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दोस्ती जब वनसाइडेड लव बन जाए

कौन अपने दोस्त से प्यार नहीं करता, आप भी करते होंगे है ना. लेकिन दोस्त से प्यार यदि दोस्ती से बढ़कर वाला हो तो ज़िन्दगी उथलपुथल होने लगती है, दोस्ती और प्यार के बीच जंग होने लगती है, मन हिचकोले खाने लगता है कि अपने दोस्त को अपनी चाहत का इजहार करूं या चुपचाप जिस तरह से दोस्ती आगे बढ़ रही है वैसे ही बढ़ने दूं. पता है होता क्या है, जब दोस्त के लिए मन में दोस्ती से ज्यादा भी फीलिंग्स आने लगती हैं तो सबकुछ अचानक से बदलने लगता है, उसका बात बात पर मुस्कुराना आप की खुद की मुस्कुराहट का कारण बन जाता है, उस का लड़ना झगड़ना और रूठना मनाना घंटों दिमाग में छाया रहता है. परंतु, अक्सर यह फीलिंग वनसाइडेड प्यार बनकर रह जाती है.

दोस्ती वनसाइडेड लव कई कारणों से बन जाती है. ‘मुझे लगा था हम दोस्त हैं,’ ‘मैंने दोस्ती से बढ़कर कुछ सोचा ही नहीं कभी,’ ‘मुझे नहीं पता मैंने कोई हिंट कब दिया,’ कुछ आम वाक्य हैं जो दोस्त से अपने प्यार का इजहार करने पर सुनने पड़ते हैं. दोस्ती प्यार है यह हम सभी जानते हैं, लेकिन दोस्ती यदि रोमांटिक लव में बदल जाए वो ही वनसाइडेड लव तो दोस्ती के मायने बदल जाते हैं. दिनभर साथ घूमने वाले दोस्त एक दूसरे से हाय हैल्लो करने में भी झिझकने लगते हैं.

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वो पहला पहला एहसास

महक और शुभम कालेज के फर्स्ट इयर से एकदूसरे के पक्के दोस्त हैं. उन की दोस्ती को डेढ़ साल हो चुके हैं. महक ने वैसे कभी शुभम के लिए कुछ खासा महसूस नहीं किया था लेकिन 4 महीने पहले जब शुभम और वह रोज की ही तरह क्लासरूम में बैठे थे तो शुभम ने उसे बातों ही बातों में यह कहा था कि वह उस की ज़िन्दगी में बहुत मायने रखती है. हमेशा लड़ाई झगड़ा करने वाले शुभम के मुंह से यह सब सुनकर महक को कुछ अलग महसूस हुआ. उस के बाद से वह शुभम को नोटिस करने लगी, जितनी तवज्जो पहले देती थी उस से कई ज्यादा अब देने लगी. शुभम उसे क्या कह रहा है, क्या बता रहा है सब ध्यान से सुनती. अब जब शुभम उस का हाथ पकड़ता तो उस के दिल में कुछ होने लगता था. ऐसा पहले नहीं था.

नजरिया बदल जाना

महक शुभम को दोस्त से कही ज्यादा मानने लगी थी. बस उस के मन में एक ही सवाल था कि क्या शुभम भी उसे वैसे ही चाहता है जैसे वो चाहती है, क्या शुभम के दिल में उस के लिए कोई फीलिंग्स हैं? महक अपनी उलझनों का हल शुभम के हावभाव और बातों में ढूढ़ने लगी. महक दो दिन बिना बताए कालेज नहीं गई तो तीसरे दिन शुभम ने उस से बात नहीं की. वह एक कोने में रूठ के बैठ गया और महक को उसे मनाना पड़ा. शुभम की नाराजगी से महक को लगा कि शुभम उस की गैरमौजूदगी में बेचैन होता है बिलकुल वैसे ही जैसे वह उस के लिए होती है. शुभम उस को जब भी मिलता गले लगता, तो महक की धड़कनें बढ़ जातीं. शुभम का उसे चिढ़ाना और उस के चुप होने पर उसे बोलने के लिए मजबूर करना, उसे हंसाना और हाथ पकड़े यहां से वहां घूमना महक की चाहत को बढ़ाता गया.

असलियत से सामना

महक ने अब तय कर लिया कि वह शुभम को अपनी चाहत के बारे में खुल कर बता देगी. उस के मन में तो न जाने कितने अरमान उफान भरने लगे थे. अब वह सिर्फ हाथ पकड़े घूमना या गले लगना ही नहीं चाहती थी, वह शुभम के स्पर्श को और अधिक महसूस करना चाहती थी, उसे अपनी बाहों में भींच लेना चाहती थी. सो, एकदिन उस ने शुभम को लिख भेजा कि वह उस के लिए दोस्ती से ज्यादा भी कुछ फील करती है, उसे लाइक करती है. यह सुन कर शुभम ने उसे मैसेज भेज दिया कि वह उस के लिए दोस्त से ज्यादा कुछ फील नहीं करता.  महक यह सुनकर टूट गई थी लेकिन वह इतनी कमजोर नहीं थी कि शुभम के प्यार के लिए उस के सामने गिड़गिड़ाए. महक ने बात यह कहकर खत्म कर दी कि इस बारे में हम आगे कभी बात नहीं करेंगे.

महक और शुभम अब रोज मिलते तो थे लेकिन पहले जैसे नहीं. महक के चेहरे पर मुस्कराहट रहती थी लेकिन अंदर ही अंदर वह कितना टूट चुकी थी यह वह किसी को नहीं बताती थी. शुभम अब महक का हाथ नहीं पकड़ता था, उसे गले नहीं लगाता था, उस तरह बातें नहीं करता था जैसे पहले किया करता था. महक सब कुछ नोटिस तो करती थी, शुभम से दूर जाना भी चाहती थी लेकिन उस की चाहत उसे हमेशा ही रोक लिया करती थी. महक जब भी शुभम को किसी से बात करते देखती थी तो उसे एंग्जायटी होने लगती थी, उसे ऐसा लगता जैसे उस ने प्यार तो खोया ही लेकिन साथ ही अपना दोस्त भी खो दिया. महक की हालत दिन ब दिन खराब होने लगी लेकिन अपनी दोस्ती के खातिर वह शुभम से दूर होने से हिचकती थी, वह उसे खोना नहीं चाहती थी. लेकिन, महक यह समझ नहीं पाई कि वह उसे न खोने के चक्कर में वह खुद को खोने लगी है.

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वनसाइडेड लव से निकलना है जरूरी

किसी के लिए मन में फीलिंग आ जाना सचमुच हमारे बस में नहीं होता और न ही यह कि किस से प्यार करना है, कितना करना है और क्यों करना है. लेकिन इस वनसाइडेड लव  के चक्कर में अपनी दोस्ती खराब न करना, एंग्जायटी से निकलना और इस दुख से निकलना हमारे बस में जरूर है. हमारी इस जनरेशन के साथ जो सब से बड़ी परेशानी है वह यह है कि हमे लगता है कि प्यार एकतरफा ही सही, इस में दर्द या तकलीफ ही सही लेकिन हमे पीछे नहीं हटना है क्योंकि यही तो असली प्यार है. पर यह सही नहीं है. खुद को तकलीफ दे कर आप जी नहीं सकते. जीना तो सभी को है लेकिन घुटघुट ही क्यों जिया जाए? ‘एकतरफा प्यार की ताकत ही कुछ और होती है, यह दो लोगों में नहीं बंटता, इस पर सिर्फ मेरा हक है,’ जैसे बौलीवुड डायलौग्स से दूर रहिए और खुद पर फोकस कर इस वनसाइडेड लव से निकलिए.

