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Family Story In Hindi : गलत फैसला

Family Story In Hindi :  जयश्री को गुजरे एक महीना भी नहीं हुआ था कि उस के मम्मीपापा उस के ससुराल आ धमके. लगभग धमकीभरे लहजे में अपने दामाद प्रशांत से बोले, ‘‘राजन मेरे पास रहेगा.’’

‘‘क्यों आप के पास रहेगा? उस का बाप जिंदा है,’’ प्रशांत ने भी उसी लहजे में जवाब दिया.

‘‘उस की परवरिश करना तुम्हारे वश में नहीं,’’ वे बोले.

‘‘बड़े होने के नाते मैं आप की इज्जत करता हूं लेकिन यह हमारा निजी मामला है.’’

‘‘निजी कैसे हो गया? राजन मेरी बेटी का पुत्र है. उस की उम्र अभी मात्र 6 महीने है. तुम नौकरी करोगे कि बेटा पालोगे,’’ प्रशांत के ससुर रामानंद बोले.

‘‘आशा दीदी के हाथों वह सुरक्षित है,’’ प्रशांत ने सफाई दी.

‘‘तो भी यह बच्चा तुम्हें मुझे देना ही होगा,’’ रामानंद ‘देना’ शब्द पर जोर दे कर बोले.

‘‘रवि, तू अंदर जा कर बच्चा ले आ,’’ रवि उन का इकलौता बेटा था. भले ही उम्र के 40वें पायदान पर था तथापि स्वभाव से उद्दंडता गई न थी. आशा दौड़ कर कमरे में गई और राजन को सीने से लगा कर शोर मचाने लगी. प्रशांत ने भरसक प्रतिरोध किया लेकिन रवि ने उसे झटक दिया. रवि की उद्दंडता से नाराज प्रशांत, रवि को थप्पड़ मारने ही जा रहा था कि रामानंद बीच में आ गए. तब तक आसपड़ोस की भीड़ इकट्ठी हो गई. भीड़ के भय से रामानंद ने अपने पांव पीछे खींच लिए. उस रोज वे खाली हाथ लौट गए जिस का उन्हें मलाल था. प्रसंगवश, यह बता देना आवश्यक है कि प्रशांत और जयश्री का अतीत क्या था.

प्रशांत की जयश्री से शादी हुए 16 साल हो चुके थे. इन सालों में जब जयश्री गर्भवती नहीं हुई तो उन दोनों ने टैस्टट्यूब बेबी का सहारा लिया. इस तरह जयश्री की गोद भर गई. जब तक जयश्री मां न बन सकी थी तब तक प्रशांत ने उसे सरकारी नौकरी में जाने की पूरी छूट दे रखी थी. इसी का परिणाम था कि वह एक सरकारी स्कूल में अध्यापिका बन गई. नौकरी मिलते ही जयश्री के मांबाप, भाईबहन सब उस के इर्दगिर्द मंडराने लगे. जयश्री का मायका मोह अब भी नहीं छूटा था. कहने के लिए वह प्रशांत की बीवी थी पर रायमशवरा वह मायके से ही लेती. एक दिन रामानंद जयश्री से बोले, ‘बेटी, तुम्हारे पास रुपयों की कोई कमी न रही. तुम दोनों सरकारी नौकरी में हो.’ जयश्री चुपचाप उन की बात सुनती रही.

 

वे आगे बोले, ‘तुम्हारी छोटी बहन लता जमीन खरीदना चाहती है. हो सके तो तुम उस की मदद कर दो.’

रामानंद व उन की बीवी दोनों बड़े चापलूस और मक्कार किस्म के थे. उन का बेटा रवि भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलता. शादी के बाद भी वे लोग जयश्री पर छाए रहे. जयश्री कभी भी पूर्णतया ससुराल की हो कर न रह पाई थी. छोटीछोटी समस्याओं के लिए अपने मम्मीपापा और भाई रवि पर निर्भर रहती. उन की राय के बिना एक कदम न बढ़ाती. यहां तक कि लता को 2 लाख रुपए उस ने चोरी से लोन ले कर दे दिए. यह बात प्रशांत तक को पता न थी. लोन के पैसे वेतन से कटते. जयश्री ने अपने सारे गहने मायके में रख छोड़े थे. प्रशांत ने आपत्ति की तो उस ने यह कह कर उन्हें शांत कर दिया कि वहां लौकर में सुरक्षित हैं. मांबाप कहीं बेटी का हक थोड़े ही मारते हैं. इस के पीछे उसे डर अपनी बड़ी ननद आशा को ले कर था. वे अकसर आती रहतीं. प्रशांत उन से कुछ ज्यादा घुलामिला था. आशा की जयश्री से कभी नहीं पटी.

आशा सोचती कि प्रशांत के मांबाप नहीं रहे, इसलिए उसी ने उस की शादी का जिम्मा लिया तो प्रशांत की तरह जयश्री भी उस से दब कर रहे. जयश्री सोचती, आशा प्रशांत की बहन है, वे चाहे उस से जैसे भी पेश आएं, मैं क्यों उन के तलवे चाटूं. इन्हीं सब बातों को ले कर दोनों में तनातनी रहती. जयश्री को अपने मायके से जुड़ाव का एक बहुत बड़ा कारण यह भी था. जयश्री की इसी कमजोरी का फायदा उस के मांबाप, भाईबहनों ने उठाया. वे कोई न कोई बहाना बना कर उस से रुपए ऐंठते रहते. उस दोपहर अचानक जयश्री की तबीयत बिगड़ी. प्रशांत ने नजदीक के एक प्राइवेट अस्पताल में उसे भरती कराया. 2 दिन इलाज चला. तीसरे दिन अचानक उसे बेचैनी महसूस हुई. डाक्टरों ने भरसक कोशिश की परंतु उसे बचा न सके.

जयश्री की मृत्यु की खबर सुन कर उस के मायके के लोग भागेभागे आए. आते ही प्रशांत को कोसने लगे, ‘तुम ने मेरी बेटी का ठीक से इलाज नहीं करवाया.’ गनीमत थी कि वह प्राइवेट अस्पताल में मरी. अगर घर में मरती तो निश्चय ही वे कोई न कोई आरोप लगा कर प्रशांत को जेल भिजवा देते.

 

‘ये आप क्या कह रहे हैं, बाबूजी. वह मेरी पत्नी थी. मैं भला उस के इलाज में कोताही क्यों बरतूंगा,’ प्रशांत बोला.

‘बरतोगे,’ व्यंग्य के भाव उन के चेहरे पर तिर गए, ‘16 साल के वैवाहिक जीवन में वह एक दिन भी खुश नहीं रही.’

‘यह आप कैसे कह सकते हैं?’

‘क्यों नहीं कहूंगा? तुम्हें फिट आते थे. क्या तुम ने शादी के पहले इस का जिक्र किया था?’

‘गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा?’ प्रशांत बात टालने की नीयत से बोला.

‘इसीलिए कह रहा हूं, अगर फायदा होता तो नहीं उखाड़ता.’

‘दोष तो आप की बेटी में भी था.’

‘दोष? तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है.’

‘16 साल इलाज किया, लाखों रुपए खर्च हुए, तब भी वह मां न बन सकी. जानते हैं क्यों? क्योंकि उस के बच्चेदानी में टीबी थी, जो शादी के पहले से थी. अगर समय रहते आप लोगों ने उस की समुचित चिकित्सा की होती तो यह दिन न देखना पड़ता.’ ‘बेकार की बातें मत करो,’ रामानंद का स्वर किंचित तेज था, ‘जो भी खामी आई वह सब तुम्हारे माहौल का दोष है. मेरे यहां तो वह भलीचंगी थी.’

 

‘झूठ मत बोलिए, आप 5 बेटियों के पिता हैं. आप भला क्यों इलाज कराएंगे. आप तो चाहेंगे कि वह मरमरा जाए तो अच्छा है.’ प्रशांत की बात उन्हें कड़वी लगी, तथापि संयत रहे.

‘जबान को लगाम दीजिए, जीजाजी,’ रवि उखड़ा.

‘सत्य बात हमेशा कड़वी लगती है.’

‘तब आप ने उस सच को उजागर क्यों नहीं किया?’

‘कौन सा सच?’

‘आप के फिट आने का,’ रवि बोला.

‘फिट कोई लाइलाज बीमारी नहीं. मुख्य बात यह है कि मुझे बीमारी से कोई शिकायत नहीं. मैं अपने पैरों पर खड़ा हूं. बिना मदद के अपने औफिस जाता हूं. अच्छीखासी तनख्वाह पाता हूं. अपने परिवार का भरणपोषण करने में सक्षम हूं और क्या चाहिए एक पुरुष से?’

‘मेरी बहन हमेशा आप की बीमारी को ले कर चिंतित रहती थी. इसी ने उस की जान ली,’ रवि बोला.

‘और शादी के 16 साल बाप न बनने की जो चिंता मुझे हुई, क्या उस चिंता ने मुझे चैन से जीने दिया? आप के पिता ने एक पुत्र के लिए 5 बेटियां जनीं. मुझे तो सिर्फ 1 पुत्री की आस थी. वह भी जयश्री के बीमारी के चलते पूरी न हो सकी. हार कर मुझे टैस्टट्यूब बेबी का सहारा लेना पड़ा,’ प्रशांत भावुक हो उठा.

‘जैसे भी हो, आप बाप बन गए न,’ रवि बोला.

‘‘इस बच्चे के बारे में क्या सोचा है?’’ रामानंद का स्वर सुन कर प्रशांत अपनी सोच से बाहर आ गया, ‘‘सोचना क्या है, बच्चा मेरे पास रहेगा.’’

कुछ सोच कर रामानंद बोले, ‘ठीक है. तुम्हारे पास ही रहेगा लेकिन इस शर्त पर कि बीचबीच में मैं इसे देखने आता रहूंगा. फोन से भी इस की खबर लेता रहूंगा. अगर इस की परवरिश में लापरवाही हुई तो बच्चा तुम्हें देना पड़ेगा,’ वे अपनी बात पर थोड़ा जोर दे कर बोले. प्रशांत को यह नागवार लगा. उस रोज सब चले गए. तेरहवीं के रोज जब आए तो वही बात दोहराई, ‘‘बच्चा मुझे दे दो. तुम्हारे वश में संभालना संभव नहीं,’’ प्रशांत की सास बोलीं.

‘‘मम्मीजी, आप बारबार बच्चा लेने की बात क्यों करती हैं. बच्चा मेरा है, मैं उस की बेहतर परवरिश कर सकता हूं.’’

‘‘किस के भरोसे?’’

‘‘अभी तो आशा दीदी हैं, बाद का बाद में देखा जाएगा.’’

‘‘आशा दीदी क्या पालेंगी? बांझ को बच्चा पालने का क्या अनुभव?’’ प्रशांत की सास मुंह बना कर बोलीं.

प्रशांत चाहता तो उन्हें धक्के मार कर निकाल सकता था पर चुप रहा. अब हर दूसरे दिन कभी रवि तो कभी रामानंद का फोन बच्चे के हालचाल के लिए आता. फोन पर अकसर वे बच्चे की आड़ में अनापशनाप बकते. मसलन, ‘कहां थी अब तक, कब से फोन लगा रहा हूं. बच्चा नहीं संभलता तो हमें दे दीजिए,’ रवि तीखे स्वर में आशा से कहता. आशा लाख कहती कि उस ने फोन उठाने में देरी नहीं की, फिर भी रवि उसे अनापशनाप बोलता रहता. उस की हरकतों से आजिज आ कर प्रशांत ने वकील से सलाह ली.

‘‘देखिए, जब तक आप की शादी नहीं हो जाती तब तक बच्चे पर हक नानानानी का ही बनता है. आप के मांबाप हैं नहीं,’’ वकील ने कानूनी पक्ष सामने रखा.

‘‘तो क्या किया जाए?’’

‘‘अतिशीघ्र शादी. तब तक उन से कोई बैर मोल मत लीजिए. जितनी सहूलियत से बोलबतिया सकते हैं बतियाइए वरना…’’

‘‘वरना क्या?’’

‘‘कानूनन वे कुछ भी कर सकते हैं. यहां तक कि बच्चा भी ले सकते हैं. जब तक कि आप शादी नहीं कर लेते हैं.’’

प्रशांत को सारा माजरा अब समझ में आया कि वे लोग क्यों इतने ताव से बातें करते हैं. जयश्री के मरने के 1 महीने के अंदर ही जब उन सब ने बच्चा उठाने की नीयत से उस के घर पर धावा बोला था तब भी इसी कानून का सुरक्षा कवच उन के पास था. वह तो महल्ले वालों के भय से वे अपने मिशन में कामयाब न हो सके वरना…

उस रोज के एक हफ्ते बाद सबकुछ शांत था. प्रशांत के लिए जोरशोर से लड़की देखी जाने लगी. विवाह की बात थी. हड़बड़ी दिखाना, वह भी 6 महीने के 1 बच्चे की परवरिश के लिए किसी को भी ब्याह कर के लाना उचित न था. प्रशांत खूब सोचसमझ कर किसी लड़की से शादी करना चाहता था ताकि बच्चे को ले कर कोई टकराव की स्थिति न बने. इधर, रामानंद ने जो सोचा था वह न हो पाने के कारण बेचैन वे थे.

वे चाहते थे कि किसी तरह बच्चा उन के पास आ जाए ताकि प्रशांत को वे उंगलियों पर नचा सकें. उंगलियों पर नचाने का भी उन का अपना मकसद था. जब तक जयश्री जिंदा थी, अपनी कमाई का ज्यादातर हिस्सा मायके पर खर्च करती थी. अब एकाएक वह चली गई तो वह स्रोत बंद हो गया. लालची किस्म के रामानंद को यह बात सीने पर नश्तर की तरह चुभती. वे बच्चे के बहाने प्रशांत से और भी कुछ ऐंठना चाहते थे, जैसे पीएफ व बीमे के रुपए जिन्हें वे अपनी बेटी का मानते थे.

प्रशांत उन की बदनीयती से कुछकुछ वाकिफ हो चुका था. जयश्री के मरने के बाद जब प्रशांत उस के औफिस बकाया पीएफ व बीमे के लिए गया तो पता चला कि 2 लाख रुपए का उस पर कर्जा है जो उस के वेतन से कटता है.

अब सरकार तो छोड़ेगी नहीं, जो भी फंड जयश्री के नाम होगा उसी से भरपाई करेगी. उसी समय प्रशांत को भान हो गया था कि जयश्री के मांबाप किस प्रवृत्ति के हैं व उस से क्या चाहते हैं. बच्चे से प्रेम महज बहाना था. जिसे अपनी बेटी से प्रेम नहीं वह भला अपनी बेटी के पुत्र से स्नेह क्यों रखने लगा?

