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इन का दर्द इन की दुनिया

मैं पढ़ीलिखी हूं, नौकरी चाहती हूं, पेशा ताली बजाना हो सकता है. मैं भी हर इंसान की तरह समाज और आसपास के लोगों से इज्जत चाहती हूं. हमें कोई शौक नहीं है टे्रेन में, रास्ते में, सिग्नल पर इधरउधर भागने का, वेश्यावृत्ति करने का. हम में भी हुनर है, हम हर वह काम कर सकते हैं जो आम लड़के या लड़कियां कर सकती हैं. ऐसे कितने ही शब्दवाक्य कहे जा रही थी ट्रांसजैंडर भाविका पाटिल. ग्रेजुएशन कर चुकी भाविका की आंखों से लगातार गिरते आंसू उस के दर्द को बयां कर रहे थे. उस ने सालों ऐसा झेला है लेकिन कुछ समय पहले यशराज के वाई फिल्म्स बैनर ने 6 पैक बैंड के जरिए इन का म्यूजिक अलबम रिलीज किया तो इन्हें भी सैलिब्रिटी जैसा सम्मान मिला.

भाविका उन 6 ट्रांसजैंडर मैंबर्स में से एक है जिसे अपने संगीत के हुनर को दिखाने का अवसर मिला. इस के अलावा चांदनी सुवर्णनकर, रविना जगताप, आशा जगताप, फिदा खान, कोमल जगताप आदि ट्रांसजैंडरों को इसी अलबम के जरिए गायक सोनू निगम के साथ मिल कर गाना गाने का मौका मिला. यह इन के लिए बड़ी उपलब्धि थी.

दरअसल, विश्व के सभी समाजों में स्त्री और पुरुष के रूप में केवल 2 लिंगों को ही मान्यता दी गई है. समाज द्वारा स्त्री और पुरुष की लैंगिक पहचानों से परे जो भी है उसे थर्डजैंडर की संज्ञा दी गई. यह वर्ग संसार के सभी समाजों में कहीं कम तो कहीं ज्यादा के अनुपात में शोषण और अवहेलना का शिकार होता आया है. जन्म से ही इन्हें स्वीकारा नहीं जाता, इसलिए ये अपने जैसे लोगों को ढूंढ़ कर उन के साथ रहते हैं.

आर्थिक व सामाजिक ढांचा

थर्डजैंडर को ‘हिजड़ा’ कह कर भी बुलाया जाता है. रामायण और महाभारत काल से ये हमारे समाज में हैं. मुसलिम शासक इन्हें वफदार मानते थे. अकसर इन को हरम की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी. हिजड़ा या किन्नर के बारे में यह कहा जाता है कि ये सभी जन्मजात नहीं होते. कई बार इन्हें जबरन किन्नर बना दिया जाता है. ऐसे अनेक गिरोहों का भी परदाफाश हुआ है जो बच्चों और जवानों को किन्नर बना कर इन को जिस्मफरोशी व भीख मांगने जैसे धंधों में ढकेल देते हैं.

हिजड़ा समुदाय की आर्थिक और सामाजिक स्थिति बहुत ही दयनीय है. इस की वजह समाज और सरकार द्वारा बरसों तक इन्हें नागरिक होने के अधिकार से वंचित रखना है. इसी धरती पर जन्म लेने के बावजूद इन के होने, इन के वजूद का कोई रिकौर्ड नहीं होता. भारत सरकार द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार, देश में 4.9 लाख किन्नर हैं. यह समाज पिछड़ेपन का शिकार है जहां शिक्षा न के बराबर है. 12वीं पास फिदा खान कहती है, ‘‘बचपन से मुझे कुछ अच्छा करने की धुन थी. मैं स्कूल गई, पढ़ाई में अच्छी थी पर मेरे हावभाव का सभी मजाक उड़ाते थे. फिर मैं ने स्कूल जाना छोड़ दिया. घर से ही शिक्षा पूरी की. आगे पढ़ना चाहती थी पर लोगों के नजरिए से परेशान हो कर मैं ट्रांसजैंडर बन गई और शादीब्याह में गाना गाती थी. जब मुझे वाई फिल्म्स से औडिशन के लिए बुलाया गया तो मुझे लगा कि ये लोग हमें बेवकूफ बना रहे हैं. लेकिन जब सबकुछ पता किया तो वाकई यह बड़ी बात थी कि मैं गा सकती हूं और अपनी प्रतिभा को आगे बढ़ा सकती हूं. मैं कजीना, सांताक्रूज, मुंबई की रहने वाली हूं. मैं अपने परिवार के साथ रहती हूं. वे भी बहुत खुश हैं, उन लोगों ने मुझे टीवी पर देखा है. मैं हिंदी के अलावा अंगरेजी में भी गाना गा सकती हूं. अभिनय का मौका मिले तो अभिनय भी कर सकती हूं.’’

15 अप्रैल, 2014 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा किन्नरों को तीसरे लिंग के रूप में स्वीकृति प्रदान करने के बाद भी इन के समुदाय में कोई खास बदलाव नहीं आया. शैक्षिक संस्थाएं हिजड़ों को दाखिला देने से कतराती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उन के शिक्षा संस्थान की साख पर असर पड़ेगा, छात्रों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. यही वजह है कि न तो इन्हें ढंग की कोई नौकरी मिलती है, न ही समाज इन्हें स्वीकारता है. नाचगाने के अलावा इन के पास कमाने का कोई साधन नहीं. उस में जरूरतभर की इनकम न होने की वजह से ये भीख मांगने और वेश्यावृत्ति में लिप्त हो जाते हैं. इन लोगों में इस वजह से एड्स पीडि़तों की संख्या लगातार बढ़ रही है. बाजार, महल्ला, सड़क, ट्रेनों आदि में भारीभरकम आवाज, जोरजोर से तालियां बजाते, अभद्र भाषा का प्रयोग करते इन किन्नरों से हर व्यक्ति पीछा छुड़ाना चाहता है. कोई इन के दर्द को सुनना या महसूस करना नहीं चाहता.

पेट का सवाल है

कल्याण, मुंबई की रहने वाली 35 वर्षीया चांदनी सुवर्णनकर कहती है, ‘‘मैं पढ़ीलिखी नहीं हूं. शादीब्याह हो या बच्चा होने पर बधाई देने के लिए जाती थी. वहां नाचगाना कर जो पैसा मिलता था, उसी से पेट भरती थी. यहां आने के बाद परिवार मिला है. मैं गाती थी पर इतना अच्छा, पता नहीं था. लोगों को मेरा गाना पसंद आया है. लोगों का नजरिया भी बदला है. हम लोग भड़कीले और चमकीले कपड़े पहन कर इसलिए ट्रेन में मांगते हैं कि लोगों की नजर पड़े. मैं अकेली रहती हूं छोटे से कमरे में. परिवार मुझे सहयोग नहीं देता. हम बहुत ही सामान्य लोग हैं और सामान्य तरीके से जीना चाहते हैं.’’

मुंबई के विरार इलाके की रहने वाली भाविका पाटिल यहां आने से पहले फिल्मों, टीवी में छोटामोटा अभिनय किया करती थी. वह कहती है, ‘‘4-5 साल से काम कर रही हूं, पर कहीं मुख्य भूमिका नहीं मिली. इस बैंड की मैं एक सिंगर हूं. कई बार औडिशन के बाद मैं यहां पहुंची हूं. इस अलबम के बाद मेरी दुनिया ही बदल गई. ट्रांसजैंडर को इतना बड़ा मौका दिया जाना बड़ी बात थी. मैं अपने परिवार के साथ रहती हूं. परिवार से काफी अटैच्ड हूं.’’

भाविका को कब पता चला कि वह ट्रांसजैंडर है, इस बात पर वह मायूस हो कर कहती है, ‘‘जब मैं चौथीपांचवीं कक्षा में थी तो शर्टपैंट पहन कर स्कूल जाती थी. वहां स्कूल में बच्चे मेरा मजाक उड़ाते थे. मेरी मां मुझे सोसायटी के बच्चों के साथ खेलने नहीं देती थीं. इस के लिए मैं हमेशा पूछती थी कि ‘मां, मैं कैसी हूं कि लोग मुझे ऐसे चिढ़ाते है, मैं कौन हूं?’ यह मेरी गलती नहीं है कि मैं ऐसी हूं. थोड़ी बड़ी होने के बाद मैं समझ गई. और घर में रह कर ओपन यूनिवर्सिटी से बीए की पढ़ाई पूरी की. आज मेरी मां बहुत खुश हैं. वे कहती हैं, ‘मेरा बच्चा ऐसा हुआ तो क्या हुआ, टीवी पर आता है.’ ड्रैस सैंस मैं ने मां से ही सीखी है. मेरे पिता ने भी मुझे बहुत सहारा दिया.’’

भाविका आगे कहती है, ‘‘लोग हमें जोकर मानते हैं. मैं जोकर नहीं. मेरा परिवार है, मैं चाहती हूं कि  पूरे विश्व की धरोहर जो युवा हैं, बच्चे हैं उन के अंदर मातापिता, दादादादी, नानानानी अच्छे भाव भरें, उन के दिलों में हमारे प्रति सम्मानभरी बातें भरें, उन के मन में हमारे प्रति जो डर है वे निकाल दें. हम इंसान हैं, राक्षस नहीं. हमारे दिल में बहुत सारे दुख हैं जिन्हें हम किसी से शेयर नहीं कर सकते. मैं उसी दिन का इंतजार करूंगी जब हम भी समाज में सब के साथ रह सकें.’’

हम में हैं और भी हुनर

कोमल जगताप भी इस बैंड की मैंबर है. वही चांदनी और आशा जगताप को इस बैंड में लाई थी. वह कहती है, ‘‘शुरूशुरू में तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि इतना बड़ा मौका मुझे मिल रहा है. हिजड़ों को इतनी तवज्जुह कोईर् देता है भला. पहला गाना रिकौर्ड होने के बाद यकीन हुआ कि हम केवल ताली ही नहीं बजा सकते. बहुत सारे हुनर हम में है. गाना गा सकते हैं, अभिनय कर सकते हैं वगैरहवगैरह. आज हम सैलिब्रिटी बन चुके हैं. कहीं जाते हैं तो लोग पूछते हैं कि आप ही सिंगर हो न उस बैंड की? बहुत अच्छा लगता है. आगे भी कुछ अच्छा करने की इच्छा है. पर सब का साथ जरूरी है.’’ यह सब कहतेकहते उस की आंखें भर आईं.

किन्नर बच्चे के जन्म पर परिवार वाले भी अधिकतर उस का साथ नहीं देते, क्योंकि वे निर्धारित स्त्रीपुरुष की श्रेणी से अलग पहचान रखते हैं. यह सही है कि किन्नरों का जन्म चिकित्सकीय समस्या नहीं है. ये पुरुष होते हुए भी अपनेआप को महिला समझते हैं, क्योंकि इन के माइंड और बौडी इन के बायोलौजिकल सैक्स को स्वीकार नहीं करते.

स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डा. मेघना सरवारिया इस बारे में बताती हैं, ‘‘ट्रांसजैंडर वाले बच्चों का पता जन्म से पहले नहीं चल पाता. जन्म के बाद ही कभी जल्दी तो कभी एक उम्र के बाद ही पता चलता है. यह जैनेटिक समस्या नहीं. विज्ञान अभी तक इस बारे में जानकारी नहीं रखता, पर इतना सच है कि ऐसे बच्चे में महिला हारमोन अधिक होते हैं. इस में कुछ पुरुष हो कर भी महिलाओं के जैसे आचरण करते हैं जिसे ट्रांसजैंडर कहते हैं. जबकि कुछ लोग सैक्सुअली भी स्थायी रूप से बदलाव चाहते हैं और सर्जरी के लिए जाते हैं. उन्हें ट्रांस सैक्सुअल कहते हैं. इन लोगों के लिए अलग तीसरा जैंडर होने की आवश्यकता है, तभी ये आगे बढ़ सकते हैं, क्योंकि मानसिक तौर पर ये फिट होते हैं. ये हर तरह के काम कर सकते हैं.’’

ट्रांसजैंडर लोगों के बीच हुए कुछ अध्ययनों में उन के यौन झुकाव के बारे में पता चला है कि पूरी आजादी में उन का आकर्षण तुलनात्मक रूप से समान लिंग के लोगों की ओर ही होता है. ट्रांसजैंडर होना किसी भी तरह से यौन विकृत से संबंधित नहीं होता और न ही इस से पता चलता है कि व्यक्ति विषमलिंगी, द्विलिंगी या समलैंगिक है. लड़के और लड़कियों जैसे विभिन्न लिंगों के व्यक्तियों के आकर्षण के बावजूद भी व्यक्ति ट्रांसजैंडर हो सकते हैं.

हिजड़ों को सब से पहले जिस बात की आवश्यकता है वह है समाज के संवेदनशील होने की, उन्हें स्वीकारे जाने की. कागजी सुधारों से अधिक उम्मीद करना व्यर्थ है. हालांकि, एकाध उदाहरण ऐसे हैं जहां ट्रांसजैंडरों को नौकरी मिली, उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की गई.

पश्चिम बंगाल के एक महिला महाविद्यालय में एक किन्नर की प्राचार्या के पद पर नियुक्ति की गई. हिसार, हरियाणा की शोभा नेहरू  वर्ष 1995 में हुए नगर निगम चुनाव में पार्षद चुनी गई. राजस्थान के गंगानगर की किन्नर पार्षद बंसती मौसी, देश की पहली हिजड़ा विधायक शबनम मौसी, छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की मेयर मधु आदि सभी एक अच्छी कोशिश हैं पर इन की संख्या बहुत कम है.

