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संपादकीय

जब देश के किसान खुले में 2021 में सारे साल दिल्ली के चारों ओर की सडक़ों पर पड़े रहे थे कि उनको मारने वाले और बुरी तरह लूटने वाले कृषि कानून वापिस लिए जाएं और जब देश भर में कोविड़ की दूसरी लहर के लिए लोग पैसेपैसे को तरस रहे थे कि पैसे का जुगाड़ हो तो औक्सीजन सिलेंडर खरीदा जा सके.

कोविड की मंहगी दवाएं खरीदी जा सकें. जब सडक़ें सुनसान थीं और सारे पटरी दुकानदार बेकार थे. जब मकान नहीं बन रहे थे और मजदूर जेबर बेच कर गुजारा कर रहे थे, न सिर्फ राजपथ पर सैंट्रल विस्टा पर अरबों का काम जारी था, राम मंदिर बनाने की प्लानिंग चालू थी, काशी कौरीडोर की तोडफ़ोड़ चालू थी. बीसियों के पास इतना पैसा था कि 4 करोड़ से ज्यादा की लैंबोरगिनी खाड़ी खरीद लें.

2021 में इस जर्मन कंपनी ने रिकार्ड सेल की और 52 गाडिय़ां बेचीं जो कंपनी के लिए खुद अचंम की बात है. यह कैसा भारत बन रहा है जहां कुछ लोग ऊंचे संगमरमर के महलों जैसे प्रधानमंत्री निवास या राम मंदिर में पुजारी की तरह रहेंगे, कुल 8000 करोड़ का विमान खरीदेंगे. आम बिजनैसमैन माने जाने वाले लैंबोरगिनी खरीद सकेंगे और उसी समय 2 बार का खाना मिलने की आस में हजारों औरतें कोविड का खतरा उठा कर सरकारी बसों में चल निकलें.

अमीरी अपने आप में बुरी बात नहीं है. यह भाग्य का खेल नहीं है, यह मेहनत का नतीजा है पर वह समाज जो हर समय त्याग की बात करता है. फल की ङ्क्षचता न करों के उपदेश सुनाता है, किसान के 2 रुपए किलो गेंहू के ज्यादा नहीं देना चाहता, वहां 52 लोग मंहगी गाडिय़ां खरीद सकें जो 5-7 साल भी न चलेंगी.

यह चोंचले उन देशों के लिए ठीक है जहां न बेकारी है, न भुखमरी है, जहां कर बिमार के लिए अस्पताल है, जहां मजदूरों की इतनी कमी है कि बाहर से बुलाने पड़ते हैं, जहां कर रोज नई चीजें बनती हैं, नई ईजादें होती है, जो देश आज भी गोबर में पैर रखे हुए है, जहां आज बड़े शहरों में भी शौचालय तक नहीं हैं. पेशाब घर नहीं है, मकानों की पुताई के लिए पैसे नहीं है, वहां ऐसी गाड़ी जिस का टायर ही 5-7 साल का हो, कैसे खरीदा जा सकता है.

अमीरों से चिडऩा नहीं चाहिए पर यह तो जरूरी है कि अमीर इतने अमीर न हो कि वे पैसा बर्बाद कर सकें. अमीर के पास बड़े कारखानों हों जिन में लाखों मजदूर काम करते हैं, यह खुशी की बात है, अमीर कालोनियां बनवाए जिन में सैंकड़ों लोग घर पाएं अच्छी बात है, अमीर बस सेवा चालू करें जिन में आमलोग भी साथ रहे, खुशी की बात है पर आमिरों के लिए 4-4, 5-6 करोड़ की गाडिय़ां बने और भारत में बिकें, एकदो नहीं एक साल में गई एक बिमारी की निशानी है.

एक तरह से यह राजा रजवाड़ों के दिनों की वापिसी है. किसी भी पुरुष की खोल लो उस में ऐसे राजा की कहानी दिख जाएगी जिस के बड़े महल होंगे. बीसियों रानियां होंगी. सैंकड़ों दासियां होंगी जो सिर्फ राजा का सुख देंगी और ऋ षिमुनि उस राजा को बारबार बरदान देंगे. तभी तो राजा हर थोड़े दिन में यज्ञ हवन कराते थे ताकि ऋ षिमुनि आम जनता को बहकाते रहें. यही आज हो रहा है. ङ्क्षहदू खतरे में है, राम मंदिर बना रहे हैं, चारधाम ठीक हो रहा है के नाम पर बोट लेकर अदानी अंबानी को अरबों रुपए मिल जाते हैं और कोई कुछ नहीं बोच पाता.

लैबोरमिनी की इतनी बिक्री उसी तरह की बरबादी की निशानी है जो धर्म के नाम पर आज गरीबों के टोलों में भी होने लगी है. जहां सही खाना न हो, सही कपड़ा न हो वहां रात भर सैंकड़ों लाइटें लगा कर कीर्तन होते है, नाचगाने होते हैं और हवलापूरी बांटा जाता है. अपने घर को आग लगा कर हाथ सेंकना इसी को कहते हैं और हजारों नेता चाहे सरकार में हो या बाहर, चुप रहते हैं.

अनमोल रिश्ता : भाग 2

नंबर मिलते ही हमारी आंखों में चमक आ गई, ‘‘हैलो, आप सलीम भाई के घर से बोल रहे हैं?’’

‘‘हां, जी, आप कहां से बोल रहे हैं,’’ उधर से आवाज आई.

‘‘जी, मैं उदयपुर से बोल रहा हूं. आप सलीम भाई से बात करवा दीजिए.’’

‘‘आदाब चाचाजान, मैं आप को पहचान गया. मैं सलीम भाई का लड़का अशरफ बोल रहा हूं, अब्बा अकसर आप की बातें करते हैं. आप मुझे हुक्म कीजिए,’’ अशरफ की आवाज नम्र थी.

ये एकदम आतुरता से बोले, ‘‘असल में मैं आप को एक तकलीफ दे रहा हूं, मेरे बेटे राजीव का एलप्पी में एक्सीडेंट हो गया है. वहीं अस्पताल में है, आप उस की कुछ मदद कर सकते हैं क्या?’’

‘‘अरे, चाचाजान, आप बेफिक्र रहिए. मैं अभी एलप्पी के लिए गाड़ी से निकल जाता हूं. उन का पूरा खयाल रख लूंगा और आप को सूचना भी देता रहूंगा. आप उन का मोबाइल नंबर बता दीजिए.’’

इन्होंने जल्दी से सीमा का मोबाइल नंबर बता दिया और आगे कहा, ‘‘ऐसा है, हम जल्दी से जल्दी पहुंचने की कोशिश करेंगे, सो यदि उचित समझो तो उन को कोच्चि में भी दिखा देना.’’

‘‘आप मुझे शर्मिंदा न करें, चाचाजान, अच्छा अब मैं फोन रखता हूं.’’

अशरफ की बातें सुन कर तो हमें चैन आ गया, फटाफट प्लेन का पता किया. जल्दीजल्दी अटैची में सामान ठूंस रहे थे और जाने की व्यवस्था भी कर रहे थे. रात होने की वजह से हवाई जहाज से जाने का कार्यक्रम कुछ सही बैठ नहीं रहा था. सिर्फ सीमा से बात कर के तसल्ली कर रहे थे. मन में शंका भी हो रही थी कि अशरफ अभी रवाना होगा या सुबह?

खाने का मन न होते हुए भी इन की डायबिटीज का ध्यान कर हम ने दूध बे्रड ले लिया.

मन में बहुत ज्यादा उथलपुथल हो रही थी. सलीम भाई से बात नहीं हुई थी, यहां आते थे तब तो बहुत बातें करते थे. क्या कारण हो सकता है? कितने ही विचार मन में घूम रहे थे.

6 साल पुरानी बातें आज जेहन में टकराने लगीं. मैं सब्जी बना चुकी थी कि इन का फोन आ गया, ‘सुधा, एक मेहमान खाना खाएंगे. जरा देख लेना.’

मेरा मूड एकदम बिगड़ गया, कितने दिनों बाद तो आज मूंग की दालपालक बनाया था, अब मेहमान के सामने नए सिरे से सोचना पड़ेगा. न मालूम कौन है?

खाने की मेज पर इन्होंने मेरा परिचय दिया और बताया, ‘ये सलीम भाई हैं. सामने उदयपुर होटल में ही ठहरे हैं. इन का मार्बल और लोहे का व्यापार है. उसी सिलसिले में मुझ से मिलने आए हैं.’

फिर आगे बोले, ‘ये कैल्लूर के रहने वाले हैं, बहुत ही खुशमिजाज हैं.’

वास्तव में सलीम भाई बहुत ही खुशहाल स्वभाव के थे. उन के चेहरे पर हरदम एक मुसकान सी रहती थी, मार्बल के सिलसिले में इन से राय लेने आए थे.

धीरेधीरे इन का सलीम भाई के साथ अभिन्न मित्र की तरह संबंध हो गया. वह 2-3 महीने में अपने काम के सिलसिले में उदयपुर चक्कर लगाते थे.

गरमी के दिन थे. सलीम भाई का सिर सुबह से ही दुख रहा था. दवा दी पर शाम तक तबीयत और खराब होने लगी. उलटियां और छाती में दर्द बढ़ता गया. अस्पताल में भरती कराया क्योंकि उन को एसीडीटी की समस्या हो गई थी. 1 दिन अस्पताल में रहे, तो इन्होंने उन्हें 4 दिन रोक लिया. घर की तरह रहते हुए उन की आंखें बारबार शुक्रिया कहतेकहते भर आती थीं.

सलीम भाई के स्वभाव से तो कोई तकलीफ नहीं थी पर मैं अकसर कुढ़ जाती थी, ‘आप भी बहुत भोले हो. अरे, दुनिया बहुत दोरंगी है, अभी तो आप के यहां आते हैं. परदेस में आप का जैसा जिंदादिल आदमी मिल गया है. कभी खुद को कुछ करना पड़ेगा तब देखेंगे.’

