवन स्थायी तौर पर नेहरू के नाम का स्मारक घोषित हो जाए और आखिर में उन्हीं की जीत हुई. तीन मूर्ति भवन नेहरू और उनके वंशजों के नाम हो गया. इंदिरा की असल सियासत तीन मूर्ति से ही चलने लगी और ये परंपरा अब तक बरकरार है.

इंदिरा गांधी पार्टी के अंदर अपनी ताकत बढ़ा रही थीं और लालबहादुर शास्त्री अकेले पड़ते जा रहे थे. तब उन्होंने पहली बार प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ का दफ्तर खोला, जिसमें ईमानदार, विश्वासपात्र और काबिल अफसरों की टीम को देश चलाने के लिए रख लिया. पीएमओ का काम नाजुक और नीतिगत मसलों पर प्रधानमंत्री को सलाह देना था. शास्त्रीजी के इस पीएमओ वाले नये तजुर्बे ने इंदिरा के इशारे पर चल रहे कांग्रेसी नेताओं की चालें फेल कर दीं.

शास्त्रीजी की मौत के बाद कांग्रेस में फिर उत्तराधिकार की तलाश शुरू हुई. इस बार मोरारजी देसाई किसी भी कीमत पर प्रधानमंत्री बनना चाहते थे. लेकिन तब तक इंदिरा गांधी काफी अनुभवी हो चुकी थीं. कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने जब प्रधानमंत्री पद के लिए इंदिरा का नाम आगे किया, तो मोरारजी देसाई और इंदिरा गांधी के बीच चुनाव की नौबत आ गयी और अंतत: कांग्रेस संसदीय दल के सांसदों ने इंदिरा को चुना और इंदिरा पहली बार देश की प्रधानमंत्री बनीं. तब तक इंदिरा की उम्र 49 साल पार कर चुकी थी. अपनी मंजिल तक पहुंचने में इंदिरा को लंबा वक्त लगा, मगर उनकी पोती प्रियंका ने राजनीति की शुरुआत सत्ताइस साल की उम्र में शुरू कर दी थी, हालांकि यह राजनीति वे पर्दे के पीछे रह कर करती रहीं. सक्रिय राजनीति में उतरने का अवसर उन्हें अब मिला है 47 की उम्र में.

प्रियंका गांधी की छवि और कार्यशैली में उनकी दादी इंदिरा की छाप और असर है. कांग्रेस पार्टी में प्रियंका से बड़ा स्टार प्रचारक कोई नहीं है. इस बार लोकसभा में कांग्रेस की नय्या पार लगाने की पूरी जिम्मेदारी प्रियंका पर है. गांधी परिवार की इस सदस्या के सक्रिय राजनीति में उतरने की राह लोग काफी समय से देख रहे थे. प्रियंका गांधी वाड्रा का लक्ष्य भी हालांकि सत्ता प्राप्त करना है, मगर यह सत्ता वह अपने भाई राहुल गांधी के लिए पाना चाहती हैं. वह काफी लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रही हैं.

सोनिया गांधी और राहुल गांधी के तमाम राजनीतिक कार्यक्रमों में संयोजक के तौर पर उनकी भूमिका प्रभावशाली रही है. उनकी तेजी और स्मरण शक्ति गजब की है. अमेठी और रायबरेली में वह अपने कार्यकर्ताओं को बकायदा नाम से पुकारती हैं. उनकी यह खूबी उन्हें कार्यकर्ताओं से सीधे जोड़ती है. 2019 के चुनाव में उनका उतरना सभी विपक्षी दलों के लिए चिंता का विषय है. सुगबुगाहट तो यह है कि वह प्रधानमंत्री मोदी के निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवारी का पर्चा भर सकती हैं, अगर ऐसा हुआ तो मोदी के सामने अपनी सीट बचाने का बड़ा संकट पैदा हो जाएगा.

