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नहीं रहे दिग्गज अभिनेता विश्वमोहन बडोला

बॉलीवुड में की गलियारे से एक औऱ बुरी खबर आई है. दिग्गज अभिनेता विश्वमोहन बड़ोला की उम्र 84 साल के थें. उन्होंने अपनी कई फिल्मों में शानदेर अभिनय से लोगों का दिल जीता था.

विश्वमोहन बड़ोला क पुत्र वरुण बड़ोला ने सोशल मीडिया पर लंबा पोस्ट शेयर करते हुए दुख जताया है. विश्वमोहन बड़ोला एक सफल अभिनेता के साथ- साथ एक पत्रकार भी थें. उन्हें वर्ल्ड टूर का बहुत ज्यादा शौक था. साथ ही वह दो बार वर्ल्ड टूर पर जा चुके थें.

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अब विश्वमोहन बड़ोला हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी खूबसूरत यादें हमेशा हमारे साथ रहेगी. मुन्ना भाई , जोधा अकबर , जॉली एलएलबी जैसी फिल्मों में काम किया था.

 

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विश्वमोहन बड़ोला के बेटा ने अपने पिता को श्रद्धांजलि देते हुए कहा है कि मैं उनके विरासत को संभालकर रखूंगा. वरुण ने बताया कि मेरे पिता से मैंने बहुत कुछ सिखा है. वह हमेशा मेरे साथ रहेंगे. उन्होंने मेरे जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग बताया है. मैं अपने पिता का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने हर वक्त मेरा साथ दिया है.

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वह कई देश के यात्रा भी कर चुके थें. वहीं अक्षय कुमार के ऑनस्कीन पापा के किरदार में उन्हें काफी ज्यादा पसंद किया गया था. इसके साथ ही ऑनस्कीन पिता वह संजय दत्त के भी बन चुके हैं. जिसमें उन्हें काफी ज्यादा पसंद किया गया था. दर्शकों ने उन्हें हर वक्त बहुत सारा प्यार दिया है.

 

शादी के एक महीना पूरा होने पर रोहनप्रीत ने पत्नी नेहा कक्कड़ को दिया ये सरप्राइज

सिंगर नेहा कक्कड़ और रोहनप्रीत के शादी को क महीना पूरा हो चुका है. इस खास दिन को प्यारे कपल ने खूबसूरत अंदाज में सेलिब्रेट किया है. नेहा कक्कड़ ने इस दिन प्यारा सा वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया है. जिसमें वह अपने और रोहनप्रीत का प्यार दिखा रही हैं.

इस वीडियो में नेहा कक्कड़ ने ऐसी फोटो शेयर कि है जिसमें वह रोहनप्रीत के साथ बीताए गए पल को वीडियो के जरिए शेयर किया है. इस वीडियो को फैंस खूब लाइक और शेयर किया है. नेहा को फैंस बहुत ज्यादा प्यार भी दे रह हैं.

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नेहा न वीडियो शेयर करते हुए लिखा है कि आज हमारी पहली मंन्थ एनीवर्सरी है. ऐसे में हम उन सभी लोगों का धन्यवाद देना चाहती हूं जन्होंने मुझे इतना सारा प्यार दिया है. साथ ही मैं रोहनप्रीत की फैमली को भी धऩ्यवाद देना चाहती हूं.

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बता दें वीडियो में नेहा कक्कड़ रोहनप्रीत को किस करती नजर आ रही हैं. दोनों कपल को देखने के बाद लोग खूब सारा प्यारा जता रहे हैं. वहीं रोहनप्रीत ने कमेंट करते हुए लिखा है कि मेरी खूबसूरत डॉल जिंदगी तुम्हारे साथ बहुत खूबसूरत है.

 

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मुझे अभी भी विश्वास नहीं है कि तुम मेरी हो चुकी हो. उम्मीद करता हूं कि आगे कि जिंदगी भी इतनी ही ज्यादा खूबसूरत होगी.

बता दें कि नेहा कक्कड़ का गाना हाल ही में रिलीज हुआ है नेहू द ब्याह जो सोशल मीडिया पर जमकर छाया हुआ है. इस गाने के बाद से लोगों ने कयास लगाने शुरू कर दिए थें कि जल्द दोनों शादी के बंधऩ में बंधने वाले हैं.

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पूरी दुनिया में नेहा कक्कड़ और रोहनप्रीत के शादी को फैंस पसंद कर रहे हैं. इन दोनों की जोड़ी सभी को पसंद भी आ रही है. अगर बात करें नेहा और रोहन की शादी से उनके परिवार वाले भी खुश है. इस नए जोड़े को बेस्ट कपल कहा जा रहा है.

घर पर बनाएं पनीर पुलाव, मेहमान भी हो जाएंगे खुश

पनीर पुलाव हम अक्सर अपन घर के आप पास हो रही पार्टी में खाते हैं. ऐसे में हम अपने घर पर भी मेहमानों के लिए पनीर पुलाव बना सकते हैं. आइए आज आपको पनीर पुलाव बनान की विधि बतात हैं. पनीर पुलाव को आप बेहद ही कम समय में  बना सकते हैं. अगर आपके पास समाग्री कम है तो भी आप पनीर पुलाव को बना सकते हैं.

आइए जानते हैं इसे बनाने के लिए क्या-क्या समाग्री चाहिए होता है.

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बासमती चावल

पनीर 2 कप

काजू

प्याज

गाजर

हरी मटर

जीरा

तेज पत्ता

इलायची लौंग

रेड चीली

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बनाने कि विधि

सबसे पहले एक कड़ाही में घी को गर्म कर लें, जब घी गर्म हो जाए तो उसमें सभी खड़े मसाले डाल दें,और कुछ देर तक भूनें. जब मसाले भूून रहे हो उसे दौरान कुकर में चावल गर्म को बनने के लिए रख दें. जब चावल बन जाए तो उसे चम्मच से अलग-अलग करके रख दें.

अब आप कड़ाही में बारीक कटा हुआ प्याज और मसाले को कुछ देर तक भूने जब प्याज और मसाले एक साथ भून जाए तो अलग से पनीर के टुकड़े को लोकर उसे तल लें, इसके बाद से आपको जब मसाला भून जाए तो उसमें कटे हु हुए गाजर और बाकी सभी चीज को डाल दें.

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अब उसमें भून हुए मसाले और सब्जी में चावल को मिक्स कर लें, उसे अच्छे से जब सभी अच्छे मिक्स करने के बाद से उसमें उपर से उसमे प्याज फ्राई करके डाल दें. इससे आपके पनीर पुलाव को लुक और भी ज्यादा अच्छा आएगा.

 

 

मुझे एतराज नहीं-भाग 1 : पड़ोस मेें रहने वाली महिला इतनी शांत क्यों रहती थी

पड़ोस की महिला नितांत अकेली ही रहती थीं कि उन के यहां अचानक एक गंभीर से पुरुष का रहने लगना थोड़ा कुतूहल पैदा करने वाला था पर धीरेधीरे महिला भी खुलीं, पुरुष भी और किसी के जीवन के पन्ने भी रंगों से भर गए.

मैं एक पौश कालोनी में रहती हूं. मेरे साथ मेरे वृद्ध पिता रहते हैं. मैं इस कालोनी में 15 वर्षों से रह रही हूं. पड़ोस के मकान, जिस की बाउंड्री एक ही है, में रहने वाले उसे बेच कर अपने बच्चों के पास चले गए. यहां मकान बहुत महंगे हैं. उस मकान को

60 साल की एक महिला ने खरीदा. उसे नया बनाने में बहुत पैसा खर्च किया. उसे मौडर्न बनवा लिया.

सारी सुविधाएं मुहैया करवाईं. फिर वे रहने आईं.

वे बहुत ही प्यारी व सुंदर महिला थीं. वे किसी से बात नहीं करती थीं, सिर्फ मुसकरा देती थीं. कहीं जाना हो तो अपनी बड़ी सी कार में बैठ कर चली जातीं. हमारी और उन की कामवाली बाई एक ही थी. जो थोड़ीबहुत मेरी उत्सुकता को कम करने की कोशिश करती. पूरे महल्ले वालों को उन के बारे में जानने की उत्सुकता तो थी, पर जानें कैसे?

वे कोई त्योहार नहीं मनाती थीं. नाश्ता वगैरह नहीं बनाती थीं. बाई, जिसे मैं समाचारवाहक ही कहूंगी, कहती, ‘कैसी औरत है, न वार माने न त्योहार. पूछो तो कहती है कि इन बातों में क्या रखा है. शुद्ध ताजा बनाओ और खाओ.’ वे अकसर दलिया ही बनातीं.

कभीकभी मैं सोचती कि बाई के हाथ कुछ नाश्ता भेज दूं. फिर कभी डरतेडरते भेज देती. वे महिला पहले मना करतीं, फिर ले लेतीं. मु झे बरतन लौटाते समय कोई फल रख कर दे देतीं. उन से बोलने की तो इच्छा होती पर मैं क्या, महल्ले का कोई भी उन से नहीं बोलता. मैं अपने पिता से ही कितनी बात करती. मैं सर्विस करती थी, सुबह जा कर शाम आती थी. इसीलिए मु झे ताक झांक करने की आदत नहीं है.

