Download App

Emotional Hindi Story : आज भी है श्रवण कुमार

Emotional Hindi Story : श्रवण कुमार केवल पहले ही नहीं, आज के समय में भी काफी पाए जाते हैं. यदि आप को विश्वास नहीं है तो गंगाधर के पास आ कर स्थानांतरण के इन आवेदनों को पढ़ लें. आंखों का जाला हट जाएगा, एक नहीं अनेक श्रवण कुमार मिलेंगे. स्थापना शाखा में पदस्थापना होने से गंगाधार का दिनभर वास्ता स्थानांतरणों संबंधी भिन्नभिन्न तरह की अर्जियों से पड़ता. क्या महिला क्या पुरुष, क्या कनिष्ठ क्या वरिष्ठ, क्या मैदानी क्या कार्यालय पदस्थापना वाले कर्मी. सब के सबों के स्थानांतरण के भिन्नभिन्न आवेदनों में एक तरह की अभिन्नता रहती.

मां-बाप के प्रति उमड़ता ऐसा श्रद्धाभाव देख श्रवण कुमार भी सकुचा जाता. गंगाधर ठहरा एक होनहार कर्मी. तो उस ने डाटा एनालिसिस के इस युग में स्थानांतरण के आवेदन पत्रों का विश्लेषण करना शुरू कर दिया. किसकिस बीमारी के कितने प्रतिशत आवेदन हैं. एक व्यक्ति आखिर स्थानांतरण चाहता क्यों है. बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए, पदस्थापना स्थल में मनोरंजन के साधनों की कमी, मांबाप या सासससुर की बीमारी या अन्य किसी कारण से.

बड़े गजब के रुझान सामने आए. उन में से कुछ प्रमुख आप के लाभार्थ नीचे हैं. 90 प्रतिशत आवेदन मांबाप की बीमारी हेतु देखभाल के वास्ते होते हैं. इस में 70 प्रतिशत से अधिक कैंसर या हार्ट या किडनी आदि गंभीर बीमारियों वाले होते हैं. इन सभी आवेदकों के माता या पिता अत्यधिक बुजुर्ग होते हैं. 21 साल के रंगरूट व 42 साल के पके कर्मी दोनों के ही मातापिता अनिवार्यतौर से अत्यधिक पके हुए यानी बुजुर्ग होते हैं. बुजुर्ग के साथ ही साथ वे किसी न किसी असाध्य बीमारी से भी अवश्य पीडि़त रहते हैं. कुछ आवेदन तो 50 वर्ष पार कर चुके कर्मियों के होते हैं.

ऐसे आवेदनों में यह समझना मुश्किलभरा होता है कि ये अपनी बुजुर्गियत की बात कर रहे होते हैं या कि अपने मांबाप की. ऐसे आवेदनों का लब्बोलुआब होता है आवेदक का मांबाप की सेवा करने के भाव से लबालब भरा रहना. असाध्य बीमारियों में नंबर एक पर कैंसर, उस के बाद बीपी, हृदय रोग आते हैं. डायबिटीज से पीडि़त भी मुतके बताए जाते हैं. ऐसे वाले मातापिता इंसुलिन बेटे के हाथों से ही लेते हैं. किडनी की बीमारी वाले भी काफी तादाद में होते हैं. ऐसे सभी पेरैंट्स का सप्ताह में 2 बार डायलिसिस करवाना जरूरी होता है जिस में इन की उपस्थिति आवश्यक रहती है.

 

कुछकुछ मांबाप को लकवा भी लगवा दिया जाता है. और भी कि इन सभी मांबाप का एक ही बेटा होता है जोकि नौकरीशुदा ही होता है. आश्चर्य की बात इतने ज्यादा एकल संतान वाले मांबाप होने के बावजूद देश की जनसंख्या इतनी तेज रफ्तार से कैसे बढ़ी, शोध का गूढ़ विषय है. एक और बात, आधी दर्जन संतानों वाले मांबाप की यही एक संतान देखभाल करने लायक होती है. नहीं तो फिर इतनी दूर विदेश में होती है कि घड़ीघड़ी नहीं आ सकती. केवल ये ही आ सकते हैं. या बहुत अधिक जिम्मेदारियां होती हैं कि आवेदक के अलावा वे देखभाल नहीं कर सकते. स्थानांतरण के आवेदन पत्र अकसर झूठ का पुलिंदा होते हैं.

मांबाप की बीमारी के भार से ज्यादा एक पृष्ठ का बदली का आवेदन मांबाप की बीमारियों के सैकड़ाभर सहीगलत कागज का भार संभाले रहता है. इसी नौकरीशुदा, सब से मजबूत कंधों वाले सपूत पर ही मांबाप की असाध्य बीमारियों का भार टिका रहता है. सरकारी नौकरी में ऐसा क्या होता है कि यह वाला बेटा ही सब से लायक व बाकी के नालायक व नकारे साबित होते हैं. अपने सासससुर के किसी असाध्य रोग के आधार पर स्थानांतरण चाहने वाला कोई भी आवेदन आना नहीं पाया गया. अभी इस का चलन नहीं है. और भी कि सासससुर के नाम से कोई श्रवण कुमार इतिहास में नहीं पाया गया है. इसी तरह अपनी पत्नी की किसी बीमारी के आधार पर स्थानांतरण के आवेदन भी देखने में नहीं आते.

आखिर स्थानांतरण के आवेदन हेतु बुजुर्गियत का वह भाव इन में कहां से आता है जो अकेले, वृद्ध, बेसहारा गंभीर बीमारी से गंभीररूप से पीडि़त निशक्त हो चले मांबाप को आवेदन में ला बारबार घसीटने से उत्पन्न होता है. एक और महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आया कि ऐसे सभी कर्मचारियों के मांबाप की लाइलाज बीमारी का इलाज बड़े शहरों मुंबई, दिल्ली आदि में ही चल रहा होता है. और भी कि, इसी सपूत को उन्हें इन शहरों में ले कर बारबार जाना पड़ता है. सो, उस की पदस्थापना बड़े शहरों में करना आवश्यक हो जाता है. यह भी कि यदि उस की पदस्थापना इन शहरों में शीघ्र नहीं की गई तो इलाज के अभाव में कोई भी अनहोनी घटने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. जिस की समस्त जिम्मेदारी आवेदक की न हो कर जिस को आवेदन किया गया हो उस की होगी.

 

अब गंगाधर के पास विश्वास करने के पर्याप्त कारण हैं कि लोग नाहक ही नई पीढ़ी को बदनाम करने पर तुले हैं कि वे मांबाप की केयर नहीं करते. वे तो बेचारे मांबाप की छोटी से छोटी तकलीफ के हमराह बनना चाहते हैं. इतने फेयर हैं वे अपनी सोच में. वे ऐसे क्षुद्र आधारों जैसे कि पदस्थापना देहात या दुर्गम क्षेत्र या घर से कई सौ मील दूर होना, वहां बच्चों की शिक्षा के लिए कौन्वेंट स्कूल न होना, इन छोटे शहरों में मनोरंजन के माकूल साधन न होना, पत्नी को जगह मनहूस लगना आदि के आधार पर कभी स्थानांतरण के आवेदन नहीं प्रस्तुत करते. ऐसे आधुनिक श्रवण कुमारों के आवेदनों पर तरजीह नहीं देना एक तरह का अपराध ही होगा. गंगाधर को तो आश्चर्य है कि नएनए वृद्धाश्रम क्यों खुलते जा रहे हैं.

जब सारे नौजवान अपने मांबाप की वृद्धावस्था में बीमारी की हालत में गहन सेवासुश्रुषा करना चाहते हैं. कहीं वृद्धाश्रमों की आड़ में घपलेबाजी का खेल तो नहीं खेला जा रहा. इस की जांच होनी चाहिए. ढेरों आवेदनों के मजमून से तो सिद्ध होता है कि घोर कलियुग में भी ये युवा सतयुगी हैं. श्रवण कुमार केवल पहले नहीं, आज हमारेआप के समय में भी काफी पाए जाते हैं यदि आप को विश्वास नहीं है तो गंगाधर के पास आ कर स्थानांतरण के इन आवेदनों को पढ़ लें. आंखों का जाला हट जाएगा और एक नहीं, अनेक श्रवण कुमार मिलेंगे. गंगाधर का मानना है कि जब इतने अच्छे पारदर्शी आंकड़े उपलब्ध हैं तो फिर उन पर विश्वास न कर जबरदस्ती वृद्धाश्रम खोलने का मतलब क्या है. गंगाधर का मानना है कि जब तक ऐसे युवा हैं तो वृद्धाश्रमों की जरूरत देश को नहीं है. Emotional Hindi Story

Short Story : रंगबिरंगी तितली

Short Story : सियाली के मम्मीपापा का तलाक क्या हुआ, वह एक आजाद चिडि़या हो गई, जो कहीं भी उड़ान भरने के लिए अपनी मरजी की मालकिन थी. अब वह खुल कर जीना चाहती थी, मगर यह इतना आसान नहीं था. रविवार के दिन की शुरुआत भी मम्मी व पापा के आपसी झगड़ों की कड़वी आवाजों से हुई. सियाली अभी अपने कमरे में सो ही रही थी, चिकचिक सुन कर उस ने चादर सिर पर ओढ़ ली. आवाज पहले से कम तो हुई पर अब भी कानों से टकरा रही थी. सियाली मन ही मन कुढ़ कर रह गई थी. पास पड़े मोबाइल को टटोल कर उस में ईअरफोन लगा कर बड्स को कानों में कस कर ठूंस लिया और वौल्यूम को फुल कर दिया.

18 वर्षीया सियाली के लिए यह नई बात नहीं थी. उस के मम्मीपापा आएदिन झगड़ते रहते थे, जिस का सीधा कारण था उन दोनों के संबंधों में खटास का होना, ऐसी खटास जो एक बार जीवन में आ जाए तो उस की परिणति आपसी रिश्तों के खात्मे से होती है. सियाली के मम्मीपापा प्रकाश और निहारिका के संबंधों में यह खटास एक दिन में नहीं आई, बल्कि, यह तो एक मध्यवर्गीय परिवार के कामकाजी दंपती के आपसी सामंजस्य बिगड़ने के कारण धीरेधीरे आई एक आम समस्या थी. सियाली का पिता अपनी पत्नी के चरित्र पर शक करता था. उस का शक करना जायज था क्योंकि निहारिका का अपने औफिसकर्मी के साथ संबंध चल रहा था. पतिपत्नी की हिंसा और शक समानुपाती थे. जितना शक गहरा हुआ उतना ही प्रकाश की हिंसा बढ़ती गई और परिणामस्वरूप परपुरुष के साथ निहारिका का प्रेम बढ़ता गया. ‘जब दोनों साथ नहीं रह सकते तो तलाक क्यों नहीं दे देते एकदूसरे को?’ सियाली झुं झला कर मन ही मन बोली.

सियाली जब अपने कमरे से बाहर आई तो दोनों काफी हद तक शांत हो चुके थे. शायद, वे किसी निर्णय तक पहुंच गए थे. ‘‘ठीक है, मैं कल ही वकील से बात कर लेता हूं, पर सियाली को अपने साथ कौन रखेगा?’’ प्रकाश ने निहारिका की ओर घूरते हुए कहा. ‘‘मैं सम झती हूं कि सियाली को तुम मु झ से बेहतर संभाल सकते हो,’’ निहारिका ने कहा. उस की इस बात पर प्रकाश भड़क गया, ‘‘हां, तुम तो सियाली को मेरे पल्ले बांधना चाहती हो ताकि तुम अपने उस औफिस वाले यार के साथ गुलछर्रे उड़ा सको और मैं जवान बेटी के चारों तरफ गार्ड सा बन कर घूमता रहूं.’’ प्रकाश की इस बात पर निहारिका ने भी तेवर दिखाते हुए कहा, ‘‘मर्दों के समाज में क्या सारी जिम्मेदारी एक मां की ही होती है?’’ निहारिका ने गहरी सांस ली और कुछ देर रुक कर बोली, ‘‘हां, वैसे सियाली कभीकभी मेरे पास भी आ सकती है. 1-2 दिन मेरे साथ रहेगी तो मु झे एतराज नहीं होगा,’’ निहारिका ने मानो फैसला सुना दिया था. सियाली कभी मां की तरफ देख रही थी तो कभी अपने पिता की तरफ.

उस से कुछ कहते न बना पर इतना सम झ गई थी कि मांबाप ने अपनाअपना रास्ता अलग कर लिया है और उस का अस्तित्व एक पैंडुलम से अधिक नहीं है, जो दोनों के बीच एक सिरे से दूसरे सिरे तक डोल रही है. मांबाप के बीच रोजरोज के झगड़े ने एक अजीब विषाद से भर दिया था सियाली को. इस विषाद का अंत शायद तलाक जैसे कदम से ही संभव था, इसलिए सियाली के मन में कहीं न कहीं चैन की सांस ने प्रवेश किया कि चलो, आपस की कहासुनी अब खत्म हुई. और अब सब के रास्ते अलगअलग हैं. शाम को सियाली कालेज से लौटी तो घर में एक अलग सी शांति थी. उस के पापा सोफे पर बैठे चाय पी रहे थे, चाय, जो उन्होंने खुद ही बनाई थी. उन के चेहरे पर महीनों से बने रहने वाले तनाव की शिकन गायब थी. सियाली को देख कर उन्होंने मुसकराने की कोशिश भी की, ‘‘देख लो, तुम्हारे लिए चाय बची होगी.’’ सियाली पास आ कर बैठी तो उस के पापा ने अपनी सफाई में कहना शुरू किया, ‘‘मैं बुरा आदमी नहीं हूं, पर तेरी मम्मी ने गलत किया था.

उस के कर्म ही ऐसे थे कि मु झे उसे देख कर गुस्सा आ ही जाता था और फिर तेरी मां ने भी तो रिश्तों को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.’’ पापा की बातें सुन कर सियाली से न रहा गया, ‘‘मैं नहीं जानती कि आप दोनों में से कौन सही है और कौन गलत, पर इतना जरूर जानती हूं कि शरीर में अगर नासूर हो जाए तो औपरेशन ही सही रास्ता और ठीक इलाज होता है,’’ दोनों बापबेटी ने कई दिनों के बाद आज खुल कर बात की थी. पापा की बातों में मां के प्रति नफरत और द्वेष छलक रहा था जिसे चुपचाप सुनती रही सियाली. अगले दिन ही सियाली के मोबाइल पर मां का फोन आया और उन्होंने सियाली को अपना पता देते हुए शाम को उसे अपने फ्लैट पर आने को कहा, जिसे सियाली ने खुशीखुशी मान भी लिया था और शाम को मां के पास जाने की सूचना भी उस ने अपने पापा को दे दी, जिस पर पापा को कोई एतराज न हुआ. शाम को शालीमार अपार्टमैंट में पहुंच गई थी सियाली. पता नहीं क्या सोच कर उस ने लाल गुलाब का एक बुके खरीद लिया था.

फ्लैट नंबर 111 में सियाली पहुंच गई थी. घंटी बजाई, तो दरवाजा मां ने खोला. अब चौंकने की बारी सियाली की थी. मां गहरे लाल रंग की साड़ी में बहुत खूबसूरत लग रही थी. मांग में भरा हुआ सिंदूर और माथे पर तिलक की शक्ल में लगाई हुई बिंदी. सियाली को याद नहीं कि उस ने मां को कब इतनी अच्छी तरह से शृंगार किए हुए देखा था. हमेशा सादे वेश में ही रहती थी उस की मां और टोकने पर दलील देती, ‘अरे, हम कोई अगड़ी जाति के तो हैं नहीं जो हमेशा सिंगार ओढ़े रहें. हम पिछड़ी जाति वालों के लिए सिंपल रहना ही अच्छा है.’ ‘‘आज मां को यह क्या हो गया? उन की सादगी आज शृंगार में कैसे परिवर्तित हो गई थी और क्यों वे जातपांत की गंदी व बेकार की दलीलें दे कर सही बात को छिपाना चाह रही थीं?’’ सियाली ने बुके मां को दे दिया. मां ने बहुत उत्साह से बुके लिया. ‘‘अरे, अंदर आने को नहीं कहोगी सियाली से?’’ मां के पीछे से आवाज आई. आवाज की दिशा में नजर उठाई तो देखा कि सफेद कुरता और पाजामा पहने हुए एक आदमी खड़ा हुआ मुसकरा रहा था. सियाली उसे पहचान गई. वह मां का सहकर्मी देशवीर था. उस की मां उसे पहले भी घर भी ला चुकी थी. मां ने बहुत खुशीखुशी देशवीर से सियाली का परिचय कराया, जिस पर सियाली ने कहा, ‘‘जानती हूं मां, पहले भी तुम इन से मिलवा चुकी हो मु झे.’’ ‘‘पर पहले जब मिलवाया था तब यह सिर्फ मेरे अच्छे दोस्त थे पर आज मेरे सबकुछ हैं. हम लोग फिलहाल तो लिवइन में रह रहे हैं और तलाक होते ही शादी कर लेंगे.’’ मुसकरा कर रह गई थी सियाली. सब ने एकसाथ खाना खाया. डाइनिंग टेबल पर भी माहौल सुखद ही था.