भाजपा की तैयारियों में उत्साह नदारद

कुंभ स्नान के साथ भाजपा-अध्यक्ष अमित शाह प्रियंका से निपटने की रणनीति बनाने में जुट गये हैं, मगर अबकी बार जोश 2014 के मुकाबले जरा कम ही नजर आ रहा है. वजह यह है कि संघ के भीतर नरेंद्र मोदी को लेकर अलग-अलग मत सुनायी पड़ रहे हैं. 2014 में जहां भाजपा के दिग्गज नेताओं ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को स्वीकारा और संघ की पूरी ताकत भी उनके पीछे थी, वहीं अबकी बार यह ताकत नजर नहीं आ रही है. ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ या ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ जैसा कोई प्रभावी नारा भी अभी तक जनता के कानों में नहीं पड़ा है.

उधर राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, उमा भारती, शाहनवाज हुसैन, मुख्तार अब्बास नकवी, अरुण जेटली जैसे दिग्गज भाजपाई खामोशी ओढ़े बैठे हैं. चुनाव सिर पर हैं और भाजपा खेमे में कोई हलचल दिखायी नहीं दे रही है. अंदरखाने की खबर यह है कि अबकी बार नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व पर कुछ संशय बना हुआ है. संघ की ओर से उन्हें कोई खास सपोर्ट मिलता नहीं दिख रहा है. जिस तरह हाल के दिनों में उनके कैबिनेट मंत्री नितिन गडकरी बातों-बातों में बड़ी चोटें कर गये हैं, वह भी गौर करने लायक है.

बीते दिनों अपने भाषणों के दौरान नितिन गडकरी कई ऐसी बातें बोल गये हैं, जिन्हें सीधे नरेंद्र मोदी से जोड़ कर देखा जा रहा है. बकौल गडकरी, ‘सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, लेकिन दिखाये हुए सपने अगर पूरे नहीं किये तो जनता उनकी पिटाई भी करती है, इसलिए सपने वही दिखाओ जो पूरे हो सकते हैं. मैं सपने दिखाने वालों में से नहीं हूं, जो भी बोलता हूं, वह डंके की चोट पर बोलता हूं.’ या ‘जो अपना घर नहीं संभाल सकते, वह देश क्या संभालेंगे…’ जैसी बातें साबित करती हैं कि पार्टी के भीतर मोदी-शाह के लिए सबकुछ ठीक नहीं है.

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मोदी जिस तरह विपक्षियों – ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, मायावती या रॉबर्ट वाड्रा के बहाने प्रियंका गांधी वाड्रा को निपटाने और चुनावी दौर में परेशान करने के लिए देश की बड़ी जांच एजेंसियों को हथियार बना कर इस्तेमाल कर रहे हैं, वह भी खुलेतौर पर दिख रहा है और राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मोदी के इस दांव से भाजपा को फायदे की जगह नुकसान ही उठाना पड़ेगा. खैर, यहां बात करते हैं प्रियंका गांधी वाड्रा की, जिनकी एंट्री ने कांग्रेस के सुस्त-सोये कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी है. विपक्ष तो उनकी एंट्री से इतना घबराया हुआ है कि कहीं उनकी खूबसूरती और चार्म पर टिप्पणी कर रहा है, तो कहीं उनके पति रॉबर्ट वाड्रा को जांच एजेंसियों के जरिए घेर कर चुनावी तैयारियों से उनका ध्यान भटकाने की कोशिश में मुब्तिला है.

मगर प्रियंका पर इन बातों का रत्तीभर भी असर दिखायी नहीं देता. पति रॉबर्ट वाड्रा से जांच एजेंसियों की पूछताछ पर वह एक वाक्य में मीडिया के सवालों का मुंह बंद कर देती हैं कि – ‘यह सब तो चलता रहेगा.’