यदि उन के बाहर जाते समय मैं बाहर खड़ी होती तो वे मुसकरा देतीं. सब को उन के रुतबे के कारण बोलने में संकोच होता था. मैं स्वयं तो बोलती ही नहीं थी. ऐसे ही 5 साल बीत गए. इतने साल कालोनी में रहने के बावजूद उन की किसी से दोस्ती न हुई, न उन्होंने की.

एक दिन अचानक उन के घर एक बड़ी कार आ कर खड़ी हुई. उस में से एक सुंदर 40-45 साल का व्यक्ति निकला. सब ने उसे आश्चर्य से देखा. इतने सालों में उन के घर कोई नहीं आया. अब यह कौन है? महल्ले वालों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा वह उन्हीं के घर में उन के साथ ही रहने लगा. वे साथसाथ बाहर जाते. कार से जाते और कार से ही वापस आते. मैं अपनी उत्सुकता रोक न सकी. पर क्या करें. अब तो उन के घर से पकवान बनाने की खुशबू भी आने लगी. परम आश्चर्य, एक दिन बाई ने मु झे बताया कि वह उन का बेटा है. शायद चला जाए. पर वह तो गया ही नहीं.

एक दिन वही पड़ोसिन गीता आंटी घर के सामने सुंदर रंगोली बना रही हैं. क्या बच्चे, क्या बड़े, पूरा महल्ला  झांक झांक कर देख रहा था. मेरी भी कुछ सम झ में नहीं आया, कहां तो कोई त्योहार नहीं मनाती थीं. हमारे उत्तर भारत में रंगोली कोईकोई बनाता है.

उन का बेटा भी मां के रंगोली बनाने को बड़े ध्यान से देख रहा था. तो उसी समय मेरे पापा ने अपना परिचय दे कर उस युवक से बात की. युवक तो बहुत खुश हुआ. बड़ी गर्मजोशी से पापा से हाथ मिलाया. पापा ने उसे बताया कि पड़ोस में रहते हैं.

‘‘हां अंकल, मैं ने आप को देखा, संकोचवश बोल न पाया,’’ उस ने कहा.

मैं ने घर में मूंग की दाल का हलवा बनाया था, सोचा क्यों न गीता आंटी को भी दे आऊं. मैं आंटी के घर गई.

उन्होंने खुश हो कर मेरे हाथ से हलवा ले लिया. और पोंगल चावलमूंग की दाल की मीठी डिश मुझे खिला दी. मु झे बहुत आश्चर्य हुआ. मैं ने बहुत स्वाद ले कर खाई. उन्होंने मेरे पापा के लिए भी एक बरतन में डाल कर दी. फिर अपने बेटे से मेरा परिचय कराया. उस का नाम सोमसुंदरम था. वे उसे सुंदर कह कर बुलाती हैं.

मैं ने पूछा, ‘‘इतने दिनों ये कहां गए थे?’’

‘‘यह अमेरिका में रहता था. अब मेरे पास आ गया है.’’

इस तरह आंटी से मेरी दोस्ती हो गई. पर मु झे एक प्रश्न परेशान करता था. इतने दिनों से तो कहती थीं कि मेरा कोई नहीं. आज मेरा बेटा कह रही हैं. कोई इन्हें धोखा तो नहीं दे रहा है, कहीं भावना में बह कर इन्होंने इसे अपना बेटा तो नहीं माना, कोई अनहोनी हो गई तो? मेरा मन रहरह कर मु झे परेशान करता. मैं ने यह बात अपने पापा को बताई तो वे बोले, ‘‘तुम अपने काम से मतलब रखो, ज्यादा होशियार बनने की जरूरत नहीं. वह औरत आईएएस थी. अपने काम से ही मतलब रखना बेटा. उन्हें सलाह देने की जरूरत नहीं.’’

परंतु, वह लड़का बहुत ही स्मार्ट, बढि़या पर्सनैलिटी, बहुत ही हैंडसम था. कहना तो नहीं चाहिए पर मेरे दिल में पता नहीं क्यों कुछ अजीब सा होने लगा. क्या हुआ इस उम्र में. मैं ने दिल को काबू करना चाहा. पर पता नहीं क्यों मेरा दिल काबू में नहीं रहा.

मु झे लगा इन आदमियों का दिल तो होता नहीं. मु झे बहुत तकलीफ हो रही थी. मु झे लगता, बच्चे सब को बहुत अच्छे लगते हैं. कौन सी ऐसी औरत होगी जो मां न बनना चाहे. यह औरत भी 65 साल से ऊपर हो गई है. कहते तो हैं कि 60 साल में सठिया जाते हैं. यह तो 65 से ऊपर हो गई है.

पैसे वाली हैं, इसीलिए कोई इन्हें धोखा तो नहीं दे रहा, फंस जाएंगी बेचारी. मैं सोचसोच कर परेशान होती रही. पर उन के बेटे का आकर्षण मु झे उन की ओर खींचता चला गया.

वे बेटे के लिए रोज तरहतरह का खानानाश्ता बनातीं.

 बिहार चुनाव परिणाम

विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में एक बार फिर भाजपा समर्थित सरकार का बनना आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि भारत में धर्मजनित राजनीति अब गहरे तक अपनी जड़ें मजबूत कर चुकी है. हिंदू धर्म की पौराणिक नीतियां ही सर्वश्रेष्ठ हैं और समाज उन्हीं के अनुसार चलेगा, यह खुल्लमखुल्ला कहने वाली भारतीय जनता पार्टी का असर हर घर तक है और बिहार इस का अपवाद कैसे हो सकता है? अगर कहींकहीं दूसरी पार्टियां जीत रही हैं तो वह इसलिए नहीं कि उन्हें इन नीतियों से कोई बैर है बल्कि इसलिए कि इसी मिक्सचर में वहां कुछ और सिरफिरी बात डाली गई है या इस को बेचने वाले की छवि भाजपा के नरेंद्र मोदी से अलग है.

बिहार में भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा जुआ खेला और नीतीश कुमार का कद छोटा करने के लिए लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान को नीतीश की जनता दल (यूनाइटेड) पार्टी के खिलाफ अलग से खड़ा कर दिया. नीतीश चक्रव्यूह में फंस गए. उन्हें पता था कि वे अपनी सीटें खो सकते हैं पर फिर भी उन्हें भाजपा को दी गई सीटों पर पूरी तरह काम करना पड़ा. राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव ने लालू प्रसाद यादव की धरोहर को काफी ढंग से संभाला और चुनाव के दौरान जनता को आशा बंधाई कि वे नीतीश की दोगली नीतियों से छुटकारा दिला सकेंगे. पर, वे उस तंत्र को तोड़ नहीं पाए जो भाजपा ने बना डाला है, वह तंत्र जो मंदिरों, पुजारियों, धर्म के दुकानदारों, जातियों के नेताओं के माध्यम से कोनेकोने में फैला हुआ है.

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न कांग्रेस में हिम्मत हो रही है और न ही किसी और दल में कि उस तंत्र के खिलाफ बोल भी सके, तोड़ना तो दूर. पुरातनपंथी, जाति और धर्म में बांटने वाली भाजपा की यह सोच अब राजनीति की पहली जरूरत बन गई है. घरघर में इसे सहज स्वीकार कर लिया गया है. हम एक समाज हैं, यह सोच तो नेताओं और समर्थकों के दिमाग में भूले भी कहीं नहीं है. हम अलगअलग कबीलों का समूह हैं जिस की डोर उन के पास है जो आज भारतीय जनता पार्टी को इशारे पर चला रहे हैं और वे ही पहले कांग्रेस को चलाया करते थे. बिहार के चुनावों के ताजा परिणाम इसी का नतीजा हैं. राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस की हार इस बात का उदाहरण है कि लोग अपनी बिरादरी और संकीर्ण सोच को दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों के मुकाबले ज्यादा महत्त्व देते हैं. देश कहीं जाए, हमारे खून में जो गंध है वह वहीं की वहीं रहे, यह हर आम आदमी की पहली प्राथमिकता बनी हुई है. अगर हम दुनिया के सब से पिछड़े, गंदे, बिखरे देश हैं तो यह ऐसे ही नहीं है.

