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बंटी हुई औरत

लाजवंती को अपनी पत्नी बना कर शेखर ने सभी रिश्तेदारों के साथसाथ अपने पिता की आशाओं पर भी पानी फेर दिया था, क्योंकि वह तो कब से इस बात की उम्मीद लगाए बैठे थे कि बेटा ज्यों ही प्रशासनिक सेवा में लगेगा उस का विवाह किसी कमिश्नर या सेक्रेटरी की बेटी से कर देंगे. इस से शेखर के साथसाथ सारे परिवार का उद्धार होगा.

दूरदर्शी शेखर के पिता यह भी जानते थे कि बड़े ओहदेदारों से पारिवारिक संबंध बनाना बेटे के भविष्य के लिए भी जरूरी है साथ ही स्थानीय प्रशासन पर भी अच्छा रौबदाब बना रहता है.

उधर भाईबहनों में यह धुन सवार थी कि कब भैया की शादी हो और कब घर को संभालने वाला कोई आए. उन्हें तो यह भी विश्वास था कि भाभी अवश्य ही अलादीन का चिराग ले कर आएंगी.

एक मध्यवर्गीय परिवार के टूटेफूटे स्वप्न…

शेखर जब भी अपनी मौसी या बूआ के घर जाता तो उस का स्वागत एक ही वाक्य से होता, ‘‘बेटे, मैं ने तुम्हारे लिए सर्वगुण संपन्न चांद सी दुलहन ढूंढ़ रखी है. बस, नौकरी ज्वाइन करने का इंतजार है.’’

जीवनसाथी के मामले में शेखर की सोच कुछ और थी. उस ने एक गरीब असहाय लड़की को अपना जीवन- साथी बनाने का निर्णय किया था. चूंकि

लाजवंती उस के सोच के पैमाने पर खरी उतरी थी इसीलिए उस ने उसे अपना जीवनसाथी बनाया. बचपन में ही लाजवंती के पिता का देहांत हो चुका था. घर में एक भाई था और 4 बहनें. अब तक 2 बहनों का विवाह हो चुका था. मां थीं जो ढाल बन कर बच्चों को ऊंचनीच से बचाने के प्रयास में लगी रहतीं. शेखर का विचार था कि दरिद्रता में पली हुई लाजवंती जिंदगी के उतारचढ़ाव से परिचित होगी. भलेबुरे की उसे पहचान होगी.

लाजवंती में ऐसा कुछ भी न था. वह उस गंजी कबूतरी की तरह थी जो महलों में डेरा डाल चुकी हो. शेखर की धारणा गलत साबित हुई. इतना ही नहीं लाजवंती अपने साथ अपना अतीत भी समेट कर लाई थी.

मां के कंधों का बोझ कम करने के लिए 14 वर्ष की आयु में ही लाजवंती को उस की सब से बड़ी बहन ने अपने पास बुला कर स्कूल में दाखिल करा दिया. हर सुबह लाजो सफेद चोली और नीला स्कर्ट पहने अपना बस्ता कंधे पर लटकाए स्कूल जाने लगी. घड़ी की टिकटिक चढ़ती जवानी का अलार्म बन गई.

उधर लाजो के रूप में निखार आने लगा. चाल में लचक पैदा होने लगी. आंखें भी चमकने लगीं और यौवन का प्रभाव उन्नत डरोजों पर स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा.

पिता के प्यार की चाहत लिए लाजो अकसर अपने जीजा के सामने बैठ कर अपना पाठ दोहराती या फिर उस की गोद में सिर रख कर एलिस के वंडरलैंड में खो जाती. जीजा लाजो के केशों में अपनी उंगलियां फेरता या फिर उस के मुलायम गालों को सहलाता तो नारी स्पर्श से उस की आंखों में नशा छा जाता.

लाजो भी नासमझी के कारण इस कोमल अनुभूति का आनंद लेने की टोह में लगी रहती. एक दिन पत्नी की गैर- मौजूदगी ने भावनाओं को विवेक पर हावी कर दिया. नदी अपने किनारे तोड़ कर अनियंत्रित हो गई. लाजो को जब होश आया तो बहुत देर हो चुकी थी.

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उस घटना के बाद लाजो अपने आप से घृणा करने लगी. वह हर समय खोईखोई रहती. परिणाम की कल्पना से ही भयभीत हो जाती. बहन से कहने में भी उसे डर लगता था इसलिए अंदर ही अंदर घुटती रहती, हालांकि  उस में उस का कोई दोष नहीं था. जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो असहाय मासूम बच्ची क्या कर सकती थी.

मन पर बोझ लिए लाजो को रात भर भयानक सपने आते. अंधेरे जंगलों में वह जान बचाने के लिए भागती, चीखतीचिल्लाती, मगर उस की सहायता के लिए कोई नहीं आता. सपने में देखा चेहरा जाना- पहचाना लगता पर आंख खुलती तो सपने में देखे चेहरे को पहचानने में असफल रहती. इस तरह एक मासूम बच्ची बड़ी अजीब मानसिक स्थिति में जी रही थी.

बहन इतनी पढ़ीलिखी समझदार नहीं थी कि उस के मानसिक द्वंद्व को समझ सकती.

इस के बावजूद लाजो को बारबार उसी दलदल में कूदने की तीव्र इच्छा होती. डर और चाह चोरसिपाही का खेल खेलते. कई महीने के बाद जब उस की बहन को अचानक ही इस संबंध की भनक पड़ी तो उस ने लाजो को वापस मायके भेज दिया.

उस मासूम बच्ची की आत्मा घायल हो चुकी थी. अब हर पुरुष उस को भूखा और खूंखार नजर आने लगा था. फिर भी मुंह से खून लगी शेरनी की तरह उस को मर्दों की बारबार चाह सताती रहती थी. कालिज के यारदोस्तों ने जब घर के दरवाजे खटखटाने शुरू किए तो वह अपनी मां के साथ गांव चली आई. कुनबे के प्रयास से लाजवंती को देखने के लिए शेखर आया और उस ने लाजो को पसंद कर लिया.

लाजवंती ने कभी सपने में भी न सोचा था कि उस को ऐसा जीवनसाथी मिल जाएगा और वह भी किसी मोल- तोल के बिना. वह फूली न समा रही थी.

पहली रात में एक औरत के अंदर सेक्स के प्रति जो झिझक, घबराहट होती है ऐसा कुछ लाजवंती में न पा कर शेखर को उस पर शक होने लगा. उस  पर लाजवंती के व्यवहार ने उस के शक को यकीन में बदल दिया. यद्यपि शेखर ने इस बात को टालने की बहुत कोशिश की मगर उस के दिमाग में अंगारे सुलगते रहे. वह किस को दोषी ठहराता. विवाह के लिए उस ने खुद ही सब की इच्छा के खिलाफ हां की थी. अत: परिस्थितियों से समझौता करना ही उस ने उचित समझा.

लाजवंती अपने अतीत को भूल जाना चाहती थी, मगर अपने द्वारा लूटे जाने की जो पीड़ा उस के मन में घर कर चुकी थी वह अकसर उसे झिंझोड़ती रहती. शेखर ने उस के अतीत को कुरेद कर जानने का कभी प्रयास नहीं किया, शायद यही वजह थी कि लाजवंती खुद ही अपने गुनाहों के बोझ तले दब रही थी. कई बार उस के दिमाग में आया कि जा कर शेखर के सामने अपनी भूल को स्वीकार कर ले. फिर जो भी दंड वह दे उसे हंसीखुशी सह लेगी पर हर बार मां की नसीहत आड़े आ जाती.

अपनी असुरक्षा की भावना को दूर करने के लिए लाजवंती ने अपनी आकर्षक देह का यह सोच कर सहारा लिया कि शेखर की सब से बड़ी कमजोरी औरत है.

अब वह हर रोज नएनए पहनावे व मेकअप में शेखर के सामने अपने आप को पेश करने लगी. वह शेखर को किसी भी हालत में खोना नहीं चाहती थी. वह अपनी बांहों की जकड़ शेखर के चारों तरफ इतनी मजबूत कर देना चाहती थी कि वह उस में से जीवन भर निकल न सके. इस के लिए लाजवंती ने शेखर के हर कदम पर पहरा लगा दिया. उस के सामाजिक जीवन की डोर भी अपने हाथों में ले ली. वह चाहती थी कि शेखर जहां भी जाए उसी के शरीर की गंध ढूंढ़ता फिरे.

यह पुरुष जाति से लाजवंती के प्रतिशोध का एक अनोखा ढंग था. अकसर ऐसा होता है कि करता कोई है और भरता कोई. लाजवंती शेखर के चारों तरफ अपना शिकंजा कसती रही और वह छटपटाता रहा.

आखिर तनी हुई रस्सी टूट गई. शेखर ने अपने एक नजदीकी दोस्त से परामर्श किया.

‘‘तुम तलाक क्यों नहीं ले लेते?’’ दोस्त ने कहा.

तलाक…शब्द सुनते ही शेखर के चेहरे का रंग उड़ गया. वह बोला, ‘‘शादी के इतने सालों बाद ढलती उम्र में तलाक?’’

‘‘अरे भई, जब तुम दोनों एक छत के नीचे रहते हुए भी एकदूसरे के नहीं हो और तुम्हारी निगाहें हमेशा औरत की तलाश में भटकती रहती हैं. बच्चों को भी तुम लोगों ने भुला दिया है. कभी तुम ने सोचा है कि इस हर रोज के लड़ाईझगड़े से बच्चों पर क्या असर पड़ता होगा.’’