कंफेस्स करने से पहले सोचिए

होता यह है कि आपको लगता है कि हो सकता है हमारे दोस्त को भी हम से प्यार हो और वह  यह सोचकर न बोल रहा हो कि कहीं हमारी दोस्ती खराब न हो जाए, इसलिए मैं ही सामने से जाकर बोल देता हूं. तो भई, कंफेस्स करने से पहले 15 -20 बार और सोच लो. क्योंकि जब यह अनुमान गलत निकलता है और पता चलता है कि ओह तेरी, यह तो वनसाइडेड निकला, तो दिल टूट कर रह जाता है और आवाज भी होती है. जो सिर्फ आप को ही सुनाई देती है तो बेहतर है कि अच्छे से सोच समझ लो या इंतजार कर लो थोड़ा कि दोस्त के मन में कुछ है तो वह खुद ही बोल दे. वैसे भी अगर आप का प्यार उफान भर रहा है तो उस का प्यार भी हिचकोले खा ही रहा होगा, अगर उसे आप से प्यार होगा तो. नहीं तो जो जैसे चल रहा है चलने दो.

 खुद को समय दो

अगर आप ने कंफेस्स कर दिया है और पता लग गया है कि आप का प्यार वनसाइडेड है तो एकदम से सोचना मुश्किल हो ही जाता है कि अब करें तो करें क्या. दोस्त से बात करना छोड़ दें, दोस्ती जैसी जारी है जाने दें या कुछ और. लेकिन इन सब में सब से सही है कि कुछ दिन के लिए थोड़ी दूरी बना लें. अपनी फीलिंग्स को थोड़ा सा सेटल होने का, थोड़ा थमने का समय दें. आज आपने कंफेस्स किया और आप सोचें कि कल से सब पहले जैसा हो जाएगा, तो यकीन मानिए ऐसा नहीं होता. यह सचमुच बहुत मुश्किल है. क्योंकि कल तक जिस दोस्ती को आप प्यार कि नजर से देख रहे थे अब वह प्यार नहीं बल्कि एकतरफा प्यार है. अब अपने दोस्त को देख कर, उस से बात कर के आप को महसूस होगा कि आप रिजेक्ट हुए हैं, अब तक जिस सपने में आप खोए हुए थे वह टूट चुका है. यह सब आप के सीने में कांटे की तरह चुभेगा और ऐसे में आप अपने दोस्त का किसी और लड़की में इंटरेस्ट देख लें तो हो सकता है आप की एंग्जायटी बढ़ जाए, आप डिप्रेस्ड फील करें और अपनी सेल्फ रेस्पेक्ट और सेल्फ एस्टीम को बिखरता हुआ देखने लगें. बेहतर है कि थोड़ी दूर बना लें और एक्सेप्ट करें कि जो है सो है, इस में अब कुछ किया नहीं जा सकता.

एक्सपेक्ट करना छोड़ दें

वनसाइडेड लव में होता यह है कि हमें लगने लगता है कि जिस तरह मुझे अपने दोस्त से प्यार हुआ है उसी तरह उसे भी हो जाएगा, आज नहीं तो कल. आपको लगता है वह आपका उदास चेहरा देखेगा तो उसे बुरा लगेगा, उस का दबा हुआ प्यार बहार निकल आएगा, वह एक दिन हाथ पकड़ेगा और कहेगा ‘हां मुझे भी तुम से उतना ही प्यार है जितना तुम्हें है,’ लेकिन इस सोच में डूबे रहने से आप की फीलिंग्स कम होने की जगह बढ़ती ही जाएंगी.

प्यार जिसे होना होता है हो जाता है और जिसे नहीं होना होता नहीं होता. यह समय आप को मूव ओन करने में देना चाहिए न कि ख्याली पुलाव पकाने में. इस से आप की खुद की तकलीफ बढ़ेगी, कम नहीं होगी.

ध्यान कहीं और लगाने की जरुरत है

अगर आप वनसाइडेड लव को अपने दिल और दिमाग पर चढ़ाये रखेंगे तो खुश रहना आप के लिए सचमुच बहुत मुश्किल हो जाएगा. अपने दोस्त की पुरानी यादों में डूबे रहने से, उसे हर बार देखने पर खुद को टूटा हुआ महसूस करने से, सोशल मीडिया पर उसे स्टोक करने और एक के बाद एक सैड कोट्स पोस्ट करने से कुछ होने वाला नहीं है. फोन को साइड पटक कर किताब हाथ में लें, घंटों घर में पड़े रहने से बेहतर बाहर निकलकर बाकी दोस्तों से मिलें. इस से आप का ध्यान अपने दोस्त से थोड़ा हटेगा भी और आप मूव औन भी कर पाएंगे.

खुद को कोसते रहना छोड़ दें

वनसाइडेड लव में व्यक्ति हर पल खुद को कोसता रहता है. ‘काश, मैं ने उसे कुछ न कहा होता,’ ‘मेरी ही गलती है जो मैंने उस से प्यार किया,’ ‘मुझ में ही कुछ कमी है तभी उसे मुझ से प्यार नहीं,’ ‘मेरी बेवकूफी से सब खत्म हो गया,’ ‘मैं सुंदर नहीं हूं, मुझ में हजार कमिया हैं इसलिए में उस के पार के काबिल नहीं हूं,’ जैसी बातें हर वक़्त दिमाग में छाई रहती हैं. ऐसा सोचना गलत है और इस कारण साफ़ है, ज़रूरी नहीं कि जिस से आप को प्यार हो उसे भी आप से प्यार हो क्यूंकि प्यार किसी से भी हो सकता है पर हर किसी से हो यह जरूरी नहीं, और इस के लिए खुद को किसी से कम समझना बेतुकी बात है.

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यहां जानें, पेन से जुड़ी कुछ रोचक बातें

अगर आपको कागज पर शब्दों को पिरोना हैं तो सबसे पहले आपके मन में पेन का ख्याल आता है. फिर आप पेन लेते हैं और उससे लिखना शुरू कर देते हैं. रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाली यह एक काफी जरूरी चीज है. तो चलिए आज आपको पेन से जुड़ी कुछ रोचक बात बताते हैं-

आपको जानकर आश्चर्य होगा की, औसतन एक पेन लगभग 45,000 शब्द लिख सकता है.

क्या आप जानते हैं? 95% मामलों में, जब एक व्यक्ति को एक नई कलम मिलती है, तो वह पहला शब्द जिसे वह लिखता है वह उसका नाम है!

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हर साल 38 बिलियन बौलपॉइंट पेन बनाने के बावजूद, चीन ने अभी तक साल 2017 तक घरेलू रूप से अपनी कलम युक्तियों का उत्पादन करने के लिए प्रौद्योगिकी हासिल नहीं की थी.

पेन कैप्स यानि पेन के खोल हर साल लगभग 100 से अधिक लोगों की मौत का कारन बनते हैं! जी हां, लोग खेलते हुए पेन कैप्स को अपने मुंह में डाल लेते हैं और गलती से इसे निगल जाते हैं.