मां के चेहरे की चमक देखते ही बनती थी और यह चमक कृत्रिम या किसी फेशियल की नहीं थी, उस के मन की खुशी उस के चेहरे पर झलक रही थी. सियाली रात में मां के साथ ही सो गई और सुबह वहीं से कालेज के लिए निकल गई. चलते समय मां ने उसे 2,000 रुपए देते हुए कहा, ‘‘रख लो, घर जा कर पिज्जा वगैरह मंगवा लेना.’’ कल से ले कर आज तक मां ने सियाली के सामने एक आदर्श मां होने के कई उदाहरण प्रस्तुत किए थे पर सियाली को यह सब नहीं भा रहा था और न ही उसे सम झ में आ रहा था कि यह मां का कैसा प्यार है जो उस के पिता से अलग होने के बाद और भी अधिक छलक रहा है. फिलहाल तो वह अपनी जिंदगी खुल कर जीना चाहती थी, इसलिए मां के दिए गए पैसों से सियाली उसी दिन अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने चली गई. ‘‘सियाली, आज तुम किस खुशी में पार्टी दे रही हो?’’ महक ने पूछा. ‘‘बस, यों सम झो आजादी की,’’ मुसकरा दी थी सियाली. सच तो यह था कि मांबाप के अलगाव के बाद सियाली बहुत रिलैक्स महसूस कर रही थी. रोजरोज की टोकाटाकी से अब उसे मुक्ति मिल चुकी थी और सियाली अब अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीना चाहती थी.

इसीलिए उस ने अपने दोस्तों से अपनी एक इच्छा बताई, ‘‘यार, मैं एक डांस ट्रिप जौइन करना चाहती हूं ताकि मैं अपने जज्बातों को डांस द्वारा दुनिया के सामने पेश कर सकूं.’’ उस के दोस्तों ने उसे और भी कई रास्ते बताए जिन से वह अपनेआप को व्यक्त कर सकती थी, जैसे ड्राइंग, सिंगिंग, मिट्टी के बरतन बनाना. पर सियाली तो मजे और मौजमस्ती के लिए डांस ट्रिप जौइन करना चाहती थी, इसलिए उसे औप्शन अच्छे नहीं लगे. अपने शहर के डांस ट्रिप गूगल पर खंगाले तो डिवाइन डांसर नामक एक डांस ट्रिप ठीक लगा, जिस में 4 सदस्य लड़के थे और एक लड़की. सियाली ने तुरंत ही वह ट्रिप जौइन कर लिया और अगले ही दिन से डांस प्रैक्टिस के लिए जाने लगी. सियाली अपना सारा तनाव अब डांस द्वारा भूलने लगी और इस नई चीज का मजा भी लेने लगी. डिवाइन डांसर नाम के इस ट्रिप को परफौर्म करने का मौका भी मिलता तो सियाली भी साथ में जाती और स्टेज पर सभी परफौर्मेंस देते जिस के बदले सियाली को भी ठीकठाक पैसे मिलने लगे.

इस समय सियाली से ज्यादा खुश कोई नहीं था. वह निरंकुश हो चुकी थी. न मांबाप का डर और न ही कोई टोकाटोकी करने वाला. जब चाहती, घर जाती और अगर नहीं भी जाती तो भी कोई पूछने वाला न था. उस के मांबाप का तलाक क्या हुआ, सियाली तो एक आजाद चिडि़या हो गई, जो कहीं भी उड़ान भरने के लिए आजाद थी. सियाली का फोन बज रहा था. फोन पापा का था, ‘‘सियाली, कई दिनों से घर नहीं आईं तुम क्या बात है? हो कहां तुम?’’ ‘‘पापा, मैं ठीक हूं और डांस सीख रही हूं.’’ ‘‘पर तुम ने बताया नहीं कि तुम डांस सीख रही हो?’’ ‘‘जरूरी नहीं कि मैं आप लोगों को सब बातें बताऊं. आप लोग अपनी जिंदगी अपने ढंग से जी रहे हैं, इसलिए मैं भी अब अपने हिसाब से ही जीना चाहती हूं.’’ फोन काट दिया था सियाली ने, पर उस का मन एक अजीब सी खटास से भर गया था. डांस ट्रिप के सभी सदस्यों से सियाली की अच्छी दोस्ती हो गई थी पर पराग नाम के लड़के से उस की कुछ ज्यादा ही पटने लगी. पराग स्मार्ट भी था और पैसे वाला भी.

वह सियाली को गाड़ी में घुमाता और खिलातापिलाता. उस की संगत में सियाली को सुरक्षा का एहसास होता था. अगले दिन डांस क्लास में जब दोनों मिले तो पराग ने एक सुर्ख गुलाब सियाली की ओर बढ़ा दिया. ‘‘सियाली, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं और शादी करना चाहता हूं,’’ घुटनों को मोड़ कर जमीन पर बैठते हुए पराग ने कहा. सभी लड़केलड़कियां इस बात पर तालियां बजाने लगे. सियाली ने भी मुसकरा कर गुलाब पराग के हाथों से ले लिया और कुछ सोचने के बाद बोली, ‘‘लेकिन, मैं शादी जैसी किसी बेहूदा चीज के बंधन में नहीं बंधना चाहती. शादी एक सामाजिक तरीका है 2 लोगों को एकदूसरे के प्रति ईमानदारी दिखाते हुए जीवन बिताने का. पर क्या हम ईमानदार रह पाते हैं?’’ सियाली के मुंह से ऐसी बड़ीबड़ी बातें सुन कर डांस ट्रिप के लड़केलड़कियां शांत थे. सियाली ने रुक कर कहना शुरू किया, ‘‘मैं ने अपने मांबाप को शादीशुदा जीवन में हमेशा लड़ते देखा है, जिस की परिणति तलाक के रूप में हुई और अब मेरी मां अपने प्रेमी के साथ लिवइन में रह रही हैं और पहले से कहीं अधिक खुश हैं.’’ पराग यह सुन कर तपाक से बोला कि वह भी सियाली के साथ लिवइन में रहने को तैयार है अगर उसे मंजूर हो तो. पराग की बात सुन कर उस के साथ लिवइन के रिश्ते को झट से स्वीकार कर लिया था सियाली ने. और कुछ दिनों बाद ही पराग और सियाली लिवइन में रहने लगे,

जहां पर दोनों जीभर कर अपने जीवन का आनंद ले रहे थे. पराग के पास आय के स्रोत के रूप में एक बड़ा जिम था, जिस से पैसे की कोई समस्या नहीं आई. पराग और सियाली ने अब भी डांस ट्रिप को जौइन कर रखा था और लगभग हर दूसरे दिन ही दोनों क्लासेज के लिए जाते और जीभर नाचते. इसी डांस ट्रिप में गायत्री नाम की लड़की थी. उस ने सियाली से एक दिन पूछ ही लिया, ‘‘सियाली, तुम्हारी तो अभी उम्र बहुत कम है और इतनी जल्दी किसी के साथ… मतलब लिवइन में रहना कुछ अजीब सा नहीं लगता तुम्हें?’’ सियाली के चेहरे पर एक मीठी सी मुसकराहट आई और चेहरे पर कई रंग आतेजाते गए, फिर सियाली ने अपनेआप को संयत करते हुए कहा,

‘जब मेरे मांबाप ने सिर्फ अपनी जिंदगी के बारे में सोचा और मेरी परवा नहीं की तो मैं अपने बारे में क्यों न सोचूं? और गायत्री, जिंदगी मस्ती करने के लिए बनी है. इसे न किसी रिश्ते में बांधने की जरूरत है और न ही रोरो कर गुजारने की. ‘‘मैं आज पराग के साथ लिवइन में हूं और कल मन भरने के बाद किसी और के साथ रहूंगी और परसों किसी और के साथ. ‘‘उम्र का तो सोचो ही मत, एंजौय योर लाइफ, यार,’’ सियाली यह कहते हुए वहां से चली गई थी जबकि गायत्री अवाक खड़ी थी. तितलियां कभी किसी एक फूल पर नहीं बैठीं. वे कभी एक फूल के पराग पर बैठती हैं तो कभी दूसरे फूल के. और तभी तो इतनी चंचल होती हैं व इतनी खुश रहती हैं तितलियां, रंगबिरंगी तितलियां, जीवन से भरपूर तितलियां..

Love Story : अजब प्रेम की गजब कहानी

Love Story :  एक बार देखने पर रीवा को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. सो उस ने दोबारा दर्पण में देखा और पूरा ध्यान अपनी आंख के उस कोने पर केंद्रित किया जहां पर उसे संदेह था, क्या त्वचा की यह सिकुड़न उस की बढ़ती आयु को दिखा रही है, कहीं यह झुर्री तो नहीं है? हां, यह झुर्री ही तो है.

‘खुश रहा करो, तनाव लेने से ऐसी झुर्रियां आती हैं चेहरे पर,’ यह सुना था रीवा ने लेकिन तनाव तो वह लेती नहीं.

‘बहुत से तनाव लिए नहीं जाते पर वे हमारे अंतर्मन में इस तरह बैठे होते हैं कि चेहरे पर अनजाने में ही अपनी छाप छोड़ जाते हैं,’ कहा था एक बार रीवा की सहेली सिमरन ने.

‘कोई बात नहीं, अब हम और भी अनुभवी कहलाएंगे इस हलकी सी झुर्री के साथ,’ 48-वर्षीया रीवा ने मुसकराते हुए अपनेआप से कहा.

रीवा की आयु भले ही बढ़ गई हो पर उस के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का भंडार था. गिलास आधा खाली या भरा में से उस ने सदैव ही भरे गिलास को चुना था. जीवन की हार को भी अच्छे शब्दों में परिभाषित कर के उसे एक अच्छा आयाम दे देना रीवा के व्यक्तित्व का मुख्य हिस्सा था.

अभी रीवा आईने के सामने से हट नहीं पाई थी कि उस का मोबाइल बज उठा. मोबाइल पर एक निश्चित रिंगटोन के बजने से ही रीवा को पता चल गया था कि यह फोन सुबाहु का था. रीवा जब तक मोबाइल उठाती तब तक मोबाइल कट गया पर रीवा के डायल करने से पहले ही दोबारा कौल आ गई, उधर से सुबाहु का व्यग्र स्वर था-

“क्या आंटी, आप ने आने में इतनी देर कर दी, हम सब कब से आप का वेट कर रहे हैं. और कितनी देर लगाओगी आप?”

सुबाहु और भी लंबी शिकायत करता पर रीवा ने बीच में ही टोक कर कहा कि अभी उसे 15 मिनट और लगेंगे. सुबाहु का हताशाभरा स्वर “ओह नो” रीवा के कानों में सुनाई दिया, जिसे सुन कर  बिना मुसकराए नहीं रह सकी वह, मोबाइल रख कर वह झटपट तैयार होने लगी.

रीवा को लखनऊ शहर के बाहरी इलाके में बने रिजौर्ट गोमती राइड में पहुंचना था जहां पर सुबाहु का 25वां जन्मदिन सैलिब्रेट होना था. सुबाहु अपनी मम्मी रेवती और पापा अभिराज के साथ पहुंच चुका था.

रीवा के वहां पहुंचते ही सुबाहु का चेहरा खिल गया और उस ने लपक कर रीवा का स्वागत किया. रेवती और अभिराज से मिलने के बाद सुबाहु ने अपने दोस्तों से भी रीवा को मिलवाया और केक काटने के बाद जब गिफ्ट देने की बारी आई तो रीवा सुबाहु को गोमती राइड के लौन में ले गई जहां पर एक शानदार कवर से ढकी थी एक चमचमाती स्पोर्ट्स बाइक. सुबाहु बाइक देख कर खुशी से चीख पड़ा. अभी वह ठीक से खुश भी नहीं हो पाया था कि अभिराज ने रीवा से इतना महंगा गिफ्ट देने के लिए नाराज़गी जताई.

“कुछ भी महंगी नहीं, सुबाहु के शौक के आगे इस बाइक की कीमत कोई माने नहीं रखती,” रीवा ने कहा तो अभिराज प्यारभरी कसमसाहट में पड़े दिखाई दिए पर कुछ कह नहीं सके. पत्नी रेवती और रीवा एकसाथ खड़े मुसकरा रहे थे. सुबाहु बाइक स्टार्ट कर चुका था. सारे दोस्त सुबाहु से मन ही मन रश्क कर रहे थे.

सुबाहु ने जब से होश संभाला है तब से रीवा आंटी को मेहता परिवार की फैमिलीफ्रैंड के रूप में ही जाना, जो उस परिवार के हर सुख और दुख में शामिल होती थी.

सीबीडी बैंक में मैनेजर के पद पर काम करने वाली रीवा, मेहता परिवार की नई गाड़ी की प्लानिंग में शामिल होती तो पिकनिक में भी साथ होती. खूबसूरत और अपने जीवन में  एक सफल महिला होने के बावजूद रीवा ने शादी क्यों नही की, यह बात बहुत से लोगों को समझ नहीं आती थी. सुबाहु भी उन में से एक था और उस ने कई बार अपनी जिज्ञासा शांत करने की कोशिश भी की पर हर बार रीवा ने उस के प्रश्न को टाल दिया.

सुबाहु भी अपने जीवन के हर छोटेबड़े काम में रीवा की सहायता लेता था फिर चाहे वह कालेज के ऐनुअल डे की स्पीच हो या फिर किसी प्रोजैक्ट का. रीवा भी व्यस्त होने के बावजूद बड़े मनोयोग से सहायता करती थी सुबाहु की.

उस दिन सुबाहु देरशाम रात 8 बजे  रीवा के फ्लैट पर पहुंचा. वह काफी परेशान लग रहा था. जब उस की परेशानी रीवा ने जाननी चाही तो उस ने बताया कि उसे उस के क्लास में साथ पढ़ने वाली एक बहुत सुंदर लड़की से प्यार हो गया है.

“बधाई हो भाई, तुम्हें प्यार हुआ. इस में हैरान और परेशान होने वाली बात क्या है?” रीवा ने चुटकी लेते हुए कहा तो सुबाहु ने अपनी प्रौब्लम बताते हुए कहा, “वह लड़की बहुत सुंदर है और उसे इस बात का गुमान भी है. कालेज का हर लड़का उस पर डोरे डाल रहा है. वह मेरी अच्छी फ्रैंड है. मैं उस से अपनी प्रौब्लम्स शेयर करता हूं पर उस की बातों से लगता है कि वह मेरी  25 और उस की 23 वर्ष की आयु को विवाह के लिये ठीक नहीं मानती और पहले अपना कैरियर बनाना चाहती है.”

रीवा बड़े ध्यान से सुबाहु की सारी बातें सुनीं. उस ने सुबाहु से कुछेक सवाल किए, मसलन वह उस लड़की को कब से जानता है, वह उसे क्यों पसंद है इत्यादि. जो उत्तर सुबाहु ने उसे दिए उस के आधार पर रीवा ने जो फैसला सुनाया वह सुबाहु को बड़ा नागवार गुज़रा था.

रीवा ने कहा कि कुछ दिनों की जानपहचान और शारीरिक सुंदरता को देख कर होने वाला प्यार अकसर ही आभासी प्यार होता है. उस में व्यग्रता तो होती है पर स्थायित्व नहीं होता. जोश और जनून तो होता है पर गहराई नहीं होती.

रीवा की बातें सुबाहु को समझ नहीं आ रही थीं. उस ने मुंह बना कर कहा कि प्रेम तो प्रेम होता है, असली और नकली क्या?

“अकसर ही नकली चीजें असली चीजों से भी ज्यादा असली लगती हैं,” रीवा ने मुसकराते हुए कहा तो सुबाहु खीझ उठा, बोला, “आप ने अब तक शादी नहीं की पर प्यार तो किया होगा न, तो क्या वह नकली प्यार था या कोई ऐसा था जो आप को धोखा दे कर चला गया, तो क्या आप पहचान पाईं असली और नकली प्यार को?”

सुबाहु के इन तीखे सवालों पर रीवा का जी चाहा कि वह इन सब बातों का उत्तर दे दे पर नाजुक विषय और सुबाहु के इमोशन देख कर फिलहाल चुप रह जाना पड़ा था उस को. सुबाहु अभी भी प्यार के जनून में तो था पर उसे भी लगा कि वह थोड़ा अधिक बोल गया है.

कुछ देर की खामोशी के बाद रीवा सहज होते हुए बोली कि अभी वह घर चला जाए, सुबह इस मैटर पर बात होगी.

सुबाहु वापस लौट आया था पर उस ने रीवा के दबे जख्मों को कुरेद दिया था जिस से अब दर्द की टीस उठनी शुरू हो गई थी और वह टीस चीखचीख़ कर अपना दर्द किसी दूसरे को बताना चाहती थी.

