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Best Hindi Story : ये ऐड्रैस बताना प्लीज

Best Hindi Story : आप ने न जाने कितनी बार अनजान जगहों पर अनजान लोगों से कोई न कोई ऐड्रैस जरूर पूछा होगा. जब हम खुद किसी जगह के बारे में नहीं जानते तो दूसरों से पूछना मजबूरी हो जाती है. फिर यह अच्छी बात भी है कि महान देश के महान नागरिक ऐसे पते बताने में पूरी दिलचस्पी लेते हैं. लेकिन यह साधारण सी बात हमारे दिमाग में अकसर हलचल पैदा करती है कि हमें आज तक ऐसा कोई शख्स नहीं मिला जो हमारे द्वारा पूछे गए किसी भी ऐड्रैस को बताने में अपनेआप को असमर्थ बताता हो. वह कभी हार ही नहीं मानता, चाहे सही ऐड्रैस जानता हो या नहीं. वह बताने का कर्तव्य सौ फीसदी पूरी निष्ठा के साथ निभाता है.

लोग पता बताने में ऐसे गंभीर, दत्तचित्त हो कर डूब जाते हैं कि अपने अति जरूरी काम छोड़ कर एक दक्ष गाइड की तरह कुछ न कुछ निर्देशन अवश्य करते हैं. कोई भी महानुभाव हरगिज ऐसा नहीं कहता, ‘सौरी, मुझे इस ऐड्रैस का कोई अनुमान नहीं.’ हमारी पूरी जिंदगी इसी खोजबीन में निकल गई, अब तो उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गए जहां सठिया जाने के पूरे चांस रहते हैं लेकिन इस अद्भुत विषय पर हमारा अघोषित शोध आज भी बदस्तूर जारी है. हम इस अंतहीन विषय को ले कर भारत के अनेकानेक राज्य, शहर, जिले, गांव, ढाणी की जनता पर सर्वे कर चुके, परिणाम हमेशा रोचक ही निकलते हैं.

हम तो आप को भी सुझाव देंगे कि यदि आप के पास फालतू का समय है और करने को कोई काम नहीं तो निठल्ले पड़े रहने से बेहतर होगा कि आप भी हमारे अभियान से जुड़ें. इस मुहिम से शहर की जनता की सामाजिक संवेदनशीलता को मापसकते हैं. प्रयोग करना चाहें तो, कागज के एक पुर्जे पर कोई भी गलतसलत पता लिख डालें और निकल पड़ें किसी भी शहर, कसबे के बाशिंदों की आईक्यू को जांचने. शहर के व्यस्त चौराहे, बाजार, गलीनुक्कड़ पर खड़े लोगों की मुफ्त सेवा लेनी शुरू करें. हम दावा करते हैं कि अब आप को कुछ नहीं करना है, जो भी करना है वह सामने वाला करेगा. वह आप के गलत पते को भांप भी जाए तो भी इस अनसुलझी पहेली अथवा चुनौती को स्वीकार कर उसे सुलझाने में डूब जाएगा.

हमें लगता है शायद यह हमारी मनोवैज्ञानिक कमजोरी है. जन्मभूमि से जुड़ी हमारी भावनाएं हमें अपने शहर के प्रति अनजान होने की बात कतई स्वीकार नहीं करने देतीं. जानतेबूझते हम गलत पते को भी पहचानने का स्वांग-नाटक करते हैं. ऐसी स्थिति में कुछ साधारण किस्म के लोग मिल सकते हैं जो फौरी तौर पर आप को सीधेउलटे हाथ जा कर बाईं या दाईं गली में मुड़ने और वहां जा कर पता करने जैसी बात कह देंगे लेकिन कुछ अति गंभीर और शहर के प्रति पूर्ण प्रतिबद्ध ऐसे नागरिक भी मिल जाएंगे जो बड़े कौन्फिडैंस से निर्देशन देंगे, जैसे वे सौ प्रतिशत उस ऐड्रैस को जानतेपहचानते हैं. हम बस, लोगों की इसी कला से मोहित और अभिभूत हैं.

इस अभियान में हम ने एक बार अभिनव प्रयोग किया. हमारे एक मित्र जो एम आई रोड, जयपुर में रहते हैं, उन के पति को पुरानी दिल्ली में खोजना शुरू किया. आप आश्चर्य करेंगे कि लोगों ने इस पूर्णत: गलत पते को पहचानने में भी पूरी गंभीरता दिखलाई जैसे वे उस पते से बखूबी परिचित हों. चालाकी कर पते की स्लिप पर केवल जयपुर की जगह दिल्ली लिख दिया, बाकी पूरा पता वही रहने दिया जो जयपुर का था. लेकिन इस से कोई फर्क नहीं पड़ा. एमआई रोड, जो जयपुर की पहचान है, को कुछ लोगों ने दिल्ली में बड़ी आसानी से पहचान लिया, जैसे वे उसी जगह के बाशिंदे हों. हो सकता है उन में से कुछ सज्जन हमें ही मूर्ख बना रहे हों लेकिन इस संपूर्ण कवायद में मजा भरपूर आ रहा था.

एक और बानगी देखिए, एक सज्जन सपत्नीक बाइक से कहीं जल्दी जाने की फिराक में थे लेकिन हमारे द्वारा वह गलत पता पूछे जाने पर भी बड़े मनोयोग से उस पते को पहचानने में पिल पड़े. अपनेआप को पूर्ण सामाजिक और शालीन होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए हमारा मार्गदर्शन करने लगे. उन के बताने का अंदाज ऐसा आत्मविश्वास से लबरेज था कि लगा, जैसे यदि अपनी पत्नी के साथ न होते तो शायद हमें अपनी गाड़ी पर बिठा कर उस पते पर पहुंचा आते. लेकिन हम ने उन्हें ज्यादा परेशान करना उचित नहीं समझा. धन्यवाद देते हुए अपने इस टैलेंट हंट के सर्च अभियान से उन्हें मुक्त किया.

अब बताइए क्या कहेंगे? है न निराली बात. जो जगह दिल्ली में है ही नहीं, उसे भी लोग जबरदस्ती पहचान रहे हैं. यही नहीं, वहां तक पहुंचने का सहज रास्ता भी बताया जा रहा है. आप हमारी इस बुरी आदत पर हंस सकते हैं लेकिन यह सच है. हम जहां भी जाते हैं, अपनी इस तकनीक को जरूर आजमाते हैं. असल में, अब यह हमारे लिए एक ऐसा थर्मामीटर बन चुका है जिस से हम गांव, शहर, महानगरों के निवासियों की संवेदना की जांचपड़ताल करने से बाज नहीं आते. अब 21वीं सदी में तो इंटरनैट, फेसबुक, मोबाइल, स्मार्टफोन आ गए लेकिन हमारा फार्मूला आज भी, अचूक और गारंटिड बना हुआ है. पनवाड़ी की दुकान पर खड़े रसिकजन, चाय की थड़ी, चौराहे पर जमा भीड़, यहां तक कि ट्रैफिक पुलिस का तथाकथित मुस्तैद सिपाही भी हमारी इस अनोखी मुहिम में निशुल्क भागीदार बनता है और यथायोग्य अपनी मुफ्त की सलाहसेवा प्रदान करता ही करता है.

कछ लोगों का पता बताने का लहजा ऐसा होता है कि दिल कुरबान हो जाए या फिर अपना सिर पीट लिया जाए. ऐसे जनाब अपनी इठलाती जबान से मौखिक रूप से ही पूरे शहर का नक्शा ऐसा खींचते हैं कि वहां तैनात पोस्टमैन भी शरमा जाए. एक बार लखनऊ में हम ने एक बुजुर्गवार से मजाकमजाक में एक पता पूछ लिया. आप से क्या छिपाना, दरअसल हम तो दिल्लगी करने के मूड में थे, इसलिए नवाबों के शहर लखनऊ की सरजमीं पर पैर रखते ही सामने सड़क पर गुजर रहे एक जहीन किस्म के नवाबी संस्करण से वह पता पूछने से पूर्व भूमिका बांधने की गरज से इतना पूछ बैठे, ‘क्या जनाब, लखनऊ में ही रहते हैं?’ उन्हें हमारे इस तरह सवाल पूछने पर सख्त एतराज हुआ, लगा, जैसे हम ने उन की लखनवी जड़ों को खुली चुनौती दे डाली हो. बहरहाल, हमारी तहजीब पर तौबा करते हुए वे उस पते को समझाने लगे जिस से हम बखूबी पहले से परिचित थे कि वह पता शर्तिया गलत व झूठा था.

उन के अंदाज का आप भी मुलाहिजा फरमाएं. उन्होंने पहले अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फिराया, अचकन ठीक कर खंखारते हुए गला साफ कर खालिस शायराना उर्दू की ऐसी तकरीर झाड़ने लगे कि हमें बेहोशी आने लगी. लगे हाथ हमारा तआर्रुफ (परिचय), जन्मस्थान, शिक्षा, मजहब, ब्याहशादी, बालबच्चों, नौकरी, तनख्वाह सहित जरूरी स्टेटस पूछ डाला. हम सेर तो जनाब सवा सेर. लेकिन हम इस रस्साकशी को बीच अधर में छोड़ने को कतई तैयार नहीं थे. सो उन की तकरीर को बड़े अदब से सुनते रहे. हमारे हाथ में वह कागज था जिस पर मुंबई का पता लिखा था, केवल शहर चेंज कर लखनऊ लिख डाला था ताकि लोगों को कन्फ्यूज कर मजा ले सकें. उन की तकरीर शुरू हुई, ‘‘जनाब, सब से पहले एक आटो लें, उस से किराया तय करें ताकि बाद में किसी तरह का झंझट न हो. फिर सामने वाले चौक से दाएं मुड़ें, वहां से आगे 2 चौराहे पार कर बाईं तरफ की रोड पर जाएं. फिर 4 फ्लाईओवर पार कर नूरानी महल की ओर आगे बढ़ें, तकरीबन 3 किलोमीटर चल कर सीधे हाथ को मुड़ जाएं. वहां 2 कालोनियां पार कर जनता फ्लैट्स मिलेंगे. ये जनाब वहीं कहीं रहते मिलेंगे.’’

हम उन की काबिलीयत पर कायल थे लेकिन हमें खुद पर शक हो रहा था कि क्या वास्तव में पता बदलने की कारस्तानी हम ने की भी है या नहीं. कहीं सच में हमारे मित्र मुंबई छोड़ कर लखनऊ तो नहीं आ बसे हैं? खैर, समझनासमझ के इस खेल में कतई स्पष्ट नहीं हो पाया कि कौन कितना समझ पाया था. जनाब से विदा ले कर हम अब अपनी मंजिल की तरफ रुख्सत हुए कि तपाक से एक आवाज सुनाई पड़ी. पीछे देखा तो वे ही बुजुर्गवार हमें अचरजभरी नजरों से ऐसे निहार रहे थे जैसे क्लास में कोई विद्यार्थी, टीचर द्वारा पूरा लेसन समझाने के बाद भी बेसिक गलती कर रहा हो. हम ने तौबा की और उन से छिपतेछिपाते अपने ठिकाने की तरफ बढ़ लिए.

सच में, हमारी यह अंतहीन खोज आज भी जारी है. इस का एक सुंदर पहलू और है, यदि आप के साथ कोई महिला है और इस अवस्था में आप किसी से कोई पता पूछते हैं तो पता बताने वालों की गंभीरता, शालीनता, समर्पण, सेवाभाव दोगुनातीनगुना हो जाता है. हमारी यह खोज निष्फल ही सही लेकिन यह सत्य है कि यह कवायद हमारे इंसान होने, दूसरों की समस्या के प्रति संवेदनशील होने का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करती है. सामाजिक होने का यही तो फायदा है वरना पश्चिमी देशों की संस्कृति में यह खासीयत कहां मिलेगी. वहां फीस चुकाने के बाद भी गारंटी नहीं कि आप को ‘सर्विस प्रोवाइड’ कर ही दी जाए. हम भारतीयों का दिल बहुत बड़ा है और इस में अपने अलावा दूसरों के लिए भी खाली जगह हमेशा रहती है. हम दूसरों के लिए इतना सोच लें, यह तथ्य भी क्या कम है? हम ने मजाक किया, आप ने हमें सहन किया, यह भी तो हमारे उदारमना होने का संकेत है. धन्यवाद. Best Hindi Story

Husband Wife Story : बीवी और कुत्ता

Husband Wife Story : जसबीर की पत्नी खो गई. वे पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने गए. इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘कब खोई तुम्हारी पत्नी?’ जसबीर ने कहा, ‘7 दिन हो गए.’ इंस्पैक्टर हैरान हुआ, बोला, ‘मियां, 7 दिन हो गए, और आज आप आ रहे हैं रिपोर्ट लिखवाने? होश ठिकाने हैं न आप के? 7 दिनों तक कर क्या रहे थे?’ जसबीर ने कहा, ‘मुझे पहले यकीन ही नहीं हुआ. मैं तो चाहता था कि काश, पत्नी मुझे छोड़ कर चली जाए. जब पूरी तरह भरोसा हुआ कि हां, वह भाग गई है तभी मैं आया रिपोर्ट लिखवाने. अब तक तो वह बहुत दूर निकल गई होगी. आप खोजना भी चाहें तो भी उसे खोज नहीं पाएंगे. इसलिए चला आया रिपोर्ट लिखवाने.’

इंस्पैक्टर ने रिपोर्ट लिखना शुरू किया. उस ने जसबीर से पूछा, ‘आप की पत्नी की लंबाई कितनी थी?’ जसबीर ने कहा, ‘अब ऐसे भी कठिन सवाल मत किया करो. अपनी पत्नी को भी कोई नापता है क्या?’ इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘लंबाई?’ कुछ पल के बाद जसबीर ने कहा, ‘यही मंझोले कद की होगी और क्या.’ इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘कोई खास बात, कि जिस से उन्हें पहचाना जा सके?’ तो जसबीर ने कहा, ‘बड़ी बुलंद आवाज है उस की. दहाड़ दे तो पहाड़ हिल जाए, दिल कांपने लगें.’ लेकिन इंस्पैक्टर ने कहा, ‘आवाज का क्या, वे दहाड़ कर बोलें या कभी न भी बोलें. कोई ऐसा चिह्न बताओ जिस के सहारे उन्हें पहचानना आसान हो.’

जसबीर ने कहा, ‘कुछ नहीं, इंस्पैक्टर.’ फिर कहा, ‘दुख की बात यह है कि वह मेरे कुत्ते को भी साथ ले कर गई है.’ इंस्पैक्टर ने कहा, ‘ठीक है, कुत्ते की भी रिपोर्ट लिखवा दो.’ पहचान की बात आई तो जसबीर ने कहा, ‘अल्सेशियन कुत्ता, ढाई फुट लंबा, रंग काला. उस का एक कान सफेद रंग का है. बालों की लंबाई एक इंच, पिछले हर पैर की 2-2 उंगलियों के नाखून टूटे हुए हैं. हिंदी भाषा अच्छी तरह समझता है…’ उस ने पूरा ब्योरा अच्छी तरह से लिखा दिया. एक बात आखिर तक उस की समझ में हीं आई कि आखिर इंस्पैक्टर उस की तरफ अजीब नजरों से क्यों देख रहा था. Husband Wife Story

Family Story in Hindi : सीरियल औन अनाज गौन

Family Story in Hindi : ‘‘यह क्या, खाने में बैगन बनाए हैं… तुम्हें पता है न कि मुझे बैगन बिलकुल पसंद नहीं हैं. फिर क्यों बनाए? तुम चुनचुन कर वही चीजें क्यों बनाती हो, जो मुझे पसंद नहीं?’’ इन्होंने मुंह बना कर थाली परे सरकाते हुए कहा.

मैं भी थोड़ी रुखाई से बोली, ‘‘तो रोजरोज क्या बनाऊं? वही आलूमटर, गोभी…? सब्जियों के भाव पता हैं? आसमान छू रहे हैं. इस महंगाई में यह बन रहा है न तो इसे भी गनीमत समझो… जो बना है उसे चुपचाप खा लो.’’

ये चिढ़ते स्वर में बोले, ‘‘मुझे क्या अपने मायके वालों जैसा समझ रखा है कि जो बनाओगी चुपचाप खा लूंगा, जानवरों की तरह?’’

उफ, एक तो मेरे मायके वालों को बीच में लाना उस पर भी उन की तुलना जानवरों से करना. मैं ऐसे उफनी जैसे जापान के समुंदर में लहरें उफनती हैं, ‘‘मेरे मायके वाले आप की तरह नहीं हैं, वे चादर देख कर पैर फैलाते हैं. हुंह, घर में नहीं दाने और अम्मां चली भुनाने. पल्ले है कुछ नहीं पर शौक रईसों जैसे… इस महंगाई के जमाने में आप जो मुझे ला कर देते हैं न उस में तो बैगन की सब्जी भी नसीब नहीं हो सकती है… आए बड़े मेरे मायके वालों को लपेटने… पहले खुद की औकात देखो, फिर मेरे मायके की बात करो.’’

ये भी भड़क गए, ‘‘जितना देता हूं न वह कम नहीं है. बस, घर चलाने की अक्ल होनी चाहिए… मैं तुम्हारी जगह होता तो इस से भी कम में घर चलाता और ऊपर से बचत कर के भी दिखाता.’’

