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कैल्शियम लेना कब शुरू करें

हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाए रखने के लिए शरीर को कैल्शियम की जरूरत होती है. और 99 फीसदी से ज्यादा कैल्शियम शरीर के इन्हीं हिस्सों में इकट्ठा होता है. यह तंत्रिका सिग्नल भेजने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वहीं यह इंसुलिन जैसे हार्मोन का स्राव करता है और मांसपेशियों व रक्त वाहिकाओं के संकुचन को कंट्रोल करता है.

हड्डी के स्वास्थ्य के संदर्भ में, भोजन में कैल्शियम जरूरी मात्रा में नहीं होने से शरीर हड्डियों और दांतों से इस की सप्लाई करता है, जिस से ये कमजोर हो जाते हैं. विटामिन डी आंतों से कैल्शियम के अवशोषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इस की कमी होने से शरीर में कैल्शियम की कमी हो सकती है, इसलिए आप प्राकृतिक स्रोतों (सूर्य की रोशनी) से और सप्लीमैंट्स से विटामिन डी की जरूरत की पूर्ति कर सकते हैं.

किसी भी इंसान की अपनी जिंदगी में प्राप्त होने वाली हड्डी की सब से बड़ी मात्रा, जिसे पीक बोन मास कहते हैं, लड़कियों में 18 साल की उम्र में और लड़कों में 20 साल की उम्र में हासिल की जाती है. इस का करीब 30 साल की उम्र तक बढ़ना जारी रह सकता है. एक बार पीक बोन मास प्राप्त होने के बाद उम्र बढ़ने के साथ महिला व पुरुष दोनों में हड्डियों का धीरेधीरे कमजोर होना शुरू हो जाता है. उम्र बढ़ने के कारण हार्मोनल कारकों की वजह से महिलाओं में पुरुषों की तुलना में हड्डियों का औसतन ज्यादा नुकसान होता है.

मीनोपौज के बाद महिलाओं में हर साल 1 से 2 फीसदी हड्डियों का घनत्व (बोन डैनसिटी) कम होता है. हड्डियों से जुड़ी समस्याओं से बचने के लिए कम उम्र से ही कैल्शियम लेना शुरू कर देना चाहिए. मातापिता होने के नाते बच्चों को कैल्शियमयुक्त संतुलित आहार, जैसे दूध, दही, हरी पत्तीदार सब्जियां और कैल्शियम फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ, विटामिन डी सप्लीमैंट (सूरज की रोशनी, फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ) देना चाहिए. साथ ही, बच्चों को हर दिन कम से कम 60 मिनट हलकी ऐक्सरसाइज करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. स्वस्थ जीवनशैली की अहमियत पर जोर दें. धूम्रपान और कम उम्र में शराब के सेवन से बचें. ये सब हड्डियों के लिए नुकसानदायक होते हैं.

50 साल से कम उम्र की महिलाओं और 70 साल से कम उम्र के पुरुषों को रोज 1,000 मिलीग्राम कैल्शियम जबकि 50 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं और 70 साल से ज्यादा उम्र के पुरुषों को रोज 1,200 मिलीग्राम कैल्शियम की जरूरत होती है. अगर संभव हो तो लोगों को डेयरी उत्पादों, हरी पत्तीदार सब्जियों, नट्स, बीन्स, टोफू आदि के जरिए पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम का सेवन करना चाहिए.

आहार में नाकाफी कैल्शियम के सेवन की हालत में कैल्शियम सप्लीमैंट्स (सामान्यतौर पर अलगअलग समय में 500 एमजी की 2 गोलियां, दिन में 2 बार) ले कर उस की भरपाई की जानी चाहिए. सक्रिय जीवनशैली और वजन ठीक रखने संबंधी ऐक्सरसाइज करने के साथ ही औस्टियोपोरोसिस को रोकने के लिए कैल्शियम सप्लीमैंट्स की खुराक मीनोपौज वाली महिलाओं के लिए बेहद जरूरी है.

बचें ज्यादा कैल्शियम सेवन से

अगर कोई शाकाहारी भोजन, उच्च प्रोटीन या उच्च सोडियम युक्त आहार का सेवन करता है या आंत्र रोग से पीडि़त है जो कैल्शियम अवशोषण को सीमित करता है या कार्टिकोस्टेरौयड ले रहा है या फिर औस्टियोपोरोसिस है, तो उसे कैल्शियम सप्लीमैंट्स लेना चाहिए. कैल्शियम कार्बोनेट, कैल्शियम का सब से सस्ता और सर्वाधिक व्यापक रूप से उपलब्ध रूप है. कैल्शियम के अन्य रूप में कैल्शियम साइट्रेट शामिल है, जो अधिक महंगा है.

ध्यान रहे, किसी भी व्यक्ति को रोज 2,000 मिलीग्राम से ज्यादा कैल्शियम के सेवन से बचना चाहिए क्योंकि इस से हार्ट के काम करने में दिक्कत हो सकती है और यह पथरी (स्टोन) बनने का कारण भी हो सकता है. सो, आप अपने जिस्म में कैल्शियम की मात्रा संतुलित रखें ताकि जिंदगीभर हड्डियां मजबूत व सक्रिय रहें.

:डा. पुनीत मिश्रा, आर्थोपेडिक्स, फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग, दिल्ली

सैक्स से दूर रहने के ये हैं 8 साइड इफैक्ट्स

हमारे देश में सैक्स को ले कर इतनी हायतोबा मचाई जाती है मानो इस की बात करने पर प्रतिबंध हो. पोंगापंथी और धर्म के ठेकेदार सैक्स को गंदा काम बताते फिरते हैं. यह अलग बात है कि कई मुल्लामौलवी, बाबा और पादरी सैक्सुअल हैरासमैंट और रेप के मामलों में पकड़े जा चुके हैं.

सच यह है कि सैक्स एक शारीरिक जरूरत है, जो बेहद स्वाभाविक और प्राकृतिक है. लेकिन धर्म के ठेकेदारों द्वारा फैलाई गई भ्रांतियों और नकली बाबाओं द्वारा दिए गए उलटेसीधे प्रवचनों से प्रभावित हो कर भारतीय महिलाएं सैक्स को एक अधार्मिक क्रिया समझने लगती हैं और खुलेमन से इस का आनंद उठाने के बजाय इस से कतराने लगती हैं.

पति के लाख मनाने और समझाने के बावजूद वे उस का साथ देने और सैक्स का आनंद उठाने के लिए तैयार नहीं होतीं. कभी व्रतत्योहार का बहाना बना कर, तो कभी तबीयत खराब होने का बहाना बना कर ये महिलाएं ‘अपवित्र’ होने से बचती रहती हैं. लेकिन चिकित्सक, मनोविज्ञानी, व्यवहार विशेषज्ञ और समाजशास्त्री इस प्रवृत्ति को तन और मन की सेहत के लिए नुकसानदायक मानते हैं.

पीरियड्स में बढ़ सकता है दर्द : आमतौर पर महिलाओं के मैन्सट्रुअल साइकिल के दौरान पेट के निचले हिस्से में दर्द होता है. लेकिन जो महिलाएं सैक्सुअल लाइफ को एंजौय नहीं करतीं उन में यह दर्द ज्यादा हो सकता है.

सैक्स ऐक्सपर्ट डा. लारेज स्ट्रीचर का कहना है कि पीरियड्स के दौरान सैक्स करने से मैन्स्ट्रुअल क्रैंप में काफी कमी आ सकती है. यूट्रस एक मांसपेशी है जिस में सैक्स और्गेज्म के दौरान सिकुड़न होती है. इस से रक्तस्राव बेहद आसानी से हो जाता है और स्राव के समय होने वाले दर्द से महिलाओं को काफी हद तक छुटकारा मिल सकता है. इस के साथ ही, यौन आनंद से एंडौर्फिन का स्राव होता है जो दर्द को कम करने में सहायक होता है.

वैजाइना की दीवार हो सकती है कमजोर : सैक्स थेरैपिस्ट सारी कूपर बताती हैं, ‘‘खुद को सैक्स से वंचित रखने वाली महिलाओं में वैजाइना की वाल धीरेधीरे कमजोर यानी पतली होने लगती है. विशेषरूप से मीनोपौज की उम्र में पहुंच चुकी महिलाएं जब सैक्स से दूरी बढ़ाती हैं तो उन में यह समस्या अधिक होती है.’’

वे कहती हैं, ‘‘नियमित सैक्स करते रहने से वैजाइना की वाल लचीली रहती है और ज्यादा दर्द महसूस नहीं होता जबकि कभीकभी सैक्स करने में यह दर्द काफी ज्यादा महसूस हो सकता है. नौर्थ अमेरिकन मीनोपौज सोसायटी ने भी मीनोपौज के दौर से गुजरने वाली महिलाओं को नियमित पैनेट्रेटिव सैक्स करने की सलाह दी है.

बढ़ सकता है स्ट्रैस : जगजाहिर है कि सैक्स से तन और मन में आनंद की अनुभूति होती है. इस से दिमाग में खुशी के हार्मोन एंडौर्फिन व औक्सीटोसीन उत्सर्जित होते हैं. स्कौटलैंड के शोधकर्ताओं ने पाया है कि  सैक्स से दूर रहने वाले लोेग पब्लिक स्पीकिंग या ऐसी दूसरी स्टै्रसफुल सिचुएशन को आसानी से हैंडल नहीं कर पाते, जबकि महीने में कम से कम 2 बार सैक्स करने वाले लोग इस में आसानी महसूस करते हैं. नियमित सैक्स करने की आदत को हैल्थ ऐक्सपर्ट स्ट्रैस बस्टर मानते हैं, सैक्स न करने वाले लोगों का ब्लडप्रैशर स्ट्रैस की सिचुएशन में काफी बढ़ जाता है.

पुरुषों में बढ़ सकती है प्रोस्टैट कैंसर की संभावना : हैल्थ ऐक्सपर्ट का मानना है कि जो पुरुष नियमित रूप से सैक्स नहीं करते उन में प्रोस्टैट कैंसर की संभावना बढ़ सकती है. सैक्स करने से प्रोस्टैट को सुरक्षा देने वाले कैमिकल्स रिलीज होते हैं. अमेरिकन यूरोलौजिकल एसोसिएशन द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है कि नियमित रूप से यौनसंबंध बनाने वाले पुरुषों में प्रोस्टैट कैंसर होने की संभावना 20 फीसदी तक कम हो जाती है क्योंकि समयसमय पर वीर्य स्खलन होने से प्रोस्टैट में मौजूद हानिकारक तत्त्व शरीर से बाहर निकल जाते हैं.

संबंधों के प्रति आ सकता है असुरक्षा का भाव : जिन पतिपत्नी में सैक्सुअल संबंध लगभग खत्म हो जाते हैं उन में आपसी नजदीकी, माधुर्य और अपनापन भी कम होने लगता है. साथ ही, पति और पत्नी के मन में एकदूसरे के प्रति अविश्वास की भावना भी आ सकती है जिस से रिलेशनशिप में इनसिक्योरिटी का भाव आता है.

‘सेविंग योर मैरिज बिफोर इट स्टार्ट्स’ की लेखिका एवं मनोविज्ञानी लेस पैरोट कहती हैं, ‘‘सैक्स न करने से शरीर में औक्सीटोसिन व दूसरे बौंडिंग हार्मोन का लैवल कम होने लगता है. पति और पत्नी के मन में अपराधबोध की भावना आती है, सैल्फ एस्टीम में कमी आती है. साथ ही, मन में हमेशा संदेह रहता है कि कहीं आप अपनी सैक्स की जरूरत के लिए किसी दूसरे के संपर्क में तो नहीं. हालांकि, इस का मतलब यह बिलकुल नहीं है कि बिना सैक्स के पतिपत्नी खुश रह ही नहीं सकते. उन्हें आपस में चुंबन लेना, हाथ पकड़ना, एकदूसरे को सहलाना आदि जारी रखने चाहिए.

