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अजब गजब: 300 किलो की अमिता

अन्य लड़कियों की तरह अमिता रजानी भी चाहती थी कि वह अपनी पसंद के नएनए फैशन के कपड़े पहने, अपने रिश्तेदारों और जानपहचान वालों के यहां होने वाले शादीविवाह के कार्यक्रमों में शामिल हो कर एंजौय करे. लेकिन चाहते हुए भी वह ऐसा नहीं कर पा रही थी. इस की वजह थी उस का मोटापा. वह इतनी मोटी थी कि तमाम लोग उस का मजाक उड़ाते थे. उस का वजन था 300 किलोग्राम.

जाहिर है 300 किलोग्राम का इंसान अपने काम खुद नहीं कर सकता. अमिता का भी यही हाल था. काम करना तो दूर उस से ढंग से चला तक नहीं जाता था. वह बिस्तर पर या सोफे पर बैठी रहती थी. बैठेबैठे वह लैपटौप पर शेयर मार्केट से जुड़े काम करती थी. अमिता के काम करने में उस की मां ममता रजानी बहुत सहयोग करती थीं.

ऐसा नहीं है कि अमिता रजानी बचपन से मोटी थी. बचपन में अन्य बच्चों की तरह वह भी सामान्य थी लेकिन जैसेजैसे उस की उम्र बढ़ी, उस का वजन भी बढ़ता गया. जबकि वह बाजार की चीजें भी कम ही खाती थी. नतीजा यह निकला कि 16 साल की उम्र में उस का वजन 126 किलोग्राम हो गया था.

छोटी उम्र में इतना वजन बढ़ने पर उस के घर वाले भी परेशान हो गए. उन्होंने उसे ऐसा खाना देना शुरू कर दिया, जिस में कम वसा हो. लेकिन उस के वजन पर कोई फर्क नहीं पड़ा. स्कूल में तमाम बच्चे उस का मजाक उड़ाते थे. कई बच्चे तो उसे मोटी कह कर बुलाने लगे थे. अमिता मुंबई के वसई इलाके में रहती थी. अपनी कालोनी में भी वह मोटी के रूप में जानी जाने लगी थी.

घर वालों ने अमिता रजानी को कई डाक्टरों को दिखाया, लेकिन उस का वजन कम होने के बजाए बढ़ता ही गया. एक दिन ऐसा भी आया कि उस का वजन बढ़ कर 300 किलोग्राम हो गया.

इस से अमिता का शरीर बेढंगा हो गया. वह अपनी पसंद के आधुनिक डिजाइन के कपड़े तक पहनने से तरस गई. उस से चलाफिरा भी नहीं जाता था. शर्म की वजह से उस ने घर से बाहर निकलना तक बंद कर दिया. उस का अपने पैरों पर खड़ा होना तक मुश्किल हो गया था.

अमिता के मोटापे की वजह से उसे ही नहीं, उस के मांबाप को कालोनी के सब लोग जान गए. बेटी की इस हालत से वे लोग बहुत परेशान थे. समझ नहीं आ रहा था कि उस का इलाज कहां कराया जाए, जिस से वह ठीक हो जाए.

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भारत के कई बड़े डाक्टरों के अलावा उन्होंने ब्रिटेन के एंडोक्रिनोलौजिस्टों को भी दिखाया पर वे अमिता के मोटापे का सही इलाज करने में असमर्थ रहे. डाक्टरी जांचों में यह जरूर पता चल गया कि नमिता को टाइप टू की डाइबिटीज, किडनी, तनाव, सांस लेने जैसी कई समस्याएं हो गई हैं.

अमिता की एक प्राब्लम दूर नहीं हुई थी कि उसे दूसरी समस्याओं ने घेर लिया. इतना वजन बढ़ने की वजह से वह नहाने तक में असमर्थ थी. लिहाजा गीले तौलिए से उस के शरीर की सफाई की जाती थी. उस की सफाई के लिए 15-16 तौलिए इस्तेमाल होते थे.

इसी बीच अमिता रजानी के घर वालों को पुणे के बैरियाट्रिक सर्जन डा. शशांक शाह के बारे में जानकारी मिली. करीब 4 साल पहले उन्होंने डा. शशांक शाह से मुलाकात की. डा. शाह ने अमिता की सारी रिपोर्ट्स देखने के बाद भरोसा दिया कि वह अमिता का वजन कम कर तो सकते हैं, लेकिन इस में समय लगेगा. उन्हें उस की कई राउंड में सर्जरी करनी होंगी.

अमिता के मातापिता इस के लिए तैयार हो गए. क्योंकि वैसे भी अमिता पिछले 10 सालों से घर पर ही थी. अब समस्या यह थी कि 300 किलोग्राम की अमिता को मुंबई से पुणे कैसे ले जाया जाए. इस के लिए एक विशेष प्रकार की ऐंबुलेंस का इंतजाम किया गया. और एक सोफे पर बैठा कर अमिता को उस ऐंबुलेंस में सोफे सहित बैठा दिया गया.

डा. शशांक शाह ने अमिता के कई तरह की जांच कीं. इस के बाद उसे औपरेशन थिएटर तक ले जाना भी आसान नहीं था. उसे वहां तक ले जाने के लिए 20 लोगों की जरूरत पड़ी. कई डाक्टरों की टीम ने अमिता का औपरेशन किया.

इस सर्जरी के लिए खास किस्म का औपरेशन बैड और औजारों की व्यवस्था करनी पड़ी. उसे कोलेस्टाइल और सांस लेने की भी समस्या थी. इस के लिए भी 2 सर्जरी की गईं.

डा. शशांक ने इस से पहले ब्रिटेन में एक ऐसे ही 310 किलोग्राम के मरीज की सर्जरी की थी. इसलिए उन्हें अमिता की सर्जरी के समय कोई समस्या नहीं हुई. 2015 में अमिता की पहली सर्जरी के बाद ही उस का वजन कम होना शुरू हो गया था. उस की दूसरी सर्जरी सन 2017 में हुई. इस के बाद वह चलनेफिरने लगी थी. अब सन 2019 में उस का अगला औपरेशन हुआ.

औपरेशन के बाद अमिता रजानी का वजन 214 किलोग्राम कम हो गया. अब वह मात्र 86 किलोेग्राम की रह गई है. एक सामान्य महिला बन चुकी अमिता का कहना है कि पहले उसे दूसरे लोगों पर निर्भर रहना पड़ता था. जो उसे भी अच्छा नहीं लगता था.

अब वह बहुत खुश है क्योंकि अपनी पसंद के कपड़े भी पहन सकती है. डा. शशांक का कहना है कि आने वाले सालों में अमिता का वजन 10-12 किलोग्राम और कम हो जाएगा.

अमिता की सफल सर्जरी के बाद डा. शशांक शाह ने इस मामले को लिम्का बुक औफ रिकौर्ड्स के लिए भेजा है.

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कनछेदी लाल की “मुख्यमंत्री” से मुठभेड़!

पत्रकार कनछेदी लाल मुख्यमंत्री से रूबरू है . कनछेदी लाल की आज वर्षों की साध पूरी हुई थी. राज्य का धुरंधर मुख्यमंत्री साक्षात्कार के लिए आमने-सामने है. कनछेदी लाल को सुखद अनुभव हो रहा है आत्मा को परम शांति या कहें परमगति मिल गई है.श्रीमान मुख्यमंत्री से उसे बातचीत करनी है, बड़े सौभाग्य से उसे यह मौका मिला है.

कनछेदी लाल बड़े धांसू अखबार नवीस है .पैदा होते ही उन्होंने जन्म दात्री मां से प्रश्न किया- “मां ! तुम्हें आज मुझे पैदा करके कैसी अनुभूति हो रही है ?”फिर पिताश्री की ओर सवाल उछाला, -“मेरे भविष्य के लिए क्या सोच रखा है.”

अब देखिए ! कनछेदी लाल और मुख्यमंत्री आमने सामने बैठे हैं जैसे दो शांत शावक ! एक दूसरे को घूर रहे हों या कहें जैसे दो विशालकाय सर्प या  बब्बर सिंह ! एक दूसरे को घात प्रतिघात के लिए आंखों से आंखें मिलाकर खड़े हो…

कनछेदी लाल के मुंह से बोल नहीं फूट रहे हैं. वह कनछेदीलाल जो लोगों के बात बात में कान काट खाता था इस विशिष्ट मौके पर मौन है . मुंह से बोल नहीं फूट रहे .

