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एक साथी की तलाश: भाग 1- क्या श्यामला अपने पति मधुप के पास लौट पाई?

शाम गहरा रही थी. सर्दी बढ़ रही थी. पर मधुप बाहर कुरसी पर बैठे शून्य में टकटकी लगाए न जाने क्या सोच रहे थे. सूरज डूबने को था. डूबते सूरज की रक्तिम रश्मियों की लालिमा में रंगे बादलों के छितरे हुए टुकड़े नीले आकाश में तैर रहे थे. उन की स्मृति में भी अच्छीबुरी यादों के टुकड़े कुछ इसी प्रकार तैर रहे थे.

2 दिन पहले ही वे रिटायर हुए थे. 35 सालों की आपाधापी व भागदौड़ के बाद का आराम या विराम… पता नहीं…

‘‘पर, अब… अब क्या…’’ विदाई समारोह के बाद घर आते हुए वे यही सोच रहे थे. जीवन की धारा अब रास्ता बदल कर जिस रास्ते पर बहने वाली थी, उस में वे अकेले कैसे तैरेंगे.

‘‘साब सर्दी बढ़ रही है… अंदर चलिए,’’ बिरूवा कह रहा था.

‘‘हूं…’’ अपनेआप में खोए मधुप चौंक गए.

‘‘हां… चलो,’’ कह कर वे उठ खड़े हुए.

‘‘इस वर्ष सर्दी बहुत हो रही है साब…’’ बिरूवा कुरसी उठा कर उन के साथ चलते हुए बोला, ‘‘ओस भी बहुत पड़ रही है. सुबह सब भीगाभीगा रहता है, जैसे रातभर बारिश हुई हो,’’ बिरूवा लगातार बोलता जा रहा था.

मधुप अंदर आ गए. बिरूवा उन के अकेलेपन का साथी था. अकेलेपन का श्राप उन्हें मिला था, पर भुगता बिरूवा ने भी था.

खाली घर में बिरूवा कई बार अकेला ही बातें करता रहता. उन की जरूरत से अधिक चुप रहने की आदत थी. उन की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न पा कर बड़बड़ाया हुआ वह स्वयं ही खिसिया कर चुप हो जाता.

पर, श्यामला खिसिया कर चुप न होती थी, बल्कि झल्ला जाती थी, ‘‘मैं क्या दीवारों से बातें कर रही हूं. हूं, हां भी नहीं बोल पाते. चेहरे पर कोई भाव ही नहीं रहते, किस से बातें करूं,’’ कह कर कभीकभी उस की आंखों में आंसू आ जाते.

मधुप की आवश्यकता से अधिक चुप रहने की आदत श्यामला के लिए इस कदर परेशानी का सबब बन गई थी कि वह दुखी हो जाती थी. उन की संवेदनहीनता, स्पंदनहीनता की ठंडक, बर्फ की तरह उस के संपूर्ण व्यक्तित्व को झुुलसा रही थी. नाराजगी में तो मधुप और भी अभेद हो जाते थे. मधुप ने कमरे में आ कर टीवी चला दिया. तभी बिरूवा गरम सूप ले कर आ गया, ‘‘साब सूप पी लीजिए.’’

बिरूवा के हाथ से ले कर वे सूप पीने लगे. बिरूवा भी वहीं जमीन पर बैठ गया. कुछ बोलने के लिए वह हिम्मत जुटा रहा था, फिर किसी तरह बोला, ‘‘साब घर वाले बहुत बुला रहे हैं. कहते हैं, अब घर में आराम करो, बहुत कर लिया कामधाम, दोनों बेटे कमाने लगे हैं. अब जरूरत ना है काम करने की…’’

मधुप कुछ बोल न पाए, छन्न से दिल के अंदर कुछ टूट कर बिखर गया. बिरूवा का भी कोई है, जो उसे बुला रहा है. 2 बेटे हैं जो उसे आराम देना चाहते हैं. उस के बुढ़ापे की और असशक्त होती उम्र की फिक्र है उन्हें… लेकिन सबकुछ होते हुए भी यह सुख उन के नसीब में नहीं है.

बिरूवा के बिना रहने की वे कल्पना भी नहीं कर पाते. अकेले में इस घर व दीवारों से भी उन्हें डर लगता है, जैसे कोनों से बहुत सारे साए निकल कर उन्हें निगल जाएंगे. उन्हें अपनी यादों से भी डर लगता है और अकेले में यादें बहुत सताती हैं.

‘‘सारा दिन आप व्यस्त रहते हैं, रात को भी देर से आते हैं, मैं सारा दिन अकेले घर में बोर हो जाती हूं,’’ श्यामला कहती थी.

‘‘तो और औरतें क्या करती हैं? और क्या करती थीं? बोर होना तो एक बहाना भर होता है काम से भागने का. घर में सौ काम होते हैं करने को.’’

‘‘पर, घर के काम में कितना मन लगाऊं. घर के काम तो मैं कर ही लेती हूं. आप कहो तो बच्चों के स्कूल में एप्लीकेशन दे दूं नौकरी के लिए, कुछ ही घंटों की तो बात होती है, दोपहर में बच्चों के साथ घर आ जाया करूंगी,’’ श्यामला ने अनुनय किया.

‘‘कोई जरूरत नहीं है. कोई कमी है तुम्हें?’’ अपना निर्णय सुना कर जो मधुप चुप हुए तो कुछ नहीं बोले. उन से कुछ बोलना या उन को मनाना टेढ़ी खीर था. हार कर श्यामला चुप हो गई. जबरदस्ती भी करे तो किस के साथ, और मनाए भी तो किस को…

‘‘नोवल्टी में अच्छी पिक्चर लगी है, चलिए न किसी दिन देख आएं. कहीं भी तो नहीं जाते हैं हम…’’

‘‘मुझे टाइम नहीं… और वैसे भी 3 घंटे हाल में मैं नहीं बैठ सकता.”

‘‘तो फिर आप कहें तो मैं किसी सहेली के साथ हो आऊं.’’

‘‘कोई जरूरत नहीं भीड़ में जाने की, सीडी ला कर घर पर देख लो.’’

‘‘सीडी में हाल जैसा मजा कहां आता है.’’

लेकिन अपना निर्णय सुना कर चुप्पी साधने की उन की आदत थी. श्यामला थोड़ी देर बोलती रही, फिर चुप हो गई. तब नहीं सोच पाते थे मधुप कि पौधे को भी पल्लवित होने के लिए धूप, छांव, पानी व हवा सभी चीजों की जरूरत होती है. किसी एक चीज के न होने पर भी पौधा मर जाता है. दफिर श्यामला तो इनसान थी. उसे भी खुश रहने के लिए हर तरह के मानवीय भावों की जरूरत थी, वह उन का एक ही रूप देखती थी. आखिर कैसे खुश रह पाती वह.

‘‘थोड़े दिन पूना हो आऊं मां के पास. भैयाभाभी भी आए हैं आजकल. उन से भी मुलाकात हो जाएगी.’’

‘‘कैसे जाओगी इस समय?’’ मधुप आश्चर्य से कहते और पूछते, ‘‘किस के साथ जाओगी?’’

‘‘अरे, अकेले जाने में क्या हुआ… 2 बच्चों के साथ सभी जाते हैं.’’

‘‘जो जाते हैं, उन्हें जाने दो. पर, मैं तुम लोगों को अकेले नहीं भेज सकता.’’

फिर श्यामला लाख तर्क करती, मिन्नतें करती, पर मधुप के मुंह पर जैसे टेप लग जाता.

ऐसी अनेकों बातों से शायद श्यामला का अंतर्मन विरोध करता रहा होगा. पहली बार विरोध की चिनगारी कब सुलगी और अब भड़की, याद नहीं पड़ता मधुप को.

‘‘साब खाना लगा दूं,’’ बिरूवा कह रहा था.

‘‘भूख नहीं है बिरूवा, अभी तो सूप लिया है.’’

‘‘थोड़ा सा खा लीजिए साब, आप रात का खाना अकसर छोड़ने लगे हैं.”

‘‘ठीक है, थोड़ा सा यहीं ला दे,’’ मधुप बाथरूम से हाथ धो कर बैठ गए.

इस एकरस दिनचर्या से वे 2 दिन में ही घबरा गए थे, तो श्यामला कैसे बिताती पूरी जिंदगी. वे बिलकुल भी शौकीन तबीयत के नहीं थे. न उन्हें संगीत का शौक था, न किताबें पढ़ने का, न पिक्चरों का, न घूमने का. न बातें करने का.