बढ़ता है सर्दीजुकाम का खतरा : पैनसिलवानिया की विलकेस बौरे यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने अपने शोध में पाया कि जो लोग हफ्ते में एक या दो बार सैक्स करते हैं, उन में एंटीबौडीज का उत्पादन 30 फीसदी तक बढ़ जाता है. ये एंटीबौडीज तरहतरह के वायरस आदि के खिलाफ लड़ने में हमारे शरीर के डिफैंस सिस्टम की मदद करते हैं. सैक्स को इम्यूनिटी सिस्टम इंप्रूव करने वाला भी माना गया है.

यौनेच्छा में कमी आने लगती है : जब आप सैक्स से कतराने लगते हैं या इस की आदत धीरेधीरे छूटती जाती है तो आप की यौनेच्छा खुदबखुद कम होने लगती है. सैक्स थेरैपिस्ट सारी कूपर कहती हैं, ‘‘एक वक्त ऐसा आता है जब आप सैक्स करना चाह कर भी सैक्स नहीं कर पाते. सैक्स शारीरिक प्रक्रिया से ज्यादा एक मानसिक प्रक्रिया है. आदत छूटने या नियमित इस का उपभोग न करने पर आप का मन सैक्स के लिए तैयार नहीं हो पाता. जब तक मन तैयार नहीं होता, तो तन का साथ देने का सवाल ही नही.

पुरुषों में इरैक्टाइल डिसफंक्शन : उपरोक्त कारण की वजह से पुरुषों में यौनांग सैक्स के लिए तैयार नहीं हो पाता, यानी यौनांग में कठोरता नहीं आ पाती जिसे हैल्थ ऐक्सपर्ट इरैक्टाइल डिसफंक्शन कहते हैं.

अमेरिकी मैडिकल जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पुरुषों का यौनांग एक मांसपेशी है. जैसे हमारे शरीर की अन्य मांसपेशियों को नियमित ऐक्सरसाइज की जरूरत है, ठीक उसी तरह इस का भी नियमित इस्तेमाल जरूरी है, वरना इस में शिथिलता आने लगती है. कुछ वैज्ञानिकों ने सरल भाषा में इसे ‘यूज इट आर लूज इट’ कह कर समझाया है.

त्वचा को टाइट बनाए रखने के लिए लगाएं ये फेस मास्क

अगर आपको खूबसूरत चेहरा चाहिए तो आपको इस बात का पता होगा कि त्‍वचा अगर टाइट बनी रहती है तो चेहरा अपने आप चमकने लगता है. मगर उम्र के साथ साथ हमारी त्‍वचा भी ढीली पड़ने लगती है, रूखी दिखने लगती है और उस पर बहुत सी झुर्रियां आ जाती हैं. इस चीज को हटाने के लिये आप घर पर ही फेस मास्‍क तैयार कर सकती हैं, जिससे त्‍वचा टाइट नजर आने लगेगी. तो आइए जानें त्‍वचा को टाइट बनाने वाले कुछ खास फेसमास्क के बारे में.

एग वाइट मास्‍क

अंडे को फोड़ कर उसका सफेद भाग पीले वाले से अगल कर दें. फिर इसे सीधे अपने चेहरे पर लगा कर सुखा लें. बाद में हल्‍के गरम पानी से चेहरा धो लें. इसके अलावा आप अंडे में मुल्‍तानी मिट्टी, ग्‍लीसरीन और शहद मिला कर भी प्रयोग कर सकती हैं.

अंडा और दही

1 अंडे में 1 चम्‍मच दही और आधा चम्‍मच चीनी मिलाइये. अंडे को फेंट कर उसमें ये सभी चीजें मिक्‍स करें और चेहरे पर लगाएं. जब चेहरा सूख जाए तब इसे धो लें.

पत्‍तागोभी और चावल

पत्‍तागोभी की दो तीन पत्‍तियों को पीस कर उसमें 2 चम्‍मच चावल का आटा मिक्‍स करें. फिर उसमें बादाम या औलिव औइल डाल कर चेहरे पर लगाएं. अगर चेहरा औइली है तो पैक में तेल ना मिलाएं. पत्‍ता गोभी की पत्‍तियां चेहरे से झुर्रियां मिटाती हैं.

पत्‍तागोभी और शहद मास्‍क

पत्‍ता गोभी की पत्‍तियों का पेस्‍ट बना कर उसमें दही और शहद मिलाएं. अगर स्‍किन ड्राई है तो उसमें बदाम या औलिव औइल मिलाएं. इस पेस्‍ट को चेहरे पर 20 मिनट तक रहने दें और फिर हल्‍के गरम पानी से धो लें.

विवाहेतर संबंध : सूली ऊपर सेज पिया की

दिलचस्प लेकिन चिंतनीय मामला भोपाल का है जो दुनिया का पहला तो नहीं, पर उन इनेगिने मामलों में शामिल हो गया है, जिस में पति की गलती या गुनाह, कुछ भी कह लें, को ढकने के लिए पत्नी ने न केवल पति का साथ दिया बल्कि उसे बचाने के चक्कर में खुद भी गुनाहगार बन बैठी.

शाहपुरा भोपाल का पौश इलाका है जहां के थाने में केरल निवासी 32 वर्षीया पुष्पा लक्ष्मी (बदला नाम) ने यह रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि डाक्टर कपिल लाहोटी और उन की डैंटिस्ट पत्नी सीमा लाहोटी ने जबरन उस का अबौर्शन कर दिया. पेशे से नर्स पीडि़ता ने अपने बयान में बताया था कि वह कपिल लाहोटी के संपर्क में एक साल पहले आई थी. जैसा कि ऐसे मामलों में होता है, दोनों को प्यार हो गया और फिर शारीरिक संबंध भी बन गए.

कपिल ने पुष्पा लक्ष्मी को बहैसियत ‘वो’ रखा और 4 महीने तक लिवइन में रहते उन के शारीरिक संबंध बनते रहे. कपिल ने उसे शादी का झांसा भी दिया था. कोलार इलाके में रह रही पुष्पा लक्ष्मी जब गर्भवती हो गई तो कपिल घबरा उठे. घबराने की दूसरी वजह यह थी कि बारबार कहने पर भी पुष्पा लक्ष्मी गर्भपात के लिए तैयार नहीं हो रही थी.

जैसेजैसे पुष्पा लक्ष्मी की कोख में कपिल के प्यार का बीज पौधा बन कर बढ़ता जा रहा था वैसेवैसे उन का ब्लडप्रैशर हाई होता जा रहा था. उन्होंने अपनी इस प्रेयसी से मिन्नतें कीं, प्रतिष्ठा की दुहाई दी, घर टूटने का वास्ता दिया लेकिन पुष्पा टस से मस नहीं हुई.

ऐसे वक्त में कपिल की मनोदशा वही पुरुष समझ सकता है जो इस हालत से हो कर गुजरा हो या फिर गुजर रहा हो. भोपाल के नजदीक विदिशा के रहने वाले कपिल की संपन्न और प्रतिष्ठित पारिवारिक पृष्ठभूमि हर कोई जानता है. समाज में लाहोटी परिवार का अपना रुतबा है, जो कपिल की एक गलती या बेवकूफी से मिट्टी में मिल गया है.

पत्नी का सहारा

एक तरफ खाई थी तो दूसरी तरफ कुआं था. 2 नावों की सवारी कर रहे कपिल लाहोटी को अब समझ आ रहा था कि वे एक समुद्री तूफान में फंस चुके हैं, ऐसे में सहारे के लिए उन्होंने इधरउधर निगाह दौड़ाई तो एकलौता सहारा उन्हें पत्नी सीमा में नजर आया.

पत्नी के सामने कैसे हिम्मत कर उन्होंने बेवफाई वाला सच बताया होगा, यह तो वही जानें लेकिन भावुक सीमा तड़प के साथ पति की मदद करने के लिए तैयार हो गई. तब उन्होंने मीलों लंबी चैन की सांस ली.

सिलसिला फिल्म की जया भादुड़ी और रेखा की तरह वे दोनों महिलाएं मिलीं. सीमा ने पुष्पा लक्ष्मी को समझाने की कोशिश की पर नतीजा वही ढाक के तीन पात निकला. वह अबौर्शन कराने के लिए तैयार नहीं हुई. वजह, कथित रूप से कपिल उस से मंदिर में शादी कर चुके थे.

इन दोनों का ही दर्द समझ पाना आसान काम नहीं. दोनों ही कपिल के विश्वासघात का शिकार हुई थीं. तमाम मर्यादाएं और सीमाएं भूलते कपिल ने पहली गलती पुष्पा से कथित प्यार करने की की थी और दूसरी यह भी की थी कि शारीरिक संबंधों के वक्त कोई सावधानी नहीं बरती थी. प्रेमिका गर्भवती हो जाए और फिर गर्भपात कराने को तैयार न हो, तो उस का मैसेज बहुत साफ रहता है कि वह प्रेमी के बच्चे की मां बनेगी और दूसरी का दर्जा उस से घाटे का सौदा न लगते हुए मंजूर है.

अभी तक पुष्पा लक्ष्मी के सांवले, सौंदर्य और छरहरे बदन में सुख के गोते लगा रहे कपिल को हकीकत का झटका लगा तो उन की रातों की नींद और दिन का चैन दोनों हराम हो गए. ऐसे में पत्नी का सहारा उन्हें संबल देने वाला साबित हुआ. सीमा ने उन्हें माफ नहीं किया था, लेकिन उन की एक ही भूल को सुधारने में उन का सहयोग करना कुबूल कर लिया था. इस के पीछे सीमा की मंशा इज्जत और कैरियर बचाने की थी.

लेकिन समस्या ज्यों की त्यों थी. पुष्पा लक्ष्मी मान नहीं रही थी. ऐसे में कपिल और सीमा ने उसे बहलाफुसला कर कुछ दिन अपने घर पर रखा और अक्तूबर के तीसरे सप्ताह में उसे जबरन दवा दे कर गर्भपात कर दिया. इस पर तिलमिलाई पुष्पा न्याय के लिए थाने जा पहुंची. अब लाहोटी डाक्टर दंपती सलाखों के पीछे हैं, लेकिन कई सवाल सोचने के लिए छोड़ गए हैं जो विवाहेतर संबंधों से ताल्लुक रखते हैं.

गलत और सही की लक्ष्मणरेखा

हैरत की तीसरी बात अभिजात्य वर्ग की प्रतिक्रियाएं रहीं. 10 में से 8 लोगों ने कहा कि कपिल लाहोटी ने गलती की. उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए थी और कुछ लेदे कर मामला रफादफा कर देना चाहिए था. ऐसा होना तो अब आम है, लेकिन समझदार लोग सधे ढंग से चलते हैं. यानी, नैतिकता की बात बीते कल की हो चली है और संपन्न वर्ग ने विवाहेतर संबंधों को कुछ शर्तों पर स्वीकृति दे दी है. आधुनिकता का नया तकाजा इस मामले पर खरा उतरता नजर आया कि पुरुषों को संभल कर रहना चाहिए.

भोपाल के ही एक नामी सीनियर फिजीशियन की मानें तो इस में नया या हैरतअंगेज कुछ नहीं है सिवा इस के कि 38 वर्षीय कपिल मामले को मैनेज नहीं कर पाए. इन डाक्टर साहब के मुताबिक, कोशिश यह होनी चाहिए कि बात पत्नी, बच्चों और घर वालों तक न पहुंचे.

