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Best Short Story : मकसद – पैसों के लिए कुछ भी करते बच्चों की कहानी

Best Short Story : बड़े शहर की व्यस्ततम लालबत्ती.  सुबह से रात तक वाहनों का आनाजाना लगा रहता है. इस चौराहे पर हर दिन राधा को हरीबत्ती  होने का इंतज़ार करना पड़ता  है. कार, औटोरिकशा जैसे वाहनों को भी रुक कर आगे बढ़ना पड़ता है. वाहनों के बीच कई बार राधा ने देखा है- 4 लड़के गोटे-किनारे लगी हरे रंग की चादर को फैलाए  कुछ मांगते हैं. वाहनों की ज़ीरो रफ़्तार के बीच खड़े लड़के एक ही वेशभूषा में होते हैं.  सिर पर जालीदार टोपी, तन पर हरा कुरता और लुंगी.  इन में से एक राधा की गाड़ी से सट कर  खड़ा दीनहीन स्वर में कहता है, ‘माईबाप, नमाज़ियों के लिए जाजिम ख़रीदनी है, कुछ दे दो. मालिक आप को बहुत देगा.’

राधा गाड़ी औफ कर के सोचती है, ये बच्चे   जान जोखिम में डाल कर दान ही तो मांग रहे हैं. एक नेक काम कर रहे हैं. जब भी इन्हें देखती हूं, तरस आता है. पर्स खोल कर 10 रुपए का नोट हरी झोली में डाल देती है. पता नहीं ये बच्चे पढ़ते हैं या सारा दिन यही  करते हैं.

एक दिन  झोली में  नोट डाल कर पास खड़े लड़के से पूछा, “क्या नाम है तुम्हारा?”

“मैं अब्दुल, ये रज़्ज़ाक़, वो पीछे वाला नमाज़ी और ये जो खड़ा है सलमान है.”

“तुम लोग स्कूल नहीं जाते?”

“हां, जाते हैं, वह सामने जो सरकारी स्कूल है न, वहीं. हमारी दोपहर की शिफ़्ट है.”

बत्ती हरी हो गई. ट्रैफ़िक आगे बढ़ा तो हरी चादर वाले भी खिसक लिए.
यह सिलसिला हफ़्ते में दोतीन दिन ही चलता.  मासूमों के लिए मन में कुछ तो था, तभी तो कभी दो का तो कभी दस रुपए का नोट झोली में पड़ जाता है.

गरमी की छुट्टियों में बच्चे न जाने कहां चले गए.

एक दिन किसी काम से  शहर के मशहूर हनुमान मंदिर के पास  राधा को जाना पड़ा. सोचा,   चलो बजरंग बली के दर्शन कर लूं, प्रसाद भी चढ़ा दूं. प्रसाद ख़रीदने को पर्स खोला  कि एक हाथ आगे बढ़ा, “मैडम, हनुमान बाबा आप का भला करेंगे.”

राधा ने चौंक कर सामने फैलाने वाले को देखा. सामने 12 साल का  एक लड़का था. एक हाथ में पीतल की थाली  जिस में सिंदूर  पुती हनुमान की मूर्ति थी, तीनचार देवीदेवताओं की मूर्तियां और मौली का गोला व कुछ फूल थे.   लड़के के पूरे बदन पर सिंदूर पुता था. कमर पर सिंदूरी लंगोट और पीछे  यू शेप में हिलती दुम. बेशक उस ने हनुमानजी का स्वाग किया था पर  देख कर हंसी आ गई. चेहरा जानापहचाना लगा.   मन ही मन हंसी, “वाह बजरंग बली, खूब जंच रहे हो.”  अचानक याद आया, “अरे, तुम तो अब्दुल हो.” पर्स से पैसे निकालते उस का हाथ रुक गया.

मेरा नाम रामदेव है, अब्दुल नहीं.  बजरंग बली समझ गए, राधा  ने उसे पहचान लिया है, फिर भी वह झूठ बोल रहा था.

‘अरे वह  लालबत्ती चौराहे पर हरा कपड़ा, वो चार लड़के…’ मैं उसे हैरानी से एकटक देख रही थी और वह झेंपीली हंसी के साथ मुंह नीचा किए खड़ा था. मैं उसे कुछ और कहती, इस से पहले वह पवनपुत्र… न जाने कहां उड़ गए. आंखें इधरउधर  देखती रहीं.
दर्शन कर के लौटी, तो  भी नहीं था वह.  चप्पल पहन कर सिर उठाया, तो सामने खड़ा पाया.

पर्स से निकाला नोट अभी तक राधा की मुठ्ठी में था. पैसे दे कर पूछा, “कभी यहां, कभी वहां. ऐसा क्यों?”

वह अभी तक हंस रहा था.

“बस, वह वहां पुलिसवाला  तंग करता था, सो अम्मा ने इस ठीये पर  बुला लिया. यहां से भी कोई और ठीया बदलना पड़ेगा.” लड़के ने मेरा दिया नोट  लंगोट से सिली थैली में सरका लिया. फिर थोड़ा रुक कर बोला, “मैम, मक़सद तो एक ही है,  पैसे कमाना, पेट भरना.”

यह सुन कर राधा अवाक थी, उस का चेहरा देख रही थी.

“बाक़ी बातें बाद में, अभी धंधे का टाइम है.”

और बजरंग बली पूंछ लहराते, ये गए और वो गए.

India-Pakistan War : युद्ध से खतम नहीं होगा आतंकवाद

India-Pakistan War : युद्ध खतम नहीं हुआ है बल्कि पोस्टपोन हुआ है लेकिन इस से आतंकवाद के खतम होने की बात आयुर्वेदिक दवाओं की तरह है जिन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता. लड़ाई से हमें क्या हासिल हुआ यह भी लोग सोचने और पूछने लगे हैं कि क्या यह महज नरेंद्र मोदी की ध्वस्त होती इमेज को चमकाने के लिए किया गया था.

10 मई की शाम देशभर के लोगों ने राहत की सांस ली थी क्योंकि भारत और पाकिस्तान युद्ध बंद करने सहमत हो गए थे. यह घोषणा चूंकि एकाएक ही महाभारत के कृष्ण की भूमिका में आ गए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने की थी इसलिए भी लोगों का भरोसा सीजफायर पर बढ़ा था.

लेकिन 3 घंटे बाद ही पाकिस्तान ने जताबता दिया कि शांति की मोगरी में उस की पूंछ टेढ़ी ही है. लिहाजा फिर दोनों तरफ से गोलाबारी शुरू हो गई. चंद घंटों के होहल्ले और दहशत के बाद बात फिर संभली फिर सीजफायर का ऐलान हुआ जिस के चलते हालफिलहाल हालात सामान्य हैं लेकिन कब क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता.

डोनाल्ड ट्रंप कृष्ण की तरह लड़ा रहे हैं या लड़ाई बंद कराना चाह रहे हैं यह कहना मुश्किल है क्योंकि उन्होंने 2 दिन पहले ही कहा था कि इस से हमें कोई मतलब नहीं हमारे लिए तो सिरहाने बैठा पाकिस्तान और पंगायते बैठा भारत दोनों बराबर हैं. पर दरअसल में ऐसा है नहीं.

आम भारतीय ट्रंप पर विश्वास नहीं करता है. उन की और नरेंद्र मोदी की दोस्ती का गुब्बारा तो उसी दिन फुस्स हो गया था जिस दिन सैकड़ों भारतीयों को जंजीरों में जकड़ कर वापस भेजा गया था. दूसरे कई मसलों की तरह टैरिफ के मामले में भी वे कोई रियायत भारत के साथ नहीं बरत रहे हैं.

तो पाकिस्तान की तरह अमेरिका का भी भरोसा नहीं इस के बाद भी उस की सुननी तो सभी को पड़ेगी क्योंकि उस के हाथ में दुनिया की सब से बड़ी ताकत होने का तमगा ‘सुदर्शन चक्र’ जो है.

यह युद्ध है या आतंकवाद के खिलाफ जंग जैसा कि भारत कह रहा है तय कर पाना मुश्किल है क्योंकि हिंसा विध्वंस और जानमाल का नुकसान दोनों में ही होते हैं. बल्कि युद्ध में ज्यादा होते हैं यह दो दिन की लड़ाई में साफ दिखा भी. इस की दहशत की धमक कन्याकुमारी तक रही. 22 अप्रैल को पहलगाम हमले में 26 बेगुनाह मारे गए थे लेकिन 8-9 मई को कितने निर्दोश कहांकहां मारे गए इस का सटीक आंकड़ा जब आएगा तब आएगा पर दो दिन में ही आम लोग लड़ाई बंद होने की दुआ करने लगे थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पहलगाम हमले को ले कर महज 8-10 फीसदी लोगों का दबाव था कि भारत व पाकिस्तान को सबक सिखाए जो कि उस ने सिखाया. हमारी सेना का शौर्य और पराक्रम वाकई बेमिसाल है. यह युद्ध के दौरान उस ने साबित भी कर दिखाया.

2 दिन में ही देश में चारों तरफ से शांति की मांग उठने लगी थी. युद्ध विराम के लिए घोषित तौर पर कोई मांग नहीं कर रहा था लेकिन इस से पहले युद्ध करने की मांग करने वाले सड़कों पर आ गए थे. युद्ध शुरू होते ही उन्होंने मंदिरों में पूजापाठ हवनकीर्तन शुरू कर दिए थे. मकसद यह जताना था कि सेना का शौर्य और आधुनिक हथियार कहने भर की बातें हैं नहीं तो करता तो सब भगवान ही है.

यही वे लोग थे जो युद्ध चाह रहे थे. ये भक्त हैं दक्षिणपंथी हैं जिन्होंने पहलगाम हादसे को ले कर जो हल्ला मचाना शुरू किया तो नरेंद्र मोदी दबाब में आ गए. लेकिन युद्ध विराम की मांग या इच्छा उन 80 फीसदी लोगों की थी जिन्हें यह समझ आ गया था कि इस से न तो आतंक खतम होगा और न ही आतंकवादी खतम होने वाले क्योंकि इस की जड़ में मजहब है. हां अस्थाई तौर पर सबक सिखा कर इन्हें काबू किया जा सकता है. हुआ भी यही हालांकि लड़ाई अभी खतम नहीं हुई है ऐसा भी हर कोई मान रहा है.

अब जो होगा सो होगा लेकिन 3 दिन की लड़ाई में ही ऐसा एक और नुकसान हो चुका है जिस की भरपाई आने वाले कई सालों तक नहीं होने वाली. पहलगाम की विधवाओं की तरह ही युद्ध ने कितनी महिलाओं के मांग का सिंदूर औपरेशन सिंदूर ने पोंछा इस के सटीक आंकड़े अब आएंगे. यह युद्ध क्या बहुत जरूरी था इस सवाल का जवाब हां में ही ज्यादा निकलता है.

पहलगाम हमले से साबित हो गया था कि आतंकियों के हौसले कितने बुलंद हैं. उन्हें सबक सिखाया जाना जरूरी हो गया था पर इस के वैकल्पिक तरीके भी हो सकते थे.

22 अप्रैल के बाद से ही भक्तों ने यह नेरैटिव गढ़ना शुरू कर दिया था कि पाकिस्तान को सबक सिखाया जाना चाहिए. यानी यह मान लिया गया था कि फसाद की जड़ पाकिस्तान है जो पूरी तरह से गलत बात भी नहीं क्योंकि इस्लामिक आतंकवाद की बड़ी मंडी पाकिस्तान है लेकिन इस की जड़ें पाताल से ले कर आकाश तक फैली हुई हैं.

भारत ने इसे जस्टिफाई करने की जरूरत महसूस नहीं की, इस से उन लोगों को शह मिली जो किसी भी कीमत पर जंग चाहते थे. लिहाजा इन उन्मादियों जिन में शिक्षित लोग ज्यादा थे ने माहौल ऐसा बना दिया मानो लड़ाई नहीं हुई तो हम कहीं के नहीं रहेंगे.

सरकार चौतरफा घिर गई थी जिन में पहला दबाव तो भक्तों का था ही दूसरा दबाव खुद के झूठे और खोखले दावों का था कि अब कश्मीर में शांति है वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता और अब तो लाल चौक पर शान से तिरंगा फहराया जाता है.

370 के बेअसर होने के बाद कश्मीर में खुशहाली है, रौनक है और सभी लोग सुकून से रह रहे हैं. नरेंद्र मोदी और अमित शाह सहित पूरी भगवा गैंग बड़बोलेपन का शिकार 2014 से ही रही है. इस गैंग ने पूरे आत्मविश्वास से दावा किया था कि एक नोटबंदी से बहुत से दूसरी समस्याओं की तरह आतंकवाद भी खतम हो जाएगा.

इस से लगता है कि इन्हें ही अपने फैसलों पर शक ज्यादा रहता है. 12 मई को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में भी नरेंद्र मोदी पुराने वादे इरादे दोहराते दिखे कि आतंकवाद को जड़ से खतम कर देंगे ये कर देंगे वो कर देंगे.

लेकिन कश्मीर में कुछ भी ठीक नहीं था. आम लोगों ने सरकार के दावों पर भरोसा किया और कश्मीर जा कर पछताए भी. पहलगाम की एक विधवा ने तो बहुत खुल कर सरकार को निशाने पर लिया था. विरोध और असंतोष बढ़ते देख खुद सरकार ने मान लिया था कि उस से चूक हुई है. लेकिन तब तक नरेंद्र मोदी की चमत्कारिक इमेज के चिथड़े उड़ने लगे थे.

पाकिस्तान को सबक सिखाओ जैसा हल्ला मचा रहे भक्तों को इस की चिंता ज्यादा थी कि उन के हीरो की भद्द पिट रही है जिसे अब युद्ध से ही चमकाया जा सकता है.

तो लड़ाई का फैसला इमेज चमकाने ज्यादा था वरना तो हर कोई जानता है कि युद्ध से आतंकवाद खत्म नहीं किया जा सकता. हां अस्थाई तौर पर उसे दबाया जरूर जा सकता है. 22 अप्रैल के बाद से ही यह माहौल बनाया जाने लगा था कि युद्ध ही आखिरी विकल्प है और एक हद तक ऐसा था भी क्योंकि सवाल अब मोदी सरकार या भक्तों का नहीं बल्कि पूरे देश के स्वाभिमान का था.

लेकिन 8 मई आतेआते लोग घबरा भी उठे थे वजह उन्हें युद्ध की वीभ्त्सता दिखने लगी थी सरहद पर सैनिक और आम लोग मारे जा रहे थे. जानमाल का नुकसान होने लगा था खासतौर से औरतें डर गई थीं कि अब जाने क्या होगा.

ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप की इंट्री हुई जिस पर अब ऊंगलियां उठने लगी हैं पर सरकार के पास कोई जवाब नहीं कि हम अमेरिका के इतने मोहताज क्यों हैं. क्या दूसरों के इशारे पर नाच कर हम विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे हैं क्या हम से ताल्लुक रखते फैसले अमेरिका लेगा अगर हां तो किस हैसियत और रिश्ते से किस हक से और यह उसे दिया किस ने.

एक हकीकत यह भी थी कि पाकिस्तान उतना कमजोर पड़ नहीं रहा था जितना कि शुरू में अंदाजा लगाया गया था. शुरूआती दौर में ही भारत के रिहायशी इलाकों को निशाने पर ले कर उस ने जता दिया था कि वह करो या मरो के इरादे से जंग में कूदा है और आतंकियों की तरह किसी भी किस्म का रहम नहीं करने वाला. अब तक यह भी साबित हो गया था कि युद्ध में भारत का नुकसान भी बराबरी से हो रहा है.

युद्ध से आतंकवाद खतम करने की बात सब से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने 2001 में कही थी तब ओसामा बिन लादेन का खौफ किसी के दिलोदिमाग से उतरा नहीं था. लादेन को तो अमेरिका ने मई 2011 में खतम कर दिया लेकिन आतंकवाद का प्रेत ज्यों का त्यों खड़ा है. इस बार उस का कहर भारत पर बरपा तो नौबत परमाणु युद्ध तक की आ गई जिसे बकौल डोनाल्ड ट्रंप उन्होंने रुकवाया.

इधर मीडिया खासतौर से न्यूज चैनल्स ने भी जम कर अफवाहें उड़ाई. किसी ने लाहौर के खतम होने की बात कही तो किसी ने स्टूडियो में बैठेबैठे ही इस्लामाबाद को ध्वस्त कर दिया किसी ने कराची के खाली हो जाने की बात कही.

युद्ध को ले कर मीडिया कतई गंभीर नहीं दिखा, टीआरपी के चक्कर में तबियत से मनमानी की. एंकर सब्जी मंडी की तरह चिल्लाते नजर आए. इसे ले कर आम लोगों ने जम कर कोसा और मजाक भी उड़ाया.

किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था कि युद्ध किस से और क्यों अगर यह आतंकवाद के खिलाफ है तो उस के खतम हो जाने की गारंटी क्या और तीन दिन में जो नुकसान हुआ उस की भरपाई कैसे होगी. पाकिस्तान अगर दोषी है तो उस के खिलाफ हम दुनियाभर को सहमत क्यों नहीं कर पा रहे?

Rights : रेप के झूठे मामलों के सहारे औरतों के अधिकारों को छीनने का प्रयास

Rights : रेप के झूठे मामले एक गंभीर समस्या है, जिन में निर्दोष पुरुषों का जीवन तबाह होता है. विष्णु तिवारी जैसे मामले, जहां 19 साल बाद निर्दोष साबित हुए, चौंकाने वाले हैं. लेकिन क्या ये केस महिला अधिकारों के खिलाफ साजिश का हिस्सा हैं? एनसीआरबी के अनुसार, 65% मामलों में आरोपी बरी होते हैं, पर क्या इस का मतलब यह है कि ज्यादातर शिकायतें झूठी हैं? या फिर यह न्याय प्रणाली और सामाजिक पूर्वाग्रहों की विफलता है? क्या इन्हें महिलाओं के खिलाफ हथियार बनाना उचित है?

