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एक लड़का मेरे ईमेल से जानकारी एकत्र कर मुझे और मेरे परिवार को परेशान कर रहा है, क्या करूं?

सवाल

मेरी उम्र 26 साल है. मेरा एक दोस्त था जिसे मैं कुछ ही समय से जानती थी. वह लड़का मेरा बहुत करीबी नहीं था लेकिन ठीकठाक दोस्त था. मुझे समझ नहीं आता कि कौन सी बेवकूफी मेरे दिमाग पर छाई हुई थी जो मैं ने उसे अपने ईमेल अकाउंट का पासवर्ड दे दिया. अब वह लड़का मेरे ईमेल से मेरी बाकी सभी जानकारी एकत्र कर मुझे और मेरे परिवार को परेशान कर रहा है. मुझे समझ नहीं आ रहा कि इस स्थिति में मैं क्या करूं?

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जवाब

घरपरिवार को भी अपने किसी पर्सनल अकाउंट का पासवर्ड नहीं देना चाहिए. आप ने बाहरी व्यक्ति को अपना पासवर्ड दे दिया. तो सब से पहले आप अपना पासवर्ड चेंज कर लें. चेंज करने के लिए ईमेल पर यूजरनेम लिखें और ‘फोरगेट पासवर्ड’ पर क्लिक करें. आप से मोबाइल नंबर मांगा जाएगा. अपना मोबाइल नंबर लिख दें. आप के मोबाइल पर ओटीपी नंबर आएगा, उसे साइट पर लिख दें. फिर अपना नया पासवर्ड लिखें. आप का पासवर्ड चेंज हो जाएगा.

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उस के बाद अपने परिवार से बात करें. उन्हें सबकुछ सचसच बता दें. अगर कोई भी पर्सनल बात यदि उस ने परिवार को बता दिया है, तो आप उस बात को ले कर घरवालों को कन्विंस करें कि जो भी उस ने बताया है वह गलत है. उस ने सच भी बताया है तो घरवालों के सामने यह स्वीकार भी करें. निश्चिततौर पर आप के मातापिता या भाईबहन जो भी परिवार में हों इस बात को समझेंगे. आगे से कभी भी अपना पासवर्ड किसी को न बताएं, इस बात का खयाल रखें.

दुखी दोस्त से कभी न कहें ये 4 बातें

जब आपकी कोई दोस्त किसी दुख से गुजर रही है या उदास है तो आपको उनसे बात करते वक्त बहुत सी चीजों का ध्यान रखना जरूरी होता है. इस बात का विशेष रूप से आपको ध्यान रखना होगा कि आप उन्हें कोई ऐसी बात ना बोल दें जिससे उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचें.

आपको उन्हें उस दुख से उबरने में मदद करनी चाहिए ना कि कोई ऐसी बात बोलनी चाहिए जिससे उन्हें अपने दुख से जुड़े बातों की याद आ जाए. आइए जानते हैं कि जब आपकी दोस्त दुखी हो तो आपको किन बातों की ध्यान रखने की जरूरत होती है.

  1. किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे बताना –  यह बात बोलना अच्छा होता है, लेकिन जब आपकी दोस्त किसी दुख में हो और अगर आप उससे ऐसा बोलेंगे कि किसी चीज की जरूरत पड़े तो मुझे बताना. वास्तव में वे ऐसा बिल्कुल भी नहीं करेंगी. ये बात बिना कहें आप अपने मित्र की सहायता के लिए आगे  बढ़े और फिर पूरी तरह से उनकी मदद करने की कोशिश करें.

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2. आप बहुत हिम्मती हो –  जब आपकी दोस्त दुखी हो या अकेला महसूस कर रही हो, तो वैसी स्थिति में आपको ये बात बिल्कुल भी नहीं कहनी चाहिए कि तुम बहुत हिम्मती हो और तुम इस परिस्थिति का सामना बहुत आसानी से कर सकती हो. यह उनके दुख को कम करने के बजाय और बढ़ा सकता है. उन्हें इस बात का विश्वास दिलाना चाहिए कि आप उनके साथ हैं.

3. उसने अपनी जिंदगी को जिया – आपको यह बात कभी भी नहीं कहनी चाहिए की उसने अपनी जिंदगी जी ली थी या ये कि जिसे जब जाना होता है वो चला जाता है. यह बात उनको दुख से उबरने की जगह और दुखी कर देगा. उन्हें बार-बार उस इंसान की याद आएगी जो उनसे हमेशा के लिए दूर हो गया हो.

4. मैं समझ सकती हूं तुम्हे कैसा महसूस हो रहा है – जब आपका दोस्त अपने किसी करीबी को खो देते हैं तो आपको उनसे ये बात नहीं बोलनी चाहिए कि मैं तुम्हारे दुख को समझ सकती हूं क्योंकि इससे ऐसा लगेगा कि आप दिखावा कर रही हैं. ऐसा करना शायद आपके दोस्त के दुख को कम करने के बजाय और बढ़ा सकता है.

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गुरु पूर्णिमा: लूट खसोट का पर्व!

देश भर में गुरु पूर्णिमा का पर्व धूमधाम से मना, चेलों ने खूब खिलाया और छुटभैयों से लेकर ब्रांडेड गुरुओं तक ने छक कर खाया. एक दिन में ही साल भर के राशन पानी का इंतजाम हो गया. खूब नकदी मिली. वस्त्राभूषण भी मिले और पूजा पाठ हुई सो अलग. कई अति श्रद्धालु शिष्यों ने तो बिना बैक्टीरिया वायरस की परवाह किए गुरु के चरण धोकर पानी पिया जिसे चरणामृत कहा जाता है.

श्रद्धा चीज ही ऐसी है कि जिसके आगे तर्क नतमस्तक हो जाते हैं. अब अगर जीवन में एक अदद गुरु न हो तो वह जीवन कीड़े मकोड़ों जैसे लगता है. सो खुद को मानवमात्र दिखाने का सबसे अहम किरदार है गुरु. गुरु न हो तो जीवन व्यर्थ है जो गुरु हीन हैं वे ही श्री हीन और पशुवत भी हैं. उनका होना न होना एक समान है. इधर 2 दिन गुरु महिमा प्रवाहित होती रही लोग एक दूसरे को शुभकामनाओं के जरिये यह सोचते उकसाते रहे कि कहीं ऐसा न हो कि मैं तो अपने गुरु को तगड़ी दक्षिणा चढ़ाकर बेबकूफ बन जाऊ और अगला बीमारी का बहाना बनाकर कल्टी मार जाये, इसलिए उसे एक बार फिर गुरु महिमा से अवगत करा दिया जाए कि साल भर जो गुरु के आशीर्वाद से कमाया है आज उसका कमीशन देना है.

गुरु पूर्णिमा पर मैं हर साल की तरह इस बार भी विकट की ग्लानि और अपराध बोध से ग्रस्त था क्योंकि मैं खानदानी और पैदाइशी गुरुहीन हूं. जो मिला उसने पूछा, अरे गुरु जी के यहां नहीं गए ? इस सवाल का जबाब ढूंढ़ते ढूंढ़ते 55 वसंत निकल गए कि मेरा कोई गुरु क्यों नहीं है. एक वो दत्तात्रेय था जिसने दर्जनों गुरु बनाए लेकिन इसके बाद भी उसका जी नहीं भरा और एक मैं हूं बिलकुल निकृष्ट प्राणी जिसने दो तिहाई जिंदगी बिना गुरु के गुजार दी. कभी किसी को अपनी गाढ़ी कमाई का धेला भी नहीं दिया लोग मुझे कंजूस कहकर गलत नहीं धिककारते.

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हर साल सोचता हूं और फिर भूल जाता हूं कि इस साल एक गुरु कर ही लूंगा जिसके बगैर ज्ञान, अज्ञान, विज्ञान सब अधूरा है. कौन 11रु से लेकर 11 लाख तक की दक्षिणा या वसूली कुछ भी कह लें लेकर मेरे कष्ट अपने सर लेगा और क्या अपने पापों की गठरी मैं ढो पाऊंगा. श्रद्धा की उस न्यूनतम सीमा तक मैं कभी नहीं पहुंच पाया कि खुद को पापी मानते किसी महान विभूति को अपना शिष्यत्व सौंप दूँ ठीक वैसे ही जैसे बहुत पुराने जमाने में पत्नियां पति को अपना कौमार्य अर्पित कर बेफिक्र हो जातीं थीं कि अब इस धरोहर को संभालने की

जिम्मेदारी इस परमेश्वर की है. अभी एक मित्र सपत्नीक मिले सीधे हरिद्वार से वापस आ रहे थे, बड़े रोमांचित थे. वे बोले आनंद आ गया, इस साल बड़ा अच्छा गुरु पूजन हुआ, बहुत भीड़ थी हमारे गुरु जी के तो देश विदेश में लाखों शिष्य हैं फिर भी अलग से मुझ से मिले और मुझे विशेष आशीर्वाद दिया .

ऐसे ही मौकों पर मैं बेकाबू हो जाता हूं सो लाख रोकने पर भी मुंह से निकल ही पड़ा कि कितने का पड़ा यह विशेष आशीर्वाद. अब वे मेरे मित्र नहीं रहे हालांकि शत्रु भी नहीं हो गए. लेकिन जैसे भी थे सम्बन्धों में स्थायी खटास तो पड़ ही गई क्योंकि मैंने बेशकीमती आशीर्वाद की कीमत पूछने की हिमाकत और जुर्रत जो कर डाली थी. उनकी आस्था पर चोट करने का अपराध तो हो ही गया था तब मुझे समझ आया कि ऐसे ही जाने अनजाने में हुए गुनाहों से मुक्ति दिलाने गुरु जरूरी होता है.

इस गलती का प्रायश्चित करने मैं व्हाट्सएप खोल कर बैठ गया वहां भी गुरु ही गुरु दिख रहे थे . गुरु की महिमा बखान करते लोग तरह तरह के संस्कृत के श्लोक प्रवाहित कर रहे थे. जिनमें सबसे चलाऊ था गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु ….. कई पोस्टों में शिष्य गुरु के चरणों में लोटा था. यह सब देखकर मैं खामखां भावुक हो गया कि क्यों मैं इस पवित्र रिश्ते को दक्षिणा के पैसों से तौलता हूं. यह तो श्रद्धा, आस्था, भाव और भावना का संबंध है, जन्म जन्मांतर का है. आत्मा परमात्मा का है. फिर सोचने में आ ही गया, जब निस्वार्थ है तो इसमें अर्थ क्यों, इसके आगे श्रुति और स्मृति के आधार पर मन में सवाल भी फूटने लगे कि गुरु अक्सर ब्राह्मण ही क्यों होता है और बिना चढ़ावे के गुरु पूर्णिमा पूर्ण क्यों नहीं सम्पन्न होती. क्यों आदमी आदमी को पूजता है.

कोई भी कह सकता है कि चढ़ावा कोई शर्त नहीं वह तो एक रिवाज है, श्रद्धा प्रगट करने का तरीका है. कोई गुरु पैसा नहीं मांगता या चाहता. वह तो बस शिष्यों का कल्याण चाहता है और रही बात व्यक्ति पूजन की तो वह भी स्वभाविक है गुरु का दर्जा तो शास्त्रों में भगवान से भी ऊपर बताया गया है. खुद सूफी संत कबीर कह गए हैं कि गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय… बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय…

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गुरुमय माहौल से खुद को बचाते मैंने गुरु द्रोणाचार्य का स्मरण किया जिन्होंने गरीब आदिवासी एकलव्य का अंगूठा ही गुरु दक्षिणा में ले लिया था. वह भी उस सूरत में जब उन्होंने नीची जाति वाले इस युवक को दीक्षा भी नहीं दी थी. ऐसे कई प्रसंगों से महसूस हुआ कि गुरु पूर्णिमा का आविष्कार सिर्फ दान दक्षिणा झटकने के लिए ही हुआ है और अगर आप गरीब या फिर नास्तिक हैं तो किसी गुरु की आपको जरूरत नहीं आपकी जरूरतें ही आपकी गुरु हैं.

आदमी होते हुए आदमी के सामने झुकना उसका पूजा पाठ करना, उसके पैर धोकर पानी पीना, अपनी मेहनत की कमाई उसे चढ़ा देना ये सब हीनता और पिछड़ेपन के निशानियां हैं. असभ्यता के प्रतीक चिन्ह हैं. इनसे बचना और बचाना जरूरी है. सोशल मीडिया लाख अंधविश्वासों का अड्डा सही लेकिन इसी प्लेटफार्म पर कई सलीके के लोग भी मिल जाते हैं. जो गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर भी कह रहे हैं कि मेरी असली गुरु तो पड़ोसन है जिसमें गुरुत्वाकर्षण है, पत्नी ही आदमी की सबसे बड़ी गुरु होती है उसके बाद किसी ज्ञान की जरूरत नहीं रह जाती.

हौस्टल और कालेज के उन गुरुओं को भी प्रणाम जिन्होंने लड़की पटाना और पेग बनाना सिखाया. उन्हें भी गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएं…

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हिंदी फिल्मों की चाहत मुझे मुंबई वापस ले आयी: संयोगिता मायर

‘‘कलर्स’’चैनल पर हर शनीवार और रवीवार प्रसारित हो रहे सीरियल‘‘कवच 2’’में अंगद की बहन शोभा के किरदार में नजर आ रही अभिनेत्री संयोगिता मायर कोई नई अदाकारा नहीं है. भोपाल निवासी संयोगिता मायर ने 2001 में मुंबई में कदम रखा था. 2001 से 2009 के बीच उन्होने‘‘कर्म अपना अपना’’सहित कई सीरियलों के अलावा तेलगू, तमिल व कन्नड़ फिल्मों में अभिनय किया. उसके बाद एकता कपूर ने उन्हें सीरियल ‘‘पवित्र रिश्ता’’ का आफर दिया था. मगर संयोगिता ने इस आफर को ठुकरा कर लंदन निवासी अंग्रेज के साथ शादी कर 2009 में लंदन चली गयी. दो बेटियों की मां बनने तथा लंदन में कुछ काम करने के बाद 2017 में वह वापस मुंबई लौट आयी. तब से वह लगातार टीवी इंडस्ट्री में कार्यरत हैं.