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साल 1938 में, पहली बौलपॉइंट पेन का आविष्कार हंगेरियन पत्रकार लाज्लो बिरो ने किया था, हालांकि पहला पेटेंट साल 1888 में जौन लाउड का था

आपको जानकर हैरानी होगी की एक बालपौइंट पेन की टिप/नोक एक हीरे के सामान ही हार्ड/कठोर होती है.

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इन्तकाम : भाग 2

‘खट… खट… खट…’ दरवाजे की दस्तक ने निकहत को चौंका दिया. वह पलंग पर बैठी एक रोमान्टिक सा गीत लिखने में मशगूल थी. दरवाजे पर संजीव के होने के ख्याल से उसका दिल बल्लियों उछलने लगा. वह लगभग भागती हुई सी दरवाजे तक पहुंची. कुंडी खोली तो उसके चेहरे पर खुशियों के हजारों रंग बिखर गये. सामने उसका संजीव खड़ा था. वो उससे लगभग लिपटते हुए बोली…

‘आज जल्दी कैसे आ गये…?’

‘कुछ काम था…’ छोटा सा जवाब देकर संजीव तख्त की ओर बढ़ गया, ‘अम्मी नहीं हैं…?’ उसने इधर-उधर दृष्टि घुमायी.

‘नहीं, जाहिद के साथ वैद्यजी के पास गयी हैं, मालिश का तेल लेने…’ निकहत ने उसे प्यार से देखते हुए कहा और उसके बगल में बैठ गयी.

‘निकहत… मैं बिजनेस के काम से कुछ दो-तीन महीने के लिए बाहर जा रहा हूं…?’

‘दो-तीन महीने के लिए… क्यों… कहां…?’ निकहत ने बेचैनी से पूछा.

‘कोलकाता…’ संजीव ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, ‘पापा चाहते हैं कि वहां हमारा एक नया शोरूम खुल जाए… वो अब बिजनेस बढ़ाना चाहते हैं…. इसके लिए मेरा जाना जरूरी है…’

‘कब तक वापस आ जाओगे…’ निकहत ने उदास होते हुए पूछा.

‘कम से कम तीन महीने तो लग ही जाएंगे… ज्यादा वक्त भी लग सकता है…’ संजीव ने जवाब दिया.

‘मैं यहां तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी…’ निकहत परेशान हो गयी.

‘अरे यार, समय जाते देर नहीं लगती, फिर ये भी तो सोचो अगर कोलकाता में हमारा बिजनेस सेट हो गया तो हमें कितना फायदा होगा… फिर पापा भी मुझसे खुश हो जाएंगे… क्या तुम यह नहीं चाहतीं…?’ संजीव प्यार से उसका चेहरा अपनी हथेलियों के बीच लेते हुए बोला.

‘वो तो ठीक है मगर…’ निकहत की आंखों में आंसू आ गये.

‘देखो निकहत, बात समझने की कोशिश करो, अगर मेरी वजह से पापा का बिजनेस बढ़ता है तो मेरे ऊपर उनका भरोसा बढ़ेगा, वो मेरी बात मानेंगे और तब हम दोनों की शादी के लिए मैं उनको आसानी से मना भी सकता हूं, वरना…’ संजीव ने उसे फुसलाने की कोशिश की.

निकहत की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे. संजीव से एक दिन की दूरी भी उसे बर्दाश्त नहीं थी और वह तीन महीने के लिए दूर जाने की बात कर रहा था, ‘मैं…’ कुछ कहते-कहते निकहत के होंठ थरथराने लगे. शब्द उसके हलक में ही अटक कर रह गये.

‘मैं तुम्हें फोन करता रहूंगा…’ संजीव उठ खड़ा हुआ. उसे डर था कि निकहत के आंसुओं के सामने वह अपने झूठ को ज्यादा देर संभाल नहीं पाएगा.

‘मैं अभी चलता हूं… पैकिंग वगैरह भी करनी है, अपना ख्याल रखना… परेशान मत होना…’ वह दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा.

निकहत अपने आंसुओं को समेटती उसके पीछे उठ खड़ी हुई.

‘देखो… तुम खुद कोई फोन मत करना, वहां मैं काफी बिजी रहूंगा… मैं ही टाइम मिलने पर तुम्हारे स्टूडियो फोन कर लिया करूंगा… ठीक है न…?’ संजीव ने पलट कर कहा.

‘हूं…’ निकहत ने सिर हिलाया.

संजीव चला गया, मगर आज जाते वक्त न तो उसने निकहत के माथे पर अपने प्यार की मुहर लगायी थी, न ही उसे मुड़ कर देखा था. वह तो जैसे उसकी निगाहों की पकड़ से जल्द ही बहुत दूर हो जाना चाहता था. उसे डर था कि अगर उसने पलट कर देखा तो वहीं जकड़ जाएगा, उसके पैर उसका साथ नहीं देंगे. वह अपने पीछे आंसुओं में डूबी निकहत को छोड़ कर तेज-तेज कदमों से बढ़ता चला गया.

जिन्दगी अपनी रफ्तार से चलने लगी. तीन हफ्ते गुजर गये. इस बीच सिर्फ दो बार ही संजीव का फोन आया था. औपचारिक सी बातचीत ही हो पायी थी. हालचाल पूछने, काम अच्छा चलने की खबर और अपना ख्याल रखने की नसीहतों के साथ ही फोन कट गया था. निकहत ने पूछा भी था कि कब तक लौटेगा?

‘अभी कुछ कह नहीं सकता… समय लगेगा…’ संजीव ने गोलमोल सा जवाब दिया था.

निकहत मुरझाने लगी थी. इसी आशा के साथ वह रोजाना स्टूडियो जाती थी कि न जाने किस दिन संजीव का फोन आ जाए. रिकॉर्डिंग या रिहर्सल नहीं भी होती, तब भी वह वहां जाकर घंटों बैठी रहती थी. दो महीने बीत चुके थे. इधर प्रेमभाई ने निकहत को कई गीत लिखने के लिए कहे थे. उसकी आवाज भी मार्केट में ठीक बिजनेस दे रही थी. अक्सर ही किसी न किसी रेडियो विज्ञापन की रिकॉर्डिंग होती रहती थी. काफी समय बीत चुका था संजीव का फोन आये. बीते दो हफ्ते से उसका फोन नहीं आया था. कोलकाता का फोन नम्बर निकहत के पास नहीं था, वरना वह खुद ही बात कर लेती. संजीव ने फोन नम्बर दिया ही नहीं, बोला कि स्टूडियो के लैंड लाइन पर मैं खुद ही फोन करूंगा.

‘शायद काम ज्यादा बढ़ गया हो’ निकहत सोचती. कई बार सोचा कि उसके घर पर फोन करके पता करे, मगर संजीव की हिदायत याद आ जाती, ‘घर पर फोन मत करना…’ और वह दिल मसोस कर रह जाती.

‘पता नहीं वो कैसा होगा…?’ निकहत स्टूडियो में बैठी अपने ख्यालों में गुम थी.

अचानक…

‘एक गाने की रिकॉर्डिंग फिर से होगी…’ प्रेमभाई ने अन्दर प्रवेश करते हुए उससे कहा. वह चौंकर उनकी तरफ देखने लगी.

‘क्या सोच रही हो निकहत…?’ उन्होंने स्नेहिल स्वरों में पूछा.

‘जी कुछ नहीं… आप कुछ कह रहे थे…?’ निकहत उनकी तरफ देखने लगी.