एक रोज रवि सपत्नी आया, ‘‘पापा ने राजन को देखने के लिए लखनऊ बुलाया है.’’

‘‘इतने छोटे से बच्चे को कौन ले जाएगा? वे खुद नहीं आ सकते?’’ प्रशांत बोला.

‘‘वे बीमार हैं,’’ रवि का जवाब था.

‘‘ठीक हो जाएं तब आ कर देख जाएं.’’

‘‘नहीं, उन्होंने अभी देखने की इच्छा जाहिर की है.’’

‘‘यह कैसे संभव है?’’ प्रशांत लाचार स्वर में बोला.

‘‘मैं ले जाऊंगा,’’ रवि का यह कथन प्रशांत को अच्छा न लगा.

‘‘यह असंभव है.’’

‘‘कुछ भी असंभव नहीं. आप राजन को मुझे दे दीजिए. मैं सकुशल उसे पापा से मिलवा कर आप के पास पहुंचा दूंगा.’’

प्रशांत कुछ देर शांत था. फिर एकाएक उबल पड़ा, ‘‘आप लोग झूठ बोल रहे हैं. किसी को राजन से प्रेम नहीं है. साफसाफ बताइए, आप लोग चाहते क्या हैं?’’

रवि के चेहरे पर एक कुटिल मुसकान तैर गई. वह धीरे से बोला, ‘‘दीदी के पीएफ और बीमे के रुपए.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि वे मेरी बहन की कमाई के थे.’’

‘‘वह मेरी कुछ नहीं थी?’’

‘‘तो ठीक है, राजन को हमें दे दीजिए.’’

प्रशांत की आंखें भर आईं. ‘‘क्या रुपयापैसा खून के रिश्ते से ज्यादा अहमियत रखने लगे हैं? क्या रिश्तेनाते, संस्कार गौण हो गए हैं?’’ किसी तरह उस ने अपने जज्बातों पर नियंत्रण रखा. 5 लाख रुपए बीमे की रकम व 3 लाख रुपए का पीएफ. यही कुल जमापूंजी जयश्री की थी. गनीमत थी कि रामानंद ने नवनिर्मित मकान में हिस्सेदारी का सवाल नहीं खड़ा किया.

‘‘2 लाख रुपए उस ने लोन लिए थे,’’ प्रशांत ने कहा.

‘‘लोन?’’ रवि चिहुंका.

‘‘चिहुंकने की कोई जरूरत नहीं. आप अच्छी तरह जानते हैं कि वे लोन के रुपए किस के काम आए,’’ प्रशांत के कथन पर वह बगलें झांकने लगा, फिर बोला, ‘‘गहने?’’

‘‘वे सब आप के पास हैं.’’

‘‘फिर भी कुछ तो होंगे ही?’’

प्रशांत ने जयश्री के कान के टौप्स, चूड़ी, एक सिकड़ी ला कर दे दी जो जयश्री के बदन पर मरते समय थे. 8 लाख रुपए का चैक काट कर प्रशांत ने अपने बेटे का सौदा कर लिया. उस रोज के बाद रामानंद ने भूले से भी कभी अपने नाती राजन का हाल नहीं लिया. Family Story In Hindi 

Family Story : मृत सविता की हमशक्‍ल कौन थी

Family Story :  बाजार के बीचोबीच स्थित रामलीला मैदान में दोस्तों के साथ रामलीला देख रहे दिनेश पटेल ने कहा, ‘‘भाइयो, मैं तो अब जा रहा हूं. मैं ट्यूबवेल चला कर आया हूं. मेरा खेत भर गया होगा. इसलिए ट्यूबवेल बंद करना होगा, वरना बगल वाले खेत में पानी चला गया तो काफी नुकसान हो जाएगा.’’

‘‘थोड़ी देर और रुक न यार, रामलीला खत्म होने वाली है. हम सब साथ चलेंगे. तुम्हें तुम्हारे खेतों पर छोड़ कर हम सब गांव चले जाएंगे.’’ दिनेश के बगल में बैठे उस के दोस्त कान्हा ने उसे रोकने के लिए कहा, ‘‘अब थोड़ी ही रामलीला बाकी है. पूरी हो जाने दो.’’

दिनेश गुजरात के बड़ौदा शहर से करीब 15-16 किलोमीटर दूर स्थित मंजूसर कस्बे में रहता था. मंजूसर कभी शामली तहसील जाने वाली सड़क किनारे बसा एक गांव था. लेकिन जब गुजरात सरकार ने यहां जीआईडीसी (गुजरात इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन) बना दिया तो यहां छोटीबड़ी तमाम इंडस्ट्रीज लग गईं, जिस की वजह से मंजूसर गांव एक कस्बा बन गया.

दिनेश की जमीन सड़क से दूर थी, जिस पर वह खेती करता था. सिंचाई के लिए उस ने अपना ट्यूबवेल भी लगवा रखा था. बगल वाले खेत में पानी चला जाता तो उस का काफी नुकसान हो जाता, इसलिए वह कान्हा के रोकने पर भी वह नहीं रुका. एक हाथ में टौर्च और दूसरे हाथ में डंडा ले कर वह रामलीला से खेतों की ओर चल पड़ा.

उस समय रात के लगभग डेढ़ बज रहे थे. जिस रास्ते से वह जा रहा था, उस के दोनों ओर ऊंचेऊंचे सरपत खड़े थे, जिन में झींगुर अपनी पूरी ताकत से अपना राग अलाप रहे थे. कोई अगर पीछे से सिर में टपली मार कर चला जाए, तब भी पहचान में न आए उस समय इस तरह का अंधेरा था. उस सुनसान रास्ते पर दिनेश अपनी धुन में चला जा रहा था.

मुख्य रास्ते से जैसे ही वह अपने खेत के रास्ते की ओर मुड़ा, अंधेरे में भी उसे कुछ ऐसा दिखाई दिया, जिसे देख कर वह चौंक उठा. दिनेश को लगा कि रास्ते में कोई जानवर लेटा है. उस ने हाथ में ली लकड़ी को मजबूती से पकड़ कर दूसरे हाथ में ली टौर्च जलाई तो उस ने जो दृश्य देखा, उस के छक्के छूट गए.

उसे देखते ही वह वापस रामलीला मैदान की ओर भागा. जितने समय में वह खेत के रास्ते तक पहुंचा था, उस के एक चौथाई समय में ही वह रामलीला देख रहे दोस्तों के पास पहुंच गया था. लेकिन तब तक रामलीला खत्म हो चुकी थी. पर अभी उस के दोस्त कान्हा, करसन, रफीक और महबूब रामलीला मैदान में ही बैठे थे.

दिनेश को इस तरह भाग कर आते देख कर सभी हैरानी से उठ खड़े हुए. कान्हा ने पूछा, ‘‘क्या हुआ दिनेश, तू इतनी जल्दी क्यों वापस आ गया? तू तो बहुत डरा हुआ लग रहा है?’’

‘‘डरने की ही बात है,’’ डरे हुए दिनेश ने हांफते हुए कहा,‘‘जल्दी चलो, मेरे खेत वाले रास्ते में एक औरत की लाश पड़ी है. मैं ने अपनी आंखों से देखी है, उस के आसपास सियार घूम रहे हैं.’’

‘‘तेरा दिमाग तो ठीक है, तू ये क्या बक रहा है? किस की लाश हो सकती है?’’ करसन ने हैरानी जताते हुए कहा.

‘‘करसन भाई, मुझे क्या पता वह किस की लाश है,’’ हांफते हुए दिनेश ने कहा.

कान्हा ने जल्दी से अपनी बुलेट स्टार्ट की तो अन्य दोस्तों ने भी अपनीअपनी बाइकें स्टार्ट कर लीं. दिनेश कान्हा के पीछे उस की बुलेट पर बैठ गया तो सभी दिनेश के खेत की ओर चल पड़े. दिनेश के खेत के रास्ते पर जहां लाश पड़ी थी, वहां पहुंचते ही दिनेश ने चिल्ला कर बुलेट रुकवाते हुए कहा, ‘‘रुकोरुको यहीं वह लाश पड़ी है.’’

सभी ने अपनीअपनी मोटरसाइकिलें  मुख्य रास्ते पर खड़ी कर दीं और उस ओर चल पड़े, जहां दिनेश ने लाश पड़ी होने की बात कही थी. जहां लाश पड़ी थी, वहां पहुंच कर दिनेश ने टौर्च जलाई तो वहां लाश नहीं थी. लाश गायब थी. लाश न देख कर दिनेश हतप्रभ रह गया. हैरान होते हुए उस ने कहा, ‘‘अरे यहीं तो लाश पड़ी थी. इतनी देर में कहां चली गई?’’

‘‘अरे यार दिनेश, मैं तो तुम्हें बहुत बहादुर समझता था, पर तुम तो बहुत डरपोक निकले. पता नहीं क्या देख लिया कि तुम्हें लगा लाश पड़ी है. लगता है, जागते में सपना देखा है. यहां कहां है लाश?’’ कान्हा ने कहा.

कान्हा की बात खत्म होते ही करसन ने कहा, ‘‘भले आदमी तुम्हें वहम हुआ है. यहां कहां है लाश? लाश होती तो इतनी देर में कहां चली जाती. सियार तो उठा कर ले नहीं जा सकता. घसीटने का भी यहां कोई निशान नहीं है.’’

दिनेश सोचने लगा कि कुछ तो गड़बड़ हुई है. पर अब उस के पास ऐसा कोई सबूत नहीं है था कि वह दोस्तों को विश्वास दिला देता कि उस ने जो देखा था, वह सच था.

दिनेश यही सब सोच रहा था कि कान्हा ने बुलेट स्टार्ट की तो दिनेश उस के पीछे बैठ गया. बाकी सब ने भी अपनीअपनी बाइकें स्टार्ट कर लीं. सब के सब दिनेश के खेत पर जा पहुंचे. थोड़ी देर बातचीत कर के सभी अपनेअपने घर चले गए.

दिनेश ट्यूबवेल पर पड़ी चारपाई पर लेट गया. रात का चौथा पहर हो चुका था. दिनेश की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. बारबार उस की आंखों के सामने उस लाश का दृश्य आजा रहा था. इस बीच कब दिनेश की आंख लग गई, उसे पता नहीं चला.

सुबह 10 बजे मंजूसर बसअड्डे पर स्थित केतन की चाय की दुकान पर कान्हा, करसन, महबूब और अन्य दोस्त इकट्ठा हुए तो रात की बात याद कर के सब दिनेश की हंसी उड़ाने लगे. उसी बीच रफीक ने आ कर कहा, ‘‘अरे यार कान्हा, अर्जुन काका के यहां क्या हुआ है, जो तमाम लोग इकट्ठा हैं?’’

कान्हा अर्जुन के घर की ओर चला तो बाकी के दोस्त भी उस के पीछेपीछे चल पड़े. कुछ देर में यह टोली अर्जुन के घर पहुंच गई. गांव के तमाम लोग अर्जुन के घर के सामने इकट्ठा थे.

उन के बीच अर्जुन मुंह लटकाए सिर पर हाथ रखे बैठा था. पहुंचते ही कान्हा ने सीधे पूछा, ‘‘क्या हुआ अर्जुन काका? इस तरह मुंह लटका कर क्यों बैठे हो?’’

‘‘अरे, हमारे मोहन की बहू रात को रामलीला देखने गई थी. अभी तक लौट कर नहीं आई है. उस का मोबाइल भी बंद आ रहा है,’’ अर्जुन ने बताया.

कान्हा सोच में पड़ गया. उसे तुरंत पिछली रात की बात याद आ गई. उस के मन में सीधा सवाल उठा कि कहीं दिनेश की बात सच तो नहीं थी?

थोड़ी ही देर में यह खबर एकदूसरे के मुंह से होते हुए पूरे कस्बे में फैल गई.

अर्जुन से मामला जान कर कान्हा अपने दोस्तों के साथ सीधे दिनेश के खेत पर पहुंचा. दिनेश अभी भी खेत पर ही था. उस के पास पहुंच कर कान्हा ने कहा, ‘‘यार दिनेश, रात वाली बात पर अब मुझे विश्वास हो रहा है. तू जो कह रहा था, लगता है वह सच था.’’

‘‘मुझे लगता है, रात को किसी ने अर्जुन काका की विधवा बहू सविता की इज्जत लूट कर उसे मार डाला है.’’ अंदाजा लगाते हुए कान्हा के साथ आए करसन ने कहा, ‘‘एक काम करते हैं, चलो यह बात अर्जुन काका को बताते हैं.’’

दिनेश पटेल ने करसन की हां में हां मिलाई तो कान्हा ने उन सब को चेताते हुए कहा, ‘‘भई देख लेना दिनेश, कहीं यह बवाल अपने माथे ही न पड़ जाए. अर्जुन काका बहुत काईयां आदमी है. बिना कुछ समझेबूझे हम लोगों के सिर ही न आरोप मढ़ दे.’’

‘‘नहीं यार कान्हा, हम लोगों के अलावा और कोई यह बात जानता भी तो नहीं है. इसलिए यह बात हमें अर्जुन काका को जरूर बतानी चाहिए.’’ दिनेश ने दृढ़ता के साथ अपना निर्णय दोस्तों को सुना दिया.

वहां से सभी सीधे अर्जुन के घर पहुंचे. उस समय अर्जुन घर में अकेला ही था. तभी दिनेश ने रामलीला देख कर लौटते समय अपने खेत वाले रास्ते में जो लाश देखी थी, पूरी बात अर्जुन को बता दी. दिनेश की बात सुन कर अर्जुन के तो जैसे होश ही उड़ गए. उस का शरीर ढीला पड़ गया. उस के चेहरे पर चिंता की रेखाएं साफ दिखाई देने लगीं.

अर्जुन को इस तरह परेशान देख कर उसे आश्वस्त कर के सलाह देते हुए दिनेश ने कहा, ‘‘काका मेरी मानो तो अभी भादरवा थाने जा कर रात की पूरी बात बता कर सविता के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज करा दो.’’

दिनेश और उस के दोस्तों के सामने ही अर्जुन ने तुरंत कपड़े बदले और गांव के प्रधान को साथ ले कर सीधे थाना भादरवा पहुंच गया. थानाप्रभारी भोपाल सिंह जडेजा को पूरी बात बता कर उस ने अपनी बहू सविता के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद जब थानाप्रभारी ने उस से पूछा कि उसे किसी पर शक है तो उस ने कहा, ‘‘जी साहब…’’

‘‘किस पर शक है?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘मुझे अपने ही गांव के दिनेश पटेल पर शक है.’’ अर्जुन ने पूरे आत्मविश्वास के साथ दिनेश का नाम ले लिया था.

