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Romantic Hindi Story : दिल के करीब

Romantic Hindi Story : ‘‘आ ओ, तुम यहां बैठ जाओ,’’ समीर ने प्रीति को अपने बगल में खड़ा देखा तो अपनी सीट से उठते हुए कहा.

‘‘नहीं, तुम बैठो, मुझे अगले स्टैंड पर उतरना है.’’

‘‘तुम बैठो, तुम्हें खड़ा होने में तकलीफ हो रही है,’’ उस ने फिर आग्रह किया तो प्रीति उस की सीट पर बैठ गई.

बस में खचाखच भीड़ थी. तिल भर भी पैर रखने की जगह नहीं थी. प्रीति का एक पैर जन्मजात खराब था. इसलिए थोड़ा लंगड़ा कर चलती थी. नीलम ठीक उस के पीछे खड़ी थी. मुसकराती हुई बोली, ‘‘चलो तुम्हारी तकलीफ समझाने वाला कोई तो मिला.’’

अगले स्टैंड पर दोनों सहेलियां उतर गईं. समीर भी उन के पीछेपीछे उतरा.

‘‘तुम्हारी सहेली के साथ मैं ने अन्याय किया,’’ वह प्रीति को देखते हुए मुसकरा कर बोला, ‘‘लेकिन क्या करूं, सीट एक थी और तुम दो.’’

‘‘कोई बात नहीं, अगली बार तुम मुझे लिफ्ट दे देना,’’ नीलम भी मुसकराते हुए बोली तो समीर ने पूछा, ‘‘वैसे, तुम दोनों यहां कहां रहती हो?’’

‘‘बगल में ही, गौरव गर्ल्स होस्टल में,’’ नीलम ने बताया.

‘‘अच्छा है, अब तो हमारा इसी स्टैंड से कालेज आनाजाना होता रहेगा. मैं भी थोड़ी दूर पर ही रहता हूं. मेरे बाबूजी एक कंपनी में जौब करते हैं और यहीं उन्होंने एक अपार्टमैंट खरीदा हुआ है.’’ समीर, प्रीति और नीलम एक ही कालेज में थे. आज कालेज में उन का पहला दिन था.

प्रीति आगरा की रहने वाली थी और नीलम लखनऊ की. दोनों गौरव गर्ल्स होस्टल में एक रूम में रहती थीं. प्रीति के पिताजी एक अच्छे ओहदे वाली सर्विस में थे, किंतु असमय उन का देहांत हो गया था जिस के कारण उस की मां को अनुकंपा के आधार पर उसी औफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई थी.

प्रीति के बाबूजी बहुत पहले अपना गांव छोड़ कर आगरा में आ गए थे और यहीं उन्होंने एक छोटा सा मकान बना लिया था. गांव की जमीन और मकान उन्होंने बेच दिया था. प्रीति की मां चाहती थीं कि वह आईएएस की तैयारी करे ताकि एक ऊंची पोस्ट पर जा कर अपनी विकलांगता के दर्द को भुला सके, इसलिए उन्होंने उसे दिल्ली में एमए करने के लिए भेजा था. प्रीति को शुरू से ही साइकोलौजी में गहरी रुचि थी और बीए में भी उस का यह फेवरेट सब्जैक्ट था इसलिए उस ने इसी सब्जैक्ट से एमए करने का विचार किया. प्रीति को शुरू से ही कुछ सीखने और अधिकाधिक ज्ञानार्जन करने की इच्छा थी. वह साइकोलौजी में शोध कार्य करना चाहती थी और भविष्य में किसी कालेज में लैक्चरर बनने की ख्वाहिश पाले हुए थी.

नीलम एक बड़े बिजनैसमैन की बेटी थी. उस के पिताजी चाहते थे कि उन की बेटी दिल्ली के किसी कालेज से एमए कर ले और उस की सोसायटी मौडर्न हो जाए क्योंकि आजकल बिजनैसमैन के लड़के भी एक पढ़ीलिखी और मौडर्न लड़की को शादी के लिए प्रेफर करते थे. इसलिए उस ने दिल्ली के इसी कालेज में ऐडमिशन ले लिया था और ईजी सब्जैक्ट होने के कारण साइकोलौजी से एमए करना चाहती थी. समीर के पिताजी उसे आईएएस बनाना चाहते थे और समीर भी इस के लिए इच्छुक था, इसलिए वह भी साइकोलौजी से एमए करने के लिए कालेज में ऐडमिशन लिए हुए था.

प्रीति एक साधारण परिवार की थी और स्वभाव से भी बहुत ही सरल, इसलिए उस की वेशभूषा और पोशाकें भी साधारण थीं. पर वह सुंदर व स्मार्ट थी. उसे बनावशृंगार और मेकअप पसंद नहीं था किंतु दूसरी ओर नीलम सुंदर और छरहरे बदन की गोरी लड़की थी और अपने शरीर की सुंदरता पर उस का सब से ज्यादा ध्यान था. वह मेकअप करती और प्रतिदिन नईनई ड्रैस पहनती. कालेज में जहां प्रीति अपनी किताबों में उलझी रहती वहीं नीलम अपनी सहेलियों के साथ गपें मारती और मस्ती करती.

एक दिन प्रीति लंच के समय कालेज की लाइब्रेरी में कुछ किताबों से कुछ नोट्स तैयार कर रही थी. तभी नीलम उस के पास आई और बोली, ‘‘अरे पढ़ाकू, यह लंच का समय है और तुम किताबों से माथापच्ची कर रही हो जैसे रिसर्च कर रही हो. चलो चल कर कैफेटेरिया में चाय पीते हैं.’’

‘‘तुम जाओ, मैं थोड़ी देर बाद आऊंगी,’’ प्रीति ने कहा तो नीलम चली गई.

तभी उस ने महसूस किया कि उस के पीछे कोई खड़ा है. उस ने पलट कर पीछे की ओर देखा तो समीर था.

बस में मिलने के बाद समीर आज पहली बार उस के पास आ कर खड़ा हुआ था. क्लास में कभीकभी उस की ओर देख लिया करता था, किंतु बात नहीं करता था.

‘‘प्रीति सभी लोग कैफेटेरिया में चाय पी रहे हैं और तुम यहां बैठ कर नोट्स बना रही हो? अभी तो परीक्षा होने में काफी देर है. चलो, चाय पीते हैं.’’

‘‘बाद में आऊंगी समीर, थोड़े से नोट्स बनाने बाकी हैं, पूरा कर लेती हूं.’’

‘‘अब बंद भी करो,’’ समीर ने उस की नोटबुक को समेटते हुए कहा.

‘‘अच्छा चलो,’’ प्रीति भी किताबों को नोटबुक के साथ हाथ में उठाते हुए उठ खड़ी हुई.

जब समीर और प्रीति कैफेटेरिया में पहुंचे तो वहां पहले से ही नीलम अपनी कुछ क्लासमेट्स के साथ बैठ कर चाय पी रही थी. अगलबगल और भी कई लड़केलड़कियां थीं.

‘‘आ गई पढ़ाकू,’’ सविता ने उस को देखते हुए चुटकी ली.

‘‘मैं ने कहा, तो मेरे साथ नहीं आई. अब समीर के एक बार कहने पर आ गई. हां भई, उस दिन बस में उठ कर अपनी सीट जो तुम्हें औफर की थी. अब उस का कुछ खयाल तो रखना ही पड़ेगा न.’’ नीलम की बात सुन कर उस की सहेलियां हंसने लगीं.

समीर कुछ झोंप सा गया. बात आईगई हो गई किंतु इस के बाद प्रीति और समीर अकसर आपस में मिलते. प्रीति को साइकोलौजी के कई टौपिक्स पर बहुत ही अच्छी पकड़ थी. उस ने साइकोलौजी में कई जानेमाने लेखकों की पुस्तकों का अध्ययन किया था. जब कभी क्लास में कोई लैक्चरर आता तो उस विषय के ऐसे गंभीर प्रश्नों को उठाती कि सभी उस की ओर ताकने लगते.

समीर को उस के पढ़ने में काफी मदद मिलती. समय के साथसाथ उन के बीच आपसी लगाव बढ़ रहा था. उन के बीच का गहराता संबंध कालेज में चर्चा का विषय था. कुछ साथी उस पर चुटकियां लेने से नहीं चूकते.

‘लंगड़ी ने समीर को अपने रूपजाल में फंसा लिया है,’ कोई कहता तो कोई उन दोनों की ओर इशारा करते हुए अपने मित्र के कान में कुछ फुसफुसाता, जिस का एक ही मतलब होता था कि उन दोनों के बीच कुछ पक रहा है. अब वह किसकिस को जवाब देता. इसलिए चुप रहता.

वैसे भी समीर अपने कैरियर के प्रति सीरियस था. उसे आईएएस की तैयारी करनी थी जिस में साइकोलौजी को मुख्य विषय रखना था. वह इस विषय के बारे में अधिकाधिक जानकारी प्राप्त कर लेना चाहता था. उधर प्रीति को इसी विषय के किसी टौपिक पर रिसर्च करना था. इसलिए दोनों के अपनेअपने इंटरैस्ट थे. किंतु लगातार एकदूसरे के साथ संपर्क में रहने के कारण उन के अंदर प्रेम का भी अंकुरण होने लगा था जिस को दोनों महसूस तो करते किंतु इस की आपस में कभी चर्चा नहीं करते.

ऐसे ही कब 2 वर्ष गुजर गए उन्हें पता ही नहीं चला. दोनों ने एमए फर्स्ट डिवीजन से पास कर लिया. फिर समीर ने आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली में ही एक कोचिंग जौइन कर ली और प्रीति एक प्रोफैसर के अंडर पीएचडी करने लगी.

नीलम ने किसी तरह एमए किया और घर चली गई. उस के पिता ने उस की शादी एक बिजनैसमैन से कर दी. उस के निमंत्रण पर प्रीति उस की शादी में गई. उस ने समीर को भी निमंत्रण दिया था लेकिन किसी कारणवश समीर नहीं पहुंच पाया. नीलम ने प्रीति से वादा किया था कि भले ही वह उस से दूर है लेकिन जब कभी वह याद करेगी वह जरूर उस से मिलेगी. बिछुड़ते वक्त दोनों सहेलियां खूब रोईं.

इधर समीर और प्रीति के बीच दूरी बढ़ी तो लगाव भी कम होने लगा. उन के बीच कुछ महीनों तक तो फोन पर संपर्क होता रहा, फिर धीरेधीरे वह समाप्त हो गया. यही दुनियादारी है. कभी समीर जब तक उस से एक बार नहीं मिल लेता उसे चैन न मिलता, अब उसे उस की याद ही नहीं रही. प्रीति ने भी उस से बात करनी बंद कर दी.

जीवन किसी का भी हर वक्त एकजैसा कहां रहता है. यह कोई जानता भी तो नहीं कि कब किस के साथ क्या घट जाए. प्रीति अभी दिल्ली में ही थी कि एक दिन सुबह सुबह ही उसे खबर मिली कि उस की मां को हार्टअटैक आया है और वह अस्पताल में भरती है. सुनते ही वह आगरा के लिए भागी किंतु वहां पहुंचने पर मालूम हुआ कि उस की मां अब दुनिया में नहीं रहीं.

प्रीति पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. वह फफक कर रोने लगी. अब उस का एकमात्र सहारा मां भी उसे छोड़ गई थीं. अस्पताल में वह मां के शव को पकड़ कर रो रही थी. उस को सांत्वना देने वाला कोई नहीं था. उस की मां के औफिस वाले आए हुए थे. उन लोगों ने कहा, ‘‘बेटी, अब अपने को संभाल…यह समय रोने का नहीं है. उठो, अब मां का दाहसंस्कार करने की सोचो…अब आग भी तुम्हें ही देनी है.’’

इस दुखभरी घड़ी में अपनों की कितनी याद आती है. उस ने समीर को फोन लगाया लेकिन उस का फोन तो डैड था. शायद उस ने नंबर बदल लिया था. अंतिम बार जब उस से भेंट हुई थी तो कहा था, अब दूसरा सिम लेगा. हारथक कर उस ने नीलम को याद किया. नीलम से उस की शादी में अंतिम बार भेंट हुई थी. वैसे भी उस से कभीकभी बातें होती रहती थीं. उस के हस्बैंड की प्रयागराज में एक बड़ी कपड़े की दुकान थी. वह खुले विचारवाला युवक था, इसलिए नीलम को कहीं आनेजाने में रोक नहीं थी.

नीलम खबर सुनते ही आगरा के लिए अपनी गाड़ी से चल पड़ी. प्रीति के जिम्मे अभी काफी काम थे. अस्पताल का बिल चुकाना, मां का दाहसंस्कार क्रिया करना और अकेले पड़े घर को संभालना. एक युवती जिस को दुनियादारी का भी कोई ज्ञान न हो और जिस की जिंदगी मां पिता की छत्रछाया में बीती हो, व जिस को घर संभालने का कोई व्यावहारिक ज्ञान न हो, अचानक इस तरह की विपत्ति पड़ने पर क्या स्थिति हो सकती है, यह तो वही समझा सकती है जिस के सिर पर यह अचानक बोझ आ पड़ा हो.

इस स्थिति में पड़ोसी भी बहुत काम नहीं आते सिवा सांत्वना के कुछ शब्द बोल देने के. और जिस का कोई अपना न हो उस के लिए तो यह क्षण बड़े ही धैर्य रखने और आत्मबल बनाए रखने का होता है और वह भी तब जब कोई अपना बहुत ही करीबी उसे छोड़ कर चला गया हो. सब से बड़़ी दिक्कत यह थी कि उस के पास पैसे नहीं थे और मां के बैंक अकाउंट का उस के पास कोई लेखाजोखा न था. पिछले महीने मां ने उस के खाते में जो पैसा ट्रांसफर किया था वह अब तक खर्च हो चुका था.

नीलम से वह कुछ मांगना तो न चाहती थी किंतु उस के पास इस के सिवा कोई रास्ता भी नहीं बचा था, इसलिए उस ने उस से कुछ मदद करने के लिए कहा. नीलम ने चलते वक्त चैकबुक और अपना डैबिट कार्ड भी पास में रख लिया. नीलम ने गांव के अपने सहोदर चाचाजी को बुला लिया जिन्होंने प्रीतिकी मां के दाहसंस्कार करवाने में बहुत मदद की. नीलम ने अस्पताल के सारे बिल भर दिए और मां के दाहसंस्कार व पारंपरिक विधि में होने वाले दूसरे आवश्यक खर्च को वहन किया.

प्रीति दकियानूसी विचारों वाली युवती नहीं थी, इसलिए उस ने विद्युत शवदाह द्वारा अपनी मां का दाहसंस्कार किया और अन्य पारंपरिक क्रियाएं भी बहुत सादे ढंग से संपन्न कीं. जब तक प्रीति सारी क्रियाओं से निबट नहीं गई तब तक नीलम उस के साथ रही.

परिस्थितियां चाहे जितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों मनुष्य को उस से तो बाहर निकलना ही पड़ता है और प्रीति भी इस से निकल तो गई किंतु वह जिस खालीपन का एहसास कर रही थी उसे भरना बहुत ही मुश्किल था.

कुछ समय बाद नीलम प्रयागराज लौट गई और प्रीति अपने मकान को एक विश्वस्त आदमी को किराए पर दे कर अपना रिसर्च वाला काम पूरा करने के लिए दिल्ली लौट आई. उसे पता चला कि उस की मां ने अपने नाम से एक इंश्योरैंस भी कराया था जिस का अच्छाखासा पैसा नौमिनी होने के कारण उसे मिल गया.

मां के बैंक अकाउंट में भी काफी पैसे थे, इसलिए उस को अपने रिसर्च के काम में कोई दिक्कत न आई. उस ने नीलम का सारा पैसा लौटा दिया. समय बीतता गया और उस के साथसाथ प्रीति भी पहले से ज्यादा समझदार व परिपक्व होती गई. उसे आगरा के ही एक कालेज में लैक्चरर की नौकरी मिल गई.

इस दुनिया में कहां किसी को किसी से मतलब होता है. वह अकेली थी. समीर जो कभी उस के दिल के करीब आ चुका था उस से भी उस का संपर्क टूट गया था. नीलम अपने घर चली गई थी जिस से कभीकभी फोन पर बातचीत होती रहती थी.

लड़कियों की शादी में तो वैसे ही काफी दिक्कतें होती हैं और उस का तो एक पैर भी खराब था. और उस की शादी के बारे में सोचने वाला भी कोई नहीं था. जो लोग उस के संपर्क में आते थे, वे उस की सुंदरता से आकर्षित हो कर आते थे न कि उस का जीवनसाथी बनने के लिए. इसलिए ऐसे लोगों से वह हमेशा ही अपने को दूर रखती थी. अब तो उस की जिंदगी का एक ही मकसद था घर से कालेज जाना, वहां मनोयोग से छात्रों को पढ़ाना और शाम को घर लौट कर मनोविज्ञान की पुस्तकों का गहरा अध्ययन करना.

इधर, वह मनोविज्ञान पर एक किताब लिख रही थी जिस से उस का खालीपन कट जाता था. कालेज के उस के सहकर्मी पढ़ाने में कम कालेज की आपसी राजनीति में ज्यादा इंटरैस्ट लेते थे और उन की इन बेवजह की चर्चाओं से वह अपने को हमेशा ही दूर रखती थी, इसलिए उन लोगों से भी उस का ज्यादा संबंध नहीं था.

किंतु कालेज के प्रिंसिपल उस को बहुत सम्मान देते थे क्योंकि उन की निगाहों में उसे इतनी कम उम्र में काफी अच्छी जानकारी थी, इसलिए वे उस की हर संभव मदद भी करते थे. कालेज के छात्र भी उस की कक्षाओं को कभी भी नहीं छोड़ते थे क्योंकि उस से अच्छा लैक्चर देने वाला कालेज में कोई अन्य लैक्चरर नहीं था.

एक दिन सुबह उस ने अखबार में देखा कि समीर नाम का कोई आईएएस अधिकारी उस के शहर में जिला अधिकारी बन कर आया हुआ है.

समीर नाम ने ही उस के दिल में हलचल पैदा कर दी. वह सोचने लगी यह वही समीर तो नहीं जो कभी उस के दिल के बहुत करीब हुआ करता था और घंटों मनोविज्ञान के किसी टौपिक पर उस से चर्चा करता था. क्या समीर आईएएस बन गया?

यह प्रश्न उस के जेहन में कौंध रहा था और वह बहुत देर तक समीर के साथ बिताए गए उन पलों को याद कर रही थी जो 5 वर्ष बाद भी अभी तक वैसे ही तरोताजा थे जैसे यह बस कुछ पलों पहले की बात हो.

यही पता लगाने के लिए एक दिन वह उस के औफिस पहुंची तो पता लगा कि साहब अभी मीटिंग में व्यस्त हैं. दूसरे दिन समीर से मिलने के लिए उस के चैंबर में जाना चाहा तो, दरवाजे पर खड़े चपरासी ने उसे रोक दिया और उस से स्लिप मांगी. उस ने सोचा, पता नहीं वही समीर है या कोई और, इसलिए उस ने चैंबर में उस से मिलने का विचार त्याग दिया. वह सोचने लगी वैसे तो जिलाधिकारी आम आदमी के हितों के लिए जिला में पदस्थापित होता है और उस से मिलने के लिए कोई भी व्यक्ति स्वतंत्र है लेकिन अफसरशाही ने आम आदमी से जिलाधिकारी को कितना दूर कर दिया है.

वैसे जिलाधिकारी से उस के द्वारा समयसमय पर लगाए जाने वाले जनता दरबार में भी आसानी से भेंट हो सकती थी किंतु उस के बारे में जानने की तीव्र जिज्ञासा इतनी थी कि वह बहुत समय तक इस के लिए इंतजार नहीं कर सकती थी. सो, जिलाधिकारी द्वारा राजस्व से संबंधित मुकदमों की सुनवाई के लिए किए जाने वाले कोर्ट के दौरान उस ने उसे देखने का मन बनाया.

उसे किसी ने बताया था कि उस दिन जिलाधिकारी न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई करेंगे. जब वह उस के न्यायालय में पहुंची तो समीर मुकदमे की कोई फाइल देख रहा था. वह न्यायालय में खड़ी थी किंतु समीर ने उसे नहीं देखा और वह ?ाट न्यायालय के कमरे से बाहर आ गई. फिर अपने घर पहुंची. अब उस ने सोचा कि वह उस के आवास में जा कर मिलेगी. जब वह उस के आवास पहुंची तो फिर चपरासी ने स्लिप मांगी. उसे लगा, वह तो लड़की है, लोग जाने उस के बारे में क्याक्या सोचने लगें, इसलिए उस से बिना मिले ही वापस घर लौट आई.

समीर को जिला में पदस्थापित हुए 4 महीने से अधिक हो गए थे, किंतु उन दोनों की मुलाकात नहीं हुई थी. अब तक मनोविज्ञान पर प्रीति की लिखी पुस्तक ‘आने वाली पीढि़यां और मनोविज्ञान’ को छापने के लिए दिल्ली का पाठ्यपुस्तकों से संबंधित एक प्रकाशक तैयार हो गया था. पुस्तक की पांडुलिपि उस ने प्रकाशक को सौंप दी थी जो अब मुद्रण के लिए भेजी जा चुकी थी.

अगले महीने उस की प्रतियां तैयार हो कर आ जाने वाली थीं और पुस्तक का विमोचन उस के कालेज के हौल में होना तय हुआ था. प्रिंसिपल के आग्रह पर जिलाधिकारी समीर ने भी विमोचन समारोह में आना स्वीकार कर लिया था और उसी के हाथों उस की पुस्तक का विमोचन होना था.

काम की बहुत ज्यादा व्यस्तता के कारण समीर का ध्यान इस ओर नहीं गया था कि इस की लेखिका वही प्रीति है जो कभी दिल्ली में उस के साथ मनोविज्ञान में एमए कर रही थी. पिंसिपल साहब खुद इन्विटेशन ले कर गए थे और प्रीति ने उन से कभी समीर की चर्चा नहीं की थी.

प्रीति यह सोच कर काफी उत्सुक और रोमांचित थी कि उस की पुस्तक का विमोचन समीर के हाथों होगा और उसी के द्वारा वह सम्मानित की जाएगी. वह सोच रही थी कि वह क्षण कैसा होगा जब वह पहली बार इतने दिनों के बाद समीर के सामने जाएगी. आज वह दिन आ ही गया था.

रात में उसे नींद ठीक से नहीं आई थी. बारबार उसे समीर की बातें, उस के साथ घंटों मनोविज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर हुई चर्चाएं याद आ रही थीं. उस समय समीर उस से बारबार कहता था कि वह आईएएस बन कर समाज की सेवा करना चाहता है और अब उस की मनोकामना पूरी हो गईर् थी. उस ने जो सोचा था उसे वह मिल गया था.

क्या समीर की शादी हो गई है या अभी भी वह कुंआरा है, यह प्रश्न भी उस के मन में बारबार कौंध रहा था. वह सोच रही थी कि यदि समीर की शादी हो गई है तो उस की पत्नी कैसी होगी. यदि समीर ने उसे देख कर पुरानी बातों को कुरेदना शुरू किया तो उस की पत्नी की प्रतिक्रिया क्या होगी? कहीं वह उस के संबंधों को ले कर आशंकित तो न हो जाएगी.

उस के मन में पहली बार इतना उत्साह था. दिल में हलचल थी. वहीं, अंदर से समीर से मिलने का एक मधुर एहसास भी था. उस ने अपनी सब से अच्छी साड़ी निकाली और पहली बार अपना इतनी देर तक शृंगार किया. आज सच में वह काफी सुंदर लग रही थी.

पुस्तक विमोचन समारोह के लिए कालेज के हौल को काफी सजाया गया था. शहर के कई गणमान्य व्यक्तियों को भी बुलाया गया था. दूसरे कालेजों के शिक्षक और कई विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया था. सब के खानेपीने का इंतजाम पुस्तक के प्रकाशक की ओर से था.

वह कालेज रिकशा से जाती थी, किंतु आज प्रिंसिपल ने उसे लाने के लिए अपनी गाड़ी ड्राइवर के साथ भेजी थी और कालेज के एक जूनियर लैक्चरर को भी साथ लगा दिया था.

जब वह कालेज के हौल में पहुंची तो अधिकतर मेहमान आ चुके थे. लाउडस्पीकर पर कोई पुराना संगीत काफी कम आवाज में बज रहा था. पुस्तक विमोचन की सारी आवश्यक तैयारियां कर ली गई थीं. अब जिलाधिकारी के आने की प्रतीक्षा थी.

तभी जिलाधिकारी समीर के आने का माइक पर अनाउंसमैंट हुआ. समीर के स्टेज पर पहुंचते ही सभी उपस्थित मेहमान उस के सम्मान में खड़े हो गए.  प्रिंसिपल ने समीर का स्टेज पर स्वागत किया और उन्हें अपनी बगल में विशेष अतिथि के रूप में बैठाया. ठीक उस के बगल में प्रीति भी बैठी हुई थी. प्रीति ने समीर को देख कर हाथ जोड़े तो वह अप्रत्याशित रूप से उस को स्टेज पर देख कर विस्मित होते हुए बोला, ‘‘अरे तुम, प्रीति?…यहां?’’

‘‘क्या आप एकदूसरे को पहचानते हैं?’’ प्रिंसिपल ने पूछा.

‘‘हम दोनों ने एक ही साथ दिल्ली में एक ही कालेज से साइकोलौजी में एमए किया है.’’

‘‘लेकिन प्रीति ने यह कभी नहीं बताया,’’ प्रिंसिपल ने अब प्रीति की ओर मुखातिब होते हुए कहा, ‘‘क्यों प्रीति, इतना बड़ा राज तुम छिपाए हुए हो. मुझे तो कम से कम बताया होता.’’

प्रीति प्रिंसिपल को क्या बताती कि उस ने कई बार समीर से मिलने की कोशिश की थी लेकिन कुछ संकोच, कुछ झिझक और परिस्थितियों ने उसे उस से नहीं मिलने दिया और चाह कर भी वह समीर से अपने संबंधों को अपने सहकर्मियों के साथ साझा न कर पाई.

‘‘समीर तुम से मिलने की मैं ने बहुत बार कोशिश की, लेकिन मिल नहीं पाई,’’ वह सकुचाते हुए धीरे से बोली.

‘‘अब यह बहानेबाजी न चलेगी प्रीति. फंक्शन के बाद मैं तुम्हारे घर पर आऊंगा. मां कैसी हैं?’’

सुनते ही प्रीति की आंखें नम होने लगीं और वह इस का कोई जवाब नहीं दे पाई तो प्रिंसिपल ने मामले की नाजुकता को समझाते हुए, बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘‘इत्मीनान से इस संबंध में बातें होंगी. अभी हम लोग पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम शुरू करते हैं.’’

पुस्तक का विमोचन करते हुए समीर ने प्रीति की सादगी, नम्रता और उस के कोमल भावों की विस्तृत चर्चा करते हुए अपने कालेज के दिनों की यादों को सब के साथ साझा करते हुए कहा कि प्रीति कालेज में एक ऐसी लड़की थी जिस से हमारे प्रोफैसर भी बहुत प्रभावित थे. प्रीति को साइकोलौजी पर जितनी पकड़ है उतनी बहुत कम लोगों को होती है. हमें गर्व है कि इस शहर में हमारे बीच प्रीति जैसी एक विदुषी हैं.’’

समीर की बातों से पूरा हौल तालियों से गड़गड़ाने लगा तब प्रीति ने महसूस किया कि समीर, जिस के बारे में उस ने सोचा था कि वह उसे भूल गया है, बिलकुल उस की थोथी समझा थी. उस के दिल में उस के प्रति अभी भी उतना ही लगाव और प्रेम है जितना कालेज के दिनों में हुआ करता था.

फंक्शन के बाद समीर ने उस से उस का फोन नंबर लिया और उस के घर की लोकेशन नोट करते हुए कहा कि इस रविवार को वह उस के साथ ही लंच करेगा. अपना विजिटिंग कार्ड उसे थमाते हुए उस ने रविवार को इंतजार करने के लिए कहा.

फंक्शन के बाद उस के सभी सहकर्मी उस को आंखें फाड़ कर देख रहे थे. समीर ने सभी लोगों के बीच जिस प्रकार प्रीति की प्रशंसा की थी और सम्मान दिया था उस का किसी को भी अनुमान नहीं था. प्रीति ने घर आ कर पूरे घर को साफ किया, ड्राइंगरूम में सोफे को करीने से लगाया और घर के बाहर पड़े हुए गमलों को ठीक से लगाया और उन में पानी दिया.

मां के गुजर जाने के बाद प्रीति अंदर से काफी टूट गई थी. घर में कोई नहीं था और उस का जीवन अकेलेपन के दौर से गुजर रहा था, इसलिए पूरा घर ही अस्तव्यस्त पड़ा हुआ था. किंतु समीर ने जब से कहा था कि रविवार को उस के घर आ कर उस के साथ लंच करेगा उस के शरीर में एक नया ही उत्साह पैदा हो गया था, मनमयूर नाचने लगा था और जीवन के प्रति एक नया नजरिया पैदा हो गया था.

रविवार को सुबह से ही प्रीति समीर के लिए लंच की तैयारी में लगी हुई थी. इस बीच फोन पर उस ने प्रयागराज से नीलम को भी बुला लिया था. वह पुस्तक विमोचन समारोह में कुछ जरूरी कामों में व्यस्त रहने के कारण नहीं आ पाई थी. नीलम भी समीर से मिलने के लिए उत्साहित थी. एक लंबे समय के बाद तीनों एकसाथ एक टेबल पर मिलने वाले थे.