‘हां… वो पिछले महीने डिटर्जेंट पाउडर के लिए जो जिंगल तैयार किया था, उसकी धुन थोड़ी बदलनी है, वो फिर से रिकौर्ड होना होगा… मास्टर जी को भी बुलाया है… आते ही होंगे…’ प्रेमभाई ने संगीतकार के बारे में बताया, ‘तुम्हारे पास तो लिखा होगा वो गाना…?’ उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि निकहत पर डाली.

‘जी लिखा तो है, मगर वह डायरी तो घर पर पड़ी है…’

‘घर पर…! अच्छा तुम यहां किसी डायरी में देखो, कहीं न कहीं लिखा रखा होगा. मैं जब तक उधर रिकॉर्डिंग रूम सेट करवाता हूं…’ प्रेमभाई कहते हुए कमरे से निकल गये.

निकहत मेज पर रखी डायरियों के पन्ने पलट कर देखने लगी. ‘यहां तो किसी में भी नहीं है…’ वह बड़बड़ायी, ‘शायद दराज के अन्दर रखी डायरियों में मिले…’ सोचते हुए उसने प्रेमभाई की मेज वाली दराज बाहर खींची. पहली डायरी खोलते ही एक कार्ड जमीन पर गिरा. निकहत ने झुककर उसे उठाया, मेज पर डालने ही वाली थी कि उस पर संजीव का नाम पढ़ते ही चौंक पड़ी. उसने जल्दी से कार्ड खोला.

संजीव वेड्स मोनिका’ पढ़ते ही उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. कार्ड पर संजीव के घर का पता लिखा था और शादी की तारीख पिछले महीने की थी. उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया… खड़ा न रहा गया… वह धड़ाम से कुर्सी पर गिर पड़ी. उसे लगा जैसे सारे जिस्म की ताकत किसी ने निचोड़ ली हो. न जाने कितनी देर तक वह सन्नाटे में बैठी रही. एकाएक दरवाजा खुला…

‘निकहत… गाना मिल गया…?’ पूछते हुए प्रेमभाई अन्दर आये तो निकहत की हालत देखकर उनके होश उड़ गये.

‘निकहत…!’ वह उसकी ओर बढ़े और उसके कंपकपाते हाथों में संजीव की शादी का कार्ड देखकर पलक झपकते ही सब कुछ समझ गये. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वो उससे क्या कहें.

संजीव ने उन्हें निकहत को कुछ न बताने की कसम दी थी. उन्हें स्वयं संजीव की यह हरकत बड़ी नागवार गुजरी थी मगर वह कुछ भी नहीं कर पाये. संजीव ने अपनी दोस्ती का वास्ता देकर उन्हें अपनी मजबूरी कुछ इस ढंग से समझा दी थी कि वह खामोश होकर रह गये थे. उसका कार्ड लेकर उन्होंने चुपचाप अपनी दराज में रखी एक पुरानी डायरी में डाल दिया था, और आज… निकहत के हाथ वह कार्ड लग गया. उन्हें समझ में नहीं आया कि वह निकहत को किस तरह सांत्वना दें. उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे और वह सूनी-सूनी नजरों से प्रेमभाई को ताक रही थी.

प्रेमभाई ने आगे बढ़कर अपना हाथ उसके कंधों पर टिका दिया, ‘निकहत… मैं तुम्हें सबकुछ…’ वह हकलाते हुए बोले, और बस… निकहत फट पड़ी. वह दहाड़े मार-मार कर रोने लगी. प्रेमभाई बौखला उठे, ‘निकहत… अपने आपको संभालो निकहत…’ वह बौखलाए हुए स्वरों में बोले.

‘आपने मुझे बताया क्यों नहीं, प्रेमभाई…?’ उसने बुरी तरह रोते हुए पूछा, ‘आपको तो मैं अपने बड़े भाई की जगह समझती थी, मगर… मगर आपने भी… आपको सबकुछ पता था… है न…?’ वह फफक रही थी.

‘निकहत…’ उन्होंने उसका कंधा थपथपाते हुए उसे चुप कराने की कोशिश की, ‘निकहत… तुम नहीं जानती, मैंने उसे समझाने की कितनी कोशिश की, मगर उस पर तो दौलत का नशा सवार था. अगर उसे तुम्हारे प्यार की जरा भी कद्र होती तो वह यह काम हरगिज नहीं करता, वह तो सिर्फ तुमसे अपना दिल बहला रहा था… व्यापार कर रहा था… प्यार का व्यापार…’ प्रेमभाई की आवाज कर्कश हो गयी.

‘प्रेमभाई…’

‘देखो निकहत… अब जो हुआ है उसे भूल जाओ… वो तुम्हारे काबिल नहीं था…’ प्रेमभाई ने समझाने की कोशिश की.

‘कैसे भूल जाऊं, प्रेमभाई…?’ निकहत रोते-रोते लगभग चीखने के अन्दाज में बोली, ‘कितना आसान है आपके लिए यह बात कह देना, भूल जाओ… कैसे भूल जाऊं? आप ही बताइये… कैसे भूल जाऊं?’ निकहत की हालत पागलों जैसी हो गयी.

पे्रमभाई निरुत्तर हो गये. वह आगे बढ़े और मेज पर रखे गिलास में पानी उंडेल कर उसकी ओर बढ़ाया. निकहत ने कंपकंपाते हाथों से गिलास लेकर अपने होंठों से लगा लिया, मगर अभी भी वह बुरी तरह सिसक रही थी. उसके प्रेम की बगिया को उसका ही माली उजाड़ गया था. गिलास वापस मेज पर रख कर वह आंसू पोछते उठ खड़ी हुई.

‘निकहत…’ प्रेमभाई ने उसे टोका, ‘चलो मैं तुम्हें घर छोड़ आऊं… रिकॉर्डिंग कल करेंगे…’ वह उसके साथ दरवाजे की ओर बढ़े. उन्हें डर था कि दु:ख के आवेश में कहीं वह कुछ उल्टा-सीधा न कर बैठे.

‘नहीं, प्रेमभाई…’ निकहत ने उन्हें रोक दिया, ‘मैं अकेली जाऊंगी… रिकौर्डिंग कल की रख लीजिए…’ कह कर वह तेजी के साथ दरवाजे से निकल गयी.

उसके दिलो-दिमाग में एक सन्नाटा सा छाया हुआ था. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका संजीव उसके साथ ऐसा कर सकता है. टैक्सी लेकर वह सीधे उसके घर की ओर चल दी.

एक्स हसबैंड को लेकर मलाइका अरोड़ा ने कही ये बात

अरबाज खान और मलाइका अरोड़ा शादी के करीब 18 साल बाद एक-दूसरे से अलग होने का फैसला लिया हैं. अब इन दोनों का तलाक भी हो चुका है. और दोनों ही अपनी-अपनी जिंदगी में आगे भी बढ़ चुके हैं. हाल ही में मीडिया रिपोर्टस के अनुसार मलाइका अरोड़ा ने कहा कि सभी विवादों और मतभेदों के बाद भी अरबाज परिवार जैसे हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि वो उनके बेटे के पिता हैं इस बात को कभी नकारा नहीं जा सकता.मलाइका ने ये भी कहा,  रिश्ते एक रात में नहीं बन जाते, ये वक्त के साथ बनते हैं. अरबाज वो नहीं हैं जिन्हें हम जानते हैं वो बच्चों के जैसे हैं. वो परिवार हैं.