अर्जुन के मुंह से दिनेश का नाम सुन कर उस के साथ आया ग्रामप्रधान अवाक रह गया. पर वह कुछ बोल नहीं सका. क्योंकि वह जानता था कि इस समय थानाप्रभारी के सामने उस का कुछ बोलना ठीक भी नहीं है.

थाने के बाहर आते ही ग्रामप्रधान ने दिनेश का बचाव करते हुए कहा, ‘‘क्यों अर्जुन, तुम ने दिनेश का नाम क्यों लिया? वह लड़का तो इस तरह का नहीं है.’’

‘‘नहीं… नहीं प्रधानजी, मैं पागल थोड़े ही हूं जो किसी को गलत फंसा दूंगा. मोहन के मरने के बाद सविता जब से विधवा हुई है, जब देखो तब दिनेश उस से मिलने आता रहता था, उस के हिस्से की खेतों को जोतवाता था, कहीं बाहर जाना होता तो उसे साथ ले कर जाता था. पर बहू बेचारी भोलीभाली थी, आखिर उस के जाल में फंस ही गई. दिनेश ने उस के साथ मनमानी कर के कांटा निकाल फेंका. अब वह लाश देखने का नाटक कर रहा है.’’ अर्जुन ने दिनेश पर गंभीर आरोप लगाते हुए ग्रामप्रधान से कहा.

रात 9 बजे पुलिस दिनेश के घर पहुंची. पुलिस जीप के रुकते ही आसपास के लोग उत्सुकता से देखने लगे. एक पुलिस वाले ने जीप से उतर कर दिनेश को दरवाजे के बाहर से आवाज लगाई, ‘‘दिनेश… ओ दिनेश.’’

पुलिस वाले की आवाज सुन कर दिनेश बाहर आया. पुलिस वाले को देख कर बोला, ‘‘क्या बात है साहब?’’

‘‘चलो, जीप में बैठो.’’ पुलिस वाले ने रौब से कहा.

डरासहमा दिनेश चुपचाप जीप में बैठ गया. जीप वापस थाने के लिए चल पड़ी. थोड़ी ही देर में यह खबर पूरे गांव में फैल गई कि दिनेश को पुलिस थाने ले गई है.

मोहन और दिनेश पक्के दोस्त थे. एकदूसरे के बिना घड़ी भर नहीं रह सकते थे. मोहन की शादी को साल भर ही हुआ था कि एक दिन वह खेत में घास काट रहा था, तभी उसे जहरीले सांप ने काट लिया. तमाम कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका.

एक अच्छा दोस्त होने की वजह से मोहन के मरने के बाद दिनेश उस की पत्नी सविता की घर या खेतों के काम में मदद करने लगा.

दिनेश अकेला ही था. उस की पत्नी किसी बात से नाराज हो कर उसे पहले ही छोड़ कर मायके चली गई थी. सविता और दिनेश की निकटता देख कर गांव वाले तरहतरह की बातें करते थे.

सविता के ससुर अर्जुन को दिनेश का सविता के पास आनाजाना जरा भी पसंद नहीं था. इसलिए गांव वालों को यह मानने में जरा भी देर नहीं लगी थी कि सविता की हत्या के पीछे दिनेश का हाथ हो सकता है. इसलिए अर्जुन ने दिनेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा कर उसे गिरफ्तार करा दिया था.

थाने ला कर दिनेश से पूछताछ शुरू हुई. थानाप्रभारी भोपाल सिंह ने उसे अपने पैरों के पास बैठा कर हाथ में बेंत ले कर पूछा, ‘‘तू ने उस औरत की हत्या क्यों की, उस की लाश कहां छिपाई?’’

‘‘साहब, आप चाहे जिस की कसम खिला लीजिए, मैं इस बारे में कुछ नहीं जानता.’’

‘‘तू  इस तरह नहीं मानेगा. अभी चार डंडे पिछवाड़े पर पड़ेंगे तो सब कुछ बक देगा.’’ थानाप्रभारी ने हाथ में लिया डंडा उस की आंखों के सामने घुमाते हुए कहा.

‘‘तेरे कहने का मतलब यह है कि तू ने सविता की लाश देखी नहीं है?’’

‘‘साहब, ऐसा मैं ने कब कहा है. पर रात को मैं ने जो लाश देखी थी, वह किस की थी, मुझे पता नहीं. मैं निर्दोष हूं साहब,’’ रुआंसे हो कर दिनेश ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा.

अगले दिन थाना भादरवा पुलिस ने दिनेश को अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 8 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. दिनेश ने जहां लाश देखी थी, पुलिस दिनेश को ले जा कर लगातार 3 दिनों तक लाश ढूंढती रही. पुलिस ने आसपास का एकएक कोना छान मारा, पर लाश का कुछ पता नहीं चला.

चौथे दिन बगल के गांव मालपुर के प्रधान ने थाना भादरवा पुलिस को फोन कर के सूचना दी कि गांव के बाहर स्थित एक कुएं में किसी औरत की लाश पड़ी है. पुलिस तुरंत उस कुएं पर पहुंची और गांव वालों की मदद से लाश बाहर निकलवाई. लाश अब तक काफी हद तक सड़ चुकी थी. उस से बहुत तेज दुर्गंध आ रही थी.

लाश का सिर इस तरह कुचल दिया गया था कि उस की शिनाख्त नहीं की जा सकती थी. चूंकि 4 दिन पहले ही सविता के गायब होने की  रिपोर्ट दर्ज हुई थी, इसलिए पुलिस को पूरा विश्वास था कि यह लाश उसी की होगी. इसलिए पुलिस ने लाश की शिनाख्त के लिए अर्जुन को बुलवा लिया.

लाश देखते ही अर्जुन सिसकसिसक कर रोने लगा. रोते हुए वह कह रहा था, ‘‘बहू, तुम ने भी मोहन की राह पकड़ ली. मुझे अकेला छोड़ कर चली गई. अब इस दुनिया में मेरा कोई नहीं रहा.’’

थानाप्रभारी ने जोर से रो रहे अर्जुन को सांत्वना दी, ‘‘काका धीरज रखो, अपराधी हमारे कब्जे में है. हम आप को न्याय दिला कर रहेंगे.’’

‘‘साहब, उस राक्षस को छोड़ना मत. उस ने मेरे बुढ़ापे का सहारा छीन लिया.’’ रोते हुए अर्जुन ने कहा.

गांव वाले अर्जुन को संभाल कर वापस ले आए. 8 दिनों का रिमांड समाप्त होने पर पुलिस ने दिनेश को दोबारा कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. दिनेश ने सविता के साथ दुष्कर्म करने और उस की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया था.

उस के दोस्तों ने उस की जमानत के लिए काफी प्रयास किया, पर उस पर दुष्कर्म के साथसाथ हत्या का भी आरोप था, इसलिए निचली अदालत से उस की जमानत नहीं हो सकी.

यह मामला काफी उछला था, इसलिए सरकार ने इस मामले की सुनवाई लगातार करने के आदेश दे दिए थे. लगातार सुनवाई होने की वजह से 3 महीने में ही दिनेश को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई थी.

दिनेश के अपराध स्वीकार करने के बाद उस की गांव में थूथू हो रही थी. लोगों का कहना था कि देखने में वह कितना भोला और भला आदमी लगता था. पर निकला कितना नालायक.

भाई जैसे दोस्त की पत्नी की इज्जत लूट कर उसे मौत के घाट उतार दिया. उस की पत्नी को लगता है पहले ही पता चल गया था कि यह आदमी ठीक नहीं है, इसीलिए वह छोड़ कर चली गई.

गांव में लगभग रोज ही इस बात की चर्चा होती थी. पर कान्हा, करसन और उस के अन्य दोस्तों के गले यह बात नहीं उतर रही थी. पर दिनेश ने थाने में ही नहीं, अदालत में भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया था, इसलिए कान्हा के मन में थोड़ा शक जरूर हो रहा था.

सजा सुनाए जाने के बाद दिनेश को अहमदाबाद की साबरमती जेल भेज दिया गया था. एक दिन केतन की दुकान पर चाय पीते हुए करसन ने अपने दिल की कही, ‘‘यार कान्हा, एक बार हमें अहमदाबाद चल कर दिनेश से मिलना चाहिए. मेरी आत्मा कहती है कि दिनेश इस तरह का घटिया काम नहीं कर सकता.’’

‘‘छोड़ न यार करसन, उस की कोई बात मुझ से मत कर. अब मैं उस कलमुंहे का मुंह भी नहीं देखना चाहता. अब तो उसे दोस्त कहने में भी शरम आती है.’’ कान्हा ने दुखी मन से कहा.

‘‘ऐसा मत कह यार कान्हा. बुरा ही सही, पर दिनेश हमारा बहुत अच्छा दोस्त है. दोस्ती की खातिर बस एक बार चल कर मिल लेते हैं. फिर दोबारा उस से मिलने के लिए कभी नहीं कहूंगा. एक बार मिलने से मेरी आत्मा को थोड़ा संतोष मिल जाएगा.’’ करसन ने कान्हा से दिनेश से मिलने की सिफारिश करते हुए कहा.

‘‘तू इतना कह रहा है तो चलो एक बार मिल आते हैं. पर इस मिलने से कोई फायदा नहीं है. ऐसे आदमी से क्या मिलना, जो इस तरह का घिनौना काम करे. मेरे खयाल से उस से मिल कर तकलीफ ही होगी.’’ कान्हा ने कहा.

‘‘कुछ भी हो, मैं एक बार उस से मिलना चाहता हूं.’’ करसन ने कहा.

अगले दिन दोनों दोस्त दिनेश से मिलने के लिए अहमदाबाद जा पहुंचे. जेल में मिलने की जो प्रकिया होती है, उसे पूरी कर दोनों दिनेश से मिलने जेल के अंदर पहुंचे.

अपने जिगरी दोस्त की हालत देख कर कान्हा और करसन की आंखों में आंसू आ गए. दाहिने हाथ की हथेली से आंसू साफ करते हुए भर्राई आवाज में कान्हा ने कहा, ‘‘यह सब क्या है दिनेश?’’

‘‘भाई कान्हा, मैं एकदम निर्दोष हूं. मैं ने कुछ नहीं किया. मैं कसम खा कर कह रहा हूं कि इस बारे में मैं कुछ नहीं जानता.’’ यह कहतेकहते दिनेश फफक कर रो पड़ा.

 

‘‘जब तू ने कुछ किया ही नहीं था तो फिर थाने और अदालत में यह क्यों कहा कि सविता के साथ तू ने ही दुष्कर्म कर के उस की हत्या की है?’’ कान्हा ने प्रश्न किया.

‘‘पुलिस ने मुझे मारमार कर कहलवाया है कि मैं ने यह अपराध किया है. थानाप्रभारी ने कहा कि अगर मैं ने उस की बात नहीं मानी तो वह मेरे सारे दोस्तों को पकड़ कर जेल भिजवा देगा. मजबूरन मुझे वह सब कहना पड़ा, जो पुलिस ने कहा. क्योंकि मैं तो फंसा ही था. मै नहीं चाहता था कि मेरे दोस्त भी फंसें. तुम्हीं बताओ कि ऐसे में मैं क्या करता. पुलिस की बात मानने के अलावा मेरे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था.’’

दिनेश कुछ और कहता, जेल के सिपाही ने आ कर कहा, ‘‘चलिए भाई, आप लोगों का मिलने का समय खत्म हो चुका है.’’

‘‘दोस्त, तू धीरज रख, अगर तू ने यह अपराध नहीं किया है तो मैं असलियत का पता लगा कर रहूंगा.’’ चलतेचलते कान्हा ने कहा.

दिनेश दोनों मित्रों को तब तक ताकता रहा, जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए. गांव में दिनेश के निर्दोष होने की बात करने का अब कोई फायदा नहीं था.

इसलिए दोनों दोस्त दिनेश के निर्दोष होने के सबूत बड़ी ही गोपनीयता से खोजने शुरू कर दिए. पर कोई कड़ी हाथ नहीं लग रही थी. इसी तरह धीरेधीरे 7 महीने का समय बीत गया.

दूसरी ओर अर्जुन ने बेटे और पुत्रवधू की मौत के बाद गांव वालों से कहा था कि अब उस का गांव में है ही कौन, इसलिए वह  दुकानें, मकान और जमीन बेच कर हरिद्वार जा कर किसी आश्रम को सारा पैसा दान कर देगा और वहीं जब तक जीवित रहेगा, भगवान के भजन करेगा.

गांव में ऐसे तमाम लोग थे, जो इस तरह के मौके की तलाश में रहते थे. इसलिए अर्जुन की दुकानें, मकान और जमीनें अच्छे दामों में बिक गईं. करोड़ों रुपए बैंक में जमा कर अर्जुन एक दिन हरिद्वार जाने की बात कह कर हमेशा के लिए गांव छोड़ कर चला गया.

बहुत हाथपैर मारने के बाद भी कान्हा और करसन अपने दोस्त दिनेश को निर्दोष साबित करने का सबूत नहीं खोज सके. धीरेधीरे पूरा एक साल बीत गया.

बरसात खत्म होते ही खेती के सारे काम निपटा कर करसन के बड़े भाई रामजी अपने 2 दोस्तों के साथ मोटरसाइकिलों से द्वारकाजी के दर्शन के लिए निकले. रात होने तक ये सभी खंभाडि़या पहुंचे.

आराम करने के लिए ये लोग एक गांव के पंचायत घर में रुके. गांव वालों ने पंचायत घर में एक कमरा अतिथियों के लिए बनवा रखा था. क्योंकि द्वारकाजी जाने वाले तीर्थयात्री अकसर उस गांव में रात में आराम करने के लिए ठहरते थे.

रामजी भी दोस्तों के साथ पंचायत घर के उसी कमरे में ठहरा था. अगले दिन सुबह उठ कर हलके उजाले में रामजी पंचायत घर के बरामदे में बैठे कुल्लादातून कर रहे थे, तभी अचानक उन की नजर सिर पर पानी का घड़ा रख कर ले जाती एक औरत पर पड़ी.

उन के मन में तुरंत एक सवाल उठा, ‘लगता है इस औरत को पहले कहीं देखा है.’ उन्होंने उसे दोबारा देखने के लिए नजर उठाई तो वह दूर निकल गई थी. अभी वह फिर पानी भरने आएगी तो उसे पहचान लूंगा, यह सोच कर रामजी वहीं बैठे रहे.