‘बस, तुम्हारी यही आदत खराब है. सबकुछ करते हुए भी अपनी जबान को वश में नहीं रख सकतीं, वे अपना समझ कर यहां आते हैं. दोस्ती तो काम ही आती है,’ ये मुझे समझाते.

2 साल तक उन का आनाजाना रहा. एक बार वे हमारे यहां आए. एकाएक उन का मार्बल का ट्रक खराब हो गया. 2 दिन तक ठीक कराने की कोशिश की. पर ठीक नहीं हुआ. पता लगा कि इंजन फेल हो गया था इसलिए अब ज्यादा समय लगेगा.

सलीम भाई ने झिझकते हुए कहा, ‘भाई साहब, अब मेरा जाना भी जरूरी है और मैं आप को काम भी बता कर जा रहा हूं, कृपया इसे ठीक करा कर भेज दीजिएगा. अगले महीने मैं आऊंगा तब सारा पेमेंट कर दूंगा.’

पर सलीम भाई के आने की कोई खबर नहीं आई. न उन के पेमेंट के कोई आसार नजर आए.

इंतजार में दिन महीनों में और महीने सालों में बदलने लगे. पूरे 5 साल निकल गए.

मैं अकसर इन को ताना मार देती थी, ‘औ

र करो भलाई, एक अनजान आदमी पर भरोसा किया. मतलब भी निकाल लिया. 40 हजार का फटका भी लग गया.’

ये ठंडे स्वर में कहते, ‘भूलो भी, जो हो गया सो हो गया. उस की करनी उस के साथ.’

‘‘क्या बात है? किन खयालों में खोई हुई हो,’’ इन की आवाज सुन कर मेरा ध्यान बंटा, घड़ी की ओर देखा पूरे 12 बज रहे थे. नींद आने का तो सवाल ही नहीं था, बेटे और पोतेपोती की चिंता हो रही थी. न जाने कहां कितनीकितनी चोटें लगी होंगी. शायद सीमा ज्यादा नहीं बता रही हो कि मम्मीपापा को चिंता हो जाएगी.

वहां एलप्पी में न जाने कैसा अस्पताल होगा. बस, बुराबुरा ही दिमाग में घूम रहा था. करीब 3 बजे फोन की घंटी बजी. हड़बड़ाहट में लपकते हुए मैं ने फोन उठाया. सीमा का ही था, ‘‘मम्मी, यहां एलप्पी अस्पताल में हम ने मरहमपट्टी करा ली है. अब अशरफ भाईजान आ गए हैं. हम सुबह उन के संग कोच्चि जा रहे हैं.’’

फिर एक क्षण रुक कर बोली, ‘‘अशरफ भाईजान से बात कर लो.’’

‘‘आंटी, आप बिलकुल चिंता मत करना, मैं कोच्चि में बढि़या से बढि़या इलाज करवा दूंगा, आप बेफिक्र हो कर आराम से आओ.’’

अनमोल रिश्ता : भाग 1

खाना खा कर अभी हाथ धोए भी नहीं थे कि फोन की घंटी बज उठी. जरूर बच्चों का फोन होगा, यह सोचते ही मेरे चेहरे पर चमक आ गई.

‘हैलो, हां बेटा, कहां पर हो?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मम्मी, बस, अब आधे घंटे बाद ही हम एलप्पी के लिए रवाना हो रहे हैं, शाम तक वहां पहुंच जाएंगे,’’ राजीव खुशी के साथ अपना कार्यक्रम बता रहा था.

‘‘चलो, ठीक है, वहां पहुंच कर खबर देना…और हां बेटा, खूब मौजमस्ती करना. बारबार इतनी दूर जाना नहीं होता है.’’

एक गाना गुनगुनाती हुई मैं अपने बच्चों के लिए ही सोच रही थी. 2 साल तक सोचतेसोचते आखिर इस बार दक्षिण भारत का 1 महीने का ट्रिप बना ही लिया. राजीव, बहू सीमा और उन के दोनों बच्चे आयुषआरुषि गरमियों की छुट्टियां होते ही गाड़ी द्वारा अपनी केरल की यात्रा पर निकले थे.

राजीव डाक्टर होने की वजह से कभी कहीं ज्यादा समय के लिए जा ही नहीं पाता था. बच्चे भी अब 12-14 साल के हो गए थे. उन्हें भी घूमनेफिरने का शौक हो गया था. बच्चों की फरमाइश पर राजीव ने आखिरकार अपना लंबा कार्यक्रम बना ही लिया.

हम ने तो 20 साल पहले, जब राजीव मनीपाल में पढ़ता था, पूरे केरल घूमने का कार्यक्रम बना लिया था. घूमने का घूमना हो गया और बेटे से मनीपाल में मिलना भी.

एलप्पी शहर मुझे बहुत पसंद आया था. खासकर उस की मीठी झील और खारा समुद्र का मेल, एलप्पी से चलने वाली यह झील कोच्चि तक जाती है. इस झील में जगहजगह छोटेछोटे टापू झील का सौंदर्य दोगुना कर देते हैं.

7 बजे जैसे ही मेरे पति घर में घुसे, सीधा प्रश्न किया, ‘‘बच्चों की कोई खबर आई?’’

‘‘हां, एलप्पी के लिए रवाना हो गए हैं, अब थोड़ी देर में पहुंचने ही वाले होंगे,’’ मैं ने पानी का गिलास उन के हाथ में देते हुए कहा.

‘‘बच्चों को गए 15 दिन हो गए, उन के बिना घर कितना सूनासूना लगता है,’’ फिर कुछ क्षण रुक कर बोले, ‘‘याद है तुम्हें, एलप्पी में मोटरबोट में तुम कितना डर गई थीं, जब झील से हम समुद्र के हिलोरों के बीच पहुंचे थे. डर के मारे तुम ने तो मोटरबोट मोड़ने को ही कह दिया था,’’ कहते हुए वे होहो कर हंस पड़े.

‘‘अरे, बाप रे, आज भी याद करती हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. मैं तो वैसे भी बहुत जल्दी घबरा जाती हूं. फोन पर राजीव को समझा दूंगी, नहीं तो बच्चे डर जाएंगे,’’ मैं ने उतावले हो कर कहा.

‘‘रहने दो, बच्चों को अपने हिसाब से, जो कर रहे हैं, करने दो, नसीहत देने की जरूरत नहीं है,’’ अपनी आदत के मुताबिक पति ने मुझे झिड़क दिया.

मैं पलट कर कुछ कहती कि फोन की घंटी बज उठी. इन्होंने फोन उठाया, ‘‘हां, बेटी सीमा, तुम एलप्पी पहुंच गए?’’

न जाने उधर से क्या जवाब मिला कि इन का चेहरा एकदम फक पड़ गया. बुझी आवाज में बोले, ‘‘ऐसा कैसे हो गया, ज्यादा चोट तो नहीं आई?’’ आगे बोले, ‘‘क्या आरुषि का हाथ बिलकुल मुड़ गया है और आयुष का क्या हाल है.’’

इन के चेहरे के भाव बदल रहे थे. मैं भी घबराती हुई इन से सट कर खड़ी हो गई.

फोन में से टूटेफूटे शब्द मुझे भी सुनाई दे रहे थे, ‘‘राजीव को चक्कर आ रहे हैं और कमर में तेज दर्द हो रहा है, उठा भी नहीं जा रहा है.’’

ये एकदम चिंतित हो कर बोले, ‘‘हां, ठीक है. एक बार पास ही के अस्पताल में दिखा दो. मैं कुछ सोचता हूं,’’ कह कर इन्होंने फोन धम्म से पटक दिया और वहीं बैठ गए.

मैं ने एकदम से प्रश्नों की झड़ी लगा दी, ‘‘बच्चों के संग क्या हो गया? कैसे हो गया? कहां हो गया और अब क्या सोच रहे हैं?’’

मेरे प्रश्नों को अनसुना करते हुए खुद ही बुदबुदाने लगे, ‘यह क्या हो गया, अच्छाभला बच्चे का सफर चल रहा था, एक बच्चा और मोटरसाइकिल को बचाने के चक्कर में गाड़ी असंतुलित हो कर एक खड़ी कार से टकरा गई. यह तो अच्छा है कि एलप्पी बिलकुल पास है, कम से कम अस्पताल तो जल्दी से पहुंच जाएंगे,’ यह कहते हुए वे ऊपर शून्य में देखने लगे.

मेरा मन बहुत अशांत हो रहा था. राजीव को चक्कर आ रहे हैं. कहीं सिर में तो चोट नहीं लग गई, यह सोच कर ही मैं कांप गई. सब से ज्यादा तो ये हताश हो रहे थे, ‘‘एलप्पी में तो क्या, साउथ में भी अपना कोई रिश्तेदार या दोस्त नहीं है, जो उन्हें जा कर संभाल ले. यहां उदयपुर से पहुंचने में तो समय लग जाएगा.’’

अचानक मुझे याद आया, ‘‘5-6 साल पहले अपने यहां कैल्लूर से सलीम भाई आते थे. हर 2-3 महीने में उन का एक चक्कर लग जाता था. उन से संपर्क करो,’’ मैं ने सलाह दी.

‘‘पर 5 साल से तो उन की कोई खबर नहीं है,’’ फिर कुछ सोच कर बोले, ‘‘मेरे ब्रीफकेस में से पुरानी डायरी लाना. शायद कोई नंबर मिल जाए.’’

मैं झटपट दौड़ कर डायरी ले आई. पन्ने पलटते हुए एक जगह कैल्लूर का नंबर मिल गया.

फटाफट नंबर लगाया तो नंबर मिल गया, ‘‘हैलो, कौन बोल रहे हैं? हां, मैं उदयपुर से मदन…मदनलाल बोल रहा हूं. क्या सलीम भाई से बात हो सकती है?’’

‘‘अब यह फैक्टरी सलीम भाई की नहीं है, मैं ने खरीद ली है,’’ एक ठंडा स्वर सुनाई दिया.

