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Emotional Hindi Story: अपेक्षा

Emotional Hindi Story: औफिस में आए भाई के कौल की ‘घर आ जा, शाम को जरूरी बात करनी है’ ने पसोपेश में डाल दिया. मन को शांत कर पूछा, ‘‘कुछ खास?’’

‘‘हां, मां ने घर में ब्लास्ट कर दिया.’’

‘‘ब्लास्ट? क्या मतलब?’’

‘‘मां को पापा से तलाक चाहिए,’’ कह कर भाई ने फोन रख दिया.

तलाक? वह भी शादी के 35 साल बाद. मां को क्या हो गया? ये तो वास्तव में सठिया गई हैं. दादीनानी बनने के बाद अब तलाक? ऐसा क्या हो गया जो इस उम्र में इन्हें तलाक की जरूरत पड़ गई. इन्हें और पापा को तो कभी लड़ते भी नहीं देखा. इतना जरूर था कि रिटायरमैंट के बाद पापा अपने समाजसेवा वाले स्थान पर रह रहे थे और मम्मी भाईभाभी के साथ अपने घर में. गाहेबगाहे पापा घर आ जाते या कुछ दिन मम्मी वहां चली जातीं.

समाजसेवा के विभिन्न कार्य करना पापा का शौक था विशेषकर शिक्षा से संबंधित, जैसे गरीब व वंचित बच्चों को पढ़ाना, उन में पुस्तकें बांटना, उन की जरूरतों का अन्य सामान बांटना आदिआदि. स्कूलों से गरीब और पढ़ाई में कमजोर बच्चों को ढूंढ़ उन्हें मुफ्त ट्यूशन देने का कार्य तो उन का पसंदीदा था. इस में मम्मी को भी सहयोग देने को कहते थे.

मगर मम्मी का कहना था कि दान घर से शुरू होता है. दूसरों की मदद करने और इस समाज को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाने के लिए हमें पहले खुद पर काम करना चाहिए और अपने करीबी लोगों की जरूरतों को पूरा करना चाहिए. इसलिए उन्होंने स्वयं को हम दोनों भाईबहन की शिक्षादीक्षा व घरगृहस्थी में ही सीमित कर लिया. उन का कहना था, ‘आप ही बाहर सुधारो, मैं तो घर और बालबच्चों को संभाल कर ही खुश हूं.’

रिटायरमैंट के बाद पिछले 2 सालों से पापा ने स्वयं को पूर्णता इसी कार्य में समर्पित कर दिया था. बच्चों व शिवांश की शाम की व्यवस्था कर मम्मी के घर पहुंच कर देखा कि घर में सन्नाटा पसरा हुआ है. मां अपने कमरे में, भाभी किचन में और भतीजे के साथ बिजी भाई.

‘‘क्या हुआ? इतना अचानक, ये सब कब, कैसे और क्यों?’’ कह कर मैं ड्राइंगरूम में बैठ गई. अब वहां हम चारों- मैं, मम्मी, भाई और भाभी- बिना कुछ बोले शांत बैठे थे इस ऊहापोह में कि बात कहां से शुरू करें.

‘‘मां, क्या हो गया?’’ कह कर मैं ने ही बात शुरू की.

‘‘क्या? क्या हो गया है, श्रेय ने तुम्हें बताया नहीं? मुझे तुम्हारे पापा से तलाक चाहिए.’’

‘‘तलाक पापा से मगर क्यों? ऐसी क्या बात हो गई जो इस उम्र में आप को

तलाक चाहिए?’’

‘‘क्यों, तलाक की भी कोई उम्र होती है? कानून में लिखा है क्या कि तलाक इस से इस उम्र में ही लेना चाहिए या मिलेगा?’’ मम्मी ने थोड़े गुस्से में कहा, वे ऐसे सवालों के लिए तैयार थीं.

‘‘अरे मां, बात उम्र की नहीं, कोई कारण भी तो हो तलाक लेने का?’’

‘‘पारस्परिक सहमति से भी तलाक होता है न. हम भी ले लेंगे. हिंदू विवाह

कानून 1955 की 13 बी धारा में दिया हुआ है न,’’ मम्मी ने पूरी तैयारी कर ली थी.

‘‘आप ने और पापा ने यह डिसीजन लिया है? कब डिसाइड किया?’’

‘‘अभी तो मैं ने ही निर्णय लिया है. पारस्परिक सहमति भी हो जाएगी.’’

‘‘क्या मजाक है? आप ने निर्णय ले लिया, पापा न माने तो? और फिर क्यों चाहिए आप को तलाक? कोई तो कारण होगा?’’

‘‘हां है. और बहुत बड़ा कारण है. उन्हें मेरी जरूरत ही नहीं. तो इस बंधन में रहने का लाभ? जब से हमारी शादी हुई, समाजसेवा मेरी सौत के रूप में हमेशा हमारे साथ रही. कहीं जाना हो तब या तो समय नहीं या वहां भी किसी और रूप में समाजसेवा. सोचा, परिवार बढ़ेगा, तब शायद जनून कम हो. फिर तुम मेरी गोद में आई, लगा अब तो ध्यान घर और मेरे-तुम्हारे ऊपर आएगा. मगर नहीं. हम तो घर की मुरगी ही रहे. जैसे अगर वे शिक्षा दान नहीं करेंगे तो गरीब बच्चे अनपढ़ ही रह जाएंगे.

‘‘समय के साथ श्रेय भी आ गया और तुम ने स्कूल जाना शुरू किया, तब फिर उम्मीद जगी कि शायद तुम्हारी पढ़ाई में रुचि लेंगे और दोनों बच्चों की परवरिश और घर में ध्यान देंगे. नहीं, मगर ऐसा नहीं हुआ. औफिस और समाजसेवा ही उन का पहला प्यार और कर्तव्य रहा. हमारी तरफ तो उन का कर्तव्य मात्र नौकरी कर घरखर्च की पूर्ति करना ही रहा. सामंजस्य बिठातेबिठाते इसी उम्मीद पर रही कि चलो, रिटायरमैंट के बाद कितना ही समाजसेवा कर लें, फिर भी हम दोनों को एकसाथ बैठने व सुखदुख बांटने का समय मिलेगा ही.

‘‘तुम दोनों की जिम्मेदारियों के पूरे होने और रिटायरमैंट के बाद भी उन का यह रवैया असहनीय है. मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं, कुछ सपने मैं ने भी देखे थे कि जिम्मेदारियां समाप्त होने के बाद हम क्या करेंगे, कैसे करेंगे.  मुझे अब अपनेआप को ढूंढ़ना है. फिर उस रिश्ते को ढोते रहने का क्या लाभ जिस में मन अशांत रहे.

‘‘इसलिए, मुझे तलाक चाहिए.’’

‘‘ठीक है. कहां रहेंगी आप तलाक के बाद?’’

‘‘अपने घर में.’’

‘‘भाईभाभी?’’

‘‘जैसे अभी रहते हैं मेरे साथ.’’

‘‘पापा?’’

‘‘जैसे अभी रहते हैं- समाज सेवा के आश्रम में.’’

‘‘तो बदलेगा क्या? अभी भी तो आप ऐसे ही रहती हैं.’’

‘‘तुम्हारे पापा के साथ मेरा रिश्ता. मेरी उन से अपेक्षा.’’

कमरे में पूर्ण सन्नाटा पसर गया.

मां कुछ रुक कर बोलीं, ‘‘जिंदगी में विवाह सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए नहीं होता. विवाह 2 जनों के साथ सुखदुख बांटने और रोजमर्रा की छोटीबड़ी बातों को शेयर करने के लिए होता है. जब तुम्हारे पापा ने अपनी जिम्मेदारी निभाने से साफ इनकार कर दिया तो मैं इस रिश्ते को क्यों ढोऊं? विवाह एक तरफ का फैसला नहीं होता.

‘‘मैं नहीं चाहती कि जब मुझे जरूरत हो, मैं किसी का हाथ पकड़ कर चलने की कोशिश कर रही हूं, वह जना दिखे ही नहीं. मैं उस विवाह के ?ाठ के सहारे बाकी के साल नहीं गुजारना चाहती जो कभी हुआ था ऐसा लगता ही नहीं. तुम लोगों को हमेशा की तरह आजादी रहेगी कि तुम कब पापा से मिलो, कब न मिलो. पर मुझे आजादी रहेगी कि मैं उन से न मिलूं और यदि कोई कभी मुझे मिला तो उस के साथ हंसनेबोलने पर मुझे कोई गिल्ट न हो.’’

हम दोनों के पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि पापा का व्यवहार तो हम होश संभालने के बाद से देखते आ रहे थे. आज अगर मां दुनिया से लड़ने को तैयार हैं तो हम न करने वाले कौन होते हैं? Emotional Hindi Story

लेखक – अमिता आनंद

एक बार तो पूछा होता

सरिता, बीस साल पहले, जून (प्रथम) 2006

Sad Story: ‘‘पता नहीं क्यों किसीकिसी के साथ दम घुटता सा लगता है. जैसे आप की हर सांस पर किसी का पहरा हो या कोई हर पल आप पर नजर रख रहा हो. क्या ऐसे में दम घुटता सा नहीं लगता?’’ सीमा ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी ओर देखा.

‘‘कहीं तुम्हें दमा का रोग तो नहीं हो गया?’’ मैं ने भी प्रत्युत्तर में प्रश्न दाग दिया.

मेरा मजाक उस के गले में फांस जैसा अटक जाएगा, मु झे नहीं पता था.

‘‘तुम्हें लग रहा है कि मैं तमाशा कर रही हूं, मैं अपने मन की बात सम झाना चाह रही हूं और तुम सम झ रहे हो…’’

सीमा का स्वर रुंध जाएगा, मु झे पता नहीं था. सहसा मु झे रुकना पड़ा. हंसतीखेलती सीमा इतनी परेशान भी हो सकती है, मैं ने कभी सोचा भी नहीं था.

सीमा मेरे पापा के दोस्त की बेटी है और मेरे बचपन की साथी है. हम ने साथसाथ पढ़ाई पूरी की और जीवन के कई उतारचढ़ाव भी साथसाथ पार किए हैं. ऐसा क्या हो गया उस के साथ. हो सकता है उस के पापा ने कुछ कहा हो, लेकिन पापा के साथ पूरी उम्र दम नहीं घुटा तो अब क्यों दम घुटने लगा.

2 दिन बाद मैं फिर सीमा से मिला तो क्षमायाचना कर कुछ जानने का प्रयास किया.

‘‘ऐसा क्या है, सीमा, मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूं. अब क्या मु झे भी रुलाओगी तुम?’’

‘‘मेरी वजह से तुम क्यों रोओगे?’’

तनिक रुकना पड़ा मु झे. सवाल गंभीर और जायज भी था. भला मैं क्यों रोऊंगा? मेरा क्या रिश्ता है सीमा से? सीमा की मां का एक्सिडैंट, उन का देर तक अस्पताल में इलाज और फिर उन की मौत, सीमा का अकेलापन, सीमा के पापा का पुनर्विवाह और फिर उन का भी अलगाव. कोई नाता नहीं है मेरा सीमा से, फिर भी कुछ तो है जो मु झे सीमा से बांधता है.

‘‘तुम मेरे कौन हो, राघव?’’

‘‘पता नहीं, तुम्हारे सवाल से तो मु झे दुविधा होने लगी है और विचार करना पड़ेगा कि मैं कौन हूं तुम्हारा.’’

तनिक क्रोध आ गया मु झे. यह सोच कर कि कौन है जो हमारे रिश्ते पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है?