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हमारे पुजारी, नेता और विभाजक बड़ी मेहनत कर रहे हैं. बिहार चुनाव परिणाम इसी का नमूना हैं. ट्रंप गए, बाइडेन आए अमेरिका के चुनावों पर दुनिया के सभी देशों की नजर थी कि डोनाल्ड ट्रंप फिर जीतते हैं या नहीं. चुनावों से पहले होने वाले आम पोल यही कह रहे थे कि इस बार डोनाल्ड ट्रंप बुरी तरह हारेंगे. पर जब नतीजे आए तो पता चला कि खब्ती, गोरे कट्टरपंथी, लगातार झूठ बोलने वाले ट्रंप के समर्थकों की अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक व शिक्षित देश में कमी नहीं है. डैमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडेन जीते तो थोड़े से ज्यादा वोटों से ही. दुनियाभर के उदार, तार्किक व वैज्ञानिक दृष्टि रखने वालों के लिए यह बुरी तरह से चौंकाने वाली बात है कि एक के बाद एक देश में उदारता और वैचारिक स्वतंत्रताओं का गला घोंट कर कुछ लोग अपना प्रभुत्व जमाए रखने के लिए डिक्टेटर टाइप नेताओं और शासकों को सहज स्वीकार कर रहे हैं. बैलटबौक्स से निकलने वाले कट्टरपंथी नेता सारी दुनिया में काला धुआं फैलाने में लगे हैं. डैमोक्रेटिक पार्टी की जो बाइडेन और कमला हैरिस की जोड़ी के माध्यम से अमेरिकनों ने ट्रंप के 4 सालों का हिसाब लिया हो, ऐसा लगता नहीं. ट्रंप के समर्थक, जो आमतौर पर कम पढ़ेलिखे, गोरे कट्टर धार्मिक और पैसे वाले हैं,

बड़ी संख्या में हैं. वे c डैमोक्रेटिक पार्टी की हिम्मत भी नहीं हुई कि वह देश को बांटने की मानसिकता को दम देने वाली दीवार जैसे फैसलों का खुल कर विरोध कर सके. जो बाइडेन और कमला हैरिस जीत गए पर ट्रंप की नीतियों पर यह फैसला नहीं है, यह ट्रंप की अजीब व्यक्तिगत छवि, उन के खराब व्यवहार के खिलाफ थोड़े से लोगों की नाराजगी भर है. यह अमेरिका की संसद और राज्यों के विधिमंडलों में भी दिखी जहां रिपब्लिक पार्टी ने ज्यादा जमीन नहीं खोई. आज अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, टर्की वगैरह में जो हो रहा है, उस का भारत, पश्चिमी यूरोप, जापान, कोरिया पर असर पड़ेगा ही. वहां लोकतंत्र, जैसा भी है, अब दिखावे का रह जाएगा. भारत में तो कट्टरपंथी अंधभक्त सैकड़ों सालों से अपने राजाओं और पुजारियों के आदेशों पर लाखों को मारते आए हैं,

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शहरोंगांवों को लूटते रहे हैं, औरतों का बलात्कार करते रहे हैं और धर्म की रक्षा के नाम पर अपनी जान तक देने को तैयार रहे हैं. आधुनिक शिक्षा व उदारवादी सोच ने जिस नए समाज का निर्माण शुरू किया था वह धीरेधीरे एक बार फिर कट्टरपंथी तानाशाही प्रवृत्ति वालों के चंगुल में फंस रहा है. अमेरिका जो 30-40 वर्षों से लोकतंत्र का प्रहरी माना जा रहा था, अब खुद लोकतांत्रिक भावनाओं को कुचलने वाला देश बन गया है. जो बाइडेन और कमला हैरिस की जोड़ी इस बदलाव को धीमा कर सकती है, रोक नहीं सकती क्योंकि बीमारी अब अमेरिकी समाज की रगरग में फैल गई है. अर्नब की गिरफ्तारी न्यूज चैनल रिपब्लिक भारत के मालिक, मुख्य संपादक व एंकर अर्नब गोस्वामी को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जाना अचंभे वाली बात है. अर्नब गोस्वामी खुलेआम मोदीभक्त हैं.

उन की नजर में भाजपा के अलावा देश में सब गुंडेमवाली हैं. वे अपने चैनल पर रातदिन कभी इसे, तो कभी उसे गिरफ्तार कर जेल भेज देने की मांग करते रहते थे चाहे उन के पास कोई सुबूत न हो. अर्नब ने कांग्रेसी नेता शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की आत्महत्या का मामला महीनों चैनल पर चलाया. हाल में सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या को उन्होंने देश की सब से बड़ी आफत का रंग दे डाला. उन की मांग थी, जो हर रोज दोहराई जाती थी, कि शशि थरूर और सुशांत की प्रेमिका रिया चक्रवर्ती को जेल में डाला जाए. अब जब उन्हें ऐसे ही एक मामले में महाराष्ट्र पुलिस सुबह 6 बजे गिरफ्तार कर ले गई और गिरफ्तारी के वीडियो भी जगजाहिर कर दिए तो वे देश को संकट में होना बताने लगे. अब उन की घिग्घी बंधी हुई है, बस, रातदिन ‘मु झे मार डालेंगे’, ‘मु झे पीटेंगे’,

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‘मु झे मत मारो’, ‘मु झे खाना नहीं दिया’ की गुहार लगा रहे हैं. अर्नब गोस्वामी जैसे देश में दसियों या सैकड़ों नहीं, बल्कि लाखों हैं जो जेलों में बंद हैं. आत्महत्या हो, चोरीचकारी, हत्या, देशद्रोह का मामला हो, नेता के खिलाफ कुछ बोलना हो या भरी सभा में कुछ कहना हो, हमारे यहां गिरफ्तारी आम है. रिपब्लिक चैनल ने कभी इन गिरफ्तारियों के खिलाफ मुहिम नहीं चलाई थी क्योंकि उसे मोदी सरकार जो पालपोस रही है. रिपब्लिक चैनल मोदी सरकार के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल सकता. लेकिन, देश के व्यावसायिक दृष्टि से बेहद अहम प्रदेश महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना की सरकार बन गई. पर फिर भी अर्नब गोस्वामी सोचते रहे कि यह कांग्रेस जैसी सरकार है जो राजनीतिक बदला लेने में भरोसा नहीं करती. अर्नब ने चैनल में खुले शब्दों में शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राउत और पार्टी के मुखिया व प्रदेश के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को चुनौती देनी शुरू कर दी. वे भूल गए कि उन के खिलाफ एक मामला अछूता पड़ा था जिस में किसी डैकोरेटर ने आत्महत्या करने से पहले छोड़े अपने पत्र में अर्नब गोस्वामी पर पैसे न देने का आरोप लगाया था.

पिछले भाजपा मुख्यमंत्री ने मामला रफादफा करा दिया था पर अब मामले को फिर कब्र में से निकाल लिया गया है और अर्नब को गिरफ्तार कर लिया गया. मोदी सरकार अब कुछ न कर पाई. वैसे, यह मामला साफसाफ विचारों की आजादी कुचलने का है. अर्नब गोस्वामी अनापशनाप बोले थे, झूठे आरोप लगाए थे. वे सड़कछाप पत्रकारिता करते थे. पर फिर भी, लोकतंत्र में उन्हें यह हक है. इस के लिए किसी बहाने से भी उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए. पत्रकारों को इस तरह गिरफ्तार करना नई बात नहीं है. कभी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना, कभी राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बता कर, कभी 2 बोतल शराब रखने का मामला दिखा कर पत्रकारों का मुंह बंद किया जाता है देशभर में रातदिन यही होता है. अर्नब गोस्वामी इसी का शिकार हुए हैं, पर उन का व्यवहार पहले ऐसा न था कि उन्हें बोलने की आजादी का पहरेदार कभी माना जाए. वे तो बोलने की आजादी का इस्तेमाल अपने दोस्तों और आकाओं के लिए करते थे या फिर जातिगत ऊंचनीच को साबित करने के लिए.

बहरहाल, अर्नब को अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत पर रिहा कर दिया गया है लेकिन जब तक मामले के पूरे ट्रायल के बाद अदालत से सजा न हो जाए, किसी को जेल में न डाला जाए. बोलने व लिखने का हक हर पत्रकार का है. जो जेल की सलाखों के पीछे से नहीं हो सकता. कोविड को धन्यवाद कोविड़-19 की वजह से बंद किए गए मंदिरमसजिद देश का बहुत भला कर रहे हैं. कोविड ने कुछ और दिया या नहीं, यह जरूर साबित कर दिया है कि बीमारी आदमी की अपनी वजह से ही दूर हो सकती है, पूजापाठ से नहीं. सदियों से यह पट्टी पढ़ाई जा रही है कि हर आफत का उपाय पूजापाठ और ईश्वर, अल्लाह, जीजस, बुद्ध या किसी अन्य की चरणवंदना से निकलेगा. धर्म के दुकानदारों ने हमेशा यह सावधानी बरती है कि वे धर्म की टैक्सजनित पूजापाठ के साथ हमेशा अपना काम करते रहने की सलाह भी देते रहे. वे जानते हैं कि पूजापाठ से कुछ होनाहवाना नहीं है.

चीन में पैदा हुआ वायरस दुनियाभर में फैला, पर चीन में सब से कम. जिन देशों में यह फैला, वे बेहद धार्मिक हैं, जैसे इटली, ईरान, भारत, अमेरिका, ब्राजील, रूस. इन देशों में चर्च, मंदिर, मसजिदें बंद कर दी गईं पर लोग घरों में प्रार्थना ही करते रहे कि कोविड पास न आए और आ गया है, तो चला जाए. पर पूजापाठ से कुछ न हुआ और 5 करोड़ लोग कोरोना की चपेट में आ चुके व और आते जा रहे हैं. लाखों लोग तो मर गए और लाखों अस्पतालों में सांसें गिन रहे हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो बेहद दकियानूसी हैं. उन के व्हाइट हाउस में तो बाकायदा पूजापाठी लोग हैं. चुनावों के दिनों में ट्रंप समर्थक काउंटिंग सैंटरों के आगे पूजा करते नजर आए. मगर चीन में शी जिनपिंग की तसवीरों के आगे कोविड राक्षस से बचाने के लिए किसी ने सिर नहीं झुकाया. मंदिरमसजिद असल में आम लोगों को बहकाने और उन से जेबें ढीली कराने का सब से सुलभ माध्यम हैं. भगवान का नाम ले कर किसी को भी लूटा जा सकता है. कोविड ने इस अंधविश्वास से तो कुछ दिन बचाया ही है, सो, कोविड का धन्यवाद.