‘‘ओह, देखिए, आप किसी तरह से सलीम भाई का नंबर दे सकते हैं, मुझे उन से बहुत जरूरी काम है,’’ इन की आवाज में लाचारी थी.

उधर से आवाज आई, ‘‘हमारे यहां एक अकाउंटेंट संजीव रेड्डी पुराना है, मैं उस से बात करवा देता हूं.’’

हमें एकएक पल भारी लग रहा था, ‘‘हैलो,’’ उधर से आवाज आई, ‘‘हां, मैं रेड्डी बोल रहा हूं, हां जी, मैं सलीम भाई को जानता हूं. पर मुझे उन का नंबर नहीं मालूम है. हां, पर उन की लड़की कोच्चि में रहती है. उस का नंबर शायद मेरी लड़की के पास होगा. आप 5 मिनट बाद फोन मिलाएं. मैं पूछ कर बताता हूं.’’

रेड्डी साहब के सहयोग से हमें सलीम भाई की लड़की शमीमा का नंबर मिल गया. उस से फटाफट हमें उस के भाई अशरफ का नंबर मिल गया.

#coronavirus: ताजी हवा का झौंका

पहले जनता कर्फ्यू… फिर लॉकडाउन… और अब ये पूरा कर्फ्यू… समझ में नहीं आता कि टाइमपास कैसे करें…” निशिता ने पति कमल से कहा.

“पहले तो रोना ये था कि समय नहीं मिल रहा… अब मिल रहा है तो समस्या है कि इसे बिताया कैसे जाये…” कमल ने हाँ में हाँ मिलाई.

निशिता और कमल मुंबई की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते हैं. सुबह से लेकर रात तक घड़ी की सुइयों को पकड़ने की कोशिश करता यह जोड़ा आखिर में समय से हार ही जाता है. पैसा कमाने के बावजूद उसे खर्च न कर पाने का दर्द अक्सर उनकी बातचीत का मुख्य भाग होता है.

मुंबई में अपना फ्लैट… गाड़ी… और अन्य सभी सुविधाएं होने के बाद भी उन्हें आराम करने का समय नहीं मिल पाता… टार्गेट पूरे करने के लिए अक्सर ऑफिस का काम भी घर लाना पड़ जाता है. ऐसे में प्यार भला कैसे हो… लेकिन यह भी एक भौतिक आवश्यकता है. इसलिए इन्हें प्यार करने के लिए वीकेंड निर्धारित करना पड़ रहा है. लेकिन पिछले दिनों फैली इस महामारी यानी कोरोना के कहर ने दिनचर्या एक झटके में ही बदल कर रख दी. अन्य लोगों की तरह निशिता और कमल भी घर में कैद होकर रह गए.

“क्या करें… कुछ समझ में नहीं आ रहा. पहाड़ सा दिन खिसके नहीं खिसकता…” निशिता ने लिखा.

“अरे तो बेबी! समय का सदुपयोग करो… प्यार करो ना…” सहेली ने आँख दबाती इमोजी के साथ रिप्लाइ किया.

“अब एक ही काम को कितना किया जाये… कोई लिमिट भी तो हो…” निशिता ने भी वैसे ही मूड में चैट आगे बढ़ाई.

“सो तो है.” इस बार टेक्स्ट के साथ उदास इमोजी आई.

“ये तो शुक्र है कि बच्चे नहीं हैं. वरना अपने साथ-साथ उन्हें भी व्यस्त रखने की कवायद में जुटना पड़ता.” निशिता ने आगे लिखा.

“बात तो तुम्हारी सौ टका सही है यारा… अच्छा एक बात बता… एक ही आदमी की शक्ल देखकर क्या तुम बोर नहीं हो रही?” सहेली ने ढेर सारी इमोजी के साथ लिखा तो निशिता ने भी जवाब में ढेरों इमोजी चिपका दी.

सहेली से तो चैट खत्म हो गई लेकिन निशिता के दिमाग में कीड़ा कुलबुलाने लगा. अभी तो महज तीन-चार दिन ही बीते हैं और वह नोटिस कर रही है कि कमल से उसकी झड़प होते-होते बस किसी तरह रुकी है लेकिन एक तनाव तो उनके बीच पसर ही जाता है.

कहते हैं कि बाहरी कारक दैनिक जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं. शायद यही कारण है कि लॉकडाउन और कर्फ्यू का तनाव उनके आपसी रिश्तों को प्रभावित कर रहा है. लेकिन इस समस्या का अभी निकट भविष्य में तो कोई समाधान दिखाई नहीं दे रहा.

“कहीं ऐसा न हो कि समस्या के समाधान से पहले उनका रिश्ता ही कोई समस्या बन जाये… दिन-रात एक साथ रहते-रहते कहीं वे अलग होने का फैसला ही न कर बैठें.” निशिता का मन कई तरह की आशंकाओं से घिरने लगा.

“तो क्या किया जाए… घर में रहने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं… क्यों न जरा दूरियाँ बनाई जाएँ… थोड़ा स्पेस लिया जाए… लेकिन कैसे?” निशिता ने इस दिशा में विचार करना शुरू किया तो टीवी देखना… गाने सुनना… बुक्स पढ़ना… कुकिंग करना… जैसे एक के बाद एक कई सारे समाधान विकल्प के रूप में आने लगे.

“फिलहाल तो सोशल मीडिया पर समय बिताया जाए.” सोचकर निशिता ने महीनों पहले छोड़ा अपना फ़ेसबुक अकाउंट लोगइन किया. ढेरों नोटिफ़िकेशन आए हुये थे और दर्जनों फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट… एक-एककर देखना शुरू किया तो मेहुल नाम की रिक्वेस्ट देखकर चौंक गई. आईडी खोलकर प्रोफ़ाइल देखी तो एक मुस्कान होठों पर तैर गई.

“कहाँ थे जनाब इतने दिन… आखिर याद आ ही गई हमारी…” मन ही मन सोचते हुये निशिता ने उसकी दोस्ती स्वीकार कर ली.

मेहुल… उसका कॉलेज फ्रेंड… जितना हैंडसम… उतना ही ज़हीन… कॉलेज का हीरो… लड़कियों के दिलों की धड़कन… लेकिन कोई नहीं जानता था कि मेहुल के दिल का काँटा किस पर अटका है. निशिता अपनेआप को बेहद खास समझती थी क्योंकि वह मेहुल के बहुत नजदीकी दोस्तों में हुआ करती थी. हालाँकि मेहुल ने कभी इकरार नहीं किया था और निशिता कि तो पहल का सवाल ही नहीं था लेकिन चाहत की चिंगारी तो दोनों के दिल में सुलग ही रही थी.

“कहीं वह इस राख़ में दबी चिंगारी को हवा तो नहीं दे रही…” निशिता ने एक पल को सोचा लेकिन अगले ही पल चैट हैड पर मेहुल को एक्टिव देखकर उसने अपने दिमाग को झटक दिया.

“लॉकडाउन में कुछ तो अच्छा हुआ.” मेहुल का मैसेज स्क्रीन पर उभरा. निशिता का दिल धड़क उठा. ऐसा तो कॉलेज के समय भी नहीं धड़कता था.

इसके बाद शुरू हुआ चैट का सिलसिला जो कॉलेज की चटपटी बातों से होता हुआ जीवनसाथी की किटकिटी पर ही समाप्त हुआ और वह भी तभी थमा जब कमल ने लंच का याद दिलाया. निशिता बेमन से उठकर रसोई में गई और जैसा-तैसा कुछ बना… खाकर… वापस मोबाइल पर चिपक गई.

बहुत देर इंतज़ार के बाद भी जब मेहुल ऑनलाइन नहीं दिखा तो वह निराश होकर लेट गई. खाने का असर था, जल्दी ही नींद भी आ गई. उठी तो कमल चाय का कप हाथ में लिए खड़ा था. निशिता ने एक हाथ में कप और दूसरे में मोबाइल थाम लिया. मेहुल का मैसेज देखते ही नींद कि खुमारी उड़ गई.

फिर वही देर शाम तक बातों का सिलसिला. मेहुल उससे नंबर माँग रहा था बात करने के लिए लेकिन निशिता ने उसे लॉकडाउन पीरियड तक टाल दिया. वह नहीं चाहती थी कि कमल को इस रिश्ते का जरा सा भी आभास हो. यूं भी इस तरह के रिश्ते तिजोरी में सहेजे जाने के लिए ही होते हैं. इनका खुले में जाहिर होना चोरों को आमंत्रण देने जैसा ही होता है. यानी आ बैल मुझे मार…

निशिता यह खतरा नहीं उठाना चाहती थी. वह तो इस कठिन समय को आसानी से बिताने के लिए कोई रोमांचक विकल्प तलाश रही थी जो उसे सहज ही मिल गया था. लेकिन इस आभासी रिश्ते के चक्कर में वह अपनी असल जिंदगी में कोई दूरगामी तूफान नहीं चाहती थी.

निशिता नहीं जानती थी कि आने वाले दिनों में ऊँट किस करवट बैठगा… लेकिन हाल फिलहाल वह बोरिंग हो रही जिंदगी में अनायास आए इस ताजी हवा के झौंके का स्वागत करने का मानस बना चुकी थी.

#coronavirus: कोरोना वायरस पर एक हाउसवाइफ का लेटर

कोरोना,तुम मेरे देश को जानते नहीं? हम तुम्हें गोबर से भी भगा सकते हैं. तुम ने यहां आ कर एक हाउसवाइफ के साथ अन्याय किया है. जब तुम्हारे डर का शोर मेरे बेटे के स्कूल में मचा तब मैं फेशियल करवा रही थी.