श्यामला की जीवंतता, मधुप की निर्जीवता से अकसर घबरा जाती. कई बार चिढ़ कर वह कहती, ‘‘ठूंठ के साथ आखिर कैसे जिंदगी बिताई जा सकती है.’’

‘‘काश, तभी संभाल लिया होता सबकुछ.’’

श्यामला के जीवन में स्पंदन था, संवेदनाएं थीं, भावनाएं थीं और वे…? श्यामला कहती, ‘‘आप को सिर्फ अपनेआप से प्यार है, मैं और बच्चे तो आप के लिए जीवनयापन करने के यंत्र भर हैं.’’

दगाबाज : आयुषा के साथ क्या हुआ

सरन अपने बेटे विनय की दुलहन आयुषा का परिचय घर के बुजुर्गों और मेहमानों से करवा रही थीं. बरात को लौटे लगभग 2 घंटे बीत चुके थे. आयुषा सब के पैर छूती, बुजुर्ग उसे आशीर्वाद देते व आशीर्वाद स्वरूप कुछ भेंट देते. आयुषा भेंट लेती और आगे बढ़ जाती.

जीत का परिचय करवाते हुए सरन ने जब आयुषा से कहा, ‘‘ये मोहना के पति और तुम्हारे ननदोई हैं,’’ तो एकाएक उस की निगाह जीत पर उठ गई. जीत से निगाह मिलते ही उस के शरीर में झुरझुरी सी छूट गई. जीत उस का पहला प्यार था, लेकिन अब मोहना का पति. जिंदगी कभी उसे ऐसा खेल भी खिलाएगी, आयुषा सोचती ही रह गई. अंतर्द्वंद्व के भंवर में फंसी वह निश्चय नहीं कर पाई कि जीत के पैर छुए या नहीं? अपने मन के भावों को छिपाने का प्रयास करते हुए उस ने बड़े संकोच से उस के पैरों की तरफ अपने हाथ बढ़ाए.

जीत भी उसे अपने साले की पत्नी के रूप में देख कर हैरान था. वह भी नहीं चाहता था कि आयुषा उस के पैर छुए. आयुषा के हाथ अपने पैरों की ओर बढ़ते देख कर वह पीछे खिसक गया. खिसकते हुए उस ने आयुषा के समक्ष अपने हाथ जोड़ दिए. प्रत्युत्तर में आयुषा ने भी वही किया. दोनों के बीच उत्पन्न एक अनचाही स्थिति सहज ही टल गई.

जीत को देखते ही आयुषा के मन का चैन लुट गया था. जीवन में कुछ पल ऐसे भी होते हैं, जिन्हें भुलाने को जी चाहता है. वे पल यदि जीवित रहें तो ताजे घाव सा दर्द देते हैं. ठीक वही दर्द वह इस समय महसूस कर रही थी. सुहागशय्या पर अकेली बैठी वह अतीत में खो गई.

मामा की लड़की रंजना की शादी में पहली बार उस का साक्षात्कार जीत से हुआ था. मामा दिल्ली में रहते हैं. पेशे से वकील हैं. गली सीताराम में पुश्तैनी हवेली के मालिक हैं. तीनमंजिला हवेली की निचली मंजिल में बड़े हौल से सटे 4 कमरे हैं. मुख्य द्वार से सटे एक बड़े कमरे में उन का औफिस चलता है. बाकी कमरे खाली पड़े रहते हैं. बीच की मंजिल में 12 कमरे हैं, जिन में उन का 4 प्राणियों का परिवार रहता है. नानी, वे स्वयं, मामी और रंजना. बेटा प्रमोद भोपाल में सर्विस में है. ऊपरी मंजिल में 6 कमरे हैं, लेकिन सभी खाली हैं.

मैं अपनी मम्मी के साथ शादी अटैंड करने आई थी. पापा 2 दिन बाद आने वाले थे. मेहमानों को रिसीव करने के लिए मामा, मामी और उन के परिवार के कुछ सदस्य ड्योढ़ी पर खड़े थे. हवेली में घुसते हुए अचानक मेरे पैर लड़खड़ा गए थे. इस से पहले कि मैं गिरती, मामी के पास खड़े जीत ने मुझे संभाल लिया था. वह पहला क्षण था जब मेरी निगाहें जीत से टकराई थीं. प्रेम बरसात में उफनती नदियों की तरह पानी बड़े वेग से आता है, उस क्षण भी यही हुआ था. हम दोनों ने उस वेग का एहसास किया था.

उस के बाद शादी के दौरान ऐसा कोई क्षण नहीं आया जब हमारी नजरें एकदूसरे से हटी हों. जीत सा सुंदर और आकर्षक जवान मैं ने इस से पहले कभी नहीं देखा था. मैं मानूं या न मानूं पर सत्य कभी नहीं बदला जा सकता. कोई जब हमारी कल्पना से मिलनेजुलने लगता है, तो हम उसे चाहने लगते हैं. उस की समीपता पाने की कोशिश में लग जाते हैं. उस समय मेरा भी यही हाल था. मैं जीत की समीपता हर कीमत पर पा लेना चाहती थी.

मामा द्वारा रंजना की शादी हवेली से करने का फैसला हमारे लिए फायदेमंद सिद्ध हुआ था. इतनी विशाल हवेली में किसी को पुकार कर बुला लेना या ढूंढ़ पाना दूभर था. रंजना की सगाई वाले दिन सारी गहमागहमी निचली और पहली मंजिल तक ही सीमित थी. जीत ने सीढि़यां चढ़ते हुए जब मुझे आंख के इशारे से अपने पास बुलाया तो न जाने क्यों चाह कर भी मैं अपने कदमों को रोक नहीं पाई थी.

सम्मोहन में बंधी सब की नजरों से बचतीबचाती मैं भी सीढि़यों पर उस के पीछेपीछे चढ़ती चली गई थी. थोड़े समय में ही हम ऊपरी मंजिल की सीढि़यों पर थे. एकाएक उस ने मुझे अपनी बांहों में जकड़ कर अपने तपते होंठों को मेरे होंठों पर रख दिया था. अपने शरीर पर उस के हाथों का दबाव बढ़ते देख कर मैं ने न चाहते हुए भी उस से कहा था, ‘छोड़ो मुझे, कोई ऊपर आ गया तो?’

पर वह कहां सुनने वाला था और मैं भी कहां उस के बंधन से मुक्त होना चाह रही थी. मैं ने अपनी बांहों का दबाव उस के शरीर पर बढ़ा दिया था. न जाने कितनी देर हम दोनों उसी स्थिति में आनंदित होते रहे थे. लौट कर सारी रात मुझे नींद नहीं आई थी. जीत की बांहों का बंधन और तपते होंठों का चुंबन मेरे मनमस्तिष्क से हटाए भी नहीं हटा था.

अगली रात ऊपरी मंजिल का एक कमरा हमारे शारीरिक संगम का गवाह बना था. जीत और मैं एकदूसरे में समाते चले गए थे. दो शरीरों की दूरियां कैसे कम होती जाती हैं, यह मैं ने उसी रात जाना था. कितने सुखमय क्षण थे वे मेरी जवानी के, सिर्फ मैं ही जान सकती हूं. उन क्षणों ने मेरी जिंदगी ही बदल डाली थी.

शादी के बाद हम बिछुड़े जरूर थे पर इंटरनैट हमारे मिलन का एक माध्यम बना रहा था. हम घंटों चैट करते थे. एकदूसरे की समीपता पाने को तरसते रहते थे. हम निश्चय कर चुके थे कि हम शीघ्र ही शादी के बंधन में बंध जाएंगे.

तभी एक दिन मैं ने पापा को मम्मी से कहते हुए सुना था, ‘आयुषा के लिए मैं ने एक सुयोग्य वर तलाश लिया है. लड़का सफल व्यवसायी है. पिता का अलग व्यापार है. लड़के के पिता का कहना है कि वे अपनी लड़की की शादी पहले करना चाहते हैं. उस की शादी होते ही वे बेटे की शादी कर देंगे. तब तक हमारी आयुषा भी एमए कर चुकी होगी.’

मम्मी तो पापा की बात सुन कर प्रसन्न हुई थीं, पर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई थी. उसी शाम जीत से चैट करते हुए मैं ने उसे साफ शब्दों में कहा था, ‘जीत या तो तुम यहां आ कर पापा से मेरा हाथ मांग लो या फिर मैं पापा को स्थिति स्पष्ट कर के उन्हें तुम्हारे डैडी से मिलने के लिए भेज देती हूं.’