‘‘तो मैं क्या करूं?’’ शेखर बोला, ‘‘वह पढ़ीलिखी औरत है. मैं ने सोचा था कि स्थिति की गंभीरता को समझ कर या तो वह संभल जाएगी या फिर तलाक के लिए सहमत हो जाएगी पर वह है कि जोंक की तरह चिपटी हुई है.’’

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‘‘तुम खुद ही तलाक के लिए आवेदन क्यों नहीं कर देते? वैसे भी हमारे देश में औरतें तलाक देने में पहल नहीं करतीं. एक पति को छोड़ कर दूसरे की गोद का आसरा लेने का चलन अभी मध्यवर्गीय परिवारों में आम नहीं है.’’

‘‘मैं ने इस बारे में बहुत सोचविचार किया है. मुसीबत यह है कि इस देश का कानून कुछ ऐसा है कि कोर्ट से तलाक मिलतेमिलते वर्षों बीत जाते हैं. फिर तलाक की शर्तें भी तो कठिन हैं. केवल मानसिक स्तर बेमेल होने भर से तलाक नहीं मिलता. तलाक लेने के लिए मुझे यह साबित करना पड़ेगा कि लाजवंती बदचलन औरत है.

‘‘इस के लिए झूठी गवाही और झूठे सुबूत के सहारे कोर्ट में उस की मिट्टी पलीद करनी पड़ेगी और तुम तो जानते हो कि यह सब मुझ से नहीं हो सकता’’.

‘‘शेखर, जब तुम तलाक नहीं दे सकते तो भाभी के साथ बैठ कर बात कर लो कि वह ही तुम्हें तलाक दे दें.’’

‘‘यही तो रोना है मेरी जिंदगी का. लाजवंती तलाक क्यों देगी? इतने बड़े अधिकारी की बीवी, यह सरकारी ठाटबाट, नौकरचाकर, मकान, गाड़ी, सुविधाओं के नाम पर क्या कुछ नहीं है उस के पास. जिन संबंधियों के सामने आज वह अभिमान से अपना सिर ऊंचा कर के अपनी योग्यता की डींगें मारती है उन्हीं के पास कल वह कौन सा मुंह ले कर जाएगी. ऐसे में वह भला तलाक क्यों देगी?’’

‘‘देखो शेखर, तुम्हारा मामला बहुत उलझा हुआ है, फिर भी मैं तुम्हें यही सलाह दूंगा कि कोर्ट में आवेदन देने में कोई हर्ज नहीं है.’’

‘‘बात तो सही है. अगर तलाक होने में 10 साल भी लग गए तो इस आजीवन कारावास से तो छुटकारा मिल ही सकता है,’’ शेखर अपने दिल की गहराइयों में डूब गया.

उन्हीं दिनों शेखर का तबादला पटना हो गया. वह लाजवंती को अकेला छोड़ कर बच्चों के साथ पटना चला गया. लाजवंती उसी शहर में इसलिए रुक गई क्योंकि एक कालिज में वह लेक्चरर थी.

घर में अब वह पहली सी रौनक न थी. शेखर के जाते ही तमाम सरकारी साधन, नौकरचाकर भी चले गए. सारा घर सूनासूना हो गया. रात के समय तो मकान की दीवारें काटने को दौड़तीं. इस अकेलेपन से वह धीरेधीरे उकता गई और फिर हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष विजयकुमार की शरण में चली गई.

विजयकुमार और लाजवंती के सोचने- समझने का ढंग एक जैसा ही था, रुचियां एक जैसी थीं. यहां तक कि दोनों के मुंह का स्वाद भी एक जैसा ही था. दोपहर में खाने के दौरान लाजवंती अपना डब्बा खोलती तो विजयकुमार भी स्वाद लेने आ जाता.

‘‘तुम बहुत अच्छा खाना बना लेती हो. कहां से सीखी है यह कला,’’ विजय ने पूछा तो लाजवंती उस की आंखों में कुछ टटोलते हुए बोली, ‘‘अपनी मां से सीखी है मैं ने पाक कला.’’

‘‘कभी डिनर पर बुलाओ तब बात बने,’’ विजयकुमार ने लाजवंती को छेड़ते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं, आने वाले रविवार को मेरे साथ ही डिनर कीजिए,’’ लाजवंती को मालूम था कि पुरुष का दिल पेट के रास्ते से ही जीता जा सकता है.

अगले रविवार को विजयकुमार लाजवंती के घर पहुंच गया.

इस तरह एक बार विजयकुमार को घर आने का मौका मिला तो फिर आने- जाने का सिलसिला ही चल पड़ा. अब विजयकुमार न केवल खाने में बल्कि लाजवंती के हर काम में रुचि लेने लगा. उसे तो अब लाजो में एक आदर्श पत्नी का रूप भी दिखाई देने लगा. उस की निकटता में विजय अपनी गर्लफ्रेंड अर्चना को भी भूल गया जिस के प्रेम में वह कई सालों से बंधा था. अब उस के जीवन का एकमात्र लक्ष्य लाजवंती को पाना था और कुछ भी नहीं.

उधर लाजवंती जैसा चल रहा था वैसा ही चलने देना चाहती थी. इस बंटवारे से उस के जीवन के विविध पहलू निखर रहे थे. भौतिक सुख, ऐशोआराम और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए शेखर का सहारा काफी था और मानसिक संतुष्टि के लिए था विजयकुमार. लाजवंती चाहती थी कि बचीखुची जिंदगी इसी तरह व्यतीत हो, मगर विजय इस बंधन को कानूनी रंग देने पर तुला हुआ था.

विजयकुमार की अपेक्षाओं से घबरा कर लाजवंती ने अपनी छोटी बहन अमृता को आगे कर दिया. उस ने अमृता को अपने पास बुलाया, विजयकुमार से परिचय करवाया और फिर स्वयं पीछे हो गई.

लाजो का यह तीर भी निशाने पर लगा. शारीरिक भूख और आपसी निकटता ने दो शरीरों को एक कर दिया. लाजवंती तो इसी मौके की तलाश में थी. उस ने फौरन दोनों की शादी का नगाड़ा बजवा दिया. विवाह के शोर में लाजवंती के चेहरे पर विजय की मुसकान झलक रही थी.

विजयकुमार ने सोचा कि अमृता के साथ रिश्ता जोड़ने पर लाजवंती भी उस के समीप रहेगी मगर वह औरत की फितरत से अपरिचित था. लाजवंती बहन का हाथ पीला करते ही उस के साए से भी दूर हो गई.

विजयकुमार की आंखों से जब लाजवंती के सौंदर्य का परदा हटा तो उसे पता चला कि वह तो लाजो के हाथों ठगा गया है. अत:  उस ने सोचा एक गंवार को जीवन भर ढोने से तो अच्छा है कि उस से तलाक ले कर छुटकारा पाया जाए.

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मन में यह फैसला लेने के बाद विजयकुमार अपनी पूर्व प्रेमिका अर्चना के पास पहुंचा. प्रेम का हवाला दिया. अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी. यही नहीं सारा दोष लाजवंती के कंधों पर लाद कर उस ने अर्चना के मन में यह बात बिठा दी कि वह निर्दोष है. अर्चना अपने प्रेमी की आंखों में आंसू देख कर पसीज गई और उस ने विजयकुमार को माफ कर दिया.

एक दिन अदालत परिसर में शेखर की विजयकुमार से भेंट हुई.

‘‘हैलो विजय, आप यहां… अदालत में?’’ शेखर ने विजयकुमार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए कहा.

‘‘आज तारीख पड़ी है,’’ विजय कुमार ने उत्तर दिया.

‘‘कैसी तारीख?’’ शेखर ने फिर पूछा.

‘‘मैं ने अमृता को तलाक देने के लिए कोर्ट में आवेदन किया है,’’ विजयकुमार ने अपनी बात बता कर पूछा बैठा, ‘‘पर शेखर बाबू, आप यहां अदालत में क्या करने आए हैं?’’

‘‘विजय बाबू, आज मेरे भी मुकदमे की तारीख है, मैं भी तो लाजवंती से अलग रह रहा हूं. मैं ने तलाक लेने का मुकदमा दायर कर रखा है,’’ शेखर ने गंभीरता से उत्तर दिया.

फिर 10 साल यों ही बीत गए तारीखें लगती रहीं. काला कोट पहने वकील आते रहे और जाते रहे. फाइलों पर धूल जमती रही और फिर झड़ती रही.

बारबार एक ही नाम दुहराया जाता शेखर सूरी सुपुत्र रामलाल सूरी हाजिर हो… लाजवंती पत्नी शेखर सूरी हाजिर हो…

-दीपक बुदकी   

जानें, करण जौहर के हौरर फिल्म का कौन होगा स्टार

बौलीवुड के मशहूर प्रोड्यूसर करण जौहर ने कई रोमांटिक फिल्में बनाई हैं. उनकी फिल्में जैसे ‘कुछ कुछ होता है’, ‘कल हो ना हो’, ‘कभी अलविदा ना कहना’, ‘राजी’ और ‘कलंक’ ने दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई हैं.

 

लेकिन अब करण कुछ अलग करने की प्लानिंग कर रहे हैं. करण ने शुक्रवार को सोशल मीडिया के जरिए कहा कि अब उनके प्रोडक्शन हाउस धर्मा प्रोडक्शन के तले जल्द ही हौरर फिल्म फ्रैंचाइजी बनने जा रही है.

