भाग-1

‘देखो बेटा, ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं आते… और तुम अपने पापा का स्वभाव भी अच्छी तरह जानते हो, उन्होंने अगर रिश्ते को मंजूरी दे दी है, तो बस अब उनकी बात टल नहीं सकती….’ संजीव की मां अपने इकलौते बेटे को समझाते हुए बोलीं.

‘मगर मां…’ संजीव झुंझलाया, ‘तुम समझती क्यों नहीं…? मैं निकहत को नहीं छोड़ सकता… वह मुझसे बहुत प्यार करती है….’

‘तो ठीक है, तू घर आ रही लक्ष्मी को ठुकरा दे… बंद कर दे अपने भाग्य के दरवाजे…. करोड़ों की जायदाद छोड़ दे, बंगला, गाड़ी, फार्म हाउस और इतना बड़ा लगा-लगाया बिजनेस जो तुझे मिलने वाला है, उसे भी छोड़ दे… न कर दे इस रिश्ते को… और हमें भी छोड़ दे….’ रजनीदेवी की आवाज में तेजी आ गयी, ‘हम दोनों बूढ़े-बुढ़िया सोच लेंगे कि हमारी कोई औलाद ही नहीं हुई…’ रजनीदेवी झटके से उठ खड़ी हुईं.

‘मां…’ संजीव ने बेचारगी से मां का हाथ थाम लिया.

रजनीदेवी ठिठक गयीं. उन्होंने एक नजर अपने लाडले बेटे की ओर देखा और फिर उसका सिर सहलाते हुए ममता भरे शब्दों में बोलीं, ‘मैं जानती हूं, तू अपने मां-बाप का दिल नहीं तोड़ेगा… और फिर ऐसा है ही क्या उस लड़की में, जो तू… और सबसे बड़ी बात तो यह है कि किसी और धर्म की लड़की से तेरी शादी करा के हम अपनी बिरादरी में क्या मुंह दिखाएंगे… ये सोचा है तूने?’

‘मां, निकहत को सिर्फ मेरा ही सहारा है. मेरे सिवा उसका दुख-दर्द बांटने वाला कोई भी नहीं है, वो मुझसे बहुत प्यार करती है….’ संजीव मां को कुर्सी पर वापस बिठाते हुए अपने एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला.

‘बेटा… तू सिर्फ एक नजर मोनिका को देख ले… तेरे सिर से निकहत का भूत उतर जाएगा. रही सहारा देने की बात… तो ऐसा कर तू हर महीने उसे कुछ रुपये भिजवा दिया करना… मोनिका से तेरी शादी के बाद हमारे पास लक्ष्मी की कमी नहीं होगी…’ रजनीदेवी बेटे को राजी करवाने पर तुली हुई थीं. मोनिका का नाम लेने भर से उनकी आंखों में एक अनोखी चमक उभर आयी थी.

वैसे तो संजीव भी मोनिका की खूबसूरती से बेखबर नहीं था. अभी छह महीने पहले ही एक बिजनेस इवेंन्ट में मोनिका से उसकी मुलाकात हुई थी. वह अपने पिता के साथ इस बिजनेस-मीट में आयी थी. मोनिका के पिता शहर के बहुत बड़े बिजनेसमैन थे और मोनिका उनकी इकलौती और बेहद खूबसूरत बेटी. एक पल को तो संजीव उसको देखकर ठगा सा रह गया था. उसकी सुन्दरता की चकाचौंध में लड़खड़ा गया था, मगर अगले ही पल अपनी हैसियत और निकहत के ख्याल ने उसे संभाल लिया. उसने अपने आपको एक मोटी सी गाली दी और फिर अपने दोस्तों के साथ बातों में लग गया. बिजनेस मीट और डिनर खत्म होते-होते उसे महसूस होने लगा था कि यहां मोनिका के हुस्न के सभी दीवाने हो रहे थे, मगर उसकी शोख नजरें बार-बार संजीव पर ही आकर टिक रही थीं. पार्टी में कई बार उसकी मोनिका से आंखें चार हुईं. उसके तेज में उसने खुद को पिघलता हुआ भी महसूस किया. उस पार्टी में मोनिका ने उसके दिलो-दिमाग पर अपनी छाप छोड़ दी थी. मगर उस दिन के बाद फिर कभी उससे मुलाकात नही हुई. वह इस बात को लगभग भूल चुका था कि छह महीने बाद अचानक सेठ राजनारायण के घर से उसके लिए मोनिका का रिश्ता आ गया. सेठ राजनारायण का अनेक शहरों में करोड़ों का कारोबार फैला हुआ था. कॉस्मैटिक मार्केट में वह बहुत बड़ा नाम थे. संजीव और उसके पिता का बिजनेस भी इसी क्षेत्र में था, मगर सेठ राजनारायण के मुकाबले तो अभी वह इस बिजनेस में घुटने-घुटने चल रहा था. बड़े मन्दिर के पांडेजी जब मोनिका का रिश्ता लेकर संजीव के घर आये तो उसके माता-पिता मारे खुशी के जैसे बौरा ही गये. मानो बिल्ली के भाग से छींका टूटा. मां तो बेटे की किस्मत पर बलिहारी जाती, बार-बार उसकी नजरें उतारती. यकीन ही न होता कि शहर के इतने बड़े आदमी ने उनके संजीव को अपना दामाद के रूप में चुना है. सेठ राजनारायण का करोड़ों का कारोबार, इतना बड़ा नाम, इतनी शानो-शौकत थी. मोनिका उनकी इकलौती लड़की थी इसलिए यह भी तय था कि सेठ जी की मृत्यु के बाद उनके करोड़ों के कारोबार का मालिक संजीव ही होगा, यह तमाम बातें सोच-सोच कर संजीव के माता-पिता बावले हुए जाते थे.