पति अमित टूर पर थे. मेरा मोबाइल बजा. वैसे तो मैं न उठाती, पर स्कूल का नाम देख कर उठाना ही पड़ा. मैसेज था अपने बच्चे को ले जाओ. ऐसा धक्का लगा न उस समय तुम्हें बहुत कोसा मैं ने. उस के बाद हमारी किट्टी पार्टी भी थी. टिशू पेपर से मुंह पोंछ कर मैं बंटी को लेने उस के स्कूल पहुंची. ऊपर से बुरी खबर. स्कूल ही बंद हो गए. बंटी को जानते नहीं हो न? इस की छुट्टियां मतलब मैं तलवार की नोक पर चलती हूं, कठपुतली की तरह नाचती हूं.

अमित जब बाहर से गुनगुनाते हुए घर में घुसते हैं इस का मतलब होता है मैं अलर्ट हो जाऊं, कुछ ऐसा हुआ जो अमित को तो पसंद है, पर मुझ पर भारी पड़ेगा. वही हुआ. तुम्हें यह लिखते हुए फिर मेरी आंखें भर आई हैं कि अमित के पूरे औफिस को अगले 3 महीनों के लिए वर्क फ्रौम होम का और्डर मिल गया. वर्क फ्रौम होम का मतलब किसी हाउसवाइफ से पूछो.

तो वर्क फ्रौम होम शुरू हो गया. मतलब अमित अब आराम से उठेंगे, उन के चायनाश्ते का टाइम अब तय नहीं होगा. मतलब मेरा मौर्निंग वाक अब गया तेल लेने… बंटी और अमित अब पूरा दिन रिलैक्स करेंगे कि पूछो मत. बंटी के स्कूल तो शायद कुद दिनों बाद खुल भी जाएंगे, पर अमित? 3 महीने? घर पर? वर्क फ्रौम होम? लैपटौप खुला रहेगा, रमाबाई की सफाई पर छींटाकशी होती रहेगी, मेरे अच्छेभले रूटीन पर कमैंट्स होते रहेंगे. बीचबीच में चाय बनाने के लिए कहा जाएगा, बाजार का कोई काम कहने पर ‘घर में तो काम करना मुश्किल हो जाता है,’ डायलौग है ही.

अमित कितने खुश हैं. अब मैं भीड़ से बचने के लिए वीकैंड पर मूवी देखने के लिए भी नहीं कहूंगी. ट्रेन, फ्लाइट की भीड़ से भी बचना है. यह भी तो नहीं कि अमित अगर घर पर हैं तो कुछ ऐक्स्ट्रा रोमांस, मुहब्बत जैसी कोई चीज हो रही है… अब तो साबुन, टिशू पेपर, सैनेटाइजर की ही बातें हैं न… कितनी बार हाथ धोती हूं, हाथों की स्किन ड्राई हो गई है…

और यह मेड भी तो कम नहीं. पता है कल रमाबाई क्या कह रही थी? कह रही

थी, ‘‘दीदी, मेरा पति कह रहा है, कोरोना कहीं तुम्हें मार न दे… रमा सब लोग वर्क फ्रौम होम ले रहे हैं… तुम भी 10 दिन की छुट्टी ले लो.’’

मैं ने घूरा तो भोली बन कर बोली, ‘‘दीदी क्या करें, आप लोगों की चिंता है… हम ही कहीं से न ले आएं यह कोरोना का इन्फैक्शन.’’

मैं अलर्ट हुई. जितना मीठा बोल सकती थी, उतना मीठा बोली, ‘‘नहीं रमा, तुम चिंता न करो… जो होगा देखा जाएगा… तुम आती रहना. बस आ कर हाथ अच्छी तरह धो लिया करो,’’ मन ही मन सोचा कि अमित और बंटी की छुट्टियां और कहीं यह भी गायब हो गई तो कोरोना के बच्चे, तुम्हें मेरे 7 पुश्ते भी माफ नहीं करेंगे.

बंटी और अमित की फरमाइशों पर नाचतेनाचते ही न मर जाऊं कहीं… हाय, ये दोनों कितने खुश हैं… उफ, अमित की आवाज आई है… बापबेटे का मन शाम की चाय के साथ पकौड़ों का हो आया है… वर्क फ्रौम होम है न, तो अब औफिस की कैंटीन की चटरपटर की आदत तो मुझे ही झेलनी है न… छोड़ो, मुझे कोरोना की बात ही नहीं करनी.

जवाब ब्लैकमेल का

कहानी- विनय कुमार पाठक

रमा सन्न रह गई. उस के मोबाइल पर व्हाट्सऐप पर किसी ने उस के अंतरंग क्षणों का वीडियो भेजा था और साथ में यह संदेश भी कि यदि वह इस वीडियो तथा इस तरह के और वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड होते नहीं देखना चाहती तो उस के साथ उसे हमबिस्तर होना पड़ेगा और वह सबकुछ करना पड़ेगा जो वह उस वीडियो में बड़े प्यार और कुशलता से कर रही है.

वह घर में फिलहाल अकेली थी. प्रकाश औफिस जा चुका था. वह शाम 7 बजे के बाद ही घर लौटता है. क्या करे, वह समझ नहीं पा रही थी. ‘प्रकाश को फोन करूं क्या?’ उस ने सोचा.

नहीं, पहले समझ तो ले मामला क्या है मानो उस ने खुद से कहा. उस ने वीडियो क्लिप को ध्यान से देखा. कहीं यह वीडियो डाक्टर्ड तो नहीं? किसी पोर्न साइट में उस के चेहरे को फिट कर दिया गया हो शायद. पर नहीं. यह डाक्टर्ड वीडियो नहीं था. वीडियो में साफसाफ वही थी. दृश्य भी उस के बैडरूम का ही था और उस के साथ जो पुरुष था वह भी प्रकाश ही था. बैडशीट भी उस की थी. इतनी कुशलता से कोई कैसे पोर्न वीडियो में तबदीली कर सकता है?

प्रकाश ओरल सैक्स का दीवाना था. वह तो पहले संकोच करती थी पर धीरेधीरे उस की झिझक भी मिट गई थी. अब वह भी इस का भरपूर आनंद लेने लगी थी. साथ ही प्रकाश उन क्षणों का आनंद रोशनी में ही लेना चाहता था. फ्लैट में और कोई था नहीं. अत: अकसर वे रोशनी में ही यौन सुख का आनंद लेते थे.

वीडियो में वह प्रकाश के साथ थी और बैडरूम के ठीक सामने स्विचबोर्ड भी साफसाफ दिख रहा था. पर ऐसा कैसे हो सकता है? यह दृश्य तो लगता है किसी ने जैसे कमरे में सामने खड़े हो कर फिल्माया है. उस का सिर चकराने लगा. उस की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था.

तभी उस के दिमाग में एक विचार कौंधा. ट्रूकौलर पर उस ने उस नंबर को सर्च किया, जिस से वीडियो क्लिप भेजा गया था. देवेंद्र महाराष्ट्र. ट्रूकौलर पर यही सूचना थी. देवेंद्र कौन हो सकता है? क्या इस नंबर पर कौल कर पता करे या फिर प्रकाश से बोले. वह कोई निर्णय कर पाती उस के पहले ही उस के मोबाइल की घंटी बज उठी.

‘‘हैलो.’’

‘‘भाभीजी नमस्कार, आशा है वीडियो आप को पसंद आया होगा. ऐसे कई वीडियो हैं हमारे पास आप के. कम से कम 25. कहो तो इन्हें सोशल मीडिया पर अपलोड कर दूं?’’

‘‘कौन हो तुम और क्या चाहते हो?’’

‘‘बहुत सुंदर प्रश्न किया है आप ने. कौन हूं मैं और क्या चाहता हूं? कौन हूं यह तो सामने आने पर पला चल जाएगा और क्या चाहता हूं

यह तो वीडियो क्लिप के साथ मैं ने बता दिया है आप को. सच पूछो भाभीजी तो आप के वीडियो का मैं इतना दीवाना हूं कि मैं ने तो पोर्न साइट देखना ही छोड़ दिया है. आप तो पोर्न सुपर स्टार को भी मात कर देती हैं. आप ने मुझे अपना दीवाना बना लिया है.’’

रमा समझ नहीं पाई कि क्या किया जाए. गुस्सा तो उसे बहुत आ रहा था पर उस से ज्यादा उसे डर लग रहा था कि कहीं सचमुच उस ने सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड कर दिया तो वह क्या करेगी. फिर उसने एक उपाय सोचा और उस के अनुसार उसे जवाब दिया, ‘‘देखो, मैं तैयार हूं पर इस के लिए सुरक्षित जगह होनी चाहिए.’’

‘‘आप के घर से सुरक्षित जगह और क्या होगी? प्रकाशजी तो रात में ही वापस आते हैं न?’’

रमा चौंक पड़ी. मतलब वीडियो भेजने वाला प्रकाश का नाम भी जानता है और वह कब आता है यह भी उसे पता है.

‘‘आते तो 7 बजे के बाद ही हैं पर औफिस तो इसी शहर में है. कहीं बीच में आ गए तो फिर मेरी क्या हालत होगी? 2 दिनों के बाद वे अहमदाबाद जाने वाले हैं 1 सप्ताह के लिए. इस बीच में आप की बात मान सकती हूं.’’

‘‘अरे, वाह आप तो बड़ी समझदार निकलीं. मैं तो सोच रहा था आप रोनाधोना शुरू कर देंगी.’’

‘‘बस, आप वीडियो किसी को मत दिखाइए और मेरे मोबाइल पर कोई वीडियो मत भेजिए. ये कहीं देख न लें… इसे मैं डिलीट कर रही हूं.’’

‘‘जैसे 1 डिलीट करेंगें वैसे ही 5 भी डिलीट कर सकती हैं. मैं कुछ और वीडियो भेजता हूं. देख तो लीजिए आप कितनी कुशलतापूर्वक काम को अंजाम देती हैं. देख कर आप डिलीट कर दीजिएगा. इन वीडियोज ने तो मेरी नींद उड़ा दी है. इंतजार रहेगा 2 दिन बीतने का. हां, कोईर् चालाकी मत कीजिएगा. मुझे अच्छा नहीं लगेगा कि दुनिया आप की इस कलाकारी को देखे. रखता हूं.’’