मेरी कार्यकुशलता पर आक्षेप? दक्षता से घर चलाने के बाद भी कटाक्ष? मैं भला कैसे चुप रह सकती थी… बोलना जरूरी था, इसलिए बोली, ‘‘बोलना बहुत आसान होता है… खाली जबान हिलाने से कुछ नहीं होता… 2 दिन घर संभालना पड़े तो नानीदादी सब याद आ जाएंगे. यह तो मैं ही हूं, जो आप की इस टुच्ची तनख्वाह में निर्वाह कर रही हूं… दूसरी कोई होती तो कब की छोड़ कर चली गई होती.’’

‘‘मैं ने तुम्हें रोका नहीं है. मेरी कमाई से पूरा नहीं पड़ रहा न, तो ढूंढ़ लो कोई ऐसा जिस की कमाई पूरी पड़ती हो… अच्छा है मुझे भी शांति मिलेगी,’’ कह इन्होंने जोर से हाथ जोड़ दिए.

अब तो मेरे सब्र का बांध टूट गया. जारजार आंसू बहने लगे. रोतेरोते ही बोली, ‘‘आ गई न दिल की बात जबान पर… आप चाहते ही हो कि मैं घर छोड़ कर चली जाऊं ताकि आप को छूट मिल जाए, मुझे नीचा दिखाने का बहाना मिल जाए. ठीक है, मैं चली जाऊंगी. देखती हूं कैसे रहोगे मेरे बिना… एक दिन बैगन की सब्जी क्या बना दी. इतना बखेड़ा कर दिया. अब चली जाऊंगी तो बनाते रहना, जो मन में आए और खाते रहना.’’और फिर मैं डाइनिंग टेबल से उठ कर अपने कमरे में आ गई और धड़ाम से दरवाजा बंद कर लिया.

दूसरे दिन बालकनी में कपड़े सुखा रही थी. कल का झगड़ा चेहरे पर पसरा हुआ था. उदासी आंखों के गलियारे में चक्कर लगा रही थी. बोझिल मन कपड़ों के साथ झटका जा रहा था. मैं अपने काम में व्यस्त थी और मेरी पड़ोसिन अपने काम में. पर वह पड़ोसिन ही क्या जो अपनी पड़ोसिन में बीमारी के लक्षण न देख ले और बीमारी की जड़ को न पकड़ ले. अत: उस ने पूछा, ‘‘लगता है भाई साहब से झगड़ा हुआ है?’’

खुद को रोकतेरोकते भी मेरे मुंह से निकल ही गया, ‘‘हां, इन्हें और काम ही क्या है सिवा मुझ से झगड़ने के.’’

पड़ोसिन हंस दी, ‘‘वजह से या बेवजह?’’

‘‘झगड़ा ही करना है तो फिर कोई भी वजह ढूंढ़ लो और झगड़ा कर लो. मैं तो कहती हूं ये आदमी शादी ही इसलिए करते हैं कि घर में ले आओ एक प्राणी, एक गुलाम, एक सेविका, एक दासी जो इन के लिए खाना पकाए, घर संवारे, इन के कपड़े धोए और बदले में या तो आलोचना सहे या फिर झगड़ा झेले. हुंह…’’ कह मैं ने कपड़े जोर से झटके.

मेरी पड़ोसिन खिलखिला कर हंस दी, ‘‘अरे, पर झगड़ा हुआ क्यों?’’

मैं ने बताया, ‘‘इन्हें बैगन पसंद नहीं और कल मैं ने बैगन की सब्जी बना दी. बस फिर क्या था सब्जी देखते ही भड़क उठे.’’

पड़ोसिन की हंसी नहीं रुक रही थी. बड़ी मुश्किल से हंसीं रोक कर बोली, ‘‘अच्छा, यह बता कि तुम लोग खाना खाते समय टीवी बंद रखते हो?’’

मैं ने हैरानी से कहा, ‘‘हां, मगर टीवी का और खाने का क्या संबंध?’’

उस ने कहा, ‘‘है टीवी और खाने का बहुत गहरा संबंध है. मेरे यहां तो सभी टीवी देखतेदेखते खाना खाते हैं. सब का ध्यान टीवी में रहता है तो किसी का इस तरफ ध्यान ही नहीं जाता कि खाने में क्या बना है और कैसा बना है? है न बढि़या बात? वे भी खुश और मैं भी टैंशन फ्री वरना तो रोज की टैंशन कि क्या बनाया जाए… अब तू ही बता रोजरोज बनाएं भी क्या?’’

मैं ने कहा, ‘‘वही तो… रोज सुबह उठो तो सब से पहले यही प्रश्न क्या बनाऊं? सच कहूं आधा समय तो इस क्या बनाऊं, क्या बनाऊं में ही निकल जाता है. ऊपर से फिर यह भी पता नहीं कि इन्हें पसंद आएगा या नहीं, खाएंगे या नहीं और फिर वही झगड़ा.’’

पड़ोसिन ने सुझाव दिया, ‘‘हां तो तू वही किया कर जैसे ही ये खाना खाने बैठें टीवी चला दिया. उन का ध्यान टीवी पर रहेगा तो खाने पर ध्यान नहीं जाएगा और फिर झगड़ा नहीं होगा.’’

मैं उस की सलाह सुन भीतर आ गई. फिर मन ही मन तय कर लिया आज से ही मिशन डिनर विद टीवी शुरू…

शाम को मैं ने टीवी देखना शुरू किया. स्टार प्लस, सब, जी, सोनी देखतेदेखते ही खाना बनाया. टीवी देखतेदेखते ही खाना लगाया और टीवी दिखातेदिखाते ही खिलाया. आश्चर्य, ये भी सीरियल देखतेदेखते आराम से खाना खा गए. हालांकि सब्जी इन की मनपसंद थी फिर भी कुछ बोले नहीं. न आह न वाह. फिर तो रोज का काम हो गया. मैं खाना बनाती, ये टीवी देखतेदेखते खा लेते. सब कुछ शांति से चलने लगा. पर अब दूसरी मुसीबत शुरू हो गई. इन का पूरा ध्यान टीवी में रहने लगा. मुझे गुस्सा आने लगा. जब देखो आंखें फाड़फाड़ कर सीरियल की हीरोइनों को देखते रहते. मेरा खून खौलता रहता. हद तो यह भी थी कि टीवी देखतेदेखते बस खाते रहते, खाते रहते गोया गब्बर की तरह यह डायलौग रट लिया हो कि जब तक यह टीवी चलेगा हमारा खाना चलेगा. अब मेरा किचन का बजट गड़बड़ाने लगा. एक दिन ये टीवी देखतेदेखते खाना खा रहे थे. जैसे ही इन्होंने एक और रोटी की डिमांड की मैं भड़क गई, ‘‘मैं ने यहां ढाबा नहीं खोल रखा है, जो रोटी पर रोटी बनाती रहूं और खिलाती रहूं… तोंद देखी है अपनी, कैसी निकल रही है.’’

इन्होंने टीवी में नजरें गड़ाए हुए ही जवाब दिया, ‘‘अब तुम खाना ही इतना अच्छा बनाती हो तो मैं क्या करूं? मन करता है खाते रहो खाते रहो… लाओ अब जल्दी से 1 चपाती और लाओ.’’

उफ यह… कुछ दिनों पहले तक तो खाने पर झगड़ा करते थे और अब खाना खाने बैठते हैं तो उठने का नाम ही नहीं लेते. अत: गुस्से से इन की थाली में चपाती रखते हुए मैं ने कहा, ‘‘बंद करो अब खाना खाना भी और टीवी देखना भी, कहीं ऐसा न हो चंद्रमुखी की आंखों में डूब ही जाओ…’’

इन्होंने कौर मुंह में दबाते हुए कहा, ‘‘तो प्रिया कपूर की जुल्फें है न, उन्हें पकड़ कर बाहर निकल आएंगे.’’

मैं गुस्से से तिलमिला गई, ‘‘और मैं जो हड्डियां तोड़ूंगी तब क्या करोेगे?’’

ये हंसने लगे, ‘‘तो डाक्टर निधि है न, इलाज के लिए.’’

मेरा मन किया कि टेबल पर पड़े सारे बरतन उठा कर पटक दूं… एक परेशानी से निकलना चाह रही थी दूसरी में उलझ गई.

अब मैं खाने में कुछ भी बनाऊं ये कुछ नहीं कहते. दाल पतली और बेस्वाद हो ‘लापतागंज’ की इंदुमति के चटपटेपन के साथ खा लेंगे. आलूमटर की सब्जी में मटर न मिलें तो ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ के गोलू राम को गटक लेंगे. प्लेट से सलाद गायब हो तो ‘तारक मेहता’ के सेहत भरे संवाद हैं न? मीठानमकीन नहीं है पर ‘चौटाला’ की मीठीनमकीन बातें तो हैं न? आज पनीर नहीं बना कोई बात नहीं टोस्टी की टेबल पर से कुछ उठा लेंगे.

मतलब यह कि इधर सीरियल चलने लगे. उधर मेरा सीरियल (अनाज) उड़ने लगा. अब तो जो भी बनाऊं अच्छा लगे न लगे सीरियल के साथ चटखारे ले ले कर खाने लगे. मैं अब फिर परेशान हूं कि क्या करूं क्या न करूं. कुछ समझ में नहीं आ रहा.

महंगाई से निबटने और झगड़े से बचने के लिए सीरियल दिखातेदिखाते खाना खिलने की सलाह पर अमल किया था. पर मेरे साथ तो उलटा हो गया. अब सब कुछ मुझे डबल बनाना पड़ता है वरना भूखा रह गया का आलाप सुनना पड़ता है. Family Story in Hindi

Hindi Satire Story : अफसरी के चंद नुसखे

Hindi Satire Story : सरकारी अफसरी के मजे लेने हैं जनाब तो अपने मातहत बाबुओं पर चुनिंदा नुसखे आजमाइए, फिर देखिए, कैसे ये कामचोर, चापलूस और भ्रष्ट बाबू ‘पग घुंघरू बांध’ आप के इशारे पर ताताथइया करते नजर आते हैं.

अगर आप भारत की प्रथम श्रेणी सेवा में भरती हुए हैं और शीघ्र ही आप को किसी कार्यालय का कार्यभार मिलने वाला है तो आप को सफलतापूर्वक कार्यालय संचालित करने व अपने मातहतों से निष्ठापूर्वक इच्छित कार्य करवाने के कुछ उपाय बताए जा रहे हैं. इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़ें और उन पर अमल करें. आप एक सफल अधिकारी सिद्ध होंगे और 10 साल की सेवा के बाद आप को श्रेष्ठ अधिकारी का मैडल व 15 साल की सेवा के बाद अति विशिष्ट अधिकारी का मैडल मिल जाएगा.

सर्वप्रथम कार्यभार संभालते ही आप एक गोष्ठी आयोजित करें और उस में सभी से अकड़ कर बात करें. यह सिद्ध करने का प्रयत्न करें कि आप बहुत ही ईमानदार, कठोर व अनुशासित अधिकारी हैं. कार्यालय में किसी प्रकार की कामचोरी, भ्रष्टाचार व अनुशासनहीनता आप बरदाश्त नहीं करते. कार्य में लापरवाही बरतने के लिए आप कर्मचारी को निलंबित ही नहीं करते बल्कि त्वरित कार्यवाही कर के उसे बरखास्त भी कर देते हैं.

धीरेधीरे आप कर्मचारियों और कनिष्ठ अधिकारियों के चरित्र का अध्ययन करें. आप के पदभार ग्रहण करते ही कुछ चाटुकार, कामचोर, भ्रष्ट और बौस के प्रति सेवाभाव वाले कर्मचारीअधिकारी आप के इर्दगिर्द गुड़ के ऊपर मक्खी की तरह मंडराने लगेंगे. ये प्रथम श्रेणी के कर्मचारी होते हैं. उन से आप को होशियार होने की आवश्यकता नहीं है, बस उन के गुणों को पहचानने की आवश्यकता है. वे आप के प्रत्येक व्यक्तिगत कार्य के लिए सब से उपयुक्त प्राणी हैं. वे कार्यालय का कार्य भले ही न करते हों, अधिकारी के व्यक्तिगत कार्य पूरी निष्ठा, लगन और अनुशासन से करते हैं. प्रत्येक कार्यालय में ऐसे 10 से 20 प्रतिशत कर्मचारी होते हैं.

अब हम प्रथम श्रेणी के ऐसे कर्मचारियों की चर्चा विस्तार से करते हैं. इस किस्म के कर्मचारी या कनिष्ठ अधिकारी कभी समय पर कार्यालय नहीं आते और कार्यालय में आने के बाद भी कभी अपनी सीट पर नहीं मिलते. उन का प्रिय स्थान होता है कार्यालय की कैंटीन या जाड़े के दिनों में बाहर के खूबसूरत, हरेभरे लौन, जिन पर पसर कर ये मूंगफली चबाते हैं या ताश के पत्ते फेंटते दिखाई पड़ते हैं. उन को बौस कभीकभार ही ढूंढ़ता है, जब उसे कोई अपना व्यक्तिगत कार्य करवाना होता है, वरना वे खुले सांड़ की तरह सड़क पर विचरती खूबसूरत और कमसिन गायों को ताकते रहते हैं.

एक सक्षम अधिकारी के नाते आप इस श्रेणी के कर्मचारियों से निम्न प्रकार के कार्य करवा सकते हैं :

  1. कर्मचारियों की योग्यता पहचान कर उन्हें भिन्नभिन्न कार्यों में लगा सकते हैं, जैसे बच्चों को स्कूल छोड़ना और लाना, बाजार से खाद्य सामग्री व घरेलू सामान की खरीदारी, नातेरिश्तेदारों के बच्चों को स्कूलकालेज में ऐडमिशन दिलवाना, यात्राटिकट करवाना, अतिथियों के लिए गेस्टहाउस आदि का प्रबंध करना, बौस के दौरे पर खानेपीने की व्यवस्था से ले कर वातानुकूलित गाड़ी का प्रबंध आदि करना. प्रथम श्रेणी के कर्मचारी इन कार्यों को विधिवत व पूरी कर्मण्यता के साथ पूरा करते हैं.
  2. आप को जमीन खरीद कर उस पर मकान बनवाना है तो ऐसे कर्मचारी आप के बड़े काम आएंगे. आप को कुछ करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. बौस के व्यक्तिगत कार्य करवाने की उन में इतनी क्षमता होती है कि प्रौपर्टी डीलर और रजिस्ट्रार स्वयं आ कर आप के कार्यालय में आप के प्लौट या फ्लैट की रजिस्ट्री कर जाएंगे.
  3. मकान बनवाने के लिए नक्शा बनवाने से ले कर, ठेकेदार से बात करने और भवन सामग्री का प्रबंध करने तक का सारा कार्य वे बहुत आसानी और सुविधा से कर देते हैं. आप को भवन निर्माण के अंतिम चरण तक कहीं जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती. बस, निर्माण की गति और गुणवत्ता देखने के लिए कभीकभार अवश्य पधार सकते हैं.
  4. गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से वे बौस के विदेश जाने के कार्यक्रम भी बनवा देते हैं. संबंधित अधिकारी से फाइल को त्वरित गति से हरी झंडी दिलवा कर बौस को विदेश भेज देते हैं.
  5. पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसैंस, पैन कार्ड आदि तुरंत बनवा देते हैं.
  6. बेगम को खरीदारी करनी हो तो उन्हें साथ भेज दीजिए, सारी खरीदारी मुफ्त हो जाती है, आप की बचत हो जाती है.
  7. किसी एक विश्वसनीय कर्मचारी को आप बहुत ही गोपनीय कार्य के लिए चुन सकते हैं, जैसे आप के लिए सुविधाशुल्क वसूलने का कार्य. इस कार्य में वे इतनी ईमानदारी बरतते हैं कि आप के कान को भी भनक नहीं लगने देते और सारा माल आप के बताए हुए निर्दिष्ट स्थान तक पहुंच जाता है.
  8. आप के घर में कोई सगासंबंधी आए तो उसे घुमानेफिराने के लिए आप परेशान न हों, बस उन्हीं में से किसी कर्मचारी को लगा दें. वह आप के रिश्तेदार को आप से भी बड़ा बौस मान कर नगर के सभी स्थलों का भ्रमण मुफ्त में करवा देगा, अच्छे से अच्छे रेस्तरां में भोजन करवा देगा और आप की जेब से एक कौड़ी भी खर्च नहीं होगी.
  9. ऐसे कर्मचारी बिना किसी स्वार्थ के होलीदीवाली आप के परिवार के सभी सदस्यों के लिए महंगेमहंगे उपहार लाते हैं, इसलिए आप इन की सदैव प्रशंसा करते रहें.
  10. चूंकि ऐसे कर्मचारी आप के सारे व्यक्तिगत कार्य करवाते हैं, इसलिए उन को हमेशा प्रोत्साहित करते रहें. समयसमय पर उन को नकद इनाम के साथसाथ श्रेष्ठतम कर्मचारी का प्रमाणपत्र भी देते रहें. अवधि होने पर सरकार से उन के लिए पदक की अनुशंसा करें. 15 अगस्त और 26 जनवरी पर सरकार प्रतिवर्ष इस प्रकार के कर्मचारियों और अधिकारियों को पदक देती है.
  11. ऐसे कर्मचारी बिना अस्पताल में भरती हुए, कुछ लाइलाज बीमारियों का इलाज करवाने के मैडिकल बिल हर महीने जमा करते हैं, आप आंख मूंद कर उन को पास कर दें, अन्यथा वे वास्तव में बीमार पड़ जाते हैं. ऐसी स्थिति में आप के सभी आवश्यक कार्य रुक सकते हैं.