जीत ने कहा था, ‘तुम चिंता मत करो. यह समस्या अब तुम्हारी नहीं बल्कि मेरी है. मैं वादा करता हूं, तुम्हें मुझ से कोई नहीं छीन पाएगा. तुम सिर्फ मेरी हो. मुझे सिर्फ थोड़ा सा समय दो.’ उस ने मुझे आश्वस्त किया था.

उस के बाद जीत ने चैट करना कम कर दिया था. फिर धीरेधीरे मेरे और जीत के बीच दूरियों की खाई इतनी बढ़ती चली गई कि भरी नहीं जा सकी. जीत ने मुझ से अपना संपर्क ही तोड़ लिया. बरबस मुझे पापा की इच्छा के समक्ष झुकना पड़ा था.

सुहागकक्ष का दरवाजा बंद होने की आवाज के साथ मेरी तंद्रा टूट गई. विनय सुहागशय्या पर आ कर बैठ गए, ‘‘परेशान हो,’’ उन्होंने प्रश्न किया.

अपने मन के भावों को छिपाते हुए मैं ने सहज होने की कोशिश की, ‘‘नहीं तो,’’ मैं ने उत्तर दिया.

‘‘आयुष,’’ मुझे अपनी बांहों में भरते हुए विनय बोले, ‘‘मैं इस पल को समझता हूं. तुम्हें घर वालों की याद आ रही होगी, पर एक बात मेरी भी सच मानो कि मैं तुम्हारी जिंदगी में इतनी खुशियां भर दूंगा कि बीती जिंदगी की हर याद मिट जाएगी.’’

मेरे मन के कोने में हमसफर की एक छवि अंकित थी. विनय का व्यक्तित्व ठीक उस छवि से मिलता था. इसलिए मैं विनय को पा कर धन्य हो गई थी. ऐसे में हर पल मेरा मन यह कहने लगा था कि विनय जैसे सीधेसच्चे इंसान से कुछ भी छिपाना ठीक नहीं होगा. संभव है भविष्य में मेरे और जीत के रिश्तों का पता चलने पर विनय इन्हें किस प्रकार लें? तब पता नहीं हमारी विवाहित जिंदगी का क्या हश्र हो? मैं उस समय कोई भी कुठाराघात नहीं सह पाऊंगी. मुझे आत्मीयों की प्रताड़ना अधिक कष्टकर प्रतीत होती है, पर जबजब मैं ने विनय को सत्य बताने का साहस किया. मेरा अपना मन मुझे ही दगा दे गया. बात जबान पर नहीं आई. दिन बीतते गए. यहां तक कि हम महीने भर का हनीमून ट्रिप कर के यूरोप से लौट भी आए.

हनीमून के दौरान विनय ने मेरी उदासी को कई बार नोटिस किया था. उदासी का कारण भी जानना चाहा, पर मैं द्वंद्व में फंसी विनय को कुछ भी नहीं बता पाई. उसे अपने प्यार में उलझा कर मैं ने हर बार बातों का रुख ही बदल दिया था.

हनीमून से लौटते ही विनय 2 महीने के बिजनैस टूर पर फ्रांस और जरमनी चले गए. सासूमां ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया पर वे नहीं रुके. जीत और मोहना को उन्होंने जरूर रोक लिया.

उन्होंने जीत से कहा, ‘‘मोहना को तो मैं अभी महीनेदोमहीने और आप के पास नहीं भेजूंगी. आयुषा घर में नई है. उस का मन बहलाने के लिए कोई तो उस का हमउम्र चाहिए. वैसे आप भी यहीं से अपना बिजनैस संभाल सकें, तो मुझे ज्यादा खुशी होगी. कम से कम आयुषा को 2 हमउम्र साथी तो मिल जाएंगे.’’

जीत थोड़ी नानुकर के बाद रुक गया. मैं समझ चुकी थी कि उस के रुकने का आशय क्या है? वह मुझे फिर से पाने का प्रयास करना चाहता है. मैं तभी से सतर्क हो गई थी. उस ने पहले कुछ दिन तो मुझ से दूरियां बनाए रखीं. फिर एक दिन जब सासूमां मोहना के साथ उस के लिए कपड़े और आभूषण खरीदने बाजार गईं तो जीत मेरे कमरे में चला आया. वह अतिप्रसन्न था. ठीक उस शिकारी की तरह जिस के हाथों एक बड़ा सा शिकार आ गया हो.

मेरे समीप आते हुए उस ने कहा, ‘‘हाय, आयुषा. व्हाट ए सरप्राइज? वी आर बैक अगेन. अब हम फिर से एक हो सकते हैं. कम औन बेबी,’’ जीत ने कहते हुए अपने हाथ मुझे बांहों में भरने के लिए बढ़ा दिए.

मेरे सामने अब मेरा संसार था. प्यारा सा पति था. उस का परिवार था. जीत के शब्द मुझे पीड़ा देने लगे. उस के दुस्साहस पर मुझे क्रोध आने लगा. न जाने उस ने मुझे क्या समझ लिया था? अपनी बपौती या बिकाऊ स्त्री? मैं उस पर चिंघाड़ पड़ी, ‘‘जीत, यहां से चले जाओ वरना,’’ गुस्से में मेरे शब्द ही टूट गए.

‘‘वरना क्या?’’

‘‘मैं तुम्हारी करतूत का भंडाफोड़ कर दूंगी.’’

‘‘उस से मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन तुम कहीं की नहीं रहोगी. आयुषा, तुम्हारा भला अब सिर्फ इसी में है कि मैं जैसा कहूं तुम करती जाओ.’’

‘‘यह कभी नहीं होगा,’’ क्रोध में मैं ने मेज पर रखा हुआ वास उठा लिया.

मेरे क्रोध की पराकाष्ठा का अंदाजा लगाते हुए उस ने मेरे समक्ष कुछ फोटो पटक दिए और बोला, ‘‘ये मेरे और तुम्हारे कुछ फोटो हैं, जो तुम्हारे विवाहित जीवन को नष्ट करने के लिए काफी हैं. यदि अपना विवाह बचाना चाहती हो तो कल शाम 7 बजे होटल सनराइज में चली आना. मैं वहीं तुम्हारा इंतजार करूंगा,’’ जीत तेजी से मुझ पर एक विजयी मुसकान उछालते हुए कमरे से बाहर निकल गया.

अब मेरा क्रोध पस्त हो गया था. उस के जाते ही मैं फूटफूट कर रो पड़ी. मुझे अपना विवाहित जीवन तारतार होता हुआ लगा. जीत ने मेरी सारी खुशियां छीन ली थीं. बेशुमार आंसू दे डाले थे. मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं? कैसे जीत से छुटकारा पाऊं? मेरी एक जरा सी नादानी ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा था, पर मैं ने यह निश्चय अवश्य कर लिया था कि यह मेरी लड़ाई है, मुझे ही लड़नी है. मैं किसी और को बीच में नहीं लाऊंगी. कैसे लड़ूंगी? यही सोचसोच कर सारी रात मेरी आंखों से अविरल अश्रुधारा बहती रही थी.

सवेरे उठी तो लग रहा था कि तनाव से दिमाग किसी भी समय फट जाएगा. विपरीत परिस्थितियों में कई बार इंसान विचलित हो जाता है और घबरा कर कुछ उलटासीधा कर बैठता है. मुझे यही डर था कि मैं कहीं कुछ गलत न कर बैठूं. दिन यों ही गुजर गया. शाम के 5 बजते ही जीत घर से निकल गया. जाते हुए मुझे देख कर मुसकरा रहा था. अब तक मैं भी यह निश्चय कर चुकी थी कि आज जीत से मेरी आरपार की लड़ाई होगी. अंजाम चाहे जो भी हो.

मैं जब होटल पहुंची तो जीत बड़ी बेताबी से मेरे आने का इंतजार कर रहा था. मुझे देखते ही वह बड़ी अक्कड़ से बोला, ‘‘हाय डियर, आखिर जीता मैं ही, अगर सीधी तरह मेरी बात मान लेती तो मैं तुम्हें परेशान क्यों करता?’’

‘‘जीत,’’ मैं ने उस की बात अनसुनी करते हुए कहा, ‘‘मैं बड़ी मुश्किल से अपनों की इज्जत दांव पर लगा कर तुम्हारी इच्छा पूरी करने आई हूं. मेरे पास ज्यादा समय नहीं है. आओ और जैसे चाहो मेरे शरीर को नोच डालो. मैं उफ तक नहीं करूंगी,’’ कहते हुए मैं ने अपनी साड़ीब्लाउज उतारना शुरू कर दिया, उस के बाद पेटीकोट भी.