फोन डिसकनैक्ट हो गया. कुछ ही देर में एक के बाद एक कई क्लिप उस के मोबाइल पर आते गए. उस ने 1-1 क्लिप को देखा. ऐसा लग रहा था मानो कोई अदृश्य हो कर उन के क्रीड़ारत वीडियोज बना रहा था. शाम को प्रकाश आया तो रमा का चेहरा उतरा हुआ था. ‘‘तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’ प्रकाश ने टाई की नौट ढीली करते हुए पूछा. ‘‘तबीयत बिलकुल ठीक नहीं है, बड़ी मुसीबत में हूं. दिनभर सोचतेसोचते दिमाग भन्ना गया है,’’ रमा ने तौलिया और पाजामा उस की ओर बढ़ाते हुए कहा. ‘‘कितनी बार तुम्हें सोचने के लिए मना किया है. छोटा सा दिमाग और सोचने जैसा भारीभरकम काम,’’ कपड़े बदलते हुए प्रकाश ने चुटकी ली.

‘‘पहले फ्रैश हो लो, चायनाश्ता कर लो, फिर बात करती हूं,’’ रमा ने कहा और फिर रसोई की ओर चल दी.

प्रकाश फ्रैश हो कर बाथरूम से आ कर नाश्ता कर चाय पीने लगा. रमा चाय का कप हाथ में लिए उदास बैठी थी.

‘‘हां, मुहतरमा, बताइए क्या सोच कर अपने छोटे से दिमाग को परेशान कर रही हैं?’’ प्रकाश ने यों पूछा मानो वह उसे किसी फालतू बात के लिए परेशान करेगी.

जवाब में रमा ने अपना मोबाइल फोन उठाया, स्क्रीन को अनलौक किया और उस वीडियो क्लिप को चला कर उसे दिखाया.

वीडियो देख प्रकाश भौचक्का रह गया, ‘‘यह… क्या है?’’

‘कोई देवेंद्र है, जिस ने मुझे यह क्लिप भेजा है. इसे सोशल साइट पर अपलोड करने की धमकी दे रहा था. अपलोड न करने के लिए वह मेरे साथ वही सब करना चाहता है जो वीडियो में मैं तुम्हारे साथ कर रही हूं. मैं ने उस से 2 दिन की मोहलत मांगी है. उस से कहा है कि 2 दिन बाद तुम अहमदाबाद जा रहे हो. उस दौरान उस की मांग पूरी की जाएगी.’’

प्रकाश 1-1 क्लिप को देख रहा था. उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि कैसे कोई इतना स्पष्ट वीडियो बना सकता है. उस ने अपने बैड के पास जा कर देखा. कहीं कोई गुप्त कैमरा लगाने की गुंजाइश नहीं थी और कोई गुप्त कैमरा लगाता कैसे. घर में तो किसी अन्य के प्रवेश करने का प्रश्न ही नहीं है. अपार्टमैंट में सिक्युरिटी की अनुमति के बिना कोई आ ही नहीं सकता. उस के प्लैट के सामने अपार्टमैंट का ही दूसरा फ्लैट था जो काफी दूर था. ‘‘हमें पुलिस को खबर करनी होगी,’’ प्रकाश ने कहा, ‘‘पर पहले एक बार खुद भी समझने की कोशिश की जाए कि मामला क्या है.’’ दोनों काफी तनाव में थे. खाना खा कर कुछ देर तक टीवी देखते रहे पर किसी चीज में मन नहीं लग रहा था. रात के 11 बजे दोनों सोने बैड पर गए, पर नींद आंखों से कोसों दूर थी. पतिपत्नी दोनों की ही इच्छा नहीं थी और दिनों की तरह रतिक्रिया में रत होने की. और दिन होता तो प्रकाश कहां मानता. मगर आज तनाव ने सबकुछ बदल दिया था.

प्रकाश की बांहों में लेटी रमा कुछ सोच रही थी. प्रकाश छत को निहार रहा था. एकाएक प्रकाश को खिड़की के पास कोई संदेहास्पद वस्तु दिखाई दी. वह झपट कर खिड़की के पास गया. उस ने देखा सैल्फी स्टिक की सहायता से सामने वाले फ्लैट की खिड़की से कोई मोबाइल से उन की वीडियोग्राफी कर रहा था. प्रकाश तुरंत बाहर निकल कर उस फ्लैट में गया और डोरबैल बजाई. पर मोबाइल में शायद उस ने उसे बाहर निकलते हुए देख लिया था. काफी देर डोरबैल बजाने के बाद भी दरवाजा नहीं खुला तो प्रकाश वापस आ गया. उस ने इंटरकौम से सोसाइटी के सचिव को फोन कर मामले की जानकारी दी. सचिव ने बताया कि उस में कोई देवेंद्र नाम का व्यक्ति रहता है और किसी प्राइवेट फर्म में काम करता है. इस तरह की घटना से सभी हैरान थे.

काफी कोशिश की गई देवेंद्र से बात करने की. पर न तो उस ने फोन उठाया न ही दरवाजा खोला. हार कर सिक्युरिटी को ताकीद कर दी गई कि उस व्यक्ति को सोसाइटी से बाहर न निकलने दिया जाए.

दूसरे दिन सुबह थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई और फिर देवेंद्र को गिरफ्तार कर लिया गया. ‘‘तुम ने बहुत अच्छा निर्णय लिया कि वीडियो के बारे में मुझे बता दिया. यदि उस के ब्लैकमेल के झांसे में आ जाती तो काफी मुश्किल होती और फिर वह न जाने कितने लोगों को इसी तरह ब्लैकमेल करते रहता,’’ प्रकाश ने बिस्तर पर लेटेलेटे रमा की कमर में हाथ डालते हुए कहा. रमा ने उस के हाथ को हटाते हुए कहा, ‘‘पहले खिड़की के परदे ठीक करो, बत्ती बुझाओ फिर मेरे करीब आओ.’’ प्रकाश खिड़की के परदे ठीक करने के लिए उठ गया.

सत्यकथा: सिसकती मोहब्बत

राइटर- विजय पांडेय/श्वेता पांडे

महासमुंद जिले में स्थित श्रीराम कालोनी के पास स्वीपर कालोनी भी है. दोनों कालोनियों के बीच
एक छोटा सा मैदान है. अगर वह मैदान नहीं होता तो दोनों कालोनियों को एक ही माना जाता. इसी श्रीराम कालोनी में पूनम यादव रहती थी, उस के 3 बेटे थे रोहित, शिव और कान्हा यादव.
इसी कालोनी में जीवन साहू भी अपने परिवार के साथ रहता थ. उस के 3 बेटियां थीं. हम इस कहानी में सिर्फ नीतू का ही उल्लेख कर रहे हैं जिस का संबंध इस कहानी से है. 24 वर्षीय नीतू साहू जीवन साहू की ही बेटी थी. एक ही मोहल्ले के बाशिंदे होने के कारण स्वाभाविक रूप से रोहित यादव और नीतू साहू की अकसर मुलाकात हो जाया करती थी.
इस का परिणाम यह निकला कि कब दोनों एकदूसरे को चाहने लगे, उन्हें पता ही नहीं चला. दोनों का एकदूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा था. 3 महीने तक दोनों ने अपनी चाहतों को मन में ही छिपा कर रखा.
कभी न कभी तो इस चाहत को मुखर होना ही था. पहल रोहित यादव की ओर से हुई. एक दिन वह अपनी बाइक से कहीं जा रहा था कि उस की नजर कपड़े के शोरूप में गई. उस शोरूम के भीतर नीतू कपड़े पसंद करती दिखाई दी.
उस शोरूम का दरवाजा कांच का बना हुआ था, अत: अंदर की हलचल बाहर आतेजाते लोगों को दिखाई देती थी. उस शोरूम के बाहर रोहित ने बाइक खड़ी की और दरवाजा खोल कर अंदर घुस गया. वह सीधे उस काउंटर पर पहुंचा जहां नीतू कपड़े पसंद कर रही थी.

वहां ढेरों कपड़े बिखरे पड़े थे लेकिन उसे कुछ पसंद नहीं आ रहा था. नीतू के चेहरे पर झुंझलाहट साफसाफ दिखाई दे रही थी. रोहित ने उस के करीब पहुंच कर उस के कंधे पर हाथ रखा. नीतू चिहुंक कर पीछे पलटी. रोहित मुसकराते हुए बोला, ‘‘सूट खरीद रही हो क्या?’’
‘‘हां, कोई सूट जंच ही नहीं रहा.’’
‘‘क्या मैं इस में तुम्हारी कोई मदद कर सकता हूं?’’ बगैर नीतू को बोलने का मौका दिए काउंटर पर खड़ी लड़की की ओर मुखातिब होता हुआ अंगुली से इशारा करते हुए रोहित बोला, ‘‘मैडम, वो जो तीसरे रैक पर पिंक कलर का है, उसे दिखाइए.’’
पिंक कलर वाला सूट निकाल कर उस सेल्सगर्ल ने काउंटर पर रख दिया. रोहित सूट की तह खोल कर नीतू के सामने रखते हुए बोला, ‘‘यह तुम पर बहुत फबेगा.’’
उलटपलट कर देख कर नीतू ने भी उसे पसंद कर लिया. सहयोग के लिए शुक्रिया. पैक्ड सूट का पेमेंट कर नीतू काउंटर के स्टैंड पर रखा एक कैप हाथ में लेते हुए बोली, ‘‘ये कैप तुम पर बहुत जंचेगी.’’
फिर रोहित को कुछ बोलने का मौका दिए बगैर उस के सिर पर कैप लगाते हुए बोली, ‘‘देखो, बहुत जंच रहे हो.’’
रोहित ने पेमेंट करनी चाही, पर उस ने रोहित को ऐसा करने से रोका, ‘‘ये मेरी ओर से तुम्हारे लिए, प्लीज.’’
दोनों शोरूम से बाहर आए. नीतू बोली, ‘‘अच्छा किया तुम ने यहां आ कर. मेरी मदद हो गई.’’
‘‘कहां जाओगी?’’ रोहित ने पूछा.
नीतू जिस काम से आई थी, वह तो पूरा हो गया था. अब घर ही जाना था. वह कुछ कहती उस के पहले रोहित बोला, ‘‘कुछ समय मेरे लिए नहीं निकालोगी? एकएक कप कौफी हो जाए, उस के बाद मैं तुम्हें छोड़ दूंगा.’’