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जहां करण के पोस्ट और धर्मा प्रोडक्शन से हमें ज्यादा जानकारी नहीं मिली है वहीं माना जा रहा है कि ये वही फिल्म है जिसमें विक्की कौशल और भूमि पेडनेकर को साथ लिया गया है. इस साल जनवरी में विक्की कौशल की धर्मा के साथ एक हौरर फिल्म की अनाउंसमेंट की गयी थी, जिसे डायरेक्टर शशांक खेतान के असिस्टेंट भानु प्रताप बनाने वाले हैं. करण ने शशांक और भानु को अपने नए पोस्ट में टैग भी किया है.

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ये स्टार डौटर हैं वरूण धवन की दीवानी, जानें कौन

‘स्टूडेंट औफ द इयर 2’  की अभिनेत्री  अनन्या पांडे  को अभिनेता कार्तिक आर्यन पसंद हैं, पर उन्होंने ये भी कहा कि कार्तिक आर्यन के अलावा मुझे बहुत से लोग पसंद हैं. अनन्या ने कहा,  मैंने हमेशा से ये बात कही है, मैं कार्तिक आर्यन को ज्यादा पसंद करती हैं. लेकिन और लोग भी हैं, जो मुझे पसंद हैं.

रोमांटिक हौट सीन पर अन्नया ने कहा कि यदि किसी अभिनेता के साथ ये सीन करना पड़े तो मैं वरुण के साथ करना पसंद करूंगी. अनन्या ने ये भी कहा कि मुझे वरुण काफी हौट लगते हैं.

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अन्नया ने ट्रोल होने पर भी बात करते हुए कहा कि “मेरे पतली होने को लेकर लोग मुझे ट्रोल करते हैं. लेकिन मैं इसमें कुछ नहीं कर सकती. मैं हमेशा खाती रहती हूं और ज्यादा खाती हूं. इस वक्त मुझे बहुत प्यार मिल रहा है. इसलिए मैं नापसंद करने वालों की चिंता नहीं कर रही हूं.

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आपको बता दें, जूम के कार्यक्रम ‘बौय इवेंट ओनली’ में  उन्होंने वरुण को लेकर अपने दिल के राज खोले. यह एपिसोड आज प्रसारित होगा.

घर पर बनाएं चौकलेट फान्डू

चौकलेट फान्डू एक तरह का केक हैं. इस स्वादिष्ट चौकलेट फान्डू को एक छोटे से केक के पीस के साथ, इसमें स्ट्रौबेरी का भी इसमें इस्तेमाल किया जाता है.

सामग्री

स्वीट चौकलेट (60 ग्राम)

चौकलेट (100 ग्राम)

फेंटा हुआ (1 कप क्रीम)

चीनी (2 टेबल स्पून)

दालचीनी (1 टी स्पून)

लाल मिर्च पाउडर (1/2 टी स्पून)

खट्टी दही (2 टेबल स्पून)

स्ट्रौबेरी (आवश्यकतानुसार)

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बनाने की वि​धि

सबसे पहले चौकलेट, क्रीम और चीनी को उबाल लें.

चौकलेट, क्रीम और चीनी को मेटल बाउल में डालकर सौसपैन पर रख दें, इस बात का ध्यान रखें की बाउल की तली पानी में न लगे.

चौकलेट, क्रीम और चीनी को मेटल बाउल में डालकर सौसपैन पर रख दें, इस बात का ध्यान रखें की बाउल की तली पानी में न लगे.

धीमी आंच पर चौकलेट को पिघलने दें, इसे लगातार चलाते रहे ताकि चौकलेट जले नहीं.

इस मिश्रण फौन्डू पौट में डालें और इसे चलाते हुए इसमें दालचीनी पाउडर, और लाल मिर्च डालें.

फौन्डू को धीमी आंच पर गर्म करें और सर्व करने से पहले इस पर खट्टी क्रीम डालें.

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हेल्दी लाइफ के लिए अपनाएं ये 7 टिप्स

यदि आप को जीवन के हर क्षेत्र में कामयाबी हासिल करनी है, जिंदगी का वास्तविक आनन्द उठाना है तो याद रखें, अपनी सेहत को कभी नजरअंदाज न करें. सफलता के लिए सेहत बहुत जरुरी है. सेहत के कुछ ऐसे सूत्र हैं जिन्हें अपना कर आप अपनी सेहत को मुकम्मल रख सकते हैं।

1. व्यायाम भगाए रोग

अमेरिका में सान डियागो स्थित कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं के मुताबिक अपनी व्यस्त जीवनचर्या में से हर रोज व्यायाम के लिए केवल 20 मिनट निकालना भी सेहत के लिए काफी उपयोगी हो सकता है. इस दौरान आप हलके व्यायाम करने के साथ जॉगिंग, ब्रिस्क वाक या साइकिलिंग कर लें. व्यायाम करने से एपिनेफराइन और नोरेपिनेफराइन जैसे हार्मोनों का रक्त में स्राव होता है, जो प्रतिरक्षा कोशिकाओं को प्रेरित करने का काम करते हैं. इस से शरीर में सूजन और इन्फ्लेमेशन का जोखिम कम हो जाता है. गठिया और मांसपेशियों में दर्द की समस्याएं कम होती हैं, दिल और हड्डियां मजबूत होती हैं, प्रतिरक्षा प्रणाली बेहतर होती है और मोटापा भी दूर रहता है.

2. सकारात्मक सोच का असर

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर चीज़ों पर नकारात्मक सोच के साथ नज़र डाली जाए तो उस से पूरी सेहत पर असर पड़ने लगता है. आदमी की सोच उस की सेहत अच्छी रखने वाले कारकों पर असर डालते हैं. एक अमरीकी पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल एकेडेमी ऑफ़ साइंस ने एक अध्ययन के बाद नतीजा निकाला है कि दिमाग़ में किसी भी नकारात्मक गतिविधि से आदमी की रोगों से लड़ने की ताक़त कमज़ोर हो जाती है. हारवर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के मुताबिक सकारात्मक विचार वाले लोगों में नकारात्मक रवैये वालों के मुकाबले दिल की तमाम बीमारियों का खतरा एकतिहाई कम होता है.

3. मनपसंद खाएं पर सोचसमझ कर

जो मिल जाए और जब मिल जाए वही खा लेना उचित नहीं. मगर इस का मतलब यह नहीं कि आप मन मार कर हर समय डाइट पर रहे. लंच, स्नैक्स और डिनर का सही वक्त तय करें और इस दौरान सिर्फ खाएं ही नहीं बल्कि अपने खाने को एंज्वॉय करें. सुबह का नाश्ता जल्दी करें और ऐसे ही रात आठ बजे के बाद कुछ भी न खाने को अपना रुटीन बनाएं. इस से आप का शरीर भी इस रुटीन को अपनाने लगेगा. हेल्दी डाइट लेने को अपना शौक ही नहीं बल्कि आदत बनाइए. फ्रेश सब्जी और फल खाएं. इस से जंक फूड्स खाने की अपनी आदत पर आप आसानी से नियंत्रण लगा पाएंगे . साथ ही स्वस्थ और फिट भी महसूस करेंगे .

4. हंस कर जीना सीखें

आप स्वस्थ रहना चाहते हैं तो हंसना सीखें. फिर न तो आप को डॉक्टर के पास जाने की जरूरत पड़ेगी और न ही जिन्दगी में दर्द का अहसास होगा. याद रखिये एक उन्मुक्त हंसी हर बीमारी का इलाज है. सुबह उठ कर हंसने से हमारे मस्तिष्क का व्यायाम होता है. इस से मानसिक संतुलन बना रहता है और दिन भर मन प्रसन्न रहता है. हमेशा हंसते रहने वाला व्यक्ति तनाव में जीने वाले व्यक्ति की तुलना में अधिक स्वस्थ्य होता है. हृदय रोग, रक्तचाप और शुगर की बीमारी तनाव से ही उत्पन्न होती है. हंसी से हर तरह के तनाव और डिप्रेशन दूर होते है और सकारात्मकता का संचार होता है.  आप लोगों के प्रिय बनते हैं और आप का  आत्मविश्वास भी बढ़ता है.

5. योग भी है कारगर

अगर जिम का चक्कर लगाना या नियमित रूप से एक्सरसाइज कर पाना आप के लिए संभव नहीं है तो खुद को फिट रखने के लिए आप योग का सहारा भी ले सकते हैं. सूर्य नमस्कार और कपालभाती प्राणायाम आदि की मदद से फिट रहने के साथ बढ़ते वजन को नियंत्रित किया जा सकता है. सूर्य नमस्कार से शरीर के सभी अंगों का व्यायाम हो जाता है.

6. सही नींद लें

अच्छी सेहत के लिए एक अच्छी , गहरी और सुकून भरी नींद बहुत जरुरी होती है. कम नींद लेने से सेहत को कई तरह से नुकसान पहुंचता है. भरपूर नींद न लेने पर कई रोग जैसे आँखों में सूजन होना, स्मरण शक्ति में कमी आना, आलस्य, थकान, डायबिटीज, स्ट्रोक, मोटापा, तनाव, कमजोरी, असंतुलन की स्थिति होना आदि परेशान करने लगत हैं. दिमाग़ और शरीर के दूसरे अंगों को पर्याप्त आराम दे कर तरोताज़ा करने के लिए अच्छी नींद बहुत ज़रूरी है. जब हम गहरी नींद में होते हैं तो शरीर टॉक्सिक पदार्थों को साफ़ करने का काम करता है जिस वजह से सो कर उठने पर हम हल्का महसूस करते हैं. अच्छी नींद अंदरूनी अंगों की सेहत के लिए नहीं बल्कि दमकती त्वचा के लिए भी बहुत ज़रूरी है. रात में 10-11 बजे तक सोने और सुबह जल्दी उठने की आदत डालनी चाहिए.