मुझे एतराज नहीं-भाग 3 : पड़ोस मेें रहने वाली महिला इतनी शांत क्यों रहती थी

इस बीच, सोमू आ गया. बातों में हम ने ध्यान नहीं दिया. वह हमारे लिए कौफी बना कर ले आया. वह भी हमारे बीच बैठ गया. मैं संकोचवश उठने लगी. ‘‘अरे, बैठो रमा, मेरे बेटे को कोई फर्क नहीं पड़ता. वह पहले जैसा तो है नहीं.’’

मैं बोली, ‘‘बच्चों के बिना रहना तो बहुत मुश्किल है.’‘‘हां रे, तू सही कह रही है. पर कुदरत ने मु झे बच्चा दे कर भी मु झ से छीन लिया था. किसी के बच्चे होते ही नहीं हैं. मेरे होने के बावजूद नहीं जैसे हो गया. मैं ने काम में मन लगाया और तरक्की पाती चली गई. एक बार सोमू की बहुत याद आने पर मैं एक हफ्ते की छुट्टी ले कर गई. तो पता चला वे बच्चे को ले कर विदेश चले गए. मैं ने सोचा, वे वापस आ जाएंगे, पर वे फिर नहीं आए.

‘‘मु झे पता ही नहीं चला कि वे कहां गए. बहुत कोशिश की, पर कोई सुराग नहीं मिला‘‘मेरे मम्मीपापा मेरे पास आ गए और मैं अपनी नौकरी के साथसाथ उन का भी ध्यान रखने लगी. समय बीतता गया और एक दिन अचानक पापा को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. मम्मी उन के पीछे उन की याद में

2 साल भी नहीं रहीं. सेवानिवृत्ति के बाद यह मकान खरीद व बना कर तुम्हारे पड़ोस में आ गई. मैं ने किसी से रिश्ता नहीं रखा. मन बहुत ही विरक्त था. मम्मीपापा 2 साल में आगेपीछे जा चुके थे. मैं अकेली हो चुकी थी. यहां आ कर रहने लगी.

‘‘अचानक एक दिन मेरी एक पुरानी सहेली का फोन आया, ‘मेरा बेटा मु झे ढूंढ़ रहा है’ और उस के थोड़ी देर बाद ही मु झे मेरे सोमू का फोन आया, ‘मैं आप का बेटा सोमसुंदरम बोल रहा हूं. मैं आप के पास आना चाहता हूं.’ मेरे आश्चर्य की सीमा न रही.

‘‘जैसा तुम कह रही थीं न, वैसे ही मु झे भी लगा कि कहीं कोई धोखा तो नहीं दे रहा है. मैं ने उसे घर न बुला कर एक होटल में बुलवाया. वहां बात की. तब सारी परतें एकएक कर खुल गईं.’‘‘आंटी, अब मैं घर जाऊंगी, हालांकि, जाने की इच्छा बिलकुल नहीं है. कल धारावाहिक जारी रहेगा,’’ कह कर मैं चल दी.

घर आ कर मैं ने सारा काम किया. वह तो करना ही था. परंतु मेरा मन आंटी की कहानी में ही लगा रहा. यह तो बौलीवुड की कहानी से भी ज्यादा मजेदार थी. आंटी के साथ क्या हुआ, यह जानने के लिए उत्सुक थी और सोमू के बारे में जानने के लिए भी, या दोनों के लिए, यह तो आप डिसाइड करो. फिल्म, कहानी और उपन्यास यह सब भी मानव जीवन के ही तो प्रतिबिंब हैं. दूसरे दिन जल्दीजल्दी काम निबटा कर आंटी के घर पहुंच गई. अब सोमू घर पर है, इस की उत्सुकता ज्यादा थी. मु झे लगा, यह आग एक तरफ की नहीं है. वह भी मु झ से बात करने का मौका तलाशता है. अपनी आग को जब्त करने की मैं कोशिश करती कि इस उम्र में यह ठीक नहीं है. लेकिन मन है कि मानता ही नहीं.

‘‘आओ रमा, आओ. मैं ने अपने बेटे सोमू से कहा कि मैं अपनी कहानी रमा को सुना रही हूं. सोमू ने कहा है, ‘मम्मी, जरूर सुनाओ. लोगों को हमारी कहानी सुन कर कोई शिक्षा मिले, तो बहुत अच्छी बात है, मु झे कोई एतराज नहीं.‘‘अभी अंत बाकी है,’’ आंटी बोलीं‘‘मम्मी, आप आराम से कहानी पूरी कर लो. मैं और अंकल वौलीबौल मैच देखने जा रहे हैं. हम खाना खा कर आएंगे.’’

‘‘अरे वाह, आंटी, आज हम सैलिब्रेट करेंगे,’’ मैं तो चहक उठी, पर ऊपरी तौर से. सोमू के जाने की मु झे खुशी नहीं हो रही थी‘‘रमा, आज हमें भी खाना बनाने की जरूरत नहीं. मेरे बेटे ने हम दोनों के लिए बाहर से ही खाना और्डर कर दिया है.’प्यार और खुशी से मैं ने आंटी को गले लगा लिया.

बढि़या फिल्टर कौफी पी कर हम दोनों आराम से  झूले में बैठ गए. आंटी ने पूछा, ‘‘हम कहां पर थे?’‘‘आंटी, आप ने, धारावाहिक जैसे ही, बड़े रोचक मोड़ पर छोड़ दिया था कि होटल में आप सोमू से मिलीं.’‘‘बिलकुल, रमा. अब मेरी नहीं, बेटे की कहानी शुरू होती है. बेटा वहीं पढ़ कर एक अच्छे पद पर काम करने लगा. अच्छी सैलरी थी. देखने में सोमू बहुत सुंदर था ही, परिवार की कोई रोकटोक नहीं थी. इन बातों से आकर्षित हो कर भारत से आए और वहीं बसे एक परिवार की लड़की नीला ने इस से बात की. सोमू अपने को बहुत अकेला और बिना परिवार का महसूस तो कर ही रहा था. उस के पिता बहुत ड्रिंक करते थे, वे भी चल बसे. उस ने मेरे बारे में जानने की कोशिश की थी. पर उसे कामयाबी नहीं मिली.

‘‘नीला के प्रस्ताव ने तो उसे उस की ओर मोड़ लिया. थोड़े दिन दोनों बहुत खुश रहे. 2 प्यारेप्यारे बच्चे भी हुए. एक बेटा और एक बेटी. पर गृहस्थी की गाड़ी जैसे चलनी चाहिए वैसे न चली और नीला को दूसरे लड़के से प्यार हो गया. उस ने तलाक का निर्णय लिया. केस चला और दोनों बच्चे नीला को मिल गए. यह मेरे जैसे ही अपने जीवन में असफल हो गया. उस के बचाए रुपए भी सब नीला को देने पड़े. बहुत ही निराश हो गया.’’

‘‘यह तो बहुत बुरा हुआ आंटी.’‘‘हां.’‘‘मेरे बेटे ने मु झे ढूंढ़ने की बहुत कोशिश की. इस तलाक के कारण मु झे ढूंढ़ना बीच में छोड़ दिया था. जब तलाक का काम पूरा हुआ, तब बड़े मनोयोग से उस ने फिर से मु झे ढूंढ़ने का काम जारी रखा.‘‘बहुत मुश्किल था आंटी?’’

‘‘सही कहा. बहुत कोशिश करने के बाद किसी से उस को मेरा मोबाइल नंबर मिला. मु झे तब उस ने फोन किया. वह दिन मेरे लिए अविस्मरणीय है. मु झे तो लगा था,  मेरा कोई नहीं है. किस से मैं अपनी इस खुशी को बांटूं‘‘रमा, दुख को तो फिर भी अकेले सह सकते हैं पर खुशी को जब तक न बांटो, तो खुशी, खुशी नहीं होती. उस समय मैं ने अपनेआप को बहुत अकेला पाया.’’

‘‘मुझ से क्यों नहीं कहा आंटी?’‘‘कैसे कहती? मैं ने तो अपनी कोई बात तुम्हें नहीं बताई थी. तुम्हें ही क्या, किसी को भी नहीं बताई. मैं ने अपनी कहानी अपने मन में ही दफन कर ली थी. अब मेरे बेटे के आने पर जैसे सब बदल गया. मेरी जिंदगी बदल गई.’‘‘वाकई, यह अजूबा से कोई कम नहीं आंटी?’’