रीवा ने किसी तरह रात काटी और सुबह होते ही सुबाहु से मिलने के लिए उस के घर जा पहुंची. रेवती और अभिराज उसे देख कर थोड़ा चौंके.

रीवा सीधा सुबाहु के कमरे में गई और उसे एक पैनड्राइव देते हुए कहा, “असल में इस पैनड्राइव के अंदर मेरी डायरी के कुछ ऐसे राज़ हैं जिन्हें मैं अपनी डायरी पर लिखती थी, सोचती थी समय मिलने पर इन्हें किताब का रूप दूंगी पर दे नहीं सकी. इस पैनड्राइव में स्टोर डायरी के पन्ने तुम्हें प्रेम की सही परिभाषा समझाने में मदद करेंगे.”

रीवा का यह रूप देख कर अभिराज और रेवती दोनों की आंखों में कई सवाल उभर आए थे और सारे सवाल मिल कर यही कह रहे थे कि नहीं, रीवा, ये सब उसे बताना ठीक नहीं. पर रीवा भला कहां सुनने वाली थी, वह हवा के झोंके की तरह बाहर निकल गई. अभिराज शांत खड़े थे, उन्होंने इशारे से रेवती को भी शांत रह कर अपना काम करने को कहा.

सुबाहु उस पैनड्राइव में स्टोर बातों को पढ़ने के लिए बहुत व्यग्र हो रहा था. उस ने अपने लैपटौप में पैनड्राइव लगा दी और बिस्तर पर लेट कर लैपटौप बगल में रख लिया और जो कुछ लैपटौप की स्क्रीन पर आया उसे बड़े धयान से वह पढ़ने लगा. जैसेजैसे वह पंक्तिदरपंक्ति पढ़ता गया वैसेवैसे ही उसके चेहरे पर कई रंग बदलते गए और उत्सुकता की चरमसीमा पर पहुंचने लगा. सुबाहु से लेटा न जा सका. उस की रीढ़ की हड्डी में चेतना और व्यग्रता का संचार तेज़ी से हो रहा था, वह उठ कर बैठ गया.

‘पर इतना सब कैसे हो सकता है? और मुझे इस बात का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं लग सका?’ अगली सुबह नाश्ते की टेबल पर मां से यही सवाल था सुबाहु का.

“मां, रीवा आंटी की पैनड्राइव से मुझे पता चल चुका है कि आप तीनों ने मुझ से बहुतकुछ छिपाया. आप तीनों में एक अद्भुत रिश्ता है. रीवा आंटी और पापा एक दूसरे से कालेज के समय से प्यार करते थे और शादी भी करना चाहते थे पर रीवा आंटी की दूसरी जाति यानी बढ़ई जाति के होने से पापा के घरवालों को एतराज़ था जिस के कारण वे दोनों शादी नहीं कर पाए पर पापा और रीवा आंटी की दोस्ती अब तक कायम है,” सुबाहु किसी कथाकार की तरह सबकुछ वर्णित कर रहा था और रेवती शांति से उसे सुने जा रही थी.

“रीवा आंटी का हमारे घर में इतना इन्वौल्वमैंट? आई मीन, आप ने पापा की पत्नी होते हुए भी किसी दूसरी औरत को घर में और हमारे जीवन में दखल सहन कैसे कर लिया?” सुबाहु चुप हो गया था पर एक प्रश्नचिन्ह उस के चेहरे पर तैर रहा था.

रेवती ने अब बोलना ठीक समझा और सुबाहु को बताया कि जब उस की शादी अभिराज से हुई तो किसी भी अन्य लड़की की तरह उस के अरमान भी आसमान छू रहे थे पर ये अरमान तब धड़ाम हो गए जब एक रात को अभिराज ने खुद ही अपने और रीवा के रिश्ते के बारे में उसे बता दिया. वह सदमे में आ गई थी कि उस का पति पहले से किसी लड़की के प्रेम में रंगा हुआ है, ऐसे में उस का प्रेम फीका ही रह जाएगा और वह अपने हिस्से के प्रेम और अधिकार की मांग करते हुए अभिराज से विवाद कर वैठी. अभिराज से उस ने कई हफ्तों तक बात ही नहीं की. विवाह के तुरंत बाद पत्नी से मनमुटाव हो जाए, तो उस का असर पूरे घर पर होता ही है, अभिराज भी तनाव में रहने लगे थे. उन्होंने उसे मनाना चाहा पर वह न मानी.

रेवती पुरानी यादें बता रही थी पर इस समय उस के चेहरे पर बीती बातों का कसैलापन नहीं दिख रहा था बल्कि एक असीम शांति छाई हुई थी. रेवती ने आगे बोलना शुरू किया, “मैं अभिराज के साथ रिश्ता तोड़ देती अगर उस दिन रीवा ने घर आ कर मुझे न समझाया होता कि प्रेम के सही माने क्या होते हैं.

“रीवा के शब्दों में- ‘जब 2 लोग आपस में प्रेम करते हैं तो उन का प्रेम एकदूसरे के ह्रदय को स्पर्श तो करता है पर इस का मतलब यह नहीं होता कि उन्होंने एकदूसरे के शरीरों को भी स्पर्श किया है.’

“रीवा की इस बात से मैं थोड़ा नरम हुई थी. इस के बाद रीवा अकसर मुझ से मिलने के लिए घर आने लगी. वह अकसर ही हरवंशराय बच्चानजी की कविता की पंक्तियां दोहराती कि ‘जो बीत गई सो बात गई’ और बड़े जोशीले अंदाज़ में कहती, ‘लेट्स मूव औन, यार.’

“उस की बातों में कभीकभी बनावटीपन भी लगता था पर एक बार जब मुझे मेरे ममेरे भाई की शादी में मायके जाना था पर उस समय अभिराज अपना नाम और कैरियर बनाने में व्यस्त थे और चाहते थे

कि मैं उन के साथ रहूं और काम की व्यस्तता में उन का ध्यान रखूं तो रीवा ने मुझे सपोर्ट करते हुए अभिराज से कहा कि शादी के शुरुआती कुछ दिनों में लड़की को अपने मायके आनेजाने से नहीं रोकना चाहिए क्योंकि इन दिनों में लड़कियों के मन में मायके का प्रेम हिलोरें मारता रहता है.

“रीवा की इस बात से मेरे मन में उस के लिए थोड़ी जगह बनी तो बाकी जगह उस ने गुजरते वक्त के साथ बना ली, जैसे मेरी तबीयत खराब होने पर मेरे सिरहाने बैठी रहती और एक नर्स की तरह मेरा ध्यान रखती. जब तुम गर्भ में आए तब भी वह परछाई की तरह मेरे साथ और पास रही. कभीकभी अभिराज से मेरी वकालत करते करते वह लड़ जाती और वुमेनहुड को सपोर्ट करती.

“उस का मेरी तरफ यह झुकाव भी मुझे असहज बना रहा था. मुझे लगा कि उस का मेरे घर यों आनाजाना और मुझे एक दोस्त की तरह ट्रीट करना कहीं उस का कोई निजी स्वार्थ या प्रयोजन तो नहीं,’ रेवती की बातों को बड़े धयान से सुन और समझ रहा था सुबाहु.

“‘क्यों करती हो ऐसा? क्या महान बनना चाहती हो अभिराज की नज़रों में?’ मैं लगभग चीख कर बोली थी रीवा से लेकिन इस बात का उस ने बड़ी शांति से उत्तर दिया, ‘मुझे गलत मत समझो, रेवती. तुम अगर कहो तो अभिराज की तरफ देखूंगी भी नहीं और मैं यहां आना बंद कर दूंगी पर फिर भी बताना चाहूंगी कि मैं यहां क्यों आती हूं?’ और फिर उस ने मुझे अपनी लिखी पंक्तियां सुनाईं जो उस ने कभी अभिराज के लिए लिखी थीं-

‘हां यह सच है कि मैं तुम से प्रेम करती हूं

पर प्रेम की परिणीति विवाह हो, 

यह आवश्यक तो नहीं

ज़रूरी तो प्रेम है

जो बेशर्त है, निस्वार्थ और निश्च्छल,

तुम्हें बताऊं

तुम्हारे सिवा अब मुझ को कोई और नहीं भाएगा 

मेरे जीवन में अब कोई और न आएगा

और हां,

मैं तुम्हारी हर चीज़ से प्रेम करती रहूंगी

यहां तक कि

तुम्हारी बाकी सब प्रेमिकाओं से भी.’

“रीवा की इन पंक्तियों ने मेरा मन साफ कर दिया था. मेरी रीवा के प्रति सारी ईर्ष्या तिरोहित होती जा रही थी भले ही अभिराज से मेरा विवाह हुआ है पर उस से सच्चा प्रेम तो रीवा ने ही किया है. मैं रीवा के सामने अपनेआप को काफी छोटा महसूस कर रही थी और इसी कारण मैं उसे एक सौतन नहीं बल्कि एक अच्छी दोस्त के रूप में स्वीकार कर पाई और आज रीवा हम सब की अच्छी फैमिलीफ्रैंड है.”

रेवती खामोश हो गई, अभिराज चाय के घूंट लेने लगे थे. सुबाहु के मन के अंदर रीवा की एक नई इमेज बन गई थी जो पहले से बहुत अलग थी. वह काफीकुछ समझ गया था और उस के कई सवालों के उत्तर भी मिल गए थे.

कुछ दिनों तक उस ने रीवा आंटी से कोई संपर्क नहीं किया. एक दिन उस ने रीवा आंटी को फोन किया और अपनी बाइक ले कर रीवा को पिक करने उस के बैंक पहुंच गया और उसे ले कर सीधा अपने घर पर आ गया जहां पर रेवती और अभिराज पहले से ही रीवा और सुबाहु का वेट कर रहे थे.

रीवा की आंखों में कई प्रश्न तैर रहे थे, जल्द ही उसे इन सब के उत्तर मिल गए. सुबाहु ने रीवा को सुनहरी जिल्द में लिपटी हुई एक पुस्तक भेंट की. रीवा ने किताब को देखा, किताब का शीर्षक था- ‘परिभाषा प्रेम की’.

रीवा समझ गई थी कि पैनड्राइव के डिजिटल और व्यक्तिगत पन्नों को किताब के रूप में लाने का साहस रीवा तो नहीं कर पाई थी पर वह काम सुबाहु ने कर दिखाया.

“आंटी, आप से ही मैं ने जाना है कि प्रेम किसी को जबरदस्ती पाने का नाम नहीं है बल्कि दूसरे के प्यार में अपने प्रेम को ढूंढ लेना ही सच्चा प्यार है. आप से पापा का मिलन नहीं हो सका पर आप ने उन के परिवार से दोस्ताना निभा कर इस रिश्ते को नई पहचान दी है. और तो और, मेरी दोस्त बन कर भी आप ने मुझे कई गलत रास्तों में पड़ने से बचाया.”

सुबाहु इमोशनल होता, इस से पहले ही रीवा बोल पड़ी, “मैं यह अनोखा रिश्ता निभा सकी, इस का असली श्रेय जाता है रेवती को, क्योंकि कोई भी पत्नी अपने पति के शादी से पहले के रिश्ते से द्वेष ही रखती है पर रेवती ने न केवल मुझे अपने दिल में जगह दी बल्कि अपने परिवार के मैंबर की तरह रखा. हमारे इस आपसी प्रेम का शीशमहल इसीलिए खड़ा हो सका क्योंकि इस के सभी स्तंभों ने अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई है.”

अभिराज बड़ी देर से खामोश खड़े थे, बोल पड़े, “अरे भाई, इस पूरी पिक्चर में इस असली हीरो को भी तो याद कर लो तुम लोग.”

अभिराज के इस नाटकीयताभरे कथन पर सब लोग हंस पड़े थे. रीवा ने सब को एकपास इकट्ठा कर लिया. वह सब की सैल्फी लेना चाहती थी. सभी ने मोबाइल की तरफ मुसकराता चेहरा कर दिया. रीवा ने देखा कि उस की आंख के कोने पर आई हुई झुर्री अब धुंधला चुकी थी.

Film Review : भावुक कर देने वाली फिल्म “चिड़िया”

Film Review : सच्ची, सरल व बेहतरीन फिल्म है ‘चिडि़या’ जिसे बड़ों के साथसाथ बच्चों को भी दिखानी चाहिए. यह फिल्म बच्चों के सपनों को पूरा करती है. फिल्म में दिखाया गया है कि जिस उम्र में बच्चे पढ़ते हैं, खेलते हैं, उस उम्र में उन्हें मजदूरी क्यों करनी पड़ती है. गरीब बच्चों की भी बालसुलभ जिज्ञासाएं होती हैं, तमन्नाएं होती हैं लेकिन उन की मजबूरी, गरीबी, बेबसी दिखा कर निर्देशक ने दर्शकों की आंखें गीली कर दी हैं. फिल्म दिखाती है कि सपने देखने का हक सिर्फ पैसे वालों को ही नहीं होता.

फिल्म छोटी सी चिडि़या पक्षी पर नहीं है बल्कि बैडमिंटन पर खेली जाने वाली चिडि़या (शटल कौक) पर है. बैडमिंटन रैकेट से शटल कौक पर शौट लगाते खिलाडि़यों को देख उन दोनों बच्चों का जिज्ञासु मन उन पर शौट लगाने को करता है और वे खुद के बैडमिंटन खिलाड़ी होने का सपना देखने लगते हैं.

फिल्म 15 साल से बनी पड़ी थी, अब जा कर इसे बड़े परदे पर दिखाने का मौका मिला है. फिल्म सादगी से भरी है, इसीलिए ऐसी फिल्मों की कहानियां सब से ज्यादा असर करती हैं. विदेशों में आयोजित फिल्म समारोहों में फिल्म की खूब सराहना की गई है और इस फिल्म ने कई अवार्ड भी जीते हैं. फिल्म में बच्चों का बचपन, चाइल्ड लेबर, शिक्षा, सामाजिक विसंगतियां और अभाव जैसे कई मुद्दों को बिना किसी नाटकीयता के सहज, सरल ढंग से उठाया गया है जिस से दर्शकों की आंखों में आंसू तो आते हैं मगर होंठों पर मुसकान भी तैर जाती है.

बच्चों की फिल्मों के प्रति बौलीवुड हमेशा से उदासीन रहा है. ‘चिल्लर पार्टी’, ‘तारे जमीं पर’, ‘मकड़ी’ और ‘स्टेनली का डब्बा’ जैसी बाल फिल्में उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं.

फिल्म की कहानी मुंबई की एक चाल में रहने वाले 2 बच्चों शानू (स्वर कांबले) और बुआ (आयुष पाठक) की है, जिन के पिता की अस्पताल में मौत हो गई. मां वैष्णवी (अमृता सुभास) पर बच्चों के लालनपालन की जिम्मेदारी के साथ पति के औटो की भारीभरकम किस्त की जिम्मेदारी भी आ जाती है. फीस न भर पाने के कारण दोनों बच्चों को स्कूल से निकाल दिया जाता है. इन के पड़ोस में ही अपनी पत्नी और बेटी ईशानी (हेतल गाड़ा) के साथ रहने वाले बच्चों का चाचा बाली (विनय पाठक) भी रहता है. वह एक प्रोडक्शन कंपनी में स्पौट बौय का काम करता है. वैष्णवी चाहती है कि बाली उस के दोनों बच्चों को भी काम पर लगवा दे. मगर शानू और बुआ का मन तो खेलने की जुगत में लगा है. वे बैडमिंटन के रैकेट, नैट, चिडि़या (कौक) और खेल की जगह का बंदोबस्त करने के जुगाड़ में लग जाते हैं.

यह बच्चा पार्टी चाल के आगे की सफाई कर के एक मैदान बनाती है. स्पौटबौय का काम करने वाले एक्टर (श्रेयस तलपड़े) से उन्हें एक चिडि़या मिलती है. एक दर्जी (इमामुल हक) कपड़ों के पैच से सी कर बैडमिंटन का नैट बना कर देता है. एक ठेकेदार उन्हें लोहे के खंबे ले जाने देता है. क्रू मैंबर बल्ब और तार का इंतजाम कर देता है. उन का बैडमिंटन कोर्ट तैयार हो जाता है. मगर कोई न कोई दिक्कत आ ही जाती है. कहानी के अंत में ये बच्चे शूटिंग के लिए पंचगनी पहुंचते हैं और वहां उन का बैडमिंटन खेलने का सपना पूरा होता है.