प्रस्तुत है संयोगिता मायर से हुई एक्सक्लूसिव बातचीत, जिसमें उनके संघर्ष व बौलीवुड मे शोषण की भी कहानी निहित है.

अपनी अब तक की यात्रा को किस तरह से देखती हैं?

मेरी अब तक की यात्रा बहुत संघर्षमय रही है. हम मूलतः भोपाल के रहने वाले हैं. मेरे नाना जी किसान होने के साथ ही मशहूर लेखक हैं. मेरी मां शोभा माहेश्वरी और मेरे पिता दोनों वकील हैं. हम तीन बहने हैं. मैं दूसरे नंबर पर हूं. हमारी शिक्षा भोपाल में ही हुई. जब मैं 9 वीं कक्षा में पढ़ रही थी, तभी मेरे मम्मी पापा में तलाक हो गया. हम तीनों बहनें अपनी मम्मी के साथ रहते आए हैं. घर के माहौल को देखते हुए हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद फिल्मों में काम करने के मकसद से 16 वर्ष की उम्र में मैं मुंबई चली आयी.

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इतनी छोटी उम्र में अभिनय के क्षेत्र में करियर बनाने का ख्याल कैसे आया?

सच यह है कि बचपन में मैं पुलिस अफसर बनना चाहती थी. लेकिन बचपन से ही मुझे टीवी देखने का शौक रहा है. मैं टीवी पर प्रसारित होने वाले डांस कार्यक्रम ज्यादा देखती थी. और उन्हें देखते हुए मैं खुद डांस किया करती थी. अब मैं खुद को बेहतरीन डांसर मानती हूं. पर मैंने डांस की कोई ट्रेनिंग नहीं ली. मैं कई तरह के डांस कर सकती हूं.लेकिन माता पिता के बीच हुए तलाक के बाद बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ, जिसने मुझे अभिनय की तरफ मुड़ने के लिए प्रेरित किया. 2001 में मुंबई पहुंचकर मैंने आशा चंद्रा के एक्टिंग स्कूल से अभिनय की ट्रेनिंग ली. पर इससे कोई फायदा नही हुआ.उस वक्त टीवी चैनल ज्यादा नहीं थे. ‘जीटीवी’,‘स्टार प्लस’ और ‘सोनी टीवी’ के अलावा ‘डीडी वन’ और ‘डी डी 2’थे. जबकि मेरे दिमाग में था कि मुझे टीवी नहीं, सिर्फ फिल्में करनी हैं. फिल्मों के लिए संघर्ष शुरू किया सुधाकर बोकाड़े, सावन कुमार टाक सहित कुछ निर्माता निर्देशकों के साथ बुरे अनुभव भी रहे. कौस्टिंग कौउच का भी अनुभव हुआ. पर मैं अपने आपको बचाने में सफल रही. सुधाकर बोकाड़े मुझे हीरोइन और फरदीन खान को हीरो लेकर फिल्म बनाने वाले थे. फरदीन खान की भी यह पहली फिल्म थी. पर मैंने सुधाकर बोकाड़े की कुछ मांगे पूरी नही की, तो उन्होंने मुझे फिल्म से निकाल दिया. सावन कुमार टाक एक पाकिस्तानी कहानी पर फिल्म बना रहे थे, इसमें उन्होंने मुझे मेन लीड के सपने दिखाए और फिर वही हाल हुआ. मुझे फिल्म से बाहर होना पड़ा. बाद में उन्होंने फिल्म को बनाया था, पर फिल्म चली नहीं थी. एक तरफ मुझे फिल्में मिल नही रही थी. दूसरी तरफ मेरे पास टीवी सीरियल के औफर बहुत आ रहे थे. पर मेरे दिमाग में फिल्म हीरोइन बनने का भूत सवार था. जबकि हालात बद से बदतर होते जा रहे थे. अंततः मुझे ज्यूनियर आर्टिस्ट के रूप में अपने करियर की षुरूआत टीवी सीरियल‘‘धड़कन’’से करनी पड़ी. सोनी पर प्रसारित सीरियल ‘‘धड़कन’’ में मैंने ज्यूनियर आर्टिस्ट के रूप में आठ माह तक काम किया.

600 रूपए रूपए प्रतिदिन के हिसाब से मुझे पैसे मिलते थे. सच तो यह है कि जब मैं सीरियल ‘धड़कन’के सेट पर पहुंची और नर्स की पोशाक पहनकर तैयार हुई, तब मुझे पता चला कि मुझे यह किरदार जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर मिला है. जेब में पैसे थे नहीं, मजबूरी में मुझे काम करना पड़ा. पूरे आठ माह के दौरान मेरे सामने बौलीवुड की तमाम असलियत सामने आती रही. मुझे पता चला कि कलाकारों के साथ किस तरह भेदभाव होता है?

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किस तरह की गंदी राजनीति होती है? बहुत अच्छे अनुभव मिले. ‘धड़कन’में जयति भाटिया सहित कई दिग्गज कलाकार थे, जिनसे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला. मुझे लिखने का भी शौक था.तो मैंने जी स्माइल के कौमेडी शो के लिए कुछ एपीसोड लिखे, कुछ एपीसोड में अभिनय भी किया. इसके बाद मुझे दक्षिण भारत में फिल्मों के औफर मिले. पहली तेलगू फिल्म ‘‘वीरी वीरी गुमाड़ी’’ बिना दिक्कत के मिल गयी. प्रचार भी हो गया. मैं इस फिल्म में लीड रोल में थी,पर फिर बाद में वही कौस्टिंग कौउच का मसला सामने आ गया. जिसके चलते मेरा किरदार बदलकर मेन लीड से सेकंड लीड हो गया. इसमें मैंने गांव की लड़की का किरदार निभाया था. लोगों को मेरा किरदार बहुत पसंद आया. उसके बाद मैंने करीबन 10 दक्षिण भारतीय फिल्मों में अभिनय किया. इस बीच मैं हैदराबाद में ही रहने लगी थी.दक्षिण में काम अच्छा मिल रहा था.

लेकिन कुछ समय बाद मुझे मुंबई व हिंदी फिल्मों की चाहत वापस मुझे मुंबई ले आयी. मुंबई में यह मेरी दूसरी पारी थी और मुझे फिर से शून्य से शुरूआत करनी पड़ी.

मुंबई में अभिनय की दूसरी पारी की शुरूआत कैसे हुई?

मैं एक दिन काफी डे में बैठी हुई थी. उन दिनों एकता कपूर ‘नाइन एक्स’ के लिए सीरियल ‘‘महाभारत’’ बना रही थी, जिसमें अनीता हसनदानी वगैरह थी. वहीं काफी डे में ‘बालाजी टेली फिल्मस’के क्रिएटिव डायरेक्टर मुझसे मिले. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं ‘बालाजी टेलीफिल्मस’में जाकर औडीशन दे दूं. मैंने औडीशन दिया और द्रौपदी के किरदार के लिए मेरा चयन हो गया. पर फिर किस्मत ने धोखा दे दिया. एक दिन एकता कपूर ने बताया कि वह मुझे महाभारत सीरियल के बजाए टीवी का रियालिटी शो ‘‘टिकट टू बौलीवुड’’ दे रही हैं. इसमें मुझे न्यू कमर के रूप में चेतन हंसराज के अपोजिट रखा गया था. जिसकी मैं सेकंड विनर थी. इस शो के दौरान ही शोभा कपूर ने मुझे सीरियल ‘कर्म अपना अपना’ में अभिनय करने का मौका दे दिया. इसमें मेरा किरदार नगेटिव था. इसके बाद एकता कपूर ने सीरियल ‘कितनी मोहब्बतें हैं’ में अभिनय करने का मौका दिया. इसमें मैंने करण कुंद्रा के साथ काम किया. उसके बाद मुझे एकता कपूर ने ‘‘पवित्र रिश्ता’’ में अभिनय करने का मौका दिया. एकता कपूर के अनुसार यह उनका महत्वाकांक्षी सीरियल था. लेकिन मैं मुंबई में संघर्ष करते हुए थक चुकी थी. मेरे मन में आया कि शादी करके मुझे अपना घर बसा लेना चाहिए. उन दिनों मैं शम्मी कपूर अंकल के बहुत करीब थी. हम हर रवीवार को उनके घर पर ‘फोकर’ नामक कार्ड का गेम खेलते थे. हमारा शम्मी कपूर जी, डिंपल कापड़िया, अरमान कोहली, सिंपल कापड़िया का एक ग्रुप था. हर रविवार को हम लोग शम्मी अंकल के घर जाकर यह गेम खेलते थे. शम्मी जी अपने अनुभव बताया करते थे. हमारे बीच बहुत बातें हुआ करतीं थी. वह मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहते थे कि सभी को संघर्ष करना पड़ता है.

एक दिन मैंने शम्मी अंकल से कहा कि एकता कपूर ने सीरियल ‘‘पवित्र रिश्ता’’ का औफर दिया है. पर मैं चाहती हूं कि शादी करके सेटल हो जाउं. शम्मी अंकल व डिंपल कापड़िया ने मुझे सलाह दी कि मुझे सेटल हो जाना चाहिए और मैंने शादी कर ली. शादी करके मैं पति के साथ लंदन चली गयी. मैं दो बेटी की मां बनी..पर फिर भारत की याद और अभिनय के कीड़ा के चलते 2017 में मुंबई वापस आ गयी.

आपके पति ने दोबारा करियर शुरू करने के लिए भारत लौटने की इजाजत आसानी से दे दी?

जी हां! क्योंकि उन्हें यह पता था कि मैंने उस वक्त सारा काम छोड़कर उनके साथ शादी की थी, जब मेरा करियर उंचाई पर था. मैने शादी करने के लिए ‘‘पवित्र रिश्ता’’ जैसा बड़ा सीरियल करने का मौका छोड़ दिया था. मैं एक अभिनेत्री के साथ साथ घरेलू लड़की भी हूं. अफसोस की बात यह है कि लंदन से वापस आने के बाद उन अभिनेत्रियों ने मुझ पर ताने कसे जिनकी कभी मैंने बहुत मदद की थी.

पर मैं खुश हूं कि मैं अपनी जिंदगी में सैटल हूं. शादीशुदा हूं. दो बच्चे हैं. अब फिर से मेरे अभिनय करियर ने भी गति पकड़ ली है. अभिनय के लिए उम्र की बंदिश नहीं होती.

लंदन में रहते हुए सात साल अपने क्या किया?

सबसे पहला काम तो मैं अपने बच्चों को अच्छी परवरिश देने की कोशिश कर रही थी. इसके अलावा मैंने वहां पर प्रेगनेंसी के दौरान भी मौडलिंग की. कुछ ऐड किए. मैंने बीबीसी लंदन में एक अंग्रेजी सीरियल ‘साइलेंट’ में अभिनय किया. कुछ विज्ञापन किए. इसके अलावा ब्रिटिश निर्देशक सारा जोन्स के साथ बतौर सहायक काम किया. बच्चों की परवरिश, उनकी देखभाल के साथ साथ मैं कुछ न कुछ काम जरूर कर रही थी.

लंदन से मुंबई पहुंचते ही पुराने संबंधों के चलते काम आसानी से मिल गया होगा?

जी नहीं! जब मैं यहां पहुंची, तो बहुत कुछ बदल चुका था. मुंबई में जगह जगह मौल्स खड़े हो चुके थे. सड़कें बदल चुकी थीं.ढेर सारे टीवी चैनल्स आ गए थे. डिजिटल मीडियम आ गया था. मल्टीप्लैक्स खड़े हो चुके थे.फिल्में बहुत बनने लगी थीं.जिन्हें मैं जानती थी, उनकी पोजीशन बदल चुकी थी.

जब मैं एक पुराने कास्टिंग डायरेक्टर के पास पहुंची,तो उसने कहा कि आप जिस पोशाक में आयी हैं, उसमें आपको काम नहीं मिलेगा. उसने मुझे दिन भर अपने आफिस में बैठाकर दिखाया कि अब लड़कियां किस तरह की पोशाकें पहनकर औडीशन देने आती हैं. मैंने पाया कि जो लड़कियां औडीशन देने आ रही थीं, उनमें अभिनय प्रतिभा नहीं थी, लेकिन वह जिस तरह की पोशाकें पहन कर औडीशन देने आयी थीं, उससे मैं सकते में आ गयी. मैंने पाया कि अब शो बाजी हो गयी है. फिर मैंने अपना वजन कम किया. विपश्यना करने चली गयी.

लंदन से वापसी के बाद पहला सीरियल कौन सा मिला?