संजीव के पिता ने तो पांडेजी को रिश्ते के लिए तुरंत हां कह दी थी. बेटे के प्रेम-कलापों की जानकारी उन्हें नहीं थी. यह बात तो सिर्फ रजनीदेवी जानती थीं कि उनके लाडले पुत्र को प्रेम का बुखार लग गया है, मगर उन्हें विश्वास था कि दौलत की खुराक मिलते ही ये बुखार जल्द उतर जाएगा. शायद इसी भावना के वशीभूत वो बेटे को समझाने और राजी करवाने पर तुली हुई थीं.

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‘तू अच्छी तरह सोच ले… तेरे पापा को पता चला कि तू किसी गैर-धर्म की लड़की से शादी की बात सोच रहा है तो नौबत मरने-मराने की भी आ सकती है… तू तो जानता ही है अपने पापा का गुस्सा…’ रजनीदेवी चिन्तित सी होती हुई बोलीं, ‘और फिर तू ही सोच, करोड़ों की बात है… लक्ष्मी किसी के दरवाजे पर बार-बार तो दस्तक देती नहीं है…’

‘वो तो ठीक है मां… मगर मैं निकहत को क्या जवाब दूंगा…?’ वह बड़ी असमंजस की स्थिति में था.

दौलत ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था. रजनीदेवी मन ही मन मुस्कुरा उठीं. उनकी बातों का असर बेटे पर दिखायी देने लगा था.

‘तू उसकी चिन्ता मत कर… उसको जमाने की ऊंच-नीच उसके बिरादरी वाले समझा देंगे, बस… अब तू उससे मिलना-जुलना बंद कर दे…’ रजनीदेवी कहते-कहते उठ खड़ी हुर्इं.

संजीव बैठा-बैठा सोचता रहा कि कल वह निकहत को क्या बोलेगा…? आगे न मिलने का क्या बहाना बनाएगा…? उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. एक ओर निकहत थी और दूसरी ओर करोड़ों का साम्राज्य… उसके मां-बाप की ख्वाहिशें… मोनिका की खूबसूरती… जो अब उसे निकहत के प्यार से ज्यादा अनमोल नजर आ रही थी…

निकहत… एक मध्यमवर्गीय परिवार की सीधी-सरल लड़की. उसके मासूम मगर खूबसूरत चेहरे पर दो बड़ी-बड़ी सम्मोहित कर देने वाली आंखें… उसकी मधुर, कोमल और झंकृत आवाज… जैसे वीणा के स्वर बज उठे हों. संजीव से पहली बार उसकी मुलाकात प्रेमभाई के स्टूडियो में हुई थी. प्रेमभाई, संजीव के दोस्तों में से थे. उस रोज निकहत स्टूडियो में एक गाने की रिकॉर्डिंग के लिए आयी थी, जब संजीव भी किसी काम से प्रेमभाई से मिलने पहुंचा था. स्टूडियो के शीशे के पार मिक्सिंग रूम में बैठे संजीव ने जब निकहत को गाते हुए सुना तो उसका दीवाना हो गया. गीत स्वयं निकहत का लिखा हुआ था. वह बड़ी देर तक स्टूडियो में बैठा उसके गीत के बोलों और उसकी आवाज के माधुर्य में खोया रहा. कितनी वेदना थी उसके गीत में… ‘ले चली मुझे मेरी जिन्दगी कहां, रास्ते हैं गुम मन्ज़िल धुआं धुआं…’

और अचानक ही निकहत के साथ उसकी जिन्दगी एक अनजाने सफर पर चल पड़ी, जिसकी मन्ज़िल का पता दूर-दूर तक नहीं था.