फिल्म का क्लाइमैक्स दर्शकों को असीम खुशियों से भर देता है. बालसुख कहानी फिल्म की खासीयत है. दोनों बच्चों ने बेहतरीन अभिनय किया है. सभी कलाकार अपनीअपनी भूमिकाओं में फिट हैं. निर्देशक ने आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के बीच समाज को बहुत बड़ा विलेन दिखाया है. उस ने दिखाया है कि जिन बच्चों के बाप मर जाते हैं उन्हें पुलिस वाले खाना खिलाते हैं. फिल्म के संवाद दिलों को छू जाते हैं. सैट डिजाइनिंग अच्छी की गई है. फिल्म की लंबाई ठीकठाक है. संगीत के सांचे में ढले ‘ऐ दिल की नन्ही चिडि़या…’, ‘बादल बरसे…’, ‘दोनों तरफ सन्नाटा…’ गीत विषयानुकूल हैं. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.

Family Problem : हम ग्रैंड पेरैंट्स के साथ समय बिताने में असमर्थ हैं

Family Problem : दादादादी के साथ कैसे जुड़ा जाए? उन की सेहत कमजोर है, जिस कारण मु झे सम झ नहीं आता कि मैं कैसे उन्हें खुश रखूं, उन को स्पैशल फील कराऊं? मम्मीपापा दोनों वर्किंग हैं, बिजी रहते हैं. वे उन का ध्यान रखते हैं पर ज्यादा टाइम उन्हें नहीं दे पाते. मैं कालेजगोइंग बौय हूं और मेरा शैड्यूल भी बहुत बिजी है. आप की राय मु झे रास्ता दिखा सकती है.

जवाब : आप अपने दादादादी के बारे में इतना सोच रहे हैं, अच्छा लगा जान कर. आज के समय में युवा केवल खुद पर ध्यान देते हैं और दादादादी से कटेकटे रहते हैं. जैसा कि आप ने कहा, आप के दादादादी की सेहत ठीक नहीं रहती है, इसलिए उन के स्वास्थ्य का खास ध्यान रखें. उन के साथ डाक्टर के अपौइंटमैंट पर जाएं. उन की दवाओं का समय याद दिलाएं. यह आप की उन के प्रति परवा को दर्शाता है.

ऐसी गतिविधियां चुनें जो उन की सेहत के अनुकूल हों, जैसे घर में बोर्ड गेम खेलना या हलकी सैर. उन की आंखें कमजोर हैं तो उन की पसंद की किताब, अखबार पढ़ कर उन्हें सुनाएं.

उन्हें अपनी दुनिया में शामिल करें, जैसे उन्हें अपनी पसंद का मौडर्न गाना सुनाएं और उन की राय पूछें. अपनी जिंदगी की छोटीछोटी बातें, जैसे कालेज का कोई किस्सा, उन के साथ सा झा करें. उन की जिंदगी के अनुभव पूछें. यह आप को उन की भावनाओं से जोड़ेगा और उन्हें लगेगा कि आप उन की परवा करते हैं.

छोटेछोटे तरीकों से भी प्यार दिखाएं, जैसे उन के लिए चाय बनाना या गले लगाना, उन के साथ पुरानी फोटो देखें या बचपन की कोई मजेदार घटना पर बात करें आदि.

उन के लिए एक छोटा हैल्थ जर्नल बनाएं, जिस में उन की दवाएं और डाइट का रिकौर्ड रखें. ये सब बातें अपना कर आप अपने दादादादी के साथ रिश्ते को गहरा, स्नेहपूर्ण और यादगार बना सकते हैं.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Relationship Problem : हम पतिपत्नी के बीच में यौन संतुष्टि की कमी है

Relationship Problem : शादी हुए 16 साल हो गए हैं. 2 बच्चे हैं. पत्नी के साथ सैक्सुअल रिलेशन बनाता तो हूं लेकिन सबकुछ डीपली फील नहीं करता. इस वजह से पत्नी के साथ इमोशनल दूरी बढ़ रही है. समझ नहीं पा रहा कि कैसे इस समस्या का हल निकालूं?

जवाब : पतिपत्नी के रिश्ते में सैक्स बहुत इंपौर्टेंट होता है और उसी में दिक्कत आने लगे तो समस्याएं आने लगती हैं. आप के केस में आप पतिपत्नी का खुल कर बात करना बेहद जरूरी है कि कैसे अपने अंतरंग पलों को बेहतर बनाएं. आप दोनों सैक्स में एकदूसरे से क्या चाहते हैं, जानने की कोशिश करें. आप इस पर बात करेंगे तो पत्नी अपनी पसंद व ख्वाहिश आप को जरूर बताएगी.

इस के अलावा कुछ बातें अपना कर अपने रिश्ते से यौन संतुष्टि और इमोशनल नजदीकी बढ़ा सकते हैं. जैसे, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का तनाव कम करें, रैगुलर ऐक्सरसाइज और पर्याप्त नींद सैक्सुअल हैल्थ को बेहतर बनाते हैं, अपने अंतरंग जीवन में नयापन लाने के लिए रोमांटिक डेट नाइट्स, मसाज या एकसाथ नई गतिविधियां कर रिश्ते में एक्साइटमैंट पैदा करें.

जान लें कि छोटीछोटी चीजें, जैसे कैंडल्स जलाना, लाइट म्यूजिक या पार्टनर की तारीफ करना आदि भी इंटीमेसी बढ़ाते हैं. एकदूसरे के लिए ज्यादा से ज्यादा समय निकालें. किताबें या ट्रस्टवर्दी औनलाइन मैटर पढ़ें जो सैक्सुअल हैल्थ और अंतरंगता पर जानकारी देते हों. अगर समस्या फिर भी बनी रहती है तो सैक्स थेरैपिस्ट या रिलेशनशिप काउंसर से सलाह लें.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Raja Raghuvanshi Murder Case : सोनम के मंडप से जेल तक का सफर

Raja Raghuvanshi Murder Case : सोनम जिस रास्ते गई थी उस से वापस इंदौर आ गई लेकिन ऐसे आई कि किसी को हवा भी नहीं लगी. खुद उस के अलावा चारों हत्यारे जानते थे कि सोनम गई तो सुहागिन थी लेकिन वापस विधवा हो कर आई है जिस की स्क्रिप्ट भी खुद उस ने ही लिखी थी.

29 वर्षीय राजा रघुवंशी और 25 वर्षीया सोनम दोनों इंदौर के रहने वाले थे. राजा पेशे से ट्रांसपोर्ट व्यवसायी थे और सोनम के पिता का प्लाइवुड का करोड़ों का जमाजमाया कारोबार था. दोनों की शादी रघुवंशी समाज की वैवाहिक पत्रिका के जरिए बीती 11 मई को धूमधाम से हुई थी. इस से पहले दोनों परिवार एकदूसरे से परिचित नहीं थे. उन के लिए यह रिश्ता इस लिहाज से भी सुखद संयोग था कि सजातीय होने के साथसाथ राजा और सोनम दोनों की जन्मकुंडली में मंगल था जिस से शादी में दिक्कत पेश आ रही थी.

इस दिन जब दोनों स्टेज पर बैठे आगंतुकों की बधाइयां और आशीर्वाद ले रहे थे तब उन के चेहरे की चमक और उल्लास देखने के काबिल थे, हर कोई उन के सुखमय खुशहाल दांपत्त्य जीवन और उज्ज्वल भविष्य की कामना कर रहा था. लेकिन किसी को रत्तीभर भी यह एहसास नहीं था कि भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है और यह छिपा जब उजागर हुआ तो हर कोई सनाके में रह गया. बात कुछ थी भी ऐसी ही जिसे संक्षेप में सिलसिलेवार समझें तो कहानी कुछ यों सामने आती है.

शादी के बाद एक हफ्ता रीतिरिवाजों, मेहमानों आगंतुकों के आनेजाने और लोकल घूमनेफिरने में ही निकल गया. दोनों परिवारों में खुशी का माहौल था लेकिन सोनम शादी के पहले ही मन ही मन एक खतरनाक साजिश बुन चुकी थी. इसी दौरान दोनों ने हनीमून प्लान किया और बहुत सी जगहों में से आखिरकार सोनम के जोर देने पर मेघालय जाना तय किया.

राजा ने अपने पेशे के सिलसिले में बहुत से शहर घूम रखे थे. लेकिन पूर्वोत्तर भारत नहीं घूमा था इसलिए मेघालय के नाम पर मुहर लग गई. मेघालय जाने की जिद चूंकि सोनम की ही थी इसलिए पति की सहमति मिलते ही उस ने ही तुरंत 20 मई के रिजर्वेशन करा लिए थे. लेकिन नई बहू की असल मंशा कोई नहीं भांप पाया.

शादी के बाद धार्मिक स्थलों पर जाने का रिवाज भी उन्होंने निभाया और सब से पहले बेंगलुरु होते कामख्या मंदिर जा कर देवी का आशीर्वाद लिया. हर कोई जानता है कि असम के गुवाहटी में स्थित कामख्या मंदिर तांत्रिक क्रियाओं के लिए मशहूर है. 21 मई को दोनों शिलांग पहुंचे और वहां के बालाजी गेस्ट हाउस में ठहरे. लोकल घूमनेफिरने उन्होंने कीटिंग रोड की एक दुकान से एक्टिवा किराए पर ली और वापस गेस्ट हाउस आ कर सो गए. दूसरे दिन सुबह यानी 22 मई को दोनों ने बालाजी गेस्ट हाउस से चेकआउट कर दिया. लेकिन जातेजाते मैनेजर को कहा कि हम 25 मई तक वापस आ सकते हैं और जरूरत पड़ने पर फिर से कमरा ले सकते हैं.

सुबह दोनों ने होटल में नाश्ता नहीं किया और स्कूटर पर सवार हो कर शिलांग से चेरापूंजी के लिए रवाना हो गए. तब उन के साथ 2 बैग थे. दोपहर को दोनों मावलखियाट गांव पहुंचे और वहां से नोग्रियाट गांव स्थित लिविंग रूट ब्रिज देखने चले गए, जिस के लिए उन्हें कोई 3 हजार सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ा. इस दौरान सोनम बेहद असहज थी और बारबार राजा से दूर जा कर किसी को मैसेज भेज रही थी दरअसल में वह लोकेशन शेयर कर रही थी.

शाम तक घूमफिर कर दोनों ने रात नोग्रियाट के ही शिपारा होम स्टे में गुजारी. 23 मई की सुबह दोनों ने शिपारा गेस्ट हाउस से भी चेक आउट कर दिया और ट्रैकिंग के लिए वेईसावडोंग झरने पर चले गए. इस दौरान दोनों फोन पर लगातार परिवारजनों के संपर्क में रहे और अपने घूमनेफिरने के बारे में बताते रहे. जिस से घर वाले बेफिक्र रहे कि दोनों एंजौय कर रहे हैं लेकिन हकीकत में दोनों में से कोई भी हनीमून एंजौय नहीं कर रहा था, हां राजा जरूर सोनम के इशारों पर नाचता जा रहा था.

इसी दिन दोपहर कोई डेढ़ बजे राजा ने अपनी मां उमा देवी से फोन पर बात की और उन्हें बताया कि वे चोटी पर पहुंच गए हैं और फल खा रहे हैं. इस के कुछ देर बाद ही सोनम ने भी अपनी सास को एक औडियो मैसेज भेजा जिस में कहा था कि हम लोग अभी चढ़ाई चढ़ रहे हैं बाद में बात करेंगे.

सोनम की आवाज से थकान साफ झलक रही थी. उमा देवी ने उसे याद दिलाया कि आज उस का ग्यारस का उपवास होगा. बातचीत में सोनम ने सास को यह भी बताया कि यहां उपवास का खानेपीने कुछ खास नहीं मिल रहा है कुछ देर पहले कौफी पी थी तो ऐसा लगा न जाने क्या पी रहे हैं.

इस के बाद घर वालों से उन का संपर्क ऐसा टूटा कि फिर स्थापित हुआ ही नहीं. दोनों के परिवारजन फोन पर फोन करते रहे लेकिन हर बार दोनों के ही मोबाइल बंद मिले तो सभी को स्वभाविक चिंता होने लगी. अपने ही शहर में किसी का फोन घंटे दो घंटे से ज्यादा न लगे तो भी घर वालों को फिक्र होने लगती है फिर ये दोनों तो कोई 2185 किलोमीटर दूर शिलांग के घने जंगलों में थे. एक अंदाजा यह लगाया गया कि नेटवर्क इशू हो सकता है इसलिए कौल नहीं लग पा रहा.

लेकिन इशू कुछ और ही था और इतना खतरनाक था कि जिस ने सुना वह सकते में आ गया. जब संपर्क हो ही नहीं पाया तो दोनों के घर वाले घबरा गए. तब तय यह हुआ कि घर के ही लोग शिलांग जा कर देखें कि आखिर हुआ क्या है. किसी अनहोनी की आशंका से मन ही मन सब कांप रहे थे. तुरंत ही राजा का भाई विपिन और सोनम का भाई गोविंद इमरजैंसी फ्लाइट ले कर शिलांग पहुंचे और दोनों की खोजबीन में जुट गए.

गूगल मैप के जरिए जब दोनों ने आसपास की लोकेशन ट्रेस की तो किराए पर एक्टिवा देने वाले की जानकारी मिल गई जिस से उन्हें अंधेरे में रौशनी की किरण नजर आई. किराए पर व्हीकल देने वाली एजेंसी ने इस बात की पुष्टि की कि दोनों ने उन्हीं के यहां से एक्टिवा ली थी और दोनों उस से ओसरा हिल्स की तरफ रवाना हुए थे. स्थानीय पुलिस का सहयोग उन्होंने लिया लेकिन दोनों के मुताबिक पुलिस ने कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई.

इस की एक वजह भाषा की समस्या भी थी. रौशनी की जो किरण गोविंद और सचिन को दिखाई दी थी वह उस वक्त बुझ सी गई जब एक्टिवा पहाड़ी इलाके में लावारिस हालत में पड़ी मिली. इन दोनों ने इंदौर पुलिस कमिश्नर संतोष सिंह से बात कर मदद की गुहार लगाई. कमिश्नर साहब ने क्राइम ब्रांच के डीसीपी राजेश कुमार त्रिपाठी को जांच की जिम्मेदारी सौंप दी जो शिलांग पुलिस के लगातार संपर्क में रहे.

इंदौर के रघुवंशी दंपत्ति शिलांग में रहस्मय तरीके से गायब हैं और अब तक कोई सुराग उन का नहीं मिला है यह बात जंगल की आग की तरह इंदौर से मध्य प्रदेश होते पूरे देश में फैल गई. इंदौर में हर घंटे हर दिन सस्पेंस गहराता जा रहा था कोई नई बात जो दरअसल में पुरानी हो चुकी होती थी वह पता चलती थी तो सभी अपने अपने कयास लगाना और बताना शुरू कर देते थे.

परिचित, दोस्त और नातेरिश्तेदार यानी शुभचिंतक राजा और सोनम के घर हालचाल लेने और सहानुभूति प्रदर्शित करने जाने लगे थे. जिस से कम होने के बजाय दोनों परिवारों का ब्लड प्रेशर और तनाव दोनों बढ़ रहे थे.

इधर शिलांग में लावारिस हालत में पड़ी मिली एक्टिवा से कुछ ही दूर खाई में शाम को सर्चिंग के दौरान एक रेन कोट और दो बैग मिले. इंदौर में मीडिया को इस परिवार से जुड़े अर्पित चौहान ने बताया कि इस मामले में पुलिस अधिकारियों की मीटिंग चल रही है और इंदौर व शिलांग पुलिस से उन्हें सहायता मिल रही है.

मामला बहुत गंभीर मोड़ पर आ गया था जिस में अब तरहतरह की आशंकाएं ही बची थीं और सोशल मीडिया इस रहस्मय मसले से भरा पड़ा था. जिस के चलते मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मेघालय के मुख्यमंत्री कानराड संगमा से फोन पर बात की और अपने अफसरों को मेघालय पुलिस के संपर्क में रहने की हिदायत दी. मध्य प्रदेश के ही एक और वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मदद के लिए आग्रह किया.

इधर शिलांग में सर्चिंग चल रही थी जो भारी बारिश और घने कोहरे के चलते व्यवधान तो डाल रही थी. सभी की दहशत उस वक्त और बढ़ गई जब स्थानीय लोगों ने यह बताया कि जिस इलाके में एक्टिवा मिली है वह कुख्यात इलाका है और गुंडे बदमाशों का अड्डा है. कहासुना यह भी गया कि यहां पहले भी कपल्स के गायब होने की वारदातें हो चुकी हैं. चूंकि स्थानीय लोग और पुलिस रघुवंशी परिवारों की उम्मीद के मुताबिक मदद नहीं कर रहे थे. इसलिए विपिन और गोविंद ने यूट्यूबर की मदद ली. एक यूट्यूबर को पैसे दे कर राजा और सोनम के फोटो व वीडियो वायरल करवाए गए. एक लोकल न्यूज चैनल को भी पैसे दे कर खबर चलवाई गई.

दूसरी तरफ पुलिस की सर्चिंग मुहिम जारी थी लेकिन तेज बारिश के चलते व्यवधान पड़ रहा था. मामला सुलझने के बजाय उलझता जा रहा था. राजा के परिवारजनों ने कपल की खबर देने वालों को 5 लाख नगद इनाम देने का एलान कर दिया.