दूसरी तरफ श्रीमान मुख्यमंत्री आत्मविश्वास से लबरेज कनछेदी लाल के सामने बैठे हैं .जाने कितने पत्रकार, संपादकों को उन्होंने पानी पिलाया है, यह अब तो उन्हें भी स्मरण नहीं .मगर कनछेदी लाल के बारे में उन्होंने जो रिपोर्ट देखी है वह स्वयं चकित है ऐसा भी होता है अरे यह कनछेदी लाल तो जन्म लेते ही अपने मां बाप से भिड़ गया था. बड़ा खतरनाक खबरैलू है.

मुख्यमंत्री मोहक मुस्कान बिखेरते हुए बोले -“कहो कनछेदी लाल, क्या जानना चाहते हो ?
मानौ पत्रकारिता ध्वस्त होकर चरमरा कर गिर पड़ी हो. पत्रकारिता के माथे पर किसी ने मुद्गर चला दिया हो या पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो. अभी तक का इतिहास रहा है कनछेदी लाल कभी भी प्रश्न का ब्रह्मास्त्र छोड़ने में एक सेकंड भी देर नहीं करते, मगर आज तो श्रीमान मुख्यमंत्री ने बाजी मार ली. कुर्सी को नमन है सत्ता को प्रणाम है.

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कनछेदी लाल को आत्मा ने मानौ धिक्कारा -“रे कनछेदी! तू इतना असहाय कब से हो गया. एक मुख्यमंत्री के सामने हथियार डाल दिए थू है तुझ पर .तू तो बड़ा पत्रकार बनता था कहां गया तेरा वह जज्बा जिसमें बड़े धुरंधर धूल में ओटते दिखा करते थे। अरे! यह मुख्यमंत्री, यह सत्ता तो आती जाती रहेगी मगर तुझे यही रहना है जवाब देना होगा.”

अब जब आत्मा जागृत हुई तो कनछेदी लाल ने पत्रकारिता का ब्रह्मास्त्र निकाला-” श्रीमान ! क्या मुख्यमंत्री का काम सिर्फ आईएएस, आईपीएस के तबादले करना ही है ? और कुछ भी नहीं… सप्ताह 15 दिवस में आप यही करते है.”

कनछेदी लाल के पहले प्रश्न से ही श्रीमान मुख्यमंत्री भीतर तक हिल गए.सोचने लगे यह कनछेदीलाल तो हृदय की सच्चाई बयां कर रहा है सच है, मैं और करता ही क्या हूं । इसने तो मेरी नब्ज पर हाथ रखा है मगर मैं भी कोई कम बड़ा खिलाड़ी नहीं, देखना, कैसा प्रतिउत्तर देता हूं .यह सोचते-सोचते श्रीमान मुख्यमंत्री के चेहरे पर मुस्कान तिर आई, बोले, “कनछेदी लाल ! हमारा पहला और आखरी काम प्रशासन के घोड़े पर लगाम रखना है यह कस कर रखने पर ही प्रदेश में अमन चैन कायम रहता है अन्यथा प्रदेश के हालात भयावह हो सकते हैं.”

यह कह कर श्रीमान मुख्यमंत्री सोचने लगे मैंने कैसा उल्लू बनाया इस कनछेदी लाल को. और जब प्रदेश की जनता यह जवाब सुनेगी तो ताली बजायेगी. निरी मूर्ख है यह जनता जनार्दन. हर एक मुख्यमंत्री तो यही करता है मगर क्या स्थिति-परिस्थिति बदलती है, नहीं न ! यह सोच असहाय श्रीमान मुख्यमंत्री ने कंधे झटके और कनछेदी लाल की और असहाय भाव से दृष्टिपात किया .

कनछेदी लाल मन ही मन भांप गए थे, श्रीमान मुख्यमंत्री की बत्ती गुल हो गई है. अपने कंधे पर शाबाशी की काल्पनिक धौल जमाते कनछेदी लाल ने दूसरा प्रश्न दागा- “श्रीमान! आपने शपथ लेते ही प्रदेश की जनता को वचन दिया था की कानून-व्यवस्था कायम रहेगी. मगर वह तो द्रोपदी के चीर की भांती रोज, नित्य प्रति हरण हो रही है.”

श्रीमान मुख्यमंत्री का मुंह सुख गया.ऐसे यक्ष प्रश्न की तो उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. वह इधर-उधर ताकने लगे यह प्रश्न तो मेरे मन मंदिर में सदैव घंटी बजाता है. यह इस कनछेदी लाल को कैसे खबर हो गई, मगर चेहरे पर मुस्कान ला कर श्रीमान मुख्यमंत्री ने कहा, “हां… यह सच है. मैं आज भी अपने वचन पर कायम हूं मगर यह तो सभी प्रदेशों के हालात हैं. कहां, कानून व्यवस्था के साथ नग्न नाच नहीं हो रहा. दरअसर इसके लिए जनता को कानून का साथ देना होगा .” मुख्यमंत्री यह कह कर इधर-उधर तकने लगे, तो कनछेदी लाल समझ गए चीफ मिनिस्टर अब दूसरे प्रश्न की अपेक्षा कर रहे हैं.
कनछेदी लाल ने अपनी तरकश से तीसरा प्रश्न निकाला और कहा-” श्रीमान मुख्यमंत्री जी ! मैं किसानों की समस्या पर प्रश्न नहीं करता, मैं बेरोजगारों की समस्या और भ्रष्टाचार की बात नहीं करता, मैं आपसे आप की पार्टी के कार्यकर्ताओं के संबंध में यह जानना चाहता हूं कि पार्टी के सैकड़ों हजारों कार्यकर्ता, जिनके पास कोई काम धंधा नहीं है,वह हवा पी कर जिंदा हैं क्या, वह फलते-फूलते कैसे हैं, यह रहस्य है, क्या इसका जवाब आप देंगे.”

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श्रीमान मुख्यमंत्री ने मानौ राहत की सांस ली, यह प्रश्न उन्हें बड़ी राहत दे रहा था. उन्होंने सोच लिया कनछेदी लाल को वीआईपी क्षेत्र में एक भूखंड गिफ्ट कर देंगे यह प्रश्न करके उन्होंने पत्रकारिता धर्म का गला दबाने का काम ईमानदारी से किया है. इतने इनाम के हकदार तो अब यह हो जाते हैं .

श्रीमान मुख्यमंत्री ने प्रसन्न भाव से प्रश्न का जवाब दिया फिर कहा चलो ! फिर कभी मिलते हैं… तुम्हारे लिए एक छोटी सी गिफ्ट है जो लेते जाना. उन्होंने पीए की ओर इशारा कर दिया.

कनछेदी लाल मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए. आज पत्रकारिता धर्म का जैसा निर्वाहन किया वह ऐतिहासिक था. ऐसी सफलता तो उन्हें जीवन भर मेहनत करके भी नहीं मिलती जो चार प्रश्न दाग कर मिल गई . मानौ मुख्यमंत्री का साक्षात्कार नहीं था, यह गंगा स्नान था.कनछेदी लाल के कान लाल सुर्ख हो गए थे. वे खुशी-खुशी हाथों में कलम की जगह खंजर लेकर घर की ओर लौटने लगे.

राजपूतों का सपा से मोहभंग

नीरज शेखर के समाजवादी पार्टी छोड़ भाजपा में शामिल होने के बाद एक बार फिर यह चर्चा गरम है कि समाजवादी पार्टी से राजपूत नेताओं का मोहभंग हो चुका है. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही एक के बाद एक राजपूत नेता सपा को छोड़ कर भाजपा में शामिल हो रहे हें. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के खासे करीबी माने जाते थे. अखिलेश के कई फैसलों में नीरज शेखर की अहम सहमति रहा करती थी. मगर उन्हें भी पार्टी में रोक पाने में अखिलेश नाकाम रहे. दरअसल 2019 के लोकसभा चुनाव में नीरज शेखर बलिया से टिकट चाहते थे. बलिया में उनका काफी दबदबा है, मगर ऐसा न होने से वे अखिलेश से नाराज चल रहे थे.

बलिया से लगातार सांसद रहने के बाद देश के प्रधानमंत्री बने स्व. चंद्रशेखर के परिवार से दूरी समाजवादी पार्टी को काफी भारी पड़ सकती है. गौरतलब है कि बलिया पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की परंपरागत सीट रही है. 2007 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में नीरज शेखर को समाजवादी पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया और सपा के टिकट पर वह पहली बार सांसद बने. इसके बाद 2009 के आम चुनाव में भी नीरज ने सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और दूसरी बार सांसद बने. मगर 2014 के लोकसभा चुनाव में बलिया की सीट पहली बार मोदी लहर में भाजपा के खाते में चली गयी. इसके बाद भी समाजवादी पार्टी ने चंद्रशेखर परिवार से अपने रिश्ते को मजबूती देते हुए नीरज शेखर को राज्यसभा सदस्य बनाया. 2019 कि लोकसभा के लिए सपा-बसपा गठबंधन हुआ और इस गठबंधन ने ही नीरज शेखर की सपा से दूरी बना दी.

