महिमा देवी कुछ दिनों के लिए अपनी बेटी नूपुर के घर गईं तो उस की ननद शर्वरी के व्यवहार व शालीनता ने उन का मन जीत लिया. इसलिए दामाद अभिषेक की गैरहाजिरी में उन्होंने शर्वरी को अपने साथ ही रख लिया. महिमा के इस वात्सल्य व स्नेह का शर्वरी ने क्या प्रतिदान दिया? ‘‘ओशर्वरी, इधर तो आ. इस तरह कतरा कर क्यों भाग रही है,’’ महिमा ने कांजीवरम साड़ी में सजीसंवरी शर्वरी को दरवाजे की तरफ दबे कदमों से खिसकते देख कर कहा था. ‘‘जी,’’ कहती, शरमातीसकुचाती शर्वरी उन के पास आ कर खड़ी हो गई.

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