अचानक मेरे इस व्यवहार को देख कर जीत चकित रह गया. उस ने इस स्थिति की कल्पना भी नहीं की थी. विचारों के बवंडर ने संभवत: उसे विवेकशून्य कर दिया. आयुषा से क्या कहे, कुछ नहीं सूझा. घबराते हुए उस ने मुझ से पूछा, ‘‘यह तुम्हारे हाथ में क्या है?’’

‘‘जहर की शीशी,’’ मैं ने उत्तर दिया, ‘‘तुम्हें तृप्त कर के इसे पी लूंगी. सारा किस्सा एक बार में खत्म हो जाएगा.’’

‘‘फिर मेरा क्या होगा?’’

‘‘चाहो तो तुम भी इसे पी सकते हो. हमारा प्यार भी अमर हो जाएगा और हम भी.’’

तभी मैं ने देखा उसे अपनी आशाओं पर पानी फिरता हुआ नजर आया था. उस के चेहरे से पसीना चूने लगा था. फिर उस के पैर मुझ से कुछ दूर हुए और दूर होतेहोते कमरे से बाहर हो गए.

सवेरे जब नींद टूटी तो मैं ने देखा कि जीत कहीं बाहर जा रहा था.

सासूमां और मोहना उस के पास दरवाजे पर खड़ी थीं. मुझ पर नजर पड़ते ही मोहना ने मुझे बताया कि आज जीत की एक जरूरी मीटिंग है, उसे 10 बजे की फ्लाइट पकड़नी है. सच क्या था. वह केवल जीत जानता था या मैं. जीत ने जाते समय मुझे देखा तक नहीं, पर मैं उसे जाते हुए देख कर मंदमंद मुसकरा रही थी. मैं अब विनय के प्रति पूरी तरह समर्पित थी.

कभी कभी मुझे पत्नी की हरकतों से ऐसा आभास होता है कि उसका किसी के साथ अफेयर है, इस शक को कैसे दूर करूं?

सवाल

मैं अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता हूं. वह भी मुझ से उतना ही प्यार करती है. हमारा दांपत्य जीवन काफी खुशहाल है. लगता है कि हम आदर्श जीवनसाथी हैं पर कभी कभी मुझे पत्नी की कुछ गतिविधियों से ऐसा आभास होता है कि उस की किसी के साथ सैटिंग है. मैं यह भी नहीं जानता कि इस में कुछ सचाई है या यह मेरे मन का वहम है. अपने दिमाग के इस संशय को कैसे दूर करूं?

जवाब

पति पत्नी के परस्पर विश्वास पर ही दांपत्य जीवन की बुनियाद टिकी होती है. शक का कीड़ा इसे खोखला कर देता है. आप स्वयं स्वीकारते हैं कि आप की पत्नी आप को बहुत प्यार करती है, फिर भी आप किसी अज्ञात संशय से घिरे हुए हैं. अपने मन से इस वहम को निकाल दें.

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मेरी छोटी बहन के लिए हमने एक लड़के से बात चलाई थी पर उसके बड़े भाइयों का आपराधिक इतिहास रहा है, क्या ऐसे लड़के से बहन का रिश्ता करना चाहिए?

सवाल

मेरी छोटी बहन जो स्कूल टीचर है, के लिए हम ने एक लड़के से बात चलाई थी. लड़का सरकारी नौकरी में था. तहकीकात करने पर पता चला कि उस के बड़े भाइयों का आपराधिक इतिहास रहा है. इसलिए हम वहां रिश्ता करने से इनकार कर रहे हैं. लेकिन जो व्यक्ति यह रिश्ता करा रहा था उस का कहना है कि आप जिस लड़के से रिश्ता करने जा रहे हैं वह तो ठीक है, उस के भाइयों की गतिविधियों से आप को क्या लेना? कृपया बताएं कि क्या हमें ऐसे लड़के से बहन का रिश्ता करना चाहिए?

जवाब

शादी ब्याह से केवल 2 व्यक्तियों का ही नहीं वरन 2 परिवारों का भी रिश्ता जुड़ता है. इसलिए यदि उस लड़के के बड़े भाइयों के आपराधिक इतिहास के कारण रिश्ता करने से इनकार कर रहे हैं तो यह सही फैसला है.

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मेडिकल फील्ड के काले रहस्यों का खुलासा करेगी वेब सीरीज ‘ह्यूमन’, देखें Video

इस वेब सीरीज की कहानी काफी रोचक है. इसके अनुसार जब चिकित्सा जगत के काले रहस्य सामने आते हैं, तो क्या बहादुर मनुष्य सच को उजागर करने के लिए जीवित रहेगा या झूठ और धोखे के खतरनाक जाल में फंस जाएगा?

इस वेब सीरीज में राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री शेफाली शाह और बहुमुखी अभिनेत्री कीर्ति कुल्हारी के साथ विशाल जेठवा, राम कपूर, सीमा बिस्वास, आदित्य श्रीवास्तव और मोहन अगाशे सहित कई प्रतिभाशाली कलाकार शामिल हैं. सस्पेंस थ्रिलर, ह्यूमन, दवाओं की दुनिया और हत्या, रहस्य, वासना और हेरफेर की मनोरंजक कहानी के साथ लोगों पर इसके प्रभाव के अप्रत्याशित रहस्यों को उजागर करती है.

विपुल अमृतलाल शाह और मोजेज सिंह द्वारा निर्देशित, डिजनी़ हॉटस्टार स्पेशल सीरीज को मोजेज सिंह और इशानी बनर्जी ने लिखा है. जिसका निर्माण विपुल अमृतलाल शाह ने ‘सनशाइन पिक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड’ के बैनर तले किया है. यह वेब सीरीज हुलु (भ्नसन) पर भी उपलब्ध होगी.

काल्पनिक वेब सीरीज ‘ह्यूमन’’ की मनोरंजक कहानी में वित्तीय लाभ के लिए तेजी से ट्रैक किए गए ड्रग परीक्षणों के कारण का चित्रण है, जिसमें लालच में खोई निर्दोष जिंदगियां शामिल हैं. मानव जीवन के मूल्य, मेडिकल मालप्रैक्टिस, क्लास डिवाइड और एक तेज-तर्रार चिकित्सा विज्ञान के प्रभाव जैसे सम्मोहक विषयों को छूते हुए, ‘ह्यूमन‘ सत्ता संघर्ष, गुप्त अतीत, ट्रॉमा और हत्याओं की एक सम्मोहक कहानी में पैसा बनाने के लालच को सामने लाती है.

वेब सीरीज ‘‘ह्यूमन’’ की चर्चा करते हुए निर्माता और निर्देशक विपुल अमृतलाल शाह ने कहा- ‘‘वेब सीरीज ‘ह्यूमन’ चिकित्सा जगत की पृष्ठभूमि के साथ मानव प्रकृति की जटिलताओं को तलाशती है. यह उत्तेजक और वास्तविक तरीके से अनैतिक मानव परीक्षणों की अंधेरी और ट्विस्टेड दुनिया की खोज करता है. इसमें हर मोड़ पर रहस्य से भरी अज्ञात चिकित्सा जगत के पहलुओं का चित्रण है.

मोजेज सिंह और इशानी बनर्जी ने स्क्रिप्ट के साथ एक अद्भुत काम किया है और अविश्वसनीय रूप से प्रतिभाशाली कलाकारों की टुकड़ी ‘ह्यूमन’ को एक रोमांचक सीरीज बनाती है.‘‘ निर्देशक और लेखक मोजेज सिंह ने ‘ह्यूमन’ की पटकथा पर काम करने के अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा- “वेब सीरीज ‘ह्यूमन’ एक ऐसी श्रृंखला है जो जीवन और मृत्यु को लेकर एक बहुत ही अनोखा पहलू पेश करती है. यह सीरीज मानवीय जीवन मूल्यों पर ही नहीं बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि इंसान अपने दुःख, अपराधबोध और शर्म से भागने के लिए किस हद तक जा सकता है?? इसके नतीजे, शामिल लोगों के जीवन पर अत्यधिक प्रभाव डाल सकते हैं, उन सभी के बीच बढ़ते ड्रामा और संघर्ष पैदा कर सकते हैं और कथा को वास्तव में विस्फोटक होने की इजाजत दे सकते हैं. अपनी सह-लेखक इशानी बनर्जी और बाकी राइटर्स रूम के साथ उपरोक्त सभी चीजों को एक्सप्लोर करना एक सच्चा सम्मान रहा.यह मेरे लिए एक इंटेंस प्रोजेक्ट था,क्योंकि इसमें कई एलिमेंट हैं,जो मेरे साथ प्रतिध्वनित होते हैं.’’