दरअसल नीरज शेखर अपने पुश्तैनी संसदीय क्षेत्र बलिया से खुद या अपनी पत्नी को चुनाव लड़ाना चाहते थे. अखिलेश की ओर से उन्हें पूरा आश्वासन भी दिया गया था परंतु ऐन वक्त पर बहनजी के दबाव में अखिलेश के इनकार से नीरज काफी आहत हो गये. उनकी नाराजगी इसलिए ज्यादा थी कि बलिया का टिकट बसपा के इशारे पर दिया गया. लोकसभा चुनाव में बलिया की सीट सपा-बसपा बंटवारे में समाजवादी पार्टी के खाते में थी. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की इस परंपरागत सीट से नीरज शेखर या उनकी पत्नी का लड़ना तय माना जा रहा था. नीरज राज्यसभा सदस्य भी थे, लिहाजा माना जा रहा था कि समाजवादी पार्टी अपनी एक सीट कम नहीं करेगी. ऐसे में नीरज शेखर की पत्नी डॉ. सुषमा शेखर को उम्मीदवार बनाने पर मंथन हो ही रहा था कि ऐन मौके पर चंद्रशेखर की विरासत पर विराम लगाते हुए सपा ने यहां से सनातन पांडे को उम्मीदवार बना दिया. अखिलेश के इस फैसले ने नीरज का दिल तोड़ दिया. नीरज पहले ही यह मान रहे थे कि बसपा के साथ गठजोड़ सपा के लिए आत्मघाती कदम साबित होगा, और वह हुआ भी. अब नीरज के पार्टी छोड़ने से सपा के भीतर क्षत्रिय वोटों का समीकरण भी गड़बड़ाएगा. नीरज शेखर के सपा से इस्तीफे और उनके भाजपा से जुड़ने के बाद भाजपा की जड़ें न केवल पूर्वांचल में मजबूत होंगी वरन राज्यसभा के भीतर सपा की ताकत घटने का लाभ भी उसे मिलेगा. खबर तो यह भी है कि नीरज के कई समर्थक और समाजवादी पार्टी के कई बड़े नेता अब भाजपा नेतृत्व के संपर्क में हैं और आने वाले चंद दिनों में कई और लोग सपा का दामन छोड़ कर भाजपा में शामिल होंगे.

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गौरतलब है कि यादव, मुसलमान और राजपूत समुदाय ही सपा का मूल वोटबैंक था. इसी गठजोड़ में सपा की ताकत निहित थी, मगर मुसलमान पहले ही सपा से निराश हैं. अबकी लोकसभा में सपा का मुस्लिम वोट कांग्रेस, भाजपा और बसपा के बीच बंट गया. अब राजपूतों के भी छिटकने से यह साफ दिख रहा है कि अपने पिता मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत को संभालने और सहेजने में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार नाकाम हो रहे हैं. पार्टी की प्रतिष्ठा बचाने व समाजवादी दिग्गजों को संभालने में वह पूरी तरह फेल हैं.

उल्लेखनीय है कि मुलायम सिंह यादव ने जिस तरह मौलाना मुलायम बन कर मुसलमानों को साध रखा था और अपने मित्र अमर सिंह के जरिये उन्होंने जिस तरह प्रदेश के ठाकुर-क्षत्रीय-भूमिहारों को पार्टी से जोड़े रखा था, वह गुण और कला अखिलेश में कतई नहीं है. मुलायम के जमाने में पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक के राजपूत नेता साइकिल पर सवार थे. अमर सिंह, रघुराज प्रताप सिंह और बृजभूषण शरण सिंह जैसे प्रतापी नेताओं ने पूरे प्रदेश के राजपूत समुदाय को सपा से जोड़े रखा. सपा के राष्ट्रीय संगठन से लेकर जिला संगठन तक में राजपूत छाये रहे. वर्ष 2003 में प्रदेश में सपा की सरकार बनाने में राजपूतों का अहम रोल रहा. राजपूतों को पार्टी से जोड़ने में अहम रोल अमर सिंह का था. मुलायम के दाहिने हाथ कहे जाने वाले अमर सिंह का पार्टी में काफी रुतबा था. वे पार्टी के अहम फैसले लिया करते थे और मुलायम सिंह यादव उनके फैसलों को सिर-माथे पर रखते थे. मुलायम के वक्त सपा में अमर सिंह की तूती बोलती थी, लेकिन शिवपाल और अखिलेश के बीच हुई वर्चस्व की जंग के बाद उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. मुलायम भी दोस्त और बेटे के बीच फंस गये और मजबूरन उन्हें बेटे का साथ देना पड़ा. अमर सिंह के पार्टी से बाहर होने के बाद और पार्टी की कमान अखिलेश के हाथों में आने के बाद धीरे-धीरे राजपूत नेताओं ने सपा से किनारा करना शुरू कर दिया. यह फेहरिस्त काफी लम्बी है, जिसमें मयंकेश्वर शरण सिंह, राज किशोर सिंह, बृजभूषण शरण सिंह, राजा अरिदमन सिंह, कीर्तिवर्धन सिंह, आनंद सिंह, अक्षय प्रताप सिंह, रघुराज प्रताप सिंह और यशवंत सिंह जैसे कद्दावर नेताओं का नाम उल्लेखनीय है. 2014 के लोकसभा चुनाव से सूबे में राजपूत नेताओं के सपा का साथ छोड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ है वह यथावत जारी है. सपा का साथ छोड़ने वाले ज्यादातर नेताओं ने भाजपा का दामन थाम लिया है.

देश के वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह कभी उत्तर प्रदेश के कद्दावर राजपूत नेता थे. वर्ष 2002 में राजनाथ सिंह के उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर आने के बाद राजपूत समुदाय का झुकाव सपा की ओर हुआ था. अमर सिंह ने इस मौके का खूब फायदा उठाया था और उनके प्रयासों से प्रदेश का राजपूत समुदाय समाजवादी पार्टी का मजबूत स्तम्भ बन गया था. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में जब राजनाथ सिंह ने राजधानी लखनऊ से पर्चा भरा तो सपा से नाखुश राजपूत भाजपा की ओर झुक गये. वहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी राजपूत बिरादरी से सम्बन्ध रखते हैं. उनका चार्म भी राजपूतों को भाजपा के पाले में खींचने के लिए उत्तरदायी है.

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गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में राजपूत आठ फीसदी के आस-पास हैं. उत्तर प्रदेश में संख्या के हिसाब से यह बड़ी जाति नहीं है लेकिन राजनीतिक रूप से 90 के दशक तक यह जाति बहुत महत्वपूर्ण रही है. राजपूत सामाजिक रूप से दबदबे वाले, ग्रामीण उच्च वर्ग के प्रतिनिधि, लाठी से मजबूत एवं ओपिनियन बनाने वाले माने जाते हैं. चुनावों में लाठी से मजबूत होने के कारण बूथ मैनेजमेंट में यह जाति काफी प्रभावी रहती है. इसीलिए पार्टियों के प्रभावी राजनीतिक नेतृत्व के रूप में यह जाति हमेशा छायी रही है. इनके दबदबे में गांव के गांव अपना वोट सपा की झोली में डाल देते हैं. अब जबकि राजपूत नेता सपा का दामन छोड़ कर लगातार भाजपा में शामिल हो रहे हैं, तो 2020 के विधानसभा चुनाव में सपा के लिए परिस्थितियां काफी विकट होने वाली हैं, इसमें कोई दोराय नहीं है. अब सिर्फ पिछड़ों और यादवों के भरोसे तो सपा की साइकिल चलने से रही. समाजवादी पार्टी में बसपा से गठबंधन को लेकर पनपा असंतोष भी कायम है. इसके साथ ही लोकसभा चुनाव के वक्त टिकटों के बंटवारे से गहराया गुस्सा भी कम नहीं हुआ है. पार्टी में चंद्रशेखर परिवार से वर्षों पुराना नाता टूट जाने से चिन्ता और गहरी हो गयी है. इससे समाजवादी आंदोलन की धार कुंद होने और पूर्वांचल में जनाधार घटने का डर भी अखिलेश को सता रहा है. नीरज शेखर का समाजवादी पार्टी को छोड़ना पार्टी के लिए पूर्वांचल में एक बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है.