इसके अलावा अर्जुन कपूर के बारे में उनसे पूछा गया तो मलाईका ने कहा कि वो दोनों बिल्कुल अलग हैं. इन दिनों मलाइका और अर्जुन साथ में छुट्टियां मना रहे हैं और इस दौरान की कई तस्वीरें सामने भी आई हैं. दोनों ने एक ही जगह की तस्वीरें शेयर की हैं. मलाइका ने लेक के पास खड़े हुए ये तस्वीर शेयर की. इस तस्वीर के कैप्शन में मलाइका ने लिखा- रुकें, परछाई देखें और शुक्रिया अदा करें. इसी लेक के पास खड़े होकर तस्वीर क्लिक की और मलाइका से मिलता जुलता ही कैप्शन लिखा. अर्जुन ने लिखा, सीधे खड़े रहो, एक पल लो और शुक्रिया अदा करो.

हाल ही में अर्जुन कपूर के बर्थडे पर दोनों ने अपने रिलेशन को सोशल मीडिया पर तस्वीरों के जरिए औफिशियल तौर पर बताया  था. अपने रिश्ते को औफिशियल करने के बाद से ही दोनों अक्सर सोशल मीडिया पर एक दूसरे को लेकर अपना प्यार जाहिर करते  हैं.

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‘‘तू मेरा हीरो’’सहित कई सीरियलो में अभिनय कर चुके प्रियांशु जोरा हमेशा अपनी अभिनय प्रतिभा को लेकर चर्चा में रहते हैं. मगर इस बार टीवी इंडस्ट्री में इन दिनों कई कलाकारों को टीवी कलाकार प्रियांशु जोरा की किस्मत से जलन हो रही है. इस जलन की वजह महज यह है कि प्रियांशु जोरा ने कुछ दिन पहले ही ‘‘मर्सडीज कार’’ खरीदी है. पर प्रियांशु जोरा काफी खुश हैं. वह कहते हैं- ‘‘मैं हमेशा से कार को लेकर पैशिनेट रहा हूं. मुझे कार में अपने दोस्तों को बैठाकर पूरे शहर और शहर से बाहर लौंग ड्राइव पर जाने का शौक रहा है. कम से कम सप्ताह में एक दिन मैं अपने दोस्तों के साथ कार में लांग ड्राइव पर जरूर जाते हैं. मुंबई में सीलिंक से होकर मरीन ड्राइव पर कार से जाना अच्छा लगता है.’’

क्या प्रियांशु जोरा को लक्जरी कार का ही शौक है. इस पर प्रियांशु जोरा कहते हैं- ‘‘ऐसा नहीं है. मेरी पहली प्राथमिकता सुरक्षा होती है. उसके बाद अंदर की बनावट व सुविधाएं मायने रखती हैं. इतना ही नहीं लक्जरी कार की बनावट मजबूत होती है. लक्जरी कार की परफौर्मेंस की तो मैं तुलना ही नहीं करता. क्योंकि लक्जरी कार की परफौर्मेंस की तुलना किसी अन्य कार से की ही नही जा सकती.’’

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मर्सडीज कार के संग प्रियांशु जोरा की कुछ भावनाएं भी जुड़ी हुई हैं. वह कहते हैं- ‘‘मेरे पापा ने सबसे पहले मर्सडीज कार ही खरीदी थी. और उस कार में बैठकर घूमने का आनंद ले चुका हूं. मर्सडीज कार में बैठने के बाद जो अहसास होता है, उसे तो मैं कभी भुला ही नहीं पाया. इसलिए मैने मर्सडीज कार खरीदी है. मुझे बचपन में अपने पिता के साथ कार में बैठकर रात में सड़क पर घूमना पसंद था. क्योंकि जब हमारी कार सड़क पर होती थी और उस वक्त सामने से आ रही गाड़ी/कार की लाइट जो पड़ती थी, वह मुझे बहुत अच्छा लगता था. बचपन में ही मुझे हर कार की मेंकिंग, उसके मौडल आकृति की विस्तृत जानकारी हो गयी थी.

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एक रोमांटिक उदास गीत, जो आपके दिल की धड़कन को तेज कर देगा

अजय जसवाल “अपेक्षा म्यूजिक ” के प्रतिष्ठित बैनर के तहत एक और वीडियो लौन्च करने के लिए तैयार हैं – “लौट आओ ना”. अजय जसवाल द्वारा निर्मित और निर्देशित किया गया  है.  इसके  अतिरिक्त आवाज  दी है गायक शान ने. संगीत और गीत दिया है  फराज अहमद ने.  विशेषत: ये रवि भाटिया और सोनाली सूडान पर  गाना  फिल्माया  गया है .

“लौट आओ ना” संगीत की समृद्धि, इसकी सूक्ष्मता और दर्शकों के दिलों के भीतर गहराई तक पहुंचने की इसकी अलौकिक क्षमता है.  वीडियो दर्शकों को शांत संगीत और शानदार माहौल की आनंदमय दुनिया में शामिल कर देगा.

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धीरज, खौफ से प्रेरित संगीत रचना फराज अहमद ने शान की भावपूर्ण आवाज के साथ पूरी तरह से मिश्रित की, जो उस खिड़की को देखने के लिए एक आदर्श कंपनी है.

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अपेक्षा म्यूजिक म्यूजिक के अजय जयसवाल, जो इस गीत के निर्देशक और निर्माता कहते  हैं, “लौट आओ ना! इस बात का प्रमाण है कि अच्छे गाने दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बना ही लेते है. यह अपनी मधुर रचना के साथ दिलों के दौड़ते लहू  को गर्म कर देता है.  फराज अहमद का संगीत  और शान की आवाज. शान हमेशा की तरह उत्कृष्ट है. वे एक ऐसे गायक हैं जो हर गीत को अपना अनोखा  स्पर्श देता है.

फराज अहमद कहते हैं, “गीत अपनी अनूठी व्यवस्था के लिए एक प्रभाव छोड़ देगा. हमने अलग-अलग तरीकों से उदासी और प्यार की भावनाओं का पता लगाने की कोशिश की हैं, आशा है कि दर्शक इसे उतना ही पसंद करेंगे जितना हम करते हैं.

शान ने अपने सबसे अच्छे काम में से एक “लौट आओ ना” कहा, “यह बहुत दुर्लभ है कि मैं एक भावनात्मक रोमांटिक संख्या गाता हूं, लेकिन यह रोमांटिक रचना वह है जो लंबे समय तक आपके साथ रहेगी” आगे जोड़ते हुए “मैं इसके साथ जुड़े रहने के लिए सम्मानित हूं.  अपेक्षा म्यूजिक एक संगीत लेबल के रूप में वे अपने दर्शकों को समझते हैं और गुणवत्ता सामग्री जारी करने की दिशा में काम करते हैं.”

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नींबू करेगा आपके पिंपल्स की छुट्टी, ऐसे करें इस्तेमाल

अक्सर पिंपल से बचने के लिए आप कई सारे उपाय करते होंगे. आप महंगे से महंगे क्रीम का इस्तेमाल करते होंगे पर फिर भी आपको पिंपल से छुटकारा नहीं मिलता होगा. पर क्या आपने कभी पिंपल से छुटकारा पाने के लिए नींबू का इस्तेमाल किया हैं? जी हां, नींबू स्किन के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है. तो आईए आपको बताते हैं, पींपल से छूटकारा पाने के लिए आप नींबू का इस्तेमाल कैसे करें.