विपश्यना से वापस आने के बाद मुझे ‘शोभना देसाई प्रोडकशन’ के सीरियल ‘‘कुलदीपक’’ में अभिनय करने का मौका मिला, जिसमें अच्छा किरदार था. यह ‘एंड’टीवी पर प्रसारित हुआ. मैंने दोनों बेटियों और पति को मुंबई बुला लिया. दुर्भाग्यवश पांच माह बाद सीरियल बंद हो गया. मेरी पारिश्रमिक राशि भी नहीं मिली. मजबूरन मुझे अपने पति व बच्चों को वापस लंदन भेजना पड़ा. उसके बाद मेरे पास बुआ सास,चाची के ही किरदार आ रहे थे, जो कि मैं करना नहीं चाह रही थी. मैंने कुछ लोगों से कहा भी और सोचा भी यदि सिर्फ पैसा कमाना होता, तो मैं लंदन में रह कर कमा सकती थी. मैं पाउंड छोड़कर रूपए कमाने के लिए ऐरागैरा काम करने थोड़ी आयी हूं.मैं ऐसा काम करना चाहती हूं, जिसे करने का मुझे गर्व हो. मुझे लगे कि मैंने अपनी बेटियों और पारिवार के लिए जो त्याग किया है, उसके बदले मैंने बड़ा अच्छा काम किया है. पूरे डेढ़ साल के संघर्ष व इंतजार के बाद मुझे एकता कपूर निर्मित सीरियल ‘कवच 2’’में अभिनय करने  का मौका मिला. जो कि 25 मई से ‘कलर्स’ चैनल पर हर शनिवार व रवीवार को प्रसारित होता है. शूटिंग शुरू हुए अभी डेढ़ माह ही हुए हैं. जबकि अब तक छ: एपीसोड प्रसारित हुए हैं. अब लगता है जिंदगी बदल जाएगी.

सीरियल ‘‘कवच 2’’ के किरदार को लेकर क्या कहेंगी?

सीरियल कवच 2 में मैंने शोभा का किरदार निभाया हैं. शोभा इसमें अंगद यानी कि नमित पाल की बहन है. दो हफ्ते बाद मेरा सीरियल में लव ट्रैक शुरू हो जाएगा. अभी तक तो 6 एपीसोड ही प्रसारित हुए हैं. मैं यह कह सकती हूं कि यह एक अच्छा सीरियल है. मुझे एक बहुत अच्छा किरदार निभाने का अवसर मिला है.

इस सीरियल से आपको कितनी उम्मीदें हैं?

यह हफ्ते में दो दिन प्रसारित होता है. इसका हर एपीसोड एक घंटे का है. इसके लिए हमें हर सप्ताह कम से कम पांच दिन शूटिंग करनी पड़ती है. सीरियल अभी शुरू हुआ है. इसलिए इसके साथ कोई दूसरा सीरियल भी नही कर सकती हूं. बीच में मौका मिलने पर एक दो विज्ञापन फिल्में की हैं. फिर हमें बताया गया है कि लव ट्रैक शुरू होने के बाद हमारे सीन और बढ़ जाएंगे.

लिखने का शौक रहा है, तो लंदन में कुछ लिखा नहीं?

लिखना तो बंद नही हुआ. अपने अनुभव लिखती रही. अनुभवों पर कहानी लिखी. मैं तो अपनी जिंदगी के संघर्ष को लेकर एक फिल्म बनाना चाहती हूं. मैंने कविताएं बहुत लिखी हैं. लंदन में हमें अपना काम खुद करना होता है. तो दो बच्चों को पालते हुए नियमित लेखन तो संभव नहीं था. पति के लिए भी समय पर खाना बनाकर देना ही पड़ता था. पर कविताएं तो मैं आज भी लिखती हूं. लेखन मुझे विरासत में मिला है. मेरे नाना मदन गोपाल चांडा की कई किताबें छप चुकी हैं. हम लोग मध्यप्रदेश के मारवाड़ी हैं. मेरे नाना जी किसान थे, फिर भी उन्होंने तमाम किताबें लिखी. कविताएं भी लिखी थी. मेरी मां शोभा माहेश्वरी भी कविताएं लिखती हैं. मेरी कविताओं वाली कुछ डायरी भोपाल में पड़ी हुई हैं. कुछ डायरीयां लंदन में पड़ी हैं. कुछ मुंबई में हैं. मेरा संघर्ष खत्म नही हुआ है कि मैं शांत दिमाग से इन कविताओं को किताब का रूप देने के बारे में सोच सकूं.

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टैवल टिप्स: यात्रा करते समय रखें इन बातों का ध्यान

किसा भी जगह आप सैर करने जाते हैं तो कुछ बातों का खास ख्याल रखें. हर देश के अलग-अलग कायदे-कानून और रिवाज होते हैं, जिससे यात्री अनजान होते हैं. हालांकि यात्रा पर जाने वाले यात्रियों की यह जिम्मेदारी है कि वह उस जगह के प्राकृतिक पर्यावरण को संरक्षित करने में सहयोग करें.

फीमेलफर्स्ट डॉट को डॉट यूके’ ने जिम्मेदार यात्री बनने के संबंध में कुछ सुझाव दिए हैं :

  • किसी शहर को जानने और उसकी पारंपरिक चीजों से रूबरू होने के लिए वहां के स्थानीय बाजारों से खरीदारी करना अच्छा होगा, इससे स्थानीय दुकानदारों को भी लाभ होगा और आपके पास कुछ प्यारी, अनोखी यादगार चीजें होंगी.
  • स्थानीय होटल में रहने से आप न सिर्फ वहां के पारंपरिक अनुभव से ज्यादा वाकिफ हो पाएंगे, बल्कि स्थानीय व्यवसायियों को भी लाभ पहुंचाएंगे, जो आगंतुकों को उस जगह की खूबसूरती का दीदार कराके अपनी जीविका चलाते हैं.

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  • वाइल्डलाइफ कुछ खास देशों, जगहों को घूमने का एक बड़ा हिस्सा है. वाइल्ड सफारी का लुत्फ उटाने के दौरान इस बात का भी ध्यान रखें कि वन्यजीवों के साथ सेल्फी लेने से वे डर भी सकते हैं. स्थानीय वाइल्डलाइफ और इसके आसपास के परिवेश का आदर करें.
  • जब हम पानी के बिल का भुगतान नहीं करते हैं, तो इसकी अहमियत को नजरअंदाज कर बेहिसाब पानी गिराते हैं और स्थानीय पर्यावरण पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा इस बारे में नहीं सोचते हैं, इसलिए नहाने के समय भी ज्यादा पानी न गिराएं.
  • स्थानीय भाषा की थोड़ी-बहुत जानकारी होना आपके लिए फायदेमंद साबित होगा. इससे आप स्थानीय लोगों से बात कर सकते हैं और आप वहां के लोगों का भरोसा जीत सकते हैं, और आपको कुछ खास इलाकों में जाकर वहां की संस्कृति को अच्छी तरह से समझने में भी मदद मिलेगी.
  • सोच-समझकर तस्वीरें लें और स्थानीय समुदाय के प्रति सम्मान का भाव रखें. इस बात का ध्यान रखें कि आपने स्थानीय लोगों की जो तस्वीरें ली हैं, उससे वे खुश और संतुष्ट हों.

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साथी को मिलाना चाहती हैं दोस्तों से तो अपनाएं ये टिप्स

अगर आप अपने साथी को अपने दोस्तों से मिलाने वाली हैं तो थोड़ा तनाव और चिंता होना तो आम बात है. आप सोचने लगती हैं कि आपके दोस्त आपके साथी को पसंद करेंगे या नहीं, आपका पार्टनर आपके दोस्तों के साथ सहज महसूस करेगा या नहीं, वो एक-दूसरे को पसंद करेंगे या नहीं और कोई गड़बड़ तो नहीं होगी. ये सभी बातें आपको चिंता में डाल सकती हैं. अगर आप भी अपने जीवन के स्पेशल पर्सन को अपने दोस्तों से मिलाने वाली हैं तो ये टिप्स आपके काम आ सकते हैं.

दोस्तों से पहले ही बात कर लें – अपने दोस्तों को अपने पार्टनर के बारे में थोड़ी जानकारी दे दें ताकि वो उससे मिलने के बाद सहज महसूस करें. वह क्या करता है, कौन है, उसे क्या पसंद है, क्या नापसंद आदि बातें अगर वो पहले ही जान लेंगे तो आपके पार्टनर से मिलते वक्त उन्हें अजीब महसूस नहीं होगा और आप इस मुलाकात को आसान बना पाएंगी.

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सही समय चुनें – अपने साथी को अपने दोस्तों से मिलाने के लिए सही समय का चुनाव सबसे जरुरी है. इस बारे में एक बार सोच लें कि क्या इस फैसले को लेकर पूरी तरह तैयार है या नहीं और केवल आप ही नहीं बल्कि आपका साथी भी इस कदम के लिए तैयार है या नहीं.

सही जगह चुनें – बेहतर होगा कि आप इस मुलाकात को अनौपचारिक ना बनाएं और किसी बड़े सेलिब्रेशन की तरह ना समझें. इस मुलाकात को लेकर ज्यादा तनाव या चिंता में ना रहें. किसी सामान्य जगह का चुनाव करें. अगर बात करते वक्त सवाल ज्यादा हो जाएं या फिर बातें उलझने लगें तो किसी ऐसे विषय को उठाएं जिसमें दोनों पक्ष बात करने में दिलचस्पी रखते हो.

परेशानी वाली बातों को अवौइड करें – अगर आपको लगता है कि आपके दोस्तों की कुछ बातें आपके पार्टनर को असहज कर सकती हैं तो उन्हें पहले ही ऐसे किसी भी विषय पर बात करने से मना कर दें. ऐसे किसी भी विषय पर बातचीत ना करें जिससे दोनों पक्ष यानी आपके दोस्त और आपका पार्टनर परेशान हो जाए.

बात करने के लिए कोई कौमन टौपिक चुनें – आप दोनों पक्षों के बीच में एक ब्रिज की तरह है. आप अपने दोस्तों और अपने पार्टनर दोनों के बारे में अच्छे से जानते हैं और उन्हें समझते भी हैं. इसलिये आप पहले से कुछ कौमन टौपिक्स चुन सकते हैं जिन पर आपके दोस्त और आपका साथी दोनों ही बात कर सकें.

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सरकारी इलाज है लाइलाज

हमारे देश में बीमारियों की भरमार है. सरकारी हों या प्राइवेट अस्पताल सब रोगियों से भरे पड़े हैं. तमाम दावों और योजनाओं के बाद भी सरकार मरीजों को सुव्यवस्थित और सस्ता इलाज नहीं दे पा रही है. पैसे वाले तो निजी अस्पतालों  में अपना इलाज करा लेते हैं, पर गरीब जनता सरकारी अस्पतालों में एक अदद बिस्तर के लिए तरस जाती है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का बहुत ही मशहूर अस्पताल लखनऊ मैडिकल कालेज के नाम से जाना जाता है. केवल लखनऊ ही नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश से मरीज यहां आते हैं. मरीज को बेहतर इलाज मिले, इस के लिए यहां पर ट्रौमा सैंटर भी है. यहां इमरजैंसी में मरीजों को भरती कराने के लिए लाया जाता है. कुशीनगर के रहने वाले प्रभु राजभर अपने बेटे बडे़लाल को ले कर आए थे. प्रभु राजभर पिछड़ी जाति के किसान थे. बेटे के इलाज में काफी पैसा पहले ही खर्च हो चुका था.

बडे़लाल का 3 महीने पहले ऐक्सिडैंट हुआ था. उसे ट्रौमा सैंटर में भरती कराया गया था. न्यूरो सर्जरी विभाग में उस का इलाज चला. 3 महीने से वह कोमा में है. ट्रौमा सैंटर में औपरेशन करने के बाद डाक्टरों ने उस की छुट्टी कर दी. डाक्टरों ने कहा कि धीरेधीरे उस को होश आएगा. घरवाले उसे ले कर वापस चले गए. घर पहुंचने के बाद बडे़लाल की तबीयत सुधरने के बजाय बिगड़ने लगी. तब घरवाले उसे वापस ले कर मैडिकल कालेज के ट्रौमा सैंटर में आ गए.

रविवार, 16 जून की दोपहर करीब 2 बजे का समय था. प्रभु राजभर अपने बेटे को कंधे का सहारा दे कर भरीदोपहरी में किसी तरह से ट्रौमासैंटर के गेट तक पहुंचे. गेट पर उन को रोक दिया गया. वहां मौजूद जूनियर डाक्टर ने कहा, ‘‘यहां आज मरीज नहीं देखे जा रहे. कल ओपीडी खुलेगी, उस में दिखाना.’’ प्रभु राजभर डाक्टर के सामने हाथ जोड़ कर रोनेगिड़गिड़ाने लगे.

प्रभु राजभर से अपने बेटे के शरीर को संभाला नहीं जा रहा था. उन्होंने बेटे को ट्रौमा सैंटर में ही गाडि़यों की पार्किंग के पास खाली पड़ी थोड़ी सी जगह में खुले में ही लिटा दिया. इस के बाद वे जूनियर डाक्टर से हाथ जोड़ कर बोले, ‘‘डाक्टर साहब, एक बार मेरे बेटे को देख लीजिए, कल हम इस को ओपीडी में दिखा लेंगे. आप की बहुत मेहरबानी होगी.’’ जूनियर डाक्टर ने प्रभु राजभर की बात नहीं सुनी और वह दूसरे तीमारदार को भी बताने लगा कि आज मरीज यहां नहीं देखे जाएंगे.

ट्रौमा सैंटर की स्थापना इस कारण हुई थी कि यहां पर हर वक्त मरीज को इलाज मिल सके. आज यहां प्रभु राजभर जैसे तमाम लोग अपने मरीजों को ले कर भटक रहे थे. ये लोग हर डाक्टर से गुहार लगा चुके थे. प्रभु राजभर के सामने सब से बड़ी दिक्कत यह थी कि वे अकेले ही थे, इन्हें ही अपने बेटे की देखभाल करनी थी और डाक्टर से भी संपर्क करना था. कुछ ही दिनों पहले उन्होंने यहां बेटे के इलाज में लंबा समय गुजारा था. ऐसे में उन्हें यहां के रंगढंग समझ में आ चुके थे.