फोटो वायरल: 80 की उम्र में ऐसे दिखेंगे दीपिका-रणवीर

दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह बौलीवुड के मशहूर जोड़ियों में से एक हैं. ये अपने फिल्मी कैरियर के साथ-साथ पर्सनल लाइफ में भी सक्सेस हैं. दरअसल इन दिनों दीपिका-रणवीर के फैनक्लब पर कपल की एक फोटो वायरल हो रही है, जिसमें बताया गया है कपल 80 साल का हो जाने पर कैसा लगेगा.

ये तस्वीर किसी फैन ने एज ओल्ड फिल्टर का इस्तेमाल करके बनाई है. जिस तस्वीर पर ये एक्सपेरिमेंट किया गया है वो दीपिका और रणवीर के रिसेप्शन पार्टी की है. तस्वीर में उनके चेहरे पर झुर्रियां दिख रही हैं. रणवीर की दाढ़ी और बाल सफेद हो गए हैं. लेकिन फिर भी वे काफी स्टाइलिश दिखाई दे रहे हैं और दीपिका भी बेहद खूबसूरत नजर आ रही हैं. ये कपल बुढ़ापे में भी स्टाइलिश दिखेंगे.

 

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आपको बता दें, इस साल रणवीर सिंह की गली बौय रिलीज हुई थी. मूवी ने बौक्स औफिस पर अच्छा बिजनेस किया था. इन दिनों वे फिल्म 83 की शूटिंग में बिजी हैं, जिसमें वे टीम इंडिया के पूर्व कप्तान कपिल देव की भूमिका निभाएंगे. 83 के बाद वे तख्त की शूटिंग शुरू करेंगे. वहीं दीपिका पादुकोण छपाक में नजर आएंगी. ये फिल्म अगले साल रिलीज होगी. छपाक का निर्देशन मेघना गुलजार ने किया है, इसमें दीपिका एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल के रोल में नजर आएंगी.

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प्रिन्स चार्ल्स के चैरिटी बौल में शामिल हुई कनिका कपूर

  • कनिका कपूर बी-टाउन में एक लोकप्रिय नाम है, उन्होंने बेबी डौल, टुकुर टुकुर, बीट पे बूटी, डा दा दास और कमली जैसे चार्ट बास्टिंग सौंग से काफी सफलता और शोहरत हासिल की हैं. कनिका को उनके आत्मीय गीतों के लिए बहुत सराहा जाता है, उन्हें अपने प्रशंसकों द्वारा फैशन की भावना के लिए समान रूप से पसंद  की जाती है. हाल ही में एनिमल बौल में कनिका की उपस्थिति ने फिर से उनके व्यक्तित्व को फैशनिस्ट होने की गवाही दी.

बहुमुखी गायक को हाल ही में ब्रिटिश एशियाई ट्रस्ट के राजदूत के रूप में साइन किया गया था. सम्मान जनक टैग के जरिये  कनिका को एलीफेंट फैमिली द्वारा आयोजित एनिमल बौल में शामिल हुई. एलीफेंट फैमिली एक चैरिटी फाउंडेशन है जो मूल रूप से मार्क शैंड द्वारा शुरू किया गया है. इस संगठन का उद्देश्य एशियाई हाथियों के जीवन की गुणवत्ता को सुरक्षित और बेहतर बनाना है. इस चैरिटी बौल को प्रिंस चार्ल्स और कैमिला ने लंदन में अपने घर क्लेरेंस हाउस में होस्ट किया.

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इस बौल में कनिका बहुत ही आकर्षित लग रही थी, जहां उन्होंने अनीता डोंगरे द्वारा डिजाइन किया गया. हाथी प्रेरित सिर वाला गियर पहनकर नेक उद्देश्य का समर्थन किया और इसके साथ ही उन्होंने  एलेक्जेंडर्मस्कीन के क्लासिक ब्लैक गाउन पहन था जो उनपर और भी शानदार लग रहा था.

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कनिका कहती हैं, “मैं ब्रिटिश एशियन ट्रस्ट के राजदूत होने के नाते बहुत गर्व महसूस कर रही हूं, और यह एलीफेंट परिवार और, एशियन ट्रस्ट के साथ जुड़ा होना एक सम्मान की बात है. प्रिंस चार्ल्स से मिलना हमेशा एक सौभाग्य की बात है और वे चैरिटी के लिए मेजबानी भी करते है,  यह एक बेहतरीन अनुभव था.”

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पृथ्वी का सौंदर्य “स्विट्जरलैंड”

संसार के सब से सुंदर देशों में स्विट्जरलैंड की गणना होती है. यह बात अकारण नहीं है. इसे नयनाभिराम बनाने में प्रकृति का सब से बड़ा हाथ है. बर्फ से लदी ऊंचीऊंची पर्वत चोटियां, अत्यंत स्वच्छ वातावरण, शीतल पवन, शुद्ध जल एवं बहुत ही सुंदर लोग. वातावरण की शुद्धता ही शायद वह महत्त्वपूर्ण कारक है कि यहां अत्यंत सूक्ष्म यंत्र एवं दवाओं का निर्माण होता है. स्विस मेड घडि़यों को भला कौन नहीं जानता.

राइन फौल्स

जरमनी के ब्लैक फौरेस्ट इलाके से प्रस्थान करने के बाद हम इस देश की सीमा में दाखिल हुए. पहला पड़ाव था राइन फौल्स के पास. यह स्थान पर्यटकों को काफी लुभाता है. इस की गिनती पर्यटन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थलों में होती है. यहां करीब 80-90 फुट चौड़ाई वाली राइन नदी 30-40 फुट ऊंचाई से सीढ़ीनुमा चबूतरे पर हरहरा कर गिरती है. चारों तरफ जहां पानी का फेन ही फेन दिखाई पड़ता है वहीं कुछ दूर तक हवा में बादल सा भी बन जाता है. प्रपात के गिरने के स्थान से थोड़ी दूरी पर ही उद्वेलित जल शांत होने लगता है और कुछ नावें नदी की सतह पर दिखाई देने लगती हैं. कुछ ऐडवैंचर के शौकीन नाव से प्रपात का आनंद निकट से लेने के लिए उधर जाने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे.

टूरिस्टों की सुविधा हेतु वहां एक विशाल ठेला भी नजर आया जिस में हिंदुस्तानी समोसा, पावभाजी, वड़ा, चाय और कौफी मिल रहे थे. इन के अलावा कुछ यूरोपियन स्नैक्स भी उपलब्ध थे. उन के रेट्स की बात मत पूछिए. भारतीय मुद्रा के हिसाब से काफी महंगे थे. स्विट्जरलैंड के इस सुदूर कोने में इंडियन स्नैक्स बिकते देखना एक सुखद अनुभूति थी. उस से भी आश्चर्य यह देख कर हुआ कि उस अनजान स्थल पर मात्र वही एक दुकान थी जहां हलके नाश्तेपानी की व्यवस्था थी. क्या इसे मात्र संयोग कहा जाए. इस का कारण शायद यह है कि इन दिनों बड़ी संख्या में हिंदुस्तानी छुट्टियों में या वैसे भी, परिवार के साथ विदेश भ्रमण हेतु निकल रहे हैं. इस प्रकार के ठेले वाले हिंदुस्तानी लोगों की आवश्यकता के लिए बने हैं क्योंकि वे उन के स्वाद के मुताबिक चीजें उपलब्ध करा रहे हैं. इस अत्याधुनिक ठेले पर काम करने वाले भारतीय ही प्रतीत हो रहे थे.