थोड़ी देर बाद वह औरत घड़ा ले कर फिर पानी के लिए आई तो रामजी ने उसे पहचान लिया. उसे पहचान कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

उन्होंने खुद से ही कहा, ‘अरे, यह तो मोहन की पत्नी सविता है. पर सविता यहां कहां से आएगी? वह तो मर चुकी है. दिनेश ने उस की हत्या की बात खुद स्वीकार की है. उस की लाश भी बगल के गांव के कुएं से बरामद हुई थी.’ वह सोच में पड़ गया कि कहीं वह जागते में सपना तो नहीं देख रहा है. उस के मन में भूकंप सा आ गया. शंकाकुशंका के बादल उस के मन में घुमड़ने लगे.

द्वारिकाधीश के दर्शन कर के वह गांव लौटे तो उन्होंने यह बात अपने छोटे भाई करसन को बताई तो करसन ने अपने दोस्त कान्हा को. वे दोनों भी यह जान कर हैरान थे. अगर सविता जीवित है तो फिर वह लाश किस की थी? यह एक बड़ा सवाल उन दोनों के सामने आ खड़ा हुआ था.

करसन और कान्हा अगले ही दिन उस गांव पहुंच गए, जिस गांव में रामजी ने सविता को देखने की बात बताई थी. उस गांव में जा कर कान्हा और करसन ने सारी सच्चाई का पता लगा लिया. अर्जुन और सविता उस गांव में नाम बदल कर पतिपत्नी बन कर रह रहे थे.

अर्जुन ने पूरे गांव को बेवकूफ बना दिया था. सविता की हत्या का कौतुक रच कर दिनेश को तो फंसा ही दिया, साथ ही बड़ी होशियारी से पूरे गांव की सहानुभूति भी पा ली थी. बेटी समान पुत्रवधू से अवैध संबंध बना कर अधेड़ अर्जुन, सोच भी नहीं सकता था उस से भी अधिक होशियार निकला था.

करसन और कान्हा अगले दिन गांव लौट आए. गांव में किसी को कुछ बताए बगैर वे सीधे थाना भादरवा पहुंचे और नए आए थानाप्रभारी फौजदार सिंह से मिले. फौजदार सिंह ईमानदार और सख्त पुलिस अधिकारी थे. वह अपने कर्तव्य के प्रति काफी सजग माने जाते थे. शिकायतकर्ता की बात ध्यान से सुन कर अपराधी को कानून का भान कराना उन्हें अच्छी तरह आता था.

कान्हा और करसन ने जब सारी बात बता कर फौजदार सिंह को अर्जुन और सविता द्वारा किए गए कारनामे के बारे में बताया तो उन का कारनामा सुन कर फौजदार सिंह भी हैरान रह गए.

उन्होंने तुरंत दोनों से एक एप्लीकेशन ले कर अर्जुन और सविता के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया. उस के बाद अपनी एक टीम बना कर कान्हा तथा करसन को साथ ले कर अर्जुन और सविता की गिरफ्तारी के लिए चल पड़े.

खंभाडि़या पुलिस की मदद से थानाप्रभारी फौजदार सिंह ने गांव में छिप कर रह रहे अर्जुन और सविता को गिरफ्तार कर लिया. दोनों को गिरफ्तार कर थाना भादरवा लाया गया. थाने ला कर दोनों से पूछताछ की गई तो बिना किसी हीलाहवाली के दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

उस के बाद उन्होंने इस अपराध के पीछे की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर सभी दंग रह गए. अवैध संबंध की इस कहानी ने रिश्तों को तो कलंकित किया ही, एक निर्दोष और रिश्तों के प्रति समर्पित आदमी की जिंदगी भी बरबाद कर दी थी.

अर्जुन रबारी मंजूसर गांव का बहुत पुराना निवासी था. उस के पूर्वजों ने दूध बेच कर काफी पैसा कमाया था. अपनी कमाई का सही उपयोग करते हुए उन्होंने गांव में काफी जमीनें खरीद ली थीं. उस की कुछ जमीन जीआईडीसी में चली गई थी, जिस का उसे अच्छाखासा मुआवजा मिला था.

मुआवजे की रकम से अपनी सड़क के किनारे वाली जमीन पर उस ने दुकानें और कमरे बनवा कर किराए पर उठा दिए थे. इस तरह किराए के रूप में उसे एक मोटी रकम मिल रही थी. बाकी बची जमीन पर वह खेती करवा कर आराम की जिंदगी जी रहा था.

उस का एक ही बेटा था मोहन. अचानक 2 साल पहले उस की पत्नी की मौत हो गई तो बापबेटे ही बचे. गुजरात में जबारियों में देर से शादी करने का रिवाज है. पर अर्जुन के घर रोटी बनाने वाला कोई नहीं था, इसलिए पत्नी की मौत के बाद उस ने बेटे की शादी जल्दी ही कर डाली.

पुत्रवधू के आने से दोनों को दो जून की रोटी आराम से मिलने लगी. बापबेटे की जिंदगी आराम से कट रही थी. मोहन ने अपनी जिम्मेदारी संभाल ली थी. उस ने कई गाएं और भैंसें पाल रखी थीं, जिन का दूध बेच कर वह अच्छा पैसा कमा रहा था.

मकानों और दुकानों का किराया तो आता ही था, खेती से भी ठीकठाक आमदनी हो जाती थी. उस की पत्नी सविता भी उस के हर काम में उस के साथ रह कर उस की मदद करती थी.

मोहन का सब से अच्छा दोस्त था दिनेश. हालांकि दिनेश उस से 2-3 साल बड़ा था, पर दोनों में खूब पटती थी. उन की दोस्ती ऐसी थी कि ज्यादा देर तक दोनों एकदूसरे से अलग नहीं रह पाते थे. ज्यादा देर तक दोनों एकदूसरे के साथ रह सकें, इस के लिए दोनों ही खेती या घर के कामों में एकदूसरे की मदद भी करते या दोनों ही कोई भी काम एक साथ मिल कर करते.

इस से वे ज्यादा से ज्यादा देर साथ भी रह लेते और काम भी आसानी से निपट जाता. सिर्फ वे काम के ही साथी नहीं थे, दुखसुख में भी एकदूसरे का साथ देते थे.

दिनेश के पिता की बहुत पहले मौत हो गई थी. उस की शादी के साल भर बाद ही अचानक उस की मां की भी मौत हो गई थी. मां की मौत के बाद दिनेश और उस की पत्नी ही रह गए थे.

दिनेश यारों का यार था, इसलिए उस के मोहन के अलावा भी तमाम दोस्त थे. उन में कान्हा, करसन, रफीक और महबूब खास दोस्त थे. जबकि मोहन की दोस्ती सिर्फ दिनेश से ही थी. बाकी से उस की हायहैलो भले हो जाती थी, पर साथ उठनाबैठना कोई खास नहीं था.

सब कुछ बढि़या चल रहा था कि एक दिन अचानक मोहन को घास काटते समय जहरीले सांप ने काट लिया तो उस की मौत हो गई. मोहन की मौत के बाद सविता का तो संसार ही उजड़ गया था, अर्जुन का भी बुढ़ापे का सहारा छिन गया था.

मोहन की मौत का उतना ही दुख दिनेश को भी था, जितना सविता और अर्जुन को था. इसलिए उस की मौत के बाद भी दिनेश का मोहन के घर उसी तरह आनाजाना बना रहा.

पहले जिस तरह वह हर काम में मोहन की मदद करता था, उसी तरह उस की मौत के बाद सविता की मदद करता रहा. चूंकि अब सविता विधवा हो चुकी थी, दूसरे अभी वह एकदम जवान थी, इसलिए दिनेश का उस के घर आना, उस की मदद करना लोगों की आंखों में कांटे की तरह चुभ रहा था.

सविता के ससुर अर्जुन को भी यह जरा भी पसंद नहीं था. क्योंकि दिनेश की पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी. वह भी अकेला था.

सविता जवान भी थी और सुंदर भी. इसलिए गांव के हर लड़के की नजर उस पर थी. अर्जुन को पता था कि सविता अभी जवान है, इसलिए कभी भी उस का पैर फिसल सकता है.

दिनेश उस के साथ हमेशा लगा ही रहता था. हालांकि वह जानता था कि दिनेश इस तरह का आदमी नहीं है, पर किसी का क्या भरोसा कब मन बदल जाए. आग और फूस करीब रहेंगे तो कभी भी आग लग सकती है.

सविता अब करोड़ों की मालकिन थी. क्योंकि अर्जुन की सारी संपत्ति अब उसी की थी. अर्जुन नहीं चाहता था कि गांव का कोई शोहदा उस की पुत्रवधू से संबंध बना कर उस की दौलत पर उस की पुत्रवधू के साथ मौज करे. इस के लिए उस ने बिना किसी शरम संकोच के सीधे सविता से बात की.

अर्जुन ने स्पष्ट कहा कि अगर वह उस की बन कर रहेगी तो वह उसे रानी बना कर रखेगा. उस की सारी दौलत उसी की होगी.

दोनों को ही एकदूसरे की जरूरत थी. अर्जुन के पास देह के साथ दौलत भी थी, इसलिए सविता ने हामी भर दी थी. फिर क्या था, दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे. इस का परिणाम यह निकला कि सविता गर्भवती हो गई. यह एक तरह का पाप ही था, जो सविता की कोख में आ गया था.

अगर यह पाप उजागर होता तो अर्जुन गांव में ही नहीं, पूरी बिरादरी में मुंह दिखाने लायक न रहता. दोनों का जीना हराम हो जाता. इसलिए उन्होंने गांव छोड़ कर कहीं ऐसी जगह जा

कर रहने का निर्णय लिया, जहां उन्हें कोई न जानता हो.

इस के लिए उन्होंने ऐसी योजना बनाई, जिस में गांव का कोई आदमी उन पर शक न कर सके. कभी कोई उन की तलाश भी न करे.

इस के लिए सविता ने दशहरा के दिन जब गांव के लोग रामलीला मैदान में रामलीला देखने में मग्न थे, तभी सविता ने गांव में कई दिनों से घूम रही एक पागल औरत की रात में सोते समय लोहे के भारी सरिए से सिर पर कई वार कर के हत्या कर दी. चूंकि उन की योजना में दिनेश को फंसाना भी शामिल था. इसलिए लाश का चेहरा एक पत्थर से कुचल कर उसे दिनेश के खेत की ओर जाने वाले रास्ते पर फेंक दिया.

बगल के खेत में दोनों छिप कर दिनेश के आने का इंतजार करने लगे. उन्हें दिनेश की हर गतिविधि का पता था ही, इसलिए वे उसी हिसाब से अपना सारा काम कर रहे थे. आधी रात के बाद जब दिनेश आया तो लाश देख कर वह दोस्तों को बुलाने उल्टे पैर भागा.

उसी बीच सविता और अर्जुन ने लाश उठाई और बगल के गांव मालपुर ले जा कर गांव के बाहर स्थित कुएं में डाल दी. सविता वहां से सीधे बड़ौदा जा कर वहां एक धर्मशाला में ठहर गई. वह तब तक उस धर्मशाला में छिपी रही, जब तक अर्जुन ने उस के रहने की ठीक से व्यवस्था नहीं कर दी.

खंभाडि़या के उस गांव में अर्जुन ने जमीन खरीद कर मकान बनवाया और गुजरबसर के लिए किराने की दुकान खोल ली. समय पर सविता ने एक बेटी को जन्म दिया. पर वह बच नहीं सकी. अर्जुन के पास पैसा था ही, उस ने खेती की कुछ जमीन भी खरीद ली थी. दोनों आराम से रह रहे थे, पर उन का अपराध छिप नहीं सका और वे पकड़े गए. इस के बाद जो हुआ, आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं.

अपना कारनामा बताते हुए जहां सविता जोरजोर से रोने लगी थी, वहीं अर्जुन का सिर शरम और ग्लानि से झुक गया था. अर्जुन ने अपने अपराध को छिपाने का निशाना तो बहुत सही लगाया था, पर उस का निशाना चूक गया और वह जेल पहुंच गया.

पूछताछ के बाद थाना भादरवा पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश कर उन के बयान कराए, जिस से आजीवन कारावास की सजा काट रहे निर्दोष दिनेश को जेल से रिहा कराया जा सके. थानाप्रभारी फौजदार सिंह ने दिनेश के निर्दोष होने के सारे सबूत पेश कर उसे जेल से रिहा कराया.

दिनेश की रिहाई के कागज ले कर आए  कान्हा और करसन के साथ थानाप्रभारी फौजदार सिंह भी अहमदाबाद की साबरमती जेल के गेट पर खड़े थे. दिनेश जैसे ही जेल से बाहर आया, दौड़ कर दोस्तों के गले लग गया. फौजदार सिंह को वे तीनों उस समय त्रिदेव लग रहे थे.

(कहानी सत्य घटना पर आधारित है. कथा में पात्रों के नाम बदले हुए हैं) Family Story

Romantic Story In Hindi : एक बेवफा थी

Romantic Story In Hindi : श्रेया से गौतम की मुलाकात सब से पहले कालेज में हुई थी. जिस दिन वह कालेज में दाखिला लेने गया था, उसी दिन वह भी दाखिला लेने आई थी.

वह जितनी सुंदर थी उस से कहीं अधिक स्मार्ट थी. पहली नजर में ही गौतम ने उसे अपना दिल दे दिया था.

गौतम टौपर था. इस के अलावा क्रिकेट भी अच्छा खेलता था. बड़ेबड़े क्लबों के साथ खेल चुका था. उस के व्यक्तित्व से कालेज की कई लड़कियां प्रभावित थीं. कुछ ने तो खुल कर मोहब्बत का इजहार तक कर दिया था.

उस ने किसी का भी प्यार स्वीकार नहीं किया था. करता भी कैसे? श्रेया जो उस के दिल में बसी हुई थी.

श्रेया भी उस से प्रभावित थी. सो, उस ने बगैर देर किए उस से ‘आई लव यू’ कह दिया.

वह कोलकाता के नामजद अमीर परिवार से थी. उस के पिता और भाई राजनीति में थे. उन के कई बिजनैस थे. दौलत की कोई कमी न थी.

गौतम के पिता पंसारी की दुकान चलाते थे. संपत्ति के नाम पर सिर्फ दुकान थी. जिस मकान में रहते थे, वह किराए का था. उन की एक बेटी भी थी. वह गौतम से छोटी थी.

अपनी हैसियत जानते हुए भी गौतम, श्रेया के साथ उस के ही रुपए पर उड़ान भरने लगा था. उस से विवाह करने का ख्वाब देखने लगा था.