समीर ने उसे फोन पर सूचना दी थी कि वह रविवार को 2 बजे के बाद आएगा, उसे एक जरूरी मीटिंग में शामिल होना है क्योंकि जिले में सोमवार को सीएम का दौरा होने वाला था. किंतु वह उस दिन 12 बजे ही आ गया.

‘‘सीएम साहब का दौरा रद्द हो गया तो मैं जल्दी आ गया,’’ आते ही वह बोला. उस का घर एक संकरी गली में था. उस की गाड़ी सड़क पर खड़ी थी. बौडीगार्ड साथ में था.

उसे अचानक आया देख प्रीति और नीलम दोनों उठ खड़ी हुईं.

नीलम को देख कर उस ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘अरे तुम कब आईं. तुम भी आगरा में ही रहती हो क्या?’’

‘‘नहीं, तुम्हारे बारे में प्रीति ने बताया तो मिलने आ गई,’’ नीलम मुसकराते हुए बोली.

‘‘अच्छा हुआ तुम आ गईं. मैं इस शहर में पिछले 4 महीने से हूं लेकिन प्रीति को मेरी कभी याद न आई.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है समीर, तुम से मिलने का मैं ने कई बार सोचा लेकिन मिलने की हिम्मत न हुई.’’ प्रीति ने कहा.

‘‘क्यों, मैं तुम्हारे लिए गैर कब से हो गया. यह क्यों नहीं कहतीं कि तुम मुझसे मिलना ही नहीं चाहती थीं.’’ अब प्रीति उस से क्या कहती और कहती भी तो क्या उस की सफाई से समीर की उलाहना दूर हो जाती?

‘‘अच्छा, अब बता मां जी कहां हैं?’’

‘‘समीर, अब प्रीति की मां इस दुनिया में नहीं हैं,’’ नीलम ने बताया.

कुछ देर तक समीर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘सौरी प्रीति, मैं ने तुम्हारे दिल के दर्द को कुरेदा. अब घर में कौन रहता है?’’

‘‘इस के साथ अब कोई रहने वाला नहीं है समीर. यह नितांत अकेलापन का जीवन जीती है. अपनी दुनिया में खोई हुई. जिस तरह कालेज में किताबों में खोई रहती थी, अब भी किताबें ही इस की साथी हैं,’’ नीलम बोली.

समीर थोड़ी देर तक घर में इधरउधर देखते रहा. उस की मां और बाबूजी का फोटो सामने की दीवार पर टंगा हुआ था. उस ने सोचा उस का ध्यान अब तक उन फोटो पर क्यों नहीं गया जो वह प्रीति को बारबार मां की याद दिलाता रहा. उस ने हाथ जोड़ कर उस के मातापिता के फोटो के सामने जा कर उन्हें प्रणाम किया और प्रीति से बोला, ‘‘जिंदगी इसी का नाम है. यह कोई नहीं जानता कि किस की जिंदगी उस को किस तरह जीने के लिए मजबूर करेगी. तुम से बिछुड़ने के बाद मैं एक बौयज होस्टल में शिफ्ट कर गया जहां सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले लड़के रहते थे. घर में पढ़ने का माहौल नहीं था.

‘‘वहां एक दिन किसी ने मेरा स्मार्टफोन चुरा लिया. उस फोन में बहुत सारी इन्फौर्मेशन थीं, उसी में तुम्हारा फोन नंबर भी था. मैं ने तुम्हें खोजने का प्रयास किया किंतु तुम्हें ढूंढ़ नहीं पाया. फिर मेरी कोचिंग की क्लासेज चलने लगीं और परीक्षा की तैयारी में इतनी बुरी तरह उलझा कि फिर तुम्हारी ओर ध्यान ही नहीं गया और इसी बीच मेरे बाबूजी का तबादला कंपनी वालों ने दूसरे शहर में कर दिया जहां वे मां के साथ शिफ्ट कर गए.

‘‘मैं इकलौती संतान था. घर में कोई रहने वाला नहीं था, इसलिए पिताजी ने 3 कमरों के इस अपार्टमैंट में एक कमरा निजी उपयोग के लिए रख कर 2 कमरे किराए पर दे दिए. लेकिन प्रीति तुम चाहतीं तो मेरे घर जा कर मेरे किराएदार से मेरा फोन नंबर मांग सकती थीं क्योंकि कभीकभी मैं वहां जाया करता था और किराएदार को मेरा फोन नंबर मालूम था. तुम तो मेरे घर आई थीं. मेरे मातापिता तुम्हें बहुत ही लाइक करते थे. मां तो हमेशा ही तुम्हारे सरल स्वभाव की प्रशंसा करती थीं और पिताजी अकसर कहा करते थे कि किसी भी व्यक्ति का गुण प्रधान होता है न कि उस का शरीर.

‘‘मेरे मांबाबूजी इसी हफ्ते यहां घूमने आने वाले हैं. मैं तुम्हें उन से मिलवाऊंगा.’’

‘‘हां समीर, मुझे भी उन से मिलने की बहुत इच्छा है. उन से मिले हुए काफी दिन हो गए हैं. उन के आने के बाद तुम मुझे फोन करना, मैं उन से मिलने जरूर आऊंगी. लेकिन तुम अपनी पत्नी को ले कर क्यों नहीं आए?’’

समीर ने हंसते हुए कहा, ‘‘अभी तुम्हारी जैसी कोई मिली नहीं.’’

‘‘क्यों मजाक करते हो समीर. मेरे जैसी कोई मिले भी नहीं. हैंडीकैप होना एक अभिशाप से कम नहीं है.’’

‘‘ऐसा न कहो प्रीति, आज भी मनोविज्ञान के क्षेत्र में तुम्हारा मुकाबला करने वाला इस शहर में कोई नहीं है.’’

यह तो प्रीति नहीं जानती थी कि समीर के साथ उस का क्या रिश्ता है किंतु अंदर ही अंदर यह जान कर कि वह अब तक कुंआरा है उस के मन के तार झांकृत हो उठे.

इस बीच समीर के मांबाबूजी के आने का वह बेसब्री से इंतजार करती रही और फिर कुछ ही दिनों बाद समीर ने उसे फोन कर बताया कि उस के मांबाबूजी आए हुए हैं और उस से मिलना चाहते हैं. आज रात का डिनर उन के साथ करोगी तो उसे खुशी होगी.

प्रीति तो इसी अवसर का इंतजार कर रही थी, इसलिए उस ने उस के निमंत्रण को सहर्ष स्वीकार कर लिया. उसे अंदर आने से कोई न रोके, इसलिए समीर ने उस को लाने के लिए अपनी प्राइवेट कार भेज दी थी.

प्रीति को लेने समीर अपने आवास के गेट तक स्वयं आया. जब वह उस के साथ ड्राइंगरूम में पहुंची तो उस के मांबाबूजी उस का इंतजार कर रहे थे. उस ने उन के पैर छुए. उन्होंने उसे अपनी बगल में बैठा लिया.

‘‘समीर तुम्हारी हमेशा चर्चा करता है. सुना मां भी नहीं रहीं. घर में अकेली हो. बेटी मैं समझा सकती हूं तुम्हारी तकलीफ को. लड़की वह भी अकेली,’’ समीर की मां बोलीं.

‘‘बेटी, अब आगे क्या करना है?’’ समीर के बाबूजी ने पूछा.

‘‘क्या करूंगी बाबूजी. दिन में कालेज में पढ़ाती हूं, रात में अध्ययन, कुछ लेखन.’’ उस ने नम्रता से कहा.

‘‘अभी क्या लिख रही हो?’’

‘‘अभी तो कुछ नहीं. इस पुस्तक का रिस्पौंस देख लेती हूं कैसा है, फिर आगे का प्लान बनाऊंगी.’’

‘‘यह पुस्तक ‘आनेवाली पीढि़यां और मनोविज्ञान’ मैं ने पढ़ी. समीर ने दी थी. यह सच है कि मनोविज्ञान के स्थापित सिद्धांत आने वाली पीढि़यों के संदर्भ में वैसे ही न रहेंगे.’’

‘‘बाबूजी, आप भी क्या न… आते ही पुस्तक की चर्चा में लग गए. घर और बाहर रातदिन यही तो यह करती है. आज तो हम एंजौय करें. वैसे प्रीति, मैं तुम से पूछना भूल गया था, सारे आइटम वेज ही रखे हैं. मांबाबूजी वैजिटेरियन हैं.’’

‘‘मैं भी वैजिटेरियन ही हूं.’’

खाना खाने के बाद जब प्रीति जाने को हुई तो मां ने उसे रोका.

‘‘बेटी, तुम्हारी शादी की कहीं बात चल रही है क्या?’’

प्रीति कुछ न बोल पाई. जवाब देती भी क्या. उस की शादी के लिए कौन बात करने वाला था.

‘‘समझ गई बेटी. अब तो तुम्हारे घर में तुम्हारे सिवा कोई है नहीं जिस से तुम्हारी शादी के बारे में बात की जाए. समीर तुम्हारी बहुत प्रशंसा करता है. आईएएस में उस के सिलैक्शन के बाद कई अमीर घराने के लोग अपनी बेटियों की शादी के लिए आए. वे सभी अपनी दौलत के बल पर समीर को खरीदना चाहते थे.

‘‘समीर का इस संबंध में स्पष्ट मत था कि शादी मन का मिलन होता है, सिर्फ शरीर का नहीं और जो लड़की अपने बाप की हैसियत के बल पर इस घर में आएगी वह कभी भी अपना दिल उसे न दे पाएगी. बेटी, अगर तुम्हें कोई आपत्ति न हो और समीर से तुम्हारा मन मिलता हो तो इस घर में तुम्हारी जैसी बहू पा कर हम प्रसन्न होंगे. समीर के पिताजी की भी यही इच्छा है. समीर भी यही चाहता है. अब सबकुछ तुम पर निर्भर करता है. तुम इत्मीनान से फैसला ले कर बताना. कोई जल्दी नहीं है, हम तुम्हारे जवाब का इंतजार करेंगे.’’

‘‘लेकिन मांजी, कहां समीर की पोस्ट और कहां मैं एक साधारण कालेज की लेक्चरार.’’

‘‘अब लज्जित न करो प्रीति,’’ समीर बोला, ‘‘मेरे और तुम्हारे संबंधों के बीच हमारी पोस्ट और हैसियत बीच में कहां से आ गई, इसी से बचने के लिए तो मैं ने

अब तक किसी शादी का प्र्रस्ताव स्वीकार नहीं किया.’’

प्रीति ने लज्जा से सिर झांका लिया.

उस ने समीर के मांबाबूजी के पैर छूते हुए कहा, ‘‘आप लोगों का आदेश मेरे लिए आज्ञा से कम नहीं.’’

फिर उस की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे.

समीर उसे छोड़ने उस के घर तक गया. जब वह लौटने लगा तो उस ने प्रीति को अपने गले से लगा लिया. और बोला, ‘‘प्रीति पतिपत्नी का रिश्ता बराबर का होता है, आज भी मैं वही समीर हूं जो कालेज के दिनों में हुआ करता था और आगे भी ऐसे ही रहूंगा.’’

समीर के गले लगी प्रीति को ऐसा लग रहा था मानो सारे जहां की खुशियां उसे मिल गई हैं. रात का सियाह अंधेरा अब समाप्त हो चुका था. सुबह की नई किरणें फूटने लगी थीं.

Story in Hindi : बेटी हो तो सौम्‍या जैसी

Story In Hindi : प्रोफैसर हंसराज चिंतित रहा करते कि ना जाने उन्हें कैसे पड़ोसी मिलेंगे. दरअसल, नईनई विकसित हुई इस अमलतास कालोनी में वह 2 महीने पहले ही रहने आए हैं. कालोनी के सभी मकान देखतेदेखते भर गए, सिवाय उन के पड़ोस वाले मकान के.

हंसराजजी और उन की पत्नी सुधा ऊपर वाले से प्रार्थना करते कि कोई बालबच्चों वाला संभ्रांत परिवार पड़ोसी के रूप में आ जाए, तो उन्हें बड़ा सहारा हो जाएगा. वैसे तो उन के 2-2 बेटे हैं, लेकिन दोनों विदेश में जा कर बस गए. बड़ा यूएस में और छोटा यूके में.

एक दिन बिल्डर ने जब उन्हें सूचना दी कि जल्दी ही इस मकान में रहने के लिए बुलानीजी आ रहे हैं, तो वे निश्चिंत हो गए. पर सुधा के यह कहते ही कि बुलानी तो सिंधी होते हैं, उन में तो मीटमटन, दारू वगैरह सब चलता है तो वे थोड़ा परेशान हो गए. फिर स्वयं ही विवेक का परिचय देते हुए सुधा को समझाने का प्रयास करने लगे, “किसी के बारे में बिना जाने, बिना उस से मिले, पहले से गलत धारणा बना लेना ठीक नहीं. और खानेपीने के मामले में जब अपने स्वयं के बच्चे ही नौनवेजिटेरियन हो गए हैं, तो किसी और के नौनवेज खाने से आपत्ति क्यों?”

 

अगले दिन दोपहर के समय जब वे आरामकुरसी पर अधलेटे अखबार पढ़ रहे थे, तभी उन के मकान के ठीक सामने एक कार आ कर रुकी. कार से पहले एक सज्जन बाहर निकले और फिर पीछे से एक महिला और एक 10-12 साल की बच्ची. हंसराजजी ने हाथ के अखबार को टेबल पर रखा और उठ कर बाहर के गेट तक आए.

उतरने वाले सज्जन ने दोनों हाथ जोड़ते हुए नमस्कार किया, “मैं अशोक बुलानी हूं और यह मेरी पत्नी शशि और बेटी सौम्या. हम लोग आप के बाजू वाले मकान में शिफ्ट हो रहे हैं. अभी गर्ल्स हायर सेकेंडरी के पास ‘टीचर्स कालोनी’ में रह रहे थे. मैं सिविल इंजीनियर हूं और शशि शासकीय कमला नेहरू गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल में व्याख्याता. सौम्या डीपीएस स्कूल में छठी कक्षा की विद्यार्थी है.”

बुलानी और उन के छोटे से परिवार को देख कर हंसराजजी गदगद हो गए. एक सुसंस्कृत सभ्य परिवार उन का पड़ोसी बन रहा है. उन्होंने गेट खोलते हुए आमंत्रित किया, “अंदर आइए. मैं अपनी पत्नी सुधा से मिलवाता हूं.”

ड्राइंगरूम में सब के बैठते ही सुधा पानी की ट्रे ले आईं. यह मेरी धर्मपत्नी सुधा है. हम दोनों 4 माह पहले ही शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से प्रोफैसर पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. अभी 2 महीने पहले ही इस कालोनी में शिफ्ट किया है. इस से पहले कालेज के पास ही ‘औफिसर कालोनी’ में रहते थे.

 

सुधा ने बीच में टोकते हुए शशि से पूछा, “आप लोग क्या लेना पसंद करेंगे? चाय या कौफी?” शशि कुछ जवाब दे पाती, उस के पहले ही बुलानी बोल पड़े, “मैडम, चाय ले लेंगे.”चाय की चुसकियों के बीच गपशप से यह पता चला कि बुलानी सिविल कांट्रैक्टर हैं, और उन का प्रोजैक्ट अभी शहर के बाहरी छोर पर बन रही ‘विशाल कालोनी’ में चल रहा है.

शशि ने पहली मुलाकात में ही सुधा को आंटी बना लिया. उसे सब से ज्यादा खुशी इस बात की थी कि अंकलआंटी उसी की तरह शिक्षाजगत से हैं. उस ने अपनी उत्कंठा व्यक्त करते हुए पूछ ही लिया, “आंटी, आप कालेज में क्या पढ़ाती थीं?”

“शशि, हम दोनों बौटनी वाले हैं. एमएससी कक्षाओं को मैं ‘एलगी’ पढ़ाती थी और सर ‘फंगाई’. स्टूडेंट लाइफ में हम दोनों एक ही यूनिवर्सिटी में सहपाठी थे. एमएससी और पीएचडी भी साथ ही की, तभी एकदूसरे से प्रेम हुआ और फिर विवाह हो गया. उस जमाने में प्रेम विवाह आसान नहीं होता था. मैं ब्राह्मण थी और सर कायस्थ.”

फिर अचानक जैसे उन्हें कुछ संकोच सा हुआ, तो बोल पड़ीं, ” अरे, ये क्या मैं ने अपना टौपिक शुरू कर दिया. तुम अपना बताओ शशि, स्कूल में क्या पढ़ाती हो?””आंटी, मै बायोलौजी लेक्चरर हूं. मैं ने जूलौजी से पीजी किया है. मैं भी पीएचडी करना चाहती थी, पर उस से पहले गवर्नमेंट जौब मिल गई. मेरी तमन्ना तो अभी भी कालेज में पढ़ाने की है, पर पिछले 6 सालों में जूलौजी में लेक्चरर की वैकेंसी ही नहीं निकली.”

“शशि, यदि तुम कालेज में लेक्चरर बनना चाहती हो, तो मेरी सलाह है कि पीएचडी कर डालो. तुम्हें गाइड के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा. जूलौजी में प्रोफैसर हम लोगों के कलीग डा. सिलावट हैं. हां,  तुम्हें पीएचडी क्वालीफाइंग एक्जाम क्लियर करना पड़ेगा, और फिर 90 दिन का थीसिस राइटिंग कोर्स भी.”

 

बुलानी जो अब तक बड़े धैर्य से वार्तालाप सुन रहे थे, बेचैन हो उठे. थोड़े तल्खी से वह बोले, “अरे शशि, जिस काम के लिए आए हैं, उस के बारे में तो बात कर लो.”हंसराजजी ने माहौल हलका करते हुए कहा, “शिक्षाजगत के लोगों की यही समस्या है, मिलते ही वे हर समय एजुकेशन पर बात शुरू कर देते हैं.”

“आंटी, हमारा सामान आज रात यहां अनलोड हो जाएगा और हम लोग कल सुबह शिफ्ट करेंगे. आप के यहां घरेलू काम करने वाली बाइयां क्या मेरे यहां भी काम कर देंगी? टीचर्स कालोनी में तो 2 बाइयों से काम चल जाता था. एक झाड़ूबरतन और साफसफाई करती थी और दूसरी खाना बनाती थी.””शशि, मेरे यहां तो एक ही काम वाली बाई सुबह आती है, झाड़ूबरतन के लिए. खाना तो अब मैं खुद ही बनाती हूं.

“रिटायरमेंट के बाद अब दिनभर कोई काम तो रहता नहीं, तो इसी में समय गुजारती हूं. मैं तुम्हें अपनी महरी लक्ष्मी का मोबाइल नंबर देती हूं, उस से बात कर लो और खाना बनाने वाली बाइयां भी कालोनी के कई घरों में आती हैं,  तुम यहां रहना शुरू करोगी तो सब व्यवस्थाएं अपनेआप हो जाएंगी.”

“सर, दूध वाले का नंबर भी चाहिए और न्यूजपेपर और केबल टीवी वाले का भी,बुलानी ने हंसराजजी की ओर देखते हुए रिक्वेस्ट की.”कालोनी के गेट पर सुपरवाइजर और गार्ड के रूम हैं. आप गणेश सुपरवाइजर को बोल देना. आप की सभी व्यवस्थाएं वह करा देगा. उस के पास  सभी के नंबर हैं- केबल टीवी,  इलेक्ट्रीशियन, न्यूज पेपर, दूध वाले, प्लंबर और कारपेंटर सभी के.”

( 6 साल बाद)पिछले 6 सालों में दोनों पड़ोसी पड़ोसी कम, एक परिवार के अंग ज्यादा हो चुके थे. बुलानी तो अपने प्रोजैक्ट के सिलसिले में सुबह निकल जाते और देर रात लौटते. पर, शशि और सौम्या का ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब वे आंटी के यहां दिन में 1-2 बार फेरे न लगा लें. आंटी धीरेधीरे  शशि को बेटी की तरह मानने लगी थीं. शशि ने भी अपने बारे में उन्हें सारी बातें बता डाली थीं. आंटी को यह भी बता दिया था  कि उस का भी यह  ‘प्रेम विवाह’ है और वह ब्राह्मण है और बुलानी सिंधी.

सौम्या पूरी तरह अपनी मां पर गई थी. उस का ध्यान सिर्फ पढ़ाई पर रहता. वह देर रात तक पढ़ती रहती. हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा में वह अपने जिले की टौपर थी और उस की प्रशंसा में जिले के सभी अखबारों ने सौम्या के साथसाथ उस के मांपापा के भी फोटो सहित इंटरव्यू छापे थे. अब इस वर्ष भी उस का टारगेट कक्षा 12वीं में मेरिट में आने का था.

सौम्या की आदत थी, जोरजोर से बोलबोल कर पढ़ने की. रात में उस की आवाज अंकलआंटी के बेडरूम में साफ सुनाई देती और उन की नींद में खलल डालती. नींद डिस्टर्ब होने पर भी कभी उन्होंने सौम्या को टोका नहीं. पढ़ाई का महत्व उन से ज्यादा कौन समझता. उन्होंने भी अपने दोनों बेटों की शिक्षादीक्षा में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी और आज उसी शिक्षा की बदौलत दोनों बेटे यूएस और यूके में बड़ीबड़ी कंपनियों में उच्च पदों पर थे.

हंसराजजी और सुधा बारीबारी से हर साल 3 माह के लिए एक बार यूके जाते और अगली बार यूएस. उन दिनों उन के घर की पूरी देखभाल और सुरक्षा शशि और सौम्या करतीं.पहली बार ऐसा हुआ कि इस साल कोरोना के कारण इंटरनेशनल फ्लाइट बंद कर दी गईं और बेटों के पास उन का जाना नहीं हो पाया. हालात यहां तक आ गए कि देशभर में लौकडाउन के कारण लोगों का घर से निकलना भी बंद हो गया. बुलानी के प्रोजैक्ट का काम भी ठप हो गया और प्रोजैक्ट के बंद होने से सभी कर्मचारी और मजदूर काम छोड़ कर अपनेअपने घर चले गए. सुबह से रात तक  बाहर रहने वाले बुलानी अब घर में कैद हो कर रह गए. लंबे समय के लौकडाउन ने उन्हें डिप्रेशन में ला दिया.शशि की व्यस्तता दोगुनी बढ़ गई. कामवाली बाइयों के न आने से घर के सारे काम भी करने पड़ते और औनलाइन क्लास भी लेनी पड़ती.

सौम्या भी औनलाइन क्लासेज अटेंड करती और अपनी स्टडी में व्यस्त रहती. मांबेटी दोनों का आंटी के यहां आनाजाना भी बंद हो गया. उन्हें अंकलआंटी की वृद्धावस्था के कारण पूरी सावधानी जो बरतनी थी.6 वर्षों में आज पहली बार शशि और बुलानी के आपसी झगड़े की आवाजें छनछन कर हंसराज और सुधा के कानों में पड़ रही थीं. दोनों अचंभित थे कि यह क्या हो गया?

झगड़े का यह सिलसिला धीरधीरे प्रतिदिन की रूटीन  में तबदील हो गया. बुलानी अब रोज नशा भी करने लगा और नशे की हालत में वह शशि को गालियां भी देता. जिस तरह के शब्द उस के मुंह से निकलते, उसे सुन कर कोई भी निष्कर्ष निकाल सकता कि ये शब्द सभ्य पुरुष की निशानी नहीं हो सकते हैं.

सुधा को इन घटनाओं के कारण पूरी रात नींद नहीं आती. वे शशि को बेटी की तरह प्यार करने लगी थीं. आज रात तो बुलानी ने गालियों के साथ शशि पर हाथ भी उठा दिया था.सुधा का दिल व्याकुल हुआ जा रहा था. उन्हें इंतजार था कि कब सुबह हो और वे शशि से मिल कर झगड़े की जड़ का पता लगाएं. अन्याय के प्रति उदासीन रवैया अपनाना बुजदिली कहलाएगी. उन्होंने अपने महाविद्यालय की अनेक छात्राओं में आत्मविश्वास जागृत किया था, जो किन्हीं कारणों से प्रताड़ित थीं.

अपने मन की बात जब सुबह उन्होंने हंसराजजी को बताई तो उन्होंने बुलानी के घर में रहते शशि के यहां जाने से मना किया और कुछ समय धैर्य रखने की सलाह दे डाली.आज रात तो पानी सारी हदें पार कर गया. शशि ने बुलानी के मोबाइल की उस समय पड़ताल कर डाली थी, जब वह बाथरूम में था. उस का शक सही साबित हुआ था. बुलानी चोरीछिपे जिस महिला से बातें करता था, उस की चैट शशि ने पढ़ डाली थी. अश्लील चैट को देख उस का खून खौल उठा था. वह चिल्लाचिल्ला कर बुलानी से सफाई मांग रही थी. बुलानी सीधे स्पष्टीकरण देने के बजाय गुस्से में शशि से बारबार यही पूछ रहा था कि उस की हिम्मत कैसे हुई उस के मोबाइल को छूने की? धीरेधीरे बहस हाथापाई में तबदील हो गई थी.

मां की चीख सुन कर सौम्या दौड़ती हुई नीचे आई थी और बीचबचाव कर मां को अपने कमरे में ले आई थी.शशि बुरी तरह आहत थी. उसे पति की ऐयाशी किसी कीमत पर गवारा नहीं थी. उस की दूसरी चिंता यह थी कि घर में जवान बेटी है. ऐसी बेटी जिस के कारण पूरे शहर में उन दोनों का भी नाम और प्रतिष्ठा बनी हुई है. लोगों को जब पता चलेगा और वे सौम्या को ताने दे कर कुछ कहेंगे, तो उस के दिल पर कैसा प्रभाव पड़ेगा.

सौम्या अपने विद्यालय में जूडोकराटे की चैंपियन भी थी. उस ने मां को आश्वस्त किया, “यदि पापा ने अब आप के साथ दुर्व्यवहार किया तो वह भूल जाएगी कि वे उस के पापा हैं. मां का और वह भी निर्दोष मां का अपमान वह अब सहन नहीं करेगी. जो व्यक्ति महिलाओं की इज्जत नहीं करता, उसे दंड देना मुझे सिखाया गया है.”पूरी रात मांबेटी भविष्य की योजना बनाती रहीं. सौम्या ने मां को समझाया कि उसे साहसी बनना होगा. अपराध करने वाले को सही राह पर लाने की युक्ति स्वयं खोजनी होगी. आप दिनरात मेहनत करें और आप की कमाई पर कोई दूसरा गुलछर्रे उड़ाए, इसे बदलना होगा.

अगले दिन शशि एकदम बदले हुए रूप में थी. सौम्या मां से सट कर खड़ी हुई थी. शशि ने बुलानी से पूरे धैर्य और गंभीरता से अपनी बात कहनी शुरू की, “आप मेरी 3 शर्तें पूरी करें और उस के बाद हमारा आप से कोई रिश्ता नहीं. आप पूरी तरह स्वतंत्र होंगे, कहीं भी जाने के लिए, कुछ भी करने के लिए. एक तो इस मकान के खरीदने में पूरा पैसा मेरा लगा है, इसलिए संयुक्त मालिकाना हक से आप अपना नाम तुरंत हटवा लें. दूसरा, मेरे सभी बैंक खाते आप के साथ संयुक्त नाम से हैं, उन में से आप अपना नाम पृथक करा लें और तीसरा, मेरी सभी ‘एफडी’ और ‘बीमा पौलिसी’ में से भी आप अपना नाम हटवाएं. अब सभी में नौमिनी आप के स्थान पर सौम्या होगी.

बुलानी यह सुन कर अवाक रह गया. उस ने तो इस सब की कल्पना भी नहीं की थी. वह अपने कंस्ट्रक्शन प्रोजैक्ट में पहले से ही कर्ज में डूबा हुआ था. पूरी रात वह विचार करता रहा. वह तो अभी पूरी तरह शशि की कमाई पर ही निर्भर है. शर्तें मानने पर तो उसे भूखों मरने की नौबत आ जाएगी.

अगले दिन से घर में पूरी तरह शांति थी. लौकडाउन में छूट मिलते ही वह कंस्ट्रक्शन साइट पर जाने लगा. अब वह सिर्फ शनिवार की रात में आता और बेटी सौम्या को समझाने की कोशिश करता कि वह अपनी मां को सुलह करने के लिए समझाए.

सौभ्या साफसाफ कहती, “पापा, आप ने मां को बहुत कष्ट दिया है, उन्हें जिस दिन यह विश्वास हो जाएगा कि आप ने वे सभी बुराइयां त्याग दी हैं, जिन से मां आहत हुई थीं, उसी दिन से सबकुछ पहले की तरह सामान्य हो जाएगा.

“एक बात और भी मैं कहना चाहती हूं, यदि सचमुच मैं  आप की बेटी हूं और आप चाहते हैं कि मैं सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा में मेरिट में आ कर आप लोगों का नाम रोशन करूं, तो आप वह सब बातें छोड़ दीजिए, जो मां को आहत करती हैं.”

बेटी की बातों ने पिता को अंदर तक झकझोर दिया और इस तरह एक दक्ष कन्या ने अपनी बुद्धिमानी और दूरदर्शिता से टूटते परिवार को बिखरने से बचा लिया.