रात होतेहोते हम स्विट्जरलैंड की राजधानी जूरिख स्थित होटल नोवोटेल पहुंचे जहां हमारे ठहरने की व्यवस्था कराई गई थी. दिनभर की बस यात्रा से थकान हो गई थी और शरीर आराम मांग रहा था. खुशी इसी बात की थी कि इस देश में हमारा 2 दिनों का प्रोग्राम था. स्विट्जरलैंड की यात्रा अधूरी ही रह जाएगी यदि माउंट टिटलिस न जाया जाए. यहां आने के लिए हमें एंगिलबर्ग नामक छोटे से कसबे में आना था, जहां के होटल आइडलवाइस में हमारे ठहरने का प्रबंध किया गया था. बताया गया कि इस जगह की पूरी आबादी लगभग 1 हजार है. पूरा कसबा, लगता है एक बड़े कटोरे में बसा है. चारों ओर ऊंचीऊंची और कहींकहीं बर्फ से लदी पहाडि़यां, घुमावदार सड़कें और साफसुथरी गलियां मन को बरबस मोह लेती थीं. ऐसा प्रतीत होता था जैसे हमारे आने के कुछ ही समय पहले सड़कों पर किसी ने अच्छी तरह झाड़ू से साफसफाई की हो. इतनी स्वच्छता का मुख्य कारण था हवा में धूल कणों का सर्वथा अभाव. न गरमी पड़ती है, न हवा गरम होती है, न धूल उड़ती है, न गंदगी फैलती है. पहाड़ की ढलानों पर बसे छोटेछोटे कोनेदार रंगीन छतों वाले मकान बड़ेबड़े खिलौनों की तरह लगते थे. उन्हीं की तरह ढलानों एवं जमीन पर विभिन्न डिजाइनों में बने बड़ेबड़े होटल, हवा में लहराते रंगीन झंडों के कारण बड़े मनभावन लग रहे थे. शायद बहुत कम आबादी होने के कारण बाजार एवं गलियां अकसर लोगों से खालीखाली दिखीं.

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ऊंचाई पर बने होटल में प्रवेश करने के लिए 2-2 स्टेज की लिफ्ट लगी है. दोनों स्टेजों पर एक सुरंग से पहुंचा जाता है. ऐसा लगा कि सुरंग वाला रास्ता सर्वसाधारण के लिए न हो कर केवल होटल में ठहरने वालों के लिए ही बना है क्योंकि जहां स्थानीय निवासी ऊंचीनीची घुमावदार सड़कों से हो कर, अपने घर में जाने के आदी थे. अपने भारत देश के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले भी इस प्रकार की जिंदगी से वाकिफ हैं. होटल के टेरेस से बड़ा दिलकश नजारा देखने को मिला. जिधर नजर घुमाइए, देखिए ऊंचे पहाड़. कुछ बर्फ की चादर ओढ़े, कुछ वैसे ही नंगे. ये पहाड़ शायद अल्पाइन रेंज का ही हिस्सा हैं. अब था कल का इंतजार. जब हम केबल कार से माउंट टिटलिस की सैर पर जाएंगे.

माउंट टिटलिस

हमारे होटल से मात्र डेढ़दो किलोमीटर पर ही वह स्थान था जहां से पहाड़ के ऊपर जाने के लिए केबल कार मिलती है. जमीन से ऊपर चोटी तक, थोड़ीथोड़ी दूर पर विशाल एवं मजबूत खंभे गड़े हैं. इन के बीच खिंचे मोटे रस्सों पर ही केबल कारें कुछकुछ समय के अंतराल पर आतीजाती रहती हैं. हरेक केबल कार में 6 आदमियों के बैठने की जगह है. एक ऊंचे प्लेटफौर्म से सभी कारें स्टार्ट होती हैं. धीरेधीरे सरकती कारों में सवारियों को लगभग दौड़ते हुए अपनी जगह लेनी होती है. वरना कारें आगे बढ़ जाएंगी. पता नहीं यहां कितनी कारें इस तरह की हैं. चाह कर भी ये नहीं गिनी जा सकतीं, क्योंकि इन की आवाजाही, अप और डाउन, दोनों लाइनों पर निरंतर लगी रहती है क्योंकि पहाड़ की चढ़ाई एकदम खड़ी है, इसलिए ये तिरछी हो कर ऊपर चढ़ती जाती हैं.

पहाड़ के अंतिम पौइंट पर जाने के लिए यात्रा 3 स्टेजों में संपन्न होती है. पहले स्टेज पर एक लंबाचौड़ा चबूतरा मिलता है. वहां किसी तकनीकी कारण से कारें एकडेढ़ मिनट के लिए रोक दी जाती हैं. जैसे ही हम दूसरे स्टेज पर आते हैं, पुरानी कार को छोड़ कर दूसरी, काफी बड़ी पिंजरानुमा कार में चढ़ जाना होता है. कम से कम 40-50 आदमी हड़बड़ा कर इस गोल पिंजरे में घुस गए. कार के केंद्र में एक गोलाकार सीट थी, जिस पर किसी प्रकार 8-10 लोग बैठ सके किसी लोकल ट्रेन की तरह. जैसे ही पिंजरे का गेट बंद हुआ, केबल कार तिरछी हो कर ऊपर की ओर चढ़ने लगी. अब वह केवल चढ़ ही नहीं रही थी, बाएं से दाएं धीरेधीरे घूम भी रही थी. संसार में यही एक केबल कार है, जो रोटेट भी होती है. कार की छत पर चारों ओर विभिन्न भाषाओं में यात्रियों का इस केबल कार में स्वागत किया गया और सेवा का अवसर प्रदान करने के लिए उन का धन्यवाद ज्ञापन भी किया गया. 2 स्थानों पर हिंदी में भी यह संदेश लिखा हुआ मिला. अनजान जगह में हिंदी का प्रयोग देख कर गौरव एवंआनंद दोनों हुआ कि हमारी हिंदी यहां भी पहुंच गई है.

थोड़ी देर बाद केबल कार आखिरी मंजिल पर पहुंची. वहां चारों ओर बर्फ ही बर्फ दिखाई पड़ती थी. कोहरे में जिस तरह का नीम अंधेरा चारों ओर छाया रहता है, कुछ वैसा ही दृश्य था वहां. कंपकंपाने वाली ठंडी हवा भी चल रही थी. बहुत लोगों ने अतिउत्साह में बर्फ की ऊंचाइयों पर चलना भी शुरू कर दिया था. कुछ लोग एकदूसरे पर बर्फ के गोले बना कर फेंक रहे थे. इसी मुद्रा में न जाने कितने कैमरे क्लिक हो रहे थे. इस अंतिम मंजिल पर सरकार की ओर से सुरक्षा की पूरी व्यवस्था थी ताकि किसी तरह का खतरा न हो. चारों ओर इस प्रकार से रेलिंग एवं जाल की व्यवस्था की गई थी कि मनोरंजन के लिए भागदौड़ के क्रम में कोई फिसल कर गिर न पड़े. खुले में बर्फ पर जाने के लिए सब को एक टैरेस से आगे जाना होता है. टैरेस की

सुंदरता बढ़ाने के लिए रंगबिरंगे दर्जनों झंडे हवा में लहराते रहते हैं. टैरेस के प्रारंभ में एक अत्यंत अनपेक्षित चीज देखने को मिली. वह थी हिंदी फिल्म ‘दिलवाले दुलहनियांले जाएंगे’ का एक 5-6 फुट का कटआउट, जिस में मशहूर अभिनेता शाहरुख खान और काजोल एक डांसिंग पोज में हमें देख रहे हैं, कुछ ऐसा ही प्रतीत हो रहा था. देख कर अचरज और खुशी दोनों हुई. कटआउट के सामने से गुजरने वाले थोड़ी देर के लिए वहां रुकते, मुसकराते हुए निहारते और आगे बढ़ जाते. देखा, कुछ जापानी पर्यटक बारीबारी से शाहरुख के गले लग कर, काजोल के गले लग कर, अपनी तसवीरें खिंचवा रहे थे.

ऐसा ही देखने को मिला था लंदन के मैडम तुसाद म्यूजियम में, जहां माधुरी दीक्षित एवं ऐश्वर्या राय के मोम के पुतलों से गले लग कर विभिन्न पोजों में फोटो खिंचाने की होड़ मची हुई थी. पहाड़ के अंतिम स्टेज पर, जिस की ऊंचाई 3020 मीटर यानी 10 हजार फुट है, यात्रियों की सुविधा की सारी व्यवस्था की गई है. खानपान के स्टौलों के अतिरिक्त शौचालय भी बने थे. पहाड़ की चोटी पर करीब 1 घंटा बिताने के बाद वापसी यात्रा प्रारंभ हुई. सब से ज्यादा अचरज इसी बात का था कि झूलती हुई रस्सियों पर एकसाथ कई रोटेटिंग कारें, जिन में प्रत्येक में 40-50 यात्री भरे होते हैं, आतीजाती रहती हैं. ये रस्सियां कैसे इतना तनावभरा वजन बरदाश्त कर लेती हैं. यह भी किसी अचरज से कम नहीं था, आखिर किस धातु की बनी हैं ये. अगर कहीं इन में एक भी टूट जाए तो क्या होगा. सोच कर ही मन अशांत हो जाता था. परंतु इन्हें ऐसी तकनीक से बनाया गया है कि किसी दुर्घटना की आशंका ही नहीं.

