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Superstition : अंधविश्वासी मांबाप और इकलौती संतान

Superstition : 60-70 के दशक में यह उम्मीद की जाती थी कि जैसेजैसे लोग शिक्षित होंगे वैसेवैसे अंधविश्वास कम होंगे लेकिन हुआ उलटा, अंधविश्वास और अंधविश्वासी और बढ़ रहे हैं क्योंकि उन का पहला स्कूल घर और पहले टीचर खुद पेरैंट्स हैं जिन के साथ रहना आर्थिक और भावनात्मक के अलावा सामाजिक विवशता भी है.

मैं तब बेंगलुरु के एक नामी इंस्टिट्यूट से एमबीए कर रहा था और होस्टल में रहता था. एक दिन सुबह सुबह मम्मी का फोन आया कि रिश्ते के एक चाचा नहीं रहे. इसलिए मुझे तला कुछ नहीं खाना है और 10 दिनों तक शेव नहीं करना है. क्यों, यह पूछने पर वही पुराना जवाब मिला कि घर में सूतक लगे हैं.

28 वर्षीय संकेत याद करते बताता है, ‘मुझे न पहले कभी समझ आया था, न तब आया था और आगे भी कभी शायद ही आए कि यह सूतक होती क्या बला है. क्योंकि ऐसा पहले भी दोतीन बार हो चुका था और सूतक लगने पर घर में कड़ाही का इस्तेमाल नहीं हुआ था. पापा ने 10 दिन यानी शुद्धि के दिन तक दाढ़ी नहीं बनाई थी और भी कुछ बंदिशें थीं. तब मैं छोटा था, इसलिए खामोश रहा था और 10 दिन उबलाथुबला, बेस्वाद खाना जैसेतैसे गले के नीचे उतार लेना मजबूरी थी. पर यह मजबूरी आज से 4 साल पहले नहीं थी, जब वे चाचा नहीं रहे थे जिन्हें मैं ने होश संभालने तक कभी देखा भी नहीं था. यहां होस्टल में न मम्मी थी और न ही पापा थे, इसलिए कोई परहेज नहीं किया था.’

‘लेकिन यह समस्या का हल नहीं है’, संकेत कहता है, ‘ऐसे कोई दर्जनभर से भी ज्यादा ढकोसलों का पालन घर में होता है जिन्हें मम्मीपापा तो करते हैं पर मुझ से भी एक तरह से जबरन करवाते हैं और मैं इच्छा और विश्वास न होते हुए भी करता हूं. मैं उन की इकलौती संतान हूं और उन्हें बहुत चाहता हूं, वे भी मुझे बेइंतहा चाहते हैं, इसलिए उन की भावनाओं और मान्यताओं को मैं ठेस नहीं पहुंचाना चाहता. बावजूद यह जाननेसमझने के कि इन मान्यताओं और अंधविश्वासों के पीछे कोई ठोस वजह नहीं है.’

संकेत इन दिनों अपने घर भोपाल में है और एक बड़ी औटोमोबाइल कंपनी में वर्क फ्रौम होम के तहत घर से ही जौब कर रहा है. ऐसे अंधविश्वासों पर पेरैंट्स से दूसरे युवाओं की तरह वह ज्यादा बहस नहीं कर पाता. इस की वजहें साफ़ हैं. पहली तो पेरैंट्स का स्वाभाविक आदरसम्मान और दूसरी है, ज्यादा तर्क करने पर उन का झल्ला जाना, क्योंकि उन के पास कोई तर्कपूर्ण जवाब नहीं होता. इसलिए आखिर में वे खीझ कर यही कहते हैं कि तो ठीक है जो जी में आए वो करो लेकिन हम तो इन्हें मानेंगे तुम हमारे मरने पर सर भी मत मुड़ाना वगैरहवगैरह.

ऐसे अंधविश्वासी मांबाप के साथ रहना आसान नहीं है, बल्कि एक तरह का चैलेंज है कि आप उन्हें अंधविश्वासों की बाबत समझा पाएं या न समझा पाएं लेकिन खुद को उन से दूर रखने में सफल हों. 32 वर्षीया नेहा बताती है, ‘आप उन्हें नहीं बदल सकते और न ही खुद बदल सकते, इसलिए बैलेंस करना ही पड़ता है.’ नेहा एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर है और संकेत की ही तरह इकलौती संतान है. चूंकि पेरैंट्स को अकेला नहीं छोड़ना चाहती, इसलिए अभी तक शादी नहीं की और न ही हालफिलहाल करने का उस का इरादा है.

‘शादी न करने का मेरा फैसला निहायत ही व्यक्तिगत है जिसे ले कर मम्मी के टोनेटोटके भी पनाह मांगते हैं,’ नेहा हंसते हुए कहती है, ‘मेरी शादी के लिए उन्होंने खूब व्रतउपवास किए, एकदो बार नहीं बल्कि 5 बार सोलह सोमवार का व्रत किया, खूब मन्नतें मांगीं, ज्योतिषियों के चक्कर काटे जो हर बार हजारपांचसौ की दक्षिणा झटक कर उन्हें कोर्ट के बाबू की तरह अगली तारीख दे देते थे कि बस योग बन ही रहा है, सालछह महीने में शादी हो ही जाएगी. इस पर भी बात नहीं बनी तो कुछ ज्योतिषियों से उन्होंने पूजापाठ भी करवाए, लालपीली टाइप पूजनें भी करवाईं. लेकिन मैं अपनी जगह दृढ थी.

‘इस सिलसिले को 6 साल होने आ रहे हैं, अब उन की हिम्मत और जिद जवाब देने लगे हैं. इस पर कभीकभी मैं उन से हंसीमजाक में कह भी देती हूं कि इन फुजूल की चीजों में दम होता तो अब तक मेरी एक नहीं बल्कि दोचार शादियां हो जानी चाहिए थीं. हालांकि उन्हें दुखी और चिंतित देख मुझे तनिक भी अच्छा नहीं लगता,’ वह थोड़ा तल्ख हो कर कहती है, ‘लेकिन इस का यह मतलब भी नहीं कि मैं अपनी मरजी से बिलकुल ही कोई व्यक्तिगत फैसला न लूं. तरहतरह से मैं अपनी फीलिंग्स मम्मीपापा दोनों को बता चुकी हूं. अफसोस तो इस बात का है कि वे मुझे समझने के बजाय ज्योतिषियों की बात ज्यादा समझते हैं कि आप की बेटी का मंगल ज्यादा स्ट्रौंग है, इसलिए वह जिद में आ कर शादी नहीं कर रही. नहीं तो तीन बार योग आ कर टल चुका है.’

निश्चित रूप से ऐसे पेरैंट्स, जैसे कि नेहा के हैं और जैसे कि आमतौर 90 फीसदी युवाओं के होते हैं, के साथ निभाना दुष्कर काम है. पर इस का यह मतलब भी नहीं कि उन का साथ छोड़ दिया जाए या उन की अनदेखी की जानी शुरू कर दी जाए. तो फिर हल क्या है, इस का जवाब हर किसी के पास नहीं और जिन के पास है वे ‘दीवार’ फिल्म का हवाला देते कह सकते हैं कि अमिताभ बच्चन और निरूपा राय जैसे रहो. दोनों अपनेअपने उसूलों पर अड़े रहे. लेकिन परेशानी यह है कि पेरैंट्स बचपन से ही संतान को अंधविश्वासों में ढकेल देते हैं.

यहां भी दिक्कत यह है कि इस अड़े रहने में अंधविश्वासी मांबाप ही भारी पड़ते हैं. भोपाल के नजदीक सीहोर के एक युवा की मानें तो अपनी झख थोपने के लिए वे इमोशनल ब्लैकमेलिंग करने लगते हैं. इस कारोबारी युवा का रोना यह है कि उस की मां विकट की अंधविश्वासी हैं इतनी कि घर के बाहर शाम के बाद कोई कुत्ताबिल्ली रो भी दे तो वे तरहतरह के उपाय करने लगती हैं जिन में से खास है तुरंत मंदिर जा कर नारियल और मावे की मिठाई का प्रसाद चढ़ाना, पंडित को दान देना और घर में भगवान की मूर्ति के सामने माला जपने बैठ जाना व सूरज के उगने तक महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते रहना. उन के दिलोदिमाग में गहरे तक यह अंधविश्वास पसरा है कि सूर्यास्त के बाद घर के बाहर कुत्ता या बिल्ली रोए तो यह घोर अपशकुन होता है जिस के चलते घर में किसी की मौत भी हो सकती है.

ऐसा हर तीसरेचौथे दिन होता है कि किसी कुत्ते या बिल्ली के रोने की आवाज सुनाई दे ही जाती है. दरअसल, इस कारोबारी का घर शहर के पुराने इलाके में है जहां कुछ वर्षों पहले तक बांस का घना जंगल था और अभी भी एक कोना लगभग सुनसान है, वहां जानवरों ने डेरा डाल रखा है. अब वहां कोई कलाकार सितारगिटार तो बजाएगा नहीं. कुत्ते बिल्ली ही शोर मचाएंगे, भूंकेंगे, म्याऊंम्याऊं भी करेंगे और रोएंगे भी. कई बार पापा से मकान बेच कर किसी नई कालोनी में घर खरीदने की पेशकश की लेकिन अंधविश्वासों के मामले में वे मम्मी को भी मात यह कहते देते हैं कि इस पुश्तैनी घर में एक पीर बाबा का आला यानी निवास है, उन्हें छोड़ कर नहीं जा सकते, वे नाराज हो गए तो कहर टूट पड़ेगा.

यह युवा बेहद त्रस्त हो चुका है और रोजरोज नारकीय जिंदगी जी रहा है लेकिन असहाय है कि क्या करे कि जिस से हर कभी दिन का चैन और रात की नींद ख़राब न हो. लेकिन उसे भी समझ नहीं आ रहा कि अंधविश्वासी मांबाप को कैसे समझाए. एकाध बार सख्ती से समझाने की कोशिश की थी तो मम्मी भड़क उठी थीं कि तू तो बहू के कहने में है. हमें किसी वृद्धआश्रम में छोड़ आ या किसी रिश्तेदार के यहां भेज दे.

यह यानी अंधविश्वासी मांबाप के साथ रहना उन समस्याओं में से एक है जिन का कोई हल किसी के पास नहीं. यह समस्या शाश्वत इसलिए भी है कि कुछ और मिले न मिले, विरासत में बिना वसीयत के अंधविश्वास जरूर मिल जाते हैं. आज जो युवा अपने पेरैंट्स की अंधविश्वासी मानसिकता से त्रस्त हैं, इस बात की कोई गारंटी नहीं कि कल को वे भी इन्हीं की राह नहीं चलेंगे. संकेत को आज सूतक और दूसरे पाखंड खल रहे हैं लेकिन यह पूछने पर वह अचकचा जाता है कि क्या कल को पिता के निधन पर वह वाकई में सिर के बाल नहीं देगा, घर की शुद्धि नहीं करेगा, गंगापूजन और मृत्युभोज का आयोजन नहीं करेगा, सालाना श्राद्ध नहीं करेगा.

मुमकिन है वह पेरैंट्स से कुछ कम करे लेकिन अंधविश्वास करेगा तो यह वह खुद स्वीकारता है और यह कन्फेशन एक युवक का नहीं बल्कि एक पूरी पीढ़ी का है जिस का सार यह है कि हम एक सामाजिक दबाव और दैवीय डर में जीते हैं. उस दर से लड़ने के लिए जिस निर्भीक मानसिकता और इच्छाशक्ति की जरूरत होती है उसे धर्म की दुकानें पनपने ही नहीं देतीं और वे अपने प्रचारप्रसार में दिनरात जुटी रहती हैं. नरेंद्र दाभोलकर जैसी अंधविश्वास विरोधी हस्तियों की दिनदहाड़े हत्या कर दी जाती है क्योंकि वे समाज को तार्किक तरीके से जागरूक कर रहे होते हैं.

न केवल हिंदू बल्कि मुसलिम, ईसाई, सिख और जैन समुदाय के परिवार भी अपनेअपने धर्म के दिए अंधविश्वासों में जकड़े हुए हैं. दूरदूर तक इन से मुक्ति के कोई आसार नहीं दिख रहे क्योंकि अंधविश्वासों का पहला स्कूल घर और प्रथम शिक्षक मांबाप ही हैं, सो, कोई क्या कर लेगा.

Ratan Tata की वसीयत में कुत्ते से ले कर रसोइये तक का नाम

Ratan Tata : भारत के सम्मानित उद्योगपति रतन टाटा की पिछले वर्ष 9 अक्तूबर को मृत्यु हुई. करीबन 6 महीने बाद उन की वसीयत डिस्क्लोज हुई है, जिस में कई दिलचस्प जानकारियां सामने आई हैं.

भारत के कारोबारी जगत में जब उपब्धियों की बात होगी, तब रतन टाटा का नाम सब से ऊपर रखा जाएगा. उन के नेतृत्व में, टाटा समूह ने वैश्विक स्तर पर विस्तार पाया. रतन टाटा ने टाटा समूह को नया आकार दिया. उन की नेतृत्व क्षमता और उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 2000 में उन्हें देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण प्रदान किया गया और वर्ष 2008 में उन्हें दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.

रतन टाटा को देश के सब से बड़े व्यापारिक घरानों में से एक के नेतृत्व के साथसाथ महत्वपूर्ण परोपकारी गतिविधियों के लिए जाना जाता है. टाटा की विरासत कौर्पोरेट क्षेत्र की सीमाओं से परे लाखों आम लोगों के जीवन को प्रभावित करती है.

रतन टाटा का पूरा नाम रतन नवल टाटा था. वे नवल टाटा और सूनी टाटा के पुत्र थे. उन का जन्म 28 दिसंबर 1937 को हुआ. रतन सिर्फ़ 10 साल के थे जब उन के मातापिता के बीच तलाक हो गया. जब रतन 18 वर्ष के हुए तो उन के पिता ने एक स्विस महिला सिमोन दुनोयर से शादी कर ली और उन की माता ने तलाक के बाद सर जमशेदजी जीजी से विवाह कर लिया. तब रतन को उन की दादी लेडी नवाजबाई टाटा ने पाला. लेडी नवाजबाई टाटा संस की पहली महिला निदेशक थीं. यह पद उन्होंने 1925 में संभाला था और उन्हें हमेशा एक उदार परोपकारी व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है.

दादी के परोपकारी व्यक्तित्व का प्रभाव रतन पर बचपन से पड़ा. उन की छत्रछाया में बड़े होते हुए रतन टाटा ने साल 1962 में कार्नेल यूनिवर्सिटी से बी.आर्क की डिग्री प्राप्त की थी. 1962 के अंत में भारत लौटने से पहले उन्होंने लौस एंजिल्स में जोन्स और इमन्स के साथ कुछ समय काम किया. साल 1962 में रतनटाटा ने जमशेदपुर में टाटा स्टील में काम करना शुरू किया.

रतन टाटा का सफर एक प्रेरणादायक कहानी है, जो उन की दूरदर्शिता, मेहनत और नेतृत्व कौशल को दर्शाता है. रतन टाटा मशहूर उद्योगपति तो थे ही लेकिन उन की सादगी के लिए भी उन्हें जाना जाता था. रतन टाटा के छोटे भाई जिमी नवल टाटा हैं जो बेहद सामान्य जीवन जीते हैं. वे मुंबई के कोलाबा के दो बेडरूम वाले फ्लैट में रहते हैं. लेकिन टाटा ग्रुप में उन की भी हिस्सेदारी है. उन्होंने भी रतन टाटा की तरह शादी नहीं की है.

रतन टाटा का पिछले साल 9 अक्टूबर, 2024 को 86 वर्ष की आयु में निधन हुआ. इस के बाद उन की एक वसीयत सामने आई, जिस की चर्चा जोरों से हो रही है. इस वसीयत के मुताबिक टाटा की संपत्ति में सब से ज्यादा हिस्सा चैरिटी को दिया गया है. इस के अलावा वसीयत में परिवार, दोस्तों, घर के काम करने वाले नौकरों और यहां तक कि पालतू जानवरों का भी ध्यान रखते हुए सब को कुछ न कुछ दिया गया है.

रतन टाटा ने वसीयत में अपने पालतू कुत्ते ‘टीटो’ की हमेशा देखभाल करने की बात लिखी है. ये एक जर्मन शेफर्ड है. इस के लिए उन्होंने अंगरेजी में ‘अनलिमिटेड केयर’ शब्द का इस्तेमाल किया है. रतन टाटा के रसोइये सुब्बया का नाम भी वसीयत में शामिल है.

रतन टाटा की अनुमानित संपत्ति 3,800 करोड़ रुपए आंकी गई है. इस में टाटा संस के साधारण और प्रेफरेंशियल शेयर और अन्य संपत्तियां शामिल हैं. ये दान रतन टाटा एंडोमेंट फाउंडेशन, रतन टाटा एंडोमेंट ट्रस्ट और एक अन्य कंपनी को दिया जाएगा. ये कंपनियां दान और परोपकार के काम करती हैं.

रतन टाटा ने अपनी संपत्ति का करीब एकतिहाई हिस्सा अपनी दो सौतेली बहनों शिरीन जीजीभोय और डीना जीजीभोय को और टाटा समूह की पूर्व कर्मचारी मोहिनी एम. दत्ता के लिए छोड़ी है, जो दिवंगत उद्योगपति की करीबी थीं. इस की कुल वैल्यू करीब 800 करोड़ रुपए है. इस में बैंक एफडी, फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स, घड़ियां और पेंटिंग्स जैसे एसेट्स शामिल हैं.

वसीयत के अनुसार उन के जुहू बंगले का आधा हिस्सा रतन टाटा के भाई 82 वर्षीय जिमी नवल टाटा को मिलेगा, जबकि शेष सिमोन टाटा और नोएल टाटा को दिया जाएगा. रतन टाटा के करीबी दोस्त मेहली मिस्त्री को अलीबाग की संपत्ति और टाटा की 3 बंदूकें, जिस में एक प्वाइंट 25 बोर की पिस्टल भी शामिल है, मिलेंगी.

उन की इच्छा के अनुसार, उन के पालतू जानवरों के लिए 12 लाख रुपए का फंड बनाया जाएगा. प्रत्येक पालतू जानवर को हर तिमाही में 30,000 रुपए मिलेंगे. रतन टाटा के करीबी सहयोगी रहे शांतनु नायडू और पड़ोसी जेक मालिटे का एजुकेशन लोन माफ कर दिया जाएगा.

रतन टाटा ने 23 फरवरी, 2022 को जो वसीयत बनाई थी उस में 4 कोडिसिल हैं. कोडिसिल का मतलब है वसीयत पर साइन करने के बाद उस में कुछ बदलाव करना. आखिरी कोडिसिल में यह बताया गया है कि रतन टाटा ने कुछ कंपनियों के शेयर खरीदे थे. इन में लिस्टेड और अनलिस्टेड दोनों तरह की कंपनियां शामिल हैं. इस के अलावा, कुछ ऐसी संपत्ति भी थीं जिस के बारे में वसीयत में कुछ नहीं लिखा था. यह सब रतन टाटा एंडोमेंट फाउंडेशन और रतन टाटा एंडोमेंट ट्रस्ट को बराबर बराबर दिया जाएगा.

रतन टाटा की लगभग 40 करोड़ रुपए की विदेशी संपत्ति में सेशेल्स में जमीन, वेल्स फ़ार्गो बैंक और मौर्गन स्टेनली के खाते, एल्कोआ कौर्प और हाउमेट एयरोस्पेस के शेयर शामिल हैं.

असेट लिस्ट में बुलगारी, पाटेक फिलिप, टिसोट और औडेमर्स पिगुएट जैसे ब्रांड्स की 65 घड़ियां हैं. टाटा ने सेशेल्स में अपनी जमीन आरएनटी एसोसिएट्स सिंगापुर को दी है.

वसीयत का प्रोबेट एक कानूनी प्रक्रिया है. इस में कोर्ट यह देखता है कि वसीयत असली है या नहीं. अगर वसीयत सही पाई जाती है, तो कोर्ट उसे लागू करने की अनुमति दे देता है. इस के बाद, वसीयत को लागू करने वाला व्यक्ति टाटा वसीयत के अनुसार संपत्ति का बंटवारा कर सकता है. वकील डेरियस खंबाटा, मेहली मिस्त्री, शिरीन और डीना जेजेभोय वसीयत को लागू करने वाले हैं. संपत्ति का बंटवारा तभी होगा जब कोर्ट इसे सही मानेगा. इस प्रक्रिया में लगभग 6 महीने का समय लगेगा. वसीयत में ‘नो कान्टेस्ट’ क्लौज भी शामिल है. इस के मुताबिक, वसीयत को चुनौती देने वाला शख्स वसीयत के दावे से बाहर माना जाएगा.

वसीयत के एक्सक्यूटर्स ने वसीयत की अंतिम प्रोबेट के लिए बौम्बे उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है, जिस में चौथा कोडिसिल शामिल है. लास्ट कोडिसिल में कहा गया है कि रतन टाटा ने जिन नौन लिस्टेड स्टौक और नौन लिस्टेड कंपनियों में निवेश किया था, उन के शेयरों के साथसाथ कहीं और कवर नहीं की गई संपत्तियों को रतन टाटा एंडोमेंट फाउंडेशन और रतन टाटा एंडोमेंट ट्रस्ट में समान रूप से बांटा जाएगा.

Best Story : मुहब्बत पर फतवा – नुसरत बानो ने दूसरे निकाह का ख्वाब क्यों नहीं पाला

Best Story : रजिया को छोड़ कर उस के वालिद ने दुनिया को अलविदा कह दिया. उस समय रजिया की उम्र तकरीबन 2 साल की रही होगी. रजिया को पालने, बेहतर तालीम दिलाने का जिम्मा उस की मां नुसरत बानो पर आ पड़ा. खानदान में सिर्फ रजिया के चाचा, चाची और एक लड़का नफीस था. माली हालत बेहतर थी. घर में 2 बच्चों की परवरिश बेहतर ढंग से हो सके, इस का माकूल इंतजाम था. अपने शौहर की बात को गांठ बांध कर नुसरत बानो ने दूसरे निकाह का ख्वाब पाला ही नहीं. वे रजिया को खूब पढ़ालिखा कर डाक्टर बनाने का सपना देखने लगीं. ‘‘देखो बेटी, तुम्हारी प्राइमरी की पढ़ाई यहां हो चुकी है. तुम्हें आगे पढ़ना है, तो शहर जा कर पढ़ाई करनी पड़ेगी. शहर भी पास में ही है. तुम्हारे रहनेपढ़ाने का इंतजाम हम करा देंगे, पर मन लगा कर पढ़ना होगा… समझी?’’ यह बात रजिया के चाचा रहमत ने कही थी.

दोनों बच्चों ने उन की बात पर अपनी रजामंदी जताई. अब रजिया और उस के चाचा का लड़का नफीस साथसाथ आटोरिकशे से शहर पढ़ने जाने लगे. दोनों बच्चे धीरेधीरे आपस में काफी घुलमिल गए थे. स्कूल से आ कर वे दोनों अकसर साथसाथ रहते थे. चानक एक दिन बादल छाए, गरज के साथ पानी बरसने लगा. रजिया ने आटोरिकशे वाले से जल्दी घर चलने को कहा. इस पर आटोरिकशा वाले ने कुछ देर बरसात के थमने का इंतजार करने को कहा, पर रजिया नहीं मानी और जल्दी घर चलने की जिद करने लगी. भारी बारिश के बीच तेज रफ्तार से चल रहा आटोरिकशा अचानक एक मोड़ पर आ कर पलट गया. ड्राइवर आटोरिकशा वहीं छोड़ कर भाग गया.

रजिया आटोरिकशा के बीच फंस गई, जबकि नफीस यह हादसा होते ही उछल कर दूर जा गिरा. उस ने बहादुरी से पीछे आ रहे अनजान मोटरसाइकिल वाले की मदद से आटोरिकशे में फंसी रजिया को बाहर निकाला.

‘‘मामूली चोट है. उसे 2-3 दिन अस्पताल में रहना होगा,’’ डाक्टर ने कहा.

‘‘ठीक है. आप भरती कर लें डाक्टर साहब,’’ रजिया के चाचा रहमत ने कहा. नफीस अपने परिवार वालों के साथ रजिया की तीमारदारी में लग गया. परिवार वाले दोनों के प्यार को देख कर खुश होते.

‘‘नफीस, अब तुम सो जाओ. रात ज्यादा हो गई है. मुझे जब नींद आ जाएगी, तो मैं भी सो जाऊंगी,’’  रजिया ने कहा.

‘‘नहीं, जब तक तुम्हें नींद नहीं आएगी, तब तक मैं भी जागूंगा,’’ नफीस बोला. नफीस ने रजिया की देखरेख में कोई कसर नहीं छोड़ी. उस की इस खिदमत से रजिया उसे अब और ज्यादा चाहने लगी थी.

‘‘अम्मी देखो, मैं और नफीस मैरिट में पास हो गए हैं.’’

अम्मी यह सुन कर खुश हो गईं. थोड़ी देर के बाद वे बोलीं, ‘‘अब तुम दोनों अलगअलग कालेज में पढ़ोगे.’’

‘‘पर, क्यों अम्मी?’’ रजिया ने पूछा.

‘‘तुम डाक्टर की पढ़ाई करोगी और नफीस इंजीनियरिंग की. दोनों के अलगअलग कालेज हैं. अब तुम दोनों एकसाथ थोड़े ही पढ़ पाओगे. नफीस के अब्बू उसे इंजीनियर बनाना चाहते हैं. हां, पर रहोगे एक ही शहर में,’’ अम्मी ने रजिया को प्यार से समझाया.

‘‘ठीक है अम्मी,’’ रजिया ने छोटा सा जवाब दिया. उन दोनों का अलगअलग कालेज में दाखिला हो गया. दाखिला मिलते ही वे दोनों अलगअलग होस्टल में रहने लगे. एक रात अचानक 11 बजे नफीस के मोबाइल फोन की घंटी बजी.

‘‘नफीस, सो गए क्या?’’ रजिया ने पूछा.

‘‘नहीं रजिया, तुम्हारी याद मुझे बेचैन कर रही है. साथ ही, अम्मीअब्बू और बड़ी अम्मी की याद भी आ रही है,’’ कह कर नफीस सिसक उठा.

‘‘जो हाल तुम्हारा है, वही हाल मेरा भी है. कैसे बताऊं कि दिनरात तुम्हारे बिना कैसे गुजर रहे हैं,’’ रजिया बोली.

वे दोनों बहुत देर तक बातें करते रहे और फिर ‘शब्बाखैर’ कह कर सो गए.

‘‘मैडम, यह मेरे देवर का लड़का नफीस है. अब तक इन दोनों बच्चों ने साथसाथ खेलकूद कर पढ़ाई की है. अब ये परिवार से दूर अलगअलग रहेंगे. अगर नफीस अपनी बहन से मिलने आता है, तो इसे आप मिलने की इजाजत दे दें. इस बाबत आप वार्डन को भी बता दें, तो आप की मेहरबानी होगी,’’ रजिया की अम्मी ने कालेज की प्रिंसिपल से कहा.

‘‘ठीक है, पर हफ्ते में सिर्फ छुट्टी के दिन रविवार को ही मिल सकते हैं,’’ प्रिंसिपल ने कहा.

‘‘जी ठीक है, हमें मंजूर है.’’

रविवार का इंतजार करना नफीस को भारी पड़ता था. रविवार आते ही वह रजिया से मिलने उस के होस्टल मोटरसाइकिल से पहुंच जाता था. वे दोनों घंटों बैठ कर बातें करते थे. जातेजाते नफीस होस्टल के गेटकीपर को इनाम देना नहीं भूलता था. वह वार्डन को भी तोहफे देता था. एक बार नफीस अपने दोस्त के साथ रजिया से मिलने पहुंचा और बोला, ‘‘रजिया, यह मेरा दोस्त अमान है. हम दोनों एक ही कमरे में रहते हैं.’’

‘‘अच्छा, आप कहां के रहने वाले हैं?’’ रजिया ने अमान से पूछा.

‘‘जी, आप के गांव के पास का.’’

इस तरह नफीस ने अमान का परिचय करा कर उस की खूब तारीफ की. अब तो अमान भी रजिया से मिलने नफीस के साथ आ जाता था. वे एकदूसरे से इतने घुलमिल गए, जैसे बरसों की पहचान हो.

‘‘रजिया, क्या तुम नफीस को चाहती हो?’’ अमान ने अकेले में रजिया से पूछा.

‘‘हां, कोई शक?’’ रजिया बोली.

‘‘नहीं,’’ अमान ने कहा.

अमान इस फैसले पर नहीं पहुंच पा रहा था कि उन का प्यार दोनों भाईबहन जैसा था या प्रेमीप्रेमिका जैसा. समय का पहिया घूमा. रजिया के एकतरफा प्यार में डूबा अमान उसे पा लेने के सपने संजोने लगा. इम्तिहान खत्म हो गए थे. बुलावे पर रजिया की मां उसे घर में अपने देवर के भरोसे छोड़ कर मायके चली गई थीं. टैलीविजन देखने के बहाने नफीस देर रात तक रजिया के कमरे में रहा. ज्यादा रात होने पर रजिया ने कहा, ‘‘तुम यहीं बाहर बरामदे में सो जाओ. मुझे अकेले में डर लगता है.’’नफीस बरामदे में अपना बिस्तर डाल कर सोने की कोशिश करने लगा, पर आंखों में नींद कहां. वह तो रजिया के प्यार के सपने बुनने लगा था. रात बीतती जा रही थी. नफीस को अचानक अंदर से रजिया के कराहने की आवाज आई. वह बिस्तर से उठ बैठा. दरवाजे के पास जा कर जोर से दरवाजा खटखटाया. दरवाजा पहले से खुला था. वह अंदर गया.

नफीस ने घबरा कर पूछा, ‘‘क्या हुआ रजिया?’’

‘‘पेट में दर्द हो रहा है,’’ रजिया ने कराहते हुए कहा.

‘‘मैं अम्मी को बुला कर लाता हूं,’’ सुन कर नफीस ने कहा.

‘‘नहीं, अम्मी को बुला कर मत लाओ. मैं ने दवा खा ली है. ठीक हो जाऊंगी. किसी को भी परेशान करने की जरूरत नहीं है… तुम मेरे पास आ कर बैठो. जरा मेरे पेट को सहलाओ. इस से शायद मुझे राहत मिले.’’

नफीस उस के पेट को सहलाने लगा. नफीस के हाथ की छुअन पाते ही रजिया के मन में सैक्स उभरने लगा. इधर नफीस भी आंखें बंद कर के पेट सहलाता जा रहा था, तभी रजिया ने नफीस का हाथ पकड़ कर अपने उभारों पर रख दिया. नफीस के हाथ रखते ही वह गुलाब की तरह खिल उठी.

‘‘जरा जोर से सहलाओ,’’ रजिया अब पूरी तरह बहक चुकी थी. उस ने एक झटके से नफीस को खींच कर अपने बगल में लिटा लिया और ऊपर से रजाई ढक ली. और वह सबकुछ हो गया, जिस की उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी. उधर अमान को भी रजिया की जुदाई तड़पा रही थी. जब उस से रहा नहीं गया, तो वह नफीस से मिलने के बहाने उस के गांव जा पहुंचा. नफीस ने उस की खूब खातिरदारी की. वह रजिया से भी मिला. अमान ने रजिया से उस का मोबाइल नंबर मांगा, पर रजिया ने बहाना बना कर नहीं दिया, न ही फोन पर बात करने को कहा. अमान भारी मन से लौट गया.

पढ़ाई का यह आखिरी साल था. नफीस की उम्र 21 साल की होने जा रही थी, वहीं रजिया 18वां वसंत पार कर 19वें की ओर बढ़ रही थी. उस की बोलचाल किसी को भी अपना बनाने के लिए दावत देती थी. बादलों के बीच चमकती बिजली सी जब वह घर से बाहर निकलती, तो कई उस के दीवाने हो जाते.कालेज खुल चुके थे. वे दोनों अपनेअपने होस्टल में पहुंच चुके थे.

एक दिन रजिया ने अपनी प्रिंसिपल से कहा, ‘‘मैडम, हमें बाहर खाना खाने के लिए 2 घंटे का समय मिलना चाहिए, क्योंकि होस्टल में शाकाहारी खाना मिलता है और हम…’’

‘‘ठीक है, रविवार को चली जाया करो,’’ प्रिंसिपल ने अपनी रजामंदी दे दी.

इस के बाद नफीस और रजिया मोटरसाइकिल पर सवार हो कर एक होटल पहुंच गए. नफीस ने पहले ही वहां एक कमरा बुक करा रखा था. अब तो सिलसिला चल पड़ा और वे दोनों अपने तन की प्यास बुझाने होटल आ जाते थे. एक दिन अमान भी होटल में नफीस और रजिया को देख कर पहुंच गया.

‘‘मैनेजर, अभीअभी एक लड़का और एक लड़की आप के होटल में आए हैं. वे किस कमरे में ठहरे हैं?’’ अमान ने पूछा.

‘‘मुझे पता नहीं. कई लोग आतेजाते हैं. आप खुद देख लो,’’ मैनेजर ने कहा.

अमान ने सारा होटल देख डाला, पर उसे वे दोनों नहीं मिले. अब अमान की जिज्ञासा और बढ़ गई.

अगले दिन अमान ने नफीस से पूछा, ‘‘कल मैं ने तुम्हें और रजिया को एक होटल में जाते हुए देखा था, पर तुम वहां अंदर कहीं नहीं दिखे.’’

नफीस चुपचाप सबकुछ सुनता रहा, पर बोला कुछ नहीं. अमान के जाने के बाद नफीस रजिया से मिला और बोला, ‘‘रजिया, ऐसा लगता है, जैसे अमान हमारी जासूसी कर रहा है. वह हमें ढूंढ़तेढूंढ़ते होटल में जा पहुंचा था.’’

‘‘हमें अब दूरी कम करनी होगी, नहीं तो बवाल खड़ा हो जाएगा,’’ रजिया डरते हुए बोली.

समय तेजी से आगे बढ़ता जा रहा था. कैसे एक साल बीत गया, पता नहीं चला. अमान ने सोचा कि अगर रजिया को पाना है, तो नफीस से दोस्ती बना कर रखनी होगी. इम्तिहान शुरू हो गए थे. आज रजिया का आखिरी पेपर था. दूसरे दिन घर वापस आना था. अमान का रजिया से मिलने का सपना टूटने लगा. प्यार से बेखबर रजिया के पेट में नफीस का 4 महीने का बच्चा पल रहा था. कहा गया है कि आदमी जोश में होश खो बैठता है. डाक्टरी की पढ़ाई करने के बाद भी रजिया अपना बचाव नहीं कर पाई.

‘‘मेरी बात ध्यान से सुनिए. अगर आप ने पेट गिराने की कोशिश की, तो लड़की की जान जा सकती है. आगे आप जानें. आप मरीज को घर ले जाइए,’’ डाक्टर ने रजिया का मुआयना कर के कहा.

डाक्टर की बात सुन कर रजिया की अम्मी, चाचाचाची सकते में आ गए. रजिया को घर ले आए. सभी ने रजिया से पूछा कि किस का पाप पेट में पल रहा है, पर वह खामोश रही. आंसू बहाती रही. नफीस पर कोई शक नहीं कर रहा था. बात धीरेधीरे गांव में फैल गई. हर किसी की जबान पर रजिया का नाम था. अगर उसे शहर में पढ़ने को नहीं भेजते, तो ऐसा नहीं होता. अमान पर शक की सूई घूमी, उस से ही निकाह कर दिया जाए. एक रिश्तेदार कासिद को उस के घर भेजा गया, पर वह पैगाम ले कर खाली हाथ लौटा. गांव की जमात इकट्ठा हुई. पंचायत बैठी. मौलाना ने सब के सामने खत पढ़ कर सुनाने को कहा. लिखा था:

‘आप की जमात का पैगाम मिला, पर हम एक बेहया और बदचलन लड़की से अपने लड़के का निकाह कर के खानदान पर दाग नहीं लगाना चाहते. न जाने किस कौम की नाजायज औलाद पाल रखी है उस ने.’ मौलाना कुछ देर खामोश बैठे रहे. कुछ सोचने के बाद मौलाना ने अपना फैसला सुनाया, ‘‘बात सही लिखी है. जमात आज से इन का हुक्कापानी बंद करती है. जमात का कोई भी शख्स इन से कोई ताल्लुक नहीं रखेगा.

‘‘लड़की को फौरन गांव से बाहर कर दिया जाए. मुहब्बत करने चली थी, मजहब के उसूलों का जरा भी खयाल नहीं आया उसे. यही मुहब्बत करने वालों की सजा है.’’ मौलाना का मुहब्बत पर फतवा सुन कर रजिया का खानदान सहम गया. जमात उठ गई. रजिया के घर मायूसी पसरी थी. रात में सभी फिक्र में डूबे थे. जब सुबह आंख खुली, तो रजिया को न पा कर सब उस की खोजखबर लेने लगे. नफीस और रजिया मौलाना के फतवे को ठोकर मारते हुए दूर निकल गए थे, अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करने के लिए.

Hindi Story : कैसी वाग्दत्ता – परख से बिछुड़ने का गम क्या तनीषा सालों बाद भी भुला पाई

Hindi Story : सामनेवाली कोठी में रंगरोगन हो रहा था. चारों ओर जंगली बेलों से घिरी वह कोठी किसी खंडहर से कम नहीं लगती थी. सालों से उस में न जाने किस जमाने का जंग लगा बड़ा ताला लटक रहा था. वैसे इस कोठी को देख कर लगता था कि किसी जमाने में वह भी किसी नवयौवना की भांति असीम सौंदर्य की स्वामिनी रही होगी. उस की दीवारें न जाने कितने आंधीतूफानों और वर्षा को झेल कर कालीकाली सी हो रही थीं. खिड़कियों के पल्ले जर्जर हो चुके थे, मगर न जाने किन कीलकांटों से जड़े थे कि अभी तक अपनी जगह टिके हुए थे.

तनीषा की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी. कौन आ रहा है यहां रहने के लिए. क्या किसी ने इसे खरीद लिया है. कौन हो सकता है इस विशाल कोठी को खरीदने वाला. जबकि आजकल तो लोग फ्लैट में रहना ज्यादा पसंद करते हैं. यह कौन असाधारण व्यक्ति है, जो इतनी बड़ी कोठी में रहने के लिए आ रहा है.

उस का मन जिज्ञासा की सारी हदें पार करने को मचल रहा था. तभी एक नौजवान उस के घर की ओर आता दिखा. सोचा उसी से कुछ पता किया जाए किंतु फिर उस ने अपनी उत्सुकता को शांत किया, ‘‘छोड़ो होगा कोई सिरफिरा या फिर कोई पुरातत्त्ववेत्ता जिसे इस भुतही कोठी को खरीदने का कोई लोभ खींच लाया होगा. वैसे यह कोई ऐतिहासिक कोठी भी तो नहीं है. लेकिन किसी की पसंद पर कोई अंकुश तो नहीं लगाया जा सकता है न.’’

‘‘ऐक्सक्यूज मी,’’ आगंतुक उस के घर के गेट के सामने खड़ा था.

वह चौंक कर इधरउधर देखने लगी, ‘‘कौन हो सकता है? क्या यह मुझे ही बुला रहा है?’’ उस ने इधरउधर देखा, कोई भी नहीं दिखा.

‘‘हैलो आंटी, मैं आप से ही बात कर रहा हूं.’’ आगंतुक ने उस का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. आंटी उसे अजीब सा लगा. क्या मैं आंटी सी लगती हूं? उस का मन सवाल करने लगा. ठीक है कि मेरी उम्र 50 की हो रही है लेकिन लगती तो मैं 35 से ज्यादा की नहीं हूं. अभी भी शरीर उसी प्रकार कसा हुआ है. हां इक्कादुक्का बाल जरूर सफेद हो गए हैं. लेकिन आजकल बालों का सफेद होना तो आम बात है.

वह थोड़ी अनमनी सी हो गई. तत्काल ही उसे गेट पर खड़े उस युवक का ध्यान आया. वह तुरंत उस की ओर बढ़ी. बड़ा ही सौम्य युवक था.

बड़ी शिष्टता से उस युवक ने कहा, ‘‘जी मेरा नाम अनुज मित्तल है. क्या पानी मिलेगा? दरअसल घर में काम चल रहा है. पानी की लाइन शाम तक ही चालू हो सकेगी. लेकिन जरूरत तो अभी है न.’’

‘‘हां, हां आओ न अंदर. पानी जरूर मिलेगा,’’ उस ने अपने माली को आवाज दे कर कहा कि नल में पाइप लगा कर सामने वाले घर की ओर कर दो जितनी जरूरत हो पानी ले लें. फिर उस ने अनुज से कहा, ‘‘आओ बेटा, मैं चाय बनाती हूं. भूख भी लगी होगी, कुछ खाया तो होगा नहीं.’’

चायनाश्ता करते हुए उस ने अनुज व उस के परिवार के बारे में पूरी जानकारी हासिल कर ली. अवनीश मित्तलजी की वह पुरानी खानदानी कोठी थी. बहुत पहले उन के पिता अभय मित्तल भारत छोड़ कर व्यवसाय के सिलसिले में नैरोबी में जा कर बस गए थे. अवनीश मित्तल भी उसी व्यापार में संलग्न थे. इसलिए बच्चों का पालन पोषण भी वहीं हुआ. अब वे अपनी बेटी की शादी भारत में अपने पुरखों की हवेली से ही करना चाहती थे इसलिए रंगरोगन कर के उस का हुलिया दुरुस्त किया जा रहा था.

‘‘विवाह कब है?’’ तनीषा ने पूछा.

‘‘जी अगले महीने की 25 तारीख को. अब ज्यादा समय भी नहीं बचा है. इसीलिए सब जल्दीजल्दी हो रहा है. मुझे ही इस की देखभाल करने के लिए भेजा गया है,’’ चायनाश्ता कर के वह चला गया. तनु भी तत्काल ही आईने के सामने जा कर खड़ी हो गई. उस ने मुझे आंटी क्यों कहा? सोचने लगी. क्या सच में मैं आंटी लगने लगी हूं. उस ने शीशे में खुद को निहारा. सिर में झिलमिलाते चांदी के तारों से भी उस की खूबसूरती में कोई कमी नहीं आई थी.

तनीषा अकेली ही रहती थी. आसपास के सभी लोग उसे जानते थे और यह भी जानते थे कि वह अविवाहित है. लोग इस विषय पर चर्चा भी करते थे. किंतु अप्रत्यक्ष रूप में ही, कारण भी कोई नहीं जानता था. किंतु तनीषा? वह तो अपने चिरकुंआरी रहने का राज बखूबी जानती थी. लेकिन दोष किस का था? नियति का, घर वालों का या स्वयं उस का? शायद उसी का दोष था. यदि उस की शादी हुई होती तो आज अनुज के बराबर उस का भी बेटा होता. उस ने एक गहरी सांस ली और बड़बड़ाने लगी, ‘कहां हो परख, क्या तुम्हें मेरी याद आती है या बिलकुल ही भूल गए हो?’ अतीत उसे भ्रमित करने लगा था…

‘‘तनु, आज क्लास के बाद मिलते हैं,’’  परख ने उसे रोकते हुए कहा. वह तनीषा को तनु ही पुकारता था.

‘‘ठीक है परख. लेकिन आज मेरा प्रैक्टिकल है वह भी लास्ट पीरियड में, उस के तुरंत बाद घर भी जाना है. जानते हो न जरा सी भी देर होने पर मां कितनी नाराज होती हैं.’’

‘‘परख को तनु की भावनाओं का बहुत अच्छी तरह भान था फिर भी उस ने मुसकराते हुए जाने के लिए अपने पैर आगे बढ़ाए.

‘‘ठीक है, पर मैं ने भी कह दिया. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा,’’ कहते हुए परख चला गया.

तनीषा मन ही मन मुसकरा रही थी परख की बेसब्री देख कर.

तनीषा मानव विज्ञान में एम.ए. द्वितीय वर्ष की छात्रा थी. जबकि परख उस का सीनियर था. वह मानव विज्ञान में ही रिसर्च कर रहा था. अकसर पढ़ाई में उस की सहायता भी करता था. हालांकि तनु से एक वर्ष ही सीनियर था. किंतु जब कभी प्रोफैसर नहीं आते थे तब वही प्रैक्टिकल भी लेता था.

उस के समझाने का अपना एक अलग ही अंदाज था और उस के इसी लहजे पर तनु फिदा रहती थी. परख भी तनीषा के प्रति एक अव्यक्त सा आकर्षण महसूस करता था. उस का चंपई गोरा रंग, चमकती काली आंखें, लहराते काले बाल सभी तो उसे सम्मोहित करते थे. विभाग में सभी लोग इन दोनों के प्यार से वाकिफ  थे. कभीकभी छेड़ते भी थे. लेकिन कहते हैं न कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते.

तनीषा के मातापिता को भी इस की भनक लग गई और उन्होंने तनु से इस की पूछताछ शुरू कर दी.

‘‘तनु सच क्या है, मुझे बता. ये परख कौन है? क्यों शुभ्रा उस का नाम ले कर तुझे चिढ़ा रही थी?’’

‘‘कोई नहीं मां, मेरा सीनियर है. हां, नोट्स बनाने या प्रैक्टिकल में कभीकभी हैल्प कर देता है. बस और कुछ नहीं,’’ तनु ने मां कि उत्सुकता को शांत करने का प्रयास किया.

‘‘अगर ऐसा है तो ठीक, अन्यथा मुझे कुछ और सोचना पड़ेगा,’’ मां ने धमकाते हुए कहा.

‘मां, ऐसा क्यों कह रही हैं? क्या सच में परख मेरी जिंदगी में कुछ माने रखता है,’ उस ने अपने मन से पूछा. ‘कुछ, अरे बहुत माने रखता है. कभी चेहरा देखा है आईने में अपना. कैसे उसे देखते ही लाल हो जाता है. क्यों तू हर पल उस की प्रतीक्षा करती रहती है और परख, वह भी तुझे ही पूछता रहता है. यह प्यार नहीं तो और क्या है?’ उस का मन उसी से उस की चुगली कर रहा था.

लेकिन यह राज अब राज न रहा था. एक दिन जब वह लाइब्रेरी में थी, तभी परख की आवाज सुन कर वह चौंक गई.

‘‘अरे तुम यहां? कुछ खास बात करनी है क्या?’’ वह अचंभित सी थी.

‘‘हां, कुछ खास बात ही करनी है. मुझे बताओ मैं तुम्हारी जिंदगी में क्या स्थान रखता हूं? परख के स्वर में उतावलापन था.’’

‘‘ऐसे क्यों पूछ रहे हो? क्या अब ये भी बताना पड़ेगा कि मेरी जिंदगी में तुम्हारी क्या अहमियत है. तुम्हारे बिना तो मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है. परख है तो तनीषा है. क्या कभी पेड़ से लिपटी लता को भी यह बताना पड़ेगा कि उस के जीवन में उस पेड़ के क्या माने हैं,’’ तनीषा कहने को तो कह गई परंतु तुरंत ही उस ने अपनी जबान काट ली, ‘‘अरे, यह मैं ने क्या कह दिया. भला परख भी क्या सोचता होगा, कितनी बेशर्म लड़की है.’’

‘‘बोलोबोलो तनु चुप क्यों हो गईं. आखिर सच तुम्हारे मुंह से निकल ही गया. मुझे विश्वास तो था किंतु मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता था,’’ कहते हुए उस ने उसे अपनी बलिष्ठ भुजाओं में बांध कर उस के होंठों पर अपने प्यार की मुहर जड़ दी. तनीषा शर्म से दुहरी हुई जा रही थी. बिना कुछ कहे हौले से अपनेआप को छुड़ा कर वहां से भाग गई.

दोनों का प्यार परवान चढ़ता जा रहा था. लोग कहने लगे थे कि ये दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं. उन के प्यार की गंभीरता को उन के मातापिता भी समझने लगे थे. उन्होंने दोनों का विवाह कर देना ही उचित समझा. परख भी अब तैयार था, क्योंकि उसे चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में लैक्चररशिप भी मिल गई थी. खुशी से तनीषा के पांव भी अब जमीन पर नहीं पड़ते थे. किंतु परख की दादी ने तनीषा और परख की जन्मपत्री मिलवाने की बात कही और जब कुंडली मिलवाई गई तो तनीषा घोर मांगलिक निकली.

उस के मातापिता को ये सब दकियानूसी बातें लगती थीं, इसलिए सच जानते हुए भी उन्होंने कभी कुंडली आदि के लिए कुछ सोचा भी नहीं. उन के हिसाब से ये सब खोखले अंधविश्वास हैं. पंडितों और पुरोहितों की कमाई का स्रोत हैं. लेकिन परख की दादी ने इस विवाह के लिए मना कर दिया, क्योंकि परख उन का इकलौता पोता था, उन के खानदान का अकेला वारिस. लेकिन परख आजकल का पढ़ालिखा युवक था. उस के दिल में तनीषा के सिवा किसी और के लिए कोई स्थान नहीं था. वह जिद पर अड़ गया कि यदि उस का प्यार उसे न मिला तो वह कभी विवाह नहीं करेगा.

जब तनीषा को ये सब बातें पता चलीं तो उस ने विवाह करने से ही मना कर दिया. उस ने परख से कहा, ‘‘यदि इस विवाह से तुम्हारी जान को खतरा है तो मैं तुम्हें आजाद करती हूं, क्योंकि मुझे तुम्हारे साथ अपना पूरा जीवन बिताना है न केवल तुम्हें पाना. यदि तुम्हें कुछ हो गया तो मैं तुम्हारे बिना क्या करूंगी?’’

परख को बड़ा ही आश्चर्य हुआ. उस ने कहा, ‘‘अब जब हम दोनों ही एकदूसरे को प्यार करते हैं तो फिर इन रूढि़वादी रिवाजों के डर से तुम अपने कदम पीछे क्यों कर रही हो? क्या तुम्हें तुम्हारी शिक्षा इन्हीं सब अंधविश्वासों को मानने के लिए ही मिली है? बी लौजिकल.’’

लेकिन तनीषा अपनी बात पर अडिग रही. उस ने परख को कोई उत्तर नहीं दिया. किंतु परख ने उस की बाएं हाथ की उंगली में अपने नाम की हीरों जड़ी अंगूठी पहना ही दी.

‘‘यह अंगूठी मेरी ओर से हमारी सगाई का प्रतीक है. मैं तुम्हारी हां की प्रतीक्षा करूंगा,’’ कह कर परख वहां से चला गया.

तनीषा ने अब परख से मिलनाजुलना भी कम कर दिया था. डरती थी कि कहीं वह कमजोर न पड़ जाए और परख की बात मान ले. परख भी अब चुपचाप उस समय की प्रतीक्षा कर रहा था जब उस की तनु विवाह के लिए हां कर दे. इस बीच तनु को एक स्थानीय कालेज में लैक्चररशिप मिल गई और उस ने खुद को अध्यापन कार्य में ही व्यस्त कर लिया.

इधर परख भी एक फैलोशिप पा कर कनाडा चला गया था 2 वर्षों के लिए. फिर कुछ

ऐसा इत्तेफाक हुआ कि उस के कनाडा प्रवास की अवधि बढ़ती ही चली गई. दोनों की फोन पर या व्हाट्सऐप पर ही बातें होती थीं. लेकिन धीरेधीरे वह भी कम होता चला गया और फिर एक दिन उस की सहेली शुभ्रा ने जोकि परख के मामा की ही बेटी थी, परख के ब्याह की खबर दे कर उसे अचंभित कर दिया.

उस ने यह भी बताया कि दादी मृत्यु शैय्या पर पड़ी थीं और परख का विवाह देखना चाहती थीं. उस ने दादी की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी रजामंदी दे दी थी. तनीषा ने अपनी आंखों में भर आए आंसुओं को जबरन रोका और परख के नाम की अंगूठी को, जिसे पहन कर वह खुद को उस की वाग्दत्ता समझने लगी थी, अपने दूसरे हाथ से कस कर भींच लिया.

‘‘नहीं, मैं उस की हूं और वह मेरा है. भले ही उस का ब्याह किसी से हो जाए. मेरी उंगली में तो उसी के प्यार की निशानी है,’’ और इस प्रकार उस ने खुद को अकेले रहने को बाध्य कर लिया.

कुछ दिनों बाद उस के विवाह न करने के फैसले को देखते हुए उस के मातापिता ने उस के भाई का विवाह कर दिया. उन की मृत्यु के उपरांत वह भाईभाभी तथा उन के बच्चों के साथ रहने लगी. किंतु भाभी को अब उस का वहां रहना अखरने लगा था. जबतब वे उसे ताने सुना ही देती थीं, ‘‘भई अकेले की जिंदगी भी कोई जिंदगी होती है. अपने घरपरिवार की जरूरत तो सभी को होती है.’’

तनीषा भलीभांति समझती थी कि वे ऐसा क्यों कहती थीं. पिछली बार जब वह 2 माह टायफाइड से पीडि़त रही तब भाभी को उस की सेवा करनी पड़ी थी. इसीलिए वे ये सब बातें सुना देती थीं. लेकिन शायद वे भूल जाती थीं कि उन की 3-3 जचगी में उस ने किस प्रकार उन की सेवा की थी. वे सो सकें इसलिए वह रातरात भर जाग कर बच्चों को संभालती थी और सवेरे घर का सारा काम निबटा कर क्लासेज लेने के लिए कालेज भी जाती थी. घरखर्च के रूप में वह भाभी के हाथ पर अपने वेतन का एक हिस्सा रख ही देती थी. जबकि भाभी बनावटी आंसू बहाते हुए कहती थीं, ‘‘अरे मेरा हाथ कट कर गिर जाए, अपनी बेटी सरीखी ननद से घरखर्च में मदद लेते हुए. लेकिन क्या करें महंगाई भी तो बढ़ती ही जा रही है.’’

तनीषा इन सब बातों का मतलब समझती थी और जब भाई ने अपना अलग फ्लैट लिया तब उसे यह समझने में देर न लगी कि अब वे लोग उस के साथ और नहीं रहना चाहते. बिना यह सोचे की वह अकेली रह जाएगी, उस का भाई अपने परिवार को ले कर चला गया और वह अब एकदम अकेली ही रह गई थी.

डौरबैल की आवाज से वह वर्तमान में लौटी और दरवाजे पर जा कर देखा अनुज ही था. बहन के विवाह का निमंत्रण ले कर आया था. ‘नीरजा परिणय प्रतीक’ उस ने कार्ड को उलटपलट कर देखा. वर के पिता का नाम परख जालान पढ़ कर वह चिहुंक सी गई.

‘तो क्या प्रतीक मेरे परख का ही बेटा है? नहींनहीं यह कोई और परख भी तो हो सकता है,’ उस ने अपने को आश्वस्त किया.

‘आंटी, आप को जरूर आना है,’ कह कर अनुज चला गया.

न जाने क्यों आज वह आईने में खुद को गौर से निहार रही थी. क्या सच में उसे वार्धक्य की आहट सुनाई दे रही है. वह सोचने लगी, ‘‘हां, समय ने उस पर अपना भरपूर प्रहार जो किया था. काश कि बीता समय लौट पाता तो वह परख को अपनी बांहों में कस कर जकड़ लेती,’’

‘आ जाओ परख, तुम्हारी तनु आज भी तुम्हारा इंतजार कर रही है,’ उस के मुंह से एक निश्वास निकल गया.

आज 25 तारीख है. शाम को नीरजा की बरात आने वाली है. उस ने अपनी कोई भी तैयारी नहीं की थी. जाऊं या न जाऊं, वह उलझन में पड़ी हुई थी. अभी तो उस के लिए कोई गिफ्ट भी नहीं खरीदा था. आखिर कुछ न कुछ देना तो होगा ही. खैर कैश ही दे देगी उस ने सोचा.

बैंडबाजे की आवाज से उस की तंद्रा भंग हो गई. लगता है बरात आ गई है. वह जल्दी से तैयार होने लगी. बालों को फ्रैंच बुफे स्टाइल में कानों के ऊपर से उठा कर प्यारा सा जूड़ा बनाया. हलके नीले रंग की सिल्क की साड़ी पहनी, सफेद मोतियों का सैट पहना, उंगली में अंगूठी पहनने की जरूरत ही नहीं थी, क्योंकि वहां तो परख का प्यार पहले से ही अपना अधिकार जमाए हुए था.

पूरी कोठी दुलहन की तरह सजी हुई थी. बरात दरवाजे पर आ गई थी. तभी उस की नजर दुल्हे के पिता पर पड़ी. परख ही था. अपने समधी के किसी मजाक पर हंसहंस कर दुहरा हुआ जा रहा था. तनीषा की नजरें अपने परख को ढूंढ़ रहीं थीं जो कहीं खो सा गया था. उस के सिर के खिचड़ी हो गए बाल, कलमों के पास थोड़ीथोड़ी सफेदी उस की बढ़ती उम्र का परिचय दे रहे थे. तनिक निकली हुई छोटी सी तोंद उस की सुख तथा समृद्धि का प्रतीक थी. नहीं, यह मेरा परख नहीं हो सकता है. सोचते हुए वह घर के अंदर जाने के लिए मुड़ी कि तभी उस ने देखा सामने से नीरजा दुलहन बनी हुई अपनी सहेलियों के साथ जयमाला ले कर आ रही थी. उस ने तत्काल ही एक निर्णय लिया और आगे बढ़ कर नीरजा की उंगली में परख के नाम की अंगूठी पहना दी. जब तक नीरजा कुछ समझ पाती वह वहां से वापस लौट पड़ी. अब उस का वहां कोई काम नहीं था.

‘‘जब भी परख अपनी बहू की उंगली में यह अंगूठी देखेगा तो क्या उसे मेरी याद आएगी?’’ सोचते हुए वह नींद के आगोश में चली गई, क्योंकि अब उसे परख के लौटने की कोई उम्मीद जो नहीं थी. उसे एक पुराना गीत याद आ रहा था ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं…’ और अब उस का मन शांत हो गया था.

Funny Story : मैरिज के बाद उपरवाले का साथ

Funny Story : ‘ईश्वर की विशेष कृपा से विवाह के 20 साल सफलतापूर्वक गुजर गए,’ उन्होंने बतौर इन्फौर्मेशन, धांसू अचीवमैंट, फांसू फोटो शृंखला के साथ फेसबुक पर गुरिल्ला स्टाइल में घोषणा की, ‘थैंक्स टू ईश्वर.’

यों आप चाहें तो इसे महज सूचना भी मान सकते हैं, धमकी भी और चैलेंज भी. आगे उन्होंने याचना सी करते हुए लिखा, ‘इस मौके पर आप की शुभकामनाओं की दरकार है.’ सूचना दे कर वे लाइक व कमैंट रूप में शुभेच्छाओं का इंतजार करने लगे. शुभेच्छाओं से बल मिलता है. विशेषकर विवाह जैसे मसलों में शुभेच्छाएं शिलाजीत से भी ज्यादा बलवर्द्धक होती हैं.

गौर करने वाली बात यह थी कि उन्होंने 20 साल सफलतापूर्वक कहा. इसे आप व्यंजना में शांतिपूर्वक समझ सकते हैं. गोया एक पिक्चर है, जो 20 वर्षों से चल रही है और पिक्चर अभी बाकी है, मेरे दोस्त.

कई दोस्तों ने हैरत जताई. वौव, 20 साल, इतना लंबा पीरियड. रश्क तो होता है. कुछ हतप्रभ हुए, तो कुछ स्मृतियों में खो गए कि उन के अपने कैसे गुजर रहे हैं. कुछ ने ‘कैसे कटे ये दिन, कैसे कटीं ये रातें…’ गुनगुनाते हुए ठंडी आह भरी. दिन हैं कि गुजरने का नाम नहीं लेते. इस से पता चलता है कि विवाह में ईश्वर की विशेष कृपा की कितनी अहमियत है. थैंक्स टू ईश्वर.ईश्वर अपनी विशेष कृपादृष्टि बनाए रखे, तो 20 क्या, बंदा सात जन्मों तकका रिस्क उठा लेता है. बिन ईश्वर कृपा,7 मिनट ही सात जन्मों के समान लगते हैं. ऐसे में 20 साल गुजरना अपनेआप में बड़ी परिघटना है. बिग अचीवमैंट है. स्तुत्य है. प्रशंसनीय है. ओलिंपिकनुमा कारनामा है. इस से तो गठबंधन की सरकार चलाना कहीं आसान है, सिर्फ तुष्टीकरण से चल जाती है. शादीशुदा जिंदगी सतत संतुष्टिकरण तक से सफलतापूर्वक नहीं चलती. इसलिए ऐसे मसलों में आदमी स्वयं पर कतई भरोसा नहीं करता. अपने बूते चला ले जाने का कोई मुगालता नहीं पालता.

हालांकि, विवाहपूर्व बड़ा जोश रहता है, दौड़ा ले जाने का. फिर धीरेधीरे दिन गुजरते हैं, विश्वास के आईने पर जमी धूल छंटती है, सबकुछ ईश्वर पर छूटता जाता है.

मैं ने इधरउधर खूब खंगाला. मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जिसे खुद पर भरोसा हो, जिस ने कहा हो कि हमारे प्यार, सहयोग, समर्पण के बल पर विवाह के 20 साल गुजर गए. इस के पीछे कारण शायद यह हो कि ईश्वर पर छोड़ देने से किसी पक्ष को एतराज नहीं होता. वरना एक के श्रेय ले लेने पर दूसरा पक्ष चैलेंज कर सकता है, समर्थनवापसी का ऐलान कर सकता है. चलती सरकार को अल्पमत में ला कर पटखनी दे सकता है.

एक मित्र हैं, जिन्होंने परसों फेसबुक पर लिखा- ‘पता ही नहीं चला, विवाह के 25 साल कैसे गुजर गए.’ इस में ऐसा ध्वनित हो रहा था कि उन्हें ये साल गुजरने की कतई उम्मीद नहीं थी और अब वे खुद यह कल्पना कर हैरान हो रहे हैं कि हा, हू, हाय, उफ, अहा, हुर्रे. आखिर गुजर कैसे गए.

एक मित्र तो हर साल मैरिज एनिवर्सरी पर लिखते हैं- ‘जैसे कल ही की बात हो.’ उन का समझ आता है. हादसों को कौन भूल सकता है, भला. कल के से ही लगते हैं. वह तारीख, वह दिन, वह घटना उन के दिमाग में इस कदर फ्रीज हो गई है कि उस के बाद का उन्हें याद ही नहीं. उन्हें रहरह कर लगता रहता है जैसे कल की ही बात है.

कुछकुछ लोगों के दिमाग के पट पर उन की शादी होने की घटना घंटे की तरह टकराती रहती है. अनुगूंज आती रहती है-जैसे कल की ही बात है. सही भी है, जिस से आज प्रभावित हो रहा हो, उस कल को कौन भूल सकता है.

पिछले हफ्ते एक मित्र ने मैरिज एनिवर्सरी पर रात 12 बजते ही तूफानी अंदाज में फेसबुक पर दनादन कई तसवीरें अपलोड कर डालीं. या तो उत्साह का अतिरेक था, या फिर एक और साल गुजर जाने की बेतहाशा खुशी कि उन्हें सुबह तक का भी इंतजार नहीं हुआ. मुमकिन है, इस के पीछे शायद यह धारणा भी हो कि विवाह के बाद वह सुबह कभी आती ही नहीं, जिस का इंतजार रहता है, इसलिए जब मानो, तभी सवेरा. आधी रात को सुबह मानने की उलटबांसी वैवाहिक जीवन में ही संभव है. खैर, सिलसिलेवार डाली गई तसवीरों का कुल सार यह था कि शादी के बाद इस बंदे से सुखी व्यक्ति संसार में दूसरा कोई नहीं.

मैं ने चकित होते हुए शुभकामना देने के लिए फोन किया. उन की कौलर ट्यून ‘सुन रहा है तू, रो रहा हूं मैं…’ सुन कर चौंक गया. फोन उठाते ही मैं ने कहा, भई, सुन तो रहा हूं मैं, लेकिन तुम्हें रोते हुए कभी देखा नहीं. वह एकदम रोंआसा सा हो गया, जैसे दुखती नस पर मैं ने हाथ रख दिया हो, वह बोला, आप जैसे मित्रों से ही उम्मीद रहती है कि कम से कम वे तो सुन ही लेंगे. वैसे भी, विवाह लोकल एनेस्थेसिया की तरह होता है, सुन्न में गुजर जाता है. होश आया और जोश गया.

मैं ने दिलासा देने के अंदाज में कहा, ‘सही कह रहे हो, भाई. खुशफहमी में साल गुजर जाते हैं. इसीलिए समझदार कहते हैं, खुशफहमी सफल वैवाहिक जीवन का आधार है.’

वह ‘हूंहूं’ करता रहा.

उन्हें एक बार फिर सांत्वनात्मक बधाई देने के बाद फोन काट कर मैं खुशफहमी पालने लगा, ताकि मेरे अपने आधार को मजबूती मिल सके.

Romantic Story : आज दिन चढ़या तेरे रंग वरगा

Romantic Story : दो प्यार करने वालों के बीच धर्म की दीवार खड़ी करने वाले क्या जानें प्यार करने वालों की दीवानगी, जो धर्म क्या, समाज के सारे रस्मोंरिवाज को तोड़ देती है.

‘‘10 मिनट पहले शुरू हो चुकी होगी क्लास.’’ कालेज के गेट से अंदर आते हुए अपने मोबाइल में टाइम देख अमन बोला.

‘‘यह दिल्ली की धोखेबाज मैट्रो, आज ही रुकना था इसे रास्ते में. क्या यार,’’ सिर झटक कर निराश स्वर में साक्षी ने कहा.

दोनों लगभग भागते हुए क्लासरूम की ओर जा रहे थे.

‘‘प्रशांत सर के लैक्चर में लेट होने का मतलब है क्लास में प्रवेश करते ही खूब सारी डांट, टाइम की वैल्यू पर लंबा सा भाषण और आज तो…’’

‘‘क्या आज तो? डरा क्यों रहा है?’’ साक्षी ने शिकायती अंदाज में पूछा.

‘‘हम दोनों हैं एकसाथ, कोई और दोस्त नहीं है.’’

‘‘ओ माय गौड, मैं तो भूल ही गई थी. लड़कालड़की साथ, मतलब सर का पारा हाई.’’

‘‘वही तो. एक दिन नेहा और कार्तिक कैंटीन में साथसाथ बैठे थे. प्रशांत सर भी पहुंच गए वहां. वे पूछने लगे, उन का रिलेशन, दोनों की कास्ट वगैरहवगैरह.’’

‘‘लगता है सर की शादी नहीं हुई, तभी तो किसी का प्यार देखा नहीं जाता इन से. पिछले महीने कालेज के फाउंडेशन डे पर सभी टीचर्स अपने परिवार के साथ आए थे, लेकिन सर अकेले ही थे. फिफ्टी प्लस तो होंगे ही न, ये सर?’’ साक्षी प्रशांत सर की आयु का अनुमान लगाने लगी.

‘‘हां, फिफ्टी? फिफ्टी फाइव प्लस होंगे, यार.’’

‘‘बेचारे, कुंआरे बिना सहारे,’’ साक्षी ठहाका लगा कर हंस पड़ी.

‘‘चुप, चुप, क्लासरूम आ गया.’’ अमन ने अपने होंठों पर उंगली रख साक्षी को चुप रहने का इशारा किया और दोनों क्लासरूम के भीतर चले गए.

अंदर दृश्य कुछ और ही था. सभी छात्र किसी चर्चा में लीन थे. सर नहीं थे वहां.

‘‘क्या हो गया?’’ अमन ने हर्षित को संबोधित करते हुए कहा.

‘‘अरे, आज इमरान क्लास में बेहोश हो कर गिर पड़ा. दीपेश ने उस के मुंह पर पानी के छींटे मारे. 2 मिनट बाद ही होश तो आ गया था उसे, पर बहुत बेचैन सा लग रहा था वह. विनायक और दीपेश उसे ले कर उस के घर गए हैं,’’ हर्षित ने बताया.

‘‘तो अब क्यों चिंता कर रहे हो तुम सब, उस के पेरैंट्स ले जाएंगे न डाक्टर के पास, सब ठीक हो जाएगा. नो फिक्र, यार,’’ अमन ने हर्षित को आश्वस्त करते हुए कहा.

‘‘क्या खाक ठीक हो जाएगा. पूरी बात तो सुन ले भाई,’’ हर्षित बोला.

‘‘अब तू और क्या सुनाएगा?’’ साक्षी के माथे पर चिंता की रेखाएं खिंच गईं.

‘‘हुआ यों कि जब इमरान के होश में आने पर हम उसे तसल्ली दे रहे थे कि स्वाति न सही कोई और सही, क्यों इतना मरा जा रहा है उस के लिए, तभी…’’

‘‘अरे, इमरान और स्वाति का ब्रेकअप हो गया क्या? इलैवंथ से साथसाथ थे वे दोनों. 6 साल पुराना रिश्ता अचानक कैसे टूट गया?’’ अमन ने हर्षित की बात बीच में ही काट कर प्रश्न किया.

‘‘ब्रेकअप हुआ नहीं, करवा दिया है स्वाति के घरवालों ने. उन को दोनों की रिलेशनशिप का पता लग गया और उन्होंने इमरान को धमकी दे दी कि अगर उस ने कभी स्वाति से बात भी की तो उस का नामोनिशान मिट जाएगा. देखा नहीं, 2 दिनों से वे दोनों दूरदूर बैठ रहे थे. आज तो आई ही नहीं स्वाति. सुना है उस ने अपने पेरैंट्स से कह दिया था कि वह इमरान से रिश्ता नहीं तोड़ सकती. शायद, इसलिए आने न दिया हो उस को,’’ हर्षित ने दोनों को वस्तुस्थिति से अवगत करवाया.

‘‘ओह, बड़ा बुरा हुआ यह तो,’’ साक्षी मुंह बना कर बोली.

‘‘अरे यार, अपनी वह बात तो पूरी कर कि जब सब लोग समझा रहे थे इमरान को, तब क्या हुआ?’’ अमन बेचैन हो कर बोला.

‘‘हां, हुआ यह कि हम सब इमरान को समझाने की कोशिश में लगे हुए थे तो पीछे से प्रशांत सर चुपचाप आ कर खड़े हो गए और उन्होंने सबकुछ सुन लिया.’’

‘‘गई भैंस पानी में,’’ अमन के माथे पर बल पड़ गए.

‘‘और फिर सर भी दीपेश और विनायक के साथ इमरान के घर चले गए,’’ हर्षित की बात पूरी होते ही तीनों चिंतित हो उठे.

दोपहर में कक्षा के लगभग सभी छात्र कैंटीन में बैठे इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे.

‘‘सर ने जरूर इमरान के पेरैंट्स को सबकुछ बता दिया होगा,’’ साक्षी निराश स्वर में बोली.

‘‘पता नहीं क्या पट्टी पढ़ाई होगी आज सर ने उन को,’’ ग्रुप में से आवाज आई.

‘‘अगर इमरान अब कभी स्वाति के साथ बात करने की कोशिश भी करेगा तो सर की नजर रहेगी उस पर,’’ अमन इमरान के भविष्य में आने वाली परेशानियों का अनुमान लगा रहा था.

‘‘अरे, हम लोग बस इमरान के बारे में ही सोच रहे हैं. क्या स्वाति कम दुखी हो रही होगी?’’ अब तक चुप बैठी मारिया स्वाति के मन में उठ रहे तूफान के विषय में सोचते हुए बोली.

तभी दीपेश वहां हांफता हुआ आ पहुंचा. सब को संबोधित कर वह कुछ बोलने ही वाला था कि सब ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी, ‘‘क्या हुआ? सर ने क्या कहा वहां जा कर? इमरान के साथ कुछ बुरा तो नहीं हुआ न? सब ठीक तो है न?’’

‘‘गाएज, यू वुंट बिलीव इट. सुनो, प्रशांत सर आज इमरान के पेरैंट्स के साथ स्वाति के घर गए थे. दोस्ती करवा दी उन्होंने दोनों परिवारों की. और स्वाति अब इमरान की तबीयत का हालचाल पूछने उस के घर गई है.’’

‘‘चल झूठे, क्यों हमारे जले पर नमक छिड़क रहा है?’’ तानिया बोली.

‘‘यह ठीक कह रहा है,’’ वहां पहुंच विनायक ने दीपेश का समर्थन करते कहा.

कोई इस घटना पर यकीन ही नहीं कर रहा था.

‘‘दीपेश, तू पहले यह बता कि वहां क्याक्या हुआ.’’

‘‘बता न विनायक, ऐसा किया क्या सर ने कि यह सब हो गया?’’

सब ने उन्हें घेर कर प्रश्न करने शुरू कर दिए.

‘‘मुझे नहीं पता. मैं और विनायक तो इमरान को उस के घर छोड़ कर मौल चले गए थे. दोपहर में व्हाट्सऐप पर इमरान का स्टेटस देख हम चौंक गए. उस में स्वाति और इमरान की एकसाथ हंसते हुए आज खींची हुई एक तसवीर थी. उसे देख कर विनायक ने इमरान को फोन किया. तब उस ने बताया हमें कि यह सब हो गया. लेकिन सर और बाकी सब के बीच क्याक्या बातें हुईं, यह तो उसे भी नहीं पता.’’

‘‘क्यों न हम सर से ही पूछने की कोशिश करें?’’ हर्षित ने सुझाव दिया.

‘‘हां, हम उन को थैंक्स भी बोल देंगे,’’ साक्षी बोली.

‘‘ऐसा करते हैं, 4 बजे शिखा मैम के लैक्चर के बाद हम लोग उन के पास चलेंगे,’’ अमन ने कहा. अमन से सहमत हो सब कक्षा की ओर चल दिए.

शाम 4 बजे प्रशांत सर यूनिवर्सिटी में नहीं थे, इसलिए अमन, साक्षी, दीपेश और हर्षित ने उन के घर जाने का फैसला किया, जो कैंपस में ही था.

वहां पहुंच कर अमन ने डोरबैल बजाई. प्रशांत सर ही आए दरवाजा खोलने. ड्राइंगरूम में विशेष सजावट तो नहीं थी, पर कुछ था जो आकर्षित कर रहा था वहां. लाल रंग के कालीन पर साफसुथरा नीले रंग का सोफा और बीच में गोलाकार सैंटर टेबल पर समाचारपत्र रखा था. दीवार से सटी शैल्फ में रखी साहित्यिक पुस्तकें गृहस्वामी के साहित्य प्रेम की व्याख्या कर रही थीं, तो ऊपर टंगा नदी और सागर के मिलन का तैलचित्र उन के अनुरागी हृदयी होने का प्रमाण था.

‘‘सर, हम आप का शुक्रिया अदा करने आए हैं, आप ने इमरान और स्वाति को एक तरह से नई जिंदगी दे दी है,’’ दीपेश ने बात शुरू की.

‘‘हां सर, हमारे पास धन्यवाद करने के लिए भी शब्द नहीं हैं. पर यह हुआ कैसे?’’ साक्षी ने बात आगे बढ़ाई.

‘‘प्लीज सर, हमें बताइए न, आप ने ऐसा क्या कहा उन के पेरैंट्स को कि दोनों को मिलने दिया आज उन्होंने?’’ अमन बोला.

‘‘आप जानना चाहते हैं, ओके, अभी आता हूं मैं, तब तक आप कुछ ले लीजिए, कमला, चाय बना दो,’’ और रसोई में खड़ी स्त्री को चाय बनाने को कह वे दूसरे कमरे में चले गए.

जब वे लौटे तो उन के हाथ में लकड़ी का छोटा सा डब्बा और एक पुरानी डायरी थी.

‘‘आप सब को अपने प्रश्न का उत्तर जानने के लिए कुछ समय देना होगा. लो हर्षित, इस पृष्ठ से पढ़ना शुरू करो,’’ डायरी खोल कर सर ने हर्षित के हाथों में देते हुए कहा.

‘‘लेकिन सर, यह तो आप की लिखाई है. मतलब आप की पर्सनल डायरी, जोरजोर से पढ़ूं क्या?’’ हर्षित झिझकते हुए बोला.

‘‘हां, पढ़ो, आज से लगभग 34 साल पहले की है यह,’’ प्रशांत सर बोले.

तब तक चाय और नमकीन लग गए टेबल पर. चाय की चुसकियों के बीच हर्षित ने डायरी खोल कर सर के बताए पृष्ठ से पढ़ना शुरू किया.

1 मई, 1984

अगले सप्ताह से परीक्षाएं शुरू. अविश्वसनीय ही लग रहा है कि मैं एमए फाइनल भी पास करने जा रहा हूं. आज से खुद को अध्ययन में ही केंद्रित करना होगा. कल से यह डायरी अलमारी में और पुस्तकें बाहर.

29 मई

कल अंतिम दिन था परीक्षा का, आज चैन की सांस ली है. लेकिन पूरा दिन खाली बैठना उबाऊ भी लग रहा है. कल सैंट्रल लाइब्रेरी जा कर कुछ पुस्तकें ले आऊंगा. कम से कम घर पर मन तो लगा रहेगा.

30 मई

पुस्तकें ले कर घर लौटा, तो मम्मी ने बताया कि आज सामान लेने चांदनी चौक गई थीं वे. वहां अचानक उन की भेंट अपनी एक पुरानी सहेली जसवंत कौर से हो गई. वे अपने पति के साथ विवाह की खरीदारी करने लुधियाना से दिल्ली आई हुई हैं. जुलाई में उन के परिवार में एक शादी है.

आंटीजी को यहां शौपिंग करने में थोड़ी परेशानी हो रही थी, क्योंकि अंकलजी जल्दबाजी करते हैं. मम्मी के कहने पर वे लोग होटल छोड़ कर कुछ दिनों के लिए हमारे घर आ जाएंगे, फिर आंटीजी मम्मी के साथ 2-3 दिनों में आराम से सब खरीदारी कर सकेंगी.

31 मई

आज दोपहर में वे दोनों आ गए थे. अच्छा लगा उन से मिलना. आंटीजी एक गृहिणी हैं और अंकलजी का पारिवारिक व्यवसाय है.

उन की एक बेटी है जसप्रीत, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीए कर रही है. वह छात्रावास में रहती है. आज उस की परीक्षा का अंतिम दिन था. अब वह उन लोगों के साथ लुधियाना चली जाएगी. छुट्टियां भी हैं और वहां उस के ताऊजी के बेटे की शादी भी.

एग्जाम दे कर शाम को जसप्रीत भी आ गई थी हमारे घर. लेकिन उस से मिलना नहीं हो सका मेरा. मैं अपने मित्र सोहन के घर गया हुआ था. कुछ देर पहले ही लौटा हूं. रात के 11 बजे हैं, तेज नींद आ रही है.

1 जून

सुबह नाश्ते के बाद अपने कमरे में एक कहानीसंग्रह ले कर बैठा था. फिर से पढ़ी फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’. सचमुच, कितनी भोलीभाली है यह कहानी, मन मोह लेती है पढ़ने वाले का, तभी तो बनी उस पर ‘तीसरी कसम’ जैसी फिल्म.

अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई. ‘कौन होगा जो आधे खुले दरवाजे को खटखटा रहा है?’ सोच कर मैं ने दरवाजा खोला. वह जसप्रीत थी.

ओह, कितना गोरा रंग है उस का और बड़ीबड़ी मनमोहक आंखें. मेरा दिल तेजी से धड़क उठा जसप्रीत को देख कर.

‘मारे गए गुलफाम’ के हीरामन को शायद ऐसा ही लगा होगा जब चांदनी रात में उस ने हीराबाई का चेहरा पहली बार देखा था. उस के मुंह से निकल गया था, ‘अरे बाप रे, ई तो परी है.’

गुलाबी सलवारसूट और सितारे लगे दुपट्टे में किसी परी से कम कहां लग रही थी जसप्रीत.

वह अंदर आ कर बैठ गई. मैं डीयू से हिंदी में एमए कर रहा हूं, जान कर वह प्रसन्न हुई. वह हिस्ट्री (औनर्स)

के दूसरे वर्ष की परीक्षा दे चुकी है.

बातोंबातों में पता लगा कि उसे भी साहित्य में रुचि है. मेरी मेज पर रखे कहानीसंग्रह को वह खोल कर देखने लगी. उस में चंद्रधर शर्मा गुलेरी की अमर कहानी ‘उस ने कहा था’ का उल्लेख करते हुए वह बोली कि यह कहानी उसे बेहद पसंद है.

जसप्रीत की आंखों, उस की बातों और विशेषकर लंबे बालों में न जाने क्या आकर्षण था कि उस की अनामिका उंगली में पहनी हुई अंगूठी मेरी आंखों में खटक रही थी. ‘क्या जसप्रीत का रिश्ता हो चुका है कहीं?’ जी चाहा मैं भी ‘उस ने कहा था’ कहानी के लहना सिंह की तरह ही पूछ लूं, ‘तेरी कुड़माई हो गई?’

पर उस के हाथ में अंगूठी का मतलब यह तो नहीं कि उस की सगाई हो गई हो, उम्र तो ज्यादा नहीं है उस की.

‘आप के हाथ में जो अंगूठी है क्या वह सोने की है?’ आखिर मुझ से रहा नहीं गया.

‘अरे, मैं तो इसे उतारना ही भूल गई. सोने की है पर यह अंगूठी नहीं ‘कलिचड़ी’ है. मेरे वीरजी की मैरिज है न लुधियाना में. यह अंगूठी भरजाईजी की बहन के लिए बनवाई है.’

‘हां, जानता हूं. दूल्हा शादी में अपनी साली को जो अंगूठी देता है, उसे पंजाब में ‘कलिचड़ी’ कहते हैं. पर तुम पहन कर क्यों बैठ गईं इसे?’ मैं जसप्रीत से दोस्ताना अंदाज में बोला.

‘मम्मी ने कहा था कि पहन कर देख लो. उस का और मेरा साइज एक है,’ अंगूठी उतारते हुए मेरी ओर देख मुसकरा कर जसप्रीत बोली.

‘अंगूठी उस की सगाई की नहीं है,’ सोच कर मैं मन ही मन राहत महसूस करने लगा. फिर अगले ही क्षण मुझे अपने पर ही हंसी आ गई. यदि जसप्रीत का रिश्ता तय हो चुका होता तो भी क्या फर्क पड़ता.

2 जून

नाश्ते के समय आज सुबह मैं और जसप्रीत बालकनी में कुरसियां डाल कर बैठे थे. उस ने मुझे अपनी सहेलियों और कालेज के विषय में बताया. मैं ने भी उस से अपने खास मित्रों की चर्चा की.

मम्मी और आंटीजी के चांदनी चौक चले जाने के बाद वह मेरे कमरे में आ कर बैठ गई. हम दोनों को बातचीत के लिए मनपसंद विषय मिल गया था-साहित्य.

उसे हिंदी कहानियों के साथसाथ कविताएं भी अच्छी लगती हैं. हिंदी साहित्य में उस की रुचि देख मुझे आश्चर्यमिश्रित हर्ष हो रहा था.

जब मैं ने उसे बताया कि मुझे रूसी भाषा का हिंदी में अनुवादित साहित्य भी पसंद है तो वह उस विषय में जानने को उत्सुक हो गई. यह सुन कर कि मैं ने मैक्सिम गोर्की का कालजयी उपन्यास ‘मां’ हिंदी में पढ़ा है, वह बेहद प्रभावित हुई. अपनी बड़ीबड़ी आंखें फाड़े मेरी ओर देख कर वह बोली, ‘अरे वाह, कुछ और भी बताओ न रूसी साहित्य के विषय में.’

जसप्रीत का चेहरा उस समय मुझे बेहद मासूम लग रहा था. मेरा नटखट मन चाह रहा था कि मैं उसे कोई प्रेमकहानी सुना दूं. तब मैं ने जानबूझ कर आंतोन चेखोव की कहानी ‘एक छोटा सा मजाक’ के बारे में बताना शुरू कर दिया. कहानी में एक लड़का नाद्या नाम की लड़की से बारबार तेजी से स्लेज पर फिसलते समय कहता है कि वह उस से प्यार करता है और भोलीभाली नाद्या हर बार यही सोचती है कि वह आवाज हवा की है.

कहानी सुन कर जसप्रीत कुछ देर तक मेरी ओर देखती रही. ऐसा लग रहा था जैसे उस की झील सी आंखों में कोई प्रश्न तैर रहा है.

3 जून

आज जसप्रीत भी गई थी चांदनी चौक, उसे अपने लिए खरीदारी करनी थी.

अंकलजी प्रतिदिन मम्मी और आंटीजी के चले जाने के बाद 2-3 घंटे तक सोते रहते हैं और शेष समय समाचारपत्र व पत्रिकाएं आदि पढ़ने में बिता देते हैं. पर आज वे मेरे साथ बैठ कर खूब बातें करते रहे. अंकलजी बहुत रोचक किस्से सुनाते हैं. उन्होंने बताया कि कालेज के दिनों में वे अपने दोस्तों के साथ मिल कर खूब शरारत करते थे. किसी भी बरात में वे सजधज कर चले जाते और दूल्हे के आगे खूब नाचते थे. बाद में खापी कर चुपचाप वापस आ जाते थे.

अंकलजी हिंदी बोलते हुए बीचबीच में पंजाबी के शब्दों का प्रयोग करते हैं. मुझे यह बहुत अच्छा लगता है.

वे मुझे प्रशांत पुत्तर कह कर पुकारते हैं. उन के साथ बातों में दिन हंसते हुए बीत गया.

शाम को सब लोग वापस आ गए. जसप्रीत पास ही खड़े ठेले से मेरे लिए कोला वाली बर्फ की चुस्की ले कर आई. आज सुबह बात कर रहे थे हम दोनों अपनी पसंदनापसंद के विषय में. याद रही जसप्रीत को मेरी पसंद. मेरा रोमरोम खिल उठा.

4 जून

ओह, आज का दिन…क्या लिखूं? इस समय रात में डेढ़ बज चुके हैं. प्रीत सो गई होगी या नहीं? पता नहीं. पर मुझे नींद कहां?

सुबह से ही मेरे दोस्त अविनाश

और संजीव आए हुए थे. शाम

को वापस गए. सारा दिन कोई बात नहीं हुई मेरी जसप्रीत से.

रात को खाना खाने के बाद हम दोनों छत पर चले गए. आसमान में बादल छाए हुए थे और हवा कुछ शीतलता लिए थी. शायद कहीं बारिश हुई होगी.

जसप्रीत मुझे अपनी अब तक की खरीदारी के विषय में बता रही थी. किनारी बाजार और परांठे वाली गली के अनुभव सुना रही थी. मैं टहलते हुए निरंतर उस की ओर देख रहा था. रात की चांदनी में चांदनी चौक की बातें सुनते हुए उस का मदमाता रूप मुझे बारबार किसी और ही लोक में ले जा रहा था. तब मुझे तेज झटका लगा जब जसप्रीत ने अचानक पूछ लिया, ‘क्या आप ने कभी प्यार किया है?’

‘शायद नहीं.’

‘शायद? मतलब?’

‘अभी तक तो नहीं किया था,’ मैं मुसकरा दिया.

‘अच्छा बताओ, मुझे ऐसा क्यों लगता है कि आप के साथ मैं महफूज हूं. आप मुझे जो कहते हो, मेरा वही करने को दिल करता है. आप ने कहा, मैं छत पर चलूं, मैं आ गई, जबकि मैं अंधेरे से बहुत डरती हूं.’

‘सच? पर तुम्हें अचानक यह प्यार वाली बात कैसे सूझी?’ मुझे जसप्रीत की बात से नशा सा होने लगा था.

‘क्योंकि मैं जानना चाहती थी कि तब कैसा लगता होगा जब किसी से प्यार हो जाता है?’

‘हूं, सुनो, तब ऐसा लगता है जैसे आप किसी के पास महफूज हैं,’ मैं अपनी आवाज को गंभीर बनाते हुए बोला.

‘हाय, तुसी ते बड़े शैतान हो,’ आंखें फाड़ कर जसप्रीत लगातार मुझे देख रही थी.

अंधेरे में मुझे उस की आंखों में वह सब दिखाई दे रहा था, जो तेज रोशनी में एक लाज का परदा छिपा लेता है.

‘पर तुम बिलकुल शैतान नहीं हो,’ मैं भावहीन सा चेहरा लिए बोला.

जसप्रीत तेजी से अपना चेहरा मेरे चेहरे के पास लाई और पंजों के बल खड़े हो कर मेरे माथे को हौले से चूम लिया. मैं इस के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं था. अचानक ही मेरे अंदर एक मादक सी ऊर्जा भरने लगी. हाथ उस को कस कर लपेट लेना चाहते थे, आंखें बस उस को ही देखना चाहती थीं और उस को मैं अपने बहुत करीब महसूस करना चाहता था. मैं ने उस का चेहरा अपने दोनों हाथों में थाम लिया और अपना मुंह उस के कान के पास ले जा कर धीरे से बोला, ‘मेरी सोहणी.’

जसप्रीत मुझ से छूट कर मुसकराती हुई नीचे भाग गई.

मैं भी नीचे आ गया. उस की पलकें लाज और प्रेम से बोझिल थीं. तुम बहुत प्यारी हो प्रीत, क्या लिखूं और?

रात के 2 बजे हैं और नींद मेरी आंखों को छोड़ कर वैसे ही जा चुकी है जैसे मेरे और जसप्रीत के बीच 5 दिन पहले का परायापन.

अचानक बारिश होने लगी है. काश, मैं और जसप्रीत अभी छत पर ही होते, वह कहती ‘मेरी सोहणी’ कह कर रुक क्यों गए, कुछ और बोलो न. मैं कहता, कल्पना करो कि तुम धरती और मैं बादल. प्यासी धरती और फिर खूब जोर से बरस जाए बादल. वह कहती यों नहीं, प्यार से कहो, कुछ अलग ढंग से. और मैं उसे कुछ गढ़ कर सुना देता, शायद कुछ ऐसा-

जमीं से लिपट कर बरस रहे आज बादल,

खुशबू में उस की सिमट रहे आज बादल,

करवट ली मौसम ने कैसी अचानक आज,

लिबास बन कर जमीं का मदहोश है बादल.

तुम ने तो मुझे शायर बना दिया प्रीत. आज नींद नहीं आएगी मुझे.

5 जून

कल रात न जाने कब नींद आई, पर आंख सुबह 6 बजे ही खुल गई. आसमान सुनहरा था. मेरे चेहरे को छू रही थी धूप की गुनगुनी सी गरमी और गुलाब के फूल को छू कर आए नर्म हवा के झोंके. मैं पंजाबी में गुनगुना उठा –

‘आज दिन चढ़या तेरे रंग वरगा,

तेरे चुम्मन पिछली संग वरगा,

है किरणा दे विच नशा जेहा,

किसे चिंदे सप्प दे डंग्ग वरगा.’

‘ओह, तो आप शिव कुमार बटालवी को भी पढ़ते हैं?’ पीछे से जसप्रीत की आवाज आई.

‘हां जी, सुना भी है उन्हें. कितना सुंदर लिखते थे वे प्रेम पर,’ मैं मुसकरा दिया.

‘सिर्फ प्रेम पर थोड़े ही लिखते थे. वे तो जुदाई का दर्द भी जानते थे. तभी तो उन्हें बिरहा का सुलतान कहते हैं,’ जसप्रीत दोनों हाथ पीछे कर आंखें नचाती हुई बोली.

‘जब विरह से सामना होगा तब भी याद कर लेंगे उन्हें. पर अभी तो मोहब्बत के नगमे गाने दो न,’ मैं जसप्रीत के पास जा कर खड़ा हो गया.

‘करो जी इश्कविश्क, सुनाओ जी उन की प्रेम वाली कविता. पर मतलब भी समझते हो या यों ही?’ मुझे चिढ़ाने के अंदाज में हंसती हुई वह बोली.

मैं उस के एकदम करीब पहुंच गया और अपने दोनों हाथों में उसे समेटते हुए बोला, ‘मतलब भी जानते हैं, ऐसे ही थोड़ी गुनगुना रहा था मैं. लो सुनो, आज की सुबह तो बिलकुल तुम्हारे रंग जैसी है, एकदम सुनहरी. और पिछली मुलाकात में हुए चुंबन जैसी गुलाबी महक भी है सुबह में. और….और….आज तो किरणों की छुअन से भी नशा सा हो रहा है, किसी जहरीले सांप का डंक था वो चुंबन… नहीं…चुम्मन…’

मेरे बाहुपाश में जकड़ी जसप्रीत खिलखिला कर हंस पड़ी, ‘आप तो माहिर हो पंजाबी में भी. हाय, मर जावां.’

जसप्रीत के तन की सुगंध मेरे अंगअंग पर छा रही थी. मैं किसी उन्मादी सा बहकने लगा था, ‘मर तो मैं गया हूं. एक बार फिर डस कर अपने जहर से जिंदा कर दो मुझे,’ कह कर मैं ने उस के अधरों पर अपने होंठों से प्रेम लिख दिया.

जसप्रीत का सुनहरा चेहरा सुर्ख लाल हो गया. मैं इस लाल रंग में रंगा अपनी सुधबुध खो बैठा हूं.

6 जून

जसप्रीत लुधियाना में रहने वाली अपनी कुछ सहेलियों के लिए रेडीमेड सलवारसूट खरीदना चाहती थी. उस ने बताया कि कमला मार्केट में इस प्रकार के कपड़ों की कई दुकानें हैं. मम्मी आज थकी हुई थीं. आंटीजी ने मुझ से आग्रह किया कि जसप्रीत के साथ मैं चला जाऊं. मुझे पता था कि कनाट प्लेस के पास भी कपड़ों की कुछ ऐसी ही दुकानें हैं जनपथ पर. इसलिए हम दोनों वहां चले गए.

अहा, क्या दिन था आज का. चिलचिलाती धूप आज चांदनी से कम नहीं लग रही थी. कनाट प्लेस में घूमते हुए कुल्फी खाने में बहुत आनंद आ रहा था हम दोनों को. कुछ सामान खरीदने के बाद मैं ने उस से पालिका बाजार चलने को कहा.

पालिका बाजार के विषय में जसप्रीत नहीं जानती थी. वातानुकूलित भूमिगत बाजार पहली बार देखा था उस ने. वहां गरमी से तो राहत मिली पर भीड़भाड़ बहुत थी.

बाहर निकल कर हम ने रीगल सिनेमा हौल में फिल्म ‘शराबी’ देखने का निश्चय किया, पर हाउसफुल का बोर्ड देख कर निराश हो गए. फिर आसपास घूमते हुए हम ने रेहड़ी वाले से गन्ने का रस खरीद कर पिया और गोलगप्पे भी खाए, खूब चटखारे ले कर.

शाम तक प्रीत ने वह सब खरीद लिया जो वह लेना चाहती थी. घर आते समय सामान अधिक होने के कारण हम ने बस से न आ कर औटो करना उचित समझा. औटो की तेज गति और जसप्रीत की निकटता का रोमांच. मैं हवा में उड़ा जा रहा था.

घर पहुंचे तो सभी टीवी पर नजरें गड़ाए औपरेशन ब्लूस्टार का समाचार देख रहे थे. कुछ देर बाद अंकलजी ने कहा कि उन लोगों को लुधियाना के लिए कल ही निकल लेना चाहिए. कहीं ऐसा न हो कि राजनीति के नाम पर फूट डालने वालों को मौका मिल जाए और दंगेफसाद हो जाएं. खरीदारी भी लगभग पूरी हो गई थी उन की.

रात के खाने के बाद मैं जसप्रीत के साथ अपने कमरे में आ गया. हम अपने सपनों को ले कर चर्चा कर रहे थे. जसप्रीत बीएड कर एक अध्यापिका बनना चाहती है. मैं ने इस के लिए उसे खूब मेहनत करने की सलाह दी. मुझे भी लैक्चरर बनने के लिए शुभकामनाएं दीं उस ने.

अपने प्रेम के भविष्य को ले कर हमें एक सुखद एहसास हो रहा था. हम दोनों ही अपने मम्मीपापा की प्रिय संतान हैं, इसलिए विजातीय और अलगअलग धर्मों से होने के बावजूद हमें पूरा यकीन है कि हमारे मातापिता हमें एक होने से नहीं रोकेंगे.

7 जून

चली गई जसप्रीत.

जाने से पहले भावुक हो कर मुझ से बोली, ‘जल्दी ही हमेशा के लिए आ जाऊंगी यहां.’

मैं ने अपनी उदासी छिपाने की कोशिश कर हंसते हुए कहा, ‘जल्दी ही? अभी तो मैं अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हूं और तुम हो कि अपना बोझ मुझ पर लादना चाहती हो.’

उस ने नजरें झुका कर एक

कविता की पंक्तियां बोलते हुए जवाब

दिया-

‘चरणों पर अर्पित है, इस को चाहो तो स्वीकार करो,

यह तो वस्तु तुम्हारी ही है, ठुकरा दो या प्यार करो.’

‘ओह, सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता,’ मैं मुसकराने की असफल चेष्टा करते हुए बोला.

टैक्सी में बैठते हुए जसप्रीत अपनी रुलाई रोक न पाई और अपने कमरे में वापस आ कर मैं.

4 जुलाई

कई दिनों बाद डायरी खोली है. लिखता भी तो क्या? प्रीत की यादों के सिवा लिखने को था ही क्या मेरे पास.

आज लाइब्रेरी में पुस्तकें लौटाने गया तो यशपाल सर मिल गए. उन्होंने बताया कि केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद ने एक प्रोजैक्ट के लिए कुछ विद्यार्थियों के नाम मांगे थे उन से. सर ने मेरा नाम भी दिया था. मुझे चयनित कर लिया गया है. 4 महीने के लिए जाना पड़ेगा मुझे वहां पर. इस अनुभव का मुझे विशेष लाभ मिलेगा और पीएचडी के लिए आवेदन करने पर निश्चय ही मुझे प्राथमिकता दी जाएगी.

जसप्रीत तो 15 जुलाई से पहले आएगी नहीं होस्टल वापस. मैं तो तब तक हैदराबाद चला जाऊंगा. उसे पत्र या टैलीफोन द्वारा सूचित करने के उद्देश्य से मम्मी के पास जा कर जसप्रीत के घर का पता और फोन नंबर मांगा तो उन के माथे पर बल पड़ गए. वे जानना चाहती थीं कि मैं अपने हैदराबाद जाने की सूचना जसप्रीत को क्यों देना चाहता हूं? जब मैं ने उन्हें अपनी भावनाओं से अवगत कराया तो मेरी आशा के उलट वे नाराज हो गईं. मुझे डांट लगाती हुई बोलीं, ‘तुझे भी जमाने की हवा लग गई?’

जब मैं इस विषय में खुल कर उन से चर्चा करने लगा तो वे कल पापा के सामने बात करेंगे. कह कर चुपचाप चली गईं. पापा आज औफिस के काम से मेरठ गए हैं, देर रात में लौटेंगे.

5 जुलाई

कभी सोचा भी नहीं था मैं ने कि पापा मेरे और प्रीत के रिश्ते को ले कर इतने नाराज हो जाएंगे. वे मुझ से ऐसे बरताव करने लगे जैसे मैं ने चोरी की हो.

‘यह क्या तमाशा है? अपनी जात में लड़कियों का अकाल पड़ गया है क्या?’ त्योरियां चढ़ा कर पापा सुबहसुबह मुझ से बोले.

‘पापा, मैं उस से प्यार करता हूं.’

‘एक हफ्ता रहे उस के साथ

और प्यार? इसे प्यार नहीं कुछ और ही कहते हैं.’

‘क्या कहते हैं इसे पापा?’

‘बुरी नजर. शर्म नहीं आती तुझे?’ पापा गुस्से से चिल्लाए.

‘जसप्रीत भी प्यार करती है मुझ से,’ मैं भी तेज आवाज में बोला.

मेरे इस तरह जवाब देने से पापा कहीं और क्रोधित न हो जाएं, यह सोच कर मम्मी बीच में आ गईं.

‘बेटा, तू बड़ा भोला है, वह तुझ से दो मीठे बोल बोली और तू प्यार समझ बैठा. वह सबकुछ भूल भी चुकी होगी अब तक,’ मम्मी बोलीं.

‘नहीं, मुझे यकीन है जसप्रीत पर,’ मैं अपनी बात पर अड़ा हुआ था.

‘लुधियाना से लौट कर तेरे साथ घूमनेफिरने के लिए कर रही होगी, प्यार का नाटक. यहां जसप्रीत की जानपहचान वाला तो कोई रहता नहीं. हमारे तो रिश्तेदार भरे पड़े हैं दिल्ली

में. मिलना भी मत उस से. हमारी

इज्जत मिट्टी में मिलाएगा?’ पापा जोर से चिल्लाए.

‘ठीक है पापा, अभी नहीं घूमूंगा उस के साथ. पर शादी के बाद तो घूम सकता हूं, फिर तो कोई एतराज नहीं होगा किसी रिश्तेदार को?’

‘फिर वही बेवकूफी. क्या कमी है तुझ में कि कोई अपनी लड़की नहीं देगा? और फिर भी तुझे हमारी बात नहीं माननी है तो समझ ले कि मर गए हम तेरे लिए,’ किसी फिल्मी पिता की तरह बोल कर पापा ने बात खत्म की.

मैं अपने कमरे में वापस आ गया. सोच रहा हूं कि हैदराबाद न जाऊं.

पर ऐसा मौका हाथ से जाने भी नहीं

दे सकता.

ठीक है. चला जाता हूं. आ कर मिलता हूं जसप्रीत से. शायद उस के मम्मीपापा मना लेंगे मेरे पापामम्मी को.

6 जुलाई

आज मैं जसप्रीत के होस्टल गया. अच्छा हुआ कि उस की रूममेट, शालिनी छुट्टियां बिता कर आ चुकी थी वहां. एक पत्र उस को दे दिया मैं ने जसप्रीत के लिए. उस में ज्यादा न लिख कर केवल अपने जाने की बात लिख दी थी.

अब इस डायरी में हैदराबाद से लौट कर ही कुछ लिखूंगा.

20 नवंबर

मैं कितना प्रसन्न था कल हैदराबाद से लौटने पर. सोचा था कुछ देर बाद ही जसप्रीत से मिलने होस्टल जाऊंगा. पर उस समय मैं अवाक रह गया जब मम्मी ने मुझे जसप्रीत की शादी का कार्ड दिखाया. डाक से मिला था उन्हें वह कार्ड. यकीन ही नहीं हुआ मुझे.

जसप्रीत के विवाह की शुभकामनाएं देने के बहाने मैं एक बार लुधियाना जा कर इस बारे में जानना चाहता था. पर मम्मीपापा नहीं माने. उन का कहना था कि 31 अक्तूबर को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में जो माहौल बना है उसे देखते हुए वे मुझे पंजाब जाने की अनुमति नहीं दे सकते.

जब अपने घर में ही लोग धर्म और जाति को ले कर इतना भेदभाव करते हैं तो देश में सौहार्दपूर्ण वातावरण की आशा क्यों?

21 नवंबर

मैं जसप्रीत के होस्टल जा कर शालिनी से मिला. उस ने बताया कि जसप्रीत जुलाई में लुधियाना से वापस आ गई थी. शालिनी ने मेरा पत्र भी दे दिया था प्रीत को. पर अगस्त में ही उस के पापा उसे वापस लुधियाना ले गए थे. शालिनी भी नहीं जानती थी कि प्रीत का विवाह हो गया.

क्या कहूं मैं अब? उसे तो भूल नहीं सकता कभी. मेरे लिए तो प्रीत के साथ बिताए वे 7 दिन ही सात जन्मों के बराबर थे. जसप्रीत, तुम ही हो मेरी सात जन्मों की साथी. किसी और की क्या जरूरत है अब मुझे?

कभी मिले तो पहचान लोगी न? खुश रहना हमेशा.

इतना पढ़ने के बाद हर्षित रुक गया. उस ने पन्ने पलटे पर इस के बाद डायरी में कुछ नहीं लिखा था.

‘‘तो सर कभी मिलीं जसप्रीतजी आप से आ कर?’’ साक्षी ने निराश हो कर पूछा.

‘‘आप ने क्यों नहीं कर ली शादी जब उन्होंने ही आप को धोखा दे दिया,’’ अमन के कहते ही दीपेश और हर्षित ने भी सहमति में अपना सिर हिला दिया.

प्रशांत सर ने पास रखा लकड़ी का डब्बा खोला और एक कागज साक्षी की ओर बढ़ा दिया और बोले, ‘‘मेरे हैदराबाद से लौटने के लगभग 2 वर्षों बाद अंकलजी हमारे घर आए थे. मैं मिल नहीं पाया था उन से, क्योंकि तब मैं जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहा था और प्रतिदिन होने वाली भागदौड़ से बचने के लिए होस्टल में रह रहा था. लो, पढ़ो यह पत्र.’’

एक सफेद लिफाफा जो लगभग पीला पड़ चुका था. भेजने वाले का नाम-सतनाम सिंह और पाने वाले की जगह लिखा था- प्रशांत पुत्तर के वास्ते. उस लिफाफे से कागज को निकाल कर साक्षी ने पढ़ना शुरू किया-

नई दिल्ली,

14.10.1986

प्रशांत, मेरे बच्चे,

लंबी उमर हो तेरी.

आज मैं आप के घर पर आया हुआ हूं. मिलना चाहता था एक बार आप से. यहां पहुंचा तो पता लगा कि आप गए हुए हो पीएचडी करने. मैं खत लिख कर आप के पापा को दे दूंगा.

पिछली बार जब मेरा परिवार आप के घर आया था, तब कितने खुश थे हम सब. बस यों समझ लो कि मेरे जीवन की सारी खुशियां यहीं छूट गई थीं. मुसकराना भी भूल गया मैं तो उस के बाद.

मेरे भतीजे की शादी के टाइम पर एक रिश्ता आया था हमारी प्रीत के वास्ते. लड़का कनाडा में रहता था, पर उस वक्त वह शादी अटैंड करने आया हुआ था.

जसप्रीत ने इस रिश्ते के लिए इनकार कर दिया. मेरा पूरा परिवार तो हिल गया था यह सुन कर कि वह आप को पसंद करती थी. खानदान में कभी किसी ने सिख धर्म को छोड़ कर कहीं ब्याह नहीं किया था अपने बच्चों का.

लड़का अपने घरवालों के साथ 2 महीनों के लिए ही था इधर. हम ने जसप्रीत की मरजी के खिलाफ उस लड़के से जसप्रीत की शादी करने का प्रोग्राम बना लिया. जसप्रीत ने बहुत विनती की हम से कि आप के हैदराबाद से आने तक हम इंतजार करें, आप से बात कर के ही कोई फैसला लें.

नहीं माने हम लोग. पर क्या मिला उस जोरजबरदस्ती से हमें? आनंद कारज वाला घर अफसोस में बदल गया. बरात आने से पहले ही घर की छत से कूद गई जसप्रीत. 3 हफ्ते तक कोमा में रहने के बाद होश में तो आ गई वह, पर गरदन से नीचे का हिस्सा बेकार हो गया. सब समझती है, थोड़ाबहुत बोल भी लेती है पर, पुत्तर, उस के हाथपैर किसी काम के नही रहे. महसूस भी कुछ नहीं होता उसे गरदन के नीचे से पैरों तक. आप की आंटीजी सतवंत तो उस की हालत देख ही नहीं सकीं और पिछले साल चली गईं यह दुनिया छोड़ कर.

अंधे हो गए थे हम लोग. हमारी आंखों पर धर्म का परदा पड़ा था. हम नहीं समझ सके आप दोनों को. मेरे बच्चे, मैंनू माफ कर देना. वरना चैन से मर नहीं पाऊंगा.

आप का अंकलजी,

सतनाम सिंह.

पत्र पूरा होते ही सब सिर झुका कर बैठ गए. ‘‘मैं अभी आया,’’ कह कर प्रशांत सर लंबेलंबे डग भरते हुए दूसरे कमरे की ओर चल दिए.

कुछ देर बाद वे एक व्हीलचेयर को पीछे से सहारा देते हुए चला कर ला रहे थे. व्हीलचेयर पर एक महिला गाउन पहने बैठी थी. शांत, सौम्य चेहरा, स्नेह से भरी बड़ीबड़ी आंखें, बालों से झांकती हलकी चांदी और कंधे पर आगे की ओर लटकती हुई लंबी सी चोटी.

प्रशांत सर नम आंखों से सब की ओर देख कर व्हीलचेयर पर बैठी महिला से परिचय करवाते हुए बोले, ‘‘मिलिए इन से, मेरे सुखदुख की साथी, मेरे जीवन की खुशी, मेरी अर्धांगिनी, जसप्रीत.’’

सब आश्चर्यचकित रह गए. कुछ देर तक उन दोनों को अपलक निहारने के बाद दीपेश उठ कर खड़ा हो गया और उस को देख सभी जसप्रीत के सम्मान में खड़े हो गए.

जसप्रीत ने अपना टेढ़ा हाथ उठा कर सब को बैठने का इशारा किया और अपने होंठों को धीरे से फैलाते हुए मुसकरा दी.

प्रशांत सर बोलने लगे, ‘‘अपनी पीएचडी के दौरान ही जब मुझे जसप्रीत के विषय में पता लगा तो मैं ने झट से विवाह का निर्णय ले लिया. दबी जबान में मम्मीपापा ने विरोध जरूर किया पर वे समझ गए थे कि अब मैं नहीं रुकने वाला. मैं नहीं छोड़ सकता था जसप्रीत को उस हाल में.’’

‘‘इन्होंने बहुत इ…इ…इलाज करवाया मेरा. उस के बा…बाद ही थो…थोड़े हाथपैर चल…चलने लगे मेरे.’’ जसप्रीत अपनी बात रुकरुक कर कह पा रही थी.

‘‘आज जसप्रीत ने मुझ से कहा कि मैं अपनी डायरी आप सब को पढ़ने को दे दूं, इन का कहना था कि तभी बच्चे जान सकेंगे कि हम इमरान और स्वाति की भावनाएं क्यों बेहतर ढंग से समझ पा रहे हैं,’’ प्रशांत सर ने बताया.

‘‘ओह, आप से मिलना कितना अच्छा लग रहा है,’’ कह कर चहकती हुई साक्षी जसप्रीत से लिपट गई. सब लोग उठ कर जसप्रीत को घेर कर खड़े हो गए.

प्रशांत सर ने फिर से बोलना शुरू किया, ‘‘आप लोग जानना चाहते थे कि मैं ने क्या कहा स्वाति और इमरान के पेरैंट्स से? सुनो, मैं ने पहले उन से पूछा कि धर्म के नाम पर बंटवारा आखिर है क्या? कहां से आईं ये बातें? क्या यह जन्मजात गुण है व्यक्ति का? जन्म लेते ही बच्चे के चेहरे पर क्या उस का धर्म अंकित होता है? हम ही बनाते हैं ये दीवारें और कैद हो जाते हैं उन में खुद ही. इतना ही नहीं, जब कोई प्रेम के वशीभूत हो इन दीवारों को तोड़ना चाहता है तो हम उसे नासमझ ठहरा कर या डराधमका कर चुप करा देते हैं. कब तक अपनी बनाई हुई दीवारों में खुद को कैद करते रहेंगे हम? कब तक अपनी बनाई हुई बेडि़यों में जकड़े रखेंगे खुद को हम? आखिर कब तक.’’

जसप्रीत ने अपनी दोनों हथेलियां मिलाईं और धीरे से ताली बजाने लगी. वहां खड़े छात्र भी मुसकराते हुए जसप्रीत का अनुसरण करने लगे. कमरा तालियों की आवाज से गूंज उठा.

‘‘सर, हम किन शब्दों में आप को धन्यवाद कहें,’’ दीपेश ने कहा.

प्रशांत सर मुसकराते हुए बोले, ‘‘एक बात मैं जरूर कहूंगा. स्वाति और इमरान के पेरैंट्स समझदार हैं. फिलहाल दोनों के मिलने पर रोकटोक न लगाने को तैयार हैं वे. कह रहे थे कि रिश्ता जोड़ने के विषय में कुछ दिन विचार करेंगे. चलो, आशा की किरण तो दिखाई दी न? पर दुख की बात है कि सब लोग ऐसे नहीं होते.’’

‘‘क्यों न हम सब मि…मिल…मिल कर एक ऐसा संग…संगठन बनाएं जो लोगों को जा…जा…जाग…जागरूक करे,’’ जसप्रीत ने सुझाव दिया.

‘‘हां, हां,’’ की सम्मिलित आवाज कमरे में सुनाई देने लगी.

‘‘मैं भी स…सह… सहयोग करूंगी उस…उस में.’’ कह कर जसप्रीत का चेहरा नई आभा से दैदीप्यमान हो झिलमिलाने लगा.

‘‘वाह जसप्रीत, खूब. हम जल्द ही ऐसा करेंगे,’’ प्रशांत सर बोले.

‘‘उस संगठन के माध्यम से हम सब को यह समझाने का प्रयास करेंगे कि जाति और धर्म का लबादा जो हम ने सिर तक पहन रखा है, बहुत जरूरी है अब उसे उतार फेंकना. दम घुट जाएगा वरना हमारा,’’ हर्षित अपनी बुलंद आवाज में बोला.

‘‘और यह भी कि बच्चों की बात सुना करें पेरैंट्स. उन पर भरोसा रखें, उन्हें दोस्त समझें,’’ साक्षी ने कहा.

‘‘औ…औ…और यह भी…यह भी… कि कोई औरत अपने को कम….कम…. कमजोर समझ कर आ…आ….आ… आत्महत्या की कोशिश न करे…क… कभी,’’ जसप्रीत अटकअटक कर बोली.

‘‘बिलकुल, नारी अबला नहीं वह तो संबल है सब का,’’ साक्षी ने कहा.

कुछ देर बाद प्रशांत ने सब का धन्यवाद किया और वे चारों लौट गए.

रात के 10 बज गए थे. प्रशांत सर ने कमला को खाना लगाने को कहा और जसप्रीत को सहारा दे कर डाइनिंग टेबल की कुरसी पर बैठा दिया.

अगले दिन सुबह 6 बजे नींद खुली उन की. खिड़की का परदा हटा कर वे बाहर देखते हुए सोच रहे थे, ‘कितना सुंदर है यह आकाश में गुलाबी रंग बिखेरता हुआ सूरज और उस के उदय होते ही गगन में स्वच्छंदता से उड़ान भरते हुए ये पंछियों के झुंड…

‘जसप्रीत, तुम्हारा यह नया रूप शायद आने वाले समय को अपने गुलाबी रंग में रंग लेगा और फिर नई पीढ़ी भर सकेगी एक स्वच्छंद, ऊंची उड़ान…आज का दिन तो सचमुच तुम्हारे रंग में रंग कर निकला है प्रीत.’

प्रशांत सर गुनगुना उठे – ‘‘आज दिन चढ़या तेरे रंग वरगा.’’

Love Story : कालेजिया इश्क – कालेज के दिनों में इश्कबाजी की अनकही कहानी

Love Story : कालेज के दिन भी क्या थे. वैसे तो कालेज में न जाने कितने दोस्त थे, लेकिन सलीम और रजत के बिना न तो कभी मेरा कालेज जाना हुआ और न ही कभी कैंटीन में कुछ अकेले खाना.

सलीम दूसरे शहर का रहने वाला था. एक छोटे से किराए के कमरे में उस का सबकुछ था जैसे कि रसोईर् का सामान, बिस्तर और चारों तरफ लगीं हीरोइनों की ढेर सारी तसवीरें. हुआ यह कि एक दिन अचानक अपनी पूरी गृहस्थी साइकिल पर लादे मेरे घर आ गया. मैं ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘यार हुआ क्या, मकान मालिक से कहासुनी हो गई. मैं ने कमरा खाली कर दिया. चलो, कोई नया कमरा ढूंढ़ो चल कर,’’ उस ने जवाब दिया तो मैं ने कहा, ‘‘इतनी सुबह किस का दरवाजा खटखटाएं. तुम पहले चाय पियो, फिर चलते हैं.’’

सुबह 10 बजे मैं और सलीम नया कमरा ढूंढ़ने निकले. ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा, पड़ोसी इरफान चाचा का कमरा खाली था. इरफान चाचा पहले तैयार नहीं हुए तो मैं ने अपने ट्यूशन वाले इफ्तियार सर से कहा, ‘‘सर, मेरे दोस्त को कमरा चाहिए.’’ उन की इरफान चाचा से जान पहचान थी. उन के कहने पर सलीम को इरफान चाचा का कमरा मिल गया.’’

कुछ दिनों बाद सलीम ने बताया ‘‘यार, इरफान चाचा बड़े भले आदमी है, कभीकभी उन की बेटियां खाना दे जाती हैं.’’ मैं ने उस से कहा, ‘‘यार चक्कर में मत पड़ जाना.’’

‘‘यार मुझे कुछ लेनादेना नहीं, पढ़ाई पूरी हो जाए अपने शहर वापस चला जाऊंगा,’’ सलीम बोला.

महीना भर बीता होगा सलीम को इरफान चाचा के यहां रहते हुए, एक सुबह वह फिर पूरी गृहस्थी साइकिल पर लादे मेरे घर आया. मैं ने पूछा, ‘‘अब क्या हुआ, तुम तो फिर बेघर हो गए?’’

उस ने कहा, ‘‘रुको, पहले मैं साइकिल खड़ी कर दूं, फिर बताता हूं. पिछले हफ्ते इरफान चाचा और उन की बेगम खुसरफुसुर कर रहे थे. मैं ने दरवाजे से सट कर उन की बातचीत सुनी. वे कह रहे थे, ‘लड़का तो अच्छा है अपनी जैनब के लिए सही रहेगा. इसे घर में ही खाना खिला दिया करो. जल्द ही निकाह कर देंगे.‘’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘यार इस में कमरा छोड़ने की कौन सी बात है. तुम्हारी बिना मरजी के कोई भला शादी कैसे कर देगा.’’

सलीम ने कागज का एक टुकड़ा निकाल कर पढ़ा जो कि उर्दू में था, ’आप तो बड़े जहीन हैं. मुझे तो पता ही नहीं चला कि मैं कब आप को दिल दे बैठी. अब्बू कह रहे थे, लड़का बहुत भला है, खयाल रखा करो. कल आप का इंतजार करती रही और आप हैं कि आप को अपने दोस्तों से फुरसत नहीं. वैसे जो आप का बड़े बालों वाला दोस्त है वह तो इसी महल्ले में रहता है. अब्बू कह रहे थे. अपनी शादी में उसे भी बुलाना. आज आप के लिए मेवे वाली खीर बनाऊंगी, मुझे पता है. आप को बहुत पसंद हैं.

‘तुम्हारी जैनब.’

खत पढ़ने के बाद सलीम ने कहा, ‘‘तुम्हें पता है, ये खत किस ने लिखा है.’’ ‘‘जैनब ने लिखा होगा,’’ मैं ने कहा.

‘‘नहीं, यह जैनब ने नहीं लिखा. मुझे पता है कि जैनब को उर्दू लिखनी नहीं आती. मैं ने यह भी पता कर लिया है कि इसे किस ने लिखा है.’’

‘‘अगर तुम्हें पता है तो बताओ किस ने लिखा है,’’ मैं ने अचरज से पूछा.

सलीम ने कहा, ‘‘इसे जैनब के अब्बू ने खुद लिखा है.’’

‘‘वो तुम्हें कैसे पता?’’

सलीम ने बताया, ‘‘इरफान चाचा के 4 बेटियां हैं और उन्होंने एक को भी नहीं पढ़ाया. मैं उन्हें अब हिंदी वर्णमाला सिखा रहा हूं. उर्दू सिर्फ उन की बेटियों को रटी हुई है थोड़ीबहुत लेकिन वे लिख नहीं पातीं.’’

मैं ने कहा, ‘‘तो अब क्या करें?’’

सलीम बोला,’’ कुछ नहीं, पुराने मकान मालिक के पास जा रहा हूं, माफी मांग लूंगा वहीं रहूंगा.’’

पहला साल था हमारा ग्रेजुएशन का. रजत शहर का ही रहने वाला था. एक दिन जैसे ही मैं इकोनौमिक्स की क्लास में घुसा, मेरे होश उड़ गए. ब्लैकबोर्ड पर लिखा था ‘आई लव यू अंजुला.’ नीचे मेरा नाम लिखा था, ‘तुम्हारा राहुल’ और अंजुला नाम की जो लड़की क्लासमेट थी, उस की मेज पर गुलाब का फूल रखा था और साथ में एक लैटर, जिस में लिखा था, ‘अंजुला, आज मैं पूरी क्लास के सामने यह स्वीकार करता हूं कि मैं तुम्हे बेइंतहा प्यार करता हूं.’

ये सब देख कर और लैटर पढ़ कर मेरा हाल बेहाल था. क्लास में रजत मुझे मिला नहीं. वह ये सब कर के निकल चुका था. क्लास में सब से पहले अंजुला ही आई और ये सब देख कर फूटफूट कर रोने लगी. मैं तो मेजों के नीचे से निकल कर कालेज के पिछले दरवाजे से भाग कर घर आ गया. मैं 7 दिनों तक कालेज गया ही नहीं.

ग्रेजुएशन का दूसरा साल था. लंबी छुट्टी के बाद कालेज खुला. सलीम अपने शहर से वापस आ गया. सलीम और मैं हमेशा क्लास की आगे की पंक्ति में बैठते थे. ऐडमिशन चल रहे थे, एक दिन सलमा नाम की लड़की क्लास में आई. उस ने क्लास में पढ़ा रहे सर से कहा, ‘‘सर, मेरा नाम रजिस्टर में लिख लीजिए, मेरे पापा जिला जज हैं. उन का यहां ट्रांसफर हुआ है. सर ने लिख लिया. वह हमारे साथ ही क्लास की अगली पंक्ति में बैठती थी.

सलीम की निगाहें अकसर सलमा की तरफ ही रहती थीं, एक दिन सलीम ने मुझ से कहा, ‘‘तुम ने देखा, सलमा मेरी तरफ देखती रहती है.’’

मैं ने कहा, ‘‘अबे ओए तेरी अक्ल घास चरने गई. कहां राजा भोज कहां गंगू तेली. वह तेरी तरफ नहीं, मुझे देखती है.’’

सलीम ने तुरंत बात काटते हुए कहा, ‘‘नहीं, वह तुम्हारी तरफ बिलकुल नहीं देखती, वह मेरी तरफ ही देखती है और तुम्हें एक बात और बता दूं, अमीर लड़कियों को गरीब लड़कों से ही प्यार होता है. हिंदी फिल्मों में भी तो यही दिखाया जाता है.’’

मैं ने कहा,’’चलो, छोड़ो यार पिछले साल हम लोगों के नंबर कम आए थे, इस बार मेहनत कर लो, पता चले इन बातों के चक्कर में ग्रेजुएशन 3 की जगह 4 साल का हो जाए.’’

एक दिन सलीम का भ्रम टूट ही गया जब उस ने मुझे बताया, ‘‘यार, वह न मेरी तरफ देखती है और न तुम्हारी तरफ. आज मैं कौफी शौप गया तो मैं ने देखा जो अपने क्लास का सुहेल है, उस के साथ सलमा हाथ में हाथ डाले एक ही कप में कौफी पी रही थी.’’

मुझे हंसी आ गई. मैं ने पूछा, ’’फिर तुम्हारी गरीब लड़का और अमीर लड़की वाली फिल्म का क्या होगा?’’

सलीम ने झेंपते हुए कहा, ‘‘मेरी फिल्म फ्लौप हो गई.’’

लेकिन उस ने भी मुझ से पूछ लिया, ‘‘तुम भी तो कह रहे थे, वह तुम्हारी तरफ देखती है. तुम भी तो रेल सी देखते रह गए?’’

मैं ने कहा ‘‘छोड़ो यार, हमारी दोस्ती सब से बढ़ कर है.’’

कुछ दिनों से रजत की अजीब किस्म के शरारती लड़कों से दोस्ती हो गई थी. जब भी कोई सर क्लास में पढ़ाने आते, रजत अपने शरारती दोस्तों के साथ क्लास के बाहर कसरत करने लगता.

एक दिन सर ने चिल्ला कर पूछा, ‘‘यह हो क्या रहा है, तुम पढ़ते समय ये हरकतें क्यों करते हो?’’

रजत अकड़ कर बोला, ’’सर, इसे हरकत मत बोलिए. जैसे आप किसी विषय को क्लास में पढ़ाते हो वैसे ही मैं इन्हें कसरत कर के शरीर हृष्टपुष्ट रखने की ट्रेनिंग देता हूं.’’

रजत की हरकतों से सर गुस्से में पैर पटकते क्लास छोड़ कर चले गए, ‘‘बेकार है पढ़ाना, यह पढ़ाने ही नहीं देगा.’’

मैं ने रजत से कहा, ‘‘यार, कभीकभी तो क्लास लगती है, उस पर भी तुम ड्रामा कर देते हो.’’

रजत बोला, ‘‘तुम्हें ज्यादा पढ़ाई सूझ रही है तो घर पर पढ़ा करो. हमें तो पहले शरीर हृष्टपुष्ट करना है, फिर पढ़ाई.’’

एक दिन तो हद हो गई, सर इकोनौमिक्स पढ़ा रहे थे. रजत और उस के दोस्त शेख की वेशभूषा में क्लास में घुसे और सर से बोले, ’’ए मिस्टर, हमें आप से बात करनी है. हमारे अरब में सौ तेल के कुएं हैं, और हम आप को अपना बिजनैस पार्टनर बनाना चाहते हैं.’’

सर आगबबूला हो गए. उन्होंने प्रिंसिपल से तुरंत शिकायत की. प्रिंसिपल ने पुलिस बुला दी. सभी शेख पिछला दरवाजा फांद कर नौ दो ग्यारह हो गए.

कालेज की लाइब्रेरी में नीचे का फ्लोर लड़कों के बैठने के लिए था और ऊपर का फ्लोर लड़कियों के लिए. लाइब्रेरियन लड़कों से तो बड़े खुर्राट तरीके  से बात करता लेकिन जब कोई लड़की बात करने आती तो उस की बातें ही खत्म नहीं होतीं. यह दूसरी बात थी कि लड़कियां ही उस से कम बात किया करती थीं.

एक दिन जब मैं, रजत और सलीम साथ में लाइब्रेरी में घुसे, सलीम ने लाइब्रेरियन से कोई मैगजीन मांगी. उस ने मैगजीन दी ही नहीं और वही मैगजीन जब एक लड़की ने मांगी तो उसे दे दी. सलीम को बड़ा गुस्सा आया. उस ने लाइब्रेरियन से गुस्से में कहा, ‘‘यह बताओ, हमारे में क्या कांटे लगे हैं. तुम्हें सिर्फ लड़कियां ही दिखाई देती हैं.’’

मोनू सिंह और उस की बहन भी हमारे बैचमेट थे. दोस्ती तो नहीं थी, हां, कभीकभार बातचीत हो जाती थी. एक दिन मैं, सलीम, रजत लाइब्रेरी में बैठे पढ़ रहे थे. अचानक ताबड़तोड़ गोलियों की आवाज आनें लगी, बाद में पता चला कि मोनू सिंह की बहन का किसी ने दुपट्टा खींच दिया था. गांव से उस के साथ आए लोगों ने गोलियां चलाई थीं. खैर, मोनू सिंह और उन की बहन सैकंड ईयर में ही घर वापस चले गए.

पता ही नहीं चले कालेज के 2 साल कब फुर्र से उड़ गए. तीसरे साल में सलीम ने मुझे बताया, ‘‘यार, मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है.’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारी एक मुहब्बत पहले भी फ्लौप हो चुकी है. चुपचाप पढ़ाई करो, वैसे भी यह थर्ड ईयर है.’’ लेकिन सलीम के ऊपर जैसे मुहब्बत का भूत सवार था. मैं ने पूछा, ‘‘बताओ कौन है वह लड़की?’’

‘‘अरे वही गुलनाज जो पीछे बैठती है.’’ गुलनाज कभीकभार सलीम से बात कर लेती थी.

एक दिन मैं कालेज नहीं गया. सलीम शाम को घर आया,’’यार, तुम तो कालेज गए नहीं लेकिन तुम्हारे लिए किसी ने लैटर दिया है. लो, पढ़ लो.’’

लैटर में यों लिखा था-

‘डियर राहुल, मुझे पता है जीसीआर (गर्ल कौमन रूम) के सामने खड़े हो कर तुम सिर्फ मुझे ही देखते हो. बड़ी अच्छी बात है. तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, लेकिन क्या करूं, मुझे शर्म लगती है तुम से बात करने में. इसीलिए आज तक हम कोई बात नहीं कर पाए. वैसे, मिलना या बातें करने से भी ऊंचा है हमारा प्यार. कल तुम गांधीजी की मूर्ति के पास जो बैंच है, उस के पास अपने हिस्ट्री के नोट्स रख देना, मैं उन्हें उठा लूंगी.

‘ढेर सारा प्यार. तुम्हारी ममता.’

लैटर में ढेर सारी गुलाब की पंखुडि़यां रखी थी. लैटर पढ़ने के बाद सलीम बोला, ‘‘बधाई हो. कालेज जाते कई दिन हो गए, ममता ने कभी उड़ती नजर से भी मेरी तरफ नहीं देखा.’’

मैं ने सलीम से पूछा, ‘‘यार, लैटर लिखने के बाद उस ने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा.’’ सलीम ने बड़ी गंभीरता से कहा, ’’तुम ने पढ़ा नहीं. लैटर में उस ने खुद लिखा है उसे शर्म लगती है.

कालेज के दिन पता ही नहीं चले, कब वसंत के दिनों में पेड़ों पर आए बौर की तरह चले भी गए. आखिर ग्रेजुएशन के थर्ड ईयर की ऐग्जाम डेट्स आ गई. जब सभी पेपर हो गए, एक दिन शाम को सलीम घर पर मिलने आया. उस ने कहा, ‘‘आज तुम्हें एक राज वाली बात बतानी है.’’

‘‘बताओ.’’

सलीम ने लंबी सांस भरते हुए कहा, ‘‘ममता वाला लैटर मैं ने खुद लिखा था.’’

मैं ने अचरज से पूछा, ‘‘क्यों?’’ तो उस ने कहा, ‘‘मुझे डर था कि कहीं सलमा की तरह हमारीतुम्हारी एकतरफा मुहब्बत की तरह गुलनाज भी कौमन मुहब्बत न बन जाए.’’

मैं ने कहा, ‘‘ओह, तो क्या गुलनाज तुम से प्यार करती है?’’ वह बोला, ‘‘नहीं यार, गुलनाज की सगाई लतीफ से हो गई है.’’ और हमेशा की तरह, गृहस्थी साइकिल पर लादे सलीम ने उसी रात महल्ला नहीं, बल्कि शहर ही छोड़ दिया.

Hindi Kahani : पांच साल बाद – क्या स्निग्धा एकतरफा प्यार की चोट से उबर पाई?

Hindi Kahani : उस दिन सुबह से ही मौसम खुशगवार था. निशांत के घर में फूलों की महक थी, हवा गुनगुना रही थी. उस के मम्मी और डैडी कल ही कानपुर से आ गए थे. निशांत ने उन्हें सबकुछ बता दिया था. उन्हें खुशी थी कि बेटा 5 साल बाद ही सही, ठीक रास्ते पर आ गया था वरना न जाने उसे कौन सा रोग लग गया था कि शादी के नाम से भड़क जाता था.

मम्मीपापा के सामने स्निग्धा को खड़ा कर के निशांत ने कहा, ‘‘अब आप देख लीजिए. जैसा आप चाहते थे वैसा ही मैं ने किया. आप एक सुंदर, पढ़ीलिखी और अच्छी बहू अपने बेटे के लिए चाहते थे. क्या इस से अच्छी व सुंदर बहू कोई और हो सकती है?’’

स्निग्धा निशांत की मम्मी के चरण स्पर्श करने के लिए नीचे की तरफ झुकने लगी, परंतु उन्होंने स्निग्धा को अपने कदमों पर झुकने का मौका ही नहीं दिया. उस के पहले ही उसे अपने सीने से लगा लिया.

स्निग्धा पहली नजर में ही सब को पसंद आ गई थी.

निशांत ने मम्मीडैडी को स्निग्धा के बारे में बताना उचित नहीं समझा. वह जानता था कि स्निग्धा के दुखद और कष्टमय विगत को बताने से मम्मीडैडी को मानसिक संताप पहुंच सकता था. इसलिए उस ने थोड़े से झूठ का सहारा लिया और उन्हें केवल इतना बताया कि स्निग्धा को एक रिश्तेदार ने पालापोसा और पढ़ायालिखाया था. इलाहाबाद में वह उस के साथ पढ़ती थी, तभी उन दोनों की जानपहचान हुई थी. अब वह अपने पैरों पर खड़ी थी और दिल्ली में रह कर एक प्राइवेट फर्म में नौकरी कर रही थी. निशांत के परिवार वाले समझदार थे. स्निग्धा की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए उस के परिवार के बारे में कोई बात नहीं की.

निशांत और स्निग्धा की शादी हो गई. बहुत सादगी और परंपरागत तरीके से उन दोनों की शादी का आयोजन किया गया था. निशांत तथा उस के घर वाले शादीब्याह में बहुत ज्यादा तामझाम और दिखावे के खिलाफ थे. थोड़े से खास रिश्तेदारों और मित्रों के बीच में उन की शादी संपन्न हो गई.

शादी के पहले एक दिन एकांत में निशांत ने स्निग्धा से पूछा, ‘अगर तुम्हारा मन हो तो हम दोनों चल कर तुम्हारे मम्मीपापा को मना लाते हैं. उन का आशीर्वाद मिलेगा तो हम सब को अच्छा लगेगा.’

‘चाहती तो मैं भी हूं परंतु अभी मेरे पास इतना नैतिक साहस नहीं है. एक बार तुम्हारे साथ शादी कर के घरगृहस्थी सजा लूं तब फिर चल कर मम्मीपापा से मिलेंगे. तब वे मेरे अतीत की भूलों को माफ भी कर सकेंगे.’

‘जैसी तुम्हारी इच्छा,’ और बात वहीं समाप्त हो गई थी.

पति, सास, ससुर और एक पारिवारिक जीवन, बिलकुल नया अनुभव था स्निग्धा के लिए. कितना सुखद और स्निग्ध, वसंत के फूलों की खुशबू से भरा हुआ, वर्षा की पहली फुहारों की तरह मदहोश करता हुआ और पायल की मधुर झंकार की तरह कानों में संगीत घोलता हुआ, यह था जीवन का असली संगीत, जिस की धुनों के बीच हर व्यक्ति झूमझूम जाता है. और आज स्निग्धा जीवन के बीहड़ रास्तों के घुमावदार मोड़ों को पार करती हुई अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुई थी.

शादी के बाद स्निग्धा ने निशांत के घरपरिवार को ही नहीं, बल्कि उस के व्यक्तित्व को भी संवार दिया था. इस में निशांत की मम्मी का बहुत बड़ा हाथ था. उन्होंने स्निग्धा को एक बेटी की तरह घरपरिवार की जिम्मेदारी से अवगत कराया. उस ने भी अपनी सास से कुछ सीखने में संकोच नहीं किया. नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में उस ने एक समझदार पत्नी, आदर्श बहू और सुलझी हुई गृहिणी के रूप में सब के दिलों में स्थान बना लिया.

अब उसे स्वयं विश्वास नहीं होता था कि वह 5 साल पहले की एक बिगड़ैल और गैरजिम्मेदार, सामाजिक परंपराओं को तोड़ने वाली लड़की थी.

निशांत इतना शांत और सरल स्वभाव का व्यक्ति था कि वह कभी भी स्निग्धा के अतीत की चर्चा नहीं करता था, परंतु वह स्वयं कभीकभी एकांत के क्षणों में सोचने पर मजबूर हो जाती थी कि शादी के पहले वह किस प्रकार का गंदा जीवन व्यतीत कर रही थी. उस ने तब अपने जीवन के लिए जो राह चुनी थी वह एक न एक दिन उसे पतन के गर्त में डुबो देती. बिना शादी के किसी पुरुष के साथ रहना और शादी कर के अपने पति व एक परिवार के बीच रहने में कितना अंतर था. अब उसे महसूस हो रहा था कि शादी के पहले वह एक डरासहमा, उपेक्षित और घृणास्पद जीवन व्यतीत कर रही थी.

अपने रूप और सौंदर्य पर स्निग्धा को बहुत अभिमान था. वह सुशिक्षित और संपन्न परिवार की लड़की थी, इसलिए लालनपालन बहुत प्यार व दुलार के साथ हुआ था. उस ने अपने जीवन में किसी अभाव को कभी महसूस नहीं किया था, उस के ऊपर किसी प्रकार के पारिवारिक और सामाजिक प्रतिबंध नहीं थे, वह जिद्दी और विद्रोही स्वभाव की हो गई थी.

सामाजिक और पारिवारिक वर्जनाओं को तोड़ने में उसे मजा आता. समाज के स्थापित मूल्यों की खिल्ली उड़ाना और उन के विपरीत काम करना उस के स्वभाव में शामिल था और प्यार, प्यार से बच कर आज तक इस दुनिया में शायद ही कोई रह पाया हो. प्रेम एक भाव है, एक अनुभूति है, जो मन की सोच और हृदय के स्पंदन से जुड़ा हुआ होता है. प्रेम एक प्राकृतिक अवस्था है, इसलिए इस से बचना बिलकुल असंभव है. परंतु वह किसी से प्यार भी करती थी या नहीं, यह किसी को पता नहीं चला था, क्योंकि वह बहुत चंचल थी और हर बात को चुटकियों में उड़ाना उस का शगल था.

कालेज के दिनों में वह हर तरह की गतिविधियों में भाग लेती थी. खेलकूद, नाटक, साहित्य और कला से ले कर विश्वविद्यालय संगठन के चुनाव तक में उस की सक्रिय भागीदारी होती थी. वह कई सारे लड़कों के साथ घूमती थी और पता नहीं चलता था कि वह पढ़ाई कब करती थी. बहुत कम लड़कियों के साथ उस का उठनाबैठना और घूमनाफिरना होता था, जबकि वह गर्ल्स होस्टल में रहती थी.

एक दिन पता चला कि वह यूनियन अध्यक्ष राघवेंद्र के साथ एक ही कमरे में रहने लगी थी. दोनों ने विश्वविद्यालय के होस्टलों के अपनेअपने कमरे छोड़ दिए थे और ममफोर्डगंज में एक कमरा ले कर रहने लगे थे. उस कालेज के लिए ही नहीं, पूरे शहर के लिए बिना ब्याह किए एक लड़की का एक लड़के के साथ रहने की शायद यह पहली घटना थी. वह छोटा शहर था, परंतु इस बात को ले कर कहीं कोई हंगामा नहीं मचा. राघवेंद्र यूनियन का लीडर था और स्निग्धा के विद्रोही व उग्र स्वभाव के कारण किसी ने खुले रूप में इस की चर्चा नहीं की. स्निग्धा के घर वालों को पता चला या नहीं, यह किसी को नहीं मालूम, क्योंकि उस के परिवार के लोग फतेहपुर जिले के किसी गांव में रहते थे. उस के पिता उस गांव के एक संपन्न किसान थे.

अगर कहीं कोई हलचल हुई थी तो केवल निशांत के हृदय में जो मन ही मन स्निग्धा को प्यार करने लगा था. वे दोनों सहपाठी थे और एक ही क्लास में पढ़तेपढ़ते पता नहीं कब स्निग्धा का मोहक रूप और चंचल स्वभाव निशांत के मन में घर कर गया था और उस के हृदय ने स्निग्धा के लिए धड़कना शुरू कर दिया था. स्निग्धा के दिल में निशांत के लिए ऐसी कोई बात थी, यह नितांत असंभव था. अगर ऐसा होता तो स्निग्धा राघवेंद्र के साथ बिना शादी किए क्यों रहने लगती?

यह उन दोनों का यूनिवर्सिटी में अंतिम वर्ष था. निशांत प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. एमए करने के तुरंत बाद उसे नौकरी मिल गई और वह स्निग्धा की छवि को अपने दिल में बसाए दिल्ली चला आया.

निशांत के सिवा किसी को पता नहीं था कि वह स्निग्धा को प्यार भी करता था. 5 साल तक उसे यह भी पता नहीं चला कि स्निग्धा कहां और किस अवस्था में है. उस ने पता करने की कोशिश भी नहीं की, क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि स्निग्धा अब न तो किसी रूप में उस की हो सकती थी न उसे कभी मिल सकती थी. दोनों के रास्ते कब के जुदा हो चुके थे.

फिर एक दिन कश्मीरी गेट जाने वाली मैट्रो ट्रेन में वे दोनों आमनेसामने बैठे थे. भीड़ नहीं थी, इसलिए वे एकदूसरे को अच्छी तरह देख सकते थे. पहले तो दोनों सामान्य यात्रियों की तरह बैठे अपनेआप में मग्न थे. लेकिन थोड़ी देर बाद सहज रूप से उन की निगाहें एकदूसरे से टकराईं. पहले तो समझ में नहीं आया, फिर अचानक पहचान के भाव उन की आंखों में तैर गए. लगातार कुछ पलों तक टकटकी बांध कर एकदूसरे को देखते रहे. फिर उन की आंखों में पूर्ण पहचान के साथसाथ आश्चर्य और कुतूहल के भाव जागृत हुए.

निशांत का दिल धड़क उठा, बिलकुल किशोर की तरह, जिसे किसी लड़की से पहली नजर में प्यार हो जाता है. अपनी अस्तव्यस्त सांसों के बीच उस ने अपनी उंगली उस की तरफ उठाई और फिर एकसाथ ही दोनों के मुंह से निकला, ‘आप…’

उन के बीच में कभी अपनत्व नहीं रहा था. एकसाथ एक ही कक्षा में पढ़ते हुए भी कभीकभार ही उन के बीच बातचीत हुई होगी, परंतु उन बातों में न तो आत्मीय मित्रता थी, न प्रगाढ़ता. इसलिए औपचारिकतावश उन के मुंह से एकसाथ ‘आप’ निकला था.

वह अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ और उस के नजदीक आ कर बोला, ‘स्निग्धा.’

‘हां,’ वह भी अपनी सीट से उठ कर खड़ी हो गई और उस की आंखों में झांकते हुए बोली, ‘मैं तो देखते ही पहचान गई थी.’

‘मैं भी. परंतु विश्वास नहीं होता. आप यहां…?’ उस के मुंह में शब्द अटक गए. गौर से स्निग्धा को देखने लगा. वह कितनी बदल गई थी. पहले और आज की स्निग्धा में जमीनआसमान का अंतर था. उस का प्राकृतिक सौंदर्य विलुप्त हो चुका था. चेहरे का लावण्य, आंखों की चंचलता, माथे की आभा, चेहरे की लाली और होंठों का गुलाबीपन कहीं खो सा गया था. उस के होंठ सूख कर डंठल की तरह हो गए थे. आंखों के नीचे कालीकाली झाइयां थीं, जैसे वह कई रातों से ढंग से सोई न हो. वह पहले से काफी दुबली भी हो गई थी. छरहरी तो पहले से थी, लेकिन तब शरीर में कसाव और मादकता थी.

परंतु अब उस की त्वचा में रूखापन आ गया था, जैसे रेगिस्तान में कई सालों से वर्षा न हुई हो. निशांत को उस का यह रूप देख कर काफी दुख हुआ, परंतु वह उस के बारे में पूछने का साहस नहीं कर सकता था. उन के बीच बस पहचान के अलावा कोई बात नहीं थी. वह भले ही उसे प्यार करता था परंतु उस के भाव उस के मन में थे और मन में ही रह गए थे. क्या स्निग्धा को पता होगा कि वह कभी उसे प्यार करता था? शायद नहीं, वरना क्या वह दूसरे की हो जाती और वह भटकने के लिए अकेला रह जाता.

यह तो वही जानता था कि उस का प्यार अभी मरा नहीं था, वरना अच्छीभली नौकरी मिलने और घर वालों के दबाव के बावजूद वह शादी क्यों न करता? उसे स्निग्धा का इंतजार नहीं था, परंतु एकतरफा प्यार करने की जो चोट उस के दिल पर पड़ी थी उस से अभी तक वह उबर नहीं पाया था और आज स्निग्धा फिर उस के सामने बैठी थी. क्या सचमुच जीवन में…कह नहीं सकता. वह तो आज दोबारा मिली ही है. क्या पता यह मुलाकात क्षणिक हो. कल फिर वह वापस चली जाए. उस के जीवन में तो पहले से ही राघवेंद्र बैठा है. उस ने अपने दिल में एक कसक सी महसूस की.

‘हां, मैं यहां,’ वह बोली. स्निग्धा स्वयं भी निशांत के साथ अकेले में समय बिताने को व्याकुल थी, ‘पर क्या सारी बातें हम ट्रेन में ही करेंगे?’ वह बोली, ‘कहीं बैठ नहीं सकते?’

‘क्या इतनी फुरसत है आप के पास? मैं तो औफिस से छुट्टी कर लेता हूं.’

‘हां, अब मेरे पास फुरसत ही फुरसत है. बस, कुछ देर के लिए बाराखंबा रोड के एक औफिस में काम है. उस के बाद मैं तुम्हारी हूं,’ स्निग्धा के मुरझाए चेहरे पर एक चमक आ गई थी. उस की आंखों की चंचलता लौट आई थी. निशांत ने आश्चर्य से उस की तरफ देखा. उस की अंतिम बात का क्या अर्थ हो सकता था? क्या वह सचमुच उस की हो सकती थी?

दोनों ने आपस में सलाह की. निशांत ने अपने औफिस फोन कर के बता दिया कि तबीयत खराब होने के कारण वह आज औफिस नहीं आ सकता था. वह लोधी रोड स्थित सीजीओ कौंप्लैक्स के एक सरकारी दफ्तर में जूनियर औफिसर था.

स्निग्धा ने बताया कि उसे बाराखंभा रोड स्थित एक प्राइवेट औफिस में इंटरव्यू के लिए जाना था. दिल्ली आने के बाद वह एक सहेली के साथ पेइंगगेस्ट के रूप में पीतमपुरा में रहती थी. निशांत भी उसी तरफ रोहिणी में रहता था. कनाट प्लेस या सैंट्रल दिल्ली जाने के लिए उन दोनों का मैट्रो से एक ही रास्ता था, परंतु उन दोनों की मुलाकात आज पहली बार हुई थी.

स्निग्धा का इंटरव्यू लगभग साढे़ 10 बजे खत्म हो गया था. उस के बाद वे दोनों खाली थे. उन के कदम साउथ इंडियन कौफी हाउस में जा कर रुके. वहां एकांत होने के साथसाथ नीम अंधेरा रहता था. वे दोनों खुल कर अपने मन की गांठें खोल सकते थे और एकदूसरे की आंखों के रास्ते मन की बातें जान सकते थे. कोल्ड कौफी का और्डर देने के बाद निशांत ने उस के सूखे उदास चेहरे की तरफ देखा. वह तो जैसे लगातार उसे ही देखे जा रही थी. वे दोनों एकदूसरे को देख तो रहे थे परंतु उन के मन में संकोच था. बातचीत का सिलसिला कहां से आरंभ हो, कौन पहल करे, यही बात उन दोनों के मन में घुमड़ रही थी.

तब तक कोल्ड कौफी के लंबेलंबे 2 गिलास उन के सामने रखे जा चुके थे.

स्निग्धा वैसे चंचल रही थी परंतु आज चुप थी. निशांत स्वभाव से ही अंतर्मुखी था. अंतर्मुखी नहीं होता तो स्निग्धा आज उस की होती. तब वह अपने मन की बात उस से नहीं कह पाया था. क्या आज कह पाएगा? आज स्निग्धा के पास समय भी था और वह उस के सामने बैठी थी, उस की बात सुनने के लिए परंतु एक रुकावट थी जो बारबार निशांत को परेशान किए जा रही थी. स्निग्धा पहले से ही राघवेंद्र की है. उस को छोड़ कर क्या वह उस की हो सकती थी? ऐसा संभव तो नहीं था. स्निग्धा के विद्रोही स्वभाव से वह परिचित था. वह जो ठान लेती थी उसे कर के ही मानती थी. भले ही बाद में उसे नुकसान उठाना पड़े.

कई पल खामोशी से गुजर गए. यह खामोशी उबाऊ लगने लगी तो स्निग्धा ने ही कहा, ‘क्या हम यहां ऐसे ही बैठने के लिए आए हैं? कुछ मन की नहीं कहेंगे?’

‘आप ही कुछ बताओ,’ उस ने ऐसे कहा जैसे उसे कुछ बोलना नहीं था. वह केवल उस की बातें सुनने के लिए ही उस के साथ आया था. वैसे वह उस के विगत जीवन के बारे में जानने का इच्छुक नहीं था, परंतु जाने बिना उसे कैसे पता चल सकता था कि इलाहाबाद और राघवेंद्र को छोड़ कर वह दिल्ली में क्या कर रही थी? आजकल किस के साथ रह रही थी? ऐसी लड़कियां क्या एक पल के लिए अकेली रह सकती हैं? एक मर्द छोड़ती हैं तो दूसरा पकड़ लेती हैं. इस तरह के संबंधों में कोई प्रतिबद्धता नहीं होती, न एकदूसरे के प्रति कोई जिम्मेदारी और लगाव यही तो आधुनिकता है.

‘मुझे विश्वास नहीं होता हम यहां एकसाथ,’ कह कर स्निग्धा ने बात आरंभ की.

निशांत ने यह नहीं पूछा कि उसे किस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था, फिर उस के मुंह से निकला, ‘और मुझे भी.’

वह मुखर हो उठी. एक बार बात शुरू हो जाए तो स्निग्धा की जबान को पर लग जाते थे. उस ने कहा, ऐसी ही घटनाओं से लगता है कि दुनिया वाकई बहुत छोटी है. जीवन के एक मोड़ पर हम अलग होते हैं तो अगले मोड़ पर फिर मिल जाते हैं.’

स्निग्धा बातें करते हुए अब काफी प्रफुल्लित लग रही थी. कुछ देर पहले की उदासी उस के चेहरे से गायब हो गई थी. ऐसा लग रहा था, जैसे उसे अपनी खोई हुई बहुत कीमती चीज मिल गई थी. उस के बदन में थिरकन आ गई थी और आंखों की पुतलियां नाचने लगी थीं.

निशांत उसे एकटक देखता जा रहा था. उस ने सोचा, वह इसी तरह खुश रहेगी तो शायद उस का खोया हुआ यौवन और सौंदर्य एक दिन वापस आ जाएगा.

वह दिल की धड़कन को संभाले बैठा रहा. फिर भी विचार उमड़घुमड़ रहे थे. स्निग्धा जैसी लड़की उस के साथ, बिलकुल उस के सामने बैठी हो और वह निरपेक्ष व निस्पृह रहे, क्या ऐसा संभव था?

वह स्निग्धा के चेहरे के चढ़तेउतरते और बदलते भावों को पढ़ने का प्रयास कर रहा था कि अचानक स्निग्धा ने पूछ लिया, ‘क्या तुम ने शादी कर ली?’ वह अवाक् रह गया. स्निग्धा पहली बार अनौपचारिक हुई थी. उस ने निशांत को ‘तुम’ कहा था.

निशांत ने अपना चेहरा नीचे झुका लिया, ‘अभी शादी के बारे में सोचा नहीं है. नौकरी मिलने के बाद अपने पांव जमाने का प्रयास कर रहा हूं. जिस दिन लगेगा कि अब जीवन में हर प्रकार का स्थायित्व आ गया है, आर्थिक और सामाजिक, तो शादी के बारे में सोचूंगा.’

‘तब सोचोगे?’ स्निग्धा ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, ‘नौकरी मिलने के बाद भी क्या शादी के लिए सोचना पड़ता है? नौकरी ही तो हर प्रकार का स्थायित्व देती है. अब क्या सोचना. यहां तो लोग बिना किसी आय के शादी के बारे में सोचते हैं. मांबाप भी, चाहे बेटा बेरोजगार क्यों न हो, उस के जवान होते ही उस की शादी करने के लिए उतावले हो जाते हैं. फिर तुम तो हर प्रकार से सक्षम हो. बात कुछ मेरी समझ में नहीं आ रही है.’

इस संबंध में उस ने स्निग्धा को कोई स्पष्टीकरण देना उचित नहीं समझा. कोई आवश्यकता भी नहीं थी. वह चुप रहा तो स्निग्धा ने ही शरारती मुसकराहट के साथ कहा, ‘तुम अभी तक मुझे भूले नहीं हो, क्यों? है न यही बात?’

निशांत के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. उस की आंखें स्निग्धा की आंखों से जा टकराईं, जैसे पूछ रही थीं, ‘तो तुम जानती थीं?’

स्निग्धा उस के भावों को समझते हुए बोली, ‘हां, मुझे पता था. मेरा जिस तरह का स्वभाव था और जिस प्रकार मैं यूनियन के कार्यों व खेलकूद में भाग लेती थी, हर प्रकार के व्यक्ति से मेरा वास्ता पड़ता था, किसी के व्यक्तित्व के बारे में जानना मेरे लिए मुश्किल नहीं था. उन दिनों लड़के जिस प्रकार मेरे लिए पागल थे, मैं महसूस करती थी. जो खुल कर मेरे सामने आते थे, उन को भी और जो चुपचाप अपने मन की बात मन की पर्तों में छिपा कर रखते थे, उन के बारे में भी जानती थी.

किसी लड़की के लिए लड़कों की निगाहों के भाव पढ़ना मुश्किल नहीं होता और फिर जिस प्रकार कक्षा में पीछे बैठ कर तुम मुझे देखा करते थे. डिपार्टमैंट के अंदर आतेजाते, सीढि़यां चढ़तेउतरते मुझे देख कर जिस प्रकार तुम्हारी आंखों में चमक आ जाया करती थी, वह मुझ से कभी छिपी नहीं रही थी. परंतु ये वे दिन थे जब सैकड़ों लड़के मेरे सौंदर्य के कायल थे और मेरा तनमन जीतने के युद्ध में सम्मिलित थे वैसी स्थिति में तुम्हारे जैसे सच्चे प्रेमी को नकार देना किसी भी लड़की के लिए बहुत आसान था. उस समय समझदार से समझदार लड़की भी यश और धन की चमक में खो कर सच्चा प्रेम नहीं पहचान पाती है. वह मगरूर हो जाती है और प्रेमियों की भीड़ में सच्चा प्यार खो देती है.’

कहतेकहते उस ने निसंकोच निशांत का दाहिना हाथ पकड़ लिया और प्यार से उसे सहलाते हुए बोली, ‘मुझे खेद है कि मैं ने तुम्हारे जैसा हीरा खो दिया, परंतु अफसोस तो मुझे इस बात का अधिक है कि आजादी और समाज से विद्रोह के नाम पर परंपराओं को तोड़ने का जो नासमझी भरा कदम मैं ने इलाहाबाद जैसे पारंपरिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक शहर में किया था, वह मेरे जीवन की सब से बड़ी भूल थी. उस भूल का परिणाम तुम देख ही रहे हो कि आज मैं कैसी हूं और कितनी तन्हा. इतनी तन्हा, जितना किसी गुफा का सन्नाटा हो सकता है.’

स्निग्धा की आंखों में आंसू छलक आए. निशांत ने उस की आंखों को देखा, परंतु उस ने उस के आंसू पोंछने का कोई प्रयास नहीं किया. बस, अपने हाथों को धीरे से उस के हाथों से अलग कर के कहा, ‘हर आदमी जीवन में कोई न कोई भूल करता है, परंतु उस के लिए अफसोस करने से दुख कम नहीं होता, बल्कि बढ़ता ही है,’ उस के स्वर में दृढ़ता थी.

‘सच कहते हो तुम,’ उस ने झटके से अपने आंसू पोंछ डाले और मुसकराने का प्रयास करती हुई बोली, ‘मैं अपना अतीत याद नहीं करना चाहती, परंतु उसे बताए बिना तुम मेरी बात नहीं समझ पाओगे. विगत की हर एक बात मैं तुम्हें नहीं बताऊंगी. बस, उतना ही जितने से तुम मेरे मन को समझ सको और यह समझ सको कि मैं ने अपने विद्रोही स्वभाव के कारण क्या पाया और क्या खोया.’

‘इतना भी आवश्यक नहीं है,’ वह गंभीरता से बोला, ‘तुम सामान्य बातें करोगी तो मुझे अच्छा लगेगा.’

‘मैं तुम्हारे मन की दशा समझ सकती हूं. तुम मेरे दुख से दुखी नहीं होना चाहते हो.’

‘मैं तुम्हारे सुख से सुखी होना चाहता हूं,’ उस ने स्पष्ट किया.

स्निग्धा को उस की बात से घोर आश्चर्य हुआ. वह हकबका कर बोली, ‘मैं कुछ समझी नहीं?’

‘जिस जगह तुम मुझे छोड़ कर गई थीं, उसी जगह पर मैं अभी तक खड़ा हो कर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं,’ उस ने निसंकोच कहा.

स्निग्धा के हृदय में मधुर वीणा के तारों सी झंकार हुई, ‘लेकिन तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं बिना शादी के राघवेंद्र के साथ रह रही थी. तुम्हें पता नहीं है कि पिछले 5 सालों में मेरे साथ क्याक्या गुजरा है?’

निशांत ने प्रश्नवाचक भाव से उस की तरफ देखा और अपने दोनों हाथों को मेज पर रख कर उस की तरफ झुकता हुआ बोला, ‘तुम चाहो तो बता सकती हो.’

स्निग्धा ने एक राहत भरी सांस ली और बोली, ‘मैं बहुत लंबा व्याख्यान नहीं दूंगी. मेरी बातों से ऊबने लगो तो बता देना.’

उस ने सहमति में सिर हिलाया और तब स्निग्धा ने धीरेधीरे उसे बताया, ‘मैं ने परंपराओं, सामाजिक मर्यादा और वर्जनाओं का विरोध किया. बिना शादी के एक युवक के साथ रहने लगी. परंतु जिसे मैं ने आजादी समझा था वह तो सब से बड़ा बंधन था. सामाजिक बंधन में तो फिर भी प्रतिबद्धता होती है, एकदूसरे के प्रति लगाव और कुछ करने की चाहत होती है परंतु बिना बंधन के संबंधों का आधार बहुत सतही होता है. वह केवल एक विशेष जरूरत के लिए पैदा होता है और जरूरत पूरी होते ही मर जाता है.

‘मैं राघवेंद्र के साथ रहते हुए बहुत खुश थी. हम दोनों साथसाथ घूमते, राजनीतिक पार्टियों में शामिल होते. मेरी अपनी महत्त्वाकांक्षा भी थी कि राघवेंद्र के सहारे मैं राजनीति की सीढि़यां चढ़ कर किसी मुकाम तक पहुंच जाऊंगी, परंतु यह मेरी भूल थी. 3 साल बाद ही मुझे महसूस होने लगा कि राघवेंद्र मुझे बोझ समझने लगा था. अब वह मुझे अपने साथ बाहर ले जाने से भी कतराने लगा था. बातबात पर खीझ कर मुझे डांट देता था.

मैं समझ गई, वह केवल अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए मुझे अपने साथ रखे हुए था. मेरा रस चूस लेने के बाद अब वह मुझे बासी समझने लगा था. वह मुरझाए फूल की तरह मुझे फेंक देना चाहता था. उस की बेरुखी से मैं ने महसूस किया कि हम जिस शादी के बंधन को बोझ समझते हैं, वह वाकई वैसा नहीं है. बिना शादी के भी तो 2 व्यक्ति वही सबकुछ करते हैं, परंतु बिना किसी जिम्मेदारी के और जब एकदूसरे से ऊब जाते हैं तो बड़ी आसानी से जूठी पत्तल की तरह फेंक देते हैं. लेकिन मान्यताप्राप्त बंधन में ऐसा नहीं होता.

‘मैं ने भी अगले 2 साल तक और बरदाश्त किया, परंतु एक दिन राघवेंद्र ने मुझ से साफसाफ कह दिया कि मुझे अपना राजनीतिक कैरियर बनाना है. तुम अपने लिए कोई दूसरा रास्ता चुन लो. तुम्हारे साथ रहने से मेरी बदनामी हो रही है. अगला आम चुनाव आने वाला है. अगर तुम मेरे साथ रहीं तो मेरी छवि धूमिल हो जाएगी और मुझे टिकट नहीं मिलेगा.’

‘मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई. मेरी सारी शक्ति, समाज से बगावत करने का जोश जैसे खत्म हो गया. मैं समझ गई, नारी चाहे जितना समाज से विद्रोह करे, पुरुष के हाथों की कठपुतली न बनने का मुगालता पाल ले, परंतु आखिरकार वह वही करती है जो पुरुष चाहते हैं. वह पुरुष की भोग्या है. जानेअनजाने वह उस के हाथों से खेलती रहती है और सदा भ्रम में जीती है कि उस ने पुरुष को ठोकर मार कर आजादी हासिल कर ली है.

‘जिस समाज से मैं विद्रोह करना चाहती थी, जिस की मान्यताएं, परंपराओं और वर्जनाओं को तोड़ कर मैं आगे बढ़ना चाहती थी, उसी समाज के एक कुलीन और सभ्य व्यक्ति ने मेरा सतीत्व लूट लिया था या यों कहिए कि मैं ने ही उस के ऊपर लुटा दिया था. बताओ, एक शादीशुदा औरत और मुझ में क्या फर्क रहा? शादीशुदा औरत को भी पुरुष भोगता है और बिना शादी किए मुझे भी एक पुरुष ने भोगा. उस ने अपनी भूख मिटा ली. परंतु नहीं, हमारी जैसी औरतों और शादीशुदा औरतों में एक बुनियादी फर्क है. जहां शादीशुदा औरत यह सब कुछ एक मर्यादा के अंतर्गत करती है, हम निरंकुश हो कर वही काम करती हैं. एक पत्नी को शादी कर के परिवार और समाज की सुरक्षा मिलती है, परंतु हमारी जैसी औरतों को कोई सुरक्षा नहीं मिलती. पत्नी के प्रति पति जिम्मेदार होता है, उस के सुखदुख में भागीदार होता है, जीवनभर उस का भरणपोषण करता है, परंतु हमें भोगने वाला व्यक्ति हर प्रकार की जिम्मेदारी से मुक्त होता है. वह हमें रखैल बना कर जब तक मन होता है, भोगता है और जब मन भर जाता है, ठोकर मार कर गलियों में भटकने के लिए छोड़ देता है.’

वह बड़ी धीरता और गंभीरता से अपनी बात कह रही थी. निशांत पूर्ण खामोशी से उस की बातें सुन रहा था. बीच में उस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की, न कुछ बोला. अपनी बात खत्म करतेकरते स्निग्धा भावों के अतिरेक से विह्वल हो कर रोने लगी. परंतु निशांत ने उसे चुप नहीं कराया.

कुछ देर बाद वह स्वयं शांत हो गई.

पता नहीं, निशांत क्या सोच रहा था. उस का सिर झुका हुआ था और लग रहा था जैसे वह स्निग्धा की सारी बातों को मन ही मन गुन रहा था, उन पर मनन कर रहा था. फिर और कई पल गुजर गए. इस बीच वेटर आ कर कई बार पूछ गया कि कुछ और चाहिए या बिल लाऊं. उस ने इशारे से उसे 2 और कोल्ड कौफी लाने को आदेश दे दिया था.

वह सारा दिन उन दोनों ने साथसाथ व्यतीत किया. पालिका बाजार, सैंट्रल पार्क, कनाट प्लेस से ले कर पुराने किले से होते हुए वे इंडिया गेट तक गए और रात 8 बजे तक वहीं बैठ कर उन्होंने जीवन के हर पहलू के बारे में बात की. निशांत हवा के साथ उड़ रहा था तो स्निग्धा के मन में अपने विगत को ले कर एक अपराधबोध था. निशांत हर प्रकार की खुशबू अपने दामन में समेटने के लिए आतुर था तो स्निग्धा संकोच के साथ अपने पांव पीछे खींच रही थी.

निशांत के जीवन की खोई हुई खुशियां जैसे दोबारा लौट आई थीं. उस के जीवन में 5 साल बाद वसंत के फूल महके थे. स्निग्धा को उस के घर के बाहर तक छोड़ कर जब वह वापस लौट रहा था तब उस के कानों में स्निग्धा के मीठे स्वर गूंज रहे थे, ‘बाय निशू, गुड नाइट. एक अच्छे दिन के लिए बहुतबहुत धन्यवाद. आशा है, हम कल फिर मिलेंगे.’

‘हां, कल शाम को मैं तुम्हें फोन करूंगा, ओके.’

स्निग्धा के घर से उस के घर के बीच का रास्ता कितनी जल्दी खत्म हो गया, उसे पता ही न चला. अपने 2 कमरों के किराए के मकान में पहुंच कर उसे लगा, जैसे पूरा घर ताजे फूलों से सजा हुआ हो और उन की मादक सुगंध चारों तरफ फैल कर उस के दिमाग को मदहोश किए दे रही थी. वह एक लंबी सांस ले कर पलंग पर धम से गिर पड़ा.

उसे स्निग्धा के साथ मिलने के संयोग पर विश्वास नहीं हो रहा था.

विश्वास तो स्निग्धा को भी नहीं हो रहा था. वह अपने कमरे की सीढि़यां चढ़ते हुए यही सोच रही थी कि निशांत से मिलने के बाद क्या उस के जीवन में कोई बड़ा परिवर्तन होने वाला है. क्या यह परिवर्तन सुखद होगा? कमरे में पहुंची तो उस के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे, जैसे वह फूल की तरह हलकी हो गई थी और उसे लग रहा था कि हवा का एक हलका झोंका भी आया तो वह आसमान में उड़ जाएगी. कोई उसे पकड़ नहीं पाएगा.

उस की रूममेट रश्मि ने जब उस का हंसता हुआ चेहरा देखा तो पहला प्रश्न यही किया, ‘लगता है, तुम्हारा खोया हुआ प्यार तुम्हें मिल गया है?’

उस ने पर्स को मेज पर पटका और रश्मि को गले से लगा कर भींच लिया. रश्मि कसमसा उठी और उसे परे करती हुई बोली, ‘इतना ज्यादा मत इतराओ. अभी एक प्यार की चोट पूरी तरह से भरी नहीं है और फिर से तुम प्यार करने लगी हो. कहां तो समाज की हर चीज से बगावत करने पर तुली हुई थीं, कहां अब एक आम लड़की की तरह बारबार प्यार में इस तरह गिर रही हो, जैसे गीले गुड़ में मक्खी…क्या यही है तुम्हारा आदर्श?’

‘अरे, भाड़ में जाए समाज से विद्रोह. वह मेरी बेवकूफी थी कि मैं नैतिकता को बंधन समझती थी. दरअसल, यही सच्चा जीवनमूल्य है, जो हमें एक नैतिक और मर्यादित बंधन में रख कर समाज और राष्ट्र को आगे बढ़ाने में मदद करता है. निरंकुश आजादी मनुष्य को गैरजिम्मेदार और तानाशाह बना देती है, जबकि सामाजिक मूल्य हमें एक निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करते हैं.’

‘वाह, तुम तो एक दिन ही में सारे जीवनमूल्यों को पहचान गईं. किस ने ऐसा गुरुमंत्र दिया है जो अपनी बनाई हुई लीक को तोड़ने पर मजबूर हो गई हो? क्या पहले प्यार में धोखा खाने के बाद तुम्हें यह एहसास हुआ है या किसी ने तुम्हें भारतीय दर्शन और संस्कृति का पाठ पढ़ाया है?’

वह पलंग पर बैठती हुई बोली, ‘नहीं रश्मि, बहुतकुछ हम अपने अनुभवों से सीखते हैं और बहुतकुछ हम अपने संपर्क में आने वाले लोगों से. इस से कुछ कटु अनुभव होते हैं और कुछ मृदु. यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि अपने द्वारा किए गए गलत कामों के कटु अनुभवों से हम क्या सीखते हैं और हम किस प्रकार अपने को बदल कर सही मार्ग पर आते हैं.

समाज में हर चीज गलत नहीं होती. हमें अपने विवेक से देखना पड़ता है कि क्या सही है, क्या गलत. सामाजिक कुरीतियां, अंधविश्वास, अति पूजापाठ और धर्मांधता अगर बुरे हैं तो शादीब्याह जैसी संस्थाएं बुरी नहीं हैं. यह परिवार और समाज को एक बंधन में बांध कर राष्ट्र को मजबूत बनाने में मदद करती हैं. मेरी गलती थी कि मैं समाज की हर चीज को बुरा समझने लगी थी. मनमाने ढंग से जीवन जीने का परिणाम क्या हुआ? एक व्यक्ति जिसे मैं अपना समझती थी कि वह जीवनभर मेरा साथ देगा, मेरे सुखदुख बांटेगा, वही मेरा उपभोग कर के एक किनारे हो गया.

‘यही काम अगर मैं शादी कर के करती तो समाज में गर्व से अपना सीना तान कर चल सकती थी. आज मैं अपने मांबाप, परिजनों और संबंधियों के सामने नहीं पड़ सकती, उन को अपना मुंह नहीं दिखा सकती. इतनी नैतिक शक्ति मेरे पास नहीं है,’ और उस के चेहरे पर फिर से पहले जैसी उदासी व्याप्त हो गई.

रश्मि बहुत समझदार लड़की थी. वह उस के पास आ कर उस के सिर पर हाथ रख कर बोली, ‘तुम बहुत साहसी लड़की हो. कभी इस तरह हिम्मत नहीं हारतीं. आज तुम कितना खुश थीं. मुझे अफसोस है कि मैं ने तुम्हारी दुखती रग पर हाथ रख कर तुम्हें ज्यादा दुखी कर दिया. चलो, भूल जाओ अपना अतीत और नए सिरे से अपना जीवन शुरू करो. अब मैं तुम से पिछले जीवन के बारे में कोई बात नहीं करूंगी. बस, तुम खुश रहा करो.’

‘मैं खुश हूं, रश्मि,’ उस ने हंसने का खोखला प्रयास किया और बाथरूम की तरफ जाती हुई बोली, ‘तुम देखना, मैं हमेशा हंसतीमुसकराती रहूंगी.’

‘ये हुई न कोई बात.’

स्निग्धा ने अपने मन को इतना कठोर बना लिया था कि राघवेंद्र के साथ व्यतीत किए गए जीवन के कड़वे पलों को पूरी तरह भुला दिया था. अगर कभी यादें उसे हरा देतीं तो उस को उबकाई आने लगती.

आज वह एक सच्चे प्यार की तलाश में थी, तन की भूख की अब उस में कोई ललक नहीं थी.

रश्मि एक कौल सैंटर में काम करती थी. लखनऊ की रहने वाली थी. स्निग्धा से उस की मुलाकात इसी गैस्ट हाउस में हुई थी. रश्मि पहले से यहां रह रही थी. बाद में स्निग्धा आ गई तो उन्होंने एकसाथ एक कमरे में रहने का निर्णय लिया. इस से उन पर किराए का बोझ कम हो गया था.

स्निग्धा जब से आई थी, बहुत उदास और गुमसुम सी रहती थी. बहुत पूछने और साथ रहने के कारण स्निग्धा ने उस से अपने जीवन की बहुत सारी बातें बांट ली थीं. रश्मि ने भी उसे अपने बारे में बहुतकुछ बताया था. धीरेधीरे स्निग्धा खुश रहने लगी थी परंतु आज बाहर से आने के बाद वह जितना खुश थी उतना दिल्ली आने के बाद कभी नहीं रही.

स्निग्धा दिल की बुरी नहीं थी. अत्यधिक प्यारदुलार और अनुचित छूट से वह उद्दंड और उच्छृंखल हो गई थी. वह हर उस काम को करती थी जिसे करने के लिए उसे मना किया जाता था. इस से उसे मानसिक संतुष्टि मिलती. जब लोग उसे भलाबुरा कहते और उस की तरफ नफरतभरी नजर से देखते तो उसे लगता कि उस ने इस संसार को हरा दिया है, यहां के लोगों को पराजित कर दिया है. वह इन सब से अलग ही नहीं, इन सब से महान है. दूसरे लोगों के बारे में उस की सोच थी कि ये लोग परंपराओं और मर्यादाओं में बंधे हुए गुलामों की तरह अपनी जिंदगी जी रहे हैं.

शादी को वह एक बंधन समझती थी. इसे स्त्री की पुरुष के प्रति गुलामी समझती थी. उस की सोच थी कि शादी करने के बाद पुरुष केवल स्त्री पर अत्याचार करता है. इसलिए उस ने ठान लिया था कि वह शादी कभी नहीं करेगी.

परंतु बिना शादी किए किसी पुरुष के साथ रहना उसे अनुचित न लगा.

उसे इलाहाबाद के वे दिन याद आते हैं जब राघवेंद्र के साथ रहते हुए पीठ पीछे उसे लोग न जाने किनकिन विशेषणों से संबोधित करते थे, जैसे- ‘चालू लड़की’, ‘चंट’, ‘छिछोरी’, ‘रखैल’ आदिआदि. तब उसे इन संबोधनों से कोई फर्क नहीं पड़ता था. वह किसी की बात पर कान नहीं धरती थी. वह बेफिक्री का आलम था और राघवेंद्र जैसे राजनीतिक नेता से उस का संपर्क था. वह सातवें आसमान पर थी और जमीन पर चल रहे कीड़ेमकोड़ों से वह कोई वास्ता नहीं रखना चाहती थी. उन दिनों उसे अच्छी बात अच्छी नहीं लगती थी और बुरी बात को वह सुनने के लिए तैयार नहीं थी. लोग उस के बारे में क्या सोचते थे, इस से उस को कोई लेनादेना नहीं था.

स्निग्धा के जीवन के साथ खिलवाड़ करने के लिए केवल राघवेंद्र ही जिम्मेदार नहीं था, इस के लिए स्निग्धा स्वयं जिम्मेदार और दोषी थी. अपनी गलती से उस ने सबक लिया था कि परंपराओं का उल्लंघन हमेशा उचित नहीं होता. राघवेंद्र ने भी स्निग्धा के शरीर से खेलने के बाद उसे छोड़ कर अच्छा नहीं किया था. इस प्रकार के चरित्र से उस का राजनीतिक जीवन तहसनहस हो गया था. इलाहाबाद बहुत आधुनिक शहर नहीं था कि बिना ब्याह के स्त्रीपुरुषों के संबंधों को आसानी से स्वीकार कर लेता. अगले आम चुनाव में उसे पार्टी की तरफ से टिकट नहीं दिया गया. उस ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा, परंतु बुरी तरह हार गया.

स्निग्धा को आज एहसास हो रहा था कि अपने अति आत्मविश्वास के कारण मांबाप द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता का उस ने नाजायज फायदा उठाया था और अपने पांवों को गंदे दलदल में फंसा दिया था. वह अपने परिवार, संबंधियों और परिचितों से दूर हो गई. दोस्त उस का साथ छोड़ गए और आज वह इतनी बड़ी दुनिया में अकेली है. कोई उसे अपना कहने वाला नहीं है. थोड़ी देर के लिए अगर कोई सुखदुख बांटने वाला है तो वह है रश्मि, जो सच्चे मन से उस की बात सुनती है और सलाह देती है.

दिल्ली आ कर वह अपने इलाहाबाद के दिनों की कड़वी यादों को भुलाने में काफी हद तक सफल हो गई थी. वहां रहती तो शहर के रास्तों, गलीकूचों और बागबगीचों से गुजरते हुए अपने कटु अनुभवों को भुला पाना उस के लिए आसान न था. अब निशांत से मिलने के बाद क्या वह अपना पिछला जीवन भूल सकेगी? उस के मन में कोई फांस तो नहीं रह जाएगी कि वह निशांत को धोखा दे रही है. परंतु वह ऐसा क्यों सोच रही है? क्या वह समझती है कि निशांत उसे अपना बना लेगा? उस के दिल में एक टीस सी उठी. अगर निशांत ने उसे ठुकरा दिया तो. इस तो के आगे उस के पास कोई जवाब नहीं था. हो भी नहीं सकता था, परंतु संसार में क्या अच्छे पुरुषों की कमी है? अगर वह चाहती है कि शादी कर के अपना घर बसा ले और एक आम गृहिणी की तरह जीवन व्यतीत करे तो उसे कौन रोक सकता था. निशांत न सही, कोई भी पुरुष उस का हाथ थामने के लिए तैयार हो जाएगा. उस में कमी क्या है?

सच तो यह है कि आज पहली बार उस का दिल सच्चे मन से किसी के लिए धड़का है और वह है निशांत.

स्निग्धा को बाराखंभा वाली जौब मिल गई, उस के जीवन में खुशियों के पलों में इजाफा हो गया, लेकिन जीवन में एक ठहराव सा था. पुरुष हो या स्त्री, एकाकी जीवन दोनों के लिए कष्टमय होता है. यह बात निशांत भी जानता था और स्निग्धा भी, परंतु अभी तक उन्होंने अपने मन की पर्तों को नहीं खोला था. ताश के खिलाडि़यों की तरह दोनों ही अपनेअपने पत्ते छिपा कर चालें चल रहे थे.

प्रतिदिन शाम को वे दोनों मिलते थे. मिलने की एक निश्चित अवधि थी और निश्चित स्थान. इंडिया गेट के लंबेचौड़े, खुले मैदान. कभी बैठ कर, कभी घास पर चलते हुए और कभी फूलों के पौधों के किनारे चलते हुए वे दुनियाजहान की बातें करते, वहां घूम रहे लोगों के बारे में बातें करते, चांदतारों की बातें करते और लैंपपोस्ट की हलकी रोशनी में एकदूसरे की आंखों में चांद ढूंढ़ने की कोशिश करते.

उन को मिलते हुए कई महीने बीत गए. चांद अभी भी उन की पकड़ से दूर था. स्निग्धा पहले जितनी वाचाल और चंचल थी, अब उतनी ही अंतर्मुखी हो गई थी या शायद निशांत के संसर्ग में आ कर उस के जैसी हो गई थी. यह उस के स्वभाव के विपरीत था, परंतु मानव मन परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है. स्निग्धा उस के सामने अपने मन को बहुत ज्यादा नहीं खोल सकती थी, क्योंकि निशांत उस के बारे में सबकुछ जानता था. परंतु वह न तो उस के भूतकाल की कोई बात करता, न भविष्य के बारे में कोई बात. दोनों के बीच अनिश्चितता का एक लंबा ऊसर पसरा हुआ था. क्या इस ऊसर में प्यार का कोई अंकुर पनपेगा?

वोट क्लब के छोटेछोटे कृत्रिम तालाबों के किनारे चलते हुए निशांत ने पूछा, ‘जीवनभर अकेले ही रहने का इरादा है या कुछ सोचा है?’

‘क्या मतलब…?’ उस ने आंखों को चौड़ा कर के पूछा.

निशांत गंभीर था.

‘मांबाप के पास जाने का इरादा है?’ निशांत ने घुमा कर पूछा.

स्निग्धा के हृदय में कुछ चटक गया. फिर भी अपने को संभाल कर कहा, ‘उस तरफ के सारे रास्ते मेरे लिए बंद हो चुके हैं. न मुझ में इतना साहस है, न कोई इच्छा. उन के पास जा कर मुझे क्या मिलेगा? मुझे ही इस संसार सागर को पार करना है, अकेले या किसी के साथ?’ उस का स्वर भीगा हुआ था.

‘किस के साथ?’ निशांत ने उस का हाथ पकड़ लिया.

स्निग्धा के शरीर में एक मीठी सिहरन दौड़ गई. वह सिमटते हुए बोली, ‘जो भी मेरे मन को समझ लेगा.’

‘तो कोई ऐसा मिला है?’ वह जैसे उस के मन को परखने का प्रयास कर रहा था. स्निग्धा मन ही मन हंसी, ‘तो मुझ से बनने की कोशिश की जा रही है.’

वह आसमान की तरफ देखती हुई बोली, ‘देख तो रही हूं, सूरज के रथ पर सवार हो कर कोई औरों से बिलकुल अलग एक पुरुष मेरे जीवन में प्रवेश कर रहा है,’ आसमान में तारों का साम्राज्य था. चांद कहीं नहीं दिख रहा था, परंतु तारों की झिलमिलाहट आंखों को बहुत भली लग रही थी.’

‘परंतु आसमान में तो कहीं सूरज नहीं है, फिर उस का रथ कहां से आएगा?’ उस ने चुटकी ली.

‘अभी रात्रि है. रथ में जुते घोड़े थक गए हैं, वे विश्राम कर रहे हैं. कल फिर यात्रा मार्ग पर निकलेंगे,’ वह हंसी.

‘अच्छा, तो कल शाम तक यहां पहुंच जाएंगे?’

‘कह नहीं सकती. मार्ग लंबा है, समय लग सकता है,’ वह जमीन पर देखने लगी.

निशांत ने उस की कमर में हाथ डाल दिया. वह उस से सट गई.

‘जब सूरज का रथ तुम्हारे पास आ जाए तो उस पुरुष को ले कर मेरे पास आना, मेरे घर.’

‘अवश्य.’

एक दिन स्निग्धा ने मिलते ही एटम बम फोड़ा.

‘मैं तुम्हारे घर आना चाहती हूं.’

‘क्या सूरज का रथ और वह पुरुष आ चुका है?’ उस ने मुसकराती आंखों से स्निग्धा को देखते हुए पूछा.

‘हां,’ उस ने शरमाते हुए कहा.

‘कहां है?’

‘तुम्हारे घर पर ही उस से मिलवाऊंगी.’

‘तो फिर मुझे 2 दिन का समय दो. आने वाले इतवार को मैं घर पर तुम्हारा इंतजार करूंगा. ढूंढ़ लोगी न, भटक तो नहीं जाओगी?’

‘अब कभी नहीं,’ स्निग्धा ने आत्मविश्वास से कहा.

अगले इतवार को स्निग्धा उस के घर पर थी और कुछ ही महीनों बाद उस की बांहों में. कुछ साल में वह 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. यह तो बताने की जरूरत नहीं पर दोनों बच्चे मां से ज्यादा दादादादी से चिपटे रहते और दादादादी बहू के बिना न कहीं जाते न उस से पूछे बिना कुछ करते. निशांत कई बार कहता, ‘‘तुम भी अजीब हो, मैं ने तुम्हें पाया, बदले में मेरे मातापिता को छीन कर तुम ने अपनी तरफ कर लिया.’’

USA : अमेरिका में आसमान क्यों छू रहे अंडों के दाम

USA : अंडे अगर एआई से बनाए जा सकते तो एलन मस्क अमेरिका की सड़कों पर अंडों की बारिश करवा देते लेकिन चूंकि अंडे मुर्गियां देती हैं इसलिए उन पर तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भी बस नहीं चल रहा. सारी दुनिया को बस में करने का ख्वाव देख रहे बेबस ट्रंप अपने देश के अंडा संकट से निजात पाने दूसरे देशों तुर्की पोलेंड और साउथ कोरिया और फिनलेंड के आगे झोली फैलाए खड़े हैं. शायद किसी को इस उभरते तानाशाह पर दया आ जाए, हालांकि ऐसा लग नहीं रहा.

हैरानी भरी खबर यह है कि अमेरिका में अंडा 80 रुपए प्रति नग तक बिक रहा है जिस के चलते लोग त्राहित्राहि कर रहे हैं. अंडों की तस्करी और कालाबाजारी होने लगी है, स्टोर्स को तय शुदा मात्रा में अंडे दिए जा रहे हैं. लोग किराए पर मुर्गियां ले कर अंडा उत्पादन कर रहे हैं क्योंकि वह महंगा अंडा खरीदने के मुकाबले सस्ता पड़ता है. अंडों को ले कर सोशल मीडिया पर मीम्स वायरल हो रहे हैं. सड़कों पर भी प्रदर्शन होने लगे हैं जो जाहिर है डैमोक्रेट्स ज्यादा कर रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे हमारे देश में कभीकभी विपक्षी आलू प्याज और टमाटर को ले कर हायहाय करने की रस्म निभा देते हैं.

आलू प्याज और टमाटर के दामों के बाबत अच्छा है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी पंडित जवाहरलाल नेहरु को जिम्मेदार नहीं ठहराया जो कि उन की आदत में शुमार है कि जिस मसले पर कोई दलील या बहाना भी न सूझे तो झट से नेहरु गांधी खानदान को उस का जिम्मेदार ठहरा दो. भक्त और पूजा पाठी झट से मान लेंगे. उधर ट्रंप ने अंडा संकट के बाबत पूर्व राष्ट्रपति जो बाईडैन को ठहराते अंडों का ठीकरा उन के सर फोड़ दिया है. न केवल अंडों बल्कि बढ़ती मुद्रा स्फीति और महंगाई के लिए भी उन्होंने संसद में वाईडैन सरकार को इस का जिम्मेदार ठहराया.

लेकिन ऐसे बहाने भरे वक्तव्यों और भाषणों से अंडा संकट दूर होता नहीं दिखाई दे रहा. हाल यह है कि एक दर्जन अंडे की कीमत 10 डौलर तक पहुंच गई है. मोटेतौर पर कहें तो लगभग 80 रुपए का एक अंडा पड़ रहा है. इस भाव में अंडे खरीदना हरेक अमेरिकी के बूते की बात नहीं है क्योंकि अंडे उन के दैनिक आहार का खास हिस्सा होते हैं.

अंडों की कम पैदावार के लिए बर्ड फ्लू नाम की बीमारी को जिम्मेदार माना जा रहा है जिस से बचने करोड़ों मुर्गियों मार दी गईं. अब मुर्गियां कम तो अंडे भी कम होंगे ही. रेंट द चिकन एजेंसी किराए पर मुर्गियां मुहैया करा कर जम कर चांदी काट रही है. यह एजेंसी 495 डौलर में दो मुर्गियां 6 महीने के लिए किराए पर उपलब्ध करा रही है.

एक स्वस्थ मुर्गी एक सप्ताह में एक दर्जन अंडे देती है. इस लिहाज से ग्राहकों के नजरिये से भी सौदा बुरा नहीं जिन्हें एक फायदा अंडों के लिए भागादौड़ी से बचने का भी है नहीं तो आधा दिन पैट्रोल फूंकने के बाद अगर दर्जन भर अंडे जैसेतैसे मिल भी जाएं तो 5 – 10 डौलर तो पैट्रोल में ही फुंक जाना है और वक्त की बरबादी की कीमत अलग.

अब ट्रंप को आदेश देना चाहिए कि सभी अमेरिकी चर्चों में जा कर प्रभु से यह प्रार्थना करें कि ‘हे ईश्वर जल्द से जल्द मुर्गियों को स्वस्थ कर दो और बर्ड फ्लू को समूल नष्ट कर दो जो मागा की राह में रोड़ा बन कर आया है.’

Relationship : तलाक को सरल बनाना जरूरी

Relationship : शादी के बाद जल्दी तलाक न मिलने के चलते गुस्से व तनाव से मन में अपराध की भावना भरता जा रहा है. पतिपत्नी के बीच पंडे और काले कोट वाले न आए तो अलगाव सरल होगा अपराध में नहीं बदलेगा.

रामपुर गांव में एससी परिवार की नेहा नामक लड़की की शादी एक साल पहले नगराम के दीपक से हुई थी. शादी दोनों ही परिवारों ने एकदूसरे को ठीक से देख समझ कर की थी. शादी के कुछ माह के बाद ही नेहा और दीपक में विवाद शुरू हो गया. विवाद का कारण यह था कि दीपक शराब का नशा करने के बाद नेहा से मारपीट करता था. उसे लगता था कि नेहा का चरित्र ठीक नहीं है. वह दूसरे लड़कों से हंसतीबोलती है. झगड़े के बाद नेहा अपने मायके चली आई. दीपक के पिता चाहते थे कि नेहा अपने घर से ससुराल चली आए.

दोनों परिवारों की पंचायत गांव में लगी. दोनों परिवारों के बीच झगड़े न हों इस के लिए गांव में ही पुलिस भी आ गई थी. दीपक और नेहा के बीच बातचीत विवाद की तरह से हो रही थी. दो घंटे से अधिक तक यह विवाद चलता रहा. अंत में नेहा ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि वह ससुराल नहीं जाएगी. सभी ने उसके फैसले को ही मान लिया. दीपक और उस के पिता यह मानने के पक्ष में नहीं थे. अंत में पंचायत के दबाव में उनको भी फैसला स्वीकार करना पड़ा.

एक लिखित में समझौता पत्र तैयार हुआ. दोनों पक्षों ने एकदूसरे के सामान वापस किए. गवाहों के सामने लिखित में दिया कि नेहा और दीपक के बीच तलाक हो गया है. अब एकदूसरे के बीच कोई रिश्ता नहीं है. दोनों ही अपनी अलग शादी करने के लिए आजाद हैं. पूरी लिखापढ़त में पुलिस कहीं शामिल नहीं थी. इस के बाद भी यह फैसला इसलिए मान्य था क्योंकि पुलिस की मौजूदगी में यह किया गया.

कैसे कोर्ट से शून्य या अमान्य घोषित होती है शादी ?

अगर अदालत से कोई शादी शून्य यानि अमान्य घोषित की जाती है तो लंबा खर्च आता है. इस के साथ ही साथ कई माह भी लगते हैं. पंचायत में यह काम कुछ घंटों में ही बिना किसी बड़े विवाद के हो गया. भारत में विवाह से संबंधित अलगअलग कानून हैं. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के विवाह, तलाक और संतान की वैधता को समझाने वाला कानून बना है. इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट, 1872 ईसाई धर्म के लोगों का विवाह कानून है. मुसलिम पर्सनल ला (शरीयत) अधिनियम, 1937 मुसलिम धर्म मानने वालों के विवाह, तलाक और उत्तराधिकार को बताता है. पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 पारसी धर्म के लोगों के विवाह और तलाक से जुड़ा हुआ है. विशेष विवाह अधिनियम, 1954 का कानून धर्म और जाति से परे अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों को कानूनी मान्यता देता है.

शून्य विवाह क्या होता है ? कुछ विवाह ऐसे होते हैं, जो कानून की दृष्टि से शुरू से ही अमान्य होते हैं. इन की कोई कानूनी वैधता नहीं होती. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 11 के तहत शून्य विवाह का मतलब यह है कि यदि किसी व्यक्ति का पहले से कोई वैध विवाह है तो दूसरी शादी शून्य होती है. पतिपत्नी का संबंध अमान्य या निषिद्ध संबंध माना जाता है. इस के अलावा वह विवाह शून्य माना जाता है जिस में विवाह आवश्यक रस्मों के बिना पूरा हुआ हो. विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा 24 के तहत शून्य विवाह तब माना जाता है जब शादी के समय लड़के की उम्र 21 वर्ष से कम या लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम हो.

इस के अलावा यदि कोई पक्ष मानसिक रूप से अस्वस्थ हो और विवाह की सहमति देने योग्य न हो. यदि विवाह अवैध संबंध में आता हो. यदि पति या पत्नी में से कोई नपुंसक हो. यदि कोई पुरुष या महिला पहले से विवाह में हो और दूसरी शादी कर ले. मुसलिम कानून के तहत ‘बातिल निकाह’ वह माना जाता है जिस में विवाह मुसलिम कानून की शर्तों के अनुसार न किया गया हो. विवाह निषिद्ध संबंध में हुआ हो. विवाह ‘इद्दत’ अवधि के दौरान संपन्न हुआ हो. यदि मुसलिम महिला पहले से विवाहित हो. यदि विवाह धोखाधड़ी या जबरदस्ती से हुआ हो. यदि विवाह पूर्ण रूप से सम्पन्न न किया गया हो.

शून्य विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी जाती है. इस में पतिपत्नी के रूप में कोई अधिकार नहीं बनते हैं. यदि पतिपत्नी में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है, तो दूसरा उस की संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं बन सकता. ऐसे विवाह से उत्पन्न संतानें वैध मानी जाती हैं, लेकिन उन्हें केवल पिता की अर्जित संपत्ति में अधिकार मिलता है. शून्य विवाह में पत्नी भरण पोशण की मांग नहीं कर सकती. मुसलिम कानून में शून्य विवाह के बाद उत्पन्न संतानें अवैध मानी जाती हैं. पत्नी को ‘मेहर’ या भरण पोषण का अधिकार नहीं होता. पतिपत्नी के बीच कोई उत्तराधिकार का अधिकार नहीं होता.

शून्य विवाह और तलाक में अंतर

शून्य विवाह और तलाक के बीच अंतर होता है. शून्य विवाह वह है जो कानूनन मान्य नहीं है. तलाक कानूनी रूप से वैध विवाह को समाप्त करने की प्रक्रिया होती है. शून्य विवाह को कानूनी स्थिति विवाह कभी नहीं माना जाता है. तलाक में पहले विवाह मान्य था, लेकिन अब समाप्त हो गया है. शून्य विवाह में कोई वैवाहिक अधिकार नहीं बनते हैं. तलाक के मसले में विवाह से जुड़े अधिकार और कर्तव्य बने रहते हैं. शून्य विवाह में पतिपत्नी को कोई अधिकार नहीं होता. तलाक से पहले उत्तराधिकार का अधिकार रहता है.

संतान की स्थिति में शून्य विवाह में बच्चे वैध होते हैं लेकिन पिता की पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं होता. तलाकशुदा दंपति के बच्चों को पूर्ण उत्तराधिकार मिलता है. भरण पोषण में शून्य विवाह में पत्नी को कोई हक नहीं होता. तलाक के बाद पत्नी भरण पोषण की मांग कर सकती है. विवाह को शून्य करार करने के लिए अदालत का सहारा लेना चाहिए. अदालत विवाह को शून्य घोषित कर सकती है. इस में समय लगता है. समय तलाक में भी लगता है. यही कारण है कि अधिकतर युवा इस तरह के मसलों में छुटकारा पाने के लिए अपराधिक कदम भी उठा लेते हैं.

अलगाव हो अपराध नहीं

उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में रहने वाली प्रगति की शादी मैनपुरी के कारोबारी दिलीप से शादी हुई थी. शादी से पहले प्रगति अनुराग से प्यार करती थी. दोनों पिछले 4 साल से रिलेशन में थे. प्रगति किसी भी हाल में अनुराग को पाना चाहती थी. अनुराग भी प्रगति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था. इस के बाद भी प्रगति की शादी घर वालों ने दिलीप नामक युवक से करा दी. नई नवेली पत्नी प्रगति को अपने पति का साथ मंजूर नहीं था. उस ने शादी के 15 दिन के अंदर ही अपने प्रेमी अनुराग के साथ मिल कर दिलीप को रास्ते से हटाने की योजना तैयार की.

19 मार्च को औरैया के सहार थाना क्षेत्र के पलिया गांव के पास दिलीप गंभीर रूप से घायल हालत में गेहूं के खेत में पड़ा मिला था. उसे गोली मारी गई थी. ग्रामीणों ने तुरंत इस की सूचना पुलिस को दी. मौके पर पहुंच कर पुलिस ने दिलीप को अस्पताल पहुंचाया, जहां उस की हालत नाजुक होने पर उसे हायर सेंटर रेफर कर दिया गया. इलाज के दौरान दिलीप की मौत हो गई. इस मामले की जांच के लिए सहार थाना पुलिस, सर्विलांस टीम को लगाया गया. पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज खंगाले, जिस में एक संदिग्ध शख्स प्रगति के पति को बाइक पर बैठा कर ले जाता दिखा. ऐसे में पुलिस ने प्रेमी और प्रगति को हिरासत में ले कर सख्ती से पूछताछ की. जिस पर दोनों ने राज उगल दिया.

शादी के 15वें दिन की पति की हत्या

पुलिस पूछताछ में प्रगति ने पति की हत्या करने की साजिश को कबूल ली. जांच में सामने आया कि प्रगति का प्रेमी अनुराग यादव उसी गांव का रहने वाला था और दोनों का प्रेम संबंध था. परिवार इस रिश्ते के खिलाफ था, इसलिए प्रगति की शादी अनुराग से नहीं हो पाई थी. शादी के बाद भी प्रगति अनुराग के प्रेम में पागल थी. यही वजह थी कि उस ने पति को रास्ते से हटाने के लिए अनुराग के साथ हत्या की साजिश रच डाली.

प्रगति ने अनुराग को पति की हत्या के लिए एक लाख रुपए दिए. जिस के बाद अनुराग ने अपने साथी रामजी नागर के साथ मिल कर 2 लाख रुपए में सौदा तय किया. 19 मार्च को जब प्रगति का पति कन्नौज से लौट रहा था, तब आरोपियों ने उसे नहर के पास एक होटल पर रोक कर बहाने से बाइक पर बिठा लिया और सुनसान जगह ले जा कर उस की हत्या कर दी. पुलिस ने रामजी नागर और अनुराग को गिरफ्तार कर लिया है. उन के पास से 315 बोर के तमंचे और जिंदा कारतूस बरामद हुए हैं. गहराई से पूछताछ के बाद प्रगति को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

सिपाही ने पत्नी के प्रेमी और साथी को मारा

यह कोई अकेली घटना नहीं है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के काकोरी में सिपाही महेंद्र कुमार और उस की पत्नी अंकिता उर्फ दीपिका ने मनोज और उस के दोस्त रोहित की हत्या की दी. पुलिस को सर्विलांस से पता चला कि मरने वाले मनोज से तेजकिशनखेड़ा निवासी अंकिता उर्फ दीपिका रोज बात करती थी. घटना के दिन उस ने 35 कौल की थी.

इस आधार पर पुलिस ने अंकिता से पूछताछ की. पहले तो उसने पुलिस को सच नहीं बताया. उस के हाथ पर मौजूद ताजा चोट को देख कर पुलिस का शक गहरा गया. पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सच बयां कर दिया. अंकिता और मनोज दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे. तब से ही दोनों में प्रेम प्रसंग था. दोनों शादी भी करना चाहते थे. इसी बीच अंकिता के परिवारजनों ने उस की शादी 20 जून 2021 में तेजकिशनखेड़ा निवासी 2018 बैच के सिपाही महेंद्र कुमार से कर दी थी.

शादी के बाद दोनों का जीवन सही चल रहा था. मौजूदा समय में महेंद्र की पोस्टिंग लखीमपुरखीरी स्थित पुलिस लाइन में थी. उस का घर आना जाना थोड़ा कम हो गया था. इसी बीच अंकिता और मनोज में फिर से बात होने लगी. दोनों ने मिलना शुरू कर दिया. 24 दिसंबर 2024 को सिपाही महेंद्र को पत्नी अंकिता और मनोज के प्रेम प्रसंग के बारे में जानकारी हो गई. सिपाही ने विरोध किया. अंकिता को मनोज से बात करने और मिलने से मना किया गया. इस के बावजूद दोनों बात करते थे. अकसर मिलते भी थे. इस बात को ले कर महेंद्र ने पत्नी अंकिता से कहा कि उस में और मनोज में से एक को चुनना होगा.

अंकिता ने महेंद्र का साथ देने की बात कही. इसके बाद सिपाही ने पत्नी के साथ मिलकर में मनोज की हत्या करने का प्लान तैयार किया. साजिश के तहत दो नए सिम लिए थे. अंकिता ने एक सिम मनोज को दिया दूसरा अपने पास रखा था. नए सिम लेने के पीछे कारण यह था कि वारदात के बाद सर्विलांस या कौल डिटेल से पुलिस ट्रेस न कर सके.

लखीमपुर खीरी पुलिस लाइन से सिपाही महेंद्र की ड्यूटी अयोध्या में लगाई गई थी. उसे 21 मार्च की शाम को लखीमपुर खीरी पुलिस लाइन में रिपोर्ट करना था. वह अयोध्या से लखीमपुर खीरी पुलिस लाइंस सीधे न जा कर काकोरी के लिए निकल लिया. उस ने अंकिता, अपने दो सालों और भांजे को कौल कर के मनोज की हत्या उसी दिन करने की बात कही. ड्यूटी मूवमेंट के दौरान हत्या करने से किसी को शक नहीं होगा. इसलिए उस ने अंकिता से मनोज को कौल कर के काकोरी स्थित बरकताबाद पुलिया पर मिलने के लिए बुलाने के लिए कहा. करीब 35 बार कौल करने पर मनोज मिलने के लिए तैयार हो गया. महेंद्र, उस के साले और भांजे पहले से बरकताबाद पुलिया के पास छुप गए थे.

मनोज बाइक से रोहित के साथ पहुंचा था. उन दोनों के बरकताबाद पुलिया के पास पहुंचते ही आरोपी ने दोनों को पकड़ लिया. इस के बाद दोनों को पीटना शुरू कर दिया. उन का प्लान था मनोज को मारने का था. महेंद्र के साथ रोहित स्कूल में पढ़ा हुआ था. दोनों दोस्त भी थे. मनोज की हत्या का राज रोहित खेल देगा इसलिए दोनों की एक साथ हत्या कर दी. वारदात के बाद अंकिता व अन्य 3 लोग अपने घर चले गए थे. महेंद्र लखीमपुर खीरी पुलिस लाइन के लिए रवाना हो गया था. आरोपी सिपाही महेंद्र रिपोर्टिंग टाइम से काफी देर से लखीमपुर खीरी पुलिस लाइन पहुंचा था. उस ने बहाना बनाया कि उस की तबीयत खराब हो गई थी. उंगली में भी चोट लग गई थी. इस लिए उसे देर हो गई. इस के बाद वह अनुमति ले कर बेड रेस्ट पर चला गया था. इस के बाद भी कोई होशियारी काम नहीं आई. पुलिस ने अंकिता और महेंद्र को जेल भेज दिया.

नीले ड्रम का खौफ

उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक सनसनीखेज हत्या का मामला सामने आया. जो सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में रहा. लंदन से 22 दिन पहले 24 फरवरी को मर्चेंट नेवी के अफसर सौरभ कुमार वापस अपने घर आए थे. सौरभ कुमार मेरठ के इंद्रानगर सेकेंड में किराए के मकान में अपनी पत्नी मुस्कान और 6 साल की बेटी पीहू के साथ रहते थे. अगले दिन 25 फरवरी को मुस्कान का जन्मदिन था. महल्ले वालों को बताया गया कि वे हिमाचल घूमने जा रहे हैं.

इस के बाद घर के गेट पर ताला लग गया. सौरभ का अपने परिवार से विवाद था. जिस के चलते उन्हें बेदखल कर दिया गया था. 3 साल पहले उन्होंने मुस्कान के साथ अलग रहना शुरू किया था. उन की बेटी पीहू सेकंड क्लास में पढ़ती है. कई दिनों के बाद जब महल्ले वालों को घर से बदबू आने लगी तो पुलिस ने कमरा खोला. मुस्कान की बेटी ने बताया पापा इस नीले ड्रम में है. तब पुलिस ने ड्रिल मशीन से ड्रम तोड़ा.

उस के बाद शव को बाहर निकाला गया. पुलिस को आशंका है कि सौरभ की हत्या करीब 10 दिन पहले ही कर दी गई थी. हत्या के बाद शव को ड्रम में बंद कर सीमेंट से सील कर दिया गया और मुस्कान बाहर चली गई. जब घर से बदबू फैलने लगी, तो मकान मालिक ने पुलिस को सूचना दी. हत्या के मामले में मुस्कान और उस के प्रेमी मोहित को गिरफ्तार कर लिया गया है. हत्या के पीछे मुस्कान और मोहित के अवैध संबंध बताए गए.

मांबाप के द्वारा तय किए जाने वाले रिश्तों में अनबन होना कोई नई बात नहीं है. पहले लड़कियां समझौता करके इस को सहन कर लेती थीं. आज वह इस से बाहर निकलने का रास्ता तलाश करने लगती हैं. शादी से बाहर निकलने का रास्ता काफी कठिन होता है. शादी कराने वाले पंडे होते हैं. तलाक के बीच काले कोट वाले पंडे आ जाते हैं, जिस से तलाक में लंबा समय लगता है. अगर पंचायतों की तरह आपसी रजामंदी से चट शादी पट तलाक होने लगे तो पति पत्नी के बीच आपसी अपराध कम हो जाएगा.

तलाक लेने में केवल लड़की की सुनी जानी चाहिए. दोनों के बीच आपसी सहमति से कुछ माह में तलाक पूरा हो जाए. जिस से वह दोनों अपना नया जीवन शुरू कर सकें. पतिपत्नी के बीच अपराध की घटना में एक दो नहीं पूरे तीन परिवार तबाह होते हैं. अगर नोटरी की तरह एफिडेविड दे कर यह काम हो सके तो बहुत ही बेहतर होगा. शादी के बाद तलाक जितना समय लेगा, परेशानी उतनी होगी, युवा लड़केलड़कियां शादी से उतना ही दूर भागेंगे. विवाह को बचाने के लिए तलाक को बेहद सरल करना होगा.

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