दो मोर्चों पर मजबूती से खड़ी प्रियंका

प्रियंका गांधी वाड्रा देश और परिवार दोनों ही मोर्चों पर मजबूती से खड़ी हैं. उनके राजनीति में उतरने की सुगबुगाहट के साथ ही भाजपा चौकन्नी हो गयी थी. पांच साल तक राबर्ट वाड्रा मामले में खामोश ओढ़े पड़ी जांच एजेंसियों में अचानक हलचल देखी जाने लगी और फिर प्रवर्तन निदेशालय ने रॉबर्ट को कथित रूप से अवैध संपत्ति और मनी लांड्रिग मामले में पूछताछ के लिए ठीक उसी दिन तलब कर लिया जिस दिन प्रियंका को बतौर कांग्रेस महासचिव अपना पद ग्रहण करना था. आशंका व्यक्त की जा रही थी कि इसके खिलाफ कांग्रेसी हो-हल्ला मचाएंगे, मगर रॉबर्ट और प्रियंका दोनों ने शालीनता और सहयोग का परिचय दिया और रॉबर्ट वाड्रा पूछताछ का सामना करने के लिए एजेंसी के सामने हाजिर हो गये.

चुनावी तैयारियों और रैलियों के अतिव्यस्त कार्यक्रम के बीच प्रियंका अपने पति रॉबर्ट को पूरा सपोर्ट करती नजर आयीं. कांग्रेस महासचिव की कुर्सी पर बैठने से पहले वे पति को लेकर प्रवर्तन निदेशालय पहुंचीं और फिर वहां से कांग्रेस औफिस जाकर उन्होंने कार्यभार संभाला. यही नहीं, जब रॉबर्ट वाड्रा को पूछताछ के लिए जयपुर तलब किया गया, तब भी प्रियंका लखनऊ में रैली पूरी करने के बाद सीधी जयपुर पहुंचीं. इन बातों से प्रियंका ने साफ कर दिया है कि वह देश और परिवार दोनों ही मोर्चों पर लड़ने के लिए मजबूती से कमर कस के खड़ी हैं और उनके यही तेवर भाजपा खेमे को डरा रहे हैं.

गौरतलब है कि 2014 में जब मोदी सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब रॉबर्ट वाड्रा को जेल भेजने की बातें खूब कर रहे थे, मगर सत्ता में आने के बाद पांच साल तक वह इस मामले में खामोशी ओढ़े रहे. जैसे ही यह खबर आयी कि प्रियंका गांधी राजनीति में पदार्पण करने वाली हैं, केन्द्र के अधीन जांच एजेंसियां अचानक नींद से जाग पड़ीं. ऐसा क्यों हुआ यह सवाल सबकी जुबां पर है.

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प्रियंका ने एक लाइन में इस सवाल का जवाब दिया है – ‘सबको पता है, क्या हो रहा है?’ वहीं प्रियंका की तारीफ करते हुए पति रॉबर्ट वाड्रा ने भी सोशल मीडिया पर लिखा – ‘प्रिय पी, तुम एक सच्ची दोस्त, परफेक्ट वाइफ और मेरे बच्चों के लिए बेस्ट मां साबित हुई हो. आज के दिन दुर्भाग्यपूर्ण राजनीतिक माहौल है, मुझे पता है तुम अपनी जिम्मेदारी को सही से निभाओगी. हम प्रियंका को देश के हवाले करते हैं. भारत की जनता इनका ध्यान रखे.’ रॉबर्ट के इस इमोशनल मैसेज से प्रियंका तो प्रभावित हुर्इं ही, कांग्रेसी खेमे में इस मैसेज ने संजीवनी का काम किया है.

खून में दौड़ती राजनीति

राजनीति प्रियंका के खून में है. लंबे समय से वह अमेठी और रायबरेली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की रैलियों के आयोजन का कार्यभार संभालती रही हैं. उनकी कार्यशैली अनूठी है. वे अजनबियों के साथ पलक झपकते ही स्नेहिल संबंध बना लेती हैं. उनकी खूबसूरती और मोहक मुस्कान सामने वाले को सम्मोहित कर लेती है. अपने राजनीतिक दौरों के दौरान कभी प्रियंका किसी बूढ़ी महिला का हाथ थाम कर बैठ जाती हैं, कभी उनके साथ परांठा-अचार का नाश्ता करती हैं, तो कभी रिक्शे पर अपने बच्चों को घुमाती हैं. उनका यह व्यवहार क्षेत्र के लोगों को उनसे गहरे जोड़ता है.