लूजर्न लेक

पहाड़ से उतरने के बाद लूजर्न लेक में नौकाविहार करने को लूजर्न आए. यह लंबीचौड़ी झील बहुत खूबसूरत है. किनारे पर बहुत सी सफेद बतखें जल में तरहतरह के करतब कर रही थीं. नौकाविहार के लिए टूरिस्टों की भीड़ लगी थी. जैसे ही 1-2 मंजिला जहाज जेट्टी से स्टार्ट करता, पीछे लगे दूसरे जहाज में लोग बैठना शुरू कर देते थे. पर हमारे जहाज के छूटने में 40-50 मिनटों की देर थी क्योंकि सभी के छूटनेपहुंचने का टाइम फिक्स्ड था. इसी बीच, जेट्टी के नजदीक, सड़क किनारे लगी एक बैंच पर बैठ कर मैं शहर के चौक का नजारा लेने लगा. देखा कि यहां 3 तरह की ट्रामें चलती हैं. एक तो कोलकाता की तरह, जिस में लोहे के पहिए लगे हैं और ऊपर बिजली से पावर मिल रहा है. दूसरा, जिसे पावर तो उपर से मिल रहा है पर टायर वाले पहिए लगे हैं. तीसरी तरह की वह, जिस में डीजल इंजन लगे थे. किसी ट्राम में 3-4 से ज्यादा बोगियां नहीं थीं. शहरी यातायात की समस्या के हल करने की दिशा में यह एक रोचक प्रयोग लगा. इसी प्रकार का आंशिक प्रयोग जरमनी के कोलोन शहर में देखने को मिला था पर वहां सिर्फ टायर से चलने वाली रेलगाडि़यां ही थीं.

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इसी बीच, दूसरा जहाज तैयार हो गया था. कुछ यात्रियों के साथ मैं ऊपर वाले डैक पर बैठ गया. वहां से चारों तरफ का अच्छा नजारा देखने को मिलता है. वैसे निचले डैक का अपना ही मजा है. वहां से पानी की ऊपरनीचे होती लहरों को आदमी पास से देख सकता है. इस लंबीचौड़ी झील का पानी काफी साफ एवं ठंडा होने के साथ आसमानी नीला भी है. जल विहार के बाद थकेमांदे शाम को होटल लौटे क्योंकि अगले ही दिन आस्ट्रिया के लिए प्रस्थान करने का कार्यक्रम था.

बर्फ के नीचे मेहमाननवाजी

माउंट टिटलिस की सुंदरता से अगर पर्यटक ज्यादा ही प्रभावित हो गए हों तो यहां रात में भी रुक सकते हैं. पर्यटकों के लिए इसी बर्फीली पहाड़ी पर इग्लू बनाए गए हैं जिस में स्पा से ले कर, मल्टीकुजीन डिशेज, हौट वाटर बाथ से ले कर सारी लक्जरी सुविधाएं उपलब्ध हैं. इन इग्लू में अंदर डबल बैडरूम से ले कर आधुनिक वाशरूम उपलब्ध हैं. रात्रि को यहां कैंपफावर भी आयोजित किया जाता है जहां मनोरंजन के सभी साधन उपलब्ध रहते हैं.

ऐसे करें टमाटर फेशियल

चेहरे के लिए टोमैटो फेशियल काफी फायदेमंद है क्योंकि इसमें नेचुरल क्लींजिंग गुण पाए जाते हैं. टमाटर चेहरे को अच्छी तरह क्लिन करता है. चेहरे पर आप टमाटर को कई तरीके से लगा सकते हैं. तो चलिए जानते हैं, आप चेहरे पर टमाटर को किस तरह से लगाएं.

  • चेहरे को क्लिन करने के लिए आधे टमाटर के पल्प में चीनी मिलाकर 5 मिनट तक चेहरे पर मलें। इसके बाद साफ पानी से चेहरा थोकर हल्के हाथ से पोंछ लें. इसके अलावा भी कई तरीकों से क्लींजिंग की जा सकती है.

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  • टमाटर के रस और दूध को मिलाकर चेहरे पर एक से दो मिनट तक मालिश करें. अब नौर्मल पानी से मुंह धो लें. टमाटर जहां चेहरा क्लीन करता है वहीं दूध मौइश्चराइजिंग के काम आता है.
  • चेहरे से डेड स्किन को हटाने के लिए आप टमाटर के गूदे को निकालकर उसमें चीनी मिक्स करके चेहरे पर दो से तीन मिनट तक मालिश करें. आप चाहें तो चीनी की जगह ओटमील का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इस स्क्रब का इस्तेमाल करने से चेहरे की सारी डेड स्किन दूर हो जाएगी. उसके बाद आप साफ पानी से मुंह धो लें.

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सावधान! जंक फूड खाने से हो सकती है बच्चों की याददाश्त कमजोर

आजकल बच्चों में जंक फूड खाने की आदत बढ़ गई है, जिसके कारण बच्चें घर का खाना नही खाना चाहते. बच्चों में  बर्गर, फ्रेंच फ्राइज, चाउमीन, मोमोज जैसे जंक फूड खाने की आदत बहुत बढ़ गई है. इन सबसे बच्चों में दिन-प्रतिदिन मोटापा बढ़ता जा रहा है, इस बात से आप रूबरू होंगे ही. लेकिन हाल ही में हुई रिसर्च के मुताबिक जंक फूड ज्यादा खाने से बच्चों की याददाशत कमजोर होने का खतरा होता है. छोटी उम्र के बच्चे, जो स्कूल जाते हैं, उन बच्चों को मानसिक विकास तेजी से हो रहा होता है और जंक फूड की आदत ऐसे बच्चों को ज्यादा जल्दी लग जाती है. जिससे बच्चों का मानसिक विकास रूक सकता है साथ ही बच्चें का दिमाग कमजोर होने की संभावना भी होती है. आज हम आपको इस लेख में बताएंगे कि जंक फूड से होने वाले नुकसान और ये कैसे  स्वास्थय पर बुरा असर डालती है.

याददाशत कमजोर होना

रिसर्च के मुताबिक जो बच्चे सप्ताह में 3-4 बार जंक फूड खाते है उन बच्चों की याददाशात कमजोर होती है साथ ही सही तरीकें से मानसिक विकास भी नही हो पाता. जंक फूड स्वादिष्ट लगने की वजह से ये पेट तो भर देती है पर जो पोषक तत्व बच्चों को आहार में मिलना चाहिए वो नही मिलता. शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है कि खाने में विटामिन, प्रोटीन, मिनरल्स की मात्रा होनी जरूरी है. जंक फूड में ये सभी बिल्कुल नही पाई जाती, जिसके कारण मस्तिष्क का विकास सही तरीकें से नही हो पाता.

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छोटे बच्चों में मोटापे का कारण

जंक फूड ज्यादातर शुगर, तेल और एकस्ट्रा कैलोरी से बनती है. जो बच्चों की सेहत के सही संतुलन को बिगाड़ देती है. आजकल बच्चे बाहर खेलने से ज्यादा समय मोबाइल फोन में गेम खेलकर या टीवी देखकर बिताते है. जिसके कारण वो पूरे दिन बैठ कर या लेटकर बिताते है, इसी वजह से उनकी एक्सट्रा कैलोरी बर्न नही हो पाती और से बच्चों में मोटापा बढ़ने का कारण होता है. मोटापे के कारण आजकल कम उम्र में ही शुगर और हृदय की बीमारी की संभावना होने लग जाती है.

6 साल से 12 साल तक के बच्चों पर की गई रिसर्च

इस रिसर्च के लिए 6 से 12 साल तक के बच्चों को चुना गया. इस रिसर्च के बाद शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहंचे कि जिन बच्चों में जंक फूड की आदत नही वे उन बच्चों से जिन्हें हफ्ते में एक या दो बार जंक फूड खाने की आदत है उनसें ज्यादा स्वस्थ है.

जंक फूड्स से बच्चों में होता है एलर्जी का खतरा

रिसर्च के मुताबिक ऐसे फूड्स जिनमें चीनी की मात्रा बहुत अधिक मात्रा में हो, नमक की मात्रा बहुत अधिक हो, प्रौसेस्ड हो, माइक्रोवेव में बनाया या गर्म किया गया हो, इन सभी फूड से बच्चों को एलर्जी हो सकती है. इन सभी से खाने में  जंक फूड में एडवांस्ड ग्लाइकेशन एंड प्रोडक्ट्स (AGEs)’ की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे बच्चों को एलर्जी ता खतरा हो सकता है.