नींबू और दही

नींबू और दही दोनों ही स्किन के लिए काफी फायदेमंद हैं. इन दोनों को मिलाकर अगर मुंहासों के लिए इस्तेमाल करेंगे तो यह काफी फायदेमंद साबित होगा. एक कटोरी में थोड़ा सा दही लें और उसमें नींबू का रस मिला लें. इस पेस्ट को मुहांसों पर लगाएं. इसे कुछ देर सूखने दें और फिर चेहरा धो लें. हर रोज इसका इस्तेमाल करें.

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नींबू का रस

नींबू का रस मुंहासे ठीक करने में काफी फायदेमंद साबित होगा. एक कटोरी में नींबू का रस ले लें. कौटन बौल की मदद से रस को पिंपल पर लगाएं और इसे सूखने दें. सूखने के बाद साफ पानी से चेहरा धो लें. दिन में दो बार ऐसा करना ठीक रहेगा.

नींबू और बेसन

बेसन को उबटन के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. यह स्किन को पोषण देने के साथ ही एक्स्ट्रा औयल हटाने में मदद करता है. मुहांसों के इलाज में भी यह काफी फायदेमंद है. एक कटोरी में आवश्यकतानुसार बेसन लें और एक ताजे नींबू का रस निचोड़ लें. इस पेस्ट को पिंपल पर लगाएं और सूखने दें. इसके बाद गुनगुने पानी से चेहरा धो लें.

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रोजगार: ब्यूटी पार्लर का गांव गांव फैलता कारोबार

शहरों में बड़ीबड़ी कंपनियों ने इस मेकअप कारोबार को संभाल लिया है. लोग ब्रांडैड कंपनियों के ब्यूटी पार्लर में जा कर ही मेकअप कराना चाहते हैं. इस से अलग कसबों और गांवों में छोटे और कम लागत से शुरू होने वाले ब्यूटी पार्लर में काम बढ़ रहा है.

ऐसे में मेकअप की अच्छी जानकारी रखने वाली लड़कियां गांवकसबों के छोटे हाटबाजारों में ब्यूटी पार्लर का कारोबार बढ़ा रही हैं.

गांवकसबों में रहने वाली लड़कियां ब्यूटी पार्लर चलाने की ट्रेनिंग ले कर अपना कारोबार शुरू कर सकती हैं.

आज हर उम्र के लोग ब्यूटी पार्लर में जा कर सजनासंवरना चाहते हैं, इसलिए इस कारोबार की संभावनाएं भी काफी बढ़ गई हैं. अब ब्यूटी पार्लर चलाने की जानकारी और उस के कामकाज को सिखाने के लिए छोटेछोटे शहरों में ट्रेनिंग स्कूल भी खुल गए हैं.

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क्या कर सकती हैं आप

मेकअप आर्टिस्ट, मसाज थेरैपिस्ट, ब्यूटी टीचर, कौस्मैटिक काउंसलर और ब्यूटी मैनेजर जैसे काम ब्यूटी पार्लर का कोर्स कर के शुरू किए जा सकते हैं.

ब्यूटी पार्लर के क्षेत्र में  कारोबार कर के आप अपना भी ब्यूटी पार्लर खोल सकती हैं. इस के लिए हेयर स्टाइलिस्ट, स्किन ट्रीटमैंट स्पैशलिस्ट, पर्सनल ग्रूमिंग स्पैशलिस्ट, मैनीक्योर व पैडीक्योर स्पैशलिस्ट का काम भी सीखा जा सकता है. इन सब को भलीभांति सीख कर अपना ब्यूटी पार्लर खोला जा सकता है.

इस के अलावा किसी दूसरे के ब्यूटी पार्लर में भी नौकरी की जा सकती है. अगर आप अपने अंदर लिखने की कूवत को बढ़ा लेती हैं तो अखबारों और पत्रपत्रिकाओं में ब्यूटी निखारने के तरीके लिख कर भी घर बैठे कमाई कर सकती हैं.

जरूरत इस बात की है कि इस बारे में अच्छे इंस्टीट्यूट से ही ट्रेनिंग हासिल करें. आज ब्यूटी पार्लर का कारोबार जिस तरीके से बढ़ा है, उसी जोर से खूबसूरती निखारने के सामान बनाने का काम भी बढ़ गया है.

बहुत सारे लोग इस तरह का सामान भी बनाते हैं जो खूबसूरती निखारने के बजाय उसे खराब कर देते हैं इसलिए आप को अपने काम की सही जानकारी होनी चाहिए. सही जानकारी होने से काम अच्छा होता है और लोग आप के काम की तारीफ भी करते हैं जिस से आप का कारोबार भी बढ़ता है.

कहां से करें कोर्स

मेकअप प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनी लैक्मे ने अब ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट भी खोले हैं. इन में कई तरह के कोर्स भी सिखाए जाते हैं. यहां पर अलगअलग मीआद के कोर्स कराए जाते हैं.

इंदिरानगर, लखनऊ में लैक्मे ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट चलाने वाली अनीता मिश्रा कहती हैं, ‘‘आज के दौर में मेकअप के क्षेत्र में कैरियर के मौके बढ़ रहे हैं. इस क्षेत्र में काम शुरू करने से पहले पूरी जानकारी का होना जरूरी है.’’

अच्छे ब्यूटी पार्लर के जरीए भी ब्यूटी ट्रेनिंग ली जा सकती है. इस तरह के कोर्स करने की अलगअलग फीस ली जाती है.

अनीता मिश्रा आगे कहती हैं कि काबिल लड़कियों के लिए लैक्मे की ओर से स्कौलरशिप देने का भी इंतजाम है.

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कितना लगता है पैसा

अगर किसी छोटे कसबे में ब्यूटी पार्लर खोलना है तो जगह को छोड़ कर 50,000 से 60,000 रुपए में ब्यूटी पार्लर खोला जा सकता है. इस के लिए बिजलीपानी का अच्छा इंतजाम होना चाहिए. इस के लिए 800 से 2,000  वर्गफुट की जगह जरूर होनी चाहिए.

ब्यूटी पार्लर जिस जगह पर खोला जाता है, वह जगह भी साफसुथरी होनी चाहिए ताकि लड़कियों और औरतों को वहां जाने में किसी तरह की कोई दिक्कत का सामना न करना पड़े.

ब्यूटी पार्लर को कुछ लोग सही नहीं मानते हैं इसलिए ब्यूटी पार्लर चलाने वाली को बहुत सावधान रहने की जरूरत होती है. लेडी ब्यूटी पार्लर में आदमियों का घुसना न के बराबर होना चाहिए.

अभी तक छोटी जगहों पर हेयर कटिंग, आईब्रो सैटिंग, हेयर कलर, मेहंदी, ब्राइडल मेकअप और फेसियल का ज्यादा जोर रहता है.

इस के अलावा शादीब्याह के मौके पर लोग पैडीक्योर और मैनीक्योर भी कराते हैं. इस तरह का ब्यूटी पार्लर चला कर 25,000 से 30,000 रुपए हर महीने कमाए जा सकते हैं.

यही वजह है कि अब ब्यूटी पार्लर का कोर्स कर के अपने पैरों पर खड़ी होने वाली लड़कियों व औरतों की तादाद बढ़ती जा रही है.

सब से बड़ी बात तो यह है कि कुंआरी लड़कियों के अलावा शादीशुदा औरतें  भी इस क्षेत्र में अपना एक अलग ही मुकाम बना सकती हैं. यह घर की आमदनी बढ़ाने का सब से बढि़या तरीका है.