हालांकि वे थोड़ी गुस्सैल स्वभाव की भी हैं. मगर कार्यकर्ताओं का मानना है कि उनका गुस्सा उन लोगों पर ही प्रकट होता है, जो पार्टी का काम ठीक से नहीं करते हैं. ऐसा ही आचरण उनकी दादी इंदिरा गांधी का भी देखा जाता था.

दरअसल प्रियंका में लोगों को इंदिरा की छवि ही नजर आती है. खासतौर पर उनकी हेयर स्टाइल और लंबी नाक. तमाम समानताओं के साथ एक समानता यह भी है कि प्रियंका गांधी का करियर भी इंदिरा गांधी की तरह ही शुरू हुआ है. प्रियंका की तरह इंदिरा भी शुरू से ही स्मार्ट थीं, लेकिन उन्हें राजनीति से दूर रखा गया था. जवाहर लाल नेहरू ने कभी उन्हें अपनी उत्तराधिकारी के रूप में नहीं देखा. ये अलग बात थी कि राजनीति उन्हें विरासत में मिली थी. शुरू में गूंगी गुड़िया के रूप में मशहूर इंदिरा के राजनीतिक तेवर पिता की मृत्यु के बाद राजनीति में पदार्पण के साथ देश-दुनिया ने देखे. वैसे ही तेवर प्रियंका में हैं. महज 16 साल की उम्र में, प्रियंका गांधी ने अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया था. तब से वह कई राजनीतिक जुलूसों, रैलियों और सम्मेलनों में हिस्सा लेती रही हैं.

रायबरेली के पुराने लोग प्रियंका में हमेशा इंदिरा को देखते हैं. इंदिरा की तरह वे भी सीधी और भावुक बातें करके लोगों को वह करने पर मजबूर कर देती हैं, जो वह चाहती हैं. यह बात तो रायबरेली की पहली ही जनसभा में साबित हो गयी थी. वह 1999 का लोकसभा चुनाव था. कांग्रेस ने रायबरेली सीट से कैप्टन सतीश शर्मा को खड़ा किया था. भाजपा ने जवाब में राजीव गांधी के ममेरे भाई अरुण नेहरू को टिकट दिया था. अरुण नेहरू और राजीव गांधी में रिश्ते बिगड़ गये थे. वे कांग्रेस छोड़ भाजपा में आ गये थे. अरुण नेहरू मजबूत नेता थे. वहीं कैप्टन सतीश शर्मा सोनिया परिवार के घरेलू मित्र थे. प्रियंका उन्हें अंकल कहती थीं.

कैप्टन रायबरेली से लगभग हारे हुए कैंडिडेट नजर आ रहे थे. उन्होंने प्रियंका से आग्रह किया कि वह उनकी एक चुनावी सभा में आ जाएं. तब प्रियंका सिर्फ 27 साल की थीं. रायबरेली में उनकी पहली जनसभा थी. प्रियंका ने वहां सिर्फ एक लाइन बोली – ‘मेरे पापा के साथ जिसने गद्दारी की. पीठ में छुरा भोंका, ऐसे आदमी को आपने यहां घुसने कैसे दिया? उनकी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?’ भीड़ ने प्रियंका की डांट सुनी. एक सन्नाटा खिंच गया चारों ओर. प्रियंका को लगा कि कुछ ज्यादा हो गया. उन्होंने बात संभाली और बोलीं – ‘मेरी मां ने ये कह कर भेजा था कि कभी किसी की बुराई मत करना. लेकिन मैं आपसे भी अगर अपने दिल की बात नहीं कहूंगी तो किससे कहूंगीं.’ और प्रियंका के इस इमोशनल संबोधन के बाद पूरा चुनाव ही पलट गया. कैप्टन सतीश शर्मा जीत गये और अरुण नेहरू का राजनीतिक करियर खत्म हो गया. कैप्टन खुद मानते थे कि ये चुनाव उन्हें अकेली प्रियंका की एक मीटिंग ने जिता दिया था.