शिलांग के खासी हिल्स जिले की सोहरा हिल्स जहां से राजा और सोनम लापता हुए थे बेहद खतरनाक ट्रेक है और दुनिया में सब से ज्यादा और तेज बारिश बाले इलाकों में से एक है. राजा को रोमांच से परहेज नहीं था लेकिन वह काफी एहतियात से चलने वाला युवक था. पूछताछ में दोनों के भाइयों को किसी ने बताया कि यहां किडनैप करने वालों की एक गैंग सक्रिय है. मुमकिन है उस ने ही इन दोनों का अपहरण कर लिया हो और एक्टिवा को दूर छोड़ दिया हो. वैसे भी इस इलाके में लूटपाट आम है जिस के चलते स्थानीय लोग भी अकेले आने से भी डरते हैं.

रघुवंशी परिवार की मदद की गरज से इंदौर के सांसद शंकर ललवानी भी शिलांग पहुंच कर पुलिस अधिकारियों से मिले जिस से पुलिस सर्च औपरेशन में और तेजी आई. लेकिन इस के बाद भी लापता कपल का कोई सुराग नहीं मिल रहा था. और जब सुराग मिला भी तो राजा की लाश की शक्ल में मिला.

सर्चिंग के दौरान ड्रोन की मदद से एक गहरी खाई में राजा की लाश पड़ी मिली, शव ऊपर लाया गया तो उसे पहचानना मुश्किल था क्योंकि वह गल चुका था. राजा के दाहिने हाथ पर बने टैटू से उसे पहचाना गया.

इसी जगह से एक लेडिज शर्ट, पैंटरा- 40 नाम की दवा, वीवो कंपनी के मोबाइल फोन की स्क्रीन और एक स्मार्ट घड़ी बरामद हुई. यह जगह उस जगह से कोई 25 किलोमीटर दूर थी, जहां एक्टिवा पड़ी मिली थी. राजा ने जो सोने की अंगूठियां पहन रखी थीं उन सहित उस के बैलेट के गायब होने से यह ख्याल पुख्ता हुआ कि यह कपल लूट का शिकार हुआ है.

राजा की मौत की खबर इंदौर पहुंची तो शहर में मातम पसर गया और देशभर में फिर चर्चाओं और अफवाहों का बाजार गर्म हो उठा. पोस्टमार्टम के बाद राजा का शव इंदौर ला कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया. लेकिन सोनम का अभी भी कोई अतापता नहीं था कि वह जिंदा है भी या नहीं और है तो किस हाल में और कहां है यह सच सोनम सहित उस के प्रेमी राज कुशवाह और तीनों सुपारी किलर्स को ही मालूम था.

सोनम और राजा की गुमशुदगी के दौरान दोनों के घर वाले ज्योतिषियों और तांत्रिकों के चक्कर लगाते रहे जो उन्हें अपने पेशे के मुताबिक ब्लफ देते रहे. एक तांत्रिक के कहने पर सोनम की तस्वीर घर के बाहर उलटी लटका दी गई. एक और ज्ञानी ने आंख मूंद कर भविष्यवाणी कर दी कि दोनों का अपहरण किया गया है और उन्हें नीले रंग के मकान में रखा गया है. लेकिन चूंकि इस मामले का हल्ला बहुत मच चुका है इसलिए अपहरणकर्ता फिरौती के लिए संपर्क नहीं कर रहे हैं अब भला कौन इन पंडित जी को बताता समझाता कि राजा का अपहरण नहीं हुआ बल्कि हत्या हुई है जिस की सूत्रधार और कर्ताधर्ता पत्नी सोनम है.

गोविंद, विक्रम और दोनों के घर वाले मेघालय पुलिस को कोसते रहे लेकिन इन तांत्रिकों ज्योतिषियों की गिरहबान किसी ने नहीं पकड़ी जो इंदौर में बैठे भविष्यवाणियां कर रहे थे. अगर इन में कोई दम होता तो इन्होंने राजा की मौत की भविष्यवाणी क्यों नहीं की थी और सोनम के बाबत भी कुछ स्पष्ट नहीं बोल पाए लेकिन जब वह जिंदा मिली तो ये अपने उलटी तस्वीर वाले टोटके को इस का श्रेय देते नजर आए.

मीडिया वाले भी उस पंडित का इंटरव्यू लेते नजर आए जिन्हें कल तक उस का नाम पता भी नहीं मालूम था. कुछ दिन बाद सोनम सही सलामत मिल गई.

सोनम ने जानबूझ कर हनीमून के लिए उस दुर्गम जगह को चुना था जो उन के शहर इंदौर से कोई 2200 किलोमीटर दूर थी, जहां घने जंगल थे जंगली जीवजंतु थे, पहाड़ियां थीं, झरने थे लेकिन सब एकदम असुरक्षित होते हैं पर अब साबित हो रहा है कि पति की हत्या करने ये जगहें मुफीद साबित होती हैं.

यह राज तब खुला जब 9 जून को एकाएक ही सोनम प्रगट हो गई लेकिन इंदौर या मेघालय में नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के एक ढाबे से जिस से यह साबित हो गया कि मेघालय पुलिस इस मामले पर पूरी गंभीरता और मुस्तेदी से काम कर रही थी. जैसे ही सोनम के मिलने की खबर न्यूज चैनल्स पर आई वैसे ही टीवी से बिदकने वाले लोग भी टीवी देखने टूट पड़े खासतौर से महिलाओं को तो इस हत्याकांड से जुड़ी हर सनसनी देखने में पारिवारिक धारावाहिकों सरीखा बल्कि उस से भी ज्यादा आनंद मिल रहा था.

गाजीपुर के काशीपांन जायका ढाबे से गिरफ्तार सोनम बदहवास दिखने की असफल कोशिश कर रही थी. मेघालय पुलिस ने सोनम को गिरफ्तार करते बताया कि पति राजा की हत्या की साजिश उस ने ही रची थी और इस के लिए किराए के हत्यारे भी हायर किए थे 16 मई को इंदौर के सुपर कोरिडोर में सोनम राज से मिली और पूरा प्लान बनाया. हत्या के लिए राज ने अपने 3 दोस्तों आकाश राजपूत, आनंद कुर्मी और विशाल चौहान को भी साथ मिला लिया.

प्लान के मुताबिक ये चारों ट्रेन और सड़क मार्ग से शिलांग पहुंचे. इन्हें सोनम लगातार अपनी लोकेशन देती जा रही थी. 23 मई की सुबह जब राजा के साथ वह मावलखियात पहुंची तो ये चारों भी पीछे लग लिए. सोनम राजा को पहाड़ी पर सुनसान जगह ले गई और आरोपियों को इशारा कर दिए जो राजा के नजदीक पहुंच गए. पहुंच तो गए लेकिन उस की हत्या करने की हिम्मत इन की नहीं पड़ रही थी जिस से सोनम बौखला गई और चिल्लाई भी.
इस पर विशाल ने धारदार हथियार से राजा के सर पर पहला वार किया. आनंद ने राजा को पकड़ा और आकाश निगरानी करता रहा. सोनम थोड़ी दूर खड़ी राजा की मौत देखती रही. इस के बाद इन सभी ने बेसुध राजा को गहरी खाई में धक्का दे दिया.

प्लान की कामयाबी के बाद विशाल आकाश और राज इंदौर लौट आए और आनंद बीना चला गया. सोनम जिस रास्ते गई थी उस से वापस इंदौर आ गई लेकिन ऐसे आई कि किसी को हवा भी नहीं लगी. खुद उस के अलावा चारों हत्यारे जानते थे कि सोनम गई तो सुहागिन थी लेकिन वापस विधवा हो कर आई है जिस की स्क्रिप्ट भी खुद उस ने ही लिखी थी. अब ये सभी नातजुर्बेकार कम उम्र हत्यारे भी जेल में हैं जो इस खुशफहमी में थे कि उन्हें कोई नहीं पकड़ सकता लेकिन इन लोगों को रत्तीभर भी इल्म नहीं था कि मेघालय पुलिस 23 मई को ही सक्रिय हो गई थी जिस ने राजा हत्याकांड को औपरेशन हनीमून नाम दिया था इस मिशन में 120 पुलिसकर्मी लगातार जुटे रहे थे जिन्होंने बतौर सबूत 42 सीसीटीवी फुटेज और दूसरे साक्ष्य भी जुटा लिए थे, इन में से अहम हैं सभी के आनेजाने और ठहरने के सबूत और सोनम की 20 दिन में राज से मोबाइल फोन पर 242 बार हुई बातचीत के भी सबूत के अलावा ढेरों पुख्ता साक्ष्य अदालत में गवाही देंगे.

न्यूज चैनल्स टीआरपी बढ़ाने के लिए अभी भी इस हत्याकांड को भुना रहे हैं. पुलिस की थ्योरी और बयान टुकड़ों में आ रहे हैं लेकिन टीवी से चिपके दर्शकों ने सोनम के ढाबे पर मिलने के साथ ही साबित कर दिया कि सोनम ही हत्यारिन और साजिशकर्ता है.

Crime : राजा की ‘बलि’ के जिम्मेदार तीन – सोनम, जन्मपत्री और जातिवाद

Crime : भारतीय मध्यवर्गीय, खासतौर से उच्च मध्यवर्गीय, घरों के माहौल का आलम तो यह है कि रहने वाले चारपांच लोग मेहमानों और अजनबियों की तरह रहते हैं. पैसों के अलावा किसी से किसी को कोई खास सरोकार नहीं. बेटा रात 2 बजे के करीब या अलसुबह घर वापस आता है, बेटी उस से चारछह घंटे पहले आ जाती है. डाइनिंग टेबल पर रखा खाना ये बच्चे यानी युवा, जितना खाना हो, खा लेते हैं. खाना पसंद न आए तो भी दिक्कत नहीं, स्वीगी और जोमैटो रातभर पेट भरने को तैयार रहते हैं. घर की धुरी कही जाने वाली मां टीवी और मोबाइल देख कर 12 बजे के लगभग अपने बैडरूम में लुढ़क जाती है. पतिदेव के आनेजाने का भी कोई ठिकाना नहीं.

जरूरी नहीं कि सभी घरों में ऐसा माहौल हो लेकिन ऐसा तो लगभग सभी घरों में है कि संवादहीनता और एकदूसरे के प्रति अविश्वास निर्णायक रूप से पसर चुके हैं जिस का खमियाजा हरेक को अलगअलग तरीके से भुगतना पड़ता है. पेरैंट्स को शिकायत है कि बच्चे उन की सुनना तो दूर की बात है, उन से बातचीत ही नहीं करना चाहते. जबकि युवा होते बच्चों की शिकायत यह है कि पेरैंट्स उन्हें सम झना ही नहीं चाहते, वे आजकल के हिसाब से फिट नहीं हैं.

ऐसी कई बातें और शिकायतें हरेक को हैं जिन का कोई हल नहीं. आज लोग जमीनी हकीकतों से बहुत दूर हो चले हैं जिस का बड़ा जिम्मेदार वह स्मार्टफोन है जिस ने पढ़नापढ़ाना छुड़ा दिया है. नतीजतन पेरैंट्स को नहीं मालूम कि संतान को आने वाले कल और चुनौतियों के लिए कैसे प्रशिक्षित किया जाना है. उन्हें पढ़ने के लिए पत्रपत्रिकाएं दिया जाना कितना अहम और जरूरी हो चला है जिस से वे वह सीखें जो हम से सीखने को तैयार नहीं या हम सिखा ही नहीं पा रहे.

पत्रपत्रिकाओं का फायदा यह है कि नाश्ते के समय किसी भी प्रकाशित लेख और कहानी पर सभी बात कर सकते हैं क्योंकि एकएक कर के सभी ने उसे पढ़ लिया होगा. अब मोबाइल में कौन क्या देखसुन रहा है, यह दूसरेतीसरे को कैसे मालूम होगा. मोबाइल के दुराज्ञान पर भी कोई चर्चा करने का माहौल नहीं बनता.

उधर संतानें हवा में उड़ रही हैं क्योंकि उन के हाथ में गूगल गुरु के अलावा अब एआई भी जो है. दिक्कत तो बड़ी यह भी है कि इस वर्ग के युवाओं के सामने आर्थिक चुनौतियां न के बराबर बची हैं. जो पीढ़ी आधी रात को 400-500 रुपए के कोल्डड्रिंक के साथ सोयाचाप और सैंडविच मंगा कर पेट भरती हो उस से यह उम्मीद करना बेकार है कि वह जीवन की कठिनाइयों से वाकिफ होगी. यह उन्हें बताने वाला कोई नहीं कि जीवन की कठिनाइयां, चुनौतियां और उन के हल स्क्रीन पर नहीं बल्कि प्रिंट पेजेज में मिलते हैं.

सोनम रघुवंशी की अपराध गाथा

अब बात इंदौर की सोनम रघुवंशी की जिस की उम्र महज 24 साल है. सोनम इन दिनों जेल में है और उम्मीद है, आने वाले 15-20 साल भी वह जेल में ही रहेगी. वह जब जेल से बाहर आएगी तब कोई उसे लेने फूल या गुलदस्ता ले कर जेल के दरवाजे पर नहीं खड़ा होगा. उस के सामने तब भी एक पहाड़ सी जिंदगी पड़ी होगी, एक स्याह दुनिया और भविष्य होगा और उस के हाथ में उतना ही पैसा होगा जो जेल मैन्युअल के हिसाब से जेल में की गई मेहनत के एवज में उसे मिला होगा.

लेकिन यह युवती अभी इन से भी कड़वे और भयावह सच नहीं सम झ पाएगी. दरअसल, सोचनासम झना तो उस ने सीखा ही नहीं और पेरैंट्स ने सिखाया भी नहीं. अगर उस ने कहीं से भी सीखा होता या पेरैंट्स ने सिखाया होता तो वह पति राजा रघुवंशी की हत्या करने के बजाय उसे स्वीकार लेती.

आजकल की युवतियों के लिए अपने प्यार और शादी के फैसले के बारे में घर वालों को बता देना कोई मुश्किल काम नहीं रह गया है जो वे 70-80 के दशक की हिंदी फिल्मों की नायिका की तरह सिर झुकाए चुन्नी या साड़ी का पल्लू उंगलियों में लपेटते-हकलाते हुए मां या बाप को बताएं कि एक लड़का मु झे पसंद आ गया है. अब वे दोटूक फैसला सुनाती हैं और पेरैंट्स के पास उन से सहमत होने के अलावा कोई रास्ता नहीं रह जाता. वे मानसिक और सामाजिक तौर पर इस बात के लिए तैयार भी रहते हैं कि बेटा या बेटी इंटरकास्ट मैरिज का फैसला कभी भी सुना सकते हैं. यह एक अच्छी बात है क्योंकि हर किसी को अपनी मरजी से शादी करने का हक है जिस का इस्तेमाल नई पीढ़ी कर भी रही है. आजकल हर दूसरी शादी इंटरकास्ट होती है, इस से सहज सम झा जा सकता है कि इस बदलाव को सहज स्वीकार कर लिया गया है.

जाति थी वजह

सोनम के मामले में हरकोई पूछ और कह रहा है कि जब वह राज कुशवाह को इतना चाहती ही थी तो उस ने उस से ही शादी क्यों नहीं कर ली. बेचारे निर्दोष और मासूम राजा की हत्या करने से क्या मिला उसे. इस सवाल का आसान जवाब जो हर किसी को नहीं सू झ सकता वह यह है कि राज जाति से कुशवाह यानी काछी था जिस की गिनती धर्म के हिसाब से सछूत शूद्रों और संविधान के हिसाब से ओबीसी यानी अन्य पिछड़े वर्ग में होती है.

देश में जो ऊंची जातियां हैं उन में रघुवंशियों की गिनती क्षत्रियों में होती है. यह जाति खुद को राम का वंशज मानती है. रघुवंशियों का अपना एक अलग रुतबा, मुकाम, आनबानशान और ठसक होती है. ये आमतौर पर अपने उसूलों, रीतिरिवाजों और परंपराओं से किसी भी कीमत पर कोई सम झौता नहीं करते. मध्य प्रदेश में इन की आबादी सब से ज्यादा है. रघुवंशी बाहुल्य जिलों में विदिशा, रायसेन, गुना, होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम), नरसिंहपुर और जबलपुर के अलावा रीवा, सतना व पन्ना की गिनती होती है. इस जाति के लोग बड़े पैमाने पर खेतीकिसानी के लिए मशहूर हैं लेकिन अब ये गांवों से निकल कर शहरों में आ कर व्यवसाय भी करने लगे हैं.

शहरों में आ कर रघुवंशी समुदाय के लोग रहनसहन, पहनावे वगैरह से तो आधुनिक हो गए और शिक्षित भी होने लगे लेकिन दिलोदिमाग में बसी अपनी जमींदारी, ठसक, चौधराहट और ऊंचे ठाकुर होने का गुमान व गरूर पूरी तरह नहीं छोड़ पाए.