 

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सीरीज में डॉ. गौरी नाथ की मुख्य भूमिका निभा रही अभिनेत्री शेफाली शाह ने कहती हैं- ‘‘एक सीरीज के रूप में ह्यूमन आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक और संबंधित है. जब मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी, तो मैं हमारे वर्तमान परिदृश्य, अस्पतालों और वैक्सीन परीक्षणों की दुनिया की कल्पना कर पा रही थी.यह मानवता और इसे इनटेकत रखने के लिए जो कुछ भी होता है, उस पर सवाल उठाती है. गौरी नाथ ऐसी शख्सियत हैं जिनसे आप शायद ही कभी मिलते हों.यह मेरे द्वारा निभाए गए सबसे जटिल पात्रों में से एक है, और पूरी तरह से मेरे कम्फर्ट जोन से परे है. वह अप्रत्याशित और अशोभनीय है. ह्यूमन भावनाओं, कार्यों और परिणामों का पिटारा है.और आप कभी नहीं जान पाएंगे कि इसकी जटिलताओं की गहराइयों से कैसे प्रभावित होते है.”

सीरीज ‘ह्यूमन’ में डॉ सायरा सबरवाल की भूमिका निभा रही अभिनेत्री कीर्ति कुलकर्णी ने कहा, “डॉ सायरा सभरवाल की भूमिका निभाना एक परम आनंद और रोमांच अनुभव रहा है.यह पहली बार है जब मैं स्क्रीन पर एक डॉक्टर की भूमिका निभाया है.यह एक ऐसी दुनिया जिससे मैं परिचित हूं, क्योंकि मेरी बहन और जीजा डॉक्टर हैं. मुझे उन दोनों और अन्य डॉक्टरों से बात करके काफी जानकारी मिली. उस फेज के दौरान, मैं जिस भी डॉक्टर से मिलती, उनसे बातचीत करती, वे मेरे करैक्टर में मेरी मदद कर सकते थे. इसके अलावा, ह्यूमन इतनी स्तरित और जटिल कहानी है, इसने मुझे तुरंत मेरा ध्यान आकर्षित कर लिया. साथ ही यह तथ्य कि शेफाली शाह मेरे साथ उसी शो का हिस्सा होंगी, इसने मुझे उत्साहित कर दिया. मैंने अपने किरदार के कुछ पहलुओं को समझने के मकसद से एक मनोवैज्ञानिक से भी मिली. मैंने मूल रूप से डॉक्टरों की मानसिकता और दुनिया में झांकने की कोशिश की, विभिन्न लोगों से बात करते हुए विभिन्न पहलुओं को समझा कि वह कार्यक्षेत्र में और इसके बाहर कैसे काम करते हैं.’

परवीन बॉबी की लाइफ पर बेस्ड है वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’, देखें Video

मशहूर फिल्म निर्माता निर्देशक महेश भट्ट ने जियो स्टूडियोज के साथ मिलकर पहली बार डिजिटल पर कदम रखते हुए प्रेम कहानी प्रधान वेब सीरीज ‘‘रंजिश ही सही’’ का निर्माण किया है.

ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘वूट सेलेक्ट’’पर जल्द प्रसारित होने वाली वेब सीरीज ‘‘रंजिश ही सही’’ का लेखन व निर्देशन पुष्पदीप भारद्वाज ने किया है. पीरियड प्रेम कहानी वाली वेब सीरीज ‘ रंजिश ही सही ’ के जरिए ताहिर राज भसीन, अमृता पुरी, मोहित के मेहता, अरूण बाली, लिलेट दुबे और जरीना वहाब के साथ अमाला पॉल बॉलीवुड में अपनी शुरुआत कर रही हैं.

वैसे आमला पॉल दक्षिण भारत का जाना पहचाना चेहरा हैं. सूत्रों की माने तो यह वेब सीरीज परवीन बॉबी की बायोपिक ही है, जिसमें अमाला पॉल, परवीन बॉबी का किरदार निभा रही हैं.

सत्तर के दशक के बौलीवुड के संगीत के स्वर्ण युग की पृष्ठभूमि के साथ इस वेब सीरीज की कहानी एक संघर्षरत फिल्म निर्देशक शंकर (ताहिर राज भसीन), अभिनेत्री आमना (अमाला पॉल) और निर्देशक शंकर की पत्नी अंजू (अमृता) के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है.

 

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एक जटिल त्रिकोणीय प्रेम कहानी में नवोदित व संघर्ष रत आवारा फिल्म निर्देशक को बौलीवुड की एक सूची में एक आत्मा रूपी साथी मिल जाती है, जिससे उसकी पत्नी स्तब्ध रह जाती है और वह दो दुनियाओं के बीच बंट कर रह जाती है. अब अहम सवाल यही है कि क्या भावनाओं और उथल-पुथल के उलझे धागे को फिल्म निर्देशक शंकर सुलझा पाएंगे?

संपादकीय

जब देश के किसान खुले में 2021 में सारे साल दिल्ली के चारों ओर की सडक़ों पर पड़े रहे थे कि उनको मारने वाले और बुरी तरह लूटने वाले कृषि कानून वापिस लिए जाएं और जब देश भर में कोविड़ की दूसरी लहर के लिए लोग पैसेपैसे को तरस रहे थे कि पैसे का जुगाड़ हो तो औक्सीजन सिलेंडर खरीदा जा सके.

कोविड की मंहगी दवाएं खरीदी जा सकें. जब सडक़ें सुनसान थीं और सारे पटरी दुकानदार बेकार थे. जब मकान नहीं बन रहे थे और मजदूर जेबर बेच कर गुजारा कर रहे थे, न सिर्फ राजपथ पर सैंट्रल विस्टा पर अरबों का काम जारी था, राम मंदिर बनाने की प्लानिंग चालू थी, काशी कौरीडोर की तोडफ़ोड़ चालू थी. बीसियों के पास इतना पैसा था कि 4 करोड़ से ज्यादा की लैंबोरगिनी खाड़ी खरीद लें.

2021 में इस जर्मन कंपनी ने रिकार्ड सेल की और 52 गाडिय़ां बेचीं जो कंपनी के लिए खुद अचंम की बात है. यह कैसा भारत बन रहा है जहां कुछ लोग ऊंचे संगमरमर के महलों जैसे प्रधानमंत्री निवास या राम मंदिर में पुजारी की तरह रहेंगे, कुल 8000 करोड़ का विमान खरीदेंगे. आम बिजनैसमैन माने जाने वाले लैंबोरगिनी खरीद सकेंगे और उसी समय 2 बार का खाना मिलने की आस में हजारों औरतें कोविड का खतरा उठा कर सरकारी बसों में चल निकलें.

अमीरी अपने आप में बुरी बात नहीं है. यह भाग्य का खेल नहीं है, यह मेहनत का नतीजा है पर वह समाज जो हर समय त्याग की बात करता है. फल की ङ्क्षचता न करों के उपदेश सुनाता है, किसान के 2 रुपए किलो गेंहू के ज्यादा नहीं देना चाहता, वहां 52 लोग मंहगी गाडिय़ां खरीद सकें जो 5-7 साल भी न चलेंगी.

यह चोंचले उन देशों के लिए ठीक है जहां न बेकारी है, न भुखमरी है, जहां कर बिमार के लिए अस्पताल है, जहां मजदूरों की इतनी कमी है कि बाहर से बुलाने पड़ते हैं, जहां कर रोज नई चीजें बनती हैं, नई ईजादें होती है, जो देश आज भी गोबर में पैर रखे हुए है, जहां आज बड़े शहरों में भी शौचालय तक नहीं हैं. पेशाब घर नहीं है, मकानों की पुताई के लिए पैसे नहीं है, वहां ऐसी गाड़ी जिस का टायर ही 5-7 साल का हो, कैसे खरीदा जा सकता है.

अमीरों से चिडऩा नहीं चाहिए पर यह तो जरूरी है कि अमीर इतने अमीर न हो कि वे पैसा बर्बाद कर सकें. अमीर के पास बड़े कारखानों हों जिन में लाखों मजदूर काम करते हैं, यह खुशी की बात है, अमीर कालोनियां बनवाए जिन में सैंकड़ों लोग घर पाएं अच्छी बात है, अमीर बस सेवा चालू करें जिन में आमलोग भी साथ रहे, खुशी की बात है पर आमिरों के लिए 4-4, 5-6 करोड़ की गाडिय़ां बने और भारत में बिकें, एकदो नहीं एक साल में गई एक बिमारी की निशानी है.