27 साल की तब की प्रियंका और 47 साल की आज की प्रियंका में कोई ज्यादा फर्क नहीं आया है. वे आज भी उसी तरह इमोशनल बातें करके लोगों का दिल जीत जीतने में उस्ताद हैं, मगर कोई कार्यकर्ता काम से जी चुराये तो डांट-डपट भी करने से नहीं चूकतीं. राजनीति उनके खून में है और मेच्योरिटी लेवल भाई राहुल गांधी से कहीं ज्यादा. यही वजह रही कि इतने साल तक सोनिया ने उन्हें राजनीति से दूर रखा ताकि राहुल ठीक तरह से स्थापित हो सकें.

भय्याजी के नाम से मशहूर हैं प्रियंका

राहुल और सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी और रायबरेली में प्रियंका बचपन से ही काफी सक्रिय रही हैं. क्षेत्र के लोग राहुल गांधी के साथ-साथ प्रियंका को भी ‘भय्याजी’ के संबोधन से पुकारते हैं. इन दोनों जगहों को प्रियंका अपने घर के रूप में देखती हैं. प्रियंका की खासियत है कि वो लोगों से जल्दी जुड़ जाती हैं. इस बात के गवाह कई लोग हैं कि रायबरेली में प्रियंका गांधी कभी भी अचानक ही बीच सड़क पर रुककर किसी भी कार्यकर्ता को नाम से पुकार लेती थीं और उसका हालचाल लेती थीं.

वर्ष 2004 के आम चुनाव में उन्होंने रायबरेली में सोनिया गांधी के लिए अभियान प्रबंधक के रूप में जबरदस्त काम किया था. वहीं अमेठी में भाई राहुल गांधी के अभियान की निगरानी भी उन्होंने की. वर्ष 2004 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत का परचम लहराया तो पार्टी में प्रियंका का कद बढ़ गया. हालांकि वह एक उम्मीदवार के रूप में या प्रचारक के रूप में पार्टी की चुनावी जीत में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाती थीं, लेकिन वह इसके पीछे थीं.

2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में, जब राहुल गांधी अपने राज्यव्यापी अभियान में व्यस्त थे, प्रियंका ने अमेठी-रायबरेली क्षेत्र की दस सीटों पर अपनी ऊर्जा और प्रयास केन्द्रित किया. आम चुनाव 2009 और 2014 में, प्रियंका गांधी ने अमेठी और रायबरेली के निर्वाचन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर प्रचार किया और अपने भाई और मां के लिए जीत हासिल करने में मदद की. 23 जनवरी, 2019 को, प्रियंका गांधी का औपचारिक रूप से राजनीति में प्रवेश हो गया है. कांग्रेस महासचिव पद के साथ उन्हें उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग का प्रभार दिया गया है, जहां 41 सीटों के लिए वह ताबड़तोड़ रैलियां करेंगीं, वहीं बाकी की 39 सीटों का जिम्मा ज्योतिरादित्य सिंधिया उठाएंगे.

फर्स्ट शो, हिट शो

सक्रिय राजनीति में प्रियंका गांधी वाड्रा की एंट्री धमाकेदार रही. पति रॉबर्ट वाड्रा को प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों के सुपुर्द करके जब वह अपने पहले रोड शो के लिए लखनऊ पहुंचीं तो अमौसी हवाई अड्डे से लेकर लाल बाग चौराहे से होते हुए कांग्रेस आफिस तक करीब 25 किलोमीटर का रास्ता फूलों, नारों, पोस्टर-होर्डिंग और बैनरों से पट गया. एक ट्रक पर भाई राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, राज बब्बर, जितिन प्रसाद  और अन्य नेताओं के साथ बैठी प्रियंका को एक नजर देखने की लालसा में जैसे पूरा शहर सड़क पर उमड़ पड़ा. लखनऊ में प्रियंका गांधी का यह पहला मेगा शो था. प्रियंका को देखकर कार्यकर्ता और आम शहरी जोश से भर गये. उन्होंने जगह-जगह ट्रक रोक कर फूल-मालाओं से उनका स्वागत किया.