अब दूसरा सवाल जो बेहद आम है कि सोनम राज के साथ भाग क्यों नहीं गई जो उम्र में भले ही उस से 5 साल छोटा था लेकिन बालिग तो था, लिहाजा कोई अड़ंगा इस शादी में पेश न आता. यह बहुत अहम और दिलचस्प सवाल है जिस के कई जवाब सटीक जान पड़ते हैं. उन में सब से ऊपर यह है कि सोनम अव्वल दर्जे की ऐसी मूर्ख युवती है जो खुद को स्मार्ट, बुद्धिमान और चालाक होने की गलतफहमी पाले बैठे थी. प्रेमी यानी बौयफ्रैंड छोटी जाति का हो, ऊपर से गरीब भी तो बात ‘एक तो करेला, ऊपर से नीम चड़ा’ जैसी हो जाती है. राज कुछ दिनों पहले तक देवी सिंह के करोड़ों के प्लाईवुड के कारोबार में, अदना सा लेकिन, भरोसेमंद मुलाजिम हुआ करता था.

राजकपूर निर्देशित फिल्म ‘प्रेमरोग’ की याद दिलाती सोनम की दास्तां के बारे में एक सच यह भी है जो फिल्म में पद्मिनी कोल्हापुरे की मां बनी नंदा के मुंह से एक दृश्य में बतौर हकीकत उगलवाया गया है. उस का सार यह है कि इन ठाकुरों को औलाद से ज्यादा अजीज अपने उसूल होते हैं. फिल्म 43 साल पुरानी है पर अप्रासंगिक नहीं हुई है. उलटे, दिनोंदिन और प्रासंगिक होती जा रही है. सोनम का मामला उस की ही कड़ी है.

‘प्रेमरोग’ तो सोनम को लग गया लेकिन वह समाज और परिवार से बगावत नहीं कर पाई. शायद उस के मन में यह डर था कि अगर भाग कर राज से शादी की तो घर वाले छोड़ेंगे नहीं. आएदिन ऐसी खबरें मीडिया की सुर्खियां भी बनी रहती हैं जिन में लड़की और लड़के वालों में तलवारें खिंच जाती हैं.

इस के लिए कहीं बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं. 10 जून को जब मीडिया, सोशल मीडिया और घरोंचौराहों में सोनम की चर्चा हो रही थी तब मध्य प्रदेश के ही गुना की एक अदालत में इंटरकास्ट मैरिज के विरोध में जम कर हंगामा मच रहा था. इत्तफाक से इस मामले में भी 23 वर्षीया युवती का नाम सोनम था जिस ने एक विजातीय हमउम्र युवक अजय से कोर्ट मैरिज कर ली थी. दोनों अपनी शादी के सिलसिले में ही बयान देने आए थे. अजय यादव जाति का है जबकि सोनम मीणा जाति की है. बस, इसी बात पर दोनों के घर वाले आपस में भिड़ पड़े. खबर के मुताबिक सोनम के घर वालों ने अजय के घर वालों को ज्यादा कूटा. अगर वक्त पर कोर्ट परिसर में भारी पुलिस बल तैनात न किया जाता तो यहां भी लाशें बिछ जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

प्यार की गरीबी

दूसरे, रईसी में पली सोनम राज के साथ लो प्रोफाइल जिंदगी जीने से भी कतरा रही थी. जिस घर में कारें न हों, एसी न हों, दूसरे शानशौकत और सहूलियतों वाले लग्जरी आइटम व गैजेट्स न हों, और तो और जो घर ही झुग्गी झोंपड़ी सरीखा लगे उस में भला वह कैसे रह पाती.

सोनम ने ‘जिस्म’ फिल्म की बिपाशा बसु बनना पसंद किया जो अपने करोड़पति पति गुलशन ग्रोवर की हत्या के लिए गरीब वकील प्रेमी जौन अब्राहम को राजी कर लेती है. हत्या करने के बाद जौन को पता चलता है कि उसे तो मोहरा बनाया गया है. दरअसल बिपाशा पैसों से प्यार करती है. फिल्म की कहानी चूंकि महेश भट्ट जैसे प्रयोगवादी लेखक ने लिखी थी इसलिए अंत में बिपाशा और जौन दोनों एकदूसरे को गोली मार देते हैं. लेकिन सोनम ने राज को मोहरा नहीं बनाया क्योंकि उसे अपने पिता की नाक और खानदान की इज्जत की भी चिंता थी.

लगता तो ऐसा है कि राज ने उसे मोहरा बनाया था जो राजा की हत्या के बाद विधवा सोनम से शादी कर बैठेबिठाए करोड़पति बन जाता. सोनम की उस के प्रति चाहत और मुहब्बत इस बात से भी सम झ आती है कि पूरे हनीमून (कथित) के दौरान उस ने राजा को सहवास की इजाजत नहीं दी थी. कोई न कोई बहाना बनाती रही थी, कभी कामख्या देवी के दर्शन का तो कभी थकान का.

सोनम के पकड़े जाने के बाद उस के घर वालों ने एक बार भी यह नहीं कहा कि एक बार कहती तो हम उस की शादी राज से करवा देते. उलटे, वे संस्कारों की दुहाई देते फुजूल का बचाव उस का करते रहे. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कम से कम सोनम की मां को तो उस के और राज के प्रेमप्रसंग की मालूमात थी. लेकिन उसे घर की इज्जत का हवाला दे कर जाति वाले राजा से ही शादी करने को मजबूर किया गया था.

संपत्ति का लोभ

सोनम का प्लान तो यही लगता है कि राजा के मरने के बाद पैतृक जायदाद में से पति का जो हिस्सा मिलेगा उस से शान से जिंदगी गुजारी जा सकती है. दूसरे, अपने पिता की जायदाद में से भी हिस्सा मिलता. इस के लिए जरूरी था कि कुछ दिन विधवाओं सी जिंदगी जी जाए, फिर सहानुभूति बटोर कर राज या किसी और से शादी कर ली जाए. हर कोई उस का वैधव्य देख कर यही कहता कि अभी उम्र ही क्या है, इतनी बड़ी पहाड़ सी जिंदगी कैसे अकेले काटेगी बेचारी. कोई ठीकठाक लड़का देख शादी कर देना ठीक रहेगा.

काम न आई कुंडली

आजकल तो विधवा विवाह होने लगे हैं. कोई न कोई जरूरतमंद हाथ थाम ही लेगा. अपने समाज में न मिले तो किसी और जाति का भी चलेगा. लेकिन यह कहने की बात है वरना ऊंची जातियों में विधवा की शादी आसानी तो क्या मुश्किल से भी नहीं होती. इसलिए नीची जाति वाले राज कुशवाह के नाम पर मंजूरी मिल सकती थी.

न भी मिलती तो करोड़ों की मालकिन बन जाने के बाद वह किसी को भी चुनने को आजाद रहती. लेकिन दूसरी शादी उस की जन्मकुंडली में है या नहीं, यह बताने को अब कोई पंडित तैयार नहीं. इंदौर के जिस पंडित एन के पांडेय ने दोनों की जन्मकुंडली मिलाई थी उस ने यह नहीं बताया था कि राजा की जिंदगी मरने की हद तक खतरे में आ जाएगी. उस ने तो यह कहा था कि चूंकि दोनों की ही जन्मकुंडली में मंगल दोष है इसलिए शादी हो सकती है और दोनों का जीवन सुखशांति से बीतेगा.

मंगलअमंगल का धंधा

मंगल के चक्कर में कितने अच्छे मैच शादी में तबदील नहीं हो पाते. इस का तजरबा हिंदुओं को है जो यह नहीं सोचते कि बिना जन्मकुंडली मिलाए जो शादियां होती हैं वे ज्यादा टिकाऊ होती हैं. भोपाल की एक प्राइवेट कंपनी के अधिकारी की मानें तो उन के परिवार में जन्मकुंडली मिलाने का रिवाज ही नहीं है. पिछले 40 वर्षों में 5 शादियां उन के खानदान में हुई हैं और सभी सफल हैं. इन अधिकारी के मुताबिक, सालों पहले उन के दादाजी की बहन की कुंडली गांव के पंडित ने 32 गुणों के साथ मिलाई थी. लेकिन शादी के दूसरे साल ही दादाजी के बहनोई एक सड़क हादसे में चल बसे तो उन का भरोसा इन पाखंडों से उठ गया.
मंगलअमंगल का धंधा चलता रहेगा क्योंकि कोई कानून ऐसा नहीं है जो एन के पांडेय जैसे पंडितों को अभियुक्त बना कर कठघरे में खड़ा करे. तरस तो उस मीडिया पर आता है जो सोनम के मामले को और चटपटा बनाते टीआरपी बढ़ाने में जी जान से लगा रहा. इस होड़ में आजतक नाम के न्यूज चैनल के संवाददाता ने उक्त पंडितजी का भी इंटरव्यू लिया जो उच्च और नीच के मंगल का राग अलापते रहे.

इस चैनल की हिम्मत पंडित से यह पूछने की नहीं हुई कि आप ने जब कुंडलियां देखी थीं तो यह कहीं क्यों नहीं दिखा था कि शादी के चंद दिनों बाद ही इतना भयानक हादसा हो सकता है. आप ने तो वरवधू को आशीर्वाद दिया था.
इस मामले से कई सबक मिलते हैं, मसलन यह कि युवाओं को अपने फैसले खुद लेने की हिम्मत जुटानी चाहिए. पेरैंट्स की जायदाद के लालच में सम झौता नहीं कर लेना चाहिए. अलावा इस के, वैवाहिक जीवन की गंभीरता सम झते हुए उस की जिम्मेदारियां उठाने के लिए भी उन्हें तैयार रहना चाहिए. दांपत्य के सफर में कई उतारचढ़ाव आते हैं. उन का सामना पतिपत्नी दोनों को एकदूसरे का हाथ भरोसे और मजबूती से पकड़ कर करना चाहिए. सोनम-राजा रघुवंशी का मामला अब अपवाद नहीं रह गया है. मीडिया ने छांट कर ऐसे मामले दिखाए और छापे जिन में शादी के कुछ दिनों बाद ही पति या पत्नी की मौत यानी हत्या हुई थी.

रही बात सोनम की, तो वह किराए के तीनों हत्यारों और प्रेमी राज सहित सजा भुगतेगी, वहीं, वह एक अवसाद, डर और अविश्वास समाज में फैला गई है जो पहले से ही बहुत थे. ऐसे मामले तो उसे और बढ़ाते हैं.

Hindi Kahani : शादी से इनकार

Hindi Kahani : पिछले 6 महीने से मुझे पुलिस स्टेशन में बुलाया जा रहा है. मुझे शहर में घटी आपराधिक घटनाओं का जिम्मेदार मानते हुए मुझ पर प्रश्न पर प्रश्न तोप के गोले की तरह दागे जा रहे थे. अपराध के समय मैं कब, कहां था. पुलिस को याद कर के जानकारी देता. मुझे जाने दिया जाता. मैं वापस आता और 2-4 दिन बाद फिर बुलावा आ जाता. पहली बार तो एक पुलिस वाला आया जो मुझे पूरा अपराधी मान कर घर से गालीगलौज करते व घसीटते हुए ले जाने को तत्पर था.

मैं ने उस से अपने अच्छे शहरी और निर्दोष होने के बारे में कहा तो उस ने पुलिसिया अंदाज में कहा, ‘पकड़े जाने से पहले सब मुजरिम यही कहते हैं. थाने चलो, पूछताछ होगी, सब पता चल जाएगा.’

चूंकि न मैं कोई सरकारी नौकरी में था न मेरी कोई दुकानदारी थी. मैं स्वतंत्र लेखन कर के किसी तरह अपनी जीविका चलाता था. उस पर, मैं अकेला था, अविवाहित भी.

पहली बार मुझे सीधा ऐसे कक्ष में बिठाया गया जहां पेशेवर अपराधियों को थर्ड डिगरी देने के लिए बिठाया जाता है. पुलिस की थर्ड डिगरी मतलब बेरहमी से शरीर को तोड़ना. मैं घबराया, डरा, सहमा था. मैं ने क्या गुनाह किया था, खुद मुझे पता नहीं था. मैं जब कभी पूछता तो मुझे डांट कर, चिल्ला कर और कभीकभी गालियों से संबोधित कर के कहा जाता, ‘शांत बैठे रहो.’ मैं घंटों बैठा डरता रहा. दूसरे अपराधियों से पुलिस की पूछताछ देख कर घबराता रहा. क्या मेरे साथ भी ये अमानवीय कृत्य होंगे. मैं यह सोचता. मैं अपने को दुनिया का सब से मजबूर, कमजोर, हीन व्यक्ति महसूस करने लगा था.

मुझ से कहा गया आदेश की तरह, ‘अपना मोबाइल, पैसा, कागजात, पेन सब जमा करा दो.’ मैं ने यंत्रवत बिना कुछ पूछे मुंशी के पास सब जमा करा दिए फिर मुझ से मेरे जूते भी उतरवा दिए गए.

उस के बाद मुझे ठंडे फर्श पर बिठा दिया गया. तभी उस यंत्रणाकक्ष में दो स्टार वाला पुलिस अफसर एक कुरसी पर मेरे सामने बैठ कर पूछने लगा :

‘क्या करते हो? कौनकौन हैं घर में? 3 तारीख की रात 2 से 4 के बीच कहां थे? किनकिन लोगों के साथ उठनाबैठना है? शहर के किसकिस अपराधी गिरोह को जानते हो? 3 जुलाई, 2012 को किसकिस से मिले थे? तुम चोर हो? लुटेरे हो?’

बड़ी कड़ाई और रुखाई से उस ने ये सवाल पूछे और धमकी, डर, चेतावनी वाले अंदाज में कहा, ‘एक भी बात झूठ निकली तो समझ लो, सीधा जेल. सच नहीं बताओगे तो हम सच उगलवाना जानते हैं.’

मैं ने उस से कहा और पूरी विनम्रता व लगभग घिघियाते हुए, डर से कंपकंपाते हुए कहा, ‘मैं एक लेखक हूं. अकेला हूं. 3 तारीख की रात 2 से 4 बजे के मध्य में अपने घर में सो रहा था. मेरा अखबार, पत्रपत्रिकाओं के कुछ संपादकों से, लेखकों से मोबाइलवार्ता व पत्रव्यवहार होता रहता है. शहर में किसी को नहीं जानता. मेरा किसी अपराधी गिरोह से कोई संपर्क नहीं है. न मैं चोर हूं, न लुटेरा. मात्र एक लेखक हूं. सुबूत के तौर पर पत्रिकाओं, अखबारों की वे प्रतियां दिखा सकता हूं जिन में मेरे लेख, कविताएं, कहानियां छपी हैं.’

मेरी बात सुन कर वह बोला, ‘पत्रकार हो?’

‘नहीं, लेखक हूं.’

‘यह क्या होता है?’

‘लगभग पत्रकार जैसा. पत्रकार घटनाओं की सूचना समाचार के रूप में और लेखक उसे विमर्श के रूप में लेख, कहानी आदि बना कर पेश करता है.’

‘मतलब प्रैस वाले हो,’ उस ने स्वयं ही अपना दिमाग चलाया.

मैं ने उत्तर नहीं दिया. प्रैस के नाम से वह कुछ प्रभावित हुआ या चौंका या डरा, यह तो मैं नहीं समझ पाया लेकिन हां, उस का लहजा मेरे प्रति नरम और कुछकुछ दोस्ताना सा हो गया था. उस ने अपने प्रश्नों का उत्तर पा कर मुझे मेरा सारा सामान वापस कर के यह कहते हुए जाने दिया कि आप जा सकते हैं. लेकिन दोबारा जरूरत पड़ी तो आना होगा.

पहली बार तो मैं ‘जान बची तो लाखों पाए’ वाले अंदाज में लौट आया लेकिन जल्द ही दोबारा बुलावा आ गया. इस बार जो पुलिस वाला लेने आया था उस का लहजा नरम था.

इस बार मुझे एक बैंच पर काफी देर बैठना पड़ा. जिसे पूछताछ करनी थी, वह किसी काम से गया हुआ था. इस बीच थाने के संतरी से ले कर मुंशी तक ने मुझे हैरानपरेशान कर दिया. किस जुर्म में आए हो, कैसे आए हो, अब तुम्हारी खैर नहीं? फिर मुझ से चायपानी, सिगरेट के लिए पैसे मांगे गए. मुझे देने पड़े न चाहते हुए भी. फिर जब वह पुलिस अधिकारी आया, मैं उसे पहचान गया. वह पहले वाला ही अधिकारी था. उस ने मुझे शक की निगाहों से देखते हुए फिर शहर में घटित अपराधों के विषय में प्रश्न पर प्रश्न करने शुरू किए. मैं ने उसे सारे उत्तर अपनी स्मरणशक्ति पर जोर लगालगा कर दिए. कुछ इस तरह डरडर कर कि एक भी प्रश्न का उत्तर गलत हुआ तो परीक्षा में बैठे छात्र की तरह मेरा हाल होगा.