‘‘तुम्हारा दिमाग तो नहीं घूम गया. अच्छी बात है, नहीं मिलूंगा मैं तुम से. पता नहीं कैसे लोगों में उठतीबैठती हो आजकल, लगता है किसी मानसिक रोगी की संगत में हो जो खुद तो बीमार होगा ही, तुम्हारा भी दिमाग खराब कर रहा है,’’ और इतना कह कर मैं ने हाथ में पकड़ी किताब पटक दी.

‘‘यह लाया था तुम्हारे लिए. पढ़

लो और अपनी सोच को जरा

स्वस्थ बनाओ.’’

मैं तैश में उठ कर चला तो आया पर पूरी रात सो नहीं सका. भैयाभाभी और पिताजी पर भी मेरी बेचैनी खुल गई. बातोंबातों में उन के होंठों से निकल गया, ‘‘सीमा के रिश्ते की बात चल रही थी, क्या हुआ उस का? उस दिन भाईसाहब बात कर रहे थे कि जन्मपत्री मिल गई है. लड़के को लड़की भी पसंद है. दोनों अच्छी कंपनी में काम करते हैं, क्या हुआ, बात आगे बढ़ी कि नहीं?’’

‘‘मु झे तो पता नहीं कि सीमा के रिश्ते की बात चल रही है?’’

‘‘क्या सीमा ने नहीं बताया? भाईसाहब तो बहुत उतावले हैं इस रिश्ते को ले कर कि लड़का उसी के साथ काम करता है. मनीष नाम है उस का, जाति भी एक है.’’

‘‘अरे, भाभी, आप को इतना सब पता है और मु झे इस का क ख ग भी पता नहीं,’’ इतना कह कर मैं भाभी का चेहरा देखने लगा और भौचक्का सा अपने कमरे में चला आया. पता नहीं चला कब भाभी भी मेरे पीछे कमरे में चली आईं.

‘‘राघव, क्या सचमुच तुम कुछ नहीं जानते?’’

‘‘हां, भाभी, बिलकुल सच कह रहा हूं कि मैं कुछ भी नहीं जानता.’’

‘‘क्यों, सीमा ने नहीं बताया. उस की तुम से तो अच्छी दोस्ती है. जराजरा सी बात भी एकदूसरे के साथ तुम बांटते हो.’’

‘‘भाभी, यही तो मैं भी सोच रहा हूं मगर यह सच है. आजकल सीमा परेशान बहुत है. पिछले 3-4 दिनों में हम जब भी मिले हैं, हम में  झगड़ा ही हुआ है. मैं पूछता हूं तो कुछ बताती नहीं है. हो सकता है वह लड़का मनीष ही उसे परेशान कर रहा हो.’’

सहसा याद आया मु झे. दम घुटने जैसा कुछ कहा था. उसी बात पर तो  झगड़ा हुआ था. सब सम झ आने लगा मु झे. हो सकता है वह लड़का सीमा को पसंद न हो. वह सीमा की हर सांस पर पहरा लगा रहा हो. बचपन से जानता हूं न सीमा को, जरा सा भी तनाव हो तो उस की सांस ही रुकने लगती है.

‘‘तुम से कुछ पूछना चाहती हूं, राघव,’’ भाभी बड़ी बहन का रूप ले कर बोलीं, ‘‘सीमा तुम्हारी अच्छी दोस्त है या उस से ज्यादा भी है कुछ?’’

‘‘अच्छी मित्र है, ये कैसी बातें कर रही हैं आप? कल सीमा भी पूछ रही थी कि मैं उस का क्या लगता हूं, जैसे वह जानती नहीं कि मैं उस का क्या हूं.’’

‘‘तुम तो पढ़ेलिखे हो न,’’ भाभी बोलीं, ‘‘एमबीए हो, बहुत बड़ी कंपनी में काम करते हो. सब को सम झा कर चलते हो, क्या मु झे सम झा सकते हो कि तुम सीमा के क्या हो?’’

‘‘हम दोनों बचपन के साथी हैं. बहुतकुछ साथसाथ सहा भी है.’’

भाभी बात को बीच में काट कर बोलीं, ‘‘अच्छा बताओ, क्या 2 पल भी बिना सीमा को सोचे कभी रहे हो?’’

‘‘न, नहीं रहा.’’

‘‘तो क्या उस के बिना पूरा जीवन जी लोगे? उस की शादी कहीं और हो गई तो?’’

‘‘भाभी, मैं सीमा को किसी धर्मसंकट में नहीं डालना चाहता था, इसीलिए ऐसा सपना ही नहीं देखा. उस का सुख ही मेरे लिए सबकुछ है. वह जहां रहे सुखी रहे, बस.’’

‘‘तुम ने उस से पूछा, वह मनीष को पसंद करती है? नहीं न, तुम्हें कुछ पता ही नहीं है. जिस के साथ उस के पिता ने जन्मकुंडली मिलाई है, क्या उस के साथ उस के विचार भी मिलते हैं. नहीं जानते न तुम. तुम उस का सुखदुख जानते ही नहीं तो उसे सुखी रखने की कल्पना भी कैसे कर सकते हो. एक बार तो उस से खुल कर बात कर लो. बहुत देर न हो जाए, मुन्ना.’’

भाभी का हाथ मेरे सिर पर आया तो लगा एक ममतामय सुरक्षा कवच उभर आया मन के आसपास. क्या भाभी मेरा मन पहचानती हैं. लगा चेतना पर से कुछ हट सा रहा है.

‘‘ज्यादा से ज्यादा सीमा न कर देगी,’’ भाभी बोलीं, ‘‘कोई बात नहीं, हम बुरा नहीं मानेंगे. कम से कम दिल की बात कहो तो सही. तुम डरते हो तो मैं अपनी तरफ से बात छेड़ूं.’’

‘‘मु झे डर है राघव कहीं ऐसा न हो कि वह इतनी दूर चली जाए कि तुम उसे देख भी न पाओ. सवाल अनपढ़ या पढ़ेलिखे होने का नहीं है, कुछ सवाल इतने भी आसान नहीं होते जितना तुम सोचते हो क्योंकि बड़ेबड़े पढ़ेलिखे भी अकसर कुछ प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाते. सीमा को तो अनपढ़ कह दिया, तुम्हीं कौन से पढ़ेलिखे हो, जरा सम झाओ मु झे.’’

किंकर्तव्यविमूढ़ मैं भाभी को देखता रहा. मेरा मन भर आया. अपने भाव छिपाने चाहे लेकिन प्रयास असफल रहा. भाभी से क्या छिपाऊं. शायद भाभी मु झ से ज्यादा मु झे जानती हैं और सीमा को भी.

‘‘मुन्ना, तुम आज ही सीमा से बात करो. मैं शाम तक का समय तुम्हें देती हूं, वरना कल सुबह मैं सीमा से बात करने चली जाऊंगी. अरे, जाति नहीं मिलती न सही, दिल तो मिलता है. वह ब्राह्मण है, हम ठाकुर हैं, इस से क्या फर्क पड़ता है, जब उसे साथ ही लेना है तो उस के लायक बनने की जरूरत ही क्या है?

‘‘जिंदगी इतनी सस्ती नहीं होती बच्चे कि तुम इसे यों ही गंवा दो और इतनी छोटी भी नहीं कि सोचो बस, खत्म हुई ही सम झो. पलपल भारी पड़ता है जब कुछ हाथ से निकल जाए. मुन्ना, तुम मेरी बात सुन रहे हो न.’’

मैं भाभी की गोद में समा कर रो पड़ा. पिछले 10 सालों में मां बन कर भाभी ने कई बार दुलारा है. जब भाभी इस घर में आई थीं तब मैं 16-17 साल का था. डरता भी था, पता नहीं कैसी लड़की घर में आएगी, घर को घर ही रहने देगी या श्मशान बना देगी और अब सोचता हूं कि मेरी यह नन्ही सी मां न होती तो मैं क्या करता.

‘‘तुम बडे़ कब होगे, राघव?’’ चीखी थीं भाभी.

‘‘मु झे बड़े होने की जरूरत ही नहीं है, आप हैं न. अगर आप को लगता है, बात करनी चाहिए तो आप बात कर लीजिए, मु झ में हिम्मत नहीं है. उन की हां आप ही पूछ कर बता दें. डरता हूं, कहीं दोस्ती का यह रिश्ता हाथ से ही न फिसल जाए.’’

‘‘इस रिश्ते को तो यों भी तुम्हारे हाथ से फिसलना ही है. जितनी पीड़ा तुम्हें सीमा की वजह से होती है वह तब तक कोई अर्थ रखती है जब तक उस की शादी नहीं हो जाती. उस के बाद यह पीड़ा तुम्हारे लिए अभिशाप बन जाएगी और सीमा के लिए भी. राघव, तुम एक बार तो सीमा से खुद बात कर लो. अपने मन की कहो तो सही.’’

‘‘भाभी, आप सोचिए तो, उस के पापा नहीं मानेंगे तो क्या सीमा उन के खिलाफ जाएगी? नहीं जाएगी. इसलिए कि अपने पापा का कहना वह मर कर भी निभाएगी. मेरे प्रति अगर उस के मन में कुछ है भी तो उसे हवा देने की क्या जरूरत?’’

‘‘क्या सीमा यह सबकुछ सह लेगी? इतना आसान होगा नहीं, जितना तुम मान बैठे हो.’’

भाभी गुस्से से मेरे हाथ  झटक कर चली गईं और सामने चुपचाप कुरसी पर बैठे अपने भाई पर मेरी नजर पड़ी, जो न जाने कब से हमारी बातें सुन रहे थे.

‘‘क्या लड़के हो तुम? भाभी का पल्ला पकड़ कर रो तो सकते हो पर सीमा का हाथ पकड़ एक जरा सा सवाल नहीं पूछ सकते. आदमी बनो राघव, हिम्मत करो बच्चे, चलो, उठो, नहाधो कर नाश्ता करो और निकलो घर से. आज इतवार है और सीमा भी घर पर ही होगी. हाथ पकड़ कर सीमा को घर ले आओगे तो भी हमें मंजूर है.’’

भैयाभाभी के शब्दों का आधार मेरे लिए एक बड़ा प्रोत्साहन था, लेकिन एक पतली सी रेखा संकोच और डर की मैं पार नहीं कर पा रहा था. किसी तरह सीमा के घर पहुंचा. बाहर ही उस के पापा मिल गए. पता चला सीमा की तबीयत अच्छी नहीं है.

‘‘कभी ऐसा नहीं हुआ उसे. कहती है सांस ही नहीं आती. रातभर फैमिली डाक्टर पास बैठे रहे. क्या करूं मैं, अच्छीभली थी, पता नहीं क्या होता जा रहा है इसे.’’

‘‘अंकल, आप को पता तो है कि घबराहट में सीमा को दम घुटने जैसा अनुभव होता है. उस दिन मु झ से बात करनी भी चाही थी पर मैं ने ही मजाक में टाल दिया था.’’

‘‘तो तुम उस से पूछो, बात करो.’’

मैं सीमा के पास चला आया और उस की हालत देख घबरा गया. 3-3 तकिए पीठ के पीछे रखे वह किसी तरह शरीर को सीधा रख सांस खींचने का प्रयास कर रही थी. एकएक सांस को तरसता इंसान कैसा दयनीय लगता है, मैं ने पहली बार जाना था. आंखें बाहर को फट रही थीं मानो अभी पथरा जाएंगी.

उस की यह हालत देख कर मैं रो पड़ा था. सच ही कहा था भाभी ने कि मेरा सीमा के प्रति स्नेह और ममता इतनी भी सतही नहीं जिसे नकारा जा सके. दोनों हाथ बढ़ा कर किसी तरह हांफते शरीर को सहारा देना चाहा. क्या करूं मैं जो सीमा को जरा सा आराम दे पाऊं. माथा सहला कर पसीना पोंछा. ऐसा लग रहा था मानो अभी सीमा के प्राणपखेरू उड़ जाएंगे, दम घुट जो रहा था.