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प्रियंका ने हाथ हिलाये, हाथ जोड़े, सलाम किया और जनता के सामने एक भावुक बात कह दी – ‘जब भी उत्तर प्रदेश आती हूं, मुझे अपने घर जैसा अहसास होता है. आप सभी का प्यार और अपनापन हमें शक्ति देता हैं. कल हम फिर आ रहे हैं आपके बीच.’ जनता भावविह्वल हुई. जयजयकार के नारे लगे. गौरतलब है कि कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद जब राहुल गांधी लखनऊ आये थे तो उनका इतना जोरदार स्वागत नहीं हुआ था, जितना उनकी बहन प्रियंका का हुआ.

डर के मारे योगी ने दिया फुल पेज विज्ञापन

प्रियंका गांधी के रोड शो की भीड़ और भव्यता से घबरायी प्रदेश की योगी-सरकार ने इस खबर को अखबारों के पहले पन्ने पर आने से रोकने के लिए सभी प्रमुख अखबारों को पहले पूरे पेज का रंगीन विज्ञापन दे डाला. इस घटना से प्रियंका को लेकर भाजपा खेमे का डर सामने आ गया है. लोगों ने योगी का मजाक भी बनाया कि – ‘डर के आगे विज्ञापन है’. छोटे और मंझोले अखबार-मालिकों में भी उत्साह जगा कि अगर प्रियंका गांधी वाड्रा ऐसे ही रोड शो करती रहीं तो आज नहीं तो कल योगी सरकार उन्हें भी फुल पेज विज्ञापन देने के लिए मजबूर हो जाएगी.

अक्सर ऐसा होता है कि जब किसी राजनीतिक दल का कोई बड़ा कार्यक्रम होता है तो वो दल या उसके नेता अखबारों को विज्ञापन देते हैं. लेकिन लखनऊ में उल्टी गंगा बही. रोड शो प्रियंका का था और लाखों का विज्ञापन बांटा योगी आदित्यनाथ ने. वह भी फुल पेज का. प्रदेश के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने अखबार-मालिकों के सामने विज्ञापन जारी करते हुए शर्त रखी कि उसे पहले पेज पर लिया जाए वरना भुगतान नहीं होगा. साफ था कि प्रियंका के रोड शो के कवरेज को जनता की नजरों से छिपाने के लिए सारी कवायद की गयी, मगर खबर तो फिर भी लोगों तक पहुंची और पूरे जोश से पढ़ी गयी.

लखनऊ में प्रियंका गांधी के रोड शो में उमड़े जनसैलाब और युवाओं में व्याप्त उत्साह को देखकर जहां भाजपा खेमा परेशान है, वहीं प्रदेश की जनता को ऐसा लग रहा है जैसे इंदिरा गांधी का फिर से राजनीति में पदार्पण हो गया हो. प्रियंका गांधी की सक्रिय राजनीति में एंट्री के बाद उनका ऐसा स्वागत तो होना ही था क्योंकि कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा लंबे समय से यह मांग की जाती रही है. लोगों से सहजता पूर्वक जुड़ाव और उनसे घुलना मिलना तो प्रियंका गांधी की विशेषता है ही, साथ ही खासकर उत्तर प्रदेश में राजनीतिक परिस्थितियां भी ऐसी हैं कि यहां कांग्रेस का कोई बड़ा चेहरा पार्टी को लीड करे.

ऐसे में प्रियंका गांधी अगर उत्तर प्रदेश में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं तो इसका कांग्रेस पार्टी को ना सिर्फ लोकसभा चुनाव में फायदा होगा, बल्कि इसका सकारात्मक असर यूपी के 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव पर भी अच्छा खासा पड़ेगा.

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