प्रभु राजभर के बेटे को हर 2-2 घंटे में नाक के जरिए पानी देना पड़ता था और 4-4 घंटे में उस को दाल, फल और सब्जियों का सूप देना पड़ता था. अस्पताल में भरती हो जाता तो कुछ राहत मिल जाती. कम से कम कमरे में छांव, पंखे की हवा और बिस्तर मिल जाता. सड़क पर यह सबकुछ नहीं था.

प्रभु राजभर इधरउधर से खाने का इंतजाम कर के बेटे की सेवा कर रहे थे. धूप और जून माह की गरमीपसीने में डूबे बापबेटे सही माने में मौत का इंतजार करते नजर आ रहे थे कि मौत आए और इस नर्क से छुटकारा दिलाए.

शाम के 4 बज चुके थे. प्रभु राजभर डाक्टरों से गिड़गिड़ा कर हार चुके थे. अब वे थक कर बेटे के पास ही बैठ गए. अब तक धूप थोड़ी दूर जा चुकी थी. टीनशेड की छांव अब राहत देने लगी थी. प्रभु राजभर बेटे को पानी पिलाने के बाद खुद भी वहीं बैठ कर सोमवार को ओपीडी खुलने का इंतजार करने लगे.

ऐसे हालात को देखने के लिए किसी खास दिन की जरूरत नहीं होती है. लखनऊ के ही राम मनोहर लोहिया अस्पताल में ओपीडी का समय 8 बजे सुबह से होता है. दूरदूर से आने वाले लोग सुबह 4 से 5 बजे ही आ कर परचा बनवाने की लाइन में लग जाते हैं. परचा बनवाने का काउंटर खुलते ही लंबी लाइन लगती दिख जाती है.

कईकई बार तो भीड़ में परचा बनवाते समय ही मरीज दम तोड़ देता है. मरीज को अस्पताल दिखाने लाने के लिए कम से कम 2 लोगों का साथ होना जरूरी होता है. आज के समय में मरीज के साथ तीमारदारों की कमी होती है. इस वजह से ज्यादातर लोग प्राइवेट अस्पताल ज्यादा पसंद करते हैं.

लखनऊ के ही गोमतीनगर स्थित मेयो अस्पताल में सोमवार की सुबह 9 बजे गोरखपुर के रहने वाले प्रवीण अपनी मां के साथ आए. मां को पेट में दर्द था. प्रवीण को लोगों ने गोरखपुर के अस्पताल में मां को दिखाने के लिए कहा. प्रवीण को गोरखपुर के अस्पताल का हाल पता था. वे बोले, ‘‘मैं अपनी मां का दर्द नहीं देख सकता. मैं अकेला मां की देखभाल करने वाला हूं, ऐसे में मैं सरकारी अस्पताल में डाक्टरों के चक्कर नहीं लगा सकता हूं. मैं लखनऊ के किसी प्राइवेट अस्पताल में मां का इलाज कराऊंगा.’’ प्रवीण गोरखपुर से ही एंबुलैंस ले कर लखनऊ आए और सीधे मेयो अस्पताल पहुंचे.

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एंबुलैंस के रुकते ही अस्पताल के गेट पर ही उन को एक व्हीलचेयर और एक अटेंडैंट मिल गया. 10 मिनट से भी कम समय में उन का परचा बन गया और फीस जमा हो गई. प्रवीण की मां का रजिस्ट्रेशन हो गया. प्रवीण मां को ले कर डाक्टर के पास गए तो उन्होंने 10 मिनट में ही उन को देख कर उन का अल्ट्रासाउंड कराने के लिए कहा.

अब प्रवीण बस थोड़ाबहुत काम देख रहे थे. जांच से ले कर औपरेशन तक का सारा काम प्रवीण ने अकेले मैनेज कर लिया. यहां प्रवीण को जांच, कमरे और दवाओं के लिए पैसा भले ही जमा कराना पड़ा हो पर वे मां के चेहरे पर मुसकान लाने में सफल रहे. प्रवीण को यह नहीं लगा कि इलाज कितना कठिन है. उन के पैसे भले ही खर्च हुए पर उस को सुकून था कि मां का अच्छा इलाज वे करा सके.

मेयो जैसे प्राइवेट अस्पताल हर शहर में मरीजों को इलाज देने में सफल हैं. इलाज के साथ ही साथ वे मरीज को खुशी भी देते हैं. यही वजह है कि ये अस्पताल तेजी से हर शहर में बढ़ते जा रहे हैं. सरकार किसी भी शहर में सरकारी अस्पतालों की दशा नहीं बदल पा रही है. अस्पताल मरीज के लिए सजा बन गए हैं. जिन लोगों के पास पैसा और भागदौड़ करने वाले लोग नहीं हैं उन की हालत और भी अधिक बदहाल है.

मुद्दा नहीं बनतीं स्वास्थ्य सेवाएं

किसी भी चुनाव में खराब स्वास्थ्य व्यवस्था, नकली अस्पताल, सरकारी अस्पतालों में मरते मरीज चुनाव का मुद्दा नहीं बनते. सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने वालों की संख्या बेहद कम है और इन स्वास्थ्य सेवाओं के लाभ लेने का तरीका बेहद उलझाने वाला है. इस का खमियाजा मरीज को जान दे कर चुकाना पड़ता है.

केंद्रीय स्वास्थ्य अन्वेषण ब्यूरो के 2016 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में जनता कुपोषण, स्वच्छता और संक्रामक रोगों की शिकार हो रही है. पर्यावरण, प्रदूषण, खराब जीवनशैली, शराब का सेवन, धूम्रपान, फैट बढ़ाने वाले भोजन और ऐक्सरसाइज न करने से मधुमेह, हृदयसंबंधी दिक्कतों एवं कैंसर जैसी बीमारियों की तादाद बढ़ी है. शहरी और संपन्न घरों की बीमारियां अब गांव में भी फैल गई हैं. भारत में संक्रामक बीमारियां जैसे तपेदिक, मलेरिया, डेंगू बुखार, चिकनगुनिया, हैजा और डायरिया बढ़ गए हैं.

भारत में बीमारियों से होने वाली कुल मौतों में एकचौथाई मौतें डायरिया, सांस संबंधी दिक्कत, तपेदिक और मलेरिया के कारण होती हैं. इस के अतिरिक्त कई नई बीमारियों, जैसे एड्स आदि के होने का खतरा हमेशा बना रहता है. ग्रामीण और शहरी लोगों की समस्या अलग है.

जहां शहरों में खराब जीवनशैली के चलते हृदय, यकृत व गुरदा रोग असमय ही युवावर्ग को भी बेहद तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रामक बीमारियों का प्रभाव कायम है.

भारतीय आबादी का बड़ा हिस्सा बीमारियों से जूझता है. अस्पतालों में लंबी कतारों के साथ सुविधाओं का अभाव है. देश में अस्पतालों और डाक्टरों की उपलब्धता जनसंख्या के हिसाब से कम है और सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं, चिकित्सकों, कमरों, दवाइयों, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ व दूसरी सुविधाओं की कमी है.

नहीं हैं जरूरी सुविधाएं

अस्पतालों की संख्या बढ़ने के बाद भी स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है. 65 फीसदी जनता को अपनी बीमारी का खर्च खुद उठाना पड़ता है. इस की वजह से भी गरीबी बढ़ रही है. अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं न होने से बीमारी से मरने वालों की संख्या भी बढ़ रही है.

भारत में 7,54,724 बिस्तरों वाले कुल 19,653 सरकारी अस्पताल हैं. इन में ग्रामीण क्षेत्र में 15,818 और शहरी क्षेत्र में 3,835 अस्पताल हैं. यहां डाक्टर, दूसरे स्टाफ  और सुविधाओं का अभाव है.

गांवों में 1,53,655 स्वास्थ्य उपकेंद्र, 25,308 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 5,396 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. इस के बाद भी गांव के लोगों को छोटी से छोटी बीमारी के इलाज के लिए शहर के अस्पतालों में जाना पड़ता है.

यहां भी सरकारी अस्पतालों की बदहाल व्यवस्था के कारण निजी अस्पताल में लोगों को महंगी स्वास्थ्य सेवाओं को लेना पड़ता है.

सरकारी योजनाओं में उन लोगों को ही सुविधाएं दी जा रही हैं जो बीपीएल श्रेणी में आते हैं यानी जिन की आय

72 हजार रुपए सालाना से ज्यादा नहीं होगी यानी करीब 6 हजार रुपए प्रतिमाह. जबकि 10 हजार रुपए प्रति महीने कमाने वाला भी अपनी बीमारी का इलाज कराने में पूरी तरह से असमर्थ है.

भारत सरकार अपनी आयुष्मान योजना का जोरशोर से प्रचार कर रही है. इस के बाद भी अस्पतालों में भटक रहे गरीब बताते हैं कि इस तरह की योजनाओं का लाभ बहुत कम लोगों तक ही पहुंचा है. ऐसे में जरूरी है कि सभी को बेहतर सरकारी इलाज मिले और इस दिशा में काम हो. यह तभी संभव है जब सरकारी अस्पताल पूरी तरह से अपनी क्षमता के हिसाब से काम करें. केवल अस्पताल खोलने और दिखावे के लिए स्वास्थ्य योजनाओं की शुरुआत करने भर से जनता का सही इलाज संभव नहीं हो सकता.

अस्पतालों में प्रशिक्षित स्टाफ और मशीनों का होना जरूरी होता है. सरकारी अस्पतालों में मशीनें तो खरीद भी ली जाती हैं क्योंकि खरीद में ऊपरी कमाई होती है पर पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ  न होने से ये मशीनें धूल खा रही होती हैं और जांच के लिए मरीज इधरउधर धक्के खा रहे होते हैं. 2 वर्षों पहले ही उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के अस्पताल में औक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत का मामला सुर्खियों में था.

अभी भी ऐसे हालात हर सरकारी अस्पताल में बने हुए हैं. सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की बुरी हालत का लाभ प्राइवेट अस्पताल उठा रहे हैं जो प्रशिक्षित न होने के बाद भी विशेषज्ञ होने का दावा कर मरीजों की जान जोखिम में डाल रहे हैं. सब से मजेदार बात यह है कि चुनावों में खराब इलाज की व्यवस्था कभी मुद्दा नहीं बनती है. चुनावों में धर्म, जाति और देशभक्ति के मामले छाए रहते हैं.

सुलभ नहीं सरकारी इलाज

कमोबेश देशभर में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है. उत्तर भारत के राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के हालात सब से अधिक खराब हैं. सरकार जनता को खुश करने के लिए बडे़बडे़ अस्पताल खोलने के नाम पर बड़ीबड़ी बिल्ंिडगें बना रही है. एम्स और पीजीआई जैसे अस्पताल खोलने की होड़ सी लगी है. ये बडे़ अस्पताल मरीजों को जरूरी सुविधाएं नहीं दे पा रहे जिन की वजह से मरीज प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर होते हैं. प्राइवेट में भी 2 तरह के अस्पताल हो गए हैं. अच्छे प्राइवेट अस्पताल बहुत मंहगे हैं वहां इलाज कराना सामान्य मरीज के बस का नहीं होता है. प्राइवेट अस्पताल के नाम पर कुछ ऐसे अस्पताल भी खुले हैं जो स्पैशलिटी का लेबल लगा कर 2 कमरों के अस्पताल में हर इलाज का दावा करते हैं. ऐसे अस्पताल मरीजों की जान से खेल रहे हैं.

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प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों को लाने के लिए भी कमीशन लैवल पर काम किया जाता है. सरकारी अस्पतालों में ऐसे तमाम दलाल घूमते रहते हैं जो वहां आए मरीज को यह बताते हैं कि किस अस्पताल में अच्छा इलाज हो सकता है. इन में सरकारी एंबुलैंस चालकों की मिलीभगत रहती है.

उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के मल्लांवा के रहने वाले 26 साल के शमीम का इलाज वहां चल रहा था. उस की तबीयत खराब हुई तो डाक्टरों ने लखनऊ के सरकारी अस्पताल ले जाने के लिए कहा. शमीम के घरवाले उसे एंबुलैंस से ले कर चले तो एंबुलैंस चालक ने उन को समझाबुझा कर मलिहाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल में भरती करा दिया.

वहां 5 दिनों में इलाज के नाम पर 30 हजार रुपए लिए गए. इस के बाद मरीज को लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल भेज दिया गया. समय पर सही इलाज न मिलने से मरीज की मौत हो गई.

निजी अस्पतालों का बढ़ता दायरा

भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बंगलादेश, चीन, भूटान और श्रीलंका समेत अपने कई पड़ोसी देशों से पीछे है. भारत स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्ता व पहुंच के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है. भारत की गणना स्वास्थ्य सेवाओं पर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी को सब से कम खर्च करने वाले देशों में की जाती है.

भारत स्वास्थ्य सेवाओं में जीडीपी का महज 1.3 प्रतिशत खर्च करता है, जबकि ब्राजील स्वास्थ्य सेवा पर 8.3 प्रतिशत, रूस 7.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका लगभग 8.8 प्रतिशत खर्च करता है. दक्षेस देशों में अफगानिस्तान 8.2 प्रतिशत, मालदीव 13.7 प्रतिशत और नेपाल 5.8 प्रतिशत खर्च करता है. भारत स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने पड़ोसी देशों चीन, बंगलादेश और पाकिस्तान से भी कम खर्च करता है. यहां शायद सरकार पूजापाठ और भभूत को ही इलाज मान कर चलती है.

2015-16 और 2016-17 में स्वास्थ्य बजट में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, लेकिन मंत्रालय से जारी बजट में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के हिस्से में गिरावट आई और यह मात्र 48 प्रतिशत रहा.