मैनिट भोपाल के एक प्रोफैसर का नाम न छापने की शर्त पर कहना है कि हर चौथा पति इस तरह के संबंधों या पार्टटाइम लिवइन में है. इन प्रोफैसर साहब के मुताबिक, सौदा जरूरत का है. दिक्कत प्रेमिका से उठ खड़ी होती है जब वह ज्यादा मुंह फाड़ने लगती है या फिर सचमुच प्यार करने लगती है.

सभ्य समाज के इन नए उसूलों से परे इन दोनों में से कोई यह नहीं समझ पा रहा या फिर जानबूझ कर नहीं कह रहा कि विवाहेतर संबंध न तो गैरकानूनी हैं और न ही अनैतिक कहे जा सकते हैं. हां, परिवार के लिहाज से जरूर ये अव्यावहारिक हैं जिस की सजा राज खुलने पर पुरुष को भीषण मानसिक यंत्रणा, पश्चात्ताप, आत्मग्लानि और घर में रहते बहिष्कृत हो कर भुगतनी पड़ती है. यानी पति की सारी कोशिश संबंधों के दौरान उन्हें ढके रखने की होनी चाहिए और इस में पैसों की चिंता तो बिलकुल नहीं करनी चाहिए.

चक्रव्यूह में पति

इस के सिवा कोई और चारा नहीं कि इन संबंधों को खारिज न किया जाए. लेकिन संबंध उजागर हो जाने पर पति की मनोदशा का विश्लेषण किया जाए, जिस का एक आदर्श उदाहरण कपिल लाहोटी हैं.

सीमा भले ही सहअभियुक्त हो, लेकिन उन्होंने पति को बचाने के लिए उन का साथ दिया. पुष्पा लक्ष्मी को बतौर सौत तो वे स्वीकार नहीं सकती थीं और न ही पति को माफ कर सकती थीं. उन की गलती यह है कि उन्हें इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए जो सहज रास्ता लगा, वह उन्होंने चुना भले ही वह गैरकानूनी था.

लेकिन पति जिस चक्रव्यूह में फंस जाता है उसे देखा जाना भी जरूरी है. वह न इधर का रहता और न ही उधर का रहता. भले ही संभ्रात समाज अपनी सहूलियत के लिए ऐसे संबंधों का ज्यादा विरोध न करे लेकिन राज खुलने के बाद वह खुल कर दोषी का साथ नहीं देता, यानी पकड़े गए तो चोर, नहीं तो कोतवाल.

पकड़े गए पतियों को न तो पत्नी माफ करती, न ही बच्चे और न ही परिवारजन. हैरत की बात यह भी है कि सबकुछ ढकेमुंह चलता रहे तो इज्जत और रुतबा बरकरार रहता है और पकड़े गए तो एक दिन में पानी उतर जाता है.

इस दोहरेपन को पति के नजरिए से देखें तो निश्चित ही वह लापरवाही के क्षणों को कोसता नजर आएगा. पत्नी, घर वालों और बच्चों की निगाह में गिर जाना उस के लिए कानून की सजा, जो आमतौर पर मामूली ही होती है, से कहीं बड़ी होती है.

भोपाल के ही एक वरिष्ठ इंजीनियर इस मामले पर आपबीती सुनाते बताते हैं कि वे लगभग 15 वर्षों से पत्नी के साथ एक छत के नीचे अजनबियों की तरह रह रहे हैं. उन के मुताबिक, यह सजा असहनीय है कि पत्नी है तो, पर दिखाने के लिए. इन दोनों में तभी से शारीरिक संबंध नहीं बने हैं जब से इंजीनियर साहब का प्रेमप्रसंग उजागर हुआ था.

पत्नी ने रिश्तेदारी और बच्चों की खातिर घर नहीं छोड़ा और न ही तलाक की पेशकश की. लेकिन पति की बेवफाई से वे इतनी आहत हुईं कि अब उन से बात भी नहीं करती हैं. हां, घर में कोई आता है तो इतनी खूबसूरती से पेश आती हैं कि कभीकभी इंजीनियर साहब भी चकरा जाते हैं कि शायद पत्नी ने उन्हें माफ कर दिया. लेकिन उन की यह गलतफहमी या उम्मीद उस वक्त धूमिल हो जाती है जब मेहमानों के जाते ही पत्नी पहले सी बेरुखी दिखाते अपने कमरे में जा कर बंद हो जाती है.

इंजीनियर साहब शुरू में अकेले में रोते रहते थे, लेकिन अब इस माहौल के आदी हो गए हैं. पत्नी की उपेक्षा उहें कांटों सी चुभती है और बाहर पढ़ रहे दोनों बच्चे भी उन से बात नहीं करते. अपनी दास्तां सुनाते वे बेमन से शायद खुद को बहलाने की गरज में लंबी सांस भरते कहते हैं कि शायद यही मेरी सजा थी.

बरतें सावधानी

क्या पति के बहकने में पत्नी की भूमिका कुछ नहीं होती, यह सवाल ज्यादा माने नहीं रखता. संबंधों का यह वह दौर है जिस में कोई पत्नी पति की शर्ट सूंघ कर नहीं बता सकती कि वह कहीं और मुंह मार कर आ रहा है.

मिसाल कपिल लाहोटी की लें तो उन की गलती क्या है, संबंध बनाना या फिर उसे छिपाने में असफल रहना. जाहिर है दूसरी बात अहम है, पत्नी के तो कोई खास माने किसी की नजर में हैं नहीं.

सार यह कि सावधानी पति को ही बरतनी होंगी. पर क्या ऐसा होना मुमकिन है कि कोई पति खुलेआम इश्क लड़ाए और डिजिटल होते इस समाज में राज को राज रख पाए. इस पर हां कहना मुश्किल है, लेकिन प्रेरणा वे लोग देते हैं जो ऐसे संबंधों को सफलतापूर्वक निभा रहे हैं. लेकिन वे कब तक निभा पाएंगे, इस की कोई गारंटी नहीं. फिर भी पतियों को चाहिए कि वे अपनी तरफ  से सावधानी रखें :

–     आजकल हर कोई 15-16 घंटे काम कर रहा है. ऐसे में प्रेमिका के लिए अलग से वक्त निकालना हर किसी के लिए संभव नहीं. वजह, घरपरिवार एक ऐसी इकाई है जहां रोज दफ्तर या व्यवसाय की तरह हाजिरी लगानी पड़ती है.

–     एक ही शहर में हैं तो प्रेमिका के साथ मौलहोटल आदि में आनाजाना जोखिमभरा काम है. ऐसे में घूमनेफिरने या शौपिंग करने की जिद करे तो ना कहना उसे भड़काने जैसी बात है और हां कह कर सार्वजनिक स्थानों पर जाना आ बैल मुझे मारने जैसी बात है.

–     प्रेमिका जबतब फोन कर सकती है. ऐसे में आप कितने भी बड़े ऐक्टर हों, ज्यादा देर मोबाइल पर हैलोहैलो, कौन बोल रहे हैं या आवाज नहीं आ रही… जैसे बहाने बना कर उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते. हां, इस बात पर जरूर खीझ सकते हैं कि औरतें होती ही बेवकूफ हैं. लाख समझाने पर भी उस ने बेवक्त फोन कर ही डाला.

–     अब छिपाइए पत्नी से चेहरे के रंग. एकदो बार कामयाब हो भी जाए लेकिन ऐसा हर बार नहीं होगा. प्रेमिका को ब्लौक करेंगे तो वह ऐसा बिफरेगी कि अगली बार फोन की जगह खुद ही घर आ टपक सकती है.

–     भोपाल जैसे बी श्रेणी के शहर में प्रेमिका का खर्च लगभग 20 हजार रुपए महीने बैठता है. यह एक रकम है जिस का हिसाबकिताब रखना या घालमेल करना संभव नहीं. बड़े व्यापारी तो इधरउधर के बहाने बना कर बहला सकते हैं, लेकिन नौकरीपेशा लोग दिक्कत में फंस जाते हैं. पत्नी को जब शक होता है, तो वह कैसे बाल की खाल निकालती है, यह भी कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है.

–     प्रेमिका कैसी भी हो, उसे रोज आप से फोन पर बात करनी ही होती है. जब तक वह सैक्सी और रोमांटिक बातें करती है तभी तक अच्छी लगती है. लेकिन जब वह दूसरी बातों का रोना ले कर बैठ जाती है तो आप की इच्छा फोन फेंकने की होना स्वाभाविक है. लेकिन ऐसा आप कर नहीं सकते यानी आप से ज्यादा बेवफा इंसान कोई और नहीं.

–     जब वह यह पूछती है कि ऐसा कब तक चलेगा, मेरा क्या होगा, क्या मैं जिंदगीभर रखैल बन कर रहूंगी, मुझे एक बच्चा दे दो उसी के सहारे जिंदगी काट लूंगी. तब आप की पूरी ऊर्जा उसे समझने में खर्च हो जाती है. डर इस बात का रहता है कि अगर वह जिद पर अड़ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे.

–     कभीकभी वह इशारों में कहती है कि वह अब इस रिश्ते को ले कर थक गई है तो इस का सीधा सा मतलब यह निकलता है कि वह रिश्ते को सार्वजनिक कर देने की बात कर रही है. तब आप की हालत देखने लायक होती है कि अब क्या करें.

–     जब आप उस के साथ लौंग ड्राइव पर जाते हैं तो घर लौटते वक्त कितनी बार कार को बारीकी से देखते हैं कि उस काकोई छोटामोटा सामान न रह गया हो. चोर की दाढ़ी में तिनका अच्छेअच्छे क्लीनशेव वालों को परेशान कर डालता है. अब घर पहुंचने के कुछ पहले कार को नजरों से साफ करते रहिए.

–     पत्नी शक न करती हो, तो भी आप कभीकभी उस की निश्छलता और भोलापन देख कर ग्लानि से भर उठते हैं. लेकिन सहज रहने की कोशिश में कितने दयनीय हो जाते हैं, यह आप से बेहतर कोई नहीं जानता.

और आखिर में मुद्दे की बात, वह अनजाना डर है जो भूतप्रेत की तरह चौबीसों घंटे आप के साथ चलता है कि कहीं पकड़े गए तो क्या होगा, लोग क्या कहेंगे, पत्नी और बच्चे क्या करेंगे, दफ्तर में क्या इमेज बनेगी या कौर्पोरेट में क्या प्रतिक्रिया होगी. अगर आत्मविश्वास खोया तो धंधा तो चौपट होना तय है.

इसलिए ध्यान यह रखें कि प्रेमिका, प्रेमिका ही रहेगी जिसे रखैल जैसे बाजारू शब्द से नवाजना आप भले ही पसंद न करें लेकिन सच तो सच है कि वह कभी पत्नी की जगह नहीं ले सकती. पत्नी आप की पहचान है और बच्चे जिंदगी का मकसद हैं. इन से बेईमानी करेंगे तो आज नहीं तो कल, आप का हश्र भी लाहोटी परिवार सरीखा हो सकता है.

बेहतर होगा कि इस राह पर न चलें और चल पड़ें तो कुछ दूर जा कर वापस लौट आएं और कदमों के निशान न छोड़ें उन्हें मिटाने की जो भी कीमत हो, चुकाएं. याद यह भी रखें कि जितने दूर तक जाएंगे, कीमत और जोखिम उतने ही बढ़ते जाएंगे. अब फैसला आप के हाथ में है कि पत्नी या वो.

आम चुनाव 2019 सीरीज (पार्ट-2) : जनता जाने सरकार का लेखाजोखा

यूपीए सरकार 2014 में मोदी लहर में बह गई थी. भाजपा प्रवक्ता सय्यद शाहनवाज हुसैन दावा करते हैं कि पहले मोदी लहर आई थी तो अब की बार 2019 में मोदी सुनामी आने वाली है. मगर अंदरखाने खबर यह है कि अब की बार भाजपा की धुकधुकी बज रही है, क्योंकि 2014 में सत्ता पाने की कोशिश में भाजपा के कर्णधार नरेंद्र मोदी ने जनता को लुभाने के लिए जो बड़ेबड़े वादे किए थे, वे ज्यादातर हवाहवाई निकले.