बौलीवुड में भी इन की संख्या बहुत कम है. अगर इन्हें काम मिलता भी है तो छोटीमोटी भूमिका या फिर एक गाना, बस. इन को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार को पर्याप्त कदम उठाने चाहिए. हिजड़ों के नाम पर आजकल कुछ लड़के फ्रौड हिजड़ा बन कर भी पैसा कमा रहे हैं. मैडिकल जांच के आधार पर रिकौर्ड बनाया जाना चाहिए, जिस से कि सभी संस्थाओं को कल्याणकारी काम करने में सुविधा हो. इस के अलावा कई सवाल इन के साथ जुड़े हैं. क्या इन की शादी हो पाएगी? क्या धर्म के नाम पर बंटे इस देश में इस समुदाय को स्वीकृति मिलेगी?

यह सही है कि यह सब समाज की देन है. आधुनिक समाज में इन्हें स्वीकारने के लिए जैंडर की परिभाषा को बदलना होगा. थर्डजैंडर को जीने की स्वतंत्रता देनी होगी. तभी इन के दर्द को कम किया जा सकता है, और तभी इन की दुनिया बदल सकती है.

अंधविश्वास के चक्र में घनचक्कर

‘शनिवार के एक दिन पहले यानी शुक्रवार को सवासवा किलो काले चने अलगअलग 3 बरतनों में भिगो दें. अगले दिन नहा कर, साफ वस्त्र पहन कर शनिदेव का पूजन करें और चनों को सरसों के तेल में छौंक कर उन का भोग शनिदेव को लगाएं और अपनी समस्याओं के खत्म होने के लिए प्रार्थना करें. इस के बाद पहले सवा किलो चने भैंसे को खिला दें. दूसरे सवा किलो चने कुछ रोगियों में बांट दें और तीसरे सवा किलो चने मछलियों को खिला दें. इस तरीके से शनिदेव के प्रकोप में कमी होती है.’

यह सब तिकड़म है जिस में अंधविश्वासी टाइप के महिलापुरुष उलझ जाते हैं. तिकड़में और भी हैं.

‘कई बार ऐसा होता कि शत्रु आप की सफलता व तरक्की से चिढ़ कर तांत्रिकों द्वारा जादू करा देता है. इस से व्यवसाय बाधा, गृहक्लेश होता है. सो, इस के दुष्प्रभाव से बचने के लिए सवा किलो काले उड़द, सवा किलो कोयला को सवा मीटर काले कपड़े में बांध कर अपने ऊपर से 21 बार घुमा कर शनिवार के दिन बहते जल में बहा दें व मन में हनुमान का ध्यान करें. ऐसा लगातार 7 शनिवार करें. तांत्रिकों के जादू का असर पूरी तरह खत्म हो जाएगा.’

हम भगवान को प्रसाद का लालच दे कर उन से बड़े से बड़ा काम करवाना चाहते हैं, ‘मेरे बेटे की नौकरी लग जाए, मैं 500 रुपए का प्रसाद चढ़ाऊंगा.’ ‘मुझे एक करोड़ की संपत्ति मिल जाए, सोने का छत्र चढ़ाऊंगा.’ ‘कैंसर की बीमारी ठीक हो जाए, हनुमान की मूर्ति में चांदी की आंखें लगाऊंगा.’

डर का प्रतीक है आस्था

आस्था और अंधविश्वास एक हैं. आस्था ही अंधविश्वास का रूप लेती है. पढ़ेलिखे सुशिक्षित लोग, जो देश में गरीबी दर भी जानते हैं और समाज में फैले अंधविश्वास को भी, अपना पैसा गरीबों की शिक्षा, ट्रेनिंग पर खर्च करने के बजाय पहले से संपन्न मंदिरों और धार्मिक गुरुओं को देते हैं.

एक जमाने में सवा रुपए से शुरू हुआ दान आज सवा करोड़ रुपए तक पहुंच गया है. मजे की बात है कि इस सवा की परंपरा के बारे में अभी तक कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है और न ही जो सवा के हिसाब से दान देते है, उन लोगों को इस की जानकारी है. वे सवा किलो, सवा मन, सवा लाख, सवा करोड़ और न जाने कितने रूपों में इस सवा को मानते हैं. बस, लकीर के फकीर की तरह परंपराओं को मानते रहते हैं, डर से कि कहीं भगवान रुष्ट न हो जाए. अंधविश्वास, मूर्खता और ब्रेनवाशिंग के चलते लोगों का यह मानना हो जाता है कि भगवान को चढ़ावा तो चढ़ाना ही है.

उन का मत होता है कि मेहनत मत करो, चढ़ावा, वह भी सवा मन, चढ़ा दिया, अब सब ठीक हो जाएगा, सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी.

हावी हैं कर्मकांड

लोगों में धर्म के प्रति तरहतरह के विचार पनपते या बैठाए जाते हैं जो उन के मस्तिष्क में एक ओर जहां अंधविश्वास व आस्था का भाव पैदा करते हैं तो दूसरी ओर वही अंधविश्वास व आस्था उन्हें वेबकूफी की हरकतों के शिकंजे में जकड़ लेती है.

आज जब आधुनिक विज्ञान जीव जगत के रहस्यों की परतों को एक के बाद एक कर के उघाड़ता जा रहा है और सदियों से कायम धर्म आधारित अंधविश्वासों, कर्मकांडों, पाखंडों और भ्रांतियों के झूठ को उजागर करता जा रहा है, तो लोगों के मनमस्तिष्क पर धार्मिक कर्मकांड और अंधविश्वास और अधिक हावी होते जा रहे हैं. यह आश्चर्य वाली बात है.

आज शायद ही किसी शहर का कोई महल्ला, कसबा या गांव हो जहां आएदिन भजनकीर्तनप्रवचन के आयोजन न होते हों. इन आयोजनों पर करोड़ों रुपए खर्च होते हैं. कहीं भी, कभी भी नजर उठा कर देख लें, कोई न कोई धार्मिक आयोजनअनुष्ठान होते मिल जाएगा. कहीं भगवती जागरण तो कहीं सत्संग हो रहे हैं. कहीं राम की सवारी तो कहीं शोभायात्रा और कहीं ताजिया निकल रहे हैं. कहीं मंदिर तो कहीं मसजिद और कहीं गुरुद्वारे बन रहे हैं. कहीं मंदिर के नाम पर तो कहीं मसजिद के नाम पर दंगे हो रहे हैं.

कभी नए धार्मिक टैलीविजन चैनल खुल रहे हैं. चैनलों पर पुनर्जन्म, नागनागिन और भूतप्रेत की कहानियों की बाढ़ आई हुई है. कभी किसी सरकारी कालेज या अस्पताल में मंत्र चिकित्सा विभाग खोला जा रहा है तो कभी देश का कोई केंद्रीय मंत्री गले में नाग लपेट कर आग पर चल रहा है और तांत्रिकों को सम्मानित कर रहा है और कभी कोई केंद्रीय मंत्री तंत्रसाधना व ज्योतिष को स्कूलकालेजों व विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल कराने की जुगत कर रहा है.

धार्मिक गुरुओं का है बोलबाला

धर्म का प्रचार करने के लिए कितने ही धार्मिक गुरु जगहजगह कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं जो आत्मिक शांति के नाम पर लोगों से श्रद्धास्वरूप लाखों रुपए ऐंठते हैं. कहीं जाने के लिए ये बाबा लोग बड़ीबड़ी गाडि़यों और हैलिकौप्टर का इस्तेमाल करते हैं. इतना पैसा कहां से आता है? निश्चित रूप से इस का जवाब हर व्यक्ति जानता है, श्रद्धालु आस्था के नाम पर अपने प्रिय बाबा को लाखों रुपए दान देते हैं.

हमारे देश में 50 लाख के करीब साधुसंत, इमाम, पादरी और ग्रंथी हैं जिन में से ज्यादातर को मानवता और देशदुनिया की स्थिति का क, ख, ग का भी पता नहीं है. लेकिन वे लोगों को धर्म की शिक्षा देते हैं और लोगों को मूर्ख बना कर ऐश करते हैं. देश में उत्सवोंकीर्तनोंप्रवचनों और धार्मिक स्थलों के रखरखाव और पुजारियोंपादरियों की ऐयाशी पर वर्षभर में जो रकम खर्र्च होती है, वह अगर देश के विकास पर खर्च होती तो स्कूलकालेजों और अस्पतालों का जाल बिछ जाता. हर गांव में बिजली, सड़क और पेयजल जैसी सुविधाएं उपलब्ध हो गई होतीं. न कोई निरक्षर रहता और न कोई इलाज के कमी से मरता.

महिलाएं ज्यादा फंसती हैं

परिवार में धर्म के पालन की सब से ज्यादा या सौ फीसदी जिम्मेदारी महिलाओं पर ही होती है. परिवार को बुरी नजर से बचाने के लिए, पति और बच्चों के स्वास्थ्य व लंबी उम्र के लिए, घर में सुखशांति बनाए रखने के लिए पूजापाठ, व्रतउपवास, सत्संग, साधुसंतों की सेवा करना आमतौर पर केवल महिलाओं की जिम्मेदारी है.

मीडिया की अहम भूमिका

धर्म सामाजिक नियंत्रण के एक साधन के रूप में उभरा, ताकि समाज में बेचैनी की हालत पैदा होने से रोकी जा सके और लोगों को संतुलित व्यवहार करने के लिए मजबूर किया जा सके. समाजशास्त्रीय दृष्टि से धर्म के 2 अर्थों की चर्चा की जाती है. पहला, ईश्वर के प्रति आस्था और दूसरा, मानव, समाज, देश के प्रति कर्तव्य को करना. लेकिन मीडिया निर्देशित समाज में मानो धर्म का स्थान मीडिया ने ले लिया  है. अब मीडिया मानव व्यवहार को निर्देशित और उसे अपने फायदे के लिए नियंत्रित करता है.

मीडिया, बाजार और उपभोक्ता समाज के गठजोड़ ने धर्म को नया आकार देना शुरू कर दिया है. उदाहरण के लिए, टीवी पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों में आत्मा, जादूटोना, अंधविश्वास और रूढि़यों को उजागर कर के वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर हमले की कोशिश करना, ताकि लोगों में डर पैदा किया जा सके और धर्म संबंधी वस्तुओं के बाजार को स्थापित किया जा सके. मीडिया अंधविश्वास को फैलाने में इस समय अहम भूमिका निभा रहा है. वह भय के मनोविज्ञान को भुना रहा है.

धर्म के नाम पर अफवाहें बड़ी तेजी से जंगल में आग की तरह फैलती हैं. आज की मोबाइल व इलैक्ट्रौनिक क्रांति ने तो अफवाहों को फैलाना आसान बना दिया है. मीडिया भी इस तरह की अफवाहों को खबरों के जरिए फैलाने में मदद करती रही है. हाल के वर्षों में धर्म व चमत्कार के नाम पर अफवाहें जम कर फैलाई गई हैं. जिन में गणेश मूर्तियों का दूध पीना, आदमी का पतथर बन जाना इत्यादि ने सामान्य जनजीवन को अस्तव्यस्त कर दिया है लेकिन बाद में उन की वास्तविकता जानने के बाद ये अफवाहें मात्र छलावा साबित हुई. लेकिन हां, धर्म के कारण अफवाह फैलाने वालों की झोलियां जरूर भर गईं.

कुछ इसी तरह धर्म व आस्था के नाम पर अफवाह उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिले में देखने को मिली. मसाला पीसने वाले सिलबट्टे पर अचानक ही छोटेछोटे काले निशान उभर आए. फिर क्या था, किसी ने इसे देवी का प्रकोप बताते हुए यह कह कर अफवाह बना डाला कि सिलबट्टे में देवी मां (चेचक) निकल आई है. देखते ही देखते यह अफवाह उत्तर प्रदेश के कई पूर्वी जिलों में आग की तरह फैल गई. लोग अपनेअपने सिलबट्टों को देखने लगे, जहां बहुत से सिलबट्टो में काले निशान पाए गए. फिर शुरू हुआ अंधविश्वास के नाम पर चढ़ावे का खेल. लोगों ने खूब दानदक्षिणा देना शुरू किया, यहां तक कि अपने घरों में सिलबट्टों पर मसाले पीसना बंद कर दिया. कहींकहीं तो पाखंडियों ने लोगों के सिल और बट्टों को नीम के नीचे रख कर पूजापाठ व चढ़ावा का खेल शुरू कर दिया. फिर क्या था, अंधविश्वास की मारी आसपास की मूर्ख जनता ने खूब चढ़ावा चढ़ाया. चढ़ाया गया चढ़ावा धर्म की दुकानदारी करने वालों की जेब में गया.

भय का मनोविज्ञान

दरअसल, हम आधुनिक तो बनना चाहते हैं लेकिन धार्मिक प्रचार के चलते पारंपरिकता को छोड़ना भी नहीं चाहते. क्योंकि अब सरकार धर्म की है, और वह भी इसे खूब बढ़ावा देती है. भय का मनोविज्ञान हमें ऐसा नहीं करने देता. अगर हम ऐसा करेंगे तो बुरा होने की आशंका का डर हमें घेर लेता है. जिस का सामना करने के लिए हम तैयार नहीं होते. हमारे इसी भय को बाजार भुनाता है और फायदा उठाता है. वह हमें यकीन दिलाता है कि अगर हम फेंगशुई या वास्तुशास्त्र का ध्यान रखेंगे तो बुरा वक्त नहीं आएगा.