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कम उम्र में डायबिटीज और दिल की बीमारी का खतरा

ज्यादा (AGEs) वाले आहार जैसे- पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज, डोनट्स, कोल्ड ड्रिंक्स, सोडा, चाउमीन आदि के ज्यादा खाने से औक्सिडेटिव से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इन बीमारियों में डायबिटीज पुख्य रूप में होता है. साथ ही आलू के चिप्स, फ्रेंच फ्राइज जैसे जंक फूड में सोडियम की मात्रा ज्यादा पाई जाती है. ज्यादा मात्रा में सोडियम हमारे दिल के लिए हानिकारक होता है. इसके अलावा लंबे समय तक इस तरह के फूड खाते रहने से बच्चों की हड्डियां भी कमजोर हो जाती हैं. औस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर निकोलस चेरुबिन के मुताबिक रिसर्च में इस बात के ठोस सबूत मिले हैं कि जंक फूड खाने और एक्सरसाइज ना करने वाले लोगों में टाइप-2 डायबिटीज और दिमाग की कार्य करने की क्षमता में गिरावट आती है.

ऐसे समझे अट्रैक्शन और प्यार को

आज मैं बात करूंगी एक ऐसी प्रौबलम की, जिससे रिलेशन में रहने वाला लगभग हर लड़का या लड़की जूझते हैं. वो है अट्रैक्शन…. जी हां अक्सर ऐसा होता है जब दो लोग रिलेशन में होते हैं लेकिन रोज मिलना नहीं हो पाता ज्यादा बातें नहीं हो पाती और आप दिन-रात किसी के साथ रहते हो तो आप उसकी तरफ अट्रैक्ट होने लगते हो. मेरी एक दोस्त है जो रिलेशन में है लेकिन वो काफी दूर रहती है और अपने ब्याफ्रैंड से रोज नहीं मिल पाती है.

उसने मुझसे कहा कि उसका एक दोस्त है जिसके वो बहुत करीब है उससे सबकुछ शेयर करती है,उसके साथ घूमना,उससे बातें करना सबकुछ उसे बहुत अच्छा लगता है. लड़के को पता है कि उसकी दोस्त रिलेशन में है फिर भी उसे उस लड़की से प्यार हो गया. लड़की भी उसकी तरफ आकर्षित हो रही थी. लेकिन वो अपने ब्वायफ्रैंड से बहुत प्यार करती है और उसका ब्वायफ्रैंड भी उससे बहुत प्यार करता है. दूर रहता है लेकिन उसकी हर जरूरत का ख्याल रखता है.फिर मैंने उसको समझाया कि उसके दोस्त के साथ सिर्फ उसका अट्रैक्शन है जो उसे प्यार लग रहा है इसलिए उसे अपने बने-बनाए रिश्ते पर ध्यान देना चाहिए.

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ये आज काफी लड़कियों की समस्या है…..जिसके साथ जितना ज्यादा वक्त बिताती हैं उन्हें लगता है कि उनको उस लड़के से प्यार हो गया है. जब हम किसी के तरफ आकर्षित होते हैं तो कुछ समय के लिए भले ही अच्छा लगता है लेकिन ये समझना कि आपको उससे प्यार हो गया है आपकी सबसे बड़ी भूल है…. ये कह सकते हैं कि कोई आपको पसंद आ जाए वो प्यार नहीं है बल्कि जीवन भर वही पसंद रहे वो प्यार है. मेरी नजरों में प्यार की यही परिभाषा है.

कहीं पढ़ा था मैंने कि पहले के जमाने में लोग एक ही इंसान से प्यार करने में पूरी जिंदगी निकाल देते थे… लैला-मजनू और हिर-रांझा की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी लेकिन आजकल के जमाने में ऐसा बहुत कम ही होता है. आजकल तो लोग कपड़ों की तरह अपने पार्टनर बदलते हैं आज किसी से ब्रेकआप हो गया तो कल किसी और से ब्रेकअप. यही चीज लड़कों के साथ भी होती है. किसी को पहली नज़र में देखा नहीं कि वो उन्हें पसंद आ जाते हैं और फिर वो उनका क्रश बन जाता है. ऐसा बहुत बार होता है कि किसी की आंखें पसंद आती हैं…उन्हें खूबसूरत लगती हैं तो किसी की बातें या उनके बोलने का तरीका, किसी के पहनावे का तरीका ऐसी बहुत सी चीजें होती हैं.

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ऐसा आपके साथ कभी भी हो सकता है. यू के की ग्लासगों यूनिवर्सिट के शोधकर्ताओं द्वारा एक रिर्सच किया गया था कि इंसान उन लोगों की तरफ ज्यादा अट्रैक्ट होता है जिनके फीचर्स उनके माता-पिता से मिलते जुलते हों. कुल मिलाकर आप ये समझिए कि किसी की ओर अट्रैक्ट होना बहुत मामूली सी बात है और ये हर किसी को हो सकता है ये आप पर निर्भर करता है कि आप प्यार और अट्रैक्शन के फर्क को समझे…और अट्रैक्शन को सिर्फ अट्रैक्शन ही रहने दें.

भ्रमजाल में फंसाते टीवी सीरियल्स

हिंदी टीवी सीरियल्स की बात की जाए तो आंखों के सामने आता है वह दृश्य जिस में एक बहुत ही आलीशान पैलेस है, एक सास जो या तो अबला है या फिर इतनी बड़ी बिंदी लगाती है कि उस में से वैंप वाली वाइब्स आनी शुरू हो जाती हैं, एक बहू जो ऊपर से नीचे तक जेवरों से लदी हुई है, आंखों से अश्रुधारा बहा रही है और गाय बन कर सब की हां में हां मिला रही है.

इंडियन टीवी सीरियल्स असल में इस से कहीं ज्यादा बनावटी और नकली हैं जिन के बैकग्राउंड म्यूजिक ‘धुम्म ताना…ना…ना…ना’ को भूल पाना लगभग मुश्किल है.

इन सीरियल्स में लोगों की जान डाक्टर के हाथ में न हो कर भगवान के सामने जल रहे उस दीए की लौ में होती है जो औपरेशन के दौरान यदि बुझ जाए तो समझिए व्यक्ति की जान गई. इल्लौजिकल और दकियानूसी बातों से भरे ये टीवी सीरियल्स दर्शकों के मस्तिष्क को विकृत तो करते ही हैं, साथ ही ये ऐसा भ्रमजाल फैलाते हैं जिस की चपेट में अकसर वे लड़कियां आ जाती हैं जिन्हें छोटी उम्र से ही मां के साथ बैठ कर इन सीरियल्स को देखने की आदत लग जाती है.

मेरी उम्र यही कुछ 16 वर्ष थी जब मैं 11वीं कक्षा में पढ़ रही थी. देखा जाए तो 16 वर्ष इतनी छोटी उम्र भी नहीं, जिस में लड़कियों को बच्चा कहा जा सके. साथ ही, इतनी बड़ी उम्र भी नहीं कि उन से अत्यधिक समझदारी की उम्मीदें रखी जाएं. मेरी कुछ सहेलियां मेरे अगलबगल बैठ कर टीवी पर आने वाले एक सीरियल ‘बालिका वधू’ के विषय में चर्चा कर रही थीं. यह सीरियल मेरे घर में भी बड़े चाव से देखा जाता था.

‘‘यार, जगिया ने कितना गलत किया न मुंबई जा कर. उसे किसी दूसरी लड़की से कैसे प्यार हो सकता है?’’ पहली लड़की ने कहा.

‘‘हां यार, बता, ऐसा भी कोई करता है भला. वे दोनों बचपन से साथ थे और अब अचानक बड़े होते ही किसी और से प्यार कैसे हो सकता है उसे,’’ दूसरी ने जवाब दिया.

तीसरी लड़की ने कहा, ‘‘सच में, देखना यह दूसरी लड़की ना जगिया को छोड़ कर चलती बनेगी, उस ने आनंदी का प्यार जो ठुकरा दिया.’’