कालांतर में दोनों ने आधुनिक रीति से तनमन से प्रेम प्रदर्शन किया. सैरसपाटे, मूवी, होटल कुछ भी उन से नहीं छूटा. मर्यादा की सारी सीमा बेहिचक लांघ गए थे.

2 वर्ष बीत गए तो गौतम ने महसूस किया कि श्रेया उस से दूर होती जा रही है. वह कालेज के ही दूसरे लड़के के साथ घूमने लगी थी. उसे बात करने का भी मौका नहीं देती थी.

बड़ी मुश्किल से एक दिन मौका मिला तो उस से कहा, ‘‘मुझे छोड़ कर गैरों के साथ क्यों घूमती हो? मुझ से शादी करने का इरादा नहीं है क्या?’’

श्रेया ने तपाक से जवाब दिया, ‘‘कभी कहा था कि तुम से शादी करूंगी?’’

वह तिलमिला गया. किसी तरह गुस्से को काबू में कर के बोला, ‘‘कहा तो नहीं था पर खुद सोचो कि हम दोनों में पतिपत्नी वाला रिश्ता बन चुका है तो शादी क्यों नहीं कर सकते हैं?’’

‘‘मैं ऐसा नहीं मानती कि किसी के साथ पतिपत्नी वाला रिश्ता बन जाए तो उसी से विवाह करना चाहिए.

‘‘मेरा मानना है कि संबंध किसी से भी बनाया जा सकता है, पर शादी अपने से बराबर वाले से ही करनी चाहिए. शादी में दोनों परिवारों के आर्थिक व सामाजिक रुतबे पर ध्यान देना अनिवार्य होता है.

‘‘तुम्हारे पास यह सब नहीं है. इसलिए शादी नहीं कर सकती. तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि अब मेरा पीछा करना बंद कर दो, नहीं तो अंजाम बुरा होगा.’’

श्रेया की बात गौतम को शूल की तरह चुभी. लेकिन उस ने समझदारी से काम लेते हुए उसे समझने की कोशिश की पर वह नहीं मानी.

आखिरकार, उसे लगा कि श्रेया किसी के बहकावे में आ कर रिश्ता तोड़ना चाहती है. उस ने सोचा, ‘उस के घर वालों को सचाई बता दूंगा तो सब ठीक हो जाएगा. परिजनों के कहने पर उसे मुझसे विवाह करना ही होगा.’

एक दिन वह श्रेया के घर गया. उस के पिता व भाई को अपने और उस के बारे में सबकुछ बताया.

श्रेया अपने कमरे में थी. भाई ने बुलाया. वह आई. भाई ने गौतम की तरफ इंगित कर उस से पूछा, ‘‘इसे पहचानती हो?’’

श्रेया सबकुछ समझ गई. झट से अपने बचाव का रास्ता भी ढूंढ़ लिया. बगैर घबराए कहा, ‘‘यह मेरे कालेज में पढ़ता है. इसे मैं जरा भी पसंद नहीं करती. किंतु यह मेरे पीछे पड़ा रहता है. कहता है कि मुझ से शादी नहीं करोगी तो इस तरह बदनाम कर दूंगा कि मजबूर हो कर शादी करनी ही पड़ेगी.’’

वह कहता रहा कि श्रेया झठ बोल रही है परंतु उस के भाई और पिता ने एक न सुनी. नौकरों से उस की इतनी पिटाई कराई कि अधमरा हो गया. पैरों की हड्डियां टूट गईं.

किसी पर किसी तरह का इलजाम न आए, इसलिए गौतम को अस्पताल में दाखिल करा दिया गया.

थाने में श्रेया द्वारा यह रिपोर्ट लिखा दी गई, ‘घर में अकेली थी. अचानक गौतम आया और मेरा रेप करने की कोशिश की. उसी समय घर के नौकर आ गए. उस की पिटाई कर मुझे बचा लिया.’

थाने से खबर पाते ही गौतम के पिता अस्पताल आ गए. गौतम को होश आया तो सारा सच बता दिया.

सिर पीटने के सिवा उस के पिता कर ही क्या सकते थे. श्रेया के परिवार से भिड़ने की हिम्मत नहीं थी.

उन्होंने गौतम को समझाया, ‘‘जो हुआ उसे भूल जाओ. अस्पताल से वापस आ कर पढ़ाई पर ध्यान लगाना. कोशिश करूंगा कि तुम पर जो मामला है, वापस ले लिया जाए.’’

 

अस्पताल में गौतम को 5 माह रहना पड़ा. वे 5 माह 5 युगों से भी लंबे थे. कैलेंडर की तारीखें एकएक कर के उस के सपनों के टूटने का पैगाम लाती रही थीं.

उसे कालेज से निकाल दिया गया तो दोस्तों ने भी किनारा कर लिया. महल्ले में भी वह बुरी तरह बदनाम हो चुका था. कोई उसे देखना नहीं चाहता था.

श्रेया के आरोप पर किसी को विश्वास नहीं हुआ तो वह थी इषिता. वह उसी कालेज में पढ़ती थी और गौतम की दोस्त थी. वह अस्पताल में उस से मिलने बराबर आती रही. उसे हर तरह से हौसला देती रही.

गौतम घर आ गया तो भी इषिता उस से मिलने घर आती रही. शरीर के घाव तो कुछ दिनों में भर गए पर आत्मसम्मान के कुचले जाने से उस का आत्मविश्वास टूट चुका था.

मन और आत्मविश्वास के घावों पर कोई औषधि काम नहीं कर रही थी. गौतम ने फैसला किया कि अब आगे नहीं पढ़ेगा.

परिजनों तथा शुभचिंतकों ने बहुत सम?ाया लेकिन वह फैसले से टस से मस नहीं हुआ.

इस मामले में उस ने इषिता की भी नहीं सुनी. इषिता ने कहा था, ‘‘ पढ़ना नहीं चाहते हो तो कोई बात नहीं. क्रिकेट में ही कैरियर बनाओ.’’

‘‘मेरा आत्मविश्वास टूट चुका है. कुछ नहीं कर सकता. इसलिए मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो,’’ उस ने दोटूक जवाब दिया था.

वह दिनभर चुपचाप घर में पड़ा रहता था. घर के लोगों से भी ठीक से बात नहीं करता था. किसी रिश्तेदार या दोस्त के घर भी नहीं जाता था. हर समय चिंता में डूबा रहता.

पहले छुट्टियों में पिता की दुकान संभालता था. अब पिता के कहने पर भी दुकान पर नहीं जाता था. उसे लगता था कि दुकान पर जाएगा तो महल्ले की लड़कियां उस पर छींटाकशी करेंगी तो वह बरदाश्त नहीं कर पाएगा.

इसी तरह घटना को 2 वर्ष बीत गए. इषिता ने ग्रैजुएशन कर ली. जौब की तलाश की, तो वह भी मिल गई. बैक में जौब मिली थी. पोस्टिंग मालदह में हुई थी.

जाते समय इषिता ने उस से कहा, कोलकाता से जाने की इच्छा तो नहीं है पर सवाल जिंदगी का है. जौब तो करनी ही पड़ेगी, पर 6-7 महीने में ट्रांसफर करा कर आ जाऊंगी. विश्वास है कि तब तक श्रेया को दिल से निकाल फेंकने में सफल हो जाओगे.

इषिता मालदह चली गई तो गौतम पहले से अधिक अवसाद में आ गया. तब उस के मातापिता ने उस की शादी करने का विचार किया.

मौका देख कर मां ने उस से कहा, ‘‘जानती हूं कि इषिता सिर्फ तुम्हारी दोस्त है. इस के बावजूद यह जानना चाहती हूं कि यदि वह तुम्हें पसंद है तो बोलो, उस से शादी की बात करूं?’’

‘‘वह सिर्फ मेरी दोस्त है. हमेशा दोस्त ही रहेगी. रही शादी की बात, तो कभी किसी से भी शादी नहीं करूंगा. यदि किसी ने मुझ पर दबाव डाला तो घर छोड़ कर चला जाऊंगा.’’

गौतम ने अपना फैसला बता दिया तो मां और पापा ने उस से फिर कभी शादी के लिए नहीं कहा. उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

लेकिन एक दोस्त ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘श्रेया से तुम्हारी शादी नहीं हो सकती, यह अच्छी तरह जानते हो. फिर जिंदगी बरबाद क्यों कर रहे हो? किसी से विवाह कर लोगे तो पत्नी का प्यार पा कर अवश्य ही उसे भूल जाओगे.’’

‘‘जानता हूं कि तुम मेरे अच्छे दोस्त हो. इसलिए मेरे भविष्य की चिंता है. परंतु सचाई यह है कि श्रेया को भूल पाना मेरे वश की बात नहीं है.’’

दोस्त ने तरहतरह से समझाया. पर वह किसी से भी शादी करने के लिए राजी नहीं हुआ.

इषिता गौतम को सप्ताह में 2-3 दिन फोन अवश्य करती थी. वह उसे बताता था कि जल्दी ही श्रेया को भूल जाऊंगा. जबकि हकीकत कुछ और ही थी.

हकीकत यह थी कि इषिता के जाने के बाद उस ने कई बार श्रेया को फोन लगाया था. पर लगा नहीं था. घटना के बाद शायद उस ने अपना नंबर बदल लिया था.

न जाने क्यों उस से मिलने के लिए वह बहुत बेचैन था. समझ नहीं पा रहा था कि कैसे मिले. अंजाम की परवा किए बिना उस के घर जा कर मिलने को वह सोचने लगा था.

तभी एक दिन श्रेया का ही फोन आ गया. बहुत देर तक विश्वास नहीं हुआ कि उस का फोन है.

विश्वास हुआ, तो पूछा, ‘‘कैसी हो?’’

‘‘तुम से मिल कर अपना हाल बताना चाहती हूं. आज शाम के 7 बजे साल्ट लेक मौल में आ सकते हो?’’ उधर से श्रेया ने कहा.

खुशी से लबालब हो कर गौतम समय से पहले ही मौल पहुंच गया. श्रेया समय पर आई. वह पहले से अधिक सुंदर दिखाई पड़ रही थी.

उस ने पूछा, ‘‘मेरी याद कभी आई थी?’’

‘‘तुम दिल से गई ही कब थीं जो याद आतीं. तुम तो मेरी धड़कन हो. कई बार फोन किया था, लगा नहीं था. लगता भी कैसे, तुम ने नंबर जो बदल लिया था.’’

उस का हाथ अपने हाथ में ले कर श्रेया बोली, ‘‘पहले तो उस दिन की घटना के लिए माफी चाहती हूं. मुझे इस का अनुमान नहीं था कि मेरे झठ को पापा और भैया सच मान कर तुम्हारी पिटाई करा देंगे.

‘‘फिर कोई लफड़ा न हो जाए, इस डर से पापा ने मेरा मोबाइल ले लिया. अकेले घर से बाहर जाना बंद कर दिया गया.

‘‘मुंबई से तुम्हें फोन करने की कोशिश की, परंतु तुम्हारा नंबर याद नहीं आया. याद आता तो कैसे? घटना के कारण सदमे में जो थी. उन्होंने सोर्ससिफारिश की तो श्रेया के पिता ने मामला वापस ले लिया.

‘‘फिलहाल वहां ग्रैजुएशन करने के बाद 3 महीने पहले ही आई हूं. बहुत कोशिश करने पर तुम्हारे एक दोस्त से तुम्हारा नंबर मिला, तो तुम्हें फोन किया. मेरी सगाई हो गई है. 3 महीने बाद शादी हो जाएगी.

‘‘यह कहने के लिए बुलाया है कि जो होना था वह हो गया. अब मुद्दे की बात करते हैं. सचाई यह है कि हम अब भी एकदूसरे को चाहते हैं. तुम मेरे लिए बेताब हो, मैं तुम्हारे लिए.

‘‘इसलिए शादी होेने तक हम रिश्ता बनाए रख सकते हैं. चाहोगे तो शादी के बाद भी मौका पा कर तुम से मिलती रहूंगी. ससुराल कोलकाता में ही है. इसलिए मिलनेजुलने में कोई परेशानी नहीं होगी.’’

श्रेया का चरित्र देख कर गौतम को इतना गुस्सा आया कि उस का कत्ल कर फांसी पर चढ़ जाने का मन हुआ. लेकिन ऐसा करना उस के वश में नहीं था. क्योंकि वह उसे अथाह प्यार करता था. उसे लगता था कि श्रेया को कुछ हो गया तो वह जीवित नहीं रह पाएगा.

उसे सम?ाते हुए उस ने कहा, ‘‘मुझे इतना प्यार करती हो तो शादी मुझ से क्यों नहीं कर लेतीं?’’

‘‘इस जमाने में शादी की जिद पकड़ कर क्यों बैठे हो? वह जमाना पीछे छूट गया जब प्रेमीप्रेमिका या पतिपत्नी एकदूसरे से कहते थे कि जिंदगी तुम से शुरू, तुम पर ही खत्म है.

‘‘अब तो ऐसा चल रहा है कि जब तक साथ निभे, निभाओ, नहीं तो अपनेअपने रास्ते चले जाओ. तुम खुद ही बोलो, मैं क्या कुछ गलत कह रही हूं? क्या आजकल ऐसा नहीं हो रहा है?

‘‘दरअसल, मैं सिर्फ कपड़ों से ही नहीं, विचारों से भी आधुनिक हूं. जमाने के साथ चलने में विश्वास रखती हूं. मैं चाहती हूं कि तुम भी जमाने के साथ चलो. जो मिल रहा है उस का भरपूर उपभोग करो. फिर अपने रास्ते चलते बनो.’’

श्रेया जैसे ही चुप हुई, गौतम ने कहा, ‘‘लगा था कि तुम्हें गलती का अहसास हो गया है. मु?ा से माफी मांगना चाहती हो. पर देख रहा हूं कि आधुनिकता के नाम पर तुम सिर से पैर तक कीचड़ से इस तरह सन चुकी हो कि जिस्म से बदबू आने लगी है.

‘‘यह सच है कि तुम्हें अब भी अथाह प्यार करता हूं. इसलिए तुम्हें भूल जाना मेरे वश की बात नहीं है. लेकिन अब तुम मेरे दिल में शूल बन कर रहोगी, प्यार बन कर नहीं.’’

श्रेया ने गौतम को अपने रंग में रंगने की पूरी कोशिश की, परंतु उस की एक दलील भी उस ने नहीं मानी.

उस दिन से गौतम पहले से भी अधिक गमगीन हो गया.

इस तरह कुछ दिन और बीत गए. अचानक इषिता ने फोन पर बताया कि उस ने कोलकाता में ट्रांसफर करा लिया है. 3-4 दिनों में आ जाएगी.

3 दिनों बाद इषिता आ भी गई. गौतम के घर गई तो वह गहरी सोच में था.

उस ने आवाज दी. पर उस की तंद्रा भंग नहीं हुई. तब उसे झंझोड़ा और कहा, ‘‘किस सोच में डूबे हुए हो?’’

‘‘श्रेया की यादों से अपनेआप को मुक्त नहीं कर पा रहा हूं,’’ गौतम ने सच बता दिया.

इषिता गुस्से से उफन उठी, ‘‘इतना सबकुछ होने के बाद भी उसे याद करते हो? सचमुच तुम पागल हो गए हो?’’

‘‘तुम ने कभी किसी को प्यार नहीं किया है इषिता, मेरा दर्द कैसे समझ सकती हो.’’

‘‘कुछ घाव किसी को दिखते नहीं. इस का मतलब यह नहीं कि उस शख्स ने चोट नहीं खाई होगी,’’ इषिता ने कहा.

गौतम ने इषिता को देखा तो पाया कि उस की आंखें नम थीं. उस ने कहा, ‘‘तुम्हारी आंखों में आंसू हैं. इस का मतलब यह है कि तुम ने भी प्यार में धोखा खाया है?’’

‘‘इसे तुम धोखा नहीं कह सकते. जिसे मैं प्यार करती थी उसे पता नहीं था.’’

‘‘यानी वन साइड लव था?’’

‘‘कुछ ऐसा ही समझो.’’

‘‘लड़का कौन था. निश्चय ही वह कालेज का रहा होगा?’’

इषिता उसे उलझन में नहीं रखना चाहती थी, रहस्य पर से परदा हटाते हुए कह दिया, ‘‘वह कोई और नहीं, तुम हो.’’

गौतम ने चौंक कर उसे देखा तो वह बोली, ‘‘कालेज में पहली बार जिस दिन तुम से मिली थी उसी दिन तुम मेरे दिल में घर कर गए थे. दिल का हाल बताती, उस से पहले पता चला कि तुम श्रेया के दीवाने हो. फिर चुप रह जाने के सिवा मेरे पास रास्ता नहीं था.

‘‘जानती थी कि श्रेया अच्छी लड़की नहीं है. तुम से दिल भर जाएगा, तो झट से किसी दूसरे का दामन थाम लेगी. आगाह करती, तो तुम्हें लगता कि अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए उस पर इलजाम लगा रही हूं. इसलिए तुम से दोस्ती कर ली पर दिल का हाल कभी नहीं बताया.

‘‘श्रेया के साथ तुम्हारा सबकुछ खत्म हो गया, तो सोचा कि मौका देख कर अपनी मोहब्बत का इजहार करूंगी और तुम से शादी कर लूंगी. पर देख रही हूं कि आज भी तुम्हारे दिल में वह ही है.’’

दोनों के बीच कुछ देर तक खामोशी पसर गई. गौतम ने ही थोड़ी देर बार खामोशी दूर की, ‘‘उसे दिल से निकाल नहीं पा रहा हूं, इसीलिए कभी शादी न करने का फैसला किया है.’’

‘‘तुम्हें पाने के लिए मैं ने जो तपस्या की है उस का फल मुझे नहीं दोगे?’’ इषिता का स्वर वेदना से कांपने लगा था. आंखें भी डबडबा आई थीं.

‘‘मुझे माफ कर दो इषिता. तुम बहुत अच्छी लड़की हो. तुम से विवाह करता तो मेरा जीवन सफल हो जाता. पर मैं दिल के हाथों मजबूर हूं. किसी से भी शादी नहीं

कर सकता.’’

इषिता चली गई. उस की आंखों में उमड़ा वेदना का समंदर देख कर भी वह उसे रोक नहीं पाया. वह उसे कैसे समझाता कि श्रेया ने उस के साथ जो कुछ भी किया है, उस से समस्त औरत जाति से उसे नफरत हो गई है.

3 दिन बीत गए. इषिता ने न फोन किया न आई. गौतम सोचने लगा, ‘कहीं नाराज हो कर उस ने दोस्ती तोड़ने का मन तो नहीं बना लिया है?’

उसे फोन करने को सोच ही रहा था कि अचानक उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. उस समय शाम के 6 बज रहे थे. फोन किसी अनजान का था.

उस ने ‘‘हैलो’’ कहा तो उधर से किसी ने कहा, ‘‘इषिता का पापा बोल रहा हूं. तुम से मिलना चाहता हूं. क्या हमारी मुलाकात हो सकती है?’’

उस ने ?ाट से कहा, ‘‘क्यों नहीं अंकल. कहिए, कहां आ जाऊं?’’

‘‘तुम्हें आने की जरूरत नहीं है बेटे. 7 बजे तक मैं ही तुम्हारे घर आ जाता हूं.’’

इषिता उसे 3-4 बार अपने घर ले गई थी. वह उस के मातापिता से मिल चुका था.

उस के पिता रेलवे में उच्च पद पर थे. बहुत सुलझे हुए इंसान थे. वह उन की इकलौती संतान थी. मां कालेज में अध्यापिका थीं. बहुत समझदार थीं. कभी भी उस के और इषिता के रिश्ते पर शक नहीं किया था.

इषिता के पापा समय से पहले ही आ गए. गौतम के साथसाथ उस की मां और बहन ने भी उन का भरपूर स्वागत किया.

उन्होंने मुद्दे पर आने में बहुत देर नहीं लगाई. पर उन चंद लमहों में ही अपने शालीन व्यक्तित्व की खुशबू से पूरे घर को महका दिया था. इतनी आत्मीयता उड़ेल दी थी वातावरण में कि उसे लगने लगा कि उन से जनमजनम का रिश्ता है.

कुछ देर बाद इषिता के पापा को गौतम के साथ कमरे में छोड़ कर मां और बहन चली गईं तो उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, इषिता तुम्हें प्यार करती है और शादी करना चाहती है. उस ने श्रेया के बारे में भी सबकुछ बता दिया है.

‘‘श्रेया से तुम्हारा रिश्ता टूट चुका है तो इषिता से शादी क्यों नहीं करना चाहते? वैसे तो बिना कारण भी कोई किसी को नापसंद कर सकता है. यदि तुम्हारे पास इषिता से विवाह न करने का कारण है तो बताओ. मिलबैठ कर कारण को दूर करने की कोशिश करें.’’

उसे लगा जैसे अचानक उस के मन में कोई बड़ी सी शिला पिघलने लगी है. उस ने मन की बात बता देना ही उचित समझा.

‘‘इषिता में कोई कमी नहीं है अंकल. उस से जो भी शादी करेगा उस का जीवन सार्थक हो जाएगा. कमी मुझ में है. श्रेया से धोखा खाने के बाद लड़कियों से मेरा विश्वास उठ गया है.

‘‘लगता है कि जिस से भी शादी करूंगा वह भी मेरे साथ बेवफाई करेगी. ऐसा भी लगता है कि श्रेया को कभी भूल नहीं पाऊंगा और पत्नी को प्यार नहीं कर पाऊंगा,’’ गौतम ने दिल की बात रखते हुए बताया.

‘‘इतनी सी बात के लिए परेशान हो? तुम मेरी परवरिश पर विश्वास रखो बेटा. तुम्हारी पत्नी बन कर इषिता तुम्हें इतना प्यार करेगी कि तुम्हारे मन में लड़कियों के प्रति जो गांठ पड़ गई है वह स्वयं खुल जाएगी.’’

वे बिना रुके कहते रहे, ‘‘प्यार या शादी के रिश्ते में मिलने वाली बेवफाई से हर इंसान दुखी होता है, पर यह दुख इतना बड़ा भी नहीं है कि जिंदगी एकदम से थम जाए.

‘‘किसी एक औरतमर्द या लड़कालड़की से धोखा खाने के बाद दुनिया के तमाम औरतमर्द या लड़केलड़की को एकजैसा सम?ाना सही नहीं है.

‘‘यह जीवन का सब से बड़ा सच है कि कोई भी रिश्ता जिंदगी से बड़ा नहीं होता. यह भी सच है कि हर प्रेम संबंध का अंजाम शादी नहीं होता.

‘‘जीवन में हर किसी को अपना रास्ता चुनने का अधिकार है. यह अलग बात है कि कोई सही रास्ता चुनता है कोई गलत.

‘‘श्रेया के मन में गलत विचार भरे पड़े थे. इसलिए चंद कदम तुम्हारे साथ चल कर अपना रास्ता बदल लिया. अब तुम भी उसे भूल कर जीने की सही राह पर आ जाओ. गिरते सब हैं पर जो उठ कर तुरंत अपनेआप को संभाल लेता है, सही माने में वही साहसी है.’’

थोड़ी देर बाद इषिता के पापा चले गए. गौतम ने मंत्रमुग्ध हो कर उन की बातें सुनी थीं.

श्रेया के कारण लड़कियों के प्रति मन में जो गांठ पड़ गई थी वह खुल गई.

अब देर करना उस ने मुनासिब नहीं समझा. इषिता के पापा को फोन किया, ‘‘अंकल, कल अपने घर वालों के साथ इषिता का हाथ मांगने आप के घर आना चाहता हूं.’’

उधर से इषिता के पापा ने कहा, ‘‘वैलकम बेटे. देर आए दुरुस्त आए. अब तुम्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. तुम ने अपने भीतर के डर पर विजय जो प्राप्त कर ली है.’’ Romantic Story In Hindi

Hindi Love Stories : फेसबुक वाला लव

Hindi Love Stories : देर रात को फेसबुक खोलते ही रितु चैटिंग करने लगती. जैसे वह पहले से ही इंटरनैट पर बैठ कर विनोद का इंतजार कर रही हो. उस से चैटिंग करने में विनोद को भी बड़ा मजा मिलने लगा था. रितु से बातें कर के विनोद की दिनभर की थकान मिट जाती थी. स्कूल में बच्चों को पढ़ातेपढ़ाते थका हुआ उस का दिमाग व जिस्म रितु से चैटिंग कर तरोताजा हो जाता था.

पत्नी मायके चली गई थी, इसलिए घर में विनोद का अकेलापन कचोटता रहता था. ऐसी हालत में रितु से चैटिंग करना अच्छा लगता था. विनोद से चैटिंग करते हुए रितु एक हफ्ते में ही उस से घुलमिल सी गई थी. वह भी उस से चैटिंग करने के लिए बेताब रहने लगा था.

आज विनोद उस से चैटिंग कर ही रहा था कि उस का मोबाइल फोन घनघना उठा, ‘‘हैलो… कौन?’’ उधर से एक मीठी आवाज आई, ‘हैलो…विनोदजी, मैं रितु बोल रही हूं… अरे वही रितु, जिस से आप चैटिंग कर रहे हो.’

‘‘अरे…अरे, रितु आप. आप को मेरा नंबर कहां से मिल गया?’’ ‘‘लगन सच्ची हो और दिल में प्यार हो तो सबकुछ मिल जाता है.’’

फेसबुक पर चैटिंग करते समय विनोद कभीकभी अपना मोबाइल नंबर भी डाल देता था. शायद उस को वहीं से मिल गया हो. यह सोच कर वह चुप हो गया था. अब विनोद चैटिंग बंद कर उस से बातें करने लगा, ‘‘आप रहती कहां हैं?’’

‘वाराणसी में.’ ‘‘वाराणसी में कहां रहती हैं?’’

‘सिगरा.’ ‘‘करती क्या हैं?’’

‘एक नर्सिंग होम में नर्स हूं.’ ‘‘आप की शादी हो गई है कि नहीं?’’

‘हो गई है…और आप की?’ ‘‘हो तो मेरी भी गई है, पर…’’

‘पर, क्या…’ ‘‘कुछ नहीं, पत्नी मायके चली गई है, इसलिए उदासी छाई है.’’

‘ओह, मैं तो कोई अनहोनी समझ कर घबरा गई थी…’ ‘‘मुझ से इतना लगाव हो गया है एक हफ्ते में… आप की रातें तो रंगीन हो ही रही होंगी?’’

‘यही तो तकलीफ है विनोदजी… पति के रहते हुए भी मैं अकेली हूं,’ कहतेकहते रितु बहुत उदास हो गई. उस का दर्द सुन कर विनोद भी दुखी हो गया था. उस ने अपना फोटो चैट पर भेजा. रितु ने भी अपना फोटो भेज दिया था. वह बड़ी खूबसूरत थी. गोलमटोल चेहरा, कजरारी आंखें… पतले होंठ… लंबे घने बाल देख कर विनोद का मन उस की मोहिनी सूरत पर मटमिटा था. वह उस से बातें करने के लिए बेचैन रहने लगा. मोबाइल फोन से जो बात खुल कर न कह पाता, वह बात फेसबुक पर चैट कर के कह देता. रितु का पति मनोहर शराबी था. वह जुआ खेलता, शराबियों के साथ आवारागर्दी करता, नशे में झूमता हुआ वह रात में घर आ कर झगड़ा करता और गालीगलौज कर के सो जाता.

रितु जब तनख्वाह पाती तो वह छीनने लगता. न देने पर वह उसे मारतापीटता. मार से बचने के लिए वह अपनी सारी तनख्वाह उसे दे देती. रितु विनोद से अपनी कोईर् बात न छिपाती. वह अपनी रगरग की पीड़ा जब उसे बताती, तब दुखी हो कर वह भी कराह उठता. स्कूल में बच्चों को अब पढ़ाने का मन न करता. पत्नी घर पर होती तो बाहुपाश में उस को… उस की पीड़ा को वह भ्ूल जाता. पर अब तो रितु की याद उसे सोने ही न देती. चैट से मन न भरता तो वह मोबाइल फोन से बात करने लगता. ‘‘हैलो… क्या कर रही हो तुम?’’ ‘आप की याद में बेचैन हूं. आप से मिलने के लिए तड़प रही हूं… और आप?’

‘‘मेरा भी वही हाल है.’’ ‘तब तो मेरे पास आ जाओ न. आप वहां अकेले हो और मैं यहां अकेली. दोनों छटपटा रहे हैं. मैं आप को पत्नी का सारा सुख दूंगी.’

रितु की बात सुन कर विनोद के बदन में तरंगें उठने लगतीं. बेचैनी बढ़ जाती. तब वह जोश में उस से कहता, ‘‘मैं कैसे आऊं… तुम्हारा पति मनोहर जो है. हम दोनों का मिलना क्या उसे अच्छा लगेगा?’’ ‘आप आओ तो मैं कह दूंगी कि आप मेरे मौसेरे भाई हो. वैसे, वे कल अपने गांव जा रहे हैं. गांव से लौटने में उन को 2-4 दिन तो लग ही जाएंगे. परसों रविवार है. आप उस दिन आ जाओ न. ऐसा मौका जल्दी नहीं मिलेगा. मैं आप का इंतजार करूंगी,’ रितु का फोन कटा तो विनोद की बेचैनी बढ़ गई. वह रातभर करवटें बदलता रहा.

रविवार को विनोद उस से मिलने वाराणसी चल पड़ा. उस के बताए पते पर पहुंचने में उसे कोई दिक्कत नहीं हुई. मकान की दूसरी मंजिल पर रितु जिस फ्लैट में रहती थी, उस में 2 कमरे, रसोईघर, बरामदा था. उस ने अपना घर खूब सजा रखा था, जिसे देख कर विनोद का मन खिल उठा. खातिरदारी और बात करतेकरते दिन ढलने लगा तो विनोद ने कहा, ‘‘आप से बात कर के बड़ा मजा आया. वापस भी तो जाना है मुझे.’’

‘‘कहां वापस जाना है आज? आज रात तो मैं कम से कम आप के साथ रह लूं… फिर कब मिलना हो, क्या भरोसा?’’ रितु ने इतना कहा, तो विनोद की बांछें खिल उठीं. इतना कह कर वह उस के गले लग गया. रितु कुछ नहीं बोली. ‘‘मैं आप की बात भी तो नहीं टाल सकता… चलो, अब कमरे में चल कर बातें करें.’’

विनोद ने कमरे में रितु को डबल बैड पर लिटा दिया और उस के अंगों से खेलने लगा. इतने में पता नहीं कहां से मनोहर उस कमरे में आ घुसा और विनोद को डपटा, ‘‘तू कौन है रे, जो मेरे घर में आ कर मेरी पत्नी का रेप कर रहा है?’’

मनोहर को देख विनोद घबरा गया. उस का सारा नशा गायब हो गया. रितु अपनी साड़ी ओढ़ कर एक कोने में सिमट गई. मनोहर ने पहले तो विनोद को खूब लताड़ा, लातघूंसों से मारा, फिर पुलिस को फोन मिलाने लगा.

विनोद उस के पैर पकड़ कर पुलिस न बुलाने की भीख मांगता हुआ उस से बोला, ‘‘इस में मेरी कोई गलती नहीं है. रितु ने ही फेसबुक पर मुझ से दोस्ती कर के मुझे यहां बुलाया था.’’ ‘‘मैं कुछ नहीं जानता. फेसबुक पर दोस्ती कर के औरतों को अपने प्यार के जाल में फांस कर उन के साथ रंगरलियां मनाने वाले आज तेरी खैर नहीं है. जब पुलिस का डंडा पीठ पर पड़ेगा तब सारा नशा उतर जाएगा,’’ कह कर मनोहर फिर से पुलिस को फोन मिलाने लगा.

‘‘नहीं मनोहर बाबू, मुझे छोड़ दो. मेरा भी परिवार है. मेरी सरकारी नौकरी है. मुझे पुलिस के हवाले कर दोगे तो मैं बरबाद हो जाऊंगा,’’ कहता हुआ विनोद उस के पैरों पर अपना माथा रगड़ने लगा. काफी देर बाद हमदर्दी दिखाता हुआ मनोहर उस से बोला, ‘‘अपनी इज्जत और नौकरी बचाना चाहता है, तो 50 हजार रुपए अभी दे, नहीं तो मैं तुझे पुलिस के हवाले कर दूंगा,’’

इतना कहने के बाद मनोहर कमरे में लगा कैमरा हाथ में ले कर उसे दिखाता हुआ बोला, ‘‘तेरी सारी हरकत इस कैमरे में कैद है. जल्दी रुपए ला, नहीं तो…’’ ‘‘इतने रुपए मैं कहां से लाऊं भाई. मेरे पास तो अभी 10 हजार रुपए हैं,’’ कह कर विनोद ने 2-2 हजार के 5 नोट जेब से निकाल कर मनोहर के सामने रख दिए. गुस्से से लालपीला होता हुआ मनोहर बोला, ‘‘10 हजार रुपए…?

50 हजार रुपए से कम नहीं चाहिए, नहीं तो पुलिस को करता हूं फोन…’’ मनोहर की दहाड़ सुन कर विनोद रोने लगा. वह बोला, ‘‘आप मुझ पर दया कीजिए मनोहर बाबू. मैं घर जा कर बैंक से रुपए निकाल कर आप को दे दूंगा.’’

‘‘बहाना कर के भागना चाहता है तू. मुझे बेवकूफ समझता है. अभी जा और एटीएम से 15 हजार रुपए निकाल और कल 25 हजार रुपए ले कर आ, नहीं तो… कोई चाल तो नहीं चलेगा न. चलेगा तो जान से भी हाथ धो बैठेगा, क्योंकि तेरी सारी करतूत मेरे इस कैमरे में कैद है.’’ मनोहर की बात मानना विनोद की मजबूरी थी. वह बहेलिए के जाल में फंसे कबूतर की तरह फेसबुक की दोस्ती के जाल में फंस कर छटपटाने लगा था. Hindi Love Stories 

Brazil : रातोंरात अमीर हुए 6 मजदूर

Brazil : कभीकभी संयोग से कुछ ऐसी अनहोनी भी हो जाती है जो किसी इंसान की नियति को बदल कर रख देती है. ब्राजील के कुछ मजदूरों के साथ भी कुछ ऐसी ही अनहोनी हुई है जिस ने 6 मजदूरों की नियति को ऐसा बदला कि उन की 7 पीढ़ियां नाम लेंगी.

यह कहानी 50 वर्ष के मेनुएल नामक मजदूर और उस के 5 साथियों की है जो पहले एक दूसरे खदान में एक ठेकेदार के यहा दिहाड़ी पर काम करते थे लेकिन उन का ठेकेदार उन्हें इतना कम पैसा देता था जिस से उन के परिवार का गुजारा मुश्किल से हो पाता था इसलिए मेनुएल ने उस ठेकेदार का काम छोड़ने का फैसला किया लेकिन दूसरी जगह काम मिलना इतना आसान भी नहीं था.

वह कई जगह भटका लेकिन उसे कहीं काम नहीं मिला तो उस ने एक पुराने बंद पड़े खादान में हाथ आजमाने की सोची कि शायद वहां से कुछ मिल जाए. मेन्युअल अकेला ही उस खादान में खुदाई करने लगा. 10 दिन की मेहनत के बाद भी मेन्युअल को वहां से कुछ विशेष नहीं मिला लेकिन उसे खुद पर पूरा भरोसा था और वो इस पुराने खादान में 23 वर्ष काम भी कर चुका था लेकिन वह अकेला यहां से कुछ भी हासिल नहीं कर सकता था इसलिए मेन्युअल ने अपने कुछ साथियों को उस खादान में काम करने की बात बताई तो सभी ने उस का मजाक उड़ाया लेकिन 5 ऐसे लोग थे जिन्हें मेनुएल पर पूरा भरोसा था इसलिए वे मेनुएल के साथ उस पुराने खदान में काम करने को तैयार हो गए.

मेनुएल और उस के साथी लगातार 3 महीने तक उस खदान में काम करते रहे लेकिन उन्हें कुछ हाथ नहीं लगा. एक दिन वे मन बना कर आए थे कि आज आखिरी बार काम करने के बाद वे फिर कभी यहां नहीं आएंगे और उसी दिन उन्हें वो चीज हाथ लग गई जिस ने उन्हें एक ही झटके में मजदूर से सम्राट बना दिया. खुदाई के दौरान उन्हें एक ऐसी वस्तु मिली जिस के बाद में वे अरबपति बन गए.

इस खुदाई में इन मजदूरों को एक चट्टान का टुकड़ा मिला जिस पर कई पन्ने लगे हैं और इस चट्टान की कीमत वर्तमान में 19 अरब 35 करोड़ से भी ज्यादा है. आज तक जितने भी खदानों से पन्ने मिले, उन में ये सब से बड़ा है. इस का वजन करीब 360 किलो है.

इस चट्टान के टुकड़े के कारण अब इन सभी मजदूरों की जान को खतरा आ पड़ा है, क्योंकि वर्तमान में ब्राजील में काफी अपराध और क्रिमिनल्स का बोलबाला है. ब्राजील सरकार ने इन मजदूरों की सुरक्षा की गारंटी ली है, साथ ही इस कीमती खनीज को भी अपने कंट्रोल में रखा है. बहिया नामक यह क्षेत्र जहां से यह पन्ना रत्न जड़ी चट्टान निकली है, यह खदान बहुमूल्य रत्न निकलने के कारण प्रसिद्ध था लेकिन इसे 2006 में ब्राज़ील सरकार ने बंद कर दिया था. Brazil 

Patiala Peg : दुनिया को ‘पटियाला पैग’ देने वाले महाराजा भूपेंद्र सिंह की रंगीन दुनिया

Patiala Peg : दुनिया में कई ऐसे राजामहाराजा हुए जो अपने अय्याश और रंगीन मिजाज के लिए आज भी जाने जाते हैं. ऐसे ही एक राजा थे पटियाला रियासत के महाराजा और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर के दादा महाराजा भूपिंदर सिंह जो अपने रंगीन मिजाज के लिए काफी मशहूर हुए.

कहा जाता है कि महाराजा भूपिंदर सिंह ने पटियाला में ‘लीला-भवन’ (रंगरलियों का महल) बनवाना था, जहां लोग बिना कपड़ों के ही प्रवेश कर सकते थे. महाराजा भूपेंद्र सिंह के जीवन और उनके हरम से जुड़ी ये महत्वपूर्ण जानकारियां महाराजा भूपिंदर सिंह के दीवान जरमनी दास द्वारा लिखी किताब ‘महाराजा’ से ली गई हैँ.

महाराजा की 10 अधिकृत रानियों के साथसाथ कुल 365 रानियां थीं. इन रानियों की सुखसुविधा का महाराज भरपूर ख्याल रखते थे. महाराजा की रानियों के किस्से तो इतिहास में दफन हो चुके हैं लेकिन इन रानीयों के लिए बनाए गए महल अब भी ऐतिहासिक धरोहर के तौर पर खड़े हैं. अपनी 365 रानियों के लिए पटियाला में महाराजा ने भव्य महल बनाए थे. रानियों के स्वास्थ्य की जांच के लिए डाक्टर/वैद की एक टीम भी इन महलों में ही रहती थी. हरम की औरतों की इच्छा के मुताबिक उन्हें हर चीज मुहैया करई जाती थी. महाराजा भूपिंदर सिंह की 10 पत्नियों से 83 बच्चे हुए थे.

महाराजा कैसे अपनी 365 रानियों को संतुष्ट रखते थे इस सवाल के जवाब में ‘महाराजा’ पुस्तक के लेखक जरमनी दास लिखते हैं, “महाराजा पटियाला के महल में रोजाना 365 लालटेनें जलाई जाती थीं, हर लालटेन पर उन की अलगअलग रानियों का नाम लिखा होता था. जो लालटेन सुबह पहले बुझती थी महाराजा उस लालटेन पर लिखे रानी के नाम को पढ़ते थे और फिर उसी के साथ रात गुजारते थे.”

महाराजा भूपिंदर सिंह के पास 2,930 हीरो के नेकलेस थे, जिस में दुनिया का सातवां सब से बड़ा हीरा भी जड़ा हुआ था. इस नेकलेस का वजन लगभग एक हजार कैरेट था, जिस की कीमत उस समय 166 करोड़ थी.

महाराजा ने महल के बाहर एक ‘स्विमिंग पूल’ भी बनवाया था, जो इतना बड़ा था कि उस में 150 मर्द-औरतें एक साथ नहा सकते थे. यहां शानदार पार्टियों का आयोजन किया जाता था. पार्टियों में खुलेआम रंगरलियां चलती थीं. पार्टियों में शरीक होने के लिए महाराजा अपनी प्रेमिकाओं को बुलाते थे. वे सब, महाराजा और उन के कुछ खास मेहमानों के साथ तालाब में नहाती थीं. ‘पटियाला पैग‘ भी दुनिया को महाराजा भूपिंदर सिंह की ही देन है. Patiala Peg

God : यदि ईश्वर होता तो दुनिया में कोई समस्या ही नहीं होती

God : चप्पल पहन कर मंदिर को मत छुओ, भगवान नाराज हो जाएंगे और दंड देंगे. मधु ने अपने 4 साल के बालक को खेलतेखेलते घर में बने मंदिर को हाथ लगाते देखा तो चिल्ला उठी.
भगवान कहां हैं?
दिख नहीं रहा वो मंदिर में विराजमान हैं.
वो तो स्टैच्यू है. वो दंड कैसे देगा? वो तो चल भी नहीं सकता.
बालक ने अपने निश्छल भोले मन ने सच उजागर कर दिया.
मगर मां ने भगवान का डर मन में बिठाने के लिए 4 साल के मासूम को थप्पड़ जड़ दिया. उस के बाद पिता ने भी डांट फटकार करते हुए मासूम के सामने भगवान का हौव्वा खड़ा किया.

धर्म और भगवान दोनों इंसान पर जबरदस्ती लादे गए हैं. इंसान अपने कुदरती रूप में ही बहुत अच्छा और शुद्ध पैदा होता है और बिना धर्म और भगवान के वह बहुत अच्छा इंसान बन सकता है. अब चूंकि धार्मिक और अंधविश्वासी लोगों की जनसंख्या इस धरती पर बहुत ज्यादा है लिहाजा वह हर नए बच्चे को अपनी तरह ही बना लेती है. हो सकता है एक जमाने में धर्म सोसायटी को चलने के लिए लोगों ने बनाया हो. मगर अब हमारी सोसायटी को चलने के लिए एक अलग व्यवस्था है. और ऐसे में अब ये धर्म हमारी प्रगति में लंगड़ी मारने के सिवा और किसी काम के नहीं हैं.