Hindi Story Collection : मौत की दोषी मैं

Hindi Story Collection : शची अपने पति पल्लव के अधीनस्थ कर्मचारियों से रिश्वत ले कर उन का प्रमोशन, ट्रांसफर आदि कार्य करने के लिए पल्लव को बाध्य करती थी, लेकिन एक दिन वक्त ने उस के साथ ऐसा क्रूर मजाक किया कि उस के पास अपनी गलती पर सिर्फ पछताने के और कुछ न बचा.

‘‘मिश्राजी, अब तो आप खुश हैं न, आप का काम हो गया…आप का यह काम करवाने के लिए मुझे काफी पापड़ बेलने पड़े,’’ शची ने मिठाई का डब्बा पकड़ते हुए आदतन कहा.

‘‘भाभीजी, बस, आप की कृपा है वरना इस छोटी सी जगह में बच्चों से दूर रहने के कारण मेरा तो दम ही घुट जाता,’’मिश्राजी ने खीसें निपोरते हुए कहा.

शची की निगाह मिठाई से ज्यादा लिफाफे पर टिकी थी और उन के जाते ही वह लिफाफा खोल कर रुपए गिनने लगी. 20 हजार के नए नोट देख कर चेहरे की चमक दोगुनी हो गई थी.

शची के पति पल्लव ऐसी जगह पर कार्यरत थे कि विभाग का कोई भी पेपर चाहे वह ट्रांसफर का हो या प्रमोशन का या फिर विभागीय खरीदारी से संबंधित, बिना उन के दस्तखत के आगे नहीं बढ़ पाता था. बस, इसी का फायदा शची उठाती थी. शुरू में पल्लव शची की ऐसी हरकतों पर गुस्सा हो जाया करते थे, बारबार मना करते थे, आदर्शों की दुहाई देते थे पर लोग थे कि उन के सामने दाल न गलती देख, घर पहुंच जाया करते थे और शची उन का काम करवाने के लिए उन पर दबाव बनाती, यदि उन्हें ठीक लगता तो वे कर देते थे.

बस, लोग मिठाई का डब्बा ले कर उन के घर पहुंचने लगे…शची के कहने पर फिर गिफ्ट या लिफाफा भी लोग पकड़ाने लगे. इस ऊपरी कमाई से पत्नी और बच्चों के चेहरे पर छाई खुशी को देख कर पल्लव भी आंखें बंद करने लगे. उन के मौन ने शची के साहस को और भी बढ़ा दिया. पहले अपना काम कराने के लिए लोग जितना देते शची चुपचाप रख लेती थी किंतु जब इस सिलसिले ने रफ्तार पकड़ी तो वह डिमांड भी करने लगी.

पत्नी खुश, बच्चे खुश तो सारा जहां खुश. पहले जहां घर में पैसों की तंगी के कारण किचकिच होती रहती थी वहीं अब घर में सब तरह की चीजें थीं. यहां तक कि बच्चों के लिए अलगअलग टीवी एवं मोटर बाइक भी थीं. शची जब अपनी कीमती साड़ी और गहनों का प्रदर्शन क्लब या किटी पार्टी में करती तो महिलाओं में फुसफुसाहट होती थी पर किसी का सीधे कुछ भी कहने का साहस नहीं होता था.

कभी कोई कुछ बोलता भी तो शची तुरंत कहती, ‘‘अरे, इस सब के लिए दिमाग लड़ाना पड़ता है, मेहनत करनी पड़ती है, ऐसे ही कोई नहीं कमा लेता.’’ कहते हैं लत किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती और जब यही लत अति में बदल जाती है तो दिमाग फिरने लगता है. यही शची के साथ हुआ. पहले तो जो जितना दे जाता वह थोड़ी नानुकुर के बाद रख लेती लेकिन अब काम के महत्त्व को समझते हुए नजराने की रकम भी बढ़ाने लगी थी.

शची की समझ में यह भी आ गया है कि आज सभी को जल्दी है तथा सभी एकदूसरे को पछाड़ कर आगे भी बढ़ना चाहते हैं. और इसी का फायदा शची उठाती थी. कंपनी को अपने स्टाफ के लिए कुछ नियुक्तियां करनी थीं. पल्लव उस कमेटी के प्रमुख थे. जैसा कि हमेशा से होता आया था कि मैरिट चाहे जो हो, जो चढ़ावा दे देता था उसे नियुक्तिपत्र मिल जाता था तथा अन्य को कोई न कोई कमी बता कर लटकाए रखा जाता था.

एक जागरूक प्रत्याशी ने इस धांधली की सूचना सीबीआई को दे दी और उन्होंने उस प्रत्याशी के साथ मिल कर अपनी योजना को अंजाम दे दिया. वह प्रत्याशी मिठाई का डब्बा ले कर पल्लव के घर गया. उस दिन शची कहीं बाहर गई हुई थी अत: दरवाजा पल्लव ने ही खोला.

उस ने उन्हें अभिवादन कर मिठाई का डब्बा पकड़ाया और कहा, ‘‘सर, सेवा का मौका दें.’’

‘‘क्या काम है?’’ पल्लव ने प्रश्नवाचक नजर से उसे देखते हुए पूछा. ‘‘सर, मैं ने इंटरव्यू दिया था.’’ ‘‘तो क्या तुम्हारा चयन हो गया है?’’

‘‘जी हां, सर, पर नियुक्तिपत्र अभी तक नहीं मिला है.’’

‘‘कल आफिस में आ कर मिल लेना. तुम्हारा काम हो जाएगा.’’

‘‘धन्यवाद, सर, लिफाफा खोल कर तो देखिए, इतने बहुत हैं या कुछ और का इंतजाम करूं.’’

‘‘अरे, इस की क्या जरूरत थी… जितना भी है ठीक है,’’

पल्लव ने थोड़ा झिझक कर कहा क्योंकि उन के लिए यह पहला मौका था…यह काम तो शची ही करती थी. ‘‘सर, यह तो मेरी ओर से आप के लिए एक तुच्छ भेंट है. प्लीज, एक बार देख तो लीजिए,’’ उस प्रत्याशी ने नम्रता से सिर झुकाते हुए कहा.

पल्लव ने रुपए निकाले और गिनने शुरू कर दिए. तभी भ्रष्टाचार निरोधक दस्ते के लोग बाहर आ गए और पल्लव को धरदबोचा तथा पुलिस कस्टडी में भेज दिया. शची जब घर लौटी तो यह सब सुन कर उस ने अपना माथा पीट लिया. उसे पल्लव पर गुस्सा आ रहा था कि उन्होंने उसी के सामने रुपए गिनने क्यों शुरू किए…लेते समय सावधानी क्यों नहीं बरती. थोड़ा सावधान रहते तो मुंह पर कालिख तो नहीं पुतती.

लोग तो करोड़ों रुपए का वारान्यारा करते हैं पर फिर भी नहीं पकड़े जाते और यहां कुछ हजार रुपयों के लिए नौकरी और इज्जत दोनों जाती रहीं. इच्छाएं इस तरह उस का मानमर्दन करेंगी यह उस ने सोचा भी नहीं था. जानपहचान के लोग अब बेगाने हो गए थे. वास्तव में वह स्वयं सब से कतराने लगी थी. सब उस की अपनी वजह से हुआ था. पल्लव तो सीधेसीधे काम से काम रखने वाले थे पर उस की आकांक्षाओं के असीमित आकाश की वजह से पल्लव को यह दिन देखना पड़ा है.

शची ने यह सोच कर कि पैसे से सबकुछ संभव है, शहर का नामी वकील किया पर उस ने शची से पहले ही कह दिया, ‘‘मैडम, मैं आप को भुलावे में नहीं रखना चाहता. आप के पति रंगेहाथों पकड़े गए हैं अत: केस कमजोर है पर हां, मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा.’’ पल्लव अलग से परेशान थे क्योंकि उन की तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. आश्चर्य तो शची को तब होता था जब उसे अपने पति से मिलने के लिए ही नजराना चुकाना पड़ता था. ‘‘तो क्या सारा तंत्र ही भ्रष्ट है. अगर यह सच है तो यह सब दिखावा किस लिए?’’

अपने वकील को यह बात बताई तो वह बोला, ‘‘मैडम, आज के दौर में बहुत कम लोग ईमानदार रह गए हैं. जो ईमानदार हैं उन्हें भी हमारी व्यवस्था चैन से नहीं रहने देती. आप जिन लोगों की बात कर रही हैं वे भी कहीं नौकरी कर रहे हैं, उन्हें भी अपनी नौकरी बचाने के लिए कुछ मामले चाहिए… अब उस में कौन सा मुरगा फंसता है यह व्यक्ति की असावधानी पर निर्भर है.’’

उधर पल्लव सोच रहे थे कि नौकरी गई तो गई, पूरे जीवन पर एक कलंक अलग से लग गया. जिन बीवीबच्चों के लिए मैं ने यह रास्ता चुना वही उसे अब दोष देने लगे हैं. शची तो चेहरे पर झुंझलाहट लिए मिलने आ भी रही थी पर बच्चे तो उन से मिलने तक नहीं आए थे. क्या सारा दोष उन्हीं का है? कितने अच्छे दिन थे जब शची के साथ विवाह कर के वह इस शहर में आए थे. आफिस जाते समय शची उन से शाम को जल्दी आने का वादा ले लिया करती थी. दोनों की शामें कहीं बाहर घूमने या सिनेमा देखने में गुजरती थीं. अकसर वे बाहर खा कर घर लौटा करते थे. हां, उन के जीवन में परेशानी तब शुरू हुई जब विनीत पैदा हुआ.

अभी विनीत 2 साल का ही था कि विनी आ गई और वे 2 से 4 हो गए लेकिन उन की कमाई में कोई खास फर्क नहीं आया. हमेशा हंसने वाली शची अब बातबात पर झुंझलाने लगी थी. पहले जहां वह सजधज कर गरमागरम नाश्ते के साथ उन का स्वागत किया करती थी अब बच्चों की वजह से उसे कपड़े बदलने का भी होश नहीं रहता था. पल्लव समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें? बच्चों को अच्छे स्कूल में दाखिल करवाने के लिए डोनेशन चाहिए था. उस स्कूल की मोटी फीस के साथ दूसरे ढेरों खर्चे भी थे…कैसे सबकुछ होगा? कहां से पैसा आएगा…यह सोचसोच कर शची परेशान हो उठती थी.

उन्हीं दिनों उन के एक मातहत का ट्रांसफर दूसरी जगह हो गया. उस ने पल्लव से निवेदन किया तो उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उस का ट्रांसफर रुकवा दिया था. इस खुशी में वह मिठाई के साथ 2 हजार रुपए भी घर दे गया. अब शची उन से इस तरह के काम करवाने का आग्रह करने लगी थी. शुरू में तो वह झिझके भी पर धीरेधीरे झिझक दूर होती गई और वह भी अभ्यस्त हो गए थे. ऊपर की कमाई के पैसों से शची के चेहरे पर आई चमक उन्हें सुकून पहुंचा जाती थी…साथ ही बच्चों की जरूरतें भी पूरी होने लगी थीं.

खूब धूमधाम से उन्होंने पिछले साल ही विनी का विवाह किया था…विनीत भी इसी वर्ष इंजीनियरिंग कर जाब में लगा है. अच्छीभली जिंदगी चल रही थी कि एकाएक वर्षों की मेहनत पर ग्रहण लग गया. तब पल्लव को भी लगने लगा था कि भ्रष्टाचार तो हर जगह है… अगर वह भी थोड़ाबहुत कमा लेते हैं तो उस में क्या बुराई है. फिर वह किसी से मांगते तो नहीं हैं, अगर कुछ लोग अपना काम होने पर कुछ दे जाते हैं तो यह तो भ्रष्ट आचरण नहीं हुआ. लगता है, उन के साथ किसी ने धोखा किया है या उन्हें जानबूझ कर फंसाया गया है.

कहते तो यही हैं कि लेने वाले से देने वाला अधिक दोषी है पर देने वाला अकसर बच निकलता है जबकि अपना काम निकलवाने के लिए बारबार लालच दे कर वह व्यक्ति को अंधे कुएं में उतरने के लिए प्रेरित करता है और प्यास बुझाने को आतुर उतरने वाला यह भूल जाता है कि कुएं में स्वच्छ जल ही नहीं गंदगी के साथसाथ कभीकभी जहरीली गैसें भी रहती हैं और अगर एक बार आदमी उस में फंस जाए तो उस से बच पाना बेहद मुश्किल होता है. बच भी गया तो अपाहिजों की तरह जिंदगी बितानी पड़ जाती है.

अब पल्लव को महसूस हो रहा था कि बुराई तो बुराई है. किसी के दिल को दुखा कर कोई सुखी नहीं रह सकता. उन्होंने अपना सुख तो देखा पर जिसे अपने सुखों में कटौती करनी पड़ी, उन पर क्या बीतती होगी…इस पर तो उन का ध्यान ही नहीं गया था. मानसिक द्वंद्व के कारण पल्लव को हार्टअटैक पड़ गया था. सीबीआई ने अपने अस्पताल में ही उन्हें भरती कराया किंतु हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती ही जा रही थी. शची, जो इस घटना के लिए, सारी परेशानी के लिए उन्हें ही दोषी मानती रही थी…उन की बिगड़ती हालत देख कर परेशान हो उठी.

पहले जब शची ने पल्लव की बिगड़ती हालत पर सीबीआई का ध्यान आकर्षित किया था तो उन में से एक ने हंसते हुए कहा था, ‘डोंट वरी मैडम, सब ठीक हो जाएगा. यहां आने पर सब की तबीयत खराब हो जाती है.’ उस समय उस की शिकायत पर किसी ने ध्यान नहीं दिया लेकिन दूसरे दिन जब वह मिलने गई तो पल्लव को सीने में दर्द से तड़पते पाया. शची से रहा नहीं गया और वह सीबीआई के सीनियर आफिसर के केबिन में दनदनाती हुई घुस गई तथा गुस्से में बोली, ‘आप की कस्टडी में अगर पल्लव की मौत हो गई तो लापरवाही के लिए मैं आप को छोड़ूंगी नहीं. आखिर कैसे हैं आप के डाक्टर जो वास्तविकता और नाटक में भेद नहीं कर पा रहे हैं.’ शची की बातें सुन कर वह सीनियर अधिकारी पल्लव के पास गया और उन की हालत देख कर उन्हें नर्सिंग होम में शिफ्ट कर दिया पर तब तक देर हो चुकी थी.

डाक्टर ने पल्लव को भरती तो कर दिया पर अभी वह खतरे से खाली नहीं थे. रोतेरोते शची की आंखें सूज गई थीं. कोई भी तो उस का अपना नहीं था. ऐसे समय बच्चों ने भी शर्मिंदगी जताते हुए आंखें फेर ली थीं. इस दुख की घड़ी में बस, उस की छोटी बहन विभा जबतब उस से मिलने आ जाया करती थी जो बहन को समझाबुझा कर कुछ खिला जाया करती थी. शची टूट एवं थक चुकी थी. जाती भी तो जाती कहां?

घर अब वीरान खंडहर बन चुका था. अत: वह वहीं अस्पताल में स्टूल पर बैठे पति को एकटक निहारती रहती थी. पल्लव को सांस लेने में शिकायत होने पर आक्सीजन की नली लगाई गई थी. सदमा इनसान को इस हद तक तोड़ सकता है, आज उसे महसूस हो रहा था. पति की हालत देख कर शची परेशान हो जाती पर कर भी क्या सकती थी. पल्लव की यह हालत भी तो उसी के कारण हुई है. मन में हलचल मची हुई थी.

तर्कवितर्क चल रहे थे. कभी पति को इतना असहाय उस ने महसूस नहीं किया था. दोनों बच्चे अपनीअपनी दुनिया में मस्त थे. पल्लव की गिरफ्तारी की खबर सुन कर उन दोनों ने अफसोस करना तो दूर, शर्मिंदगी जताते हुए किनारा कर लिया था पर बीमार पल्लव को देख कर रहा नहीं गया तो एक बार फिर उन की बीमारी के बारे में उस ने बच्चों को बताया.

विनी ने रटारटाया वाक्य दोहरा दिया था, ‘ममा, मैं नहीं आ सकती, डैड की वजह से मैं घर के सदस्यों से नजर नहीं मिला पा रही हूं…आखिर डैड को ऐसा करने की आवश्यकता ही क्या थी?’ आना तो दूर कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया विनीत की भी थी. शची समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे. बच्चों के मन में पिता के प्रति बनी छवि ध्वस्त हो गई थी…पर क्या वह नहीं जानते थे कि पिता के इतने कम वेतन में तो उन की सुरसा की तरह नित्य बढ़ती जरूरतें व इच्छाएं पूरी नहीं हो सकती थीं.

शची को अपनी कोख से जन्मी संतानों से नफरत होने लगी थी. कितने स्वार्थी हो गए हैं दोनों…पिता तो पिता उन्हें मां की भी चिंता नहीं रही…उस मां की जिस ने उन के अरमानों को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास किए, उन्हीं के लिए गलत रास्ता अपनाया, हर सुखसुविधा दी…अच्छे से अच्छे स्कूल में शिक्षा दिलवाई, धूमधाम से विवाह किया…यहां तक कि दहेज में विनी को जब कार दी थी तब तो उस ने नहीं पूछा कि ममा, इतना सब कैसे कर पा रही हो. ‘तुम बच्चों को क्यों दोष दे रही हो शची?’

उस के मन ने उस से पूछा, ‘उन्होंने तो वही किया जिस के वह आदी रहे थे… जैसे माहौल में तुम ने उन्हें पाला वैसे ही वह बनते गए. क्या तुम ने कभी किसी कमी का एहसास उन्हें कराया या तंगी में रहने की शिक्षा दी…पल्लव तो आदर्शवादी रहे थे, चोरीछिपे किए तुम्हारे काम से नाराज भी हुए थे तब तो तुम्हीं कहा करती थीं कि मैं सिर्फ वेतन में घर का खर्च नहीं चला सकती…तुम तो कुछ नहीं कर रहे हो, जो भी कर रही हूं वह मैं कर रही हूं…और हम मांग तो नहीं रहे…अगर थोड़ाबहुत कोई अपनी खुशी से दे जाता है तो आप को बुरा क्यों लगता है?’

अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन वह बोल पड़ी, ‘पर मैं ऐसा तो नहीं चाहती थी.’ ‘ठीक है, तुम ऐसा नहीं चाहती थीं पर क्या तुम्हें पता नहीं था कि जो जैसा करता है उस का फल उसे भुगतना ही पड़ता है’ अपनी आत्मा के साथ हुए वादविवाद से अब शची को एहसास हो गया था कि उसी ने बुराई को प्रश्रय दिया था. पल्लव के विरोध करने पर तकरार होती पर अंतत: जीत उस की ही होती. पल्लव चुप हो जाते फिर घर में खुशी के माहौल को देख कर वह भी उसी के रंग में रंगते गए. अगर वह पल्लव को मजबूर नहीं करती, उन की सीमित आय में ही घर चलाती और बच्चों को भी वैसी ही शिक्षा देती तो आज पल्लव का यह हाल न होता…कहीं न कहीं पल्लव के इस हाल के लिए वही दोषी है. पल्लव ने उस की खातिर बुराई का मुखौटा तो पहन लिया था पर शायद मन के अंदर की अच्छाई को मार नहीं पाए थे तभी तो अपनी छीछालेदर सह नहीं पाए और बीमार पड़ गए पर अब पछताए होत क्या जब चिडि़यां चुग गईं खेत. पल्लव की हिचकी ने उस के मन में चल रहे अंधड़ को रोका. उन्हें तड़पते देख कर वह डाक्टर को बुलाने भागी और जब तक डाक्टर आए तब तक सब समाप्त हो चुका था.

उस की आकांक्षाओं के आकाश ने उस का घरसंसार उजाड़ दिया था. खबर सुन कर विभा भागीभागी आई और उसे देखते ही शची चीत्कार कर उठी, ‘‘पल्लव की मौत के लिए मैं ही दोषी हूं…मैं ही उन की हत्यारिन हूं… पल्लव निर्दोष थे…मेरी गलती की सजा उन्हें मिली…’’ शची का मर्मभेदी प्रलाप सुन कर विभा समझ नहीं पा रही थी कि कैसे उसे संभाले. सचाई का एहसास एक न एक दिन सब को होता है पर यहां देर हो गई थी.

लेखिका –  सुधा आदेश

Romantic Story : इग्‍नोर करते ही हुई मुहब्‍बत

Romantic Story :  सुबह तारा जब विवेक  के आगोश से खुद को छुड़ा कर बाहर निकली तो विवेक के प्रति उस के मन में बसी सारी भ्रांतियां भी इस प्यार की गरमाहट में पिघल चुकी थीं और वह एक नई सुबह की किरणों की तरह नए जीवन के सपने बुनने लगी. वह यही सोच रही थी कि आखिर कैसे वह एक अनजाने से डर के कारण शादी के बाद भी पिछले 6 माह तक प्यार के इन सुनहरे लमहों को नहीं जी पाई थी क्योंकि सुहागरात के दिन ही उस ने अपने पति विवेक को एक ऐसी शर्त में बांध दिया था और उस की परीक्षा लेती रही. इस अनोखी शर्त में बंध कर दोनों इतने दिनों तक एकदूसरे का प्यार पाने के लिए तड़पते रहे.

सुबह की बयार भी तारा के जेहन में उमड़ रही लहरों को जैसे नई गति प्रदान कर रही थी और तारा की नैसर्गिक खूबसूरती में आज अजीब सी रौनक बढ़ आई थी जो पिछले 6 महीने में पहली बार ही दिखाई दी.

इन सुखद अनुभूतियों के साथ तारा उन कड़वी यादों के अतीत में खो गई जिन के कारण वह इतने दिनों तक एक घुटनभरी जिंदगी जीने को बाध्य हो गई थी.

2 बहनों और 1 भाई में सब से बड़ी तारा मम्मीपापा की सब से दुलारी होने के कारण बचपन से ही उसे जो भाता वही करती. अपनी मस्तीभरी जिंदगी में कब उस ने जवानी की दहलीज पर कदम रख दिया, उसे बिलकुल पता ही नहीं चला.
मजे से कट रही थी उस की जिंदगी, आंखों का तारा जो थी वह अपने मम्मीपापा की. उस के मम्मीपापा उसे पलकों पर बिठा कर रखते, वह भी सब पर जान छिड़कती और उन के प्रति अपना हर फर्ज निभाती.
हंसतेखेलते जब उस ने स्नातक की डिगरी अच्छे नंबरों से हासिल कर ली तो एक दिन मम्मी ने पूछा, ‘आगे क्या करने का इरादा है, बेटी?’
‘कुछ नहीं. बस, यों ही मस्ती करूंगी.’
‘मस्ती की बच्ची, मैं तो सोच रही हूं कि तेरी शादी कर दूं.’
‘नहीं मम्मी, अभी नहीं, क्यों अभी से ही मुझे अपने से दूर करने पर तुली हो?’ रोंआसी सी सूरत बना कर वह मम्मी की गोद में समा गई.
‘तो फिर कर लो कोई नौकरी, नहीं तो पापा तुम्हारी शादी कर देंगे,’ उस के बालों को सहलाते हुए मम्मी बोलीं.
‘नौ…क…री…ओके, डन. मम्मी, मैं आज से ही नौकरी की तैयारी करनी शुरू कर देती हूं. डिगरी में अच्छे अंक तो हैं ही, थोड़ी तैयारी करने पर नौकरी मिल ही जाएगी,’ उस ने चहक कर कहा.

‘तो फिर ठीक है. पर अगर 6 महीने में नौकरी नहीं मिली तो मैं तुम्हारे पापा को मना नहीं कर पाऊंगी,’ मम्मी ने उस के गालों को थपथपाते हुए कहा और अपने कमरे में चली गईं.

मम्मी के जाते ही तारा सोच में पड़ गई कि अब इस समस्या से कैसे निबटे. अखबार में तो कई रिक्तियां प्रकाशित होती हैं. क्यों न किसी अच्छी नौकरी के लिए आवेदन कर दिया जाए, यही सोच कर उस ने अखबार उठाया तो उस की नजर रिक्तियां कौलम में एक विज्ञापन पर पड़ी, ‘जरूरत है राज्य सरकार में परियोजना सहायक की. आवेदक को स्नातक होना अनिवार्य है और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होना चाहिए,’ यह देखते ही उस का चेहरा खिल उठा क्योंकि उस ने स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी, इसलिए उस ने फौरन आवेदन कर दिया.

कुछ ही दिनों में साक्षात्कार का बुलावा आया और वह पापा के साथ साक्षात्कार देने पहुंच गई. साक्षात्कार अच्छा हुआ और उसे उस के लखनऊ से दूर कानपुर में नौकरी की पेशकश की गई तो उस ने फौरन स्वीकार कर लिया कि चलो कम से कम 1-2 साल शादी के झंझट से मुक्ति मिली. थोड़े ही दिनों में उसे नियुक्तिपत्र मिल गया और तमाम औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उस ने नौकरी जौइन कर ली.

अब शुरू हुआ एक ऐसा सिलसिला जिस में सोमवार से शनिवार तक तो नौकरी में निकल जाते, फिर आती एक दिन की छुट्टी. इसलिए शनिवार आते ही तारा सारा काम जल्दीजल्दी निबटा कर दोपहर को ट्रेन पकड़ कर शाम तक लखनऊ हाजिर हो जाती, फिर सोमवार की सुबह इंटरसिटी से कानपुर पहुंच कर सीधे औफिस. यही अब तारा की साप्ताहिक दिनचर्या बन गई थी.
तारा अब अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहती, पर व्यस्तता के कारण वह ऐसा कर नहीं पाती थी. इस तरह उस के जीवन में एक अजीब सा एकाकीपन या यों कहें कि एक खालीपन सा आ गया था जिसे वह चाह कर भी नहीं भर पा रही थी.
दिखने में सुंदर व स्मार्ट होने के कारण औफिस में वह सब की नजरों में चढ़ी रहती. एक दिन उस के एक वरिष्ठ सहयोगी रमेशजी ने उस से कहा, ‘बेटी, औफिस वाले तुम्हारे बारे में तरहतरह की गौसिप करते हैं, अकेली लड़की के बारे में अकसर ऐसी बातें तो होती ही रहती हैं. यदि तुम्हारी शादी हुई होती तो शायद लोग तुम्हारे बारे में ऐसी बातें न करते. तुम्हारी उम्र भी शादी की हो चुकी है. यदि हो सके तो जल्दी से शादी कर के सब का मुंह बंद कर दो.’
रमेशजी की बात सुन कर वह दंग रह  गई कि सामने मीठीमीठी बातें करने  वाले उस के सहयोगी उस के बारे में कैसे गंदे खयाल रखते हैं, पर वह नहीं चाहती थी कि अभी शादी के बंधन में बंधे क्योंकि इसी से बचने के लिए ही तो वह इतनी कष्टपूर्ण जिंदगी जी रही है. पर आखिर होनी को कौन टाल सकता है. समय ने करवट बदली और घर में भी शादी की चर्चा ने जोर पकड़ लिया. आखिरकार पापा ने लखनऊ में ही एक सरकारी अधिकारी विवेक से उस की शादी तय कर दी और उस से कहा कि वह चाहे तो उस से मिल कर अपनी पसंद बता दे. बुरी फंसी बेचारी, आखिरकार उसे हां करनी पड़ी और शादी की तारीख तय हो गई. मिलनेमिलाने के सिलसिले के बाद जब शादी का दिन नजदीक आया तो
1 माह की छुटटी ले कर वह अपने घर आ गई और शादी की तैयारियों में लग गई. घर में खुशी का माहौल था, घर की पहली शादी जो थी. भाई रोहन और बहन बबली तो हमेशा भागतेदौड़ते, व्यस्त नजर आते थे. घर में जीजाजी आने वाले थे, इसलिए दोनों बहुत खुश थे.

एक दिन तारा के मोबाइल पर   विवेक का फोन आया. फोन उठाते ही विवेक की आवाज आई, ‘जल्दी से तैयार हो जाओ, तारा, तुम्हारे लिए साडि़यां और गहने खरीदने बाजार चलना है.’

तारा को एक झटका सा लगा क्योंकि एक तो विवेक ने शादी तय होने के बाद से एक भी बार फोन नहीं किया और आज पहली बार फोन भी किया, वह भी ऐसे जैसे वह उस की होने वाली पत्नी नहीं बल्कि आया हो और कपड़े व गहने खरीद कर वह उस पर कोई उपकार कर रहा है. उसे गुस्सा तो बहुत आया परंतु उस ने कुछ कहने के बजाय बस इतना ही कहा, ‘ठीक है, मैं आधे घंटे में तैयार हो जाती हूं.’