सीरियल ‘बालिका वधू’ में आनंदी और जगिया यानी जगदीश का बालविवाह हो जाता है. अब इतने वर्षों बाद जब दोनों बड़े हो चुके हैं तो जगिया ने डाक्टर बनने के लिए मुंबई के एक मैडिकल कालेज में दाखिला ले लिया जहां उस की मुलाकात एक दूसरी लड़की से हो जाती है. जगिया इस दूसरी लड़की से प्यार करने लगता है जोकि इस उम्र में स्वाभाविक ही है. एक तरफ वह दूसरी लड़की पढ़ीलिखी और समझदार है तो दूसरी तरफ आनंदी भोली गाय सी है जो सुबह से शाम तक अपनी कोठी की चारदीवारी में ‘दादीसा और मासा’ करती रहती है.

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शो के क्रिएटर्स को जहां एक मैच्योर कंटैंट के तहत बजाय यह दिखाने के कि छोटी उम्र की शादियों में बच्चों का किसी दूसरे से प्यार में पड़ना स्वाभाविक है, उन्होंने दिखाया कि बड़े हो कर जगदीश का किसी और से प्यार में पड़ना गलत था और चाहे उसे आनंदी से प्यार नहीं लेकिन जीवन उसे उसी के साथ काटना चाहिए था क्योंकि प्यार आज नहीं तो कल, हो ही जाता.

अब जब इस तथ्य के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि काश, उस समय ही मैं उन से यह कह देती कि यह सीरियल कोई आदर्श सीरियल नहीं जिस में जो कुछ भी दिखाया जाए, सही ही हो, बल्कि यह तो एक झूठ और कल्पना है जिसे हमारे मस्तिष्क पर थोपा जा रहा है.

अच्छे होने की पहचान

टीवी सीरियल्स के मुताबिक अच्छे होने की पहचान है कि आप के साथ कुछ भी बुरा हो तो उसे आंख बंद कर के सहते जाइए. वह लड़की जो सिर से पैर तक ढके कपड़े पहनती है, बोली साधारण है, गुस्सा तो उस के स्वभाव में है ही नहीं और लड़कों से तो इतना दूर रहती है कि उन का साया भी उस पर नहीं पड़ता, टीवी सीरियल्स के मुताबिक अच्छी है. वह लड़की जिस के शरीर पर घुटने से ऊपर तक की ड्रैस है और पैरों में हाई हील्स हैं, जिस की जबान कैंची की तरह चलती है वह या तो सीरियल में वैंप है या फिर सोकौल्ड बिगड़ी हुई नवाबजादी. ऐसी लड़की, सीरियल्स के मुताबिक, खराब है.

सीरियल की गोपी बहू, अक्षरा और संध्या जैसे कैरेक्टर्स को देखदेख कर इन का मुझ पर इतना गहरा असर पड़ा था कि मुझे लगता था हमेशा लोगों का अच्छा करो, चाहे वे सीधेमुंह बात न करें. इस सीख को मैं ने इतनी बुरी तरह अपना लिया कि मेरा स्वभाव ही गूंगी गाय जैसा हो गया. हकीकत से सामना तो तब हुआ जब मेरी अच्छाई का लोगों ने फायदा उठाना शुरू किया और जब तक मैं ने विरोध नहीं किया तब तक ऐसा चलता रहा.

वन मैन वूमन

सीरियल्स में वन मैन वूमन वाली जो धारणा दिखाई जाती है उस से मुझे खासी चिढ़ है. आखिर हो भी क्यों न, इन के द्वारा औरतों और लड़कियों के दिमाग में जो ये अजीबोगरीब बातें बैठाई जा रही हैं वे सही हैं तो हैं कहां से. पति अपनी पत्नी के अलावा दूसरी औरत से शादी कर के आ गया है और बीवी दरवाजे के परदे से लिपट कर रोए जा रही है, भला यह कौन सी समझदारी का प्रदर्शन हुआ? शादी निभाने का कारण क्या है? उन का पतिव्रता होना. आखिर पति कुछ भी करे, है तो पति ही, लड़कियों में छोटी उम्र से ही यह सोच डालने का श्रेय इन सीरियलों को देना तो बनता है.

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अमीर बनने का शौर्टकट

गरीब से सीधा अमीर बनने का क्या तरीका है? दिनरात की मेहनत? नहीं. लौटरी लग जाना? नहीं. किसी स्टार्टअप का हिट हो जाना? नहीं. इन सीरियल्स के मुताबिक एक ही रात में गरीब से सीधा अमीर बनने का तरीका है शादी, प्यार, मुहब्बत. जी हां, किसी बड़ी कंपनी में नौकरी करो, बौस को तुम से और तुम्हें बौस से प्यार होना स्वाभाविक है बिलकुल वैसे ही जैसे ‘इस प्यार को क्या नाम दूं’ में खुशी कुमारी गुप्ता को अर्नव से, ‘कस्तूरी’ में कस्तूरी को रोनी से, ‘कितनी मुहब्बत है’ में आरोही को अर्जुन से हुआ था. मुझे सीरियल्स का यह लौजिक आज तक समझ नहीं आया.

मकसद आखिर शादी ही है

‘एक अभिमान स्वाभिमान’ औरतों के आत्मसमान, ‘मनमर्जियां’ लड़की के कैरियर ओरिएंटिड होने और ‘दिया और बाती हम’ औरत के सपनों को आधार बना कर शुरू किए सीरियल्स थे लेकिन आखिर में स्टोरी के प्लौट में ऐसे बदलाव किए गए कि ये सीरियल्स भी प्यारमुहब्बत, शादी, सासबहू नौटंकी और झगड़ेरोमांस केंद्रित बन गए. ये सीरियल्स आखिर लोगों के दिमाग में यही डालना चाहते हैं कि कुछ भी कर लो, आखिरी डैस्टिनेशन तो ससुराल और घरगृहस्थी ही है.

जितनी दूरी उतना अच्छा

टीवी सीरियल्स से जितनी दूरी रखी जाए, उतना अच्छा है. यहां कोई कभी मक्खी बनता नजर आता है तो कभी नागिन. ये सीरियल्स समाज का आईना नहीं हैं बल्कि स्वप्नदर्पण हैं जिन में जो कुछ दिखाया जाता है न तो सच हो सकता है न होता ही है. हालांकि, कुछ ऐसे सीरियल्स भी हैं जिन्हें देखा जाए तो शायद समाज पर कुछ अच्छा असर पड़े, जैसे आशुतोष गोवारिकर निर्देशित ‘एवरेस्ट’, जो लड़कियों में अपने दम पर कुछ करगुजरने का हौसला भरता है. मांओं को खासकर यह ध्यान रखना चाहिए कि वे कुछ ढंग के सीरियल्स देखें जिस से वे खुद भी एक अच्छी सोच रखें. यदि वे सासबहू ड्रामे देख रही हैं तो कम से कम अपने बच्चों को उन से दूर रखें. हलकेफुलके लगने वाले ये सीरियल्स असल में बच्चों, खासकर लड़कियों, को मानसिक विकृति का शिकार बना रहे हैं.

 कोई परेशानी है तो करो आरती

पड़ोस की मेरी एक सहेली थी जिस ने एक बार अपनी मम्मी के गुल्लक से पैसे चुराए थे. उस की मम्मी को यह बात बताने खुद उस का भाई भागाभागा गया था. बजाय इस के कि वह जा कर मम्मी से माफी मांगे या कुछ नहीं तो पिटने के डर से छत पर जा कर छिप जाए, वह घर पर पूजा के कमरे में भगवान की मूर्ति के सामने बैठ गई और हाथ में मोमबती ले कर प्रार्थना करने लगी. मैं ने जब यह दृश्य देखा तो हक्कीबक्की रह गई.

मैं ने जब उस से इस बेवकूफी को करने का कारण पूछा तो उस ने बताया कि उस ने ऐसा एक सीरियल में नायिका को करते देखा था, जो मोमबत्ती हाथ में ले कर बैठी थी तो उस की मनोकामना पूरी हो गई थी.

पर अफसोस कि मेरी दोस्त के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ. उस की मम्मी चोरी के लिए तो उसे पीटने आई ही, साथ ही, उस की यह मोमबत्ती वाली करतूत देख कर इतना तिलमिलाई कि पहले तो वह अपनी मम्मी से पिटी, रात में पापा से भी 2 थप्पड़ पड़े, टीवी देखना बंद हो गया. हम सब ने अगले 2 हफ्तों तक उसे इस हादसे के लिए चिढ़ाया, सो अलग.

टीवी पर दिखाए जाने वाले सीरियल्स कई तरह से समाज को प्रभावित करते हैं. इन में दिखाया जा रहा कंटैंट छोटेछोटे मस्तिष्कों में इतनी मजबूती से अपनी पैठ जमा रहा है कि उन की जिंदगियां, उन की सोच इन के इर्दगिर्द घूमने लगती है.

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