फिर खामोशी से उस ने उस के प्रस्ताव पर स्वीकृति दे दी. दोनों बाइक पर सवार हो कर कौफी शौप पर पहुंचे. रोहित ने बाइक स्टैंड पर खड़ी की. नीतू के एक हाथ में पौलीथिन का कैरीबैग था. उस के खाली हाथ को रोहित ने थाम लिया.
नीतू ने देखा मगर बोली कुछ नहीं.
एक खाली टेबल पर दोनों पहुंचे. उस समय कौफी शौप में बहुत भीड़ थी. टेबल के आमनेसामने दोनों बैठ गए.
‘‘कुछ और लोगी?’’ रोहित ने पूछा.
नीतू ने इनकार में अपना सिर हिलाया.
‘‘सिर्फ कौफी,’’ रोहित ने 2 कप कौफी का और्डर दिया.
5 मिनट बाद कौफी सर्व हुई. खामोशी के साथ दोनों कौफी का सिप लेते रहे.
लब खामोश थे. निगाहें बातें कर रही थीं. कौफी खत्म कर दोनों कौफी शौप से बाहर आए. बाइक पर नीतू को बिठा कर रोहित श्रीराम कालोनी पहुंचा.
नीतू के घर से थोड़ी दूरी पर उस ने बाइक रोकी. नीतू बाइक से उतर कर अपने घर की ओर बढ़ी ही थी कि रोहित ने आवाज लगाई, ‘‘नीतू, सुनो.’’
नीतू ने पलट कर रोहित की ओर सवालिया निगाहों से देखा. रोहित बोला, ‘‘कल वहीं मिलोगी क्या उस सूट के साथ? सच्ची कह रहा हूं, उस सूट में तुम्हें देखना चाहता हूं.’’
नीतू मुसकराते हुए बोली, ‘‘सोचूंगी.’’
फिर वह वहां रुकी नहीं. घर की ओर बढ़ गई. उस ने एक बार पीछे पलट कर देखा तो रोहित बाइक की सीट पर बैठा उसे बाय कर रहा था.
करार के मुताबिक अगले दिन नीतू उस से नहीं मिली और न ही 3-4 दिन तक दिखाई दी. परेशान हो कर रोहित नीतू के घर के सामने बाइक की सीट पर बैठा टकटकी बांधे उस के घर की ओर देखता रहा.

एक घंटे इंतजार के बाद नीतू उसे घर की छत पर कपड़े डालती हुई दिखाई दी. रोहित ने हाथ हिला कर अपनी ओर आकर्षित करना चाहा लेकिन जानबूझ कर नीतू ने अनदेखा कर दिया.
रोहित को बहुत गुस्सा आया. इधरउधर देखा और पास से एक पत्थर उठा कर जोर से छत की ओर उछाल दिया. पत्थर नीतू के पास जा कर गिरा.
नीतू को मालूम था कि ऐसा किस ने किया होगा. उस ने चौंकने की शानदार एक्टिंग की. इधरउधर निगाहें घुमाने के बाद रोहित पर जा कर ठहर गईं. रोहित ने उसे हाथ से इशारा किया साथ ही हवा में मुक्का घुमाया.
रोहित के ऐसा करने पर नीतू खिलखिला कर हंस पड़ी. उस के हंसने से रोहित का गुस्सा और बढ़ गया. उस ने गुस्से में अपने सिर के बालों को नोचने का नाटक किया. नीतू को हाथ का पंजा दिखा कर इशारे से बताया 5 बजे. फिर उस ने हाथ उठा कर चाय की चुस्की का इशारा किया.
हरी झंडी मिलते ही रोहित के चेहरे पर रौनक आ गई. बाइक पर बैठा और चल पड़ा. तय समय से 15 मिनट पहले रोहित कौफी शौप में जा कर एक टेबल के पास लगी कुरसी पर बैठ गया. घड़ी की सुइयां धीरेधीरे सरक रही थीं. सवा 5 होने जा रहा था. वह उठ कर बाहर जाने ही वाला था कि दरवाजा खोल कर नीतू आती दिखाई दी.

उठने को तत्पर रोहित फिर से वहीं बैठ गया. नीतू पिंक कलर का वही सूट पहन कर आई थी. टेबल के करीब पहुंच कर कुरसी पर बैठती हुई बोली, ‘‘ज्यादा इंतजार तो नहीं करना पड़ा हुजूर को? बस 15 मिनट लेट हुई हूं.’’
‘‘और वो 5 दिन जिस में तुम ने मुझ से मिलने का वादा किया था? वो इंतजार में शामिल नहीं है?’’
‘‘गुस्सा ठंडा कीजिए हुजूर.’’
फिर रोहित ने नारमल होते हुए कौफी मंगाई. कौफी पीते समय इधरउधर की बातें होती रहीं. मौका देख कर नीतू बोली, ‘‘तुम ने बुलाया मैं आ गई. हो गई तसल्ली.’’
‘‘5 दिन के इंतजार का ये सिला?’’
‘‘15 मिनट बहुत होते हैं जनाब.’’ कहते हुए नीतू कौफी शौप से बाहर निकल गई.
वक्त के साथ दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. प्यार का अंकुर अब बड़ा दरख्त बन चुका था. दोनों साल भर से एकदूसरे को प्यार कर रहे थे. इन दिनों में इन लोगों ने साथ जीनेमरने की कसमें भी खाईं लेकिन इस का क्या किया जाए कि समय को कुछ और ही मंजूर था.
10 जुलाई, 2021 को श्रीराम कालोनी में रात 9 बजे किसी की जन्मदिन की पार्टी चल रही थी. उस वक्त रोहित नीतू के घर के सामने बल्कि दरवाजे पर चिल्लाचिल्ला कर नीतू का नाम ले कर दरवाजा पीटे जा रहा था.

पार्टी में व्यवधान हो रहा था. सोनू प्रजापति और जागेश्वर साहू ने रोहित को ऐसा करने से मना किया. इस बीच सोनू ने किशन पांडेय को फोन कर श्रीराम कालोनी पहुंचने को कहा. सोनू ने जिस समय किशन को फोन किया, उस वक्त वह थोड़ी ही दूरी पर था. 2 मिनट में ही वह वहां पहुंच गया.
आननफानन बाइक को स्टैंड पर खड़ी कर गुत्थमगुत्था हो रहे सोनू, जागेश्वर और रोहित के बीच में वह भी घुस गया. ये 3 और रोहित अकेला. फिर भी तीनों पर भारी पड़ रहा था.
स्ट्रीट लाइट की रोशनी उन तक पहुंच रही थी. होहल्ला सुन कर नीतू छत पर पहुंच गई. रोहित काबू में नहीं आ रहा था. तीनों को मांबहन की गालियां देते हुए देख लेने की धमकी दिए जा रहा था.
नीतू ने रोहित को पहचान लिया. नीतू ने देखा कि उन तीनों में से एक के हाथ में चाकू था जिसे उस ने ऊपर उठाया और बगैर मौका दिए रोहित पर वार करता चला गया. छत पर खड़ी नीतू चिल्लाई, ‘‘छोड़ दो उसे…छोड़ दो उसे. कोई बचाओ.’’

उन चारों के पास कोई मोहल्ले वाला नहीं आया तब नीतू ने प्रेमी को बचाने के लिए छत से नीचे छलांग लगा दी और रोहित की ओर बढ़ना चाहा लेकिन उस के पैरों ने जवाब दे दिया. उस के पैर फ्रैक्चर हो चुके थे. एक पैर टूट ही गया. फिर भी वह वहीं जमीन पर पड़ी हुई चीखतीचिल्लाती रही.
सोनू प्रजापति, जागेश्वर साहू और किशन पांडेय रोहित को चाकू से मार कर फरार हो गए. उन के भागने के बाद मोहल्ले वाले वहां पहुंचे, जहां रोहित अपने ही खून में डूबा हुआ था. किसी ने रोहित के चाचा लालू यादव और पिता पूनम यादव को दौड़ कर यह सूचना दी.
दोनों भाई वहां पहुंचे. रोहित खून से तरबतर पड़ा था. आननफानन में पुलिस को बुलाया गया. तत्काल रोहित को पास के जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां चैकअप के बाद डाक्टरों ने रोहित को मृत घोषित कर दिया गया.
लालू यादव की रिपोर्ट पर महासमुंद सिटी कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. थानाप्रभारी शेर सिंह बंदे अपने साथ टीकाराम सारथी, सुशील शर्मा, योगेश सोनी आदि पुलिसकर्मियों को ले कर घटनास्थल पर पहुंचे.
वहां लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि रोहित पर 3 लोगों ने हमला किया था. लोगों ने यह भी बता दिया कि एक हमलावर कुम्हारपाड़ा का रहने वाला जग्गू साहू उर्फ जागेश्वर रायपुर की ओर भागा है.
तीनों फरारों के हुलिए के हिसाब से पुलिस ने जिले से बाहर जाने वाले रास्तों पर नाकाबंदी कर दी.
इस का नतीजा यह निकला कि महासमुंद के घोड़ारी के पास से पुलिस ने जागेश्वर को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ करने पर उस ने 2 लोग सोनू प्रजापति जोकि मूर्तिकार है और किशन पांडेय को घटना में शामिल बताया.