7.सफाई का रखें ख्याल

खाना पकाने और पीने के लिए साफ़ पानी का इस्तेमाल करें. सब्जियों और फलों को अच्छी तरह धो कर उपयोग में लाएं. अपने घर और दफ्तर के अलावा स्कूल कॉलेज , मेट्रो या बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक इलाकों में भी साफ़सफाई का ख़याल रखें. सफाई न रखने पर कई तरह के इन्फेक्शन शरीर को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं.

Edited By- Neelesh Singh Sisodia 

अपराध

ऐलिस का साथ पाने के लिए नीलकंठ ने अपनी दम तोड़ती पत्नी सुरमा को बचाने की कोई कोशिश नहीं की.

एंबुलैंस का सायरन बज रहा था. लोग घबरा कर इधरउधर भाग रहे थे. छुट्टी का दिन होने से अस्पताल का आपातकालीन सेवा विभाग ही खुला था, शोरशराबे से डाक्टर नीलकंठ की तंद्रा भंग हो गई.

घड़ी पर निगाह डाली, रात के 10 बज कर 20 मिनट हो रहे थे. उसे ऐलिस के लिए चिंता हो रही थी और उस पर क्रोध भी आ रहा था. 9 बजे वह उस के लिए कौफी बना कर लाती थी. वैसे, उस ने फोन पर बताया था कि वह 1-2 घंटे देर से आएगी.

‘‘सर,’’ वार्ड बौय ने आ कर कहा, ‘‘एक गंभीर केस है, औपरेशन थिएटर में पहुंचा दिया है.’’

‘‘आदमी है या औरत?’’ नीलकंठ ने खड़े होते हुए पूछा.

‘‘औरत है,’’ वार्ड बौय ने उत्तर दिया, ‘‘कहते हैं कि आत्महत्या का मामला है.’’

‘‘पुलिस को बुलाना होगा,’’ नीलकंठ ने पूछा, ‘‘साथ में कौन है?’’

‘‘2-3 पड़ोसी हैं.’’

‘‘ठीक है,’’ औपरेशन की तैयारी करने को कहो. मैं आ रहा हूं. और हां, सिस्टर ऐलिस आई हैं?’’

‘‘जी, अभीअभी आई हैं. उस घायल औरत के साथ ही ओटी में हैं,’’ वार्ड बौय ने जाते हुए कहा.

राहत की सांस लेते हुए नीलकंठ ने कहा, ‘‘तब तो ठीक है.’’

वह जल्दी से ओटी की ओर चल पड़ा. दरअसल, मन में ऐलिस से मिलने की जल्दी थी, घायल की ओर ध्यान कम ही था.

ऐलिस को देखते ही वह बोला, ‘‘इतनी देर कहां लगा दी? मैं तो चिंता में पड़ गया था.’’

‘‘सर, जल्दी कीजिए,’’ ऐलिस ने उत्तर दिया, ‘‘मरीज की हालत बहुत खराब है. और…’’

‘‘और क्या?’’ नीलकंठ ने एप्रन पहनते हुए पूछा, ‘‘सारी तैयारी कर दी है न?’’

‘‘जी, सब तैयार है,’’ ऐलिस ने गंभीरता से कहा, ‘‘घायल औरत और कोई नहीं, आप की पत्नी सुरमा है.’’

‘‘सुरमा,’’ वह लगभग चीख उठा.

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सुबह ही नीलकंठ का सुरमा से खूब झगड़ा हुआ था. झगड़े का कारण ऐलिस थी. नीलकंठ और ऐलिस का प्रणय प्रसंग उन के विवाहित जीवन में विष घोल रहा था. सुबह सुरमा बहुत अधिक तनाव में थी, क्योंकि नीलकंठ के कोट पर 2-4 सुनहरे बाल चमक रहे थे और रूमाल पर लिपस्टिक का रंग लगा था. सुरमा को पूरा विश्वास था कि ये दोनों चिह्न ऐलिस के ही हैं. कुछ कहने को रह ही क्या गया था? पूरी कहानी परदे पर चलती फिल्म की तरह साफ थी.

झुंझला कर क्रोध से पैर पटकता हुआ नीलकंठ बाहर निकल गया.

जातेजाते सुरमा के चीखते शब्द कानों में पड़े, ‘आज तुम मेरा मरा मुंह देखोगे.’

ऐसी धमकियां सुरमा कई बार दे

चुकी थी. एक बार नीलकंठ ने

उसे ताना भी दिया था, ‘जानेमन, जीना जितना आसान है, मरना उतना ही मुश्किल है. मरने के लिए बहुत बड़ा दिल और हिम्मत चाहिए.’

‘मर कर भी दिखा दूंगी,’ सुरमा ने तड़प कर कहा था, ‘तुम्हारी तरह नाटकबाज नहीं हूं.’

‘देख लूंगा, देख लूंगा,’ नीलकंठ ने विषैली मुसकराहट के साथ कहा था, ‘वह शुभ घड़ी आने तो दो.’

आखिर सुरमा ने अपनी धमकी को हकीकत में बदल दिया था. उन का घर 5वीं मंजिल पर था. वह बालकनी से नीचे कूद पड़ी थी. इतनी ऊंचाई से गिर कर बचना बहुत मुश्किल था. नीचे हरीहरी घास का लौन था. उस दिन घास की कटाई हो रही थी. सो, कटी घास के ढेर लगे थे. सुरमा उसी एक ढेर पर जा कर गिरी. उस समय मरी तो नहीं, पर चोट बहुत गहरी आई थी.

शोर मचते ही कुछ लोग जमा हो गए, उन्होंने सुरमा को पहचाना और यही ठीक समझा कि उसे नीलकंठ के पास उसी के अस्पताल में पहुंचा दिया जाए.

काफी खून बह चुका था. नब्ज बड़ी मुश्किल से पकड़ में आ रही थी. शरीर का रंग फीका पड़ रहा था. नीलकंठ के मन में कई प्रश्न उठ रहे थे, ‘सुरमा से पीछा छुड़ाने का बहुत अच्छा अवसर है. इस के साथ जीवन काटना बहुत दूभर हो रहा है. हमेशा की किटकिट से परेशान हो चुका हूं. एक डाक्टर को समझना हर औरत के वश की बात नहीं, कितना तनावपूर्ण जीवन होता है. अगर चंद पल किसी के साथ मन बहला लिया तो क्या हुआ? पत्नी को इतना तो समझना ही चाहिए कि हर पेशे का अपनाअपना अंदाज होता है.’

सहसा चलतेचलते नीलकंठ रुक गया.

‘‘क्या हुआ, सर?’’ ऐलिस ने चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘मैं यह औपरेशन नहीं कर सकता,’’ नीलकंठ ने लड़खड़ाते स्वर में कहा, ‘‘कोई डाक्टर अपनी पत्नी या सगेसंबंधी का औपरेशन नहीं करता, क्योंकि वह उन से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. उस के हाथ कांपने लगते हैं.’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं?’’ ऐलिस ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘जल्दी से डाक्टर जतिन को बुला लो,’’ नीलकंठ ने वापस मुड़ते हुए कहा. वह सोच रहा था कि औपरेशन में जितनी देर लगेगी, उतनी जल्दी ही सुरमा इस दुनिया से दूर चली जाएगी.

‘‘यह कैसे हो सकता है?’’ ऐलिस ने तनिक ऊंचे स्वर में कहा, ‘‘डाक्टर जतिन को आतेआते एक घंटा तो लगेगा ही. लेकिन इतना समय कहां है? मैं मानती हूं कि आप के लिए पत्नी को इस दशा में देखना बड़ा कठिन होगा और औपरेशन करना उस से भी अधिक मुश्किल, पर यह तो आपातस्थिति है.’’

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‘‘नहीं,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘यह डाक्टरी नियमों के विरुद्ध होगा और यह बात तुम अच्छी तरह जानती हो.’’

‘‘ठीक है, कम से कम आप कुछ देखभाल तो करें,’’ ऐलिस ने कहा, ‘‘मैं अभी डाक्टर जतिन को संदेश भेजती हूं.’’

डाक्टर नीलकंठ जब ओटी में घुसा तो आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था, कितने ही उद्गार मन में उठते और फिर बादलों की तरह गायब हो जाते थे.

सामने सुरमा का खून से लथपथ शरीर पड़ा था, जिस से कभी उस ने प्यार किया था. वे क्षण कितने मधुर थे. इस समय सुरमा की आंखें बंद थीं, एकदम बेहोश और दीनदुनिया से बेखबर. इतना बड़ा कदम उठाने से पहले उस के मन में कितना तूफान उठा होगा? एक क्षण अपराधभावना से नीलकंठ का हृदय कांप उठा, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उस के शरीर को झंझोड़ रही हो.

नीलकंठ ने कांपते हाथों से सुरमा के बदन से खून साफ किया. उस का सिर फट गया था. वह कितने ही ऐसे घायल व्यक्ति देख चुका था, पर कभी मन इतना विचलित नहीं हुआ था. वह सोचने लगा, क्या सुरमा की जान बचा सकना उस के वश में है?

लेकिन डाक्टर जतिन के आने से पहले ही सुरमा मर चुकी थी. नीलकंठ सूनी आंखों से उसे देख रहा था, वह जड़वत खड़ा था.

जतिन ने शव की परीक्षा की और धीरे से नीलकंठ के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘मुझे दुख है, सुरमा अब इस दुनिया में नहीं है. ऐलिस, नीलकंठ को केबिन में ले जाओ, इसे कौफी की जरूरत है.’’