निकहत अपनी आवाज के सहारे अपनी अपंग-विधवा मां और छोटे भाई का पेट पाल रही थी. उसकी जिन्दगी एक सीधे-सपाट रास्ते पर रेंग रही थी कि संजीव ने अचानक उसमें प्रवेश कर चारों ओर फूल ही फूल खिला दिये. पहले प्यार का स्पर्श निकहत ने दिल की गहराइयों से महसूस किया था. संजीव जैसे ख्ूाबसूरत नौजवान का प्यार ठुकरा पाना उसके बस में नहीं था. उसकी अम्मी ने उसे जात-बिरादरी की बहुत ऊंच-नीच समझायी, मगर सब बेकार… बेटी की कमाई न खा रही होती तो उन दोनों के ताल्लुकात पर शायद जमीन-आसमान एक कर देती, उसका स्टूडियो जाना ही बंद करवा देती, मगर लाचार थी पैसे से भी और अपने पैरों से भी… बेटा भी उसका अभी काफी छोटा था और अभी पढ़ रहा था. पांच साल पहले मियां उसकी गोद में चार साल के जाहिद और चौदह साल की निकहत को छोड़कर अल्लाह को प्यारे हो गये थे. दो कमरों के एक छोटे से घर के अलावा और कोई धन-दौलत नहीं थी. मियां जिस प्राइवेट स्कूल में मामूली तनख्वाह पर उर्दू के टीचर थे, उसी में निकहत फ्री में पढ़ रही थी. बाप के मरने के बाद उसने बड़ी मुश्किल से अपनी पढ़ाई पूरी की थी. हां, उसका गला बेहद सुरीला था तो स्कूल टाइम से ही कभी रेडियो तो कभी टीवी के छोटे-छोटे प्रोग्राम मिलते रहते थे. इसी से घर का खर्च और छोटे भाई की पढ़ाई का खर्च निकल रहा था. शाम के वक्त वह ट्यूशन क्लास चलाती थी.

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संजीव से मुलाकात के बाद निकहत की जिन्दगी को जैसे खुशियों की संजीवनी मिल गयी थी. वह हर वक्त फूलों की तरह हंसती-मुस्कुराती रहती थी. उसका सौन्दर्य भी निखर आया था. अम्मी ने भी अब उसे समझाना छोड़ दिया था. उनके मुंह से तो सदा यही निकलता, ‘जाने क्या लिखा है इसकी तक़दीर में…’ हालांकि संजीव को वह भी पसन्द करती थीं. खूबसूरत, जवान, पढ़ालिखा और बहुत बड़े व्यापारी का न सही, मगर था तो व्यापारी का बेटा, पैसे की कमी भी न थी. अगर कहीं वह अपनी ही बिरादरी का होता तो निकहत की अम्मी तो ऐसे रिश्ते पर वारी-वारी जाती. ऐसा दामाद तो उन्हें चिराग लेकर ढूंढने से भी न मिलता. मगर अफसोस… ऐसा न था, फिर भी उन्होंने निकहत की खुशियों के आगे हथियार डाल दिये थे. हर वक्त गम्भीर और उदास रहने वाली उनकी बेटी, जिसने अपनी जवानी की चुहलों को दरकिनार करके घर का खर्च बखूबी संभाला हुआ था, आज संजीव के साथ हंसती-खिलखिलाती कितनी अच्छी लगती थी. उसके मुखड़े पर निखार आ गया था, जैसे गुलाब के फूल पर पड़ी हुई गर्द सावन की हल्की सी फुहार से धुल गयी हो. संजीव न केवल उस सूने घर-आंगन में हंसी-मजाक का तूफान खड़ा कर देता था, बल्कि समय-कुसमय उनकी आर्थिक मदद भी करता रहता था और यही वजह थी कि अम्मी के मुंह पर ताले पड़ गये थे और निकहत संजीव को अपना मसीहा मान बैठी थी.

(धारावाहिक के दूसरे भाग में पढ़िये कि निकहत से मुक्ति पाने के लिए संजीव ने क्या हथकंडा अपनाया और जब निकहत को सच्चाई का पता चला तब क्या हुआ…)

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