‘‘मेरा बेटा विदेश को छोड़ कर आ गया. अब यहीं रहेगा. अपना देश अपना ही होता है. दूर के ढोल सुहाने होते हैं. यही बात सही है. यह बात अब सोमू की सम झ में आ गई. उस के बच्चे जब उस की मां के कहने पर उस से नफरत करने लगे तब ही उस को यह बात सम झ में आई कि मेरी मां के साथ भी यही हुआ होगा और उसे पश्चात्ताप हुआ. ‘अब क्या होत, जब चिडि़या चुग गई खेत’ ऐसा सोचा. पर अब मेरे समय में बेटे का सुख लिखा था. मेरी कोई गलती नहीं थी. कुदरत ने मु झे ये दिन दिखाए. कुछ दिनों पहले भी मैं ने कई बार आत्महत्या करने की सोची. यदि मैं अपनी मंशा में कामयाब हो गई होती तो बेटे का प्रेम, स्नेह कैसे पाती.

‘‘जब जो होना है, किसी न किसी रूप में हो कर रहता है. हमें कर्म करते रहना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए. क्यों रमा, तुम मेरी कहानी सुन कर कुछ सोचने को मजबूर तो हुई होगी?’‘‘हां आंटी, मु झे इसे आत्मसात करने में समय लगेगा. क्या मैं आप की कहानी लिख सकती हूं?’’

‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं रमा, जरूर लिखो. मैं जानती हूं कि तुम एक लेखिका हो. लेखक जो कहता है वह सब कल्पना नहीं होती. वह जो अपने चारों ओर देखता है, सुनता है, महसूस करता है, वह तो लिखता है‘‘रमा, तुम्हें मेरा बेटा कैसा लगा?’मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया‘‘अरे रमा, तुम तो छोटी लड़की जैसी शरमा गईं.’’‘‘मम्मी, अंकल आए हैं, उन्हें आप से कुछ कहना है?’’

‘‘कहिए?’‘‘मैं जो कहने आया था, घर के दरवाजे पर आते ही वह बात आप के मुंह से ही सुन ली. अब मु झे क्या कहना.’‘‘मियांबीवी राजी, तो क्या करेगा काजी,’’ आंटी बोल कर हंस दींसब लोग ठहाका लगा कर हंसने लगे.सोमू बड़े प्रेम से मु झे देखने लगा. मैं बोल पड़ी, ‘‘आज बाहर चलते हैं, आज का डिनर बाहर.’’‘‘व्हाय नौट, श्योर,’’ सोमसुंदरम बोला.

मुझे एतराज नहीं-भाग 2 : पड़ोस मेें रहने वाली महिला इतनी शांत क्यों रहती थी

यह लड़का शायद दक्षिण भारत का है, सो वे वहीं के त्योहार ज्यादा मनातीं और दक्षिण भारतीय व्यंजन और नाश्ते बनातीं. मन बहुत परेशान रहने लगा. कहीं मेरी पड़ोसिन धोखा न खा जाए क्योंकि पड़़ोस में साथ रहतेरहते उन से विशेष स्नेह और अपनत्व हो गया था. उन से कैसे पूछूं. कुछ बोलूं, तो शायद बुरा मानें. कल को कुछ हो न जाए, मन बहुत व्यथित हो रहा था.

एक दिन उन के लड़के को अकेले बाहर जाते देखा, तो मैं गीता आंटी

के पास चली गई. मैं ने कहा, ‘‘आंटी, आप बहुत बड़ी हैं. सम झदार हैं. मु झे आप के पारिवारिक मामले में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है. होना भी नहीं चाहिए. पर मैं आप से बहुत ही स्नेह रखती हूं. सो, कह रही हूं, गलती हो तो माफ कर देना. मैं आप की बेटी जैसी हूं.’’

‘‘हांहां रमा, बोलो, क्यों इतनी परेशान हो रही हो? तुम मेरी बेटी ही हो,’ वे बोलीं. िझ झकते हुए मैं बोली, ‘‘यह आप का सगा बेटा है क्या?’’‘‘बिलकुल. पर मैं ने कभी किसी से कहा नहीं क्योंकि मु झे भी पता नहीं था कि वह कहां है?’’

‘‘क्या?’’ मैं ने आश्चर्य से पूछा‘‘यह बहुत बड़ी कहानी है. अभी तुम्हें फुरसत नहीं है, सुनाऊंगी कभी.’’मैं ने कहा, ‘‘आज मु झे फुरसत ही फुरसत है. आप को समय हो और आप बताना चाहें, तो बता दें. आज पापा का खाना उन के फ्रैंड के साथ है. मैं अकेली हूं. आज मेरी छुट्टी है.’’‘‘अच्छा, तो रमा बैठो, मेरी कहानी सुन लो और यहीं खाना भी खा लेना. मेरा बेटा सुंदर काम से बाहर गया हुआ है.’’

‘‘सुनाइए आंटी.’‘‘मेरा आईएएस में सलैक्शन हो गया था. मसूरी में ट्रेनिंग चल रही थी. सुदूर दक्षिण भारत के तमिलनाडु प्रांत से आए रघुपति स्मार्ट, सुंदर और होशियार थे. हम दोनों एकदूसरे की तरफ आकर्षित हुए. दोनों के घरवालों के विरोध के बावजूद हम ने शादी करने की ठान ली. शादी भी हो गई.

‘‘थोड़े दिनों तक सब ठीकठाक रहा. मेरा बेटा भी हो गया. रघुपति के मांबाप ने बेटे से सम झौता कर लिया और मु झ से कहा कि अपने बेटे को हमारे पास छोड़ दो. हम उसे पालपोस कर बड़ा करेंगे.

‘‘मेरी इच्छा ऐसी नहीं थी. पर सब ने मु झे सम झाया, बच्चे के दादादादी उस को तुम से ज्यादा अच्छे से रखेंगे. तुम्हें नौकरी करते हुए छोटे बच्चे को साथ रखने में परेशानी होगी. मेरी नौकरी दौरे की थी, बारबार दौरे पर जाना पड़ता था.

मुझे एतराज नहीं-भाग 1 : पड़ोस मेें रहने वाली महिला इतनी शांत क्यों रहती थी‘‘हैडक्वार्टर में थी, तब भी सुबहशाम घर आनेजाने का कोई ठिकाना नहीं था. मेरे मातापिता ने भी इसे ठीक सम झा. मैं विवश थी. नौकरों के भरोसे बच्चों को पालना मुश्किल था. शुरू में सब ठीकठाक था. छुट्टी होते ही बच्चे के मोह में ससुराल जातीआती रही. बाद में मेरी ससुराल वालों को मेरा आनाजाना खलने लगा. मेरे पति रघुपति कहते, ‘सही तो है न, तुम बारबार आओगी तो बेटा उन के पास कैसे रहेगा?’ वह बात भी मैं मान गई.

‘‘जब छुट्टी होती तो वे अपने घर चले जाते. मेरी उपेक्षा करने लगे. मैं काम के बो झ में व्यस्त होती गई. जब बेटे से मिलने जाती तो वे लड़ाई झगड़ा करते. मेरा बेटा सुंदर मु झ से ज्यादा अपने दादादादी और पिता से जुड़ा था. मेरा जीना ही मुश्किल हो गया,’’ यह कहते हुए बोलीं, ‘‘चलो, चाय पीते हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘आंटी, मु झे तो आप के हाथ की फिल्टर कौफी पीनी है. उस की खुशबू हमारे घर तक आती है.’’

‘‘अरे, जरूरजरूर. लो, मेरा बेटा भी आ गया. वह भी इस समय कौफी पीता है. हम साथसाथ पिएंगे.’’

मु झे संकोच हुआ. वे बोलीं, ‘‘तुम आराम से बैठे. मेरा बेटा सोमू मेरे जैसा नहीं है, बहुत सोशल है.’’ हम पहले ही मिल चुके थे. उन के बेटे ने भी मु झ से बैठने का आग्रह किया. सुंदरम मु झ से पापा के बारे में पूछने लगे. बातों ही बातों में मैं ने बताया कि पापा का मन नहीं लगता. उन्होंने पूछा, ‘‘पापा को क्याक्या शौक हैं?’’

‘‘पढ़ने का, गार्डनिंग, राजनीति बहस करने का.’’‘‘अरे वाह, मेरा उन के साथ मन

लग जाएगा. मैं भी इन बातों का शौक रखता हूं.’’‘‘फिर तो आप घर जरूर आइएगा, मिल कर बातें करेंगे.’’

इतने में कौफी आ गई. हम सब ने कौफी पी, फिर मैं घर आने को हुई तो गीता आंटी बोलीं, ‘‘आगे की कहानी बाद में सुनाऊंगी, अभी खाना बनाना है.’’

अगले दिन सुंदरम आ गए. पापा मेरे बड़े बातूनी हैं. दोनों की जोड़ी जोरदार थी, खूब बातें कर रहे थे. मैं भी उन के साथ बैठ गई, बातें करने लगी?

सुंदरम पापा से बात करते पर मेरी तरफ भी देखते जाते. इस उम्र में भी मेरे अंदर एक सिहरन सी दौड़ जाती. यह कैसे है, मु झे पता नहीं. सोमसुंदरम की बातें सुनती रहूं, ऐसा लगता. मु झे आज तक किसी के लिए ऐसा नहीं महसूस हुआ. अब ऐसा क्यों लग रहा है?

पापा और सोमसुंदरम दोनों वौक पर जाते. कई बार रात में क्लबों में जाते. पापा खेल के बहुत शौकीन हैं, ऐसे ही आंटी का बेटा भी. दोनों में पटने लगी. जब दोनों जाते तब मैं आंटी के पास चली जाती. वे अपनी कहानी सुनाने लगतीं. वही धारावाहिक सीरियल जैसे मु झे सुनातीं. मु झे भी बहुत इंटरैस्ट आने लगा.