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इन्तकाम : भाग 1

‘देखो बेटा, ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं आते… और तुम अपने पापा का स्वभाव भी अच्छी तरह जानते हो, उन्होंने अगर रिश्ते को मंजूरी दे दी है, तो बस अब उनकी बात टल नहीं सकती….’ संजीव की मां अपने इकलौते बेटे को समझाते हुए बोलीं.

‘मगर मां…’ संजीव झुंझलाया, ‘तुम समझती क्यों नहीं…? मैं निकहत को नहीं छोड़ सकता… वह मुझसे बहुत प्यार करती है….’

‘तो ठीक है, तू घर आ रही लक्ष्मी को ठुकरा दे… बंद कर दे अपने भाग्य के दरवाजे…. करोड़ों की जायदाद छोड़ दे, बंगला, गाड़ी, फार्म हाउस और इतना बड़ा लगा-लगाया बिजनेस जो तुझे मिलने वाला है, उसे भी छोड़ दे… न कर दे इस रिश्ते को… और हमें भी छोड़ दे….’ रजनीदेवी की आवाज में तेजी आ गयी, ‘हम दोनों बूढ़े-बुढ़िया सोच लेंगे कि हमारी कोई औलाद ही नहीं हुई…’ रजनीदेवी झटके से उठ खड़ी हुईं.

‘मां…’ संजीव ने बेचारगी से मां का हाथ थाम लिया.

रजनीदेवी ठिठक गयीं. उन्होंने एक नजर अपने लाडले बेटे की ओर देखा और फिर उसका सिर सहलाते हुए ममता भरे शब्दों में बोलीं, ‘मैं जानती हूं, तू अपने मां-बाप का दिल नहीं तोड़ेगा… और फिर ऐसा है ही क्या उस लड़की में, जो तू… और सबसे बड़ी बात तो यह है कि किसी और धर्म की लड़की से तेरी शादी करा के हम अपनी बिरादरी में क्या मुंह दिखाएंगे… ये सोचा है तूने?’

‘मां, निकहत को सिर्फ मेरा ही सहारा है. मेरे सिवा उसका दुख-दर्द बांटने वाला कोई भी नहीं है, वो मुझसे बहुत प्यार करती है….’ संजीव मां को कुर्सी पर वापस बिठाते हुए अपने एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला.

‘बेटा… तू सिर्फ एक नजर मोनिका को देख ले… तेरे सिर से निकहत का भूत उतर जाएगा. रही सहारा देने की बात… तो ऐसा कर तू हर महीने उसे कुछ रुपये भिजवा दिया करना… मोनिका से तेरी शादी के बाद हमारे पास लक्ष्मी की कमी नहीं होगी…’ रजनीदेवी बेटे को राजी करवाने पर तुली हुई थीं. मोनिका का नाम लेने भर से उनकी आंखों में एक अनोखी चमक उभर आयी थी.

वैसे तो संजीव भी मोनिका की खूबसूरती से बेखबर नहीं था. अभी छह महीने पहले ही एक बिजनेस इवेंन्ट में मोनिका से उसकी मुलाकात हुई थी. वह अपने पिता के साथ इस बिजनेस-मीट में आयी थी. मोनिका के पिता शहर के बहुत बड़े बिजनेसमैन थे और मोनिका उनकी इकलौती और बेहद खूबसूरत बेटी. एक पल को तो संजीव उसको देखकर ठगा सा रह गया था. उसकी सुन्दरता की चकाचौंध में लड़खड़ा गया था, मगर अगले ही पल अपनी हैसियत और निकहत के ख्याल ने उसे संभाल लिया. उसने अपने आपको एक मोटी सी गाली दी और फिर अपने दोस्तों के साथ बातों में लग गया. बिजनेस मीट और डिनर खत्म होते-होते उसे महसूस होने लगा था कि यहां मोनिका के हुस्न के सभी दीवाने हो रहे थे, मगर उसकी शोख नजरें बार-बार संजीव पर ही आकर टिक रही थीं. पार्टी में कई बार उसकी मोनिका से आंखें चार हुईं. उसके तेज में उसने खुद को पिघलता हुआ भी महसूस किया. उस पार्टी में मोनिका ने उसके दिलो-दिमाग पर अपनी छाप छोड़ दी थी. मगर उस दिन के बाद फिर कभी उससे मुलाकात नही हुई. वह इस बात को लगभग भूल चुका था कि छह महीने बाद अचानक सेठ राजनारायण के घर से उसके लिए मोनिका का रिश्ता आ गया. सेठ राजनारायण का अनेक शहरों में करोड़ों का कारोबार फैला हुआ था. कॉस्मैटिक मार्केट में वह बहुत बड़ा नाम थे. संजीव और उसके पिता का बिजनेस भी इसी क्षेत्र में था, मगर सेठ राजनारायण के मुकाबले तो अभी वह इस बिजनेस में घुटने-घुटने चल रहा था. बड़े मन्दिर के पांडेजी जब मोनिका का रिश्ता लेकर संजीव के घर आये तो उसके माता-पिता मारे खुशी के जैसे बौरा ही गये. मानो बिल्ली के भाग से छींका टूटा. मां तो बेटे की किस्मत पर बलिहारी जाती, बार-बार उसकी नजरें उतारती. यकीन ही न होता कि शहर के इतने बड़े आदमी ने उनके संजीव को अपना दामाद के रूप में चुना है. सेठ राजनारायण का करोड़ों का कारोबार, इतना बड़ा नाम, इतनी शानो-शौकत थी. मोनिका उनकी इकलौती लड़की थी इसलिए यह भी तय था कि सेठ जी की मृत्यु के बाद उनके करोड़ों के कारोबार का मालिक संजीव ही होगा, यह तमाम बातें सोच-सोच कर संजीव के माता-पिता बावले हुए जाते थे.

संजीव के पिता ने तो पांडेजी को रिश्ते के लिए तुरंत हां कह दी थी. बेटे के प्रेम-कलापों की जानकारी उन्हें नहीं थी. यह बात तो सिर्फ रजनीदेवी जानती थीं कि उनके लाडले पुत्र को प्रेम का बुखार लग गया है, मगर उन्हें विश्वास था कि दौलत की खुराक मिलते ही ये बुखार जल्द उतर जाएगा. शायद इसी भावना के वशीभूत वो बेटे को समझाने और राजी करवाने पर तुली हुई थीं.

‘तू अच्छी तरह सोच ले… तेरे पापा को पता चला कि तू किसी गैर-धर्म की लड़की से शादी की बात सोच रहा है तो नौबत मरने-मराने की भी आ सकती है… तू तो जानता ही है अपने पापा का गुस्सा…’ रजनीदेवी चिन्तित सी होती हुई बोलीं, ‘और फिर तू ही सोच, करोड़ों की बात है… लक्ष्मी किसी के दरवाजे पर बार-बार तो दस्तक देती नहीं है…’

‘वो तो ठीक है मां… मगर मैं निकहत को क्या जवाब दूंगा…?’ वह बड़ी असमंजस की स्थिति में था.

दौलत ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था. रजनीदेवी मन ही मन मुस्कुरा उठीं. उनकी बातों का असर बेटे पर दिखायी देने लगा था.