ऐलिस ने आहिस्ता से नीलकंठ का हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए ओटी से बाहर ले गई. कमरे में ले जा कर उसे कुरसी पर बैठाया.

‘‘सर, मुझे दुख है,’’ ऐलिस ने आहत स्वर में कहा, ‘‘सुरमा के ऐसे अंत की मैं ने कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी. मैं अपने को कभी माफ नहीं कर सकूंगी.’’

नीलकंठ ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘तुम्हारा कोई दोष नहीं, कुसूर मेरा है.’’

नीलकंठ आंखें बंद किए सोच रहा था, ‘शायद सुरमा को बचा पाना मेरे वश से बाहर था, पर कोशिश तो कर ही सकता था. लेकिन मैं टालता रहा, क्योंकि सुरमा से छुटकारा पाने का यह सुनहरा अवसर था. मैं कलह से मुक्ति पाना चाहता था. अब शायद ऐलिस मेरे और करीब आ जाएगी.’

ऐलिस सामने कौफी का प्याला लिए खड़ी थी. वह आकर्षक लग रही थी.

पुलिस सूचना पा कर आ गई थी. औपचारिक रूप से पूछताछ की गई. यह स्पष्ट था कि दुर्घटना के पीछे पतिपत्नी के बिगड़ते संबंध थे, परंतु नीलकंठ का इस दुर्घटना में कोईर् हाथ नहीं था. नैतिक जिम्मेदारी रही हो, पर कानूनी निगाह से वह निर्दोष था. पोस्टमार्टम के बाद शव नीलकंठ को सौंप दिया गया. दोनों ओर के रिश्तेदार सांत्वना देने और घर संभालने आ गए थे. दाहसंस्कार के बाद सब के चले जाने पर एक सूनापन सा छा गया.

नीलकंठ को सामान्य होने में सहायता दी तो केवल ऐलिस ने. अस्पताल में ड्यूटी के समय तो वह उस की देखभाल करती ही थी, पर समय पा कर अपनी छोटी बहन अनीषा के साथ उस के घर भी चली जाती थी. चाय, नाश्ता, भोजन, जैसा भी समय हो, अपने हाथों से बना कर देती थी. धीरेधीरे नीलकंठ के जीवन में शून्य का स्थान एक प्रश्न ने ले लिया.

कई महीनों के बाद नीलकंठ ने एक दिन ऐलिस से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे जैसी पत्नी ही पाना चाहता था. तुम मुझे पहले क्यों नहीं मिलीं. यह सोच कर कभीकभी आश्चर्य होता है.’’

‘‘सर,’’ ऐलिस बोली, ‘‘सर.’’

नीलकंठ ने टोकते हुए कहा, ‘‘मैं ने कितनी बार कहा है कि मुझे ‘सर’ मत कहा करो. अब तो हम दोनों अच्छे दोस्त हैं. यह औपचारिकता मुझे अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘क्या करूं,’’ ऐलिस हंस पड़ी, ‘‘सर, आदत सी पड़ गई है, वैसे कोशिश करूंगी.’’

‘‘तुम मुझे नील कहा करो,’’ उस ने ऐलिस की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘मुझे अच्छा लगेगा.’’

ऐलिस हंस पड़ी, ‘‘कोशिश करूंगी, वैसे है जरा मुश्किल.’’

‘‘कोई मुश्किल नहीं,’’ नीलकंठ हंसा, ‘‘आखिर मैं भी तो तुम्हें ऐलिस कह कर बुलाता हूं.’’

‘‘आप की बात और है,’’ ऐलिस ने कहा, ‘‘आप किसी भी संबंध से मुझे मेरे नाम से पुकार सकते हैं.’’

‘‘तो फिर किस संबंध से तुम मेरा नाम ले कर मुझे बुलाओगी?’’ नीलकंठ के स्वर में शरारत थी.

‘‘पता नहीं,’’ ऐलिस ने निगाहें फेर लीं.

‘‘तुम जानती हो, मेरे मन में तुम्हारे लिए क्या भावना है,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि तुम मेरे सूने जीवन में बहार बन कर प्रवेश करो.’’

‘‘यह तो अभी मुमकिन नहीं,’’ ऐलिस ने छत की ओर देखा.

‘‘अभी नहीं तो कोई बात नहीं,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘पर वादा तो कर सकती हो?’’ नीलकंठ को विश्वास था कि ऐलिस इनकार नहीं करेगी, शक की कोई गुंजाइश नहीं थी.

‘‘यह कहना भी मुश्किल है,’’ ऐलिस ने मेज पर पड़े चम्मच से खेलते हुए कहा.

‘‘क्यों?’’ नीलकंठ ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘आखिर हम अच्छे दोस्त हैं?’’

‘‘बस, दोस्त ही बने रहें तो अच्छा है,’’ ऐलिस ने कहा.

‘‘क्या मतलब?’’ नीलकंठ ने खड़े होते हुए पूछा, ‘‘तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘यही कि अगर शादी कर ली तो इस बात की क्या गारंटी है,’’ ऐलिस ने एकएक शब्द तोलते हुए कहा, ‘‘कि मेरा भी वही हश्र नहीं होगा, जो सुरमा का हुआ? आखिर दुर्घटना तो सभी के साथ घट सकती है?’’

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यह सुनते ही नीलकंठ को मानो सांप सूंघ गया. उस ने कुछ कहना चाहा, पर जबान पर मानो ताला पड़ गया था. ऐलिस ने साथ देने से इनकार जो कर दिया था.

आवारा कुत्तों का आतंक

सुनील अचारकाटे भोपाल के कारोबारी इलाके एमपी नगर में खुद का प्रिंटिंग प्रैस चलाते हैं. जिस दिन प्रैस में देररात तक काम चलना होता है उस दिन शाम से ही उन की सांसें फूलने लगती हैं. वजह, काम का दबाव या तनाव नहीं, बल्कि दिमाग पर आवारा कुत्तों का छाया आतंक है. सुनील बताते हैं कि एमपी नगर से घर चूनाभट्टी तक जाने में कोई 3 जगहों शिवाजी नगर, टीटी नगर और शाहपुरा पर आवारा कुत्ते समूह बना कर बैठे रहते हैं. जैसे ही वे बाइक की आवाज सुनते हैं, सामूहिक रूप से भूंकना और पीछा करना शुरू कर देते हैं.

शुक्र यह है कि सुनील को अभी तक किसी आवारा कुत्ते ने काटा नहीं है. हालांकि अकेले भोपाल में औसतन रोजाना 30 लोग डौगबाइट यानी कुत्ते के काटने के शिकार होते हैं. इस साल अकेले फरवरीमार्च में कोई 2 हजार लोगों को इन आवारा कुत्तों ने काटा था.

ऐसा ही एक चिंताजनक मामला पुराने भोपाल के घोड़ा नक्कास इलाके में रहने वाली 4 साल की मासूम माहिरा के साथ सामने आया था. बीती 16 मार्च को माहिरा के पिता वकार अली उर्फ विक्की उसे अपने साले के  यहां छोड़ कर गए थे. खेलती हुई माहिरा पर एक आवारा कुत्ता झपट पड़ा. घबराई इस नन्ही बच्ची ने बचने की काफी कोशिश की, लेकिन कुत्ता उसे काट कर ही माना.

अपनी बेटी का इलाज कराते समय विक्की ने नगरनिगम को इस हादसे की खबर फोन पर दी, तो जवाब मिला कुछ ही देर में नगरनिगम कर्मी आएंगे और उस इलाके के आवारा कुत्तों को पकड़ लेंगे. लेकिन इस आश्वासन के बाद भी कोई नहीं आया तो विक्की जैसे लोगों की चिंता और बढ़ गई कि ये आवारा कुत्ते कभी भी किसी को काट सकते हैं.

चिंता सुप्रीम कोर्ट की भी

आवारा कुत्तों यानी स्ट्रीट डौग्स का आतंक इस तरह देशव्यापी होता जा रहा है कि इस पर अदालतें भी वक्तवक्त पर चिंता जताती रहती हैं. मई, 2018 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने आवारा कुत्तों की समस्या पर संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया था कि वह इस से निबटने के लिए क्या कर रही है.

हुआ यों था कि सीतापुर इलाके में कुछ बच्चों को अनियमित अंतराल से आवारा कुत्तों ने काट खाया था. इस पर एक अधिवक्ता द्वारा दायर याचिका पर जस्टिस विक्रमनाथ और अब्दुल मोइन की बैंच ने इसे केवल सीतापुर ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य की समस्या बताया था.

इस से पहले सितंबर, 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार से कहा था कि लोगों को आवारा कुत्तों से बचाने की जिम्मेदारी सरकार की है और सरकार को कानूनी दायरे में रह कर इस का हल निकालना चाहिए. गौरतलब, चिंताजनक और दिलचस्प बात यह है कि अकेले केरल में एक साल में लगभग एक लाख 16 हजार लोग डौगबाइट का शिकार हुए थे.

लेकिन केरल सरकार को नसीहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि आवारा कुत्तों के पास भी जीने का हक है और यह उन से छीना नहीं जा सकता. इसलिए कुत्तों को मारते वक्त सरकार इस बात का ध्यान रखे कि केवल उन्हीं कुत्तों को मारा जाए जो नियमों के तहत आते हों. सब से बड़ी अदालत का यह कहना भी अहम था कि यह लोगों के जीवन से जुड़ा मामला है लेकिन हम ऐसा कोई आदेश नहीं दे सकते कि सभी आवारा कुत्तों को मार दिया जाए. अगर कोई व्यक्ति कुत्ते के काटने से मर जाता है तो यह एक घटना हो सकती है. ऐसी घटनाओं को ले कर सभी आवारा कुत्तों को मारने की इजाजत नहीं दी जा सकती.