वे कहने लगीं, ‘‘मेरे पास मेरे पति का आना करीबकरीब बंद हो गया. वे आते, तो भी उन के पास शिकायतों का पिटारा ही होता. ससुराल जाती, तो कोई सीधेमुंह बात न करता. बच्चे को मेरे पास न आने देने के लिए कई बहाने बनाए जाते थे. बच्चा जैसेजैसे बड़ा होता गया, मु झ से दूर होता गया. उसे मेरे खिलाफ  झूठी बातें कह कर भड़काया जाता था. मेरे लिए जीना ही दूभर हो गया. मैं ने तय कर लिया कि ऐसी जिंदगी जीने से क्या फायदा, मैं ने तलाक देने के लिए कहा.

‘‘वे यही तो चाहते थे. पर बच्चे को देने से मना कर दिया. रघुपति ने तब तक अपना ट्रांसफर भी मेरी ससुराल में ही करवा लिया था. ‘बच्चा मेरे मांबाप के पास ही रहेगा. मैं भी यहां हूं. यह अकेली उसे कैसे रखेगी?’ कोर्ट में रघुपति ने कह दिया. सोमू ने भी अदालत में पिता के पास रहने की जिद की और जज ने उसे पिता के पास सौंपने का फैसला सुनाया.’’

उन की कहानी सुन कर मेरा जी

भर आया.वे आगे कहने लगीं, ‘‘मैं हफ्ते में एक दिन या महीने में 4 दिन बच्चे से मिल सकती थी. अब सोमू बड़ा हो गया था. वह मु झ से बात नहीं करना चाहता था. मु झे देख कर अंदर भाग जाता. कुत्ते से खेलने लगता, रोने लगता और कहता, ‘तुम गंदी हो, मत आओ. आप मेरी मम्मी नहीं हो.’ यह बात मैं सहन न कर पाती थी. जब वहां जा कर आती, मन प्रसन्न होने के बजाय बहुत दुखी होता. मु झे इस हालत में देख कर मम्मीपापा भी बहुत दुखी होते. वे कहते, ‘जब वहां जा कर दुखी होती हो तो बारबार जाने की क्या जरूरत है.’

‘‘बच्चे को देखने की इच्छा को मैं रोक नहीं पाती. किसी से मिल कर मन प्रसन्न हो, तब ही जाना चाहिए. इस बात को सम झो. मैं अपनेआप को सम झाने की बहुत कोशिश करती, पर मन है कि मानता ही नहीं. मेरे खिलाफ उन लोगों ने सोमू में जहर भर दिया था. उस जहर को निकालना मेरे वश के बाहर था.

‘‘इस बीच मेरा ट्रांसफर बहुत दूर हो गया. फिर भी कोशिश कर के आती, तो वही पुरानी बातें दोहराई जाती थीं. अंत में तंग आ कर जाना छोड़ दिया.’’

 

लंगड़ी बुखार से हो सकती है दुधारू पशुओं की मौत

लेखक-डा. नागेंद्र कुमार त्रिपाठी

भारत ने दुग्ध उत्पादन में बड़ी तेजी के साथ विश्व बाजार में अपनी एक पहचान बनाई है. विश्व में आज भारत दुग्ध उत्पादन के मामले में शीर्ष पर है. जिस स्तर पर हम आज दूध उत्पादन कर रहे हैं, यह हमारे लिए गर्व की बात है. इस लय को बरकरार रखने के लिए हमें अपने दुधारू पशुओं का ध्यान रखना बहुत ही आवश्यक है. दुधारू पशुओं को पालने में जो सब से बड़ी समस्या आती है, वह है पशुओं में होने वाली बीमारियां. उन की देखभाल करना जरूरी है. यदि एक पशु में कोई बीमारी हो जाता हैं कि तो दूसरे पशु भी इस का शिकार होने लगते हैं. यदि इन की उचित देखभाल न की जाए, तो बीमारी घातक हो जाती है. कुछ बीमारियां इतनी भयानक होती हैं कि दुधारू पशुओं की मौत तक हो जाती है.

इन बीमारियों में गलघोंटू, मुंहपकाखुरपका और लंगड़ी बुखार मुख्य हैं. लंगड़ी बुखार एक जानलेवा बीमारी है. यदि पशु इस की चपेट में आ जाए और समय पर उस की देखभाल न हो, तो उस की मौत तक हो जाती है. आज हम आप को लंगड़ी बुखार बीमारी के लक्षणों और इस के इलाज के बारे में कुछ जरूरी जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं. लंगड़ी बुखार वैसे तो यह बीमारी गाय और भैंसों दोनों में होती है. परंतु यह बीमारी गाय में अधिक पाई जाती है. यह एक खतरनाक बीमारी है. सब से पहले पशु की पिछली व अगली टांगों के ऊपरी भाग में भारी सूजन आ जाती है, जिस से पशु लंगड़ा कर चलने लगता है या फिर बैठने लगता है. जिस भाग पर सूजन आई होती है, उसे दबाने पर कड़कड़ की आवाज आती है. इस से बचने के लिए पशु का उपचार शीघ्र करवाना चाहिए, क्योंकि इस बीमारी के जीवाणुओं द्वारा हुआ जहर शरीर में पूरी तरह फैल जाने से पशु की मौत हो जाती है.

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इस बीमारी से बचने के लिए पशुओं में ‘प्रोकेन पेनिसिलिन’ के टीके लगाए जाते हैं. यह टीके बिलकुल मुफ्त लगते हैं. लंगड़ी बुखार को साधारण भाषा में जहरबाद, फडसूजन, काला बाय आदि नामों से भी जाना जाता है. यह बीमारी पशुओं में कभी भी हो सकती है. मुख्य रूप से यह बीमारी 6 महीने से 2 साल तक की उम्र वाले पशुओं में अधिक पाई जाती है. मुख्य लक्षण इस बीमारी में पशु को तेज बुखार आता है और उस का तापमान 106 डिगरी फारेनाइट से 107 फारेनाइट तक पहुंच जाता है. पशु सुस्त हो कर खानापीना छोड़ देता है. पीडि़त पशु लंगड़ा कर चलने लगता है. यह बीमारी आमतौर पिछले पैरों को अधिक प्रभावित करती है और सूजन घुटने से ऊपर वाले हिस्से में होती है. यह सूजन शुरू में गरम व कष्टदायक होती है, जो बाद में ठंडी व दर्दरहित हो जाती है. पैरों के अलावा सूजन पीठ, कंधे व दूसरी मांसपेशियों वाले हिस्से पर भी हो सकती है. सूजन के ऊपर वाली चमड़ी सूख कर कड़ी होती जाती है.

इस बीमारी में पशु का उपचार जल्दी करवाना चाहिए, क्योंकि इस बीमारी के जीवाणुओं द्वारा हुआ जहर शरीर में पूरी तरह फैल जाने से पशु की मौत हो जाती है. ऐसी बीमारियों में पशुपालक को चाहिए कि अपने पशु का जल्द से जल्द इलाज कराएं या पहले से ही पशुओं का टीकाकरण करा लें, ताकि भविष्य में पशु को कोई परेशानी न हो. जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक व अध्यक्ष से संपर्क करें.

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रोकथाम व बचाव * वर्षा ऋतु शुरू होते ही पशु को इस बीमारी का टीका लगवा लेना चाहिए. यह टीका पशु को 6 माह की उम्र पर भी लगाया जाता है. * रोगग्रस्त पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए. * भेड़ों में ऊन कतरने से 3 महीने पहले टीकाकरण करवा लेना चाहिए, क्योंकि ऊन कतरने के समय घाव होने पर जीवाणु घाव से शरीर में प्रवेश कर जाता है, जिस से रोग की संभावना बढ़ जाती है.

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* सूजन को चीरा मार कर खोल देना चाहिए, जिस से जीवाणु हवा के संपर्क में आने पर अप्रभावित हो जाता है.

शर्वरी-महिमा देवी को बेटी के घर क्या अच्छा लगा, जिसे वह अपने साथ ले आई

महिमा देवी कुछ दिनों के लिए अपनी बेटी नूपुर के घर गईं तो उस की ननद शर्वरी के व्यवहार व शालीनता ने उन का मन जीत लिया. इसलिए दामाद अभिषेक की गैरहाजिरी में उन्होंने शर्वरी को अपने साथ ही रख लिया. महिमा के इस वात्सल्य व स्नेह का शर्वरी ने क्या प्रतिदान दिया? ‘‘ओशर्वरी, इधर तो आ. इस तरह कतरा कर क्यों भाग रही है,’’ महिमा ने कांजीवरम साड़ी में सजीसंवरी शर्वरी को दरवाजे की तरफ दबे कदमों से खिसकते देख कर कहा था. ‘‘जी,’’ कहती, शरमातीसकुचाती शर्वरी उन के पास आ कर खड़ी हो गई.