‘तू उसकी चिन्ता मत कर… उसको जमाने की ऊंच-नीच उसके बिरादरी वाले समझा देंगे, बस… अब तू उससे मिलना-जुलना बंद कर दे…’ रजनीदेवी कहते-कहते उठ खड़ी हुर्इं.

संजीव बैठा-बैठा सोचता रहा कि कल वह निकहत को क्या बोलेगा…? आगे न मिलने का क्या बहाना बनाएगा…? उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. एक ओर निकहत थी और दूसरी ओर करोड़ों का साम्राज्य… उसके मां-बाप की ख्वाहिशें… मोनिका की खूबसूरती… जो अब उसे निकहत के प्यार से ज्यादा अनमोल नजर आ रही थी…

निकहत… एक मध्यमवर्गीय परिवार की सीधी-सरल लड़की. उसके मासूम मगर खूबसूरत चेहरे पर दो बड़ी-बड़ी सम्मोहित कर देने वाली आंखें… उसकी मधुर, कोमल और झंकृत आवाज… जैसे वीणा के स्वर बज उठे हों. संजीव से पहली बार उसकी मुलाकात प्रेमभाई के स्टूडियो में हुई थी. प्रेमभाई, संजीव के दोस्तों में से थे. उस रोज निकहत स्टूडियो में एक गाने की रिकॉर्डिंग के लिए आयी थी, जब संजीव भी किसी काम से प्रेमभाई से मिलने पहुंचा था. स्टूडियो के शीशे के पार मिक्सिंग रूम में बैठे संजीव ने जब निकहत को गाते हुए सुना तो उसका दीवाना हो गया. गीत स्वयं निकहत का लिखा हुआ था. वह बड़ी देर तक स्टूडियो में बैठा उसके गीत के बोलों और उसकी आवाज के माधुर्य में खोया रहा. कितनी वेदना थी उसके गीत में… ‘ले चली मुझे मेरी जिन्दगी कहां, रास्ते हैं गुम मन्ज़िल धुआं धुआं…’

और अचानक ही निकहत के साथ उसकी जिन्दगी एक अनजाने सफर पर चल पड़ी, जिसकी मन्ज़िल का पता दूर-दूर तक नहीं था.

निकहत अपनी आवाज के सहारे अपनी अपंग-विधवा मां और छोटे भाई का पेट पाल रही थी. उसकी जिन्दगी एक सीधे-सपाट रास्ते पर रेंग रही थी कि संजीव ने अचानक उसमें प्रवेश कर चारों ओर फूल ही फूल खिला दिये. पहले प्यार का स्पर्श निकहत ने दिल की गहराइयों से महसूस किया था. संजीव जैसे ख्ूाबसूरत नौजवान का प्यार ठुकरा पाना उसके बस में नहीं था. उसकी अम्मी ने उसे जात-बिरादरी की बहुत ऊंच-नीच समझायी, मगर सब बेकार… बेटी की कमाई न खा रही होती तो उन दोनों के ताल्लुकात पर शायद जमीन-आसमान एक कर देती, उसका स्टूडियो जाना ही बंद करवा देती, मगर लाचार थी पैसे से भी और अपने पैरों से भी… बेटा भी उसका अभी काफी छोटा था और अभी पढ़ रहा था. पांच साल पहले मियां उसकी गोद में चार साल के जाहिद और चौदह साल की निकहत को छोड़कर अल्लाह को प्यारे हो गये थे. दो कमरों के एक छोटे से घर के अलावा और कोई धन-दौलत नहीं थी. मियां जिस प्राइवेट स्कूल में मामूली तनख्वाह पर उर्दू के टीचर थे, उसी में निकहत फ्री में पढ़ रही थी. बाप के मरने के बाद उसने बड़ी मुश्किल से अपनी पढ़ाई पूरी की थी. हां, उसका गला बेहद सुरीला था तो स्कूल टाइम से ही कभी रेडियो तो कभी टीवी के छोटे-छोटे प्रोग्राम मिलते रहते थे. इसी से घर का खर्च और छोटे भाई की पढ़ाई का खर्च निकल रहा था. शाम के वक्त वह ट्यूशन क्लास चलाती थी.

संजीव से मुलाकात के बाद निकहत की जिन्दगी को जैसे खुशियों की संजीवनी मिल गयी थी. वह हर वक्त फूलों की तरह हंसती-मुस्कुराती रहती थी. उसका सौन्दर्य भी निखर आया था. अम्मी ने भी अब उसे समझाना छोड़ दिया था. उनके मुंह से तो सदा यही निकलता, ‘जाने क्या लिखा है इसकी तक़दीर में…’ हालांकि संजीव को वह भी पसन्द करती थीं. खूबसूरत, जवान, पढ़ालिखा और बहुत बड़े व्यापारी का न सही, मगर था तो व्यापारी का बेटा, पैसे की कमी भी न थी. अगर कहीं वह अपनी ही बिरादरी का होता तो निकहत की अम्मी तो ऐसे रिश्ते पर वारी-वारी जाती. ऐसा दामाद तो उन्हें चिराग लेकर ढूंढने से भी न मिलता. मगर अफसोस… ऐसा न था, फिर भी उन्होंने निकहत की खुशियों के आगे हथियार डाल दिये थे. हर वक्त गम्भीर और उदास रहने वाली उनकी बेटी, जिसने अपनी जवानी की चुहलों को दरकिनार करके घर का खर्च बखूबी संभाला हुआ था, आज संजीव के साथ हंसती-खिलखिलाती कितनी अच्छी लगती थी. उसके मुखड़े पर निखार आ गया था, जैसे गुलाब के फूल पर पड़ी हुई गर्द सावन की हल्की सी फुहार से धुल गयी हो. संजीव न केवल उस सूने घर-आंगन में हंसी-मजाक का तूफान खड़ा कर देता था, बल्कि समय-कुसमय उनकी आर्थिक मदद भी करता रहता था और यही वजह थी कि अम्मी के मुंह पर ताले पड़ गये थे और निकहत संजीव को अपना मसीहा मान बैठी थी.

जानिए क्यों, यहां मुफ्त में हर सामान मिलता है

आज के समय में बिना पैसों के कुछ भी मुमकिन नहीं है. अगर आपके पास पैसे हो तो, आपके लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं लगता. पैसे के बल पर ही आप कोई भी काम कर सकते हैं. अगर आपके पास पैसे हो तो आपकी हर जगह वैल्यू रहती हैं. वहीं अगर आप के पास नहीं है तो आपको कोई पूछने वाला नहीं होता है. यानि आपके जीवन में पैसे की काफी वैल्यू होती है.

लेकिन क्या आप जानते हैं, एक ऐसा भी जगह है जहां बिना पैसों के समान मिलता है. जी हां ये सच है, यहां मुफ्त में मिलता है हर समान.देश में एक ऐसी ही जगह है जहां हर सामान मुफ्त में मिलता है,  और वो जगह असम में है.

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दरअसल असम के मोरीगांव जिले में जूनबिल क्षेत्र में एक मेला लगता है. इस मेले में हर सामान मुफ्त में मिलता है.इस मेले में पहाड़ी जनजातियां और मैदानी जनजातियां बड़ी संख्या में पहुंचती हैं. वो अपना सामान बेचने के लिए इस मेले में आती हैं.

ये मेला हर साल तीन दिन के लिए लगता है. असम में लगने वाला यह मेला अपने आप में एक अनोखा मेला है. इस मेले में काफी संख्या में लोग पहुंचते हैं.

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