आवारा कुत्तों के काटने की समस्या कितनी विकराल होती जा रही है, इसे सुप्रीम कोर्ट के ही इस आदेश से और समझा जा सकता है कि केरल सरकार जस्टिस एस श्रीजगत की कमेटी की सिफारिशों को लागू करे जिस में कुत्तों के काटने से घायल लोगों को मुआवजा देने की बात कही गई है. जवाब में केरल सरकार के वकील ने माना था कि मुआवजा मांगने वाले ऐसे 752 याचिकाकर्ताओं में से 154 मामले सैटल कर लिए गए हैं.

पुनर्वास हल नहीं

गंभीर मामले पर पहल करते केरल सरकार ने अदालत को बताया था कि सभी पंचायतों से पूछा गया है कि आवारा कुत्तों के लिए पुनर्वास की जगह के बारे में वे सरकार को बताएं.

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गौरतलब यह भी है कि केरल और बौंबे हाईकोर्ट ने अलगअलग फैसलों में आवारा कुत्तों को मारने के फैसले को सही ठहराया था. इन फैसलों में कहा गया था कि लोगों की जिंदगी आवारा कुत्तों से ज्यादा जरूरी है. गौरतलब यह भी है कि कई पशु अधिकार संस्थाओं ने आवारा कुत्तों को मारे जाने के फैसले के खिलाफ याचिकाएं दायर कर रखी हैं. ये संस्थाएं खासतौर से केरल में आवारा कुत्तों को मारने के लिए चलाई जा रही मुहिम पर रोक लगाने की मांग कर रही थीं.

इन मामलों को गंभीरता से लेते सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में नवंबर, 2015 में कहा था कि कुत्तों के लिए 2001 में बने केंद्रीय नियम के तहत ही कार्यवाही की जा सकती है. इस नियम के मुताबिक, लोगों के लिए खतरा बने आवारा कुत्तों को मानवीय तरीके से मारा जा सकता है. इसी बात को अदालत ने इस साल फरवरी में फिर दोहराया था.

दोटूक कहा जाए तो आवारा कुत्तों का आतंक और इस समस्या का हल किसी के पास है ही नहीं. चूंकि यह जिम्मेदारी स्थानीय निकायों के सिर है इसलिए वे भी आएदिन इस समस्या पर मीटिंग किया करते हैं, लेकिन किसी हल या निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाते. सितंबर, 2018 में इंदौर नगरनिगम की एक मीटिंग में इस मसले पर लंबीचौड़ी चर्चा हुई थी. लेकिन निगम अधिकारी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए थे. हां, इस बात पर सहमति जरूर बनी कि कुत्तों की नसबंदी की जाए, उन्हें रेबीज के इंजैक्शन लगाए जाएं और इस से भी अहम बात, आवारा कुत्तों के लिए अलग बाड़ा बनाया जाए.

आवारा कुत्तों का पुनर्वास असल में उतना आसान काम है नहीं जितना कि लगता है. वजह, हर शहर में जगह कम है. और कुत्तों को पकड़ कर एक जगह रख पाना व्यावहारिक बात भी कहीं से नहीं है. इस की अपनी वजहें भी हैं कि अकसर आवारा कुत्ते रिहायशी इलाकों के आसपास ही रहते हैं. उन्हें एक बार घसीट कर कहीं और ले जाया सकता है, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर उन की नई फौज तैयार हो जाती है. फिर अगर पुनर्वासित आवारा कुत्तों को कभी समय पर खानापीना न मिला या वे किसी दूसरे हादसे या बीमारी का शिकार हो कर मरे, तो पशुप्रेमी हायहाय करने का मौका चूकेंगे नहीं, इसलिए भी स्थानीय निकाय पुनर्वास से कतराते हैं.

एक कुत्ते की नसबंदी पर लगभग एक हजार रुपए का खर्च आता है. मिसाल भोपाल की लें, इस शहर में तकरीबन एक लाख आवारा कुत्ते हैं. यानी उन की नसबंदी के लिए 10 करोड़ रुपए चाहिए होंगे. इतनी भारीभरकम राशि का इंतजाम या प्रावधान, वह भी कुत्तों के लिए, कोई नगरनिगम नहीं कर सकता. इसलिए भी यह भीषण होती समस्या ज्यों की त्यों रहती है.

साल 2017 में चंडीगढ़ नगरनिगम ने इस परेशानी से छुटकारा पाने के लिए आम लोगों से अपील की थी कि वे आवारा कुत्तों को गोद लें. नगरनिगम ने उत्साहपूर्वक यह घोषणा भी की थी कि जो भी व्यक्ति या एनजीओ कुत्तों को गोद लेगा उसे नगरनिगम द्वारा हर तीसरे महीने सम्मानित किया जाएगा. लेकिन इस घोषणा का कोई असर नहीं हुआ. सो, वहां की मेयर आशा जसवाल भौचक्की रह गई थीं.

दरअसल, इस के पहले चंडीगढ़ नगरनिगम ने सारे टोटके आजमा लिए थे. मसलन, आवारा कुत्तों को पकड़ कर शहर से बाहर भी छोड़ा गया था और उन का बधियाकरण भी किया गया था लेकिन शहर के 12 हजार आवारा कुत्तों की तादाद कम नहीं हुई. बात बहुत सीधी सी है कि एक कुतिया एक बार में 4-6 पिल्लों को जन्मती है जो देखते ही देखते अपना एक अलग स्वतंत्र अस्तित्व बना लेते हैं और खुद को नए आवारा कुत्ते के रूप में स्थापित कर लेते हैं. कुत्ते की औसत उम्र 12 साल होती है. लिहाजा, नसबंदी के बाद भी उस की आवारगी बनी रहती है.

खानेपीने की इन कुत्तों को कोई कमी नहीं रहती. आजकल घरों से इतनी जूठन बाहर घूरों पर फेंकी जाती है कि ये कुत्ते भूखे नहीं रहते. लोगों का पशुप्रेम इस की वजह है और धार्मिक आस्थाएं भी, कि कुत्तों को खाना देने से पुण्य मिलता है और शनि ग्रह का प्रकोप कम होता है.

एक दूसरी वजह चंडीगढ़ ही नहीं, बल्कि देश के तमाम नगरनिगमों के सामने मुंहबाए खड़ी है, वह है एनिमल वैलफेयर बोर्ड की गाइडलाइन. इस के तहत नगरनिगमों को निर्देश दिए गए हैं कि शहर के सभी सार्वजनिक बागबगीचे और पार्क आवारा कुत्तों के लिए खोले जाएं और कुत्तों पर पाबंदी वाले बोर्ड भी हटाए जाएं.

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अव्वल तो सभी नगरनिगम यह बेकार और बेगार ढोना नहीं चाहते, इसलिए इस गाइडलाइन को वे कवच की तरह इस्तेमाल करते हैं कि हम क्या करें जब सरकारी एजेंसियां ही इस मामले पर हमारे हाथ बांध रही हैं. फैडरेशन औफ सैक्टर्स वैलफेयर एसोसिएशन के सलाहकार चंडीगढ़ के ही दलविंदर सैनी की मानें तो आवारा कुत्तों की समस्या से छुटकारा पाने के लिए डौग पाउंड बनाए जाएं.

यानी बात हर तरह से घूमफिर कर पुनर्वास पर आ कर ठहर जाती है, जो देश में कहीं नहीं हो पा रहा. किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जा रहा कि इस समस्या की असल जड़ शहरीकरण है जिस में कुत्तों के रहने का कोई प्रावधान नहीं है. कुत्तों से उन के रहने की जगह और ठिकाने छीन कर इमारतें खड़ी की गईं तो ये कुत्ते वहीं कहीं खाली जगह देख कर बसने लगे.

हर शहर में कालोनियों के बीच के मैदानों और घूरों पर इन कुत्तों का कब्जा है. नालों के आसपास भी ये रहते हैं और रेलवेलाइनों के पास भी इन के आशियाने हैं, क्योंकि वहां कोई ज्यादा रोकटोक इन पर नहीं रहती.

खाने की तलाश में कुत्ते रिहायशी इलाकों में पहुंचते हैं और फिर वहीं के हो कर रह जाते हैं. जब ये कुत्ते बस रहे होते हैं तब किसी के पेट में मरोड़ नहीं उठती. लेकिन जब ये आतंक फैलाने लगते हैं, लोगों को काटने लगते हैं और उन का निकलना दूभर कर देते हैं तो लोग हायहाय करते स्थानीय निकायों और सरकारी दफ्तर पहुंचने लगते हैं.

यह सच है कि गाय के बाद कुत्ता ही ऐसा मवेशी है जो हमेशा से आदमी के साथ है. लोग कुत्तों को सुरक्षा के लिए साथ रखते थे. लेकिन अब पहले से पड़ाव वाला दौर नहीं रहा और न ही लोग घुमंतू रह गए हैं. लिहाजा, कुत्ता उन के साथ तो आज भी है लेकिन वह अब वफादार चौकीदार नहीं रह गया है, बल्कि आतंक का पर्याय बन चुका है. द्य

यह भी खूब रही

मैं बस से जावरा जा रहा था. थोड़ी देर बाद बस चलने से पहले एक युवा मेरी पास की सीट पर आ कर बैठ गया. 10 किलोमीटर बस चलने के बाद कंडक्टर टिकट काटते हुए पैसे लेने आया. युवा ने सेमलिया का टिकट मांगा. यह बस विपरीत दिशा के इस ग्राम में नहीं जाती थी. इसलिए कंडक्टर ने उसे घोंसवाल में उतर जाने को कहा.