वहीं, दूसरी श्रेणी के कर्मचारी और कनिष्ठ अधिकारी वे होते हैं जो सरकारी काम के प्रति पूरी तरह से समर्पित होते हैं. वे घुग्घू प्रकार के जीव होते हैं जो बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के मन लगा कर, पूरी ईमानदारी, निष्ठा और लगन से कार्यालय का काम करते रहते हैं और हमेशा डांट खाते रहते हैं. आप उन को अच्छी तरह पहचान लीजिए और उन से ज्यादा से ज्यादा काम करवाने के लिए आप निम्नलिखित उपायों को उपयोग में लाएं ?:

इस प्रकार के कर्मचारी और अधिकारी चाहे जितना ही अच्छा और साफसुथरा कार्य करें, आप उन के अच्छे कार्य की कभी तारीफ न करें, वरना वे गरूर में आ जाएंगे और यह समझ कर कि आप उन के ऊपर निर्भर करते हैं, वे कार्य के प्रति कोताही, लापरवाही और ढीलापोली करने लगेंगे.

आप ऐसे कर्मचारियों और कनिष्ठ अधिकारियों को कार्य में लापरवाही बरतने के लिए हमेशा डांटते रहें. कार्य अगर समय से पहले भी कर के दे दें, तब भी आप उन से कहें कि कार्य में देरी क्यों लगाई? उन को डांटने का काम आप प्रथम श्रेणी के कर्मचारियों के सामने करें.

ऐसे कर्मचारियों या कनिष्ठ अधिकारियों को कभी भी आप अपने सामने कुरसी पर बैठने के लिए न कहें, चाहे आप के सामने उन से छोटा कर्मचारी आप का व्यक्तिगत कार्य करने के लिए बैठा हो. इस से उन के मन में हीनभावना आएगी और भविष्य में अधिक अनुशासन के साथ आप के समक्ष पेश होंगे.

कभी कभी उन को डराने के लिएज्ञापन भी देते रहें और उन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही करने की धमकी भी देते रहें. ज्ञापन के प्रत्युत्तर पर चेतावनी अवश्य दें.

इस प्रकार के जीव से आप कभी भी सीधे मुंह बात न करें. चूंकि वे अनुशासित और कार्य के प्रति समर्पित जीव होते हैं, उन को कार्य करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं आता, इसलिए आप को खुश रखने के लिए वे और अधिक ईमानदारी से कार्य करते हैं. उन के ही कारण कार्यालय का काम कभी अधूरा नहीं रहता, परंतु उन को इस बात का एहसास न होने दें, वरना वे काम करना बंद कर देंगे.

ऐसे कर्मचारियों को सदैव किसी न किसी काम में उलझाए रखें. काम न हो, तब भी उन्हें कोई न कोई काम देते रहें, जैसे फाइलों में पृष्ठ संख्या डालें, पुरानी फाइलों के कवर बदलें, नष्ट करने वाली पुरानी फाइलों की सूची बनाएं आदि. कार्यालय में बहुत से ऐसे निरर्थक कार्य होते हैं जिन में घुग्घू टाइप के कर्मचारियोंअधिकारियों को आप उलझाए रख सकते हैं और वे पिद्दी की तरह यह सोच कर खुश होते हैं कि बौस उन के ऊपर बहुत अधिक भरोसा करते हैं, इसलिए हर प्रकार के छोटेबड़े काम उन्हीं से करवाते हैं. उन को यह नहीं मालूम पड़ता कि बौस उन का शोरबा बना कर धीरेधीरे चुस्की ले कर पी रहे हैं.

ऐसे कर्मचारियों से निरर्थक कार्य करवाने व उन्हें व्यस्त रखने का लाभ यह होता है कि उन्हें कभी यह सोचने का मौका नहीं मिलता कि उन का शोषण किया जा रहा है.आप स्वयं किसी मामले में कोई फैसला न लें, ऐसे में आप पर कोई जिम्मेदारी आ सकती है. इसलिए ऐसे मामलों को घुमा कर कनिष्ठ अधिकारी की मेज पर लौटा दें और कुछ ऐसी जानकारियां मांग लें, जिन का उत्तर देने में कनिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी को अत्यधिक समय लग जाए और तब तक मूल प्रश्न ही दब कर रह जाए या उस की प्रासंगिकता समाप्त हो जाए.

भूले से भी कभी ऐसे कर्मचारियों और अधिकारियों को कोई पारितोषिक, इनाम या श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र न दें, बल्कि उन की वार्षिक रपट में भी कभी उत्तम या श्रेष्ठ कर्मचारी की श्रेणी न दें. उन को बस औसत श्रेणी ही दें, या अधिकतम देना ही पड़े तो ‘अच्छा’ की श्रेणी से अधिक न दें.

ऐसी श्रेणी के कर्मचारीअधिकारी कभीकभी किसी के उकसाने पर अगर कोई प्रतिवेदन देते हैं कि उन से अत्यधिक कार्य लिया जाता है या काम के अनुरूप उन को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता तो उस पर कभी विचार न करें और अगर करें भी तो उस पर ‘विश्वसनीय नहीं’ की टिप्पणी के साथ बंद कर दें. साथ ही, भविष्य में अनुशासित और सावधान रहने की चेतावनी दे कर व्यक्तिगत पंजिका में दर्ज भी करवा दें. प्रतिवेदन देने वाला कर्मचारीअधिकारी भविष्य में भूल कर भी अपने प्रति किसी ज्यादती की शिकायत नहीं करेगा.   ऐसे कर्मचारियों को कभी अवकाश न दें. मन मार कर देना भी पड़े तो आवश्यकता से कम अवकाश दें, ताकि वे हमेशा दबाव में रहें और आप का हर जायजनाजायज कहना मानते रहें.

मुझे विश्वास है कि अगर आप ने उपरोक्त सुझावों पर अमल किया तो आप एक अनुशासित और ईमानदार अधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित हो जाएंगे और फिर आप के खिलाफ कोई सांस लेने की जुर्रत भी नहीं कर पाएगा. तब आप मनमाने ढंग से सरकारी कार्यों को उलटापुलटा कर के बेहिसाब ‘कमाई’ कर सकते हैं. तुलसीदासजी डंके की चोट पर कह गए हैं कि ‘भय बिनु प्रीत न होय गुसाईं’ अर्थात आप अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को डरा कर रखेंगे, तभी वे आप का सम्मान करेंगे.हमारे बुजुर्गों के अनुभवों से लाभ उठाएं और एक सफल अधिकारी बन कर दिखाएं. Hindi Satire Story

Satire Story in Hindi : हा हा…कार

Satire Story in Hindi : कम्बख्त कार के कारनामे भी अजीबोगरीब हैं. कभी किसी बेकार के साथ चमत्कार करती है तो कभी मक्कार को दुत्कार देती है. दरअसल ‘कार’ से जुड़े इस नए शब्दकोष ने लोगों की जिंदगी में कैसे हाहाकार मचा रखा है, आप भी बूझिए.

अब से 2 दशक पहले तक कार शानोशौकत, दिखावे और विलास की वस्तु समझी जाती थी. पैसे वाले ही इसे खरीद पाते थे. आम जन इसे अपनी पहुंच से दूर समझते थे और अनावश्यक भी. लोग दालरोटी के जुगाड़ को ही अपना लक्ष्य समझते थे. संजय गांधी ने पहली बार देश के लोगों को छोटी कार का सपना दिखाया और मारुति कार जब देश में बनने लगी तो इस ने स्कूटर वालों के कार के सपनों को हकीकत में बदल दिया और बदल दीं इस के साथ कई परिभाषाएं और अर्थ. अब तो कहावत बन गई है कि ‘पति चाहे अनाड़ी हो पर पास में एक गाड़ी हो तो जिंदगी सब से अगाड़ी रहती है.’

तो भाइयो, गाड़ी आजकल लगभग सब के पास है और जिन के पास नहीं है वे भी अपना शौक टैक्सी से पूरा कर लेते हैं. हां, गाड़ी यानी कार के इस्तेमाल के आधार पर समाज 3 वर्गों में बंट गया है. पहला वर्ग तो वह है जो रोजरोज के आनेजाने में अपनी कार का ही इस्तेमाल करता है, दूसरा कोई साधन इस्तेमाल नहीं करता. दूसरा वर्ग वह है जो अपनी कार में सप्ताह में एक दिन, अकसर रविवार को अपने परिवार सहित सैर को निकलता है और शाम की चायनाश्ता किसी रेस्तरां, रिश्तेदार या मित्र के पास करता है. तीसरे वर्ग में वे लोग आते हैं जो अपनी कार की सफाई तो पूजा की तरह रोज करते हैं, पर उस का इस्तेमाल कभीकभार ही करते हैं, जैसे किसी शादीब्याह में या परिवार के किसी गंभीर बीमार को अस्पताल में ले जाने में.

खैर, कहने का तात्पर्य यह कि कार अब के जमाने में परिवार का अंग बन चुकी है. इस के सर्वव्यापक अस्तित्व के कारण कई शब्दों के अर्थ और परिभाषाएं बदल चुकी हैं. यहां छोटी कार के आगमन से जो ‘कार वाले’ बन गए हैं उन की ओर से कुछ शब्दों की नई परिभाषाएं व अर्थ प्रस्तुत किए जा रहे हैं. भाषाशास्त्रियों से विनम्र निवेदन है कि निम्नलिखित परिभाषाओं को शब्दकोष में विधिवत सम्मिलित करें :

बेकार : जिस व्यक्ति के पास आज के समय में कार नहीं है, उसे लोग (खासकर महिलाएं) ‘बेकार’ कहते हैं, चाहे वह कोई भी चंगी नौकरी या व्यवसाय क्यों न करता हो. यानी कार नहीं है तो अच्छाखासा बंदा बेकार है.

साकार : जिस व्यक्ति के पास ‘कार’ हो उसे ‘साकार’ कहते हैं यानी दुनिया को वही नजर आता है जिस के पास कार होती है. पैदल, यहां तक कि दुपहिया वाहन वालों का भी अस्तित्व खतरे में है.

निराकार : साधन संपन्न होते हुए भी जो व्यक्ति जानबूझ कर कार नहीं खरीदता उसे ‘निराकार’ कहा जाता है. कार कंपनियां ऐसे ही ‘निराकार’ सज्जनों को साकार बनाने का भरसक प्रयत्न करती रहती हैं.

चमत्कार : जिस व्यक्ति की आय का साधन भले ही लोगों को नजर न आए, फिर भी उस ने कार रखी है, तो उसे लोग ‘चमत्कार’ कहते हैं. हमारे महल्ले के मंदिर के पुजारी ने कार रखी है. उसे भी लोग ‘चमत्कार’ कहते हैं. यह दीगर है कि ऐसे चमत्कारों पर आयकर विभाग की नजर भी रहती है.

बदकार : कई कार मालिक बड़े रसिक होते हैं. अपने दोस्तों को अपनी कार में बिठा कर वे किसी एकांत स्थान पर रुक कर कार में शराब पीने का आनंद लेते हैं और कई तो अवैध कर्म भी करते हैं. ऐसे कार मालिकों को ‘बदकार’ कहा जाए तो क्या नुकसान है?

स्वीकार : जिस व्यक्ति ने अपने ससुर से दहेज में कार स्वीकार की हो उसे ‘स्वीकार’ की संज्ञा देना उचित होगा.

मक्कार : बैंक से ऋण ले कर कार तो खरीद ली पर ऋण की किस्त चुकाने में जो आनाकानी करता है, ऐसे कार मालिक को ‘मक्कार’ कहना बिलकुल सही होगा. बैंकों से अनुरोध है कि वे इस शब्द को अपनी शब्दावली में शामिल कर लें.

स्वर्णकार : जिस व्यक्ति ने अपनी पत्नी के सोने के गहने बेच कर कार खरीदने का दुस्साहस किया हो उसे ‘स्वर्णकार’ कहलाने का हकदार होना चाहिए.

पैरोकार : कार का ऐसा मालिक जो पैदल चलने में अपना अपमान समझता हो यानी कार के बाहर अपने पैर भी न रखता हो, उसे ‘पैरोकार’ कहना उचित होगा.

सरोकार : जो कार मालिक सिर्फ कार वालों से ही मिलनाजुलना पसंद करते हैं, उन्हीं में ब्याहशादी का संबंध स्थापित करने में विश्वास रखते हैं और बाकी दुनिया से कोई सरोकार रखना नहीं चाहते उन्हें ‘सरोकार’ कह कर बुलाया जाए.

चीत्कार : कारें भी कई तरह की होती हैं और चलाने वाले भी. जो व्यक्ति अपनी कार को भीड़भाड़ वाले इलाके में भी चीते की गति से चलाता हुआ ले जाता है उसे ‘चीत्कार’ कहना उपयुक्त होगा. पर अगर उस से किसी को टक्कर लग जाए तो लोग अपनेआप ही उसे ‘फटकार’ कहने लगेंगे.

ललकार : जो व्यक्ति अपने पड़ोसी से ज्यादा महंगी कार खरीद कर ले आए और रोज अपने घर से निकलते वक्त उक्त पड़ोसी के घर के सामने अपनी महंगी कार का हौर्न बारबार बजाए, ऐसे को हम ‘ललकार’ कहना पसंद करेंगे.

हाहाकार : जिस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को देखते हुए पड़ोसियों को कोई उम्मीद न हो कि वह भी कभी कार खरीद सकता है और वह अचानक नई कार खरीद कर अपने दरवाजे के सामने खड़ी कर दे तो पड़ोसियों के घरों में तो हाहाकार मचना स्वाभाविक है. ऐसा कारनामा करने वाले को ‘हाहाकार’ कहना कोई अतिशयोक्ति न होगी.

फनकार : कई ऐसे धुरंधर हैं जो महीनों तक बिना ड्राइविंग लाइसैंस और गाड़ी के रजिस्टे्रशन के अपनी कार चलाते रहते हैं. पर क्या मजाल कि कोई पुलिस वाला उन का चालान कर दे. जिस महानुभाव को ऐसा फन हासिल हो, उसे ‘फनकार’ कहा जाए तो क्या हर्ज है?

चित्रकार : इस परिभाषा को लिखने से पहले मैं दुनिया छोड़ चुके महान आर्टिस्ट एम एफ हुसैन और उन की जमात के लोगों से क्षमा मांगता हूं. कई व्यक्तियों को अपनी कार के शीशों और बौडी पर अजीबोगरीब स्टिकर सजाने का जनून होता है. इसी प्रकार के व्यक्ति को, जिस ने अपनी कार को कैनवास की तरह इस्तेमाल किया हो, उसे ‘चित्रकार’ के नाम से सम्मानित किया जाए.

कलाकार : वैसे तो किसी कवि या लेखक के लिए कार खरीदना असंभव जैसा है फिर भी कई हिम्मत वाले लेखक घर के खर्चों में कटौती कर के कार खरीदने का सपना पूरा कर लेते हैं. ऐसे ही किसी कवि या लेखक को जिस ने कार रखी हो, ‘कलाकार’ कहना उचित होगा.

फुफकार : कई कार चालक बड़े गुस्सैल होते हैं. पैट्रोल की महंगाई ने ज्यादातर को ऐसा बना दिया है. वे अपना गुस्सा अपने विरोधी पर अपनी कार के साइलैंसर से धुआं फेंक कर निकालते हैं. ऐक्सिलरेटर को बारबार दबा कर ऐसा धुआं फेंकेंगे मानो कोई सांप फुफकार रहा हो. ऐसे गुस्सैल कारचालक को ‘फुफकार’ ही कहना चाहिए.

दुत्कार : अमीर लोगों को अब इस बात की ईर्ष्या होती है कि ऐरेगैरे आदमियों ने भी कार रख ली है, चाहे छोटी कार ही क्यों न हो. तो अब कई अमीर लोगों ने अपनी बड़ी कारों में प्रैशर हौर्न फिट करवा लिए हैं. जब वे कोई छोटी कार देखते हैं तो उस से आगे निकलते हुए बारबार अपने प्रैशर हौर्न से बड़ी भयावह आवाज पैदा करते हैं, मानो छोटी कार वालों को दुत्कार रहे हों. ऐसे ईर्ष्यालु, अमीर कार मालिक को ‘दुत्कार’ के नाम से नवाजा जाए.

नकारा : जिस व्यक्ति ने बहुत ही पुराने मौडल की कार खरीदी हो और जैसेतैसे हांक कर कार वालों की श्रेणी में रहने का प्रयास करता हो, उसे ‘नकारा’ कहना बिलकुल सही होगा.

कार सेवा : अपनी कार की हर रोज, साप्ताहिक या मासिक धुलाई और साफसफाई को आजकल ‘कार सेवा’ कहते हैं.

नाटककार : कार के ऐक्सिडैंटल डैमेज के झूठे बिल बना कर जो कार मालिक बीमा कंपनियों से पैसा ऐंठता है, उन जैसा नाटककार और कहां मिलेगा, इसलिए उसे ‘नाटककार’ कहा जाए.

हमारे पास अभी शब्द तो और भी बहुत हैं जिन की परिभाषाएं और अर्थ बदल चुके हैं पर स्थानाभाव से अभी इतना ही लिख कर समाप्त करता हूं. ऐसा न हो कि ‘सरकार’ ही मुझ से नाराज हो जाए. जब ये परिभाषाएं शब्दकोश में शामिल हो जाएंगी तो यह ‘कथाकार’ और बहुत से अर्थ व परिभाषाएं ले कर आप के सामने उपस्थित हो जाएगा. आप स्वयं भी जानकार हैं इसलिए अपनी प्रतिक्रिया अवश्य बताइए, धन्यवाद. Satire Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : सरकारी बाबू

Satirical Story In Hindi : जब से बाबू लोगन की नकेल कसने के लिए बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन लगी है, हर बाबू के कान खड़े हो गए हैं. हालांकि घबराने की बात नहीं है क्योंकि इन्होंने समय का पाबंद होने के बजाय इस मशीन से निबटने का बेहतरीन आइडिया निकाल लिया है. क्या है वह आइडिया, जरा आप भी दिमागी घोड़े  दौड़ाइए.