2014 में तत्कालीन यूपीए सरकार के दोषों को गिनवाते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा था :

–     अगर हम सत्ता में आए तो देश विकास के पथ पर तेजी से बढ़ेगा. हम हर साल 2 करोड़ नौकरियां देंगे.

–    देश से बेरोजगारी मिटा देंगे.

–     भ्रष्टाचारियों को जेल भेजेंगे.

–     कालाधन वापस लाएंगे और हर नागरिक के बैंकखाते में 15-15 लाख रुपए जमा कराएंगे.

–     हर देशवासी को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराएंगे.

जनता ने भी उन के वादों पर एतबार किया था, इस के चलते ही भाजपा को भारी बहुमत मिला और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने. मगर 5 साल के कार्यकाल में उन के ज्यादातर वादों की हवा निकल चुकी है. पार्टी व सरकार नोटबंदी, जीएसटी, आरबीआई, राममंदिर, गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी, दलितों की पिटाई, आरक्षण को कमजोर करने की कोशिश जैसे बड़े मुद्दों पर बैकफुट पर हैं.

हाल ही में हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने तो भाजपा की बेचैनी को और ज्यादा बढ़ा दिया है. जहां वह 5 में से 5 में बुरी तरह हारी.

मोदीराज में भुखमरी से मौतें

जुलाई 2017 में दिल्ली के मंडावली इलाके में एक रिकशाचालक की 3 नन्हीं बच्चियां भूख से तड़पतड़प कर मर गईं. पोस्टमौर्टम रिपोर्ट से भी इस बात का खुलासा हुआ. 8 साल की शिक्षा, 4 साल की मानसी और 2 साल की पारुल भूख के कारण अकाल मृत्यु का शिकार हो गईं.

पश्चिम बंगाल से अपना परिवार ले कर दिल्ली में बसने वाला मंगल रिकशा चला कर अपने परिवार का भरणपोषणकर रहा था. भूख और दवा के अभाव में उस की पत्नी मानसिक रोगी हो गई. मंगल के पास दिल्ली का राशनकार्ड नहीं था कि वह सस्ता अनाज खरीद कर अपने बच्चों का पेट भरता. लगातार भुखमरी झेलती उस की तीनों बच्चियां कुपोषण का शिकार हो गईं. आखिरकार, उन की जानें चली गईं. सरकारी आदेशों के अनुसार आधारकार्ड, राशनकार्ड ज्यादा जरूरी हो गए जबकि आदमी की जान कम. इन्हें बनवाने में गरीबअनपढ़ कहां ठोकरें खाएं.

भूख से बिलबिलाते गरीबों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र्र मोदी बीते पौने 5 सालों में ऐसी कोई योजना नहीं ला पाए कि उन्हें सस्ता राशन आसानी से उपलब्ध हो सके. इतना भी न कर पाए कि एक राज्य के बने राशनकार्ड पर वह दूसरे राज्य में राशन की दुकान से अनाज खरीद सके.

अगर पश्चिम बंगाल से दिल्ली आ कर बसे रिकशाचालक मंगल के परिवार को अपने पुराने राशनकार्ड पर सस्ता राशन दिल्ली में मिल जाता तो आज उस की बच्चियां जीवित होतीं.

घटना यह बताने के लिए काफी है कि देश की अंदरूनी हालत क्या है? गरीबों की झोंपडि़यों में सिर डाल कर वहां की दयनीय हालत देखने का वक्त प्रधानमंत्री तो छोडि़ए, उन के किसी मंत्री या अधिकारी को भी इस दौरान नहीं मिला.

सरकारी स्वांग

हां, बीते नवरात्र में प्रधानमंत्री ने जरूर 9 दिन का व्रत किया, कन्यापूजन कर ब्राह्मण (?) कन्याओं को भोजन कराया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी 9 दिन व्रत रखा, कन्याभोज दिया. मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी नवरात्र में व्रत रखा और कन्याभोज कराया. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से ले कर भाजपा नेता शत्रुघ्न सिन्हा, राजद नेता तेजस्वी यादव सभी नवरात्र को राजनीतिक रूप से भुनाते नजर आए. पहली बार लगा कि इस देश में कन्याभोज का भी राजनीतिकरण हो गया. होड़ लगी थी एकदूसरे से आगे बढ़ कर कन्याभोज कराने की.

देश में हर दिन 3 हजार बच्चे इसलिए दम तोड़ रहे हैं क्योंकि उन को दो वक्त की रोटी नहीं मिल पाती है.

ग्लोबल हंगर इंडैक्स 2018 की रिपोर्ट कहती है कि भारत में भुखमरी और कुपोषण बेहद गंभीर आंकड़े को छू रहा है. वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत 2017 के मुकाबले 2018 में 3 स्थान और नीचे चला गया है. भारत की स्थिति नेपाल और बंगलादेश जैसे छोटे व गरीब पड़ोसी देशों से भी बदतर हो गई है.

2014 में जहां भारत ग्लोबल हंगर इंडैक्स में 55वें स्थान पर था, वहीं 2018 में 103 पर पहुंच गया है.

ग्लोबल हंगर इंडैक्स ने गरीबी और भूख से जूझते 199 देशों का आंकड़ा सामने रखा है, यह आंकड़ा निश्चित ही सरकार की नाकामी का गवाह है.

26 दिसंबर, 2017 को झारखंड की कोयली देवी की बेटी भूख से मर गई, क्योंकि उस का राशनकार्ड आधार से नहीं जुड़ा था, लिहाजा कोटेदार ने उसे राशन देने से मना कर दिया और खुले बाजार से मंहगा राशन लेना उस के बूते से बाहर था.

प्रधानमंत्री देशभर में बन रहे फ्लाईओवर्स और सड़कों को देख कर फूले नहीं समाते हैं. इन के विज्ञापन अंगरेजी अखबारों में खूब छपवाते हैं ताकि भारत व बाहर के विदेशी विज्ञापन देख कर उन्नत भारत की कल्पना करने लगें. वे कहते हैं कि हम तेजी से विकास कर रहे हैं, मगर इन्हीं फ्लाईओवर्स के नीचे जीवनयापन करने वाले गरीब को वहां क्यों रहना पड़ता है, यह जानने की किसी ने कोशिश नहीं की.

गोरखपुर जिले के कई गांवों में आज भी मुसहर जाति के लोग चूहे और घोंघे खा कर अपनी भूख मिटाते हैं. जून 2018 में दिल्ली की सड़कों पर अपनी मांगों को ले कर प्रदर्शन करते किसानों ने अपने मुंह में चूहे दबा कर आंदोलन किया था.

पूर्वांचल के कई गांवों की हालत खस्ता है वहां लोगों के पास राशनकार्ड नहीं हैं, आधारकार्ड नहीं हैं, बैंक क्या होता है, इस बात का उन को पता ही नहीं है.

आंध्र में आत्महत्याएं बढ़ रही हैं, महाराष्ट्र के किसान और मजदूर बेहाल हैं. सरकारी योजनाओं की उन्हें कोई जानकारी नहीं है.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सांसदों से अपने निर्वाचन क्षेत्र के किसी एक गांव को गोद ले कर उन्हें आदर्श गांवों में तबदील करने को कहा था, लेकिन मोदीराज का लगभग पूरा कार्यकाल ही गुजर गया, आदर्श गांव की श्रेणी में शायद ही कोई गांव खड़ा हो पाया हो, जहां भूख का सफाया हो गया हो.

भूख शायद भाजपा की सोच के अनुसार पिछले जन्मों के पापों का नतीजा है और यह नए देवीदेवताओं को पूजने से समाप्त होगी, जिसे सरकार हर संभव बढ़ावा देने में लगी है. इस सरकार के लिए हर व्यापारी चोर है और हर भूखा पापी. यह उस धार्मिक सोच का परिणाम है जिस पर सवार हो कर भाजपा सरकार बनी थी.

बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं

हम चाहते हैं कि हम स्वस्थ रहें. कहते हैं न शरीर स्वस्थ तो मन स्वस्थ और मन स्वस्थ तो समाज और देश स्वस्थ. मगर दुख है कि हमारे देश में बीमारियों की भरमार है. सरकारी, गैरसरकारी अस्पताल, नर्सिंग होम्स रोगियों से भरे पड़े हैं. दिल्ली के एम्स और सफदरजंग अस्पतालों का हाल यह है कि वहां गंभीर रोगियों के औपरेशन के लिए भी 3 से 6 महीने की तारीखें मिल रही हैं.

अस्पतालों में बैड न होने से मरीज सड़कों पर लेटे गरमीसर्दी के कहर को झेल रहे हैं. आज अगर देश स्वस्थ नहीं है तो इस की जिम्मेदार सरकार है, जो अपना काम ठीक तरीके से नहीं कर रही है.

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति आज भी निराशाजनक यानी जस की तस बनी हुई है. कूड़ा सड़क की बाईं पटरी से खिसक कर दाईं पटरी पर चला गया तो तालियां पिट गईं.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ कहे जाने वाले गोरखपुर के बीआरडी मैडिकल कालेज से अगस्त 2017 में दिल दहला देने वाली खबर आई. वहां औक्सीजन सिलिंडरों की कमी से 33 मासूम बच्चे अकाल मौत के मुंह में समा गए. बच्चों की मौत की इस दर्दनाक खबर ने दुनिया को दहला दिया और देश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली की पोल खोल कर रख दी.

यह हादसा इतना भयावह था कि नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने ट्वीट कर लिखा, ‘बिना औक्सीजन के बच्चों की मौत हादसा नहीं, हत्या है. क्या हमारे बच्चों के लिए आजादी के 70 सालों का यही मतलब है?’ उत्तर प्रदेश सरकार शायद इस मौत को भगवान की मरजी मानती है. लोग तभी तक जिंदा रहेंगे न, जब तक उन के भाग्य में लिखा होगा.

अंतर्राष्ट्रीय खाद्य पौलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट की मानें तो तीर्थस्थानों से भरे कुंभ का विशाल आयोजन कराने वाले उत्तर प्रदेश में 46 फीसदी बच्चे 5 साल से कम उम्र में ही बीमारी से मर जाते हैं. बिहार और झारखंड भी इस मामले में पीछे नहीं हैं.

उत्तर प्रदेश में 70 फीसदी गरीब गर्भवती महिलाएं और बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. पूर्वांचल में जुलाई और अगस्त का महीना नवजातों के लिए बहुत ही घातक होता है. डायरिया और दिमागी बुखार से हजारों बच्चों की मौतें यहां हर साल होती हैं.

वर्ष 2017 में गोरखपुर के बीआरडी कालेज में केवल अगस्त माह में एक हजार से ज्यादा बच्चों की मौतें हुईं. वहीं, राजस्थान के बांसवाड़ा में इन 2 महीनों के दौरान 70 बच्चे और जमशेदपुर के अस्पताल में 100 से ज्यादा बच्चों की मौतें हुईं. उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद और बरेली से भी लगातार बच्चों की मौतों की खबरें आती रहीं.

पोल खोलते आंकड़े

इंडिया स्पेंड की ओर से किए गए एक शोध से पता चला है कि नवजातों की मौत के मामले में झारखंड सब से आगे है. जुलाईअगस्त में वहां सब से ज्यादा शिशुओं की मौत होती है. इस दौरान बारिश की वजह से इन्फैक्शन का खतरा बढ़ जाता है और बच्चों को कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं. स्वास्थ्य केंद्रों, दवा और डाक्टरों के अभाव में मौत के आंकड़े बढ़ते हैं.