परिवार नियोजन का बजट वर्ष 2013-14 और 2016-17 में स्वास्थ्य मंत्रालय के कुल बजट का 2 प्रतिशत रहा.

सरकार की इसी कमी का फायदा निजी चिकित्सा संस्थान उठा रहे हैं. भारत में बड़ी तेज गति से स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण हुआ है. आजादी के समय देश में निजी अस्पतालों की संख्या 8 प्रतिशत थी, जो अब बढ़ कर 93 प्रतिशत हो गई है. वहीं, स्वास्थ्य सेवाओं में निजी निवेश 75 प्रतिशत तक बढ़ गया है.

इन निजी अस्पतालों का लक्ष्य मात्र मुनाफा बटोरना है. दवा निर्माता कंपनियों के साथ सांठगांठ कर के महंगी से महंगी व कम लाभकारी दवा दे कर मरीजों से पैसे ऐंठना इन का रोज का काम है.

नक्कालों की भरमार

लखनऊ की कुरसी रोड पर डाक्टर संतोष का अस्पताल चलता था. बाबुरिया गांव के रहने वाले विमलेश ने 6 माह पहले यानी जनवरी 2019 में अपनी पत्नी सुमन को अस्पताल में भरती कराया था. अस्पताल के मालिक डाक्टर संतोष ने सिजेरियन औपरेशन से सुमन की डिलीवरी कराई और उस से बेटी का जन्म हुआ.

औपरेशन के बाद से ही सुमन के पेट में दर्द रहता था. विमलेश ने जब सुमन के पेट का अल्ट्रासाउंड कराया तो पता चला कि पेट में कौटन का टुकडा औपरेशन के समय छूट गया था. यह जानकारी होने पर विमलेश ने डाक्टर संतोष से संपर्क किया.

अपने को फंसता देख डाक्टर संतोष ने कहा, ‘‘दोबारा सर्जरी कर के उस टुकड़े को निकाल देंगे. इस औपरेशन की कोई फीस भी नहीं लेंगे.’’

11 अप्रैल, 2019 को सुबह विमलेश ने अपनी पत्नी सुमन को अस्पताल में भरती कराया. 13 अप्रैल की रात को डाक्टर ने बताया कि औपरेशन कर के कौटन को बाहर निकाल दिया गया है. इस के बाद सुमन के लगी कैथेटर से लगातार मल निकल रहा था. इस के बाद जब विमेलश ने डाक्टर से शिकायत की तो कहा गया कि सुमन की आंत फट गई है और इस को मैडिकल कालेज ले जाइए. मरीज की हालत बिगड़ने पर विमलेश के परिजनों ने पुलिस को सूचना दी. लखनऊ के गुडंबा थाने की पुलिस आई.

पुलिस को आता देख डाक्टर संतोष अस्पताल से भाग गए. वहां काम कर रहे नर्स और वार्डबौय को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. गुडंबा थाने के इंस्पैक्टर रवींद्र नाथ राय ने बताया, ‘‘विमलेश की सूचना पर पुलिस ने अपने स्तर से काम किया है. अब सीएमओ की तरफ  से जैसी तहरीर आएगी वैसे ही काम किया जाएगा.’’ दूसरी तरफ लखनऊ के सीएमओ नरेंद्र अग्रवाल ने कहा, ‘‘मामला जानकारी में है. अस्पताल का रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाएगा. आगे पुलिस अपना काम करेगी.’’

यह पहली घटना नहीं है. केवल निजी अस्पतालों में ही नहीं, सरकारी अस्पतालों में भी अकसर ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं. सीतापुर जिले के लहरपुर बहरवा के रहने वाले 45 साल के विश्राम को ब्रेन हैम्रेज हुआ. घरवालों ने उन को सीतापुर जिले के जिला अस्पताल में भरती कराया.

अगले दिन हालत नाजुक होने पर जिला अस्पताल के डाक्टरों ने आगे के इलाज के लिए लखनऊ ले जाने को कहा. विश्राम के परिजन लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल और सिविल अस्पताल गए. दोनों ही अस्पतालों में कोई वैंटिलेटर नहीं मिला. आखिरकार विश्राम की मौत हो गई. विश्राम के भाई बद्री ने कहा कि बलरामपुर अस्पताल में वैंटिलेटर खाली था, इस के बाद भी डाक्टरों ने भरती नहीं किया.

अस्पताल के स्टाफ  ने मरीज के साथ गए लोगों से अभद्रता भी की. इस शिकायत को ले कर तीमारदार अस्पताल के अफसरों के पास भी गए, पर वहां कोई सुनवाई नहीं हुई. इस के बाद तीमारदारों ने विश्राम को ले कर लोहिया अस्पताल की ओर रुख किया. लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही विश्राम की सांसें थम गईं.

विश्राम के परिजनों का मानना था कि डाक्टरों की लापरवाही से उन के मरीज की मौत हो गई. इस संबंध में बलरामपुर अस्पताल के निदेशक डाक्टर राजीव लोचन ने बताया, ‘‘वैंटिलेटर चलाने के लिए प्रशिक्षित टैक्नीशियन और स्टाफ  के पदों की स्वीकृति के लिए शासन को मांग भेजी है. वैंटिलेटर चलाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ  न होने की वजह से मरीज को लौटाया गया होगा.’’

आज देश के सरकारी, गैरसरकारी, छोटेबड़े तमाम अस्पताल रोगियों से भरे पड़े हैं. रोगियों की संख्या इतनी है कि उस के मुकाबले अस्पतालों में पलंग नहीं हैं, दवाएं नहीं हैं, सुविधाएं नहीं हैं. सरकारी अस्पतालों में गंभीर रोगी जमीनों पर पड़े हैं. गांवों के अस्पतालों की हालत तो इतनी दयनीय है कि वहां गरीब आदमी का इलाज कैसे होता होगा, यह सोचा भी नहीं जा सकता है.

गांवों में सरकारी अस्पतालों के भवन भूतों के अड्डे नजर आते हैं. जहां मरीजों के साथसाथ कुत्ते, बिल्ली, गाय, भैंस, बकरी, सांड़, सूअर सब आराम फरमाते हैं. टूटेफूटे बिस्तर में खटमल दौड़ते रहते हैं. आसपास खून और घाव के मवाद वाली रुई, प्लास्टर, सीरिंज, नीडल्स और पानी की खाली बोतलें बिखरी रहती हैं. हफ्तों डाक्टर नहीं आते. स्टोर में दवाएं नहीं होतीं.

आज भी कितने गांव हैं जहां लोगों को पता ही नहीं है कि एंबुलैंस सेवा जैसी भी कोई सेवा होती है क्योंकि उन्होंने तो अपने अस्पताल में कभी एंबुलैंस देखी ही नहीं. गांववालों को अपने मरीज को ले कर जाना होता है तो खाट पर उठा कर ले जाते हैं क्योंकि अस्पतालों में स्ट्रैचर नहीं होते. ग्लूकोज चढ़ाने के वास्ते बोतलें लटकाने के लिए स्टैंड नहीं होते.

गांव के सरकारी अस्पतालों में ग्लूकोज की बोतलें छत या खिड़की की छड़ों से लटकी दिखाई देती हैं या मरीजों के रिश्तेदार हाथों में टांगे खड़े नजर आते हैं. आम जनता टैक्स भरती है कि इस के बदले में उसे थोड़ी सी सुविधाएं मिलेंगी. मगर उसे मिलता क्या है?

दरदर भटकते मरीज

बड़े से बडे़ सरकारी अस्पतालों में मरीजों का भरती होना सरल काम नहीं रह गया है. बाराबंकी निवासी जगदंबा प्रसाद के सिर में चोट लग गई. घर के लोग उन को ले कर लखनऊ के लोहिया अस्पताल आए. लोहिया में इमरजैंसी विभाग में इलाज उपलब्ध न होने की बात कह कर उन को मैडिकल कालेज ट्रौमा सैंटर में रैफर कर दिया गया. वहां सीटी स्कैन कर के बताया गया कि यह गंभीर चोट नहीं है, वापस लोहिया अस्पताल ले जाओ.

मरीज के साथ तीमारदार अभी ट्रौमा सैंटर में ही थे कि मरीज की हालत फिर खराब होने लगी. तो वे लोग उस को ले कर लोहिया अस्पताल गए. इस बार भी लोहिया में मरीज को भरती नहीं किया गया. उस को बलरामपुर या मैडिकल कालेज ले जाने को कहा गया. इस तरह एक मरीज एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल दरदर भटकता रहा.

जानकारी के अनुसार, लोहिया अस्पताल के इमरजैंसी में 45 बैड हैं. वार्डों में कुल 500 मरीजों के लिए बैड हैं. कई बार जगह होने के बाद भी मरीज को भरती नहीं किया जाता है जिस से वह दरदर भटकने को मजबूर होता है.

लखनऊ के इंदिरानगर के तकरोही बाजार में रहने वाले 60 साल के जान मोहम्मद को पेट में तकलीफ  थी. घर के लोग उन को ले कर लोहिया अस्पताल के इमरजैंसी विभाग में आए. डाक्टरों ने उन्हें भरती करने के बजाय दवा दे कर घर भेज दिया.

अगले दिन जान मोहम्मद ओपीडी में दिखाने आए. परिजन परचा बनवा ही रहे थे, तभी जान मोहम्मद की सांसें थम गईं. उन के घरवालों ने आरोप लगाया कि अगर एक दिन पहले इमरजैंसी में भरती कर लिया गया होता तो मरीज की जान बच जाती. इसी तरह शाहाबाद निवासी 70 साल की रामश्री की इमरजैंसी में

3 घंटे तक इलाज न मिलने से मौत हो गई. शिकायत होने पर अस्पताल का प्रशासन जांच करने की बात करता है.

बडे़ अस्पतालों में मरीजों को ज्यादा न जाना पडे़, इस के लिए लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्रों में 25 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र यानी पीएचसी और 11 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सीएचसी शुरू किए गए हैं. शहरी क्षेत्रों में सीएचसी 9 और पीएचसी 52 है.

सामान्यतौर पर यहां उलटी, डायरिया, बुखार का इलाज हो जाता है. यहां भी सही और समय पर इलाज नहीं मिलता है जिस की वजह से लोग बडे़ अस्पतालों में जाने को मजबूर होते हैं. इलाज के लिए मुफ्त सरकारी सुविधाओं को लेने के लिए लंबी वेटिंग लिस्ट लगी होती है. खासकर डायलिसिस जैसे मरीजों को लंबा इंतजार करना होता है जिस से वे प्राइवेट जांच कराने के लिए मजबूर होते हैं. इस वजह से भी मरीजों को मुफ्त सरकारी इलाज की सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता है.

डाक्टरों की कमी

भारत में करीब 10 हजार से भी अधिक लोगों पर मात्र एक सरकारी डाक्टर उपलब्ध है. विश्व स्वास्थ्य संगठन मानता है कि करीब एक हजार लोगों पर एक सरकारी डाक्टर होना चाहिए. इस तरह से पूरे देश में 6 लाख डाक्टरों की कमी है. इस के साथ ही साथ बीमारी में असल मदद करने वाली नर्सों की भी बहुत कमी है. देश में करीब 20 लाख नर्सों की कमी है. जो उपलब्ध हैं वे सही तरह से प्रशिक्षित नहीं हैं.

अमेरिका के ‘सैंटर फौर डिजीज डाइनौमिक्स इकोनौमिक्स ऐंड पौलिसी’ यानी सीडीडीईपी द्वारा दी गई रिपोर्ट बताती है कि भारत में एंटीबायोटिक उपलब्ध होने के बाद भी बीमारी का 65 फीसदी खर्च मरीज को खुद उठाना पड़ता है. इस से हर साल 5 करोड़ से अधिक लोग गरीबी का शिकार होते जा रहे हैं.

सरकारी अस्पतालों में सही तरह से इलाज न मिलने के कारण लोग महंगे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर होते हैं. गंभीर किस्म के इलाज, जैसे टीबी, कैंसर, हार्ट, लिवर, किडनी की बीमारियों में इलाज और जांच के नाम पर इतना पैसा खर्च हो जाता है कि सामान्य आदमी इलाज का बोझ नहीं उठा पाता. ऐसे में उस को कर्ज लेना पड़ता है. जिसे भरने के लिए उस को अपनी जमीनजायदाद तक बेचनी पड़ती है. जमीन बेचने के बाद भी कई बार मरीज की मौत इलाज के समय ही हो जाती है, जिस से घरपरिवार सब बिखर जाता है.

बीमारी से बचाव

सरकारी डाक्टरी सेवा से रिटायर होने वाले डाक्टर प्रदीप कुमार कहते हैं, ‘‘सरकार को इलाज पर ध्यान देने के साथ ही साथ इस विषय पर भी योजनाएं तैयार करनी चाहिए कि बीमारियों से बचाव किया जा सके. ज्यादातर लोग खराब पानी पीने और मच्छरों के प्रकोप से बीमार होते हैं. मच्छर बहुत सी बीमारियों की जड़ होते हैं. सरकार इस तरफ ध्यान नही देती. शहरों में गंदे नाले और देहात में तालाब जैसे जलभराव के क्षेत्र बीमारी को बढ़ावा देते हैं. अगर इस की रोकथाम की जाए तो बहुत हद तक गरमी और बरसात में होने वाली बीमारियों को रोका जा सकता है.

‘‘बच्चों की बीमारियों में बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की होती है जो हाथ की सफाई नहीं करते. ऐसे में बच्चों को इस बारे में जागरूक किया जाए तो इन में होने वाली बीमारियों को रोका जा सकता है.’’