हमारे सरकारी दफ्तर में सभी कर्मचारियों को समय का पाबंद बनाने के लिए उन के फिंगर इंप्रैशन और फोटो रिकौर्ड में लेने के बाद इलैक्ट्रौनिक ‘बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली’ की नई व्यवस्था चालू कर दी गई. नई व्यवस्था के बाद अब यदि हमारे दफ्तर के कर्मचारियों को ‘सरकारी पिंजरे में बंद पशुपक्षी’ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी.

पशु इसलिए क्योंकि हाथी, घोड़ों, कुत्तों, यहां तक कि गधे जैसा स्वभाव व व्यवहार करने वाले लोग भी यहां पाए जाते हैं, जो अपने अहंकार के आगे इंसान को इंसान नहीं समझते. पक्षी इसलिए कि यहां पर कोयल की सुरीली आवाज वाली और मोर जैसी सुंदर, आकर्षक, शृंगारयुक्त व सुडौल महिलाएं भी होती हैं और बगुला भगत तो एक नहीं कई होते हैं. विशेषकर जिन्हें अपने दूरदराज के क्षेत्रों में स्थानांतरण व शीघ्र ही पदोन्नति पाने की चिंता होती है, उन्हें आला अधिकारियों का बगुला भगत बनते देर नहीं लगती.

कर्मचारियों को समय का पाबंद बनाने के लिए लगी बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली मशीन लगने के बाद एक कर्मचारी ने अपने साथियों से कहा, ‘‘साथियो, सुबह साढ़े 9 बजे बायोमीट्रिक मशीन में अपनी हाजिरी लगा कर सभी लोग दफ्तर के गार्डन में पीछे की तरफ आ जाया करो. अब तो एकएक ताश की बाजी सुबहसुबह 10 से 11 के बीच में भी हो जाया करेगी और लंच टाइम में तो हमें कोई रोक ही नहीं सकता.’’

दूसरे कर्मचारी ने भी चुसकी ली और बोला, ‘‘साथियो, बायोमीट्रिक मशीन में सुबहशाम अपनी हाजिरी के लिए उंगली (फिंगर इंप्रैशन) लगाना ठीक है, परंतु यदि गलती से भी कहीं और लगा दी तो अच्छा नहीं होगा. इसलिए इसे रास्ते चलते अपनी आदत मत बना लेना. गलती से भी यदि आप की उंगली भीड़भाड़ में किसी महिला के शरीर से टच हो गई तो जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है. पता होना चाहिए कि महिलाओं के संबंध में कानून व्यवस्था अब बहुत सख्त हो गई है.’’

लेखानुभाग में उपस्थित एक क्लर्क पुरुष बोला, ‘‘साथियो, सुबहसवेरे बायोमीट्रिक मशीन में उंगली लगा कर सीधे ही सभी लोग सभागार में पहुंच जाया करो. थोड़ी गपशप और चायशाय हो जाया करेगी. काम तो 11 बजे से पहले नहीं शुरू हो पाएगा. जब तक सफाई कर्मचारी कक्ष का अच्छी तरह से झाड़ूपोंछा नहीं कर लेते तब तक हम तो अपने कक्ष में बिलकुल भी नहीं बैठ सकते.’’

दूसरा क्लर्क पुरुष बोला, ‘‘अरे यार, क्या बात करते हो, केवल गपशप और चायशाय से क्या होगा. मेरी राय में तो समय बिताने के लिए अब करना है कुछ नया काम, सुबहसुबह ही किसी कोने में इंटरनैट खोल कर बैठिए और देखिए तमाम ब्लू फिल्में.’’

उस के इतना कहते ही सभी ने जोरदार ठहाका लगाते हुए एक स्वर में कहा, ‘‘हां, आप ठीक कह रहे हैं, यही ठीक रहेगा.’’

दफ्तर में बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन लग जाने के कारण संभ्रांत महिलाओं की चिंता थी कि सुबह साढ़े 9 बजे तक दफ्तर आने और शाम को 7 बजे से पहले न जाने पर उन के घर के कई काम अधूरे रह जाते हैं.

उन की समस्या सुन कर एक समझदार साथी ने अपनी महिला साथी की समस्या का समाधान कुछ इस प्रकार किया और बोला, ‘‘मैडम, आप तो एक इलैक्ट्रिक कुकिंग प्लेट, कुछ बरतन व जरूरी मसाले आदि ला कर यहीं अपनी अलमारी में रख लीजिए और सुबहसुबह साढ़े 9 बजे आ कर बायोमीट्रिक मशीन में अपनी हाजिरी लगा कर तुरंत दफ्तर के पास वाली मार्केट चली जाया कीजिए और वहां से ताजी सब्जियां खरीद कर ले आया कीजिए. शाम तक उसे धो कर व काटकूट कर सायं 5 बजे के बाद उसे अपने दफ्तर के कक्ष में ही तैयार कर, यहीं से सब्जी पका कर ही 6 बजे के बाद घर ले जाया करें और पहुंचते ही चपातियां सेंक कर अपने परिवार के सदस्यों को सर्व कर दिया करें.’’

वे बोलीं, ‘‘कैसी बातें करते हैं, किसी अधिकारी ने देख लिया तो?’’

समझदार साथी ने पलट कर जवाब दिया, ‘‘मैडम, इस में डरने वाली कोई बात नहीं है. जब अधिकारी अपने कक्ष में इलैक्ट्रिक कैटल और नाश्ते का सामान रख सकते हैं तो आप भला क्यों नहीं रख सकतीं. आप तो खांमखां डर रही हैं.’’

एक कर्मचारी ने बताया, ‘‘दफ्तर में जब से बायोमीट्रिक मशीन लगी है मैं ने तो अपने सुबह के टहलने के समय में परिवर्तन कर लिया है और यहां साढ़े

9 क्या, 9 बजे ही आ जाता हूं और हाजिरी मशीन में अपनी उंगली का इंप्रैशन लगा कर सीधे ही पास वाले गार्डन में जा कर 11 बजे तक चक्कर लगाता हूं और फिर दफ्तर लौट कर कैंटीन में चाय पीता हूं तब जा कर सीट पर बैठ कर 2-4 फाइलें निबटा देता हूं. तब तक लंच टाइम हो जाता है. इसी प्रकार शाम को पहले 5 बजे घर भाग जाया करता था. अब 4 बजे निकलता हूं और पास वाले सुपर मार्केट से शाम के 6 बजे तक सामान गाड़ी में डाल कर ले आता हूं और यहां आ कर मशीन में दफ्तर छोड़ने के लिए उंगली का इंप्रैशन लगाता हूं और वापस घर चला जाता हूं.’’

साथी बोला, ‘‘यार, तुम्हारे कमरे की लाइट व कंप्यूटर वगैरह कौन स्विच औफ करता है?’’

वह बोला, ‘‘मुझे उस की बिलकुल भी परवा नहीं है. प्रत्येक तल पर सुरक्षा संतरी किस लिए है. वह खुली देखता होगा तो खुद ही बंद कर देता होगा. आखिर उसे भी तो कुछ काम करना चाहिए…वह भी तो तनख्वाह लेता है.’’

सच कहूं तो मुझे तो अपने दफ्तर में बायोमीट्रिक मशीन द्वारा हाजिरी लगने से केवल एक लाभ ही दिखाई दे रहा है कि जिन सरकारी कर्मचारियों को अपने दफ्तर के कार्यदिवसों में खुलने का समय व बंद होने का समय मालूम ही नहीं था, इस बहाने उन्हें पता चल गया वरना पूरी 60 वर्ष की नौकरी हो जाती और वे रिटायर भी हो जाते, उन्हें सरकारी दफ्तर के प्रत्येक दिन का सही कार्यसमय ही न मालूम हो पाता.

बंदा तो पहले घर से ही देरी से दफ्तर आता था और जल्दी चला जाता था, इसलिए अपनी सीट पर नहीं मिलता था और अब अपने कार्यदिवसों में आता तो जल्दी है और प्रत्येक दिन जाता भी दफ्तर के समाप्त होने के निर्धारित समय के बाद है मगर फिर भी वह दिनभर सीट पर कम ही दिखता है. कहां जाता है और क्याक्या करता है, किसी को पता ही नहीं रहता.

जिस किसी से पूछो कि फलां कर्मचारी कहां है तो यही कहते मिलता है कि आए तो हैं लेकिन कहां हैं, पता नहीं. देखिए, उन का चश्मा और पैन तो उन की सीट पर रखा है और कंप्यूटर भी औन है न. बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन के कंप्यूटरीकृत सौफ्टवेयर में ताकझांक करने पर वह वहां सुबह साढ़े 9 बजे तक रोजाना ही दफ्तर आता है और शाम को भी सायं 6 बजे के बाद ही दफ्तर छोड़ता है. वहां लगे हुए उस के फिंगर इंप्रैशन व फोटो तो यही सत्यापित करते हैं. इसलिए दफ्तर के आला अधिकारियों द्वारा कभी भी उस की एक क्या, आधे दिन तक की भी, न तो छुट्टी काटी जा सकती है और न ही वेतन. Satirical Story In Hindi

Famous Kota Kachori : कोटा कचौरी, स्वाद का अनुपम खजाना

Famous Kota Kachori : कोटा की कचौरी सिर्फ एक नाश्ता नहीं, बल्कि कोटा की पहचान है. इस के बिना यहां की दावतें भी अधूरी रहती हैं. आइए यहां के जायके को ले कर एक खास आनंद की अनुभूति लीजिए.

कोटा, राजस्थान का एक प्रमुख शहर, जिस ने कोचिंग के लिए शैक्षणिक नगरी के रूप में पूरे देश के मानचित्र पर एक अलग पहचान बनाई.
कोचिंग के साथसाथ यहां की कचौरियों का जायका लोगों की जबान पर कब चढ़ गया, पता ही नहीं चला.

कचौरी, जी हां, एक स्वाद से भरपूर व्यंजन जिसे लोग किसी भी समय खाने का मन रखते हैं.

यों तो कचौरी उत्तर भारत में सभी जगह बनाई जाती है लेकिन राजस्थान के कोटा शहर की कचौरी का स्वाद अनूठा होता है.

उड़द की दाल से बनने वाली कचौरी दो तरह की चटनी के साथ दी जाती है. खट्टी चटनी और मीठी चटनी कचौरी के स्वाद को दोगुना कर देती हैं.

कचौरी के स्वाद के लिए लोग इस पर नमकीन डाल कर भी खाते हैं. तीखी हींग के साथ, तेज मिर्च इस के जायके को और बढ़ा देती है.

शहर में अनेक, सिर्फ कचौरी और नमकीन की दुकानें हैं, जो दिनभर कचौरी बनाने में व्यस्त हैं.

सुबह के समय तो प्रसिद्ध दुकानों पर खासी भीड़ होती है.

देश के विभिन्न हिस्सों से आए कोचिंग छात्र न केवल कचौरी खाते हैं बल्कि यहां से अपने घर भी भेजते हैं. कई दिनों तक खराब न होने वाली ये कचौरियां विदेश तक में भेजी जाती हैं.

कचौरी, दाल के अलावा, आलू प्याज की भी बनाई जाती है, जो बड़ी होती है और स्वाद से भरपूर होती है. आलू, प्याज की कचौरी एक दिन के बाद खराब हो जाती है.

कोटा के कुछ लोग तो प्रतिदिन कचौरी का सेवन करते हैं. उन का कहना है कि बिना कचौरी खाए उन का दिन पूरा नहीं होता.

प्रसिद्ध कचौरी की दुकान वाले प्रतिदिन हजारों की संख्या में कचौरी बनाते हैं. उन के कारीगर फ्री नहीं रहते.

रतलामी, जय अंबे, जोधपुर, रतन, सुवालाल, जैन यहां की प्रमुख दुकानें हैं. हर दुकान की अपनी खासीयत है. किसी के स्वाद में हींग तेज है तो किसी की चटनी में स्वाद है. यहां इसी कचौरी के मसाले से छोटी कचौरियां भी बनाई जाती हैं.

कचौरी कोटा का प्रमुख व्यंजन है. इस के बिना यहां की दावतें भी अधूरी रहती हैं. दफ्तरों, पिकनिक, घरेलू आयोजनों सभी में कचौरी ने अपना विशिष्ट स्थान बना रखा है.

कचौरी, कोचिंग, कोटा डोरिया और कोटा स्टोन के लिए मशहूर कोटा देश अहम राज्य राजस्थान का एक प्रमुख शहर है. तो आइए यहां के जायके के साथ एक खास आनंद की अनुभूति लीजिए.

मेरा पूरा यकीन है कि यहां की कचौरी का स्वाद आप जीवनभर याद रखेंगे. Famous Kota Kachori

Arvind Kejriwal : सीबीआई, ईडी और सीएजी – पिंजरों में डालने वाले तोते

Arvind Kejriwal : शराब घोटाले मामले में अरविंद केजरीवाल सरकार बेदाग साबित हुई है. अदालत ने सिर्फ फैसला ही नहीं दिया है बल्कि सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों की जम कर खिंचाई भी की है. ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है लेकिन सुधरने का नाम ये दोनों ही एजेंसियां नहीं ले रहीं जो सरकार के इशारे पर नाचती, खासतौर से, विपक्षी नेताओं को फंसाती हैं लेकिन अदालत में वे कुछ साबित नहीं कर पातीं, यानी, इन का काम भाजपाविरोधी नेताओं का मनोबल गिराना रह गया है. यही हाल सीएजी का भी है, जिस का औडिट अकसर मनगढ़ंत होता है , जो जांच में अहम रोल निभाता है.

27 फरवरी, 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू स्थित विशेष सीबीआई अदालत के विशेष जज जितेंद्र सिंह के एक फैसले ने भारत के चुनावी लोकतंत्र और देश की सर्वोच्च जांच एजेंसियों की कलई एक बार फिर खोल कर रख दी. दिल्ली की पिछली केजरीवाल सरकार, जिस के खिलाफ 100 करोड़ रुपए के शराब घोटाले की जांच देश की सब से बड़ी जांच एजेंसियां सैंट्रल ब्यूरो औफ इन्वैस्टीगेशन (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) कर रही थीं, के सभी आरोपियों को कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया. कानूनी तौर पर इसे डिस्चार्ज करना कहते हैं जिस में आरोप तय होने से पहले ही आरोपमुक्त कर दिया जाता है, यानी, मामला ट्रायल पर ही नहीं आता.
पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित सभी 23 आरोपी अब इस घोटाले से मुक्त हैं. यही नहीं, कोर्ट ने सीबीआई और ईडी के काम के तरीके और उन की नीयत पर सवाल भी उठाए, कहा कि यह पूरा केस एक फ्रौड केस है, जिस में न कोई रिकवरी हुई, न पैसे के लेनदेन को कोई एजेंसी साबित कर पाई.

अदालत का फैसला गौर से देखें तो वह मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों का सटीक विश्लेषण होने के साथसाथ जांच एजेंसियों को कठघरे में खड़ा करते हुए उन के सत्ता का दलाल होने की तरफ भी इशारा करता है. सीबीआई से उम्मीद होती है कि बिना पक्षपात काम करे, खासकर, उन मामलों में जिन में किसी की आजादी और प्रतिष्ठा दांव पर हों. लेकिन इस मामले में सुबूतों के बिना केजरीवाल सरकार के खिलाफ जाल फैलाया गया और जायज राजनीतिक गतिविधियों को आपराधिक रंग देने की कोशिश की गई.

सीबीआई की कार्यशैली पर तंज कसते हुए फैसले में कहा गया है कि सीबीआई मान बैठी थी कि अपराध हुआ और फिर अपनी बात साबित करने के लिए वह लोगों को फंसाती गई. कानूनी तौर पर ढिलाई और मनमानी की तरफ इशारा करते हुए फैसले में कहा गया है कि कुछ लोग संदिग्ध की सूची में थे, उन्हें गवाह भी बना लिया गया ताकि अगर वे मुकर जाएं तो उन्हें आरोपी बनाया जा सके. जो लोग नकद पैसे इधरउधर करना मान चुके थे, उन्हें आरोपी नहीं बल्कि गवाह बनाया गया, उन के बयानों के आधार पर भी लोग फंसाए गए.

इतना ही नहीं, सीबीआई की खिल्ली सी उड़ाते फैसले के ये शब्द काबिलेगौर हैं कि- सीबीआई ने चुनावप्रचार, होटल बुकिंग भुगतान की भी जांच की जो निर्वाचन आयोग का काम है, यानी, संवैधानिक सीमाएं पार की गईं. सत्ता के हाथों कठपुतली बन चुकी इस जांच एजेंसी के एक झूठ पर भी फैसले में कहा गया है कि- सीबीआई ने कहा था कि एक अभियोजक के बयान की कौपी नहीं मिली, रिकौर्ड में यह बात झूठ साबित हुई.

शराब घोटाले मामले को कैसे एक नपीतुली सियासी साजिश के तहत क्रिएट किया गया था, इस पर हैरानी जताते हुए फैसले में कहा गया है कि जांच ऐसे बढ़ी जैसे बहुत सारे लोगों को इस के दायरे में लाना हो. सुबूत के बजाय पुरानी कड़ियां खोल कर ऊपर तक जोड़ी गईं.

गौरतलब है कि 100 करोड़ रुपए के तथाकथित शराब घोटाले का मामला तब उछाला गया जब दिल्ली में चुनाव होने थे. सीबीआई ने पूरे फ्रौड मामले में राज्य के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और सरकार के सभी बड़े नेताओं को जेल में ठूंस दिया. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत नहीं दी, जमानत दी भी तो इस अलोकतांत्रिक शर्त पर कि आप चुनावप्रचार नहीं करेंगे.

इन सब के बीच सीएजी यानी कैग की रिपोर्ट भी आई जिस में कहा गया कि केजरीवाल की शराब नीतियां गड़बड़ थीं. इस रिपोर्ट के आने के बाद सीबीआई जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो गई. लगे हाथ ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय ने भी 100 करोड़ रुपए का खेल बतला दिया.

और भी हैं ऐसे मामले

कैग की रिपोर्टें पहले भी ऐसे कई गुल खिला चुकी हैं. बरबस ही इस मामले ने सीडब्ल्यूजी (कामन वैल्थ गेम्स) और 2 जी स्पैक्ट्रम मामलों की याद दिला दी. उस वक्त कैग के मुखिया विनोद राय थे. इन दोनों ही मामलों पर भाजपा के होहल्ले ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने और खुद सत्ता हथियाने में कामयाबी हासिल कर ली थी.

सीडब्ल्यूजी मामले में कैग ने साल 2011 की अपनी रिपोर्ट में भारी वित्तीय अनियमितताओं की तरफ इशारा किया था. इस आयोजन समिति के अध्यक्ष उड्डयन मंत्री रह चुके दिग्गज कांग्रेसी नेता सुरेश कलमाड़ी थे जो 16 साल भारतीय ओलिंपिक संघ के भी अध्यक्ष रहे थे. उन्हें 2011 में ही गिरफ्तार कर लिया गया था. कैग का एक अहम आरोप यह भी था कि कई ठेके मनचाही कंपनियों को दिए गए हैं. इस मामले की जांच भी सीबीआई और ईडी दोनों ने की थी लेकिन अधिकतर मुकदमे अभी भी सुनवाई के स्टेज पर ही हैं. किसी को सजा नहीं हुई है.

2 जी मामले ने तो देश की राजनीति की दशा और दिशा ही बदल कर रख दी थी. इस मामले में भी रिपोर्ट विनोद राय ने तैयार की थी. 2 जी मामला देश के दूरसंचार क्षेत्र से जुड़ा हुआ था जिस में साल 2008 में लाइसैंस आवंटित किए गए थे. लाइसैंस देने का अधिकार दूरसंचार मंत्रालय के पास था, जिस ने बहुत पारदर्शी तरीके से पहले आओ पहले पाओ की नीति पर तवज्जुह दी थी.

इसी नीति के तहत जनवरी 2008 में कुछ घंटों में ही लाइसैंस बंट गए थे. दूरसंचार मंत्रालय ने 2001 की कीमतों को ही लागू रखा था जबकि 2008 तक मोबाइल का बाजार काफी बढ़ चुका था.

साल 2010 में विनोद राय ने कैग की रिपोर्ट पेश की जिस में कहा गया था कि इस से सरकार को लगभग 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. इस आंकड़े ने देशभर में हलचल मचा दी थी. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उस ने 2 फरवरी, 2012 को 122 लाइसैंस रद्द कर दिए. तब सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि आवंटन प्रक्रिया मनमानी और असंवैधानिक थी. उस ने आइंदा स्पैक्ट्रम नीलामी के जरिए देने के भी निर्देश दिए थे. इस मामले की जांच भी सीबीआई और ईडी ने की थी.

भाजपा ने इसे ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल करते देशभर में इतना हाहाकार मचाया था कि एक बार तो हर किसी को यह लगने लगा था कि यूपीए गठबंधन के प्रमुख घटक डीएमके के ए राजा, जो उस वक्त दूरसंचार व आईटी मंत्री थे, और डीएमके सांसद कनिमोझी बहुत बड़े घोटालेबाज हैं. यह अंतिम फैसला आने के पहले की बात है.

समाजसेवी अन्ना हजारे भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन छेड़ चुके थे, जिसे देशभर से व्यापक समर्थन मिला था, लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही अन्ना जंतरमंतर से छूमंतर हो गए मानो उन का मकसद पूरा हो चुका हो. दिल्ली की शराब नीति मामले में भी ऐसा ही हल्ला भारतीय जनता पार्टी द्वारा मचाया गया था कि आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल हर किसी को महाभ्रष्ट और अव्वल दर्जे के घोटालेबाज नजर आने लगे थे.

यह कहना गलत न होगा कि भगवा गैंग के संस्कार ही दुष्प्रचार के हैं, ठीक वैसे ही जैसे पौराणिककाल में हुआ करते थे. महाभारत का एक पात्र अश्वत्थामा तब के युद्ध गुरु द्रोणाचार्य का लाड़ला बेटा था. महाभारत के युद्ध में द्रोणाचार्य ने त्राहित्राहि मचा रखी थी. लाख कोशिशों के बाद भी वे हथियार डालने के लिए तैयार नहीं थे और पांडव पक्ष के योद्धाओं को मारते जा रहे थे. तब पांड्वों की तरफ से यह रणनीति बनी कि अगर द्रोणाचार्य को यह भरोसा दिला दिया जाए कि अश्वत्थामा मर चुका है तो वे हताश हो कर हथियार छोड़ देंगे.

तब भी थे तो सब के सब एक नंबर के झुठेले ही लेकिन सिर्फ युधिष्ठिर झूठ नहीं बोलते थे, इस पर किसी को शक नहीं था, यहां तक कि द्रोणाचार्य को भी नहीं. सत्यवादी युधिष्ठिर झूठ बोलने को तैयार नहीं हुए. इस धर्मसंकट से बचने के लिए कृष्ण द्वारा तय यह किया गया कि एक हाथी का नाम अश्वत्थामा रखा जाए और युधिष्ठिर इस का ऐलान करें कि अश्वत्थामा मर गया लेकिन हाथी.

प्लान कामयाब रहा. जैसे ही युधिष्ठिर ने अश्वत्थामा मर गया कहा तो पांड्वों ने इतना शोरशराबा किया कि हाथी कोई नहीं सुन पाया. द्रोणाचार्य ने जैसे ही युधिष्ठिर के मुंह से यह सुना कि अश्वत्थामा मर गया वैसे ही उन के हाथपैर ढीले पड़ गए और उन्होंने हथियार फेंक दिए. बस, फिर क्या था, पांड्वों की तरफ से धृष्टधुम्न ने उन्हें मार डाला.

यही शोर भगवा गैंग ने दिल्ली की शराब नीति के वक्त मचाया था और यही 2 जी स्पैक्ट्रम और सीडब्ल्यूजी मामले के वक्त मचा कर जीत हासिल कर ली थी. सुरेश कलमाड़ी, ए राजा, कनिमोझी और अरविंद केजरीवाल इतने बदनाम कर दिए गए कि जनता की निगाह से ही उतर गए. इन से भी ज्यादा और निर्णायक नुकसान कांग्रेस को हुआ जिस के हाथ से सत्ता खिसकी, तो वापस आने का नाम ही नहीं ले रही. हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजे उसे उम्मीद बंधाते हुए हैं.

सो, इस तरह इन मामलों में भी जनता ने द्रोणाचार्य की तरह अश्वत्थामा मर गया तो सुना लेकिन हाथी नहीं सुना क्योंकि भगवा शोर ने उस के कान बंद कर दिए थे. बहरहाल, 2 जी मामला सीबीआई की विशेष अदालत में चला तो उस ने ए राजा और कनिमोझी सहित दूसरे आरोपियों को बरी कर दिया. विशेष न्यायाधीश ओ पी सोनी ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा था कि अभियोजन पक्ष कोई ठोस सुबूत पेश नहीं कर पाया, पूरा मामला अनुमानों और धारणाओं पर आधारित था. यह फैसला 21 दिसंबर, 2017 को आया था, तब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 3 साल गुजर चुके थे.

ए राजा को 2010 में इस्तीफा देना पड़ा था और सवा साल तिहाड़ जेल में सजा भी उन्होंने काटी थी, लेकिन उस गुनाह की जो उन्होंने किया ही नहीं था, बल्कि तकनीकी तौर पर इस के जिम्मेदार विनोद राय थे जिन्होंने, तय है, जानबूझ कर ऐसी रिपोर्ट तैयार की थी जो यूपीए की इमेज बिगाड़े जिस से फायदा एनडीए को मिले और ऐसा हुआ भी तो सहज समझ में आता है कि खासतौर से भाजपा साम, दाम, दंड और भेद सबकुछ अपनाती व आजमाती है. 2011 में ही गिरफ्तार हो कर 6 महीने जेल की सजा कनिमोझी ने भी भुगती थी और सुरेश कलमाड़ी भी 9 महीने जेल में रहे थे, मार्च 2025 में उन की मौत हो गई थी.

इन की हुई सियासी मौत

ए राजा, कनिमोझी, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के बारे में बेहिचक कहा जा सकता है कि उन्हें सियासी तौर पर कैग, सीबीआई और ईडी की तिकड़ी ने मार डाला है.

सीबीआई, ईडी और कैग न जाने कितने राजनेताओं का कैरियर उन पर झूठे आरोप लगाकर बरबाद कर दिया. एवज में उन के अधिकारियों को सत्तारूढ़ दल का संरक्षण, कृपा और बख्शिश मिली. कांग्रेस के दौर में भी ऐसा होता था और भाजपा के 12 साल के राज में तो कुछ ज्यादा ही हो रहा है.

अरविंद केजरीवाल आरोपमुक्त होने के बाद भाजपा, अमित शाह और नरेंद्र मोदी पर हमलावर जरूर हैं, वे मोदी को मनोरोगी तक कह रहे हैं लेकिन अब उन की पहले सी वापसी शक के दायरे में है. उन की हालत तो उस कथित बलात्कार पीड़िता सरीखी हो गई है जिसे समाज आसानी से स्वीकार नहीं करता. जबकि जानते सब हैं कि वह सीता की तरह पवित्र है पर हकीकत तो यह भी है कि लोगों ने बख्शा तो सीता को भी नहीं था, तो इन की क्या बिसात.

इस के बाद भी राजनीति में कुछ नहीं कहा जा सकता. कभी भी कुछ भी होने के लिए इस का चरित्र कुख्यात तो है. दिल्ली की मूडी जनता को अगर भगवा गैंग की बदमाशी समझ में आ गई और उस ने बेईमानी का सबक सिखाने की ठान ली तो अरविंद केजरीवाल खुद ही साबित कर देंगे कि उन के दामन में बदनामी के दाग साहब ने लगवाए थे. अगले साल गोवा, गुजरात और पंजाब में विधानसभा चुनाव हैं. इन तीनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी का खासा प्रभाव है. पंजाब में तो वह सरकार चला ही रही है. ‘आप’ को इस फैसले का फायदा मिल सकता है.

27 फरवरी के फैसले के बारे में सभी विपक्षी नेताओं ने कुछ न कुछ कहा लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस की सटीक व्याख्या की. बकौल सिब्बल, अगर पूरा मामला एक फ्रौड केस था तो ये जो 126 दिन दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जेल में बिताए उस का खमियाजा कौन भुगतेगा? 503 दिन दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने जेल में बिताए, उस का खमियाजा कौन भुगतेगा? आखिर किसी की जवाबदेही तो होनी चाहिए.

सिब्बल ने कहा- मोदी सरकार कहती थी 100 करोड़ रुपए का घोटाला है मगर उन की एजेंसी न कोई रिकवरी कर पाईं, न कोई फाइनैंशियल ट्रेड साबित हुआ. जज ने कहा कि पहले यह तय किया गया कि इन को फंसाना है. फिर उन्होंने यह सोचा कि कैसे फंसाना है. सबकुछ प्रीमेडीटेटेड था. यह क्या तरीका है?

ऐसे फंसी केजरीवाल सरकार

दिल्ली में भाजपा चुनाव जीत जाए, सिर्फ इसलिए देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सक्रिय हो गए क्योंकि तीन चुनावों में तमाम हथकंडे अपना कर भी भाजपा केजरीवाल का कुछ नहीं बिगाड़ पाई थी. सो, उस ने इस बार चरित्र हनन का दांव खेला. तमाम बड़ी जांच एजेंसियों जिन में सीबीआई सब से आगे थी, को केजरीवाल सरकार के एकएक नेता के पीछे छोड़ दिया गया. अदालतों को सैट किया गया. लिहाजा, अदालतें उन्हीं के साथ चल पड़ीं. केजरीवाल ने गोवा चुनाव में 44 करोड़ रुपए खर्च किए, गोदी मीडिया में इस का बढ़चढ़ कर प्रचार किया गया. लेकिन 27 फरवरी, 2026 को जब अदालत ने कहा- सबकुछ झूठ है. पूरा केस ही फ्रौड है, तब बीजेपी की साजिश खुली और उस की साजिश में संलिप्त सीबीआई और ईडी की असलियत जनता ने देखी.

कोर्ट ने कहा- शराब घोटाले का कोई सुबूत नहीं, कोई साक्ष्य नहीं, पूरा केस साजिशन बनाया लगता है. ऐसी परिस्थिति इस देश में कभी नहीं थी. जज ने यहां तक कह दिया कि सीबीआई के उस अधिकारी के खिलाफ तुरंत जांच की जाए जो पूरे मामले की जांच कर रहा था.

अदालत द्वारा केस को आधारहीन या त्रुटिपूर्ण ठहराने और जांच अधिकारी के खिलाफ जांच के आदेश देने से यह प्रश्न और तीखा हो गया है कि क्या हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में सत्ता और संस्थाओं के बीच संतुलन सही दिशा में है भी?

भारत में सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियां शुरू से ही विवादों में रही हैं. विपक्षी आरोप लगाते हैं कि इन जांच एजेंसियों का इस्तेमाल सत्ता पक्ष अपने विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए करता है. वहीं, सरकार का तर्क होता है कि कानून अपना काम कर रहा है.

देश में सीबीआई का गठन भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और गंभीर आर्थिक अपराधों की जांच के लिए किया गया था, जिस के तार कई राज्यों में फैले हों ताकि केंद्र सरकार के कर्मचारियों और सार्वजनिक संस्थानों में बढ़ते भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके. मगर देखा यह गया कि अपने मूल काम से हट कर सीबीआई उन मामलों में सुर्खियां बटोरने लगी जो हत्या से जुड़े थे. जैसे, नोएडा का निठारी कांड, आरुषि हत्याकांड, किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट, मधुमिता शुक्ल हत्याकांड, प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड या कविता रानी हत्याकांड, जबकि इन मामलों की जांच राज्य पुलिस, सीआईडी, सीबीसीआईडी आदि को करनी चाहिए थी.

परंतु इन मामलों को सीबीआई ने अपने ऊपर ओढ़ कर अखबारों की सुर्खियां बटोर लीं, जबकि असल और बड़े वित्तीय घोटालों से नजरें हटा लीं. सीबीआई ने सत्ता के इशारे पर उन वित्तीय घोटालों के मामलों, जिन में देश के बड़ेबड़े मंत्रीअधिकारी लिप्त हैं और जिन की वजह से देश की आम जनता महंगाई के बोझ तले दबती चली जा रही है, की ऐसी लचर जांचें कीं कि असली अपराधी कभी जेल की सलाखों के पीछे नहीं पहुंचा. जबकि, विपक्षी दलों के नेताओं को खूब प्रताड़ित किया.

कठघरे में सजा की दर

आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि ईडी ने जिन नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए उन में सजा की दर न के बराबर है. खुद वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने संसद में स्वीकारा था कि ईडी ने अप्रैल 2015 से ले कर फरवरी 2025 के बीच 193 लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए थे जिन में से केवल दो मामलों में ही सजा हुई यानी सजा की दर 1 फीसदी रही. जो दो नेता दोषी पाए गए वे दोनों ही झारखंड के थे. वहां के पूर्व मंत्री हरिनारायण राय को 7 साल की कैद और 5 लाख रुपए के जुर्माने की सजा हुई जबकि एक और पूर्व मंत्री एनोस एक्का को 7 साल की कैद और 2 करोड़ रुपए के जुर्माने की सजा हुई.

इस खामी या साजिश पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार मनीलौंड्रिंग के मामलों में कम दोषसिद्धि पर कमैंट किए हैं. टीएमसी विधायक पार्थ चटर्जी की जमानत याचिका पर सुनवाई करते सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी की थी कि ईडी की दोषसिद्धि की दर खराब है. कोर्ट ने यह सवाल भी किया था कि आखिर किसी व्यक्ति को कितने समय तक विचाराधीन रखा जा सकता है. इस गंभीर मसले पर देश के मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने भी एक मामले की सुनवाई के दौरान 7 अगस्त, 2025 को यह कहते हुए तंज कसा था कि ईडी बिना दोष सिद्ध किए लोगों को सालों तक जेल में रखने में सफल रही है.

यह एजेंसी कितने मनमाने ढंग से सरकार के इशारे पर नाचती हुई काम करती है, इस पर टीएमसी नेता साकेत गोखले की मानें तो ईडी द्वारा राजनेताओं के खिलाफ दर्ज किए 98 फीसदी मामले विपक्षी नेताओं के खिलाफ थे. महज 2 फीसदी भाजपा नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए गए. ये 2 फीसदी भी भाजपा वाशिंगमशीन में शामिल हो गए. जाहिर है, उन का इशारा हिमंत बिस्वा सरमा, नारायण राणे और शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं की तरफ था.

बकौल साकेत गोखले, पिछले 11 सालों में 1,000 मामलों में से केवल 7 को ही दोषी पाया गया. यानी, 993 को महज जेल में ठूंसने के लिए मामले दर्ज किए गए क्योंकि सख्त पीएमएलए (प्रिवैंशन औफ मनीलौंड्रिंग एक्ट 2002) के तहत जमानत मिलना कठिन है. यही हाल सीबीआई का है जो राजनेताओं और दूसरे अपराधियों के आंकड़े अलगअलग पेश नहीं करती लेकिन विपक्ष का यह आरोप आंकड़ों और हकीकत के बेहद नजदीक है कि उस ने भी 95 फीसदी मामले विपक्षी नेताओं के खिलाफ दर्ज किए और उस की भी दोषसिद्धि और सजा दर 3 फीसदी के लगभग ही है.

सत्ता से सीबीआई का गठजोड़ नया नहीं है. इतिहास गवाह है कि पहले कि सरकारों, खासकर कांग्रेस के शासनकाल, में भी सीबीआई को ‘कांग्रेस ब्यूरो औफ इन्वैस्टिगेशन’ कहा जाता था. सीबीआई की तसवीर और तासीर ऐसी है कि 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ कह दिया. यह टिप्पणी बताती है कि राजनीतिक हस्तक्षेप सीबीआई के कामकाज पर कितना प्रभावकारी है.

2014 में जब केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी तो सीबीआई और ईडी सत्ता की कठपुतली बन कर नाचने लगीं. मोदीशाह के इशारे पर तमाम विपक्षी नेताओं पर छापे, गिरफ्तारियां और जांचों में तेजी आ गई. सीबीआई का इस्तेमाल, बस, राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने, राज्य सरकारों को अस्थिर करने और चुनावी फायदे के लिए होने लगा. चुनाव के समय विपक्षी नेताओं के चुनावप्रचार में व्यवधान डालने के लिए सीबीआई और ईडी का सीधा इस्तेमाल मोदीशाह ने किया, यह कोई ढकीछिपी बात नहीं है.

याद होगा जब 2022 में उत्तर प्रदेश में चुनाव की रणभेरी बजी थी तब कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा की चुनावी यात्राओं में व्यवधान डालने के लिए उन के पति रौबर्ट वाड्रा को ईडी ने कई बार अपने औफिस में पूछताछ के लिए तलब किया. प्रियंका गांधी सुबह रौबर्ट वाड्रा को ईडी औफिस छोड़ कर चुनावप्रचार के लिए निकलती थीं. चुनाव समाप्त हुए और ईडी की पूछताछ भी खत्म हो गई. जमीन घोटाले में रौबर्ट वाड्रा के खिलाफ ईडी कुछ भी साबित नहीं कर पाई. दरअसल, साबित तो कुछ करना भी नहीं था. मकसद तो, बस, विपक्षी नेताओं को प्रताड़ित और हतोत्साहित करने भर का था. जिस के लिए इन एजेंसियों में बैठे बड़ेबड़े अधिकारी जनता की गाढ़ी कमाई से बड़ीबड़ी तनख्वाह पा रहे हैं और बीजेपी की उंगलियों पर नाच रहे हैं.

सीबीआई द्वारा जिन इनेगिने मामलों में नेताओं को सजा हुई है उन में से एक प्रमुख बिहार का चारा घोटाला है जिस के लीडर पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव हैं. यह बहुचर्चित घोटाला साल 1996 में उजागर हुआ था. यह साल राजनीतिक अस्थिरता और उठापटक वाला था. तब केंद्र में पी वी नरसिम्हा राव वाली कांग्रेस सरकार थी. उस ने कोई दखल इस में नहीं दिया था क्योंकि सीबीआई जांच पटना हाईकोर्ट के आदेश पर शुरू हुई थी जिस के चलते लालू यादव को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था. तब उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को कुरसी सौंप दी थी.
लालू यादव के चारा घोटाले से ताल्लुक रखते मुकदमे अभी कोर्टों में चल रहे हैं लेकिन यह भी दिख रहा है कि घोटाले तो उन्होंने किए हैं. अब यह और बात है कि उन के वकील बचाव सलीके से नहीं कर पाए और खुद लालू भी अतिआत्मविश्वास के शिकार रहे. इन दिनों खराब सेहत के चलते वे जमानत पर हैं. यहां यह सवाल मौजूद है कि भ्रष्ट तो सौ फीसदी नेता हैं लेकिन अधिकतर अपने कुकर्म ढकने और कमाई को मैनेज करने की कला जानते हैं. लालू की हालत देख तो सभी एहतियात से कमानेखाने लगे हैं. कोई कम खाता है तो कोई ज्यादा खाता है. राजनीति काजल की कोठरी है जिस में से बिना कालिख के तो किसी का बाहर आना शायद मुमकिन नहीं. ऐसे में जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपनी जांचों में निष्पक्ष रहें और सत्ता के तलवे चाटने से दूर रहें.

गैरों पे सितम और अपनों पर रहम

मजे की बात यह है कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी और सीबीआई की जांचें चुनावी मौसम में तेज होती रहती हैं और जब विपक्षी नेता बीजेपी में शामिल हो जाते हैं तो मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं. उदाहरण के लिए, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, जो पहले कांग्रेस में थे, पर शारदा चिट फंड घोटाले के आरोप थे, लेकिन बीजेपी में शामिल होने के बाद जांच रुक गई. इस पैटर्न ने ही सीबीआई की अहमियत खाक में मिला दी है हालांकि, मोदी सरकार इन आरोपों को खारिज करती है और कहती है कि जांचें कानूनी आधार पर होती हैं. लेकिन तथ्य क्या कहते हैं? आइए कुछ प्रमुख उदाहरणों पर नजर डालें.

पहला प्रमुख उदाहरण है सीबीआई डायरैक्टर आलोक वर्मा मामला. आलोक वर्मा 2018 में सीबीआई के निदेशक थे, जिन्होंने राफेल लड़ाकू विमान सौदे में हुई अनियमितताओं की जांच शुरू करने की तैयारी की थी. तभी मोदी सरकार ने वर्मा के कार्यालय को सील कर दिया और उन्हें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में पद से हटा दिया गया. आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने इसे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़ा और कहा कि यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि वर्मा के पास राफेल घोटाले से जुड़े दस्तावेज थे. अगर आलोक वर्मा यह जांच शुरू करते तो बीजेपी के शीर्ष पद पर आसीन माननीयों के चेहरे बेनकाब हो जाते.

यह घटना सीबीआई की स्वतंत्रता पर सवाल उठाती है, क्योंकि वर्मा को हटाने के बाद उन की पैंशन और अन्य लाभ भी रोक दिए गए. विपक्ष ने इसे ‘संस्थागत हत्या’ करार दिया, जबकि सरकार ने इसे सीबीआई का ही आंतरिक विवाद बताया. लेकिन इस मामले ने साफ कर दिया कि सीबीआई के शीर्ष पदों पर नियुक्तियां और बर्खास्तगी राजनीतिक इच्छाशक्ति से अपने फायदे के लिए होती हैं.

दूसरा उदाहरण है पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का केस. वर्ष 2015 में एयरसेल-मैक्सिस मामले में पहली चार्जशीट दाखिल हुई थी, लेकिन 4 साल बाद, 2019 में बीजेपी सरकार के दौरान नई चार्जशीट दाखिल की गई. यह राजनीतिक बदला था, क्योंकि चिदंबरम कांग्रेस के प्रमुख नेता हैं. इसी तरह, आईएनएक्स मीडिया मामले में चिदंबरम को गिरफ्तार किया गया, जो कई महीनों तक जेल में रहे. फिर उन्हें जमानत मिल गई. मामला अभी तक लंबित है. ईडी ने कहा- मनीलौंड्रिंग के सुबूत हैं मगर 11 साल हो गए, अदालत में वे सुबूत पेश नहीं किए गए. जो अधिकारी इस केस को देख रहे थे वे अब बीजेपी में एमएलए हैं.

मध्यप्रदेश के बहुचर्चित व्यापमं घोटाले में सीबीआई की सब से ज्यादा किरकिरी हुई. मध्य प्रदेश का बहुचर्चित व्यापमं घोटाला देश के सब से बड़े भरती और प्रवेश परीक्षा घोटालों में गिना जाता है. मैडिकल कालेजों में दाखिला, सरकारी नौकरियों की भरती और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में फर्जीवाड़े के आरोपों ने वर्षों तक राज्य और देश की राजनीति को हिला कर रखा. व्यापमं यानी मध्य प्रदेश प्रोफैशनल एग्जामिनेशन बोर्ड पर आरोप था कि उस ने पैसे ले कर फर्जी अभ्यर्थियों को परीक्षाओं में बैठाया, ओएमआर शीट्स बदलीं और अयोग्य उम्मीदवारों को चयनित कराया. जब मामले की छानबीन शुरू हुई तो बीजेपी के कई प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आए. इस के बाद मौतों की एक लंबी श्रृंखला चालू हो गई. इन में सब से संदिग्ध मौत चिकित्सा शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की थी जिन के बारे में कहा जाता है कि भगवा गैंग ने ही उन्हें फंसाया था.

2015 में, लगातार विवाद, हाईकोर्ट की निगरानी और संदिग्ध मौतों की लंबी श्रृंखला के बीच जांच राज्य पुलिस से ले कर सीबीआई को सौंपी गई. मगर व्यापमं में लिप्त कई आरोपियों, केस से जुड़े गवाहों की मौतों का सिलसिला रुका नहीं. सीबीआई से लोगों को उम्मीद थी कि वह दूध का दूध, पानी का पानी कर देगी. मगर सीबीआई ने अधिकांश मौतों में ‘प्राकृतिक कारण’ या ‘आत्महत्या’ की बात कही, जिस से विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए.

सीबीआई ने निचले स्तर के दलालों और अभ्यर्थियों पर तो कार्रवाई की लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर के बड़े चेहरों तक जांच की आंच नहीं पहुंची. अदालत में सीबीआई की कमजोर पैरवी, सुबूतों की कमी और गवाहों के मुकर जाने के कारण आरोपियों को राहत मिली. यह मामला वर्षों तक चलता रहा. हजारों पन्नों की चार्जशीट, सैकड़ों आरोपी, लेकिन अंतिम नतीजे ढाक के तीन पात. अनेक आरोपियों को सुबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया और इस तरह ‘बड़ी मछलियां’’ बच गईं. इन बड़ी मछलियों में एक चर्चित और संदिग्ध नाम पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भी है.

व्यापमं घोटाला केवल एक भरती घोटाला नहीं था; यह भारत की जांच प्रणाली, राजनीतिक जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया की परीक्षा भी था. सीबीआई को मामला सौंपे जाने के बाद जनता को बहुत उम्मीदें थीं कि उन के साथ न्याय होगा. मगर जांच की दिशा, गति और परिणामों को जिस बुरी तरह प्रभावित किया गया उस ने एजेंसी के मुंह पर कालिख पोत दी.

चौथा उदाहरण पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से जुड़ा है. 2014 में शारदा चिट फंड घोटाले में सीबीआई ने जांच शुरू की, लेकिन ममता ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार सीबीआई का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में कर रही है. उन्होंने कहा, “अन्य चिट फंड कंपनियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या सीबीआई सरकार का औजार है?”

2019 में हाल यह हुआ कि सीबीआई अधिकारियों को कोलकाता पुलिस ने हिरासत में ले लिया, जो एक बड़ा राजनीतिक विवाद बना. ममता ने सीबीआई की कार्रवाइयों को ‘संघीय ढांचे पर हमला’ बताया.

इस के बाद 2023 में तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी को सीबीआई ने पूछताछ के लिए बुलाया, जिसे तृणमूल कांग्रेस ने ‘राजनीतिक उत्पीड़न’ करार दिया. ये घटनाएं दिखाती हैं कि सीबीआई का उपयोग राज्य सरकारों को अस्थिर करने के लिए किस तरह होता है.

पांचवा उदाहरण उन्नाव रेप केस में कुलदीप सिंह सेंगर का है. सेंगर बीजेपी का पूर्व विधायक, जो रेप और हत्या का दोषी पाया गया. सीबीआई ने शुरुआत में मामले को दबाने की कोशिश की लेकिन बाद में राजनीतिक दबाव में कार्रवाई की. हाल ही में सेंगर को जमानत मिली, जिस पर राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि पीड़िता को प्रताड़ित किया जा रहा है, जबकि आरोपी को राहत दी जा रही है. यह मामला भी दिखाता है कि सीबीआई की जांचें राजनीतिक दबाव के अनुसार चलती हैं.

गौरतलब है कि बीजेपी नेता और वर्तमान में देश के गृहमंत्री अमित शाह ने 2010 में खुद सीबीआई को ‘केंद्र का औजार’ कहा था, जब वे गुजरात के गृहमंत्री हुआ करते थे. उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी और शाह पर लोगों के एनकाउंटर के आरोप थे. आज वही बीजेपी केंद्रीय सत्ता में है, और विपक्ष उसी भाषा का इस्तेमाल कर रहा है.

1989 में इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि सीबीआई ‘सत्तारूढ़ पार्टी का राजनीतिक औजार’ बन चुकी है. इसी तरह, 2013 में ओपन मैगजीन ने सीबीआई को ‘कांग्रेस ब्यूरो औफ इन्वैस्टिगेशन’ कहा था. यह दिखाता है कि हर सरकार सीबीआई का दुरुपयोग करती आई है.

सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ कहा और स्वतंत्रता के लिए सुधार सुझाए हैं. 1997 के विनीत नारायण मामले में कोर्ट ने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए समिति बनाई, लेकिन आज भी इन जांच एजेंसियों पर सरकार का प्रभाव बना हुआ है. केंद्र की सत्ता में मोदी सरकार के आने के बाद भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम में 2018 के संशोधन ने सीबीआई की शक्तियों को और कमजोर किया है.

सवाल यह है कि यदि अदालत जांच एजेंसियों की किसी जांच को त्रुटिपूर्ण या दुर्भावनापूर्ण बताती है, तो क्या एजेंसियों की जवाबदेही तय होगी? क्या संस्थागत सुधार की आवश्यकता है? और क्या जांच प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत है?

लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है, वह देश की उन तमाम संस्थाओं की विश्वसनीयता पर टिका होता है जिन से आम आदमी निष्पक्षता की उम्मीद लगाए बैठा है. यदि जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठते रहे, तो यह लोकतंत्र की बुनियाद को हिला देगा.

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के बारे में कब क्या कहा :

1. सभी संस्थाओं को तोड़ दिया गया है. कुछ भी स्वतंत्र नहीं बचा है. जब अभियुक्त अपने बचाव की कोशिश करता है तो सीबीआई उसे असहयोग करना कह कर कठघरे में खड़ा करती है.
– जस्टिस अमानुल्ला – नवंबर 2025 के विमल नेगी के मामले में.

2. आप सब कोर्ट्स को विद्वेषपूर्ण मान रहे हो क्योंकि कोर्ट्स ने बिना आप की सुने आरोपियों को जमानत दे दी. आप का यह मानना न्यायपालिका का अपमान है.
– जस्टिस अमन ओझा और पंकज मित्तल की सीबीआई के 42 मामलों की सुनवाई पश्चिमी बंगाल त्रिणमूल कांग्रेस शासित राज्य पश्चिम बंगाल से बाहर भारतीय जनता पार्टी शासित राज्य में ट्रांसफर करने की याचिका पर टिप्पणी सितंबर 2024 में.

3. आलोक कुमार वर्मा को सीबीआई के निदेशक के पद से हटाए जाने के मामले में सरकार की सिफारिश पर सैंट्रल विजिलैंस कमीशन को फटकार लगाई गई और अक्तूबर 2018 का आदेश निरस्त किया गया. हालांकि आलोक कुमार वर्मा फिर पद पर बहाल नहीं हुए पर सीबीआई और सरकार की खिंचाई हुई.

4. अनिल अंबानी की कंपनियों द्वारा 40,000 करोड़ रुपए के बैंकों से किए गए घपले पर सीबीआई द्वारा पैर घसीटने पर फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच न्यायिक, तुरंत और बिना भेदभाव वाली होनी चाहिए. यानी, सुप्रीम कोर्ट मानती है कि सीबीआई अपनी जांच में अकसर न फेयर होती है, न प्रौम्प्त होती है और न डिसपैशनेट होती है. सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बावजूद अनिल अंबानी का कुछ खास बिगड़ेगा, इस के आसार कम हैं क्योंकि सीबीआई मामले में ढीलढाल ही रखेगी.

5. सीबीआई के जिन मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट कर रही होती है उन में कोशिश होती है कि मामला ऐसे वक्त के पास सामने लाया जाए जो सत्ता का हमदर्द हो. दिसंबर 2023 के आसपास 8 विपक्षी नेताओं के बारे में मामले दूसरी बैंचों से ले कर जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की कोर्ट में ट्रांसफर कर दिए गए.
इन में दिल्ली के उमर खालिद की जमानत, तमिलनाडू के पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पाडी करप्पा पलानीसामी, आंध्र प्रदेश में तब पूर्व मुख्यमंत्री पर भाजपा सहयोगी चंद्रबाबू नायडू, कांग्रेस के कर्नाटक के नेता डी के शिवकुमार और भाजपा विरोधी डीएमके सरकार के मंत्री सेंथिल बालाजी के मामले हैं.
जस्टिस बेला एम त्रिवेदी गुजरात हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट आई हैं. वे नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री शासन के दौरान विधि सचिव रही हैं.
सीबीआई का गठन दिल्ली स्पैशल पुलिस एस्टैब्लिशमैंट एक्ट 1946 के अंतर्गत हुआ था. लेकिन यह अब प्रधानमंत्री सचिवालय द्वारा नियंत्रित है. सैंट्रल विजिलैंस कमिशन, जो प्रिवैंशन औफ करप्शन एक्ट 1988 के अंतर्गत गठित हुआ है, इस की निगरानी करता है. इस का निदेशक प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और मुख्य न्यायाधीश की एक कमेटी करती है. हालांकि, सीबीआई पूरी तरह से प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के इशारे पर काम करती है.

इस का मुख्य कार्यालय दिल्ली में लोधी रोड पर सीजीओ कौम्पलैक्स में है. इस के अधिकारी आमतौर पर राज्यों की पुलिस सेवाओं से आते हैं. Arvind Kejriwal

Epstein files : नैतिकता बनाम सत्ता – एपस्टीन प्रकरण में भारत की चुप्पी

Epstein files : एपस्टीन फाइल में नाम आने के बाद दुनिया भर के बड़े नामों में से कइयों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया तो कइयों की गिरफ्तारियां हुई हैं. इनमें नेता, व्यवसायी, शाही घराने के सदस्य और कई सेलेब्रिटीज शामिल हैं. मगर भारत सरकार इस मामले में चुप्पी साधे हुए है जबकि केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उद्योगपति अनिल अंबानी का नाम इन फाइलों में प्रमुखता से आया है.

अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस ने एपस्टीन फाइल्स का कुछ अंश जारी कर दिया है. नाबालिग लड़कियों से यौन शोषण के संगठित नेटवर्क का दोषी जेफ्री एपस्टीन और उससे जुड़े दुनिया के तमाम नामचीन लोगों के कारनामे अब पब्लिक डोमेन में हैं. जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी कोई 30 लाख फ़ाइलें अभी तक रिलीज़ हुई हैं और लाखों फाइलें रिलीज होनी बाकी हैं. इन फाइलों में दुनिया के धुरंधर और चर्चित राजनेताओं, उद्यमियों और सेलेब्रिटीज का नाम शामिल है, जिनके इस नरपिशाच से करीबी रिश्तों का जिक्र फाइलों में हैं. एपस्टीन के नजदीकियों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, हिलेरी क्लिंटन, बिल क्लिंटन, एलोन मस्क, बिल गेट्स, माइकल जैक्सन के नाम सुन कर लोग सकते में हैं.

एपस्टीन फाइल में नाम आने के बाद दुनिया भर के बड़े नामों में से कइयों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है तो कइयों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू होने के बाद उनकी गिरफ्तारियां जारी हैं. इनमें नेता, व्यवसायी, शाही घराने के सदस्य और कई सेलेब्रिटीज शामिल हैं.

सीबीएस न्यूज़ के स्वास्थ्य विशेषज्ञ के जेफ्री एपस्टीन के साथ कई ईमेल एक्सचेंज उजागर हुए, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया. गोल्डमैन सैक्स की मुख्य वकील कैथी रूएम्लर एपस्टीन से जुड़े ई-मेल्स की वजह से पद से हट गयीं. अमेरिकी अटॉर्नी (वकील) ब्रैड कार्प ने इस्तीफा दिया. हार्वर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर लैरी समर्स के जेफ्री एपस्टीन से बातचीत के रिकॉर्ड्स सामने आने के बाद इस्तीफा लिया गया. कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. रिचर्ड एक्सेल एपस्टीन से संपर्कों के खुलासे के बाद नेतृत्व से हटे. वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम (WEF) के अध्यक्ष बोर्गे ब्रेंडे ने एपस्टीन के साथ संचार दस्तावेज़ सामने आने के बाद पद छोड़ दिया.

रॉयल मार्सडेन कैंसर चैरिटी के ट्रस्टी और यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर निकोल जंकेरमन का इस्तीफा हुआ. वहीं स्लोवाकिया के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मियोज़्लाव लाइचक ने विवाद बढ़ने पर इस्तीफा दे दिया. यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज से सलाहकार बोर्ड के डेविड स्टर्न से इस्तीफा लिया जा चुका है. अरब वर्ल्ड इंस्टीट्यूट के प्रमुख जैक लांग ने जेफ्री से संबंधों के चलते इस्तीफा दिया. डीपी वर्ल्ड के चेयरमैन सुल्तान अहमद बिन सुलायेम ई-मेल्स में नाम सामने आने के बाद पद से हटे. नार्वेजियन राजनयिक  मोना जूल की प्रशासनिक पद से छुट्टी कर दी गयी. हालांकि अभी तक ये तमाम लोग सीधे ‘कानून तोड़ने के दोषी’ साबित नहीं हुए हैं मगर एक घृणित यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से दोस्ताना सम्बन्ध रखने के चलते इन लोगों को नैतिकता के आधार पर पद से हटने को मजबूर होना पड़ा.

एपस्टीन मामले में दुनिया भर के कई प्रमुख पदों पर बैठे लोगों की गिरफ्तारियां भी हो चुकी हैं, जिसमें मुख्य नाम पूर्व ब्रिटिश राजकुमार एंड्रयू माउंटबेटन-विंडसर का है. एंड्रयू को उनके अनुचित व्यवहार के चलते पहले ही शाही घराने से बाहर किया जा चुका है. इनके अलावा ब्रिटेन के पूर्व राजदूत और नेता पिटर मंडेलसन, नॉर्वेजियन राजनैतिक नेता थोरबॉर्न जगलैंड, एपस्टीन की साझेदार गिस्लेन मैक्सवेल जो पहले से नाबालिग बच्चों की तस्करी की दोषी है, को भी गिरफ्तार किया जा चुका है. ब्रिटेन और यूरोप में एपस्टीन फाइल्स के खुलासों के बाद जांचें तेज हो रही हैं और दुनिया के कुछ बड़े राजनीतिज्ञों पर कानूनी दबाव बढ़ता जा रहा है.

मगर भारत में इस मामले में ख़ामोशी पसरी हुई है. भारत के केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, अनिल अंबानी का नाम भी इन फाइलों में है.

गौरतलब है कि 2008 तक इस बात का खुलासा हो चुका था कि जेफ्री एपस्टीन एक यौन अपराधी है जिसने अनेक बच्चियों का यौनशोषण किया और उनको वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर किया. आरोप है कि एपस्टीन ने अपने आइलैंड पर बने महल में दुनिया के तमाम नामचीन लोगों को इन्वाइट करता था और  उनके मनोरंजन व कामपिपासा शांत करने के लिए कमसिन लड़कियों को ही नहीं परोसता था बल्कि उस जगह पर दुधमुहे बच्चों का मांस भी खाने के लिए परोसा जाता था.

2008 में एपस्टीन पर फ्लोरिडा (पामबीच) में नाबालिग लड़कियों से देह व्यापार कराने और यौन शोषण के आरोप लगे. इस आरोप को स्वीकारने के बाद जेफ्री एपस्टीन को 18 महीने की सजा हुई, पर वह लगभग 13 महीने ही जेल में रहा. उसे “वर्क रिलीज़” की अनुमति थी, यानी दिन में बाहर काम करने जाता था और रात में जेल लौटता था. 2009 में वह जेल से रिहा हो गया और उसके कुकर्म ज्यों के त्यों जारी रहे.

बताते चलें कि अगले दस सालों में जेफ्री एपस्टीन के पाप का घड़ा धीरे धीरे भर गया और 2019 में न्यूयॉर्क में फेडरल सेक्स ट्रैफिकिंग के नए आरोपों में उसे फिर गिरफ्तार किया गया. मगर इस बार मामला जटिल था और जेफ्री एपस्टीन अगर अदालत में मुंह खोलता तो कई अन्य लोगों के नाम उजागर हो सकते थे. लिहाजा जेल में मुकदमे के दौरान उसकी संदिग्ध मौत हो गयी. आधिकारिक तौर पर इसे आत्महत्या बताया गया, मगर सूत्रों की मानें तो जेफ्री एपस्टीन को जेल के भीतर ही मरवा दिया गया.

यह जानते हुए कि अत्यंत घिनौने कृत्य में जेफ्री एपस्टीन को 2008 में सजा सुनाई गयी थी, जिसका कैरेक्टर इस लायक नहीं था कि भारत में रामराज्य लाने का नारा देने वाली सरकार रावण से भी बदतर व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का नाता रखती, बावजूद इसके भारत सरकार के केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी जेफ्री एपस्टीन से लगातार संपर्क में रहे. कहा जा रहा है कि एपस्टीन फाइल्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी शामिल है. जो भारत में विभिन्न योजनाओं में विदेशी निवेश के लिए हरदीप पुरी के माध्यम से जेफ्री एपस्टीन की मदद ले रहे थे.

13 फरवरी को विपक्षी दल खासकर कांग्रेस सांसदों ने दिल्ली के संसद भवन के मुख्य मकर द्वार पर भारी विरोध प्रदर्शन किया. यह विरोध प्रदर्शन एपस्टीन फाइल में केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से निकट संबंधों के खुलासे को लेकर था. विपक्ष लगातार हरदीप सिंह पुरी के इस्तीफे की मांग कर रहा है. मगर मोदी सरकार इस विषय पर चुप्पी मारे बैठी है. मामला जब विपक्ष द्वारा संसद में उठाया गया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदन से ही गायब रहे.

हरदीप सिंह पुरी की जेफ्री एपस्टीन को की गयी तमाम इमेल्स अब पब्लिक डोमेन में हैं, जिनमें वे जेफ्री से ऐसे बातचीत कर रहे हैं मानों वह उनका लंगोटिया यार था. हरदीप पुरी और जेफ्री के बीच हुए ईमेल दस्तावेजों से पता चलता है कि वर्ष 2014 और 2015 के बीच एपस्टीन और हरदीप सिंह के बीच दर्जनों बार ईमेल पर बातचीत हुई.

एक नजर इस बातचीत पर –

18 जून 2014 को जेफ्री हरदीप पुरी को लिखता है – ”मेरी टेरजे से बात हुई. रीड हॉफमैन भारत आने के लिए तैयार हैं.”  गौरतलब है कि रीड हॉफमैन अमेरिकी इंटरनेट उद्यमी और लिंक्डइन एक सह संस्थापक हैं.

23 जून 2014 को हरदीप पुरी ने जेफ्री को जवाब भेजा – ”रीड हॉफमैन की यात्रा के लिए सहायता और सुविधा प्रदान करके मुझे ख़ुशी होगी.”

सवाल यह कि आखिर किसने कहा था कि पुरी जेफ्री के जरिये रीड हॉफमैन को भारत में इन्वाइट करें. जाहिर है पुरी नरेंद्र मोदी के आदेशों पर यह बातचीत कर रहे थे.

24 सितम्बर 2014 को जेफ्री एपस्टीन ने रीड हॉफमैन और हरदीप पुरी का आपस में परिचय कराते हुए एक मेल में हॉफमैन को लिखा कि भारत में हरदीप उनके मददगार व्यक्ति हैं. इस मेल के जवाब में रीड हॉफमैन ने हरदीप सिंह पुरी को लिखा – ”हरदीप, आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा. लोगों को चुनने में जेफ्री की पसंद बहुत अच्छी है (मैं अपवाद हूँ)”

25 सितम्बर को हरदीप पुरी ने हॉफमैन को जवाब भेजा – “लोगों के बारे में जेफ्री की समझ पर मुझे कोई शक नहीं है. उनके ‘इंस्टिंक्टस’ तो और भी बेहतर हैं.

इसके बाद 4 अक्टूबर 2014 को जेफ्री एपस्टीन ने हरदीप सिंह पूरी को फिर मेल भेज कर पूछा – “क्या रिड से मीटिंग हुई?”

जवाब में उसी दिन हरदीप पुरी ने लिखा – “मैं आज दोपहर की मीटिंग के लिए एसएफ (सैन फ्रांसिस्को) में हूँ. आप, मेरे दोस्त, सच में काम करवा लेते हैं.”

“कोई  और सलाह?”

इस पर एप्सटीन ने जवाब दिया – “उन्हें बताओ कि विज्ञान और तकनीक से जुड़े लोगों और सोशल नेट्वर्किंग गुरुओं से मिलने के लिए आप उनकी भारत यात्रा का इंतजाम करेंगे.”

11 अक्टूबर 2014 से 24 अक्टूबर 2014 के बीच कई ईमेल एक्सचेंज हुए जिसमें जेफ्री के कहने पर हरदीप सिंह पुरी ने उसके कई सहयोगियों को भारतीय वीजा उपलब्ध कराने में सहायता पहुंचाई.

24 दिसम्बर का एक ईमेल सामने आया है जिसमें हरदीप सिंह पुरी ने जेफ्री एपस्टीन से ‘एक्सोटिक आइलैंड’ या ‘अनूठे टापू’ का ज़िक्र किया और कहा कि – ”जब आप अपने ‘एक्सोटिक आइलैंड’ से वापस आएं तो बताइयेगा, मैं  आपसे मिल कर थोड़ी बातचीत करना चाहता हूँ और आपको भारत में रूचि जगाने वाली कुछ किताबें भी देना चाहता हूँ.”

एपस्टीन के आइलैंड को ‘एक्सोटिक आइलैंड’ कहने का तात्पर्य यही है कि हरदीप सिंह पुरी उसके आइसलैंड के बारे में सब कुछ जानते थे. यानी पुरी एक नरपिशाच की रुचि भारत में जगाने के लिए प्रयासरत थे.

गौरतलब है कि 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनी और जुलाई 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘डिजिटल इंडिया’ प्रोग्राम को लांच किया. मगर इससे करीब सात महीने पहले ही यानि 13 नवम्बर 2014 को इस प्रोग्राम के बारे में हरदीप सिंह पुरी जेफ्री एपस्टीन को बता चुके थे.

हरदीप सिंह पुरी ने जेफ्री को लिखा, “जेफ़, मैंने आपको 3 अक्टूबर को सिलिकॉन वैली में रीड के साथ हुई अपनी बातचीत के बारे में बताया था. आपकी प्रतिक्रिया थी कि रीड को जल्द से जल्द भारत का दौरा करना चाहिए. अक्टूबर के मध्य में भारत लौटने के बाद, मैं पहले से कहीं अधिक आश्वस्त हूँ कि आज भारत में इंटरनेट आधारित आर्थिक गतिविधियों के लिए शानदार मौका है.”

हरदीप सिंह पुरी ने इस मेल में आगे लिखा, “उदाहरण के लिए जापानी दूरसंचार और इंटरनेट दिग्गज सॉफ्ट बैंक ने हाल ही में घोषणा की है कि उसने अगले 10 सालों में भारतीय ई-कॉमर्स क्षेत्र में 10 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश करने की योजना बनाई है. भारतीय कंपनी स्नैपडील 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर की फंडिंग प्राप्त करने वाली पहली कंपनी है. मजबूत जनादेश के साथ चुनी गई नई सरकार के आने से बाजार में हलचल और बढ़ गई है. यह ‘डिजिटल इंडिया’ पर ख़ास फ़ोकस के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए प्रतिबद्ध है.”

सवाल यह कि जब डिजिटल इंडिया साल 2015 में लांच हुआ तो हरदीप सिंह पुरी नवंबर 2014 में ही एपस्टीन से इसकी चर्चा कैसे कर रहे थे? इसका सीधा सा अर्थ यह है कि मोदी सरकार की योजनाएं एक अपराधी के सलाह मशवरे से चलाई गयी.

2014 से 2017 के बीच केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन के बीच 62 बार ईमेल का आदान-प्रदान हुआ और 14 बार मुलाकातें हुईं. यानि जनवरी 2014 में भाजपा ज्वाइन करने के बाद पुरी ने मोदी के हरकारे के तौर पर काम किया हालांकि उनको 2014–2015 के दौरान किसी सरकारी विभाग में अधिकारी या राज्य मंत्री का पद नहीं मिला था. 2014 से पहले वे भारतीय विदेश सेवा अधिकारी (IFS) और राजनयिक थे. अपने विदेश मंत्रालय और विदेश मंत्री को हाशिये पर रख कर बिना किसी प्रशासनिक पद वाले हरदीप सिंह पुरी का इस्तेमाल मोदी सरकार ने क्यों किया?

इस सब में फॉरेन ऑफिस का कोई रोल नहीं था. इसमें मिनिस्ट्री ऑफ़ एक्सटर्नल अफेयर्स की कोई भूमिका नहीं थी, इस सब में भारत का राजदूत हाशिये पर था. 2014 से लेकर आज तक हरदीप सिंह, अनिल अंबानी, जेफ्री एपस्टीन और इन जैसे लोग ही देश की विदेश नीति चला रहे है.

29 मार्च 2017 को अनिल अंबानी जेफ्री एपस्टीन को लिखते हैं – वाइट हाउस से एक घोषणा हुई है कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका आ रहे हैं, क्या आपको मालूम है कि तारीख क्या है?

कुछ मिनटों के बाद ही जेफ्री का जवाब आया – ”ये इजरायल स्ट्रैटजी का पार्ट है.” यानी भारत और इजरायल संबंधों की रूपरेखा जेफ्री एपस्टीन के द्वारा तय की जा रही थी. 2017 में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा उसका एक हिस्सा थी, जिसके बारे में जेफ्री एपस्टीन बखूबी जानता था. और शायद उसी ने यह यात्रा अरेंज करवाई थी और उसके बाद 4 जुलाई से 6 जुलाई 2017 को मोदी पहली बार इजरायल यात्रा पर गए. अब एपस्टीन फाइल्स के रिलीज होने के बाद एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी भारतीय संसद से मुँह चुरा कर भागे भागे इजरायल गए. उनके वापस लौटते ही अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया और मीडिया से एपस्टीन फाइल्स का जिक्र गायब हो गया.Epstein files

Family Story in Hindi : मंथर हत्या

Family Story in Hindi : बड़े भैया और सुरेश दोनों सगे भाई थे लेकिन दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर था. मैं अनीता जोशी, माताजी की नर्स हूं. माताजी जब बड़े भैया के यहां से वापस आई थीं, एकदम चुस्त- दुरुस्त थीं. खूब हंसहंस कर बाबूजी को बता रही थीं कि क्या खाया, क्या पिया, किस ने पकाया.