‘‘सीमा, सीमा क्या हो रहा है तुम्हें, बात करो न मु झ से.’’

दोनों हाथों में उस का चेहरा ले कर सामने किया. आत्मग्लानि से मेरा ही दम घुटने लगा था. उस दिन सीमा कुछ बताना चाह रही थी तो क्यों नहीं सुना मैं ने. अचानक ही भीतर आते पापा की आवाज सुनाई दी.

‘‘सीमा, देखो, तुम से मिलने मनीष आया है.’’

पापा के स्वर में उत्साह था. शायद भावी पति को देख सीमा को चैन आएगा. एक नौजवान पास चला आया और  उस का अधिकारपूर्ण व्यवहार ऐसा मानो बरसों पुराना नाता हो. मेरे मन में एक विचित्र भाव जाग उठा, जैसे मैं सीमा के आसपास कोई अवांछित प्राणी था.

‘‘क्या बात है, सीमा?’’ कल अच्छीभली तो थीं तुम. अचानक ऐसा कैसे हो गया?’’

सवाल पर सवाल, उत्तर न मिलने पर भी एक और सवाल.

‘‘कल शाम तुम्हारा इंतजार करता रहा. नहीं आना था तो एक फोन तो कर देतीं. दीदी और जीजाजी तुम्हारी वजह से नाराज हो गए हैं. उन्हें फोन कर के सौरी बोल देना. जीजाजी को कह कर न आने वालों से बहुत चिढ़ है.’’

मु झे मनीष एक संवेदनहीन इंसान लगा. सीमा पर पड़ती उस की नजरों में अधिकार भावना अधिक थी और चिंता कम. यह इंसान सीमा से प्यार ही कहां कर पाएगा जिसे उस की तकलीफ पर जरा भी चिंता नहीं हो रही. सीमा रो पड़ी थी और अगले पल उस का समूचा अस्तित्व मेरी बांहों में आ समाया और मेरी छाती में चेहरा छिपा कर वह चीखचीख कर रोने लगी.

सीमा के पापा अवाक थे. मनीष की पीड़ा को मैं नकार नहीं सकता, जिस की होने वाली बीवी उसी की ही नजरों के सामने किसी और की बांहों में समा जाए.

कुछ प्रश्न और कुछ उत्तर शायद इसी एक पल का इंतजार कर रहे थे. सीमा ने पीड़ा की स्थिति में अपना समूल मु झे सौंप दिया था और मेरे शरीर पर उस के हाथों की पकड़ इतनी मजबूत थी कि मेरे लिए विश्वास करना मुश्किल था. स्पर्श की भाषा कभीकभी इतनी प्रभावी होती है कि शब्दों का अर्थ ही गौण हो जाता है.

मेरे हाथों में क्या था, मैं नहीं जानता लेकिन कुछ ऐसा अवश्य था जिस ने सीमा की उखड़ी सांसों को आसान बना दिया था. मेरे दोनों हाथों को कस कर पकड़ना उस का एक उत्तर था जिस की मु झे भी उम्मीद थी. मुझे पता ही नहीं चला कब मनीष और पापा कमरे से बाहर चले गए. गले में ढेर सारा आवेग पीते हुए मैं ने सीमा के बालों में उंगलियां डाल सहला दिया. देर तक सीमा मेरी छाती में समाई रही. सांस पूरी तरह सामान्य हो गई थी, जिस पर मैं भी हैरान था और सीमा के पापा भी.

‘‘तुम ने पूछा था न, मैं तुम्हारा कौन हूं? कल तक पता नहीं था. आज बता सकता हूं.’’

चुप थी सीमा, और उस के पापा भी चुप थे. मु झे वे प्रकृति के आगे नतमस्तक से लगे. सीमा की सांसें अगर मेरी नजदीकियों की मुहताज थीं तो इस सच से वे आंखें कैसे मोड़ लेते.

‘‘मु झे बताया क्यों नहीं तुम दोनों ने? बचपन से साथसाथ हो और एकदूसरे पर इतना अधिकार है तो.’’

‘‘अंकल, मु झे भी पता नहीं था. आज ही जान पाया,’’ और इसी के साथ मेरा गला रुंध गया था.

मुझे अच्छी तरह याद है जब सीमा की मां की मौत के कुछ साल बाद उस के पापा ने अपनी बहन के दबाव में आ कर पुनर्विवाह कर लिया था तब वे कितने परेशान थे. सीमा और उस की नई मां के बीच तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे. तब अकसर मेरे सामने रो दिया करते थे.

‘‘अपनी जाति अपनी ही जाति होती है. यह औरत हमारी जाति की नहीं है, इसीलिए हम में घुलमिल नहीं पाती.’’

‘‘अंकल, आप अपनी जाति से बाहर भी तो जाना नहीं चाहते थे न. और मैं भी नहीं चाहता था मेरी वजह से सीमा आप से दूर हो जाए क्योंकि आप ने सीमा के लिए अपने सारे सुख भुला दिए थे.’’

‘‘तो क्या उस का बदला मैं सीमा के जीवन में जहर घोल कर लूंगा. मैं उस का बाप हूं. जो मैं ने किया वह कोई एहसान नहीं था. कैसे नादान हो, तुम दोनों.’’

सीमा को गले लगा कर अंकल रो पड़े थे. हम तीनों ही अंधेरे में थे. कहीं कोई परदा नहीं था, फिर भी एक काल्पनिक आवरण खुद पर डाले बस, जिए जा रहे थे हम. डरने लगा हूं अब वह पल सोच कर, जब सीमा सदासदा के लिए जीवन से चली जाती. तब शायद यही सोचसोच कर जीवन नरक बन जाता कि एक बार मैं ने बात तो की होती, एक बार तो पूछा होता.

इन्हें आजमाइए

1.  गरमी के मौसम में सुबह जल्दी और रात में खिड़कियां खोलें. दोनों तरफ की खिड़कियां खोलने से क्रौस वैंटिलेशन होता है और गरम हवा बाहर निकलती है.

2. चायपत्ती में एंटीऔक्सिडैंट पाए जाते हैं. उबली चायपत्ती को धो लें, चोट या जख्म पर उस का लेप लगाएं. फायदा मिलेगा.

3. बोतल को गीले कपड़े या पेपर में लपेट कर फ्रिज में रखें, इस से बोतल जल्दी ठंडी होगी.

4. पंखे के ब्लेड साफ रखें. गंदे पंखे कम हवा देते हैं और ज्यादा बिजली खींचते हैं.

5. ट्रिप पर जाने से पहले वैक्यूम बैग्स का इस्तेमाल करें. कपड़े कम जगह लेंगे.

6. स्टेज प्रैजेंटेशन से पहले मिरर के सामने बोलने की तैयारी करें. कौन्फिडैंस आएगा.

7. केले जल्दी काले हो जाते हैं तो उन के डंठल पर प्लास्टिक रैप लपेट दें.

8. कपड़ों पर लगे छोटे बाल या धूल हटाने के लिए टेप को रोलर की तरह इस्तेमाल करें.

9. टिफिन में रोटी पैक करने के लिए कौटन कपड़े का इस्तेमाल करें, पेपर की वेस्टेज कम होगी.

10. घर में छोटा बच्चा हो तो सर्किट बोर्ड्स पर टेप लगा दें.

 

इंट्रस्टिंग फैक्ट्स – किताबों की गंध का रहस्य

Knowledge Facts: पुरानी किताबों से आने वाली खास खुशबू दरअसल कागज और स्याही के टूटने से निकलने वाले रसायनों के कारण होती है. कई लोगों को यह खुशबू बहुत पसंद होती है और यह पढ़ने की आदत से भावनात्मक जुड़ाव भी दिखाती है.

प्लास्टिक की बोतल का खतरा

एक प्लास्टिक की बोतल को पूरी तरह नष्ट होने में लगभग 400 से 450 साल लग सकते हैं. इस कारण यह पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदायक है. इसलिए प्लास्टिक की जगह कांच या स्टील की बोतल का उपयोग करना बेहतर माना जाता है.

दुनिया का सब से तेज बढ़ने वाला पौधा बांस

बांस ऐसा पौधा है जो एक ही दिन में लगभग 90 सैंटीमीटर तक बढ़ सकता है. इस की मजबूती और तेज बढ़त के कारण इस का उपयोग मकान, फर्नीचर और कागज बनाने में किया जाता है.

चौकलेट का मनोवैज्ञानिक प्रभाव

चौकलेट खाने से दिमाग में खुशी देने वाले हार्मोंस निकलते हैं. यही कारण है कि उदासी या थकान में लोग चौकलेट खाना पसंद करते हैं. हालांकि, इस का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए.

पेड़ रात में भी देते हैं औक्सीजन

अधिकतर पेड़ दिन में औक्सीजन देते हैं, लेकिन कुछ पेड़ जैसे नीम, पीपल और एलोवेरा रात में भी औक्सीजन छोड़ते हैं. इसी कारण इन पेड़ों को घर के आसपास लगाना लाभकारी माना जाता है.

शहद कभी खराब नहीं होता

शहद ऐसा प्राकृतिक पदार्थ है जो सालों तक खराब नहीं होता. मिस्र के पिरामिडों में हजारों साल पुराना शहद मिला है, जो आज भी खाने योग्य माना गया. इस में मौजूद प्राकृतिक गुण बैक्टीरिया को पनपने नहीं देते.

सफेद कपड़े गरमी में ठंडक क्यों देते हैं

सफेद रंग सूरज की रोशनी को अपने अंदर समाहित करने के बजाय उसे वापस परावर्तित कर देती है. इसी कारण सफेद कपड़े गरमी में शरीर को अधिक गरम नहीं होने देते और ठंडक का एहसास कराते हैं. यही वजह है कि गरम प्रदेशों में लोग सफेद कपड़े पहनना पसंद करते हैं. Knowledge Facts

 

एआई की असली दुनिया में क्या

Artificial Intelligence: हाल ही में एक आईएएस अफसर को ले कर दावा किया गया कि उन्होंने अपने काम को दिखाने के लिए एआई से बनी तसवीरों का इस्तेमाल किया और उसी के आधार पर उन्हें नैशनल अवार्ड मिल गया. बाद में अफसर ने सफाई दी कि एआई इमेजेस का अवार्ड से कोई लेनादेना नहीं है, वे तसवीरें सिर्फ वैबसाइट पर जानकारी देने के लिए थीं.

लेकिन सवाल यह नहीं है कि अफसर सही हैं या गलत, सवाल यह है कि आज एआई इतना बारीकी से चीजों को मोर्फ कर रहा है कि आम आदमी के लिए असली और नकली में फर्क करना लगभग नामुमकिन हो गया है.

एआई से बना झूठ का पहाड़

पहले झूठ पकड़ने के लिए फोटो, वीडियो या आवाज सुबूत माने जाते थे. अब वही सुबूत शक के दायरे में हैं. एआई ऐसी तसवीरें बना सकता है जो कभी हुई ही नहीं, ऐसे वीडियो तैयार कर सकता है जिस में कोई इंसान वह बोलता दिखे जो उस ने कभी कहा ही नहीं. कभीकभार तो ऐसा देखा जाता है कि रियल से परफैक्ट फोटोज और वीडियोज तो एआई बना रहा है.

आज हालात ऐसे हैं कि किसी नेता का  फेक वीडियो वायरल हो जाता है, जिस में वह भड़काऊ बयान देता दिखता है. बाद में पता चलता है कि वह डीपफेक था. हालांकि ऐसा हर बार नहीं होता लेकिन एआई अब कुछ बुरी करतूतों को अंजाम देने वालों की शील्ड भी बन गया है. जैसे, कुछ समय पहले एक पार्टी के नेता की किसी और्केस्ट्रा वाली लड़की के साथ अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर देखने को मिली. इस पर खूब हल्ला मचा.