‘‘क्या बात है? इस तरह सजधज कर कहां जा रही है?’’ महिमा ने पूछा. ‘‘आज डा. निपुण का विदाई समारोह है न, मांजी, कालेज में सभी अच्छे कपड़े पहन कर आएंगे. मैं ऐसे ही, सादे कपड़ों में जाऊं तो कुछ अजीब सा लगेगा,’’ शर्वरी सहमे स्वर में बोली. ‘‘तो इस में बुरा क्या है, बेटी. तेरी गरदन तो ऐसी झुकी जा रही है मानो कोई अपराध कर दिया हो. इस साड़ी में कितनी सुंदर लग रही है, हमें भी देख कर अच्छा लगता है. रुक जरा, मैं अभी आई,’’ कह कर महिमा ने अपनी अलमारी में से सोने के कंगन और एक सुंदर सा हार निकाल कर उसे दिया. ‘‘मांजी…’’ उन से कंगन और हार लेते हुए शर्वरी की आंखें डबडबा आई थीं. ‘‘यह क्या पागलपन है. सारा मुंह गंदा हो जाएगा,’’ मांजी ने कहा. ‘‘जानती हूं, पर लाख चाहने पर भी ये आंसू नहीं रुकते कभीकभी,’’ शर्वरी ने खुद पर संयम रखने का प्रयास करते हुए कहा. शर्वरी ने भावुक हो कर हाथों में कंगन और गले में हार डाल लिया.

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‘‘कैसी लग रही हूं?’’ अचानक उस के मुंह से निकल पड़ा. ‘‘बिलकुल चांद का टुकड़ा, कहीं मेरी नजर ही न लग जाए तुझे,’’ वह प्यार से बोलीं. ‘‘पता नहीं, मांजी, मेरी अपनी मां कैसी थी. बस, एक धुंधली सी याद शेष है, पर मैं यह कभी नहीं भूलूंगी कि आप के जैसी मां मुझे मिलीं,’’ शर्वरी भावुक हो कर बोली. ‘‘बहुत हो गई यह मक्खनबाजी. अब जा और निपुण से कहना, मुझ से मिले बिना न चला जाए,’’ उन्होंने आंखें तरेर कर कहा. ‘‘जी, डा. निपुण तो खुद ही आप से मिलने आने वाले हैं. उन की माताजी आई हैं. वह आप से मिलना चाहती हैं,’’ कहती हुई शर्वरी पर्स उठा कर बाहर निकल गई थी.

इधर महिमा समय के दर्पण पर जमी अतीत की धूल को झाड़ने लगी थीं. वह अपनी बेटी नूपुर के बेटा होने के मौके पर उस के घर गई थीं. वह जा कर खड़ी ही हुई थी कि शर्वरी ने आ कर थोड़ी देर उन्हें निहार कर अचानक ही पूछ लिया था, ‘आप लोग अभी नहाएंगे या पहले चाय पिएंगे?’ वह कोई जवाब दे पातीं उस से पहले ही नूपुर, शर्वरी पर बरस पड़ी थीं, ‘यह भी कोई पूछने की बात है? इतने लंबे सफर से आए हैं तो क्या आते ही स्नानध्यान में लग जाएंगे? चाय तक नहीं पिएंगे?’ ‘ठीक है, अभी बना लाती हूं,’ कहती हुई शर्वरी रसोईघर की तरफ चल दी. ‘और सुन, सारा सामान ले जा कर गैस्टरूम में रख दे. अंकुश का रिकशे वाला आता होगा. उसे तैयार कर देना. नाश्ते की तैयारी भी कर लेना…’

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‘बस कर नुपूर. इतने काम तो उसे याद भी नहीं रहेंगे,’ महिमा ने मुसकराते हुए कहा. ‘मां, आप नहीं जानती हैं इसे. यह एक नंबर की कामचोर है. एक बात कहूं मां, पिताजी ने कुछ भी नहीं देखा मेरे लिए. पतिपत्नी कैसे सुखचैन से रहते हैं, मैं ने तो जाना ही नहीं, जब से इस घर में पैर रखा है मैं तो देवरननद की सेवा में जुटी हूं,’ अब नूपुर पिताजी की शिकायत करने लगी. ‘ऐसे नहीं कहते, अंगूठी में हीरे जैसा पति है तेरा. इतना अच्छा पुश्तैनी मकान है. मातापिता कम उम्र में चल बसे तो भाईबहन की जिम्मेदारी तो बड़े भाईभाभी पर ही आती है,’ महिमा ने समझाते हुए कहा. ‘वही तो कह रही हूं. यह सब तो देखना चाहिए था न आप को. भाई की पढ़ाई का खर्च, फिर बहन की पढ़ाई. ऊपर से उस की शादी के लिए कहां से लाएंगे लाखों का दहेज,’ नूपुर चिड़चिड़े स्वर में बोली थी. ‘ठीक है, यदि मैं सबकुछ देख कर विवाह करता और बाद में सासससुर चल बसते तो क्या करतीं तुम?’ अभिजीत भी नाराज हो उठे थे.

महिमा ने उन्हें शांत करना चाहा. बेटी और पति के स्वभाव से वह अच्छी तरह परिचित थीं और उन के भड़कते गुस्से को काबू में रखने के लिए उन्हें हमेशा ठंडे पानी का कार्य करना पड़ता था. तभी चाय की ट्रे थामे शर्वरी आई थी. साथ ही नूपुर के पति अभिषेक ने वहां आ कर उस गरमागरम बहस में बाधा डाल दी थी. चाय पीते हुए भी महिमा की आंखें शर्वरी का पीछा करती रहीं. उस ने फटाफट अंकुश को तैयार किया,उस का टिफिन लगाया, अभिषेक को नाश्ता दिया और महिमा और उन के पति के लिए नहाने का पानी भी गरम कर के दिया. महिमा नहा कर निकलीं तो उन्होंने देखा कि शर्वरी सब्जी काट रही थी. वह बोलीं, ‘अरे, अभी से खाने की क्या जल्दी है, बेटी. आराम से हो जाएगा.’

‘मांजी, मैं सोच रही थी, आज कालेज चली जाती तो अच्छा रहता. छमाही परीक्षाएं सिर पर हैं. कालेज न जाने से बहुत नुकसान होता है,’ शर्वरी जल्दीजल्दी सब्जी काटते हुए बोली. ‘तुम जाओ न कालेज. मैं आ गई हूं, सब संभाल लूंगी. इस तरह परेशान होने की क्या जरूरत है. मुझे पता है, इंटर की पढ़ाई में कितनी मेहनत करनी पड़ती है,’ महिमा ने कहा. उन की बात सुन कर शर्वरी के चेहरे पर आई चमक, उन्हें आज तक याद है. कुछ पल तक तो वह उन्हें एकटक निहारती रह गई थी, फिर कुछ इस तरह मुसकराई थी मानो बहुत प्यासे व्यक्ति के मुंह में किसी ने पानी डाल दिया हो. दोनों के बीच इशारों में बात हुई व शर्वरी लपक कर उठी और तैयार हो कर किताबों का बैग हाथ में ले कर बाहर आ गई थी. ‘तो मैं जाऊं, मांजी?’ उस ने पूछा. ‘कहां जा रही हैं, महारानीजी?’ तभी नूपुर ने वहां आ कर पूछा. ‘कालेज जा रही है, बेटी,’ शर्वरी कुछ कहती उस से पहले ही महिमा ने जवाब दे दिया. ‘मैं ने कहा था न, एक सप्ताह और मत जाना,’ नूपुर ने डांटने के अंदाज में कहा. ‘जाने दे न नूपुर, कह रही थी, पढ़ाई का नुकसान होता है,’

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महिमा ने शर्वरी की वकालत करते हुए कहा. ‘ओह, तो आप से शिकायत कर रही थी. कौन सी पीएचडी कर रही है? इंटर में पढ़ रही है और वह भी रोपीट कर पास होगी,’ नूपुर ने व्यंग्य के लहजे में कहा. महिमा का मन हुआ कि वे नूपुर को बताएं कि जब वह स्कूल में पढ़ती थी तो उसे कैसे सबकुछ पढ़ने की टेबल पर ही चाहिए होता था और तब भी वह उसी के शब्दों में ‘रोपीट कर’ ही पास होती थी, या नहीं भी होती थी, पर स्थिति की नजाकत देख कर वे चुप रह गई थीं. अभिजीत तो 2 दिन बाद ही वापस चले गए थे पर उन्हें नूपुर के पूरी तरह स्वस्थ होने तक वहीं उस की देखभाल को छोड़ गए थे. शर्वरी दिनभर घर के कार्यों में हाथ बंटा कर अपनी पढ़ाई भी करती और नूपुर की जलीकटी भी सुनती, पर उस ने कभी भी कुछ न कहा. अभिषेक अपने काम में व्यस्त रहता या व्यस्त रहने का दिखावा करता.