मगर भारत की जनता कुपोषण, गंदगी और संक्रामक रोगों से अब भी जूझ रही है. पर्यावरण प्रदूषण, शराब का सेवन, धूम्रपान, उच्च वसायुक्त खानपान तथा गतिहीन जीवन के कारण देश में मधुमेह व हृदय रोग संबंधी दिक्कतों व कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की दर भी तेजी से बढ़ी है.

स्वास्थ्य है अस्वस्थ

तपेदिक, मलेरिया, कालाअजार, डेंगू बुखार, चिकनगुनिया और जलजनित बीमारियां जैसे हैजाडायरिया का प्रकोप देश में कम नहीं हुआ है. अस्पतालों और डाक्टरों की उपलब्धता जनसंख्या के घनत्व के हिसाब से बेहद कम है और सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं, आधारभूत संरचना, चिकित्सकों, कक्षों, बैड्स, दवाओं, कुशल व प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ व दूसरी सुविधाओं की कमी लगातार बनी हुई है. यानी स्वास्थ्य विभाग ही अस्वस्थ है.

भारत में 7,54,724 बिस्तरों वाले कुल 19,653 सरकारी अस्पताल हैं. इन में ग्रामीण क्षेत्र में 15,818 और शहरी क्षेत्र में 3,835 अस्पताल हैं. भारत की 70 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में रहती है, जिस के इलाज के लिए लगभग 1,53,655 स्वास्थ्य उपकेंद्र, 25,308 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 5,396 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. लेकिन मरीजों की संख्या की तुलना में ये केंद्र बेहद कम हैं.

खुद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी नैशनल हैल्थ प्रोफाइल रिपोर्ट कहती है कि भारत में 11,082 लोगों पर महज एक एलोपैथिक डाक्टर है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में जीडीपी का महज एक फीसदी खर्च किया जाता है, जो पड़ोसी देशों मालदीव, भूटान, श्रीलंका और नेपाल के मुकाबले भी बहुत कम है. देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर हर साल औसतन प्रतिव्यक्ति रोजाना महज 3 रुपए खर्च किए जाते हैं.

मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया के पास वर्ष 2017 तक कुल 10.41 लाख डाक्टर पंजीकृत थे. इन में से सरकारी अस्पतालों में 1.2 लाख डाक्टर हैं. सरकार ने खुद संसद में बताया कि निजी और सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले लगभग 8.18 लाख डाक्टरों को ध्यान में रखें तो देश में डाक्टर व मरीजों का अनुपात 1:1,612 हो सकता है. लेकिन यह तादाद विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के मुकाबले कम है.

मोदी सरकार के पौने 5 वर्षों के कार्यकाल में स्वास्थ्य क्षेत्र की इस कमी को पूरा करने की दिशा में कुछ नहीं हुआ. केंद्र की आयुष्मान भारत योजना ने कुछ उम्मीदें जरूर जगाई हैं, लेकिन डाक्टरों की कमी दूर नहीं होने से ग्रामीण इलाकों के लोगों को इस का कोई फायदा नहीं मिल रहा है.

महंगी दवाओं का दर्द

दवा बाजारों की मनमानी चरम पर है. निगरानी के अभाव में मनमाने मूल्य पर दवा बिक रही हैं. मनमाने दामों पर पैथलैब्स में जांचें हो रही हैं. देश में दवाओं के मूल्य को निर्धारित करने वाला प्राधिकरण नैशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथौरिटी यानी एनपीपीए खुद अपनी रिपोर्ट में लिख रहा है कि सिप्ला, डा. रेड्डीज लैब्स और रैनबैक्सी जैसी बड़ी दवा कंपनियां अपने तय मूल्य से कहीं ज्यादा दामों पर खुलेआम दवा बेच रही हैं.

बाजार में बिक रही 634 दवाएं ऐसी हैं जो सरकार द्वारा तय की गई कीमतों से कहीं अधिक दामों पर बिक रही हैं. देश की सब से बड़ी दवा कंपनी कहलाने वाली सिप्ला कंपनी सिपलौक्स टी जेड के नाम से एक दवा बेचती है. लूज मोशन यानी दस्त में यह बहुत की कारगर दवा है. सरकार की मूल्य नियंत्रण श्रेणी में यह दवा भी आती है. इस दवा की सरकार द्वारा तय बिक्री मूल्य 25.70 रुपए प्रति 10 टैबलेट है. मगर यह बड़ी कंपनी इस दवा को 100 रुपए से अधिक मूल्य पर बेच रही है यानी हर 10 टैबलेट में वह 75-80 रुपए ज्यादा वसूल रही है.

गरीब आदमी को लूटने का यह खुला खेल स्वास्थ्य अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहा है. सिर्फ 17 फीसदी दवाएं ऐसी हैं जो सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य पर बिक रही हैं.

मोदी सरकार ने दवाओं के मूल्य पर नियंत्रण और निगरानी करने वाली एनपीपीए के अधिकार और संसाधन सीमित कर के उसे बिना दांत का शेर बना दिया है.

मोदी सरकार ने दवा मूल्य प्राधिकरण से गैरजरूरी दवाओं के अधिकतम मूल्य निर्धारित करने के सारे अधिकार छीन लिए हैं, जिस के चलते अब यह प्राधिकरण जीवनरक्षक दवाओं के दाम तय करने में प्राइवेट कंपनियों की मनमानी को नहीं रोक पाएगा.

अभी तक सरकार सिर्फ जीवनरक्षक दवाओं की कीमतें ही तय करती थी, मगर अब नीति आयोग के नए प्रस्ताव के मुताबिक सभी दवाओं की कीमतें सरकारी अफसर तय करेंगे. सरकार का यह फैसला सीधे पूंजीपतियों और व्यापारियों के हित में है, न कि गरीबों के.

एनपीपीए के अधिकार छीन लेने के फैसले से कैंसर, एचआईवी, टीबी, मलेरिया, हृदयरोग, मधुमेह, अस्थमा जैसी जानलेवा बीमारियों की दवाओं के दाम बढ़ गए हैं और इस का सीधा असर गरीब व आम जनता पर पड़ रहा है.

शायद सरकार चाहती है कि वैज्ञानिक स्वास्थ्य सेवाएं कम रहें ताकि लोग स्वामियों, झाड़फूंक करने वालों, कुंडली पढ़ कर बीमारी दूर करने वालों के पास जाएं. ये भाजपा के समर्थक हैं और उन्हीं के सहारे धर्म का व्यापार चल रहा है. डाक्टरों को सुविधाएं न दे कर सरकार आयुर्वेद, होम्योपैथी, योग, गंगास्नान को महत्त्व दे रही है ताकि स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होता रहे.

बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों को लुभाने और निजी क्षेत्र की कंपनियों में अपनी वाहवाही बटोरने के लिए देश के गरीब और जरूरतमंद लोगों के साथ हुए इस अन्याय का खमियाजा 2019 के चुनाव में भाजपा को सहना पड़ सकता है.

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आम चुनाव 2019 सीरीज (पार्ट-1) : जनता जाने सरकार का लेखाजोखा

इन 5 अनजान गलतियों से आप भी बना रही हैं अपनी स्किन को रूखा

क्‍या आपको ऐसा लगता है कि बदलते मौसम ने आपकी त्‍वचा को रूखा और बेजान बना दिया है. तो ऐसा कहना पूरी तरह से गलत होगा, क्‍योंकि त्‍वचा को रूखा बनाने में आपका भी काफी योगदान है. हम अपनी त्‍वचा को जान-अनजाने रूखा और बेजान बनाते रहते हैं और हमें इस बात का जरा भी अंदाजा नही रहता.

अगर आपकी स्‍किन रूखी बन गई है और उसमें कोई चमक बाकी नहीं रह गई है तो, इसकी कसूरवार आप भी हैं. आइये जानते हैं कि किन अनजानी गलतियों से आप अपनी त्‍वचा को रूखा बना रही हैं.

  1. हममें से ज्यादातर लोग सोचते हैं कि क्रीम की मोटी परत को लगाने से त्‍वचा में नमी ज्‍यादा देर तक बनी रहेगी. पर यह बात साफतौर पर गलत हैं क्योंकि अगर आप त्‍वचा पर मोटी परत लगाएंगी तो क्रीम त्‍वचा की डेड सेल को दबा लेगी जिससे त्‍वचा मुर्झायी सी दिखेगी.
  2. हम अक्सर धूप ना होने पर सनस्‍क्रीन का प्रयोग जरूरी नहीं समझते, लेकिन अगर आसमान में बादल छाये हुए हैं तो इसका यह मतलब नहीं है कि आप सनस्‍क्रीन नहीं लगाएंगी बल्‍कि बादल यूवी किरण को आपके शरीर तक आने से नहीं रोक सकते है. आपकी त्‍वचा पर यूवी किरण का प्रभाव उतना ही पड़ेगा, जितना आसमान में बादल ना रहने पर पड़ता है.
  3. शावर लेने से ड्राई स्‍किन नम रहती है ऐसा नहीं है, ज्‍यादा देर नहाने या स्‍वीमिंग करने से त्‍वचा से पानी निकल जाता है, जिससे शरीर रूखा बन जाता है. नहाने के लिये हल्‍के गरम पानी का प्रयोग करें.
  4. स्‍क्रब करने से स्‍किन ड्राई और छिल जाती है अगर आप बहुत ज्‍यादा शरीर और चेहरे को स्‍क्रब करेंगी तो ऐसा जरुर हो जाएगा. स्‍क्रब केवल हफ्ते में एक या दो बार करना चाहिये जिससे क्रीम और मौइस्‍चराइजर त्‍वचा में समा जाए.
  5. हम ऐसा सोचटे हैं कि औइली स्‍किन को मौइस्‍चराइजर की जरुरत नहीं, लेकिन ऐसा सोचना हमारी सबसे बड़ी भूल है क्योंकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, अगर स्‍किन औइली है तो औइल फ्री वाला मौइस्‍चराइजर चुनें नहीं तो कुछ समय बाद आपकी स्किन में भा कसाव आ जाएगा.

बजट में भटकाव

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के 2019 के बजट पर भाजपा चाहे जितना शोर मचा ले, वोटकैचर नहीं है. देश की जो हालत है उस में इस बजट से कुछ सुधार होगा, यह नहीं दिखता. सरकार ने अपने घाटे के बजट को बनाए रख कर छोटीमोटी कुछ छूटें दी हैं जो अगले

2-3 महीनों में  सरकार का खर्च बढ़ाएंगी जबकि जनता की जेब में कुछ ज्यादा नहीं डालेंगी. हां, यह भ्रम रहेगा कि जनता की जेब काटी नहीं जाएगी.

सरकार के पास अब जेब काटने की गुजांइश भी नहीं. नोटबंदी कर के सरकार कालाधन पहले ही निकाल चुकी है- कम से कम नोटबंदी के समय यही कहा गया था-और अब टैक्स लगाने की कहीं गुजांइश नहीं है. टैक्स तो कालेधन को बटोरने के लिए ही लगाया जाता था न.

उधर, जीएसटी से सरकार ने पहले ही हर चीज को टैक्स के दायरे में ला दिया है. जीएसटी का कानून ही ऐसा है कि हर व्यापारी चोर समझा जाता है और चोरों को जब जीएसटी से पकड़ा जा चुका हो तो उन से और क्या वसूला जा सकता है? व्यापारी वर्ग, जो अब भी हिंदूहिंदू के नारे लगा रहा है, भूल रहा है कि हिंदूहिंदू के नारे के पीछे चंदाटैक्स चंदाटैक्स का नारा छिपा है जो जीएसटी के माध्यम से सरकार के हाथों में जा रहा है.