ललितपुर के थाना महरौनी के गांव सिलावन निवासी विष्णु तिवारी की उम्र इस वक्त 46 साल है और वो 19 वर्षों से जेल में बंद थे. विष्णु को दुष्कर्म के झूठे आरोप में आजीवन कारावास की सजा हुई थी. विष्णु के परिवार की आर्थिक स्थिति खराब थी इसलिए वो लोग हाईकोर्ट में अपील न कर सके. विधिक सेवा प्राधिकरण ने विष्णु के मामले की पैरवी हाईकोर्ट में की और 19 साल बाद हाईकोर्ट ने विष्णु को निर्दोष करार देते हुए रिहा करने के आदेश दिए. इस तरह जिंदगी के 19 साल जेल में गुजारने के बाद विष्णु ने बाहर की दुनिया देखी लेकिन इस बीच विष्णु ने बहुत कुछ खो दिया था. जेल में रहने के दौरान विष्णु के दो भाई, मां और पिता गुजर चुके थे और विष्णु इन में से किसी के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच पाए थे.

बीते कुछ सालों में बलात्कार और यौन उत्पीड़न के बहुत से ऐसे मुकदमे सामने आए जो कोर्ट में झूठे साबित हुए. ऐसे मामलों को देख कर लगता है कि औरतों के हित में बनाए गए कानून मर्दों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं. बदले की भावना या लालच में पड़ कर कई औरतें कानूनों का मिस यूज करती हैं और इस का खामियाजा बेकसूर मर्दों को भुगतना पड़ता है.

चंडीगढ़ का यह मामला और भी गंभीर है. यह मामला 2007 का है लेकिन इस में फाइनल जजमेंट अब आया है. चंडीगढ़ की स्पैशल सीबीआई कोर्ट ने मोगा सैक्स स्कैंडल में पंजाब पुलिस के 4 पूर्व अधिकारियों को दोषी ठहराया है. इन में एक आईपीएस अफसर का भी नाम है. ये लोग अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अमीर मर्दों को रेप के झूठे केस में फंसाते थे और फिर लड़की से समझौता और केस खत्म करने के नाम पर उन से मोटी रकम ऐंठते थे. इन लोगों ने मिल कर तकरीबन 50 लोगों को फर्जी रेप केस में फंसाया और उन से जम कर उगाही की. इस साजिश में मनप्रीत कौर नाम की एक महिला शामिल थी जिस के माध्यम से अमीरों को फंसाया जाता था.

दिसंबर 2021 में गुरुग्राम में एक 22 साल की लड़की को गिरफ्तार किया गया था. उस पर आरोप था कि उस ने सितंबर 2020 से नवंबर 2021 के बीच 8 लड़कों के खिलाफ रेप का झूठा केस दर्ज करवाया था. लड़की पहले लड़कों से बात करती थी, फिर मिलने बुलाती थी और फिर रेप के झूठे मामले में फंसाने का डर दिखा कर ब्लैकमेल कर के पैसे ऐंठती थी और पैसे नहीं देने पर केस दर्ज करवा देती थी.

4 अप्रैल 2025 को लाइव हिंदुस्तान की वेबसाइट पर प्रकाशित खबर में दिल्ली की एक अदालत ने रेप का झूठा केस दर्ज कराने और झूठी गवाही देने वाली महिला के खिलाफ कार्यवाही करने का आदेश दिया.

बलात्कार के एक केस में एडिशनल सेशंस जज अनुज अग्रवाल आरोपी के खिलाफ मामले की सुनवाई कर रहे थे. इस केस के आरोपी पर रेप, धमकी, महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला करने, महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने और यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए थे. 1 अप्रैल को जारी अपने आदेश में जज ने पेश किए गए सबूतों पर गौर किया और कहा, “इस मामले में अभियोक्ता की गवाही न केवल विरोधाभास पूर्ण है, बल्कि यह स्वाभाविक रूप से असंगत और मनगढ़ंत है.”

आरोपी को बरी करते हुए अदालत ने कहा कि “यह साफ है कि अभियोक्ता ने अदालत के सामने झूठा बयान दिया था, और उस ने रेप/छेड़छाड़ की झूठी कहानी गढ़ी थी इसलिए केवल बरी कर देने से आरोपी की पीड़ा की भरपाई नहीं हो सकती, क्योंकि झूठे आरोप से उस की प्रतिष्ठा धूमिल हो सकती है और उस की आत्मा नष्ट हो सकती है.”

मार्च में सुर्खियों में रही इस खबर पर गौर कीजिए. महाकुंभ से वायरल हुई खूबसूरत आंखों वाली मोनालिसा को फिल्म औफर करने वाले निर्देशक सनोज मिश्रा पर दुष्कर्म का मामला दर्ज हुआ और पुलिस ने सनोज मिश्रा को 31 मार्च को दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया.

एफआईआर में नेहा (बदला हुआ नाम) ने कहा कि सनोज ने उस की मर्जी के खिलाफ उस से संबंध बनाए. कई बार उसे अबोर्शन करवाना पड़ा. सनोज की गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद 2 अप्रैल को नेहा ने केस वापस ले लिया और कहा कि ऐसा उस ने किसी और के उकसावे में किया. निर्देशक सनोज मिश्रा पर दुष्कर्म के आरोप लगाने वाली नेहा पहले भी एक बार सनोज मिश्रा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के बाद उसे वापस ले चुकी हैं. तब भी उन्होंने सनोज पर दुष्कर्म के आरोप लगाए थे और फिर केस वापस ले लिया था. अब एक बार फिर नेहा ने सनोज पर रेप के आरोप लगाए और गिरफ्तारी होने के बाद नेहा ने बयान दिया कि सनोज के साथ उस ने अपनी मर्जी से संबंध बनाए वो सनोज के साथ लिवइन में थी सनोज ने कोई जबरदस्ती नहीं की.

यदि नेहा अब सच बोल रही है कि किसी के उकसाने में उस ने सनोज मिश्रा पर झूठे रेप का मुकदमा किया तो क्या यह एक गम्भीर समस्या नहीं है? अगर नेहा अपने बयान से न पलटती तो सनोज को क्याक्या नहीं झेलना पड़ता.

मर्जी से बने रिश्ते बन जाते हैं पुरुषों के लिए अभिशाप

कई मामलों में लड़की अपनी मर्जी से किसी मर्द के साथ रिलेशनशिप में जाती है और लंबे वक्त तक संबंध बनाए रखने के बाद बात बिगड़ने पर मर्द पर रेप का आरोप लगा कर उसे सलाखों तक पहुंचा देती है. कई मामलों में औरतें कानून का डर दिखा कर मर्दों को ब्लैकमेल भी करती हैं क्योंकि रेप के मामलों में कानून बहुत सख्त हैं और जब तक मर्द अपने को बेगुनाह साबित करता है तब तक वह बरबाद हो चुका होता है. ऐसे मर्दों को कानून का ही सामना नहीं करना पड़ता बल्कि समाज की नजर में भी वह कहीं का नहीं रहता.

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई है कि सहमति से बने रिश्तों में जब खटास आ जाती है तो रेप केस दर्ज करवा दिया जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे चिंता बढ़ाने वाला ट्रेंड बताया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिला के विरोध के बिना लंबे समय तक बने शारीरिक संबंध इस ओर इशारा करते हैं कि ये संबंध शादी के झूठे वादे की बजाय सहमति से बनाए गए थे.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि रेप के 65% से ज्यादा मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं. रेप के मामलों में कन्विक्शन रेट 30% से भी कम है.

2022 में रेप के 18,517 मामलों का ट्रायल पूरा हुआ था. इस में 5,067 मामलों में आरोपी को सजा मिली थी. इसी तरह महिलाओं के खिलाफ अपराध के 1,50 लाख से ज्यादा मामलों का ट्रायल पूरा हुआ था, जिस में 38,136 मामलों में ही आरोपी दोषी साबित हुआ. महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में कन्विक्शन रेट 25 फीसदी है. यानी हर 4 में से 3 आरोपी बरी हो जाते हैं.

आंकड़ों के मुताबिक, 2018 से 2022 के बीच 5 साल में रेप के 74 हजार से ज्यादा मामलों का ट्रायल पूरा हुआ. इन में से 46,973 मामलों में आरोपी को बरी कर दिया गया. यानी, 5 साल में रेप के 10 में से 6 मामलों में आरोपी बरी हो गए. ये आंकड़े बताते हैं कि रेप के ज्यादातर मामले या तो अदालत में साबित नहीं हो पाते या फिर ये झूठे होते हैं.

16 दिसंबर 2012 को हुए निर्भया कांड के बाद देश में रेप का कानून और सख्त कर दिया गया था. इस के बाद रेप के मामलों में अगर आरोपी की उम्र 16 से 18 साल के बीच है तो उसे वयस्क मान कर ही मुकदमा चलाया जाएगा. ये बदलाव इसलिए किया गया था क्योंकि निर्भया कांड का एक आरोपी नाबालिग था और 3 साल में ही छूट गया था.

इस के बाद पोक्सो यानी प्रोटेक्शन औफ चिल्ड्रन फ्रोम सैक्सुअल औफेंस एक्ट लाया गया था. ये बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन शोषण को अपराध बनाता है. लेकिन इस में भी कन्विक्शन रेट कम ही है. 2022 में पोक्सो केस में कन्विक्शन रेट 32% के आसपास था.

एक पुलिस अफसर ने बताया ‘अगर कोई मातापिता हमारे पास आते हैं और कहते हैं कि उन की बेटी पड़ोस के किसी लड़के के साथ भाग गई है तो हम अपहरण का केस दर्ज करते हैं. फिर जब वो लड़की कहती है कि संबंध भी बने थे, तो हम रेप की धारा भी जोड़ते हैं. फिर कोर्ट तय करती है कि रेप हुआ था या नहीं? रेप के 40% से ज्यादा मामले ऐसे होते हैं जिन में संबंध सहमति से होती है, लेकिन जब बात लड़की के मातापिता तक पहुंची तो वे लड़के पर रेप का केस दर्ज करवा देते हैं.

2017 में जयपुर के एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने बताया था कि रेप के 43% मामले जांच में फर्जी मिले हैं. ये झूठे केस पैसे ऐंठने के लिए दर्ज कराए गए थे.

इस के अलावा रेप के ज्यादातर मामले ऐसे भी होते हैं, जिन में लड़कालड़की पहले तो साथ रहते हैं और जब लड़का शादी से इनकार कर देता है तो उस के खिलाफ रेप का केस दर्ज करवा दिया जाता है. कुछ सालों में ऐसे मामले तेजी से बढ़े हैं. एनसीआरबी से मिले आंकड़े बताते हैं कि 2021 में रेप के 31,516 मामले दर्ज हुए थे, जिन में से 14,582 यानी 46% से ज्यादा मामले ऐसे थे जिन में लड़की ने दावा किया था कि उस के साथ शादी का झांसा दे कर रेप किया गया था.

2018 में बेंगलुरु की नैशनल ला यूनिवर्सिटी ने एक स्टडी की थी. इस में सामने आया था कि 16 से 18 साल की ज्यादातर लड़कियां आरोपी के खिलाफ गवाही देने से मुकर जाती हैं.

पूरे मामले पर “सरिता” का निष्पक्ष विश्लेषण

सरिता मैगजीन किसी भी मुद्दे पर प्रचलित ट्रेंड से अलग राय रखती है. सरिता ने हमेशा से नारी की गरिमा और न्याय को केंद्र में रखा है. यही वजह है कि नारी से जुड़े हर मुद्दे पर सरिता का विश्लेषण तार्किक और निष्पक्ष होता है.

रेप के ऐसे मामलों के आधार पर जो कोर्ट में झूठे साबित होते हैं महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानूनों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया जाता है. शोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, न्यूज चैनल्स और धर्मगुरुओं की पूरी लोबी एकजुट हो जाती है और यह सभी मिल कर यह नैरेटिव बिठाने में लग जाते हैं कि महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानून मर्दों के साथ अन्याय हैं. महिलाओं की आजादी पर सवाल खड़े किए जाते हैं और उन्हें संस्कारों में बांधने की बातें होने लगती हैं.

इस में कोई दो राय नहीं कि रेप के लगभग आधे मामले झूठे साबित होते हैं और कई मामलों में महिलाएं लालच या बदले की भावना से मर्दों पर रेप का झूठा मुकदमा करती हैं लेकिन ऐसे मामलों को ले कर महिला अधिकारों और कानूनों पर प्रश्नचिन्ह लगाना कहां तक उचित है.

दहेज के मामलों में भी यही पैटर्न नजर आता है. कोर्ट में दहेज के कुछ मामले झूठे साबित होते हैं इसे खूब प्रचारित किया जाता है और दहेज के खिलाफ बने कानूनों की आलोचना की जाती है. ऐसे चंद मामलों को ले कर पुरुषों को विक्टिम दिखाने की कोशिश होने लगती है. इस में भी कोई दो राय नहीं कि दहेज के मामलों में भी झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं और कई मामलों में बेकसूर मर्दों को सजा काटनी पड़ती है लेकिन इस से दहेज के नाम पर होने वाली मानसिकता तो खत्म नहीं हो जाती.

कड़वी सच्चाई यह है कि दहेज के नाम पर देश में प्रतिदिन 18 महिलाओं को मार दिया जाता है. दहेज हत्या में उत्तर प्रदेश 11,874 मौतों के साथ पहले नंबर पर है. वही, बिहार में 5,354, मध्य प्रदेश में 2,859, पश्चिम बंगाल में 2,389 और राजस्थान में 2,244 मौतें दर्ज की गईं.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 से 2021 के बीच देशभर में 35,493 महिलाओं की मौत दहेज हत्या के कारण हुई, जो प्रतिदिन लगभग 20 मौतों के बराबर है.

महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में कन्विक्शन रेट 25 फीसदी है. यानी हर चार में से तीन आरोपी बरी हो जाते हैं. इस का मतलब यह नहीं है कि कोर्ट की नजर में दोषमुक्त होने वाले सभी आरोपी सच में निर्दोष ही होते हैं. कई मामलों में लड़कियां अपना केस किसी दबाव में वापस ले लेती हैं कई मामलों में धमकी के डर से भी लड़की समझौता कर लेती है और कई बार पैसों के लालच में भी वो ऐसा करती है.

लड़कियों के लिए रेप केस का सामना करना आसान नहीं होता. इज्जत के डर से तो कई बार लड़की थाने तक भी नहीं पहुंच पाती. कई मामलों में रेप के बाद लड़की के घरवाले ही कोर्ट जाने की हिम्मत नहीं कर पाते. रेप के मामलों में यदि कन्विक्शन रेट 25 परसेंट है तो इस का मतलब यह नहीं कि 75 परसेंट मामले झूठे हैं.

पुरुषवादी मानसिकता से कोर्ट भी अछूते नहीं है. महिलाओं से जुड़े अपराधों के मामले में जजों की अनर्गल टिप्पणियों में यह मानसिकता झलक जाती है. दिल्ली हाईकोर्ट ने रेप के झूठे मामलों पर चिंता जताते हुए कहा था, ‘रेप के झूठे मामले आरोपी व्यक्ति के जीवन और कैरियर को तबाह कर देते हैं. आरोपी का सम्मान खत्म हो जाता है. वो अपने परिवार का सामना नहीं कर पाता और उस का जीवन कलंकित हो जाता है. इस तरह के आरोप इसलिए लगाए जाते हैं ताकि दूसरा पक्ष डर या शर्म के मारे उन की सारे मांगें मान लेगा. हाईकोर्ट ने सुझाव दिया कि जब तक ऐसे झूठे मुकदमे करने वालों को सजा नहीं होगी, तब तक झूठे केस बंद नहीं होंगे.

रेप के झूठे मामलों में आरोपी की जिंदगी तबाह हो जाती है लेकिन रेप के सच्चे मामलों में क्या लड़की की जिंदगी बरबाद नहीं होती? क्या लड़कियों का कैरियर और उस की सामाजिक स्थिति पर प्रभाव नहीं पड़ता? निर्दोष मर्दों के सम्मान की चिंता वाजिब है लेकिन क्या इसी वेदना के साथ जजों को पीड़ित लड़कियों के सम्मान की चिंता होती है?

17 मार्च को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज ने अपने एक फैसले में कहा था कि ‘पीड़िता के प्राइवेट पार्ट को छूना और पायजामे की डोरी तोड़ने को रेप या रेप की कोशिश के मामले में नहीं गिना जा सकता है.”

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा कि “इलाहाबाद कोर्ट का यह फैसला पूरी तरह से असंवेदनशील और अमानवीय नजरिए को दिखाता है. हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि यह निर्णय जज की ओर से संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाना जरूरी है”

10 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज संजय कुमार ने रेप के एक आरोपी की जमानत मंजूर करते हुए कहा कि “भले ही पीड़िता का आरोप सही है कि उस के साथ रेप हुआ, तो भी यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उस ने खुद ही मुसीबत मोल ली और इस के लिए वह खुद जिम्मेदार है”

पीड़िता के प्रति जजों की यह मानसिकता दर्शाती है कि ऐसे जज पुरुषवादी सोच से ऊपर नहीं उठ पाएं. यह भी एक सच्चाई है कि सत्ता जिस विचारधारा की होती है सत्ता के विभिन्न प्रतिष्ठान भी उसी विचारधारा का हिस्सा बन जाते हैं. 50 और 60 के दशक में जब सत्ता में कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रभाव था तब विभिन्न अदालतों के फैसलों में इस का असर भी साफ नजर आता था. उस दौर में कम्युनिस्ट विचारधारा के जजों ने ज्यादातर फैसले वर्कर्स के पक्ष मे दिए जिस से मालिकों को खासा नुकसान हुआ. नतीजा यह हुआ कि आगे चल कर समाजवादी व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो कर गिर गई. आज दक्षिणपंथी सत्ता में हैं इसलिए सत्ता के सभी प्रतिष्ठानों में इन की विचारधारा का प्रभाव साफ दिखाई दे रहा है. दक्षिणपंथी चाहे किसी भी देश की सत्ता में हों वो सब से पहले महिलाओं की आजादी पर लगाम लगाते हैं. आज न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और मीडिया सत्ता के यह चारों स्तम्भ पूरी तरह सत्ता के रंग में रंग चुके हैं.

यही वजह है कि महिलाओं से जुड़े जघन्यतम अपराधों में संलिप्त लोगों को बचाने के लिए सत्ता के विभिन्न प्रतिष्ठानों में पुरुषवादी लोबी एकजुट नजर आती है.