डाक्टरों का कहना है कि भारत में समयसमय पर शरीर की जांच कराने का चलन बेहद कम है. इस कारण शुरुआत में बीमारी का पता ही नहीं चल पाता है. अगर समय पर बीमारी का पता चल जाए तो इलाज सरल और किफायती हो जाएगा. देशभर में ऐसी जागरूकता फैलाने की जरूरत है कि देशवासी स्वस्थ महसूस करते हुए भी समयसमय पर स्वास्थ्य जांच कराते रहें.

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बीमारी के इलाज के साथ ही साथ बीमारी से बचाव पर भी बराबर काम करने की जरूरत है, तभी अस्पतालों में बढ़ती भीड़ को रोका जा सकता है. अस्पताल में मरीजों की संख्या कम होने से बेहतर इलाज संभव हो सकता है. सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं में बीमारी से बचाओ को ले कर बहुत बड़े स्तर पर काम करने की जरूरत है.

मौनसून टिप्स: त्वचा और बालों की ऐसे करें देखभाल

तेज गर्मी के बाद रिमझिम बरसात काफी राहत पहुंचाने वाली होती है. इस मौसम में जहां आप खुद को ऊर्जावान महसूस करते हैं वहीं बाल व स्किन की देखभाल को लेकर भी काफी दिक्कत महसूस होती है. ऐल्प्स की फाउंडर डायरेक्टर और मशहूर डर्मेटोलौजिस्ट डा. भारती तनेजा के अनुसार बारिश का मौसम आपके सौंदर्य और हैल्थ  को प्रभावित कर सकता है. स्किन तथा सिर पर गीलेपन की वजह से गंदगी व प्रदूषण फैलाने वाले तत्व आसानी से जम जाते हैं.  बाल बेजान व रूखे हो जाते हैं, जिससे आपकी सुंदरता में कमी आ सकती है. लेकिन आप इन टिप्स को अपनाकर इस मौसम में भी अपनी त्वचा व बाल की केयर कर सकते हैं. आइए जानते हैं कैसे-
1 . मौनसून के मौसम में स्किन को प्रदूषण से बचाए रखने के लिए क्लींजिंग बहुत जरूरी  है. साथ ही इस मौसम में  जब भी आपका चेहरा गीला हो तो आप सबसे पहले चेहरे को टिश्यू से क्लीन करें और अगर क्लीन करने के बाद चेहरे पर रूखापन लगे तो चेहरे पर मौइस्चराइजर अप्लाई करना न भूलें.
2 . इस मौसम में बैक्टीरिया व प्रदूषण से स्किन को बचाना बहुत जरूरी होता है. इसके लिए हर्बल साबुन का इस्तेमाल करना बेस्ट विकल्प  है. क्योंकि ये स्किन के ph लेवल को प्रभावित किए बिना  स्किन की अशुद्धियों को दूर करता है.

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3 . दिन भर में चेहरे को 2 -3  बार साफ पानी से धोएं. साथ ही आप चेहरे पर बर्फ भी लगाएं, क्योंकि इससे चेहरे पर पसीना नहीं आता और मुंहासों की समस्या से भी निजात मिलता है.
4 . मानसून के मौसम में हफ्ते में एक बार अपनी स्किन को एक्सफोलिएट जरूर करें.  यह गंदगी व स्किन के खुले छिद्रों को हटाने में मदद करने के साथ स्किन में चमक लाने का काम करता है. कुछ घरेलू उपाय जैसे कौफी, चीनी नींबू , बेकिंग सोडा या चावल का आटा स्किन को पोषण देने के  लिए काफी अच्छा माना जाता है. इसके लिए हफ्ते में एक बार चेहरे पर स्क्रब जरूर करें. तैलिये स्किन के लिए चावल के आटे में थोड़ा सा गुलाब जल मिलाएं, जबकि सामान्य या रूखी  त्वचा के लिए बादाम को दूध या दही में मिलाएं, लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि अत्यधिक संवेदनशील त्वचा वाली स्किन पर स्क्रब करने से बचें.
5.  मानसून के मौसम में अकसर पोर्स बंद होने के कारण पिम्पल्स होने लगते हैं , इसके लिए एक्टिवेटिड बैम्बू चारकोल युक्त फेशियल करवाएं. एक्टिवेटिड बैम्बू चारकोल चेहरे की अशुदियो को दूर कर रोमछिद्रों को खोलते हैं. ये मुंहासे, दाग धब्बे भी दूर करने का काम करते हैं.
6.  मानसून के मौसम में स्किन की टोनिंग करना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि ये रोमछिद्रों को बंद करने में मदद करता है और स्किन के ph बैलेंस को बहाल करता है. टोनिंग स्किन को  आमतौर पर  साफ करने के बाद की जाती है. आप चाहें  तो प्राकर्तिक उत्पादों जैसे ग्रीन टी ,नींबू  का रस, गुलाबजल और खीरे के पानी का उपयोग करके स्किन के लिए अच्छा टोनर तैयार कर सकते हैं. नमी और बारिश के कारण  स्किन को फ्री रेडिकल्स से बचाना होता है. इसलिए हफ्ते में दो बार स्किन पर टोनर का उपयोग जरूर करें  इससे स्किन हैल्दी  रहती है.
7.  पपीता और खीरा युक्त फेस पैक सभी प्रकार की स्किन के लिए उपयुक्त है.  यह स्किन की मृत कोशिकाओं को हटाकर रोमछिद्रों को खोल कर मुंहासों को कंट्रोल करता है. इसके इस्तेमाल से स्किन कोमल होती है और उसमें नमी बरक़रार रहती है.
8 बारिश के मौसम में ज्यादा चिपचिपी क्रीम्स के इस्तेमाल से बचना चाहिए. यदि आपकी ड्राई स्किन है तो लाइट मौइस्चराइजर  आपके लिए मददगार साबित हो सकता है.
9.  मानसून के समय नमी की अधिकता के कारण स्किन पर झुर्रियों से बचने के लिए सनस्क्रीन का उपयोग जरूर करें. अकसर इस मौसम में लोग सनस्क्रीन का उपयोग नहीं करते हैं लेकिन इस मौसम में वाटरप्रूफ सनस्क्रीन जरूर लगाएं .सामान्य स्किन वालो को ज्यादा spf  वाला सनस्क्रीन लगाना चाहिए और तेलिए स्किन वालों  को मिनरल फिलर वाला सनस्क्रीन लगाना चाहिए.

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बालों की देखभाल
1.  बरसात के मौसम में तैलिय ग्रंथिया ज्यादा सक्रिय होती हैं, जिसके कारण सीबम के सिर पर जमने से बाल चिपचिपे हो जाते हैं. ऐसे में बालों की सफाई का खास ध्यान रखें और हफ्ते में 3 बार हेयरवाश  जरूर करें.
2. मानसून के दौरान सिर में खुजली होना व डैंड्रफ होना आम समस्या है. इसलिए आप एंटी डैंड्रफ शैम्पू का इस्तेमाल करना न भूलें.
3. बालों  को धोने से एक घंटा पहले बालों में अच्छे से मसाज जरूर करें. इससे हेयर्स में चमक बनी रहेगी. इसके साथ ही बारिश के मौसम में बाल चिपचिपे भी नहीं रहेंगे.
4.  जब तक बाल सूखे नहीं तब तक बाल को खुल्ले ही रखें.
5. हेयर स्ट्राइटेनेर या स्टाइललर  का इस्तेमाल न करें, क्योंकि  इससे बाल बेजान हो जाते हैं.
6. शैम्पू के बाद कंडीशनर जरूर करें, क्योंकि  इससे बालों में सौफ्टनेस आती है.
7.  बालों की मजबूती को बनाए रखने के लिए हफ्ते में 3 -4 बार बालों को प्रोटीन ट्रीटमेंट दें. इसके लिए फेंटे हुए अंडे को हेयर्स पर लगाएं. 15 मिनट तक इसे रहने दें और फिर पानी से धो लें .
8.  केले का हेयर मास्क या पैक मानसून के दौरान बालों होने वाले नुकसान से बचाने का शानदार घरेलू उपाय है. केले में मौजूद पोटैशियम आपके हेयर्स को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है. बालों में इसे लगाने के लिए दो छोटे केलों को ब्लेंड करें. अब इसमें एक चम्मच जैतून का तेल और तीन बड़े चम्मच मियोनीज मिलाकर  मास्क तैयार करें. अब इस मास्क को स्कैल्प और हेयर्स पर अच्छे से लगाएं. 30 मिनट तक इसे लगा रहने दें . फिर पानी से बालों को अच्छे से धो लें. 4 से 6  बार इस प्रक्रिया को अपनाने के बाद हेयर डैमेज की समस्या जड़ से समाप्त हो जाएगी.

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घर पर बनाएं क्रंची पोटैटो

आलू की यह एक बेहतरीन रेसिपी है जिसे सरसों के दाने, नारियल, और काजू डालकर बनाया जाता है. इन्हें बनाना काफी आसान है, तो आइए जानते है इसकी रेसिपी.

सामग्री

2 आलू

1 टेबल स्पून नारियल तेल

5-6 कढ़ीपत्ता

1 कप नारियल

नमक

1 1/2 टी स्पून सरसो के दाने

4-5 हरी मिर्च, कटा हुआ

मुट्ठी भर काजू

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बनाने की वि​धि

  • आलू को डायमंड शेप में काट लें और इसमें थोड़ा नमक डालें और नरम होने के लिए हल्का सा उबाल लें. इन्हें छान लें और एक तरफ रख दें.
  • एक कड़ाही में नारियल का तेल गर्म करें और इसमें सरसों के दाने और हरी मिर्च डालें.
  • इसमें काजू डालें और इन्हें गोल्डन ब्राउन होने तक भूनें.
  • इसमें अब कढ़ीपत्ता और आलू डालें। इसमें थोड़ा सा नमक डालें और इन्हें तब तक भूनें जब आलू क्रिस्पी न हो जाएं.
  • इसमें एक कप कददूकस किया हुआ नारियल डालें, टौस करें और इसे 2 मिनट के लिए भूनें.
  • गर्मागर्म रोटी के साथ इस सब्जी को सर्व करें.

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हिजाब

‘‘आपा,दरवाजा बंद कर लो, मैं निकल रही हूं. और हां, आज आने में थोड़ी देर हो सकती है. स्कूटी सर्विसिंग के लिए दूंगी.’’

‘‘अब्बा ने निगम का टैक्स भरने को भी तो दिया था. उस का क्या करेगी?’’

‘‘भर दूंगी… और भी कई काम हैं. रियाद और शिगुफ्ता की शादी की सालगिरह का गिफ्ट भी ले लूंगी.’’

‘‘ठीक है, जो भी हो, जल्दी आना. 2 घंटे में आ जाना. ज्यादा देर न हो,’’ कह आपा ने दरवाजा बंद कर लिया.

मैं अब गिने हुए चंद घंटों के लिए पूरी तरह आजाद थी. जब भी घर से निकलती हूं मेरी हाथों में घड़ी की सूईयां पकड़ा दी जाती हैं. ये सूईयां मेरे जेहन को वक्तवक्त पर वक्त का आगाह कराती बेधती हैं- अपराधबोध से, औरत हो कर खतरों के बीच घूमने के डर से, खानदान की नाक की ऊंचाई कम हो जाने के खतरे से और मैं दौड़ती होती हूं काम निबटा कर जल्दी दरवाजे के अंदर हो जाने को.

किन दिमागी खुराफातों में उलझा दिया मैं ने… इतने बगावती तेवर तो हिजाब की तौहीन हैं. खैर, क्यों न इन चंद घंटों में लगे हाथ अपने घर वालों से भी रूबरू करा दूं.

तो हम कानपुर के बाशिंदे हैं. मेरे अब्बा होम्योपैथी के डाक्टर हैं. 70 की उम्र में भी उन की प्रैक्टिस अच्छी चल रही है. मेरे वालिदान अपनी बिरादरी के हिसाब से बड़े खुले दिलोदिमाग वाले हैं, ऐसा कहा जाता है.

6 बहनों में मैं सब से छोटी. मैं ने माइक्रोबायोलौजी में एमएससी की है. मेरी सारी बहनों को भी अच्छी तालीम की छूट दी गई थी और वे भी बड़ी डिगरियां हासिल करने में कामयाब हुईं. हमें याद है हम सारी बहनें बढि़या रिजल्ट लाने के लिए कितनी जीतोड़ मेहनत करती थीं और पढ़ने से आगे कैरियर भी मेरे लिए माने रखता ही था. मुझे एक प्राइवेट संस्थान में अच्छी सैलरी पर लैक्चरर की जौब मिल रही थी. लेकिन यह बात मेरे अब्बा की खींची गई आजादी की लकीर से उस पार की हो जाती थी.

साहिबा आपा को छोड़ वैसे तो मेरी सारी बहनों ने ऊंची डिगरियां हासिल की थीं, लेकिन दीगर बात यह भी थी कि अब वे सारी अपनीअपनी ससुराल की मोटीतगड़ी चौखट के अंदर बुरके में कैद थीं. हां, मेरे हिसाब से कैद ही. उन्होंने अपने सर्टिफिकेट को दिमाग के जंग लगे कबूलनामे के बक्से में बंद कर राजीखुशी ताउम्र इस तरह बसर करने का अलिखित हुक्म मान लिया था.

वे उन गलतियों के लिए शौक से शौहर की डांट खातीं, जिन्हें उन के शौहर भी अकसर सरेआम किया करते. वे सारी खायतों को आंख मूंद कर मानतीं और लगे हाथों मुझे मेरे तेवर पर कोसती रहतीं.