आयकर के दायरे में आने की सीमा बढ़ाना तो महज औपचारिकता है. उस से सरकार का काम घटेगा और जो थोड़ाबहुत राजस्व का नुकसान होगा वह रिटर्नों के साथ सिर न खपाने से बच जाएगा.

हर सरकार हर बजट में लोगों या व्यापारियों के दबाव में कुछ बदलाव करती है. अब की बार किसान भी इस में जोड़ लिए गए हैं. जो थोड़ा परिवर्तन किया गया है वह उसी दबाव के कारण है. इस में सरकार की दूरदर्शिता या आर्थिक विकास का दर्शन नहीं है. मीडिया में इस बजट की तारीफ हो रही है तो सिर्फ इसलिए कि इस में जेबकटौती नहीं है. जब जेब पहले ही खाली है, तो काट कर क्या करेंगे?

बजट कहीं से भी देश को दूरगामी रास्ते पर ले जाने वाला नहीं है. उलटे, गौशालाओं के लिए पैसे देना यह पक्का करता है कि सरकार तो अभी भी संतोंमहंतों को पैसा देने में जुटी है और जनता की मेहनत का पैसा व्यर्थ के तीर्थों व मूर्ति स्थलों पर खर्च किया जाता रहेगा. यह भाजपाई चुनावी बजट नहीं है, यह सरकारी बजट है जो हर सरकार पेश करती है, पार्टी चाहे कोई भी हो.

घर पर हावी न हो औफिस, आ जाएगी रिश्तों में दरार 

दिशा और मयूर की लाइफस्टाइल वैसी ही है जैसी आजकल ज्यादातर वर्किंग कपल्स की होती है. सुबह से जो भागदौड़ शुरू होती है वह रात ढलने तक चलती रहती है. फिर बिस्तर पर ढेर. अगली सुबह फिर वही रूटीन. ज्यादातर कपल्स को आजकल औफिस के काम के अलावा कुछ दिखता ही नहीं. जिन के बच्चे हैं वे बच्चों को भी इसी दौड़भाग का हिस्सा बना कर रखना चाहते हैं – कभी ट्यूशन तो कभी डांस क्लास तो कभी कराटे या फुटबौल प्रैक्टिस. एक के बाद एक क्लास में जाते बच्चों के पास अपने मातापिता से समय की मांग करने का समय ही नहीं बचता.

दिशा कहती है, ‘‘अब पहले की तरह एक सैलरी में तो घर चलने से रहा. अच्छी लाइफस्टाइल मेंटेन करने के लिए पतिपत्नी दोनों का वर्किंग यानी कमाऊ होना जरूरी है.’’

आज की बिजी लाइफ में जहां केवल काम ही जिंदगी की प्राथमिकता बन गया है, वहां पतिपत्नी के आपसी रिश्ते भी एक फाइल में बंद हो कर रह गए हैं जो शायद रिटायरमैंट के बाद ही निकलेगी. लेकिन कैरियर की ऐसी सक्सैस का क्या फायदा जो पूरी जवानी निगल जाए? बुढ़ापे में जब न स्वास्थ्य रहेगा और न उमंग, तब एकदूसरे की दवाइयों का खयाल रखने में क्या खुशी मिलेगी भला.

माना कि प्रोफैशनल सक्सैस चाहिए, कैरियर बनाने का भी यही समय है परंतु काम का असर आपसी रिश्ते पर पड़ने लगे, इस से पहले सचेतने में ही समझदारी है. प्रोफैशनल लाइफ के कारण पर्सनल लाइफ खराब न हो, इसलिए ‘वर्कलाइफ बैलेंस’ जैसे टर्म तेजी से उभर रहे हैं. औफिस कहीं आप के घर पर हावी न हो जाए, इस से पहले इन अलार्म बैल्स को सुनिए :

औफिस में ऐक्सट्रा घंटे

आजकल 9 से 5 का जमाना नहीं रहा. 10 से 12 घंटे की नौकरी आमबात हो गई है. लेकिन कई बार बौस की नजरों में चमकने के लिए लोग दफ्तर से घर आने के लिए कोई समयसीमा तय नहीं करते. औपरेशंस डिपार्टमैंट में काम करने वाली मानसी जब तक घर पहुंचती है तो उस के बच्चे सो चुके होते हैं. मां के उस के साथ रहने के कारण मानसी को अपने बच्चों की चिंता नहीं होती पर उस के बच्चे अपना बचपन बिना मां के बिताने को मजबूर हैं. ऐसे ही सुधीर के घर पहुंचने तक लगभग सभी सो चुके होते हैं. वह अकेले ही खाना खाता है.

उलझन : ऐसे कैरियर का क्या फायदा जिस के लिए आप का भरापूरा परिवार आप की जिंदगी से गायब रहे. परिवार हमारी थकान मिटाता है, उदासीनता हटा कर जीवन में खुशहाली के रंग भरता है.

टिप : किसी मीटिंग या किसी इवैंट के कारण, लेट केवल कभीकभी हों. नियम बना लें और अपने परिवार के साथ रात का खाना जरूर खाएं.

औफिस का काम घर पर लाना

लैपटौप और स्मार्टफोन आने की वजह से काम के घंटे फैल कर 24 घंटों में परिवर्तित हो गए हैं. जब ईमेल आई तभी चैक कर के उस का तुरंत रिप्लाई भेजना एक ट्रैंड बन गया है. वैसे तो यह अलगअलग कंपनी के कल्चर पर निर्भर करता है परंतु यदि संभव हो तो औफिस का काम घर लाने से बचें.

प्रियंका बताती है, ‘‘जब तक बहुत जरूरी न हो, वह घर पर औफिस का काम या कोई मेल चैक नहीं करती है. घर में केवल फिजिकल ही नहीं, मैंटल उपस्थिति भी उतनी ही जरूरी होती है.’’

उलझन : जब आप की फैमिली काम के घंटों के बीच आप को डिस्टर्ब नहीं करती तो आप के औफिस को भी यह सीखना होगा.

टिप : घर पर सहकर्मियों से गप लगाने से परहेज करें. फोन और लैपटौप को दूर रख कर, अपना समय परिवार के साथ ईमानदारी से बिताएं. यदि कोई खास दफ्तरी काम आन पड़े तो किसी अलग कमरे में बैठ कर पूरे ध्यान से उसे जल्दी पूरा करें और फिर खुद को मैंटली लौगऔफ कर लें.

औफिस कलीग से नजदीकी

कामकाजी लोग घर की अपेक्षा औफिस में ज्यादा समय बिताते हैं. ऐसे में कई बार वे अपने स्पाउस के बजाय कलीग के अधिक करीब आने लगते हैं.

उलझन : अभय के टूरिंग जौब के कारण वह अकसर अपनी कलीग मधु के साथ ट्रैवल करता था. मधु से कब उस की नजदीकियां बढ़ गईं, उसे पता ही न चला.

टिप : ऐसी स्थिति पैदा हो जाए तो अपने स्पाउस को पता लगने से पहले ही चेत जाएं वरना नौकरी के कारण आप की गृहस्थी बिखरने में देर नहीं लगेगी.

इवैंट्स पर गायब रहना

नीरज अपने, अपनी पत्नी और अपनी बेटी के जन्मदिनों पर औफिस से छुट्टी जरूर लेता है. वह समझता है कि नौकरी चलती रहेगी पर जिंदगी में ये खुशियों के पल लौट कर वापस नहीं आएंगे. वह कहता है, ‘‘बच्चों को बड़े होते देर नहीं लगती. जब तक वे हमारे साथ हैं, हमें भी उन के साथ ढेर सारी अच्छी यादें बटोर लेनी चाहिए.’’ ठीक ही तो है. हर बार ‘टाइम नहीं है’ कि रट अच्छी नहीं लगती.

उलझन : दीपा के बेटे का ऐनुअल डे प्रोग्राम था और उसी दिन औफिस में जरूरी इंटरव्यू भी थे जिन में उस की उपस्थिति जरूरी थी. वह कहती हैं, ‘‘वैसे, मैं कभी भी ऐसे इवैंट मिस नहीं करती हूं पर मजबूरी हो, तो क्या करूं.’’

 टिप : यदि आप की मैनेजमैंट समझ सकती है तो ऐसे दिन औफिस से थोड़ा जल्दी घर चली जाएं. लेकिन यदि संभव ही न हो तो तकनीकी सहारा लें और वीडियोकौल की सहायता से एकसाथ

2 जगह उपस्थिति लगाएं. यदि आप की मंशा अपने पारिवारिक इवैंट मिस करने की नहीं है तो अकसर आप खास मौकों पर खुद को अपने परिवार के साथ पाएंगे.

वर्कलाइफ बैलेंस

यदि आप का परिवार बारबार आप से समय न देने की शिकायत करता है तो आप को इस बात की तरफ विचार करना चाहिए. आप को ध्यान से सोचना चाहिए कि क्या वाकई आप अपनी नौकरी को अपने परिवार से ज्यादा प्रायोरिटी दे रहे हैं? माना कि आप नौकरी में मेहनत परिवार को सुखसुविधाएं देने के लिए करते हैं पर कहीं ऐसा न हो कि आप का परिवार आप के बिना ही जीना सीख जाए.

उलझन : आशीष ने कैरियर में आगे बढ़ने को ही सर्वोच्च माना. परिवार के साथ समय बिताना उसे हमेशा टाइमवैस्ट लगा. आज उस का परिवार उसी के कमाए पैसों से मूवी के टिकट बुक करने से पहले उस की उपस्थिति के बारे में उस से पूछता भी नहीं है.

टिप : अच्छी आमदनी भोगने के लिए सभी को पारिवारिक साथ चाहिए. इस से पहले कि आप का परिवार आप को गिनना छोड़ दे, उन के बनाए कार्यक्रमों में साथ रहें.

दरअसल, औफिस और घर, दोनों का अपनाअपना महत्त्व है. न घरपरिवार के बिना जिया जा सकता है और न औफिस कैरियर के बिना घर पनप सकता है. जैसे औफिस की टाइमिंग होती हैं, वैसे ही घर को भी समय देना जरूरी है.

दलितों व स्त्रियों पर जुल्म, उजागर हुआ धर्म का गठजोड़  

मुजफ्फरपुर, देवरिया, उन्नाव, कठुआ, इंदौर जैसे शहरों में घटी घटनाएं देख लीजिए, हर जगह सुव्यवस्थित, सांगठनिक तरीके से यौनशोषण भी हो रहा है और आर्थिक शोषण भी. यह तरीका पहले भी था. उस पर राजनीतिक संरक्षण का जामा पहना दिया गया है, अब भी कमोबेश वही तरीका है. हर घटना में राजनीतिक दल, अफसर, धार्मिक नेता और परिवार भी शामिल रहा है.

देवरिया में पुलिस की कार्यवाही से पता चलता है कि विंध्यवासिनी शेल्टर होम के रजिस्टर में दर्ज 42 युवतियों में से 18 अभी गायब हैं. बाकी युवतियों की डाक्टरी जांच में यौनशोषण की पुष्टि हुई है. उन के बयानों में कहा गया है कि हर रात 4-5 युवतियों को बाहर भेजा जाता था. शेल्टर होम में रात में बड़ेबड़े अफसर आते थे. ये शेल्टर होम इस तरह का धंधा करने की हिम्मत कर लेते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि औरतों पर अत्याचारों को सामाजिक मान्यता है.

यही क्यों, धर्म के नाम पर बने आश्रमों में भी यही सब चलता रहा है. वीर?ेंद्र देव दीक्षित से ले कर राम रहीम, आसाराम, रामपाल, इच्छाधारी बाबा और अब दाती महाराज तक की यौन उत्पीड़न मामलों में लिप्तता सामने आ चुकी है. वीरेंद्र देव दीक्षित के आश्रमों में तो मांबाप खुद अपनी लड़कियों को छोड़ कर गए थे. औरतें खुद को पाप की गठरी ही मानती हैं और ईश्वरभक्ति को मुक्ति का रास्ता.