‘ठीक है, तुम तैयार हो कर सहारागंज पहुंचो, मैं 1 घंटे में तुम्हें वहीं मिलूंगा,’ यह कह कर विवेक ने फोन काट दिया.
जिस रूखेपन से विवेक ने फोन पर उस से बात की थी, उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगा पर वह कुछ कहने के बजाय जल्दी से तैयार हुई और आटो पकड़ कर सहारागंज पहुंच गई. विवेक उसे वहीं मिल गया. अकेले में पहली मुलाकात, न कोई औपचारिकता और न ही कोई प्यारभरी बात. विवेक ने यह भी नहीं कहा कि चलो पिज्जाहट में चल कर पिज्जा खाते हैं और थोड़ा घूमते हैं. बस, उस ने कहा कि चलो, और दोनों हजरतगंज में खरीदारी करने निकल गए.
अपने दोस्तों से शादी के पूर्व मुलाकातों के कई रोमांटिक किस्से तारा ने सुन रखे थे पर उसे विवेक के इस व्यवहार से झटका लगा, उसे विवेक से ऐसी उम्मीद बिलकुल भी नहीं थी. खरीदारी के दौरान भी विवेक तारा पर अपनी पसंद लादता रहा और उस ने वही खरीदा जो उसे पसंद था. तारा चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाई. बस, वह विवेक के साथ घूमती रही. खरीदारी के बाद वह बेरुखे मन से उसे आटो पर बिठा कर चला गया. न कोई औपचारिकता, न कोई प्यार की बात.
तारा को लगा कि विवेक सचमुच रोमांटिक व्यक्ति नहीं है और उसे उस की पसंदनापसंद का बिलकुल भी खयाल नहीं है. यह सोचते हुए उस के मन में विवेक के प्रति कड़वाहट भर गई. उस ने सोचा कि जब विवेक ऐसा है तो उस के परिवार वाले कैसे होंगे और वह उन के साथ कैसे सामंजस्य बिठा पाएगी. पर अब वह कर भी क्या सकती थी, शादी बिलकुल करीब थी और वह घर में कोई हंगामा खड़ा नहीं करना चाहती थी.
शादी धूमधाम से संपन्न हुई. मम्मीपापा ने बड़े अरमान से अपनी सारी जमापूंजी इस शादी में लगा दी ताकि वर पक्ष को कोई शिकायत न हो. विदाई के वक्त सारा परिवार गाड़ी के आंखों से ओझल होने तक खूब रोया और वह भरे मन से ससुराल पहुंच गई. उस की सोच के विपरीत उस के ससुराल वालों ने पलकें बिछा कर उस का स्वागत किया और फिर शुरू हुई शादी के बाद की रस्मअदायगी.
शादी के पूर्व विवेक से मुलाकात ऐसी कड़वी यादें छोड़ गई थी कि जिस से पार पाना तारा के लिए मुश्किल था. वह दिनभर यही सोचती रही कि पहली मुलाकात से जो प्यार की मिठास घुलनी चाहिए उस ने कड़वाहट का रूप ले लिया और करीब आने के बजाय दिलों की दूरियां बढ़ गई थीं. बारबार उस के दिल में यही खयाल आ रहा था कि जो व्यक्ति उस के आत्मसम्मान का खयाल नहीं रख सकता, उस के साथ वह अपनी पूरी जिंदगी कैसे बिता पाएगी.
इसी बीच, सारी रस्मअदायगी पूरी होतेहोते काफी रात हो गई और सभी रिश्तेदार चले गए. अब विवेक की भाभी ने तारा को छेड़ते हुए सुहागरात के लिए उसे उस के कमरे में पहुंचा दिया और अपने कमरे में चली गईं. अंदर ही अंदर बेचैन तारा इस उधेड़बुन में थी कि ‘आखिर वह ऐसे शख्स, जिस के मन में उस के प्रति जरा सा भी प्यार नहीं है, कैसे उसे अपना सर्वस्व सौंप दे. हिंदू परंपरा में शादी के बाद उस के शरीर पर तो अब विवेक का हक था और वह उसे कैसे रोक सकती है?’ यह सोचते ही उस का चेहरा पीला पड़ने लगा.

इधर, विवेक के कुछ दोस्त उसे घेर कर पहली रात को ही ‘चिडि़या मार’ लेने की हिदायतें और नुस्खे बता रहे थे और विवेक भी सुहागरात के सपने बुनता हुआ रोमांचित हो रहा था. आखिरकार देर रात को उस के दोस्तों ने उसे कमरे में ढकेल दिया और अपनेअपने घर चले गए. विवेक के चेहरे पर तीव्र उत्तेजनाओं का ज्वार स्पष्ट नजर आ रहा था, मन तेजी से कमरे की ओर जाने को बेताब था किंतु शर्म, संकोच, संयम पारिवारिक मूल्यों की जंजीरों ने जैसे उस के पांव जकड़ रखे थे. धीरेधीरे सकुचाते हुए विवेक ने कमरे में प्रवेश किया और दरवाजा बंद कर बिस्तर की ओर बढ़ने लगा. तारा बिस्तर पर सिमटी सी, सकुचाई सी बैठी थी पर उस ने मन ही मन एक दृढ़ फैसला कर लिया था. विवेक ने सब से पहले तारा का घूंघट उठाया और उस का सुंदर चेहरा देख कर बोला, ‘तारा, आज सचमुच तुम बिलकुल चांद सी लग रही हो. आज से मैं तुम्हें तारा नहीं चंदा कहूंगा और तुम्हें संसार की सभी खुशियां देने का प्रयास करूंगा. आज से हम एक नई जिंदगी शुरू करने जा रहे हैं. बोलो, दोगी न मेरा साथ?’
विवेक के प्रति मन में कड़वाहट लिए तारा को जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया. विवेक ढेर सारी बातें करता रहा पर तारा यह सोचने में लगी रही कि आखिर वह विवेक को कैसे सबकुछ कह पाएगी.
अचानक विवेक को शरारत सूझी और दोस्तों की सलाह के अनुसार उस ने अपना हाथ तारा के कंधे पर रखा और फिर कंधे से नीचे सरकाना शुरू कर दिया. जैसे ही विवेक का हाथ नीचे आया, तारा उस का हाथ पकड़ते हुए बोली, ‘रुको विवेक…’
यह सुनते ही विवेक को जैसे सांप सूंघ गया. उस ने ऐसी कल्पना भी नहीं की थी कि सुहागरात के दिन उसे ऐसा सुनना पड़ेगा परंतु धैर्य से काम लेते हुए उस ने पूछा, ‘क्या बात है, चंदा?’
इतना सुनना था कि तारा शुरू हो गई, ‘विवेक, शायद इस के लिए यह समय सही नहीं है, क्योंकि हम अभी तक एकदूसरे को अच्छी तरह से समझ नहीं पाए हैं और ऐसे में मैं अपनेआप को तुम्हें सौंप नहीं सकती.
‘आज मैं ने एक फैसला लिया है कि हम 1 वर्ष तक जिस्मानी रिश्ता नहीं बनाएंगे. इस 1 वर्ष के दौरान मैं पूरी तरह से तुम्हें और तुम्हारे परिवार को समझने की कोशिश करूंगी और पूरे समर्पण के साथ तुम्हारे हर सुखदुख की साथी बनूंगी और तुम भी मेरे परिवार के सदस्यों के साथ घुलनेमिलने का प्रयास करोगे.
1 साल बाद यदि हमारा विश्वास अटूट रहा तो फिर हम हमेशा के लिए एक हो जाएंगे, वरना शायद हमारे रास्ते अलगअलग भी हो सकते हैं. ऐसे में मैं अपना सर्वस्व तुम्हें सौंप कर पछतावे में नहीं रहना चाहती.’
जैसे कोई बदले की भावना से प्रेरित हो कर बंदूक की सारी गोलियां दाग देता है और फिर एक लंबी सांस लेता है, कुछ ऐसे ही तारा एक ही सांस में सबकुछ विवेक को कह गई. तारा की बातें सुन कर विवेक को काटो तो खून नहीं. उस की हालत ऐसी हो गई थी कि उसे न कुछ कहते बनता था न ही सुनते. उस ने हाथ ऐसे हटाया मानो बिजली का झटका लग गया हो. उस समय उस ने कुछ न बोलना ही बेहतर समझा और चुपचाप तकिया उठा कर सोफे पर सोने चला गया.
अगले दिन सुबह जब दोनों कमरे से बाहर निकले तो विवेक की भाभी उन दोनों को छेड़ने लगी पर दोनों ने बिलकुल जाहिर नहीं होने दिया कि उन के बीच ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. तारा इन सब बातों को भूलते हुए घर के काम में लग गई और धीरेधीरे वह परिवार के सारे सदस्यों से घुलमिल गई और उस घर को अपना बना लिया परंतु विवेक के प्रति उस के मन में कड़वाहट वैसी ही बनी रही. दिन में तो सबकुछ ठीक चलता परंतु रात में न सिर्फ उन के बिस्तरों के बीच बल्कि उन के दिलों के बीच की दूरियां भी साफ नजर आतीं.
विवेक ने भी अपने औफिस से छुट्टी ले ली थी इसलिए वह दिनभर घर में ही रहता और बच्चों के साथ खेलता रहता. खेल की आड़ में ही वह कभीकभी तारा के शरीर से छेड़खानी भी कर देता. हालांकि विवेक के छूते ही उस के शरीर में करेंट सा दौड़ जाता पर वह चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाती.
इसी बीच, तारा कई बार अपने मायके भी गई और विवेक को भी साथ ले गई. विवेक उसे वहां छोड़ आता पर वहां ज्यादा देर रुकता नहीं था. वह रोहन व बबली से भी ज्यादा बातें नहीं करता था. बस, गंभीर बना रहता था. यहां तक कि मम्मीपापा के साथ भी वह औपचारिक ही बना रहता. 1-2 दिन रहने के बाद विवेक आ कर उसे वापस ले आता. विवेक का यह व्यवहार भी तारा को पसंद नहीं आया और उस के मन में विवेक के प्रति कड़वाहट और बढ़ती चली गई.
इसी बीच छुट्टियां बीत जाने के बाद तारा ने फिर से औफिस जौइन कर लिया. सभी सहकर्मियों ने उसे बधाई दी पर तारा उन्हें क्या कहती? बस, मन से उस ने औफिस का काम शुरू कर दिया. दिन तो औफिस में बीत जाता पर रात आते ही तारा के मन में कई तरह के द्वंद्व शुरू हो जाते कि कहीं उस ने शादी कर के कोई गलती तो नहीं कर दी? क्या उसे अब इस रिश्ते से मुक्ति ले लेनी चाहिए जिस रिश्ते में उस के पति का उस में या उस के परिवार के प्रति कोई झुकाव न हो? वह अपनेआप से लड़ती रहती. पर वह अपना गम सुनाए तो किसे. जब उस के दोस्त उस की सुहागरात के बारे में तरहतरह की बातें पूछते और उसे छेड़ते तो तारा बनावटी कहानियां सुना कर सब को शांत कर देती.
इस दौरान, अकसर विवेक से फोन पर बातें भी होतीं पर रिश्तों की कड़वाहट इन बातों में साफ नजर आती. इस बीच वह कई बार लखनऊ भी आई और अपने घर जाने के बजाय सीधे ससुराल गई और ससुराल वालों को कभी इस का एहसास नहीं होने दिया कि उस के और विवेक के बीच कुछ अच्छा नहीं चल रहा. वह पूरे समर्पण के साथ अपने सासससुर की सेवा करती और बच्चों के साथ खेलती. घर के सारे लोग उस के व्यवहार से काफी प्रसन्न थे पर रात को विवेक के कमरे में आते ही कमरे में शांति छा जाती. विवेक ने भी कभी उसे छूने या उस के बिस्तर पर साथ सोने के लिए जबरदस्ती नहीं की.
तारा हमेशा यही सोचती रहती कि जिस तरह से उस ने विवेक के परिवार को अपना लिया है उसी तरह से विवेक भी उस के परिवार को अपना ले और उन के हर सुखदुख में शामिल हो.
यही सोच कर उस ने विवेक की पसंदनापसंद का पता लगा कर उस के अनुरूप खुद को ढालना शुरू कर दिया. जब उसे पता चला कि विवेक को डांस एवं म्यूजिक बहुत पसंद है तो उस ने औफिस के बाद एक डांस एवं म्यूजिक क्लास जौइन कर ली ताकि वह किसी मौके पर उसे सरप्राइज दे सके. और जल्दी ही वह मौका आ गया. विवेक के चाचा के लड़के की शादी में वह गई और उस ने बच्चों के साथ मिल कर खूब डांस व मस्ती की. विवेक को यह सब काफी अच्छा लगा पर वह हमेशा यही सोचता रहता कि आखिर तारा ने उस के साथ ऐसा क्यों किया.
विवेक का जन्मदिन भी करीब आ रहा था और तारा उस के लिए एक और सरप्राइज की योजना बना चुकी थी ताकि वह विवेक को सरप्राइज दे सके. अपनी योजना के अनुसार जन्मदिन के दिन उस ने पहले से ही घर के सारे सदस्यों को लखनऊ के एक रैस्तरां में भेज दिया. विवेक यही सोच रहा था कि तारा ने आज उसे जन्मदिन की बधाई तक नहीं दी. हर साल घर में भी सभी को उस का जन्मदिन याद रहता है पर आज सब बिना बताए अचानक चले कहां गए.
तभी तारा ने विवेक से कहा, ‘विवेक, मेरी सहेली प्रेरणा ने मुझे बुलाया है, क्या तुम मुझे उस के घर छोड़ दोगे?’
‘क्यों नहीं, चलो,’ बिना कुछ पूछे विवेक तारा को बाइक पर बैठा कर चल दिया.
रैस्तरां आते ही तारा ने विवेक से कहा कि चलो रैस्तरां में कौफी पीते हैं. यहां की कौफी बड़ी टेस्टी होती है.
जब विवेक और तारा कौफी का और्डर दे कर इंतजार कर रहे थे तभी पीछे से सारे बच्चों ने शोर मचाते हुए विवेक को घेर लिया और जोरजोर से चिल्लाने लगे, ‘हैप्पी बर्थडे टू यू विवेक चाचा.’
अब विवेक को समझ आया कि इस तूफान के पूर्व शांति का कारण यह था. अब तक सारा परिवार इकट्ठा हो चुका था, सब ने खूब ऐंजौय किया.
विवेक काफी खुश था. इस घटना से उस के मन में तारा के प्रति प्रेम और बढ़ गया. पर वह यह सोचने लगा कि वह कैसे तारा को खुश करे ताकि उस के मन का द्वेष मिटे और दोनों एक खुशहाल जीवन जी सकें. इस तरह शादी के 6 माह बीत गए पर तारा अब तक उस के करीब नहीं आई. तारा का जन्मदिन करीब था. विवेक ने भी सोचा कि वह तारा के जन्मदिन पर कानपुर जा कर उस के जन्मदिन को धूमधाम से मनाएगा.
यही सोच कर वह बिन बताए जन्मदिन के दिन सुबह ही तारा के घर पहुंच गया और उसे जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं और बोला, ‘आज छुट्टी ले लो तारा, हम लोग कहीं घूमने चलते हैं.’
जवाब में तारा ने कहा, ‘नहीं, विवेक, औफिस में काफी काम है और मैं पहले से बता कर भी नहीं आई हूं, इसलिए औफिस तो जाना ही पड़ेगा पर मैं कोशिश करूंगी कि दोपहर तक सारा काम निबटा कर आधे दिन की छुट्टी ले लूं.’
अचानक विवेक के कानपुर आ जाने से तारा अचंभित थी और औफिस में यही सोचती रही कि कहीं यह विवेक की कोई चाल तो नहीं क्योंकि वह तो यहां अकेले रहती है. इसलिए शायद वह इस का फायदा उठाना चाहता हो.
फिर भी अपने वादे के अनुसार वह दोपहर को छुट्टी ले कर घर आ गई और तैयार हो कर विवेक के साथ निकल गई. विवेक ने दिनभर घूमने व शाम को डिनर करने के बाद लखनऊ लौटने के बारे में कहा तो तारा ने फौरन हां कर दी और खुश होते हुए मन ही मन कहा, ‘चलो अच्छा हुआ, आज तो बच गई मैं.’
थोड़े ही दिन में सर्दियां शुरू हो गईं और रात को स्कूटी चलाने के कारण तारा को ठंड लगने से वायरल फीवर हो गया. जब उस ने विवेक को इस बारे में बताया तो वह फौरन कानपुर पहुंच कर तारा को बड़े प्यार से घर ले आया और तुरंत डाक्टर के पास ले गया. उस के चेहरे की घबराहट तारा साफसाफ पढ़ सकती थी. उसे यह एहसास हुआ कि विवेक को उस की चिंता है. उस ने अपने दफ्तर से छुट्टी ले ली और दिनभर तारा के पास ही बैठा रहता और रात को जब सब चले जाते तो वह जा कर सोफे पर सो जाता.
विवेक की प्यारभरी देखभाल से तारा जल्दी ठीक हो गई और कानपुर जाने के लिए तैयार हो गई तो विवेक ने कहा, ‘अभी नहीं, तुम काफी कमजोर हो गई हो, इसलिए थोड़े दिन आराम कर लो फिर चली जाना.’
इस प्यारभरे अनुरोध को वह टाल नहीं सकी. अगले ही दिन विवेक उसे मम्मीपापा से मिलाने ले गया. इस दौरान तारा ने महसूस किया कि विवेक बबली और रोहन के साथ काफी घुलमिल गया है और उन के साथ काफी हंसीमजाक कर रहा है. दूसरी ओर, इस बार मम्मीपापा के साथ भी उस का व्यवहार प्रेमभरा था.
तारा विवेक के चेहरे पर यह परिवर्तन साफ देख पा रही थी. परंतु उस ने सोचा कि अभी तो सिर्फ 6 माह ही बीते हैं, अभी तो वह पूरे 6 माह विवेक को परखेगी तभी उसे सच्चे मन से अपनाएगी.

2 दिन वहां रुकने के बाद विवेक रात को तारा को ले कर अपने घर लौट आया. कड़ाके की सर्दी में बाइक चलाने के कारण विवेक को सर्दी लग गई पर उस ने तारा को कुछ नहीं बताया और सोफे पर सोने चला गया.

तारा विवेक में आए परिवर्तन को ले कर काफी खुश थी और सुनहरे दिनों के सपने बुनते हुए पता नहीं कब उस की आंख लग गई.
रात को जोरजोर से कराहने की आवाज सुन कर उस की आंख खुली तो उस ने देखा कि विवेक ठंड से कंपकंपाते हुए सिकुड़ कर सोफे पर सोया है. यह देखते ही वह घबरा कर उठी और विवेक के पास जा कर उसे रजाई ओढ़ा कर बिस्तर पर लाने लगी तो विवेक ने कहा कि नहीं, मैं यहीं ठीक हूं, सुबह तक ठीक हो जाऊंगा.
तारा ने जबरदस्ती विवेक को बिस्तर पर ला कर लिटा दिया और तेजी से उस के पैर सहलाने लगी. पैर सहलाने से भी जब उस के शरीर की कंपन कम नहीं हुई तो वह बिना सोचेसमझे विवेक के सीने से लिपट गई और उसे जोर से जकड़ लिया. अचानक मिली नारी देह की गरमी से विवेक के शरीर की कंपन ठीक हो गई. आराम मिलते ही उस ने तारा से अलग होने के लिए उस की पकड़ ढीली करने को कहा तो तारा ने अपनी पकड़ और मजबूत करते हुए उसे जोर से जकड़ लिया और बोली, ‘बस, विवेक, तुम्हारे धैर्य का इम्तिहान अब खत्म हुआ, ऐसे ही पड़े रहो, बस.’
अब तक विवेक को आराम मिल चुका था. वह भावुक होते हुए बोला, ‘तारा, बचपन से ही मैं संकोची स्वभाव का हूं, मुझे कभी लड़कियों से बातें या दोस्ती करने का मौका ही नहीं मिला. इसलिए मैं कभी समझ ही नहीं पाया कि रिश्ते कैसे निभाए जाते हैं. यही कारण है कि मैं तुम से और तुम्हारे परिवार के सदस्यों से ज्यादा घुलमिल नहीं पाया परंतु जब तुम ने मेरे परिवार को अपना बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और मेरी हर पसंदनापसंद का खयाल रखा तो मैं ने सोचा कि जब तुम मेरे लिए इतना बदल सकती हो तो मैं तुम्हारे लिए क्यों नहीं बदल सकता. यही सोच कर मैं ने अपनेआप में बदलाव लाना शुरू कर दिया है.
‘बचपन से मैं ने सदैव ही आगे रहते हुए सभी कार्य किए थे और आगे रहने की इसी होड़ के चलते मुझे किसी की भावनाओं को समझने का मौका नहीं मिला और इसलिए तुम्हारे जज्बातों को न समझने की भूल कर बैठा. वैसे तारा, मैं तुम्हें कभी इग्नोर करना नहीं चाहता था,’ विवेक के स्वर में एक पश्चाताप मिश्रित दुख का भाव था, जिसे तारा ने बखूबी पढ़ लिया.
फिर वह तारा की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘तारा, अभी कम से कम 6 महीने और तुम्हें मुझ से कोई खतरा नहीं है.’
उस की बातें सुन कर तारा अपनी आंखों में शरारत लिए विवेक के गालों को चूमते हुए बोली, ‘तारा नहीं, चंदा, तभी तो आप की चंदा कह रही है कि आप ने अपना इम्तिहान वक्त से पहले ही डिस्ंिटक्शन के साथ पास कर लिया है और इनाम के हकदार बन गए हैं. सच कहूं, विवेक,’ तारा ने सकुचाते हुए कहा, ‘मुझे भी तुम्हारे शादी के पहले के इग्नोरैंस की अपेक्षा बाद की दूरी बहुत खली, पिछले 6 महीने में हर रात मैं ने भी एक परीक्षा दी है, हर रात एक ही प्रश्न ने मेरी नींद उड़ा दी थी.’
‘कौन सा प्रश्न, चंदा?’ विवेक के चेहरे पर प्रश्नमिश्रित आश्चर्य के भाव थे.
तारा ने कहा, ‘यही कि मैं ने जो अनोखी शर्त रखी है वह सही है या गलत?’
यह कह कर विवेक की चंदा विवेक से लिपट गई. अब उन के जीवन में एक नई सुबह की शुरुआत हो चुकी है. और अनोखी शर्त अब जीवन के अनोखे आनंद में जैसे खो सी गई थी.

Best Hindi Satire : नाम नहीं काम बलवान है भइया

Best Hindi Satire : नाम बदलने से कुछ हो या न, सुविधा जरूर दुविधा में बदल जाती है. सरकार द्वारा नाम बदलने की वकालत तो की जाती है लेकिन मेकअप करने से चेहरा थोड़े ही बदलता है.

सरकारें अपनी तासीर व सियासी गुणाभाग के मान से शहरों, प्रसिद्ध स्थानों, संस्थानों, स्टेशनों, सड़कों के नाम परिवर्तन का अतिप्रिय कार्य अंजाम देती रहती हैं. सरकार को कुछ न कुछ तो करना ही होता है. गरीबी, बेरोजगारी दूर करने, महंगाई की नकेल कसने जैसे पीड़ादायक कार्य के बनिस्बत नाम बदलने की कवायद में उसे सुखानुभूति होती है.

बौम्बे मुंबई हो गया. पर बौम्बे हौस्पिटल मुंबई हौस्पिटल नहीं हुआ. न ही बौंबे कील को मुंबई कील कभी कहा जाएगा. कहने पर भी मुंबई कील में वैसी फील नहीं आएगी. बौम्बे उच्च न्यायालय को मुंबई उच्च न्यायालय कहने से क्या लंबित प्रकरण कम हो जाएंगे, पेशी पर पेशी मिलना बंद हो गरीब को क्या न्याय सुलभता से मिल जाएगा? क्या कलकत्ता को कोलकाता और मद्रास को चेन्नई करने से वहां सड़कों के गड्ढे कम हो गए, महंगाई कम हो गई? गुड निर्माण से गुड़गांव नाम पाए को गुरुग्राम करने से क्या वहां जाम से मुक्ति मिल गई? नाम बदलने से शहर नहीं, केवल साइनबोर्ड बदलता है.

मुगलसराय स्टेशन का नाम दीनदयाल उपाध्याय होने से क्या ट्रेनों की लेटलतीफी बंद हो गई, क्या गंदगी कम हो गई, क्या वैंडरों ने बासी सामान बेचना बंद कर दिया, कुलियों व औटो वालों के मोलभाव बंद हो गए? पहले ये सब दुरुस्त हो, फिर नाम दुरुस्त करो.

बेंगलुरु के विक्टोरिया अस्पताल का नाम बेंगलुरु मैडिकल कालेज होने से यदि ड्यूटी डाक्टर समय पर पहुंचने लगे, मरीज को निजी क्लीनिक में बुलाना बंद हो जाए, कुप्रबंधन खत्म हो, महंगी दवाएं लिखना बंद हो जाए तब तो सारे अस्पतालों के नाम बदल दो.

भोपाल के वर्ल्ड क्लास हबीबगंज स्टेशन का नाम रानी कमलापति हो गया पर पुलिस स्टेशन, स्टेट बैंक की शाखा के बोर्ड पर अभी हबीबगंज ही लिखा है. आईआरसीटीसी पर आरक्षण करने जाओ तो स्टेशन कोड के रूप में आदतवश हबीबगंज का एचबीजे टाइप हो जाता है. जब तक रानी कमलापति का आरकेएमपी याद आए तब तक तो तत्काल कोटा का द एंड हो जाता है. भले ही सरकारी दस्तावेज में चीजों के नाम बदल जाएं पर जनमानस के मानसपटल पर तो सदियों से प्रचलित नाम ही अंकित रहने से वही जबान पर आता है. तो क्या नाम बदलना भ्रम बढ़ाना है?

देश, समाज, क्षेत्र स्थान विशेष की संस्कृति व प्राचीन गौरव के सम्मान के उद्देश्य से नाम में बदलाव किए जाने की वकालत की जाती है पर मेकअप करने से चेहरा थोडे़ ही बदल जाता है. बदलाव आंतरिक होता है, बाह्य नहीं. बदलाव तो सिर्फ स्याही तक सीमित रहता है. वैसे, पुरानी शराब नई बोतल में पैक कर बेचने व पुरानी योजनाओं को नए नाम देने का ही यह वक्त है.

ट्विटर कितना उम्दा नाम था लेकिन एलन मस्क नए स्वामी बने तो चिडि़या को मस्क कर एक्स कर उसे एक्स ही बना दिया. कहां ट्विटर व उस का प्यारा सा लोगो और कहां एक्स. कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली की तरह का हो गया.

नाम परिवर्तन से और कुछ हो या न हो, सुविधा दुविधा में बदल जाती है. व्यवस्था द्वारा बारबार नाम बदलने से पर्यटन व अन्य उद्योगों को कितनी जटिलता का बैठेबिठाए सामना करना पड़ता है. बड़ी संख्या में पुराने दस्तावेज दो कौड़ी के रह जाते हैं.

गंगाधर तो कहता है, बदलना है तो गधे का नाम बदलो. सदैव सिर झुका कर कस कर मेहनत करता है लेकिन गधा कह कर सब मेहनत पर पानी फेर देते हो जबकि सरकारी दफ्तर में तो ढेले भर काम नहीं करने वाला भी सिर उठा कर घूमता है. ऊपर से काम करने वालों पर आलोचना के ढेले अलग फेंकता रहता है.

पता नहीं हम शेक्सपियर की रोमियो व जूलियट की वह पंक्ति क्यों भूल जाते हैं कि ‘व्हाटस इन अ नेम दैट व्हिच वी कौल अ रोज बाय एनी अदर नेम वुड स्मेल एज स्वीट.’

नाम बदलने से इतिहास नहीं बदलता. भैया नाम नहीं कार्यसंस्कृति बदलने, योजनाओं, उठाए कदमों को जनहितैषी व परिणामोन्मुखी बनाने की जरूरत है. नाम परिवर्तन बेरोजगारी, महंगाई, असमानता, दुराचार कम करते हों, तब तो सही है.

 

Family Story : पापा कूलकूल – कैसे सिखाया सुगंधा को पापा ने सबक

Family Story : ‘‘मु झे ‘सू’ कह कर पुकारो, पापा. कालिज में सभी मुझे इसी नाम से पुकारते  हैं.’’ ‘‘अरे, अच्छाभला नाम रखा है हम ने…सुगंधा…अब इस नाम मेें भला क्या कमी है, बता तो,’’ नरेंद्र ने हैरान हो कर कहा.

‘‘बड़ा ओल्ड फैशन है…ऐसा लगता है जैसे रामायण या महाभारत का कोई करेक्टर है,’’ सुगंधा इतराती हुई बोली.

‘‘बातें सुनो इस की…कुल जमा 19 की है और बातें ऐसी करती है जैसे बहुत बड़ी हो,’’ नरेंद्र बड़बड़ाए, ‘‘अपनी मर्जी के कपड़े पहनती है…कालिज जाने के लिए सजना शुरू करती है तो पूरा घंटा लगाती है.’’

‘‘हमारी एक ही बेटी है,’’ नरेंद्र का बड़बड़ाना सुन कर रेवती चिल्लाई, ‘‘उसे भी ढंग से जीने नहीं देते…’’

‘‘अरे…मैं कौन होता हूं जो उस के काम में टांग अड़ाऊं ,’’ नरेंद्र तल्खी से बोले.

‘‘अड़ाना भी मत…अभी तो दिन हैं उस के फैशन के…कहीं तुम्हारी तरह इसे भी ऐसा ही पति मिल गया तो सारे अरमान चूल्हे में झोंकने पड़ेंगे.’’

‘‘अच्छा, तो आप हमारे साथ रह कर अपने अरमान चूल्हे में झोंक रही हैं…’’

‘‘एक कमी हो तो कहूं…’’

‘‘बात सुगंधा की हो रही है और तुम अपनी…’’

‘‘हूं, पापा…फिर वही सुगंधा…सू कहिए न.’’

‘‘अच्छा सू बेटी…तुम्हें कितने कपड़े चाहिए…अभी 15 दिन पहले ही तुम अपनी मम्मी के साथ शापिंग करने गई थीं… मैचिंग टाप, मैचिंग इयर रिंग्स, हेयर बैंड, ब्रेसलेट…न जाने क्याक्या खरीद कर लाईं.’’