नवी मुंबई का एक पुलिस इंस्पेक्टर अभय कुरुंदकर, जो अपनी सहायक पुलिस निरीक्षक अश्विनी बिदरे के साथ इश्क में था उस ने अप्रैल 2016 में किसी बात पर विवाद होने पर अपनी सहायक अश्विनी बिदरे की हत्या कर दी, कुरुन्दर ने अश्विनी के शरीर को टुकड़ों में काट दिया, उसे एक ट्रंक और बोरी में भर दिया और वसई क्रीक में फेंक दिया जिस के अवशेष कभी नहीं मिले. पुलिस अधिकारी अश्विनी बिदरे के लापता होने के 9 साल बाद पनवेल सेशन कोर्ट ने शनिवार को उन के सहकर्मी इंस्पेक्टर अभय कुरुंदकर को हत्या का दोषी ठहराया शव को ठिकाने लगाने में कुरुंदकर की मदद करने वाले दो अन्य लोगों को भी सबूतों को गायब करने का दोषी ठहराया.

इस केस में सब से हैरानी की बात यह थी कि अपनी सहायक इंस्पेक्टर के हत्यारे कुरुंदकर को 2017 में वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया था.

इस केस के जज केजी पालदेवर ने कहा कि “यह हैरान करने वाला है कि अभय कुरुंदकर, जिस ने अप्रैल 2016 में अश्विनी बिदरे का अपहरण कर हत्या कर दी थी उस को गणतंत्र दिवस पर वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक दिया गया इसलिए यह सवाल उठता है कि पुलिस विभाग की समिति ने इस बात की जानकारी होने के बावजूद कि वह एक हत्या के मामले में आरोपी था, पुरस्कार के लिए उस के नाम की सिफारिश कैसे की?”

महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के मामले में, भारत को दुनिया के सब से खतरनाक देशों में गिना जाता है. भारत में प्रतिदिन तकरीबन 90 रेप के केसेस दर्ज होते हैं देश की राजधानी दिल्ली में (2022 के डाटा अनुसार) हर घंटे औसतन तीन बलात्कार की घटनाएं दर्ज हुईं.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के सब से ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए थे. साल 2022 में उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 65743 मामले दर्ज हुए. यह देश के किसी भी राज्य की तुलना में सब से अधिक है, साथ ही साल दर साल यह आंकड़ा बढ़ा भी है.

भारतीय समाज अपराध और अपराधियों के प्रति सिलेक्टिव नजरिया अपनाता है. अपराधियों को नस्ल और धर्म के आधार पर आंका जाता है. अगर अपराधी कोई औरत है तो इस से पूरी औरत जात को कटघरे में खड़ा करना आसान हो जाता है. इस में कोई शक नहीं कि झूठे रेप केस एक गम्भीर समस्या है लेकिन इस मामले में कन्विक्शन रेट के आधार पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि ज्यादातर मामले झूठे होते हैं.

अपराधी प्रवित्ति के लोग हर समाज मे होते हैं. अपराधों में महिलाएं भी शामिल होती हैं लेकिन यह न्याय व्यवस्था का मामला है. झूठे रेप का आरोप लगाकर मर्दों को परेशान करने वाली लड़कियों को सख्त सजा मिलनी ही चाहिए लेकिन इस तरह की घटनाओं की आड़ में नारी जाति के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने की मानसिकता और इस मानसिकता के पीछे छिपी मर्दवादी चालाकियों को भी समझना चाहिए.

Online Hindi Story : समय के फलक पर

Online Hindi Story : ‘कोकिल कुंज’ नाम के आलीशान भवन की बालकनी में बैठे अतिथि सामने बने दो कमरों वाले साधारण बेरंग मकान को देखकर नाक-भौं सिकोड़ने लगे.
आगन्तुक ने कहा भी, “यह किस फटेहाल घर के सामने तुमने अपना मकान बना लिया है अविनाश?”
अविनाश हौले से बोले, “क्या करें यार, यह फटीचर न जाने कहाँ से पाले पड़ गया.”
“तो और कहीं दूसरा प्लॉट नहीं था क्या?”
“नहीं था यार. इस शानदार कॉलोनी में यही एकमात्र प्लॉट बचा था.”
“मगर सामने एक और खाली प्लॉट भी तो दिख रहा है ना?”
अरे, यह भी तो उसी रामनिवास का है…मैं मुंहमांगी कीमत देने को तैयार था, लेकिन वह तो टस से मस नहीं हुआ.”
“क्यों भई, यह आखिर काम क्या करता है?”
“फ्रूट्स का होलसेल व्यापारी है रामनिवास.”
“हद हो गई यार, पूरी कॉलोनी में एक से बढ़कर एक मकान हैं, बस इस एक मकान के कारण कॉलोनी की भद्द उड़ गई.”
“ठीक कह रहे हो भाई.”
इस बार आगन्तुक के साथ आई महिला ने पूछा, “तो यह दो प्लॉट के पैसे कहां से ले आया?”
“दरअसल, ये दोनों प्लॉट्स इसने 20 साल पहले ही खरीद लिए थे, कौड़ियों के भाव. तब तो यह जगह जंगल जैसी ही थी.”
आगन्तुक पति-पत्नी हँस पड़े. पति ने कहा, “बंदा बहुत दूरदर्शी निकला.”
इसी समय उस मकान से एक 18 वर्षीय लड़का बाहर निकल कर आया, उसके हाथ में साईकिल थी.
आगन्तुक महिला ने पूछा, “यह कौन है?”
“फल व्यापारी का ही लड़का है.”
“पर, आजकल साईकिल कौन चलाता है!” आगन्तुक महिला ने व्यंग्य से कहा.
“जवाब अविनाश की पत्नी अभिलाषा ने दिया, “स्कूल का टॉपर है यह.”
“अच्छा..? स्कूल कौन सी है भई?”
“गवर्नमेंट स्कूल है कोई.” अविनाश बोले.
“तभी, वर्ना इंग्लिश स्कूल में तो फिसड्डी होता.” कहते हुए आगन्तुक महिला ने ठहाका लगाया.
“अरे, इसने ऑल डिस्ट्रिक्ट इंग्लिश डिबेट कॉम्पटीशन में टॉप किया है, जबकि उसमें भाग लेने वाले सभी इंग्लिश स्कूल्स के बच्चे थे, सिवाय इसके.” अभिलाषा ने स्पष्ट किया तो अतिथि महिला के मुंह से फूटा, “वाव, तो तुम्हारा उदात्त कौन सा कम है?”
“उदात्त ने उसमें भाग नहीं लिया था क्या?” अतिथि पुरुष का सवाल.
अभिलाषा मुस्कुराई, “कान्वेंट स्कूल के बेस्ट डिबेटर ने उसमें भाग लिया था इसलिए उदात्त का नंबर कैसे आता?”
“ओह…” कहते हुए अतिथि पति-पत्नी उठ खड़े हुए.
“बैठो न यार.” अविनाश की बात को खारिज करते हुए महिला बोल उठी, “नहीं जी, बहुत काम छोड़कर आई हूं घर में.”
“ठीक है जी, मिलते रहा करो आप लोग.”
“तुम महीने में दो दिन के लिए तो आते हो, तुम्हारा समय अधिक कीमती है भई.” कहते हुए वे कार में जाने के लिए बैठ गए थे.
उनके जाने के बाद अविनाश आराम मुद्रा में बैठ गए और पत्नी से गपशप करने लगे.
“एक बात बताओ, वह…क्या नाम है उसका?” अविनाश ने पूछा.
“वह, कौन?”
“अरे वही, रामनिवास फ्रूट वाले का लड़का…”
“अच्छा हां, सहिष्णु नाम है उसका.”
“अरे, बहुत बढ़िया नाम रखा है, रामनिवास ने तो अपने बेटे का!”
“हां, सो तो है. उसका परिवार भले सम्पन्न न हो, पर है सुशिक्षित.”
“तुम्हें क्या मालूम?”
“एक बार मिली थी मुझको उनकी पत्नी, बहुत शालीनता से बात करती है मुझसे.”
“तो करेगी क्यों नहीं, आखिर तुम एक आरएएस अफसर की पत्नी हो भई.”
“बात वह नहीं, यह जरूर उसके संस्कार ही हैं.”
“अच्छा, क्या हम संस्कारी नहीं हैं?”
“मैं जब कॉलेज में पढ़ती थी न, तो हमारी एक मैम ने कहा था कि पद, पैसा और प्रसिद्धि व्यक्ति को अभिमानी बना देती है इसलिए हम इन तीनों को हमारे व्यवहार पर हावी न होने दें.”
“तुम्हें लगता है, मैं अभिमानी हूं?”
“मैंने अभी श्रीमती व श्री वर्मा के साथ वार्तालाप में देखा, रामनिवास जी के लिए कौन, क्या बोल रहा था?”
“बताओ, क्या?” अविनाश ने पूछा.
“वर्मा जी ने रामनिवास जी को फटेहाल बोला और आपने फटीचर.”
“यार, तो रामनिवास सामने तो नहीं खड़ा था?”
“देखिए, मैं किसी की गरीबी का मजाक नहीं उड़ा सकती. उसकी पीठ पीछे भी नहीं!”
इस बीच उदात्त आ गया था.
“कहां से आ रहे हो, बेटा?” अविनाश ने पूछा.
“पा..पा, मैं अपने फ्रेंड के यहाँ गया था.”
“सुनो, तुम कभी सहिष्णु से मिले हो?”
“कौन सहिष्णु, वह सामने वाला? अरे, उससे क्या मिलना, उसकी औकात ही क्या है?”
अभिलाषा इस बात पर उखड़ गई, “तुमसे ज्यादा औकात है उसकी…”
“अरे, मॉम, वह डिबेट विनर क्या हो गया, आप तो उसकी लट्टू ही हो गईं!”
“अच्छा, टेन्थ में वह 95% लाया था न!”
“कम ऑन मम्मी, मार्क्स ही सब कुछ नहीं होते, आदमी का स्टेटस भी तो कुछ होना चाहिए कि नहीं? वह गवर्नमेंट स्कूल वाला किसी कान्वेंट वाले का मुकाबला करेगा भला?”
“सुनो, तुम भी तो किसी गरीब के घर में पैदा हो सकते थे, नहीं?” अभिलाषा का क्रुद्ध स्वर.
“हाहाहा…” उदात्त ने ठहाका लगाकर अपनी मम्मी की बात को हवा में उड़ा दिया.

खाना खाकर अविनाश आराम से बेडरूम में आकर लेट गए. उदात्त अपने कमरे में दोस्तों से फोन पर बतला रहा था और अभिलाषा भी रसोई का काम शीघ्रता से निपटा कर बेडरूम में आ गई.

बेडरूम की खिड़की से ही उसे पूर्णिमा का चन्द्रमा अपनी छटा बिखेरता प्रतीत हुआ. यह देखकर अभिलाषा का खिड़की से हटने का मन ही न हुआ तो अविनाश ने टोका, वहाँ खिड़की में ऐसे किसको निहार रही हो अभि?”

अभिलाषा हंसते हुए बोली, “देखिए, क्या दृश्य है…चौदहवीं का चांद आज हमारी खिड़की से जैसे मुझसे बातें कर रहा है मानो मैं उसकी पक्की सहेली हूँ!”
“तुम वाकई अच्छी हो, एकदम शिष्ट और सलोनी, बिल्कुल पूर्णिमा के चन्द्रमा की तरह.”
“अच्छा, यह प्रशंसा किसलिए?”
“इधर बैठो, एक बात कहनी है मुझे.”
“अभी आई…” कह कर डबल बेड पर आलथी-पालथी मार कर बैठ गई वह.
“कुछ देर पहले जो तुमने कहा था, तुम्हारी कॉलेज की मैडम को लेकर…सुन रही हो ना?”
“सुन तो रही हूँ, बोलो भी!”
“वह बात मुझे बहुत पसंद आई.”
“सच?”
“हां, अभिलाषा. इन तीनों बातों- पद, पैसा और प्रतिष्ठा से जो ऊपर उठ जाता है, वही सच्चा मानव है. मैं इस कथन पर भविष्य में खरा उतरने की कोशिश करूंगा.”

यह सुनकर तो अभिलाषा गद्गद हो उठी. वह नम आंखों से बोली, “आपने तो यह कहकर सचमुच मेरा मन जीत लिया.”

मुझे दु:ख हुआ कि अपना इकलौता बेटा लाड़-प्यार या स्कूल के वातावरण में या अमीर दोस्तों के साथ रहकर असभ्य व असंस्कारित हो गया है, उसे लाइन पर लाने की कोशिश करनी पड़ेगी वरना वह हाथ से निकल जाएगा.”

अविनाश के जाने के बाद अभिलाषा सोच में पड़ गई, ‘सुबह-सवेरे अविनाश तो 150 किमी. दूर अपनी ड्यूटी पर निकल गए और मुझ पर उदात्त को सुधारने का दुष्कर उत्तरदायित्व छोड़ गए.’

एक दिन अचानक बीच रास्ते में अभिलाषा को सहिष्णु मिल गया. उसे देखकर वह अपने स्कूटर की गति शून्य पर ले आई थी. वह उसके आगे-आगे पैदल ही घर की ओर जा रहा था.
“मुझे पहचाना बेटे?”
वह हाथ जोड़कर खड़ा रह गया. बोला, “नहीं पहचाना, आंटी.”
“अरे, तुम्हारे घर के सामने ‘कोकिल कुंज’ वाला मकान है न?”
“जी आंटी, अब पहचान लिया. सॉरी, आंटी.”
“वेलकम, सहिष्णु। तुम्हारी मम्मी से तो मिल चुकी हूँ मैं.”
“जी, जी.” वह बहुत ही आदरपूर्वक बोला.
“लो, आओ. मैं घर ही तो जा रही हूं. मेरे पीछे बैठ जाओ.”
“आंटी, आप परेशान न हों, मैं चला जाऊँगा.”
“चलो बेटे, मैं भी तो तुम्हारी मां जैसी ही हूं.”
अब वह बैठ गया तो वह सीधे घर पर पहुंच कर ही रुकी.
उस समय उदात्त भी घर पर नहीं था.
सहिष्णु हाथ जोड़कर जाने की अनुमति लेने लगा तो अभिलाषा ने उसे जबरन रोका.
“नहीं, दो मिनट के लिए ही घर पर चलो बेटे.”
अब वह मना नहीं कर सका.
अभिलाषा ने आज खीर बनाई थी. वह बड़े प्यार से उसके लिए एक कटोरी खीर ले गई तो सहिष्णु आनाकानी करने लगा.
“आंटी की बात के लिए मना नहीं करते. और हां, तुम्हारी गर्व करने योग्य डिबेट कॉम्पटीशन की सफलता के लिए खूब बधाई!”
वह अभिलाषा द्वारा बधाई पर उसके चरणों में झुक गया था.
अभिलाषा ने उस पर आशीर्वाद की स्नेह वर्षा कर पूछा, “अब सीनियर सेकेण्डरी के बाद क्या करोगे?”
“आंटी, अब नीट का एग्जाम दूंगा.”
“बहुत आशीर्वाद बेटे.” कहते हुए उसने सहिष्णु को विदा किया.

उदात्त भी इस वर्ष सीनियर के बाद नीट की परीक्षा में बैठने वाला था. वह तो साल भर से कोचिंग भी कर रहा था जबकि सहिष्णु तो बिना कोचिंग के केवल गाइड बुक्स के भरोसे तैयारी में जुटा था.

अभिलाषा आज सहिष्णु से मिलकर खूब खुश हो रही थी. इतने विनम्र और संस्कारी बच्चे तो अब अपवाद स्वरूप ही बचे हैं, वह यही सोच रही थी.उसने यह सब आज अविनाश को भी फोन पर बताया था. वे भी सुनकर बहुत खुश हुए थे. पर उदात्त को कुछ भी कहने का कोई मतलब नहीं था. नीट का परिणाम आया तो अपने बलबूते पढ़ने वाले सहिष्णु को प्रथम 500 में ऑल इन्डिया रैंकिंग मिली जबकि लाखों कोचिंग पर खर्च करने वाले उदात्त को रैंकिंग मिली 3500 वीं.

सहिष्णु को इसी शहर के कॉलेज में प्रवेश मिल गया था जबकि उदात्त को साउथ में जाना पड़ा. इधर अविनाश का भी काफी दूर ट्रांसफर हो गया तो अभिलाषा के पास अब घर के लाॅक करने के सिवा कोई चारा न था. वह अकेले रहकर करती भी क्या?

पति के साथ जाने से पहले वह सहिष्णु व उसकी मम्मी से मिले बिना न रह सकी थी. उसने बहुत प्यार से बाहर की ओर बने अपने सुविधाजनक अतिथि कक्ष की चाबी सहिष्णु को उसके बहुत मना करने पर भी सौंप दी और कहा कि उसके वहाँ रहने से उसे मकान की चिंता भी न रहेगी.

अभिलाषा इस बात से तो परेशान थी कि उसे अपना घर छोड़कर जाना पड़ रहा था, कितने समय के लिए; उसे कुछ भी पता न था. बावजूद उसे खुशी थी कि वह अपने पति से दूर नहीं रहेगी. जब तक बेटा उसके पास पढ़ रहा था उसके पास पति से दूर रहने का ही विकल्प था. घर का क्या, वह तो ईंट-पत्थर से बना निर्जीव भवन ही तो होता है. बेटा बहुत खुश था कि वह अब हमेशा दोस्तों के बीच रहेगा और यह एक आनंद से भरा अनुभव होगा.

अभिलाषा अब पति के पास उनके पदस्थापन स्थान बांसवाड़ा जिले के घाटोल कस्बे में आ गई थी जो उसके जयपुर स्थित मकान से बहुत दूर था. लेकिन फिर भी यहां उसका मन लग गया क्योंकि छोटी जगह और वह भी एक प्रशासनिक पद पर कार्यरत व्यक्ति की पत्नी की किसी भी समस्या का लोग तुरंत समाधान निकाल देते थे.

अभिलाषा सहिष्णु का वाट्सएप नम्बर ले आई थी जिससे वह कभी-कभी उसकी कुशलक्षेम पूछ लेती. वह अभिलाषा से अपनी मम्मी की भी बात करा देता था.

बेटे उदात्त को अपने मम्मी-पापा की कोई परवाह न थी. उसे तो बस पैसों से मतलब था जो वह मनमर्जी से खूब खर्च कर ही रहा था.

समय तो तेजी से भागता जा रहा था. अभिलाषा पति की व्यस्तता को समझती थी अत: स्वयं को व्यस्त रखने का प्रयास करती. लेकिन कभी-कभी जब पति फुर्सत में होते तो भावातिरेक में अपने बंद मकान का जिक्र कर लेती. आखिर उन्होंने कुछ लोन तो कुछ जमा पूंजी उसे बनाने में खर्च की थी.

पति अविनाश उसे समझाते, “अभि, तुम जीवन के इस स्वर्णिम काल का आनंद लो क्योंकि अपनी सेवानिवृत्ति के बाद जब हम अपने मकान में लौटेंगे तब हम इन प्यारे से दिनों को और साथ ही हमारी इस समय स्वस्थ देह वाले अतीत का स्मरण कर रहे होंगे.”

अभिलाषा अब मुस्कुरा उठी थी क्योंकि उसे समझ आ गया था कि समय के फलक पर सब कुछ अपनी मर्जी से नहीं होता और कोई न कोई कमी हमें सदैव खलती रहती है.

वह अब हमेशा खुश रहने का प्रयास करती अन्यथा पैंतालीस की आयु के समीप ऐसी कुंठाएं प्राय: व्यक्ति को विचलित कर देती हैं.

समय बहुत तेजी से बदल रहा था. इस बीच अविनाश पहले एसडीएम व बाद में एडीएम पद पर नये-नये स्थानों पर स्थानांतरित होकर सम्पूर्ण राजस्थान की माटी से सामंजस्य बिठाते हुए सपत्नीक जीवन के इस दशक को आत्मसात करते रहे. बहुत कम ऐसा हुआ जब उन्होंने दीपावली घर जाकर मनाई हो.

बीते आठ-नौ वर्षों में उदात्त ने पहले एम.बी.,बी.एस., फिर एम.एस. (सर्जरी) करके सूरत शहर की लड़की जो गायनी में स्नातकोत्तर थी, शादी कर ली फिर सूरत में ही अपना नर्सिंग होम खोल लिया. अब उसका जयपुर से कनेक्शन बिल्कुल कट गया था और वह सूरत का ही होकर रह गया.

सहिष्णु के भावनाओं से परिपूर्ण संदेश कभी-कभी अभिलाषा को रुला देते. एक दिन उसने लिखा, “आंटी, अब आप कोई चिंता न करें, आपके इस बेटे को डी.एम. कार्डियो की डिग्री बस मिलने ही वाली है. अंकल को बीपी की दवा देते रहें. मेरा जयपुर के ही खाली पड़े प्लॉट में प्रेक्टिस करने का विचार है. मैंने लोन ले लिया है और भवन निर्माण का कार्य भी प्रगति पर है. अंकल जब तक सेवानिवृत्त होकर जयपुर स्थायी रूप से आ जाएँगे, उसके पूर्व ही मैं अपना काम आरम्भ चुका हूँगा. फिर आप दोनों के दिल का ख्याल मेरी प्राथमिकता होगी.”

अभिलाषा ने यह संदेश अविनाश को बताया तो पढ़कर उनकी आंखें भी भीग गईं. वे दोनों एक दूसरे से मिल कर खूब रोए. शायद बेटे को खोने का गम इन आंसुओं में बह गया था.
अभिलाषा अनुमान न लगा सकी कि ये आंसू खुशी के थे अथवा दु:ख के?

लेखक : डा.अखिलेश पालरिया

Grihshobha Empower Moms : मां को थैंक्स कहने के लिए मदर्स डे पर आयोजित इवेंट

Grihshobha Empower Moms : दिल्ली में गत 10 मई को कासा रॉयल, पीरागढ़ी में सुबह 11 बजे से गृहशोभा एम्पावर मॉम्स इवेंट का आयोजन किया गया. यह इवेंट एकदम मदर्स डे से एक दिन पहले रखा गया क्यों कि हम सब जानते हैं घर हो या हमारी लाइफ, हमारी मां सब कुछ संभालती है. ऐसे में मां के नाम एक इवेंट तो बनता ही है। गृहशोभा एम्पावर हर का पहले भी मुंबई, बेंगलुरु, अहमदाबाद, लखनऊ, इंदौर, चंडीगढ़, लुधियाना और जयपुर में सफल आयोजन हो चुका है. अब सीजन 3 की शुरुआत दिल्ली से की गई। इस सीजन में हम 10 शहरों में इस का आयोजन करेंगे जिसमें नोएडा, पुणे, मुंबई समेत और भी कई शहर शामिल हैं. लेकिन स्पॉटलाइट में है दिल्ली की स्ट्रांग और स्टाइलिश लेडीज.

पहला सेशन : वुमन मेन्टल हेल्थ एंड वेलनेस सेशन  

सब से पहले वुमन मेन्टल हेल्थ एंड वेलनेस सेशन की शुरुआत हुई. इस के तहत ऐसे टॉपिक पर बात की गई की जो अक्सर अनस्पोकन रह जाता है. दरअसल एक स्वस्थ दिमाग उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि एक स्वस्थ शरीर। इस महत्वपूर्ण सेशन के लिए अनुभवी एक्सपर्ट शर्ली राज मंच पर आईं जो सिर्फ एक क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट ही नहीं बल्कि प्राइवेट क्लीनिकों में एक कंसलटेंट, एक ट्रेनर और यहां तक कि एमिटी विश्वविद्यालय में भी पढ़ा चुकी हैं. वह एमपावर – द सेंटर , लाजपत नगर में आउटरीच सहयोगी भी हैं. उन का फील्ड बचपन के विकास संबंधी विकार जैसे ऑटिज्म और एडीएचडी से ले कर एडल्ट्स में एंजाइटी प्रोब्लम्स जैसे जीएडी, ओसीडी, फोबिया, पैनिक अटैक आदि सब से जुड़ा है. उन्होंने थेरेपी के मल्टीपल फॉर्म्स में ट्रेनिंग लिया है – बिहेवियरल  थेरेपी से लेकर कॉग्निटिव और यहां तक कि ईएमडीआर थेरेपी तक.
शर्ली राज ने महिलाओं को समझाया कि उन्हें अपने हेल्थ का ख्याल क्यों रखना चाहिए और क्यों खुद को इग्नोर नहीं करना चाहिए। खासकर अपने मेंटल हेल्थ को. बहुत सी महिलाएं,  माँ बनने के बाद अपनी ज़रूरतों को सबसे आखिर में रखती हैं। सुबह से रात तक बच्चों, परिवार और घर की जिम्मेदारियों में उलझ कर वे अपनी थकान, चिंता, और भावनाओं को अनदेखा करती रहती हैं। याद रखें आत्म-देखभाल कोई स्वार्थ नहीं, बल्कि एक ज़रूरत है। जब आप खुद के लिए थोड़ा समय निकालती हैं – चाहे वो 10 मिनट की चाय हो या बिना किसी काम के बैठकर साँस लेना – तो आपका मन शांत होता है और यही शांति पूरे घर के माहौल को सकारात्मक बना देती है। आपकी ख़ुशी आपके बच्चों, पति और पूरे परिवार पर असर डालती है.
इस के बाद सिल्क मार्क ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया के डिप्टी सेक्रेटरी टेक श्री दशरथी बेहरा ने सिल्क की शुद्धता और सिल्क मार्क लेबल की मदद से प्रामाणिक, शुद्ध सिल्क उत्पादों की पहचान करने और चुनने में मदद करने के बारे में बताया.

 दूसरा सेशन : एसआईपी सहेली फाइनेंस सेशन  

इस के बाद फाइनेंसियल एडुकेटर और म्यूचुअल फंड एक्सपर्ट सागरिका सिंह को आमंत्रित किया गया जो लोगों को गोल बेस्ड इन्वेस्टमेंट इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजीज के जरिए स्मार्ट इन्वेस्टमेंट डिसिशन लेने, फाइनेंसियल गोल्स निर्धारित करने और लॉन्ग टर्म वेल्थ बनाने में मदद करती है एचडीएफसी म्यूचुअल फंड द्वारा आयोजित इस सेशन में सागरिका सिन्हा ने महिलाओं को म्यूच्यूअल फंड्स में निवेश से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दीं और उन्हें इन्वेस्टमेंट की जरूरतों से अवगत कराया.

तीसरा सेशन : क्विक मेकअप और हेयर स्टाइलिंग डेमो सेशन
 
इस के बाद बारी थी सबसे ग्लैमरस सेशन की। इस के लिए मंच पर पहुंचीं खूबसूरत और आकर्षक व्यक्तित्व की धनी एनी मुंजाल खरबंदा। एनी मुंजाल खरबंदा एक यंग एंटरप्रेन्योर हैं  जिन्होंने 19 साल की उम्र में वेडिंग प्लानिंग के साथ अपनी यात्रा शुरू की। व्यावहारिक अनुभव और क्लाइंट इंटरैक्शन के आधार पर उन्होंने अपने अक्वायर्ड स्किल को फैमिली बिजनेस,  स्टार अकादमी ( एक प्रसिद्ध मेकअप और हेयर ट्रेनिंग अकादमी ) में सहजता से इंटीग्रेट किया। एनी पर्सनल डेवलपमेंट प्रोग्राम्स जैसे लैंडमार्क एजुकेशन, सद्गुरु और बीसीआई आदि के जरिए पावर ऑफ़ लौ ऑफ़ अट्रैक्शन और ग्रेटिटूड को आम जनता और युवाओं तक फैलाने के मिशन पर हैं।
एनी ने उन सभी बिजी मदर्स के लिए फ़टाफ़ट खूबसूरत दिखने और मेकअप करने के टिप्स दिए जो समय की कमी होने की अपना ख़याल नहीं रख पातीं। ज़रा सी मेहनत से मदर्स अपने लुक को निखार सकती हैं. ऐनी ने मेकअप का डेमो दे कर दिखाया कि कोई भी महिला कैसे ‘उफ़’ से ‘यस क्वीन’ तक कुछ ही मिनटों में पहुंच सकती है.  क्विक मेकअप हैक्स और आसान हेयरस्टाइल के साथ उन्होंने महिलों को समझाया कि कैसे आप अगर दूसरों से अच्छा व्यवहार चाहती हैं तो अपने लुक पर ध्यान जरूर दें. आप रानी बन कर रहेंगी तभी सब आप को रानी की तरह ट्रीट करेंगे. इस सेशन को सब ने बहुत एन्जॉय किया.

अगला सेगमेंट थोड़ा इंस्पिरेशनल, थोड़ा इमोशनल और काफी मोटिवेशनल था.  दो इन्फ्लुएंसर्स ने मंच पर आ कर अपनी जर्नी बताई और सन्देश दिए.  पहले जीनिया चड्ढा आई जो एंकर, रिपोर्टर और एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर है। उन्होंने बताया कि कैसे उनकी मां ने हर कदम पर उनका साथ दिया। कैसे आज वह आत्मविश्वास से भरी महिला हैं। इस के बाद पूजा जांगड़ा जो पेशे से एक टीचर है उन्होंने भी बताया कि उसकी मां ने बहुत सपोर्ट किया तभी वह आज इस मुकाम पर है. पूजा ने अपनी जर्नी और काम के बारे में बता कर महिलाओं को इंस्पिरेशन दिया.  प्रोग्राम के बीच बीच में गेम्स और सवाल जवाब के दौर चलते रहे और जीतने वाली महिलाओं को विवेल की तरफ से गिफ्ट दिए गए. अंत में महिलाओं ने लंच किया और फिर गुडी बैग्स ले कर ख़ुशी ख़ुशी अपने घरों को गईं।

दिल्ली में हुए इस इवेंट के पार्टनर्स थे ; Silk Purity Partner : Silk Mark India, Financial Education Partner : Hdfc Mutual Fund,  Associate Sponsor : Haier, Beauty Partner: Green Leaf Aloevera Gel by Brihans Natural Products and Gift Partner : ITC Personal Care
जैसा कि आप जानते हैं भारत की नंबर 1 हिंदी महिला पत्रिका गृहशोभा 8 भाषाओं में प्रकाशित होती है। यह आप को हर तरह की नौलेज देती है. चाहे स्वास्थ्य हो, सौंदर्य हो या फिर खाना बनाना और फाइनेंशियल प्लानिंग – गृहशोभा हर विषय पर एक मॉडर्न और बैलेंस्ड नजरिया देती है ताकि हर महिला सशक्त बन सके. तभी तो धूप होने के बावजूद 11 बजते बजते पूरा बैंक्वेट हाल महिलाओं से भर गया.  हमेशा की तरह इवेंट की शुरुआत एंकर कृतिका शर्मा ने अपने चिर परिचित खुशनुमा अंदाज में किया.

Best Hindi Story : नए मोड़ पर – कुमुदिनी के मन में किसने बोए थे शंका के बीज ?

Best Hindi Story : कुमुदिनी चौकाबरतन निबटा कर बरामदे में खड़ी आंचल से हाथ पोंछ ही रही थी कि अपने बड़े भाई कपूरचंद को आंगन में प्रवेश करते देख वहीं ठगी सी खड़ी रह गई. अर्चना स्कूल गई हुई थी और अतुल प्रैस नौकरी पर गया हुआ था.

कपूरचंद ने बरामदे में पड़ी खाट पर बैठते हुए कहा, ‘‘अतुल के लिए लड़की देख आया हूं. लाखों में एक है. सीधासच्चा परिवार है. पिता अध्यापक हैं. इटावा के रहने वाले हैं. वहीं उन का अपना मकान है. दहेज तो ज्यादा नहीं मिलेगा, पर लड़की, बस यों समझ लो चांद का टुकड़ा है. शक्लसूरत में ही नहीं, पढ़ाई में भी फर्स्ट क्लास है. अंगरेजी में एमए पास है. तू बहुत दिनों से कह रही थी न कि अतुल की शादी करा दो. बस, अब चारपाई पर बैठीबैठी हुक्म चलाया करना.’’

कुमुदिनी ने एक दीर्घ निश्वास छोड़ा. 6 साल हो गए उसे विधवा हुए. 45 साल की उम्र में ही वह 60 साल की बुढि़या दिखाई पड़ने लगी. कौन जानता था कि कमलकांत अकस्मात यों चल बसेंगे. वे एक प्रैस में प्रूफरीडर थे.

10 हजार रुपए पगार मिलती थी. मकान अपना होने के कारण घर का खर्च किसी तरह चल जाता था. अतुल पढ़ाई में शुरू से ही होशियार न था. 12वीं क्लास में 2 बार फेल हो चुका था. पिता की मृत्यु के समय वह 18 वर्ष का था. प्रैस के प्रबंधकों ने दया कर के अतुल को 8 हजार रुपए वेतन पर क्लर्क की नौकरी दे दी.

पिछले 3 सालों से कुमुदिनी चाह रही थी कि कहीं अतुल का रिश्ता तय हो जाए. घर का कामकाज उस से ढंग से संभलता नहीं था. कहीं बातचीत चलती भी तो रिश्तेदार अड़ंगा डाल देते या पासपड़ोसी रहीसही कसर पूरी कर देते. कमलकांत की मृत्यु के बाद रिश्तेदारों का आनाजाना बहुत कम हो गया था.

कुमुदिनी के बड़े भाई कपूरचंद साल में एकाध बार आ कर उस का कुशलक्षेम पूछ जाते. पिछली बार जब वे आए तो कुमुदिनी ने रोंआसे गले से कहा था, ‘अतुल की शादी में इतनी देर हो रही है तो अर्चना को तो शायद कुंआरी ही बिठाए रखना पड़ेगा.’

कपूरचंद ने तभी से गांठ बांध ली थी. जहां भी जाते, ध्यान रखते. इटावा में मास्टर रामप्रकाश ने जब दहेज के अभाव में अपनी कन्या के लिए वर न मिल पाने की बात कही तो कपूरचंद ने अतुल की बात छेड़ दी. छेड़ क्या दी, अपनी ओर से वे लगभग तय ही कर आए थे. कुमुदिनी बोली, ‘‘भाई, दहेज की तो कोई बात नहीं. अतुल के पिता तो दहेज के सदा खिलाफ थे, पर अपना अतुल तो कुल मैट्रिक पास है.’’

कपूरचंद ने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया था, पर अब अपनी बात रखते हुए बोले, ‘‘पढ़ाई का क्या है? नौकरी आजकल किसे मिलती है? अच्छेअच्छे डबल एमए जूते चटकाते फिरते हैं, फिर शक्लसूरत में हमारा अतुल कौन सा बेपढ़ा लगता है?’’

रविवार को कुमुदिनी कपूरचंद के साथ अतुल और अर्चना को ले कर लड़की देखने इटावा पहुंची. लड़की वास्तव में हीरा थी. कुमुदिनी की तो उस पर नजर ही नहीं ठहरती थी. बड़ीबड़ी आंखें, लंबे बाल, गोरा रंग, छरहरा शरीर, सरल स्वभाव और मृदुभाषी.

जलपान और इधरउधर की बातों के बाद लड़की वाले अतुल के परिवार वालों को आपस में सलाहमशवरे का मौका देने के लिए एकएक कर के खिसक गए. अतुल घर से सोच कर चला था कि लड़की में कोई न कोई कमी निकाल कर मना कर दूंगा. एमए पास लड़की से विवाह करने में वह हिचकिचा रहा था, पर निवेदिता को देख कर तो उसे स्वयं से ईर्ष्या होने लगी.

अर्चना का मन कर रहा था कि चट मंगनी पट ब्याह करा के भाभी को अभी अपने साथ आगरा लेती चले. कुमुदिनी को भी कहीं कोई कसर दिखाई नहीं दी, पर वह सोच रही थी कि यह लड़की घर के कामकाज में उस का हाथ क्या बंटा पाएगी?

कपूरचंद ने जब प्रश्नवाचक दृष्टि से कुमुदिनी की ओर देखा तो वह सहज होती हुई बोली, ‘‘भाई, इन लोगों से भी तो पूछ लो कि उन्हें लड़का भी पसंद है या नहीं. अतुल की पढ़ाई के बारे में भी बता दो. बाद में कोई यह न कहे कि हमें धोखे में रखा.’’

कपूरचंद उठ कर भीतर गए. वहां लड़के के संबंध में ही बात हो रही थी. लड़का सब को पसंद था. निवेदिता की भी मौन स्वीकृति थी. कपूरचंद ने जब अतुल की पढ़ाई का उल्लेख किया तो रामप्रकाश के मुख से एकदम निकला, ‘‘ऐसा लगता तो नहीं है.’’ फिर अपना निर्णय देते हुए बोले, ‘‘मेरे कितने ही एमए पास विद्यार्थी कईकई साल से बेकार हैं. चपरासी तक की नौकरी के लिए अप्लाई कर चुके हैं पर अधिक पढ़ेलिखे होने के कारण वहां से भी कोई इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाता.’’

निवेदिता की मां को भी कोई आपत्ति नहीं थी. हां, निवेदिता के मुख पर पलभर को शिकन अवश्य आई, पर फिर तत्काल ही वह बोल उठी, ‘‘जैसा तुम ठीक समझो, मां.’’ शायद उसे अपने परिवार की सीमाएं ज्ञात थीं और वह हल होती हुई समस्या को फिर से मुश्किल पहेली नहीं बनाना चाहती थी.

कपूरचंद के साथ रामप्रकाश भी बाहर आ गए. समधिन से बोले, ‘‘आप ने क्या फैसला किया?’’

कुमुदिनी बोली, ‘‘लड़की तो आप की हीरा है पर उस के योग्य राजमुकुट तो हमारे पास है नहीं.’’

रामप्रकाश गदगद होते हुए बोले, ‘‘गुदड़ी में ही लाल सुरक्षित रहता है.’’

कुमुदिनी ने बाजार से मिठाई और नारियल मंगा कर निवेदिता की गोद भर दी. अपनी उंगली में से एक नई अंगूठी निकाल कर निवेदिता की उंगली में पहना दी. रिश्ता पक्का हो गया.

3 महीने के बाद उन का विवाह हो गया. मास्टरजी ने बरातियों की खातिरदारी बहुत अच्छी की थी. निवेदिता को भी उन्होंने गृहस्थी की सभी आवश्यक वस्तुएं दी थीं.

शादी के बाद निवेदिता एक सप्ताह ससुराल में रही. बड़े आनंद में समय बीता. सब ने उसे हाथोंहाथ लिया. जो देखता, प्रभावित हो जाता. अपनी इतनी प्रशंसा निवेदिता ने पूरे जीवन में नहीं सुनी थी पर एक ही बात उसे अखरी थी- अतुल का उस के सम्मुख निरीह बने रहना, हर बात में संकोच करना और सकुचाना. अधिकारपूर्वक वह कुछ कहता ही नहीं था. समर्पण की बेला में उस ने ही जैसे स्वयं को लुटा दिया था. अतुल तो हर बात में आज्ञा की प्रतीक्षा करता रहता था.

पत्नी से कम पढ़ा होने से अतुल में इन दिनों एक हीनभावना घर कर गई थी. हर बात में उसे लगता कि कहीं यह उस का गंवारपन न समझा जाए. वह बहुत कम बोलता और खोयाखोया रहता. 1 महीने बाद जब निवेदिता दोबारा ससुराल आई तो विवाह की धूमधाम समाप्त हो चुकी थी.

इस बीच तमाशा देखने के शौकीन कुमुदिनी और अतुल के कानों में सैकड़ों तरह की बातें फूंक चुके थे. कुमुदिनी से किसी ने कहा, ‘‘बहू की सुंदरता को चाटोगी क्या? पढ़ीलिखी तो है पर फली भी नहीं फोड़ने की.’’ कोई बोला, ‘‘कल ही पति को ले कर अलग हो जाएगी. वह क्या तेरी चाकरी करेगी?’’

किसी ने कहा, ‘‘पढ़ीलिखी लड़कियां घर के काम से मतलब नहीं रखतीं. इन से तो बस फैशन और सिनेमा की बातें करा लो. तुम मांबेटी खटा करना.’’

किसी ने टिप्पणी की, ‘‘तुम तो बस रूप पर रीझ गईं. नकदी के नाम क्या मिला? ठेंगा. कल को तुम्हें भी तो अर्चना के हाथ पीले करने हैं.’’

किसी ने कहा, ‘‘अतुल को समझा देना. तनख्वाह तुम्हारे ही हाथ पर ला कर रखे.’’

किसी ने सलाह दी, ‘‘बहू को शुरू से ही रोब में रखना. हमारीतुम्हारी जैसी बहुएं अब नहीं आती हैं, खेलीखाई होती हैं.’’

गरज यह कि जितने मुंह उतनी ही बातें, पड़ोसिनों और सहेलियों ने न जाने कहांकहां के झूठेसच्चे किस्से सुना कर कुमुदिनी को जैसे महाभारत के लिए तैयार कर दिया. वह भी सोचने लगी, ‘इतनी पढ़ीलिखी लड़की नहीं लेनी चाहिए थी.’ उधर अतुल कुछ तो स्वयं हीनभावना से ग्रस्त था, कुछ साथियों ने फिकरे कसकस कर परेशान कर दिया. कोई कहता, ‘‘मियां, तुम्हें तो हिज्जे करकर के बोलना पड़ता होगा.’’

कोई कहता, ‘‘भाई, सूरत ही सूरत है या सीरत भी है?’’

कोई कहता, ‘‘अजी, शर्महया तो सब कालेज की पढ़ाई में विदा हो जाती है. वह तो अतुल को भी चौराहे पर बेच आएगी.’’

दूसरा कंधे पर हाथ रख कर धीरे से कान में फुसफुसाया, ‘‘यार, हाथ भी रखने देती है कि नहीं.’’ निवेदिता जब दोबारा ससुराल आई तो मांबेटे किसी अप्रत्याशित घटना की कल्पना कर रहे थे. रहरह कर दोनों का कलेजा धड़क जाता था और वे अपने निर्णय पर सकपका जाते थे.

वास्तव में हुआ भी अप्रत्याशित ही. हाथों की मेहंदी छूटी नहीं थी कि निवेदिता कमर कस कर घर के कामों में जुट गई. झाड़ू लगाना और बरतन मांजने जैसे काम उस ने अपने मायके में कभी नहीं किए थे पर यहां वह बिना संकोच के सभी काम करती थी.

महल्ले वालों ने पैंतरा बदला. अब उन्होंने कहना शुरू किया, ‘‘गौने वाली बहू से ही चौकाबरतन, झाड़ूबुहारू शुरू करा दी है. 4 दिन तो बेचारी को चैन से बैठने दिया होता.’’

सास ने काम का बंटवारा कर लेने पर जोर दिया, पर निवेदिता नहीं मानी. उसे घर की आर्थिक परिस्थिति का भी पूरा ध्यान था, इसीलिए जब कुमुदिनी एक दिन घर का काम करने के लिए किसी नौकरानी को पकड़ लाई तो निवेदिता इस शर्त पर उसे रखने को तैयार हुई कि अर्चना की ट्यूशन की छुट्टी कर दी जाए. वह उसे स्वयं पढ़ाएगी.

अर्चना हाईस्कूल की परीक्षा दे रही थी. छमाही परीक्षा में वह अंगरेजी और संस्कृत में फेल थी. सो, अतुल ने उसे घर में पढ़ाने के लिए एक सस्ता सा मास्टर रख दिया था. मास्टर केवल बीए पास था और पढ़ाते समय उस की कई गलतियां खुद निवेदिता ने महसूस की थीं. 800 रुपए का ट्यूशन छुड़ा कर नौकरानी को 500 रुपए देना महंगा सौदा भी नहीं था.

निवेदिता के पढ़ाने का तरीका इतना अच्छा था कि अर्चना भी खुश थी. एक महीने में ही अर्चना की गिनती क्लास की अच्छी लड़कियों में होने लगी. जब सहेलियों ने उस की सफलता का रहस्य पूछा तो उस ने भाभी की भूरिभूरि प्रशंसा की.

थोड़े ही दिनों में महल्ले की कई लड़कियों ने निवेदिता से ट्यूशन पढ़ना शुरू कर दिया. कुमुदिनी को पहले तो कुछ संकोच हुआ पर बढ़ती हुई महंगाई में घर आती लक्ष्मी लौटाने को मन नहीं हुआ. सोचा बहू का हाथखर्च ही निकल आएगा. अतुल की बंधीबंधाई तनख्वाह में कहां तक काम चलता?

गरमी की छुट्टियों में ट्यूशन बंद हो गए. इन दिनों अतुल अपनी छुट्टी के बाद प्रैस में 2 घंटे हिंदी के प्रूफ देखा करता था. एक रात निवेदिता ने उस से कहा कि वह प्रूफ घर ले आया करे और सुबह जाते समय ले जाया करे. कोई जरूरी काम हो तो रात को घूमते हुए जा कर वहां दे आए. अतुल पहले तो केवल हिंदी के ही प्रूफ देखता था, अब वह निवेदिता के कारण अंगरेजी के प्रूफ भी लाने लगा.

निवेदिता की प्रूफरीडिंग इतनी अच्छी थी कि कुछ ही दिनों स्थिति यहां तक आ पहुंची कि प्रैस का चपरासी दिन या रात, किसी भी समय प्रूफ देने आ जाता था. अब पर्याप्त आय होने लगी.

अर्चना हाई स्कूल में प्रथम श्रेणी में पास हुई तो सारे स्कूल में धूम मच गई. स्कूल में जब यह रहस्य प्रकट हुआ कि इस का सारा श्रेय उस की भाभी को है तो प्रधानाध्यिपिका ने अगले ही दिन निवेदिता को बुलावा भेजा. एक अध्यापिका का स्थान रिक्त था. प्रधानाध्यिपिका ने निवेदिता को सलाह दी कि वह उस पद के लिए प्रार्थनापत्र भेज दे. 15 दिनों के बाद उस पद पर निवेदिता की नियुक्ति हो गई. निवेदिता जब नियुक्तिपत्र ले कर घर पहुंची तो उस की आंखों में प्रसन्नता के आंसू छलक आए.

निवेदिता अब दिन में स्कूल की नौकरी करती और रात को प्रूफ पढ़ती. घर की आर्थिक दशा सुधर रही थी, पर अतुल स्वयं को अब भी बौना महसूस करता था. प्यार के नाम पर निवेदिता उस की श्रद्धा ही प्राप्त कर रही थी. एक रात जब अतुल हिंदी के प्रूफ पढ़ रहा था तो निवेदिता ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘‘सुनो.’’ अतुल का हृदय धकधक करने लगा.

‘‘अब आप यह प्रूफ संशोधन छोड़ दें. पैसे की तंगी तो अब है नहीं.’’

अतुल ने सोचा, ‘गए काम से.’ उस के हृदय में उथलपुथल मच गई. संयत हो कर बोला, ‘‘पर अब तो आदत बन गई है. बिना पढ़े रात को नींद नहीं आती.’’

निवेदिता ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘वही तो कह रही हूं. अर्चना की इंटर की पढ़ाई के लिए सारी किताबें खरीदी जा चुकी हैं, आप प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में इंटर का फौर्म भर दें.’’

अतुल का चेहरा अनायास लाल हो गया. उस ने असमर्थता जताते हुए कहा, ‘‘इतने साल पढ़ाई छोड़े हो गए हैं. अब पढ़ने में कहां मन लगेगा?’’  निवेदिता ने उस के निकट खिसक कर कहा, ‘‘पढ़ते तो आप अब भी हैं. 2 घंटे प्रूफ की जगह पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ लेने से बेड़ा पार हो जाएगा. कठिन कुछ नहीं है.’’

अतुल 3-4 दिनों तक परेशान रहा. फिर उस ने फौर्म भर ही दिया. पहले तो पढ़ने में मन नहीं लगा, पर निवेदिता प्रत्येक विषय को इतना सरल बना देती कि अतुल का खोया आत्मविश्वास लौटने लगा था. साथी ताना देते. कोईकोई उस से कहता कि वह तो पूरी तरह जोरू का गुलाम हो गया है. यही दिन तो मौजमस्ती के हैं पर अतुल सुनीअनसुनी कर देता.

इंटर द्वितीय श्रेणी में पास कर लेने के बाद तो उस ने स्वयं ही कालेज की संध्या कक्षाओं में बीए में प्रवेश ले लिया. बीए में उस की प्रथम श्रेणी केवल 5 नंबरों से रह गई.

कुमुदिनी की समझ में नहीं आता था कि बहू ने सारे घर पर जाने क्या जादू कर दिया है. अतुल के पिता हार गए पर यह पढ़ने में सदा फिसड्डी रहा. अब इस की अक्ल वाली दाढ़ निकली है.

बीए के बाद अतुल ने एमए (हिंदी) में प्रवेश लिया. इस प्रकार अब तक पढ़ाई में निवेदिता से जो सहायता मिल जाती थी, उस से वह वंचित हो गया. पर अब तक उस में पर्याप्त आत्मविश्वास जाग चुका था. वह पढ़ने की तकनीक जान गया था. निवेदिता भी यही चाहती थी कि वह हिंदी में एमए करे अन्यथा उस की हीनता की भावना दूर नहीं होगी. अपने बूते पर एमए करने पर उस का स्वयं में विश्वास बढ़ेगा. वह स्वयं को कम महसूस नहीं करेगा.

वही हुआ. समाचारपत्र में अपना एमए का परिणाम देख कर अतुल भागाभागा घर आया तो मां आराम कर रही थी. अर्चना किसी सहेली के घर गई हुई थी. छुट्टी का दिन था, निवेदिता घर की सफाई कर रही थी. अतुल ने समाचारपत्र उस की ओर फेंकते हुए कहा, ‘‘प्रथम श्रेणी, द्वितीय स्थान.’’

और इस से पहले कि निवेदिता समाचारपत्र उठा कर परीक्षाफल देखती, अतुल ने आगे बढ़ कर उसे दोनों हाथों में उठा लिया और खुशी से कमरे में नाचने लगा.

उस की हीनता की ग्रंथि चरमरा कर टूट चुकी थी. आज वह स्वयं को किसी से कम महसूस नहीं कर रहा था. विश्वविद्यालय में उस ने दूसरा स्थान प्राप्त किया है, यह गर्व उस के चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था.

निवेदिता का चेहरा पहले प्रसन्नता से खिला, फिर लज्जा से लाल हो गया. आज पहली बार, बिना मांगे, उसे पति का संपूर्ण प्यार प्राप्त हुआ था. इस अधिकार की वह कितने दिनों से कामना कर रही थी, विवाह के दिन से ही. अपनी इस उपलब्धि पर उस की आंखों में खुशी का सागर उमड़ पड़ा.

Hindi Story : असली नकली – प्यार को सोनेचांदी से तौलने की भूल करती पत्नी की कहानी

Hindi Story : दिनेश जब थकामांदा औफिस से घर पहुंचा तो घर में बिलकुल अंधेरा था. उस ने दरवाजे पर दस्तक दी. नौकर ने आ कर दरवाजा खोला. दिनेश ने पूछा, ‘‘मैडम बाहर गई हैं क्या?’’

‘‘नहीं, अंदर हैं.’’

सोने के कमरे में प्रवेश करते ही उस ने बिजली का स्विच दबा कर जला दिया. पूरे कमरे में रोशनी फैल गई. दिनेश ने देखा, अलका बिस्तर पर औंधी लेटी हुई है. टाई की गांठ को ढीला करते हुए वह बोला, ‘‘अरे, पूरे घर में अंधेरा कर के किस का मातम मना रही हो?’’

अलका कुछ न बोली.

‘‘सोई हुई हो क्या?’’ दिनेश ने पास जा कर पुकारा. फिर भी कोई उत्तर न पा कर उस ने अलका के माथे पर हलके से हाथ रखा.

‘‘अलका.’’

‘‘मत छुओ मुझे, आप प्यार का ढोंग करते हैं, आप को मुझ से जरा भी प्यार नहीं.’’

‘‘ओह,’’ दिनेश मुसकराया, ‘‘अरे, यह बात है. मैं ने तो सोचा कि…’’

‘‘कि अलका मर गई. अगर ऐसा होता तो आप के लिए अच्छा होता,’’ अलका रो रही थी.

‘‘अरे, तुम तो रो रही हो. मैं पूछता हूं तुम्हें यह प्रमाणपत्र किस ने दे दिया कि मैं तुम्हें प्यार नहीं करता?’’

अलका तेवर चढ़ा कर बोली, ‘‘प्रमाणपत्र की क्या आवश्यकता है? मैं इतनी नासमझ तो नहीं. मुझे सब पता है.’’

‘‘ओहो, आज अचानक तुम्हें क्या हो गया है जो इस तरह बरस पड़ीं?’’

अलका आंसू पोंछती हुई बोली, ‘‘आज मैं लेडीज क्लब गई थी, तो…’’ अलका फिर रोने लगी.

दिनेश ने पूछा, ‘‘तो?’’

‘‘क्लब में सब महिलाएं बता रही थीं कि उन के पति को उन से कितना प्रेम है और मैं…’’ अलका फिर सिसकने लगी थी.

दिनेश बड़ा परेशान था. आखिर लेडीज क्लब के साथ पति के प्यार का क्या संबंध है? दिनेश को कुछ समझ नहीं आ रहा था.

अलका रोतेरोते बोली, ‘‘शकुंतला बता रही थी कि उस के पति को उस से इतना प्रेम है कि वह हर महीने कुछ न कुछ उपहार ला कर जरूर देता है. पिछले महीने उस को सोने का एक सैट उपहार में मिला और कल एक बहुत महंगी कांजीवरम की साड़ी मिली है. सरला बता रही थी कि उसे उस के पति ने जड़ाऊ सैट दिया और एक दूसरे सैट के लिए और्डर दिया है. उमा बता रही थी कि उसे हीरे का…’’‘‘अरे बस भी करो, मुझे जरा सांस तो लेने दो.’’

‘‘हां, हां, ये सब बातें आप को क्यों भाएंगी? आप को क्या मालूम मैं अपने दिल पर पत्थर रखे कैसे मुंह छिपाए बैठी थी. मुझे तो आप ने कभी कुछ नहीं दिया,’’ अलका जोरजोर से रोने लगी.

‘‘अरे अलका, तुम तो सचमुच बच्चों जैसी बातें करती हो. भला प्यार की नापतौल सोने और हीरे से की जाती है? प्यार तो दिल में होता है, पगली.’’

अलका झुंझला कर बोली, ‘‘उमा का पति आप से कितना जूनियर है, सरला का आदमी भी तो आप से जूनियर है. जब आप के जूनियर अफसर अपनी पत्नियों को हीरेजवाहरात का सैट दे सकते हैं, तो आप क्यों नहीं दे सकते? इस का मतलब तो यही है कि आप को मुझ से जरा भी…’’ अलका फिर से आंसू बहाने लगी.