वालिदान के घर मैं और सब से बड़ी आपा रहती थीं. बाकी मेरी 4 बहनों की कानपुर के आसपास ही शादी हुई थी. ये सभी बहनें पढ़ीलिखी होने के साथसाथ बाहरी कामकाज में भी स्मार्ट थीं. वैसे अब ये बातें बेजा थीं, ससुराली कायदों के खिलाफ थीं. सब से बड़ी आपा साहिबा की शादी कम उम्र में ही हो गई थी. उन का पढ़ाई में मन नहीं था और शादी के लिए वे तैयार थीं.

बाद के कुछ सालों में उन का तलाक हो गया और वे अपने बेटे रियाद के साथ हमारे पास रहने आ गईं. मेरी दूसरी आपा जीनत की शादी पड़ोस के गांव में हुई थी. उन की बेटी शिगुफ्ता की अच्छी तालीम के लिए अब्बा ने अपने पास रखा. उम्र बढ़ने के साथ रियाद और शिगुफ्ता के बीच ‘गुल गुलशन गुलफाम’ होने लगे तो इन लोगों की शादी पक्की कर दी गई.

अब्बा के बनाए घर में हम सब बड़े प्रेम से रहते थे. हां, प्रेम के बाड़े के अंदर उठापटक तब होती जब अब्बा की दी गई आजादी के निशान से हमारे कदम कुछ कमज्यादा हो जाते.

घर में पूरी तरह इसलामी कानून लागू था. बावजूद इस के अब्बा कुछ हद तक अपने खुले विचारों के लिए जाने जाते थे. मगर यह ‘हद’ जिस से अब मेरा ही हर वक्त वास्ता पड़ता मेरे लिए कोफ्त का सबब बन गया था. मैं चिढ़ी सी रहती कि मैं क्यों न अपनी तालीम को अपनी कामयाबी का जरीया बनाऊं? क्यों वालिदान का घर संभालते ही मैं जाया हो जाऊं?

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सारे काम निबटा कर रियाद और शिगुफ्ता के तोहफे ले कर मैं जब अपनी स्कूटी सर्विसिंग में देने पहुंची तो 4 बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे. मन में बुरे खयालात आने लगे… घर में फिर वही बेबात की बातें… दिमाग गरम…

मैं स्कूटी दे कर जल्दी सड़क पर आई और औटो का इंतजार करने लगी. अभी औटो के इंतजार में बेचैन ही हो रही थी कि पास खड़ी एक दुबलीपतली सांवली सामान्य से कुछ ऊंची हाइट की लड़की विचित्र स्थिति से जूझती मिली. उस की तुलना में उस की भारीभरकम ड्युऐट ने उसे खासा परेशान किया हुए था.

सर्विस सैंटर के सामने उस की गाड़ी सड़क से उतर गई थी और वह उसे खींच कर सड़क पर उठाने की कोशिश में अपनी ताकत जाया कर रही थी. हाइट वैसे मेरी उस से भले ही कुछ कम थी, लेकिन अपनी बाजुओं की ताकत का जायजा लिया मैं ने तो वे उस से 20 ही लगीं मुझे. मैं ने पीछे से उस की गाड़ी को एक झटके में यों धक्का दिया कि गाड़ी आसानी से सड़क पर आ गई. पीछे से अचानक मिल गई इस आसान राहत पर उसे बड़ी हैरानी हुई. उस ने पीछे मुड़ कर मुझे देख मुझ पर अपनी सवालिया नजर रख दी.

मैं ने मुसकरा कर उस का अभिवादन किया. बदले में उस सलोनी सी लड़की ने मुझ पर प्यारी सी मुसकान डाली. मैं पढ़ाई पूरी कर के 3 सालों से घर में बैठी हूं, मेरी उम्र 26 की हो रही. उस की भी कोई यही होगी. उस की शुक्रियाअदायगी से अचानक ऐसा लगा मुझे जैसे कभी हम मिली थीं.

मेरी उम्मीद से आगे उस ने मुझ से पूछ लिया कि मैं कहां जा रही हूं. वह मुझे मेरी मंजिल तक छोड़ सकती है. तब तक औटो को मैं ने रोक लिया था, इसलिए उसे मना करना पड़ा. हां, वह मुझे बड़ी प्यारी लगी थी, इसीलिए मैं ने उस से उस का फोन नंबर मांग लिया.

औटो में बैठ कर मैं उस सलोनी लड़की के बारे में ही सोचती रही…

वह नयनिका थी. छोटीछोटी आंखें, छोटी सी नाक पर मासूम सी सूरत. सांवली त्वचा निखरी ऐसी जैसे चमक शांति और बुद्धि की हो. बारबार मेरे जेहन में एहसास जगता रहा कि इसे मैं कहीं मिली हूं, लेकिन वे पल मुझे याद नहीं आए.

शाम को 4 बजे तक घर लौट आने का हुक्मनामा साथ ले गई थी, लेकिन अब 6 बजने में कुछ ही मिनटों का फासला था.

सूर्य का दरवाजा बंद होते ही एक लड़की बाहर महफूज नहीं रह सकती या तो बेवफाई की कालिख या फिर बिरादरी वालों की तोहमत अथवा औरत पर मंडराता जनूनी काला साया.

कहते हैं हिजाब हट रहा है. हिजाब तो समाज के दिमाग पर पड़ा है. समाज की सोच हिजाब के पीछे चेहरा छिपाए खड़ी है… वह रोशनी से खौफ खाती है. जब तक उस हिजाब को नहीं हटाओगे औरतों के हिजाब हट भी गए तो क्या?

अब्बा अम्मी पर बरस रहे थे, ‘‘लड़की जात को ज्यादा पढ़ालिखा देने से यही होता है. मैं ही कमअक्ल था जो अपनी बिरादरी के उसूलों के खिलाफ जा कर लड़कियों को इतना पढ़ा डाला.. पैर मैं चटके बांध दिए… उस की सभी बहनें खानदान के रिवाजों की कद्र करते चल रही हैं… उन की कौन सी बेइज्जती हो रही है? वे तो किसी बात का मलाल नहीं करतीं… और इस छोटी चिलमन का यह हाल क्यों? मैं कहे देता हूं, वह कितना भी रोक ले, वाकर अली से उसे निकाह पढ़ना ही है. उस के आपा के बेटेबेटियों की शादी हो गई और यह अभी तक…

‘‘कैरियर बनाएगी… और क्या बनाएगी? इतना पढ़ा दिया… बिन बुरके यूनिवर्सिटी जाती रही… अब भी बुरका नहीं पहनती. मैं भी कुछ कहता नहीं… चलो जमाने के हिसाब से हम भी उसे छूट दें, लेकिन यह तो किसी को कुछ मानना ही नहीं चाहती?’’

अब्बा की पीठ दरवाजे की तरफ थी. उन्होंने देखा नहीं मुझे. वैसे मुझे और उन्हें इस से फर्क भी नहीं पड़ने वाला था. मुझे जितनी आजादी थमाई गई थी, उस का सारा रस बारबार निचोड़ लिया जाता था और मैं सूखे हुए चारे की जुगाली करती जाती थी. वैसे मेरा मानना तो यह था कि जो दी गई हो वह आजादी कहां? मेरी शादी मेरे खाला के बेटे से तय करने की पहल चल रही थी.

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वाकर अली नाम था उस का. वह मैट्रिक पास था. अपनी बैग्स की दुकान थी. दिनरात एक कर के ईमानदारी से कमाई गई मेरी माइक्रोबायोलौजी की एमएससी की डिगरी चुल्लू भर पानी मांग रही थी डूब मरने को… और घर वाले मेरी बहनों का नाम गिना रहे थे. कैसे वे ऊंची डिगरियां ले कर भी कम पढ़ेलिखे बिजनैस और खेती करने वाले पतियों से बाखुशी निभा रही हैं… वाकई मैं घर वालों की नजरों में उन बहनों जैसी अक्लमंद, गैरतमंद और धीरज वाली नहीं थी.

वाकर अली आज मुझे देखने आया. वैसे देखा मैं ने उसे ज्यादा… मुझ जैसी हाइट 5 फुट 5 इंच से ज्यादा नहीं होगी. सामान्य शक्लसूरत वैसे इस की कोई बात नहीं थी, लेकिन जो बात हुई वह तो जरूर कोई बात थी.

वकौल वाकर अली, ‘‘घर पर रह लेंगी न? हमारे यहां शादी के बाद औरत को घर से बाहर अकेले घूमते रहने की इजाजत नहीं होती… और आप को बुरके की आदत डाल लेनी होगी. आप को बिरादरी का खयाल रखना चाहिए था.’’

मैं अब्बा की इज्जत का खयाल कर चुप रही. मगर मैं चुप नहीं थी. सोच रही थी कि ये इजाजत देने वाले क्याक्या सोच कर इजाजत देते हैं.

जेहन में सवाल थे कि क्याक्या फायदा होता है अगर आप के घर लड़कियां शादी बाद घर से अकेले नहीं निकलें या क्या नुकसान हो जाता है अगर निकलें तो? क्या बीवी पर भरोसे की कमी है या मर्दजात पर…

खानदानी आबरू के नाम पर काले सायों से ढकी रहने वाली औरतों की इज्जत घर में कितनी महफूज है?

वाकर अली मेरे अब्बा की तरह ही कई सारे कानून मुझ पर थोप कर चला गया कि अगर राजी रहूं तो अब्बा उस से बात आगे बढ़ाएं.

अब्बा तो जैसे इस बंदे के गले में मुझे बांधने को बेताब हुए जा रहे थे. घर में 2 दिन से इस बात पर बहस छिड़ी थी कि आखिर मुझे उस आदमी से दिक्कत क्या है? एक जोरू को चाहिए क्या- अपना घरबार, दुकान इतना कमाऊ पति, गाड़ी, काम लेने को घर में 2-3 मददगार हमेशा हाजिर… क्या बताऊं, क्या नहीं चाहिए मुझे? मुझे तो ये सब चाहिए ही नहीं.

मैं ने सोचा एक बार साहिबा आपा से बात की जाए. दीदी हैं कुछ तो समझेंगी मुझे. अभी मैं सोच कर अपने बिस्तर से उठी ही थी कि साहिबा आपा मेरे कमरे का दरवाजा ठेल अंदर आ गईं. बिना किसी लागलपेट के मैं ने कहा, ‘‘आपा, मैं परेशान हूं आप से बात करने को…’’

बीच में टोक दिया आपा ने, ‘‘हम सब भी परेशान हैं… आखिर तू निकाह क्यों नहीं करना चाहती? वाकर अली किस लिहाज से बुरा है?’’

‘‘पर वही क्यों?’’

‘‘हां, वही क्योंकि वह हमारी जिन जरूरतों का खयाल रख रहा है उन का और कोई नहीं रखेगा.’’

मैं उत्सुक हो उठी थी, ‘‘क्या? कैसी मदद?’’

‘‘वह तुझे बुटीक खुलवा देगा, तू घर पर ही रह कर कारीगरों से काम करवा कर पैसा कमाएगी.’’

‘‘पर सिर्फ पैसा कमाना मेरा मकसद नहीं… मैं ने जो पढ़ा वह शौक से पढ़ा… उस डिगरी को बक्से में बंद ही रख दूं?’’

‘‘बड़ी जिद्दी है तू!’’

‘‘हां, हूं… अगर मैं कुछ काम करूंगी तो अपनी पसंद का वरना कुछ नहीं.’’

‘‘निकाह भी नहीं?’’

‘‘जब मुझे खुद कोई पसंद आएगा तब.’’

साहिबा आपा गुस्से में पैर पटकती चली गईं. मैं सोच में पड़ गई कि वाकर अली से ब्याह कराने का बस इतना ही मकसद है कि वह मुझे बुटीक खुलवा देगा. वह बुटीक न भी खुलवाए तो इन लोगों को क्या? बात कुछ हजम नहीं हो रही थी. मन बहुत उलझन में था.

बिस्तर पर करवटें बदलते मेरा ध्यान पुरानी बातों और पुराने दिनों पर चला गया. अचानक नयनिका याद आ गई. फिर मैं उसे पुराने किसी दिन से मिलान करने की कोशिश करने लगी. अचानक जैसे घुप्प अंधेरे में रोशनी जल उठी…

अरे, यह तो 5वीं कक्षा तक साथ पढ़ी नयना लग रही है… हो न हो वही है… अलग सैक्शन में थी, लेकिन कई बार हम ने साथ खेल भी खेले. उस की दूसरी पक्की सहेलियां उसे नयना बुलाती थीं और इसीलिए हमें भी इसी नाम का पता था. वह मुझे बिलकुल भी नहीं समझ पाई थी. ठीक ही है…

16-17 साल पुरानी सूरत आसान नहीं था समझना. रात के 12 बजने को थे. सोचा उसे एक मैसेज भेज रखूं. अगर कहीं वह देख ले तो उस से बात करूं. संदेश उस ने कुछ ही देर में देख लिया और मुझे फोन किया.

बातों का सिलसिला शुरू हो कर हम ज्यों 5वीं क्लास तक पहुंचे हमारी घनिष्ठता गहरी होती गई. जल्दी मिलने का तय कर हम ने फोन रखा तो बहुत हद तक मैं शांत महसूस कर रही थी.

कुछ ही मुलाकातों में विचारों और भावनाओं के स्तर पर मैं खुद को नयनिका के करीब पा रही थी. वह सरल, सभ्य शालीन और कम बोलने वाली लड़की थी. बिना किसी ऊपरी पौलिश के एकदम सहज. उस के घर में पिता सरकारी अफसर थे और बड़ा भाई सिविल इंजीनियर. मां भी काफी पढ़ीलिखी महिला थीं, लेकिन घर की साजसंभाल में ही व्यस्त रहतीं.