‘‘पापा…मैचिंग हैंडबैग और शूज

भी चाहिए थे…वह तो पैसे ही खत्म हो गए थे.’’

‘‘क्या…’’ नरेंद्र चिल्लाए, ‘‘हमारे जमाने में तुम्हारी बूआ केवल 2 जोड़ी चप्पलों में पूरा साल निकाल देती थीं.’’

‘‘वह आप का जमाना था…यहां तो यह सब न होने पर हम लोग आउटडेटेड फील करते हैं…’’

‘‘और पढ़ाई के लिए कब वक्त निकलता है…जरा बताओ तो.’’

‘‘पढ़ाई…हमारे इंगलिश टीचर

पैपी यानी प्रभात हैं न…उन्होंने हमें अपने नोट्स फोटोस्टेट करने के लिए दे दिए हैं.’’

‘‘तुम्हारे इस पैपी की शिकायत मैं प्रिंसिपल से करूंगा.’’

‘‘पिं्रसी क्या कर लेगा…वह तो खुद पैपी के आगे चूहा बन जाता है…आखिर, पैपी यूनियन का प्रेसी है.’’

‘‘प्रेसी…तुम्हारा मतलब प्रेसीडेंट…’’ नरेंद्र ने उस की बात समझ कर कहा, ‘‘बेटा, बात को समझो…हम मध्यवर्गीय परिवार के  सदस्य हैं…इस तरह फुजूलखर्ची हमें सूट नहीं करती.’’

‘‘बस…शुरू हो गया आप का टेपरिकार्डर,’’ रेवती चिढ़कर बोली, ‘‘हर वक्त मध्यवर्गीय…मध्यवर्गीय. अरे, कभी तो हमें उच्चवर्गीय होने दिया करो.’’

‘‘रेवती…तुम इसे बिगाड़ कर ही मानोगी…देख लेना पछताओगी,’’ नरेंद्र आपे से बाहर हो गए.

‘‘क्यों, क्या किया मैं ने? केवल उसे फैशनेबल कपड़े दिलवाने की तरफदारी मैं ने की…आप तो बिगड़ ही उठे,’’ सुगंधा की मां ने थोड़ी शांति से कहा.

‘‘मैं भी उसे कपड़े खरीदने से कब मना करता हूं…लेकिन जो भी करो सीमा में रह कर करो…जरा इसे कुछ रहनेसहने का सही सलीका समझाओ.’’

‘‘लो, अब कपड़े की बात छोड़ी तो सलीके पर आ गए…अब उस में क्या दिक्कत है, पापा,’’ सुगंधा ठुनकी.

‘‘तुम जब कालिज चली जाती हो तो तुम्हारी मां को घंटा भर लग कर तुम्हारा कमरा ठीक करना पड़ता है.’’

‘‘मैं ने कब कहा कि वह मेरे पीछे मेरा कमरा ठीक करें…मेरा कमरा जितना बेतरतीब रहे वही मुझे अच्छा लगता है…यही आजकल का फैशन है.’’

‘‘और साफसफाई रखना…सलीके से रहना?’’

‘‘ओल्ड फैशन…हर वक्त नीट- क्लीन और टाइडी जमाने के लोग रहते हैं…नए जमाने के यंगस्टर तो बस, कूल दिखना चाहते हैं…अच्छा, मैं चलती हूं…नहीं तो कालिज के लिए देर हो जाएगी.’’

अपने मोबाइल को छल्ले की तरह नचाती हुई वह चलती बनी. रेवती ने भी चिढ़ कर नाश्ते के बरतन उठाए और किचन में चली गई.

‘कहां गलती कर दी मैं ने इस बच्ची को संस्कार देने में,’ नरेंद्र अपनेआप से बोले, ‘नई पीढ़ी हमेशा फैशन के हिसाब से चलना पसंद करती है…इसे तो कुछ समझ ही नहीं है…एक बार मन में ठान ली उसे कर के ही मानती है. ऊपर से रेवती के लाड़प्यार ने इसे कामचोर और आरामतलब अलग बना दिया है. मैं रेवती को समझाता हूं कि पढ़ाई के साथ घर के कामकाज व उठनेबैठने, पहनने का सलीका तो इसे सिखाओ वरना इस की शादी में बड़ी मुश्किल होगी, तब वह तमक कर कहती है कि मेरी इतनी रूपवती बेटी को तो कोई भी पसंद कर लेगा…’

‘‘क्या बड़बड़ा रहे हैं अकेले में आप?’’ रेवती नरेंद्र से बोली.

‘‘तुम्हारी लाड़ली के बारे में सोच रहा हूं,’’ नरेंद्र ने चिढ़ कर कहा.

‘‘ओहो, अब आप शांत हो जाओ… कितना खून जलाते हो अपना…’’

‘‘सब तुम्हारे ही कारण जल रहा है…तुम उसे दिशाहीन कर रही हो.’’

‘‘आप ऐसा क्यों समझते हो जी, कि मैं उसे दिशाहीन कर रही हूं,’’ रेवती रहस्यमय ढंग से कहने लगी, ‘‘मुझे तो लगता है कि आप ने अपनी सुविधा के लिए उस से बहुत सी आशाएं लगा रखी हैं.’’

‘‘अब इकलौती संतान है तो उस से आशा करना क्या गलत है…बोलो, गलत है.’’

‘‘देखो,’’ रेवती समझाने के ढंग से बोली, ‘‘पुरानी पीढ़ी अकसर परंपरागत मान्यताओं, रूढि़यों और अपने तंग नजरिए को युवा पीढ़ी पर थोपना चाहती है जिसे युवा मन सहसा स्वीकार करने में संकोच करता है.’’

‘‘ठीक है, मेरा तंग नजरिया है… तुम लोगों का आधुनिक, तो आधुनिक ही सही,’’ नरेंद्र के बोलने में उन का निश्चय झलकने लगा था, ‘‘जब सारे समाज में ही परिवर्तन हो रहा है तो मेरा इस तरह से पिछड़ापन दिखाना तुम दोनों को गलत ही महसूस होगा.’’

‘‘ये हुई न समझदारी वाली बात,’’ रेवती ने खुश होते हुए कहा, ‘‘आप की और सू की लड़ाइयों से आजकल घर भी महाभारत बना हुआ है…आप उसे और उस की पीढ़ी को दोष देते हो…वह आप को और आप की पुरानी पीढ़ी को दोष देती है…’’

‘‘तुम ही बताओ, रेवती,’’ नरेंद्र ने अब हथियार डाल दिए, ‘‘क्या सुगंधा और उस की पीढ़ी के बच्चे दिशाहीन नहीं हैं?’’

रेवती चिढ़ कर बोली, ‘‘आप को  तो एक ही रट लग गई है…अरे भई, दिशाहीनता के लिए युवा वर्ग दोषी नहीं है…दोषी समाज, शिक्षा, समय और राजनीति है.’’

नरेंद्र फिर चुप हो गए. लेकिन गहन चिंता में खो गए. ‘जैसे भी हो आज इस समस्या का हल ढूंढ़ना ही होगा,’ वह बड़बड़ाए, ‘सच ही है, हमारा भी समय था. मुझे भी पिताजी बहुत टोकते थे, ढंग के कपड़े पहनो…करीने से बाल बनाओ…समय पर खाना खाओ…रेडियो ज्यादा मत सुनो…बड़ों से अदब से बोलो…पैसा इतना खर्च मत करो. सही भाषा बोलो…ओह, कितनी वर्जनाएं होती थीं उन की, किंतु मैं और छुटकी उन की बातें मान जाते थे…यहां तो सुगंधा हमारी एक भी बात सुनने को तैयार नहीं.

‘उस से यही सुनने को मिलता है कि ओहो पापा, आप कुछ नहीं जानते. लेकिन मैं भी उसे क्यों दोष दे रहा हूं… जरूर मेरे समझाने का ढंग कुछ अलग है तभी उसे समझ नहीं आ रहा…उस की फुजूलखर्ची और फैशनपरस्ती से ध्यान हटाने के लिए मुझे कुछ न कुछ करना ही होगा.’

नरेंद्र अब उठ कर कमरे में चहलकदमी करने लगे. रेवती ने उन्हें कमरे में टहलते देखा तो चुपचाप दूसरे कमरे में चली गईं. अचानक नरेंद्र की आवाज आई, ‘‘रेवती, दरवाजा बंद कर लो. मैं अभी आता हूं.’’

रेवती दौड़ कर बाहर आई. दरवाजे से झांक कर देखा तो नरेंद्र कालोनी के छोर पर लंबेलंबे डग भरते नजर आए… उस ने गहरी सांस भर कर दरवाजा बंद किया.

अब उन्हें दुख तो होना ही है जब सुगंधा ने उन के द्वारा रखे अच्छेखासे नाम को बदल कर सू रख दिया.

वह भी घर में शांति चाहती है इसलिए विभिन्न तर्क दे दे कर दोनों को

चुप कराती रहती है…यह सही है

कि बेटी के लिए उस के मन में बहुत ज्यादा ममता है…वह नरेंद्र की

कही बात पर कांप उठती है, ‘रेवती, तुम्हारी अंधी ममता सुगंधा को कहीं बिगाड़ न दे.’

‘कहीं सचमुच सुगंधा दिशाहीन हो गई तो वह क्या करेगी…’ रेवती स्वयं से सवाल कर उठी, ‘सुगंधा जिस उम्र में पहुंची है वहां तो हमारा प्यार और धैर्य ही उसे काबू में रख सकता है. सुगंधा को उस की गलती का एहसास बुद्धिमानी से करवाना होगा…जिस से वह सोचने पर मजबूर हो कि वह गलत है, उसे ऐसा नहीं करना चाहिए.’ सुगंधा का बिखरा कमरा समेटते हुए रेवती सोचती जा रही थी.

शाम घिर आई थी…सुबह 11 बजे के निकले नरेंद्र अभी तक नहीं लौटे थे… अचानक बजी कालबेल ने उस का ध्यान खींचा. दरवाजा खोला तो नरेंद्र थे…हाथों में 4 बडे़बडे़ पैकेट लिए.

‘‘सुगंधा आ गई क्या?’’ नरेंद्र ने बेसब्री से पूछा.

‘‘नहीं…’’

‘‘आप कहां रह गए थे?’’

उस के प्रश्न को अनसुना कर के नरेंद्र बोले, ‘‘रेवती, जरा पानी ले आओ… बड़ी प्यास लगी है.’’

गिलास में पानी भरते समय उस के मन में कई प्रश्न घुमड़ रहे थे.

‘‘क्या है इन पैकेटों में?’’ गिलास पकड़ाते हुए उस ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘तुम खुद देख लो,’’ नरेंद्र ने संक्षिप्त उत्तर दिया, ‘‘और सुनो, मेरा सामान दे दो…मैं जरा उन्हें ट्राई कर लूं… फिर तुम भी अपना सामान ट्राई कर लेना.’’

रेवती की हंसी कमरे में गूंज गई, ‘‘ये क्या, अपने लिए आसमानी रंग की पीले फूलों वाली शर्ट लाए हो क्या?’’ वह हंसती हुई बोली.

नरेंद्र ने उस के हाथ से शर्र्ट खींच कर कहा, ‘‘हां भई, हमारी लाड़ली फैशनपरस्त है. अब तो उस के पापा भी फैशनपरस्त बनेंगे तभी काम चलेगा.’’

‘‘और यह मजेंटा कलर का बरमूडा…यह भी आप का है?’’ रेवती के पेट में हंसतेहंसते बल पड़ रहे थे.

‘‘यह हंसी तुम संभाल कर रखो… अभी कहीं और न हंसना पडे़…ये देखो… तुम अपनी डे्रस देखो.’’

‘‘ये…ये क्या?’’ रेवती चौंक कर बोली, ‘‘आप का दिमाग खराब तो नहीं हो गया…खुद तो चटकीले ऊलजलूल कपडे़ ले आए, अब मुझे ये मिडी पहनाओगे….’’

‘‘क्यों भई, फैशनपरस्त बेटी की फैशनपरस्ती को तो खूब सराहती हो. अब मैं भी तो तुम्हें सराह लूं. चलो, जरा ये मिडी पहन कर दिखाओ.’’

‘‘आप का दिमाग तो सही है…इस उम्र में मैं मिडी पहनूंगी…मुझे नहीं पहननी,’’ रेवती भुनभुनाई.

‘‘चलो, जैसी तुम्हारी मर्जी. तुम्हें नहीं पहननी, न पहनो. मैं तो पहन रहा हूं,’’ कहते हुए नरेंद्र कपड़ों को हाथ में लिए बाथरूम में घुस गए.

‘‘अब समझ आया,’’ रेवती बोली, ‘‘देखें, आज पितापुत्री का युद्ध कहां तक खिंचता है…’’ वह मुसकराई किंतु साथ ही उस के दिमाग में विचार आया…उस ने फटाफट सामान समेटा और किचन में घुस गई.

‘‘ममा…ममा…’’ सुगंधा के चीखने की आवाज उसे सुनाई दी.

‘‘आ गई मेरी लाडली…’’ वह मुसकराती हुई कमरे में आई. सुगंधा की पीठ उस की ओर थी, ‘‘ममा, मेरा पिंक टाप नहीं दिखाई दे रहा. आप ने देखा… और आज आप ने मेरा रूम भी ठीक नहीं किया,’’ कहतेकहते सुगंधा मुड़ी तो हैरानी से उस का मुंह खुला का खुला रह गया, ‘‘ममा, आप मिडी में…वह भी स्लीवलेस मिडी में.’’

क्यों, ‘‘क्या हुआ…क्या तुम ही फैशन कर सकती हो…हम नहीं,’’ नरेंद्र ने पीछे से आ कर कहा.

‘‘ऐं…पापा, आप बरमूडा में…क्या चक्कर है. पापा, आप तो ये ड्रेस चेंज कीजिए. कैसे अजीब लग रहे हैं…और मम्मी आप भी…कोई देखेगा तो क्या कहेगा.’’

‘‘क्यों, क्या कहेगा…यही कि हम 21वीं सदी के पेरेंट्स हैं…तुम्हें इन ड्रेसेस में क्या खराबी नजर आ रही है?’’

‘‘इन ड्रेसेस में कोई खराबी नहीं है,’’ सुगंधा ने सिर झटका, ‘‘कैसे दिख रहे हैं इन ड्रेसेस को पहन कर आप लोग.’’

‘‘मुझे पापा मत कहो, डैड कहो,’’ नरेंद्र बोले.

‘‘ऐं, डैड…’’ सुगंधा चौंकी, ‘‘क्या हो गया है आप को…ममा, पानी ले कर आओ…पापा की तबीयत वाकई खराब है.’’

तब तक रेवती कोल्डड्रिंक की बोतल ले कर पहुंच गई…सुगंधा ने कोल्डडिं्रक देख कर कहा, ‘‘हां, ममा, ये मुझे दो…आप पापा के लिए पानी ले कर आओ.’’

‘‘अरी हट….ये कोल्डडिं्रक तेरे पापा के लिए ही है…कह रहे हैं पानीवानी सब बंद, ओल्ड फैशन है…पीऊंगा तो केवल कोल्डडिं्रक या हार्डडिं्रक…’’

‘‘ऐं… ममा,’’ सुगंधा रोंआसी हो गई, ‘‘यह पापा को क्या हो गया है…’’

‘‘पापा नहीं, डैड…’’ नरेंद्र ने फिर बीच में टोका.

‘‘अरे, छोड़ अपने पापा को,’’  रेवती बोली, ‘‘बोल, आज डिनर में क्या बनाऊं? पिज्जा, बर्गर, सैंडविच, मैगी…या…’’

‘‘ममा, सचमुच आज आप यह सब बनाओगी…’’ सुगंधा खुश हो कर बोली.

‘‘आज ही नहीं, हमेशा ही बनाऊंगी,’’ रेवती ने पलंग पर बैठते हुए कहा.

‘‘क्या मतलब ?’’ सुगंधा फिर चौंकी.

‘‘मतलब यह कि आज से मैं ने  और तेरे पापा ने निर्णय लिया है कि जो तुझे पसंद है वही इस घर में होगा…तुझे अपने पापा से शिकायत रहती है न कि वे तुझे टोकते रहते हैं.’’

‘‘ममा, आज क्या हो गया है आप लोगों को.’’

‘‘हमें कुछ नहीं हुआ है, बेटा,’’ नरेंद्र ने प्यार से कहा, ‘‘हम तो अपनी बेटी के रंग में रंगना चाहते हैं ताकि घर में शांति बनी रहे.’’

‘‘हां, हां…ये बरमूडा और मिडी पहन कर आप लोग घर में शांति जरूर करवा दोगे लेकिन बाहर अशांति छा जाएगी…लोग क्या कहेंगे कि…’’

‘‘यही तो मैं कहता हूं…आज तुम्हें भी समझ आ गई, सू…’’

‘‘हां, आप लोगों को देख कर मुझे यह बात समझ आ रही है कि फैशन उतना ही अच्छा लगता है जो दूसरों की निगाह में न खटके.’’

‘‘मेरी समझदार बच्ची,’’ रेवती भावविह्वल हो कर बोली.

‘‘बेटा…क्या हमारे पास एकमात्र यही रास्ता रह गया है कि बदलते हुए परिवेश से समझौता कर लें या पुराणपंथी दकियानूसी लकीर के फकीर कहलाएं…’’

सुगंधा अवाक् अपने पिता को देख रही थी.

नरेंद्र कह रहे थे, ‘‘तुम लोगों के पास जोश तो है बेटा लेकिन होश नहीं…तुम्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि तुम्हारी पीढ़ी भी कल पुरानी हो जाएगी…तुम्हें भी नई पीढ़ी से ऐसा ही व्यवहार मिलेगा तब तुम्हारी बात कोई सुनने को तैयार नहीं होगा…’’

‘‘ठीक कहते हैं आप…युवा वर्ग और बुजुर्ग आपस में एकदूसरे के पूरक हैं…केवल दृष्टिकोण और कार्यों में दोनों  एकदूसरे से बिलकुल विपरीत हैं,’’  सुगंधा ने कहते हुए सिर हिलाया.

‘‘और इन दोनों में जब आपसी समझदारी हो तो दोनों वर्गों के कार्यों और परिणामों में सफलता मिलनी ही निश्चित  है.’’

‘‘आज से मेरा उलटीसीधी बातों पर जिद करना बंद. मुझे पता होता

कि आप मुझे इतना प्यार करते हैं तो मैं आप को कभी दुखी नहीं करती, पापा.’’

‘‘पापा नहीं, डैड…’’ नरेंद्र की इस बात पर तीनों खुल कर हंस पडे़ और हंसतेहंसते रेवती की आंखें बरस पड़ी यह सोच कर कि उस के समझदार पति ने उसे और उस की बेटी को दिशाहीन होने से बचा लिया.

Story In Hindi : टूटा रोबोट – लावारिस बच्चे को कैसे मिला परिवार

Story In Hindi : छोटे मासूम को देख सुजाता और सारंग उसे अपने साथ रखने की जिद करने लगे, लेकिन कुछ साल बाद यही मासूम उन दोनों की इनसिक्योरिटी का कारण बन गया. पाइन के घने दरख्तों के बीच खुद किसी दरख्त सा खिला था यह घर. पांव तले नम मिट्टी और ऊपर किसी शांत नदी की तरह बहते बादल. देख कर लगता था कि अगर सुकून की कोई महक होती होगी तो हूबहू इस घर जैसी होती होगी. जैसे दूब सारे मौसम अपने ऊपर झेल कर धरती को ढांपे रखती है वैसे ही शहर के तमाम शोरगुल और आपाधापी से दूर सुब्रत बंदोपाध्याय के इस घर को इन दरख्तों ने ढांप रखा था.

कुल 4 लोग थे इस घर में. सुब्रत, उन की पत्नी सुदेशना और 2 बच्चे सुजाता व सारंग. जिंदगी बिना भंवर वाली धारा सी बह रही थी कि एक दिन जाने कहां से एक छोटी सी लहर आ गई. इतवार था उस दिन. घनी पत्तियों के बीच से किसी तरह जगह बना कर निकल भागी धूप की एक पतली सी लकीर बाहर दरवाजे पर खेल रही थी और भीतर सब अपनेअपने पसंदीदा काम में मगन थे. सुब्रत सोफे में धंसे ‘गोरा’ पढ़ रहे थे. सुदेशना शारदा संगीत का अभ्यास कर रही थीं. सुजाता कलरिंग बुक में उल झी थी और सारंग नए रोबोट में.

अचानक सुदेशना को लगा जैसे दरवाजे पर कोई आहट हुई है. उस ने आवाज दी, ‘सारंग, देखो लगता है दरवाजे पर टवी रो रही है. जाओ अंदर ले आओ उसे.’

मम्मी की आवाज सुन कर सारंग ने रोबोट की तरह झटके लेते हुए टुकड़ोंटुकड़ों में गरदन मोड़ी और उसी अंदाज में चलता दरवाजे तक गया. लेकिन वहां उस की प्यारी बिल्ली टवी नहीं, कुछ और था. कुछ ऐसा जिसे देख कर वह भूल गया कि वह पिछले एक घंटे से रोबोट बना हुआ था और अपने नए रोबोट के साथ धरती को बचाने के लिए एक सीक्रेट मिशन पर काम कर रहा था. सारंग सफेद चेहरा लिए दौड़ता हुआ अंदर आया और बिना कुछ बोले खड़ा हो गया.

‘क्या हुआ सारंग? टवी को चोट लग गई?’

‘नहीं पापा.’

‘फिर क्या हुआ?’

‘पापा, टवी तो लिली की झाडि़यों में सो रही है आराम से.’

‘फिर क्या है?’

सुजाता बोली, ‘मम्मी कुछ नहीं है. यह आप का प्यारा सारंग न, इस दुनिया में रहता ही नहीं है. रोबोट और कौमिक्स. जब देखो खयालों के वंडरलैंड में घुसा रहता है. रुकिए, मैं देखती हूं क्या है.’

सुजाता बाहर गई लेकिन ठीक सारंग की तरह दौड़ते हुए भीतर आ गई, ‘मम्मी, वहां एक टोकरी रखी है, बड़ी सी.’

सुब्रत और सुदेशना दोनों एक पल में दरवाजे पर जा पहुंचे. वहां सचमुच बांस की टोकरी रखी थी, जिस के भीतर से एक महीन, मुलायम आवाज छन कर बाहर आ रही थी. सुब्रत ने जल्दी से खोल कर देखा, उस में एक बच्चा था. सफेद, नरम, नाजुक.

दोनों के चेहरे पर एकसाथ यह सवाल तैर गया, ‘यह बच्चा कहां से आ गया?’

दोनों बच्चे सिर के बल गिरतेपड़ते से मम्मीपापा के पीछेपीछे चले आए. सुब्रत ने जब टोकरी खोली तो भीतर लेटे उस नरम, मुलायम जीव को देख कर दोनों सम्मोहित से चीख पड़े, ‘बच्चा!’

‘देखो मम्मी, इस के बाल कित्ते सुंदर हैं, पंख जैसे मुलायम.’

‘अरे, ये तो सच्ची के हैं, पापा. और इस के हाथ देखो आप, ऐसे लग रहे हैं न जैसे गुलाबी रंग की पंखुड़ी हों’ सारंग ने उत्साह में भर कर दीदी की बांह कस कर पकड़ ली, ‘देख दीदी, इस के छोटेछोटे हाथ चल भी रहे हैं.’

दोनों बच्चे एकसाथ बोले, ‘मम्मी, प्लीज, इसे हम ही रख लेते हैं न?’

सुब्रत और सुदेशना कुछ सम झ ही नहीं पा रहे थे. ऐसे कौन छोड़ गया इतने छोटे से बच्चे को और क्यों?

सुब्रत बोले, ‘पुलिस को इन्फौर्म करना पड़ेगा. क्या पता किसी ने बच्चा चुराया हो और डर से या किसी दूसरी वजह से यहां छोड़ गया हो.’

‘हां, लेकिन यह सब बाद में सोचेंगे. पहले आप इसे अंदर ले चलिए. भूखा होगा.’

सुदेशना की बात मान कर सुब्रत टोकरी समेत बच्चे को अंदर ले आए. सुदेशना

ने हौले से उसे बाहर निकाला और गोद में उठा लिया. गोद में आते ही बच्चे

की रुलाई थम गई और वह सुदेशना की बांहों में चिपक कर उन के चेहरे की ओर टुकुरटुकुर ताकने लगा. इस पूरी प्रक्रिया में कुतूहल से भरे बच्चे मम्मीपापा के पीछेपीछे यों चलते रहे जैसे साड़ी के पीछे पल्लू चलता है.

सुदेशना ने बच्चे को जांचते हुए कहा, ‘अरे, कपड़े भी भीग गए हैं इस के. मु झे तो लगा था कि लड़की होगी, बट इट इज अ बौय.’

सारंग की खुशी दोगुनी हो गई, ‘मेरी टीम में एक और रोबोट बढ़ गया. दीदी, तू तो गई काम से. अब हम दोनों मिल कर तु झे चिढ़ाया करेंगे.’

सुजाता ने मुंह बनाया, ‘चल हट, बड़ा आया चिढ़ाने वाला. यह मेरी बात मानेगा. गुड बौय बनेगा. तेरी तरह रोबोट नहीं.’

सुदेशना टोकरी को टटोलने लगी कि शायद उस में कपड़े हों, लेकिन उस में केवल बच्चों वाला एक पतला सा कंबल था और एक मुड़ा हुआ कागज. सुदेशना ने हैरत से सुब्रत को देखा. कागज खोला. घिसटती हुई हैंडराइटिंग में कुछ शब्द लिखे थे उस पर, ‘इस बच्चे की मां इसे जन्म देते हुए दुनिया से चली गई. पिता के बारे में कुछ पता नहीं. इस वक्त आप कुछ मत सोचिए, बस, यह सोचिए कि क्या आप का यह सुंदर घर इस मासूम को छाया नहीं दे सकता.’

घबराई हुई सुदेशना ने वह कागज 2 बार पढ़ा, ‘यह सब है क्या? सुब्रत, क्या लगता है आप को, क्या इस कागज में लिखी बात सच हो सकती है?’

कुछ देर पहले जो घर इतना शांत था, वहां इस मासूम लहर के आने से सवालों के, कशमकश के तूफान उठ खड़े हुए थे. सुब्रत और सुलोचना यह तय ही नहीं कर पा रहे थे कि क्या करें? पुलिस को खबर करें या फेसबुक पर पोस्ट डाल दें बच्चे की तसवीर के साथ?

सुदेशना बोली, ‘सुब्रत, पुलिस तो चिल्ड्रनहोम में भेज देगी न इसे. फिर वे लोग अपनी व्यस्तता के हिसाब से इन्वैस्टिगेशन करेंगे. कोई भी नतीजा मिलने तक इसे वहीं रखा जाएगा. यह इतना छोटा सा है, मासूम सा. इन दिनों कैसीकैसी खबरें सुनाई दे रही हैं. दिल नहीं चाह रहा कि इसे वहां भेजें.’

‘लेकिन सुदेशना, पुलिस को खबर करना जरूरी है. हां, इतना हो सकता है कि हम उन से रिक्वैस्ट करें कि जब तक इस के पेरैंट्स नहीं मिलते, इसे हमारे पास रहने दें और अगर वे नहीं मिलते हैं तो हम इसे एडौप्ट कर लेंगे.’

सुदेशना के चेहरे पर मुसकान खिल गई, ‘थैंक्यू सुब्रत. यह ठीक रहेगा. है न बच्चो?’

सारंग चहक उठा, ‘यस मम्मा. और देखो, इस ने भी मेरी उंगली कस कर पकड़ ली है. इस के माने यह भी हमारे साथ रहना चाहता है. लेकिन यह बोलता

क्यों नहीं?’ सुजाता बोली, ‘इसीलिए कहती हूं खिलौनों के अलावा किताबें भी उठा लिया कर कभीकभी. इत्ता छोटा बच्चा बोलता है क्या? उस के तो दांत भी अभी नहीं हैं.’

‘दांत से क्या?’ सारंग ने तर्क किया, ‘दांत तो पड़ोस वाले मेजर अंकल के भी नहीं हैं पर कैसे नौन स्टौप बोलते हैं.’

मम्मी ने सारंग को आंखें दिखाईं, ‘सारंग, बुजुर्गों के बारे में ऐसे बदतमीजी से बोलते हैं क्या, बहुत बिगड़ रहे हो तुम.’

सारंग ने मुर झाए फूल की तरह गरदन झुका ली. सब हंस पड़े. सुब्रत बंदोपाध्याय अपनी पत्नी को देख रहे थे. ममता की कैसी निस्वार्थ गंध फूट रही थी वहां. उस के भीतर जो मां थी, वह इस नए जीवन को देख कर मानो और चौकन्नी हो गई. उस ने फौरन छोटे कपड़ों की खोज में पुराने सूटकेस खंगाल डाले. बच्चे को चम्मच से दूध पिलाया और जब वह सो गया तो एक तृप्ति की निगाह उस पर डाल मुसकरा दी.

‘क्या देख रहे हैं सुब्रत?’

‘यही कि ममता से भरी स्त्री और उस की छांव में सोते बच्चे को देख कर कितनाकुछ सीखा व महसूस किया जा सकता है.’

सुदेशना हंस दी, ‘तो क्या सीखा?’

‘यही कि बच्चा केवल मौजूद क्षण में जीता है. उस के मन में न अतीत का खयाल होता है न भविष्य का. इस वक्त तुम भी ऐसे ही जी रही हो. तुम को नहीं मालूम है कि कल क्या होगा. तुम केवल इस पल में हो और इस पल में जो सब से खूबसूरत भूमिका हो सकती है, उसे जी रही हो.’