ईश्वर या ग्रहों को प्रसन्न करने के लिए उन के बताए उपायों का पालन करेंगे तो बुरा नहीं होगा. विभिन्न किस्म के जाप, पूजापाठ, दानदक्षिणा देना और रंगबिरंगे रत्न या मोती पहनना कथित अनिष्टकारी शक्तियों से बचने के उपाय हैं. काश, ऐसा हो पाता तो दुनिया की सारी समस्याएं ही समाप्त हो जातीं. परिवार नहीं टूटते, अपराध नहीं होते, युद्ध नहीं होते, आत्महत्याएं, गरीबी और बेरोजगारी नहीं होती, सांप्रदायिक दंगे नहीं होते. बस, चारों ओर शांति और खुशहाली होती. ज्यादा विवाद तो धर्म के कारण ही होते हैं. भारत व पाकिस्तान का विभाजन धर्म के कारण हुआ था जिस में लाखों शिकार बने और आज भी जख्म भरे नहीं है.

भय का मनोविज्ञान व्यक्ति को अनिर्णय की स्थिति में पहुंचा देता है और वह आक्रामक, कुंठित, निराश, हिंसक प्रवृत्ति को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बना लेता है. उस से छुटकारा पाने के लिए वह दान देता है, मंदिर में चढ़ावे चढ़ाता है और इस तरह वह बाबाओं के चक्कर व तमाम तरह के अंधविश्वासों में फंस जाता है.

देश में आधुनिकता और अंधविश्वास की आंधी एकसाथ चल रही है. समाजशास्त्रियों और चिंतकों के लिए यह बात हैरान व परेशान करने वाली है कि हम आधुनिक भी हो रहे हैं और अंधविश्वासी भी हो रहे हैं. दोनों काम एकसाथ चल रहे हैं. एक बड़े विरोधाभास के अंर्तद्वंद्व से भारतीय समाज गुजर रहा है.

जरा सोचिए, यदि एडिसन अंधविश्वास में विश्वास करते तो क्या वे दुनिया को रोशनी दे पाते, यदि न्यूटन अंधविश्वासी होते तो क्या वे गुरुत्वाकर्षण को जान पाते. जरूरत है कि अंधविश्वास की इस पट्टी को उतार कर फेंक दिया जाए और समाज, देश व पूरे विश्व में एक नई जनचेतना लाई जाए जिस में न ईर्ष्या हो, न द्वेष और न ही अंधविश्वास.

अगर इन गलतियों से बनाएंगी दूरी तो आप का रिश्ता होगा परफेक्ट

क्या आपने अपने साथी के साथ डेटिंग वाली स्टेज पूरी कर ली है? अगर हां तो अब आप एक सीरियस रिलेशनशिप में हैं. यह वक्त आपके रिश्ते का सबसे अच्छा या सबसे बुरा वक्त हो सकता है. यह अब आप पर निर्भर करता है कि आप इसे कैसा बनाते हैं.

वैसे तो बहुत सी ऐसी चीजें होती हैं जिन्हें करने से आपके रिश्ते खराब हो सकते हैं लेकिन ऐसी कुछ गलतियां है जो आपको एक सीरियस रिलेशनशिप में भूल कर भी नहीं करनी चाहिए. इन गलतियों को पूरी तरह से अवौइड करना चाहिए वरना आपका रिश्ता खतरे में पड़ सकता है.

रिश्ते बनाना तो बहुत आसान होता है लेकिन उन्हें संभालना मुश्किल होता है. एक अच्छे रिश्ते का मतलब केवल फूल देना और अच्छी जगह पर डिनर करना नहीं होता है.अगर आप अपने रिश्ते को और क्लोज बनाना चाहते हैं तो इन निम्नलिखित बातों पर ध्यान दें.

  1. रोमांस में कमी

एक समय पर आप संतुष्ट हो जाते हैं और भूल जाते है कि रिश्ते में प्यार और रोमांस भी जरुरी है. ऐसा माना जाता है की प्यार दिखाया नहीं समझा जाता है. अगर आप किसी से सच्चा प्यार करते हैं तो वो इंसान खुद ही आपके प्यार को समझेगा मगर कभी-कभी अगर अपने प्यार को जाहिर कर देंगे तो इससे आपके साथी को एक अलग खुशी मिलेगी.

आपके लिए जरुरी है कि रिश्ते में रोमांस को बनाएं रखें और इसे बरकरार रखने के लिये एफर्ट डालें. कभी-कभी प्यार जताकर अपने साथी को खास महसूस कराया जा सकता है.

  1. परफेक्ट पार्टनर की उम्मीद

इस दुनिया में कोई इंसान बिल्कुल परफेक्ट नहीं होता है इसलिए इसकी उम्मीद करना बेवजह है. हर चीज में अपने साथी को टोकते रहना और उसकी गलतियां निकालना सही नहीं है. अगर उनसे कोई गलती हो जाए तो उन्हें डांटने के बजाय समझाये. बार-बार उनकी गलती को गिनवाने से उनका आत्म-विश्वास कम होगा. बेहतर होगा कि आप अपनी उम्मीदें जरुरत से ज्यादा ना रखें. अगर कोई गलती भी हो जाए तो उसे दूसरों के सामने ना गिनाएं बल्कि उन्हें आपस में निपटा लें, उन्हें सुधारने का तरीका बताएं ताकि दोबारा उनसे वही गलती न हो जाए.

  1. आमना-सामना करने से बचना

बार हम सोचते हैं कि किसी भी झगड़े को खत्म करने के लिए उसके बारे में बात ही ना की जाए. बिना बात किए आपके सारे झगड़े खत्म नहीं होंगे बल्कि और ज्यादा बढ़ जाएंगे. अगर आप-दोनों के बीच लड़ाई हो तो उसका सामना करें. आमना-सामना करने से आप अपने बीच की समस्या को दूर कर पाएंगे.

इन झगड़ों को अपने साथी को बताने के बजाय दूसरों को बताने की गलती ना करें. ऐसा करने से लोगों के सामने आपका ही मजाक बनेगा. कोई आपकी समस्या का हल नहीं निकालेगा बल्कि आपको और निराश ही करेगा. कोशिश करें कि आप एक-दूसरे से आराम से बैठकर बात करें और अपने प्रोब्लम का हल खुद निकालें.

  1. ज्यादा बांधकर न रखें

अपने रिश्ते को थोड़ा स्पेस दें. ज्यादा दखल देना भी अच्छा नहीं होता है. जब आप प्यार में होते हैं तो आप चाहते हैं कि सभी चीजें साथ में करें लेकिन रिश्ते की शुरुआत में ही ऐसा ठीक लगता है. जैसे आप आगे बढ़ते हैं तो ज्यादा साथ रहना भी आपके रिश्ते को नुकसान पहुंचा सकता है. हर इंसान की अपनी एक लाइफ होती है और थोड़ा निजीं समय आपके रिश्ते को बेहतर बना सकता है.

  1. खुद को या साथी को बदलने की कोशिश

कभी भी अपने पार्टनर को खुश करने के लिए खुद को नहीं बदले या फिर अपनी खुशी के लिये साथी को बदलने की कोशिश ना करें. अगर आप प्यार में हैं तो आप जैसे हैं उन्हें वैसे ही अच्छे लगेंगे और आपको भी उन्हें ऐसे ही पसंद करना चाहिए. अगर कोई आपको बदलना चाहता है तो उन्हें आपसे ज्यादा दिखावे से प्यार है. प्यार करने का मतलब एक-दूसरे की हर छोटी-बड़ी चीजों से प्यार करना होता है. हर तरह से एक-दूसरे को समझना होता है.

इन 5 भारतीय क्रिकेटरों ने एक नहीं बल्कि 2 बार की शादी

बौलीवुड में आपने दो या अधिक शादियां करते तो सुना होगा. लेकिन क्या आपको पता है भारतीय क्रिकेट टीम के कई खिलाड़ियों ने भी दो शादियां की हैं. हम आपको आज भारतीय क्रिकेट टीम के उन प्लेयर्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने दो शादियां की.

खुशियों भरी जिंदगी

लाइफ में अपने पार्टनर के साथ कौन खुश नहीं रहना चाता है. लेकिन हर किसी के जिंदगी में कई ऐसे मोड़ आते हैं कि जब पार्टनर के साथ रहना मुश्किल हो जाए तो तलाक लेना पड़ता है. ऐसे में लाइफ को आगे बढ़ाने के लिए अहम निर्णय लेने होते हैं. फिलहाल हम आपको उन क्रिकेटरों के बारे में ही बता रहे हैं, जिनको लाइफ में इस दौर से गुजरना पड़ा या फिर किसी और कारणों से पार्टनर से अलग हुए. इसके बाद दोबारा विवाह किया.

दिनेश कार्तिक

चेन्नई के दिनेश कार्तिक की पहली शादी निकिता वंजारा के साथ 2007 में हुई थी. निकिता कार्तिक के बचपन की दोस्त थीं. यह जोड़ी कार्तिक के फैन्स को बहुत भाती थी.

जब कार्तिक ने निकिता से विवाह किया था, वह 21 वर्ष के थे. हालांकि, बचपन की दोस्ती होने के बाद भी कार्तिक और निकिता एकसाथ 5 वर्षों तक ही रह पाए.

2012 में कार्तिक को इस बात की जानकारी हुई कि वंजारा का अफेयर क्रिकेटर मुरली विजय के साथ चल रहा है. इसके बाद कार्तिक और निकिता के बीच तलाक हो गया था. इसके बाद कार्तिक को भारत की स्क्वैश खिलाड़ी दीपिका पल्लीकल मिलीं.

बता दें कि दीपिका को अर्जुन अवॉर्ड सम्मान मिल चुका है. 2015 में कार्तिक ने दीपिका को लंदन में प्रपोज कर दिया. इसके बाद दोनों ने ही शादी कर ली.

मोहम्मद अजहरुद्दीन

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और वर्तमान राजनीतिज्ञ मोहम्मद अजहरुद्दीन ने 1987 में विवाह कर लिया था. उनकी शादी हैदराबाद की 16 वर्षीय नूरीन से हुई थी. नूरीन से अजहर को दो बेटे हुए.

जिनके नाम मोहम्मद असदुद्दीन और मोहम्मद अयाजुद्दीन हैं. लेकिन अजहर और नूरीन 9 साल तक ही साथ रह सके. इसके बाद अजहर का दिल एक्ट्रेस संगीता बिजलानी पर आ गया.

1996 में दोनों एक दूसरे को डेट करने लगे और प्यार परवान चढ़ गया. अजहर ने नूरीन को तलाक देकर संगीता से विवाह कर लिया. हालांकि, अजहरुद्दीन की ये शादी भी 2010 में टूट गई.

संगीता से तलाक के बाद मीडिया में उनके प्यार की चर्चा अमेरिकन शैनन मारी को लेकर तेज हुई. लेकिन अजहरुद्दीन ने इस चर्चा को अफवाह करार दिया.

जवागल श्रीनाथ

आपको बता दें कि जगवाल श्रीनाथ पूर्व के महान क्रिकेटरों में शुमार रहे हैं. वह तेज गेंदबाजी के लिए जाने जाते थे. इस समय जगवाल आईसीसी मैच रेफरी के एलीट पैनल से जुड़े हुए हैं.

श्रीनाथ ने भी दो शदियां की हैं. 1999 वर्ल्ड कप के बाद ज्योत्सना से उन्होंने पहली शादी की थी. लेकिन दोनों अधिक सालों तक साथ नहीं रह सके और दोनों का तलाक हो गया. इसके बाद 2007 में श्रीनाथ ने माधवी पत्रावली से दूसरी शादी कर ली. माधवी अंग्रेजी अखबार में काम करती हैं.

विनोद कांबली

भारतीय क्रिकेट की दुनिया में विनोद कांबली का नाम कौन नहीं जानता. वह दुनिया के महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के बचपन के दोस्त हैं. कांबली की शादी नोएला लुइस से हुई थी. लेकिन कांबली और नाएला भी बहुत दिनों तक साथ नहीं रह पाए. इसके बाद कांबली ने आंद्रिया हेविट से रिश्ता जोड़ लिया.

हेविट एक मॉडल हैं. शादी के बाद कांबली ने क्रिस्चियन धर्म को स्वीकार कर लिया. हेविट से कांबली को 2010 में एक बेटा हुआ. जिसका नाम जीसस क्रिस्टियानो कांबली है.

युवराज सिंह के पिता योगराज

पूर्व भारतीय क्रिकेटर योगराज सिंह मौजूदा भारतीय क्रिकेटर युवराज सिंह के पिता हैं. हालांकि, योगराज क्रिकेट में काफी कम समय तक ही भारतीय टीम के सदस्य रहे. लेकिन क्रिकेट टीम से जुड़ने के कारण ही उनकी पहचान अच्छी बन गई.

योगराज का फिल्म इंडस्ट्री से भी गहरा नाता है. पंजाबी और फिल्म एक्टर के तौर पर भी जाने जाते हैं. उन्होंने मुस्लिम लड़की शबनम से शादी रचाई थी. शबनम, युवराज सिंह की मां हैं.

पारिवारिक तालमेल नहीं बैठने के कारण योगराज और शबनम का तलाक हो गया. इसके बाद उन्होंने दूसरी शादी सतवीर कौर से कर ली. सतवरी से उनको दो बच्चे हैं. जिनके नाम विक्टर और बेटी अमरजीत कौर हैं. उनकी पत्नी को लोग नीना सिद्द्धू के तौर पर भी जानते हैं.

हनीमून की तस्वीरें शेयर करने पर ट्रोल हुईं सौंदर्या

रजनीकांत की बेटी सौंदर्या रजनीकांत शादी के बाद एक फिर चर्चा में आ गई हैं. दरअसल 11 फरवरी को अभिनेता-उद्योगपति विशागन वनंगमुदी से चेन्नई के ‘द लीला पैलेस’ होटल में शादी करने वाली सौंदर्या ने हाल ही में अपने ट्विटर अकाउंट से अपनी हनीमून की कुछ तस्वीरें शेयर की थीं. जिसके बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें जमकर ट्रोल कर दिया है.