छोटे भाई रोहित ने, शायद नूपुर के स्वभाव से ही तंग आ कर छात्रावास में रह कर पढ़ने का फैसला किया था. वह मातापिता की चलअचल संपत्ति पर अपना हक जताता तो नूपुर सहम जाती थी, पर अब सारा गुस्सा शर्वरी पर ही उतरता था. कभीकभी महिमा को लगता कि सारा दोष उन का ही है. वे उसे दूसरों से शालीन व्यवहार की सीख तक नहीं दे पाई थीं. बचपन से भी वह अपने तीनों भाईबहनों में सब से ज्यादा गुस्सैल स्वभाव की थी और बातबात पर जिद करना और आपे से बाहर हो जाना उस के स्वभाव का खास हिस्सा बन गए थे. कुछ दिन और नूपुर के परिवार के साथ रह कर महिमा जब घर लौटीं तो उन के मन में एक कसक सी थी. वे चाह कर भी नूपुर से कुछ नहीं कह सकी थीं. 2 महीने तक साथ रह कर शर्वरी से उन का अनाम और अबूझ सा संबंध बन गया था. कहते हैं, ‘मन को मन से राह होती है,’

पहली बार उन्होंने इस कथन की सचाई को जीवन में अनुभव किया था, पर संसार में हर व्यक्ति को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है और वे चाह कर भी शर्वरी के लिए कुछ न कर पाई थीं. पर अचानक ही कुछ नाटकीय घटना घट गई थी. अभिषेक को 2 साल के लिए अपनी कंपनी की तरफ से जरमनी जाना था. शर्वरी को वह कहां छोड़े, यह समस्या उस के सामने मुंहबाए खड़ी थी. दोनों ने पहले उसे छात्रावास में रखने की बात भी सोची पर जब महिमा ने शर्वरी को अपने पास रखने का प्रस्ताव रखा तो दोनों की बांछें खिल गई थीं. ‘अंधा क्या चाहे दो आंखें,’ फिर भी अभिषेक ने पूछ ही लिया, ‘आप को कोई तकलीफ तो नहीं होगी, मांजी?’ ‘अरे, नहीं बेटे, कैसी बातें करते हो. शर्वरी तो मेरी बेटी जैसी है. फिर तीनों बच्चे अपने घरसंसार में व्यवस्थित हैं. हम दोनों तो बिलकुल अकेले हैं. बल्कि मुझे तो बड़ा सहारा हो जाएगा,’ महिमा ने कहा. ‘सहारे की बात मत कहो, मां. बहुत स्वार्थी किस्म की लड़की है यह सहारे की बात तो सोचो भी मत,’ नूपुर ने अपनी स्वाभाविक बुद्धि का परिचय देते हुए कहा था.

महिमा की नजर सामने दरवाजे पर खड़ी शर्वरी पर पड़ी थी तो उस की आंखों की हिंसक चमक देख कर वे भी एक क्षण को तो सहम गई थीं. ‘हां, तो पापा, आप क्या कहते हैं?’ उन्हें चुप देख कर नूपुर ने अभिजीत से पूछा था. ‘तुम्हारी मां तैयार हैं तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. वैसे मुझे भी नहीं लगता कि कोई समस्या आएगी. शर्वरी अच्छी लड़की है और तुम्हारी मां को तो यों भी कभी किसी से तालमेल बैठाने में कोई परेशानी नहीं हुई है,’ अभिजीत ने नूपुर के सवाल का जवाब देते हुए कहा. इस तरह शर्वरी महिमा के जीवन का हिस्सा बन गई थी और जल्दी ही उस ने उन दोनों पतिपत्नी के जीवन में अपनी खास जगह बना ली थी. एक दिन शर्वरी कालेज से लौटी तो महिमा अपने बैडरूम में बेसुध पड़ी थीं. यह देख कर शर्वरी पड़ोसियों की मदद से उन्हें अस्पताल ले गई. बीमारी की हालत में शर्वरी ने उन की ऐसी सेवा की कि सब आश्चर्यचकित रह गए थे. ‘शर्वरी,’ महिमा ने हाथ में साबूदाने की कटोरी थामे खड़ी शर्वरी से कहा था. ‘जी.’ ‘तुम जरूर पिछले जन्म में मेरी मां रही होगी,’ महिमा ने मुसकरा कर कहा था. ‘आप पुनर्जन्म में विश्वास करती हैं क्या?’ शर्वरी ने पूछा. ‘हां, पर क्यों पूछ रही हो तुम?’

‘यों ही, पर मुझे यह जरूर लगता है कि कभी किसी जन्म में कुछ भले काम जरूर किए होंगे मैं ने जो आप लोगों से इतना प्यार मिला, नहीं तो मुझ अभागी के लिए यह सब कहां,’ कहते हुए शर्वरी की आंखें डबडबा गई थीं. ‘आज कहा सो कहा, आगे से कभी खुद को अभागी न कहना. कभी बैठ कर शांतमन से सोचो कि जीवन ने तुम्हें क्याक्या दिया है,’ महिमा ने शर्वरी को समझाते हुए कहा था. अभिजीत और महिमा के साथ रह कर शर्वरी कुछ इस कदर निखरी कि सभी आश्चर्यचकित रह गए थे. उस स्नेहिल वातावरण में शर्वरी ने पढ़ाई में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी. जब कठिनाई से पास होने वाली शर्वरी पूरे विश्वविद्यालय में प्रथम आई थी तो खुद महिमा को भी उस पर विश्वास नहीं हुआ था. उसे स्वर्ण पदक मिला था. स्वर्ण पदक ला कर उस ने महिमा को सौंपते हुए कहा था,

‘इस का श्रेय केवल आप को जाता है, मांजी. पता नहीं इस का ऋण मैं कैसे चुका पाऊंगी.’ ‘पगली है, शर्वरी तू तो, मां भी कहती है और ऋण की बात भी करती है. फिर भी मैं बताती हूं, मेरा ऋण कैसे उतरेगा,’ महिमा ने उसे समझाते हुए कहा, ‘तेन त्यक्तेन भुंजीषा.’ ‘क्या?’ शर्वरी ने चौंकते हुए कहा, ‘यह क्या है? सीधीसादी भाषा में कहिए न, मेरे पल्ले तो कुछ नहीं पड़ा,’ कह कर शर्वरी हंस पड़ी. यह मजाक की बात नहीं है, बेटी. जीवन का भोग, त्याग के साथ करो और इस त्याग के लिए सबकुछ छोड़ कर संन्यास लेने की जरूरत नहीं है. परिवार और समाज में छोटी सी लगने वाली बातों से दूसरों का जीवन बदल सकता है. तुम समझ रही हो, शर्वरी?’ महिमा ने शर्वरी को समझाते हुए कहा था.

‘जी, प्रयास कर रही हूं,’ शर्वरी ने जवाब दिया. ‘देखो, नूपुर मेरी बेटी है, पर उस के तुम्हारे प्रति व्यवहार ने मेरा सिर शर्म से झुका दिया है. तुम ऐसा करने से बचना, बचोगी न?’ महिमा ने पूछा. ‘जी, प्रयत्न करूंगी कि आप को कभी निराश न करूं,’ शर्वरी गंभीर स्वर में बोली थी. शीघ्र ही शर्वरी की अपने ही कालेज में व्याख्याता के पद पर नियुक्ति हो गई और अब तो उस का आत्मविश्वास देखते ही बनता था. उस की कायापलट की बात सोचते हुए उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकान तैर गई थी. ‘‘कहां खोई हो?’’ तभी अभिजीत ने आ कर महिमा की तंद्रा भंग करते हुए पूछा. ‘‘कहीं नहीं, यों ही,’’ महिमा ने चौंक कर कहा. ‘‘तुम्हारी तो जागते हुए भी आंखें बंद रहती हैं. आज लाइब्रेरी से निकला तो देखा शर्वरी डा. निपुण के साथ हाथ में हाथ डाले जा रही थी,’’ अभिजीत ने कहा. ‘‘जानती हूं,’’ महिमा ने उन की बात का जवाब दिया. ‘‘क्या?’’ अभिजीत ने पूछा. ‘‘यही कि दोनों एकदूसरे को बहुत चाहते हैं,’

’ उन्होंने बताया. ‘‘क्या कह रही हो, पराई लड़की है, कुछ ऊंचनीच हो गई तो हम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे,’’ अभिजीत ने सकपकाते हुए कहा. ‘‘घबराओ नहीं, मुझे शर्वरी पर पूरा भरोसा है. उस ने तो अभिषेक को सब लिख भी दिया है,’’ महिमा बोलीं. ‘‘ओह, तो दुनिया को पता है. बस, हम से ही परदा है,’’ अभिजीत ने मुसकरा कर कहा था. थोड़ी ही देर में शर्वरी दरवाजे पर दस्तक देती हुई घर में घुसी. ‘‘मां, आज शाम को निपुण अपनी मां के साथ आप से मिलने आएंगे,’’ उस ने शरमाते हुए महिमा के कान में कहा. ‘‘क्या बात है? हमें भी तो कुछ पता चले,’’ अभिजीत ने पूछा. ‘‘खुशखबरी है, निपुण अपनी मां के साथ शर्वरी का हाथ मांगने आ रहे हैं. चलो, बाजार चलें, बहुत सी खरीदारी करनी है,’’ महिमा ने कहा तो शर्वरी शरमा कर अंदर चली गई. ‘‘सच कहूं महिमा, आज मुझे जितनी खुशी हो रही है उतनी तो अपनी बेटियों के संबंध करते समय भी नहीं हुई थी,’’ अभिजीत गद्गद स्वर में बोले. ‘‘अपनों के लिए तो सभी करते हैं पर सच्चा सुख तो उन के लिए कुछ करने में है जिन्हें हमारी जरूरत है,’’ संतोष की मुसकान लिए महिमा बोलीं.

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