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Best Hindi Story : रंग और रोशनी – शादी की बात सुन प्रिया सकपका क्यों गई?

Best Hindi Story : मनीष अपनी पत्नी मुक्ता के साथ बरामदे में बैठा शाम की चाय की चुसकियां ले रहा था. दफ्तर में बीते दिन के  कुछ रोचक पल मुक्ता को सुना रहा था. मुक्ता भी उस के साथ अपने दिन भर के अनुभव बांट रही थी. अरेंज्ड मैरिज और नईनई गृहस्थी के अनुभव. बहुत कुछ था दोनों के बीच साझा करने को.

‘‘वाह, एक तो तुम्हारे हाथ के बने समोसे और वे भी एअर फ्रायर में. स्वाद भी और सेहत भी. एक अच्छी पत्नी का फर्ज तुम बढि़या ढंग से निभा रही हो.’’

मनीष के कथन पर मुक्ता शरमाते हुए हंसी ही थी कि तभी मनीष का दोस्त गोपाल आ गया.

‘‘आओ गोपाल, बैठो. मुक्ता 1 कप चाय गोपाल के लिए भी हो जाए.’’

मनीष के कहते ही मुक्ता फुरती से रसोई की ओर चल दी.

‘‘क्या दोस्त, मेरे आते ही भाभी को भगा दिया? खैर, अच्छा ही किया. आज मैं तुझे एक समाचार देने आया हूं. तेरी प्रिया अपनी मां के घर वापस आ गई है. मुझे आज बाजार में मिली थी. मैं ने जैसे ही तेरे बारे में खबर दी तो, वह तेरा फोन नंबर मांगने लगी… कहने लगी उस का फोन चोरी हो गया था, इसलिए तेरा नंबर खो गया.’’

आगे गोपाल ने क्या कहा, वह मनीष को सुनाई नहीं दिया. वह तो प्रिया का नाम सुनते ही अतीत की गहरी खाई में गिरता चला गया. 6 माह पहले तक इस नाम के इर्दगिर्द ही उस का पूरा जीवन सिमटा था. उस की प्रिया, उस की जान, उस का प्यार…

कमल की पार्टी में प्रिया अलग ही चमक रही थी. कौन था ऐसा पार्टी में जिस की नजर उस पर न पड़ी हो. मनीष अपने शरमीले स्वभाव के कारण बस दूर से ही उसे निहार कर खुश था. पर पार्टी के बाद जब पता चला कि प्रिया का घर मनीष के रास्ते में आता है, तो उसे घर छोड़ने का काम उस ने सहर्ष स्वीकार लिया. प्रिया की आंखों और मुसकराहट में भी तो कुछ महसूस किया था उस ने. रास्ते में पता चला कि प्रिया कालेज में पढ़ती है. मनीष कालेज की पढ़ाई के बाद प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी कर रहा था.

‘‘तब तो तुम बहुत मेधावी होगे. मुझे जो समझ न आया करे उसे क्या तुम से समझने आ जाया करूं?’’

‘‘जब तुम्हारा मन करे,’’ मनीष ने बिना देर किए कहा. आखिर अंधा क्या चाहे 2 आंखें.

मनीष अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. उस के पिताजी नौकरी के सिलसिले में अकसर दौरे पर रहते थे और मां इतनी सीधी थीं कि प्रिया का घंटों मनीष के कमरे में रहना उन्हें जरा भी नहीं अखरता था. प्रिया के घर जाने में मनीष को किसी बहाने की जरूरत न थी. प्रिया की मां अकसर घर से बाहर रहती थीं. पति से उन का तलाक हो चुका था.

धीरे-धीरे मनीष और प्रिया के संबंधों में प्रगाढ़ता आने लगी. कुछ दोष उम्र का भी था. कच्ची उम्र, सतरंगी सपने. बिना आई लव यू कहे भी दोनों एकदूसरे को अपने दिल का हाल सुनाने में सक्षम थे. दोनों को एकदूसरे का साथ बहुत भाता. जब साथ न

होते तब व्हाट्सऐप पर हरपल की खबर रहती. प्रिया मनीष की हर बात में अपनी हां मिलाती. मनीष उसे नित नए कपड़े, नेलपौलिश, लिपस्टिक, परफ्यूम इत्यादि देता रहता. यहां तक कि प्रिया की औनलाइन शौपिंग के लिए उसे क्रैडिट कार्ड भी मनीष ने ही दिया था. इस के बदले में प्रिया ने मनीष की हर कमी को पूरा कर दिया था. उस ने कभी मनीष को स्वयं को हाथ लगाने से नहीं रोका था. शायद मनीष का शरमीला स्वभाव उसे आगे बढ़ने की स्वीकृति नहीं देता यदि प्रिया ने उस दोपहर अपने अकेले घर में स्वयं को मनीष को न सौंप दिया होता. उस अनुभव के बाद मनीष का मन प्रिया के बिना कहीं लगता ही नहीं था. दोनों एकदूसरे के घर, कमरे में एकांत तलाशते. एकदूसरे के बिना स्वयं को अकेला पाते.

‘‘प्रिया, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. तुम्हारे मेरी जिंदगी में आने से पहले मेरा जीवन कितना सूना था. तुम ने उस में रंग और रोशनी भर दी.’’

मनीष प्रिया के प्रेम की लहर में बह जाता-

‘‘जीना हराम कर रखा है मेरी इन आंखों ने,

खुली हों तो तलाश तेरी और बंद हों तो ख्वाब तेरे.’’

इस प्रेम का असर मनीष की निजी जिंदगी में तो हो ही रहा था, उस की पढ़ाई पर भी पड़ने लगा था. उस की प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी में न तो वह लगन थी और न ही मेहनत, जिस की जरूरत होती है. प्रिया की सूरत और उस के सपने कभी उसे अकेला न छोड़ते. इस का नतीजा यह रहा कि वह परीक्षा में असफल रहा. अब चूंकि घर पिताजी की पेंशन पर चल रहा था, इसलिए मनीष को जेबखर्ची, क्रैडिट कार्ड इत्यादि सब बंद करने पड़े.

मनीष को आज भी अच्छी तरह याद है जब उस के मित्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण रह जाने पर अफसोस करने आए थे. सब के साथ प्रिया भी आई थी पर उस के चेहरे पर अफसोस का कोई भाव न था, बल्कि जब उस के एक मित्र ने यह कहा कि मनीष प्रिया के कारण परीक्षा में पूरी मेहनत न कर सका तो कितनी बेहयाई से हंसते हुए उस ने कहा था कि वाह, एक तो फेल हो गए, उस पर तुर्रा यह कि इलजाम किसी और के सिर मढ़ दो. यह अच्छा है यानी उस के स्वर में हमदर्दी की जगह व्यंग्य था.

मनीष को प्रिया की यह बात बुरी अवश्य लगी थी, पर वह इसे प्रिया का अल्हड़पन समझ कर टाल गया था. अभी तक उस ने प्रिया से अपने जीवन का हिस्सा बनने की बात भी कहां छेड़ी थी. जब वह उस के जीवन में शामिल हो जाएगी, तभी तो एक की स्थिति की जिम्मेदारी दूसरे की भी होगी. उसे विश्वास था कि प्रिया के साथ से वह जीवन में अवश्य सफल होगा. इसीलिए जल्द ही बिना देर किए मनीष ने प्रिया के समक्ष शादी का प्रस्ताव रख दिया.

प्रिया स्तब्ध सी उसे देखती रह गई. फिर उस ने साफसाफ कह दिया, ‘‘कैसी बातें कर रहे हो मनीष? माना कि तुम मुझे अच्छे लगते हो,

पर शादी? शादी की क्या जरूरत है, मैं तो तुम्हारी हूं ही.’’

‘‘पर प्रिया ऐसे कब तक चलेगा? मेरे मातापिता मेरी शादी की सोचेंगे और आखिर तुम्हारी मां भी कब तक इंतजार करेंगी. उन्हें भी तो तुम्हारी शादी की चिंता होगी. मैं ने सोचा है कि कोई छोटीमोटी नौकरी तो मुझे मिल ही जाएगी. पिताजी ने एक जगह बात चलाई है, छोटी ही सही पर गृहस्थी का बोझ मैं उठा लूंगा.’’

‘‘छोटीमोटी नौकरी? समझने की कोशिश करो मनीष… पैसे के बिना जीवन क्या है? देखो, आजकल तुम न तो मुझे कोई उपहार दे पाते हो और न ही मेरी खरीदारी करा पाते हो. ऐसे में भला शादी की कैसे सोच सकते हो? वैसे भी शादी का मतलब है खाना पकाना, घर संभालना, बच्चे पैदा करना और फिर उन का पालनपोषण और भविष्य की चिंता में घुलते रहना. बदले में एक ढर्रे की जिंदगी. मुझे इन सब से चिढ़ है. मैं एक स्वतंत्र विचारों की लड़की हूं. मेरी मां को ही देख लो. आज अकेले कितनी प्रसन्न और मस्त हैं. मैं भी वैसा ही जीवन चाहती हूं.’’

प्रिया के इस उत्तर ने मनीष को निरुत्तर कर दिया. उस दिन के बाद से मनीष को न जाने ऐसा क्यों लगने लगा जैसे प्रिया उस से कतराने लगी है, जैसे उस का व्यवहार ठंडा पड़ने लगा है, वह उस से किनारा करने लगी है. वह कई दिनों तक उस से न मिलती, न ही फोन पर संपर्क करती. कहीं टकरा जाने पर बहानों की कतार लगा देती, ‘‘बस इतना ही जान पाए अपनी प्रिया को तुम मनीष? मैं तुम्हें कैसे भूल सकती हूं? मैं स्वयं को भूल सकती हूं पर तुम मेरी हर सांस में बसते हो…’’

बात इमोशनल ब्लैकमेल तक पहुंच जाती. मनीष पूछना चाहता कि इतनी चाहत है, तो छलकती क्यों नहीं है तुम्हारे चेहरे पर? पर डरता था कि कहीं बात साफ करतेकरते वह प्रिया को खो न बैठे. उसे इंतजार मंजूर था पर अपने सुनहरे स्वप्नों की उड़ान में दरार नहीं.

‘प्रिया को पाने से पहले मुझे जीवन में कुछ और बुलंदियां भी हासिल करनी होंगी,’ सोच उस नेएक बार फिर प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. अब की बार उस ने शुरू से ही पूरा परिश्रम करने की ठानी थी. कभीकभार फोन पर प्रिया से बात कर वह स्वयं को हलका महसूस कर लेता था.

फिर एक दिन प्रिया ने बताया, ‘‘मैं अपने मामा के घर जा रही हूं… तुम यों परेशान हो रहे हो जैसे मेरी शादी हो रही है. तुम क्या समझते हो मैं तुम्हारे बिना खुश रह सकूंगी? पर मैं यह सब तुम्हारे लिए कर रही हूं. मेरे यहां रहते तुम पढ़ाई में मन नहीं लगा पाओगे. यह हमारी परीक्षा की घड़ी है. मनीष इस में हमें पास हो कर दिखाना है.’’

बड़ी मुश्किल से मनीष का मन शांत हो पाया था.

प्रिया के जाने के बाद सुहावना मौसम भी बोझिल लगता. मानो अंदर का बुझापन बाहर की रौनक पर हावी हो गया हो. लेकिन समय अपनी गति कब छोड़ता है? परीक्षा की तारीख पास आ रही थी. किसी तरह मनीष ने अपना ध्यान पढ़ाई में लगाया. पर प्रिया के पत्र का इंतजार उसे रोज रहता. अंतत: 3 महीने बाद उस का पत्र आया. पत्र में प्रिया की मजबूरियों का बखान था…. मनीष के बिना वह कितनी अधूरी थी, कितनी तनहा. प्रिया की तड़प पढ़ कर मनीष की आंखें भर आईं कि क्यों वह बारबार प्रिया के प्यार पर अविश्वास की परत चढ़ा देता है? हर किसी का प्यार करने और जताने का ढंग अलगअलग होता है और फिर प्रिया एक लड़की है. कुछ शर्म, कुछ हया उस के व्यक्तित्व का हिस्सा है. जरूरी तो नहीं हर बात कही जाए, कुछ महसूस भी की जाती है. एक सच्ची प्रेमिका पा कर वह स्वयं को धन्य मान रहा था.

परीक्षा समाप्त हो गई. कुछ ही समय बाद परिणाम भी आ गया. इस बार मांपिताजी की प्रसन्नता का ठिकाना न था. घर पर दोस्तों के लिए एक छोटी सी दावत रखी थी. उस शाम मनीष को प्रिया की कमी बहुत खली थी. वह प्रिया को यह खुशखबरी स्वयं सुनाना चाहता था. उस के चेहरे की खुशी को वह अपनी आंखों से देखना चाहता था. फोन पर खबर दे कर वह इस दृश्य को खोना नहीं चाहता था.

मनीष ने कमल से प्रिया का पता मांगते

हुए, जो उस के अलावा प्रिया का भी दोस्त था कहा, ‘‘यार, प्रिया को यह खुशखबरी दे दूं…

सच कहूं तो मैं उस से शादी करना चाहता हूं.

हम दोनों ने अलग रह कर बहुत कठिन परीक्षा दी है. यह त्याग उस ने मेरी सफलता के

लिए दिया और अब जब मैं अपने पैरों पर खड़ा हूं तो…’’

‘‘अरे मनीष, तुम्हारे जैसा सुशील और लायक लड़का प्रिया जैसी तितली के जाल में फंस जाएगा यह तो मैं सोच भी नहीं सकता था. प्रिया जैसी लड़की सैरसपाटे के लिए ठीक है

पर शादी के लिए नहीं. क्यों अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार रहा है?’’

कमल ने मनीष के मन की शांत झील में पहला पत्थर मारा था. उस ने प्रिया के बारे में जो कुछ भी बताया उसे सुन कर मनीष स्तब्ध रह गया.

‘‘प्रिया के प्रियों की संख्या का भान है तुझे? आए दिन वह किसी न किसी से रासलीला रचा रही होती है… उस की मां भी तो वैसी ही,’’ और फिर आगे कुछ कहने के बजाय कमल हंसने लगा.

‘‘बदलता है रंग आसमान कैसेकैसे.’’

मनीष की नायिका अचानक खलनायिका बना दी गई थी. उस के मन में उथलपुथल मची थी कि क्या सच में वह बेवकूफ बन रहा था या प्रिया जैसी प्रेमिका के कारण कमल उस से जल रहा है? उस का मन बेचैन हो उठा था. यह उस के जीवन का अहम निर्णय था. इसलिए उस ने खुद छानबीन करने की ठानी. मनीष ने काफी पूछताछ की. जितनी जानकारी मिलती गई, उस का मन उतना ही खिन्न होता गया. वह कितना पागल था प्रिया के प्यार में. प्रिया की रस घुली बातों में आने में उसे जरा भी देर न लगती थी.

‘‘ख्वाहिशों के काफिले भी बड़े अजीब होते हैं, वे गुजरते वहीं से हैं जहां रास्ते नहीं होते हैं.’’

अब मनीष की सफलता का परिणाम सुन कर शायद प्रिया शादी के लिए फौरन हामी भर

दे. विरह में बीते दिनरातों की व्यथा सुनाए. पर आंखों देखी मक्खी किस से निगली जाती है भला? इसलिए मां के बारबार पूछने पर मनीष ने उन की पसंद की लड़की से शादी के लिए हां कह दी.

उसी सप्ताहांत मनीष अपने मांपिताजी के साथ लड़की देखने उन के घर पहुंचा. लड़की सुंदर थी. उन्हें भी मनीष पसंद आया. रिश्ता पक्का हो गया. किंतु मनीष अपनी जीवनसंगिनी से अपने जीवन का अतीत अंधेरे में नहीं रखना चाहता था. अत: उस ने मुक्ता से अकेले में बात करने की इच्छा व्यक्त की. संकोचवश मुक्ता कुछ असहज थी.

मनीष ने ही शुरुआत की, ‘‘जब हम दोनों अपना पूरा जीवन साथ गुजारने का निर्णय लेने जा रहे हैं, तो हमें अपना अतीत भी साझा कर लेना चाहिए. मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. पहले सुन लो, फिर जो तुम्हारा निर्णय होगा, मुझे मान्य होगा,’’ और फिर मनीष ने मुक्ता को प्रिया के बारे में पूरी ईमानदारी से सब बता दिया.

कुछ क्षण चुप रहने के बाद मुक्ता बोली, ‘‘चलिए, खट्टा ही सही पर आप को प्यार में अपना निर्णय लेने का मौका तो मिला… ताउम्र यह गिला तो नहीं रह जाएगा कि किसी से प्यार ही न कर सके. मेरा भी मन था कि मैं लव मैरिज करूं पर हमारे यहां तो लड़कियों का आंख उठाना भी वर्जित है.’’

‘‘तो तुम क्या इसलिए उदास लग रही हो?’’

मुक्ता चुप रही, लेकिन उस की आंखों ने हामी भर दी थी.

‘‘अच्छा किया तुम ने अपने दिल की बात मुझ से कही. हमारे बीच कोई संकोच नहीं होना चाहिए.’’

‘‘दरअसल, मैं भी चाहती थी कि जो खुशी प्यार में पड़े लोगों को महसूस होती है,

उसे मैं भी अनुभव कर पाती… प्यार में जिंदगी बदल देने वाले वे…’’ बोलते ही मुक्ता रुक गई. फिर जीभ काटते हुए कहने लगी, ‘‘माफ कीजिए, मैं भी पागल हूं, पता नहीं क्याक्या बोल रही हूं.’’

मगर उस की बातें सीधे मनीष के दिल तक पहुंचीं. कितनी साफगोई से मुक्ता ने अपनी ख्वाहिश उस पर जाहिर कर दी थी. ठीक ही तो है मनीष ने अपनी मरजी कर के देख ली और अब मातापिता की इच्छा से शादी कर रहा था. किंतु मुक्ता को अपनी मरजी का अवसर कहां मिला?

मनीष ने उसी दिन से मुक्ता के जीवन में प्यार का रंग और प्यार के  खुमार की रोशनी भरने की जिम्मेदारी उठा ली. उस ने हर प्रयास कर के मुक्ता को प्यार में मिलने वाली हर खुशी दी. यहां तक कि शादी होने तक मुक्ता को लगने लगा कि जैसे उस की लव मैरिज हो रही हो.

सच कहते हैं कि शादियां ऊपर तय होती हैं. यहां जमीन पर तो हम सिर्फ उन का मेल कराते हैं. मनीष और मुक्ता असल मानों में हमसफर बने.

आज गोपाल फिर उसी भूकंप की खबर लाया था, जिस से कभी मनीष का संसार डोल जाया करता था. पर आज वह शांत था. उस का संसार प्रसन्नता के झूले में झूल रहा था और इस की डोर थी मुक्ता के हाथों में. दोनों प्यार में जिंदगी बदल देने वाले रंग और रोशनी अनुभव कर रहे थे.

Justice : मुकदमों की बढ़ती तादाद

Justice : फसाद की जड़ हकीकत में जजों की कमी है. यह बात वक्तवक्त पर विधि आयोग सहित दूसरी एजेंसियों के आंकड़ों से तो उजागर होती ही रहती है लेकिन अच्छी बात यह है कि अब कुछ ही सही जज साहबान भी सार्वजनिक तौर पर यह सच उजागर करने मजबूर होने लगे हैं. लेकिन यह कोई ऐसी बड़ी समस्या भी नहीं है जिसे दूर न किया जा सके. जजों की कमी अगर राजनातिक मुद्दा बने तो क्या समस्या हल हो सकती है ?