एक तरह से यह राजा रजवाड़ों के दिनों की वापिसी है. किसी भी पुरुष की खोल लो उस में ऐसे राजा की कहानी दिख जाएगी जिस के बड़े महल होंगे. बीसियों रानियां होंगी. सैंकड़ों दासियां होंगी जो सिर्फ राजा का सुख देंगी और ऋ षिमुनि उस राजा को बारबार बरदान देंगे. तभी तो राजा हर थोड़े दिन में यज्ञ हवन कराते थे ताकि ऋ षिमुनि आम जनता को बहकाते रहें. यही आज हो रहा है. ङ्क्षहदू खतरे में है, राम मंदिर बना रहे हैं, चारधाम ठीक हो रहा है के नाम पर बोट लेकर अदानी अंबानी को अरबों रुपए मिल जाते हैं और कोई कुछ नहीं बोच पाता.

लैबोरमिनी की इतनी बिक्री उसी तरह की बरबादी की निशानी है जो धर्म के नाम पर आज गरीबों के टोलों में भी होने लगी है. जहां सही खाना न हो, सही कपड़ा न हो वहां रात भर सैंकड़ों लाइटें लगा कर कीर्तन होते है, नाचगाने होते हैं और हवलापूरी बांटा जाता है. अपने घर को आग लगा कर हाथ सेंकना इसी को कहते हैं और हजारों नेता चाहे सरकार में हो या बाहर, चुप रहते हैं.

अनमोल रिश्ता : भाग 2

नंबर मिलते ही हमारी आंखों में चमक आ गई, ‘‘हैलो, आप सलीम भाई के घर से बोल रहे हैं?’’

‘‘हां, जी, आप कहां से बोल रहे हैं,’’ उधर से आवाज आई.

‘‘जी, मैं उदयपुर से बोल रहा हूं. आप सलीम भाई से बात करवा दीजिए.’’

‘‘आदाब चाचाजान, मैं आप को पहचान गया. मैं सलीम भाई का लड़का अशरफ बोल रहा हूं, अब्बा अकसर आप की बातें करते हैं. आप मुझे हुक्म कीजिए,’’ अशरफ की आवाज नम्र थी.

ये एकदम आतुरता से बोले, ‘‘असल में मैं आप को एक तकलीफ दे रहा हूं, मेरे बेटे राजीव का एलप्पी में एक्सीडेंट हो गया है. वहीं अस्पताल में है, आप उस की कुछ मदद कर सकते हैं क्या?’’

‘‘अरे, चाचाजान, आप बेफिक्र रहिए. मैं अभी एलप्पी के लिए गाड़ी से निकल जाता हूं. उन का पूरा खयाल रख लूंगा और आप को सूचना भी देता रहूंगा. आप उन का मोबाइल नंबर बता दीजिए.’’

इन्होंने जल्दी से सीमा का मोबाइल नंबर बता दिया और आगे कहा, ‘‘ऐसा है, हम जल्दी से जल्दी पहुंचने की कोशिश करेंगे, सो यदि उचित समझो तो उन को कोच्चि में भी दिखा देना.’’

‘‘आप मुझे शर्मिंदा न करें, चाचाजान, अच्छा अब मैं फोन रखता हूं.’’

अशरफ की बातें सुन कर तो हमें चैन आ गया, फटाफट प्लेन का पता किया. जल्दीजल्दी अटैची में सामान ठूंस रहे थे और जाने की व्यवस्था भी कर रहे थे. रात होने की वजह से हवाई जहाज से जाने का कार्यक्रम कुछ सही बैठ नहीं रहा था. सिर्फ सीमा से बात कर के तसल्ली कर रहे थे. मन में शंका भी हो रही थी कि अशरफ अभी रवाना होगा या सुबह?

खाने का मन न होते हुए भी इन की डायबिटीज का ध्यान कर हम ने दूध बे्रड ले लिया.

मन में बहुत ज्यादा उथलपुथल हो रही थी. सलीम भाई से बात नहीं हुई थी, यहां आते थे तब तो बहुत बातें करते थे. क्या कारण हो सकता है? कितने ही विचार मन में घूम रहे थे.

6 साल पुरानी बातें आज जेहन में टकराने लगीं. मैं सब्जी बना चुकी थी कि इन का फोन आ गया, ‘सुधा, एक मेहमान खाना खाएंगे. जरा देख लेना.’

मेरा मूड एकदम बिगड़ गया, कितने दिनों बाद तो आज मूंग की दालपालक बनाया था, अब मेहमान के सामने नए सिरे से सोचना पड़ेगा. न मालूम कौन है?

खाने की मेज पर इन्होंने मेरा परिचय दिया और बताया, ‘ये सलीम भाई हैं. सामने उदयपुर होटल में ही ठहरे हैं. इन का मार्बल और लोहे का व्यापार है. उसी सिलसिले में मुझ से मिलने आए हैं.’

फिर आगे बोले, ‘ये कैल्लूर के रहने वाले हैं, बहुत ही खुशमिजाज हैं.’

वास्तव में सलीम भाई बहुत ही खुशहाल स्वभाव के थे. उन के चेहरे पर हरदम एक मुसकान सी रहती थी, मार्बल के सिलसिले में इन से राय लेने आए थे.

धीरेधीरे इन का सलीम भाई के साथ अभिन्न मित्र की तरह संबंध हो गया. वह 2-3 महीने में अपने काम के सिलसिले में उदयपुर चक्कर लगाते थे.

गरमी के दिन थे. सलीम भाई का सिर सुबह से ही दुख रहा था. दवा दी पर शाम तक तबीयत और खराब होने लगी. उलटियां और छाती में दर्द बढ़ता गया. अस्पताल में भरती कराया क्योंकि उन को एसीडीटी की समस्या हो गई थी. 1 दिन अस्पताल में रहे, तो इन्होंने उन्हें 4 दिन रोक लिया. घर की तरह रहते हुए उन की आंखें बारबार शुक्रिया कहतेकहते भर आती थीं.

सलीम भाई के स्वभाव से तो कोई तकलीफ नहीं थी पर मैं अकसर कुढ़ जाती थी, ‘आप भी बहुत भोले हो. अरे, दुनिया बहुत दोरंगी है, अभी तो आप के यहां आते हैं. परदेस में आप का जैसा जिंदादिल आदमी मिल गया है. कभी खुद को कुछ करना पड़ेगा तब देखेंगे.’

‘बस, तुम्हारी यही आदत खराब है. सबकुछ करते हुए भी अपनी जबान को वश में नहीं रख सकतीं, वे अपना समझ कर यहां आते हैं. दोस्ती तो काम ही आती है,’ ये मुझे समझाते.

2 साल तक उन का आनाजाना रहा. एक बार वे हमारे यहां आए. एकाएक उन का मार्बल का ट्रक खराब हो गया. 2 दिन तक ठीक कराने की कोशिश की. पर ठीक नहीं हुआ. पता लगा कि इंजन फेल हो गया था इसलिए अब ज्यादा समय लगेगा.

सलीम भाई ने झिझकते हुए कहा, ‘भाई साहब, अब मेरा जाना भी जरूरी है और मैं आप को काम भी बता कर जा रहा हूं, कृपया इसे ठीक करा कर भेज दीजिएगा. अगले महीने मैं आऊंगा तब सारा पेमेंट कर दूंगा.’

पर सलीम भाई के आने की कोई खबर नहीं आई. न उन के पेमेंट के कोई आसार नजर आए.

इंतजार में दिन महीनों में और महीने सालों में बदलने लगे. पूरे 5 साल निकल गए.

मैं अकसर इन को ताना मार देती थी, ‘औ

र करो भलाई, एक अनजान आदमी पर भरोसा किया. मतलब भी निकाल लिया. 40 हजार का फटका भी लग गया.’

ये ठंडे स्वर में कहते, ‘भूलो भी, जो हो गया सो हो गया. उस की करनी उस के साथ.’

‘‘क्या बात है? किन खयालों में खोई हुई हो,’’ इन की आवाज सुन कर मेरा ध्यान बंटा, घड़ी की ओर देखा पूरे 12 बज रहे थे. नींद आने का तो सवाल ही नहीं था, बेटे और पोतेपोती की चिंता हो रही थी. न जाने कहां कितनीकितनी चोटें लगी होंगी. शायद सीमा ज्यादा नहीं बता रही हो कि मम्मीपापा को चिंता हो जाएगी.

