लेखक-डा. नरेश प्रसाद, डा. संजीव कुमार वर्मा, डा. मेघा पांडे, डा. नेमी चंद

पशुओं में खुरपकामुंहपका रोग यानी एफएमडी बेहद संक्रामक वायरल है. यह रोग वयस्क पशुओं में घातक नहीं होता है, लेकिन बछड़ों के लिए यह घातक होता है. यह गायभैंसों, बकरियों, भेड़ों, सूअरों और जुगाली करने वाले जंगली पशुओं को प्रभावित करता है. इस के कारण थूथन, मसूड़ों, अयन और अन्य गैर बालों वाले भागों पर छाले व घाव हो जाते हैं. यह सभी उम्र के पशुओं को प्रभावित करता है. रोग का कारण यह पिकोरनाविरिडाए परिवार के अपथो वायरस जाति की एफएमडी वायरस के कारण होता है. एफएमडी वायरस के 7 प्रकार के अलग सीरम होते हैं. भारत में एफएमडी ओ, ए और सी सीरम प्रकारों के कारण होता है. यह बहुत कठोर वायरस है और महीनों तक दूषित चारा, कपड़ा, वातावरण इत्यादि में जीवित रहता है.

महामारी विज्ञान एफएमडी वायरस सभी उम्र के पशुओं को प्रभावित करता है और 100 फीसदी रोगकारक है. इस वायरस से वयस्कों में मृत्युदर कम है, लेकिन बछड़ों में 100 फीसदी है. इस का प्रकोप मुख्य रूप से मानसून के आगमन के दौरान होता है. सूअर एफएमडी वायरस के गुणक के रूप में काम करता है और इस से जुगाली करने वाले पशुओं को रोग फैल सकता है. रोग संचरण

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* रोगग्रस्त पशुओं के आवाजाही से, संक्रमित जानवरों के साथ संपर्क से और दूषित निर्जीव वस्तुओं (जूते, कपड़े, वाहन इत्यादि) के साथ संपर्क से रोग फैल सकता है.

* संक्रमित सांड़ के साथ गर्भाधान से, बछड़ों के द्वारा संक्रमित दूध पीने से, प्रभावित पशुओं से वायु संचरण से और रोगग्रस्त पशुओं के साथ लगे हुए श्रमिकों से स्वस्थ पशुओं को यह रोग फैल सकता है.

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