‘और आप भी मिस्टर सुब्रत. अब जाइए पुलिस स्टेशन. देखिए, वे लोग क्या कहते हैं.’

एक हफ्ता बीता, फिर दूसरा और फिर तीसरा. पुलिस इन्वैस्टिगेशन में बच्चे के मातापिता के बारे में कोई सुराग न मिला. आखिरकार एडौप्शन की फौर्मलिटी पूरी कर ली गईं और उस बच्चे की किलकारी हमेशा के लिए सुब्रत बंदोपाध्याय के घर का हिस्सा बन गई. सब बहुत खुश थे उस दिन. बच्चा अगू…अगू… की आवाज निकालते हुए अपनी रहस्यमय भाषा में जाने क्या कह रहा था. सारंग टकटकी बांधे उसे देखता रहा, ‘दीदी देखो, यह अपना नाम बता रहा है- अगू.’

सुजाता बोली, ‘फिर कर दी न रोबोटों वाली बात. यह उस का नाम नहीं है. उस का नाम तो हम को सोचना पड़ेगा.’

‘ओह, तो फिर इस का नाम है- पावर रेंजर.’

‘नहीं,’ सुजाता ने उसे कोहनी से ठेला, ‘इस का नाम है माशा.’

सुब्रत बोले, ‘अरे, तुम लोग लड़ना छोड़ो, यह बोलो सत्यजीत कैसा है?’

‘एकदम हिस्टौरिकल, नहीं चलेगा.’

‘तो चलो, मम्मी को फैसला करने दो.’

‘हां, ठीक है. मैं करती हूं फैसला और मेरा फैसला यह है कि आज से इस प्यारे बच्चे का नाम है स्नेहमोय.’

सुजाता उछल पड़ी, ‘वाओ, मंजूर. लेकिन मैं इसे ‘स्ने’ कह कर बुलाऊंगी. कितना स्वेग लगेगा न पुकारते हुए.’

उस दिन लकड़ी के बड़े से फ्रेम में लगी फैमिली फोटो बदली गई. नई तसवीर में सुदेशना की गोद में गुलाबी मुलायम स्नेहमोय मुसकरा रहा था. सुजाता और सारंग उस कुरसी के आजूबाजू लटके हुए थे जिस पर पापा बड़ी शान से बैठे थे. टवी अपनी झबरीली पूंछ को अमन के झंडे की तरह हिलाती पापा की गोद में बैठी थी.

खुशी की इस सोंधी गंध में लिपटे दिन बीतते गए और फिर जैसे चमकती चीजों पर किन्हीं अनजाने रास्तों से आ कर धूल बैठ जाती है, वैसे ही इस खुशी पर तनाव की गर्द न जाने कहां से आ कर बैठने लगी. दोनों बच्चे स्नेहमोय को प्यार करते थे, लेकिन कहीं न कहीं उन को यह लगने लगा था जैसे उन के हिस्से का स्नेह भी स्नेहमोय ले रहा है. जैसे उन का कुछ छिन रहा है. खासतौर पर सारंग, बातबात पर चिढ़ जाता. कभी सीढि़यों के नीचे छिपा सुबकता मिलता तो कभी किसी पेड़ की आड़ में. सुदेशना उसे बुलाती, ‘सारंग, इधर आओ. तुम मु झे प्यार करते हो. करते हो न? तुम्हें तो धरती को बचाने वाला सुपरहीरो बनना है न?’

‘हूं.’

‘तो सुपरहीरो ऐसे चिढ़ते थोड़े हैं. क्यों गुस्सा करते रहते हो? चलो, मु झे बताओ कि तुम्हें क्या परेशानी है?’

दुलारनेसम झाने पर सारंग सामान्य हो जाता, लेकिन जैसे झाड़ने के थोड़ी देर बाद धूल फिर घूमती हुई आ जाती है वैसे ही उस का मूड फिर उखड़ जाता. सुब्रत और सुदेशना सम झ रहे थे कि वह किस तरह के साइकोलौजिकल पेन में हैं, लेकिन यह नहीं सम झ पा रहे थे कि उस पेन से उसे निकालने के लिए वे क्या करें?

‘सुदेशना आजकल तुम्हारे सुर नहीं गूंजते घर में?’ उस दिन अचानक सुब्रत ने पूछा तो सुदेशना डूबीडूबी सी आवाज में बोली, ‘मन ही नहीं होता, सुब्रत. कई बार हमारे भीतर इतना शोर भर जाता है कि बाहर चुप सी पसर जाती है. शायद वह चुप जरूरी भी होती है, क्योंकि उस के बिना हम सम झ ही नहीं पाते कि भीतर के शोर को कैसे रोकें? इन दिनों यही सोच रही हूं कि हमें इस बारे में भी सोचना चाहिए था कि कल को बच्चे स्नेहमोय को ले कर इन्सिक्योर तो महसूस नहीं करेंगे.

मु झे डर है कि यह बेबी राइवलरी कहीं सारंग को ईष्यालु न बना दे. सुजाता तो सम झदार है, फिर भी खी झ जाती है कभीकभी. वह कहती है, आप तो बस स्ने को ही देखा करो.’

सुब्रत किताब के पीछे से झांकते हुए बोले, ‘सुदेशना, तुम अगर खुद इस तरह साइकोलौजिकल पेन महसूस करोगी तो कुछ ठीक नहीं कर पाओगी. यह नौर्मल है. कई बार दूसरे बच्चे को देख कर सैल्फ वर्थ के लिए बच्चे स्ट्रगल करने लगते हैं. लेकिन हमारे लिए अच्छी बात यह है कि सारंग और सुजाता में ईष्या फील नहीं है, वे बस अपने प्यार को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. इसीलिए उस की गलतियां खोजते हैं.’

‘तो क्या करें हम?’ सुदेशना ने परेशान हो कर यह सवाल किया ही था कि सुजाता की आवाज सुनाई दी, ‘मम्मीपापा, आप लोग बिजी तो नहीं हैं?’ सामने सुजाता ऐसा खी झा हुआ चेहरा लिए खड़ी थी कि लग रहा था जैसे आंसुओं की धार बस बहने ही वाली थी.

‘क्या हुआ सुजाता?’

सुजाता ने कोफ्त से कहा, ‘वही पुरानी कहानी है, पापा. मु झे कहते हुए बुरा लग रहा है, बट, कुछ कीजिए इस स्ने का. मेरी स्टडी का सारा सामान तहसनहस कर देता है. अभी मेरे पूरे प्रोजैक्ट पर कलर फैला दिया. कल सबमिट करना है मु झे. अब क्या करूंगी मैं? आप लोग कुछ सम झा नहीं सकते उसे?’

‘वह छोटा है सुजाता. बड़ा हो जाएगा तो नहीं करेगा. तुम और सारंग उस के जितने थे, तब तुम लोग भी यही सब करते थे. और बेटा, इरिटेट होना किसी बात का इलाज नहीं है. तुम को थोड़ा पेशेंस रखना पड़ेगा. वह अभी बस 3 साल का है और तुम 15 साल की. सम झदार होने दो उसे. खुद नासम झ मत बनो.’

अभी सुजाता की नाराजगी का निबटारा हो ही रहा था कि ड्राइंगरूम से चीजों के फेंके जाने की आवाजें आने लगीं. तीनों भाग कर पहुंचे तो देखा, स्ने एक कोने में टवी के पास सहमा हुआ खड़ा है और सारंग अपने सारे खिलौने यहांवहां फेंक रहा है, ‘ले लो, सब तुम ले लो. नहीं चाहिए मु झे कोई खिलौना. लो, तोड़ो इन को भी. आओ, तोड़ो.’ सारंग पूरी ताकत लगा कर

चीखने लगा.

यह तो जाहिर था कि सारंग का यह गुस्सा स्ने की वजह से था पर हुआ क्या था?

मम्मीपापा को देख कर सारंग और जोर से चिल्लाने लगा, ‘उस ने मेरे रोबो का हाथ तोड़ दिया. मेरा पहला रोबो था वह.’

‘वह पुराना हो गया था, सारंग. प्लास्टिक आइटम्स की लाइफ बहुत ही कम होती है, टूट जाते हैं पुराने होने पर.’

‘वह आइटम नहीं था, पापा. बहुत बुरा है ये स्ने. मैं छोटा था तब कभी ऐसा नहीं करता था.’

‘यह बात तुम को कैसे पता? याद है तुम दादाजी के जमाने का रेडियो तोड़ कर छिपा आए थे? स्ने ने अपनी गलती छिपाई तो नहीं.’

सारंग का चेहरा कड़ा हो गया, ‘करिए आप लोग उसी की तारीफ, करिए उसी को प्यार. लेकिन अब कोई भी चैन से नहीं रह सकता इस घर में, खिलौने तक नहीं.’

इन शब्दों के साथ एक सन्नाटा सा पसर गया सब के चेहरे पर, लेकिन दीवार पर लगी फैमिली फोटो तो अब भी खुशी की सोंधी महक में डूबी थी. सुदेशना स्ने को सुलाने चली गई और सुब्रत जाने क्या सोचते हुए बच्चों के कमरे की ओर बढ़ गए, ‘तुम दोनों बहुत गुस्सा हो न स्ने से, लेकिन आज कौन सा दिन है,

याद है?

पापा ने याद दिलाया तो सुजाता और सारंग की आंखों में एकएक पल कौंध गया उस दिन का.

‘3 साल हो गए, पापा. मैं तो भूल ही गई थी उस दिन को.’

‘याद है तुम दोनों ने कैसे जिद पकड़ ली थी कि उसे अपने यहां ही रख लें?’

‘हां पापा, याद है. उस की पंखुड़ी जैसी हथेलियां और पंख जैसे बाल.’

‘और उस का मेरी उंगली को कस कर पकड़ लेना.’

सुब्रत धीरे से बोले, ‘लेकिन अब हमें सोचना पड़ेगा कि उस के लिए क्या करना है. मैं ने और तुम्हारी मम्मी ने सोचा है कि 2 साल बाद उसे बोर्डिंग स्कूल भेज देंगे. उस की बढ़ती शरारतों और तुम लोगों की शिकायत का शायद यही एक सौल्यूशन है.’

यह सुनते ही दोनों बच्चों के चेहरे गंभीर हो गए. लग रहा था कोई खलबली मच गई हो अंदर. दोनों बिना कुछ बोले खिड़की के बाहर देखने लगे. डहेलिया के उस पौधे पर ढेर सारे फूल खिले थे जो स्ने के आने पर मम्मी ने लगाया था. मन में एक अजीब सा शोर मच गया.

‘पापा, हमारी शिकायतों का यह मतलब नहीं था.’

यह कहते हुए एक भीगी सी चुप्पी छा गई उन के चेहरे पर. लेकिन अगले ही पल एक चहचहाती हंसी ने उस चुप्पी को तोड़ दिया. स्ने टूटे रोबो को ले कर उछलता हुआ आया और बोला, ‘दादा, देखो, मैं ने इछके हात पल बाम लगा के पत्ती बांद दी है. अब छब थीक हो जाएगा. है न?’

सारंग ने हंसते हुए स्ने के मुलायम बालों को बिखेर दिया, ‘यस जूनियर रोबो, अब सब ठीक हो जाएगा.’

उस दिन सुब्रत बंदोपाध्याय के कैमरे में ए

क ताजा तसवीर कैद हुई. उस तसवीर में सब से खास था- एक टूटा रोबो जिस ने तमाम टूटती चीजों को जोड़ दिया था.

लेखिका : अनुपमा ऋतु

Family Story Hindi : दानिया – मां को उमर के चंगुल से कैसे निकाला

Family Story Hindi : अब्बू के जाने के बाद दानिया और उस की मां एकदम अकेले पड़ गए जिस का फायदा उमर ने बखूबी उठाया. लेकिन दानिया भी उस से दो कदम आगे निकली और उमर का परदाफाश करने में सफल हो गई.

स्कूल से लौटते हुए दानिया ने दूर से देखा, उस के छोटे से घर से मौलवी उमर मियां जल्दीजल्दी निकल रहे हैं. दानिया के कदम धीमे हो गए, आंखों में पानी आ गया. उस का छोटा सा दिल उदास हुआ. बहुत उदास. स्कूल से घर की दूरी बस 15 मिनट की ही थी पर जिस तरह से स्कूल से निकल कर बच्चे बातें करते, मस्ती करते चलते हैं, उन्हें आधा घंटा लग जाता था.
साथ चलते बच्चों ने टोका, ‘‘जब घर पास आ गया,
तू धीरे चलने लगी?
जल्दी चल.’’
‘‘तुम लोग जाओ, मैं चली जाऊंगी, कुछ सामान लेना है. अम्मी ने आते हुए लाने के लिए कहा था, ले कर आती हूं,’’ कहतेकहते दानिया ने रास्ता बदला और कुछ दूरी पर एक दुकान के बाहर खाली जगह देख कर बैठ गई. वैसे तो आजकल जब से सब के हाथों में फोन आया है, भले ही फोन सस्ता सा हो, बचपन का समय कम हो गया है और दानिया की बात कुछ अलग ही थी, 15 साल की दानिया को वक्त और हालात ने समय से पहले बहुत बड़ा कर दिया था. सांवली रंगत पर तीखे नैननक्श. अपने सुंदर बालों की लंबी सी चोटी बांधती. इस समय तो यूनिफौर्म का रिबन भी बांध रखा था. छोटा सा सरकारी स्कूल था जहां दानिया बचपन से पढ़ रही थी. उत्तर प्रदेश के कैराना कसबे में ही पैदा हुई थी.

3 साल पहले तक दानिया अपने अब्बू और अम्मी के साथ हंसीखुशी रहती थी पर जब से कोरोना महामारी उस के अब्बू को लील गई तब से जो हो रहा है वह तो न कभी उस ने सोचा होगा, न उस की अम्मी अदरा ने. 35 साल की अदरा पर जैसी मुसीबत आई थी, उस की कल्पना भी कभी कोई स्त्री नहीं करती.

जब भी दानिया उमर को देखती, उस का मन करता, इसे खत्म कर दे, इस का वह हाल करे कि उमर जैसे धर्म के ठेकेदार बुरे कामों से तोबा कर लें पर ऐसा कब होता है. धर्म के ठेकेदारों की चांदी तो हर युग में रही है. अगर फायदा ही न हो तो धर्म की ठेकेदारी ही की क्यों जाए. उसे अपने अब्बू याद आने लगे. बहते आंसुओं को पोंछ वह फिर उमर और अपनी अम्मी के बारे में सोचने लगी. करीब 40 साल का पतलादुबला, शातिर, थोड़ी बड़ी दाढ़ी, सिर पर हमेशा सफेद टोपी, मजहब के उपदेश देने वाला, मीठीमीठी बातें कर के सामने वाले को लूटने वाला उमर अपनी पत्नी शाहीन के साथ आराम से गुजरबसर करता, मसजिद में बैठा रहता.

वह घरों में जा कर बच्चों को कुरान पढ़ाता. उस के घर में भी कुरान पढ़ने वाले बच्चों की भीड़ लगी रहती. दूर से देखने पर वह एक बहुत अच्छा इंसान लगता पर उस का असली रूप कुछ और था जो उस की पत्नी नहीं जानती थी, उस का 8 साल का बच्चा अमान तो क्या ही जानता. शाहीन कम पढ़ीलिखी, परदे में रहने वाली, बाहर की दुनिया से पूरी तरह बेखबर, शौहर को सबकुछ मानने वाली औरत थी. उसे लगता, उस का शौहर रातदिन लोगों को दीनी तालीम देने में जुटा है.

जब दानिया के अब्बू नहीं रहे, घर में ऐसी तंगहाली हुई कि मांबेटी के खाने के लाले पड़ गए. उस के अब्बू एक दुकान में टेलर ही थे. कितनी जमापूंजी हो सकती थी. भूखे रहने की नौबत आ गई तो अदरा मौलवी उमर के पास जा पहुंची. उमर को ऐसे ही मौकों की तलाश रहती थी. वह ऐसी जरूरतमंद औरतों की मदद करने के बहाने उन्हें देह व्यापार में धकेल देता. पूरा गिरोह यही काम करता. औरतें बदनामी के डर से चुप रह जातीं और इस दलदल में बुरी तरह फंसी रहतीं.

शाहीन की तरह अदरा भी कम पढ़ीलिखी थी वरना यह नौबत न आती. उस के मायके में भी उस का विवाह आम घरों की तरह एक काम की तरह निबटा दिया गया था पर उस के शौहर शौकत अपनी बेटी दानिया को पढ़ालिखा कर पैरों पर खड़ा करना चाहते थे.

यह कल्पना कर के कि अभी उस की अम्मी के साथ उमर क्या कर के निकला होगा, दानिया को उबकाई आने को हुई. आजकल यही होता था, कभी उमर आ कर अदरा के साथ संबंध बनाता, कभी किसी को भी रात में भेज देता. एक कमरे के बहुत छोटे से घर में पार्टिशन के लिए बीच में चादर डाल दी गई थी. दानिया को सोता हुआ बन जाना पड़ता था पर चादर के उस पार से आ रही आवाजें दानिया का दिल दहलाए रखतीं. कभीकभी रात को अदरा को किसी के पास ले जाने के लिए उमर खुद आ जाता.

घर अब खानेपीने की चीजों से भरा रहने लगा था. दानिया को किसी चीज की कमी नहीं थी. आसपास के लोगों को दिखाने के लिए उमर यों ही कपड़ों की गठरी लाता-ले जाता रहता जिस से लगे कि अदरा कपड़े सिलती रहती है. सब को यही लगता कि मौलवी साहब एक गरीब औरत की मदद कर रहे हैं. दानिया को खयाल आया कि अम्मी खाने के लिए उस का इंतजार कर रही होंगी, वे दोनों खाना साथ ही खाती थीं. वह उदास सी घर चल दी. घर जा कर दानिया ने अदरा को लस्तपस्त पड़े देखा. चौंक कर अपना बैग एक तरफ फेंका उस ने. अम्मी से लिपट गई, ‘‘क्या हुआ अम्मी?’’ और रोने लगी.

अदरा थकी सी उठ कर बैठी और बेटी के गले लग कर जोरजोर से रोने लगी. दोनों मांबेटी एकदूसरे से लिपटी रोती रहीं. वे दोनों ही नहीं, घर की जैसे हर चीज रो रही थी- दीवारें भी उदास थीं. इस घर ने 3 जनों का हंसताखेलता समय देखा था. अब मांबेटी की बरबादी यह छोटा सा घर भी नहीं देख पा रहा था, हर तरफ उदासी थी.

घर सिर्फ ईंट, सीमेंट से ही नहीं बना होता, घर में रहने वालों के दिल से भी ऐसा जुड़ा होता है कि जब किसी सुखी घर में जाओ तो साफसाफ महसूस होता है कि घर में एक सुख है, शांति है. दानिया ने रोते हुए पूछा, ‘‘अम्मी, हम यहां से कहीं जा नहीं सकते?’’

‘‘काफी कोशिश की थी, बेटा पर जब तुम्हारे अब्बू चले गए तो रिश्तेदारों ने भी पलट कर नहीं पूछा, कहीं हम मांबेटी की जिम्मेदारी उन पर न आ जाए. कहां जाएं, कहीं कोई नहीं है और इस उमर के हाथ बहुत लंबे लगते हैं. बस, तुम्हें पढ़ालिखा दूं. पर बेटा, अब थक चुकी, बरदाश्त नहीं होता,’’ कहतेकहते अदरा फिर एक बच्ची की तरह बेटी के सीने लग गई तो बेटी का दिल भी ममत्व से भर गया. बेटी जरा सी भी बड़ी हो जाए तो वह मां की मां बन जाती है. दानिया ने मां के सिर को सहलाया, ‘‘अम्मी, चिंता न करो, मैं कुछ करती हूं.’’
‘‘न, न, बेटी. इन से बची रहना. इन लोगों के सामने भी न आना. मैं ने बहुत सख्ती से उमर से कह रखा है कि तुम्हारे साथ कुछ बुरा नहीं होना चाहिए.’’
‘‘ठीक है, अम्मी, देखते हैं. आओ, खाना खा लेते हैं. मैं हाथ धो कर कपड़े बदल कर आती हूं, फिर खाना लगाती हूं.’’ दोनों मांबेटी चुपचाप खाना खाती रहीं. दोनों ही पता नहीं क्याक्या सोचती रहीं. पसरा सन्नाटा घर को और उदास करता रहा.

कैराना की सीमा से बाहर निकल कर थोड़ीथोड़ी दूर पर छोटेछोटे ढाबे, कुछ अच्छे होटल, बार खुल गए थे. अब लोग वीकैंड में यहां खानेपीने को जाने लगे थे. इन्हीं में से एक बार एंड रैस्टोरैंट था, ‘चेतन बार’. इस के मालिक कपिल ने इस का नाम अपने बेटे चेतन के नाम पर रखा था जो करीब 22 साल का था. अमीर लड़कों के सारे ठाटबाट के साथ जीता था वह. देखने में अच्छा था वह. जब भी दानिया के स्कूल की छुट्टी होती, बाहर खड़े लड़कों में अपने मवाली ग्रुप के साथ चेतन भी खड़ा होता और दानिया को देखने के लिए रुका रहता.

दानिया के स्कूल और घर के रास्ते के बीच में थी कपिल की कोठी. यों ही आतेजाते दानिया को देख कर चेतन का दिल उस में अटक गया था. अब तक जब भी दानिया की नजरें उस से मिलीं, दानिया की आंखों में एक रुखाई थी पर अब जब वह चेतन की आंखों में अपने लिए एक चाहत महसूस कर चुकी थी, दानिया के मन में बहुतकुछ चलता रहता.

वह अपनी उम्र की लड़कियों से ज्यादा चतुर हो चुकी थी, ज्यादा सजग. आसपास के लड़कों से भी उस की अच्छी दोस्ती थी. वह सब से हंसतीबोलती चलती. लोग उसे पसंद करते. उस की इमेज एक अच्छी, शरीफ लड़की की थी. छोटे कसबे में जो भी इन मांबेटी से परिचित थे, सब मांबेटी के हौसले की तारीफ करते पर इन का दुख कोई नहीं जानता था. अपने दुखों की हवा भी मांबेटी ने किसी को लगने नहीं दी थी. समाज ऐसे लोगों से भरा हुआ है जो अपने दुख चुपचाप पीते हैं. ऐसे लोग जान चुके होते हैं कि दुख बांटा तो भारी पड़ेगा.
एक दिन उमर कपिल को ले कर अदरा से मिलवाने आया हुआ था. उस दिन दानिया स्कूल से जल्दी घर लौट आई थी. उसे अपनी तबीयत कुछ खराब लग रही थी. वह जैसे ही अंदर आई, उमर और कपिल चौंक पड़े. नई उम्र का भोला, मासूम चेहरा दोनों को अपने काम का लगा. दानिया ने उन पर दूसरी नजर नहीं डाली. किसी से कुछ न कहा. उस के सीने में फिर एक आग लगी. मां का डरा हुआ दयनीय चेहरा देखा, बीच की चादर खींची और अपने बिस्तर पर लेट गई.

उमर और कपिल ने आपस में इशारा किया और निकल गए. उमर ने जातेजाते अदरा के हाथ में कुछ रुपए देते हुए कहा, ‘बाद में फोन करूंगा.’ अपने काम के लिए उमर ने उसे एक सस्ता फोन भी ले कर दे दिया था. दानिया ने यह भी महसूस किया कि जिन निगाहों से कपिल और उमर ने अभी उसे देखा था, वह शायद आगे अपनेआप को भी बचा न सके. वह अम्मी की तरह किसी मुसीबत में फंस सकती है. दोनों के जाते ही दानिया ने उठ कर बीच की चादर हटा दी. अदरा ने उस के हाथ को छू कर देखा, ‘‘जल्दी आ गई, तबीयत तो ठीक है?’’
‘‘शायद पीरियड होने वाला है. पेट में बहुत दर्द था. टीचर से बोल कर आ गई. यह नया आदमी कौन था?’’
‘‘चेतन बार वाला.’’
दानिया चौंकी, कहा कुछ नहीं.
दानिया अब हर समय यह सोचने लगी कि अपनी अम्मी को कैसे इस मुसीबत से बाहर निकाले. दिमाग चलता रहता, मंसूबे बनाती रहती. बाहर निकल कर कपिल ने उमर से कहा, ‘‘मां को तो देख ही लेंगे, मु झे अपने बार के लिए यह लड़की चाहिए. उसे बारगर्ल की नौकरी करने के लिए बोल दो. ऐसी लड़की बार में रहेगी तो मु झे बहुत फायदा होगा.’’
‘‘नहीं, साहब. लड़की तो कुछ नहीं करेगी. उस की मां ने मना किया है. लड़की को कुछ कहा तो वह तूफान खड़ा कर देगी.’’
कपिल ने एक भद्दा ठहाका लगाया, कहा, ‘‘और तुम मां से डर गए?’’
उमर कुछ बोला नहीं, सोचता रहा.
कुछ दिनों बाद उमर ने अदरा के सामने दानिया के लिए बारगर्ल की नौकरी का प्रस्ताव रखा. अदरा भड़क गई. उमर ने कहा, ‘‘अरे, तुम चिल्ला क्यों रही हो? बारगर्ल का मतलब धंधा करना थोड़े ही होता है. काउंटर पर ही तो खड़े होना है. वेटर की तरह सम झ लो.’’
‘‘मु झे कुछ सम झाने की जरूरत नहीं है. मेरी बेटी अभी पढ़ेगीलिखेगी. उस से दूर रहो.’’ उमर चला गया, जातेजाते कह गया, ‘‘अपनी बेटी से भी एक बार पूछ लेना.’’

दानिया आई तो अदरा ने सब बताया. वह कुछ देर सोचती रही, फिर बोली, ‘‘शाम को थोड़ी देर ही जाना है न. खाली ही रहती हूं, कुछ कमा लूंगी. शायद आप को फिर यह सब न करना पड़े.’’
‘‘नहीं बेटा, इन लोगों से दूर ही रहो.’’
‘‘पर साथसाथ काम करती रहूंगी तो मैं शायद आप को इस मुसीबत से बचा सकूं. मु झे आप का साथ चाहिए. ये लोग खतरनाक हैं, जानती हूं लेकिन मु झे कोशिश करने दें अम्मी. मु झ पर यकीन करो, मैं बहुतकुछ सोच चुकी हूं. मु झे थोड़ा बाहर निकलने दें. मैं आप की मदद करना चाहती हूं. घर और स्कूल ही करती रही तो आप को इस से निकाल नहीं पाऊंगी. मु झे बाहर जाने दें.’’
‘‘पर तू सोच क्या रही है? इन से कैसे सामना कर सकते हैं? कैसे बच सकती हूं?’’ कहतेकहते अदरा की आंखें भर आईं. आगे थकी सी बोली, ‘‘ठीक है, पर संभल कर रहना.’’

चेतन और दानिया आंखों ही आंखों में बहुतकुछ कहसुन चुके थे. चेतन का इश्क जोर मार रहा था. दानिया के दिल में चेतन की चाहत के अलावा भी बहुतकुछ था या यह भी कह सकते हैं कि और कुछ ज्यादा था. उस का ध्यान इस समय प्यारमोहब्बत में नहीं, यहां से अपनी अम्मी को बाहर निकालने में था. उस दिन वह जानबू झ कर अपने दोस्तों के साथ नहीं निकली, थोड़ी देर से निकली.
अप्रैल के दिन थे. बहुत तेज गरमी में अपना सिर और मुंह ढके वह चेतन को देख कर जरा धीरे चलने लगी जिस का रोज इस समय दानिया को देखने का नियम बन गया था. वह एक कोने में पान की दुकान पर खड़ा रहता. आज वह दानिया को अकेले देख कर उस के साथसाथ धीरेधीरे चलने लगा. छोटी जगहों में ऐसे मौके या तो बहुत कम मिलते हैं या जानबू झ कर दिए जाते हैं.
दानिया एक सुनसान सड़क पर मुड़ गई. चेतन हैरान हुआ. एक पेड़ के नीचे जा कर दानिया ने खड़े हो कर अपना चेहरा अपने दुपट्टे से साफ किया. चेतन अपलक उस की तरफ देख रहा था. दानिया का चेहरा उसे उस समय दुनिया का सब से सुंदर चेहरा लगा. उस के देखते रहने से इस बार दानिया शरमा गई जिस से चेतन उस पर और कुरबान हुआ. आज पहली बार बोला, ‘‘तुम्हारा क्या नाम है?’’
दानिया को हंसी आ गई, बोली, ‘‘नाम भी नहीं पता और दीवाने की तरह खड़े रहते हो?’’
चेतन भी हंस दिया, बोला, ‘‘नाम से क्या होता है?’’
‘‘बहुतकुछ होता है.’’
‘‘तुम्हें मेरा नाम पता है?’’
‘‘हां.’’
‘‘कैसे?’’
‘‘जैसे तुम्हें पता था मेरा नाम. तुम पूछने की ऐक्ंिटग ही तो कर रहे थे.’’
चेतन जोर से हंस दिया, ‘‘बहुत तेज हो. मतलब, तुम्हें भी मेरा नाम तुम्हारे दोस्तों ने पता कर के बताया है.’’
‘‘तुम डरे नहीं मेरे नाम से?’’
‘‘न, इस में डरने की क्या बात है? ऐसे ही मिलती रहोगी मु झ से? तुम्हारी अम्मी कपड़े सिलती हैं न?’’
‘‘बहुत पूछताछ करवा ली.’’
‘‘छोटी सी तो जगह है. सब तो जानते हैं एकदूसरे को.’’
‘‘अब जा रही हूं, कल तुम्हारे पापा हमारे घर आए थे. तुम्हारे बार में नौकरी करने के लिए कह रहे थे,’’ कहतेकहते दानिया का चेहरा बहुत उदास हो गया, ‘‘अब शायद तुम से वहीं मिलना हुआ करेगा. हम तो गरीब लोग हैं, जहां काम मिलेगा, वहीं कर लेंगे.’’