चूंकि उस का रवैया नरम था सो मैं ने उस से पूछा, ‘क्या बात है, सर, मुझे बारबार बुला कर ये सब क्यों पूछा जा रहा है, मैं ने किया क्या है?’

‘पुलिस को आप पर शक है और शक के आधार पर पुलिस की पूछताछ शुरू होती है जो सुबूत पर खत्म हो कर अपराधी को जेल तक पहुंचाती है.’

‘लेकिन मुझ पर इस तरह शक करने का क्या आधार है?’

‘आप के खिलाफ हमारे पास सूचनाएं आ रही हैं.’

‘सूचनाएं, किस तरह की?’

‘यही कि शहर में हो रही घटनाओं में आप का हाथ है.’

‘लेकिन…?’

उस ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘आप को बताने में क्या समस्या है? हम आप से एक सभ्य शहरी की तरह ही तो बात कर रहे हैं. पुलिस की मदद करना हर अच्छे नागरिक का कर्तव्य है.’

अब मैं क्या बताऊं उसे कि हर बार थाने बुलाया जाना और पुलिस के प्रश्नों का उत्तर देना, थाने में घंटों बैठना किसी शरीफ आदमी के लिए किसी यातना से कम नहीं होता. उस की मानसिक स्थिति क्या होती है, यह वही जानता है. पलपल ऐसा लगता है कि सामने जहरीला सांप बैठा हो और उस ने अब डसा कि तब डसा.

इस तरह मुझे बुलावा आता रहा और मैं जाता रहा. यह समय मेरे जीवन के सब से बुरे समय में से था. फिर मेरे बारबार आनेजाने से थाने के आसपास की दुकानवालों और मेरे महल्ले के लोगों को लगने लगा कि या तो मैं पेशेवर अपराधी हूं या पुलिस का कोई मुखबिर. कुछ लोगों को शायद यह भी लगा होगा कि मैं पुलिस विभाग में काम करने वाला सादी वर्दी में कोई सीआईडी का आदमी हूं. मैं ने पुलिस अधिकारी से कहा, ‘सर, मैं कब तक आताजाता रहूंगा? मेरे अपने काम भी हैं.’

उस ने चिढ़ कर कहा, ‘मैं भी कोई फालतू तो बैठा नहीं हूं. मेरे पास भी अपने काम हैं. मैं भी तुम से पूछपूछ कर परेशान हो गया हूं. न तुम कुछ बताते हो, न कुबूल करते हो. प्रैस के आदमी हो. तुम पर कठोरता का व्यवहार भी नहीं कर रहा इस कारण.’

‘सर, आप कुछ तो रास्ता सुझाएं?’

‘अब क्या बताएं? तुम स्वयं समझदार हो. प्रैस वाले से सीधे तो नहीं कुछ मांग सकता.’

‘फिर भी कुछ तो बताइए. मैं आप की क्या सेवा करूं?’

‘चलो, ऐसा करो, तुम 10 हजार रुपए दे दो. मेरे रहते तक अब तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. न तुम्हें थाने बुलाया जाएगा.’

मैं ने थोड़ा समय मांगा. इधरउधर से रुपयों का बंदोबस्त कर के उसे दिए और उस ने मुझे आश्वस्त किया कि मेरे होते अब तुम्हें नहीं आना पड़ेगा.

मैं निश्ंचत हो गया. भ्रष्टाचार के विरोध में लिखने वाले को स्वयं रिश्वत देनी पड़ी अपने बचाव में. अपनी बारबार की परेशानी से बचने के लिए और कोई रास्ता भी नहीं था. मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं था. न मेरा किसी बड़े व्यापारी, राजनेता, पुलिस अधिकारी से परिचय था. रही मीडिया की बात, तो मैं कोई पत्रकार नहीं था. मैं मात्र लेखक था, जो अपनी रचनाएं आज भी डाक से भेजता हूं. मेरा किसी मीडियाकर्मी से कोई परिचय नहीं था. एक लेखक एक साधारण व्यक्ति से भी कम होता है सांसारिक कार्यों में. वह नहीं समझ पाता कि उसे कब क्या करना है. वह बस लिखना जानता है.

अपने महल्ले में भी लोग मुझे अजीब निगाहों से देखने लगे थे, जैसे किसी जरायमपेशा मुजरिम को देखते हैं. मैं देख रहा था कि मुझे देख कर लोग अपने घर के अंदर चले जाते थे. मुझे देखते ही तुरंत अपना दरवाजा बंद कर लेते थे. महल्ले में लोग धीरेधीरे मेरे विषय में बातें करने लगे थे. मैं कौन हूं? क्या हूं? क्यों हूं? मेरे रहने से महल्ले का वातावरण खराब हो रहा है. और भी न जाने क्याक्या. मेरे मुंह पर कोई नहीं बोलता था. बोलने की हिम्मत ही नहीं थी. मैं ठहरा उन की नजर में अपराधी और वे शरीफ आदमी. अभी कुछ ही समय हुआ था कि फिर एक पुलिस की गाड़ी सायरन बजाते हुए रुकी और मुझ से थाने चलने के लिए कहा. मेरी सांस हलक में अटक गई. लेकिन इस बार मैं ने पूछा, ‘‘क्यों?’’

‘‘साहब ने बुलाया है. आप को चलना ही पड़ेगा.’’

यह तो कृपा थी उन की कि उन्होंने मुझे कपड़े पहनने, घर में ताला लगाने का मौका दे दिया. मैं सांस रोके, पसीना पोंछते, पुलिस की गाड़ी में बैठा सोचता रहा, ‘साहब से तो तय हो गया था.’ महल्ले के लोग अपनीअपनी खिड़कियों, दरवाजों में से झांक रहे थे.

थाने पहुंच कर पता चला जो पुलिस अधिकारी अब तक पूछताछ करता रहा और जिसे मैं ने रिश्वत दी थी उस का तबादला हो गया है. उस की जगह कोई नया पुलिस अधिकारी था.

मेरे लिए खतरनाक यह था कि उस के नाम के बाद उस का सरनेम मेरे विरोध में था. वह बुद्धिस्ट, अंबेडकरवादी था और मैं सवर्ण. मैं समझ गया कि अपने पूर्वजों का कुछ हिसाबकिताब यह मुझे अपमानित और पीडि़त कर के चुकाने का प्रयास अवश्य करेगा. इस समय मुझे अपना ऊंची जाति का होना अखर रहा था.

मैं ने कई पीडि़त सवर्णों से सुना है कि थाने में यदि कोई दलित अफसर होता है तो वह कई तरह से प्रताडि़त करता है. मेरे साथ वही हुआ. मेरा सारा सामान मुंशी के पास जमा करवाया गया. मेरे जूते उतरवा कर एक तरफ रखवाए गए. मुझे ठंडे और गंदे फर्श पर बिठाया गया. फिर एक काला सा, घनी मूंछों वाला पुलिस अधिकारी बेंत लिए मेरे पास आया और ठीक सामने कुरसी डाल कर बैठ गया. उस ने हवा में अपना बेंत लहराया और फिर कुछ सोच कर रुक गया. उस ने मुझे घूर कर देखा. नाम, पता पूछा. फिर शहर में घटित तथाकथित अपराधों के विषय में पूछा.

मैं ने अब की बार दृढ़स्वर में कहा, ‘‘मैं पिछले 6 महीने से परेशान हूं. मेरा जीना मुश्किल हो रहा है. मेरा खानापीना हराम हो गया है. मेरी रातों की नींद उड़ गई है. इस से अच्छा तो यह है कि आप मुझे जेल में डाल दें. मुझे नक्सलवादी, आतंकवादी समझ कर मेरा एनकाउंटर कर दें. आप जहां चाहें, दस्तखत ले लें. आप जो कहें मैं सब कुबूल करने को तैयार हूं. लेकिन बारबार इस तरह यदि आप ने मुझे अपमानित और प्रताडि़त किया तो मैं आत्महत्या कर लूंगा,’’ यह कहतेकहते मेरी आंखों से आंसू बहने लगे.

नया पुलिस अधिकारी व्यंग्यात्मक ढंग से बोला, ‘‘आप शोषण करते रहे हजारों साल. हम ने नीचा दिखाया तो तड़प उठे पंडित महाराज.’’

उस के ये शब्द सुन कर मैं चौंका, ‘पंडित महाराज, तो एक ही व्यक्ति कहता था मुझ से. मेरे कालेज का दोस्त. छात्र कम गुंडा ज्यादा.’

‘‘पहचाना पंडित महाराज?’’ उस ने मेरी तरफ हंसते हुए कहा.

‘‘रामचरण अंबेडकर,’’ मेरे मुंह से अनायास ही निकला.

‘‘हां, वही, तुम्हारा सीनियर, तुम्हारा जिगरी दोस्त, कालेज का गुंडा.’’

‘‘अरे, तुम?’’

‘‘हां, मैं.’’

‘‘पुलिस में?’’

‘‘पहले कालेज में गुंडा हुआ करता था. अब कानून का गुंडा हूं. लेकिन तुम नहीं बदले, पंडित महाराज?’’

उस ने मुझे गले से लगाया. ससम्मान मेरा सामान मुझे लौटाया और अपने औफिस में मुझे कुरसी पर बिठा कर एक सिपाही से चायनाश्ते के लिए कहा.

यह मेरा कालेज का 1 साल सीनियर वही दोस्त था जिस ने मुझे रैगिंग से बचाया था. कई बार मेरे झगड़ों में खुद कवच बन कर सामने खड़ा हुआ था. फिर हम दोनों पक्के दोस्त बन गए थे. मेरे इसी दोस्त को कालेज की एक उच्चजातीय कन्या से प्रेम हुआ तो मैं ने ही इस के विवाह में मदद की थी. घर से भागने से ले कर कोर्टमैरिज तक में. तब भी उस ने वही कहा था और अभी फिर कहा, ‘‘दोस्ती की कोई जाति नहीं होती. बताओ, क्या चक्कर है?’’

मैं ने उदास हो कर कहा, ‘‘पिछले 6 महीने से पुलिस बुलाती है पूछताछ के नाम पर. जमाने भर के सवाल करती है. पता नहीं क्यों? मेरा तो जीना हराम हो गया है.’’

‘‘तुम्हारी किसी से कोई दुश्मनी है?’’

‘‘नहीं तो.’’

‘‘अपनी शराफत के चलते कभी कहीं ऐसा सच बोल दिया हो जो किसी के लिए नुकसान पहुंचा गया हो और वह रंजिश के कारण ये सब कर रहा हो?’’

‘‘क्या कर रहा हो?’’

‘‘गुमनाम शिकायत.’’

‘‘क्या?’’ मैं चौंक गया, ‘‘तुम यह कह रहे हो कि कोई शरारत या नाराजगी के कारण गुमनाम शिकायत कर रहा है और पुलिस उन गुमनाम शिकायतों के आधार पर मुझे परेशान कर रही है.’’

‘‘हां, और क्या? यदि तुम मुजरिम होते तो अब तक जेल में नहीं होते. लेकिन शिकायत पर पूछताछ करना पुलिस का अधिकार है. आज मैं हूं, सब ठीक कर दूंगा. तुम्हारा दोस्त हूं. लेकिन शिकायतें जारी रहीं और मेरी जगह कल कोई और पुलिस वाला आ गया तो यह दौर जारी रह सकता है. इसीलिए कह रहा हूं, ध्यान से सोच कर बताओ कि जब से ये गुमनाम शिकायतें आ रही हैं, उस के कुछ समय पहले तुम्हारा किसी से कोई झगड़ा या ऐसा ही कुछ और हुआ था?’’

मैं सोचने लगा. उफ्फ, मैं ने सोचा भी नहीं था. अपने पड़ोसी मिस्टर नंद किशोर की लड़की से शादी के लिए मना करने पर वह ऐसा कर सकता है क्योंकि उस के बाद नंद किशोर ने न केवल महल्ले में मेरी बुराई करनी शुरू कर दी थी बल्कि उन के पूरे परिवार ने मुझ से बात करनी भी बंद कर दी थी. उलटे छोटीछोटी बातों पर उन का परिवार मुझ से झगड़ा करने के बहाने भी ढूंढ़ता रहता था. हो सकता है वह शिकायतकर्ता नंद किशोर ही हो. लेकिन यकीन से किसी पर उंगली उठाना ठीक नहीं है. अगर नहीं हुआ तो…मैं ने अपने पुलिस अधिकारी मित्र से कहा, ‘‘शक तो है क्योंकि एक शख्स है जो मुझ से चिढ़ता है लेकिन यकीन से नहीं कह सकता कि वही होगा.’’

फिर मैं ने उसे विवाह न करने की वजह भी बताई कि उन की लड़की किसी और से प्यार करती थी. शादी के लिए मना करने के लिए उसी ने मुझ से मदद के तौर पर प्रार्थना की थी. लेकिन मेरे मना करने के बाद भी पिता ने उस की शादी उसी की जाति के ही दूसरे व्यक्ति से करवा दी थी.

‘‘तो फिर नंद किशोर ही आप को 6 महीने से हलकान कर रहे हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘यार, मुझे इस मुसीबत से किसी तरह बचाओ.’’

‘‘चुटकियों का काम है. अभी कर देता हूं,’’ उस ने लापरवाही से कहा.

फिर मेरे दोस्त पुलिस अधिकारी रामचरण ने नंद किशोर को परिवार सहित थाने बुलवाया. डांट, फटकार करते हुए कहा, ‘‘आप एक शरीफ आदमी को ही नहीं, 6 महीनों से पुलिस को भी गुमराह व परेशान कर रहे हैं. इस की सजा जानते हैं आप?’’

‘‘इस का क्या सुबूत है कि ये सब हम ने किया है?’’ बुजुर्ग नंद किशोर ने अपनी बात रखी.

पुलिस अधिकारी रामचरण ने कहा, ‘‘पुलिस को बेवकूफ समझ रखा है. आप की हैंडराइटिंग मिल गई तो केस बना कर अंदर कर दूंगा. जहां से आप टाइप करवा कर झूठी शिकायतें भेजते हैं, उस टाइपिस्ट का पता लग गया है. बुलाएं उसे? अंदर करूं सब को? जेल जाना है इस उम्र में?’’

पुलिस अधिकारी ने हवा में बातें कहीं जो बिलकुल सही बैठीं. नंद किशोर सन्नाटे में आ गए.

‘‘और नंद किशोरजी, जिस वजह से आप ये सब कर रहे हैं न, उस शादी के लिए आप की लड़की ने ही मना किया था. यदि दोबारा झूठी शिकायतें आईं तो आप अंदर हो जाएंगे 1 साल के लिए.’’

नंद किशोर को डांटडपट कर और भय दिखा कर छोड़ दिया गया. मुझे यह भी लगा कि शायद नंद किशोर का इन गुमनाम शिकायतों में कोई हाथ न हो, व्यर्थ ही…

‘‘मेरे रहते कुछ नहीं होगा, गुमनाम शिकायतों पर तो बिलकुल नहीं. लेकिन थोड़ा सुधर जा. शादी कर. घर बसा. शराफत का जमाना नहीं है,’’ उस ने मुझ से कहा. फिर मेरी उस से यदाकदा मुलाकातें होती रहतीं. एक दिन उस का भी तबादला हो गया.

मैं फिर डरा कि कोई फिर गुमनाम शिकायतों भरे पत्र लिखना शुरू न कर दे क्योंकि यदि यह काम नंद किशोर का नहीं है, किसी और का है तो हो सकता है कि थाने के चक्कर काटने पड़ें. नंद किशोर ने तो स्वीकार किया ही नहीं था. वे तो मना ही करते रहे थे अंत तक.

लेकिन उस के बाद यह सिलसिला बंद हो गया. तो क्या नंद किशोर ही नाराजगी के कारण…यह कैसा गुस्सा, कैसी नाराजगी कि आदमी आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए. गुस्सा है तो डांटो, लड़ो. बात कर के गुस्सा निकाल लो. मन में बैर रखने से खुद भी विषधर और दूसरे का भी जीना मुश्किल. पुलिस को भी चाहिए कि गुमनाम शिकायतों की जांच करे. व्यर्थ किसी को परेशान न करे.

शायद नंद किशोर का गुस्सा खत्म हो चुका था. लेकिन अब मेरे मन में नंद किशोर के प्रति घृणा के भाव थे. उस बुड्ढे को देखते ही मुझे अपने 6 माह की हलकान जिंदगी याद आ जाती थी. एक निर्दोष व्यक्ति को झूठी गुमनाम शिकायतों से अपमानित, प्रताडि़त करने वाले को मैं कैसे माफ कर सकता था. लेकिन मैं ने कभी उत्तर देने की कोशिश नहीं की. हां, पड़ोसी होते हुए भी हमारी कभी बात नहीं होती थी. नंद किशोर के परिवार ने कभी अफसोस या प्रायश्चित्त के भाव भी नहीं दिखाए. ऐसे में मेरे लिए वे पड़ोस में रहते हुए भी दूर थे. Hindi Kahani 

Best Hindi Story : मीरा और पराग के रिश्ते से मां क्यों परेशान थी?