‘‘अलका, मैं जानता हूं ये लोग अपनी पत्नियों को कैसे भेंट देते हैं, मगर मैं उस रास्ते पर नहीं जाना चाहता. अलका, तुम यह सोचो, हमें जो तनख्वाह मिलती है, उस में से घर का किराया दे कर, नौकरचाकर रख कर, अच्छी तरह खापी कर इस महंगाई के दिनों में कितने रुपए बचते हैं? जो थोड़ाबहुत बचता है, उस से हर महीने महंगीमहंगी चीजें खरीद कर लाना असंभव है,’’ दिनेश समझाने की कोशिश कर रहा था.‘‘मुझे किसी भी तरह वह हीरे का सैट चाहिए,’’ अलका चिल्लाती हुई बोली.

‘‘असंभव,’’ दिनेश रुकरुक कर बोला, ‘‘मैं सचाई के रास्ते पर चलता हूं. मुझे गलत रास्ते पसंद नहीं. रिश्वत लेना मैं गलत समझता हूं. अगर वे गलत तरीके से रुपए कमाते हैं, तो कमाने दो. मगर मैं अपने रास्ते से नहीं हटूंगा. तुम यह अच्छी तरह समझ लो.’’ दिनेश उत्तेजना से हांफ रहा था.

‘‘यही आप का अंतिम निर्णय है?’’ अलका गरजती हुई बोली.

‘‘हां.’’

‘‘तो आप भी जान लीजिए, मुझे जब तक जड़ाऊ सैट नहीं मिलेगा, मैं पानी भी नहीं पिऊंगी.’’

‘‘अरे भई, यह क्या बचपना है. सुनो तो…’’

मगर कौन सुनने वाला था. अलका पैर पटकती हुई दूसरे कमरे में चली गई और उस ने दरवाजा बंद कर लिया.

उस रात न तो अलका ने और न दिनेश ही ने खाना खाया. दिनेश बहुत परेशान था. वह सोच रहा था, ‘जो जिद अलका कर रही है, उसे निभाना उस के लिए असंभव है. तो क्या करे वह? वह अलका की जिद से भलीभांति परिचित था. तो क्या सचमुच अलका भूखहड़ताल कर के अपनी जान दे देगी?’ सोचतेसोचते न जाने कब उस की आंख लग गई. सुबह वह अलका से बोला, ‘‘अलका, हमारी शादी की वर्षगांठ 15 दिनों बाद है न?’’

अलका ने झट मुंह फेर लिया.

‘‘ओह, तुम बोलोगी भी नहीं. अरे, मैं मान गया तुम्हारी शर्त. 15 दिनों बाद देखना मैं तुम्हें क्या उपहार देता हूं,’’ दिनेश खुश नजर आ रहा था.

‘‘क्या?’’ अलका ने अस्फुट स्वर में पूछा.

‘‘मैं तुम्हें एक शानदार सैट उपहार में दूंगा,’’ दिनेश बोला.

‘‘सच?’’

‘‘हां सच,’’ दिनेश बोला, ‘‘और सुनो, हमारी शादी की सालगिरह पर जिनजिन को बुलाना है, उन की एक लिस्ट बना लो.’’

‘‘ओह, आप कितने अच्छे हैं,’’ खुशी से अलका की आंखें चमक उठीं.

आखिर शादी की सालगिरह का दिन आ गया. अलका उस दिन खूब सजधज कर तैयार हुई. वह मन ही मन बोली, ‘अब मैं सब को दिखा दूंगी, मेरा पति मुझे कितना प्यार करता है. सरला, उमा हर कोई मन ही मन जलेंगी.’

एकएक कर के मेहमानों से घर भरने लगा. चारों ओर से बधाइयां आ रही थीं. अलका ‘बहुतबहुत शुक्रिया’ कह कर सब का स्वागत कर रही थी. उधर, दिनेश भी मेहमानों की खातिरदारी में जुटा हुआ था. अचानक दिनेश ने अलका को बुलाया, ‘‘अरे, सुनो, तुम्हारा इन से परिचय करा दूं,’’ और एक बड़ी उम्र के व्यक्ति की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘ये हैं मिस्टर हंसराज. मेरे बौस.’’

‘‘नमस्ते,’’ अलका ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘नमस्ते,’’ मिस्टर हंसराज बोले, ‘‘अरे, मिसेज दिनेश, आप ने तो इतनी भारी पार्टी दे डाली. बहुत अच्छा बंदोबस्त किया है आप ने.’’

‘‘जी,’’ अलका कुछ शरमाती हुई बोली.

मिस्टर हंसराज खाना खा रहे थे और खातेखाते अलका से गपशप कर रहे थे. ‘‘सच, दिनेश इतना होनहार और ईमानदार है कि बस पूछिए मत. उस ने तो हमारी कंपनी की आय चौगुनी कर दी. पिछले 20 वर्षों के रिकौर्ड में शायद इतना नफा कभी नहीं हुआ. मेरा बस चले तो ईमानदारी के लिए दिनेश को पद्मश्री का खिताब दिलवा दूं.’’ कह कर मिस्टर हंसराज हंसने लगे.

‘‘’अलका, वह सदा इसी तरह ईमानदारी से काम करता रहा तो मैं बताए देता हूं एक दिन वह…’

वे बात को पूरी न कर पाए. अलका के गले में कुछ अटक गया था. वह खांस रही थी. खांसतेखांसते उस का चेहरा बिलकुल लाल हो गया था. तभी दिनेश भी वहां पहुंच गया और अलका की पीठ को जोरजोर से मलने लगा. अलका ने एक लंबी सांस ली और पूरा गिलास पानी पी गई. गले में अटका भोजन का टुकड़ा नीचे उतर गया था. आंख और मुंह को पोंछती हुई वह फिर खाने का कांटा और छूरी इस प्रकार चलाने लगी जैसे किसी के दिल की चीड़फाड़ कर रही हो.

मिस्टर हंसराज तो पहले ही अपनी बातूनी आदत के लिए विख्यात थे. वे कब चुप रहने वाले थे. वे बहुतकुछ बोलते जा रहे थे, मगर अलका के दिमाग में कुछ भी नहीं घुस रहा था. वे कह रहे थे, ‘‘बात यह है कि दिनेश के प्रति मेरी एक दुर्बलता है…आज अगर मेरा इकलौता पुत्र राजीव जिंदा रहता तो ठीक इसी उम्र का होता. खैर, अरे देखिए, हम भी खाते ही रह गए. सब ने तो खा भी लिया. अगर और ज्यादा देर इधर बैठे रहे तो लोग सोचेंगे, पार्टी का सारा खाना बूढ़ा खा गया.’’ और वे ठहाका मार कर हंसने लगे.

मगर अलका को न जाने क्या होता जा रहा था. उस का दम घुटने लगा. अलका, जो कुछ देर पहले खुशी से फूली नहीं समा रही थी, अब बिलकुल उदास लग रही थी.

सब मेहमानों को विदा कर के रात को जब अलका अपने कमरे में आई तो देखा दिनेश सामने खड़ा मुसकरा रहा है. हंसते हुए उस ने पूछा, ‘‘कहो, कैसी रही? मैं ने कहा था न बहुत शानदार पार्टी दूंगा. अब बोलो, तुम्हारे दिल में अब तो कोई शक नहीं कि…अरे, अलका, तुम रो क्यों रही हो? तुम्हें क्या हुआ? कुछ बोलो तो.’’

अलका दोनों हाथों से अपने गले को पकड़े थी, जैसे उस का दम घुट रहा हो. दिनेश ने प्यार से कहा, ‘‘अलका, क्या तुम्हें…’’ अलका से अब खड़ा नहीं हुआ जा रहा था. वह दिनेश से लिपट कर फूटफूट कर रोने लगी. और बोली, ‘‘मुझे यह हार काट रहा है. मेरा दम घुट रहा है. मेरी खुशी के लिए तुम ने घूस ली. तुम्हारे बौस को तुम पर कितना विश्वास है, उन की कितनी उच्च धारणाएं हैं तुम्हारे लिए, पर जब उन्हें मालूम होगा कि तुम बेईमान हो, घूसखोर हो तो…’’ अलका का रोना रुक नहीं रहा था.

‘‘मैं ने ही तुम्हें घूस लेने के लिए विवश किया, मैं ने ही तुम्हें गलत रास्ते की ओर पैर बढ़ाने को मजबूर किया. मैं ने बहुत बड़ा गलत काम किया है.’’

‘‘मगर यह बात अब तुम्हारे दिमाग में किस तरह आई?’’

‘‘जब तुम्हारे बौस यह कह रहे थे कि तुम कितने ईमानदार हो तो मेरे दिल में एक तीर सा चुभ रहा था.’’

‘‘मगर अलका, तुम्हें किस ने कहा है कि मैं ने यह पार्टी घूस के पैसों से दी?’’

‘‘वाह, आप ही ने तो कहा था कि जो तनख्वाह आप को मिलती है उस में इतनी खरीदारी नहीं कर सकते. उमा बता रही थी कि उस ने भी बिलकुल ऐसा ही सैट 2 लाख रुपए में लिया था और ऊपर से इतनी शानदार पार्टी. यह सब घूस के पैसे के बिना असंभव है. मुझे ये गहने काटे जा रहे हैं. मुझे नहीं चाहिए, नहीं चाहिए…’’

दिनेश अलका की बात सुन कर ठहाका मार कर हंसने लगा, ‘‘पागल, मैं यों दूसरी औरतों की बातों में नहीं आने वाला. अपनी आंखों से आंसू पोंछ डालो.’’

‘‘क्या?’’ अलका आश्चर्य से दिनेश का मुंह देखने लगी.

‘‘अरे, इस जड़ाऊ सैट का दाम केवल 3 हजार रुपए है.’’

‘‘क्या?’’ अलका ने अविश्वास से दिनेश की ओर देखा.

‘‘हां, यह कोई असली थोड़े ही है, यह तो नकली है. मैं ने सोचा, साल में 2 या 3 बार पहनने के लिए ये नकली गहने ही ठीक हैं. क्या फायदा सोने के उन जेवरों का जो चोरों के भय से बैंक के लौकर में पड़े रहते हैं.’’

‘‘सच, मगर पार्टी में तो बहुत पैसे निकल गए, उस का पैसा कहां से मिला.’’

दिनेश झट से बोला, ‘‘तुम्हारी सोने की करधनी गिरवी रख कर.’’

Romantic Story : क्रौसिंग की बत्ती – अपने स्वाभिमान को बनाए रखती युवती की कहानी

Romantic Story : कीया को आज अमर की याद आ गई थी. अमर के साथ बिताया वक्त वह भूल नहीं पाई थी लेकिन उसे भूल जाना ही अच्छा था.

क्रौ सिंग पर लालबत्ती यानी ठहरने का सिग्नल होने से पहले ही कीया अपनी गाड़ी निकाल लेना चाहती थी. लेकिन उसी क्षण रैड सिग्नल हो गया, गाड़ी रुक गई और उस के पीछे वाहनों की लंबी कतार. कीया ने अनुभव किया, जब कभी भी वह डेली रूटीन में 2-4 मिनट की चूक करती है, उसे मंजिल तक पहुंचने में देर हो जाती है, ‘लेट लतीफ’ का टाइटल कीया ने दूसरों के लिए संजो रखा है, वह तो ‘मिस राइट टाइम’ के नाम से जानी जाती है.

ट्रैफिक में फंसी कीया की नजर अपनी ही कंपनी द्वारा प्रायोजित एक होर्डिंग पर पड़ी जिस में दूधिया सफेदी लिए एक बच्ची साबुन का विज्ञापन कर रही है, जिस के नीचे लिखे स्लोगन पर कीया के अपने व्यक्तित्व की छाप है, ‘सुबह की कच्ची धूप भी काफी होती है उजाले के लिए. पर तुम तो पूरा सूरज ही उतार देती हो.’

दरअसल, यह स्लोगन अमर ने कीया के संदर्भ में कहा था. दोनों की पहली मुलाकात कुछ कम रोचक नहीं थी.

उस दिन थिएटर के हौल में अंधेरा था. परदे पर गब्बर दहाड़ रहा था, ‘अरे ओ सांभा, कितना मैल था कपड़ों में?’

बदले में सांभा मिमिया रहा था. मैल और साबुन की फाइटिंग चल रही थी, इतने में कोई अजनबी कीया के कानों में फुसफुसाया. रोशनी होने पर उस ने बड़ी ही शालीनता से अपना परिचय दिया, ‘मैं अमर हूं. आप की ही एड कंपनी में पोस्ंिटग हुई है मेरी.’

कीया की अजनबी आंखों में पहचान उभारने के लिए वह आगे भी बोल रहा था, ‘आप से मेरा परिचय नहीं हुआ, पर मैं आप को पहले से ही जानता हूं. बौस आप की बेहद तारीफ करते हैं. क्या आप वाकई उतनी फंटास्टिक वर्कर हैं?’

अमर का शरारती अंदाज कीया को भा गया. मूवी के बाद उस ने कीया को अपनी क्रेटा में साथ चलने का आग्रह किया.

‘ओह सौरी, मेरी गाड़ी सामने ही खड़ी है,’ कीया ने मना करते हुए कहा.

‘उसे बाद में मंगवा लेंगे. हमारी मंजिल एक है, मंसूबे भी एक ही होने चाहिए. आप कंपनी के सेवेंथ ब्लौक में रहतीं हैं न? मु?ो भी वहीं फ्लैट एलौट हुआ है,’ अमर कहने लगा.

कीया को थोड़ी उल?ान होने लगी.

इस बीच अमर आगे बोला, ‘आप को सचमुच अपनी गाड़ी की फिक्र है या आप किसी अजनबी पुरुष के साथ जाना नहीं चाहतीं?’

कीया को लगा अमर के इस वाक्य ने संपूर्ण नारी जाति को चुनौती दे दी है. अगले ही पल अमर कंपनी की मार्केटिंग एग्जीक्युटिव औफिसर मिस कीया के लिए अपनी क्रेटा कार का दरवाजा खोल रहा था. रास्ते में कीया ने जाना कि अमर ने अमेरिका स्थित हार्वर्ड से बिजनैस मैनेजमैंट की डिगरी हासिल की है और यहां मैनेजिंग डायरैक्टर के पद पर उस की पोस्ंिटग हुई है. कंपनी द्वारा बिजनैस कंसलटैंसी की शिक्षा देने के लिए संचालित ट्रेनिंग सैंटर में अकसर अमर के लैक्चर होते रहते हैं.

काम के प्रति लगन और दायित्वबोध ने कुछ ही दिनों में अमर और कीया के रिश्ते को जहां प्रगाढ़ किया, वहीं उन का कैरियर बुलंदी को छूने लगा. यह खुशी अमर कीया के साथ किसी फाइवस्टार होटल में सैलिब्रेट करना चाहता था, पर कीया ने बिना बताए, पहल कर के होटल में टेबल बुक करवा ली. डिनर के बाद अमर ने हमेशा की तरह कार का दरवाजा खोला, तो थैंक्स कहने के बजाय कीया चुपचाप जा कर कार सीट पर बैठ गई. उस की बगल में बैठे अमर के कानों में अपने मित्रों के शब्द गूंज रहे थे, ‘देखो तो, कैसे मर्द बनने की कोशिश कर रही है.’ पर दूसरे ही पल प्रशंसाभरी नजरें उस पर उकेर कर बोला, ‘कीया, तुम्हारा स्टाइल गजब का है. तुम्हारी पलकें गजब की हैं.’

कीया बदले में मुसकराने लगी.

‘तुम कहीं कोई बिजनैस मैनेजमैंट कोर्स क्यों नहीं जौइन कर लेतीं?’

‘क्यों?’
‘अरे बाबा, शादी के बाद घरद्वार संभालना है कि नहीं?’

कीया शरमा गई. उस ने महसूस किया कि अमर उस के प्यार में दीवाना हो रहा है. एक दिन तो हद हो गई जब अमर कह रहा था, ‘कीया, तुम बाल खुले मत रखा करो. दूसरे भी आकर्षित होते हैं.’

‘बस,’ कीया ने खिजाने के लिए कहा.
‘मु?ो द्रौपदी की याद आती है.’

‘वो…वो, उस ने तो पुरुषों को चुनौती देने के लिए बाल खोल रखे थे, पर मैं…मैं… जाने दो… बांध लेती हूं,’ कीया ने ?ोंपते हुए बाल बांध लिए थे.

कभीकभी कीया को लगता कि जैसे अमर के व्यक्तित्व में एक असुरक्षा की भावना पनप रही है, क्योंकि बिजनैस की बात पर बहस करतेकरते अमर अप्रासंगिक बात छेड़ देता. ‘आज की औरत स्वतंत्र नहीं, स्वच्छंद हो गई है.’

सुन कर कीया चिढ़ जाती, ‘तुम्हारे जैसे मर्द, औरत के तन की सुंदरता तो सम?ाते हैं, पर उन की दिमागी श्रेष्ठता को बरदाश्त नहीं कर पाते.’

अमर तमतमा कर उस समय तो चुप हो जाता लेकिन दोचार दिन बाद ऐसी ही किसी बात को ले कर फिर दोनों में बहस छिड़ जाती.

ऐसे ही दिन बीत रहे थे, तभी एकसाथ 2 सुखद घटनाएं घटीं. एक तो अमर को कंपनी द्वारा लंदन टूर पर जाने का औफर मिला, दूसरे कीया को बेस्ट मार्केटिंग का अवार्ड मिला. पर अमर इस खबर में शरीक होने से पहले अपने घरवालों से मिलने अचानक अपने गांव चला गया. कीया को अकेलापन बुरी तरह सता रहा था. उस ने सोचा शायद जाने से पहले अमर कोई मैसेज छोड़ गया हो. उस ने फोन चैक किया तो मैसेज उभरा, ‘जल्दी लौटूंगा. मां चाहती हैं लंदन जाने से पहले मैं शादी कर लूं.’

कीया शरमा गई. उस ने सोचा अमर प्रपोज कर रहा है. वह बेसब्री से अमर की प्रतीक्षा करने लगी. लगभग 2 सप्ताह बाद अमर किसी लड़की के साथ दरवाजे पर खड़ा था.

‘कहां थे अब तक,’ कीया का धीरज जवाब दे रहा था.

‘इन से मिलो, ये हैं रानी.’
इतने में रानी ने आगे बढ़ कर कीया को गले लगा लिया.

‘अरे, अरे, यह क्या कर रही हो?’
‘रानी बहुत अच्छा खाना बना लेती है. आप कहें तो चाय के साथ नाश्ता भी बना लाएगी. आप तब तक अपना अवार्ड दिखाइए,’ अमर ने मुसकराते हुए कहा.

‘कौन है ये, तुम्हारी रिश्तेदार या…?’

‘मां की पसंद है रानी.’

कीया ने जैसे कुछ नहीं सुना. रानी उस की पत्नी है तो क्या अमर गांव शादी करने गया था? लेकिन, कीया ने तो ऐसा नहीं सोचा था, वह तो यही सोचती रही कि अमर उसे प्यार करता है, उस के साथ शादी करना चाहता है.

‘खाना बना देगी, देखभाल करेगी, घर में रहेगी. आखिर हमारा व्यवसाय तो एक ही है. हम अब भी गर्लफ्रैंडबौयफ्रैंड तो रह ही सकते हैं?’

अचानक कीया उठ खड़ी हुई, ‘मिस्टर अमर, हमारा व्यवसाय एक हो सकता है, पर व्यक्तित्व एक नहीं है. मैं नहीं चाहती कि तुम मेरे व्यक्तित्व को व्यवसाय बनाओ. मैं सम?ा गई तुम मु?ो अपनी गर्लफ्रैंड नहीं मिस्ट्रैस बनाना चाहते हो. गेट आउट… गेट लौस्ट,’ कीया दहाड़ रही थी, ‘तुम लोग बुद्धिमान महिला से मिलना तो चाहते हो, पर शादी रसोइए, बावर्चिन से करते हो. बाजार का हिसाबकिताब करती पत्नी तुम्हें अच्छी लगती है, पर शेयर मार्केट का हिसाब अपने कब्जे में रखना चाहते हो.’

अकेले में नाराज कीया को तो अमर कैसे भी मना लेता, पर नवविवाहित पत्नी के सामने वह अपना अपमान बरदाश्त नहीं कर पाया. गुस्से में बोला, ‘आश्चर्य की बात है. आप ने ऐसा कैसे सोच लिया कि मैं आप से शादी करूंगा? आप गलतफहमी की शिकार हुई हैं. जैसा कि महिलाएं अकसर हो जाती हैं. मेरी पत्नी भी एक नारी है. आप उसे रसोइया, बावर्चिन कह रही हैं? आप पुरुषों का तो क्या, नारियों का सम्मान करना भी नहीं जानतीं.’ अमर का स्वर तल्ख हो उठा था.

‘पश्चिम में आप जैसी महिलाओं द्वारा वुमेंस लिबरेशन का दौर चलाया गया था. आप लोग पुरुषों से मिलना तो चाहती हैं मगर समानता के स्तर पर नहीं. आप पुरुषों को हीन बनाना चाहती हैं. घरगृहस्थी दो पहियों पर चलती है. आप लोग दूसरा पहिया बनना नहीं चाहती हैं. मैं 4 साल अमेरिका में रहा हूं. पश्चिम की औरत स्वतंत्र है. मगर आप जैसी महिलाओं की तरह स्वच्छंद नहीं है.’ और पैर पटकते हुए अमर बाहर निकल आया.

गुस्से में कीया ने अपने बालों के रिबन खोल डाले. कभी अमर कहा करता था कि बाल खोल कर वह द्रौपदी सी लगती है, यही सही. पर वह मिस्ट्रैस नहीं बन सकती, कभी नहीं.
अचानक अपनी तंद्रा से बाहर आई कीया ने हरी बत्ती देखी और कार आगे बढ़ा ली.

Best Love Story : हरी झंडी – सुरभि के पापा को किसने और क्यूं बताई सच्चाई?

Best Love Story : सुरभि गौरव से मिलते ही बोली, “अरे, तुम कुछ सोचते क्यों नहीं? मेरे मम्मीपापा हर दिन एक लड़के का बायोडाटा भेज रहे हैं और मिलने को कह रहे हैं. बताओ, मैं क्या करूं?”

“मैं क्या करूं? तुम तो जानती हो कि मेरे यहां दादाजी की रजामंदी के बिना कुछ नहीं हो सकता. तुम क्यों नहीं अपने मम्मीपापा को कहती हो कि वे जा कर बात करें?”

“हां, अब लगता है कि यही करना होगा.”

हिम्मत कर के रात में सुरभि ने फोन पर अपनी मम्मी से कहा, “मम्मी, तुम लोग लड़का देखना छोड़ दो. गौरव को तो तुम जानती हो. एक बार तुम बेंगलुरु आई थी, तो उस से मिली थी. हम लोग शादी करना चाहते हैं.”

“क्या…? तुम्हारे साथ तो कितने पढ़ने वालों से मैं मिली हूं… मुझे याद नहीं.”

“ठीक है, पहले पापा के कान में डाल दो. अभी गौरव का फोटो डाल दूंगी. बहुत तेज और अच्छा लड़का है. मेरी कंपनी में ही डाटा एनलिस्ट है.”

“देखती हूं,” कह कर सुरभि की मम्मी सरिता सोने गई, लेकिन चिंता से उस की नींद काफूर हो गई.

दूसरे दिन सरिता ने अपने पति संजीव को जब सुरभि की बात बताई तो घर में कोहराम मच गया. संजीव उस पर ही दोषारोपण करने लगा, “तुम ने ही उसे बहुत छूट दे दी है. अरे, उसे इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए भेजा था कि प्रेम करने के लिए. पता नहीं, कौन सी जाति है, कैसा परिवार है?”

“अब आजकल जाति क्या देखना है… जब लड़की और लड़का एकदूसरे को पसंद कर रहे हैं, तो हम क्या कर सकते हैं? वैसे भी आजकल शादीब्याह तय करना भी आसान नहीं रहा. शादी हो जाए तो निभाना आसान नहीं,” अपनी आदत के अनुसार सरिता ने जोड़ दिया, “अब हमारा जमाना तो रहा नहीं. बिना हमारे मिले, देखे, सुने, बड़ों की मरजी से शादी हुई और चल रही है.”

“हमेशा अपना क्या ले कर बैठ जाती हो, बेटी से पूछो कि क्या करना है?”

फिर बेटी के कहने पर पापा संजीव गौरव के दादाजी से मिलने उस के घर जाने को तैयार हुए. रविवार को सरिता और संजीव दोनों ही अपनी गाड़ी से रांची से जमशेदपुर के लिए निकले. सड़क अच्छी बन गई है, ढाई घंटे में पहुंच गए. वहां घर जा कर पता चला कि परिवार में उस के दादा ही उस के संरक्षक हैं. उस के मातापिता की मौत बचपन में ही हो चुकी है. अब यह संजीव को दूसरा झटका लगा.

उन्होंने अपनी मनःस्थिति को दबाते हुए बताया कि उन की बेटी सुरभि और उन का पोता गौरव एकदूसरे को पसंद करते हैं और शादी करना चाहते हैं.

इतना सुनना था कि उस के दादा भड़क गए. वे कहने लगे कि गौरव ने तो कोई ऐसी बात नहीं बताई. उसे तो अभी बाहर जा कर आगे की पढ़ाई करनी है. एमएस करने जाना है. वे बस अपनी बोलते जा रहे थे. वे बता रहे थे कि कितनी परेशानी से उस की देखभाल की, पालापोसा.

संजीव को गौरव पर भी गुस्सा आने लगा, लेकिन वे जो बोल रहे थे, चुपचाप सुन रहे थे. पर वे अभी शादी के लिए कुछ सुनने को तैयार नहीं थे. बुढ़ापे का अजीब सा सनकीपना सवार था.

सरिता ने एक बार उन से कुछ कहना चाहा, तो वे गुस्सा गए. अंत में संजीव ने उन्हें पहले गौरव से बात करने को कह दिया और वहां से चाय पी कर विदा ली.

गाड़ी में बैठते ही उन्होंने अपनी बेटी को कोसना शुरू किया, “इतने अच्छेअच्छे रिश्ते आ रहे हैं. अरे, उस ने ऐसा क्या देखा गौरव में? न ढंग का परिवार है और न अपनी जातिबिरादरी का है. बुड्ढा अलग खूंसट है, कुछ सुनना भी नहीं चाहता.”

यह सोच कर उन का मन दुखी हो गया. अब कहीं जाने की इच्छा नहीं हो रही. पर, आने से पहले उन्होंने अपने प्रिय दोस्त को फोन पर कहा था कि तेरे से जरूर मिलना होगा.

उदास मन से अपने दोस्त के घर पहुंचे, तो वहां दोस्त और उस की पत्नी की आत्मीयता, उन के आवभगत से मन खुश हो गया. पुरानी बातों, हंसीठहाकों के बीच वे भूल ही गए कि किस काम से आए हैं. मन प्रफुल्लित हो गया. दोपहर का खाना खाने के बाद बैठे, तब असल मुद्दा निकल कर सामने आया.

संजीव ने बताया कि किस काम से और कहां से हो कर आ रहे हैं. बेटी की जिद के आगे झुकना पड़ रहा है, लेकिन लड़के का दादा जिस ने उसे पालपोस कर बड़ा किया है, बड़ा ही सनकी है. कुछ सुनना नहीं चाहता.

अपने दोस्त को जब संजीव ने उन के घर का पता बताया और यह भी कि लड़के के मातापिता नहीं हैं. विस्तार से जानकारी मिलने पर उन का दोस्त बोल पड़ा, “यार, सचमुच दुनिया गोल है. मैं तो उन्हें अच्छी तरह जानता हूं. वे मेरे ममेरे भाई के बहनोई लगते हैं.”

“क्या…? “आश्चर्यमिश्रित संजीव की आवाज आई.

“लेकिन यार, एक बात यह भी जान ले कि उस के मातापिता की मौत एक्सीडेंट से नहीं एड्स से हुई थी. जब उन का बेटा गौरव अपनी मां के पेट में रहा, तो जांच के क्रम में पता चला कि मां पौजिटिव हैं.”

आश्चर्य से सरिता कह उठी, “क्या…?”

“हां, उस की मां को शादी के बाद खून चढ़ाने की जरूरत पड़ी और वही खून चढ़ाना उन के जीवन का काल बन गया.

“अब कहां चूक हुई, वे एचआईवी पौजिटिव हो गईं. उन से गौरव के पिता भी पौजिटिव हो गए. आज तो सब को पता है कि सुरक्षा के साथ यौन संबंध बनाने से इस से बचा जा सकता है, पर आज से 30-35 साल पहले क्या स्थिति थी, तुम जानते ही हो. एड्स का नाम लेने में भी लोग डरते थे. डाक्टर इलाज तक नहीं करना चाहते थे. अस्पताल ऐसे मरीज को एडमिट नहीं करते थे. वे लोग दिल्ली तक दिखाने गए, लेकिन उन की हालत तो अछूत वाली हो गई.

“उसी समय ये लोग जमशेदपुर आ गए. उन के एक करीबी डाक्टर ने सुरक्षित प्रसव कराया. उन का बेटा एचआईवी निगेटिव हुआ. और देख ही रहे हो, वह स्वस्थ है. पर उस के मातापिता की 2-3 वर्षों के अंदर ही मौत हो गई. 5-6 साल हुए इन की पत्नी भी नहीं रही.

“अब तुम उस के दादा के सनकी होने का कारण समझ सकते हो. लेकिन, तू चिंता न कर. मैं अपने भाई को कहूंगा, वे जरूर उन्हें मना लेंगे. ”

संजीव के दोस्त ने तो विस्तार से सारी बातें बता दी. अब उसे दूसरी चिंता ने घेर लिया. अगर शादी हो भी जाती है तो ऐसा न हो कि उन की संतान कोई आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित हो जाए.

घर पहुंच कर सरिता ने बेटी सुरभि को सारी बातें बता दींं, अपने मन का भ्रम, उस के दादाजी की बातें. और कुछ दिनों के लिए शादी का मुद्दा घर से गायब हो गया. सरिता को लगा कि सुरभि और गौरव के दिमाग से भी यह खत्म हो जाएगा.

लेकिन 15 दिन ही बीते होंगे कि सुरभि ने चहकते हुए कहा कि गौरव के दादाजी तैयार हो गए हैं. आप लोग जा कर मिल लें. और कोशिश कीजिए कि मंदिर में बिना तामझाम और भीड़भाड़ के शादी हो.

सुरभि के पापा गुस्साते हुए कहने लगे, “शादी के बारे में बाद में सोचेंगे, पहले तुम गौरव का जैनेटिक टैस्ट कराओ, भविष्य में कोई दिक्कत न हो. तुम दोनों ब्लड टैस्ट कराओ. सारी रिपोर्ट भेजो तो ही आगे बात होगी.”

अब मरता क्या न करता. सुरभि और गौरव वहां जैनेटिक डाक्टर से मिले. उस ने ब्लड सैंपल ले कर जैनेटिक टैस्ट किया. उस ने यह बताया कि इस टैस्ट से आनुवंशिक बीमारी का पता लगा सकते हैं और जांच के परिणाम से शुरुआती उपचार के विकल्प चुन सकते हैं.

गौरव के टैस्ट के बाद डाक्टर ने बताया कि गौरव पूरी तरह स्वस्थ है. उस के संतान में आनुवंशिक गड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं है.

डाक्टर ने यह भी बताया कि आजकल लोग जन्मकुंडली न मिला कर ब्लड ग्रुप का मिलान करते हैं. इस के सही मिलान से दांपत्य जीवन सुखमय और सुखद होता है.

सुरभि और गौरव ने ब्लड ग्रुप का मिलान भी करवा लिया. डाक्टर ने इस पहल के लिए सुरभि और गौरव की प्रशंसा की.

सारी रिपोर्टें सुरभि अपने ने पापा को भेज दीं और चैन की सांस ली. रिपोर्ट के आधार पर डाक्टर की हरी झंडी मिल गई है. उन के विवाह में अब कोई बाधा नहीं है.

इस खुशी को सैलिब्रेट करने के लिए गौरव और सुरभि डिनर एकसाथ करने के लिए एक विशेष रेस्तरां में बैठे हैं.

बैठेबैठे सुरभि अपने पापा की तरह सोच रही है कि खुशहाल वैवाहिक जिंदगी के लिए स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना और स्वस्थ होना जरूरी है.

Family Story : मां और मोबाइल – क्या थी मां की ख्वाहिश ?

Family Story : ‘‘मेरा मोबाइल कहां है? कितनी बार कहा है कि मेरी चीजें इधरउधर मत किया करो पर तुम सुनती कहां हो,’’ आफिस जाने की हड़बड़ी में मानस अपनी पत्नी रोमा पर बरस पड़े थे.

‘‘आप की और आप के बेटे राहुल के कार्यालय और स्कूल जाने की तैयारी में सुबह से मैं चकरघिन्नी की तरह नाच रही हूं, मेरे पास कहां समय है किसी को फोन करने का जो मैं आप का मोबाइल लूंगी,’’ रोमा खीझपूर्ण स्वर में बोली थी.

‘‘तो कहां गया मोबाइल? पता नहीं यह घर है या भूलभुलैया. कभी कोई सामान यथास्थान नहीं मिलता.’’

‘‘क्यों शोर मचा रहे हो, पापा? मोबाइल तो दादी मां के पास है. मैं ने उन्हें मोबाइल के साथ छत पर जाते देखा था,’’ राहुल ने मानो बड़े राज की बात बताई थी.

‘‘तो जा, ले कर आ…नहीं तो हम दोनों को दफ्तर व स्कूल पहुंचने में देर हो जाएगी…’’

पर मानस का वाक्य पूरा हो पाता उस से पहले ही राहुल की दादी यानी वैदेहीजी सीढि़यों से नीचे आती हुई नजर आई थीं.

‘‘अरे, तनु, मेरे ऐसे भाग्य कहां. हर घर में तो श्रवण कुमार जन्म लेता नहीं,’’ वे अपने ही वार्त्तालाप में डूबी हुई थीं.

‘‘मां, मुझे देर हो रही है,’’ मानस अधीर स्वर में बोले थे.

‘‘पता है, इसीलिए नीचे आ रही हूं. तान्या से बात करनी है तो कर ले.’’

‘‘मैं बाद में बात कर लूंगा. अभी तो मुझे मेरा मोबाइल दे दो.’’

‘‘मुझे तो जब भी किसी को फोन करना होता है तो तुम जल्दी में रहते हो. कितनी बार कहा है कि मुझे भी एक मोबाइल ला दो, पर मेरी सुनता ही कौन है. एक वह श्रवण कुमार था जिस ने मातापिता को कंधे पर बिठा कर सारे तीर्थों की सैर कराई थी और एक मेरा बेटा है,’’ वैदेहीजी देर तक रोंआसे स्वर में प्रलाप करती रही थीं पर मानस मोबाइल ले कर कब का जा चुका था.

‘‘मोबाइल को ले कर क्यों दुखी होती हैं मांजी. लैंडलाइन फोन तो घर में है न. मेरा मोबाइल भी है घर में. मैं भी तो उसी पर बातें करती हूं,’’ रोमा ने मांजी को समझाना चाहा था.

‘‘तुम कुछ भी करो बहू, पर मैं इस तरह मन मार कर नहीं रह सकती. मैं किसी पर आश्रित नहीं हूं. पैंशन मिलती है मुझे,’’ वैदेही ने अपना क्रोध रोमा पर उतारा था पर कुछ ही देर में सब भूल कर घर को सजासंवार कर रोमा को स्नानगृह में गया देख कर उन्होंने पुन: अपनी बेटी तान्या का नंबर मिलाया था.

‘‘हैलो…तान्या, मैं ने तुम से जैसा करने को कहा था तुम ने किया या नहीं?’’ वे छूटते ही बोली थीं.

‘‘वैदेही बहन, मैं आप की बेटी तान्या नहीं उस की सास अलका बोल रही हूं.’’

‘‘ओह, अच्छा,’’ वे एकाएक हड़बड़ा गई थीं.

‘‘तान्या कहां है?’’ किसी प्रकार उन के मुख से निकला था.