सौंदर्या ने जो फोटोज अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर की हैं, उन फोटोज में वे अपने पति विशागन वनंगमुदी के साथ नजर आ रही हैं. लेकिन सोशल मीडिया यूजर्स को सौंदर्या द्वारा इस समय इस तरह की फोटोज शेयर करना सही नहीं लगा है.

लोगों की इस राय का कारण था पुलवामा आंतकी हमला। हालांकि सौंदर्या ने भी एक पोस्ट के जरिए अपने देश के शहीद हुए भारतीय जवानों का शौक जाहिर किया था.

सौंदर्या की हनीमून फोटोज पर लोग अब नाराजगी दिखाते हुए कमेंट कर रहे हैं. इतना ही नहीं एक सोशल मीडिया यूजर्स ने तो सौंदर्या को कमेंट करते हुए कह दिया है कि, आप दो दिनों तक नहीं रुक सकती क्या. एंजॉय करना है करिए लेकिन इस तरह की कोई पोस्ट न करिए. बता दें कि 11 फरवरी को सौंदर्या रजनीकांत ने विशागन वनंगमुदी से शादी की थी. दोनों इन दिनों हनीमून इंजॉय कर रहे हैं.

 

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बता दें कि सौंदर्या ने विशागन से दूसरी शादी की हैं. इससे पहले उन्होंने साल 2010 में अश्विन कुमार से शादी की थी. अश्विन एक जाने-माने बिजनेसमैन भी हैं. सौंदर्या और अश्विन का एक बेटा भी है जिसका नाम वेद है. साल 2017 में सौंदर्या और अश्विन का कानूनी तौर पर डाइवोर्स हो चुका है.

सौंदर्या के पति विशागन वनंगमुडी की भी यह दूसरी शादी है. सौंदर्या से पहले विशागन ने एक मैगजीन एडिटर से शादी की थी. लेकिन बाद में दोनों अलग हो गए थे. इसके बाद अब विशागन नेसौंदर्या से शादी की है. विशागन एक एक्टर के अलावा एक अच्छे बिजनेसमैन भी हैं. वे एक दवा कंपनी के मालिक हैं. विशागन एक राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं. दरअसल विशागन के भाई एसएस पोनमुडी तमिलनाडु की पॉलिटिकल पार्टी डीएमके के बड़े नेता भी हैं.

क्या आपको पता है व्हाट्सऐप के ये 5 टौप सीक्रेट्स

व्हाट्सऐप हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. समय के साथ-साथ व्हाट्सऐप अपने फीचर में बदलाव करते रहता है जिसकी वजह से यूजर्स को इससे दूर हटने का मौका नहीं मिल पाता है. व्हाट्सऐप यूजर्स की डिमांड को ध्यान में रखते हुए हमेशा अपग्रेड होते रहता है. एकबार फिर से व्हाट्सऐप अपने यूजर्स के लिए अच्छी खबर लेकर आया है. इसमें 5 फीचर्स ऐसे हैं जिन्हें जानना यूजर्स के लिए बेहद जरूरी है.

व्हाट्सऐप पर देखें यूट्यूब वीडियो

सबसे खास फीचर की बात करें तो इसमें व्हाट्सऐप में ही यूट्यूब वीडियो देखा जा सकेगा. साथ ही यूजर्स लाइव वीडियो देखते हुए चैट भी कर सकेंगे. अभी तक व्हाट्सऐप पर मिलने वाले यूट्यूब लिंक के लिए अलग विंडो खुलती थी और यूजर्स यूट्यूब ऐप पर स्विच कर जाते थे. लेकिन, अब नए अपडेट के बाद ऐसा नहीं होगा. क्योंकि, आप सीधे व्हाट्सऐप पर ही यूट्यूब का वीडियो देख सकेंगे. दरअसल, यह फीचर पिक्चर इन पिक्चर (PiP) को सपोर्ट करेगा. इसके अलावा यूजर्स अब वीडियो देखते हुए चैट भी कर सकते हैं.

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फोटो और वीडियो में स्टीकर

व्हाट्सऐप यूजर्स फोटो और वीडियो को स्टीकर के साथ भेज सकते हैं. अभी तक स्टीकर का औप्शन सिर्फ फेसबुक पर मिलता था, लेकिन अब व्हाट्सऐप पर भी यह उपलब्ध है. यह फीचर एड होने से यूजर्स को चैट औप्शन में स्टीकर मिलता है. यूजर्स अपनी फोटो और वीडियो को यूनिक स्टीकर्स के साथ भेज सकते हैं. यूजर्स को फोन में लाइव लोकेशन को शेयर करने की सुविधा भी मिलती है. लाइव लोकेशन शेयरिंग फीचर आईफोन और एंड्रौयड फोन में पिछले साल अक्टूबर से उपलब्ध है. यूजर्स अपनी कौन्टैक्ट लिस्ट में से किसी के साथ अपनी लाइव लोकेशन शेयर कर सकते हैं. वहीं, स्टीकर फीचर का इस्तेमाल आप पर्सनल चैट या ग्रुप चैट के दौरान कर सकेंगे.

दोस्तों को करें मनी ट्रांसफर

वहाट्सऐप ने मनी ट्रांसफर सर्विस शुरू कर दी है. इस पर आप किसी भी खाता धारक को यूनीफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) के जरिए पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, ये पहला मोबाइल ऐप होगा जो डिजिटेल पेमेंट के लिए मल्टी-बैंक पार्टनरशिप पर काम करेगा. व्हाट्सऐप ने जून 2017 में अपनी इंस्टेंट पेमेंट सर्विस शुरू करने के सिलसिले में स्टेट बैंक औफ इंडिया और एनपीसीआई जैसी वित्तीय संस्थाओं से बातचीत की थी. इस मैसेंजर एप के जरिए आप दोस्तों को पैसे भी भेज सकते हैं. इस फीचर की शुरुआत एंड्रौयड व आईओएस यूजर्स के लिए व्हाट्सऐप बीटा पर यूपीआई (यूनिवर्सल पेमेंट इंटरफेस) की शुरुआत भी हो गई है.

मैसेज डिलीट की सुविधा

व्हाट्सऐप यूजर्स के लिए यह फीचर सबसे कमाल का है. नया फीचर delete for everyone से गलती से भेजे गए मैसेज को वापस लिया जा सकता है. आईओएस और विंडोज फोन यूजर्स के लिए रीकौल फीचर शुरू होने के बाद से सबसे ज्यादा चर्चा में है. व्हाट्सऐप के रीकौल फीचर डिलीट फार एवरीवन के तहत गलती से कोई मैसेज सेंड कर दिया तो उसे आप वापस ले सकते हैं. हालांकि, इसकी अवधि सिर्फ 7 मिनट की है. उसके बाद यह मैसेज डिलीट नहीं होगा. इसके अलावा अगर जिसे आपने मैसेज भेजा है और उसने इसे पढ़ लिया है तो भी मैसेज डिलीट करने का कोई फायदा नहीं है.

लास्ट औनलाइन छुपाकर रखें

वैसे व्हाट्सऐप बाई डिफौल्ट लास्ट सीन और रीड रीसीट का औप्शन औन रखता है. लेकिन आप इसे सेटिंग में जाकर बदल सकते हैं. लेकिन जब आप इसे डिस्बेल करेंगे यानी आप यह औप्शन सिलेक्ट करेंगे कि कोई आपके द्वारा पढ़ी गई चैट का वक्त न देख पाए और न ही आखिरी बार आपने कब व्हाट्सऐप देखा था यह न देख पाए, तब आप भी दूसरों के ये दोनों ऐक्शन्स नहीं देख पाएंगे. आपकी प्रोफाइल पिक, स्टेटस मेसेज भी बदले जा सकते हैं. इसके लिए आप  Everyone (हर कोई देख सकता है), My contacts (सिर्फ मेरे कौन्टेक्ट्स देख सकते हैं) और Nobody (कोई नहीं देख सकता है) के बीच से किसी भी औप्शन को चुन सकते हैं. इसके लिए Settings > Account > Privacy में जाकर बदलाव करें.

बातों ही बातों में कितनी बात बढ़ाएं

आजकल तान्या के किसी ग्रुप में शामिल होते ही लोग धीरेधीरे खिसकने लगते हैं. उस की बात शुरू होते ही कुछ लोग काम का बहाना ढूंढ़ निकल लेते हैं, या कुछ कन्नी काटते हैं. परेशान सी तान्या मन ही मन कुढ़ती रहती है. बहुत दिनों से इस बात पर वह गौर कर रही है कि वह किसी भी ग्रुप में शामिल होती है तो लोग धीरेधीरे सभा खत्म करने की फिराक में रहते हैं. आखिर ऐसा क्यों होता है?

संदीप के साथ भी अब ऐसी ही स्थिति है. औफिस में उस के बोलते ही लोग एकदूसरे को देख अजीब सा मुंह बनाने लगते हैं या हंस देते हैं. घर पर पत्नी भी ‘अभी आई’ या ‘रसोई में काम पड़ा है’ कह कर कन्नी काट लेती है. बेटियां भी कुछ देर ऊबभरी नजरों से देख कर संदीप से ही उलटा पूछ लेती हैं, ‘पापा, मैं पढ़ाई करने जाऊं?’ जबकि संदीप जब बात नहीं कर रहा होता तो ये बच्चियां अपने हंसीखेल में मस्त रहती हैं.

क्या है माजरा?

बोलना हमारेआप के व्यक्तित्व का अहम हिस्सा है. कुदरत का दिया यह एक अच्छा जरिया है जो इंसान के लिए न सिर्फ अभिव्यक्ति होने पर जीने को आसान बनाता है बल्कि इस के सही इस्तेमाल से वह उच्च पद पर प्रतिष्ठित भी हो सकता है. इसलिए इस बोलने की ताकत का सही इस्तेमाल करना जरूरी है. यह बोलने की ताकत यानी वाकशक्ति का दुरुपयोग ही है कि इस के चलते झगड़े, घृणा, बदला लेने की भावना उभरती है और आजकल तो सोशल मीडिया पर निरर्थक संदेशों से दिमागी सुकून ही छिन गया है.

साइबर बुलिंग से ले कर दूसरे कई अपराध ज्यादा बोलने और निरर्थक बोलने के कारण ही होते हैं.

ज्यादा बोलने के दुष्परिणाम : तान्या को याद करें, वह जब भी किसी ग्रुप में शामिल होती, हमेशा खुद की बड़ाई करने लग जाती. और तो और, दूसरों के बारे में नकारात्मक बातें गिनाना नहीं भूलती. ‘साधना को देखा था उस दिन पार्टी में, कितने चिपके हुए कपड़े पहने थी. मैं तो हमेशा ढंग के कपड़े पहनना पसंद करती हूं.’ या फिर ‘अरे रीमा की बेटी को मैं ने मार्केट में एक लड़के के साथ बातें करते देखा. रीमा को अपनी बेटी का जरा भी ध्यान नहीं. मैं तो अपनी बेटी के हर पल का हिसाब रखती हूं.’

दूसरों की बुराई करते हुए वह हमेशा अपनी तारीफ के रास्ते तैयार करती है. यह उस की आदत बन चुकी है. वह समझ ही नहीं पाती कि उस का इस तरह ज्यादा बोलना सुनने वालों को अच्छा नहीं लगता है.

संदीप के ऐसे ही हाल हैं. अकसर वह कहता है, ‘मैं यह जानता हूं.’ ‘मैं ने ऐसा कहा था,’ ‘मेरी बात नहीं मानी, तभी ऐसा हुआ,’ ‘मुझे सब पता है.’ उस के इस घमंडी ‘मैं’ की वजह से साथी उस से कन्नी काटते हैं. पर संदीप को यह समझ नहीं आती कि उस का ‘मैं’ को स्थापित करने की होड़ में बेकार बातें बढ़ाना किसी को रास नहीं आता.

साइबर बुलिंग : साइबर बुलिंग भी आज एक अहम मुद्दा है. लोग बोलने की शक्ति का औनलाइन या सोशल मीडिया के जरिए गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. कुछ सालों से युवा होते बच्चे अपनी आपसी लड़ाई, जलन, कंपीटिशन वगैरह को सोशल मीडिया के प्लैटफौर्म पर ले आए हैं.

कभीकभी तो हकीकत में अपराध को अंजाम देना खुद को दूसरों पर थोपने का नतीजा होता है.

साइबर बुलिंग की तरह ज्यादा बोलना एक तरह से खुद को पूरी तरह उजागर कर लेना है. खुद के पूरे व्यक्तित्व को हर किसी के सामने उजागर कर अपनी सुरक्षा को दांव पर लगाना बुद्धिमानी नहीं है. गुस्से में जब लोग ज्यादा बोलते हैं,

तो उन में नापनेतोलने की क्षमता या समझ खत्म सी हो जाती है. इस तरह व्यक्ति खुद के बारे में पूरी जानकारी जानेअनजाने सार्वजनिक कर देता है.

सोशल मीडिया में ऐसा आएदिन होता है. इस से व्यक्ति की साख तो गिरती ही है, उस की सुरक्षा को भी खतरा पैदा हो सकता है.

क्यों करते हैं बेकार बातें

ज्यादा और बेकार की बातें करने के पीछे लोगों की खास मानसिक दशा काम करती है. मसलन :

ज्यादा बर्हिमुखी व्यक्तित्व : कुछ इंसानों का मन बाहरी विषयों में उलझा रहता है. ऐसे लोगों में शर्म की भावना कम होती है. वे नतीजे पर गौर किए बिना अपनी राय रखते हैं और उस पर जोर दिया करते हैं.