बाद में नेता ने लोगों से यह कह कर सहानुभूति ले ली कि यह वीडियो तो एआई था. अब जब इस से पहले भी कई डीपफेक वीडियो सोशल मीडिया पर फैले हुए हैं तो सब को इस पर विश्वास भी हो गया.

इस के अलावा किसी लड़की की एआई से बनाई गई आपत्तिजनक तसवीरें सोशल मीडिया पर डाल दी जाती हैं, जिस से उस की निजी जिंदगी, कैरियर और मानसिक सेहत तबाह हो जाती है.

और तो और, कई लोगों को अपने रिश्तेदारों की एआई जेनरेटेड आवाज में कौल आती हैं कि, ‘मैं मुसीबत में हूं, पैसे भेजो’. लोग सच मान कर पैसे ट्रांसफर कर देते हैं. इसे वौयस क्लोनिंग कहा जाता है.

एआई का सब से खतरनाक पहलू यही है कि यह पहचान को ही कन्फ्यूज कर देता है. सोचिए, अगर कल को कोई आप के मातापिता की एआई से बनी तसवीरें और वीडियो दिखा कर दावा करे कि वही आप के असली मांबाप हैं तो आप क्या करेंगे?

यह बात सुनने में फिल्मी लग सकती है, लेकिन टैक्नोलौजी जिस दिशा में जा रही है, वहां यह पूरी तरह नामुमकिन भी नहीं लगता. क्योंकि, इसे प्रूव करने के लिए आप को फोटोज या डीएनए रिपोर्ट का सहारा लेना पड़ेगा और जब फोटोज या कोई भी रिपोर्ट आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस के चलते मौर्फ्ड की जा सकती है तो भला किस चीज पर विश्वास किया जाए.

एआई की वजह से आईं असली परेशानियां

कई सैलिब्रिटीज ने शिकायत की है कि उन की फर्जी तसवीरें और वीडियो बना कर स्कैम किए जा रहे हैं या रील्स के जरिए व्यूज हासिल किए जा रहे हैं. इन वीडियोज में ऐक्टर्स को अश्लील दिखाया जाता है जिस के चलते अब कई बौलीवुड सैलिब्रिटीज ने कोर्ट से उन के पर्सनैलिटी राइट्स को ले कर गुहार लगाई है ताकि उन की फोटोज या आवाज का गलत इस्तेमाल न हो.

किसी कोर्ट केस में भी अब वीडियो और फोटो सुबूतों को जांचने में ज्यादा समय लग रहा है, क्योंकि हर चीज पर सवाल यह खड़ा हो रहा है कि कहीं यह एआई से बना तो नहीं? एआई असलियत छुपाने का भी आसान हथियार बन गया है. जब कोई नेता, अभिनेता या चर्चित हस्ती किसी मामले में फंसती है तो एआई जेनरेटिड इमेज या वीडियो बता कर बचने की कोशिश करता है.

समस्या यह है कि एआई की तकनीकों का इस्तेमाल हरकोई कर सकता है. बस, एक मोबाइल और इंटरनैट चाहिए. न कोई बड़ी लैब, न कोई विशेष अनुमति. और यही सब से बड़ा खतरा है कि कहीं सच की पहचान किया जाना खत्म न हो जाए.

जहां एक ओर एआई हमें सुविधाएं देता है जैसे मैडिकल रिसर्च, ट्रैफिक कंट्रोल या भाषा अनुवाद वहीं दूसरी ओर यह समाज में अविश्वास और डर पैदा कर रहा है. आने वाले समय में यह तय करना और मुश्किल होगा कि कौन सा चेहरा, कौन सी आवाज और कौन सी कहानी सच है.

अगर एआई का सही इस्तेमाल किया जाए तो यह इतना भी बुरा नहीं है. इस से काम आसान हुआ है, रिसर्च तेज हुई है, क्रिएटिविटी को नया प्लेटफौर्म मिला है लेकिन बिना नियम और सम?ादारी के इस्तेमाल किया गया एआई ?ाठ की फैक्ट्री बन सकता है.

अब जरूरत है कि लोग हर वायरल चीज पर आंख बंद कर भरोसा न करें,  सरकार और संस्थाएं एआई से जुड़े सख्त नियम बनाएं और हम सब डिजिटल तौर पर थोड़े ज्यादा जागरूक बनें. क्योंकि, अगर आज हम ने एआई के झूठ को पहचानना नहीं सीखा तो कल सच को पहचान पाना शायद और भी मुश्किल हो जाएगा. Artificial Intelligence

 

सीबीएसई का नया आदेश : जरमन और स्पैनिश जैसी विदेशी भाषाएं कूड़ेदान में, जीरो से संस्कृत पढ़ो

Foreign Languages Removed: सीबीएसई ने हाल ही में फ्रैंच और स्पैनिश जैसी विदेशी भाषाओं को सिलेबस से हटा कर संस्कृत जैसी भाषा को महत्त्व दिया है. सीबीएसई का यह निर्णय असल में शिक्षा के भगवाकरण की दिशा में बीजेपी का एक और कदम है. सीबीएसई ने अपने इस नए फैसले से लाखों पुरातनपंथी धोतीधारी संस्कृत को रटे हुए विशेष जाति के बेरोजगारों के लिए नौकरियों का प्रबंध कर दिया है.

सीबीएसई ने हाल ही में अपने सिलेबस में बड़ा बदलाव किया है. 9वीं-10वीं से स्पैनिश, जरमन, फ्रैंच जैसी विदेशी भाषाएं हटाने का फैसला लिया गया है. वहीं संस्कृत को तीसरी भाषा के तौर पर लगभग अनिवार्य कर दिया गया है यानी जो बच्चा कभी संस्कृत नहीं पढ़ा उसे अब जीरो से शुरू करना होगा. यह फैसला छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ है और बीजेपी सरकार की पुरातनपंथी सोच का सुबूत है. यह फैसला नौकरी का बाजार देखे बिना लिया गया है.

आज दुनिया ग्लोबल विलेज बन चुकी है. मल्टीनैशनल कंपनियां भारत आ रही हैं. 2024 में भारत में जरमन कंपनियों की संख्या 2,000 पार कर चुकी है. स्पैनिश बोलने वाले 50 करोड़ लोग दुनिया में हैं. ये 21 देशों की राजभाषा है.

नैसकौम की रिपोर्ट बताती है कि विदेशी भाषा जानने वाले ग्रेजुएट को 35 फीसदी ज्यादा सैलरी मिलती है. बीपीओ, टूरिज्म, एक्सपोर्टइंपोर्ट, दूतावास, अनुवाद जैसे सैक्टर में हर साल 1.2 लाख नई नौकरियां सिर्फ भाषा के दम पर निकलती हैं. सीबीएसई ने इन्हीं भाषाओं को हटा दिया यानी सरकार खुद अपने छात्रों के पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है. एक तरफ ‘स्किल इंडिया’ का नारा और दूसरी तरफ बच्चों से वो स्किल छीन रही है जो सीधे रोजगार देती है.

सवाल यह है कि क्या संस्कृत को जबरन सब पर थोपना सही है? सीबीएसई के 28,000 से ज्यादा स्कूल हैं. इन में 60 फीसदी से ज्यादा स्कूल शहरों में हैं जहां बच्चों के मातापिता तक संस्कृत नहीं जानते. 2019 में ही एनसीईआरटी ने माना था कि तीसरी भाषा के तौर पर संस्कृत लेने वाले 73 फीसदी छात्र 10वीं के बाद उसे छोड़ देते हैं. वजह साफ है. यह भाषा आगे कैरियर में इस्तेमाल नहीं होती. आईआईटी, मैडिकल, यूपीएससी किसी में संस्कृत से एक्स्ट्रा नंबर नहीं मिलते. ऐसे में जीरो से संस्कृत पढ़ाने का मतलब है बच्चे का समय और टैक्सपेयर के पैसों को बरबाद करना. वही समय और संसाधन अगर कोडिंग, इंग्लिश या जरमन सीखने में खर्च हो तो लाखों बच्चों की जिंदगियां बदल सकती हैं.

जानबूझ कर यह चौइस खत्म की गई क्योंकि शिक्षा पर आरएसएस की विचारधारा हावी है. नई शिक्षा नीति 2020 तो कहती है कि छात्रों को विषय चुनने की आजादी होगी लेकिन सीबीएसई तो बिलकुल उलटी गंगा बहा रही है. पहले छात्र के पास विकल्प था संस्कृत, उर्दू, फ्रैंच, जरमन या स्पैनिश. अब कहा जा रहा है कि भारतीय भाषा जरूरी है. ठीक है लेकिन भारतीय भाषा में तमिल, बंगाली, मराठी क्यों नहीं? सिर्फ संस्कृत ही क्यों? साफ है कि फैसला शिक्षा के लिए नहीं, विचारधारा के लिए लिया गया है. बीजेपी सरकार ‘एक भाषा, एक संस्कृति’ के एजेंडे को स्कूल तक घसीट लाई है. बच्चा क्या पढ़ेगा, यह अब सरकार तय करेगी, बच्चा नहीं.

सरकार की इस मानसिकता में सरकारी स्कूल का बच्चा सब से ज्यादा पिसेगा. दिल्ली यूनिवर्सिटी में जरमन-स्पैनिश की कटऔफ 99 प्रतिशत तक जाती है. कौन भरता है इन्हें? डीपीएस, संस्कृति, मौडर्न जैसे महंगे प्राइवेट स्कूलों के बच्चे ही न क्योंकि वही अफोर्ड कर सकते हैं. सरकारी स्कूल या छोटे कसबे का सीबीएसई स्कूल अब विदेशी भाषा पढ़ाएगा ही नहीं यानी गरीब का बच्चा पहले ही रेस से बाहर. अमीर का बच्चा आईबी स्कूल में जा कर फ्रैंच-जरमन पढ़ेगा, विदेश जाएगा वहीं गरीब का बच्चा संस्कृत के धातु-रूप रटेगा. यह समानता नहीं, नया भेदभाव है.

दुनिया आगे बढ़ रही, हम पीछे जा रहे हैं. चीन के स्कूलों में 3 करोड़ बच्चे इंग्लिश के साथसाथ दूसरी विदेशी भाषा सीख रहे हैं. जापान ने 2022 से कोडिंग के साथ स्पैनिश अनिवार्य की हुई है. छोटे देश वियतनाम में भी 12 लाख छात्र जरमन पढ़ते हैं ताकि बीएमडब्ल्यू, सीमेंस में नौकरी पा सकें और भारत में सरकार कह रही है कि 21वीं सदी का बच्चा 2000 साल पुरानी भाषा जीरो से शुरू करे. तकनीक, एआई, डेटा साइंस के दौर में बच्चों को ‘अहं गच्छामि’ रटवाया जा रहा है.

यह पुरातन मोह से ज्यादा भविष्य से दुश्मनी का मामला है. भाषा कोई भी बुरी नहीं होती. संस्कृत पुरोहितों की भाषा है, रोजगार की नहीं. संस्कृत का उपयोग जीवन में कही नहीं होता वहीं जरमन-स्पैनिश यूनिवर्सल भाषा होने के कारण रोजगार की गारंटी भी देती हैं. सीबीएसई और बीजेपी सरकार को तय करना होगा की स्कूल मंदिर हैं या लैब? यहां पूजा करनी है या भविष्य बनाना है?