अदालतों के बाहर तो अकसर पीड़ित लोग न्याय प्रक्रिया को कोसते नजर आ जाते हैं कि यह तो हद हो गई, सालों से चक्कर लगा रहे हैं लेकिन फैसला तो दूर की बात है 4 – 6 साल से सुनवाई ही पूरी नहीं हो पा रही. जाने कौन सी मनहूस घड़ी थी जब पैर अदालत की चौखट पर पड़े थे जहां रोजरोज तमाशा होता रहता है. भगवान किसी को यहां तक कि दुश्मन को भी अदालत का मुंह न दिखाए.

यही बात एक वकील साहब ने भरी अदालत में कह दी तो अब वे कंटेम्प्ट औफ कोर्ट के चक्कर में फंसते नजर आ रहे हैं. बात बीती 27 मार्च की है जबलपुर हाईकोर्ट के एक वकील पीसी पालीवाल ने लगभग भड़कते हुए कहा, इस कोर्ट में 4 घंटे से तमाशा चल रहा है मैं बैठा देख रहा हूं हाईकोर्ट के जज दूसरी जगह जा कर कहते हैं कि नए जज की नियुक्ति करो. लेकिन जजेस का हाल तो देखो जो दिल्ली में हुआ वह भी देखा जाए.

सुनवाई कर रहीं जस्टिस अनुराधा शुक्ला ने इन बातों पर कान न देते हुए इसे अदालत की अवमानना माना और पूरे वाकिये का जिक्र करते उस की प्रमाणित प्रति हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेज दी. उन्होंने लिखा, इस प्रकार की भाषा अत्यंत अनुचित है और यह अदालत की प्रतिष्ठा के विरुद्ध है.

अब जो होगा वो भी सामने आ ही जाएगा लेकिन वकील साहब की यह भड़ास ये कुछ बातें तो साफ कर ही गई.

– अदालतों पर मुकदमों का बोझ और जजों की कमी है.
– कोर्ट में कामकाज के नाम पर तमाशा सा होता है,
– न्याय मिलने में जरूरत से ज्यादा देर लगती है, और
– अदालतों के बाहर भले ही अपना गुबार निकाल लो लेकिन इजलास में मुंह पर लगाम होना जरुरी है.

इतने क्यों घबराए

कह तो दिया लेकिन पालीवाल को जल्द ही एहसास हो गया कि गुस्से में वे जरूरत से ज्यादा ही बोल गए हैं. इसलिए बाहर आ कर वे अपनी बात में दम लाने या उसे जस्टिफाई करने की गरज से बोले, जस्टिस शुक्ला के पास 149 केस सुनवाई के लिए आए थे. लेकिन अधिकांश समय उन्होंने केवल उन 6 मामलों में लगाया जिन में सेशन कोर्ट पहले ही आरोपियों को जमानत दे चुका था.

घबराहट इतनी बढ़ी कि वे वकालात छोड़ने तक की दुहाई देने लगे. अब यह और बात है कि किसी ने उन के हाथपांव नहीं जोड़े कि ऐसा मत करना वकील साहब नहीं तो न्याय व्यवस्था का क्या होगा. लेकिन उन के यह कहने में दम था कि जिस मामले की सुनवाई के लिए वे आए थे वह 20 बार लग चुका है. बड़ी मुश्किल से आज नंबर आया. बकौल पालीवाल, ‘मैं अपने केस की सुनवाई यहां नहीं करना चाहता इसे किसी अन्य बेंच में भेज दिया जाए.’

उन्होंने अपने मुवक्किलों के गरीब और हम्माल होने की दुहाई भी दी. जबलपुर हाई कोर्ट में सुनवाई नंबर से न होने की शिकायत भी इन वकील साहब ने की और यह भी बताया कि हम मेडम की नातजुर्बेकारी और लगभग मनमानी की शिकायत पहले ही चीफ जस्टिस से कर चुके हैं. यह घबराहट बेवजह नहीं थी. इस के पीछे मुमकिन है अदालत की अवमानना की सजा का डर हो या फिर मुमकिन यह भी है कि यह जजों और वकीलों की अपनी आपसी पौलिटिक्स हो लेकिन जो भी हो लोगों का ध्यान तो इस तरफ एक बार फिर गया कि अदालतों में देर लगती है जिस की वजह जजों की संख्या न बढ़ाया जाना है. पता नहीं क्यों सरकार जजों की संख्या बढ़ाने से कतराती है

सरकार ही है जिम्मेदार

प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है की थ्योरी के तहत इत्तफाक से ही सही वकील साहब के कहे पर प्रतिक्रिया हुई. जबलपुर की घटना के दूसरे दिन ही सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय ओक ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट औन रिकौर्ड एशोसियन के एक कार्यक्रम में इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकीलों की हड़ताल की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘क्या वकीलों का यह कार्य बहिष्कार मुवक्किलों के साथ अन्याय नहीं कर रहा है. फरियादियों को होने वाले नुकसान और उन के साथ पक्षपात की आप कल्पना कीजिए.’

कम हैरत की बात नहीं कि जबलपुर हाईकोर्ट में वकील पीसी पालीवाल जज साहिबा के ढीलेपन को देरी की वजह बता रहे थे तो जस्टिस ओक वकीलों को दोषी करार दे रहे थे. लेकिन हकीकत में न्याय प्रक्रिया से जुड़े सभी लोग देरी के जिम्मेदार हैं जिन में अदालतों के क्लर्क रीडर और रजिस्ट्रार सहित खुद पक्षकार भी शामिल हैं. जहां तक जजों की कमी की बात है तो जस्टिस अभय ओक ने भी इस का जिम्मेदार सरकार को ठहराते हुए कहा, ‘सरकारें निचली अदालतों में जजों की संख्या बढ़ाने और कोर्ट के बुनियादी ढांचे में सुधार करने में विफल रही हैं. अदालतों में मुकदमों की बढ़ती तादाद पर उन का कहना था कि न्यायालयों में कुल लंबित मामलों में 20 से 30 फीसदी वैवाहिक विवाद से जुड़े होते हैं.

बढ़ते वैवाहिक विवाद तो बजाय चिंता के संतोष की बात होनी चाहिए कि महिलाएं भी न्याय पाने के लिए कोर्ट जाने लगी हैं. क्योंकि वे शिक्षित और जागरूक हो रही हैं. हिंदू मैरिज एक्ट के वजूद में आने के पहले वैवाहिक विवाद के मुकदमे कहीं दायर ही नहीं होते थे. घरों और समाज में सीधा इंसाफ होता था जिस में कोई भी पति अपनी पत्नी को घर से धकियाने का अधिकार रखता था. पत्नी के साथ मारपीट और हिंसा भी उस का और उस के घर वालों का अधिकार था जिस की पीड़िता इंसाफ मांगने कहीं नहीं जा सकती थी. तलाक सहित दूसरे अधिकार महिला को मिले तो पुरुषों को भी अदालत जाना मजबूरी हो गई. तो ऐसे में यह तो होना ही था जो हो रहा है कि वैवाहिक विवाद के मुकदमे बढ़ रहे हैं. ये तो भविष्य में और बढ़ेंगे.

मुद्दे की बात जजों की कमी में सरकार का शक के दायरे में आता रोल है. यह रोना अब जज साहबान भी खुलेआम रोने लगे हैं लेकिन सरकार की मंशा यह है कि लोग हैरान परेशान अदालतों के चक्कर काटते रहें और दोष हमे नहीं बल्कि भाग्य को दें. और उसे भी सुधारने के लिए मंदिरों में पंडेपुजारियों के चक्कर काटते रहें. भगवान के ये दलाल वादी और प्रतिवादी दोनों की गुहार उपर तक पहुंचाने का माद्दा रखते हैं और कई बार वकील से भी ज्यादा फीस ले कर अपने लेवल पर ही अनुष्ठान वगैरह करवा देते हैं. तंत्र, मंत्र, ज्योतिष, रत्न और दीगर दर्जनों उपाय तो ये लोग थोक में देते हैं.

वकील, जज और जनता जब सब मानते हैं कि जजों की कमी सारे फसाद की जड़ है तो वे सब मिल कर सरकार पर दबाब क्यों नहीं बनाते. खास तौर से वकील और जज एक इस मुद्दे पर हो जाएं तो सरकार को झुकना तो पड़ेगा. लेकिन ये दोनों एक कभी नहीं हुए जिस से लगता है कि कहीं यह उन की ही अघोषित मिलीभगत तो नहीं कि जनता को फुसलाने के लिए सरकार को दोष देते रहो जिस से अपनी दुकानें यथावत चलती रहेंगी. वकील को हर पेशी पर पैसा मिलता रहेगा और जजों की पूछ परख और रुतबा दोनों बने रहेंगे.

क्योंकि यह मुद्दा ही नहीं

कभी किसी ने नहीं सुना कि देरी से न्याय मिलने पर जनता ने किसी किस्म का विरोध अदालत जा कर या बाहर ही जताया हो. यही जनता अस्पताल में इलाज न मिलने पर या डाक्टर की लापरवाही से परिजन के मर जाने पर तोड़फोड़ और चक्काजाम भी करती है और डाक्टर की कुटाई भी कर देती है. ऐसा या कैसा भी विरोध वह हर सरकारी दफ्तर में करती है लेकिन अदालत में नहीं कर पाती क्योंकि न्याय विकल्पहीन है. आप इंसाफ के लिए कहीं और नहीं जा सकते और अदालत में गुस्से में कोई वकील यह बात कहे तो यह अवमानना हो जाती है.

इस के बाद भी लोग मानते हैं कि देरी से ही सही इंसाफ तो मिलता है यानी अदालतों पर लोग भरोसा करते हैं. क्योंकि उन में विकट का अनुशासन है और दूसरे सरकारी दफ्तरों जैसा भ्रष्टाचार व भेदभाव नहीं है. खामी है तो बस इतनी कि न्याय के नाम पर तमाशा होता रहता है. तो जनता को यह भी समझना चाहिए कि इस तमाशे की असल जिम्मेदार सरकार है जज और वकील नहीं जो एकदूसरे को दोष दिया करते हैं.

चुनाव के वक्त तमाम दलों के नेता जनता को लुभाने तरह तरह के लालीपाप देते हैं. मसलन हम बिजली, पानी, सड़क देंगे. इलाज के लिए अस्पताल खोलेंगे या वार्ड बढ़ाएंगे, बच्चे अच्छे से पढ़ सकें इस के लिए अध्यापक और स्कूल बढ़ाएंगे. लेकिन कोई राजनैतिक दल कभी यह कहते नहीं सुना गया कि आप को वक्त पर न्याय मिल सके इस के लिए हम अदालतों और जजों की संख्या बढ़ाएंगे. अगर एक बार जनता जागरूक हो जाए तो ये लोग जजों और अदालतों को भी बढ़ाने का वादा और दावा करेंगे और सत्ता हासिल करने के बाद उसे पूरा करने भी बाध्य होंगे.

साफ दिख रहा है कि जजों की कमी की समस्या जब तक चुनावी मुद्दा नहीं बनेगी तब तक कुछ नहीं होने वाला. सत्ता में रहते न कांग्रेस ने इस पर गौर किया न सत्ता पर काबिज भाजपा कुछ कर रही क्योंकि जनता ने कभी मांग ही नहीं की, सार्वजनिक धरने प्रदर्शन नहीं किए, जाम नहीं लगाया. अब बारी जनता की है कि वह राजनैतिक दलों पर इस बाबत दबाब बनाए नहीं तो सालोंसाल अदालतों के चक्कर काटते तमाशबीन बनी रहे.

यह कहते हैं आंकड़े

आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि वाकई में अदालतों में जजों की उल्लेखनीय कमी है. देश भर की छोटीबड़ी अदालतों में लगभग 5 करोड़ मुकदमे लंबित हैं. अब यह मान लिया जाए कि वादी और प्रतिवादी दोनों को मिला कर औसतन 5 लोग भी एक मुकदमे से जुड़े रहते हैं या इन से प्रभावित होते हैं तो प्रभावितों की संख्या 25 करोड़ होती है. यह छोटामोटा आंकड़ा नहीं है लेकिन कई कारणों से इस की तरफ किसी का खासतौर पर सरकार का ध्यान नहीं जाता.

साल 1987 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जजों की कमी की दो वजहें हैं एक तकनीकी और दूसरी राजनीतिक. राजनैतिक कारणों के तहत ब्रिटिश हुकुमत के वक्त से ही जानबूझ कर भारतीय न्यायपालिका में कम जज और स्टाफ रखे गए. आजादी के बाद भी इस औपनिवेशिक स्थिति को जारी रखा गया.

इस रिपोर्ट में कही ये बातें आज भी मौजू हैं कि राजनैतिक कारणों में केवल भारत सरकार या राज्य सरकारों ने ही नहीं बल्कि राजनातिक दलों, मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बार एसोशियन ने भी इस समस्या की तरफ ध्यान नहीं दिया. तकनीकी कारणों के तहत न्यायिक प्रशासन देखने वाले नीतिनिर्माताओं श्रम शक्ति के नियोजन के वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने के बजाय पेंच वर्क और एडहौक जैसे अव्यवस्थित सुझाव दिए.

नतीजा आज हम सब के सामने है. यह रिपोर्ट कहां धूल खा रही होगी पता नहीं लेकिन 37 साल बाद भी हालात ज्यों के त्यों हैं बल्कि और खराब हो चले हैं. अदालतों में चल रहे 5 करोड़ मुकदमों को निबटाने महज 20 हजार जज देश भर में है. उन से निबटान की अपेक्षा रखना उन के साथ ज्यादती ही होगी. संसद के मानसूत्र सत्र में कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल ने बताया था कि सुप्रीम कोर्ट में 84 हजार मामले लंबित हैं वहां जजों की कुल संख्या महज 34 है. उच्च न्यायालयों में 60 लाख से भी ज्यादा मुकदमे हैं जो केवल 737 जजों के जिम्मे हैं. निचली अदालतों में सब से ज्यादा साढ़े 4 करोड़ से भी ज्यादा मुकदमे हैं जो 20011 जजों के हवाले हैं.

नैशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के मुताबिक हाईकोर्ट में प्रति जज पर जुलाई 2024 तक 7879 मुकदमे लंबित हैं तो निचली अदालतों में प्रति जज 2268 मुकदमे लंबित हैं. सुप्रीम कोर्ट में 34 जजों पर 84 हजार मुकदमे लंबित हैं.

जजों के खाली पदों पर नजर डालें तो स्थिति और स्पष्ट हो जाती है उच्च न्यायालयों में 357 जजों के पद खाली हैं. निचली अदालतों में जजों के 22 फीसदी पद खाली हैं. केवल सुप्रीम कोर्ट में ही सभी पद भरे हुए हैं.

इस स्थिति को आबादी के आईने में देखें तो ला कमीशन औफ इंडिया के मुताबिक प्रति 10 लाख लोगों पर 30 जज होने चाहिए जबकि आज 1987 के 10.5 जजों के मुकाबले 21 जज तो हैं लेकिन इस में भी खामी यह है कि यह आंकड़ा 2011 की आबादी के लिहाज से है आज की आबादी के लिहाज से नहीं. जिस की गिनती ही सरकार नहीं करवा पा रही. इस रिपोर्ट को पेश हुए 40 साल होने को आ रहे हैं, इस दौरान देश में 13 बार प्रधानमंत्री बदले जा चुके हैं और 31 बार मुख्य न्यायाधीश बदले जा चुके हैं.

दूसरे देशों से तुलना करें तो हम इस मामले में भी बहुत पीछे खड़े हैं. सब से ज्यादा आबादी वाले देश चीन में प्रति 10 लाख नागरिकों पर 300 जज उपलब्ध हैं. अमेरिका में इतनी ही आबादी पर 150 जज हैं. इंटरनैशनल जर्नल फोर कोर्ट एडमिनिस्ट्रशन के मुताबिक क्रोएशिया और स्लोवेनिया में यही संख्या 400 से ज्यादा है. हंगरी और आस्ट्रेलिया में आंकड़ा 280 है.

जाहिर है सरकार की अनदेखी की सजा जनता भुगत रही है. जानकर हैरानी होती है कि सिवाय दिल्ली के कोई भी राज्य अपने बजट का एक फीसदी भी न्यायपालिका पर खर्च नहीं करता. इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2022 की रिपोर्ट बताती है कि देश में न्यायपालिका पर औसत खर्च 1 रूपए 46 पैसे मात्र है तो ऐसे में कोई क्या कर लेगा.

BJP : 75 साल के बाद क्या संन्यास लेंगे नरेंद्र मोदी ?

BJP : हिंदू धर्म के आश्रम सिद्वांत मानते हैं कि 75 साल के बाद संन्यास आश्रम शुरू हो जाता है. इस के बाद मोक्ष की दिशा में जाना चाहिए. पौराणिक कथाएं बताती हैं कि दशरथ ने जिंदा रहते हुए अपना राजपाट राम को सौंपने का फैसला कर लिया था. सवाल यह है कि नरेंद्र मोदी क्या करेंगे ?

2024 लोकसभा चुनावों के दौरान आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिटायरमैंट को ले कर कहा था कि नरेंद्र मोदी 15 सिंतम्बर 2025 को 75 साल के पूरे हो जाएंगे. भाजपा की रिटायरमैंट पौलसी के तहत वह रिटायरमैंट लेंगे. इस के बाद वह अमित शाह को प्रधानमंत्री बना देगें. अरविंद केजरीवाल इस के जरिए भाजपा के वोटर को भ्रम में डालना चाहते थे जिस से वह पीएम मोदी के नाम पर वोट न दें. अरविंद केजरीवाल ने वोटर से कहा कि मोदी का वोट दे कर क्या लाभ वह तो 2025 में रिटायर हो जाने वाले हैं.

दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 400 पार का नारा दिया था. जबकि वह 240 सीटे ही ला सकी थी ऐसे में राजनीतिक हलको को यह उम्मीद थी कि अब भाजपा के भीतर मोदी बनाम योगी, योगी बनाम अमित शाह, संघ बनाम भाजपा जैसे कई खेमेबंदी दिखने लगेगी. तब पार्टी मे भीतरघात का लाभ विपक्ष को होगा जैसे 2004 में हुआ था. जैसे विधानसभा चुनाव के नतीजे आए विपक्ष वापस नरेंद्र मोदी के रिटायरमैंट को मुद्दा बनाने लगा.

क्या है 75 साल में रिटायरमैंट की कहानी

75 पर रिटायरमैंट की बात नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कही थी जब भाजपा में प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी को ले कर सवाल उठ रहे थे. भाजपा नेता अमित शाह ने कहा कि 75 साल के बाद कोई प्रधानमंत्री नहीं बन सकता भाजपा में ऐसा कोई कानून नहीं है’.

भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी 2009 से पीएम पद की रेस में थे. उन को ‘पीएम इन वेटिंग’ कहा जा रहा था. इस के पीछे की वजह यह थी कि 1999 में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार बनी तो अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री बने थे. भाजपा में उस दौरान ‘अटल-आडवाणी और जोशी’ की तिकड़ी का राज चलता था. अटल के प्रधानमंत्री बनने के बाद आडवाणी खेमा विद्रोही मुद्रा में रहता था.