मुजफ्फरपुर और देवरिया में यौनशोषण मामलों में सत्ता और एनजीओ का गठजोड़ सामने आने से यह साफ है कि स्त्री का यौनशोषण कोई व्यक्ति अकेला नहीं, शासन, प्रशासन, समाजसेवी, परिवारजन और धर्मगुरु मिल कर करते हैं. यह सांगठनिक यौनशोषण है. यह इसलिए है क्योंकि इसे धर्म की मान्यता प्राप्त है. इसीलिए तो जब बलात्कार की वारदात सामने आती है तो सरकार और धर्मगुरु मौन रहते हैं और नेता या दूसरे लोग जो कुछ बोलते हैं तो वे वही धर्मसम्मत बातें कहते हैं जो स्त्री के लिए धार्मिक किताबों में लिखी हैं यानी धर्म स्त्रियों के यौनशोषण को संरक्षण देता आया है. इस यौनशोषण का एक दुष्परिणाम यह भी है कि महिलाओं से आर्थिक प्रगति में जो योगदान लिया जा सकता है, वह नहीं लिया जा पाता.

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लुंजपुंज कानून

पिछले दशकों में हालांकि स्त्रियों और निचले तबकों के शोषण के खिलाफ कानून बने व संशोधित हुए, लेकिन इस के बावजूद इन दोनों वर्गों पर शोषण कम नहीं हुआ, उलटा बढ़ा ही है. शोषकों की संख्या बहुत ज्यादा है. मुट्ठीभर समाजसुधारकों ने कानून तो बनवा दिए पर उन के पास उन को लागू करवाने की संस्थाएं नहीं हैं. पुलिस, सरकारी अफसर, संगठित व्यापार, धर्मव्यापारी सब औरतों के शोषण को स्वाभाविक मानते हैं और कानूनों को समाज में हस्तक्षेप.

स्त्रियों और दलितों से संबंधित कानूनों की कमी नहीं है. समयसमय पर कानून बने और संशोधन हुए पर इन दोनों वर्गों पर अपराध कम नहीं हो रहे हैं. साफ है कि चाहे कितने ही कानून बना दिए जाएं, संशोधित कर दिए जाएं पर यह देश, समाज तो धर्म के नियमों पर ही चलेगा. स्त्रियों और निचली जातियों के साथ धर्म के बताए अनुसार ही बरताव किया जाएगा.

निर्भया कांड के बाद देश में मचे बवाल के बीच महिलाओं के साथ अपराध को ले कर एक बहस शुरू हुई. देश में सख्त कानून बनाने को ले कर दोषियों को मौत की सजा दिए जाने की मांग होने लगी. नतीजतन, एंटी रेप कानून पर मुहर लगी.

16 दिसंबर, 2012 को हुए निर्भया कांड के बाद फरवरी 2013 को  क्रिमिनल लौ अमैंडमैंट और्डिनैंस लाया गया, जिस के तहत आईपीसी की धारा 181 और 182 में बदलाव किए गए. इस में बलात्कार से जुड़े नियमों को कड़ा किया गया. रेप करने वाले को फांसी की सजा मिले, इस का प्रावधान किया गया.

22 दिसंबर, 2015 को जुवेनाइल जस्टिस बिल पास हुआ. इस एक्ट में प्रावधान किया गया कि 16 साल या उस से अधिक उम्र के बालक को जघन्य अपराध करने पर एक वयस्क मान कर मुकदमा चलाया जाएगा. बलात्कार, बलात्कार से हुई मौत, गैंगरेप और एसिड अटैक जैसे महिलाओं के साथ किए जाने वाले अपराध जघन्य अपराध की श्रेणी में लाए गए. इस के अलावा वे सभी कानूनी अपराध जिन में 7 साल या इस से अधिक की सजा का प्रावधान है, जघन्य अपराध की श्रेणी में शामिल किए गए.

इस के बावजूद, इस वक्त देशभर में मासूमों के साथ बलात्कार की घटनाएं ज्यादा प्रकाश में आ रही हैं. प्रोटैक्शन औफ चिल्डै्रन फ्रौम सैक्सुअल अफैंसेस एक्ट-2012 (पोस्को) लाया गया. अब इस में संशोधन किया गया है जिस के तहत 12 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार पर मौत की सजा दिए जाने का प्रावधान जोड़ा गया है.

घरेलू हिंसा से संबंधित महिला संरक्षण अधिनियम 2005 लागू किया गया. भारत की संसद द्वारा पारित इस अधिनियम का उद्देश्य घरेलू हिंसा से महिलाओं को बचाना है. यह अक्तूबर 2006 में लागू हुआ था पर इस के बाद भी महिलाओं पर हिंसा में कमी नहीं आई, बल्कि बढ़ोतरी हुई. कानूनों के बावजूद घरेलू हिंसा आज भयावह स्थिति में है.

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं का संरक्षण (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम-2013 पारित किया गया.

कन्याभ्रूण हत्या के खिलाफ अधिकार, गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग की जांच करना या करवाना कानूनी अपराध, संपत्ति पर अधिकार, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत नए नियमों के आधार पर पुश्तैनी संपत्ति पर महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक दिया गया है.

इन कानूनों में ज्यादातर मामलों में सजा को बढ़ा दिया गया है पर सिर्फ कानून बना देना, संशोधन करना या कानून को सख्त बना देना एक भुलावा है. हमारे पास ऐसा कोई भरोसेमंद अध्ययन नहीं है जिस से पता चल सके कि कड़ी सजा से यौनहिंसा के मामलों में कमी आती है. दूसरे देशों के उदाहरणों से पता चलता है कि कुछ जगहों पर मृत्युदंड के प्रावधान से बलात्कार के मामलों में कमी नहीं आई, जबकि कुछ स्थानों पर महिलाओं के खिलाफ अधिक हिंसक अपराधों की घटनाएं बढ़ीं.

निर्भया केस के बाद कानून में हुए बदलाव के बावजूद आंकड़े बताते हैं कि दर्ज होने वाले बलात्कार मामलों में कमी नहीं आई है. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, 2016 में देशभर में महिलाओं के कुल 38,947 मामले सामने आए यानी हर रोज औसतन 107 महिलाएं रेप की शिकार हुईं जबकि 2014 में यह औसत 90 के करीब था. 2013 में बलात्कार की घटनाओं की संख्या बढ़ कर 33,707 हो गई जो 2012 में 24,923 थी.

इन आंकड़ों की डरावनी तसवीर यह है कि यौनशोषण का शिकार होने वालों में नाबालिग लड़कियों का प्रतिशत तेजी से बढ़ा है. इन में पोस्को कानून के तहत दर्ज होने वाले मामलों की संख्या 3,598 से बढ़ कर 8,904 तक पहुंची है.

उत्तर प्रदेश में एक साल से महिलाओं पर होने वाले अपराधों में 24 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. महाराष्ट्र सरकार द्वारा जारी एक रिपोर्ट कहती है कि 2001 से 2016 तक राज्य के ट्राइबल रैजिडैंशियल स्कूलों में 1,463 बालिकाओं की मौत हुई जिन में 67 प्रतिशत मौतों का कारण अज्ञात बताया गया, पर ज्यादातर का कारण यौनशोषण माना गया है.

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यौनशोषण के बढ़ते मामले

मध्य प्रदेश यौनशोषण मामलों में अव्वल है. मंदसौर में बच्ची के साथ हुई जघन्यता के बाद सतना, सागर, जबलपुर, भोपाल और इंदौर में 2 हफ्ते के अंदर 5 जघन्य गैंगरेप और हत्या की दिल दहला देने वाली वारदातें सामने आई थीं. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, 2017 में राज्य में 5,310 महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे.

दलित चेतना के उभार के बावजूद दलितों पर अत्याचार के आंकड़े तेजी से बढ़ रहे हैं. आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 4 सालों में दलित विरोधी हिंसा के मामलों में बहुत तेजी से वृद्धि हुई है. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, पिछले 10 सालों में  दलित उत्पीड़न में 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

2006 में दलितों के खिलाफ अपराधों के कुल 27,070 मामले सामने आए जो 2011 में बढ़ कर 33,719 हो गए. 2014 में 40,401, 2015 में 38,670 और 2016 में 40,801 मामले दर्ज किए गए.

दलित उत्पीड़न में मध्य प्रदेश सब से अग्रणी है. 2014 में राज्य में दलित उत्पीड़न के 3,294 मामले दर्र्ज हुए जिन की संख्या 2015 में बढ़ कर 3,546 और 2016 में 4,922 तक जा पहुंची. राजस्थान दूसरे नंबर पर है. उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात में भी मामले बढ़े हैं. दलितों में चेतना आ रही है तो नए हमले भी होने लगे हैं और इन का स्वरूप ज्यादा बर्बर हुआ है.

बलात्कार की धमकियां

दलित और स्त्री उत्पीड़न की जड़ें धर्मग्रंथों में हैं. इस कारण नेताओं से ले कर धर्माचार्यों द्वारा इसे जायज ठहराया जा रहा है. विरोध का स्वर दबाने के लिए बलात्कार की धमकियां दी जाती हैं. आरोपी को पता होता है उसे पुरुष समाज उसे मर्द मानेगा, उस का बचाव करेगा और दोषी युवती को ही समझेगा. हमारे समाज की यह सोच धर्म की बदौलत ही है.

इसीलिए मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में हुए यौनशोषण का अपराधी ब्रजेश ठाकुर हथकड़ी पहने हंस रहा था. इस से पहले 14 वर्षीय रुचिका गिरहोत्रा के यौनशोषण का अभियुक्त डीजीपी एस पी एस राठौर अदालत में हंसता हुआ निकलता था.

1993 में रुचिका ने आत्महत्या कर ली थी क्योंकि जब उस ने आवाज उठाईर् तो स्कूल से उसे निकाल दिया गया था. समाज से उसे सहयोग नहीं मिला. अपराधियों को हर तरह से समर्थन व सहयोग मिलता है.

मूंछों पर ताव देते ऐसे अपराधियों के साथ नेता, धर्म और धर्मगुरु खड़े दिखाईर् देते हैं. विश्व हिंदू परिषद के नेता कहते रहे हैं कि दलित की जान से गाय ज्यादा कीमती है. यह अपराध शास्त्रसम्मत है, इसीलिए सुव्यवस्थित व सांगठनिक तरीके से अंजाम दिया जाता है.

मुजफ्फरपुर के एनजीओ को नेताओं, मंत्रियों और अफसरों द्वारा फंड मिलता रहा. समाजसेवा के नाम पर बने ऐसे संगठनों को सरकार फलनेफूलने दे रही है. बिहार में सिर्फ एक एनजीओ में गड़बड़ का मामला नहीं है, सरकार के सर्वे में सरकारी फंड पर पनप रहे ऐसे दर्जनों एनजीओ हैं.

यह सांगठनिक अपराध इसलिए है क्योंकि यह धर्म द्वारा समर्थित है. सरकारें, नेता, एनजीओ और धर्मगुरु बलात्कार का समर्थन, सहयोग करते दिखाई देते हैं तो इसलिए कि हमारे कानून धर्मग्रंथों के आधार पर बने हैं. मनुस्मृति, कुरान, बाइबिल संविधान से बड़ी किताबें मानी गई हैं. समाज ने इन ग्रंथों में लिखी बातों को ईश्वर की वाणी माना है, इसलिए समाज की सोच स्त्री और दलितों के प्रति वही है जो धर्म ने बताई है.