युवा झट से वहां उतर गया. उतरते हुए उस यात्री से यहां तक के किराए के पैसे मांगने पर उस ने कहा कि कौन से पैसे, क्या तुम ने सेमलिया में उतारा है? चालक से यह कह कर वह आगे बढ़ गया, और आगे चल कर अपने साथ चल रहे दोस्त से कहा, ‘‘मिलाओ हाथ, इसे कहते हैं आइडिया.’’ वास्तव में ये दोनों युवा दूसरे राज्य के थे और घोंसवाल अकसर आवाजाही करते थे.   एस सी कटारिया

मेरी शादी के बाद पहला त्योहार होली का आया. हमारे यहां यह रिवाज है कि शादी के बाद पहली होली पर सासबहू एकसाथ नहीं रहती हैं. इसलिए होली से पहले मेरे मायके से मुझे लेने आ गए. ससुराल वालों ने मुझे मायके भेज दिया. परंतु मेरा जाना मेरे पति को अच्छा नहीं लगा. नईनई शादी हुई थी.

होली पर मेरी दीदी व जीजाजी भी हमारे यहां आए थे. मायके में सभी ने मिल कर योजना बनाई कि होली पर सासबहू साथ में नहीं रह सकतीं परंतु दामादजी तो यहां आ सकते हैं. इसलिए होली पर इन्हें आमंत्रित कर के हमारे यहां बुलवा लिया.

होली से एक दिन पहले ही मेरे पति आ गए थे. उन्हें बसस्टैंड से सीधे हमारे चाचाजी के यहां ले गए. उन्हें चाचाजी के यहां ठहराया गया. हमारे यहां होली पर दामाद के साथ बहुत हंसीमजाक किया जाता है. इसलिए मेरी बहनें, भाभी व मेरी सहेलियों ने मजाक में इन्हें पकड़ कर इन के नेलपौलिश लगा दी, काजल, बिंदी व मांग में सिंदूर भर कर इन का रूप सुहाना शृंगार कर दिया और होली खेलते समय इन्हें मेरे सामने ला कर मुझे सरप्राइज दिया.

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मुझे इन के आने की पूर्व में कोई जानकारी नहीं थी. मेरे जीजाजी के साथ मेरे पति अचानक मेरे सामने आ कर खड़े हो गए. मैं अचानक इन्हें सामने खड़े देख हतप्रभ रह गई. और इन का रूप सुहाना शृंगार देख कर अपनी हंसी नहीं रोक सकी. हम सभी ठहाके लगा कर हंसने लगे. मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

अब हम सभी ने मिल कर खूब होली खेली. होली पर फाग गीत गा कर माहौल को और भी रंगीन बना दिया.

3 टिप्स: मेहंदी हेयर पैक से दूर करें बालों की समस्या

बालों की समस्या से राहत पाने के लिए आप मेहंदी का इस्तेमाल कर सकती हैं. रूखे, दोमुंहें और सफेद बालों की समस्या से राहत पाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है. बालों की खूबसूरती बरकरार रखने और इसे हेल्दी बनाए रखने में मेहंदी काफी मददगार होती है.

आप मेहंदी का इस्तेमाल किस तरह से करना पसंद करते हैं, ये पूरी तरह आप पर निर्भर करता है. लेकिन अगर आप रूसी की समस्या से जूझ रहे हैं तो मेहंदी के इन उपायों को अपना सकते हैं.

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  1. मेहंदी, दही और नींबू

अगर आपको रूसी दूर करने के साथ ही बालों में चमक भी चाहिए तो ये हेयर-पैक आपके लिए सबसे अच्छा होगा. नींबू के रस में मेंहदी पाउडर को अच्छी तरह से फेंटकर एक पेस्ट बना लें. इस पेस्ट में दही भी मिला लीजिए. कुछ देर के लिए इस पेस्ट को स्कैल्प पर लगाकर छोड़ दें, उसके बाद हल्के गुनगुने पानी से बालों को साफ कर लें.

2. मेहंदी पाउडर, अंडा और जैतून का तेल

अंडे के सफेद भाग, जैतून के तेल और मेंहदी पाउडर के इस्तेमाल से रूसी की समस्या बहुत जल्दी खत्म हो जाती है. इन तीनों चीजों को आपस में अच्छी तरह मिला लें. इस पेस्ट को स्कैल्प पर अच्छी तरह से लगा लें. 30 मिनट तक इस पेस्ट को यूं ही लगा रहने दें और उसके बाद हल्के गुनगुने पानी से बालों को साफ का लें.

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3. मेंहदी पाउडर और सरसों का तेल

बालों में रूसी हो जाने पर सरसों के तेल का इस्तेमाल करना बहुत फायदेमंद होता है. जब इसे मेंहदी के साथ मिलाया जाता है तो यह एक बेहतरीन कंडिशनर बन जाता है. इसके इस्तेमाल से बाल मजबूत और स्वस्थ बनते हैं. अगर आप मेंहदी पाउडर की जगह मेंहदी की पत्त‍ियों का इस्तेमाल करें तो और भी बेहतर होगा. आप चाहें तो मेंहदी की पत्तियों को सरसों के तेल में पकाकर उस तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं.

जय सरकारी तंत्र

बाहर हर तरफ पानी से भरे गड्ढे दिख रहे थे, ‘इस का मतलब रात से ही लगातार बारिश हो रही है. मौसम कितना खुशगवार है पर मैं कितनी अकेली हूं. दोनों बच्चे होस्टल में हैं और समीर…जब देखो तब बाहर ही रहते हैं. वैसे देखा जाए तो कितनी सुखी हूं मैं. कर्मठ व ईमानदार पति, होनहार बच्चे, बंगला, गाड़ी, नौकर सबकुछ तो है. बस, है नहीं तो केवल समीर का साथ. समीर रेलवे में उच्च पद पर हैं, जो अकसर काम की देखरेख के सिलसिले में बाहर ही रहते हैं.’

‘‘मेम साहब, मेम साहब…’’ रामू की आवाज से मंजरी की तंद्रा टूटी.

एक लंबी सांस ले कर वह दरवाजा खोलने के लिए बाहर आई. वापस आते हुए बैठक का नजारा देख कर उस की चीख निकलतेनिकलते बची, कमरे के एक तरफ की छत से टपटप पानी गिर रहा था और कीमती कालीन का एक बड़ा हिस्सा पानी से पूरी तरह भीग चुका था.

‘‘रामू, रामू…’’ मंजरी ने जोर से आवाज लगाई.

‘‘जी, आया, मेम साहब,’’ रामू ने गरम चाय का प्याला मंजरी को पकड़ाया.

‘‘रामू, यह कालीन जरा बरामदे में खड़ा कर दो, फिर बाकी सामान भी दूसरी तरफ किनारे की ओर खिसका दो,’’ चाय पीते हुए मंजरी ने कहा.

चाय पी कर अपने कमरे से मंजरी ने रेलवे के सेक्शन इंजीनियर के दफ्तर में फोन मिलाया. काफी देर घंटी बजने के बाद उधर से आवाज आई, ‘‘हैलो, सेक्शन आफिस.’’

‘‘हैलो,

हां, क्या सेक्शन इंजीनियर साहब हैं?’’ मंजरी ने पूछा.

‘‘साहब तो बाहर कर्मचारियों को आज की ड्यूटी बांट रहे हैं. अभी बहुत व्यस्त हैं.’’

‘‘उन्हें बताओ कि बंगला नं. 40 की छत से बहुत पानी टपक रहा है. जल्दी से किसी को ठीक करने के लिए भेज दें.’’

‘‘सौरी, मैडम, आज तो कुछ नहीं हो सकता. बड़े साहब के घर में काम चल रहा है.’’

‘‘लेकिन यहां भी तो बहुत जरूरी है. यह घर…’’ मंजरी के वाक्य पूरा करने से पहले ही दूसरी तरफ से फोन रख दिया गया.

मंजरी ने झल्लाते हुए फोन रखा ही था कि उस के सिर पर टपाटप 3-4 बूंदें गिरीं. उस ने चौंक कर ऊपर देखा तो पंखे के बीचोंबीच से पानी टपक रहा था. यह तो अच्छा हुआ कि उस समय पंखा बंद था.

मंजरी ने फौरन बिजली विभाग का नंबर मिला कर पंखा खराब होने की शिकायत दर्ज करा दी और रामू को आवाज दी.

‘‘आया, मेम साहब.’’

रामू को आया देख कर मंजरी बोली, ‘‘सुनो, यह पलंग जरा उधर खिसका दो, और हां, यह पंखा मत चलाना. करंट आ सकता है.’’

मंजरी सोच में पड़ गई थी कि अब पता नहीं कब बिजली विभाग के लोग पंखा ठीक करने आएंगे? यदि समीर यहां होते तो सब दौड़ते हुए आते. मन ही मन सरकारी तंत्र को कोसा. अफसर को सामने देख कर तो काम करते हैं वरना वे…

सोचते हुए मंजरी बरामदे में आई और कालीन को वहां बिछा कर वैक्यूम क्लीनर से सुखाने का प्रयास किया. फिर रामू से कमरे में भरा पानी निकलवाया.

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यह सब करतेकरते 11 बज गए. वह नहाने के लिए जा ही रही थी कि फोन बजा.

‘‘हैलो, मंजरी, मैं मीता, क्या कर रही थी?’’