इस बात को क्या नकार सकते हैं कि धर्म के नाम पे ही धरती सब से ज्यादा लहूलुहान हुई है और हो रही है. ईश्वर यदि सबकुछ देख रहा होता तो गाजा में भूख और बम से मरने वालों की पीड़ा को क्यों नहीं देख पा रहा है? बम चलाने वालों को दंड क्यों नहीं दे रहा? एक मुट्ठी चावल के लिए कटोरा ले कर रोतेगिड़गिड़ाते मासूमों का दर्द उसे दिखाई नहीं दे रहा? वह सिंथेटिक दूध बना कर नन्हेनन्हे बच्चों की रगों में जहर भरने वालों को दंड क्यों नहीं दे पाता? अगर धर्म एक अच्छे इंसान होने का सर्टिफिकेट होता तो इस दुनिया में कोई समस्या ही नहीं होती. धर्म के नाम पर या सम्प्रदाय के नाम पर की जाने वाली हत्याएं नहीं होतीं. दरअसल न तो वो कहीं है और ना कुछ देख सकता है. भगवान, ईश्वर, अल्लाह सब मनुष्य के रचे काल्पनिक नाम और सब से ज्यादा विश्वास के बोला जाने वाला झूठ है. God

Racism : बच्चों के दिमाग में घुसता नस्लवाद

Racism : वह अपने घर के बाहर अन्य बच्चों के साथ खेलने में मगन थी कि तभी कुछ बच्चों के झुंड ने उस पर हमला बोला. एक बच्चे ने अपनी साइकिल का अगला पहिया उस के पेट और प्राइवेट पार्ट पर मार कर उसे गिरा दिया. अन्य बच्चे उस मासूम सी सांवले रंग की लड़की के चेहरे और बदन पर मुक्के बरसाने लगे. वह उस से चीख कर बोले, ‘डर्टी इंडियंस… गो बैक टू इंडिया…’ (गंदे भारतीय… भारत वापस जाओ…).

यह घटना है आयरलैंड की. पीड़ित बच्ची की उम्र मात्र 6 वर्ष. और उस पर हमला करने वाले 8 से 14 साल की उम्र के.

भारतीय मूल की इस बच्ची पर 4 अगस्त को यह नस्लवादी हमला हुआ. उस की भारतीय पहचान को ले कर अपशब्द कहे गए. यह हैरान करने वाली एक डरावनी घटना है. हमला करने वाले बच्चों के घरों में निसंदेह ऐसी नस्लवादी बातें होती होंगी, जिन्होंने उन्हें ऐसा कृत्य करने के लिए प्रेरित किया. उन के दिलों में अभी से काले और सांवले लोगों के प्रति नफरत का जहर भरा जा रहा है, बड़े होने पर वे क्या कारनामे करेंगे, अनुमान लगाया जा सकता है. इंसानियत को खाने वाली यह खरपतवार बड़ी तेजी से दुनियाभर में बढ़ रही है.

बच्ची की मां ने बताया कि वह अपनी बेटी पर घर के बाहर दूसरे बच्चों के साथ खेलते हुए नजर रख रही थी कि तभी भीतर उस का 10 महीने का बच्चा रोने लगा और उसे दूध पिलाने के लिए उसे अंदर जाना पड़ा. इस बीच यह घटना हो गई. लगभग एक मिनट बाद ही बच्ची घर वापस आ गई. वह बहुत परेशान थी और रो रही थी. वह बोल भी नहीं पा रही थी, बहुत डरी हुई थी. बच्ची के साथ आई उस की दोस्त ने बताया कि लड़कों के समूह ने उसके प्राइवेट पार्ट पर साइकिल से टक्कर मारी और 5 लड़कों ने उस के मुंह पर मुक्के मारे. लड़कों ने बच्ची को गाली दी और कहा, ‘गंदे भारतीय, वापस जाओ.’

बच्ची की मां 8 साल से आयरलैंड में नर्स के रूप में काम कर रही है. उस ने हाल ही में आयरिश नागरिकता भी प्राप्त की है, पर वह अब वहां सुरक्षित महसूस नहीं करती. इस घटना के बाद उस की बच्ची ने बाहर जाना छोड़ दिया है. वह दिन भर खिड़की में बैठी बाहर खेलते हम उम्र बच्चों को बड़ी कातर दृष्टि से देखती रहती है, मगर बाहर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती. Racism

Relations : कुछ रिश्ते जो खून के रिश्तों से बड़े होते हैं

Relations : आज के समय जब प्रौपर्टी के लिए भाईभाई का दुश्मन है तब कुछ लोग ऐसे भी हैं जो यह साबित करते हैं कि खून के रिश्ते से भी बड़े कुछ रिश्ते होते हैं जो सीधे दिलों से जुड़े होते हैं. ऐसा ही एक मामला गुजरात से सामने आया है. जहां एक शख्श ने अपनी करोड़ों की जायदाद अपनी नौकरानी की पोती के नाम कर दी.

गुजरात के शाहीबाग़ में रहने वाले पेशे से इंजीनियर गुस्ताद बोरजोरजी टाटा इंडस्ट्रीज में काम करते थे. गुस्ताद का कोई कानूनी उत्तराधिकारी नहीं था. उनकी पत्नी का निधन साल 2001 में ही हो गया था. गुस्ताद बोरजोरजी के घर वर्षो से एक महिला नौकरानी के तौर पर काम करती थी. 2001 में गुस्ताद की पत्नी के निधन के बाद से वो बिलकुल अकेले थे. पत्नी के निधन और टाटा से रिटायरमैंट के बाद उन की देखभाल इसी नौकरानी ने ही की. इस नौकरानी की एक पोती थी जिस का नाम था अमीषा मकवाना.

गुस्ताद के अपनी कोई संतान नहीं थी तो वो नौकरानी की छोटी सी पोती अमीषा को ही अपनी संतान की तरह प्यार करने लगे. अमीषा की पढ़ाईलिखाई और उस के बचपन के सारे खर्च की जिम्मेदारी गुस्ताद ने उठाए. स्कूल के बाद अमीषा घर में ही रहती और पढ़ने के साथसाथ घर के कामों में अपनी दादी का हाथ बंटाटी थी. 2014 में जब अमीषा 13 साल की हुई तो गुस्ताद की मौत हो गई.

अपने पीछे इंजीनियर गुस्ताद अपनी वसीयत छोड़ गए जिस में उन्होंने शाहिबाग़ के मकान के साथ अपनी सरि सम्पत्ति अमीषा मकवाना के नाम कर दिया था. क्योंकि जिस दौरान वसीयत को अमीषा के नाम किया गया वह नाबालिग थी. इस के बाद साल 2023 में मकवाना ने वसीयत की प्रोबेट के लिए वकील आदिल सैयद के माध्यम से शहर की सिविल अदालत का दरवाजा खटखटाया और साक्ष्य प्रस्तुत किए कि वह इंजीनियर के साथ रहती थी तथा उन की मृत्यु तक उन की देखभाल करती थी. गुस्ताद की बेटी के तौर पर उन का ध्यान रखा. सब कुछ देखने के बाद कोर्ट ने संपत्ति को अमीषा को दे दिया. Relations

New Education Bill : क्या नए शिक्षा बिल से रुकेगी स्कूलों की मनमानी

New Education Bill : अन्ना आंदोलन से सत्ता में आई आम आदमी पार्टी के पास अपनी कोई विचारधारा नहीं थी इसलिए आप ने भ्रष्टाचार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को आधार बनाया और लगातार 2024 तक दिल्ली की सत्ता पर काबिज रहे लेकिन 2024 के विधानसभा चुनावों में आप की सत्ता चली गई. दिल्ली में 28 वर्षों के बाद बीजेपी सत्ता में आई है.

दिल्ली की जनता आम राज्यों से थोड़ी अलग है. बीजेपी शाषित दूसरे राज्यों में जहां बीजेपी के लिए शिक्षा जैसे मुद्दे गैरजरुरी होते हैं वहीं दिल्ली में बीजेपी शिक्षा पर नीतियां बना रही है. इस की वजह है. आप सरकार में शिक्षा मंत्री रहते हुए मनीष सिसोदिया ने दिल्ली में शिक्षा व्यवस्था और सरकारी स्कूलों में सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए. मनीष सिसोदिया ने प्राइवेट स्कूलों में फीस वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किए. अनधिकृत फीस वृद्धि के खिलाफ शिकायतों की जांच के लिए एक समिति का गठन किया और कई स्कूलों पर अनियमितताओं के लिए कार्रवाई की.

दिल्ली की बीजेपी सरकार की मजबूरी है कि वह दिल्ली में शिक्षा पर बात करे और शिक्षा से संबंधित कुछ ऐसी नीतियां बनाए जिस से पिछली आप सरकार के प्रयासों को टक्कर दिया जा सके.

दिल्ली की बीजेपी सरकार के शिक्षा मंत्री अशीष सूद ने सोमवार को विधानसभा में दिल्ली स्कूल शिक्षा (शुल्क निर्धारण एवं विनियमन में पारदर्शिता) विधेयक, 2025 पेश किया. इस बिल के मुताबिक, निजी स्कूल 3 वर्ष में एक बार ही फीस बढ़ा सकेंगे. इस नए विधेयक में फीस तय करने में स्कूल प्रबंधन के साथसाथ अभिभावकों की भी अहम भूमिका होगी.

दिल्ली स्कूल एजुकेशन (ट्रांसपेरेंसी इन फिक्सेशन एंड रेगुलेशन औफ फीस) बिल, 2025 के क्लोज 5 के मुताबिक किसी भी प्राइवेट स्कूल को फीस बढ़ाने के लिए स्कूल लेवल की 11 सदस्यों की समिति की मंजूरी लेनी होगी जिस में 5 अभिभावक होंगे, 1 चेयरमैन होगा जिसे स्कूल मैनेजमेंट तय करेगा, इन के अलावा इस कमेटी में प्रिंसिपल होगी, 3 टीचर होगी और 1 औब्जर्वर होगा.

इस में स्कूल प्रबंधन के अलावा शिक्षक और अभिभावक भी शामिल होंगे. अभिभावकों का चयन चुनाव के जरिए किया जाएगा.

स्कूल स्तर पर फैसला न होने पर मामला जिला स्तरीय समिति के पास जाएगा. इस में शामिल अधिकारियों, स्कूल, अभिभावकों की रजामंदी से फीस तय होगी.

जिला स्तर पर भी अगर फीस बढ़ोतरी को ले कर फैसला नहीं हो पाता है तो फिर राज्य स्तरीय समिति इस पर अंतिम फैसला करेगी.

इस बिल का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 15 फीसदी अभिभावकों की सहमति के बाद ही फीस बढ़ोतरी की शिकायत पर कार्रवाई होगी.

● 03 साल में सिर्फ एक बार फीस बढ़ोतरी कर सकेंगे स्कूल

● 50 हजार रुपए प्रति छात्र मुआवजा देना होगा, फीस के नाम पर अपमानित या नाम काटने पर

फीस बढ़ोतरी को ले कर स्कूल यदि सरकार का आदेश नहीं मानते हैं तो उन पर एक लाख से 10 लाख रुपए तक जुर्माना लगेगा. दोबारा गलती करने पर यह जुर्माना दोगुना हो जाएगा. नियमों का बारबार उल्लंघन करने पर स्कूल की मान्यता रद्द की जा सकती है या सरकार उस स्कूल का नियंत्रण भी ले सकती है.

प्राइवेट स्कूलों को ले कर आम आदमी में पहले से ही बहुत सी धारणाएं बैठी हुई हैं. प्राइवेट स्कूल लूटते हैं. मोटी फीस वसूलते हैं और कई बच्चोँ को फीस समय पर न देने की वजह से स्कूल से निकाल देते हैं. कुछ प्राइवेट स्कूलों का रवैया ऐसा होता भी है जिस से लोगों की यह धारणा मजबूत होती है लेकिन प्राइवेट स्कूलों की भी अपनी मजबूरियां होती हैं. प्राइवेट स्कूल सिर्फ समाज सेवा के लिए नहीं होते. इन्हें मैनेजमेंट से ले कर स्कूल के स्टाफ और दूसरे खर्चे भी पूरे करने होते हैं और मुनाफा भी बनाना होता है. इस के लिए इन स्कूलों को फीस में थोड़ी बहुत बढ़ोतरी करनी पड़ती है. इस में गलत कुछ नहीं है लेकिन ज्यादा मुनाफे के चक्कर में फीस में लगातार बढ़ोतरी करते जाना उचित नहीं है. इस से अभिभावकों की परेशानियां बढ़ती हैं. इसी समस्या पर नियंत्रण के लिए यह बिल जरुरी हो जाता है लेकिन इस बिल से प्राइवेट स्कूलों की मनमानी रुकेगी इस बात की गारंटी नहीं है.

अभिभावकों को खुश करने के लिए सरकारें इन निजी स्कूलों को लेकर जब तब तुगलकी फरमान जारी करती रहती है. सरकार को यदि सच में अभिभावकों की चिंता है तो वह सरकारी स्कूलों पर ध्यान क्यों नहीं देती? प्राइवेट स्कूलों की फीस बढ़ोतरी में पूरा मामला डिमांड और सप्लाई का है. हर अभिभावक अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में ही पढ़ाना चाहता है. इस से प्राइवेट स्कूलों पर बोझ बढ़ता है और वो इस समस्या से निपटने के लिए फीस बढ़ोतरी का रास्ता अपनाते हैं.

सवाल यह है कि अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूल ही क्यों चाहिए? लोगों का मानना होता है कि सरकारी स्कूलों की हालत खस्ता है. वहां पढ़ाई नहीं होती लेकिन सरकारी स्कूलों की इस बदहाली को सुधारने की जिम्मेदारी किस की है? पिछली सरकार ने सरकारी स्कूलों की गुड़वत्ता को सुधारने के लिए काफ़ी प्रयास किए थे लेकिन बीजेपी सरकार के सत्ता में आते ही वो सारे प्रयास ठंडे बसते में चले गए क्योंकि बीजेपी के लिए शिक्षा कभी जरूरी मुद्दा नहीं रहा. इसी बीजेपी सरकार ने यूपी में 5 हजार सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया. प्राइवेट स्कूलों में फीस वृद्धि को रोकने के लिए लाया गया बिल केवल जनता को खुश करने का एक प्रयास ही है.

इस बिल के अनुसार प्राइवेट स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोतरी को रोकने के लिए स्कूल लेवल की 11 सदस्यों की समिति की मंजूरी लेने की जरूरत होगी. इस कमेटी में 5 अभिभावक भी होंगे 1 चेयरमैन होगा जिसे स्कूल मैनेजमेंट तय करेगा, इन के अलावा इस कमेटी में प्रिंसिपल होगी, 3 टीचर होगी और 1 औब्जर्वर होगा.

बिल का यह मसौदा देखने में क्रांतिकारी लग सकता है लेकिन यह कौन तय करेगा की स्कूल लेवल की यह कमेटी पूरी तरह निष्पक्षता से फैसला करेगी? जब विधायक और सांसद बेचे खरीदे जा सकते हैं तो स्कूल के इन सदस्यों की ईमानदारी की गारंटी कौन तय करेगा? New Education Bill

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