सूट वही जो खिले बदन पर

शेरवानी के बारे में 3 बातें मशहूर हैं: गरीब पहन ले रईस लगे, अनपढ़ पहन ले पढ़ालिखा लगे और बदमाश पहन ले तो शरीफ लगे. यही बातें सूट पर भी लागू होती हैं. आजादी के फौरन बाद, शायद अंगरेजों का हैंगओवर था, सूट भारतीय फैशन का अटूट हिस्सा बन गया था. लेकिन हिप्पीइज्म के दौर में जींस, टीशर्ट औैर जैकेट का ऐसा रंग छाया कि सूट आउटडेटेड हो गया और यदाकदा शादियों में, वह भी जाड़ों की शादी में, बराती ही सूट में नजर आने लगे. लेकिन अब इसे बहुराष्ट्रीय संस्कृति का आगमन कहिए या प्रभावी सीईओ का अंदाज, सूट हमेशा से ही आकर्षक लुक वाला परिधान रहा है. अब पार्टियों या दफ्तर में जो व्यक्ति सूट में नजर नहीं आता उसे एग्जीक्यूटिव या हाईर्क्लास का सदस्य नहीं समझा जाता है.

टीवी प्रोग्राम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में अमिताभ बच्चन ने तरहतरह के सूट पहन कर न सिर्फ अपनी एंकरिंग से लोगों को प्रभावित किया बल्कि अपने डिजाइनर सूटों से भी खास प्रभाव छोड़ा. आज जिस तरह टीवी एंकर अलगअलग समय पर अलगअलग सूट में नजर आते हैं, वैसी ही बात कभी हैदराबाद के छठे निजाम मीर महबूब अली खान के बारे में मशहूर थी. उन के बारे में मशहूर है कि वे एक सूट को कभी 2 बार नहीं पहनते थे. यह 19वीं शताब्दी के आखिर की बात है, लेकिन जिस तरह मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, अजीम प्रेमजी, विजय माल्या, रतन टाटा से ले कर विक्रम पंडित जैसे लोग नित नए सूटों में नजर आते हैं, उस से यह 21वीं शताब्दी या आज की ही बात नजर आती है. कौर्पोरेट दुनिया में इस का क्रेज खासकर बढ़ रहा है. इस की कई वजहें हैं, मसलन :

सूट आप के लुक को तटस्थ बना देता है. जब आप सूट पहने हुए होते हैं तो आप की पृष्ठभूमि भले ही कहीं की हो लेकिन आप अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सदस्य प्रतीत होते हैं.

इस समय जिस बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का विकास हो रहा है उस में मार्केटिंग के व्यक्ति का वैलड्रैस्ड होना आवश्यक है. हालांकि वह टीशर्ट और जींस में भी वैलड्रैस्ड हो सकता है लेकिन सूट से वह गंभीर और अपने काम में दक्ष प्रतीत होता है.

सूट हर अवसर पर पहना जा सकता है चाहे औफिस हो, पार्टी हो, शादी हो या डेट ही क्यों न हो. ऐसा इसलिए क्योंकि सूट कहीं भी आउटडेटेड नहीं लगता.

सूट क्लासिक पहनावा है, ऐसा क्लासिक जो सालोंसाल कभी फीका नहीं पड़ता. अगर आप के जिस्म पर आप के दादाजान का सूट आ सकता है तो भी वह नया और स्टाइलिश नजर आएगा.

सूट का अर्थशास्त्र

टीवी प्रोग्राम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के चौथे सीजन में अमिताभ बच्चन द्वारा पहने गए सूटों को देख कर यही दिल करता था कि अगली सुबह वही सूट पहनें. लेकिन एक औसत आमदनी वाले व्यक्ति के लिए सूट पहनना आसान काम नहीं है क्योंकि एक सूट की कीमत 3,500 रुपए से शुरू हो कर 4,50,000 रुपए तक पहुंच जाती है. सब से सस्ता कस्टम मेड सूट लगभग 3500 से 4 हजार रुपए के बीच शुरू होता है. लेकिन जैसेजैसे आप की चाहत बढ़ती जाती है वैसे ही सूट की कीमत भी बढ़ती जाती है. मसलन, जैग्ना का औफ-द-रैक सूट 1,25,000 रुपए से 1,50,000 रुपए तक का है, जबकि मेड-टू-मेजर सूट 4,50,000 रुपए तक का हो सकता है.

वैसे केनाली का एंट्री-लेवल सूट लगभग 60 हजार रुपए का है. लेकिन अगर आप न बहुत नीचे बल्कि दरमियान में रहना चाहते हैं तो मेंजोनी का सूट ले सकते हैं जो लगभग 35 हजार रुपए का है. इसी तरह ह्यूगो बौस का सूट भी आप को 42 से 44 हजार रुपए तक का मिल सकता है. अब जैसी आप की जेब इजाजत दे वैसा सूट आप पहनें और कौर्पाेरेट दुनिया के लोगों की कतार में खड़े हो जाएं, बल्कि रतन टाटा, एन के सिंह, सुनील मित्तल, प्रणव राय आदि की संगत में शामिल हो जाएं, जो वाकई सूट में शाहरुख खान या अमिताभ बच्चन से कम नजर नहीं आते.

उपरोक्त दिए गए सूट की कीमत ऊपरनीचे हो सकती है.

सूट आप चाहे महंगा खरीदें या सस्ता, आप की जेब पर निर्भर करता है.

आज के दौर में सूट

आजाद भारत में सूट ने 3 दौर देखे हैं :

पहला,  1947 से 1960 तक, जब सूट के सिलसिले में इंगलैंड के नियम हावी थे.

दूसरा, 1960 से 1990 तक, जब हिप्पियों और कैजुअल लुक का दौर छाया रहा और सूट लगभग नदारद हो गया. हालांकि उस समय भी सूट पहना व्यक्ति अजीब नहीं लगता था, लेकिन तब बीटल्स व अब्बा का ऐसा नशा छाया हुआ था कि कैजुअलवियर से अलग व्यक्ति गए जमाने का प्रतिनिधि नजर आता था.

तीसरा, 1990 में मल्टीनैशनल्स के लिए भारतीय बाजार खुलने लगे और कौर्पोरेट लुक के साथ सूट संस्कृति भी वापस आ गई, जिसे अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान के अलावा बौलीवुड और टैलीविजन के कई अभिनेताओं ने बुलंदियों तक पहुंचा दिया.

सूट की वापसी का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इस मैदान के अंतर्राष्ट्रीय ब्रैंड्स भी अपनेअपने प्रोडक्ट ले कर भारत आ रहे हैं. मसलन, इटली की ब्रिओनी, ह्यूगो बास, केनेली, जेग्ना आदि ने देश भर में अपने स्टोर खोल लिए हैं. इस प्रतिस्पर्धा को देखते हुए अब भारतीय ब्रैंड्स भी अपनी कमर कस रहे हैं.

स्टाइल अलगअलग

फिलहाल बाजार में विभिन्न स्टाइलों के सूट उपलब्ध हैं. उन में से आप कौन सा पसंद करें, इस बात का फैसला आप अपने जिस्म के आकार के अनुसार करें न कि जो डिजाइनर या फैशन विशेषज्ञ सुझाव देते हैं. ऐसा इसलिए जरूरी है ताकि आप अपनी खामियों को छिपा सकें और अपनी खूबियों को उजागर कर सकें. शायद यही वजह थी कि पुराने जमाने में नवाबों के अपने दरजी हुआ करते थे जो उन के जिस्म के आकार को मद्देनजर रखते हुए सूट की डिजाइनिंग किया करते?थे. वैसे वही सूट अच्छा लगता है जो वजन में हल्का हो और आप के जिस्म पर उस की फिटिंग अच्छी हो. साथ ही आप आसानी से उसे दिन भर पहन सकते हों.

इस बात पर भी विशेषज्ञों की अलगअलग राय है कि सूट किस रंग का पहनना चाहिए. अधिकतर विशेषज्ञ कहते हैं कि भारतीयों को ब्राउन रंग नहीं पहनना चाहिए?क्योंकि वह उन पर फबता नहीं है. उन की राय में हम?भारतीयों को हल्के रंग और बारीक धारियों वाले सूट पहनने चाहिए. लेकिन यह कोई ऐसा नियम नहीं है जिसे बदला न जा सकता हो. जो रंग आप पर खिलते हैं उसी रंग का सूट आप पहनें. हां, शर्ट जरूर हल्के रंग की व प्लेन होनी चाहिए ताकि टाई आप की शख्सीयत को उभार सके.

सूट से संबंधित कुछ विशेष

समय बदलने के साथसाथ ही सूट बनाने के अंदाज में भी परिवर्तन आया है. आज का दरजी फीता ले कर सिलाई मशीन के पीछे नहीं बैठता बल्कि इस काम के लिए वह कंप्यूटर का प्रयोग करता है. सूट से संबंधित कुछ ऐसे टिप्स पेश हैं जो आप को न डिजाइनर बताएंगे और न ही आप को किताबों में मिलेंगे.

कोट ऊपर से चौड़ा और कमर पर से पतला होना चाहिए. जिन का कद लंबा व जिस्म भारी हो वे गहरे रंग व चौड़ी धारियों वाला सूट पहनें.

कोट का वजन ढाई किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए. कोट के मुड्ढे कंधों पर पूरी तरह से फिट होने चाहिए. न ज्यादा बड़े और न ज्यादा छोटे.

आस्तीन आसानी से कलाई तक लटकनी चाहिए और शोल्डर पैड बाहर को नहीं निकला होना चाहिए. वैसे आज का फैशन यह है कि आस्तीन कलाई से आधा इंच ऊपर होनी चाहिए ताकि कमीज कलाई पर दिखाई दे. इसे कौर्पोरेट या प्रौफैशनल लुक कहा जाता है.

अब फिर से 2 बटनों वाला सूट फैशन में आ गया है जिस के लापेल्स यानी कोट के सीने पर के भाग के भीतरी मोड़ ऊपर चढ़े होते हैं और उन की चौड़ाई भी ज्यादा नहीं होती.

सूट का दूसरा नाम है आराम, इसलिए बटन बंद करने के बाद भी आप के मूवमैंट के लिए पर्याप्त जगह होनी चाहिए.

अच्छे कोट की पहचान यह है कि कमर पर उस का घुमाव सही आए. कहने का अर्थ यह है कि कोट कंधों पर सही फिट होना चाहिए और उस की आस्तीनें ज्यादा लंबी नहीं होनी चाहिए.

द्यआप छोटे साइज का कोट भी पहन सकते हैं बशर्ते उस की आस्तीनों की लंबाई सही हो और वह कंधों पर सही फिट हो रहा हो.

द्य    आजकल डबल वेंटेड यानी कमर की ओर से 2 जगह से खुले कोट फैशन में हैं. यह प्रोफैशनल और गंभीर लुक प्रदान करता है जबकि सिंगल वेंटेड कोट कैजुअल लुक देता है. जिन लोगों को अधिक यात्रा करनी पड़ती है वे पौलिएस्टर या वूल का सूट पहनें जिस की क्रीज जल्दी नहीं टूटती है. इस सिलसिले में 16 माइक्रोन की फैब्रिक सब से अच्छी होती है जो लचीली होती है और जिस की आसानी से क्रीज नहीं टूटती.

अगर आप के पास सूट को लौंड्री में भेजने का समय नहीं है तो आप उसे बाथरूम में टांग दें और गरम पानी के शावर को खोल दें. उस से जो भाप निकलेगी वह सूट को प्रैस कर देगी.

सूट पर आप चाहे फीते वाले जूते पहन लें या स्लिपऔंस या फिर कोई भी लेकिन यह सुनिश्चित कर लें कि उन का सोल चमड़े का हो. रबर सोल के जूतों से प्रोफैशनल या कौर्पोरेट लुक नहीं आता है.

सूट पर भारी सोल वाले जूते भी अच्छे नहीं लगते.

मोजों का रंग सूट से मैच करना चाहिए न कि जूतों या कमीज से.

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