‘‘अरे, क्या बताऊं, यार, पूरा घर टपक रहा है.’’

‘‘मेरे यहां का तो हाल ही मत पूछ. पिछले 5 दिन से रसोई में टाइल्स लग रही हैं, पर अभी भी पूरी नहीं हुईं.’’

‘‘पता नहीं, कैसे काम करते हैं ये लोग?’’

‘‘खैर, इन सब बातों को मारो गोली. चलो, हम लोग बाजार चलते हैं. कलाकृति में सेल लगी हुई है.’’

‘‘हां…ठीक है, लेकिन दोपहर के बाद चलेंगे.’’

जब मंजरी नहा कर आई तो 12 बज चुके थे. उसे बहुत जोर की भूख लगी थी. सोचा अब नाश्ते का समय तो है नहीं, अत: सीधे खाना ही खा लिया जाए.

खाना खा कर और रामू को भेज कर मंजरी जब अंदर आई तो थक कर चूर हो गई थी. आंख बंद कर वह अभी लेटी ही थी कि दरवाजे की घंटी बजी.

इस समय कौन हो सकता है? उस ने सोचा और बाहर जा कर देखा तो बिजली विभाग के 4 कर्मचारी खड़े थे.

‘‘मैडम, आप का पंखा नहीं चल रहा है?’’

‘‘हांहां, आइए.’’

अंदर आ कर उन्होंने नीचे से ही पंखे को देखा और फिर घड़ी में समय देख कर बोले, ‘‘मैडम, आज तो यह पंखा ठीक नहीं हो सकता.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’

‘‘आज सीढ़ी नहीं है.’’

‘‘पर, भैया, बिना पंखे के हम क्या करेंगे?’’

‘‘बोला न मैडम, आज नहीं हो सकता. अब समय भी नहीं है,’’ कह कर वे चले गए.

मंजरी को बेहद गुस्सा आया पर वह क्या कर सकती थी. सब को कामचोरी की ऐसी आदत पड़ चुकी है कि ऐसा काम जिस में थोड़ी मेहनत हो, वे टालते रहते हैं.

आखिरकार, वह स्टोर से पुराना टेबलफैन निकाल कर ले आई और उसे झाड़पोंछ कर बेडरूम में लगाया. पूरा घर अस्तव्यस्त हो रहा था. इस कारण मंजरी ने मीता को भी बाजार के लिए मना कर दिया. रात को समीर का फोन आया तो मंजरी उफन पड़ी. उस ने पूरी दास्तान सुनाई. समीर ने वादा किया कि वह वहीं से शिकायत करेंगे.

अगले दिन सुबह फिर 3-4 लोगों की एक फौज बाहर खड़ी थी.

‘‘मैडम, आप के घर में पानी टपक रहा है?’’

‘‘हां, इधर देखिए,’’ मंजरी ने कमरे दिखाए.

‘‘ठीक है, मैडम, अभी सीमेंट और सामान लाते हैं.’’

मंजरी का सिर यह देख कर भन्नाने लगा कि अभी क्या ये घूमने के लिए आए थे. खैर, 2 लोग सामान लाने के बहाने चले गए और 2 पेड़ के नीचे बैठ कर बीड़ी पीने लगे.

करीब 1 घंटे के बाद वे दोनों कर्मचारी फिर प्रकट हुए. बाकी दोनों भी अलसाए से उठे और आखिर काम शुरू हुआ. ठक, ठक, ठक…हथौड़े की आवाज सिर में समाती जा रही थी.

‘‘मैडम, मैडम…’’ बाहर से मिस्तरी ने आवाज दी.

‘‘क्या बात है,’’ मंजरी पूछते हुए बाहर आई तो देखा वे लोग सामान समेट कर जाने के लिए तैयार हैं.

‘‘मैडम, हम जा रहे हैं. अब कल आएंगे.’’

‘‘लेकिन, पूरा घर फैला हुआ है.’’

‘‘आज हम लोगों को तनख्वाह मिलेगी, इसलिए अब काम नहीं होगा.’’

‘‘पर, तनख्वाह ले कर आ जाओ.’’

‘‘नहीं, हम लोग वेतन मिलने के बाद काम नहीं करते,’’ मिस्तरी ने दोटूक जवाब दिया.

मंजरी का मन हुआ कि इन्हें धक्के मार कर निकाल दे पर सिर्फ बेबस बनी उन्हें जाते देखती रही.

‘कैसी जंग लग चुकी है इस सिस्टम में,’ उस ने सोचते हुए घर का हाल देखा. पूरे ड्राइंगरूम में धूल भरी हुई थी. छत से सीमेंट और चूना झड़ कर एक अलग दृश्य पेश कर रहे थे. इतने में घंटी बजी. इस बार बिजली वाले थे. उन्हें बेडरूम की राह दिखाई. पंखा बदल कर उन्होंने आवाज लगाई. मंजरी ने जा कर देखा कि पंखे की डंडी बहुत ही छोटी है जिस की वजह से पंखा छत से सट गया है. हवा भी नीचे तक रोरो कर ही पहुंच रही थी.

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‘‘यह पंखा तो बहुत ऊंचा है.’’

‘‘मैडम, आज काम चला लीजिए. कल पाइप ला कर लगा देंगे.’’

‘‘फिर आज ही क्यों नहीं लाए,’’ मंजरी का धैर्य जवाब देने लगा था.

‘‘पाइप स्टाक में नहीं है.’’

‘‘उफ, यानी कल का दिन भी बरबाद हो जाएगा.’’

मंजरी यह देख कर हैरान थी कि ऐसे कर्मचारियों के बूते पूरी भारतीय रेलवे कैसे चल रही है, जो विश्व का दूसरा सब से बड़ा रेल नेटवर्क है, पर जब पूरी व्यवस्था ही अंदर तक सड़ चुकी हो, तब किसी से अनुशासन की अपेक्षा करना व्यर्थ है.

मंजरी के सामने अब पूरे सरकारी तंत्र की बखिया खुल चुकी थी. उसे समझ में आ गया था कि देश के कर्मचारी काहिली और अकर्मण्यता के रंग में इतने गहरे रंग गए हैं कि अब उन पर किसी बात का असर नहीं होता.

मंजरी का सिर फटा जा रहा था. अपने ही घर में 2 दिनों से न वह चैन से बैठ पा रही थी, न लेट पा रही थी. 2 घंटे के काम में 2 दिन तो बरबाद हो चुके थे और जाने कितने दिन अभी और लगने हैं. जय प्रजातंत्र, जय सरकारी तंत्र.

रेखा खंडेलवाल    

कहीं ये तो नही आपके शाइनी बालों के खराब होने का कारण

डेली लाइफस्टाइल में हम अपने बालों पर कईं एक्सपैरिमेंट करते हैं, जो हमारे बालों को खराब कर देता है. पर कभी-कभी हमें पता नही होता की ऐसी कौनसी चीज हम इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे हमारे बाल रूखे और बेजान बन जाते हैं. इसलिए आज हम आपको डेली लाइफल्टाइल में बालों पर इस्तेमाल होने वाले कुछ ऐसी चीजों के बारे में बताएंगे, जो हमारे बालों को नुकसान पहुंचा रहे हैं.

1. हीट स्टाइलिंग से बालों को होता है नुकसान

ब्लो ड्राइंग और स्ट्रेटनिंग आपके बालों की नेचुरल शाइन को कम करते हैं. हीट स्टाइल ट्राइकोरेक्सिस नोडोसा बालों के टूटने का एक आम रूप बनता है. अगर आप बालों को शाइनी और हेल्दी बनाए रखना चाहते हैं, तो रोज हेयर ड्रायर का इस्तेमाल करने से बचने की कोशिश और अगर आपको हीट स्टाइल करना जरूरी है तो हीट स्टाइल करने से पहले हीट प्रोटेक्टेंट जरूर लगाएं.

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2. बालों की शाइन के लिए डैंड्रफ भी है जिम्मेदार

बालों की शाइन के लिए डैंड्रफ भी जिम्मेदार होता है, यह आपके बालों की शाइम को कम करता चला जाता है. इसलिए अगर आपके बौलें में भी डैंड्रफ है तो इस प्रौब्लम को जल्द ठीक करने की जरूरत है, वरना आपके बाल ड्राई और उनकी शाइन खत्म हो सकती है.

3. धूप का भी बालों पर पड़ता है असर

बालों पर सीधी यूवी रेज का संपर्क उसके नेचुरल कलर को फीका कर सकता है. इसके अलावा, यह आपके बालों के कमजोर होने का कारण भी बन सकता है. यूवी रेज भी बालों से नेचुरल नमी निकाल देती है. शाइनी बाल को बनाएं रखने के लिए नहाने से पहले हेयर कंडीशनर का इस्तेमाल जरूर करें.

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4. हेयर डाई से रहें दूर

हेयर डाई का ज्यादा इस्तेमाल आपके शाइनी बालों के लिए बुरा होता है. जब बालों को ब्लीच किया जाता है तो ये शाइनी नहीं दिखते. शाइनी बालों को बनाए रखने के लिए, अल्कोहल वाले प्रोडक्ट्स का उपयोग करने से बचें क्योंकि यह बालों पर हार्श बनाने के साथ-साथ खराब कर देते हैं.

5. शाइनी बालों को अन हेल्दी खाना पहुंचाता है नुकसान

हेल्दी और शाइनी बालों के लिए पोषक तत्वों वाले खाद्य पदार्थो को खाना सेवन करना आवश्यक होता है. शाइनी बालों को बनाए रखने के लिए हमेशा प्रोटीन से भरपूर चीजों को खाना चाहिए.

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