संतुलन बनाने के लिए आडवाणी को डिप्टी पीएम बना दिया गया था. तभी से आडवाणी को ‘पीएम इन वेटिंग’ कहा जा रहा है. इस का मतलब यह था कि जैसे ही अटल हटेंगे आडवाणी प्रधानमंत्री बन जाएंगे. इस लड़ाई के चलते ही अटल सरकार ने 2004 मे समय से पहले ही लोकसभा के चुनाव करा दिए थे.

अटल बिहारी वाजपेई को इंडिया शाइंनिंग का भ्रम दिखाया गया. अटल खेमे को लग रहा था कि समय से पहले चुनाव होने का लाभ मिलेगा और अटल सरकार बहुमत के साथ चुनाव जीत जाएगी. तब वह किसी दबाव में नहीं रहेगी. ऐसे में आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने का सपना धरा का धरा रह जाएगा. प्रधानमंत्री पद को ले कर भाजपा में खींचतान थी.

2004 के लोकसभा चुनाव के नतीजे भाजपा के खिलाफ गए. पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा. जिस से कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए को सरकार बनाने का मौका मिल गया. डाक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमत्री बने. 2004 में भी आडवाणी ‘पीएम इन वेटिंग’ रहें. 2009 लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस की जीत हुई. लगातार 2 लोकसभा चुनाव में ‘पीएम इन वेटिंग’ रहने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए भी आडवाणी ‘पीएम इन वेटिंग’ मान रहे थे.

ऐसे में भाजपा ने उनके इस भ्रम को दूर करने के लिए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया. तब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे. 2014 का चुनाव भाजपा की नई टीम बिना किसी विवाद के लड़ सके इस के लिए लालकृष्ण आडवाणी सहित बुजुर्ग हो चले नेताओं को दरकिनार कर के ‘मार्गदर्शक मंडल का सदस्य’ बना दिया गया था. उस समय नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 75 साल की उम्र के नेताओं को रिटायरमैंट के बारें में सोचना चाहिए.

रिटायरमैंट के बहाने मोदी को घेरने की तैयारी

तब विपक्षी नेता नरेंद्र मोदी की कही बात को ही हथियार बना कर उन के सामने सवाल खड़े कर रहे हैं. अरविंद केजरीवाल ने 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार में यह बात कही. लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें घट कर 240 रह गई. उस ने 400 पार का नारा दिया था. विपक्ष को लगा कि नरेंद्र मोदी कीक ताकत घट गई है. ऐसे में भाजपा के भीतर ‘अटल-आडवाणी’ के समय वाला विवाद शुरू हो सकता है.

3-4 माह तक भाजपा और खुद नरेंद्र मोदी खुद कमजोर दिखने लगे थे. चुनावी हार किसी तरह से चेहरे का रंग उतार देती है यह उस समय की भाजपा को देख कर समझा जा सकता है. मोदी ही नहीं भाजपा के फायर ब्रांड नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उतरा हुआ चेहरा दिखाई टीवी पर बार बार दिखाई पड़ता था. विपक्ष इस बात से खुश था कि 10 साल में नेता प्रतिपक्ष का पद राहुल गांधी को मिला है. भाजपा अपने बल पर सरकार नहीं बना पाई. समाजवादी पार्टी तीसरे नम्बर की पार्टी बनी. संविधान और आरक्षण का मुद्दा जीत का हथियार बन गया. 4 जून 2024 को दूसरी आजादी माना जाने लगा. विपक्ष को लग गया कि अब मोदी रिटरयरमैंट ले या न ले उनकी हार तय है.

विपक्ष का बढ़ा हुआ आत्मविश्वास तब टूट गया जब हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में भाजपा जीत गई. विपक्ष खासकर कांग्रेस की हार ने इंडिया ब्लौक के उत्साह को तोड़ दिया. ऐसे में विपक्ष अब नरेंद्र मोदी से खुद यह चाहने लगा है कि वह पद अपने पद से हट जाए. जिस से भाजपा का हराया जा सके. प्रधानमंत्री रहते 11 साल के बाद नरेंद्र मोदी जब नागपुर स्थित संघ मुख्यालय गए तो विपक्ष ने कहा कि नरेंद्र मोदी अपने रिटायरमैंट प्लान को अंजाम पहुंचाने नागपुर गए थे.

संजय राउत ने उठाए सवाल

शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा ‘प्रधानमंत्री मोदी नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय इसलिए पहुंचे थे ताकि वे संदेश दे सकें कि वह सेवानिवृत्त हो रहे हैं. आरएसएस देश के राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव चाहता है. मोदी संभवत सितंबर में अपना सेवानिवृत्ति आवेदन लिखने के लिए आरएसएस मुख्यालय गए होंगे.’ महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस को उम्मीद थी कि उन की जीत होगी. यहां जीत भाजपा को मिली. चुनाव के बाद देवेन्द्र फडनवीस मुख्यमंत्री बने.

संजय राउत का जवाब देते महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने कहा ‘प्रधानमंत्री मोदी साल 2029 में चौथी बार प्रधानमंत्री बनेंगे. नेता के सक्रिय रहते उत्तराधिकार पर चर्चा करना भारतीय संस्कृति में अनुचित माना जाता है. अभी इस पर चर्चा का समय भी नहीं आया है. वे कई वर्षों तक देश का नेतृत्व करते रहेंगे. हमारी संस्कृति में जब पिता जीवित हो तो उत्तराधिकार के बारे में बात करना अनुचित है. यह मुगल संस्कृति है जहां पिता के रहते बेटा उत्तराधिकारी बन जाता है.’

यह बात अपनी जगह ठीक हो सकती है कि भाजपा में 75 साल के बाद नेता के रिटायरमैंट को ले कर कोई कानून नहीं है. राजनीति में नेता से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी राजनीतिक सुचिता का पालन करें. कांग्रेस प्रवक्ता आकाश जाधव ने कहा कि ‘ये 75 साल की उम्र में रिटायरमैंट की बात खुद पीएम मोदी ने ही की थी. एलके आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को जबरदस्ती रिटायर कर दिया गया. यह एक मर्यादा है. पीएम मोदी पद पर रहें न रहें, यह उन का विषय है. कांग्रेस का इस में क्या लेनादेना. मोदी को अपनी कही बात पर कायम रहना चाहिए.’

भाजपा का पक्ष है कि पार्टी में कहीं भी यह लिखित नियम नहीं है कि इस उम्र के बाद पद पर कोई नहीं रह सकता. 2034 तक पीएम मोदी कहीं नहीं जाने वाले. कोई नेतृत्व परिवर्तन नहीं होगा. भाजपा से अलग राजनीतिक जानकार यह मानते हैं कि 2029 के लोकसभा चुनाव के नतीजे यह तय करेंगे कि क्या होगा ? 2027 में 12 राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं इस के पहले राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति का चुनाव है. ऐसे में 2027 से 29 के दो साल काफी अहम रहने वाले हैं. कई फैसले इस को देख कर होंगे.

संन्यास आश्रम को बदल गया समय

नरेंद्र मोदी से रिटायरमैंट की अपेक्षा इस कारण भी की जा रही है क्योंकि वह अपनी बात को जीवन में उतार कर दिखाने वाले नेता हैं दूसरे पौराणिक कथाओं और हिंदू धर्म पर उन का पूरा भरोसा है. उस के अनुसार ही अपनी दिनचर्या को रखते हैं. पौराणिक कथाओं में हिंदू धर्म में जीवन के 4 प्रमुख भाग ब्रह्मचर्य, ग्रृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम बताए गए हैं. प्रत्येक आश्रम 25 वर्षं का होता है. ब्रह्मचर्य आश्रम जन्म से 25 वर्ष तक शिक्षा का समय होता है. गृहस्थ आश्रम 25 से 50 वर्ष तक होता है जिस में सामाजिक विकास हेतु धर्म, अर्थ, काम को प्राप्त करने का समय होता है. वानप्रस्थ आश्रम 50 से 75 वर्ष तक होता है जिस में आध्यात्मिक उत्कर्ष हेतु काम करना चाहिए इस के बाद संन्यास आश्रम 75 से 100 वर्ष तक होता है. जिस में मोक्ष प्राप्त करना होता है.

भारतीय जनता पार्टी के नेता, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चैहान ने अपने बेटों की शादी करने के बाद कहा ‘आज से वह गृहस्थ से वानप्रस्थी हो रहे है. अब वह अपना पूरा समय किसानों की सेवा में देंगे.’ शिवराज सिंह की उम्र 66 साल है. जब भाजपा के एक नेता हिंदू धर्म के आश्रम सिद्वांत को मान रहे हैं तो नरेंद्र मोदी को भी इस को मानना ही चाहिए. ऐेसे में नरेंद्र मोदी के उपर दबाव बढ़ गया है.

वैसे आज समाज में लोगों के रिटायरमैंट की उम्र तय है. नौकरियों में 58 साल से ले कर 62 साल तक के अलगअलग नियम है. आज जीवन की लाइन बढ़ रही है. लोग 80-85 साल तक सक्रिय जीवन में रहते हैं. वह भी संन्यास लेने को तैयार नहीं होते हैं. बहुत सारे घरों में इस बात के झगड़े होते हैं. नरेंद्र मोदी के रिटायरमैंट को ले कर जो बात महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने कही कि पिता के रहते उत्तराधिकार नहीं होता. संविधान और कानून भी इस बात को मानता है. घरों में जमीन जायदाद तबतक पुत्र के नाम कर हस्थांतरित नहीं होती जब तक पिता जीवित रहता है. तमाम कारोबारी घरानों को भी देखें तो जब तक पिता सक्रिय होता है पुत्र को पूरा अधिकार नहीं होता है.

पौराणिक कथाओं में राजा अपने जीवित रहते पुत्र का राजपाट सौंप देता था. रामायण में इस बात का जिक्र है कि जब राजा दशरथ जीवित थे. पूरी तरह से सक्षम थे उसी समय उन्होने अपने बेटे राम को राजपाट सौंपने का फैसला कर लिया था. क्योंकि राजपाट चलाने के लिए जिस ताकत और उर्जा की जरूरत होती है वह युवा में ही होती है.

सामान्य घर और बिजनैस में संन्यास लेने की उम्र भले ही न रखी जाए लेकिन जहां मसला राजपाट का होता है वहां तो यह नियम मानने ही चाहिए. कई बार नेता पद के मोह में उम्र की बात का टाल जाते हैं. जिस का खामियाजा जनता को चुकाना पड़ता है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस का उदाहरण हैं. उन की आलोचना होने लगी है. विरोधी कहते हैं कि वह बात करतेकरते भूल जाते हैं. राजनीति, बिजनैस और घर अलगअलग मसले हैं. रिटायरमैंट के नियम भी एक से नहीं हो सकते. राजा को अपने जीवन काल में ही राजपाट की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए जिस से राज्य का सही विकास हो सके. ऐसे में नेताओे को रिटायरमैंट का नियम पालन करना चाहिए.

Hindi Kavita : शुरुआत

Hindi Kavita : “चलो करें फिर से एक आज नई शुरुआत,
तोड़ दें हर बंधन, खोल दे मन के सारे द्वार,
स्वछंद हो मन -आँगन, पँख पसार दूर तलक फैले आसमान में,
कर खुद को मुक्त,
आज जो मन हो कर लेते हैं, जी भर कर जी ही लेते हैं। कितने बंधन लादे खुद पर।
सारा जीवन जीते रहे घुट -घुट कर।
पंछियों की उड़ान देखी,
जी किया इसी तरह उडूं विस्तृत नभ में,
खुद को हमने बाँध लिया क्यों जीवन -समर में
किन्तु कुछ कर न सके पँख ही कतरे गए,
अच्छा जो बीत गई वह गई बात,
चलो फिर से करें आज एक नई शुरुआत

लेखिका : निमिषा वर्मा, समस्तीपुर, बिहार

Online Hindi Story : गांव द्रौपदी का – भूपेंद्र की छुट्टी क्यों मंजूर हुई

Online Hindi Story : ‘‘मैं क्या अंदर आ सकता हूं सर?’’

‘‘हांहां, क्या बात है भूपेंद्र?’’

‘‘यह छुट्टी की अर्जी है सर. मुझे 20 दिन की छुट्टी चाहिए.’’

‘‘20 दिन की छुट्टी क्यों चाहिए? अभी तो तुम ने नईनई नौकरी जौइन की है और अभी छुट्टी चाहिए.’’

‘‘हां सर, पता है. पर मुझे शादी में जाना है.’’

‘‘किस की शादी है?’’

‘‘मेरी शादी है, मतलब हमारी.’’

‘‘हमारी मतलब किसी और की भी शादी हो रही है क्या?’’

‘‘मेरे साथ मेरे भाई की भी शादी हो रही है.’’

‘‘अच्छा, साथ में ही होगी?’’

‘‘जी सर.’’

‘‘कब है शादी?’’

‘‘अगले महीने की 10 तारीख को.’’

‘‘ठीक है, देखते हैं.’’

अगले दिन सर ने भूपेंद्र को बुलाया और कहा, ‘‘भूपेंद्र, तुम्हारी छुट्टी मंजूर हो गई है.’’

‘‘शुक्रिया सर.’’

‘‘तुम्हारे पापा क्या करते हैं?’’

‘‘बड़े पापा घर पर रह कर ही सब की देखभाल करते हैं. दूसरे पापा और तीसरे पापा शहर में रह कर नौकरी करते हैं.’’

‘‘तुम लोग चाचाताऊ को भी पापा ही बुलाते हो?’’

‘‘नहीं, सब मेरे पापा ही हैं.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘मेरी मां की तीनों से शादी हुई है.’’

‘‘यह क्या बात हुई?’’

‘‘मेरे गांव में ऐसा ही होता है.’’

‘‘मतलब, तुम्हारी और तुम्हारे भाई की शादी एक ही लड़की से हो रही है क्या?’’

‘‘जी.’’

भूपेंद्र की यह बात सुन कर उस का मैनेजर प्रशांत हैरान रह गया. उस ने पूछा, ‘‘कहां है तुम्हारा गांव?’’ ‘‘दिल्ली से 4 सौ किलोमीटर दूर देहरादून में पांच नाम का एक गांव है. वहीं मेरा घर है. जमीन भी है, जिसे मेरे बड़े पापा दिलीप संभालते हैं,’’ भूपेंद्र ने बताया. प्रशांत ने ज्यादा पूछना ठीक नहीं समझा, पर उस की जानने की जिज्ञासा और बढ़ गई.

‘‘भूपेंद्र, क्या हम को अपनी शादी में नहीं बुलाओगे?’’

‘‘आप आएंगे?’’

‘‘हम जरूर आएंगे. तुम बुलाओगे, तो क्यों नहीं आएंगे.’’ फिर भूपेंद्र ने बड़े प्यार से प्रशांत को शादी का कार्ड दिया. प्रशांत को देशदुनिया घूमना, हर सभ्यता को जानना अच्छा लगता है. अगर वह नौकरी नहीं करता, तो जरूर रिपोर्टर बनता. प्रशांत और उस का स्टाफ जब भूपेंद्र के घर जाने लगा, तो बड़ी परेशानी हुई. रास्ता बड़ा ही ऊबड़खाबड़, मुश्किलों से भरा था, पर खूबसूरत और रोमांच से भरपूर था. आखिर क्या वजह है कि यह प्रथा आज भी चली आ रही है? क्या होता होगा? कैसे निभती होगी ऐसी शादी? यह सब जानने के लिए वे सब उतावले हुए जा रहे थे, पर उन्हें डर भी लग रहा था कि कहीं वे लोग बुरा न मान जाएं. गांव में बड़ी चहलपहल थी. एक प्यारी सी लड़की चायनाश्ता ले कर आई.

‘‘सर, यह मेरी बहन नंदिनी है.’’

‘‘जीती रहो,’’ प्रशांत ने नंदिनी से कहा. बगल के ही गांव में शादी थी, इसीलिए सुबह 11 बजे बरात चल पड़ी. प्रशांत का मन रोमांचित हो रहा था. भूपेंद्र और उस का छोटा भाई बलबीर दोनों ही दूल्हे की पोशाक में जंच रहे थे. शादी के सब रीतिरिवाज, मंडप, उस की सजावट, गानाबजाना हमारे जैसा ही था. शादी शुरू हो गई. पंडितजी मंत्र बोलने के साथ शादी कराने लगे. जब फेरों की बारी आई, तो एक ही दूल्हे के साथ फेरे पड़े. पूछने पर पंडितजी बोले कि फेरे तो किसी एक के साथ ही होंगे, शादी  अपनेआप सब के साथ हो जाएगी. बहुत ही कम समय में शादी हो गई. भूपेंद्र हमें अपनी पत्नी से मिलवाने ले गया. प्रशांत जो उपहार लाया था, लड़की के हाथ में दिया. वह बड़ी खुश थी. उसे देख कर यह नहीं लग रहा था कि वह 2 भाइयों से शादी कर के दुखी है. प्रशांत ने सोचा कि भूपेंद्र के बड़े पापा दिलीप से कुछ बात की जाए.

‘‘किसी बात की कोई तकलीफ तो नहीं हुई?’’ भूपेंद्र के बड़े पापा ने पूछा.

‘‘नहींनहीं, आप सब से मिल कर बड़ा अच्छा लगा. क्या मैं इस शादी के बारे में आप से कुछ पूछ सकता हूं?’’ प्रशांत ने कहा.

‘‘जी जरूर.’’

‘‘क्या वजह है कि एक ही लड़की से सब भाइयों की शादी हो जाती है?’’

‘‘ऐसा है सर कि हमें नहीं पता कि यह प्रथा क्यों और कब से चल रही है, पर मेरी दादी, मेरी मां सब की ऐसी ही शादी हुई हैं. हम 3 भाइयों की भी शादी एक ही लड़की से हुई है.’’

‘‘मान लीजिए कि छोटे भाई की उम्र लड़की से बहुत कम है, तो…?’’

‘‘तो वह अपनी पसंद की लड़की से शादी कर सकता है.’’

‘‘अच्छा. ऐसी शादी निभाने में आप सभी को मुश्किलें तो बहुत आती होंगी?’’

‘‘नहीं जी, कोई मुश्किल नहीं आती, बल्कि जिंदगी और अच्छी तरह से चलती है.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘हमारे यहां जमीन बहुत कम होती है. अलगअलग लड़की से शादी होगी, तो जमीन, घर का बंटवारा हो जाएगा, बच्चे भी ज्यादा होंगे. ‘‘दूसरी बात यह कि बारिश के मौसम में यहां पहाड़ों पर कोई काम नहीं होता है, तो बाहर जा कर कमाना जरूरी हो जाता है, फिर घर में भी तो कोई चाहिए देखभाल करने के लिए. 4 भाई कमाएं और खर्च एक ही जगह हो, तो पैसे की भी बचत होती है.’’

‘‘दिलीपजी, एक पर्सनल बात पूछ सकता हूं?’’ प्रशांत बोला.

‘‘जी, जरूर.’’

‘‘सभी भाई पत्नी के साथ संबंध कैसे बनाते हैं?’’

‘‘जब जिस का मन होता है, कमरे में चला जाता है.’’

‘‘अगर कभी सब का एकसाथ मन हो गया तो…?’’

‘‘तो सभी साथ में चले जाते हैं, कमरे में, आखिर पत्नी तो हम सब की ही है.’’ प्रशांत यह सुन कर हैरान था. वह सोचने लगा कि पत्नी पर क्या गुजरती होगी?