वहां एलप्पी में न जाने कैसा अस्पताल होगा. बस, बुराबुरा ही दिमाग में घूम रहा था. करीब 3 बजे फोन की घंटी बजी. हड़बड़ाहट में लपकते हुए मैं ने फोन उठाया. सीमा का ही था, ‘‘मम्मी, यहां एलप्पी अस्पताल में हम ने मरहमपट्टी करा ली है. अब अशरफ भाईजान आ गए हैं. हम सुबह उन के संग कोच्चि जा रहे हैं.’’

फिर एक क्षण रुक कर बोली, ‘‘अशरफ भाईजान से बात कर लो.’’

‘‘आंटी, आप बिलकुल चिंता मत करना, मैं कोच्चि में बढि़या से बढि़या इलाज करवा दूंगा, आप बेफिक्र हो कर आराम से आओ.’’

अनमोल रिश्ता : भाग 1

खाना खा कर अभी हाथ धोए भी नहीं थे कि फोन की घंटी बज उठी. जरूर बच्चों का फोन होगा, यह सोचते ही मेरे चेहरे पर चमक आ गई.

‘हैलो, हां बेटा, कहां पर हो?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मम्मी, बस, अब आधे घंटे बाद ही हम एलप्पी के लिए रवाना हो रहे हैं, शाम तक वहां पहुंच जाएंगे,’’ राजीव खुशी के साथ अपना कार्यक्रम बता रहा था.

‘‘चलो, ठीक है, वहां पहुंच कर खबर देना…और हां बेटा, खूब मौजमस्ती करना. बारबार इतनी दूर जाना नहीं होता है.’’

एक गाना गुनगुनाती हुई मैं अपने बच्चों के लिए ही सोच रही थी. 2 साल तक सोचतेसोचते आखिर इस बार दक्षिण भारत का 1 महीने का ट्रिप बना ही लिया. राजीव, बहू सीमा और उन के दोनों बच्चे आयुषआरुषि गरमियों की छुट्टियां होते ही गाड़ी द्वारा अपनी केरल की यात्रा पर निकले थे.

राजीव डाक्टर होने की वजह से कभी कहीं ज्यादा समय के लिए जा ही नहीं पाता था. बच्चे भी अब 12-14 साल के हो गए थे. उन्हें भी घूमनेफिरने का शौक हो गया था. बच्चों की फरमाइश पर राजीव ने आखिरकार अपना लंबा कार्यक्रम बना ही लिया.

हम ने तो 20 साल पहले, जब राजीव मनीपाल में पढ़ता था, पूरे केरल घूमने का कार्यक्रम बना लिया था. घूमने का घूमना हो गया और बेटे से मनीपाल में मिलना भी.

एलप्पी शहर मुझे बहुत पसंद आया था. खासकर उस की मीठी झील और खारा समुद्र का मेल, एलप्पी से चलने वाली यह झील कोच्चि तक जाती है. इस झील में जगहजगह छोटेछोटे टापू झील का सौंदर्य दोगुना कर देते हैं.

7 बजे जैसे ही मेरे पति घर में घुसे, सीधा प्रश्न किया, ‘‘बच्चों की कोई खबर आई?’’

‘‘हां, एलप्पी के लिए रवाना हो गए हैं, अब थोड़ी देर में पहुंचने ही वाले होंगे,’’ मैं ने पानी का गिलास उन के हाथ में देते हुए कहा.

‘‘बच्चों को गए 15 दिन हो गए, उन के बिना घर कितना सूनासूना लगता है,’’ फिर कुछ क्षण रुक कर बोले, ‘‘याद है तुम्हें, एलप्पी में मोटरबोट में तुम कितना डर गई थीं, जब झील से हम समुद्र के हिलोरों के बीच पहुंचे थे. डर के मारे तुम ने तो मोटरबोट मोड़ने को ही कह दिया था,’’ कहते हुए वे होहो कर हंस पड़े.

‘‘अरे, बाप रे, आज भी याद करती हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. मैं तो वैसे भी बहुत जल्दी घबरा जाती हूं. फोन पर राजीव को समझा दूंगी, नहीं तो बच्चे डर जाएंगे,’’ मैं ने उतावले हो कर कहा.

‘‘रहने दो, बच्चों को अपने हिसाब से, जो कर रहे हैं, करने दो, नसीहत देने की जरूरत नहीं है,’’ अपनी आदत के मुताबिक पति ने मुझे झिड़क दिया.

मैं पलट कर कुछ कहती कि फोन की घंटी बज उठी. इन्होंने फोन उठाया, ‘‘हां, बेटी सीमा, तुम एलप्पी पहुंच गए?’’

न जाने उधर से क्या जवाब मिला कि इन का चेहरा एकदम फक पड़ गया. बुझी आवाज में बोले, ‘‘ऐसा कैसे हो गया, ज्यादा चोट तो नहीं आई?’’ आगे बोले, ‘‘क्या आरुषि का हाथ बिलकुल मुड़ गया है और आयुष का क्या हाल है.’’

इन के चेहरे के भाव बदल रहे थे. मैं भी घबराती हुई इन से सट कर खड़ी हो गई.

फोन में से टूटेफूटे शब्द मुझे भी सुनाई दे रहे थे, ‘‘राजीव को चक्कर आ रहे हैं और कमर में तेज दर्द हो रहा है, उठा भी नहीं जा रहा है.’’

ये एकदम चिंतित हो कर बोले, ‘‘हां, ठीक है. एक बार पास ही के अस्पताल में दिखा दो. मैं कुछ सोचता हूं,’’ कह कर इन्होंने फोन धम्म से पटक दिया और वहीं बैठ गए.

मैं ने एकदम से प्रश्नों की झड़ी लगा दी, ‘‘बच्चों के संग क्या हो गया? कैसे हो गया? कहां हो गया और अब क्या सोच रहे हैं?’’

मेरे प्रश्नों को अनसुना करते हुए खुद ही बुदबुदाने लगे, ‘यह क्या हो गया, अच्छाभला बच्चे का सफर चल रहा था, एक बच्चा और मोटरसाइकिल को बचाने के चक्कर में गाड़ी असंतुलित हो कर एक खड़ी कार से टकरा गई. यह तो अच्छा है कि एलप्पी बिलकुल पास है, कम से कम अस्पताल तो जल्दी से पहुंच जाएंगे,’ यह कहते हुए वे ऊपर शून्य में देखने लगे.

मेरा मन बहुत अशांत हो रहा था. राजीव को चक्कर आ रहे हैं. कहीं सिर में तो चोट नहीं लग गई, यह सोच कर ही मैं कांप गई. सब से ज्यादा तो ये हताश हो रहे थे, ‘‘एलप्पी में तो क्या, साउथ में भी अपना कोई रिश्तेदार या दोस्त नहीं है, जो उन्हें जा कर संभाल ले. यहां उदयपुर से पहुंचने में तो समय लग जाएगा.’’

अचानक मुझे याद आया, ‘‘5-6 साल पहले अपने यहां कैल्लूर से सलीम भाई आते थे. हर 2-3 महीने में उन का एक चक्कर लग जाता था. उन से संपर्क करो,’’ मैं ने सलाह दी.

‘‘पर 5 साल से तो उन की कोई खबर नहीं है,’’ फिर कुछ सोच कर बोले, ‘‘मेरे ब्रीफकेस में से पुरानी डायरी लाना. शायद कोई नंबर मिल जाए.’’

मैं झटपट दौड़ कर डायरी ले आई. पन्ने पलटते हुए एक जगह कैल्लूर का नंबर मिल गया.

फटाफट नंबर लगाया तो नंबर मिल गया, ‘‘हैलो, कौन बोल रहे हैं? हां, मैं उदयपुर से मदन…मदनलाल बोल रहा हूं. क्या सलीम भाई से बात हो सकती है?’’

‘‘अब यह फैक्टरी सलीम भाई की नहीं है, मैं ने खरीद ली है,’’ एक ठंडा स्वर सुनाई दिया.

‘‘ओह, देखिए, आप किसी तरह से सलीम भाई का नंबर दे सकते हैं, मुझे उन से बहुत जरूरी काम है,’’ इन की आवाज में लाचारी थी.

उधर से आवाज आई, ‘‘हमारे यहां एक अकाउंटेंट संजीव रेड्डी पुराना है, मैं उस से बात करवा देता हूं.’’

हमें एकएक पल भारी लग रहा था, ‘‘हैलो,’’ उधर से आवाज आई, ‘‘हां, मैं रेड्डी बोल रहा हूं, हां जी, मैं सलीम भाई को जानता हूं. पर मुझे उन का नंबर नहीं मालूम है. हां, पर उन की लड़की कोच्चि में रहती है. उस का नंबर शायद मेरी लड़की के पास होगा. आप 5 मिनट बाद फोन मिलाएं. मैं पूछ कर बताता हूं.’’