जब कम हो आत्मविश्वास : ऐसे व्यक्ति अपनी प्रशंसा में लगे रहते हैं ताकि लोगों से उन्हें तारीफ मिले और उन के आत्मविश्वास में इजाफा हो.

खुद को अच्छा साबित करना : जब व्यक्ति में खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने की चाह हो, तो वह कई तरह की बातें बना कर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचता है.

प्यार और बड़ाई की चाह : ऐसे भी लोग होते हैं जो पलभर को भी उपेक्षित नहीं महसूस होना चाहते, हमेशा अपनी ओर दूसरों का ध्यान खींचना चाहते हैं. ऐसे लोग भीड़ में या सोशल मीडिया पर बेकार की बातें बोलते रहते हैं.

निंदा करने की फितरत : कुछ लोग दूसरों की निंदा करते रहते हैं. उन्हें दूसरों के बारे में बुरी बातें फैला कर खुशी मिलती है. इस से उन का मनोरंजन होता है.

बेकार की ज्यादा बात करने वाले लोगों की ऊर्जा तो बरबाद होती ही है, साथ ही लोग उन के साथ से भी कतराते हैं. कई बार ऐसे लोगों को सोशल मीडिया में ब्लौक भी कर दिया जाता है.

यों बनाए व्यक्तित्व

अपना व्यक्तित्व शालीन रखने और दूसरों के बीच अपनी इज्जत बनाए रखने के लिए बातूनी होने से बचना बेहद जरूरी है. एक बार उन बिंदुओं पर गौर कर लें जिन से बेकार की बातों से बच कर एक गरिमामय व्यक्तित्व का निर्माण हो सकता है.

–     बात जरूरत से ज्यादा कही जा रही है तो उसे महसूस करें. जब भी लगे कि इतनी ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं, तो खुद को रोक लें.

–     हर परिस्थिति या हर किसी की बात पर प्रतिक्रिया देने से बचें. ‘जाने दें’ का रवैया अपनाएं.

–     किसी ग्रुप में बात कर रहे हों तो लोगों के भाव देख कर समझ सकते हैं कि लोेगों का आप की बात पर ध्यान नहीं है. अगर वे दूसरे कामों में खुद को बिजी कर रहे हैं तो समझ जाएं कि आप पर अब बातूनी होने का ठप्पा लगने ही वाला है.

–     हमेशा अपनी तारीफ या दूसरों की निंदा करने से बचें. जरूरी नहीं है कि आप की बातें दूसरों को अच्छी लगें.

–     दूसरों की बातें सुने बिना ही अपना राग अलापना, असभ्य लोगों की निशानी है. दूसरों की सुनें, तब अपनी कहें.

–     दिमाग में बात आते ही बोल न पड़ें, बल्कि कहने से पहले उसे परख लें.

–     दिमाग को व्यवस्थित रखें. सोचसमझ कर अपनी बात दूसरों तक पहुंचाएं.

मौन कई बार शब्दों में ज्यादा मुखर होता है. सो बेवजह मौन न रहें. बोलें लेकिन गैरजरूरी शब्दों का इस्तेमाल भी न करें. बोलना मना नहीं है, न हमेशा मौन रहना. दरअसल, मौन के सौंदर्य को महसूस करें और उसे निखरने दें.

निरर्थक बोलने से अच्छा है आप का गरिमापूर्ण मौन.

तकरार से बिखरते परिवार      

शाम 6 बजते ही जहां सब को घर निकलने की जल्दी होती थी, वहीं संतोष पूरी तसल्ली से अपने कंप्यूटर में सिर घुसाए बैठे रहते थे. काम भी ऐसा ज्यादा नहीं था कि औफिस टाइम में खत्म न हो, उन की पत्नी का कहना है कि वे कभी 9 बजे से पहले घर पहुंचते ही नहीं हैं.संतोष का घर जाने का जैसे मन ही नहीं करता, वे 9 बजे तक वहां क्या करते हैं, वही जानें.

संतोष का कहना है, ‘‘घर पहुंचते ही निशा दिमाग खाने लगती है. हमेशा हमारा किसी न किसी बात पर झगड़ा हो जाता है. इस से तो अच्छा है कि देर से जाओ और खाना खा कर चुपचाप सो जाओ, फिर सुबह निकल लो.’’

बीते 3 दशकों में भारतीय परिवारों में घरेलू हिंसा, दहेज और तलाक के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. आम धारणा यह है कि पारिवारिक कलह और बिखराव का मुख्य कारण औरतें हैं, जो अपने अहं के कारण अपने पति व परिवार के दूसरे लोगों को महत्त्व नहीं देती हैं.

ऐसे बहुतेरे लोग हैं जिन का वैवाहिक जीवन गड़बड़ाया रहता है, पर वे उसे संभालने की कोशिश नहीं करते. शायद वे उसे नियति मान लेते हैं या फिर महिलाओं की अपेक्षाओं पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझते. वे गृहस्थी को ढोल की तरह गले में लटकाए चलते हैं. समाज में गृहस्थी को बोझ बताने वाले लोगों की कमी नहीं है, लेकिन इसे ऐसा मसला नहीं माना जाता जिस पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए.

डाक्टर कहते हैं कि वैवाहिक जीवन की अशांति हमारे मन पर ही नहीं, तन पर भी गहरा असर डालती है. इस के चलते महिलाएं गंभीर रोगों, जैसे डायबिटीज, ब्लडप्रैशर, हार्ट की समस्याएं, व्यग्रता, मानसिक असंतुलन, भूलने की बीमारी, तनाव आदि की शिकार हो जाती हैं, तो पुरुष भी तनाव, हाई ब्लडप्रैशर, हार्ट व मैंटल डिजीज के शिकार बनते हैं.

pati patni takrar

अमेरिका के ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, वैवाहिक झगड़ों का स्वास्थ्य पर घातक असर पड़ता है. पतिपत्नी के रोजाना के झगड़े उन के पाचनतंत्र पर भी गहरा असर डालते हैं. लगातार मानसिक अशांति और लड़ाईझगड़ों से एसिडिटी, कब्ज और यहां तक कि आंतों में छेद तक हो जाता है, जिस से अनपचा खाना और बैक्टीरिया खून में मिल सकते हैं. नतीजतन, पेट में सूजन और दूसरी तरह की बीमारियां होती हैं.

शोधकर्ता कहते हैं कि ज्यादातर बीमारियों की शुरुआत स्ट्रैस यानी तनाव से होती है और आज के वक्त में लगभग हर घर में किसी न किसी प्रकार का तनाव पसरा हुआ है.

अगर आप का पार्टनर आप का स्ट्रैस दूर करता है तो आप स्वस्थ रहते हैं, लेकिन जब वही स्ट्रैस देने लगता है तो आप के शरीर पर कई तरह के दुष्प्रभाव पड़ने लगते हैं. 65 वर्षीय रणवीर कपूर कहते हैं कि उन से 10 साल छोटे उन के भाई की मौत सिर्फ इसलिए हो गई क्योंकि उस की अपनी पत्नी से नहीं बनती थी. वैवाहिक जीवन को सुखद बनाने का हरसंभव प्रयास करना चाहिए.

सासबहू विवाद के नए ढंग

शीला कहती है, ‘‘मेरे सासससुर भले दूसरे घर में रहते हैं, मगर मेरी सास इतनी शातिर है कि फोन करकर के मेरे पति को मेरे खिलाफ भड़काती रहती है. कोई न कोई ऐसी बात कह देती है कि ये मुझ से लड़ाई कर लेते हैं. फिर हफ्तों बात नहीं करते. जब लड़ाई करते हैं तो फिर हर रोज रात को शराब पी कर आने लगते हैं और इस का सारा दोष मुझे देते हैं कि मैं उन की मां की इज्जत नहीं करती. हमारे बीच लड़ाईझगडे़ का असर मेरी बड़ी हो रही बेटी पर भी पड़ रहा हैं.’’

सासबहू का रिश्ता भारतीय परिवारों में सब से खराब रिश्ता माना जाता है. इन दोनों की आपस में कभी पटती नहीं है. सास भले उम्र में बहू से बड़ी हो मगर वह हर बात में उस का मुकाबला करने और अपना हाथ ऊपर रखने की कोशिश करती है. वहीं, शिक्षित और नौकरीपेशा बहुएं भी सास की बातों को सहने के बजाय दोटूक जवाब देती हैं. ताली दोनों  हाथों से बजती है. अब ज्यादातर संयुक्त परिवार टूट चुके हैं, जेठानीदेवरानी, भाभीननद के बीच तूतूमैंमैं के मौके बहुत कम हो गए हैं.

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घर बना साजिशों का अखाड़ा

भारतीय समाज में सासबहू या ननदभाभी में नोकझोंक हमेशा से होती रही है, लेकिन जब इस रिश्ते में इतनी कड़वाहट आ जाए कि उस का असर पतिपत्नी को तलाक की तरफ ढकेलने लगे तो बेहतर होगा कि संयुक्त परिवार से अलग हो जाएं. ज्यादातर संयुक्त परिवारों के टूटने का कारण भी यही है. एकल परिवारों के मुकाबले संयुक्त परिवारों में पौलिटिक्स ज्यादा होती है, क्योंकि वहां सास, बहू, ननद, जेठानी सभी अपनीअपनी सत्ता बनाना चाहती हैं. जहां उन्हें लगने लगता है कि उन का वर्चस्व कम हो रहा है, वहां वे अपनी तिकड़मों से एकदूसरे को कमतर दिखाने को तत्पर हो जाती हैं. फिर चाहे इस के लिए उन्हें कुछ भी क्यों न करना पड़े, वे हिचकती नहीं हैं.

रंजना की सास उस से इसलिए चिढ़ती थी क्योंकि रंजना बेहद खूबसूरत थी और बड़े सलीके से कपड़े पहनतीओढ़ती थी. वह पढ़ीलिखी तो थी ही, उस का बात करने का लहजा भी काफी मधुर था. लिहाजा, ससुराल आते ही सब का स्नेह उसे मिलने लगा, खासतौर पर बाबूजी और उस के जेठ का. पति तो पहले ही रंजना का गुलाम था. बस, यही बातें सास के लिए जलन का सबब बन गईं और उस ने छोटीछोटी बातों पर उसे टोकनाडांटना शुरू कर दिया.

मजबूरी में रंजना ने हमेशाहमेशा के लिए अपनी ससुराल छोड़ दी. शुरूशुरू में बाहर से आई लड़की पर अपना वर्चस्व दिखाने की चाहत में सास उस के कामों में कमियां निकाल कर टोकाटाकी करती है, वहीं बहू भी अपनी प्रतिभा दर्शाने की इच्छुक होती है. छोटीछोटी बातों को ले कर दोनों के बीच मतभेद शुरू होता है.

जैसे, अगर नई बहू ने सास की मरजी के बिना रसोई में कोई बदलाव कर दिया तो यह सास को नागवार गुजरता है या बेटे ने किसी बात में अपनी पत्नी का साथ दे दिया तो सास को यह लगने लगता है कि बहू ने उन का बेटा छीन लिया.

सारी बातें धीरेधीरे दोनों के रिश्ते में कड़वाहट घोलने लगती हैं और फिर घर, घर न रह कर राजनीति का अखाड़ा बन जाता है, जिस में सासबहू अपनीअपनी चालों से एकदूसरे को शिकस्त देने की नापाक कोशिशों में जुट जाती हैं.

घरेलू राजनीति के संबंध में गुरुग्राम के एक कौल सैंटर में कार्यरत शालिनी अरोड़ा कहती हैं, ‘‘मेरी शादी को 12 साल हो चुके हैं. मेरे 2 बच्चे हैं, 10 साल की बेटी और 8 साल का बेटा. जब तक मैं सासससुर के साथ थी, आएदिन मेरा घरेलू राजनीति से सामना होता रहता था. अब उन से दूर हूं तब भी उन की पौलिटिक्स मेरा पीछा नहीं छोड़ रही है.’’

ससुराल में असुरक्षा

रिश्तों में वर्चस्व की सनक घरघर में देखने को मिलती है. कई बार तो सास और ननदें इस कवायद में लगी रहती हैं कि बेटेबहू में ज्यादा नजदीकियां न बढ़ें, वरना उन का बेटा या भाई उन से दूर हो जाएगा.

महजबीन के निकाह के हफ्तेभर बाद ही उस का पति सऊदी अरब वापस चला गया. वहां वह एक मोटर कंपनी में 2 साल के कौंट्रैक्ट पर गया था. उस की सासननद अकसर महजबीन के सांवले रंग को ले कर उसे ताने मारतीं और कहतीं कि देखना, जमाल एक दिन तुम को तुम्हारे रंग की वजह से छोड़ देगा.

दिनभर घर के कामों में खपती महजबीन रातरातभर बिस्तर पर पड़ी सुबकती रहती थी. जब कईकई दिन जमाल का फोन नहीं आता तो वह घबरा जाती थी. वह बड़ी असुरक्षित सी जिंदगी जी रही थी. पति का फोन आने पर वह शक जाहिर करती कि जमाल को जरूर वहां कोई हूर मिल गई है, इसलिए वह उसे फोन तक नहीं करता. जमाल उसे लाख समझाता कि ऐसा कुछ नहीं है, वह बस बिजी रहता है. मगर महजबीन के भोलेमन में सासननद की बातें घर कर गई थीं, लिहाजा वह पूरे वक्त तनाव में रहती थी.

शादी के बाद 2 साल उस ने ससुराल में डरडर कर जीवन जिया. हर वक्त बड़ों की सेवा और छोटों की देखभाल में लगी रही कि कहीं उस की कोई गलती उसे इस घर से दूर न कर दे. मगर 2 साल का कौंट्रैक्ट खत्म होने पर जब जमाल वापस आया तो उस की अपनी पत्नी से मोहब्बत कहीं भी कम न थी. उस ने महजबीन पर भरपूर प्यार लुटाया. उस का प्यार देख कर उस की सासननद जलभुन कर रह जाती थीं.