‘‘आप कहें, तो क्या मैं आप की पत्नी से मिल सकता हूं?’’ प्रशांत ने पूछा.

‘‘जी जरूर. ये हैं हमारी पत्नी सुनंदा.’’

‘‘नमस्ते सुनंदाजी.’’

‘‘नमस्ते,’’ उन्होंने कहा. वे घूंघट में थीं, पर चेहरा दिख रहा था.

‘‘कैसी हैं आप?’’

‘‘अच्छी हूं,’’ वे हंसते हुए बोलीं.

‘‘अब बहू आ गई है, तो आप को आराम हो जाएगा.’’

‘‘जी सरजी,’’ वे बहुत ही कम शब्दों में जवाब दे रही थीं.

‘‘आप से कुछ पूछूं सुनंदाजी?’’

उन्होंने ‘हां’ में सिर हिला दिया.

‘‘जब आप की शादी हुई थी, तब आप की उम्र क्या थी?’’

‘‘17 साल.’’

‘‘मुश्किलें तो बहुत आई होंगी घर संभालने में?’’

‘‘बहुत आई थीं, पर अब तो सब ठीक है.’’

‘‘कभी आप को ऐसा नहीं लगता कि एक से ही शादी होती, तो अच्छा होता? कम से कम जिंदगी अच्छी तरह से गुजरती?’’

‘‘ऐसा कभी सोचा नहीं. यही सब देखती आई हूं और फिर यहां यही परंपरा है, तो सब ठीक है.’’

‘‘तीनों पतियों को संभालना, उन की हर जरूरत को पूरा करना, थक नहीं जातीं आप?’’

‘‘मैं कभी नहीं थकती. द्रौपदी भी तो 5 पतियों की पत्नी थी.’’

‘‘पर, उन की मजबूरी थी. द्रौपदी तो अर्जुन को ही ज्यादा प्यार करती थी. क्या आप भी किसी एक को ज्यादा पसंद करती हैं?’’ ‘‘मैं सब को बराबर पसंद करती हूं, सब का खयाल रखती हूं, नहीं तो पाप लगेगा.’’

प्रशांत ने कभी पढ़ा था कि यूरोप में कहींकहीं बहुपत्नी प्रथा का चलन है. तिब्बत में भी छोटेछोटे गांवों में ऐसा होता है, दक्षिण अमेरिका में भी, पर हिंदुस्तान में तो एक गांव ऐसा है, जहां आज भी हजारों द्रौपदी हैं. शास्त्रीजी, जो वहां के पुजारी थे, उन से भी जानकारी मिली. वे कहने लगे, ‘‘हम अपनी पुरानी परंपरा से खुश हैं. हम इसे बुरा नहीं मानते हैं.’’ प्रशांत को पता चला कि आज के पढ़ेलिखे लोग भी इस परंपरा को बुरा नहीं मानते हैं. आज की पीढ़ी इस मुद्दे पर बात करने से झिझक महसूस नहीं करती है. दुख हो या खुशियां आपस में बांट लेती हैं. ऐसा नहीं है कि एक ही जाति है, जो इस परंपरा को मानती है. इस गांव में सभी जाति के लोग इस प्रथा को निभाते हैं. अगर कोई लड़का इस शादी में नहीं रहना चाहे, तो वह दूसरी लड़की से शादी कर सकता है. प्रशांत ने दिलीपजी से पूछा, ‘‘आप भाइयों में कभी किसी बात को ले कर झगड़ा नहीं होता.’’

‘‘नहीं जी, ऐसा कभी नहीं होता.’’ सब से बड़ा सवाल अब भी जवाब के इंतजार में था. इस प्रथा का सब से बड़ा उदाहरण पांडवों और द्रौपदी से जुड़ा ही मिलता है. इतिहास या पुराणों में कहीं भी इस प्रथा का कोई उदाहरण नहीं मिलता है. तो सवाल यह उठता है कि दूर हिमालय में बसे लोग इस प्रथा को क्यों और कब से मान रहे हैं? प्रशांत की सोच इस परंपरा को वहां तक ले जाती है कि जोड़ीदार से शादी होने का मतलब काम करने वाले ज्यादा और खाने वाले कम, ताकि परिवार न बढ़े और बंटवारा न हो. शायद यही बात इस परंपरा को जिंदा रखे हुए है.

सवाल यह नहीं है कि यह प्रथा सही है या गलत, सवाल यह भी नहीं है कि यह प्रथा रहे या खत्म हो जाए, बल्कि इस प्रथा को मानने या रोकने का फैसला इन्हीं लोगों पर छोड़ देना चाहिए. यहां आ कर इस तरह की शादी देखना प्रशांत की जिंदगी का सब से बड़ा तजरबा रहा. सब से हंसीखुशी से मिल कर वे लोग उस गांव से विदा हो लिए. साथ में थीं कुछ मीठी और कभी न भूलने वाली यादें.

Love Story : थोड़ी सी जमीन, सारा आसमान – क्या राकेश को भुला पाई फरहा

Love Story : फरहा 5 सालों के बाद अपने शहर आ रही थी. प्लेन से बाहर निकलते ही उस ने एक लंबी सांस ली मानों बीते 5 सालों को इस एक सांस में जी लेगी. हवाईअड्डा पूरी तरह बदला दिख रहा था. बाहर निकल उस ने टैक्सी की और पुश्तैनी घर की तरफ चलने को कहा, जो हिंदपीढ़ी महल्ले में था.

5 सालों में शहर ने काफी तरक्की कर ली, यह देख फरहा खुश हो रही थी. रास्ते में कुछ मौल्स और मल्टीप्लैक्स भी दिखे. सड़कें पहले से साफ और चौड़ी दिख रही थीं. जींस और आधुनिक पाश्चात्य कपड़ों में लड़कियों को देख उसे सुखद अनुभूति होने लगी. कितना बदल गया है उस का शहर. उसे रोमांच हो आया.

रेहान सो चुका था. फरहा ने भी पीठ सीट पर टिका टांगों को थोड़ा फैला दिया. लंबी हवाईयात्रा की थकावट महसूस हो रही थी. आज सुबह ही सिडनी, आस्ट्रेलिया से वह अपने बेटे के साथ दिल्ली पहुंची थी. आना भी जरूरी था. 1 हफ्ते पहले ही अब्बू रिटायर हो कर अपने घर लौटे थे. अब सब कुछ एक नए सिरे से शुरू करना था. भले शहर अपना था पर लोग तो वही थे. इसी से फरहा कुछ दिनों के लिए अम्मांअब्बू के पास रहने चली आई थी ताकि घरगृहस्थी को नए सिरे से जमाने में उन की मदद कर सके.

तभी टैक्सी वाले ने जोर से ब्रेक लगाए तो उस की तंद्रा भंग हुई. उस ने देखा कि टैक्सी हिंदपीढ़ी महल्ले में प्रवेश कर चुकी है. बुरी तरह से टूटीफूटी सड़कों पर अब टैक्सी हिचकोले खा रही थी. उस ने खिड़की के शीशे को नीचे किया. एक अजीब सी बू टैक्सी के अंदर पसरने लगी. किसी तरह अपनी उबकाई को रोकते हुए उस ने झट से शीशा चढ़ा दिया. शहर की तरक्की ने अभी इस महल्ले को छुआ भी नहीं है. सड़कें और संकरी लग रही थीं. इन सालों में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए छोटेछोटे घरों ने भूलभुलैया बना दिया था महल्ले को. उस के अब्बा का दोमंजिला मकान अलबत्ता सब से अलग दिख रहा था.

अब्बा और अम्मां बाहर ही खड़े थे.

‘‘तुम ने अपना फोन अभी बंद कर रखा है. राकेश तब से परेशान है कि तुम पहुंची या नहीं?’’ मिलते ही अब्बू ने पहले अपने दामाद की ही बातें कीं.

अचानक महसूस हुआ कि बंद खिड़कियों की दरारों से कई जोड़ी आंखें झांकने लगी हैं.

फ्रैश हो कर फरहा आराम से हाथ में चाय का कप पकड़े घर का, महल्ले का और रिश्तेदारों का मुआयना करने लगी.

एक 22-23 साल की लड़की सलमा फुरती से सारे काम निबटा रही थी.

‘‘कैसा लग रहा है अब्बू अपने घर में आ कर? अम्मां पहले से कमजोर दिख रही हैं. पिछले साल सिडनी आई थीं तो बेहतर थीं,’’ फरहा ने पूछा.

एक लंबी सांस लेते हुए अब्बू ने कहा, ‘‘कुछ भी नहीं बदला यहां. पर हां घर में बच्चे न जाने कितने बढ़ गए हैं… लोफर कुछ ज्यादा दिखने लगे हैं गलियों में. लड़कियां आज भी उन्हीं बेडि़यों में कैद हैं, जिन में उन की मांएं या नानियां जकड़ी रही होंगी. तुम्हारी शादी की बात अलबत्ता लोग अब शायद भूल चले हैं.’’

फरहा ने कमरे में झांका. नानीनाती आपस में व्यस्त दिखे.

‘‘अब्बू, मुझे लग रहा था न जाने रिश्तेदार और महल्ले वाले आप से कैसा व्यवहार करें. मुझे फिक्र हो रही थी आप की, इसलिए मैं चली आई. अगले हफ्ते राकेश भी आ रहे हैं.’’

फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोली, ‘‘फूफी के क्या हाल हैं?’’ और फिर फरहा अब्बू के पास आ कर बैठ गई.

‘‘अब छोड़ो भी बेटा. जो बीत गई सो बात गई. जाओ आराम करो. सफर में थक गई होगी,’’ कह अब्बू उठने लगे.

फरहा जा कर अम्मां के पास लेट गई. बीच में नन्हा रेहान नींद में मुसकरा रहा था.

पर आज नींद आ रही थी. कमरे में चारों तरफ जैसे यादों के फूल और शूल उग आए हों… जहां मीठी यादें दिल को सहलाने लगीं, वहीं कड़वी यादें शूल बन नसनस को बेचैन करने लगीं…

अब्बा सरकारी नौकरी में उच्च पद पर थे. हर कुछ सालों में तबादला निश्चित था. काफी छोटी उम्र से ही फरहा को होस्टल में रख दिया गया था ताकि उस की पढ़ाई निर्बाध चले. अम्मां हमेशा बीमार रहती थीं पर अब्बूअम्मां में मुहब्बत गहरी थी. अब्बू उस वक्त पटना में तैनात थे. उन्हीं दिनों फूफी उन के पास गई थी. अब्बू का रुतबा और इज्जत देख उस के दिल पर सांप लोट गया और फिर फूफी ने शुरू किया अब्बू के दूसरे निकाह का जिक्र, अपनी किसी रिश्ते की ननद के संग. अम्मां की बीमारी का हवाला दे पूरे परिवार ने तब खूब अपनापन दिखा, रजामंदी के लिए दबाव डाला था. अब्बू ने बड़ी मुश्किल से इन जिक्रों से पिंड छुड़ाया था. भला पढ़ालिखा आदमी ऐसा सोच भी कैसे सकता है. ये सारी बातें अम्मां ने फरहा को बड़ी होने पर बताई थीं. उसे फूफी और घर वालों से नफरत हो गई थी कि कैसे वे उस के वालिद और वालिदा का घर उजाड़ने को उतारू थे.

फरहा के घर का माहौल उस के रिश्तेदारों की तुलना में बहुत भिन्न था. उस के अब्बू की सोच प्रगतिशील थी. वह अकेली संतान थी और उस के अब्बू उस के उच्च तालीम के जबरदस्त हिमायती थे. उस से छोटी उस की चचेरी और मौसेरी बहनों का निकाह उस से पहले हो गया था. जब भी कोई पारिवारिक आयोजन होता उस के निकाह के चर्चे ही केंद्र में होते. यह तो अब्बू की ही जिद थी कि उसे इंजीरियरिंग के बाद नौकरी नहीं करने दी, बल्कि मैनेजमैंट की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया.

जब वह इंजीनियरिंग के फाइनल वर्ष में था तो फूफी फिर घर आई थी. आते ही अम्मां से फरहा की बढ़ती उम्र का जिक्र शुरू कर दिया, ‘‘भाभी जान, मैं कहे देती हूं कि फरहा की उम्र इतनी हो गई है कि अब जानपहचान में उस के लायक कोई कुंआरा लड़का नहीं मिलेगा. भाईजान की तो अक्ल ही मारी गई है… भला लड़कियों को इतनी तालीम की क्या जरूरत है? असल मकसद उन की शादी है. अब देखो मेरा बेटा फीरोज कितना खूबसूरत और गोराचिट्टा है. जब से दुबई गया है खूब कमा भी रहा है… दोनों की जोड़ी खूब जमेगी.’’

बेचारी अम्मा रिश्तेदारों की बातों से पहले ही हलकान रहती थीं, फूफी की बातों ने उन के रक्तचाप को और बढ़ा दिया. वह तो अब्बूजी ने जब सुना तो फूफी को खूब खरीखटी सुनाई.

‘‘क्यों रजिया तुम ने क्या मैरिज ब्यूरो खोल रखा है… कभी मेरी तो कभी मेरी बेटी की चिंता करती रहती हो? इतनी चिंता अपने बड़े लाड़ले की की होती तो उसे 10वीं फेल हो दुबई में पैट्रोल पंप पर नौकरी नहीं करनी पड़ती. फरहा की तालीम अभी अधूरी है. मेरी प्राथमिकता उस की शादी नहीं तालीम है.’’

फूफी उस के बाद रुक नहीं पाई थी. हफ्तों रहने की सोच कर आने वाली फूफी शाम की ही बस से लौट गई.

सोचतेसोचते फरहा को कब नींद आ गई उसे पता नहीं चला.

सुबह रेहान की आवाज से उस की नींद खुली.

‘‘फरहा बाजी आप उठ गईं? चाय लाऊं?’’ मुसकराती सलमा ने पूछा.

चाय का कप पकड़े सलमा उस के पास ही बैठ गई. फरहा ने महसूस किया कि वह उसे बड़े ध्यान से देख रही है.

‘‘बाजी, अब तो आप सिंदूर लगाने लगी होंगी और बिंदिया भी? क्या आप अभी भी रोजे रखती हैं? क्या आप ने अपने नाम को भी बदल लिया है?’’

सलमा की इन बातों पर फरहा हंस पड़ी. बोली, ‘‘नहीं, मैं तो बिलकुल वैसी ही हूं जैसी थी. वही करती हूं जो बचपन से करती आ रही… तुम्हें ऐसा क्यों लगा?’’

‘‘जी, कल मैं जब काम कर लौटी तो महल्ले में सब पूछ रहे थे… आप ने काफिर से शादी की है?’’ सलमा ने मासूमियत से पूछा.

फरहा के अब्बू ने फूफी को तो लौटा दिया था. पर विवाद थमा नहीं था. आए दिन उस की तालीम बढ़ती उम्र और निकाह पर चर्चा होने लगी. धीरेधीरे अब्बू ने अपने पुश्तैनी घर आना कम कर दिया. फरहा अपनी मैनेजमैंट की पढ़ाई के लिए देश के सर्वश्रेष्ठ कालेज के लिए चुनी गई. अब्बू के चेहरे का सुकून ही उस का सब से बड़ा पारितोषिक था. कालेज में यों ही काफी कम लड़कियां थीं पर मुसलिम लड़की वह अकेली थी अपने बैच में. फरहा काफी होनहार थी. कालेज में बहुत सारी गतिविधियां होती रहती थीं और वह सब में काफी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती. सब उस के कायल थे.

इसी दौरान राकेश के साथ उसे कई प्रोजैक्ट पर काम करने को मिला. उस की बुद्धिमानी और शालीनता धीरेधीरे फरहा को आकर्षित करने लगी. संयोग से दोनों साथ ही समर इंटर्नशिप के लिए एक ही कंपनी के लिए चुने गए. नए शहर में उन 2 महीनों में दिल की बातें जबान पर आ ही गईं. दुनिया इतनी हसीं कभी न थी.

इंटर्नशिप के बाद फरहा 1 हफ्ते के लिए अब्बूअम्मां से मिलने दिल्ली चली गई. अब्बू की पोस्टिंग उस वक्त वहीं थी. अब्बू काफी खुश दिख रहे थे.

‘‘फरहा कुछ महीनों में तुम्हारी पढ़ाई पूरी हो जाएगी. मेरे मित्र रहमान अपने सुपुत्र के लिए तुम्हारा हाथ मांग रहे हैं. मुझे तो उन का बेटा और परिवार सब बहुत ही पसंद है. पर मैं ने कह रखा है कि फैसला मेरी बेटी ही लेगी.’’

उस एक पल में फरहा की नसनस में तूफान सा गुजर गया. फिर खुद को संयत करते हुए उस ने कहा, ‘‘आप जो फैसला लेंगे वह सही होगा अब्बूजी.’’

‘‘शाबाश बेटा, तुम ने मेरी लाज रख ली. सब कहते थे कि इतना पढ़लिख कर तुम भला मेरी बात क्यों मानोगी. मैं जानता था कि मेरी बेटी मुझ से अलग नहीं है. मैं कल ही रहमान को परिवार के साथ खाने पर बुलाता हूं.’’

सपना देखना अभी शुरू भी नहीं हुआ था कि नींद खुल गई. फरहा रात भर रोती रही.

बहते अश्कों ने बहुत सारे संशय सुलझा लिए. राकेश और वह नदी के 2 किनारे हैं. फरहा ने सोचा कि यह तो अच्छा हुआ कि उस ने अब्बूजी को अपनी भावनाओं के बारे में नहीं बताया. वैसे ही वे घरसमाज से लड़ मुझे उच्च तालीम दिला रहे हैं. अगर मैं ने एक हिंदू काफिर से ब्याह की बात भी की, तो शायद आने वाले वक्त में अपनी बेटीबहन को मेरी मिसाल दे उन से शिक्षा का हक भी छीना जाए. उसे सिर्फ अपने लिए नहीं सोचना चाहिए… फरहा मन को समझाने लगी.

दूसरे दिन ही रहमान साहब अपने सुपुत्र और बीबी के साथ तशरीफ ले आए. ऐसा लग रहा था मानो सिर्फ औपचारिकता ही पूरी हो रही है. सारी बातें पहले से तय थीं.

‘‘समीना, आज मुझे लग रहा है कि मैं ने फरहा के प्रति अपनी सारी जिम्मेदारियों को लगभग पूरा कर लिया है… आज मैं बेहद खुश हूं. निकाह फरहा की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही करेंगे. तभी सारे रिश्तेदारों को बताएंगे,’’ अब्बू अम्मां से कह रहे थे.

2 दिन बाद फरहा अपने कालेज अहमदाबाद लौट गई. लग रहा था राकेश मिले तो उस के कंधे पर सिर रख खूब रोए. पर राकेश सामने पड़ा तो वह भी बेहद उदास और उलझा हुआ सा दिखा. फरहा अपना गम भुला राकेश के उतरे चेहरे के लिए परेशान हो गई.

‘‘फरहा, मैं ने घर पर तुम्हारे बारे में बात की. पर तुम्हारा नाम सुनते ही घर में बवाल मच गया. मैं ने भी कह दिया है कि मैं तुम्हें छोड़ किसी और से शादी कर ही नहीं सकता.

इस बार सब से लड़ कर आया हूं,’’ राकेश ने कहा तो फरहा ने भी कहा कि उस की हालत भी बकरीद पर हलाल होने वाले बकरे से बेहतर नहीं.

वक्त गुजरा. फरहा और राकेश दोनों की नौकरी दिल्ली में ही लगी. दोनों अब तक मान चले थे कि एक हिंदू लड़का और मुसलिम लड़की की शादी मुकम्मल हो ही नहीं सकती.

फरहा के निकाह की तारीख कुछ महीनों बाद की ही थी. एक दिन फरहा अपने अब्बू और अम्मां के साथ कार से गुड़गांव की तरफ जा रही थी कि सामने से आते एक बेकाबू ट्रक ने जोर से टक्कर मार दी. तीनों को गंभीर चोटें आईं. बेहोश होने से पहले फरहा ने राकेश को फोन कर दिया था.

अब्बू और अम्मां को तो हलकी चोटें आईं पर फरहा के चेहरे पर काफी चोटें आई थीं. नाक और ठुड्डी की तो हड्डी ही टूट गई थी. पूरे चेहरे पर पट्टियां थीं.

रहमान साहब और उन का परिवार भी आया हौस्पिटल उसे देखने. सब बेहद अफसोस जाहिर कर रहे थे. उस के होने वाले शौहर ने जब सब के सामने ही डाक्टर से पूछा कि क्या फरहा पहले की तरफ ठीक हो जाएगी तो डाक्टर ने कहा कि इस की उम्मीद बहुत कम है कि वह पहले वाला चेहरा वापस पा सकेगी. हां, शरीर का बाकी हिस्सा बिलकुल स्वस्थ हो जाएगा… प्लास्टिक सर्जरी के बाद कुछ बदलावों के साथ वह एक नया चेहरा पा सकेगी, जिस में बहुत वक्त लगेगा.

वह दिन और आज का दिन रहमान परिवार फिर मिलने भी नहीं आया, अलबत्ता निकाह तोड़ने की खबर जरूर फोन पर दे दी.

दुख की घड़ी में उन का यों रिश्ता तोड़ देना बेहद पीड़ादायक था. अब्बू अम्मां उतना दुर्घटना से आहत नहीं हुए थे, जितना उन के व्यवहार से हुए. यह तो अच्छा था कि किसी रिश्तेदार को खबर नहीं हुई थी वरना और भद्द होती. फिलहाल, सवाल फरहा के ठीक होने का था. इस बीच राकेश उन का संबल बना रहा. हौस्पिटल, घर, औफिस और फरहा के अब्बू अम्मां सब को संभालता. वह उन के घर का एक सदस्य सा हो गया.

उस दिन अब्बू ने हौस्पिटल के कमरे के बाहर सुना, ‘‘फरहा प्लीज रो मत. तुम्हारी पट्टियां कल खुल जाएंगी. मैं हूं न. मैं तुम्हारे लिए जमीन आसमान एक कर दूंगा. जल्द ही तुम औफिस जाने लगोगी.’’

‘‘अब मुझ से कौन शादी करेगा?’’ यह फरहा की आवाज थी.

‘‘बंदा सालों से इंतजार कर रहा है. अब तो मां भी हार कर बोलने लगी हैं कि कुंआरा रहने से बेहतर है जिस से मन हो कर लो शादी… पट्टियां खुलने दो… एक दिन मां को ले कर आता हूं.’’

राह के कांटे धीरेधीरे दूर होते गए. राकेश के घर वाले इतनी होनहार और उच्च शिक्षित बहू पा कर निहाल थे. उस के गुणों ने उस के दुर्घटनाग्रस्त चेहरे के ऐब को ढक दिया था. पहले से तय निकाह की तारीख पर ही दोनों की कोर्ट मैरिज हुई और फिर हुआ एक भव्य रिसैप्शन समारोह, जिस में दोनों तरफ के रिश्तेदारों को बुलाया गया. दोनों ही तरफ से लोग न के ही बराबर शामिल हुए. हां, दोस्त कुलीग सब शामिल हुए. कुछ ही दिनों के बाद राकेश की कंपनी ने उसे सिडनी भेज दिया. दोनों वहीं चले गए और खूब तरक्की करने लगे.

फरहा की शादी के बाद अब्बू एक बार अपने शहर, अपने घर गए थे. महल्ले के लोगों ने उन की खूब खबर ली. कुछ बुजुर्ग लोगों ने उन्हें डांटा भी. रात में उन के घर पर पथराव भी किया. किसी तरह पुलिस बुला अब्बू और अम्मां घर से निकल पाए थे.

‘‘अब्बूजी, आप किस से बातें कर रहे थे?’’ फरहा ने पूछा.

‘‘अरे, तुम्हारी फूफी जान थी. बेचारी आती रहती है मुझ से मदद लेने. बेटे तो उस के सारे नालायक हैं. कोई जेल में तो कोई लापता. बेचारी के भूखों मरने वाले दिन आ गए हैं,’’ अब्बूजी ने कहा.

‘‘फरहा उस रात हमारे घर पर इसी ने पथराव करवाया था… अपने लायक बेटों से. हम ने तुम्हारी शादी इस के बेटे से जो नहीं कराई थी. सारे महल्ले वालों को भी इस ने ही उकसाया था. बहुत साजिश की इस ने हिंदू लड़के से तुम्हारी शादी करने के हमारे फैसले के खिलाफ,’’ अम्मा ने हंसते हुए कहा.

‘‘यह जो सलमा है न. इस वर्ष वह 10वीं कक्षा की परीक्षा दे रही है. वह भी तुम्हारी तरह तालीमयाफ्ता होने की चाहत रखती है.’’

‘‘सिर्फ मैं ही क्यों महल्ले की हर लड़की आप के जैसी बनना चाहती है,’’ यह सलमा थी, ‘‘काश, सब के अब्बू आप के अब्बू जितने समझदार होते,’’ कह सलमा फरहा के गले लग गई.

Best Hindi Story : प्यार की गंध

Best Hindi Story : रात के 9 बज चुके थे. टीवी चैनल पर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ प्रोग्राम शुरू हो चुका था. मैं जल्दी से मेज पर खाना लगा कर प्रोग्राम देखने के लिए बैठना ही चाहती थी, तभी फोन की घंटी बज उठी. आनंद प्रोग्राम छोड़ कर उठना नहीं चाहते थे, सो मुझे फोन की ओर बढ़ता देख बोले, ‘‘मेरे लिए हो तो नाम पूछ लेना, मैं बाद में फोन कर लूंगा.’’

मेरे रिसीवर उठाते ही अजनबी आवाज कानों में पड़ी. संक्षिप्त परिचय के बाद अत्यंत दुखद समाचार मिला कि आनंद की उदयपुर वाली मौसी के एकलौते जवान बेटे की ऐक्सिडैंट में मौत हो गई है. फोन सुनते ही मैं स्तब्ध रह गई.

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि यह दुखद समाचार मैं आनंद को कैसे दूं. खाना मेज पर लगा था. मैं सोच में पड़ गई कि क्या पहले खाना खा लेने दूं, फिर बताऊं? लेकिन मेरे दिलोदिमाग ने चेहरे का साथ नहीं दिया. मुझे देखते ही आनंद हैरान हो गए, बोले, ‘‘क्या हुआ? किस का फोन था?’’

आनंद के पूछते ही मैं स्वयं को रोक न सकी और भीगी आंखों से उन्हें पूरी बात बता दी. सुनते ही आनंद गुमसुम से हो गए. मैं भी परेशान हो उठी थी. टीवी प्रोग्राम में अब मन नहीं लग रहा था. उस प्रोग्राम से कई गुना बड़े सवाल हमारे मन में उठने लगे थे. प्रोग्राम में पूछे जा रहे सवालों का तो 4 में से एक सही उत्तर भी था, लेकिन मन में उठ रहे सवालों का हमारे पास कोई उत्तर न था.

बच्चे हमें देख कर सहम से गए थे. उन्हें तो जैसेतैसे खाना खिला कर सुला दिया, लेकिन हम दोनों चाह कर भी कुछ न खा पाए.

आनंद उदयपुर जाने की तैयारी करने लगे. वहां जाना तो मैं भी चाहती थी, लेकिन एक तो सुबह दफ्तर में जरूरी मीटिंग थी, जिस के कारण मेरा अचानक छुट्टी करना संभव नहीं था, दूसरे, बच्चों को कुछ दिनों के लिए कहां, किस के पास छोड़ते हमें हड़बड़ी में कुछ नहीं सूझ रहा था. सो, आनंद तुरंत ही अकेले उदयपुर के लिए रवाना हो गए.

आनंद बहुत दुखी थे. यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि मौसी से आनंद का विशेष स्नेह है. बचपन में आनंद अपनी छुट्टियां मौसी के यहां ही बिताना पसंद करते थे. मां की मृत्यु के बाद तो मौसी ने मां की ही जगह ले ली थी. मौसी के बेटे, शिव और आनंद में उम्र का भी कोई ज्यादा फर्क नहीं था. शिव आनंद का मौसेरा भाई कम, दोस्त ज्यादा था.

मौसी शादी के 10 साल बाद ही विधवा हो गई थीं. बहुत मेहनत से उन्होंने अपने एकलौते बेटे शिव की परवरिश की, उसे पैरों पर खड़ा किया था. शिव भी श्रवण कुमार से कम न था. शादी के लिए बरसों इनकार करता रहा. मां की कठिन तपस्या के बदले वह मां की आजीवन सेवा करना चाहता था. वह डरता था कि कहीं कोई झगड़ालू बहू आ कर मां का जीवन जीर्ण न बना दे.

मौसी का स्वभाव बहुत ही अच्छा है. उन की जबान से शहद और आंखों से स्नेह बरसता था. मौसी के जीवन का एक ही अरमान था कि बेटे के सिर पर सेहरा देखें और बहू घर लाएं. लेकिन शिव था कि अपनी ही जिद पर अड़ा था. मौसी के बहुत कहने और हम सब के बहुत समझने पर शिव ने शादी के लिए हामी भरी थी. उस की शादी को 2 साल भी नहीं हुए थे कि जीवनभर मां की सेवा का व्रत लेने वाला शिव, बुढ़ापे में मां को छोड़ कर चला गया था.

कुछ ही दिनों बाद मैं भी दफ्तर से छुट्टी ले कर बच्चों को साथ ले उदयपुर पहुंच गई. सफेद साड़ी में लिपटी मौसी और शिव की पत्नी भारती मुझे वेदना की प्रतिमूर्ति लगीं. मैं दोनों से गले क्या मिली कि आंसुओं की बाढ़ सी आ गई.

मौसी की गृहस्थी 2 प्राणियों में सिमट कर रह गई थी. सूनी मांग तथा सूनी गोद वाली 2 औरतें, एक के सामने पहाड़ जैसा जीवन था तो दूसरी के सामाने लाचार बुढ़ापा. घर लोगों से भरा था, लेकिन शिव के बिना बिलकुल खाली लग रहा था.

भारती के मातापिता उसे हमेशा के लिए अपने साथ ले जाना चाहते थे. एक तरह से यह ठीक भी था. मुझे लगा, उस घर से दूर रह कर भारती का जख्म जल्दी भर जाएगा और फिर उस की दूसरी शादी भी कर देनी चाहिए. किसी औरत के लिए पूरा जीवन अकेले काटना बहुत कठिन होता है. वैसे भी, जीने का कोई तो बहाना होना ही चाहिए.

अपने मातापिता के निर्णय पर भारती मुझे 2 हिस्सों में बंटी हुई लगी. वह शिव की यादों के सहारे जीना भी चाहती थी और पूरा जीवन अकेले जीने के भय से ग्रस्त भी थी.

मौसी कुछ भी नहीं कह पा रही थीं. जीने का बहाना तो उन्हें भी चाहिए था, जो अब मात्र भारती के रूप में था, लेकिन भारती के भविष्य की चिंता उन्हें चुप रहने पर भी मजबूर कर रही थी.

फिर एक शाम बहुत ही दुखी मन से हम सब ने यही फैसला लिया कि भारती का लौट जाना ही उस के भविष्य को सुरक्षित रख पाएगा. आखिर एक बूढ़े पेड़ के साए में वह पूरा जीवन कैसे काट पाएगी?

मौसी अब बिलकुल अकेली हो गई थीं. एक ओर मौसी का दुख और उन का अकेलापन मुझसेदेखा नहीं जा रहा था तो दूसरी ओर आनंद का अंदर ही अंदर टूटना मुझसे सहा नहीं जा रहा था. मेरे अंदर अजीब सी कशमकश चल रही थी.

एक शाम मैं अपनी कशमकश से उबर ही आई और मैंने अपना फैसला सुना दिया, ‘‘मौसी, आप अब यहां अकेली नहीं रहेंगी. यहां की हर चीज शिव की यादों से जुड़ी है, जो आप को जीने नहीं देगी.’’

‘‘मैं तो जीती ही रहूंगी, बहू. मेरी मौत बहुत मुश्किल है. भरी जवानी में पति छोड़ कर चले गए, मैं जीती रही. अब बुढ़ापे में बेटा छोड़ गया है तो भी…’’ कहते हुए वे फूटफूट कर रोने लगीं.

मैं भी स्वयं को रोक न सकी. बहुत देर तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा.

‘‘आप को जीना है और हमारे लिए जीना है,’’ कहते हुए मैं ने खामोशी तोड़ी.

‘‘बहू, मेरे लिए परेशान होने की जरूरत नहीं. मेरी जिंदगी में अब बचा ही क्या है.’’

‘‘मौसीजी, आप हमारे साथ चलेंगी. हमें आप की जरूरत है,’’ कहते हुए मैं मौसी के गले लग गई.

मेरी बात सुन कर आनंद ने राहत की सांस ली थी, ऐसा उन के चेहरे के हावभाव बता रहे थे. वे तुरंत बोल उठे, ‘‘मौसी, मुझमें और शिव में आप ने कभी कोई फर्क नहीं किया. मैं आप का बेटा, अभी जिंदा हूं. आप के पोतेपोती हैं, बहू है, हम सब को छोड़ कर आप यहां अकेली कैसे रहेंगी?’’

‘‘क्यों नहीं, बेटा. तुम सब मेरे अपने हो, तुम्हारे सिवा अब मेरा और है ही कौन? लेकिन बेटा, मैं दुखियारी अब बुढ़ापे में तुम पर बोझ नहीं बनना चाहती.’’

‘‘मां बोझ नहीं हुआ करती. आप हमारे साथ चलिए. हम सब मिल कर आप का दुख बांटने की कोशिश करेंगे, फिर भी अगर आप को वहां अच्छा न लगे तो लौट आइएगा. हम आप को नहीं रोकेंगे,’’ मैं ने अपनी बात रखते हुए कहा.

‘‘हां मौसी, अभी आप हमारे साथ चल रही हैं. हम आप को यहां अकेला नहीं छोड़ सकते. बाद में आप को जैसा ठीक लगेगा, हम ने आप पर छोड़ा,’’ आनंद ने भी अपना फैसला सुना दिया था.

जल्दी ही हम मौसी को साथ ले कर दिल्ली लौट आए. 2-4 दिन मौसी के साथ घर पर बिता कर मैं ने दफ्तर जाना शुरू कर दिया. कई दिनों की छुट्टी के बाद मैं दफ्तर गई तो लंचटाइम में सब सहेलियां मिलीं और कई तरह के सवाल करने लगीं. कोई मेरी छुट्टियों का कारण पूछ रही थी तो कोई शिव की मृत्यु की खबर पर दुख जता रही थी, कोई उदयपुर के बारे में जानकारी चाहती थी. तभी बातोंबातों में मैं ने बताया कि मैं मौसी को साथ ले आई हूं. अब वे हमारे साथ ही रहेंगी.

मेरी बात सुनते ही सीमा बोली, ‘‘दीपा, गई तुम भी काम से. हो गया शुरू रोज का कलह, तानोंउलाहनों का सिलसिला.’’

‘‘मौसी ऐसी नहीं हैं. वे स्वभाव की बहुत अच्छी हैं,’’ मैं ने तुरंत उत्तर दिया.

‘‘कैसी भी हों, हैं तो सास ही. देख लेना एक दिन तेरा सांस लेना दूभर कर देंगी,’’ रश्मि ने हाथ नचाते हुए कहा.

तभी सुषमा बहुत ही अपनेपन से बोली, ‘‘तुझे बैठेबिठाए क्या पड़ी थी जो यह मुसीबत गले डाल ली. अच्छीभली गृहस्थी चल रही थी, ले आई मौसी को साथ.’’

‘‘अरी, ऐसा फैसला लेने से पहले तुझे हमारी याद नहीं आई, जो वर्षों से सास के जुल्मों को सह रही हैं, तू तो फिर भी खुशहाल है जो तेरी सास नहीं है. तुझे क्या शौक चर्राया था जो मौसी सास को घर ले आई?’’ वनिता ने मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘मेरे हसबैंड अगर ऐसा कहते भी न, तो मैं अड़ जाती, कभी ऐसा न होने देती. और एक तू है मूर्ख, जो स्वयं मौसी को साथ ले आई,’’ शिखा कब चुप रहने वाली थी जो कुछ महीने पहले ही लड़झगड़ कर ससुराल से अलग हुई थी, सो वह भी बोल उठी.

मेरी बात कोई सुनने को तैयार ही नहीं थी. सब अपनीअपनी कह रही थीं. उन के विचार में वे सब अनुभवी थीं और मैं नादान, जिस ने स्वयं ही अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली थी. उन सब की बातें सुन कर मेरे मन में बहुत से प्रश्न उठ रहे थे. मैं उन्हें बहुतकुछ समझना चाहती थी, लेकिन मैं जानती थी कि उस समय उन से बहस करना फुजूल था.

शाम को मेरे घर पहुंचते ही मौसी पानी का गिलास ले आईं जो हमेशा मुझे स्वयं ही भर कर पीना पड़ता था. फिर मौसी बहुत ही अपनत्व से बोलीं, ‘‘बहू, हाथमुंह धो लो, चाय तैयार है.’’

यह सुनते ही खुशी से मेरा तनमन भीग गया. कपड़े बदल कर हाथमुंह धोए, मेज पर पहुंचते ही मैं ने देखा कि गरमागरम चायनाश्ता तैयार है.

‘‘आनंद भी आने ही वाले होंगे,’’ मैं ने यों ही कह दिया, जबकि गरमागरम चायनाश्ता देख कर मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही थी.

‘‘कोई बात नहीं, बहू. सुबह की गई अब आई हो. थकी होगी तुम, अब तुम आराम से चाय पियो, आनंद आएगा तो फिर बना दूंगी.’’

मैं चाय पी ही रही थी कि रसोईघर से कुकर की सीटी की आवाज कानों में पड़ी. पता चला मौसी ने रात के खाने की तैयारी भी शुरू कर दी थी.

‘‘मौसीजी, आप पूरा दिन काम में लगी रहीं, आप आराम किया कीजिए, यह काम तो मैं आ कर रोज करती ही थी.’’

‘‘तुम्हारी गृहस्थी है, बहू. सब तुम्हें ही करना है, मैं तो यों ही थोड़ी मदद कर रही हूं. पहाड़ जितना बड़ा दिन, खाली बैठ कर गुजारना भी तो मुश्किल होता है.’’

‘‘इन दोनों शैतानों ने आप को परेशान तो नहीं किया?’’ मौसी की अगलबगल आ कर बैठे दोनों बच्चों को देख कर मैं ने हंसते हुए कहा.

‘‘ये क्या परेशान करेंगे, बहू. वे लोग खुशहाल होते हैं जिन के घर में बच्चों की किलकारियां गूंजती हैं. इन से ही तो जीवन में रौनक है,’’ मौसी बोलीं.

शायद मैं ने अनजाने में ही मौसी की दुखती रग पर हाथ रख दिया था, लेकिन मौसी ने मुझे शर्मिंदा होने का अवसर ही नहीं दिया, वे तुरंत बोलीं, ‘‘बहू, चाहो तो जब तक आनंद आता है, थोड़ा आराम कर लो. रसोई की चिंता तुम मत करो,’’ कहते हुए वे दोनों बच्चों का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने कमरे में ले गईं.

आजकल रहरह कर मेरे कानों में अपनी सहकर्मियों की कड़वी बातें गूंजती रहती हैं, लेकिन मेरा अनुभव उन के अनुभव से मेल नहीं खाता. मैं तो आजकल दफ्तर में स्वयं को इतना हलका और तनावमुक्त अनुभव करती हूं कि बता नहीं सकती. सुबह बिना किसी भागदौड़ के दफ्तर पहुंचती हूं, क्योंकि मौसी घर पर हैं ही. बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने से ले कर नाश्ता बनाने तक वे बराबर मेरी मदद करती हैं.

अब बच्चों के लिए दोपहर का खाना बनाने की भी जरूरत नहीं रही, क्योंकि मौसी उन्हें गरमागरम खाना खिलाती हैं. अब न बच्चों का सामान क्रैच में दे कर आना पड़ता है और न ही शाम को दफ्तर के बाद उन्हें वहां से लाने की चिंता है. बच्चे दिनभर अपने घर में सुरक्षित हाथों में रहते हैं.

मुझे तो मौसी को घर लाने के अपने फैसले में कहीं कोई गलती नजर नहीं आ रही. शाम को जब घर पहुंचती हूं तो घर का दरवाजा खुला मिलता है. मुसकराते और खिलखिलाते बच्चे मिलते हैं जो दिनभर क्रैच के बंधन में नहीं, अपने घर के उन्मुक्त वातावरण में रहते हैं. दोनों बच्चे दोपहर में थोड़ा आराम करने के बाद अपनाअपना होमवर्क भी कर लेते हैं.

मौसी को देख कर मुझे लगता है, वे ऐसा घना पेड़ हैं जिस के साए में हम जिंदगी की तेज धूप से बच सकते हैं. हम सब की भी पूरी कोशिश रहती है कि मौसी अपने गम को भूली रहें.

एक शाम मैं दफ्तर से आई तो तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी. देखते ही देखते मुझे तेज बुखार हो गया. मौसी तो परेशान हो उठीं. आनंद अभी दफ्तर से नहीं लौटे थे. मौसी ने तुरंत मुझे दूध के साथ बुखार उतारने की गोली दी और पानी की पट्टियां रखनी शुरू कर दीं. आनंद को आते ही डाक्टर के पास भेज दिया. जब तक मेरा बुखार नहीं उतरा, वे मेरे पास से नहीं उठीं.

मौसी का ऐसा स्नेह देख कर मैं स्वयं को रोक न सकी, मेरी आंखें भीग गईं. मौसी के हाथ अपने हाथों में ले कर मैं ने पूछा, ‘‘आप आनंद की मौसी हैं या मेरी मां?’’

‘‘चल पगली, मैं आनंद की मौसी बाद में हूं, पहले तेरी मां हूं. बहू क्या बेटी नहीं होती? सास क्या मां नहीं होती?’’ मौसी की जबान से सदा की भांति शहद और आंखों से नेह बरस रहा था.

‘‘मां ही तो होती है,’’ कहते हुए मैं मौसी से लिपट गई.

उस पल मुझे मौसी से वैसी ही गंध आ रही थी जो मैं बचपन में अपनी मां के गले लग कर महसूस करती थी. यह यकीनन ममता, प्यार की ही गंध थी, जिसे मैं वर्षों बाद अनुभव कर रही थी.

Hindi Kahani : बेरुखी – आखिर कौन था रमेश का हत्यारा

Hindi Kahani : नरेश की लाश 2 दिनों बाद एक कुएं से बरामद हुई थी. दुर्गंध फैली थी, तब लोगों को पता चला था कि कुएं में लाश पड़ी है. उस के बाद पुलिस को सूचना दी गई थी. नरेश की पत्नी ऐश्वर्या ने उस की गुमशुदगी दर्ज करा रखी थी. नरेश शहर का जानामाना व्यवसायी था. पिता की मौत के बाद सारा कारोबार वही संभाल रहा था, जिस की वजह से वह काफी व्यस्त रहता था. वह सुबह घर से निकलता था तो रात 10 बजे से पहले लौट नहीं पाता था.

नरेश की पत्नी ऐश्वर्या को परिवार वालों ने स्वीकार नहीं किया था, इसलिए वह उसे ले कर शहर के सब से महंगे इलाके में फ्लैट ले कर अलग रह रहा था. ऐश्वर्या बेहद खूबसूरत थी. शादी के अभी एक साल ही बीते थे कि यह हादसा हो गया था. लाश बरामद होने के बाद पुलिस ऐश्वर्या से पूछताछ करने पहुंची तो पहला सवाल यही किया, ‘‘आप को किसी पर शक है?’’

‘‘नहीं.’’ सुबकते हुए ऐश्वर्या ने कहा.

‘‘याद कीजिए, आप के पति का कभी किसी से लेनदेन को ले कर विवाद तो नहीं हुआ था, जिस का उन्होंने आप से जिक्र किया हो?’’

‘‘वह व्यवसाय की बातें घर पर बिलकुल नहीं करते थे.’’

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में ऐश्वर्या ने जो बताया था, उस के अनुसार, नरेश का बनारसी साडि़यों का काफी बड़ा कारोबार था. काम की अधिकता की वजह से उन का लोगों से मिलनाजुलना कम ही हो पाता था. क्योंकि उन के पास समय ही नहीं होता था. इस फ्लैट में आए उन्हें ज्यादा दिन नहीं हुए थे. गार्ड के अनुसार, वह ठीकठाक आदमी था. नरेश के बारे में गार्ड इस से ज्यादा कुछ नहीं बता सका था. नरेश बड़ा कारोबारी था, इसलिए शहर के व्यापारी उस के कातिलों को पकड़ने के लिए पुलिस पर काफी दबाव बनाए हुए थे. बारबार आंदोलन की धमकी दे रहे थे. कातिलों तक पहुंचने के लिए पुलिस पूरा जोर लगाए हुए थी. नरेश की किसी व्यापारी से दुश्मनी तो नहीं थी, इस के लिए उस के कर्मचारियों से पूछताछ की गई. उन सब का कहना था कि रुपयोंपैसों के लिए उन्होंने अपने मालिक को कभी किसी से लड़तेझगड़ते नहीं देखा था. पुलिस के लिए हैरानी वाली बात यह थी कि घर वाले कुछ बोलने को तैयार नहीं थे. इस की वजह शायद नरेश से घर वालों की नाराजगी थी.

पुलिस ने नाराजगी की वजह पूछी तो लोगों ने बताया कि नरेश ने प्रेम विवाह किया था, इसलिए घर वाले नाराज थे. पुलिस को लगा कि इतनी सी बात के लिए कोई अपने खून का कत्ल नहीं कर सकता. इस के अलावा नरेश ऐसी बिरादरी से थे, जो शुद्ध व्यवसायी होती है. ऐसे लोगों के बारे में कत्ल की बात सोचना भी ठीक नहीं था.

पुलिस ने नरेश के सभी नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की. उन में कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला. घूमफिर कर शक की सुई ऐश्वर्या पर आ टिकी. इस प्रेम विवाह से नरेश के घर का कोई भी सदस्य खुश नहीं था. इस के बावजूद नरेश भाइयों के साथ ही व्यवसाय कर रहा था. सभी पहले की ही तरह मिलजुल कर व्यवसाय करते थे. नरेश अपनी मां से मिलने घर भी जाया करता था.

फ्लैटों में रहने वालों को वैसे भी एकदूसरे के बारे में कम ही पता होता है. अगर इलाका पौश हो तो ऐसे मामले में लोग चुप्पी साधे रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं. फ्लैट बने ऐसे होते हैं कि अंदर क्या हो रहा है, बगल वाले को भी पता नहीं चलता. लेदे कर एक गार्ड ही बचता था, जिसे पता होता था कि इमारत में कौन कब आताजाता है. इसलिए पुलिस गार्ड के पास पहुंची.

मामले की जांच कर रहे इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा, ‘‘तुम हर आनेजाने वाले का रिकौर्ड रखते हो?’’

‘‘नहीं साहब, यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. आने वाले से सिर्फ पूछ लेते हैं कि किस से मिलना है?’’ गार्ड ने सहज भाव से कहा.

‘‘पूछने के बाद उसे जाने देते हो?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा.

‘‘नहीं, पहले उस फ्लैट वाले से फोन पर पूछते हैं, जिस में उसे जाना होता है. उधर से भेजने के लिए कहा जाता है, तभी अंदर जाने देते हैं.’’

‘‘क्या, ऐश्वर्या मैडम से भी कोई मिलने आता था?’’

‘‘साहब, यहां कोई न कोई किसी न किसी से मिलने आता ही रहता है. मैं किसकिस के बारे में बता सकता हूं.’’

‘‘अगर एक से ज्यादा बार कोई मिलने आया हो, तब तो पहचान सकते हो?’’

‘‘क्यों नहीं साहब,’’ गार्ड ने कहा.

इस के बाद इंसपेक्टर शर्मा ऐश्वर्या के फ्लैट पर पुन: लौट आए. उस से एक बार फिर पूछा, ‘‘मैडम, फिर याद कीजिए, कोई तो होगा, जिस से आप के पति की दुश्मनी रही होगी?’’

‘‘एक ही बात आप लोग कितनी बार पूछेंगे. मैं ने बताया तो कि मुझे कुछ नहीं पता.’’ ऐश्वर्या थोड़ा झल्ला कर बोली. इंसपेक्टर शर्मा ने इधरउधर देखते हुए पूछा, ‘‘आप यहां अकेली ही रहती हैं?’’

‘‘क्यों?’’ ऐश्वर्या ने थोड़ा विचलित हो कर पूछा.

‘‘मेरे कहने का मतलब यह है कि संकट की इस घड़ी में कोई तो आप का करीबी होना चाहिए.’’

‘‘मेरी अम्मी आई हैं.’’

‘‘अम्मी?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, मैं उन्हें अम्मी ही कहती हूं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

इस बीच इंसपेक्टर शर्मा उस के चेहरे पर आनेजाने वाले भावों को पढ़ते रहे. उन्होंने अगला सवाल किया, ‘‘क्या मैं उन से मिल सकता हूं?’’

‘‘इस समय वह घर में नहीं हैं.’’

‘‘कहां गई हैं?’’

‘‘बाजार से कुछ जरूरी सामान लेने गई हैं.’’

‘‘कब तक लौटेंगी?’’

‘‘डेढ़-दो घंटे लग सकते हैं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, मैं फिर आऊंगा तो उन से मिल लूंगा. आप जांच में सहयोग करती रहें, निश्चय ही एक न एक दिन कातिल पकड़ा जाएगा.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने उठते हुए कहा. जैसे ही वह दरवाजे पर पहुंचे, अंदर से किसी महिला के खांसने की आवाज आई. उन्होंने पलट कर कहा, ‘‘आप तो कह रही थीं कि अंदर कोई नहीं है, फिर यह खांसा कौन?’’

‘‘मैं ने कब कहा कि अंदर कोई नहीं है. मेरी सास भी आई हुई हैं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

कुछ कहे बगैर इंसपेक्टर शर्मा बाहर आ गए. जीना उतरते हुए वह यही सोच रहे थे कि पिछली बार जब वह यहां आए थे, तब नरेश के घर वालों ने कहा था कि नरेश से सिवाय व्यवसाय के उन का कोई और संबंध नहीं है. फिर जख्म पर मरहम लगाने उस की मां यहां कैसे आ गई?

इंसपेक्टर शर्मा थाने आ कर इसी मामले पर गहराई से विचार करने लगे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐश्वर्या ने अपनी मां को अम्मी क्यों कहा? कहीं वह मुसलिम तो नहीं है? अब इस का पता कैसे चले? क्यों न नरेश के घर वालों से पूछा जाए? हो सकता है, इसी वजह से नरेश के घर वाले ऐश्वर्या को नापसंद करते रहे हों?

इस बारे में घर वालों से पूछने का निर्णय ले कर वह अन्य काम में लग गए. अगले दिन सुबहसुबह ही ऐश्वर्या का फोन आया. वह थोड़ी घबराई हुई थी. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, जल्दी आइए. मैं आप को एक जरूरी बात बताना चाहती हूं.’’

इंसपेक्टर शर्मा तुरंत ऐश्वर्या के घर पहुंच गए. उन्हें कागज का टुकड़ा देते हुए उस ने कहा, ‘‘यह देखिए, इस में क्या लिखा है?’’

इंसपेक्टर शर्मा ने उसे खोल कर देखा. उस में लिखा था, ‘10 लाख रुपए 26 फरवरी तक पहुंचा देना, वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहना.’

‘‘यह आप को कहां मिला?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा.

‘‘गद्दे के नीचे रखा था.’’

27 फरवरी को नरेश की हत्या हुई थी. जाहिर था, किसी ने पैसे मांगे थे. नरेश ने पैसे नहीं दिए तो उस ने उसे मार दिया. पैसे किसे देना था, कहां देना था, इस का पता लगाना अब मुश्किल था. क्योंकि काल डिटेल्स में ऐसा कोई नंबर नहीं मिला था, जिस पर इस तरह पैसे वसूलने का शक किया जाता. इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा, ‘‘नरेश ने आप से इस बारे में कोई चर्चा की थी?’’

‘‘नहीं.’’ ऐश्वर्या ने संक्षिप्त सा जवाब दिया.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है, आप उन की पत्नी हैं. ऐसे मामलों में पति अपनी पत्नी से जरूर जिक्र करता है.’’

‘‘हो सकता है, वह मुझे परेशान न करना चाहते रहे हों.’’

बहरहाल, इंसपेक्टर शर्मा ने उस कागज के टुकड़े को सहेज कर रख लिया. वह बाहर निकले तो उन्हें गार्ड की याद आ गई. वह गार्डरूम में पहुंचे तो वह कहीं दिखाई नहीं दिया. उस की जगह दूसरा गार्ड था. उन्होंने उस से पूछा, ‘‘यहां एक दूसरा गार्ड था, वह कहां गया?’’

‘‘सर, वह तो गांव चला गया.’’

‘‘अब वह कब तक लौट कर आएगा?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा.

‘‘साहब, यह तो यहां के चेयरमैन साहब ही बता सकते हैं.’’

‘‘उस का नामपता तो मिल सकता है?’’

‘‘साहब, मैं उस के बारे में कुछ नहीं बता सकता. मैं तो नयानया आया हूं. आप चाहें तो चेयरमैन साहब से पूछ लें.’’

संयोग से तभी चेयरमैन की कार अंदर दाखिल हुई. गार्ड ने इशारा किया तो साथ के सिपाही ने कार रोकवा ली. चेयरमैन जैसे ही कार से बाहर आए, इंसपेक्टर शर्मा ने उन के पास जा कर कहा, ‘‘मैं पुराने गार्ड के बारे में जानना चाहता हूं. उस का नामपता मिल सकता है?’’

बिना किसी हीलहुज्जत के चेयरमैन ने इंसपेक्टर शर्मा को सब बता दिया. पता चला कि गार्ड नौकरी छोड़ कर चला गया था. वह थाने लौट आए. गार्ड के इस तरह नौकरी छोड़ कर चले जाने से उन्हें लगा कि गार्ड को ऐश्वर्या के बारे में जरूर कोई जानकारी थी. गार्ड नौकरी छोड़ कर चला गया था, इसलिए अब उस से कुछ पूछने के लिए उन्हें ही उस के घर जाना था. फिर भी वह इंतजार करते रहे कि शायद वह आ ही जाए.

इस बीच वह अंधेरे में तीर चलाते रहे. एक दिन उन्होंने नरेश के बड़े भाई को बुला कर पूछा, ‘‘सुना है, आप के और नरेश के बीच रुपयों को ले कर झगड़ा हुआ था?’’

‘‘सवाल ही नहीं उठता. यह बात कहीं आप को रुखसाना ने तो नहीं बताई?’’

‘‘यह रुखसाना कौन है?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैं उस का नाम ले कर अपनी जुबान खराब नहीं करना चाहता.’’

‘‘भई, जब नाम ले ही लिया है तो बता भी दीजिए कि यह रुखसाना कौन है? हो सकता है, उसी से नरेश के कातिल तक पहुंचने का रास्ता मिल जाए.’’

कुछ सोच कर बड़े भाई ने कहा, ‘‘रुखसाना नरेश की पत्नी का नाम है.’’

‘‘आप ऐश्वर्या की बात कर रहे हैं?’’

‘‘जी हां, मैं उसी की बात कर रहा हूं.’’

नरेश के बड़े भाई के इस खुलासे से यह साफ हो गया कि रुखसाना ही ऐश्वर्या है. इंसपेक्टर शर्मा समझ गए कि इसी वजह से नरेश को अलग मकान ले कर रहना पड़ रहा था. यह तो घर वालों की शराफत थी कि उन्होंने नरेश को व्यवसाय से अलग नहीं किया था.

ऐश्वर्या की असलियत पता चलने पर इंसपेक्टर शर्मा को उसी पर शक हुआ. उन्हें पहले से ही उस पर शक था. अब उन्होंने अपनी जांच उसी पर केंद्रित कर दी. नरेश देर रात घर लौटता था. इस बीच वह किनकिन लोगों से मिलती थी, कहां जाती थी, अब यह पता लगाना जरूरी हो गया था. ये सारी जानकारियां गार्ड से ही मिल सकती थीं. लेकिन वह अभी तक आया नहीं था. इस का मतलब अब वह आने वाला नहीं था.

इंसपेक्टर शर्मा ने चेयरमैन द्वारा दिए पते पर जाने का विचार किया. वह बिहार के सीवान जिले का रहने वाला था. इंसपेक्टर शर्मा स्थानीय पुलिस की मदद से उस के घर पहुंच गए. पूछने पर उस की पत्नी ने बताया कि वह तो मुंबई चले गए हैं. इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा कि उस ने वाराणसी वाली नौकरी क्यों छोड़ दी तो उस की पत्नी ने बताया कि वहां कोई लफड़ा हो गया था, जिस से उन की जान को खतरा था.

इंसपेक्टर शर्मा चौंके. उन्हें लगा कि गार्ड को कुछ तो पता रहा ही होगा, तभी हत्यारे ने उसे चेतावनी दी होगी. हो सकता है वह खुद ही हत्या में शामिल रहा हो, इसलिए भाग गया है. फिर तो बिना देर किए उन्होंने फ्लाइट पकड़ी और सीधे मुंबई पहुंच गए. गार्ड का मुंबई का पता पत्नी से मिल ही गया था.

संयोग से गार्ड उसी पते पर मिल गया. इंसपेक्टर शर्मा को देख कर उस का चेहरा सफेद पड़ गया. उस ने कहा, ‘‘साहब, मुझे कुछ नहीं पता. मैं तो सिर्फ इसलिए भाग आया था कि एक साहब ने मुझे 50 हजार रुपए दे कर हमेशा के लिए वह नौकरी छोड़ कर चले जाने की हिदायत दी थी. न जाने पर उन्होंने जान से मारने की धमकी दी थी.’’

‘‘उस आदमी को पहचानते हो?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा तो पहले तो गार्ड हीलाहवाली करता रहा. परंतु जब इंसपेक्टर शर्मा ने उसे जेल भेजने की धमकी दी तो उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘साहब, पहले आप भरोसा दिलाइए कि मुझे कुछ नहीं होगा.’’

‘‘विश्वास करो, अगर तुम ने कुछ नहीं किया तो तुम्हें कुछ नहीं होगा.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने आश्वासन दिया.

‘‘साहब, उस आदमी का नाम सलीम है.’’

‘‘यह सलीम कौन है?’’

‘‘साहब, वह अकसर शाम को कार से आता था. पूरी रात नरेश साहब के फ्लैट में रुकता और सुबह जल्दी चला जाता था. इस बात को छिपाए रखने के लिए वह मुझे टिप भी देता था.’’

इंसपेक्टर शर्मा चौंके. नरेश से उस का क्या संबंध था, जो वह उस की मौजूदगी में भी उस के फ्लैट में पूरी रात रुकता था. लेकिन कोई आदमी भला किसी गैरमर्द को कैसे अपने फ्लैट में पूरी रात रुकने देगा? यह बात उन की समझ में नहीं आई. बस इतना ही समझ में आया कि किसी बात पर दोनों में तकरार हुई होगी, जिस की वजह से नरेश को जान गंवानी पड़ी. तकरार की वजह रुपया भी हो सकता था और ऐश्वर्या की खूबसूरती भी.

अब इंसपेक्टर शर्मा के सामने चुनौती थी सलीम का पता लगाना. वह भी इस तरह कि ऐश्वर्या को पता न लग सके. इंसपेक्टर शर्मा गार्ड को साथ ले कर वाराणसी आ गए. काफी सोचविचार कर उन्होंने एक चाल चली. वह सीधे ऐश्वर्या के फ्लैट पर पहुंचे और उसे बताया कि खूनी का पता चल गया है. एकदम से चौंक कर ऐश्वर्या ने पूछा, ‘‘कैसे, कौन है हत्यारा?’’

‘‘आप की कागज वाली बात सच निकली. मांगी गई रकम न मिलने पर नरेश के औफिस के एक कर्मचारी ने उस की हत्या की है.’’ झूठ बोल कर इंसपेक्टर शर्मा ऐश्वर्या के चेहरे पर आनेजाने वाले भावों को पढ़ने की कोशिश करते रहे. उन्होंने देखा, ऐश्वर्या के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच आई थीं. उन्होंने पूछा, ‘‘कातिल के पकड़े जाने से आप खुश नहीं हैं क्या?’’

‘‘क्यों नहीं, मैं तो बहुत खुश हूं.’’ ऐश्वर्या ने कहा, ‘‘क्या आप ने उस कर्मचारी को गिरफ्तार कर लिया है?’’

‘‘नहीं, वह फरार है.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने कहा. इस तरह उन्हें आगे की जांच के लिए समय मिल गया. इस के बाद उन्होंने सादे कपड़ों में ऐश्वर्या के घर की निगरानी के लिए सिपाहियों को लगा दिया. अगले दिन ही दोपहर के आसपास ऐश्वर्या अपने फ्लैट से निकली और मुख्य सड़क पर आ कर एक जगह खड़ी हो गई. थोड़ी देर में काले रंग की एक कार आई, जिस पर बैठ कर वह चली गई. कार में कौन था, यह सिपाही नहीं देख पाया. लेकिन उस कार का नंबर उस ने नोट कर लिया था. नंबर से पता चला कि वह कार किसी सलीम की थी. इस तरह सलीम का पता चल गया.

अब इंसपेक्टर शर्मा को गार्ड से उस की शिनाख्त करानी थी. वह गार्ड को अपनी कार में बैठा कर उसी जगह खड़े हो गए, जहां एक दिन पहले ऐश्वर्या कार पर सवार हुई थी. थोड़ी देर में वह कार आई तो गार्ड ने सलीम की पहचान कर दी. अगले दिन इंसपेक्टर शर्मा ऐश्वर्या के फ्लैट पर पहुंचे. जब उन्होंने उस से सलीम के बारे में पूछा तो वह सकते में आ गई. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘सलीम मेरा भाई है.’’

‘‘कहां रहता है?’’

‘‘भदोही में.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

ऐश्वर्या इस बात की सूचना सलीम को दे सकती थी, इसलिए इंसपेक्टर शर्मा ने पहले ही अपनी एक टीम वहां भेज दी थी. वह ऐश्वर्या के घर से सीधे निकले और सलीम के घर की ओर चल पड़े. पता उन के पास था ही. भदोही पहुंच कर उस की आलीशान कोठी देख कर वह दंग रह गए. उन्होंने गार्ड से सलीम के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह तो औफिस में है. पता ले कर इंसपेक्टर औफिस पहुंचे तो वहां वह मिल गया. उन्होंने सीधे पूछा, ‘‘रुखसाना उर्फ ऐश्वर्या से आप का क्या संबंध है?’’

‘‘रुखसाना मेरे यहां रिसैप्शनिस्ट थी. 2 साल मेरे यहां काम करने के बाद उस ने किसी नरेश नाम के व्यक्ति से कोर्टमैरिज कर ली थी.’’

‘‘शादी के बाद वह कहां गई?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम.’’

‘‘थोड़ा कोशिश कीजिए, शायद याद आ जाए.’’

‘‘वह मेरे लिए एक कर्मचारी से ज्यादा कुछ नहीं थी, इसलिए मैं उस के बारे में पता कर के क्या करूंगा?’’ कह कर सलीम ने पल्ला झाड़ना चाहा. तभी एक कर्मचारी ने अंदर आ कर उस के सामने एक पर्ची रख दी. पर्ची पढ़ कर सलीम ने कहा, ‘‘माफ कीजिए इंसपेक्टर साहब, एक जरूरी काम आ गया है, मैं अभी आता हूं.’’

कर्मचारी से चाय लाने को कह कर सलीम बाहर आया. इंसपेक्टर ने उस कंप्यूटर की स्क्रीन अपनी ओर मोड़ ली, जो सीसीटीवी कैमरे से जुड़ा था. स्क्रीन पर ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना का चेहरा दिख रहा था. हालांकि वह बुरके में थी, लेकिन अंदर आ कर उस ने चेहरा खोल लिया था. उसे देख कर इंसपेक्टर शर्मा हैरान रह गए. उन्हें पक्का यकीन हो गया कि नरेश की हत्या के पीछे इन्हीं दोनों का हाथ है.

ऐश्वर्या ने पूछा, ‘‘इंसपेक्टर तो नहीं आया था?’’

‘‘वह अंदर बैठा है.’’ सलीम ने कहा, ‘‘उसे यहां का पता कैसे मिला?’’

‘‘मैं ने बताया है. उस से तुम्हें अपना भाई बताया है.’’

‘‘बेवकूफ, तुम ने तो सारा खेल बिगाड़ दिया.’’ सलीम फुसफुसाते हुए चीखा.

‘‘मैं ने कैसे खेल बिगाड़ दिया?’’

‘‘तुम्हें यह कहने की क्या जरूरत थी कि मैं तुम्हारा भाई हूं.’’

‘‘और क्या कहती?’’

‘‘मैं ने उसे सचसच बता दिया है कि तुम मेरे यहां रिसैप्शनिस्ट थी.’’

‘‘अब क्या होगा?’’ ऐश्वर्या बेचैनी से बोली.

‘‘अब जो भी होगा, हम दोनों झेलेंगे. फिलहाल तुम जिस तरह आई हो, वैसे ही लौट जाओ.’’ सलीम ने कहा और औफिस में आ कर बैठ गया. उस के बैठते ही इंसपेक्टर शर्मा ने कहा, ‘‘आप रुखसाना को पहचान तो सकते हैं? इस के लिए आप को मेरे साथ वाराणसी चलना होगा.’’

‘‘मेरे पास समय नहीं है.’’

‘‘समय निकालना होगा.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने घुड़का तो वह साथ चल पड़ा. पहले तो वह कहता रहा कि वह रुखसाना के बारे में कुछ नहीं जानता. लेकिन जब इंसपेक्टर शर्मा ने कहा कि उन के पास इस बात के सबूत हैं कि उस का रुखसाना उर्फ ऐश्वर्या से अवैध संबंध था तो वह सन्न रह गया.

थाने पहुंच कर इंसपेक्टर शर्मा ने ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना, सलीम और गार्ड को आमनेसामने किया तो सारा रहस्य उजागर हो गया. गार्ड ने सलीम की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘यही साहब अकसर ऐश्वर्या मैडम से मिलने देर शाम को आया करते थे.’’

अब सिवाय अपना अपराध स्वीकार करने के उन दोनों के पास कोई उपाय नहीं बचा था. सलीम और ऐश्वर्या फंस चुके थे. अब इंसपेक्टर शर्मा यह जानना चाहते थे कि ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना ने सलीम के साथ मिल कर नरेश की हत्या क्यों की थी?

पूछताछ शुरू हुई तो रुखसाना ने सिसकते हुए कहा, ‘‘सलीम के यहां नौकरी करते हुए उन से मेरे नाजायज संबंध बन गए थे. मैं इन से निकाह करना चाहती थी, लेकिन इन्होंने मना कर दिया. यह मुझे बीवी नहीं, रखैल बना कर रखना चाहते थे, जो मुझे मंजूर नहीं था. इन की बेवफाई से मैं हताश हो उठी. तभी नरेश से मेरी मुलाकात हुई. फिर मैं ने उन्हें पाने में देर नहीं की.’’

‘‘आप ने नरेश को धोखा क्यों दिया, जबकि उस ने तुम्हारे लिए अपने खून के रिश्ते तक को छोड़ दिया था?’’

‘‘वह सुबह निकलते थे तो देर रात को ही घर आते थे. उन पर काम का बोझ इतना अधिक था कि आते ही खापी कर सो जाते थे. जबकि मैं चाहती थी कि वह मुझे समय दें, मुझ से बातें करें, घुमानेफिराने ले जाएं. लेकिन उन्हें अपने काम के अलावा कुछ सूझता ही नहीं था, जिस से मैं चिढ़ जाती थी.’’

‘‘वह तुम्हारी हर सुखसुविधा का खयाल रखते थे, क्या यह कम था?’’

‘‘एक औरत को सिर्फ सुखसुविधा ही नहीं चाहिए. उस की और भी ख्वाहिशें होती हैं. अगर उन के पास मेरे लिए समय नहीं था तो वह मुझ से शादी ही न करते.’’ सिसकते हुए ऐश्वर्या ने कहा.

‘‘इस का मतलब यह तो नहीं कि किसी और से संबंध बना लिया जाए.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने कहा, ‘‘चलो संबंध बना लिया, ठीक था, लेकिन नरेश को मार क्यों दिया?’’

‘‘नरेश की बेरुखी की वजह से मैं ने सलीम से दोबारा जुड़ने का मन बनाया. इत्तफाक से उसी बीच एक मौल में मेरी मुलाकात सलीम से हो गई. यह खरीदारी करने आए थे. इन्होंने मुझ से फोन नंबर मांगा तो मैं ने दे दिया. उस के बाद बातचीत तो होने ही लगी, मिलनाजुलना भी शुरू हो गया. सलीम मेरी हर ख्वाहिश पूरी करते थे. यह अकसर देर शाम को मेरे घर आते और सुबह जल्दी चले जाते.’’

‘‘तुम्हारे पति ऐतराज नहीं करते थे?’’

‘‘मैं उन्हें रात की कौफी में ज्यादा मात्रा में नींद की गोलियां मिला कर दे देती थी, जिस से वह गहरी नींद सो जाते थे. एक रात उन की नींद खुल गई. मुझे अपने पास न पा कर जब वह उठे तो दूसरे कमरे में लाइट जलती देख कर वहां आ गए. सलीम को मेरे साथ देख कर वह कुछ पूछते, उस के पहले ही हम दोनों ने उन्हें कस कर पकड़ लिया. सलीम ने उन के हाथ पकड़ लिए तो मैं ने उन के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया. इस के बाद जमीन पर गिरा कर सलीम तब तक उन का गला दबाए रहा, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. उस के बाद रात में लाश को ले जा कर कुएं में डाल दिया.’’

पूछताछ के बाद इंसपेक्टर शर्मा ने ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना और सलीम को वाराणसी की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. इन दोनों का क्या होगा, यह तो समय बताएगा, पर नरेश को तो ऐश्वर्या उर्फ रुखसाना की खूबसूरती पर मरमिटने की सजा मिल गई. आज की नई पीढ़ी सीरत पर नहीं, सूरत पर मर रही है, जिस का वह खामियाजा भी भुगत रही है.

– कथा सत्यघटना पर आधारित. किन्हीं कारणों से पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं.

Romantic Story : बस इतनी सी बात थी – आखिर कैसे बदल गई मौज

Romantic Story : ‘‘साहिल,मेरी किट्टी पार्टी 11 बजे की थी… मैं लेट हो गई. जाती हूं, तुम लंच कर लेना. सब तैयार है… ओके बाय जानू्,’’ कह मौज ने साहिल को फ्लाइंग किस किया और फिर तुरंत दरवाजा खोल चली गई.

‘‘एक दिन तो मुझे बड़ी मुश्किल से मिलता है… उस में भी यह कर लो वह कर लो… चैन से सोने भी नहीं देती यह और इस की किट्टी,’’ साहिल ने बड़बड़ाते हुए उठ कर दरवाजा बंद किया और फिर औंधे मुंह बिस्तर पर जा गिरा.

‘‘उफ यह तेज परफ्यूम,’’ उस ने पिलो को अपने चेहरे के नीचे दबा लिया. शादी के पहले जिस परफ्यूम ने उसे दीवाना बना रखा था आज वही सोने में बाधा बन रहा था.

शाम 5 बजे मौज लौटी तो अपनी ही मौज में थी. किट्टी में की गई मस्ती की ढेर सारी बातें वह जल्दीजल्दी साहिल से शेयर करना चाहती थी.

‘‘अरे सुनो न साहिल… तरहतरह के फ्लेवर्ड ड्रिंक पी कर आई हूं वहां से… कितनी रईस हैं राखी… कितनी तरह की डिशेज व स्नैक्स थे वहां… कितने गेम्स खेले हम ने तुम्हें पता है?’’

‘‘अरे यार मुझे कहां से पता होगा… तुम भी कमाल करती हो,’’ साहिल ने चुटकी ली.

‘‘हम सब ने रैंप वाक भी किया… मेरी स्टाइलिंग को बैस्ट प्राइज मिला.’’

‘‘अच्छा… उन के घर में रैंप भी बना हुआ है?’’ वह मुसकराया.

‘‘घर में कहां थी पार्टी… इंटरनैशनल क्लब में थी.’’

‘‘अरे तो इतनी दूर गाड़ी ले कर गई थीं? नईनई तो चलानी सीखी है… कहीं ठोंक आती तो?’’

‘‘माई डियर, अपनी गाड़ी से मैं सिर्फ राखी के घर तक ही गई थी. वहां से सब उन की औडी में गए थे. क्या गाड़ी है. मजा आ गया… काश, हम भी औडी ले सकते तो क्या शान होती हमारी भी… पर तुम्हारी क्व40-50 हजार की सैलरी में कहां संभव है,’’ मौज थोड़ी उदास हो गई.

उधर साहिल थोड़ा आहत. मौज जबतब, जानेअनजाने ऐसी बातों से साहिल का दिल दुखा दिया करती. वह हमेशा पैसों की चकाचौंध से बावली हो जाती है, साहिल यह अच्छी तरह जानने लगा था. कभीकभी वह कह भी देता है, ‘‘तुम्हें शादी करने से पहले अपने पापा से मेरी सैलरी पूछ ली होती तो आज यह अफसोस न करना पड़़ता.’’

‘‘सौरीसौरी साहिल मेरा यह मतलब बिलकुल नहीं था. तुम्हें तो मालूम ही है कि मैं हमेशा बिना सोचेसमझे उलटासीधा बोल जाती हूं… आगापीछा कुछ नहीं सोचती हूं… सौरी साहिल माफ कर दो,’’ कह वह आंखों में आंसू भर कान पकड़ कर उठकबैठक लगाने लगी तो साहिल को उस की मासूमियत पर हंसी आ गई. बोला, ‘‘अरे यार रोनाधोना बंद करो. तुम भी कमाल हो… दिलदिमाग से बच्ची ही हो अभी. जाओ अभी सपनों की दुनिया में थोड़ा आराम कर लो… मेरा मैच आने वाला है… शाम को ड्रैगन किंग में डिनर करने चलेंगे.’’

‘‘सच?’’ कह मौज ने आंसू पोंछ साहिल को अपनी बांहों में भर लिया.

साहिल ने मौज को ड्रैगन किंग में डिनर खिला दिया, पर मन ही मन सोचने लगा कि हर तीसरे दिन इसी तरह चलता रहा तो उस के लिए हर महीने घर चलाना मुश्किल हो जाएगा… क्या करूं किसी और तरीके से खुश भी तो नहीं होती… सिर्फ पैसा और कीमती चीजें ही उसे भाती हैं… साल भर भी तो नहीं हुआ शादी हुए… अकाउंट बैलेंस बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहा… एक ड्रैस खरीद लेती तो उस से मैचिंग के झुमके, कंगन, सैंडल, जूतियां सभी कुछ चाहिए उसे वरना उस की सब सहेलियां मजाक बनाएंगी… भला ऐसी कैसी सहेलियां जो दोस्त का ही मजाक बनाएं… तो उन से दोस्ती ही क्यों रखनी? कुछ समझ नहीं आता… इन औरतों का क्या दिमाग है… कामधाम कुछ नहीं खाली पतियों के पैसों पर मौजमस्ती. वह कैसे मौज को समझाए कि उन के पति ऊंची नौकरी वाले या फिर बिजनैसमैन हैं… वह कैसे पीछा छुड़वाए मौज का इन गौसिप वाली औरतों से… इसे भी बिगाड़ रही हैं… कुछ तो करना पड़ेगा…

‘‘अरे साहिल क्यों मुंह लटकाए बैठा है. अभी तो साल भर भी नहीं हुआ शादी को… घर आ कभी… मौज को नीलम भी याद कर रही थी,’’ कह कर मुसकराते हुए उस का सीनियर अमन कैंटीन में साहिल की बगल में बैठ गया और फिर पूछा, ‘‘कुछ और्डर किया क्या?’’

‘‘नहीं, बस किसी का फोन था,’’ कह साहिल, समोसों और चाय का और्डर दे दिया.

‘‘और बता मौज कैसी है? कहीं घुमानेफिराने भी ले जाता है या नहीं… छुट्टी ले कहीं घूम क्यों नहीं आता… दूर नहीं जयपुर या आगरा ही हो आ. मैं हफ्ता भर पहले गायब था न तो मैं और नीलम किसी शादी में जयपुर गए थे. वहां फिर 3 दिन रुक कर खूब घूमे… नीलम ने खूब ऐंजौय किया.’’

‘‘हां मैं भी सही सोच रहा हूं कि उस की बोरियत कैसे अपने बजट से दूर की जाए.’’

‘‘अरे यार, क्या बात कर रहा है… सस्तेमहंगे हर तरह के होटल हैं वहां… अबे इतनी कंजूसी भी कैसी… अभी तो तुम 2 ही हो… न बच्चा न उस की पढ़ाई का खर्च…’’

‘‘हां यह तो है पर…’’ तभी वेटर समोसे व चाय रख गया.

‘‘छोड़ परवर यह देख पिक्स पिंक सिटी की… कितनी बढि़या हैं… एक बार दिखा ला मौज को.’’

‘‘अमन यह बताओ, नीलम भाभी क्या इतनी सिंपल ही रहती हैं… ज्यादातर वही जूतेचप्पल, टीशर्ट, ट्राउजर… बाल कभी रबड़बैंड से बंधे तो कभी खुले… न गहरा मेकअप, न तरहतरह की ज्वैलरी…. मौज को तो भाभी से ट्रेनिंग लेनी चाहिए… उस की सोच का स्टैंडर्ड कुछ ज्यादा ही ऊंचा व खर्चीला हो गया है.’’

‘‘मतलब?’’ चाय का सिप लेते हुए अमन ने पूछा.

‘‘मतलब, जाएगी तो गोवा, सिंगापुर, बैंकौक इस से कम नहीं. हर तीसरे दिन नई ड्रैस के साथ सब कुछ मैचिंग चाहिए… उन के साथ जाने कौनकौन से मेकअप से लिपेपुते चेहरे में वह मेरी पत्नी कम शोकेस में सजी गुडि़या अधिक लगने लगी है अपनी कई रईस सहेलियों जैसी… वह सादगी भरी सुंदर सौम्य प्रतिमा जाने कहां खो गई… महीने में 5-6 बार तो उसे ड्रैगन किंग में खाना खाना है. अब आप समझ लो, यह सब से महंगा रैस्टोरैंट है. एक बार के खाने के क्व2-3 हजार से नीचे का तो बिल बनने से रहा… अब बताओ अब भी कंजूस कहोगे?’’

‘‘तो यार इतनी रईस सहेलियां कहां से बना लीं मौज ने?’’

‘‘बात समझो. मौज ने ब्यूटीशियन का कोर्स किया हुआ है. अत: अपना ज्ञान जता कर इतराने का शौक है… बस वे चिपक जाती हैं. इस से फ्री में टिप्स मिल जाते हैं उन्हें. उस पर उसे गाने का भी शौक है. बस अपनी सुरीली आवाज से सब की जान बन चुकी है. उन के हर लेडीज संगीत, पार्टी का उसे आएदिन निमंत्रण मिल जाता है. अब हाई सोसायटी में जाना है तो उन्हीं के स्टैंडर्ड का दिखना भी है. अब तो गाड़ी भी औडी ही पसंद आ रही है… इसी सब में मेरी सारी सैलरी स्वाहा हो रही है.’’

‘‘अच्छा तो यह बात है… अरे तो तू भी तो पागल ही है,’’ कह अमन हंसने लगा, ‘‘अरे अक्लमंद आदमी पहले मेरी बात सुन… मुझे तो लगता है मौज का स्किल जिस में है इस के लिए उसे खुद को तैयार हो कर रहना ही चाहिए… दूसरा मौज बाहर काम करना चाहती है… तूने काम करने को मना किया है क्या?’’

‘‘नहीं… उसे बस शौक है, ऐसा ही लगता है. फिर 2 व्यक्तियों के लिए अभी क्व40-50 हजार मुझे मिल रहे हैं… काफी नहीं हैं क्या? फिर कल को बेबी होगा तो उस की देखभाल कौन करेगा? मांपापा भी नहीं रहे.’’

‘‘कैसी नासमझों वाली बातें कर रहा है… बेबी होगा तो जानता नहीं उस के सौ खर्चे होंगे. आजकल अकेले की सैलरी कितनी भी बढ़ जाए कम ही रहती है… फिर कुछ सीखा है तो वह दूसरों तक पहुंचे तो भला ही है… खाली बैठने से दिमाग को खुश भी कैसे रखेगा कोई?

‘‘वैसे भी खाली दिमाग शैतान का घर सुना ही है तूने… तू तो सुबह 9 बजे घर से निकल शाम को 6-7 बजे घर पहुंचता है… सारा वक्त तो काम होता नहीं घर का फिर वह क्या करे, यह क्यों नहीं सोचता तू. खाली घर काटने को दौड़ता होगा… किसी से बात तो करना चाहेगी… आफ्टर आल मैन इज सोशल ऐनिमल…’’

‘‘मैं ने उसे मिलने को मना नहीं कर रखा है, पर उन का उलटीसीधी आदतें तो न अपनाए. असर तो न ले. बनावटी लोगों से नहीं सही लोगों से मिले.’’

‘‘अरे उसे शौक है तो उसे चार्ज करने की सलाह दे. जो उस के स्किल से वाकई फायदा उठाना चाहती हैं वे उस के लिए पे करेंगी… इस फील्ड में बहुत पैसा है समझे… नीलम भी कभीकभी कहती है कि काश, उस ने भी टीचिंग सैंटर की जगह ब्यूटीपार्लर खोल लिया होता तो बढि़या रहता.’’

‘‘अच्छा?’’

‘‘और क्या… अब तो वे दिन दूर नहीं, जब तुम दोनों जल्द ही अपनी औडी में हम दोस्तों के साथ ड्रैगन किंग में दावतें किया करोगे… और गोवा क्या सीधे बैंकौक जाएंगे,’’ कह अमन हंसते हुए उठ खड़ा हुआ.

‘‘मौज, आगे वाला कमरा मां के जाने के बाद से खाली पड़ा है. तुम उस में चाहो तो ब्यूटीपार्लर खोल सकती हो.’’

‘‘सच?’’ मौज खुशी से उछल पड़ी, ‘‘मैं भी कब से तुम से यही कहना चाहती थी, पर डरती थी तुम्हें बुरा लगेगा… आखिर मांबाबूजी की यादें बसी हैं उस में.’’

‘‘अच्छी यादें तो दिल में बसी हैं मौज. वे हमेशा हमारे साथ रहती हैं… छोड़ो ये सब तुम घर पर अपना शौक पूरा कर सकोगी और तुम्हारी इनकम भी होगी. सुंदर दिखने की शौकीन लड़कियां, औरतें चल कर खुद तुम्हारे पास आएंगी… बातें करने को कोई होगा तो खुश भी बहुत रहोगी. और तो और जल्दी आने वाले नन्हे मेहमान का भी ध्यान रख सकोगी… उस के साथ भी रह सकोगी… मुझे भी कोई चिंता नहीं होगी,’’ कह साहिल ने मौज के गाल को चूम लिया.

थोड़ी देर बाद साहिल फिर बोला, ‘‘तुम्हारी आसपास रईस महिलाओं से इतनी दोस्ती हो गई है… अपना शौक पूरा करने के लिए तुम्हें उन के पास नहीं उन्हें ही तुम्हारे पास आना होगा. खूब चलेगा तुम्हारा पार्लर… उन के काम से जाना भी हो तो विजिटिंग चार्ज लिया करना… तुम्हारा दिल भी लगेगा और इनकम भी होगी… यह समझो, थोड़ी मेहनत करोगी तो बस तुम्हारी भी औडी आ सकती है. तुम भी गोवा, बैंकौक घूमने जा सकती हो.’’

‘‘औडी, बैंकौक… सच में साहिल ऐसा होगा?’’ मौज आंखें फाड़े साहिल को देखने लगी.

जवाब में साहिल ने पलकें झपकाईं तो वह बेहोशी का नाटक करते हुए साहिल की बांहों में झूल कर मुसकरा उठी. आज साहिल को सादगी भरी सुंदर, सौम्य मौज दिखाई दे रही थी आठखेलियां करती बच्चों जैसी मासूम.

‘‘बस इतनी सी बात थी… क्यों नहीं यह पहले समझ आया,’’ उस ने अपने माथे पर हाथ मारा.

Hindi Story : इश्क वाला लव – रुशाली के प्यार का कैसा घिनौना रूप विशाल ने देखा

Hindi Story : जब से मिस रुशाली की प्यार भरी नजर मुझ पर पड़ी थी, तब से मानो मैं तो जी उठा था. हमारे दफ्तर के सारे मर्दों में मैं ही तो सिर्फ शादीशुदा था और उस पर एक बच्चे का बाप भी. ऐसे में मिस रुशाली पर मेरा जादू चलना किसी चमत्कार से कम न था. पर अब जब यह चमत्कार हो गया था, तब ऐसे में सभी को आहें भरते देख मैं खुद पर नाज कर बैठा था.

‘‘मैं ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि उस विशाल पर मिस रुशाली फिदा होंगी. पता नहीं, उस हसीना को उस ढहते हुए बूढ़े बरगद के पेड़ में न जाने क्या नजर आया, जो उसे अपना दिल दे बैठी?’’ लंच करते वक्त रमेश आहें भरता हुआ सब से कह रहा था.

‘‘हां भाई, अब यह बेचारा दिल ही तो है. अब यह किसी गधे पर आ जाए, तो इस में उस कमसिन मासूम हसीना का क्या कुसूर?’’ राहुल के इस मजाक पर सभी खिलखिला कर हंस पड़े.

कैंटीन में घुसते वक्त जब मैं ने अपने साथियों की ये बातें सुनीं, तो मैं मन ही मन इतरा उठा और अपना लंच बौक्स उठा कर दोबारा अपनी सीट पर आ कर बैठ गया.

अपने दफ्तर के सारे आशिकों के जलते हुए दिलों से निकलती हुई आहें मेरे मन को ऐसा सुकून दे रही थीं कि मैं खुशी के चलते फिर कुछ खा न पाया.

तब मैं ने चपरासी से कौफी मंगाई और कौफी पी कर फिर से अपने काम में जुट गया. वैसे तो उस समय मैं लैपटौप पर काम कर रहा था, पर मेरा ध्यान तो मिस रुशाली के इर्दगिर्द ही घूम रहा था.

सलीके का पहनावा, तीखे नैननक्श, सुलझे हुए बाल और उस पर मदमस्त चाल. सच में मिस रुशाली एक ऐसा कंपलीट पैकेज है, जिस के लिए जितनी भी कीमत चुकाई जाए, कम है.

अब तो मिस रुशाली के सामने मुझे अपनी पत्नी प्रिया की शख्सीयत बौनी सी लगने लगी थी. वैसे, प्रिया में एक पत्नी के सारे गुण थे और मैं उसे प्यार भी करता था, पर मिस रुशाली से मिलने के बाद मुझे लगने लगा था कि कुछ तो ऐसा है मिस रुशाली में, जो प्रिया में नहीं है.

शायद, मुझे मिस रुशाली से इश्क वाला लव हुआ है, जो शायद उस लव से ज्यादा है, जो मैं अपनी पत्नी प्रिया से करता था, इसलिए तो मिस रुशाली मेरे मन में बसती जा रही थी.

इधर मेरा प्यार परवान चढ़ रहा था, तो उधर मिस रुशाली का जादू मेरे सिर चढ़ कर बोलने लगा था.

लौंग ड्राइव, पांचसितारा होटल में डिनर, महंगे उपहार पा कर मिस रुशाली मुझ पर फिदा हो गई थी. जब भी मैं उस की बड़ीबड़ी झील सी आंखों में अपने प्रति उमड़ रहे प्यार को देखता, तब मेरा दिल जोरजोर से धड़कने लगता था.

अब तो सिर्फ इसी बात की इच्छा होती कि न जाने ऐसा वक्त कब आएगा, जब मिस रुशाली की प्यार भरी नजरें मुझ पर मेहरबान होंगी और उस प्यार भरी बारिश में मेरा मन भीग जाएगा.

बस, इसी कल्पना की चाह में मैं फिर से जी उठा था. ऐसा लगता था, मानो मैं उस मंजिल को पा गया हूं, जहां धरती और आसमान एक हो जाते हैं.

पर प्रिया मेरे अंदर आए इस बदलाव से कैसे अछूती रह पाती? अब उस की सवालिया नजरें मुझ पर उठने लगी थीं. पर मैं चुप था, क्योंकि मुझे एक सही मौके की तलाश जो थी.

रात को सोते वक्त जब कभी प्रिया मेरे नजदीक आने की कोशिश करती, तब मैं जानबूझ कर उस की अनदेखी कर देता था.

तब मैं तो मुंह फेर कर सो जाता और वह आंसू बहाती रहती. मुझे उस का रोना अखरता था, पर मैं क्या करता? मैं अपने दिल के हाथों मजबूर जो था.

बीतते समय के साथ मेरी मिस रुशाली को पाने की चाह बढ़ने लगी थी, क्योंकि मिस रुशाली की बड़ीबड़ी आंखों में मेरे प्रति प्यार का सागर तेजी से हिलोरें जो लेने लगा था.

अब मुझे लगने लगा था कि शायद सही वक्त आ गया है, जब मुझे प्रिया से तलाक ले कर मिस रुशाली को अपना बनाना होगा, तभी मेरी इस उमस भरी जिंदगी में खुशियों के फूल खिल पाएंगे.

अभी मैं सही मौके की तलाश में था कि अचानक मेरी किस्मत मुझ पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गई. प्रिया के मामाजी के अचानक बीमार होने के चलते वह पूरे 3 दिन के लिए आगरा क्या गई, मुझे तो मानो दबा हुआ चिराग मिल गया.

‘सुनो, मैं आगरा जा रही हूं. तुम्हारा खाना कैसरोल में रखा है,’ प्रिया अपना सामान पैक करते हुए फोन पर मुझ से कह रही थी.

‘‘तुम जल्दी से निकलो. मेरे खाने की चिंता मत करो, वरना तुम्हारी शाम वाली बस छूट जाएगी,’’ मैं खुशी के मारे हड़बड़ा रहा था.

‘हां जी, वह तो ठीक है. मैं ने श्यामा को बोल दिया है कि वह सुबहशाम आप का मनपसंद खाना बना दिया करेगी,’ प्रिया अभी भी मेरे लिए परेशान थी.

‘‘प्रिया, मैं तो चाह रहा था कि मैं दफ्तर से जल्दी निकल कर तुम्हें बसस्टैंड पर छोड़ आऊं, पर क्या करूं, इतना ज्यादा काम जो है,’’ मैं ने अपनी चालाकी दिखाते हुए कहा.

‘नहीं जी, आप अपना काम करो. मैं चली जाऊंगी,’ इतना कह कर प्रिया ने फोन रख दिया.

प्रिया का इस तरह अचानक चले जाना मुझे एक अनजानी सी खुशी दे गया. मैं बावला सा कभी सोचता कि यहां दफ्तर में ही मिस रुशाली को सबकुछ बता कर अपने घर ले जाऊं. पर फिर बहुत सोचने के बाद मुझे यही लगा कि मैं अपने घर पहुंच कर फ्रैश होने के बाद ही मिस रुशाली से मिलने जाऊंगा.

जब वह अचानक मुझे देखेगी, तब मुझ पर चुंबनों की बरसात कर देगी और उस प्यारभरी बारिश में भीग कर हम दोनों दो जिस्म एक जान बन जाएंगे.

बस फिर क्या था. मैं तुरंत घर पहुंचा और अच्छी तरह तैयार हो कर मिस रुशाली के पास पहुंच गया. दरवाजे की घंटी बजाने पर दरवाजा रुशाली ने नहीं, बल्कि एक मोटी सी औरत ने खोला.

‘‘मिस रुशाली…’’

‘‘वह ऊपर रहती है,’’ उस औरत ने बेरुखी से कहा . फिर मैं ऊपर चढ़ गया. जब मैं रुशाली के कमरे में पहुंचा, तब मैं ने देखा कि वह किसी चालू फिल्मी गाने पर थिरक रही थी. कमरे में चारों तरफ कपड़े बिखरे पड़े थे और जूठे बरतन यहांवहां लुढ़के पड़े थे.

‘‘अरे तुम, अचानक…’’ मुझे अचानक सामने देख वह हड़बड़ा गई, ‘‘वह क्या है न, आज मेड नहीं आई.’’

रुशाली यहांवहां पड़ा सामान समेटने लगी. फिर उस ने सामने पड़ी कुरसी पर पड़ी धूल साफ की और मुझे बैठने का इशारा किया. फिर वह मेरे लिए पानी लेने चली गई.

रुशाली के जाने के बाद जब मैं ने कमरे में चारों तरफ नजर घुमाई, तो गर्द की जमी मोटी सी परत को पाया.

इतना गंदा कमरा देख मेरा जी मिचलाने लगा. अब धीरेधीरे मुझे अपनी प्रिया की कद्र समझ आने लगी थी. वह तो सारा घर शीशे की तरह चमका कर रखती है, तब भी मैं उसे टोकता ही रहता हूं, पर यहां तो गंदगी का ऐसा आलम है कि पूछो मत.

‘‘कुछ खाओगे क्या?’’ पानी का गिलास देते हुए रुशाली मुझ से पूछ बैठी.

‘‘हां… भूख तो लगी है.’’

‘‘ये लो टोस्ट और चाय,’’ थोड़ी देर में रुशाली मुझे चाय की ट्रे थमाते हुए बोली.

डिनर में चाय देख कर मेरे सिर पर चढ़ा इश्क का रहासहा भूत भी उतर गया.

‘‘वह क्या  है न… मुझे तो बस यही बनाना आता है, क्योंकि सारा खाना तो मेरी आंटी ही बनाती हैं. पेईंग गैस्ट हूं मैं उन की,’’ रुशाली अपना पसीना पोंछते हुए बोली, तो मैं समझ गया कि अब तक मैं जो कुछ भी रुशाली के लिए महसूस कर रहा था, वह सिर्फ एक छलावा था. मेरा उखड़ा मूड देख कर तुरंत रुशाली ने अपना अगला पासा फेंका.वह तुरंत मेरे पास आई और बेशर्मी से अपना गाउन उतारने लगी.

‘‘क्या कर रही हो यह…’’ मैं गुस्से से तमतमा उठा.

‘‘अरे, शरमा क्यों रहे हो? जो करने आए थे, वह करे बिना ही वापस चले जाओगे क्या?’’ इतना कह कर वह मुझ से लिपटने लगी.

उसे इस तरह करते देख मैं हड़बड़ा गया. इस से पहले कि मैं खुद को संभाल पाता, उस ने मुझे यहांवहां चूमना शुरू कर दिया.

तभी अचानक मेरे गले में पड़ा लौकेट उस के हाथ में आ गया, जिस में मेरी बीवी प्रिया और अंशुल का फोटो था.

‘‘ओह, तो यह है तुम्हारी देहाती पत्नी… अरे, इसे तलाक दे दो और मेरे नाम अपना फ्लैट कर दो, फिर देखो कि मैं कैसे तुम्हें जन्नत का मजा दिलाती हूं?’’ इतना कह कर वह मुझ से लिपटने की कोशिश करने लगी.

‘‘प्यार बिना शर्त के होता है रुशाली,’’ मैं उस समय सिर्फ इतना ही कह पाया.

‘‘आजकल कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता, मिस्टर. हर चीज की कीमत होती है और हर किसी को वो कीमत चुकानी ही पड़ती है,’’ इतना कह कर रुशाली जोर से हंस पड़ी.

रुशाली के प्यार का यह घिनौना रूप देख मैं टूट सा गया और उसे धक्का दे कर बाहर आ गया.

हारी हुई नागिन की तरह रुशाली जोर से चीखते हुए बोली, ‘‘विशाल, मेरा डसा तो पानी भी नहीं मांगता, फिर तुम क्या चीज हो?’’

पर मैं तब तक अपनी कार में बैठ चुका था और मेरे इश्क वाले लव का भूत उतर चुका था.

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