अगर सच में भारतीय भाषाओं की चिंता है तो पहले हर स्कूल में क्वालिटी के तमिल-तेलुगू-बांग्ला टीचर दीजिए. सिर्फ संस्कृत थोपना और नौकरी देने वाली भाषा हटाना, ये शिक्षा नहीं, राजनीति है और इस की कीमत चुका रहा है वह 14 साल का छात्र जो समझ ही नहीं पा रहा कि उस की गलती क्या है. उस ने तो सिर्फ एडमिशन लिया था, अपना कैरियर सरकार के एजेंडे में गिरवी नहीं रखा था. पुराने गौरव से पेट नहीं भरता. पेट भरता है स्किल से और सरकार वही स्किल छीन रही है. यही मानसिकता अगर जारी रही तो विश्वगुरु बनने का सपना संस्कृत के श्लोक रटने तक सिमट कर रह जाएगा.

किस की शिक्षा, किस के फायदे

सीबीएसई का यह हालिया फैसला तीनभाषा फार्मूले का हिस्सा है जो एनईपी 2020 पर आधारित है. 2026-27 सैशन से क्लास 6 से तीसरी भाषा अनिवार्य है जिस में कम से कम 2 भारतीय भाषाएं होनी चाहिए. कई स्कूलों में हिंदी और इंग्लिश के साथ संस्कृत को आसान विकल्प बना दिया गया है जिस से फ्रैंच, स्पैनिश, जरमन जैसी विदेशी भाषाएं हट रही हैं.

इस देश में पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक भी रहते हैं. ऐसे में शिक्षा को किसी एक जातिविशेष की बपौती समझने की मानसिकता गलत है. शिक्षा का मतलब है ऐसी शिक्षा जो बच्चों को आधुनिक दुनिया से जोड़े, रोजगार बढ़ाए और जातिआधारित पुरानी व्यवस्था को तोड़ते हुए समानतावादी समाज का निर्माण करे. लेकिन सीबीएसई शिक्षा की इस परिभाषा के बिलकुल उलट काम करती हुई नजर आ रही है.

फ्रैंच, स्पैनिश, जरमन जैसी भाषाएं छात्रों को विदेशी विश्वविद्यालयों, टूरिज्म, आईटी, डिप्लोमेसी और ग्लोबल बिजनैस में अवसर देती हैं. भारत में इन भाषाओं के जानकारों की डिमांड बढ़ रही है जबकि संस्कृत भाषा केवल शास्त्रों, वेदों और धार्मिक ग्रंथों तक सीमित है. ऐसे में लाखों छात्रों को संस्कृत पढ़ने पर मजबूर करना समय और संसाधन बरबाद करना है.

संस्कृत पढ़ाने वाले ज्यादातर शिक्षक पंडित परिवारों या विशेष समुदायों से आते हैं. आज भी संस्कृत एक ही जाति विशेष की बपौती मानी जाती है. संस्कृत का सीधा संबंध पुरानी जाति व्यवस्था से है. ऐसे में भाषा के नाम पर संस्कृत को बढ़ावा देना जाति व्यवस्था को मजबूती देना ही है. संस्कृत के नए पदों से इन्हें सरकारी नौकरियां मिलेंगी और आम युवा आधुनिक भाषाओं या विज्ञान तकनीक के क्षेत्र में अवसर खो देंगे. सीबीएसई की यह कवायद असल में विशेष जाति के बेरोजगार युवाओं को सरकारी संसाधनों से पालने जैसा ही है.

भारत में लगभग 25 करोड़ से ज्यादा स्कूली बच्चे हैं. सीबीएसई के इस फैसले से स्कूलों के लाखों छात्र प्रभावित होंगे. एनईपी लागू होने के बाद ही कई राज्यों में संस्कृत स्कूलों को बढ़ावा मिला है. संस्कृत शिक्षा बोर्डों की फंडिंग बढ़ी है वहीं मौडर्न भाषा शिक्षकों की ट्रेनिंग पर कम ध्यान दिया जा रहा है. छात्रों पर पहले से ही बोर्ड एग्जाम और कोचिंग का दबाव है. तीसरी भाषा अनिवार्य करने से सिलेबस ही नहीं बढ़ेगा बल्कि ग्रामीण और कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए तो यह नई मुसीबत बन जाएगी लेकिन सरकार को इस से कोई मतलब नहीं. स्टूडैंट्स का भविष्य बने या न बने, बस, कुछ लोगों की संस्कृत शिक्षक के रूप में सरकारी नौकरी पक्की जरूर हो जाएगी.

भाषा को जबरन थोपना लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या

शिक्षा में जबरन भाषा थोपना लोकतांत्रिक तरीका नहीं है. दक्षिण भारत में हिंदीसंस्कृत थोपने का विरोध पहले से है. यह एक भाषा, एक संस्कृति की दिशा में आरएसएस की सोचीसमझी साजिश का हिस्सा है. शिक्षा राष्ट्र निर्माण का औजार है. अगर इसे पुरानी भाषा, पुरानी जाति और पुरानी सोच के इर्दगिर्द घुमाया गया तो देश फिर से पिछड़ जाएगा. तार्किक और समावेशी शिक्षा चाहिए, जो सब को समान अवसर दे न कि किसी एक परंपरा को सरकारी सपोर्ट के जरिए सभी पर थोपे.

2023 में विदेशी भाषा सैक्टर में 1 लाख से ज्यादा जौब ओपनिंग्स हुईं. फ्रैंच और स्पैनिश में 20-30 फीसदी ग्रोथ रही. वहीं संस्कृत धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों तक सीमित होने के कारण इस का ग्लोबल रोजगार मूल्य जीरो है. हां, संस्कृत को बढ़ावा देने का फायदा यह है कि पंडों को सरकारी नौकरियों में फिट किया जा सकता है. वैसे भी, संस्कृत शिक्षकों की भरती में विशेष समुदायों का ही वर्चस्व है.

एनसीईआरटी और पुराने आंकड़ों के अनुसार स्कूल स्तर पर करीब 5 करोड़ छात्र संस्कृत पढ़ते हैं लेकिन अब तक यह वैकल्पिक था. अब संस्कृत को लगभग अनिवार्य बना देने से यह संख्या बहुत बढ़ेगी. कई सीबीएसई स्कूलों में पहले 97 छात्र फ्रैंच, 68 संस्कृत और 35 जरमन पढ़ रहे थे, अब फ्रैंच/जरमन की जगह संस्कृत बाईडिफौल्ट बन जाएगी. यूपी की भगवा सरकार ने तो 10 नए संस्कृत स्कूल खोलने की घोषणा कर दी है. यूपी में सब से ज्यादा संस्कृत विश्वविद्यालयों को बढ़ावा मिल रहा है. दरअसल, यह सांस्कृतिक पुनरुत्थान के ढोंग के नाम पर शिक्षा के भगवाकरण की दिशा में मजबूत कदम है.

3 भाषाओं में कम से कम एक विदेशी भाषा का विकल्प अनिवार्य रखा जाना चाहिए था. उत्तर भारत में तमिल, तेलुगू, बंगाली का बेहतर विकल्प मौजूद है. इस के बावजूद, सीबीएसई को सिर्फ संस्कृत से मतलब है. ग्लोबल स्तर पर विदेशी भाषा सीखने वाले भारतीय छात्रों का प्रतिशत पहले से कम है. सीबीएसई के इस फैसले से यह आंकड़ा और घटेगा. इस से भारत ग्लोबल कौम्पिटिशन में पीछे रह जाएगा.

जापान जरमनी और चीन जैसी दुनिया की सब से मजबूत अर्थव्यवस्थाएं अपनी भाषा के साथ इंग्लिश और दूसरी मौडर्न भाषाएं सिखाती हैं लेकिन भारत में ग्लोबल भाषाओं को रोक कर संस्कृत जैसी पुरोहितों की भाषा को बढ़ावा दिया जा रहा है. सच तो यह है की संस्कृत रटने से एक विशेष वर्ग को सरकारी नौकरी और स्मृतिआधारित शिक्षा को बढ़ावा तो मिलेगा लेकिन क्रिटिकल थिंकिंग या कम्युनिकेशन स्किल्स की मौत जरूर हो जाएगी. Foreign Languages Removed

Movie Review: पति पत्नी और वो दो

Movie Review: निर्देशक मुदस्सर अजीज की फिल्में सिटकौम जौनर पर बेज्ड होती हैं. इस से पहले वे ‘मेरे हसबैंड की बीवी’, ‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’, ‘दूल्हा मिल गया’ और ‘पति पत्नी और वो’ बना चुके हैं. यह फिल्म इसी फिल्म का स्प्रिचुअल सीक्वल है. अपनी पिछली फिल्मों की तरह ही यह फिल्म भी आईगई जैसी है.

फिल्म में नया कुछ नहीं है. एक शादीशुदा कपल है जिस में पति ऐसी सिचुएशन में फंस जाता है कि गलतफहमियां शुरू हो जाती हैं. गलतफहमियां इतनी बढ़ जाती हैं कि पूरा रायता ही फैल जाता है. फिल्म पूरी ताकत से आप को यकीन दिलाने की कोशिश करती है कि यह सब बेहद मजेदार है मगर इतना मजा आता नहीं है. समस्या सिर्फ इतनी है कि फिल्म जितना खुद पर हंसती है, उतना दर्शक नहीं हंस पाता.

कहानी प्रयागराज के फौरेस्ट औफिसर प्रजापति पांडेय (आयुष्मान खुराना) की है. प्रजापति की पत्नी अपर्णा (वामिका गब्बी) एक पत्रकार है, जो एक बड़े नेता के बेटे (विशाल) की तसवीर छाप देती है. तसवीर में उस के साथ बुर्का पहने एक लड़की चंचल (सारा अली खान) दिखती है. नेता अपनी जातिवादी राजनीति बचाने में लगा है, वह नहीं चाहता कि लड़की की शादी उस के बेटे से हो.

नेता लड़की के पीछे गुंडे लगा देता है. इस डर से लड़की छिपती फिर रही है और प्रजापति चूंकि उस का पुराना दोस्त है तो उस से मदद मांगती है. अब दोनों प्लान बनाते हैं कि वे अगर यह दिखाएं कि वे रिलेशनशिप में हैं तो लड़की पर से नेता का शक खत्म हो जाएगा. इस प्लान के बाद ही समझ आ जाता है कि अब अगले डेढ़ घंटे फिल्म में ऊलजलूल चीजें, झूठ, शक और ओवरऐक्टिंग की दुकान सजने वाली है.

फिल्म में दूसरी ‘वो’ निलोफर खान (रकुल प्रीत) है. जो प्रजापति पांडेय के साथ फौरेस्ट विभाग में काम करती है, और अपर्णा की क्लोज फ्रैंड है. मगर जानेअनजाने वह भी प्रजापति के प्लान का हिस्सा बन जाती है. सिचुएशन ऐसी बन जाती है कि अपर्णा अपने पति पर शक करने लगती है कि उस का निलोफर से भी रिश्ता है.

फिल्म पुराने ‘पति पत्नी और वो’ फौर्मूले को इस बार डबल कन्फ्यूजन के साथ परोसती है. पहले ‘वो’ एक हुआ करती थी, यहां दो हैं. सुनने में यह सेटअप एक मजेदार स्क्रूबौल कौमेडी जैसा लगता है, जो हौलीवुड में 1930-40 में खूब देखा जाता था, लेकिन यहां स्क्रीन पर आतेआते यह इतना थका हुआ और बनावटी हो जाता है कि कई बार लगता है जैसे फिल्म खुद भी अपने झूठों में फंस गई हो.

फिल्म बारबार यह साबित करने में लगी रहती है कि बेचारा पति तो बस परिस्थितियों का शिकार है. उस ने झूठ बोले, रिश्ते उलझाए, हर चीज छिपाई, लेकिन जिम्मेदारी उस की कम और समय की ज्यादा है.