धीरेधीरे बहू के साथ उन के संबंधों में इतनी कड़वाहट आ गई कि महजबीन और जमाल को अपने 2 बच्चों के साथ अलग घर में शिफ्ट होना पड़ा.

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जहर बोती बाबागीरी

वैसे तो आम धारणा ठूंसी जा चुकी है कि औरतों को धर्म का पालन करना चाहिए, धर्मगुरुओं की सेवा करनी चाहिए, उन के प्रवचन सुनने चाहिए, उन की कही बातों को मानना चाहिए. लेकिन जिस तरह के प्रवचन सत्संगों में होते हैं, उस तरह के प्रवचनों को सुनने के बजाय यदि महिलाएं घर में रह कर अच्छी किताबें, अखबार, पत्रिकाएं पढ़ें तो शायद उन के परिवार में ज्यादा शांति और सुख फैलेगा.

प्रपंच रचने में वही महिलाएं ज्यादा तेज होती हैं जो प्रवचनों को सुनने में अपना ज्यादा समय देती हैं. घर के सदस्यों के बीच दरार डालने और घर को तोड़ने में धर्मगुरु और पुजारी भी हमेशा बड़े दोषी साबित होते हैं.

पौराणिक युग से आज तक धार्मिक प्रवचनों की ओर ज्यादातर महिलाओं का झुकाव देखने को मिल रहा है, वह फायदे से ज्यादा नुकसान का सबब बन रहा है. पोंगापंडित और धर्मगुरु औरतों को बांधे रखने के लिए अपने प्रवचनों में सासबहू के रिश्तों की बातें, कैसे सास को छकाया जाए या कैसे बहू को अपनी मुट्ठी में रखा जाए, आदि हमेशा खूब करते रहे हैं.

ये बातें अकसर औरतों के मन की होती हैं, इसलिए धर्मगुरुओं के आश्रम आबाद रहते हैं. धर्मगुरु इस के लिए तावीज, भभूत तक बांटते हैं. तंत्रविद्या, जप, अनुष्ठान आदि भी बताते हैं. बहू के आने से असुरक्षित महसूस करने वाली सास अकसर इस तरह के उपायों की तलाश में ही धर्मगुरुओं के चक्कर काटती हैं.

इन सत्संगों में ज्यादातर महिलाएं अपनी बहुओं की शिकायतें ले कर ही पहुंचती हैं. बहू के प्रति मन में शंका, जलन और मैल ले कर धर्मगुरुओं की सलाह पर चलने वाली महिलाएं ही अकसर अपने घर को तोड़ने की दोषी होती हैं.

यह उसी तरह का विषबीज है जैसा धर्मगुरु पराए धर्मवाले के समाज में सदियों से बोते रहे हैं. यूरोप में यहूदियों के प्रति घृणा और भारत में मुसलमानों के प्रति विद्वेष की जड़ वही धर्मगुरु हैं जो घरों में सासबहू के बीच वैमनस्य पैदा करते हैं.

बुद्धू बक्से का बवाल

परिवारों को तोड़ने, औरतों को उकसाने और भ्रांति फैलाने में टैलीविजन पर आने वाले पारिवारिक व सासबहू स्पैशल धारावाहिक भी अपनी भूमिका बखूबी अपनी तथाकथित धार्मिक जिम्मेदारी के तहत निभाते हैं. भारतीय समाज में पारिवारिक संबंधों में लगातार गिरावट के दोषी ये अर्धधार्मिक धारावाहिक ही हैं. कम पढ़ीलिखी औरतों के दिमाग पर इन धारावाहिकों का व्यापक असर पड़ता है और वे अपने घर के सदस्यों के साथ वैसी ही हरकतें करने लगती हैं, जैसा कि वे सीरियल की औरतों को करते हुए देखती हैं.

आजकल जो धारावाहिक चल रहे हैं उन में ज्यादातर ऐसी औरतें दिखाई जा रही हैं जो परिवार में राजनीतिक चालें चलती दिखाई देती हैं.

तू डालडाल…

ऐसा नहीं है कि सिर्फ घर की महिलाएं ही राजनीति करती हैं. इस मामले में कभीकभी पुरुष भी कम नहीं होते. पुरुष का दिमाग कुचक्र रचने में औरतों से चारकदम आगे ही चलता है.

अंकुर का सपना था कि वह विदेश जाए और वहां सैटल हो, मगर संयुक्त परिवार के दबाव में उस का यह सपना पूरा नहीं हो पा रहा था. पढ़ाई पूरी होने के बाद उसे बेमन से परिवार के व्यापार में खुद को झोंकना पड़ा. पिता और बड़े भाई के साथ उसे दुकान के काम में जुटना पड़ा.

शादी के बाद जब रजनी उस के जीवन में आई तो उस ने रजनी को हथियार बना कर खुद को परिवार से अलग कर लिया. इस के लिए उस ने बड़ी शातिराना चालें चलीं. एक ओर उस ने रजनी के दिल में अपनी मां, भाभी और बहन के लिए कड़वाहट बोई, तो वहीं उन के दिलों में रजनी के प्रति.

इस से पहले घर में महिलाओं के बीच झगड़े शुरू हुए और उस के बाद पुरुषों में भी तूतूमैंमैं शुरू हो गई. 2 साल के अंदर ही अंकुर घर और दुकान में अपना हिस्सा ले कर रजनी के साथ अलग हो गया और 6 महीने के भीतरही उस ने कनाडा जाने की योजना बना डाली.

पैसों का पेच आखिर वे क्या कारण हैं कि घर के सदस्य एकदूसरे के खिलाफ नफरत उगलने लगते हैं. मनोचिकित्सक डा. राजेंद्र सरकार कहते हैं, ‘‘जब किसी को ऐसा लगता है कि घर में किसी नए सदस्य के आने से उस का वजूद खतरे में पड़ने वाला है, या उस के अधिकार सीमित होने वाले हैं, या उस को ज्यादा तवज्जुह मिलनी बंद होने वाली है तो उस के अंदर असुरक्षा की भावना पनपने लगती है. ऐसा अधिकतर घर की बड़ी उम्र की औरतों के साथ होता है, यानी लड़के की मां या बहन के साथ.’’

निम्न और मध्यवर्गीय परिवारों में पैसे की तंगी भी घर के बिखराव का अहम कारण होती है.

पैसे की तंगी के चलते बेटे अपने बीवीबच्चों को ले कर मातापिता और भाईबहनों से अलग हो जाते हैं. ऐसे हालात से आज ज्यादातर भारतीय परिवार जूझ रहे हैं.

बीवी हूं, कामवाली नहीं

ज्यादातर भारतीय घरों में बहू के आने के बाद सास रसोई और घर के दूसरे कामों से अपना हाथ खींच लेती हैं. वे सेठानी की तरह पलंग पर बैठ कर हुक्म चलाना चाहती हैं. सास को लगता है कि बेटा अपने लिए बीवी नहीं, बल्कि उन के लिए नौकरानी ब्याह कर लाया है.

वहीं, कुछ महिलाओं का मानना है कि जीवनभर तो उन्होंने काम किया, अब बहू आ गई है तो अब वही सबकुछ संभालेगी और वे आराम करेंगी. इसी सोच के तहत वे सारी जिम्मेदारी बहू के कंधे पर डाल कर काम से तो हाथ खींच लेती हैं, लेकिन परिवार पर से अपना वर्चस्व नहीं त्यागना चाहतीं. यानी उन के अनुसार ही बहू काम करे, उन की ही पसंद की चीजें बनाए, उन के ही अनुरूप घर को सजाएसंवारे.

एक समय ऐसा भी आता है जब बहू नाजुकता और शालीनता का नाटक करतेकरते ऊब जाती है और अपनी वही सामान्य जिंदगी जीना चाहती है, जो अपने मायके में जीती आई है.

लेकिन उस के व्यवहार में जैसे ही अंतर आना शुरू होता है, सास की भृकुटी तन जाती है. बुरे बोल और ताने शुरू हो जाते हैं. क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और घर जंग का मैदान बन जाता है.

जिस तरह एक हाथ से ताली नहीं बजती, ठीक उसी तरह पारिवारिक संबंधों में प्यार और सौहार्द लाने के लिए सास और बहू दोनों को एकदूसरे को सहयोग देने की जरूरत होती है.

इन दोनों का रिश्ता ठीक रहे, इस के लिए घर के मर्दों को भी रिश्तों में पूरी ईमानदारी व समझदारी दिखाने की जरूरत है.

जिसे हम प्यार करते हैं और जिस पर हमें पूरा यकीन होता है, उस के द्वारा बेवफाई किए जाने की बात सोच कर ही इंसान अंदर से टूट जाता है. हकीकत जो भी हो, मगर शक का कीड़ा रिश्ते की दीवार कमजोर करने लगता है और परिवार टूटने लगता है. बेहतर है कि समय रहते मन में चल रहे ऊहापोह को जीवनसाथी के आगे जाहिर कर दें और शादी के समय एकदूसरे के प्रति वफादार रहने के किए वादे को निभाएं.

रिश्तों की डोर नाजुक होती है, खासकर जब रिश्ता पतिपत्नी का हो. छोटीछोटी बातें रिश्तों में शक पैदा करती हैं. कई दफा हम गलतफहमी के शिकार भी हो जाते हैं. इसलिए, जल्दबाजी न करें. आवेश में आ कर फैसला न लें. जब तक हकीकत पता न चल जाए तब तक शांत रहें और ठंडे दिमाग से सोचें.

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सच जाने बगैर…

जीवनसाथी जब बातें छिपाने लगे, आप से छोटीछोटी बातों में झगड़ने लगे, उस के बरताव में अचानक खासी तबदीली आने लगे और वह जरूरत से  बहुत कम या बहुत ज्यादा रोमांटिक होने लगे, तो समझें कि मामला गड़बड़ है.

जीवनसाथी अपने मोबाइल और कंप्यूटर के पासवर्ड सीक्रेट रखें ताकि आप उन के मैसेजेस, कौल्स व मेल्स आदि चैक न कर सकें तो आप को गंभीरता से विचार करना चाहिए.

जीवनसाथी किसी से मीठे स्वर में घंटों बातें करता रहता है और आप को आसपास देख कर असहज हो जाता है, तो समझें कि आप का शक वाजिब है. कोशिश करें कि आप उस नंबर को नोट कर लें. हमारे आसपास ऐसी बहुत सी एजेंसियां और इंटरनैट पर विकल्प उपलब्ध हैं जिन के जरिए फोन ट्रेस कर के सचाई का पता लगाया जा सकता है.

चीटर हो पार्टनर

जब पता चलता है कि पार्टनर धोखा दे रहा है तब जो दुख, पीड़ा और चोट पहुंचती है वह शब्दों में बयां करना मुश्किल है. पर हिम्मत हारने से काम नहीं चलता. आप उस रिश्ते को वापस मजबूत भी बना सकती हैं.

सब से पहले तो अपने पार्टनर पर चीखनेचिल्लाने से बचें. आप को शांत और ठंडे दिमाग से इस परिस्थिति से निबटना होगा. तार्किकरूप से जिंदगी के हालात पर विचार करना होगा.

पार्टनर से बात करें. यदि मन में जीवनसाथी को ले कर शक के भाव गहरा रहे हैं तो इन्हें मन में दबाए रखने से बेहतर है कि जीवनसाथी से खुल कर बात करें. उन्हें बताएं कि कौन सी बात है जो आप को परेशान कर रही है.

सही समय देख कर शांति से इस बारे में बात करें और देखें कि आप दोनों अब इस रिश्ते को बचाने के लिए क्या कर सकते हैं. पार्टनर को समझने का प्रयास करें कि क्या वे अपनी गलती मान रहे हैं? वे अपने किए पर शर्मिंदा है और हमारे रिश्ते को बचाना चाहते हैं? यदि ऐसा है तो आप भी अपने दिमाग से सारी पुरानी बातें और कड़वाहट साफ कर रिश्ते को संभालने का प्रयास करें.

अपने जीवनसाथी को पुराने दिन याद दिलाएं. दिल में मौजूद गहरे प्यार के जज्बे को जीवनसाथी के आगे जाहिर करें. पुराने दिन याद दिलाएं जब दोनों प्यार के बंधन में बंधे थे. जीवनसाथी के रिऐक्शन पर गौर करते हुए अपने रिश्ते का भविष्य तय करें.

सचाई को स्वीकारें और इस समस्या से निकलने के लिए अपने मन की आवाज सुन कर कोई फैसला लें. रिकवर होने के लिए खुद को पूरा समय दें. नकारात्मक सोच को दूर भगाएं. काउंसलर की मदद भी ले सकती हैं.

टूटे हुए रिश्तों की चुभन न सिर्फ आप के लिए, बल्कि बच्चों के भविष्य के लिए भी खतरनाक साबित हो सकती है. मांबाप के रिश्ते में आई कड़वाहट का असर बच्चों के व्यक्तित्व पर साफ तौर से देखा जा सकता है. टूटे और बिखरे परिवार  के बच्चे अकसर डिप्रैशन में आ जाते हैं या जरूरत से ज्यादा आवेश में रहने लगते हैं.

बेवफाई केवल मौडर्न युग की देन नहीं है. आज से सैकड़ों साल पहले भी ऐसा होता था. आज के समय में आप के पास काफी विकल्प मौजूद हैं. जबरदस्ती रिश्ते को ढोने की जरूरत नहीं.

यह तीसरा मौका था जब प्रियंका का नाम प्रमोशन लिस्ट में था. लेकिन इस बार भी उसे पीओ से ब्रांच मैनेजर बन जाने की कोई खुशी न थी. देश के सब से बड़े बैंक में कार्यरत प्रियंका ने बुझे मन से यह अच्छी खबर सुनी और फिर फाइलों में सिर छिपाए कुछ सोचने लगी.

सोचना क्या था, अपनी खीझ और असंतुष्टि से सामना करना था जिस का निष्कर्ष यही निकलना था कि इस बार भी उसे पदोन्नति का यह मौका छोड़ना पड़ेगा क्योंकि प्रमोशन लेने का मतलब था कुछ सालों न सही, तो कुछ महीनों के लिए दूर किसी ब्रांच में जाना जिस पर गौरव कभी सहमत न होगा. हर बार की तरह वह अपनी मम्मी का हवाला दे कर कहेगा ‘यार, क्या दोचार हजार रुपयों के लिए मम्मी को नौकरों के भरोसे छोड़ दें जिन का कोई ठिकाना नहीं, न ढंग से देखभाल करते हैं और न ही वक्त पर दवा देते हैं.’

प्रियंका के पति गौरव इंजीनियरिंग कालेज में प्रोफैसर हैं और उन की तनख्वाह उस से लगभग डेढ़ गुनी है. लिहाजा, उन के लिए पत्नी को प्रमोशन मिलने का मतलब सिर्फ वेतनवृद्धि होता है. लेकिन प्रियंका का सपना और खुशी पैसों के साथसाथ पोस्ट का भी बढ़ना है. आज 30 साल की उम्र में ब्रांच मैनेजर बन जाएगी तो 45 की होते होते राज्य स्तरीय या प्रशासनिक पद पर होगी जिस का अपनी अलग शान और रुतबा होता है.

अपाहिज सास की सेहत पर प्रियंका तर्क करेगी, कैरियर का हवाला देगी तो पाला बदलते गौरव कहेगा, चलो मान लिया मम्मी जैसेतैसे मैनेज हो जाएंगी लेकिन बिट्टू का क्या होगा. वह रह पाएगा तुम्हारे बगैर, अभी पूरे 7 साल का भी नहीं हुआ है. कहांकहां लादे फिरोगी उसे, अकेले कैसे रहोगी. मेरी मानो तो चूल्हे में जाने दो ऐसे प्रमोशन को जिस के लिए पति, बच्चे, सास और घर को छोड़ना पड़े. फिर कभी देखेंगे, अभी कहां का पहाड़ टूटा पड़ रहा है.

बात सही है, कड़वाहट से प्रियंका ने सोचा, उस का कैरियर कैरियर नहीं है. उस का प्रमोशन, प्रमोशन नहीं, आफत है. बड़ी मुश्किलों के बाद भी वह यह खयाल मन में आने से नहीं रोक पाई कि गौरव अव्वल दर्जे का खुदगर्ज इंसान है और वह खुद पहले दर्जे की बेवकूफ है जिस की आमदनी तो माने रखती है लेकिन शर्तें ये हैं कि तरक्की छोड़, सास और बेटे की देखभाल में लगी रहो. यही एक अच्छी समझदार पत्नी और गृहिणी होने के माने हैं.

कैरियर की तूतूमैंमैं

बैंक से घर के लिए निकलतेनिकलते वह इस खयाल को भी मन में आने से नहीं रोक पाई कि जब जिंदगीभर क्लर्की ही करनी थी तो नौकरी का मतलब ही क्या रहा. क्या वह एक पेडनौकरानी है जो बहू बन कर सास की सेवा किया करती है. बिट्टू क्या जाने कि भोपाल और होशंगाबाद में क्या फर्क है, उसे तो मां चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे गौरव को चाहिए. फर्क उम्र, सेहत और समझ का है.

कई बातें प्रियंका के मन ही में आ कर रह गईं जैसे यह कि तड़ाक से गौरव को जवाब दे दे कि बिट्टू को तो मैं संभाल लूंगी, तुम अपनी मम्मी को मैनेज कर लो, फिर चाहे 2 नौकरानियां और रख लो. मेरे रास्ते में तुम रिश्तेनातों और जिम्मेदारियों के बैरियर मत अड़ाओ.

शादी के 3 साल बाद तक यानी बिट्टू के होने तक सबकुछ ठीकठाक था. फिर अचानक सास को लकवा मार गया तो प्रियंका को लगा वे अपाहिज हो गई है. गोद में 3 साल का बेटा था और पलंग से लगी सास थीं, जिन्हें ले कर गौरव कोई समझौता नहीं करता था. प्रियंका को इस पर एतराज भी नहीं था. सास की सेवा की जिम्मेदारी उस ने साझा कर ली थी जिन के बारे में डाक्टर्स ने साफ कह दिया था कि अब वे बाकी जिंदगी बिस्तर पर ही रहेंगी, आप, बस इन की सेवा करिए.

सुबह की पारी गौरव ने संभाल ली थी और शाम की प्रियंका ने ले ली थी. दोनों ने एक नौकरानी भी रख ली थी जो दिनभर घर में रहती थी और 10 हजार रुपए महीने के एवज में बिट्टू को खिलाती थी व सास की देखभाल करती थी.

काहे पैसे पे…

यह सौदा हालांकि महंगा नहीं था लेकिन गारंटेड भी नहीं था. गौरव को दिनभर कालेज में रहना पड़ता था और प्रियंका को बैंक में सिर खपाना पड़ता था. अभी तक जो आमदनी जरूरत से ज्यादा लगती थी, वह तेजी से ठिकाने लगने लगी थी. नौकरानी का खर्च बढ़ा था, सास की दवाओं और डाक्टरों पर 12-15 हजार रुपए खर्च हो जाते थे. अब बिट्टू के खर्च भी बढ़ने लगे थे. और ज्यादा चिंता की बात यह थी कि बिट्टू चिड़चिड़ा व जिद्दी हो चला था.

गौरव की एक लाख और उस की 65 हजार रुपए की तनख्वाह पर लगा कर उड़ने लगी थी. यह भी बहुत ज्यादा हर्ज की बात नहीं थी, हर्ज की बात थी सुखचैन का छिनते जाना. प्रियंका महसूस कर रही थी कि वह मशीन हो कर रह गई है. सुबह बेटे को रोता हुआ छोड़ कर जाती थी और आती थी तब भी वह सुबकता हुआ मिलता, उस के सीने से लिपट जाता था. वह बेटे को ढंग से प्यार भी नहीं कर पाती थी कि सास की कराहें शुरू हो जाती थीं.

सास स्वभाव से क्रूर या ललिता पवार छाप नहीं थीं लेकिन उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं रहता था कि बहू दिनभर बैंक में सिर खपा कर आई है. कमरे में दीपक रख दो, फलां दवा दे दो, आज घबराहट हो रही है जैसी बातें प्रियंका की खीझ और थकान को बढ़ा देती थीं.

गौरव भी खीझाखीझा रहने लगा था. पतिपत्नी दोनों में अब पहले जैसे सुकून से बैठ कर बातचीत नहीं हो पाती थी. रात को जैसेतैसे खापी कर बिस्तर पर जाते थे. गौरव को तो 2-3 बार उठ कर मम्मी के पास जाना पड़ता था. कभी वे बुला लेती थीं तो कभी वह खुद चला जाता था.

ऐसे में प्रियंका को याद आता था कि शादी के बाद दोनों कितने हसीन ख्वाब देखा करते थे कि एक सैलरी से घरखर्च आराम से चल जाएगा और दूसरी सेविंग में डालते रहेंगे जिस से अच्छा, बड़ा सा घर ले सकें और बेटे को बड़े स्कूल में पढ़ा सकें. साल में एक बार दूर कहीं जा करघूमने का सिलसिला या शौक भी 2 साल ही पूरा हो पाया. इस के बाद तो खुद के लिए भी वक्त निकालना दूभर हो गया था.

जिस डबल इनकम को प्रियंका सुख और सुविधा का जरिया मान रही थी, वही अब उसे काटने दौड़ने लगी थी. उस की नजर में न तो वह हाउसवाइफ रह गई थी और न ही अच्छी वर्किंग वूमेन.

इस साल फिर प्रमोशन की खबर ने उसे बजाय उत्साह के हताशा से भर दिया था. कुछ सहकर्मी मैनेजर बन कर ठाठ से जिंदगी गुजार रही थीं क्योंकि उन के यहां न बीमार सास थी और न ही उन्होंने बच्चे के मामले में जल्दबाजी दिखाई थी.

घर आ कर बत्ती जला कर उस ने गौरव को प्रमोशन की सूचना भर दी. जिस पर वह उम्मीद के मुताबिक खामोश रहा. यही खामोशी उस का जवाब भी थी और प्रतिक्रिया भी जिसे प्रियंका पहले से जानती थी.

रात में बिट्टू को सुला कर उस ने भी सोने की असफल कोशिश की. बारबार एक खयाल उसे कचोटे जा रहा था कि क्या वह जिंदगीभर पिछड़ी रहेगी. तमाम खर्चे पैसे से पूरे हो जाते हैं लेकिन एवज में जो तनाव मिलता है उस की भरपाई पैसों से नहीं हो पाती. पोर्च में खड़ीखड़ी 2 कारें मानो मुंह चिढ़ाती थीं और घर के तीनों कमरे में लगेएसी बजाय ठंडक देने के, झुलसाते थे. जिस के सिर चिंताओं और तनावों की गठरी लदी हो, वह क्या सो पाएगा.

प्रियंका ने नौकरी की थी एक बेहतर और सुखद भविष्य के लिए. लेकिन यह खयाल गलत साबित हो रहा था कि पैसे से ही सुख मिलता है. पति नजदीक है या महल जैसा घर,कहनेभर की बातें रह गई थीं.

एक बिट्टू ही था जिस का मुंह देख कर जीने की चाह बरकरार रहती थी पर उस पर भी प्रियंका को दया आने लगी थी जो दिनभर बिना मांबाप के नौकरानी के पास रहता था. वह कैसे उसे रखती है, इस की कोई निगरानी करने वाला था. और फिर नौकरानी, मां तो हो नहीं सकती.

हर कोई कहता है कि तुम तो दोनों खासा कमाते हो, फिर क्या कमी. अब कमियां कितनी हैं, यह प्रियंका कैसे उन्हें बताए कि दूर के ढोल सुहावने लगते हैं और इस कहावत को चरितार्थ भी करते हैं कि पैसे सेबिस्तर खरीदा जा सकता है, नींद नहीं, सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं सुख नहीं.

हल क्या 90 के दशक में एक नया चलन, ‘डिंक’ (ष्ठढ्ढहृ्य) शब्द और शैली की शक्ल में तेजी से चर्चा में आया था जिस के माने हैं ‘डबल इनकम नो किड्स.’ अब तेजी से पनपती समस्या है डबल इनकम, डबल बर्डन जिस की बड़ी वजह खासतौर से पति के पेरैंट्स होते हैं, खुद अपने बच्चे भी इसी दायरे में आते हैं. लेकिन दोनों में थोड़ाबहुत फर्क तो है.

ऐसे में डबल इनकम काटने दौड़ने लगे तो बात कतई हैरानी की नहीं. लेकिन दिक्कत यह है कि अब दोनों में से कोई नौकरी भी छोड़ेगा तो वह घर का रह जाएगा न घाट का, क्योंकि खर्चे इतने बढ़ गए हैं कि सिंगल इनकम से पूरे नहीं हो सकते. बूढ़े सासससुर की नजरअंदाजी होने पर मियांबीवी के बीच खटपट शुरू हो जाती है. डबल इनकम का मतलब डबल बर्डन इसलिए भी है कि खर्च अनापशनाप बढ़ रहे हैं.

बेंगलुरु की एक कंपनी में 2 लाख रुपए महीने की सैलरी पर काम कर रही अपूर्वा बताती है, ‘‘पैसा कमाने की शर्त पर वह अपनी नन्ही बेटी को किराए पर पाल रही है. वह खासे पैसे बेटी पर ही खर्च करती है. लेकिन भूख लगने पर उसे फीडिंग नहीं करा सकती क्योंकि बारबार क्रैच जाना असंभव और अव्यावहारिक बात है.’’

एक नामी सौफ्टवेयर कंपनी की अधिकारी अपूर्वा कहती है, ‘‘अब नौकरी दिनोंदिन कठिन होती जा रही है. कंपनियां आप की व्यक्तिगत जिंदगी और जरूरतें नहीं देखतीं, उन्हें अपने मुनाफे से ही मतलब होता है.’’

अपूर्वा के पति राजेश को भी एक लाख रुपए के लगभग सैलरी मिलती है. इस के बाद भी खर्च पूरा नहीं पड़ता. हजारों रुपए का खिलौना अपूर्वा और राजेश उसे दिला देते हैं लेकिन बेटी को जीभर कर खिलाने के लिए तरस जाते हैं. यह खीझ या बेबसी उन्हें और पैसा कमाने व काम करने के लिए उकसाती है. ये चीजें आमदनी के साथसाथ और बढ़ती जाती हैं, कम नहीं होतीं.

तो क्या डबल इनकम अभिशाप है, इस पर कपल्स को ही सोच कर फैसला लेना पड़ेगा कि उन की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए. यह डबल इनकम उन्हें लग्जरी लाइफ तो मुहैया कराती है पर आत्मीयता और सुकून छीन लेती है. इस पर भी घर में कोई बुजुर्ग हो तो सिरदर्दी और बढ़ जाती है, खासतौर से पत्नी की जो दोहरीतिहरी जिम्मेदारियां निभाती, वक्त से पहले ही, जिंदगी और जंग दोनों प्रियंका की तरह हार रही है. इस दौर की इन पत्नियों को यह भी याद नहीं कि आखिरी बार पूर्ण संतुष्टि देने वाला सैक्स उन्होंने कब किया था.

मजा या सजा

डबल इनकम मजा नहीं, सजा साबित होने लगी है. सोचना लाजिमी है कि इस से अच्छी वह पहले सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन ही क्या बुरी थी. कम से कम उस के पास बच्चे की बेहतर परवरिश का मौका और सुख तो थे, सासससुर की देखभाल करने का पारंपरिक भारतीय जज्बा तो था. पर अब उस का अस्तित्व और पहचान डबल इनकम के चक्कर में सैंडविच बन गए हैं, तो उसे हासिल क्या हुआ.

घरेलू जिम कैसे बनाएं

‘सनी फिटनैस फैक्टरी’ के जरिए युवाओं को फिटनैस मंत्र दे रहे सनी मेहरोत्रा और सोनिया मेहरोत्रा कहते हैं, ‘‘आज के समय में तेजी से ब्लडप्रैशर, डायबिटीज और कोलैस्ट्रौल की बीमारी बढ़ रही है, इस की खास वजहें नशा करना, हैल्दी डाइट न लेना और ऐक्सरसाइज न करना हैं. नशा करने से बौडी कई तरह की बीमारियों से घिर जाती है और कुछ सालों में ही बौडी कमजोर हो कर खत्म सी हो जाती है. ऐसे में जरूरी है कि लोग नियमित ऐक्सरसाइज करें. जिम जाना सब के लिए सुलभ नहीं होता, तो लोग अपने घर में पर्सनल जिम बना सकते हैं.’’

जिम वेट बढ़ाने और कम करने दोनों के लिए ही होता है. ऐक्सरसाइज के जरिए ही फिटनैस हासिल की जाती है. इस के लिए नियमित ऐक्सरसाइज करना जरूरी होता है. कई बार यह देखा जाता है कि लोग एकदो दिन की ऐक्सरसाइज करने के बाद ही जिम जाना छोड़ देते हैं. ऐसे लोगों के लिए जरूरी है कि वे घर में अपना पर्सनल जिम बना लें.

फिटनैस ऐक्सपर्ट अर्चना तिवारी कहती हैं, ‘‘पर्सनल जिम 50 हजार रुपए तक में खोला जा सकता है. इस के लिए घर में एक खाली जगह होनी चाहिए. घर में जिम बनाने के लिए सब से ज्यादा जरूरी डंबल होते हैं. ये अलगअलग साइज के होते हैं. इन की कीमतें भी अलगअलग होती हैं. डंबल के 2 हिस्से होते हैं. एक में डंबल दूसरे में राड होती है. वजन के हिसाब से केवल डंबल बदलना होता है. इस के अलावा जिम में एक बैंच होनी जरूरी है. बैंच के सहारे कई तरह की ऐक्सरसाइज की जाती हैं. इस के अलावा ट्रेडमिल पर्सनल जिम में जरूरी होता है. मल्टी जिम नाम से एक अलग मशीन आती है. इस तरह आप साधारण रूप से घर में जिम बना सकते हैं.’’

टोंड आर्म : बेहतर फिटनैस और फिजीक के लिए बाजुओं का भी स्ट्रौंग और टोंड होना जरूरी होता है. इस के लिए कुछ ऐक्सरसाइज हैं जो आर्म्स को टोंड और स्ट्रौंग बनाती हैं. आर्म के 2 हिस्से होते हैं, पहला बाइसैप्स और दूसरा ट्राइसैप्स. दोनों ही हिस्सों के लिए अलगअलग ऐक्सरसाइज होती है.

अल्टरनेट हैमर कर्ल : अल्टरनेट हैमर कर्ल करने के लिए सीधे खड़े हो जाएं. रीढ़ की हड्डी जितनी हो सके सीधी रखें. अब दोनों हाथों में समान वजन के डंबल्स लें. डंबल्स अंदर की तरफ रखें. इस के बाद दाएं हाथ को चैस्ट तक ऊपर ले जाएं और धीरेधीरे नीचे लाएं. अब इसी क्रिया को बाएं हाथ से दोहराएं. फिर पूरी प्रक्रिया को 10 से 15 बार करते रहें.

प्लांक आर्म ऐक्सरसाइज : प्लांक आर्म ऐक्सरसाइज न केवल बाजुओं बल्कि एब्स मसल्स को भी मजबूत बनाती है. प्लांक आर्म करने के लिए पेट के बल लेट जाएं और फिर माथे को जमीन से छुआएं. इस के बाद शरीर के ऊपरी हिस्से से कुहनी को आगे लाते हुए कुहनी को जमीन से और पैरों को पंजों के ऊपर टिका दें. अब पेट व जांघों को धीरेधीरे ऊपर की ओर उठाने की कोशिश करें. इस के रोज 10 राउंड करें.

एल्बो प्लांक : प्लांक आर्म ऐक्सरसाइज करने के बाद एल्बो प्लांक करें. इसे करने के लिए पीठ के बल लेट जाएं. फिर दाएं पैर को बाएं पैर के ऊपर रखें. हाथों को सीधे सिर के ऊपर तक उठाएं. लेकिन ध्यान रहे कि बाजू कान से छूते हुए जाएं. इस के बाद अपने शरीर को रैगुलर क्रंच की तरह ऊपर उठाएं. फिर शरीर के ऊपरी हिस्से पर दबाव डालते हुए अपनी कुहनी से घुटने को छूने की कोशिश करें. दूसरे पैर से भी इस प्रकिया को दोहराएं.

रिवर्स बारबेल कर्ल : रिवर्स बारबेल कर्ल को ई-जेड बार के साथ करने पर अधिक फायदा होता है. आप इसे साधारण तरीके से भी कर सकते हैं.

3 सैट 10 रैप की इस कसरत का मकसद अपर मसल के नीचे की मसल्स को लाभ देना होता है.

स्टैंडिंग डंबल ट्राइसैप्स ऐक्सटैंशन : कमर में दर्द की शिकायत वाले लोग स्टैंडिंग डंबल ट्राइसैप्स ऐक्सटैंशन को बैठ कर भी कर सकते हैं. इसे रस्सी लगा कर मशीन के साथ भी किया जा सकता है क्योंकि डंबल में कई बार ग्रिप अच्छी नहीं बन पाती. इस के रोजाना 3 सैट और 15 रैप लगाएं.

इंक्लाइन डंबल कर्ल : इंक्लाइन डंबल कर्ल एक कमाल की बाइसैप्स की कसरत है. यह सीधे बाइसैप्स के सहारे होती है. इस का पूरा फायदा बाजुओं को ही मिलता है. यदि इस के कई रैप नहीं निकल पा रहे हैं तो डंबलों को नीचे लाने के बाद हथेलियों को पैरों की ओर कर लें. और फिर ऊपर ले जाते समय फिर से सीधे ले जाएं. इस के 3 सैट और 15 रैप किए जा सकते हैं.

क्लोज ग्रिप बैंचप्रैस : ट्राइसैप्स की 2 बेहतरीन कसरतें हैं, एक ट्राएंगल पुशअप्स और दूसरी क्लोज ग्रिप बैंचप्रैस. बाइसैप्स को टोंड करने के लिए ट्राइसैप्स पर काम करना भी बेहद जरूरी होता है. मोटे, मजबूत ट्राइसैप्स की इस कसरत से चैस्ट पर भी काम होता है. इस में आप हैवी वेट भी लगा सकते हैं. लेकिन ध्यान रहे कि इसे करते समय एक अच्छा रिस्ट बैंड भी इस्तेमाल करें.

ट्रेडमिल ऐक्सरसाइज : आप कोई भी कसरत कर लें, जब तक आप ट्रेडमिल पर दौड़ नहीं लगा लेते, वर्कआउट अधूरा ही माना जाता है. उम्र, वजन या लिंग चाहे जो कुछ भी हो, ट्रेडमिल पर वर्कआउट करने से बहुत फायदे होते हैं. इस से शरीर फिट तो रहता ही है, साथ ही, आप के शरीर के सारे अंग भी चुस्त बने रहते हैं. ट्रेडमिल ऐक्सरसाइज के पूरे फायदे लेने के लिए इसे ठीक से करना जरूरी है.

ट्रेडमिल पर रनिंग करने से न केवल वजन घटता है बल्कि शरीर की मासपेशियां भी टोन होती हैं. ध्यान रहे, अच्छे शेप में आने के लिए मांसपेशियों का टोन होना जरूरी है. ट्रेडमिल पर ऐक्सरसाइज करने से पैर, जांघ, पेट और कूल्हे पर जोर पड़ता है और इन का शेप बेहतर होता है. ट्रेडमिल पर दौड़ने से शरीर में औक्सीजन की मात्रा ठीक होती है और इस का प्रवाह ठीक होता है. इसे करने से पसीना आता है और त्वचा के पोर्स खुल जाते हैं. इस से शरीर से गंदगी बाहर निकलती है और त्वचा कुछ ही दिनों में चमकदार बन जाती है, जो आप को सुंदर बनाती है.

मोदी और विपक्ष

वर्ष 2018 में कांग्रेस द्वारा बेंगलुरु में गैरभाजपाई दलों को इकट्ठा करना और अब तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा कोलकाता में दोगुने जोश में लगभग सभी गैरभाजपाई दलों के नेताओं को जमा कर लेने की सफलता ने भाजपा को हिला दिया है. बेंगलुरु में जब कांग्रेस और जनता दल (सैक्युलर) ने मिल कर सरकार बनाई थी तो लगा था कि 2014 के बाद यह महज दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की जीत जैसी फ्लूक घटना है पर 5 विधानसभा चुनावों के नतीजों, जिन में भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार करने के बावजूद हारी है, ने साफ कर दिया है कि नरेंद्र मोदी की सरकार से मतदाता संतुष्ट नहीं हैं. कोलकाता की रैली में विपक्षियों का मिलन होने से साफ हो गया है कि मोदी की तानाशाही के खिलाफ विपक्षी एकजुट हैं. विपक्षी दलों की मजबूत होती एकता से भाजपा चिंता में है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीमार मंत्री, अस्पतालों से चाहे जो भी कहते रहें और नरेंद्र मोदी चाहे जितना मखौल उड़ाने की शैली में, बचाव करते नजर आएं, उन की परेशानियां बढ़ रही हैं, यह पक्का है.

गलती भाजपा की साफसाफ है. सब से बड़ी बात यह है कि हिंदू धर्म के पाखंड को देश से ऊपर मानने की भाजपा की गलती विपक्षी पार्टियों को फिर से जान दे रही है जिन्हें जनता ने पिछले आम चुनावों में इतिहास के कचरे में डाल सा दिया था. नरेंद्र मोदी की सरकार अपने कार्यकाल के दौरान हिंदू धर्म को चलाने में ज्यादा उत्सुक रही बजाय देश को गरीबी, गंदगी और गहरे गड्ढे से निकालने के.

बहुत लंबे समय बाद 2014 में नरेंद्र मोदी को एक ऐसी सरकार का मुखिया होने का मौका मिला था जिस में उन के पास पूर्ण से ज्यादा बहुमत था. फिर राज्यों के चुनावों ने इस उपलब्धि को और ज्यादा बेहतर कर दिया. लेकिन बजाय देश व समाज के पुनर्निर्माण में लगने के, नरेंद्र मोदी ने पौराणिक हिंदू राजाओं की तरह धार्मिक कर्मकांडों में अपना समय देना शुरू कर दिया.

नोटबंदी और जीएसटी भी धार्मिक काम बन कर रह गए. नोटबंदी पर नरेंद्र मोदी के भाषण की तुलना महाभारत के पात्र युधिष्ठिर से की जा सकती है जिस ने प्रण ले रखा था कि जब भी कोई उन्हें जुए में चुनौती देगा, तो जुआ खेल लेंगे. कालाधन निकालने के लिए उन्होंने जुआ खेला और पूरे देश की संपत्ति को बाहर कर दिया. गनीमत यह रही कि अज्ञात वनवास कुछ महीनों का ही रहा. लेकिन आखिरकार इसी जुए के कारण पांडवों को महाभारत का युद्ध करना पड़ा. महाभारत में भी भाजपा के आराध्य विष्णु के अवतार कृष्ण ने उसी तरह दुष्ट कौरवों के खिलाफ इधरउधर से एक धर्मसेना जमा की थी जैसी बेंगलुरु और कोलकाता में हुई है.

नरेंद्र मोदी की सरकार ने कट्टर हिंदुओं को फिर से पौराणिक राज स्थापित करने की छूट दे रखी है. ऊंचे ब्राह्मणों और सवर्णों के लिए उन्होंने 10 फीसदी आरक्षण का तोहफा दिया है जबकि गौरक्षा के नाम पर मुसलमानों की हत्याओं, किसानों की फसलों को बरबाद, और चमड़े के काम को नष्ट करने के आतंक के चलते उन्हें दंड देना था. ब्राह्मणपुत्र की मृत्यु के लिए वेदपाठी शंबूक की हत्या करने दी गई है. दलितों को मारने के लिए किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है. दलितों और गरीबों का साथ देने वालों को देशद्रोही, अरबन नक्सलाइट कह कर जेलों में बंद कर रखा है.

निश्चित है कि जनआक्रोश अब पैदा होगा ही क्योंकि आज का समाज और आज की सरकार पौराणिक कहानियों के आधार पर नहीं चल सकती. वर्तमान की चुनौतियां कुछ और हैं. ममता बनर्जी और राहुल गांधी में मतभेद हैं पर, फिलहाल, उन को किसी और से मुकाबला करना है, इसीलिए कोलकाता पुलिस अफसर पर सीबीआई हमले पर सारा विपक्ष एकजुट हो गया है.

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