बड़े भैया जब भी कनाडा से भारत आते मां को अपने फ्लैट पर ले जाते और अमृतसर से अपनी छोटी बहन मंजू को भी बुला लेते. कई सालों से यह सिलसिला चल रहा है. महीना भर के लिए मेरी भी मौज हो जाती. मैं भी उधर ही रहती. माताजी पिछले 4 सालों से मेरे ऊपर पूरी तरह निर्भर थीं. 90 साल की उम्र ठहरी, शरीर के सभी जरूरी काम बिस्तर पर ही निबटाने पड़ते थे.

वैसे देखा जाए तो सुरेश और उन की पत्नी संतोष को सेवा करनी चाहिए. मांबाप के घर में जो रह रहे हैं. कभी काम नहीं जमाया. एक तरह से बाबूजी का ही सब हथिया कर बैठ गए हैं. संतोष बीबीजी भी एकदम रूखी हैं. पता नहीं कैसे संस्कार पाए हैं. औरत होते हुए भी इन का दिल कभी अपनी सास के प्रति नहीं पसीजता. बस, अपने पति और बच्चों से मतलब या पति की गांठ से.

इधर कई महीनों से माताजी रात को आवाज लगाती थीं तो सुरेश का परिवार सुनीअनसुनी कर देता था. एक दिन बाबूजी ने सुरेश के बच्चों को फटकारा तो वह कहने लगे कि ऊपर तक आवाज सुनाई नहीं देती. आवाज लगाना फुजूल हुआ तो माताजी ने कटोरी पर चम्मच बजा कर घंटी बना ली. इस पर संतोष बीबीजी ने यह कह कर कटोरी की जगह प्लास्टिक की डब्बी रखवा दी कि कटोरी बजाबजा कर बुढि़या ने सिर में दर्द कर दिया.

मैं ड्यूटी पर आई तो माताजी ने कहा कि अनीता, तू ने मुझे रात को खाना क्यों नहीं दिया. मैं बोली कि खाना तो मैं बना कर जाती हूं और आशीष आप को दोनों समय खाना खिलाता है. मैं ने ऊपर जा कर छोटी बहू संतोष से पूछा तो वह बोलीं, ‘‘अरे, इस बुढि़या का तो दिमाग चल गया है. खाऊखाऊ हमेशा लगाए रखती है. खाना दिया था यह भूल गई.’’

अगले दिन बाबूजी से पूछा तो वह कहने लगे कि डाक्टर ने खाने के लिए मना किया है. रात का खाना खिलाने से इन का पेट खराब हो जाएगा. ताकत की दवाइयां दे गया है. आशीष खिला देता है.

मैं ने माताजी से पूछा, ‘‘डाक्टर आप को देखने आया था लेकिन आप ने तो नहीं बताया.’’

माताजी हैरान हो कर बोलीं, ‘‘कौन सा डाक्टर? अरे, मैं तो डा. चावला को दिखाती थी पर उन को मरे हुए तो 2 साल हो गए. दूसरे किसी डाक्टर को ये इसलिए नहीं दिखाते कि मुझ पर इन को पैसा खर्च करना पड़ेगा.’’

मैं ने फिर पूछा, ‘‘ताकत की गोलियां कहां हैं मांजी, दूध के संग उन्हें मेरे सामने ही ले लो.’’

वह बोलीं, ‘‘कौन सी गोलियां? मरने को बैठी हूं… झूठ क्यों बोलूंगी? 3 दिन से रात का खाना बंद कर दिया है मेरा. जा, पूछ, क्यों किया ऐसा.’’

मैं ने तरस खा कर जल्दी से एक अंडा आधा उबाला और डबल रोटी का एक स्लाइस ले कर अपने घर जाने से पहले उन्हें खिला दिया.

अगले दिन मेरी आफत आ गई. सुरेश बाबू ने मुझे डांटा और कहा कि जो वह कहेंगे वही मुझे करना पड़ेगा. रात को उन्हें पाखाना कौन कराएगा.

मैं ने दबी जबान से दलील दी कि भूख तो जिंदा इनसान को लगती ही है, तो चिल्ला पड़े, ‘‘तू मुझे सिखाएगी?’’

मैं भी मकानजायदाद वाली हूं. घर से कमजोर नहीं हूं. मेरा बड़ा बेटा डाक्टरी पढ़ रहा है. छोटा दर्जी की दुकान करता है. उसी की कमाई से फीस भरती हूं. दोनों मुझे यहां कभी न आने देते. मगर माताजी मेरे बिना रोने लगती हैं. मैं हूं भी कदकाठी से तगड़ी. माताजी 80 किलो की तो जरूर होंगी. उन्हें उठानाबैठाना आसान काम तो नहीं और मैं कर भी लेती हूं.

एक बार कनाडा से माताजी जिमर फ्रेम ले आई थीं जो वजन में हलका और मजबूत था. माताजी उसे पकड़ कर चल लेती थीं. अंदरबाहर भी हो आती थीं. पर तभी छोटी बहू के पिताजी को लकवा मार गया. अत: उन्होंने जिमर फ्रेम अपने पिताजी को भिजवा दिया.

बड़े भैया जब अगली बार आए तो अपनी मां को एक पहिएदार कुरसी दिला गए. मैं उसी पर बैठा कर उन को नहलानेधुलाने बाथरूम में ले जाती थी. मगर 2 साल पहले जब आशीष ने कंप्यूटर खरीदा तो संतोष बीबीजी ने उस की पुरानी मेज माताजी के कमरे में रखवा दी जिस से व्हील चेयर के लिए रास्ता ही नहीं बचा.

बड़े भैया कनाडा से आते तो अपनी मां के लिए जरूरत का सब सामान ले आते. भाभीजी सफाईपसंद हैं, एकदम कंचन सा सास को रखतीं. भाभीजी अपने हाथ से माताजी की पसंद का खाना बना कर खिलातीं. बाबूजी बड़े भैया के घर नहीं जाते थे. सुरेश ने कुछ ऐसा काम कर रखा था कि बाप बेटे से जुदा हो गया. बाबूजी के मन में अपने बड़े बेटे के प्रति कैसा भाव था यह तब देखने को मिला जब भैया माताजी से मिलने आए तो बाबूजी परदे के पीछे चले गए. इस के बाद ही बड़े भैया ने अलग मकान लिया और मां को बुलवा कर उन की सारी इच्छाओं को पूरा करते थे. तब मेरी भी खूब मौज रहती. वह मुझे 24 घंटे माताजी के पास रखते और उतने दिनों के पैसों के साथ इनाम भी देते.

फिर जब उन के कनाडा जाने का समय आता तो वह माताजी को वापस यहां छोड़ जाते और वह फिर उसी गंदी कोठरी में कैद हो जातीं. भाभीजी की लाई हुई सब चीजें एकएक कर गायब हो जातीं. मैं ने एक बार इस बात की बाबूजी से शिकायत की तो उलटा मुझ पर ही दोष लगा दिया गया. मैं ने जवाब दे दिया कि कल से नहीं आऊंगी, दूसरा इंतजाम कर लो. मगर माताजी ने मेरे नाम की जो रट लगाई कि उन का चेहरा देख कर मुझे अपना फैसला बदलना पड़ा.

खाना तो रोज बनता है इस घर में. बाबूजी को खातिर से खिलाते हैं मगर मांजी के लिए 2 रोटी नहीं हैं. यह वही मां है जिस ने किसी को कभी भूखा नहीं सोने दिया. देवर, ननद, सासससुर, बच्चे सब संग ही तो रहते थे. आज उसी का सब से लाड़ला बेटा उसे 2 रोटी और 1 कटोरी सब्जी न दे? क्या कोई दुश्मनी थी?

माताजी की सहेली भी मैं ही थी. एक दिन उन से पूछा तो कहने लगीं कि बाबूजी की ये खातिरवातिर कुछ नहीं करते. सब नीयत के खोटे हैं. बाबूजी के बैंक खाते में करोड़ों रुपए हैं इसलिए उन्हें मस्का लगाते हैं. मैं ठहरी औरत जात. 2-4 गहने थे उन्हें बेटी के नेगजोग में दे बैठी. इन पर बोझ नहीं डाला कभी. अब मैं खाली हाथ खर्चे ही तो करवा रही हूं. रोज दवाइयां, डाक्टर. ऊपर से मुझे दोष लगाते हैं कि तू मेरे गहने परायों को दे आई.

आज सुरेश अपनी बीवी को 5 हजार रुपया महीना जेबखर्च देता है. मेरा आदमी इसे देख कर भी नहीं सीखता. पहले तो ऐसा रिवाज नहीं था. औरतों को कौन जेबखर्च देता था.

माताजी की बाबूजी से नहीं बनती. कैसे बने? शराबी का अपना दिमाग तो होता नहीं. सुरेश के हाथ कठपुतली बन कर रह गए हैं. 10वीं में बेटा फेल हुआ तो उसे अपने साथ दुकानदारी में लगा लिया और पीना भी सिखा दिया. अब उसी नालायक से यारी निभा रहे हैं. माताजी कहती थीं कि देखना अनीता, जिस दिन मेरी आंखें बंद हो जाएंगी यह बाप की रोटीपानी भी बंद कर देगा. बाप को बोतल पकड़ा कर निचोड़ रहा है, ताकि जल्दी मरे.

माताजी कोसतीं कि इतनी बड़ी कोठी कौडि़यों के मोल बेच दी और इस दड़बे जैसे घर में आ बैठा, जहां न हवा है न रोशनी. मेरे कमरे में तो सूरज के ढलने या उगने का पता ही नहीं चलता. ऊपर से संतोष ने सारे घर का कबाड़ यहीं फेंक रखा है.

माताजी रोज अपनी कोठी को याद करती थीं. सुबह चिडि़यों को दाना डालती थीं. सूरज को निकलते देखतीं, पौधों को सींचतीं. ग्वाला गाय ले कर आता तो दूध सामने बैठ कर कढ़वातीं. लोकाट और आम के पेड़ थे, लाल फूलों वाली बेल थीं.

बड़े भैया के बच्चे सामने चबूतरे पर खेलते थे. बड़े भैया अच्छा कमाते थे. सारे घर का खर्च उठाते थे. सारा परिवार एक छत के नीचे रहता था और यह सुरेश की बहू डोली से उतरने के 4 दिन बाद से  ही गुर्राने लगी. अपने घर की कहानी सुनातेसुनाते माताजी रो पड़तीं.

इस बार बड़े भैया जब आए तब जाने क्यों बाबूजी खुद ही उन से बोलने लगे. भाभीजी ने पांव छुए तो फल उठा कर उन के आंचल में डाले. पास बैठ कर घंटों अच्छे दिनों की यादें सुनाने लगे. जब वह लोग माताजी को अपने फ्लैट पर ले गए तो मैं ने देखा कि उस रोज बाबूजी पार्क की बेंच पर अकेले बैठे रो रहे थे.

मैं रुक गई और पूछा, ‘‘क्या बात हो गई?’’ तो कहने लगे कि अनीता, आज तो मैं लुट गया. मेरा एक डिविडेंड आना था. सुरेश फार्म पर साइन करवाने कागज लाया था. मगर मैं ने कुछ अधिक ही पी रखी थी. उस ने बीच में सादे स्टांप पेपर पर साइन करवा लिए. नशा उतरने के बाद अपनी गलती पर पछता रहा हूं. अरे, यह सुरेश किसी का सगा नहीं है. पहले बड़े भाई के संग काम करता था तो उसे बरबाद किया. वह तो बेचारा मेहनत करने परदेस चला गया. मुझ से कहता था, भाई ने रकम दबा ली है और भाग निकला है. मैं भी उसे ही अब तक खुदगर्ज समझता रहा मगर बेईमान यह निकला.

मैं ने कहा, ‘‘अभी भी क्या बिगड़ा है. सबकुछ तो आप के पास है. बड़े को उस का हक दो और आप भी कनाडा देखो.’’

वह हताश हो कर बोले, ‘‘अनीता, कल तक सब था, आज लुट गया हूं. क्या मुंह दिखाऊंगा उसे. मुझे लगता है कि मैं ने इस बार बड़े से बात कर ली तो छोटे ने जलन में मुझे बरबाद कर दिया.’’

मन में आया कह दूं कि आप को तो रुपए की बोरी समझ कर संभाल रखा है. मांजी पर कुछ नहीं है इसलिए उन्हें बड़े भाई के पास बेरोकटोक जाने देता है. मगर मैं क्यों इतनी बड़ी बात जबान पर लाती.

होली की छुट्टियों में मैं गांव गई थी. जाते समय जमादारिन से कह गई थी कि माताजी को देख लेगी. 4 दिन बाद गांव से लौटी तो देखा माताजी बेहोश पड़ी थीं. बड़े भैया 1 माह की दवाइयां, खाने का दिन, समय आदि लिख कर दे गए थे. उसी डा. चावला को टैक्सी भेज कर बुलवाया था जिसे इन लोगों ने मरा बता दिया था. माताजी देख कर हैरान रह गई थीं. डाक्टर साहब ने हंस कर कहा था, ‘‘उठिए, मांजी, स्वर्ग से आप को देखने के लिए आया हूं.’’

बाबूजी ने मुझे बताया कि जब से तू गांव गई सुरेश ने एक भी दवाई नहीं दी. कहने लगा कि आशीष और विशेष की परीक्षाएं हैं, उस के पास दवा देने का दिन भर समय नहीं और मुझे तो ठीक से कुछ दिखता नहीं.

माताजी ब्लड प्रेशर की दवा पिछले 55 साल से खाती आ रही हैं. मुझे बाबूजी से मालूम हुआ कि दवा बंद कर देने से उन का दिल घबराया और सिर में दर्द होने लगा तो सुरेश ने आधी गोली नींद की दे दी थी. उस के बाद ही इन की हालत खराब हुई है.

मैं ने माताजी की यह हालत देखी तो झटपट बड़े भैया को फोन लगाया. सुनते ही वह दौड़े आए. बड़ी भाभी ने हिलाडुला कर किसी तरह उठाया और पानी पिलाया. माताजी ने आंखें खोलीं. थोड़ा मुसकराईं और आशीर्वाद दिया, ‘‘सुखी रहो…सदा सुहागिन बनी रहो.’’

बस, यही उन के आखिरी बोल थे. अगले 7 दिन वह जिंदा तो रहीं पर न खाना मांगा न उठ कर बैठ पाईं. डाक्टर ने कहा, सांस लेने में तकलीफ है. चम्मच से पानी बराबर देते रहिए.

मैं बैठी रही पर उन्होंने आंखें नहीं खोलीं. ज्यादा हालत बिगड़ी तो डाक्टर ने कहा कि इन्हें अस्पताल में भरती करवाना पड़ेगा.

सुरेश झट से बोला, ‘‘देख लो, बाबूजी. क्या फायदा ले जाने का, पैसे ही बरबाद होंगे.’’

तभी बड़ी भाभी ने अंगरेजी में बाबूजी को डांटा कि आप इन के पति हैं. यह घड़ी सोचने की नहीं बल्कि अपनी बीवी को उस के आखिरी समय में अच्छे से अच्छे इलाज मुहैया कराने की है, अभी इसी वक्त उठिए, आप को कोई कुछ करने से नहीं रोकेगा.

2 दिन बाद माताजी चल बसीं. उन का शव घर लाया गया. महल्ले की औरतें घर आईं तो संतोष बीबीजी ऊपर से उतरीं और दुपट्टा आंखों पर रख कर रोने का दिखावा करने लगीं.

अंदर मांजी को नहलानेधुलाने का काम मैं ने और बड़ी भाभी ने किया. बड़े भैया ने ही उन के दाहसंस्कार पर सारा खर्च किया.

कल माताजी का चौथा था. कालोनी की नागरिक सभा की ओर से सारा इंतजाम मुफ्त में किया गया. पंडाल लगा, दरी बिछाई गई. रस्म के मुताबिक सुरेश को सिर्फ चायबिस्कुट खिलाने थे.

सुबह 11 बजे मैं घर पहुंची तो देखा, बाबूजी उसी पलंग पर लेटे हुए थे जिस पर माताजी लेटा करती थीं. मैं ने उन्हें उठाया, कहा कि पलंग की चादरें भी नहीं बदलवाईं अभी किसी ने.

यह सुनते ही सुरेश चिल्लाए, ‘‘तेरा अब यहां कोई काम नहीं, निकल जा. होली की छुट्टी लेनी जरूरी थी. मार डाला न मेरी मां को. अब 4 दिन की नागा काट कर हिसाब कर ले और दफा हो.’’

‘‘माताजी को किस ने मारा, यह इस परिवार के लोगों को अच्छी तरह पता है. मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा हिसाब.’’

मैं चिल्ला पड़ी थी. मेरा रोना निकल गया पर मैं रुकी नहीं. लंबेलंबे डग भर कर लौट पड़ी.

बाबूजी मेरे पीछेपीछे आए. मेरे कंधे पर हाथ रखा. उन की आंखों में आंसू थे, भर्राए गले से बोले, ‘‘अब मेरी बारी है, अनीता.’’ Family Story in Hindi

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