घटना के अगले दिन पुलिस ने दोनों को अलगअलग जगहों से धर दबोचा. इन लोगों ने अपने बयानों में बताया कि रोहित की दबंगई पहले से ही उन की आंखों में खटक रही थी.
उस दिन हम ने रोहित को समझाया लेकिन वह उत्तेजित हो कर हम तीनों को ही गालियां देने लगा था. रोहित हाथापाई पर उतर आया था. तब हम लोगों ने
मजबूर हो कर उसे सबक सिखाया.
उसी रात नीतू को जिला अस्पताल में एडमिट कराया गया. वह बारबार बेहोश हो रही थी. और जब भी होश आता तो एक ही सवाल करती, ‘‘रोहित…मेरा रोहित कैसा है?’’
जो भी हालचाल पूछने अस्पताल पहुंचता, हर किसी से यही पूछती कि रोहित कैसा है. ठीक तो है न.

कथा लिखने तक वह अस्पताल में भरती थी. लोगों की खामोशी ने नीतू को बहुत कुछ समझा दिया है. अपने दर्द को भूल कर वह रोहित की सलामती की कामना करती हुई बैड पर पड़ी थी.
रोहित के चाचा लालू यादव की रिपोर्ट पर महासमुंद पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 34 कायम कर आरोपियों को कोर्ट में पेश कर 14 दिनों के रिमांड पर ले लिया.
कहानी लिखी जाने तक पुलिस पड़ताल में जुटी हुई थी. हत्या में प्रयुक्त चाकू और घटना के समय पहन रखे कपड़े पुलिस ने जब्त कर लिए.
प्रेमी की जान बचाने के लिए नीतू ने छत से छलांग लगा दी थी, लेकिन इस के बाद भी उस का प्रेमी नहीं बच सका. कथा लिखने तक नीतू का अस्पताल में इलाज चल रहा था.
उसे इस बात की सूचना नहीं दी कि उस का प्रेमी रोहित अब इस दुनिया में नहीं है. प्रेमी की मौत की जब भी उसे जानकारी मिलेगी, यकीनन उसे बहुत बड़ा सदमा लगेगा.

अनमोल रिश्ता : समय के साथ कैसे बदला उनका रिश्ता ?

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शापित- भाग 2: रोहित के गंदे खेल का अंजाम क्या हुआ

Writer-आशीष दलाल

‘ऐसा कुछ नहीं होगा. तेरी मम्मी तेरे पास है न बेटा. सचसच बता कि क्या हुआ?’ सुनंदा ने नमन को विश्वास में लेते हुए बड़े ही प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा.

मां के स्नेह का स्पर्श और हूंफ पा कर नमन ने पिछले दिनों रोहित की उपस्थिति में अपने साथ हुआ सारा घटनाक्रम सुनंदा को कह सुनाया.

नमन की बात सुन कर सुनंदा के हाथपैर ढीले पड़ गए. वह वहीं पलंग पर सिर पकड़ कर बैठ गई. उस ने नमन का सिर अपनी गोद में ले लिया और उस के बालों को सहलाते हुए अपनी आंखों में उभर आए आंसुओं को पोंछने लगी.

‘तू घबरा मत बेटा. मैं हूं न,’ कुछ देर तक कुछ सोचने के बाद सुनंदा ने नमन के गालों को सहलाते हुए कहा और वापस रसोईघर में चली गई.

परीक्षाएं पूरी होने के बाद स्कूल की छुट्टियां होने से नमन घर पर ही था. सुनंदा ने अपने औफिस में फोन कर तबीयत ठीक न होने का बहाना कर छुट्टी ले ली, लेकिन सारा दिन घर पर रह कर वह व्यथित और परेशान थी. वह जल्दी से जल्दी नमन के पापा को रोहित की अपने बेटे के संग की गई घिनौनी हरकत के बारे में बता देना चाहती थी. उस ने दोपहर को संकेत को फोन कर सबकुछ बताना चाहा, लेकिन संकेत किसी मीटिंग में व्यस्त था. सो, उस से सुनंदा की बात न हो पाई. एकदो बार उस ने सोचा भी कि पड़ोस में जा कर चाची से बता कर उन्हें उन के सपूत रोहित की काली करतूत से अवगत करा आए, लेकिन फिर संकेत के बिना इस मामले में महिला हो कर अकेले पड़ना ठीक न समझा.

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शाम को जैसे ही संकेत घर आया, तो सुनंदा ने नमन के संग हुआ सारा घटनाक्रम उसे कह सुनाया.

‘तुम्हें कोई गलतफहमी हुई होगी सुनंदा. रोहित को मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वह ऐसा लड़का नहीं है. अपने भतीजे के संग वह ऐसी गिरी हुई हरकत कभी कर ही नहीं सकता,’ सुनंदा की बात सुन कर संकेत को अपने चचेरे भाई की हरकत पर विश्वास ही न हुआ.

‘संकेत, तुम्हारे अपने बेटे के संग गलत हुआ है. 12 साल का बच्चा बिना किसी खराब अनुभव के यह बात कैसे कह सकता है? तुम रोहित को अभी फोन लगा कर पूछो. सारी बात साफ हो जाएगी,’ संकेत का ठंडा रवैया देख कर सुनंदा जैसे चीख उठी.

‘ठीक है, करता हूं, लेकिन नमन कहां है?’ सुनंदा को शांत करते हुए संकेत ने नमन की पूछपरख करते हुए पूछा.

‘सुबह से अपने कमरे में है. बाहर ही नहीं आ रहा है वह. थोड़ीथोड़ी देर में कुछ सोचते हुए कहीं खो जाता है,’ सुनंदा ने जवाब दिया.

‘ठीक है. तुम समझा कर उसे बाहर ले कर आओ. मैं रोहित को फोन करता हूं,’ संकेत ने पैंट की जेब से मोबाइल निकालते हुए सुनंदा से कहा.

दो बार रोहित को फोन लगाने के बाद संकेत ने झुंझला कर मोबाइल टेबल पर रख दिया… तब तक सुनंदा नमन को ले कर उस के पास आ कर बैठ गई थी.

संकेत ने नमन के सिर पर बड़े ही प्यार से हाथ फेरा. नमन उसे आज कुछ सहमा सा नजर आ रहा था. उस का उदास चेहरा देख संकेत रोहित का नाम ले कर गुस्से से बड़बड़ा उठा, ‘मार डालूंगा साले को.’ फिर वह आगे कुछ बोलने ही जा रहा था, लेकिन फिर अपना गुस्सा पी कर चुप हो गया.

‘एक बार रिंग पूरी हो गई और दूसरी बार उस ने फोन काट दिया,’ संकेत ने सुनंदा की तरफ देखते हुए कहा. उस के स्वर में खीज समाई हुई थी.

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‘उस के मन में चोर हैै, तभी तो बात करने से भी कतरा रहा है. तुम जा कर चाचाजी से बात करो,’ सुनंदा परेशान हो उठी.

‘सुनंदा, चाचाजी से यह बात कैसे कर सकते हैं? आई मीन… मैं उन्हें किस शब्दों में यह सब कहूं? मुझ से ना कहा जाएगा.’

नमन सुनंदा के पास बैठा हुआ सुनंदा और संकेत की बातें सुन कर सारे घटनाक्रम की गंभीरता को समझने का यत्न कर रहा था. उसे अब तक तो समझ आ चुका था कि उस के संग कुछ गलत हुआ है, लेकिन वह यह समझ नहीं पा रहा था कि उस के पापा इस बात को रोहित अंकल के पापा से कहने से क्यों झिझक रहे थे.

‘संकेत. तुम्हारा अपना बेटा छला गया है. तुम्हें अंदाजा भी है. उसे इस बात की वास्तविकता जब बड़े होने पर समझ आएगी, तो उस पर क्या बीतेगी. जो भी हो, तुम्हें चाचाजी से बात कर रोहित की इस हरकत के बारे में बता कर उन्हें उस की काली करतूतों के बारे में बताना ही होगा. मैं अपने बेटे को न्याय दिला कर ही रहूंगी,’ सुनंदा अपनी जगह से उठ कर संकेत के पास जा कर खड़ी हो गई.

‘सुनंदा, तुम मेरे दर्द का अंदाजा नहीं लगा सकती, लेकिन इस बात को बड़े बुजुर्गों के सामने इस तरह से कहने से एक मर्यादा मुझे रोक रही है. समझ नहीं आ रहा कि क्या कहूं, कैसे कहूं?’ संकेत अपनी जगह से खड़ा हो गया.

‘तुम्हारे भाई के आड़े जब कोई संस्कार और मर्यादा गलत काम करते हुए नहीं आए तो तुम्हें तो केवल जो हुआ वही सचसच बोलना है. इस में कौन सी मर्यादा तुम्हारें आड़े आ रही है संकेत?’ संकेत का व्यवहार सुनंदा की समझ से परे था.

‘सुनंदा, तुम्हें भी अच्छी तरह से मालूम है कि ऐसी बातें हमारे परिवार में खुल कर नहीं की जा सकती हैं. फिर मां होने के नाते तुम्हें नमन का खयाल रखना चाहिए था,’ कहते हुए संकेत झुंझला उठा.

‘कहना क्या चाहते हो संकेत? जो कुछ हुआ, उस में सारा दोष मेरा ही है? मुझे क्या पता था कि तुम्हारे भाई की नियत में खोट है, वरना अपने बेटे को कभी भी उस घर में अकेले उस राक्षस के संग न छोड़ती. पिता हो कर तुम ने तो अपने बेटे को न्याय दिलाने के लिए अपने परिवार से ही लड़ने की हिम्मत नहीं है. सारा दोष तुम मेरे सिर पर डाल कर अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते,’ कहते हुए सुनंदा की आंखें भर आईं.

‘तो क्या करूं? जा कर खंजर घुसा दूं उस के पेट में?’ कुछ न कर पाने की विवशता में संकेत गुस्से से तिलमिला उठा.