‘‘नहा रही है. कोई संदेश हो तो दे दीजिए. मैं उसे बता दूंगी.’’

‘‘कोई खास बात नहीं है, मैं कुछ देर बाद दोबारा फोन कर लूंगी,’’ वैदेही ने हड़बड़ा कर फोन रख दिया था. पर दूसरी ओर से आती खनकदार हंसी ने उन्हें सहमा दिया था.

‘कहीं छोकरी ने बता तो नहीं दिया सबकुछ? तान्या दुनियादारी में बिलकुल कच्ची है. ऊपर से यह फोन. स्थिर फोन में यही तो बुराई है. घरपरिवार को तो क्या सारे महल्ले को पता चल जाता है कि कहां कैसी खिचड़ी पक रही है. मोबाइल फोन की बात ही कुछ और है…किसी भी कोने में बैठ कर बातें कर लो.’ उन की विचारधारा अविरल जलधारा की भांति बह रही थी कि अचानक फोन की घंटी बज उठी थी.

‘‘हैलो मां, मैं तान्या. मां ने बताया कि जब मैं स्नानघर में थी तो आप का फोन आया था. कोई खास बात थी क्या?’’

‘‘खास बात तो कितने दिनों से कर रही हूं पर तुम्हें समझ में आए तब न. अरे, जरा अक्ल से काम लो और निकाल बाहर करो बुढि़या को. जब देखो तब तुम्हारे यहां पड़ी रहती है. कब तक उस की गुलामी करती रहोगी?’’

‘‘धीरे बोलो मां, कहीं मांजी ने सुन लिया तो बुरा मानेंगी.’’

‘‘फोन पर हम दोनों के बीच हुई बात को कैसे सुनेगी वह?’’

‘‘छोड़ो यह सब, शनिवाररविवार को आप से मिलने आऊंगी तब विस्तार से बात करेंगे. जो जैसा चल रहा है चलने दो. क्यों अपना खून जलाती हो.’’

‘‘मैं तो तेरे भले के लिए ही कहती हूं पर तुम लोगों को बुरा लगता है तो आगे से नहीं कहूंगी,’’ वैदेही रोंआसे स्वर में बोली थीं.

‘‘मां, क्यों मन छोटा करती हो. हम सब आप का बड़ा सम्मान करते हैं. यथाशक्ति आप की सलाह मानने का प्रयत्न करते हैं पर यदि आप की सलाह हमारा अहित करे तो परेशानी हो जाती है.’’

‘‘लो और सुनो, अब तुम्हें मेरी बातों से परेशानी भी होने लगी. ठीक है, आज से कुछ नहीं कहूंगी,’’ वैदेही ने क्रोध में फोन पटक दिया था और मुंह फुला कर बैठ गई थीं.

‘‘क्या हुआ, मांजी, सब ठीक तो है?’’ उन्हें दुखी देख कर रोमा ने प्रश्न किया.

‘‘क्यों? तुम्हें कैसे लगा कि सब ठीक नहीं है?’’ वैदेही ने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न ही पूछ लिया.

‘‘आप का मूड देख कर.’’

‘‘मैं सब समझाती हूं. छिप कर मेरी बातें सुनते हो तुम लोग. इसीलिए तो मोबाइल लेना चाहती हूं मैं.’’

‘‘मैं ने आज तक कभी किसी का फोन वार्त्तालाप नहीं सुना. आप को दुखी देख कर पूछ लिया था. आगे से ध्यान रखूंगी,’’ रोमा तीखे स्वर में बोली और अपने काम में व्यस्त हो गई.

वैदेही बेचैनी से तान्या के आने की प्रतीक्षा करती रही कि कब तान्या आए और कब वे उस से बात कर के अपना मन हलका करें पर जब सांझ ढलने लगी और तान्या नहीं आई तो उन का धीरज जवाब देने लगा. मानस सुबह से अपने मोबाइल से इस तरह चिपका था कि उन्हें तान्या से बात करने का अवसर ही नहीं मिल रहा था.

‘‘मुझे अपनी सहेली नीता के यहां जाना है, मांजी. मैं सुबह से तान्या दीदी की प्रतीक्षा में बैठी हूं पर लगता है कि आज वे नहीं आएंगी. आप कहें तो मैं थोड़ी देर के लिए नीता के घर हो आऊं. उस का बेटा बीमार है,’’ रोमा ने आ कर वैदेही से अनुनय की तो वे मना न कर सकीं.

रोमा को घर से निकले 10 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि तान्या ने कौलबेल बजाई.

‘‘लो, अब समय मिला है तुम्हें मां से मिलने आने का? सुबह से दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठी हूं. आंखें भी पथरा गईं.’’

‘‘इस में टकटकी लगा कर बैठने की क्या बात थी, मां?’’ मानस बोल पड़ा, ‘‘आप मुझे से कहतीं मैं तान्या दीदी से फोन कर के पूछ लेता कि वे कब तक आएंगी.’’

‘‘लो और सुनो, सुबह से पता नहीं किसकिस से बात कर रहा है तेरा भाई. सारे काम फोन कान से चिपकाए हुए कर रहा है. बस, सामने बैठी मां से बात करने का समय नहीं है इस के पास.’’

‘‘क्या कह रही हो मां. मैं तो सदासर्वदा आप की सेवा में मौजूद रहता हूं. फिर राहुल है, रोमा है जितनी इच्छा हो उतनी बात करो,’’ मानस हंसा.

‘‘2 बेटों, 2 बेटियों का भरापूरा परिवार है मेरा पर मेरी सुध लेने वाला कोई नहीं है. यहां आए 2 सप्ताह हो गए मुझे, तान्या को आज आने का समय मिला है.’’

‘‘मेरा बस चले तो दिनरात आप के पास बैठी रहूं. पर आजकल बैंक में काम बहुत बढ़ गया है. मार्च का महीना है न. ऊपर से घर मेहमानों से भरा पड़ा है. 3-4 नौकरों के होने पर भी अपने किए बिना कुछ नहीं होता,’’ तान्या ने सफाई दी थी.

‘‘इसीलिए कहती हूं अपने सासससुर से पीछा छुड़ाओ. सारे संबंधी उन से ही मिलने तो आते हैं.’’

‘‘क्या कह रही हो मां, कहीं मांजी ने सुन लिया तो गजब हो जाएगा. बहुत बुरा मानेंगी.’’

‘‘पता नहीं तुम्हें कैसे शीशे में उतार लिया है उन्होंने. और 2 बेटे भी तो हैं, वहां क्यों नहीं जा कर रहतीं?’’

‘‘जौय और जोषिता को मांजी ने बचपन से पाल कर बड़ा किया है. अब तो स्थिति यह है कि बच्चे उन के बिना रह ही नहीं पाते. दोचार दिन के लिए भी कहीं जाती हैं तो बच्चे बीमार पड़ जाते हैं.’’

‘‘तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को कठपुतली बना कर रखा है उन्होंने. जैसा चाहते हैं वैसा नचाते हैं दोनों. सारा वेतन रखवा लेते हैं. दुनिया भर का काम करवाते हैं. यह दिन देखने के लिए ही इतना पढ़ायालिखाया था तुम्हें?’’

‘‘किसी ने जबरदस्ती मेरा वेतन कभी नहीं छीना है मां. उन के हाथ में वेतन रखने से वे लोग भी प्रसन्न हो जाते हैं और मेरे सासससुर भी वह पैसा अपनी जेब में नहीं रख लेते बल्कि उन्हें हमारे पर ही खर्च कर देते हैं. जो बचता है उसे निवेश कर देते हैं. ’’

‘‘पर अपना पैसा उन के हाथ में दे कर उन की दया पर जीवित रहना कहां की समझदारी है?’’

‘‘मां, आप क्यों तान्या दीदी के घर के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करती हैं,’’ इतनी देर से चुप बैठा मानस बोला था.

‘‘अरे, वाह, अपनी बेटी के हितों की रक्षा मैं नहीं करूंगी तो कौन करेगा. पर मेरी बेटी तो समझ कर भी अनजान बनी हुई है.’’

‘‘मां, मैं आप के सुझावों का बहुत आदर करती हूं पर साथ ही घर की सुखशांति का विचार भी करना पड़ता है.’’

‘‘वही तो मैं कह रहा हूं. अपनी समस्याएं क्या कम हैं, जो आप तान्या दीदी की समस्याएं सुलझने लगीं? और मां, आप ने तो दीदी के आते ही अपने सुझावों की बमबारी शुरू कर दी. न चाय, न पानी…कुछ तो सोचा होता,’’ मानस ने मां को याद दिलाया.

‘‘रोमा अभी तक लौटी नहीं जबकि उसे पता था कि तान्या आने वाली है. फोन करो कि जल्दी से घर आ जाए.’’

‘‘फोन करने की जरूरत नहीं है. वह स्वयं ही आ जाएगी. उस की मां आई हुई हैं, उन से मिलने गई है.’’

‘‘मां आई हुई हैं? मुझ से तो कह कर गई है कि नीता का बेटा बीमार है. उसे देखने जा रही है.’’

‘‘उसे भी देखने गई है. कई दिनों से सोच रही थी पर जा नहीं पा रही थी. नीता के घर के पास रोमा के दूर के रिश्ते के मामाजी रहते हैं. वे बीमार हैं और रोमा की मम्मी उन्हें देखने आई हुई हैं.’’

‘‘ठीक है, सब समझ में आ गया. मां से मिलने जा रही हूं यह भी तो कह कर जा सकती थी, झुठ बोल कर जाने की क्या आवश्यकता थी. रोमा अपना फोन तो ले कर गई है?’’

‘‘हां, ले गई है.’’

‘‘ला, अपना फोन दे तो मैं उस से बात करूंगी.’’

‘‘क्या बात करेंगी आप? वह अपनेआप आ जाएगी,’’ मानस ने तर्क दिया.

‘‘फोन कर दूंगी तो जल्दी आ जाएगी. तान्या आई है तो खाना खा कर ही जाएगी न…’’

‘‘आप चिंता न करें मां, मैं खाना नहीं खाऊंगी. आप को जो खाना है मैं बना देती हूं,’’ तान्या ने उन्हें बीच में ही टोक दिया.

‘‘फोन तो दे मानस, रोमा से बात करनी है,’’ वैदेही जिद पर अड़ी थीं.

‘‘एक शर्त पर मोबाइल दूंगा कि आप रोमा से कुछ नहीं कहेंगी. बेचारी कभीकभार घर से बाहर निकलती है. दिनभर घर के काम में जुटी रहती है.’’

‘‘ठीक है, रोमा को कुछ नहीं कहूंगी, उस की मां से बात करूंगी. कहूंगी आ कर मिल जाएं. बहुत लंबे समय से मिले नहीं हम दोनों.’’

मां को फोन थमा कर मानस और तान्या रसोईघर में जा घुसे थे.

‘‘हैलो रोमा, तुम नीता के बीमार बेटे से मिलने की बात कह कर गई थीं. सौदामिनी बहन के आने की बात तो साफ गोल कर गईं तुम,’’ वैदेही बोलीं.

‘‘नहीं मांजी, ऐसा कुछ नहीं था. मुझे लगा, आप नाराज होंगी,’’ रोमा सकपका गई.

‘‘लो भला, मांबेटी के मिलने से भला मैं क्यों नाराज होने लगी? सौदामिनी बहन को फोन दो जरा. उन से बात किए हुए तो महीनों बीत गए,’’ वैदेहीजी का अप्रत्याशित रूप से मीठा स्वर सुन कर रोमा का धैर्य जवाब देने लगा था. उस ने तुरंत फोन अपनी मां सौदामिनी को थमा दिया था.

‘‘नमस्ते, सौदामिनी बहन. आप तो हमें भूल ही गईं,’’ उन्होंने उलाहना दिया.

‘‘आप को भला कैसे भूल सकती हूं दीदी, पर दुनिया भर के पचड़ों से समय ही नहीं मिलता.’’

‘‘तो यहां तक आ कर क्या हम से मिले बिना चली जाओगी? मेरा तो सब से मिलने को मन तरसता रहता है. इसीलिए बच्चों से कहती हूं एक मोबाइल ला दो, कम से कम सब से बात कर के मन हलका कर लूंगी.’’

रसोईघर में भोजन का प्रबंध करते मानस और तान्या हंस पड़े थे, ‘‘मां फिर मोबाइल पुराण ले कर बैठ गईं, लगता है उन्हें मोबाइल ला कर देना ही पड़ेगा.’’

‘‘मैं ने भी कई बार सोचा पर डरती हूं अपना मोबाइल मिलते ही वे हम भाईबहनों का तो क्या, अपने खानेपीने का होश भी खो बैठेंगी.’’

‘‘मुझे दूसरा ही डर है. फोन पर ऊलजलूल बात कर के कहीं कोई नया बखेड़ा न खड़ा कर दें.’’

‘‘जो भी करें, उन की मर्जी है. पर लगता है कि अपने अकेलेपन से जूझने का इन्होंने नया ढंग ढूंढ़ निकाला है.’’

‘‘चलो, तान्या दीदी, आज ही मां के लिए मोबाइल खरीद लाते हैं. इन का इस तरह फोन के लिए बारबार आग्रह करना अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘चाय तैयार है. चाय पी कर चलते हैं, भोजन लौट कर करेंगे,’’ तान्या ने स्वीकृति दी थी.

‘‘मैं रोमा और जीजाजी दोनों को फोन कर के सूचित कर देता हूं कि हम कुछ समय के लिए बाहर जा रहे हैं.’’

‘‘कहां जा रहे हो तुम दोनों?’’ वैदेही ने अपना दूरभाष वार्त्तालाप समाप्त करते हुए पूछा.

‘‘हम दोनों नहीं, हम तीनों. चाय पियो और तैयार हो जाओ, आवश्यक कार्य है,’’ मानस ने उन का कौतूहल शांत करने का प्रयत्न किया.

वे उन्हें मोबाइल की दुकान पर ले गए तो उन की प्रसन्नता की सीमा न रही. मानो कोई मुंह में लड्डू ठूंस दे और उस का स्वाद पूछे.

वैदेहीजी के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे लंबे समय से अपने मनपसंद खिलौने के लिए मचलते बच्चे को उस का मनपसंद खिलौना मिल गया हो.

उन्होंने अपनी पसंद का अच्छा सा मोबाइल खरीदा जिस से अच्छे छायाचित्र खींचे जा सकते थे. घर के पते आदि का सुबूत देने के बाद उन के फोन का नंबर मिला तो उन का चेहरा खिल उठा.

‘‘आप को अपना फोन प्रयोग में लाने के लिए 24 घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी,’’ सेल्समैन ने बताया तो वे बिफर उठीं.

‘‘यह कौन सी दुकान पर ले आए हो तुम लोग मुझे इन्हें तो फोन चालू करने में ही 24 घंटे लगते हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं है, मां जहां आप ने इतने दिनों तक प्रतीक्षा की है एक दिन और सही,’’ तान्या ने समझना चाहा.

‘‘तुम नहीं समझोगी. मेरे लिए तो एक क्षण भी एक युग की भांति हो गया है,’’ उन्होंने उत्तर दिया.

घर पहुंचते ही फोन को डब्बे से निकाल कर उस के ऊपर मोमबत्ती जलाई गई. फिर बुला कर सब में मिठाई बांटी, मानो मोबाइल का जन्म उन्हीं के हाथों हुआ था और उस के चालू होने की प्रतीक्षा की जाने लगी.

यह कार्यक्रम चल ही रहा था कि रोमा, सौदामिनी और अपने मामा आलोक बाबू के साथ आ पहुंची.

वैदेही का नया फोन आना ही सब से बड़ा समाचार था. उन्होंने डब्बे से निकाल कर सब को अपना नया मोबाइल फोन दिखाया.

‘‘कितना सुंदर फोन है,’’ राहुल तो देखते ही पुलक उठा.

‘‘दादी मां, मु?ो भी दिया करोगी न अपना मोबाइल?’’

‘‘कभीकभी, वह भी मेरी अनुमति ले कर. छोटे बच्चों पर नजर रखनी पड़ती है न सौदामिनी बहन.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ सौदामिनी ने सिर हिला दिया था.

‘‘सच कहूं, तो आज कलेजा ठंडा हो गया. यों तो राहुल को छोड़ कर सब के पास अपनेअपने मोबाइल हैं. पर अपनी चीज अपनी ही होती है. आयु हो गई है तो क्या हुआ, मैं ने तो साफ कह दिया कि मुझे तो अपना मोबाइल फोन चाहिए ही. मैं क्या किसी पर आश्रित हूं? मुझे पैंशन मिलती है,’’ वे देर तक सौदामिनी से फोन के बारे में बातें करती रही थीं.

कुछ देर बाद सौदामिनी और आलोक बाबू ने जाने की अनुमति मांगी थी.

‘‘आप ने फोन किया तो लगा कि यहां तक आ कर आप से मिले बिना जाना ठीक नहीं होगा,’’ सौदामिनी बोलीं.

‘‘यही तो लाभ है मोबाइल फोन का. अपनों को अपनों से जोड़े रखता है,’’ वैदेही ने उत्तर दिया.

‘‘चिंता मत करना. अब मेरे पास अपना फोन है. मैं हालचाल लेती रहूंगी.’’

‘‘मैं भी आप को फोन करती रहूंगी. आप का नंबर ले लिया है मैं ने,’’ सौदामिनी ने आश्वासन दिया था.

हाथ में अपना मोबाइल फोन आते ही वैदेही का तो मानो कायाकल्प ही हो गया. उन का मोबाइल अब केवल वार्त्तालाप का साधन नहीं है. उन के परिचितों, संबंधियों और दोस्तों के जवान बेटेबेटियों का सारा विवरण उन के मोबाइल में कैद है. वे चलताफिरता मैरिज ब्यूरो बन गई हैं. पहचान का दायरा इतना विस्तृत हो गया है कि किसी का भी कच्चा चिट्ठा निकलवाना हो तो लोग उन की ही शरण में आते हैं.

‘‘इस बुढ़ापे में भी अपने पांवों पर खड़ी हूं मैं. साथ में पैंशन भी मिलती है,’’ वे शान से कहती हैं. और एक राज की बात. उन के पास अब एक नहीं 5 मोबाइल फोन हैं जो पहले दूरभाष पर उन के लंबे वार्त्तालाप का उपहास करते थे अब उसी गुण के कारण उन का सम्मान करने लगे हैं.

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