फिल्म के हर सीन में ऐसा लगता है जैसे फिल्म दर्शकों से कह रही हो कि अब वाला सीन मजेदार होने वाला है मगर उसे देख कर हंसी तो क्या, होंठ भी नहीं हिलते. ज्यादातर सिचुएशन इतनी बनावटी हैं कि लगता है कलाकार ने अच्छा बनाने के चक्कर ओवर कर दिया है. ऐसी फिल्मों में अकसर

बैकग्राउंड म्यूजिक रहता तो है मगर इस में बैकग्राउंड म्यूजिक जबरदस्ती ठूंसा गया है. लगभग 2 घंटे वाली यह फिल्म स्पीड में चलती है. आप 2 मिनट भी लौजिक लगा दें तो पूरी कहानी ढह जाए. क्लाइमैक्स तक आतेआते स्क्रीन पर भेड़िया तक घूमने लगता है, जिस की तुक समझ नहीं आती.
वामिका गब्बी यहां सब से ज्यादा रियल लगती हैं.

उन की नाराजगी, शक और गुस्सा कम से कम इंसानों जैसा महसूस होता है. रकुल प्रीत सिंह का काम एनर्जेटिक है, जबकि सारा अली खान सुंदर लगी है. ऐक्टिंग में मजा तिग्मांशु धूलिया देते हैं. उन का सूखा व्यंग्य, इलाहाबादी लहजा नैचुरल लगता है. विजय राज का काम ठीकठाक है, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें ज्यादा मौका नहीं देती. फिल्म प्रयागराज, बनारस और कानपुर में उठकबैठक भी करवाती है पर, लोकेशन खास समझ नहीं आते.

आयुष्मान खुराना अपनी साख बचाने के चक्कर में जरूरत से ज्यादा मेहनत करते दिखाई देते हैं, उन का रोल काफी लाउड है. फिल्म की बड़ी दिक्कत इस के फुजूल गाने हैं. गाने कहानी रोकते हैं, आगे नहीं बढ़ाते. कई जगह तो लगता है कि फिल्म को खुद भी नहीं पता कि उसे रोमांटिक होना है, सटायर बनना है या सिर्फ मसाला कौमेडी. इन सब के बावजूद फिल्म पूरी तरह खराब नहीं है. कुछ हलके पल हैं, कुछ अच्छे कलाकार हैं और कुछ सीन हंसी भी दिलाते हैं. उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों में फिल्माई इस फिल्म की सिनेमेटोग्राफी उसी अनुरूप है. Movie Review

Kartavya Movie Review: कर्तव्य

Kartavya Movie Review: यदि किसी ने ‘पाताललोक’ वैब सीरीज देखी हो तो उसे फिल्म ‘कर्तव्य’ अलग नहीं लगेगी. वही डार्क टेंपलेट, हरियाणवी टोन, जाति पर सवाल और औनरकिलिंग. इन सब के साथ पैरलेल में चलती एक स्टोरी जो किसी गुथी को सुलझा रही हो.

फिल्म की शुरुआत देख कर लगता भी है कि शायद इस बार कोई ऐसा हिंदी थ्रिलर देखने को मिलेगा जो सिर्फ गोलीबारूद नहीं, समाज की सड़ांध पर भी चोट करेगा, लेकिन जैसेजैसे फिल्म आगे बढ़ती है, समझ आने लगता है कि ‘कर्तव्य’ अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंसती दिखाई देती है.
फिल्म की कहानी हरियाणा के जामली नाम के इलाके में सेट है. यहां सैफ अली खान पुलिस अफसर पवन मलिक के किरदार में है, जो अपनी नौकरी ईमानदारी से करना चाहता है. उस की जिंदगी तब उलझ जाती है जब उसे जानीमानी पत्रकार की सुरक्षा का जिम्मा मिलता है जिस में वह असफल साबित होता है. पत्रकार मारी जाती है और उसे उस के कातिलों का पता लगाना होता है.

पड़ताल शुरू होती है तो बच्चों के गायब होने और बाबा आनंद श्री (सौरभ द्विवेदी) से जुड़ी जांच उस के हाथ लगती है. दूसरी तरफ उस के अपने परिवार में उठापटक चल रही है. उस के छोटे भाई दीपक मलिक (सौरभ अबरोल) का दूसरी जाति की लड़की से भाग कर शादी करना गांव में बवाल खड़ा कर देता है.

गांव में खाप बैठती है. फैसला होता है कि दोनों लड़कालड़की को ढूंढ कर मार दिया जाए. वहीं दूसरी तरफ पता चलता है पत्रकार को मारने वाला 14-15 साल का एक किशोर हरपाल (यधुवीर अहलावत) है जो आनंद श्री के इशारे पर यह काम करता है. अब इसी लड़के को पवन को ढूंढना है.
फिल्म में अच्छी बात है कि फिल्म के मेन किरदार पवन को किसी हीरो की तरह नहीं दिखाया गया है, उस की सीमाएं तय कर दी गई हैं. जैसे आनंद श्री के गुंडों से पिट रहा है, वह खाप से अपने भाई को नहीं बचा पाता, वहीँ हरपाल को भी आनंद श्री से नहीं बचा पाता.

फिल्म की कहानी सुनने में दमदार लगती है, पुराने सिस्टम पर प्रहार करती है और शुरू के कुछ हिस्सों में फिल्म पकड़ भी बनाती है लेकिन देखते हुए हलकी लगने लगती है जब फिल्म अपने ही खड़े किए गंभीर मुद्दों को कड़े तरीके से दिखाने से डरने लगती है. ऐसा लगता है जैसे निर्देशक पुलकित ढकछिपा कर चीजें दिखा कर बच निकल जाना चाहता है. कई जगह लगता है कि फिल्म अपने मुद्दों पर चीखना चाहती थी, लेकिन फुसफुसा कर रह जाती है.

सब से बड़ा झटका फिल्म का विलेन आनंद श्री है. इतनी भारीभरकम फिल्म में इतना हलका विलेन पूरी तरह से कास्टिंग डायरैक्टर के खराब सिलैक्शन का नतीजा है. पूरी फिल्म उस के डर का माहौल बनाती रहती है, लेकिन स्क्रीन पर आते ही फुग्गा फूट जाता है. बल्कि, हंसी ज्यादा आती है. वह बाबा कम किसी यूट्यूब पौडकास्ट से उठा कर फिल्म में डाल दिया गया इन्फ्लुएंसर ज्यादा लगता है. उस की डायलौग स्क्रिप्ट रीडिंग ज्यादा लगती है, मंच में जब वह भक्तों को भाषण देता है तो बौडी लैंग्वेज में खूब मात खाता है.

हालांकि सैफ अली खान पूरी फिल्म को टूटने नहीं देते. सैफ यहां चीखनेचिल्लाने वाले हीरो नहीं बने हैं. उन का गुस्सा अंदर दबा हुआ है. वे ऐसे आदमी लगते हैं जो सिस्टम से सालों से लड़तेलड़ते थक चुका है. यही थकान उन के किरदार को वजन देती है. कई कमजोर सीन भी सिर्फ सैफ की वजह से संभल जाते हैं.

संजय मिश्रा ने बढ़िया काम किया है, वह इस फिल्म में धोखेबाज दोस्त बना है. फिल्म में सब से ज्यादा ध्यान युधवीर अहलावत के छोटे लेकिन असरदार रोल ने खींचा है. फिल्म का रनटाइम ज्यादा नहीं है, फिल्म बेवजह खिंचती नहीं दिखी. फिल्म धर्म और कर्म में से चुनने की बात करती है. फिल्म पूछती है कि इंसान का असली कर्तव्य क्या है, परिवार बचाना, सिस्टम का आदेश मानना या सच के लिए खड़ा होना? सवाल अच्छे हैं लेकिन सवाल के जवाब अधूरे रह जाते हैं.

तकनीकी रूप से भी फिल्म पूरी तरह संतुलित नहीं लगती. हरियाणा की धूल, गंदगी और हिंसा वाली दुनिया को कई जगह इतना चमकदार विजुअल ट्रीटमैंट दिया गयाहै कि उस का कच्चापन खत्म हो जाता है. हालांकि, इस के दूसरे पार्ट आने की संभावना है क्योंकि फिल्म अधूरी सी छोड़ दी गई है. अगर इसे थोड़ा और रफ, थोड़ी और बेरहमी या कम सावधानी के साथ कहें, तो ‘कर्तव्य’ नैटफ्लिक्स की अच्छी हिंदी फिल्मों में शामिल हो सकती है.

बात करें, फिल्म के संवाद की तो अच्छे बन पड़े हैं. बैकग्राउंड म्यूजिक सीन के अनुसार ठीकठाक है. सैफ अली खान पुलिस की वरदी में जंचा है. सैफ की पत्नी बनी रसिका दुग्गल के पास कुछ करने को नहीं था. जाकिर हुसैन फिल्म में थ्रिल पैदा करता है. बाकी दुर्गेश, मनीष, सहार्ष जैसे कलाकारों ने फिल्म को संतुलित बनाया है. फिल्म में बेवजह गाने नहीं ठूंसे गए हैं. ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली सिनेमेटोग्राफी और लोकेशंस ठीक हैं. Kartavya Movie Review

 

 

Romantic Film: चांद मेरा दिल

Romantic Film: निर्देशक विवेक सोनी की यह फिल्म एक मैच्योर लव स्टोरी बनने की कोशिश थी जिस में अर्ली एज में प्रैग्नैंसी, कैरियर, जिम्मेदारियां, टूटते रिश्ते, मैंटल प्रैशर सब है. समस्या सिर्फ इतनी है कि फिल्म इन सब मुद्दों को समझने से ज्यादा इन्हें इंस्टाग्राम रील की तरह सजाने में लगी हुई है.

फिल्म की कहानी आरव (लक्ष्य) और चांदनी (अनन्या पांडे) की है. दोनों हैदराबाद के इंजीनियरिंग कालेज में मिलते हैं. चांदनी कालेज की टौपर है, वह क्लासिकल डांस भी करती है और स्पोर्ट्स में भी आगे है. वहीं आरव भी पढ़ाई में टौपर है. वह शर्मीला है मगर कबीर सिंह की तरह दिन में एक पैकेट सिगरेट फूंक जाता है, टैंशन में रहता है तो रिजर्व में रखी 3 और फूंक डालता है.

आरव चांदनी को इंप्रैस करने के लिए उस के साथ कपड़ों की ट्यूनिंग करना शुरू करता है. चांदनी को उस का ऐसे प्यार का इजहार करना पसंद आता है. दोनों में प्यार हो जाता है.

एक दिन पता चलता है कि चांदनी प्रैग्नैंट हो गई है. उम्र छोटी है तो दोनों बच्चा अबौर्ट कराने का फैसला करते हैं, मगर एकाएक अस्पताल में चांदनी की ममता जाग जाती है और वह अबौर्शन के लिए मना कर देती है. दोनों फैसला कर लेते हैं कि वे पढ़ाई के साथ बच्चा भी पाल लेंगे.

वे फैमिली को अपनी सिचुएशन बताते हैं मगर परिवार वाले दोनों को सपोर्ट नहीं करते. यहीं से असल जिंदगी की समस्याएं शुरू हो जाती हैं. अब उन के पास अपनी पढ़ाई, बच्ची की जिम्मेदारी, खर्चा चलाने और फिर कैरियर में आगे बढ़ने के चैलेंजेस खड़े हो जाते हैं.

कच्ची उम्र में बढ़ी ये जिम्मेदारियां वे हैंडल नहीं कर पाते और एक दिन गरमागरमी में आरव का हाथ चांदनी पर उठ जाता है. यहां से आरव के पछतावे और चांदनी के अलगाव का दौर शुरू होता है, लेकिन यह दौर इतना उबाऊ और रिपीटिटिव होता है कि कोफ्त होने लगती है.

हर सीन ऐसा लगता है जैसे उसे जरूरत से ज्यादा देर तक खींचा गया हो ताकि बैकग्राउंड में कोई सैड सौंग बज सके और कैमरा इन दोनों में से किसी के चेहरे पर 20 सैकंड तक रुक सके. हद यह कि थिएटर में बैठा जेनजी, जो आमतौर पर 3-4 घंटे की वैब सीरीज एक रात में खत्म कर देता है, वह यहां उबासियां लेते दिखता है.

फिल्म का हीरो ज्यादातर टाइम दुखी या रोती शक्ल बनाए घूमता है. उस की इंटैंस आंखें बोलती तो हैं पर बहुत ज्यादा दोहराव उस के असर को खत्म कर देता है. अनन्या पांडे कुछ जगह ठीक लगती है, उस के बचपन का ट्रैजिक पास्ट दिखाया गया है जिस चलते उस का स्ट्रौंग और बोल्ड डिसीजन लेने वाला इंडिपेंडैंट किरदार है.

फिल्म तकनीकी रूप से बहुत लंबी नहीं है, लेकिन इमोशनल सीन जबरदस्ती और उन्हें ज्यादा गहरा करने की कोशिश में निर्देशन फिल्म को उबाऊ बना देता है.

हालांकि, फिल्म में हैदराबाद जरूर खूबसूरत दिखता है. चौड़ी सड़कें, कालेज कैंपस, बारिश, कैफे आदि सबकुछ चमकता रहता है. फिल्म में संगीत कमजोर पक्ष है, यह कहानी को बचाने के बजाय उसे और भारी बना देता है. थीम सौंग ‘चांद मेरा दिल…’ हर कुछ देरी में बजता रहता है. ऐसा लगता है जैसे फिल्म जबरदस्ती महसूस करवाना चाहती है कि यह सीन बहुत दर्दनाक है. इस से फिल्म कमजोर पड़ती है.

‘चांद मेरा दिल…’ की सब से बड़ी विडंबना यह है कि इस में अच्छे विषय हैं, मौडर्न रिलेशनशिप की घुटन, जल्दी बड़े हो जाने का डर, पैरेंटहुड का प्रैशर, कैरियर, मगर इतने विषयों को निर्देशक समेटने में असमर्थ दिखाई पड़ा है. एक और बड़ी समस्या है कि फिल्म में साइड कैरेक्टर को बिलकुल स्पेस नहीं दिया है, जैसे आरव के दोस्त जो कि फनी कैरेक्टर हैं और माहौल को खुशनुमा बनाते हैं, उन्हें एकदो पंच मारने लायक जगह दी गई है.

इसके अलावा दोनों मुख्य किरदारों के परिवार वाले तो कैमियो जैसे लगे. फिल्म पूरी तरह से 2 किरदारों पर केंद्रित है. अगर साइड किरदारों को थोड़ा और स्पेस मिलता तो फिल्म दिलचस्प हो सकती थी. Romantic Film

 

 

राजस्थान में 60 लाख रुपए में बेचा गया था कृषि विज्ञान का पेपर

Rajasthan Paper Leak: विश्वगुरु बनने का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार में पेपर लीक होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. बीजेपी के शासन में पेपर लीक कोई नहीं बात तो नहीं है. मध्यप्रदेश में ही नहीं, व्यापमं जैसा खेल तो बीजेपी द्वारा शासित हर राज्य में चलता है. राजस्थान में हाल की घटना बेहद चिंताजनक है. यह बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है. लेकिन बच्चों का भविष्य बरबाद हो, इस से भगवा सरकार को क्या फर्क पड़ता है?

राजस्थान में एक बार फिर पेपर लीक का बड़ा घोटाला सामने आया है. कृषि विज्ञान विषय की भरती परीक्षा-2022 का पेपर मात्र 60 लाख रुपए में बिक गया. इस मामले में एसओजी ने पूर्व आरपीएससी सदस्य बाबूलाल कटारा समेत 4 लोगों को गिरफ्तार किया है. इस खबर के बाद यह बात तो तय है कि जो युवा रातदिन मेहनत करते हैं, सपने देखते हैं कि नौकरी लग जाएगी उन का भविष्य ऐसे लोगों के हाथों ही बिक रहा है.

सरकार विश्वगुरु बनने का ढिंढोरा पीटती रहती है, लेकिन अपने ही राज्य में परीक्षाओं की हालत इतनी खस्ता है कि आरपीएससी जैसे महत्त्वपूर्ण आयोग के पेपर चोरी हो जाते हैं और उन्हें 60 लाख रुपए में बेचा जाता है. यह कोई छोटी घटना नहीं है. यह पूरी व्यवस्था की नाकामी का सुबूत है.

बीजेपी के शासन में पेपर लीक कोई नई बात नहीं है. मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले में तो सैकड़ों युवाओं की जान चली गई थी. राजस्थान में भी लगातार ऐसी घटनाएं घट रही हैं. सरकार दावा करती है कि उस ने पेपर लीक बंद कर दी. लेकिन, हकीकत इस के उलट है. 60 लाख रुपए में पेपर बिक जा रहे हैं. इस का मतलब माफिया अभी भी सक्रिय हैं. सिस्टम में बैठे लोगों की मदद के बिना यह कैसे संभव है?

जिस परीक्षा का पेपर पहले से लीक हो जाए उस में मेहनत करने वाले ईमानदार छात्रों का क्या होगा? उन के सपने चूरचूर हो जाते हैं. अमीर लोग पैसे दे कर नौकरी हथिया लेते हैं जबकि गरीब का बच्चा निराश हो कर रह जाता है. इस से समाज का सिस्टम से भरोसा टूटता है.

पेपर लीक होने से सिर्फ एक परीक्षा भ्रष्ट नहीं होती बल्कि इस से मेहनती स्टूडैंट्स का भविष्य बरबाद होता है. हजारों छात्र सालभर तैयारी करते हैं, कोचिंग फीस भरते हैं, रातों की नींद हराम करते हैं और आखिर में पता चलता है कि पेपर पहले ही बिक चुका था. इस से उन का आत्मविश्वास टूट जाता है. कई युवा हताश हो कर आत्महत्या तक कर लेते हैं या गलत रास्ते पर चले जाते हैं. सरकार को समझना चाहिए कि शिक्षा और नौकरी का सिस्टम अगर भ्रष्ट हो गया तो देश का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब हर युवा को निष्पक्ष मौका मिले. Rajasthan Paper Leak

साथ हो कर भी अलग, आवरण में ढके टूटे रिश्ते

Broken Relationships: पिछले एकदो दशकों में खासकर शहरी और उच्च वर्ग में एक नया और जटिल सामाजिक परिघटन उभर कर सामने आया है- ‘साथ रहते हुए भी अलग’ का चलन. यह स्थिति तलाक से अलग है और साथ रहने से भी अलग. पतिपत्नी कानूनी रूप से विवाहित रहते हैं लेकिन भावनात्मक, मानसिक और कई बार भौतिक रूप से अलगअलग जीवन जीने लगते हैं.

शक्ति सिंह और नंदिनी शाह दोनों सरकारी अधिकारी हैं. 20 साल पहले दोनों ने लवमैरिज की थी. इस कपल के 2 बच्चे हैं. 12 साल का बेटा पियूष और 18 साल की बेटी गार्गी. शक्ति सिंह की मां जीवित हैं. 5 लोगों का परिवार है मगर ये पांचों जन साथ नहीं रहते हैं.

शादी के 4-5 साल तक तो शक्ति सिंह और नंदिनी शाह ने एकदूसरे का खूब साथ निभाया. नौकरी से छुट्टियां लेले कर देशदुनिया घूमे. दोनों को देख कर ऐसा लगता था कि इन से ज्यादा मोहब्बत तो कोई कर ही नहीं सकता. मगर धीरेधीरे दोनों में दूरियां बढ़ने लगीं. शक्ति सिंह का नैचर कुछ गरम था. वे स्त्री पर पुरुष वाला दंभ रखना चाहते थे. घर के किसी भी फैसले में उन की ही सुनी जाए, ऐसी इच्छा रखते थे और सब से बड़ी बात यह कि वे चाहते थे कि नंदिनी दफ्तर में भले अपनी अफसरी झाड़े मगर घर में वह बिलकुल अम्मा जी की गाय बन कर रहे. यानी, शक्ति सिंह की मां जैसा कहें वैसा ही वह करे. जबकि, नंदिनी शाह जो पति के बराबर ही पढ़ीलिखी और उन के बराबर के ओहदे पर तैनात थीं, इस तरह का व्यवहार न तो झेलने के लिए तैयार थीं और न करने के लिए.

नंदिनी कहती हैं, ”शादी के तुरंत बाद की बात और थी. हमारी लवमैरिज थी. शक्ति के परिवार में मैं एडजस्ट होना चाहती थी. तब इन के बाबूजी भी जिंदा थे. काफी समय तक मैं ने बहुतकुछ सहन किया. सासससुर का बहुत लिहाज किया. सेवा भी की. उन की न मानने योग्य बातें भी सिर झुका कर मानीं. मगर मेरी भी अपनी पर्सनैलिटी है, सोच है, इच्छाएं हैं, पदप्रतिष्ठा है, जिम्मेदारियां हैं. ऐसे में अगर अम्मा जी चाहें कि मैं सुबह उठ कर उन के साथ पूजा में बैठूं, उन के कहे मुताबिक व्रत और त्योहार करूं, बच्चों को उन के मुताबिक पालूं, किचन में क्या बने यह वे बताएं, उन से पूछ कर कहीं आऊंजाऊं तो वह सब मुझ से नहीं हुआ.”

अम्मा जी अपने बेटे शक्ति से नंदिनी की शिकायत करतीं तो नंदिनी को बुरा लगता था. बच्चों पर शक्ति सिंह का गुस्सा और शक्ति प्रदर्शन भी उन को आहत करता था. और भी कई घरेलू वजहें थीं कि शक्ति और नंदिनी के बीच लड़ाईझगड़ा रोज की बात हो गई. आखिरकार नंदिनी ने दूसरे शहर में पोस्टिंग ले ली. बच्चों को अपने साथ ले गईं.

पिछले 10 वर्षों से शक्ति सिंह और नंदिनी अलगअलग जगहों पर काम कर रहे हैं. दोनों को सरकारी आवास मिला हुआ है. अम्मा जी अपने बेटे शक्ति के साथ रहती हैं. नंदिनी कभी तीजत्योहार पर ही उन के घर आती है. वह भी बस एक दिन के लिए. शक्ति से बातचीत न के बराबर है. बच्चे अपने पिता और दादी से मिल कर खुश हो जाते हैं. यानी रिश्तेदारों और समाज के लिए वह एक परिवार है, मगर अंदरूनी तौर पर रिश्तों में खामोश दरारें हैं. साथ दिखते हुए भी वे अलग हैं. यह विवाहित जीवन का नया शहरी चलन है जो तेजी से उच्च वर्ग में पैर पसार रहा है.

यह चलन बौलीवुड में काफी पहले से था. 90 के दशक की बेहद खूबसूरत और मशहूर अभिनेत्री राखी और प्रसिद्ध गीतकार और फिल्मकार संपूर्ण सिंह कालरा उर्फ गुलजार का रिश्ता किसी से छिपा नहीं है. दोनों ने 1973 में शादी की थी. शादी के लगभग एक साल के अंदर ही उन के रिश्ते में दरार आ गई और वे अलग हो गए. इस के बावजूद, उन्होंने कभी कानूनी तौर पर तलाक नहीं लिया. वे कई दशकों से अलगअलग रह रहे हैं. उन का रिश्ता एक तरह का ‘रिस्पैक्ट सेप्रेशन’ यानी सम्मानजनक अलगाव का है. दोनों अलग रहते हुए एकदूसरे के प्रति एक शांतिपूर्ण सम्मान बनाए हुए हैं. कानूनी रूप से वे अब भी पतिपत्नी हैं. मगर दोनों के बीच भावनात्मक लगाव नहीं है. हां, उन की बेटी मेघना गुलजार दोनों से जुड़ी रहती हैं.

बौलीवुड में इस तरह का जीवन जीने वाले कई कपल हैं. कई चर्चित जोड़े वर्षों तक अलग रहने के बावजूद कानूनी रूप से शादीशुदा रहे हैं या लंबे समय तक रिश्तों को खींचते रहे. जावेद अख्तर और हनी ईरानी का विवाह खत्म हुआ मगर रिश्ता पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. दोनों ने अपने बच्चों फरहान अख्तर और जोया अख्तर की परवरिश में सहयोग किया. आज भी दोनों के बीच कोई कटुता नहीं है.

ऋतिक रोशन और सुजैन का रिश्ता लंबे समय तक खिंचा और आखिरकार तलाक में बदला, लेकिन अलग रहने का दौर काफी लंबा रहा. आज भी कई मौकों पर दोनों अपने बच्चों के साथ इकट्ठा दिख जाते हैं. सैफ अली खान और अमृता सिंह के बीच भी लंबे समय तक मतभेद रहे, जिन का अंत अलगाव में हुआ. कई ऐसे भी उदाहरण हैं जहां कपल औपचारिक रूप से अलग नहीं होते, लेकिन निजी जीवन में दूरी बना लेते हैं, हालांकि वे सार्वजनिक रूप से कम चर्चा में आते हैं.

बौलीवुड, जो अकसर समाज का ट्रैंडसैटर माना जाता है, से शुरू हुआ यह व्यवहार अब शहरी उच्च वर्ग में भी दिखाई देने लगा है. भारतीय समाज में जहां वैदिक काल से विवाह को एक अटूट बंधन माना गया है, पति को परमेश्वर बता कर पत्नी को उस की सेविका के रूप में दर्शाया गया है, उस समाज में वैवाहिक जीवन में चुपचाप पैर पसारता अलगाववाद धीरेधीरे ऊपर से नीचे की ओर बढ़ रहा है.

पिछले एकदो दशकों में खासकर शहरी और उच्च वर्ग में एक नया और जटिल सामाजिक परिघटन उभर कर सामने आया है- ‘साथ रहते हुए भी अलग’ का चलन. यह स्थिति तलाक से अलग है, और साथ रहने से भी अलग. पतिपत्नी कानूनी रूप से विवाहित रहते हैं, लेकिन भावनात्मक, मानसिक और कई बार भौतिक रूप से अलगअलग जीवन जीने लगते हैं. कुछ साथ रहते हुए भी गहरी चुप्पी इख़्तियार कर लेते हैं, अलगअलग कमरों में सोने लगते हैं. यह बदलाव अचानक नहीं आया है. इस के पीछे सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों का एक जटिल तानाबाना है.

बदलते रिश्तों की वजह

पहले विवाह को निभाने की जिम्मेदारी अधिकतर महिलाओं पर होती थी. पुरुष आर्थिक रूप से सक्षम होता था और स्त्री सामाजिक दबावों व पुरुष पर आर्थिक रूप से आश्रित होने की वजह से हर तरह का समझौता करती थी. ब्याही गई बेटी से मांबाप कहते थे- ‘अब वही तेरा घर है. वहीं से तेरी अर्थी उठेगी.’ मतलब यह कि जिस घर में ब्याह दिया है वही लोग अब लड़की का आर्थिक बोझ उठाएंगे और उस के बदले में लड़की को चुप रह कर हर जुल्म बरदाश्त करना होगा. सदियों तक औरतों ने यही किया. आज भी कर रही हैं. मगर अब पढ़ीलिखी और नौकरीपेशा औरतों की संख्या बढ़ रही है. शिक्षित, आत्मनिर्भर महिला जहां अपने आत्मसम्मान और मानसिक शांति को प्राथमिकता देती हैं, वहीं अपने उत्पीड़न के खिलाफ मुखर भी हैं.

उधर, पुरुष आज भी अपनी पारंपरिक भूमिकाओं और आधुनिक अपेक्षाओं के बीच उलझा हुआ है. अभी भी वह खुद को पतिपरमेश्वर ही मान कर चल रहा है. उसे पत्नी की तनख्वाह का भी लालच है और वह पत्नी को आजाद भी नहीं देखना चाहता है. नतीजा यह कि शादी के 10-12 वर्षों के भीतर, जब प्रारंभिक आकर्षण और उत्साह कम हो जाता है, असली व्यक्तित्व और मतभेद सामने आने लगते हैं. इस के साथ ही कैरियर का दबाव, बच्चों की जिम्मेदारी, समय की कमी और संवादहीनता, ये सब मिल कर रिश्ते में दरारें पैदा कर देते हैं.

तलाक क्यों नहीं

यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि रिश्ते में संतोष नहीं है, तो लोग तलाक क्यों नहीं ले लेते? तलाक न ले कर अलगअलग रहने का औप्शन क्यों कैरी करते हैं? इस की कई वजहें हैं-

कानूनी जटिलताएं : भारत में तलाक की प्रक्रिया अभी भी एक लंबी और बेहद थकाऊ है. अदालतों के चक्कर, तारीख पर तारीख और मानसिक तनाव के अलावा वकील की लंबीचौड़ी फीस लोगों को तलाक से पीछे हटने पर मजबूर करती है. कोर्ट भी तलाक का फैसला देने से पहले पूरी कोशिश करती है कि परिवार बना रहे. इसलिए कई बार मामले को काउंसलिंग में भेज दिया जाता है. फिर भरणपोषण, बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी, संपत्ति में हिस्सेदारी जैसी कई अन्य समस्याओं का समाधान निकलने में लंबा समय लगता है. इन प्रक्रियाओं के चलते तलाक मिलने में 2 साल से ले कर 10 साल तक लग जाते हैं.

आर्थिक पहलू : तलाक के केस में औरतें पुरुषों पर कई तरह के झूठे आरोप लगाती हैं ताकि अदालत उस आधार पर तलाक को जल्दी मंजूर कर ले. इस से पुरुष की सामाजिक छवि बहुत खराब हो जाती है. कई मामलों में तो गंभीर आरोप लगने की वजह से पुरुषों को नौकरी तक से हाथ धोना पड़ा है. इस के अलावा पुरुषों को अकसर एलिमनी यानी स्त्री को भरणपोषण का पैसा देने का डर सताता है. पति की नेट इनकम का 30-40 फीसदी इस में जा सकता है. ऐसे में वह सोचता है कि अलग रहना तलाक लेने से कहीं बेहतर है.

महिलाएं आर्थिक असुरक्षा और बच्चों के भविष्य को ले कर चिंतित रहती हैं. अगर पति उन को अलग रख कर उन का खर्चापानी देता रहे तो यह चिंता भी खत्म हो जाती है. ऐसी स्थिति में पति बच्चों के संपर्क में भी रहता है. फिर जो स्त्रियां नौकरी करती हैं, वे तो अपने लिए पति से कोई पैसा भी नहीं चाहती हैं. वे, बस, सुकून से जीवन जीना चाहती हैं जैसे नंदिनी शाह चाहती हैं.

सामाजिक दबाव : आज भी ‘तलाकशुदा’ शब्द समाज में एक धब्बे की तरह देखा जाता है, खासकर महिलाओं के लिए. परिवार, रिश्तेदार और सामाजिक सर्कल में फुसफुसाहटें और जजमैंट तलाक लेने के फैसले को कठिन बना देता है.

न तू मेरा न पराया वाला रिश्ता

40-50 साल की आयु आतेआते स्त्री और पुरुष दोनों की सैक्स भूख लगभग खत्म सी हो जाती हैं. इस उम्र में वे शांति और सुकून ज्यादा चाहते हैं. ऐसे में यदि एकदूसरे की शक्ल अब अच्छी नहीं लगती या मनभेद और मतभेद अधिक उभर गए हैं, तो इस स्थिति में कई कपल बीच का रास्ता चुन लेते हैं. वे कानूनी रूप से विवाहित रहते हैं लेकिन अलगअलग कमरों या घरों में रहते हैं. कुछ पतिपत्नी एक ही घर में रहते हुए भी अलग कमरे में सोते हैं. कुछ अलगअलग शहरों या घरों में रहना पसंद करते हैं. कई मामलों में वे सामाजिक आयोजनों में साथ दिखाई देते हैं लेकिन निजी जीवन में पूरी तरह अलग होते हैं. यह व्यवस्था उन्हें रोजमर्रा के झगड़ों से राहत देती है और एक तरह की ‘व्यवस्थित दूरी’ बना देती है.

बच्चों पर बुरा असर

सच यह है कि यह अलगाववादी व्यवस्था एक कंप्रोमाइज मौडल है- न पूरी तरह अलग, न पूरी तरह साथ. यह उन लोगों के लिए एक अस्थायी राहत हो सकती है जो तलाक के कानूनी, सामाजिक और आर्थिक परिणामों से बचना चाहते हैं. मगर लंबे समय तक इस स्थिति का गहरा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है. वे ऐसे माहौल में बड़े हो रहे होते हैं जहां मातापिता दुनिया को दिखाने के लिए साथ हैं, मगर असलियत में साथ नहीं हैं. ऐसे बच्चे भावनात्मक रूप से बेहद असुरक्षित होते हैं. रिश्तों को ले कर उन का दृष्टिकोण बहुत भ्रमित सा रहता है.

बच्चे स्वभावतया संवेदनशील होते हैं. वे शब्दों से अधिक भावनाओं को पढ़ते हैं. मातापिता के बीच का तनाव, संवादहीनता, ठंडापन या छिपी हुई कड़वाहट, इन सब बातों को वे आसानी से महसूस कर लेते हैं, भले ही उन से कुछ कहा न जाए. जब मातापिता दुनिया के सामने एक आदर्श परिवार का दिखावा करते हैं, लेकिन घर के भीतर संबंध खोखले होते हैं, तो बच्चे एक गहरे द्वंद्व में फंस जाते हैं.

ऐसे में आगे आने वाले समय में वे किसी पर भरोसा नहीं कर पाते यहां तक कि वे अपने जीवनसाथी के साथ भी अच्छे से कनैक्ट नहीं हो पाते हैं. उन के लिए सभी रिश्ते बड़े उथलेउथले से होते हैं. कई बार बच्चे मांबाप के अलगाव के लिए खुद को दोषी समझने लगते हैं. उन्हें लगता है कि शायद उन की किसी गलती या कमी के कारण घर का माहौल बिगड़ा है. वे ग्लानि और हीनभावना से ग्रस्त हो जाते हैं, जो उन के आत्मविश्वास और व्यक्तित्व विकास पर गहरा असर डालता है.

यह समझना जरूरी है कि बच्चे सिर्फ भौतिक सुविधाओं से नहीं, बल्कि स्वस्थ भावनात्मक वातावरण से विकसित होते हैं. मातापिता का साथ होना तभी सार्थक है जब उस में सच्चाई, सम्मान और संवाद हो. केवल सामाजिक छवि बनाए रखने के लिए एक टूटे हुए रिश्ते को ढोना, दरअसल बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है.

समाधान आसान नहीं है, लेकिन स्पष्ट है कि या तो रिश्ते को ईमानदारी से सुधारने की कोशिश की जाए, या फिर सम्मानजनक और स्पष्ट अलगाव का रास्ता अपनाया जाए. आधेअधूरे रिश्ते बच्चों को पूरा नहीं बना सकते. बच्चों को एक ‘परफैक्ट परिवार’ नहीं, बल्कि एक ‘सच्चा और स्वस्थ माहौल’ चाहिए होता है, जहां रिश्ते दिखावे के नहीं, बल्कि विश्वास और भावनात्मक सच्चाई पर टिके हों.

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