अपने मम्मीपापा को अपनी वजह से आपस में लड़ते हुए देख नमन सहम गया. उसे मन ही मन अपने पर अफसोस होने लगा कि उस ने यह बात मम्मी को बताई ही क्यों. उस के मन में एक डर घर कर गया कि अब रोहित अंकल को पापा मार डालेंगे और उस का पाप रोहित अंकल के कहे अनुसार उस पर ही लगेगा.

सहसा रोते हुए वह दौड़ कर अंदर अपने कमरे में चला गया. उसे इस तरह अंदर जाते देख सुनंदा ने एक पल संकेत को घूरा और फिर नमन के पीछे अंदर चली गई.

सारे मसले में कुछ न कर पाने की बेबसी से संकेत बेचैन हो उठा. बेवजह वह कमरे में इधर से उधर चलने लगा, तभी हिम्मत जुटा कर वह घर से बाहर निकल गया और पांच कदम चल कर पड़ोस में स्थित अपने चाचाजी के घर के अंदर चला गया.

क्षितिज ने पुकारा- भाग 2: क्या पति की जिद के आगे नंदिनी झुक गई

‘‘जरूरत ही क्या है बाहर जाने की? रोजीरोटी कमाने जा रही हो? हमें पालना पड़ रहा है तुम्हें? कितने पैसे आते हैं महीने में? मुश्किल से 7-8 हजार… इन के न आने से हमें क्या फर्क पड़ेगा? घर में रह कर घर का खयाल नहीं रख सकती? बाप के घर में खाने के लाले पड़े होंगे, जो बेटी का कमाया खाया… यहां हम बीवी का कमाया देखते तक नहीं.’’

‘‘इस की बेटी भी ज्यादा दिन घर में नहीं रहेगी, देख लेना… अभी ही अगर इस की मां को कुछ कह दें तो तुरंत जवाब देती है,’’ बूआ ने आग में घी का काम किया.

नंदिनी का दिल बैठा जा रहा था. ये लोग ऐसे ही बोलते रहेंगे तो 13 साल की बेटी भी जीने का उत्साह खो देगी. पति न समझे तो कैसे वह अपने जनून और कला को जिंदा रखे? कैसे रूपेश को समझाए कि यह 7-8 हजार की बात नहीं है. उस की नसों में, उस के खून के उबाल में अभिनय तड़पता है. उस तड़प की अभिव्यक्ति बिना वह मृतप्राय है.

पत्नी के मन को छुए बिना पति यह कैसे समझे कि यह न तो बाहरी मर्दों को पाने की चाह है, न पैसों की लालसा, न जिम्मेदारियों से भागने की मंशा और न ही पति के साथ प्रतियोगिता.

इस सब के बीच अपनी बेटी को वह कैसे स्त्री होने के मान और गौरव से सजाए यह भी नंदिनी के लिए एक बड़ा प्रश्न था. बेटी वेणु ने डाइनिंग टेबल पर 2-4 मिनट रुक कर अपना खाना खत्म कर ऊपर अपने कमरे में चली गई. वह बहुत कम बोलती थी. न हंसतीखेलती थी और न ही किसी बात पर अपनी राय देती थी.

बूआ और रूपेश खाना खाते हुए व्यंग्यबाणों से नंदिनी का कलेजा छलनी कर रहे थे..

आए दिन खाते वक्त ही इन का यह सिलसिला शुरू होता और नंदिनी भूखे पेट ही रह जाती. रसोई का काम निबटा कर वह अपने कमरे में चली गई. बेटी को झांका. वह सो चुकी थी. अपने कमरे में आ कर वह बिस्तर पर लेट गई. आज उम्मीद नहीं थी कि रूपेश ऊपर आए. शायद नीचे बाबूजी के कमरे में ही सो जाए.

खुली खिड़की से आती ठंडी हवा उसे सहलाने लगी. निर्मम बूआ और उन्हीं की शिक्षा से पलेबढ़े रूपेश का चेहरा बारबार उस की आंखों के सामने आ रहा था.

आंसुओं के तूफान में नंदिनी को अपनी सास की हर बात याद आने लगी. उस की शादी के 2 साल बाद ही सास गुजर गई थीं, लेकिन उन के साथ बिताए पल उस की स्मृति में अब भी ताजा हैं. सास से सुना था उस ने…

बूआ सास अर्थात हिरन्मयी की शादी खातेपीते पुजारी ब्राह्मण से हुई थी. 70 के दशक के शुरुआती वर्ष में वह कच्चे यौवन से मदमाती खिलती कली थी. उम्र का 17वां पड़ाव घूंघट के नीचे आकंठ प्यास, शरीर में भौंरों का गुंजन, मन कामनाओं से सराबोर…

ससुराल में सास और पति के अलावा एक चंचल सा देवर जिस के होंठों में भरपूर रसीला सा आमंत्रण सदैव पारिवारिक कायदे में छिपा दबा रहता था.

30 साल के पति को परमेश्वर मानने की परंपरा ने हिरन्मयी को बस पति के भोग का साधन ही बना रखा था. जिंदगी चलती जा रही थी. एक दिन अचानक ‘बस के खाई में गिरने से 50 की मौत’ के समाचार में पति का नाम देख उस की जिंदगी खत्म हो गई.

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अब वह घर की बहू न रह गई थी. विधवा बहू सास के लिए बेटे के मौत की साक्षात तसवीर थी. सफेद साड़ी में लिपटी बहू हमेशा सास की आंखों के सामने बेटे की मौत की गवाह बनी रहती.

पंडिताई कर के ससुरजी ने बहुत कमाया था. घर में 2 गाएं भी थीं. अपनी जमीन थी, जो उन के शहर से दूर गांव में थी. सास वहां अपने खेत के चावल लेने जाया करतीं. अन्नसंपन्न घर था, लेकिन विधवा की स्थिति तब बहुत खराब थी. दिन भर दोमंजिले मकान में काम करते वह थकती नहीं थी, लेकिन सास को संतुष्ट कर पाना अब उस के वश में नहीं था.

तानोंउलाहनों से उस के पंख कटे यौवन पर हर वक्त चोट करती रहती. बड़े बेटे की मौत ने उन्हें प्रकृति से प्रतिशोध का यही सहज तरीका सुझाया था. जहां सहानुभूति इनसान को जोड़ती है, कृतज्ञ बनाती है वहीं क्रूरता बगावत को निमंत्रण देती है. हिरन्मयी देवर के आकर्षण के प्रति सचेत सहने लगीं. रसोई हो या बरतन मांजने की जगह, छत पर कपड़े सुखाने हों या कमरों की सफाई करनी हो, साए की तरह देवर पीछे रहता. ऐसे ही एक दिन सूखे कपड़े छत से उतारते वक्त देवर ने पीछे से आ जकड़ा. प्यासी हिरन्मयी चेतनाशून्य सी होने लगी. देवर उसे कमरे में ले गया और फिर दोनों दीनदुनिया से बेखबर एकदूसरे में समा गए.

छत से सास की सहेली गायत्री ने सारा नजारा अपनी आंखों में कैद कर लिया. अचानक दरवाजे पर जोरजोर से ठकठक होने लगी तो दोनों कपड़े समेटते हुए खड़े हुए. फिर बहू के लिए घर का दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो गया. पर बेटा अपना था. अत: उसे माफ कर दिया गया.

गनीमत यह रही कि बड़े बेटे की इज्जत और छोटे ब्याह की खातिर बात दबा दी गई. शीघ्रातिशीघ्र हिरन्मयी के पिता को बुला कर बेटी सौंप दी गई. एक अध्याय समाप्त.

पिता और भाई ने उस के वैधव्य की हताश को छेड़े बिना उसे सहारा दिया. पिता के साथ वाले नीचे के कमरे में उसे हमेशा के लिए जगह दे दी गई. पिता की ओर से फिर कभी उस की शादी की कोशिश नहीं की गई. इसलिए कि कहीं दबीढकी बात खोजबीन में सामने न आ जाए और रहीसही शांति भी नष्ट हो जाए. निजी हताशा हिरन्मयी के पलपल में बसने लगी.

इधर रूपेश की मां अचानक बीमार रहने लगी. उसे क्या हुआ है डाक्टर पकड़ नहीं पा रहे थे. कभी मुंह में छाले, कभी बुखार तो कभी पेट दर्द. वह ज्यादातर वक्त या तो स्वयं को ले कर पस्त रहती या फिर परिवार के कामकाज को ले कर. अकेली बूआ ने अपनी सार्थकता सिद्ध करने के लिए इस परिवार का भार अपने कंधों पर लेना शुरू कर दिया.

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रूपेश से लगाव और स्नेह की मात्रा में स्वयं का आधिपत्य भी समाने लगा. ‘मुझे जिंदगी ने दिया ही क्या है’ के भाव की जगह ‘मुझे सब कुछ अपना बनाना होगा’ का भाव गहरा होता गया. बारबार उसे देवर की याद आती. सोचती कि अगर सास चाहती तो देवर के साथ उस का ब्याह कर सकती थी. देवर भी तो उस से 4 साल बड़ा ही था. लेकिन कलंकित मान कर बुरी तरह निकाल दिया.

इधर नंदिनी की सास की कायामात्र ही इस परिवार में बची रह गई थी. बूआ थीं वर्चस्व की अधिकारिणी.

रूपेश के जीवन पर बूआ की हर मानसिकता की गहरी छाप थी. बूआ का हरे से जीवन का अचानक पतझड़ में बदल जाना संतप्त और नकारात्मक व्यक्तित्व के निर्माण का मूल कारण बन गया था और इसी बूआ के सांचे में ढला रूपेश आज की आधुनिक जीवनशैली में भी सामंती सोच का प्रतिनिधि था.

आखिर रूपेश की शादी के 2 साल बाद लंबी बीमारी के बाद रूपेश की मां चल बसी. रूपेश का अपनी मां से लगाव न के बराबर रह गया था. उस के पूरे निर्णय और सोच बूआ की सत्तासीन सोचों से प्रेरित थे.

सास की मौत के कुछेक सालों में नंदिनी के ससुर भी गुजर गए. 

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