नयनिका कानपुर आईआईटी से ऐरोस्पेस इंजीनियरिंग में डिगरी हासिल कर के अब पायलट बनने की नई इबारत लिख रही थी. इतनी दूर तक उस की जिंदगी भले ही समतल जमीन पर चलती दिख रही हो, लेकिन उस की जिंदगी की उठापटक से मैं भी दूर नहीं रह पा रही थी.

इधर मेरे घर पर अचानक अब्बा अब वाकर अली से निकाह के लिए जोर देने के साथसाथ बुटीक खोल लेने की बात मान लेने को ले कर मुझ से लड़ने लगे थे. साथ कभीकभार अम्मी भी बोल पड़तीं. हां, आपा सीधे तो कुछ नहीं कहतीं, लेकिन उन का मुझ से खफा रहना मैं साफ समझती थी. अब तो रियाद और शिगुफ्ता भी बुटीक की बात को ले कर मुझ से खफा रहने लगे थे. अलबत्ता निकाह की बात पर वे कुछ न कहते. मैं बड़ी हैरत में थी. दिनोदिन घर का माहौल कसैला होता जा रहा था. आखिर बात थी क्या? मुझे भी जानने की जिद ठन गई.

साहिबा आपा से पूछने की मैं सोच ही रही थी कि रात को किचन समेटते वक्त बगल के कमरे से अब्बा की किसी से बातचीत सुनाई पड़ी. अब्बा के शब्द धीरेधीरे हथौड़ा बन मेरे कानों में पड़ने लगे.

अच्छा, तो यह वाकर अली था फोन पर. रियाद की प्राइवेट कंपनी में घाटा होने की वजह से उस के सिर पर छंटनी की तलवार लटक रही थी. इधर शिगुफ्ता को बुटीक का काम अच्छा आता था. रियाद और शिगुफ्ता के लिए एक विकल्प की तलाश थी. मुझ से बुटीक खुलवाना. लगे हाथ मेरे हाथ पीले हो जाएं… रियाद और शिगुफ्ता को मेरे नाम से बुटीक मिल जाए… मालिकाना हक रियाद और शिगुफ्ता का रहे, लेकिन मेरा नाम आगे कर के कामगारों से काम लेने का जिम्मा मेरा रहे. शिगुफ्ता को जब फुरसत मिले वह बुटीक जाए.

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मैं रात को साहिबा आपा के पास जा बैठी… कहीं उन का मन मेरे लिए पसीजे. मगर वे लगीं उलटा मुझे समझाने, ‘‘वाकर तो अपनी खाला का बेटा है. गैर थोड़े ही है. पहली बीवी बेचारी मर गई थी… दूसरी भी तलाक के बाद चली गई… 38 का जवान जहान लड़का… क्यों न उस का घर बस जाए? शादी तो तुझे करनी ही है… कहीं तेरी शादी से मेरे बच्चों का जरा भला न हो जाए वह तुझे फूटी आंख नहीं सुहा रहा न?’’

‘‘अब आगे इन के बच्चे होंगे, हमारा घर छोटा पड़ेगा… इन का कारोबार जम जाए तो ये फ्लैट ले लें… यहां भी जगह बने. अब्बा फिर इस घर को बड़ा करवा कर किराए पर चढ़ाएं तो हमें भी कुछ आमदनी हो.’’

‘‘घर तोड़ेंगे क्या अब्बा… किस का कमरा?’’

‘‘किस का क्या बाहर वाला?’’

‘‘पर वह तो मेरा कमरा है?’’

‘‘तो तू कौन सी घर में रह जाएगी… वाकर के घर चली तो जाएगी ही न? जरा घर वालों का भी सोच चिलमन.’’

‘‘क्या मतलब? सुबह से ले कर रात तक सब की सेवा में लगी रहती हूं… और क्या सोचूं?’’

‘‘कमाल है… तुझे बिना बुरके के आनेजाने, घूमनेफिरने की आजादी दी गई है… और क्या चाहिए तुझे?’’

हताश हो कर मैं आपा के कमरे से अपने कमरे में बिस्तर पर आ कर लेट गई… सच मैं क्या चाहती हूं? क्या चाहना चाहिए मुझे? एक औरत को खुद के बारे में कभी सोचना नहीं है, यही सीख है परिवार और समाज की?

मुझे एक दोस्त की बेहद जरूरत थी. नयनिका से मिलतेमिलाते सालभर होने को था. बचपन का सूत्र कहूं या हम दोनों की सोच की समानता दोनों ही एकदूसरे की दोस्ती में गहरे उतर रहे थे.

मैं जिस वक्त उस के घर गई वह अपनी पढ़ाई की तैयारी में व्यस्त थी. नयनिका कमर्शियल पायलट के लाइसैंस के लिए तैयारी कर रही थी. हम दोनों उस के बगीचे में आ गए थे. रंगबिरंगे फूलों के बीच जब हम जा बैठे तो कुछ और करीबियां हमारे पास सिमट आईं. उस की आंखों में छिपा दर्द शायद मुझे अपना हाल सुनाने को बेताब था. शायद मैं भी. बरदाश्त की वह लकीर जब तक अंगारा नहीं बन जाती, हम उसे पार करना नहीं चाहतीं, हम अपने प्रियजनों के खिलाफ जल्दी कुछ बुरा कहनासुनना भी नहीं चाहते.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘उदास क्यों रहती हो हमेशा? तैयारी तो अच्छी चल रही न?’’

उस ने कहा, ‘‘कारण है, तभी तो उदास हूं… कमर्शियल पायलट बनने की कामयाबी मिल भी जाए तो हजारों रुपए लगेंगे इस की ट्रेनिंग में जाने को. बड़े भैया ने तो आदेश जारी कर दिया है कि बहुत हो गया, हवा में उड़ना… अब घरगृहस्थी में मन रमाओ.’’

‘‘हूं, दिक्कत तो है… फिर कर लो शादी.’’

‘‘क्यों, तुम मान रही हो वाकर से शादी और बुटीक की बात? वह तुम्हारे

हिसाब से, तुम्हारी मरजी से अलग है… अमेरिका में हर महीने लाखों कमाने वाले खूबसूरत इंजीनियर से शादी वैसे ही मेरी मंजिल नहीं. जो मैं बनना चाहती हूं, वह बनने न देना और सब की मरजी पर कुरबान हो जाना… यह इसलिए कि एक स्त्री की स्वतंत्रता मात्र उस के सिंदूर, कंगन और घूमनेफिरने के लिए दी गई छूट या रहने को मिली छत पर ही आ कर खत्म हो जाती है.’’

‘‘वाकई तुम प्लेन उड़ा लोगी,’’

मैं मुसकराई. वह अब भी गंभीर थी. पूछा, ‘‘क्यों? अच्छेअच्छे उड़ जाएंगे, प्लेन क्या चीज है,’’ वह उदासी में भी मुसकरा पड़ी.

‘‘क्या करना चाहती हो आगे?’’

‘‘कमर्शियल पायलट का लाइसैंस मिल जाए तो मल्टीइंजिन ट्रैनिंग के लिए न्यूजीलैंड जाना चाहती हूं. पापा किसी तरह मान भी जाएं तो भैया यह नहीं होने देंगे.’’

‘‘क्यों, उन्हें इतनी भी क्या दिक्कत?’’

‘‘वे एक सामान्य इंजीनियर मैं कमर्शियल पायलट… एक स्त्री हो कर उन से ज्यादा डेयरिंग काम करूं… रिश्तेदारों और समाज में चर्चा का विषय बनूं? बड़ा भाई क्यों पायलट नहीं बन सका? आदि सवाल न उठ खड़े हों… दूसरी बात यह है कि अमेरिका में उन का दोस्त इंजीनियर है. अगर मैं उस दोस्त से शादी कर लूं तो वह अपनी पहचान से भैया को अमेरिका में अच्छी कंपनी में जौब दिलवाने में मदद करेगा. तीसरी बात यह है कि इन की बहन को मेरे भैया पसंद करते हैं और शादी करना चाहते हैं, जो अभी अमेरिका में ही जौब कर रही है.’’

‘‘उफ, बड़ी टेढ़ी खीर है,’’ मैं बोल पड़ी.

‘‘सब सधे लोग हैं… पक्के व्यवसायी… मैं तो उस दोस्त को पसंद भी नहीं करती और न ही वह मुझे.’’

‘‘हम ही नहीं सीख पा रहे दुनियादारी.’’

‘‘सीखना पड़ेगा चिलमन… लोग हम जैसों के सिर पर पैर रख सीढि़यां चढ़ते रहेंगे… हम आंसुओं पर लंबीलंबी शायरियां लिख उन पन्नों को रूह की आग में जलाते जाएंगे.’’

‘‘तुम्हें मिलाऊंगी अर्क से… आने ही वाला है… शाम को उस के साथ मुझे डिनर पर जाना पड़ेगा… भैया का आदेश है,’’ नयनिका उदास सी बोली जा रही थी.

मैं अब यहां से निकलने की जल्दी में थी. मेरी मोहलत भी खत्म होने को आई थी.

‘ये सख्श कौन? अर्क साहब तो नहीं? फुरसत से बनाया है बनाने वाले ने,’ मैं मन ही मन अनायास सोचती चली गई.

अर्क ही थे महाशय. 5 फुट 10 इंच लंबे, गेहुंए रंग में निखरे… वाकई खूबसूरत नौजवान. उन्हें देखते मैं पहली बार छुईमुई सी हया बन गई… न जाने क्यों उन से नजरें मिलीं नहीं कि चिलमन खुद आंखों में शरमा कर पलकों के अंदर सिमट गई.

अर्क साहब मेरे चेहरे पर नजर रख खड़े हो गए. फिर नयनिका की ओर मुखाबित हुए, ‘‘ये नई मुहतरमा कौन?’’

‘‘चिलमन, मेरी बचपन की सहेली.’’

अर्क साहब ने हाथ मिलाने को मेरी ओर हाथ बढ़ाया. मैं ने हाथ तो मिलाया, पर फिर घर वालों की याद आते ही मैं असहज हो गई. मैं ने जोर दे कर कहा, ‘‘मैं चलूंगी.’’

नयनिका समझ रही थी, बोली, ‘‘हां,

तुम निकलो.’’

अर्क मुझ पर छा गए थे. मैं नयनिका से मन ही मन माफी मांग रही थी, लेकिन इस अनजाने से एहसास को जाने क्यों अब रोक पाना संभव नहीं था मेरे लिए.

कुछ दिनों बाद नयनिका ने खुशखबरी सुनाई. उस की लड़ाई कामयाब हुई थी… उसे मल्टी इंजिन ट्रेनिंग के लिए राज्य सरकार के खर्चे पर न्यूजीलैंड भेजा जाना था.

इस खुशी में उस ने मुझे रात होटल में डिनर पर बुलाया.

उस की इस खबर ने मुझ में न सिर्फ उम्मीद की किरण जगाई, बल्कि काफी हिम्मत भी दे गई. मैं ने भी आरपार की लड़ाई में उतर जाने को मन बना लिया.

होटल में अर्क को देख मैं अवाक थी और नहीं भी.

हलकेफुलके खुशीभरी माहौल में नयनिका ने मुझ से कहा, ‘‘तुम दोनों को यहां साथ बुलाने का मेरा एक मकसद है. अर्क और तुम्हारी बातों से मैं समझने लगी हूं कि यकीनन तुम दोनों एकदूसरे को पसंद करते हो वरना अर्क माफी मांगते हुए तुम्हारे मोबाइल नंबर मुझ से न मांगते… चिलमन, अर्क जानते हैं मैं किस मिट्टी की बनी हूं… यह घरगृहस्थी का तामझाम मेरे

बस का नहीं है… सब लोग एक ही सांचे में नहीं ढल सकते… मैं अभी न्यूजीलैंड चली जाऊंगी, फिर आते ही पायलट के काम में समर्पण. चिलमन तुम अर्क से आज ही अपने मन की बात कह दो.’’

अर्क खुशी से सुर्ख हो रहे थे. बोले, ‘‘अरे, ऐसा है क्या? मैं तो सोच रहा था कि मैं अकेला ही जी जला रहा हूं.’’

कुछ देर चुप रहने के बाद अर्क फिर बोले, ‘‘नयनिका के पास बड़े मकसद हैं.’’

मेरे मुंह से अचानक निकला, ‘‘मेरे पास भी थे.’’

‘‘तो बताइए न मुझे.’’

नयनिका ने कहा, ‘‘जाओ उस कोने वाली टेबल पर और औपचारिकता छोड़ कर बातें कर लो.’’

अर्क ने पूरी सचाई के साथ मेरा हाथ थाम लिया था… विदेश जा कर मेरे कैरियर को नई ऊंचाई देने का मुझ से वादा किया.

इधर शादी के मामले में अर्क ने नयनिका के घर वालों का भी मोरचा संभाला.

अब थी मेरी बारी. अर्क का साथ मिल गया तो मुझे राह दिख गई.

घर से निकलते वक्त मन भारी जरूर था, लेकिन अब डर, बेचारगी की जंजीरों से अपने पैर छुड़ाने जरूरी हो गए थे.

कानपुर से दिल्ली की फ्लाइट पकड़ी हम ने. फिर वक्त से अमेरिकन एयरवेज में दाखिल हो गए.

साहिबा आपा को फोन से सूचना दे दी कि अर्क के साथ मैं अपनी नई जिंदगी शुरू करने अमेरिका जा रही हूं. वहां माइक्रोबायोलौजी ले कर काम करूंगी और अर्क को खुश रखूंगी.’’

साहिबा आपा जैसे आसमान से गिरी हों. हकला कर पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

हमारी आजादी हिजाब हटनेभर से नहीं है आपा… हमारी आजादी में एक उड़ान होनी चाहिए.

आपा के फोन रख देने भर से हमारी आजादी की नई दास्तां शुरू हो गई थी.

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