चेतन को यह सुन कर बहुत दुख हुआ. दानिया को बस यही देखना था कि चेतन को उस के दुख से दुख होता है या नहीं. दानिया को राहत मिली. उस की आगे की प्लानिंग पर चेतन का स्वभाव बहुत निर्भर करता था. चेतन ने कहा, ‘‘अगर तुम बार में आती भी हो तो मैं तुम्हारा ध्यान रखूंगा. शाम को मैं भी वहां होता हूं. तुम्हें देख
भी लिया करूंगा, तुम्हारा ध्यान भी रख लूंगा.’’
‘‘यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात होगी. हम मांबेटी का तो कोई है नहीं,’’ कहते हुए दानिया ने अपने आंसू पोंछे जो निकले ही नहीं थे.
चेतन गंभीर हुआ, बोला, ‘‘चिंता मत करो. पापा भी उमर मियां के साथ मिल कर काफी अच्छे काम करते रहते हैं. उमर मियां ने ही बताया होगा कि तुम्हारे यहां पैसे की तंगी है, अब तुम चिंता मत करो.’’

दानिया ने मन में सब को गालियां दीं पर उदास बनी रही. शाम को उमर ने अदरा को फोन किया, ‘‘दानिया से पूछा, काम करेगी वह?’’

तब तक दानिया अपनी सहमति दे चुकी थी. तय हुआ कि एक आदमी दानिया को बाइक से ले जाया करेगा, छोड़ कर भी जाएगा. दानिया को कुछ आधुनिक कपड़े ले कर दे दिए गए. बार में जाने वाले पहले दिन मांबेटी एकदूसरे के गले लग कर बहुत रोईं पर दानिया ने बहुत हिम्मत रखी. उस ने कहा, ‘‘अम्मी, अब देखना आप, एक महीना भी नहीं लगेगा, मैं सब संभाल लूंगी. उमर को मैं सबक सिखाऊंगी.’’

पहले दिन जब वह चेतन बार गई, चेतन उसे एक टेबल पर बैठे ही दिख गया. वह शाम को यहीं रहता था. कपिल ने सोचा था कि दानिया को बारगर्ल के साथसाथ और भी बहुतकुछ बना कर रखेगा पर ऐसा न हो, इसलिए दानिया ने पहले से ही चेतन को अपनी अदाओं, प्यार में गुलाम सा बना लिया था. चेतन को उस के सिवा अब और कुछ न दिखता.

दानिया आधुनिक कपड़ों में चमक गई थी. चेतन की निगाहें उस पर से हट ही नहीं रही थीं. दानिया ने काम सम झ कर सब संभाल लिया. वहां के 2-3 लोगों को चेतन ने पता नहीं क्या कहा था कि अब दानिया की तरफ उठने वाली नजरों में अश्लीलता नहीं थी. दानिया सब देखसम झ रही थी. पहला दिन ठीक तरह से बीत गया. 10 बजे रात को उसे घर छोड़ आया गया.

अदरा कहीं बाहर गई थी. दानिया को अपने सीने पर फिर एक बो झ सा महसूस हुआ. आज ही चेतन ने भी उसे एक फोन दे दिया था. वह फ्रैश हो कर चेतन से मीठीमीठी पर दुखी, उदास बातें करने लगी. उस ने महसूस किया कि चेतन कोमल दिल रखता है.

अदरा एक घंटे बाद थकी सी आई. अपनी अम्मी की हालत देख कर दानिया की आंखें भर आईं. उमर के लिए दिल में नफरत के अलाव धधक उठे. दोनों एकदूसरे से कुछ देर तक कुछ नहीं बोलीं. फिर कपड़े बदल कर अदरा दानिया के पास ही लेट गई. उस के बार के काम के बारे में पूछती रही, तसल्ली करती रही कि दानिया के साथ सबकुछ ठीक तो रहा.

कुछ दिन और बीते. चेतन कुछ और दीवाना हुआ. सब को ताकीद कर दी कि दानिया के साथ कुछ भी गलत न हो. दानिया इस चिंता से आजाद हुई तो और अच्छी तरह काम संभाल लिया. वह बार में 3 घंटे ही रहती. अब तो चेतन ही उसे अपनी बाइक पर कभीकभी छोड़ देता. दानिया उसे सचमुच बहुत अच्छी लगने लगी थी. दानिया उसे अपने दुखड़े सुनाती रहती. चेतन का दिल और हमदर्दी से भर जाता. एक दिन चेतन ने उस से पूछा, ‘‘कहीं बाहर चलें, पानीपत चलते हैं, कुछ घूम कर आते हैं?’’

‘‘मुझे ऐसी लड़की मत सम झना, चेतन. मेरे सामने बहुत काम हैं जो मु झे अपनी खुशियों से पहले पूरे करने हैं. सबकुछ उस के बाद सोचूंगी.’’
‘‘अब तो सब ठीक है न? तुम्हें 3 घंटे के हिसाब से पापा अच्छे पैसे देते हैं.’’
‘‘हम कितनी मुश्किल में हैं, चेतन, तुम सोच भी नहीं सकते?’’
‘‘प्लीज, मु झे दोस्त ही समझ कर बता दो.’’
‘‘यह हम मांबेटी का सच और दुख है, इसे मैं किसी से बांटना नहीं चाहती.’’
चेतन का मुंह उतर गया. दानिया ने फिर मुलायम, उदास स्वर में कहा, ‘‘क्या मैं तुम्हें सचुमच अपना दोस्त मान सकती हूं?’’
‘‘हां, अगर मु झ पर विश्वास कर सको. मैं तुम्हारे किसी भी काम आ गया तो मु झे बहुत खुशी होगी.’’

ऐसा नहीं था कि चेतन का पहले किसी लड़की से संबंध नहीं रहा था. अमीर था, सुविधाएं थीं. उस ने 2 लड़कियों के साथ टाइम पास किया था पर दानिया से उसे सचमुच लगाव हो गया था. उस की उदासउदास, सुंदर, बड़ीबड़ी आंखें हमेशा उसे अपनी तरफ खींचतीं. वह अब यह सोचने लगा था कि दानिया के साथ ज्यादा दूर तक तो नहीं चल पाएगा, बहुत सारे मसले होंगे पर जब तक साथ है, वह दनिया के लिए अब सबकुछ करने का मन बना चुका था.

चेतन ने दानिया का हाथ पकड़ा और चूम लिया. दानिया का तनमन पहली बार किसी पुरुष स्पर्श से लहरा सा गया. उस के अंदर अचानक कुछ पिघलने सा लगा. वह एक जादू में घिर गई. इस उम्र के भी अपने ही रंगढंग हैं. चेतन ने प्यार से कहा, ‘‘मु झे बताओ, क्या दुख हैं तुम दोनों को?’’
इस समय दोनों दानिया के घर से कुछ ही दूर थे. चेतन ने रास्ते में बाइक रोक रखी थी. रात के अंधेरे में दानिया उमर के सब कारनामे बताती चली गई. चेतन सांस रोके, हैरान, बुत सा बना सुनता रहा. दानिया के आंसू अंधेरे में चमके तो चेतन को होश आया. उस ने हाथ बढ़ा कर उस की आंखें पोंछी. उस के कंधे पर हाथ रखा, ‘‘यकीन करना मुश्किल है, कैसे लोग हैं आसपास. मु झे बताओ, कैसे तुम्हारी हैल्प करूं?’’
‘‘चेतन, मैं उमर से बदला लेना चाहती हूं, अम्मी को यहां से दूर ले जाना चाहती हूं.’’
‘‘कैसे ले पाओगी बदला?’’
‘‘मैं ने सब सोच लिया है, साथ दोगे?’’
‘‘हां, बोलो.’’
कपिल का आसपास के कई शहरों में बिजनैस था. वे अकसर टूर पर रहते. मां अमिता भजनकीर्तन में समय बिता देती. चेतन इकलौता लड़का था, दिन में कालेज जाता, कभी नहीं भी जाता. उसे आगे बिजनैस ही देखना था. उस के ऊपर फिलहाल कम ही जिम्मेदारियां थीं. उस ने सोचा, अभी वह आराम से दानिया की हैल्प कर सकता है.
‘‘बोलो, दानिया, क्या करना है,
उमर का परदाफाश करना है, सब को बता दें?’’
‘‘कोई जल्दी यकीन नहीं करेगा. धर्म की बड़ीबड़ी बातें करने वालों की समाज में बड़ी इज्जत होती है. लोग इन जैसों के पीछे पागल हैं. देखा नहीं तुम ने, हमारे धार्मिक गुरु हों या तुम्हारे, कैसेकैसे कांड कर के खुलेआम मजे करते हैं. मु झे उमर के बेटे अमान को किडनैप करना है और अपनी अम्मी को बचाना है.’’
चेतन कुछ सोच रहा था. दानिया उसे सोचों में घिरे देख परेशान हो गई, कहीं चेतन पीछे हट गया तो बड़ी मुश्किल होगी. उस ने फौरन चेतन के कंधे पर सिर रख दिया, ‘‘चेतन, मु झे पहली बार ऐसा दोस्त मिला है जिस से मैं ने अपने दुख बांटे हैं. तुम मेरी हैल्प नहीं भी करोगे तो भी मैं उमर से बदला तो ले कर रहूंगी.’’
नाजुक सी लड़की ने लड़के के कंधे पर सिर रखा हुआ था. लड़की उदास थी. लड़का कैसे न मानता. चेतन ने दानिया का चेहरा उठा कर उस के गाल चूम लिए. दानिया ने चूमने दिए.
चेतन ने कहा, ‘‘जैसा कहोगी, हो जाएगा. बताना, क्या सोचा है, क्या करना है. अभी तुम्हें घर छोड़ देता हूं.’’

दानिया ने चैन की सांस ली. चेतन ने दानिया को ऊपर से नीचे तक देखा, इस समय वह रैड टौप और ब्लू जीन्स में थी. बालों को उस ने ऊपर कर के बांधा हुआ था पर बाल फिर भी इधरउधर बिखर गए थे. चेहरे पर परेशानी थी पर फिर भी रंगत पर एक चमक थी. दानिया ने पूछ लिया, ‘‘क्या देख रहे हो?’’
‘‘देख रहा हूं कि एक नाजुक सी लड़की अपनी अम्मी को बचाने के लिए क्याक्या करने को तैयार है.’’
‘‘हां, तैयार तो हूं.’’
‘‘ठीक है, चलो. आगे प्लान करते हैं, कैसे क्या करना है,’’ कहते हुए चेतन ने उसे अपनी आगोश में ले लिया. दानिया भी उस के सीने से जा लगी. इस समय उसे कोई खौफ नहीं था, इस से ज्यादा सड़क पर कुछ और हो भी नहीं सकता था. अदरा की हालत ने सचमुच दानिया को बहुत होशियार बना दिया था.

अब दानिया रातदिन यही सोचती रहती कि कैसे क्या करना है. चेतन से भी इस बारे में बात करती रहती. 8 साल का अमान बहुत शरारती बच्चा था. दानिया के घर से कुछ ही दूर एक खेल का मैदान था जहां आसपड़ोस के बच्चे शाम को खेला करते. कुछ लोग टहलते रहते. कुछ किसी पेड़ के नीचे बैठ कर महफिल जमाए रखते. बड़े शहरों की तरह अभी यहां लड़केलड़कियां साथ नहीं दिखते थे. कसबाई माहौल था. प्यारमोहब्बत अब फोन पर या छिप कर ही चला करती.

अमान दानिया को पहचानता था. कई बार उमर उसे और अपनी पत्नी को अपने साथ दानिया के घर ले आता जिस से आसपास वालों को कुछ शक न हो. दानिया ने जब सब प्लानिंग कर ली. चेतन से सब तय हो गया. उस ने अदरा से बस इतना ही कहा, ‘‘अम्मी, हमारी मुसीबत खत्म होने ही वाली है. हम दोनों बहुत जल्दी यहां से निकल जाएंगे.’’ अदरा पूछती रह गई पर इस से ज्यादा दानिया ने कुछ नहीं कहा. बस, अम्मी के गले लग गई और कहा, ‘‘मुझ पर यकीन करना, बस.’’

दानिया ने अगले 2 दिनों की स्कूल की छुट्टी ले ली थी. अदरा के पूछने पर इतना ही कहा, ‘‘कुछ जरूरी काम है. बाहर जा रही हूं. कोई पूछे तो कह देना, मेरी तबीयत खराब है.’’ चेतन अब उस से कई बार कह देता था कि बार भी रोजरोज आने की जरूरत नहीं है. पापा हों, तो शक्ल दिखा देना कि तुम काम कर रही हो. वहां सब मेरे ही आदमी हैं. जो कहूंगा, वही बोलेंगे.’’

इस बात से दानिया को बहुत राहत हो गई थी. तय हुआ था कि पार्क के माहौल का जायजा ले कर दानिया सबकुछ चेतन को बता देगी. अमान के सामने नहीं जाएगी वरना अमान बाद में सब को बता सकता था कि दानिया उसे ले गई थी. दानिया ने दूर से नोट किया कि अमान रोज घर जाने से पहले आइसक्रीम खाता है. बाकी बच्चे उस से आगेआगे चले जाते हैं. अमान थोड़ा आराम से आइसक्रीम खाता हुआ चलता है.

यही समय चेतन ने अमान को किडनैप करने का चुना. उस के 2 दोस्त नीरज और कपिल पहले से पार्क में इधरउधर टहलते रहे. जब अमान घर जाने के समय आइसक्रीम खाता हुआ धीरेधीरे चलने लगा, नीरज ने बहुत तेजी से उस के मुंह पर एक रूमाल रख कर उसे बेहोश किया और पास खड़ी हुई कार में उसे धकेल सा दिया और कार दौड़ पड़ी, जिस में चेतन पहले से बैठा हुआ था. यह पूरा मंजर दानिया ने बहुत दूर से देखा. पहले कदम की सफलता ने उसे जोश से भर दिया.

कैराना से कार से बस 20 मिनट दूर ही शामली में एक पुरानी बस्ती में चेतन के दोस्त राजीव का एक छोटा सा घर खाली पड़ा था. राजीव दिल्ली चला गया था. उस घर की चाबी चेतन के पास ही रहती थी. अमान को वहीं रखा जाना था. चेतन ने अपने यहां काम करने वाले कमल को इस काम में हैल्प के लिए चुना था जो अभी उस घर में चेतन के आने का इंतजार कर रहा था. चेतन अमान को गोद में उठा कर अंदर ले गया. कमल ने उसे अपनी बांहों में ले कर बिस्तर पर लिटा दिया. चेतन ने दानिया को यहां तक पहुंचने का मैसेज डाल दिया. दानिया ने जवाब में थम्सअप की इमोजी भेज दी.

रात में दानिया ने अदरा को सब बता दिया. वह सुन कर घबरा गई पर दानिया ने जब पूरी बात सम झाई तो उसे कुछ तसल्ली हुई. यहां से जाने का मौका दिखा, रातदिन जलते तनमन को सुकून मिलने की उम्मीद दिखी तो बेटी को अपने सीने से लगा लिया. दानिया तो सो गई पर अदरा की आंखों से नींद उड़ी हुई थी. क्या सब ठीक हो जाएगा? क्या सब सचमुच ऐसा ही होगा जैसा दानिया ने सोच लिया है? कहीं उस की बेटी किसी मुसीबत में तो नहीं पड़ेगी?

अगले 2 दिन न तो उमर आया, न अदरा को कहीं जाना पड़ा. सब जगह शोर मच गया कि अमान गायब है. लोग हैरान थे कि इतने शरीफ उमर मियां का क्या कोई दुश्मन हो सकता है? उस की पत्नी का रोरो कर बुरा हाल था. पुलिस तफ्तीश कर रही थी. मैदान में जा कर पूछताछ की गई. आखिरी बार उसे वहीं देखा गया था. दानिया ने अदरा से कहा, ‘‘आप पहले उमर को फोन कर के यहां बुलाओ, उस से बात करूंगी. फिर मु झे चेतन के कुछ और साथियों से भी बात करनी है जो इस समय हमारे साथ हैं.’’

चेतन के बारे में दानिया अदरा को सबकुछ बता चुकी थी. आगे की प्लानिंग पूरी तरह से तैयार थी. अदरा ने उमर को शाम को फोन कर के आने के लिए कहा. दानिया लगातार चेतन के संपर्क में थी. अब सारी मुसीबत खत्म होने का समय आ गया था. उड़ी शक्ल ले कर दुखी सा उमर शाम को आ गया, बीच में लटकी चादर को देखा, इशारे से पूछा, ‘‘दानिया है?’’
‘‘हां, उसे बहुत तेज बुखार है. अमान का कुछ पता चला?’’
‘‘नहीं, सारा कामधंधा ठप हुआ पड़ा है. पता नहीं कौन ले गया है. तुम ने मु झे क्यों बुलाया है?’’ फिर विद्रूप हंसी हंसा, ‘‘क्या तुम्हें भी धंधे की आदत हो गई है. 2 दिन तुम्हें कहीं नहीं भेजा, किसी को यहां नहीं भेजा तो तुम ने मु झे बुलवा लिया.’’
‘‘तुम ने जिस नरक में मु झे धकेला है, वह आदत नहीं, मेरी मजबूरी थी.’’
‘‘अब तो दानिया कपिल को पसंद आ गई है.’’
इतने में दानिया एक कोने से निकल कर आई, ‘‘मु झे पता है, अमान कहां है?’’
उमर को जैसे करंट लगा. वह झटके से खड़ा हो गया. ‘‘क्या बकवास कर रही है, तु झे कैसे पता?’’
‘‘तु झे क्या लगता है, तू हमेशा बेसहारा औरतों को अपने जाल में फंसाता रहेगा, किसी को पता नहीं चलेगा?’’
‘‘अमान कहां है? तु झे तो ऐसा मजा चखाऊंगा कि याद रखेगी. मेरे सेठ लोग तेरा क्या हाल करेंगे, तू सोच भी नहीं सकती.’’
‘‘तू सोच सकता है कि तेरे बेटे के साथ क्याक्या हो सकता है?’’
‘‘तू चाहती क्या है?’’
यही कि तू मु झे इतने पैसे दे कि मैं अपनी अम्मी के साथ यहां से निकल सकूं और फिर हमें तेरी शक्ल कभी न दिखे.’’
‘‘मैं पुलिस को बताता हूं.’’
‘‘चल, मु झे भी बहुतकुछ बताना है.’’

उमर अब डरा. ‘‘मैं पैसे ले कर आता हूं. मु झे अपना बच्चा सहीसलामत चाहिए पर मैं तेरी बात पर यकीन कैसे करूं?’’

दानिया ने अपने फोन में अमान की कई फोटोज दिखाईं. किसी में वह सो रहा था, किसी में रो रहा था.

दानिया ने कहा, ‘‘तू ने पता नहीं कितनी औरतों के साथ बुरा किया है, उन से धंधा करवाता है, समाज के सामने धर्म का ठेकेदार बनता है, तेरी पोल खुलनी ही चाहिए और तू अभी कहीं जाएगा नहीं, फोन पर ही मेरे लिए पैसे मंगवा.’’

उमर ने दांत पीसते हुए मांबेटी को देखा और किसी को फोन किया, ‘‘सेठ, अमान मिल जाएगा, मु झे कुछ रकम चाहिए. इसी समय अदरा के घर भेज दो, जल्दी.’’

आधे घंटे तीनों एकदूसरे को घूरते रहे, सन्नाटा रहा. फिर एक आदमी आया. उमर को एक बैग दिया और चला गया. उमर ने वह बैग दानिया की तरफ फेंका, ‘‘चलो, अमान का पता बताओ.’’

बीच में टंगी चादर हटी, चेतन अपने 3 साथियों के साथ बाहर निकला. ये सब अभी तक जैसे सांस रोके ही सब बात सुन रहे थे जिस से इन की कोई आवाज चादर के उस पार न जाए. उमर के होश उड़ गए. अदरा को
देख चिल्लाया, ‘‘यह सब क्या है? तुम दोनों को मैं छोड़ूंगा नहीं.’’

चेतन ने उमर को एक थप्पड़ मारा. वह हिल गया. ‘‘तू किसी को क्या पकड़ेगा या छोड़ेगा, तू तो खुद ही गया अब.’’ फिर उस ने एक जगह रखे फोन को उठाया, अपने साथियों से कहा, ‘‘थैंक्यू दोस्तो. इस कपटी की यह वीडियो रिकौर्डिंग हम संभाल कर रखेंगे. इस ने जरा सा भी इन दोनों को या किसी और औरत को भी परेशान किया तो यह आदमी ऐसा फंसेगा कि याद रखेगा. मेरे पापा को तो कोई परेशानी नहीं आएगी, उन से तो मैं बात कर ही लूंगा. यही काम से गया. उमर मियां, जाओ, अब सच में सब को अच्छी बातें सिखाओ और कुछ पर खुद भी अमल कर लेना.’’
‘‘तुम चिंता मत करो,’’ दानिया की तरफ देख चेतन का एक पक्का दोस्त राजू हंसा, ‘‘तुम्हारा दोस्त बहुत अच्छा है, अपने बाप से भी पंगा लेने को तैयार है.’’ फिर उमर को एक डंडा जमा
दिया, ‘‘तू तो अब ह्यूमन ट्रैफिकिंग में अंदर जाएगा.’’
दानिया अपनी अम्मी के गले लग गई. दोनों की आंखों से आंसू बह निकले. राजू ने उमर से कहा, ‘‘तुम जाओ, अमान तुम्हें थोड़ी देर बाद मिल जाएगा.’’ उमर चला गया. एक दोस्त अमान को लेने चला गया. अदरा ने चेतन के आगे हाथ जोड़ दिए, सुबक उठी, ‘‘तुम ने आज हमारी बहुत मदद की.’’

‘‘अरे, आंटी,’’ कहते हुए चेतन ने उन के हाथ पकड़ लिए और अपने सिर पर रख लिए, ‘‘आप बस आशीर्वाद दीजिए कि आने वाले समय में भी मैं ऐसी हिम्मत दिखा पाऊं. अभी तो मु झे अपने पापा से भी निबटना है. आप दोनों के लिए पानीपत में छोटा सा घर देख लिया है. आप वहां चली जाइए. दानिया वहां से आगे की पढ़ाई पूरी कर लेगी. मैं आप दोनों से मिलता रहूंगा. अभी आप दोनों यहां की पैकिंग जल्दी कीजिए और फौरन यहां से निकल जाइए. मैं यहां सब देख लूंगा. मैं आप लोगों के बाकी इंतजाम कर के अभी आता हूं. आप जरूरी सामान ले लो, कुछ बचा तो मैं पहुंचा दूंगा. अभी आया,’’ कह कर चेतन बाहर चला गया.

अदरा ने दानिया को गले लगा लिया. उस का मुंह बारबार चूमती रहीं, ‘‘तुम ने अपनी मां को बहुत मुसीबत से बड़ी होशियारी से निकाला है, शाबाश.’’ दोनों जल्दीजल्दी अपना जरूरी सामान बांधने लगीं. इतने में दानिया के फोन पर चेतन का मैसेज आया, ‘जा तो रही हो लेकिन मैं आगे मिलता रह सकता हूं न? हमारी दोस्ती रहेगी न?’’

‘हां’ में जवाब दे कर दानिया मुसकरा दी. आगे उस का और चेतन का रिश्ता कैसा रहेगा, यह तो किसी को नहीं पता था पर यह साफ था कि दोस्ती बनी रहने वाली थी.

Story In Hindi : हम मम्मी जैसी बेवकूफ नहीं – सीमा से अधिक दबती स्त्री की व्यथा

Story In Hindi : घरगृहस्थी और बच्चों की जिम्मेदारियां निभाती स्त्री अपना मूल्य आंकती नहीं है. कनिका ने तो अपने अस्तित्व को जिंदगीभर दबा कर रख दिया था लेकिन आज उसे एहसास हो रहा था कि अपने अधिकारों की लड़ाई खुद लड़नी होगी.

‘‘कनिका को अपने आने की खबर तो कर देती. कहीं ऐसा न हो कि उन्हें सरप्राइज देने के चक्कर में खुद सरप्राइज्ड हो जाओ,’’ मीनाक्षी का पति उसे सम झाते हुए बोला.
‘‘नहीं, मैं तो उस के चेहरे पर अचानक से मु झे देख कर आने वाली खुशी देखना चाहती हूं. अच्छा, अब मैं चलूं. आप भी वहां पहुंच कर मु झे खबर कर देना और अपना ध्यान रखना,’’ मीनाक्षी अपना बैग ले कर बाहर निकलते हुए बोली.

मीनाक्षी का पति 2 दिनों के लिए औफिस टूर पर जा रहा था और उन के दोनों ही बच्चे बाहर रह कर पढ़ाई कर रहे थे. वैसे तो उस की छोटी बहन उस के ही शहर में रहती थी लेकिन मिलनाजुलना कम ही हो पाता था. एक तो घरगृहस्थी का चक्कर, दूसरा कनिका के पति और सास को उस के मायके वालों का वहां आना कम ही पसंद था.

2-3 दिनों पहले जब मीनाक्षी की कनिका से बात हुई तब कनिका की आवाज से लग रहा था कि कुछ सही नहीं है. मीनाक्षी ने मिलने आने के लिए कहा तो कनिका हंसते हुए बोली, ‘अरे दीदी, घबराओ मत, मैं ठीक हूं. हलकाफुलका बुखार है. दवा ले ली है, शाम तक सही हो जाऊंगी.’

कल ही उस के पति ने औफिस टूर के बारे में बताया तो उस ने कनिका से मिलने का प्रोग्राम बनाया. पता था कि उस के पति व सास को अच्छा नहीं लगेगा लेकिन कनिका की खुशी के लिए वह उन की बेरुखी सह लेगी.

वैसे भी, इस बार रक्षाबंधन पर भी कहां उस से मिलना हुआ था. उस ने दोपहर तक कनिका का इंतजार किया लेकिन वह देर शाम तक ही मायके पहुंची. तब तक वह वापस आ गई थी.

कैब में बैठेबैठे मीनाक्षी अतीत के गलियारों में पहुंच गई. दोनों बहनों में 2 साल का ही अंतर था. बहनें कम, सहेलियां ज्यादा थीं वे दोनों. पढ़नेलिखने में दोनों ही बहुत होशियार थीं लेकिन कनिका को पढ़ाई के साथसाथ सिलाईबुनाई का भी बड़ा शौक था. जहां उस की शादी एक प्राइवेट बैंक मैनेजर से हुई वहीं कनिका की शादी मनीष से हुई जो सरकारी विभाग में यूडीसी के पद पर कार्यरत था.

दोनों ही बहनों को घरबार अच्छा मिला. मांपिताजी तो यह सोच कर बहुत खुश थे लेकिन उन की खुशी ज्यादा दिन टिक न सकी. कनिका का परिवार संयुक्त था, जिस में सासससुर, जेठजेठानी, देवर और एक ननद थी. जेठजेठानी तो उस की शादी के थोड़े दिनों बाद ही अलग हो गए. सारे परिवार के काम की जिम्मेदारी अब कनिका पर आ गई थी. इतना काम करने पर भी उस के पति, सास व ननद का व्यवहार उस के साथ अच्छा न था.

उस की सास छोटीछोटी बातों पर कलेश करती. वहीं पति भी लड़ने झगड़ने, गालीगलौज और यहां तक कि हाथ उठाने में भी गुरेज न करता. शुरू के एकडेढ़ साल तो कनिका ने ससुराल की बातों पर परदा डाले रखा. इस बीच, वह एक बेटी की मां बन गई थी. वह तो अभी भी न बताती लेकिन अब उस के पति व सास ने अति कर दी थी. कनिका के पिताजी, भाई को जब यह बात पता चली तो वे वहां गए और इस बारे में बात की तब उस के ससुर ने बीचबचाव करते हुए हाथ जोड़ सम झौता करने के लिए कहा और वादा किया कि आगे से ऐसा नहीं होगा.

बेटी की जिंदगी का सवाल था. शादीशुदा बेटी को घर पर बैठाना इतना आसान कहां और वह भी एक बच्चे की मां. इसी तरह एकडेढ़ साल और निकल गया और कनिका की गोद में एक बेटी और आ गई. दूसरी बेटी होने के बाद सास व पति ने फिर से अपना वही रूप धर लिया. कनिका अपनी बेटियों की खातिर सबकुछ बरदाश्त कर रही थी. कितनी ही बार मांपिताजी ने इस रिश्ते को तोड़ उसे वापस लाने का प्रयास किया लेकिन हर बार वह अपनी बेटियों के बारे में सोच कर आने से मना कर देती.

दिन बीतते रहे. उस की ननद व देवर की भी शादी हो गई और कनिका ने एक बेटे को जन्म दिया. सब ने यही सोचा कि पोता व छोटी बहू आने से उस की सास कनिका के प्रति नरम हो जाए लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और इस का सब से बड़ा कारण कनिका का पति था. उसे परिवार में अपने भाईबहन सब की फिक्र थी, केवल अपनी पत्नी को छोड़ कर. जब पति ही साथ न दे तो दूसरों से क्या उम्मीद.

मीनाक्षी को आज भी याद है जब गरमी की छुट्टियों में वह मायके आई हुई थी तो एक दिन कनिका की ससुराल से किसी का फोन आया. सुन कर पिताजी व उस का भाई दौड़े गए. जा कर देखा तो उस के पति ने कनिका को इतनी बेरहमी से पीटा हुआ था कि वह लहूलुहान थी. उस पर भी उस की सास अपने बेटे का पक्ष लेते हुए कनिका में ही कमियां निकाल रही थी. अब शायद कनिका की सहनशक्ति भी जवाब दे चुकी थी. वह भी इस बार बच्चों को छोड़ मायके आ गई लेकिन अभी उसे आए 2 दिन भी न हुए थे कि उस ने वापस अपने बच्चों के पास जाने के लिए रट लगा ली.

सब ने उसे कितना सम झाया कि कुछ दिन यहीं रहो. तभी तुम्हारे ससुराल वालों को अक्ल आएगी. करने दो उन्हें घर का काम अकेले और पालने दो बच्चों को. तुम मां हो तो वह भी तो उन का बाप है. पता तो चले कि बच्चे कैसे पाले जाते हैं और काम कैसे होता है.

लेकिन कनिका ने किसी की न सुनी. उसे बस अपने बच्चों की फिक्र थी और उन की फिक्र में उस ने खाना भी छोड़ दिया. बस, एक ही रट लगा रखी थी कि ‘मैं अपने बच्चों के बगैर नहीं रह सकती. मु झे यहां नहीं रहना. मु झे उन के पास ही जाना है. इस में मेरे बच्चों की क्या गलती है?’

उस की जिद के आगे किसी की न चली और आखिर में भैया उसे ससुराल छोड़ आए.

कनिका की सास व पति ने कितनी बातें सुनाई थीं उस के भाई को- ‘बहन को दो दिन ही रखना भारी पड़ गया.’ और भी न जाने क्याक्या.

उस दिन के बाद कनिका ने कभी भी अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के बारे में उन्हें नहीं बताया. साल में एकदो बार ही वह मायके आती थी और वह भी अकेले.

कैब के रुकने से मीनाक्षी की तंद्रा टूटी. ड्राइवर को पैसे दे वह नीचे उतरी और अगले ही पल वह कनिका के दरवाजे पर खड़ी थी.

दरवाजा कनिका की बड़ी बेटी ने खोला. उसे यों अचानक सामने देख कनिका की बड़ी बेटी के साथसाथ छोटी बेटी, जो सामने ही सोफे पर बैठी थी, एकदम से सकपका गई और फिर संभलते हुए उसे नमस्ते कर अंदर ले गई. मीनाक्षी को उन का व्यवहार कुछ अजीब लगा.

अपनी बड़ी बहन को सामने देख कनिका भी एक बार तो हैरान रह गई. फिर खुश होते हुए बोली, ‘‘मीनाक्षी, तू? अरे, तू ने तो खबर भी नहीं दी आने की,’’ कहते हुए वह उस के गले लग गई.
‘‘खबर तो परायों को करते हैं. मैं तो अपनी हूं और ऐसे अचानक न आती तो तेरे चेहरे की खुशी कैसे देख पाती.’’
मीनाक्षी ने ध्यान से देखा, कनिका का चेहरा उतरा हुआ था. इतनी सी उम्र में वह उम्रदराज लग रही थी. उस की दोनों बेटियां अब 15-17 साल की हो चुकी थीं. वे दोनों उस के लिए चायनाश्ता ले आईं.

चाय पीते हुए अचानक से कनिका के सिर पर ढका हुआ दुपट्टा फिसल गया. कनिका जल्दी से अपने सिर का दुपट्टा ढकने लगी कि तभी मीनाक्षी की नजर उस के सिर पर बंधी पट्टी पर गई तो वह चौंकते हुए बोली, ‘‘कनिका, यह तेरे सिर पर चोट कैसे?’’
‘‘कुछ नहीं दीदी, फिसल गई थी.’’
‘‘ऐसे कैसे फिसली कि सिर के ऊपर चोट आई? अपनी बहन से छिपा रही है. सचसच बता, क्या बात है? कहीं इसलिए ही तो तू मु झे आने के लिए मना नहीं कर रही थी? क्या मनीष ने…’’ मीनाक्षी ने उस के कंधे पर हाथ रखते हुए प्यार से पूछा.

कनिका अब चुप न रह सकी. उस की आंखों में ठहरा हुआ दर्द आंसुओं के रूप में बह निकला और उस ने रोते हुए बताया, ‘‘कल मेरी सास आई थी और छोटी सी बात का बतंगड़ बना रोने लगी. अपनी मां को रोता देख ये गुस्से से इतने पागल हो गए कि मेरी बात सुने बगैर राजू का बैट उठा कर मेरे ऊपर चढ़ गए.’’

यह सुन कर मीनाक्षी के होश उड़ गए, ‘‘कोई इतना भी राक्षस हो सकता है क्या?’’ मीनाक्षी ने जब कनिका की बेटियों से कहा, ‘‘अब तो तुम बड़ी हो गई हो. अपने पापा व दादी को क्यों नहीं रोकतीं और सम झातीं. अच्छा लगता है क्या कि वे तुम्हारी मां पर हाथ उठाएं?’’ तो वे दोनों सम झने के बजाय नाराज होती हुई बोलीं, ‘‘मौसीजी, आप मम्मी को क्यों नहीं सम झातीं. सारी गलती मम्मी की है. क्यों दादी के मुंह लगती हैं. पापा सारा दिन औफिस में कितना काम करते हैं. थकहार कर घर आए और फिर यह सब सुनने को मिले तो किसे गुस्सा नहीं आएगा. अरे मम्मी, चुपचाप अपनी गलती मान बात क्यों नहीं खत्म करतीं. सच कहूं, मम्मी बहुत बहस करती हैं तो किसे गुस्सा नहीं आएगा.’’
‘‘गलती न होते हुए भी अपनी गलती मान लें, तुम्हारी मां. कल को तुम्हारी शादी होगी और तुम्हारे साथ कोई ऐसा सलूक करे तो?’’
‘‘मौसीजी, हम मम्मी जैसी बेवकूफ नहीं. हमें पता है कहां बोलना है और कहां चुप रहना है. हम सब संभाल लेंगी.’’

उन दोनों लड़कियों की बात सुन मीनाक्षी आवाक रह गई. जिन बेटियों को कभी उस की दादी व बाप ने गोद में नहीं लिया वे दोनों आज उन्हीं का पक्ष ले रही थीं.

और जिस मां ने उन बेटियों की खातिर इतना जुल्म बरदाश्त करते हुए अपनी पूरी जिंदगी स्वाहा कर दी, उस के प्रति उन्हें तनिक भी सहानुभूति नहीं. उलटा, वे तो उसे ही कसूरवार ठहरा, बेवकूफ बता रही थीं. बेटियां तो मां की होती हैं उस का हमसाया, लेकिन जिस का हमसाया ही साथ छोड़ जाए तो वह क्या करे?

मीनाक्षी ने कनिका की तरफ देखा. मानो पूछना चाह रही हो कि आखिर क्या मिला तुम्हें. जिन बच्चों की खातिर तुम ने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी, वे ही तु झे कसूरवार ठहरा रहे हैं. मांपिताजी की बात मान लेती तो शायद?

लेकिन सारे प्रश्न मीनाक्षी के भीतर ही घुट कर रह गए. वह कुछ भी कह कर कनिका की पीड़ा बढ़ाना नहीं चाहती थी. लेकिन उस ने मीनाक्षी की आंखों में सभी प्रश्न पढ़ लिए थे और उस का एक ही जवाब था कि-
‘वह मां है. औलाद बुरी हो सकती है, मां नहीं. मैं ने अपना फर्ज निस्वार्थ भाव से निभाया आगे उन की मरजी.’

मीनाक्षी बोली, ‘‘हां कनिका, मैं यही तो कह रही हूं कि तुम ने मां और पत्नी बन कर अब तक अपने सारे फर्ज निभाए. इन की खातिर तुम ने अपने आत्मसम्मान को भी जीतेजी मार दिया. अब तो बच्चे बड़े हो गए. वे अपनी जिम्मेदारी खुद उठा सकते हैं. अपनी ही क्यों, अपने पापा की भी जिन के प्रति उन के मन में इतना सम्मान और सहानुभूति है. तेरी परवा तो पहले भी इस घर में किसी को नहीं थी. सोचा था, बच्चे तो तेरी कद्र करेंगे लेकिन?’’ कहते हुए मीनाक्षी रुक गई.
‘‘मेरी किस्मत में शायद यही लिखा था और वैसे भी इस उम्र में कहां जाऊंगी मैं, कौन मु झे सहारा देगा? अब तो यही मेरा घर है. इतनी कट गई और कट जाएगी.’’
‘‘कैसी बात कर रही है. तू इतनी लाचार कैसे हो सकती है. तु झे सहारे की जरूरत कब से पड़ने लगी? तू इस घर की नींव है और तेरे सहारे पर ही यह घर टिका है. यह इस घर में सब को पता है लेकिन तेरा पति पुरुषदंभ में यह बात स्वीकार नहीं करता और बच्चे अपने स्वार्थवश. उन्हें लगता है, मां तो कुछ करती ही नहीं, उन की जरूरतें तो उन के पापा ही पूरी करते हैं.’’
‘‘यह सही भी तो है, मीनाक्षी. मैं कौन सा कहीं कमाने जा रही हूं.’’
‘‘कनिका, हम औरतों की यही तो सब से बड़ी कमी है कि हम खुद ही अपनेआप को कमतर आंकती हैं. अपना पूरा जीवन बच्चों की परवरिश और घर को संवारने में निकाल देती हैं. लेकिन परिवार की नजरों में यह कोई काम नहीं. यह तो हमारा कर्तव्य था. उन्हें यह काम, काम नहीं लगते तो क्यों न यह न लगने वाले काम कुछ दिन इन को सौंप दिए जाएं. पता तो चले घर का काम कैसे होता है. दालरोटी बनाने में कितना पसीना बहाना पड़ता है.’’
‘‘लेकिन, बच्चे ये सब कैसे करेंगे और ये… कहीं घर से निकाल दिया तो? मैं तो कमाती भी नहीं.’’
‘‘कनिका, यह घर जितना तेरे पति का है, उतना तेरा भी. कोई तु झे घर से नहीं निकाल सकता. बच्चों की फिक्र कुछ दिन के लिए छोड़ दे और कमाती कैसे नहीं, अरे, तेरे हाथ में तो इतना हुनर है. भूल गई क्या? तेरी सिलाईबुनाई की महल्ले वाले कितनी प्रशंसा करते थे. तु झे कपड़े सिलने के लिए दोगुने पैसे देने के लिए तैयार थे. कनिका, जितना तू दबेगी, उतना ही तु झे सब दबाएंगे.

‘‘और अब तो देख, तेरी चुप्पी का फायदा उठा कर बच्चे भी तु झ से जबान लड़ाने लगे हैं. यों मरमर कर कब तक जिएगी. अपने लिए तु झे पहले खुद ही आवाज उठानी पड़ेगी. तभी कोई दूसरा तेरा साथ देगा. याद है, जब हम पढ़ते थे तो टीचरजी ने हमें क्या सबक सिखाया था कि एक बार अपने डर पर काबू पा लोगी तो फिर तुम्हें कोई नहीं डरा पाएगा. चीखनेचिल्लाने वाला डरपोक होता है. एक बार उस का विरोध कर के तो देखो.’’

मीनाक्षी की बातें सुन कनिका कुछ नहीं बोली. मीनाक्षी की बातों ने उस के अंदर एक अंतर्द्वंद्व उत्पन्न कर दिया. मीनाक्षी के साथ वह हंसबोल रही थी लेकिन भीतर ही भीतर आत्ममंथन भी कर रही थी. मीनाक्षी तो जाने से पहले उस के पति से मिल कर इस बारे में बात करना चाहती थी लेकिन कनिका ने उसे सम झाबु झा कर भेज दिया. उसे सम झ आ गया था कि अपनी लड़ाई उसे खुद ही लड़नी है.

उस दिन के बाद उस ने घर की कुछ जिम्मेदारियां बच्चों पर डालनी शुरू कर दीं. शुरू में तो बच्चों ने इस का विरोध किया और पति वह तो उसी तरह से गालीगलौज व मारपीट पर उतर आया लेकिन पहले जहां कनिका झगड़ा शुरू होने से पहले ही घर की शांति के लिए अपनी हार मान लेती थी, इस बार उस ने पुरजोर विरोध किया. इस की उस के पति को अपेक्षा न थी. बच्चे भी हतप्रभ थे. कनिका की आंखों में विरोध देख उस का पति चीखताचिल्लाता अपने कमरे में चला गया.

शुरूशुरू में तो सब को यही लगा कि कनिका एकदो दिन में ही फिर से घर का काम संभाल लेगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. बरसों से कनिका ने जिस घर को बड़े जतन से संजो कर रखा था और जिस काम की किसी ने कभी कद्र न की, आज उस बिखरते से घर को देख सभी को अपनी गलती का एहसास हो रहा था.

पति ने चीखनाचिल्लाना बंद कर दिया था. बच्चों ने पासा पलटते देख कनिका की खुशामद करनी शुरू कर दी लेकिन कनिका तो अब मां से मैं तक के सफर पर चल पड़ी थी. हां, उस ने पूरी तरह घरपरिवार की जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा लेकिन अब उस ने घरपरिवार की खातिर अपनी खुशियों का गला घोंटना छोड़ दिया था.

लेखक : सरोज प्रजापति

Kahani In Hindi : मुंबई की एक वेश्या – औरत के दिल छूते एहसास की कथा

Kahani In Hindi : वेश्या शब्द के साथ ही स्त्री की एक तिरस्कृत छवि दिमाग में घूम जाती है लेकिन मुंबई में मैं जिस वेश्या से मिला उस ने मेरे मन में इस शब्द के मायने ही बदल दिए.

हवाएं जब उम्मीद के विपरीत बहती हैं तो कुछ अप्रत्याशित होता है और जब कुछ अप्रत्याशित होता है तो समय के गर्भ से एक नई कहानी जन्म लेती है. यह कुदरत का दस्तूर है.

मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर एक प्रौढ़ बैठा हुआ था. उस की उम्र 45 के आसपास रही होगी, लेकिन स्वस्थ इतना कि अपनी उम्र से 10 साल छोटा लग रहा था. वह उत्तर भारत के एक गांव जटपुर का रहने वाला था.

उस की सामान्य देह, मध्यम आकार की मूंछ, सफाचट दाढ़ी और उस का ठेठ देहाती लहजा उस उसे मुंबई वालों से कुछ अलग ठहराता था. वैसे तो वह धोतीकुरता या फिर कुरतापाजामा पहनता था लेकिन मुंबई आया तो पैंटशर्ट पहन कर जो उस के शरीर पर ठीक से फब नहीं रहे थे.

हर उत्तर भारतीय जिस ने कभी मुंबई के दर्शन नहीं किए उसे मुंबई एक शानदार आधुनिक शहर ही लगता है. यह मुंबइया फिल्मों का असर है जो मुंबई नगरिया कल्पना में ऐसी नजर आती है. उस की कल्पना में मुंबई की गरीबी, झोंपड़पट्टियां और चालें नजर नहीं आती हैं. हर उत्तर भारतीय के लिए मुंबई एक मायानगरी है. ऐसे ही उस प्रौढ़ रणवीर को भी लगा था. लेकिन मुंबई आ कर उस का यह भ्रम दूर हुआ. उस ने अभी मुंबई के पौश इलाके नहीं देखे थे. वह तो बेचारा पहली बार मुंबई आया था, अपने बेटे को एक शिक्षण संस्थान में छोड़ने जहां उस के बेटे ने एडमिशन लिया था. वह आज गर्व से अपना सीना चौड़ा किए हुए था. उस के लिए यह बड़ी बात थी.
रणवीर अपने बेटे को उस संस्थान में छोड़ कर अब मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर बैठा था. उसे मुंबई बिलकुल भी ऐसी नहीं लगी थी जैसी उस ने सोची थी. वह स्टेशन पर बैठा वहां लगे भीमकाय सीलिंग फैन को देख रहा था जिस की पंखुडि़यां बहुत बड़ीबड़ी थीं.

अभी ट्रेन चलने में बहुत समय बाकी था. उसे चाय की तलब लगी. बाहर बारिश की हलकीहलकी फुहारें पड़ रही थीं जबकि इस समय उत्तर भारत गरमी से तप रहा था. मुंबई में तो सुबह से ही बारिश हो रही थी. रणवीर ने सोचा, इन हलकी फुहारों में बाहर निकला जा सकता है और गरम चाय का मजा लिया जा सकता है.
वह सड़क किनारे ऊंचे उठे फुटपाथ पर चलने लगा. उसे यहां का बाजार भी कुछ अलग न लगा. वह सोचने लगा, ऐसे बाजार तो अपने बिजनौर और मेरठ में भी देखने को मिल जाते हैं. कुछ दूर चलने पर उसे चाय की एक अच्छी दुकान मिल गई जहां वह आराम से बैठ कर चाय पी सकता था. चाय पीतेपीते उस ने सोचा, क्यों न अपनी पत्नी राधिका के लिए कुछ यादगार चीज खरीद ले वरना वह पूछेगी कि मुंबई से उस के लिए क्या लाए.
यही सोच कर रणवीर कुछ और आगे बढ़ा तब उस ने एक दुकान से राधिका के लिए एक खूबसूरत सा गुलाबी पर्स खरीद लिया. उसे लगा कि वह काफी आगे निकल आया है, अब उसे वापस स्टेशन की ओर चलना चाहिए. बारिश की हलकीफुलकी फुहारें अभी भी पड़ रही थीं, इसलिए फुटपाथ पर इक्कादुक्का आदमी ही नजर आ रहे थे.
रणवीर अपने कंधे पर हलका सा बैग लटकाए जा रहा था. तभी उसे पीला छाता लगाए और हरी साड़ी पहने फुटपाथ पर एक औरत खड़ी दिखाई दी. जैसे ही रणवीर उस के पास से गुजरा, उस ने कहा, ‘‘चलोगे.’’
रणवीर ने गरदन घुमा कर उस की तरफ देखा और प्रश्नवाचक दृष्टि से पूछा, ‘‘कहां?’’
‘‘रूम पर,’’ त्वरित जवाब आया.
‘‘क्यों, क्या है वहां पर?’’
‘‘मजा,’’ उस औरत ने मुसकराते हुए कहा.
रणवीर सम झ चुका था कि वह औरत जरूर कोई वेश्या है. उस ने उस से पीछा छुड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं शादीशुदा हूं. घर पर मेरी बीवी है.’’
‘‘अरे साहब, घर का एक ही तरह का खाना खातेखाते मन नहीं भरता क्या? कभीकभी बाहर का खाना भी खा लिया करो.’’
‘‘नहीं जी, हमें एक ही तरह का खाना खाने की आदत है. हम बाहर का खाना नहीं खाते.’’
‘‘अरे, चलो तो सही, बहुत जायकेदार खाना खाने को मिलेगा. घर का खाना भूल जाओगे. आज सुबह से बोहनी भी नहीं हुई. एक भी कस्टमर नहीं मिला.’’
‘‘अरे बहन, मु झे माफ कर. हम बाहर का कैसा भी खाना नहीं खाते.’’
‘बहन’ शब्द सुनते ही वह अचकचा गई. उस ने बड़े अचंभे से पूछा, ‘‘बहन, मैं तुम्हारी बहन कैसे हुई?’’
‘‘देखो बहन, हम तो बचपन से ही यह सीखते आए हैं कि अपनी पत्नी को छोड़ कर दुनिया की सारी औरतें अपनी मां और बहन ही हैं. तुम मेरी हमउम्र हो तो तुम्हें मां तो कह नहीं सकता, तब तुम मेरी बहन हुई न.’’

वह औरत आंखें फाड़े रणवीर को देखे जा रही थी. रणवीर में उसे अपने भाई का अक्स उभरता नजर आ रहा था. रणवीर के प्रति उस के मनोभाव बदलने लगे थे. उसे इस भयंकर नारकीय जीवन में पहली बार किसी ने ‘बहन’ कह कर पुकारा था. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई किसी वेश्या को इतनी इज्जत से ‘बहन’ कह कर भी पुकार सकता है. उसे तो सब गंदी नाली का कीड़ा ही सम झते हैं. सचमुच, उस की आंखें सजल हो उठीं.
‘‘रो मत, बहन. मैं जानता हूं तुम्हारी मुसीबतें क्या होती हैं और दुनिया तुम्हें किस नजर से देखती है.’’
यह सुन कर वह फफकफफक कर रो पड़ी जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. रणवीर ऊहापोह में था, फिर भी उस ने उस का सिर अपने कंधे पर रख लिया जैसे दुख में वह अपनी बहन को सांत्वना दे रहा हो.
रणवीर ने तो उसे आदतन ‘बहन’ बोल दिया था. लेकिन वह तो इतनी भावुक
हो गई थी जैसे उसे बहुत दिनों के बाद सचमुच अपना सगा भाई मिल गया हो. रणवीर ने भी सोचा कि जब उस ने उसे बहन बोल ही दिया है तो एक सच्चे जाट की तरह उसे भाई का किरदार निभाना चाहिए.
‘‘अच्छा, अब रो मत, बहन.’’

‘‘भैया, अब रोऊं न तो क्या करूं? मुंबई आने के 25 साल बाद आज पहली बार किसी ने ‘बहन’ कह कर पुकारा है. तुम्हारे लिए हो सकता है इस बात का कोई मूल्य न हो लेकिन मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है. हमें तो हर कोई वेश्या की दृष्टि से ही देखता है और देखे भी क्यों न, हम हैं ही बदनाम गलियों की वेश्या. हमें तो सपने में भी कोई ‘बहन’ कह कर नहीं पुकारता.’’
‘‘इस का मतलब तुम मुंबई से नहीं हो?’’
‘‘नहीं भैया, मैं तो शहडोल, मध्य प्रदेश से हूं. मेरा प्रेमप्रसंग मेरे पड़ोस में रहने वाले युवा किराएदार रतन से हो गया था जो रायपुर, छत्तीसगढ़ का रहने वाला था. मैं अपने मांबाप के खिलाफ जा कर उस के संग भागी थी. कुछ दिन इधरउधर घुमाने के बाद वह मु झे मुंबई में वेश्याओं के एक दलाल के हाथ बेच कर भाग गया. मैं इस शहर में वेश्या बन गई. चकलाघर मेरा घर बन गया.’’
‘‘कोई संतान?’’
‘‘हां, उस हरामजादे रतन की एक बेटी की मां बनी थी. उसे पालपोस कर इस गंदे माहौल में बड़ा किया. उस की शादी की. मेरी सहेली वेश्याओं ने खूब मदद की. मेरी बेटी और दामाद की इज्जत पर कोई आंच न आए, इसलिए उन से मैं ने सारे संबंध तोड़ लिए. मेरा दामाद बहुत नेक है जिस ने सबकुछ जान कर भी मेरी जैसी वेश्या की बेटी से शादी की.’’
‘‘तो बहन, यहां से निकल और हमारे गांव चल. वहां बहुत काम है. इज्जत की जिंदगी जी.’’
यह सुन कर वह हंसी और रणवीर से पूछा, ‘‘भैया, क्या नाम है तुम्हारा?’’
‘‘रणवीर.’’
‘‘सुनो रणवीर भैया, हम वेश्याएं इतनी बुरी सम झी जाती हैं जहां हम जाती हैं, चालीस कोस तक की आबोहवा हमारे वहां होने से गंदी हो जाती है. एक बड़े कारखाने का काला धुआं भी हवा को इतना गंदा नहीं करता जितना एक वेश्या कर देती है. मेरे वहां पहुंचने से तुम्हारा पूरा गांव गंदा ही नहीं हो जाएगा बल्कि किसी गंदे नाले की तरह सड़ जाएगा और लोग तुम्हें जिम्मेदार ठहराएंगे कि मुंबई से किस गंद को उठा लाया.’’
रणवीर उस वेश्या की खरी बात सुन कर दंग रह गया.
‘‘रणवीर भैया, तुम ने मु झे बहन कहा, इसलिए तुम्हें बता रही हूं, मेरा असली नाम नीलम है और तुम ने बहुत अच्छा किया कि तुम ने रूम पर जाने से मना कर दिया. नहीं तो वहां से बुरी तरह लुटपिट कर भागते. बाहरी लोगों के साथ हम ऐसा ही सुलूक करती हैं. तुम समय के बलवान हो, बच गए,’’ नीलम ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘मैं तो बहन तुम्हें इस दलदल से अब भी निकालना चाहता हूं.’’
‘‘भैया, यह दलदल इतना भयानक है कि इस में फंसी कोई लड़की कभी नहीं निकल सकती. हम इस दलदली दरिया की वे मछलियां हैं जिन की यहां से निकलते ही सांस फूलने लगती है. यहां की गंदगी ही हमारा भोजनपानी है. यहां से बाहर की शुद्ध हवा हमारे लिए जहरीली है. जैसे खारे समुद्र की मछलियां साफ पानी में जिंदा नहीं रह सकतीं, बस, ऐसी ही मछलियां हम बन गई हैं जो इस गंदगी से बाहर नहीं रह सकतीं.’’
‘‘तो बहन, फिर मैं चलूं.’’
‘‘ऐसे नहीं, भैया. बहन से मिले हो तो अतिथि सत्कार तो करूंगी ही. आओ, तुम्हें चाय पिलाती हूं.’’

सामने ही चाय की एक गुमटी थी. वहां बैठने की जगह तो नहीं थी, वे दोनों वहीं खड़े हो कर चाय पीने लगे. रणवीर ने चाय पीते हुए पूछा, ‘‘नीलम, क्या इतने दिनों में तुम्हें अपने घर की याद नहीं आई?’’
‘‘क्या मुंह ले कर जाती मैं वहां, भैया? मेरे परिवार वाले तो अभी भी यही सोचते होंगे कि मैं रतन के साथ सुखपूर्वक जीवन जी रही हूं, इसीलिए उन के पास वापस नहीं गई. उन्हें यह पता चलेगा कि मैं वेश्या बन गई हूं तो उन का दिल कांप उठेगा. वे तो जीतेजी ही मर जाएंगे. बस, इस वजह से मैं कभी उन के पास वापस नहीं गई. हमारी तो दुनिया ही अलग है.’’
‘‘नीलम, तुम इस धंधे में रह कर भी दूसरों के बारे में इतना भला कैसे सोच लेती हो?’’
‘‘रणवीर भैया, क्या तुम्हें पता है खारे पानी में रहने वाली मछली अपने अंदर शुद्ध पानी का निर्माण करती है, बस वैसा ही हमारा भी चित्त है. हम तो यह भी नहीं चाहती दुनिया की कोई बहूबेटी इस धंधे में आए और भैया, हमारी अच्छाई की वजह से ही तो तुम दूसरी बार बचे हो,’’ नीलम ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘वह कैसे?’’ रणवीर ने बड़ी जिज्ञासा और आश्चर्य से पूछा.
‘‘भैया हो, इसलिए चाय में नशा नहीं मिलाया. नहीं तो, इस सामान से भी हाथ धो बैठते,’’ नीलम ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘अच्छा, तुम यह काम भी कर लेती हो.’’
‘‘भैया, इस भूखे पेट ने बहुतकुछ करना सिखा दिया. ग्राहक तो रोज नहीं मिलता, लेकिन इस भूखे पेट को तो रोज रोटी चाहिए.’’

रणवीर को अब नीलम से कुछ डर सा लगने लगा. अब उस ने वहां से निकलना ही बेहतर सम झा. उस ने चाय खत्म कर के कहा, ‘‘ठीक है बहन, अब मैं चलता हूं.’’
‘‘भैया, एक बात भूल रहे हो. मेरा शगुन,’’ नीलम ने हथेली आगे करते हुए कहा.
रणवीर सोचने लगा, ‘आखिर आ ही गई अपनी औकात पे.’
उस ने अपनी जेब से 200 रुपए का नोट निकाल कर आगे बढ़ा दिया और यह सोच कर आगे बढ़ने लगा कि चलो, 200 रुपए में पीछा छूटा.
तभी नीलम बोली, ‘रणवीर भैया, एक मिनट.’

यह कह कर वह बराबर वाली मिठाई की दुकान पर गई और वहां से मिठाई का डब्बा ले कर आई. उस ने उस डब्बे पर कम से कम 500-600 रुपए खर्च किए होंगे. उस डब्बे को रणवीर को पकड़ाते हुए कहा, ‘‘भैया, भाभी कै लिए भेंट. भाभी से कहना मुंबई में कोई दूर की बहन मिल गई थी. उसी ने यह भेंट भेजी है. भैया, हम गरीब जरूर हैं लेकिन इतने भी नहीं कि रिश्ते न निभा सकें.’’

उस के शब्द रणवीर के गाल पर झन्नाटेदार तमाचे की तरह लगे. कहां तो वह एक वेश्या की औकात माप रहा था और कहां उस वेश्या ने उस की औकात माप कर रख दी थी. वह जा तो रहा था रेलवे स्टेशन की तरफ लेकिन नीलम को ले कर अभी भी उस के जेहन में सैकड़ों प्रश्न उमड़घुमड़ रहे थे. जिंदगीभर उस को यह वाकेआ याद रहने वाला था.

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