रेड्डी साहब के सहयोग से हमें सलीम भाई की लड़की शमीमा का नंबर मिल गया. उस से फटाफट हमें उस के भाई अशरफ का नंबर मिल गया.

#coronavirus: ताजी हवा का झौंका

पहले जनता कर्फ्यू… फिर लॉकडाउन… और अब ये पूरा कर्फ्यू… समझ में नहीं आता कि टाइमपास कैसे करें…” निशिता ने पति कमल से कहा.

“पहले तो रोना ये था कि समय नहीं मिल रहा… अब मिल रहा है तो समस्या है कि इसे बिताया कैसे जाये…” कमल ने हाँ में हाँ मिलाई.

निशिता और कमल मुंबई की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते हैं. सुबह से लेकर रात तक घड़ी की सुइयों को पकड़ने की कोशिश करता यह जोड़ा आखिर में समय से हार ही जाता है. पैसा कमाने के बावजूद उसे खर्च न कर पाने का दर्द अक्सर उनकी बातचीत का मुख्य भाग होता है.

मुंबई में अपना फ्लैट… गाड़ी… और अन्य सभी सुविधाएं होने के बाद भी उन्हें आराम करने का समय नहीं मिल पाता… टार्गेट पूरे करने के लिए अक्सर ऑफिस का काम भी घर लाना पड़ जाता है. ऐसे में प्यार भला कैसे हो… लेकिन यह भी एक भौतिक आवश्यकता है. इसलिए इन्हें प्यार करने के लिए वीकेंड निर्धारित करना पड़ रहा है. लेकिन पिछले दिनों फैली इस महामारी यानी कोरोना के कहर ने दिनचर्या एक झटके में ही बदल कर रख दी. अन्य लोगों की तरह निशिता और कमल भी घर में कैद होकर रह गए.

“क्या करें… कुछ समझ में नहीं आ रहा. पहाड़ सा दिन खिसके नहीं खिसकता…” निशिता ने लिखा.

“अरे तो बेबी! समय का सदुपयोग करो… प्यार करो ना…” सहेली ने आँख दबाती इमोजी के साथ रिप्लाइ किया.

“अब एक ही काम को कितना किया जाये… कोई लिमिट भी तो हो…” निशिता ने भी वैसे ही मूड में चैट आगे बढ़ाई.

“सो तो है.” इस बार टेक्स्ट के साथ उदास इमोजी आई.

“ये तो शुक्र है कि बच्चे नहीं हैं. वरना अपने साथ-साथ उन्हें भी व्यस्त रखने की कवायद में जुटना पड़ता.” निशिता ने आगे लिखा.

“बात तो तुम्हारी सौ टका सही है यारा… अच्छा एक बात बता… एक ही आदमी की शक्ल देखकर क्या तुम बोर नहीं हो रही?” सहेली ने ढेर सारी इमोजी के साथ लिखा तो निशिता ने भी जवाब में ढेरों इमोजी चिपका दी.

सहेली से तो चैट खत्म हो गई लेकिन निशिता के दिमाग में कीड़ा कुलबुलाने लगा. अभी तो महज तीन-चार दिन ही बीते हैं और वह नोटिस कर रही है कि कमल से उसकी झड़प होते-होते बस किसी तरह रुकी है लेकिन एक तनाव तो उनके बीच पसर ही जाता है.

कहते हैं कि बाहरी कारक दैनिक जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं. शायद यही कारण है कि लॉकडाउन और कर्फ्यू का तनाव उनके आपसी रिश्तों को प्रभावित कर रहा है. लेकिन इस समस्या का अभी निकट भविष्य में तो कोई समाधान दिखाई नहीं दे रहा.

“कहीं ऐसा न हो कि समस्या के समाधान से पहले उनका रिश्ता ही कोई समस्या बन जाये… दिन-रात एक साथ रहते-रहते कहीं वे अलग होने का फैसला ही न कर बैठें.” निशिता का मन कई तरह की आशंकाओं से घिरने लगा.

“तो क्या किया जाए… घर में रहने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं… क्यों न जरा दूरियाँ बनाई जाएँ… थोड़ा स्पेस लिया जाए… लेकिन कैसे?” निशिता ने इस दिशा में विचार करना शुरू किया तो टीवी देखना… गाने सुनना… बुक्स पढ़ना… कुकिंग करना… जैसे एक के बाद एक कई सारे समाधान विकल्प के रूप में आने लगे.

“फिलहाल तो सोशल मीडिया पर समय बिताया जाए.” सोचकर निशिता ने महीनों पहले छोड़ा अपना फ़ेसबुक अकाउंट लोगइन किया. ढेरों नोटिफ़िकेशन आए हुये थे और दर्जनों फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट… एक-एककर देखना शुरू किया तो मेहुल नाम की रिक्वेस्ट देखकर चौंक गई. आईडी खोलकर प्रोफ़ाइल देखी तो एक मुस्कान होठों पर तैर गई.

“कहाँ थे जनाब इतने दिन… आखिर याद आ ही गई हमारी…” मन ही मन सोचते हुये निशिता ने उसकी दोस्ती स्वीकार कर ली.

मेहुल… उसका कॉलेज फ्रेंड… जितना हैंडसम… उतना ही ज़हीन… कॉलेज का हीरो… लड़कियों के दिलों की धड़कन… लेकिन कोई नहीं जानता था कि मेहुल के दिल का काँटा किस पर अटका है. निशिता अपनेआप को बेहद खास समझती थी क्योंकि वह मेहुल के बहुत नजदीकी दोस्तों में हुआ करती थी. हालाँकि मेहुल ने कभी इकरार नहीं किया था और निशिता कि तो पहल का सवाल ही नहीं था लेकिन चाहत की चिंगारी तो दोनों के दिल में सुलग ही रही थी.

“कहीं वह इस राख़ में दबी चिंगारी को हवा तो नहीं दे रही…” निशिता ने एक पल को सोचा लेकिन अगले ही पल चैट हैड पर मेहुल को एक्टिव देखकर उसने अपने दिमाग को झटक दिया.

“लॉकडाउन में कुछ तो अच्छा हुआ.” मेहुल का मैसेज स्क्रीन पर उभरा. निशिता का दिल धड़क उठा. ऐसा तो कॉलेज के समय भी नहीं धड़कता था.

इसके बाद शुरू हुआ चैट का सिलसिला जो कॉलेज की चटपटी बातों से होता हुआ जीवनसाथी की किटकिटी पर ही समाप्त हुआ और वह भी तभी थमा जब कमल ने लंच का याद दिलाया. निशिता बेमन से उठकर रसोई में गई और जैसा-तैसा कुछ बना… खाकर… वापस मोबाइल पर चिपक गई.

बहुत देर इंतज़ार के बाद भी जब मेहुल ऑनलाइन नहीं दिखा तो वह निराश होकर लेट गई. खाने का असर था, जल्दी ही नींद भी आ गई. उठी तो कमल चाय का कप हाथ में लिए खड़ा था. निशिता ने एक हाथ में कप और दूसरे में मोबाइल थाम लिया. मेहुल का मैसेज देखते ही नींद कि खुमारी उड़ गई.

फिर वही देर शाम तक बातों का सिलसिला. मेहुल उससे नंबर माँग रहा था बात करने के लिए लेकिन निशिता ने उसे लॉकडाउन पीरियड तक टाल दिया. वह नहीं चाहती थी कि कमल को इस रिश्ते का जरा सा भी आभास हो. यूं भी इस तरह के रिश्ते तिजोरी में सहेजे जाने के लिए ही होते हैं. इनका खुले में जाहिर होना चोरों को आमंत्रण देने जैसा ही होता है. यानी आ बैल मुझे मार…

निशिता यह खतरा नहीं उठाना चाहती थी. वह तो इस कठिन समय को आसानी से बिताने के लिए कोई रोमांचक विकल्प तलाश रही थी जो उसे सहज ही मिल गया था. लेकिन इस आभासी रिश्ते के चक्कर में वह अपनी असल जिंदगी में कोई दूरगामी तूफान नहीं चाहती थी.

निशिता नहीं जानती थी कि आने वाले दिनों में ऊँट किस करवट बैठगा… लेकिन हाल फिलहाल वह बोरिंग हो रही जिंदगी में अनायास आए इस ताजी हवा के झौंके का स्वागत करने का मानस बना चुकी थी.

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