Best Hindi Story : मोबाइलफोन लगातार बज रहा था. गहरी नींद सोई मीरा आवाज सुन घबराते हुए उठी. इतनी सुबहसुबह कौन हो सकता है? कहीं कोई बुरी खबर तो नहीं? भय की एक लहर उस के अंदर दौड़ गई. उस ने सामने लगी घड़ी पर नजर डाली. 6 बजे थे. अभी तो बाहर रोशनी भी नहीं हुई थी. वैसे भी सर्दियों की सुबह में 6 बजे अंधेरा ही होता है. इस से पहले कि वह फोन उठाती, फोन कट गया. झुंझलाते हुए उस ने टेबललैंप औन किया. मिस्ड कौल चैक करने पर पाया सासूमां का फोन था. उस के मन में अनेक तरह की शंकाएं उठने लगीं. जरूर कोई गंभीर बात है तभी तो इतनी सुबहसुबह फोन किया है मां ने सोच उस ने पराग को उठाना चाहा. तभी फिर से मोबाइल बजा.

‘‘हैलो मां, नमस्ते. आप कैसी हैं? सब ठीक है न?’’ मीरा के स्वर में घबराहट थी. देर रात तक जगे रहने के बावजूद उस की नींद पूरी तरह खुल गईर् थी.

ये भी पढ़ें- बीच की दीवार : सुजाता अपने मायके क्यों नहीं जाना चाहती थी

‘‘सदा खुश रहो,’’ मीरा के नमस्ते के जवाब में अनुराधा ने उसे आशीर्वाद दिया, ‘‘यहां सब ठीक है. मैं ने तो यह जानने के लिए फोन किया था कि तुम उठीं कि नहीं. आज तुम दोनों की ही छुट्टियां खत्म हो रही हैं. औफिस जाने की तैयारी करनी होगी. अच्छा पराग को भी समय से उठा देना. मेड को टाइम से आने के लिए कह दिया था न? नईनई गृहस्थी है. मुझे पूरी उम्मीद है कि धीरेधीरे तुम सब संभाल लोगी.

अब तक चाय तो पी ही ली होगी. पराग से भी बात करा दे. उसे भी समझा दूं कि वह काम में तेरा हाथ बंटाए. अब वह अकेला नहीं है. तेरी जिम्मेदारी भी उस पर है. दोनों मिल कर ही तो गृहस्थी जमाओगे. वैसे बेटा, आदमियों को कहां इतनी समझ होती है. घर तो औरत को ही संभालना होता है. तुम्हारे ससुर तो खुद एक गिलास पानी भी नहीं ले कर पीते. मैं ही करती हूं उन के सब काम. हालांकि पराग तो नए जमाने का लड़का है और इतने समय से अकेले रहतेरहते घर के कामकाज भी सीख गया है. फिर भी. घर तो तुम्हें ही संभालना होगा,’’ अनुराधा लगातार हिदायतें दे रही थीं.

ये भी पढें- बेवफा :सरिता ने दीपक से शादी के लिए इंकार क्यों किया था

मीरा को उन की बातें और लगातार दी जाने वाली हिदायतें सुन बड़ी हैरानी हुई पर वह उन की बातों की अवहेलना नहीं कर सकती थी अत: बोली, ‘‘आप चिंता न करें मां, मैं सब संभाल लूंगी. पराग अभी सो रहे हैं, उठते हैं तो बात कराती हूं,’’ मीरा ने बहुत ही ठहरे हुए स्वर में कहा. कहीं सासूमां को बुरा न लग जाए, इस बात का भी उसे ध्यान रखना था. पराग की नींद डिस्टर्ब न हो, इसलिए वह बाहर ड्राइंगरूम में आ गई थी.

फोन कट गया तो मीरा ने चैन की सांस ली. उन की शादी हुए अभी 1 महीना ही हुआ था. दोनों ही दिल्ली में नौकरी करते थे और यहीं रहते थे. इसलिए शादी के बाद वे यहीं रहेंगे, यह तो पहले से ही तय था. पराग के मम्मीपापा और बाकी रिश्तेदार लखनऊ में रहते थे. पराग की बहन सुधा की शादी हो चुकी थी और वह देहरादून में रहती थी. पराग और मीरा की वैसे तो यह लव मैरिज नहीं थी, पर उन के कुछ दोस्त कौमन थे जिन के कारण उन का परिचय हुआ था.

ये भी पढें- अहंकार के दायरे-भाग 1: नीरा ने अपने परिवार को टूटने से कैसे रोका

संयोग की बात है जब मीरा के पापा उस की जौब लग जाने के बाद उस के लिए लड़के की तलाश कर रहे थे तो मम्मी की एक सहेली ने जो लखनऊ में रहती थीं और पराग के परिवार से परिचित थीं, पराग का रिश्ता सुझाया था. दोनों परिवारों को एकदूसरे का परिवार भी पसंद आया और पराग व मीरा भी. वे दोनों तो इस तरह खुद को आमनेसामने खड़े देख हंसे बिना न रह सके थे. उन्हें क्या पता था कि एक दिन वे दोनों पतिपत्नी बन जाएंगे. हालांकि उन के दोस्तों ने तो यही कहा कि ये अवश्य ही प्यार करते होंगे और इस तरह चक्कर चला कर अपने परिवार वालों करे मना लिया होगा.

शादी बेशक संयोग से हुई थी, पर इस समय तो दोनों ही एकदूसरे का साथ पा कर बेहद खुश थे. कुछ दिन लखनऊ अपने ससुराल व कुछ दिन हनीमून में बिता कर वे दिल्ली वापस आ गए थे. उन्हें काम पर वापस जाने से पहले घर भी सैट करना था. पर जब से उन की शादी हुई थी, मीरा की सास दूर बैठ कर भी हर बात में दखलंदाजी करती थीं. जैसे कि टाइम से सोते हो कि नहीं, खाना बनाती हो या होटल में खाते हो, घर के लिए कैसा और क्याक्या सामान लेना चाहिए, पराग को क्या पसंद है क्या नहीं…

कई बार मीरा को लगता कि साथ न रहते हुए भी उस की सास उन के बीच हमेशा रहती है. सुबहशाम न जाने कितनी बार फोन करतीं. कुछ दिन तो उन का इस तरह चिंता दिखाना उसे अच्छा लगा था, पर फिर जब वे हर बात खोदखोद कर पूछने लगीं तो उसे बहुत अटपटा लगा.

ठीक है कि वे अपने बेटे और बहू की खुशी चाहती हैं, उन्हें कोई तकलीफ न हो,

इसलिए हिदायतें देती रहती हैं, पर वह भी तो अपनी तरह से कुछ करने की आजादी चाहती है, वह भी निर्णय लेने में सक्षम है. उन का बातबात पर टोकना उसे खलने लगा था. लेकिन वह यह सोच कर अपने मन को समझा लेती कि अभी उन की शादी हुए दिन ही कितने हुए हैं. शुरूशुरू की बात है, फिर सासूमां खुद ही ज्यादा टोकना छोड़ देंगी.

‘‘जल्दी कैसे उठ गईं?’’ पराग ने सोफे पर बैठते हुए उबासी लेते हुए पूछा. उसे अभी भी नींद आ रही थी.

‘‘नहीं, मां का फोन आ गया था. तुम बात कर लेना,’’ और फिर चाय बनाने के लिए किचन में चली गई.

‘‘इतनी सुबह? मां को भी चैन नहीं,’’ किचन में उस के पीछे आ खड़े हुए पराग ने मीरा की झूलती लटों से खेलते हुए कहा.

‘‘हां, दूर बैठी भी मिसाइल छोड़ती रहती हैं. बेटे की चिंता में परेशान रहती हैं. क्या पता मैं तुम्हारा ठीक से खयाल रख पा रही हूं या नहीं,’’ मीरा के स्वर में थोड़ा व्यंग्य का पुट था.

‘‘मैं अपना खयाल खुद रख सकता हूं मां यह बात अच्छी तरह जानती हैं. पिछले 2 सालों से अकेला रह रहा हूं. सब मैनेज कर ही रहा था. मैडम, हम तो खाना भी बनाना जानते हैं, यह बात तो आप को भी पता है. तो बताइए नाश्ते और लंच के लिए क्या बनाया जाए? पराग का यों हर चीज को लाइटली लेना उसे बहुत रिलैक्स फील कराता. किसी भी बात को प्रौब्लम बनाने के बजाय तुरंत हल करने में यकीन रखता है.

दोनों मिल कर किचन का काम खत्म कर तैयार हो औफिस के लिए निकल गए. मीरा का औफिस पहले पड़ता था, इसलिए पराग उसे छोड़ कर गया. वह इस बात से खुश थी कि औफिस आनेजाने में उसे अब कोईर् परेशानी नहीं होगी. पहले वह चाटर्ड बस पर निर्भर थी, पर अब आराम से पराग के साथ कार में जा सकती थी. दिल्ली में ट्रांसपोर्ट और ट्रैफिक की समस्या इतनी भीषण है कि इंसान की आधी जिंदगी तो इसी आपाधापी में निकल जाती है. इन दोनों की जिंदगी मजे से गुजर रही थी.

ये भी पढ़ें- कैक्टस के फूल

औफिस हो या फ्रैंड सर्कल, सब मीरा से यही कहते, ‘‘यार तुम कितनी खुशहाल हो. सास दूर रहती हैं, ननद की शादी हो चुकी है. तुम ही घर की बौस हो वरना हम तो सासननद की टोकाटाकी में ही उलझे रहते हैं.’’

‘‘ट्रैजेडी तो यह है कि आजकल की सासें हैं तो बहुत मौर्डन, ऐजुकेटेड भी हैं, नौकरी भी करती हैं, पर जब बात बहू की आती है तो अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए उस के हर काम में कमियां निकालने में पीछे नहीं रहती हैं. मेरी ही सांस को देख लो. टीचर हैं, पर बहू से कैसे व्यवहार करना चाहिए, इस की ट्रेनिंग कभी नहीं ली है,’’ बहुत ही नाटकीय अंदाज में बेला ने एक सांस लेते हुए जब कहा तो सब हंस पड़े. औफिस में बेला का बिंदासपन और हाजिरजवाबी सभी को पसंद थी. हमेशा खिलखिलाती रहती थी, लेकिन केवल औफिस में या घर से बाहर निकलने पर.

‘‘सास के सामने ज्यादा खुश रहो तो उन्हें एक तरह की जलन होती है, मेरा तो ऐक्सपीरियंस यही कहता है. इसीलिए यार घर पहुंचते ही मैं दुखी सा चेहरा बना लेती हूं. अब तो मेरा पति भी इस ट्रिक को समझ गया है, इसलिए इस सिचुएशन को हम ऐंजौय करते है,’’ बेला की बात सुन सब दांतों तले उंगली दबा लेते. उस की फिलौसफी से सब सहमत थे, पर हरकोई ऐसा करने की हिम्मत नहीं रखता, इसलिए सह रही थीं सास की दखलंदाजी.

‘‘अरे यार, मैं कोई खुशहाल नहीं हूं.

बेशक मेरी सास यहां नहीं रहतीं, लेकिन वे तो

दूर बैठे भी मिसाइलें चलाती रहती हैं. दिन में कईकई बार फोन कर डिटेल में सबकुछ पूछती हैं, राय देती हैं और हिदायतों का पुलिंदा भी फोन पर ही पकड़ा देती हैं’’ मीरा ने मेज पर रखी फाइलों को समेटते हुए कहा. उस के चेहरे पर शिकन साफ दिखाई दे रही थी, ‘‘औफिस में कई बार जब मैं फोन नहीं उठा पाती तो व्हाट्सऐप मैसेज की झड़ी लग जाती है. म्यूट कर के रखा है उन का नंबर वरना सारा दिन मैसेजों की आवाज ही सुननी पड़ती.’’

मीरा की बात सुन सब चौंक गए.

‘‘सच?’’ रमा ने माथे पर हाथ मारते हुए पूछा.

‘‘क्या वे यह भी पूछती हैं कि तुम लव कैसे करते हो आई मीन सैक्स..’’ बेला ने मीरा को कुहनी मारते हुए कहा.

‘‘यार कभी तो सीरियस हो जाया करो,’’ मीरा ने उस के गालों पर चिकोटी काटी, ‘‘जब भी वे वीडियो कौल करती हैं तो मुझे नाइटी बदल सूट या साड़ी पहननी पड़ती है. कई बार पराग उन्हें टालना भी चाहते हैं तो कहती हैं बहू से बात किए बगैर, उस की शक्ल देखे बगैर चैन नहीं पड़ता, मीरा ने सास की नकल उतारी.

औफिस से निकलते हुए मीरा सोच रही थी कि शुक्र है पराग इस बात को समझ रहे हैं कि मां जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप करती हैं. अकसर कहते भी हैं, ‘‘मां अगर हमारे साथ रह रही होतीं तो न जाने क्या होता. मैं तो तुम दोनों के बीच सैंडविच ही बन जाता. दूर बैठ कर भी पलपल की खबर रखना चाहती हैं तो मैं तो उस स्थिति के बारे में सोच कर ही सहम जाता हूं.’’

‘‘तुम्हें ले कर शायद मां बहुत ज्यादा पजैसिव हैं.’’

मीरा की बात सुन पराग खिलखिला कर हंस पड़ा.

‘‘इकलौता होने का परिणाम है. पजैसिव तो वे सुधा को ले कर भी हैं.’’

‘‘फिर तो उस की लाइफ में भी दखल

देती होंगी…’’

मीरा की बात सुन पराग फिर हंसा, ‘‘वहां मुमकिन नहीं है, क्योंकि सुधा की सास बैलिस्टिक मिसाइल हैं, सीधे टारगेट पर गिरती हैं, मां की साधारण मिसाइलें वहां नहीं चल पातीं. उस की सास के सामने तो मां के होंठ ही सिल जाते हैं.’’

‘‘फिर तो सुधा की सास से ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी, ताकि तुम्हारी मां के वारों से बचा जा सके,’’ मीरा ने भी हंसतेहंसते जवाब दिया.

‘‘अरे चलने दो न मिसाइलें, अगर उन्हें खुशी मिलती है तो… कब तक चलाएंगी… शुरुआती दिनों की बात है, फिर सब ठीक हो जाएगा,’’ पराग ने समझाया.

‘‘तो फिर चलने दो,’’ मीरा ने पराग की बांहों में झूलते हुए कहा.

लौटते वक्त अकसर पराग उसे तब नहीं ले पाता था, जब वह फील्ड में होता था. उस दिन भी ऐसा ही हुआ. इसलिए उस दिन उसे घर पहुंचतेपहुंचते 7 बज गए. पराग भी तभी लौटा.

कपड़े चेंज कर मीरा कोल्ड कौफी बनाने जैसे ही किचन में घुसी कि तभी उस

का मोबाइल बज उठा. जब सासूमां को पता चला कि वह अभी आई है तो बोली, ‘‘इतनी देर घर से बाहर रहोगी तो घर की व्यवस्था बिगड़ जाएगी. टाइम से आ जाया करो. अब खाना घर पर बनाओगी या बाहर से और्डर करोगी… आजकल तो यह फैशन ही बन गया है कि रेस्तरां से खाना मंगवा लो.’’

मीरा की सास उसे कुछ बोलने का मौका

ही नहीं दे रही थीं. उस ने स्पीकर औन कर

दिया कि पराग भी बात कर सके, पर वह तो कौफी पीतेपीते उन की बातों का जैसे मजा ले

रहा था.

‘‘मैं इतनी दूर बैठी हूं वरना आ जाती.

तुम्हें थोड़ी मदद हो जाती. फिर तुम्हारे ससुर

भी तो ज्यादा ट्रैवल नहीं कर सकते. उन्हें छोड़ कर मैं कहीं नहीं जाती. इधर सुधा की भी डिलीवरी होने वाली है. उस की सास का कहना है कि पहला बच्चा है, इसलिए परंपरा के

अनुसार वह मायके में ही होना चाहिए… अब तुम लोग भी प्लान करो… 6 महीने हो गए हैं… लेकिन तब नौकरी छोड़ देना… बच्चे पालना

कोई हंसीखेल नहीं है. मैं तुम्हें सब समझा दूंगी कि बच्चे की परवरिश कैसे की जाती है…’’

मीरा की सास लगातार मिसाइल छोड़ रही थीं और वह चुपचाप बैठी धीरेधीरे कौफी के सिप लेते हुए सोच रही थी कि कहां से लाए वह बैलिस्टिक मिसाइल.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें