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सोशल मीडिया रील्स बदल रहीं लड़कियों का फैशन

Girls Fashion Trends: सोनम सिंह इंस्ट्राग्राम पर रील बनाती है. 2 लाख 60 हजार इस के फौलोअर हैं. म्यूजिक, गरबा डांस और गाना गाने इस को पंसद है. अपने इंस्ट्राग्राम पर परिचय में उस ने लिखा है कि वह अपने मम्मीपापा को बहुत प्यार करती है. आइसक्रीम खाना उसे पसंद है. दोस्त प्यार से उसे पगली बुलाते हैं. यह अपने गानों पर नहीं दूसरों के गानों पर रील बनाती है. हर रील में नई ड्रैस पहनना संभव नहीं होता, इसलिए वह ड्रैस के साथ अलगअलग स्टाइल में कभी अपनी नाभि का प्रदर्शन करती है तो कभी अपनी ब्रा की स्ट्रैप्स झलकाती है.

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर की रहने वाली रानी यादव के इंस्ट्राग्राम पर 73 हजार से अधिक फौलोअर हैं. वह अपने को इन्फ्लुएंसर बताती है. वह पेड प्रमोशन और ब्रैंड कोलैबोरेशन के लिए पैसे लेती है. यह अपनी रील्स गाने पर बनाती है. ड्रैस के रूप में साड़ीब्लाउज ही पसंद करती है. इन को वह तरहतरह से पहनती है ताकि देखने वालों को वीडियोज में नयापन दिख सके, वीडियो वायरल हो सके.

26 हजार फौलोअर्स वाली अवनी रील्स बनाते समय वैस्टर्न ड्रैस का प्रयोग करती है. हर वीडियो में नयापन दिखाना चुनौती होती है. पहले तो बारबार नए कंटैट सोचने होते हैं. इस के बाद लोकेशन और ड्रैस का प्रबंध करना होता है. अवनी को काले रंग की ड्रैस पहनना पंसद है. कभीकभी वह सफेद और प्रिटेंड ड्रैस भी पहन लेती है.

20 लाख से अधिक फौलोअर्स वाली राखी कुमारी पांडेय कलाकार है. उस की रील्स में दिखता भी है कि वह किस तरह से अपने डांस से देखने वाले को रिझाती है. भोजपुरी हीरो पवन सिंह और खेसारी लाल यादव के साथ स्टेज पर डांस के उस के वीडियो बहुत पसंद किए गए हैं.

78 हजार फौलोअर्स वाली प्रिया भदौरिया इंडियन ब्यूटी मौडर्न ग्रेस की स्टाइल को फौलो करती है. साड़ी के साथ मौडर्न वैस्टर्न ड्रैस में रील बनाती है.

3 लाख 74 हजार फौलोअर्स वाली रेनू कश्यप पहले बाबासाहब के सामाजिक संदेशों पर बने गानों पर ही डांस करती थी. उस समय वह साड़ी पहनती थी. साड़ी पर स्पोटर्स शूज पहनती थी. उस के गाने ज्यादातर अंबेडकर पार्क में ही शूट होते थे. धीरेधीरे उन में बदलाव आया और अब उस के वीडियो अच्छे बन रहे हैं. अब वह मेकअप और साड़ी के साथ ही साथ वीडियो की अच्छी एडिटिंग पर ध्यान दे रही है. उस की ड्रैस भी अच्छी हो गई है और वह नईनई भी रहती है.

3 लाख 57 हजार फौलोअर्स वाली सोना सिंह भोजपुरी कलाकार है. इस की रील्स में टाइट फिटिंग वाली लेगीज के साथ टीशर्ट का प्रयोग दिखता है. यह साड़ी और दूसरी ड्रैस के मुकाबले सस्ती पड़ती है.

सोशल मीडिया पर रील्स बनाने वाली लड़कियों की बात करें या इन्फ्लुएंसर्स की, उन के लिए फैशन का मतलब कंफर्ट, एक्सप्रैशन और एक्सपैरिमैंट है. लड़कियां ऐसे लुक चाहती हैं जो आरामदायक भी हो और अलग पहचान भी बनाए. यह सस्ता भी हो जिस से बारबार नईनई ड्रैस दिखाई जा सके. यह लड़कियां फैशन को सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं मानतीं, बल्कि इसे अपनी पहचान और आत्मविश्वास का हिस्सा मानती हैं.
इंस्टाग्राम, रील्स और फैशन इन्फ्लुएंसर्स की वजह से फैशन पहले से ज्यादा तेजी से बदल रहा है. कालेज कैंपस, कैफे और सोशल मीडिया पर कुछ खास स्टाइल बारबार देखने को मिलते हैं, जिन्हें लड़कियां सब से ज्यादा पसंद कर रही हैं. यह पीढ़ी फैशन के नियमों को तोड़ने जैसा काम कर रही है. इन की रील्स में कभी ओवरसाइज कपड़े, कभी विंटेज लुक, कभी स्ट्रीट स्टाइल और कभी बोल्ड लुक दिखता है. इन का टारगेट केवल यह रहता है कि अलग पहचान बन सके.

रील्स ने बदला फैशन ट्रैंड

ओवरसाइज्ड कपड़े सब से बड़ा ट्रैंड बन चुके हैं. लड़कियां आजकल ढीलीढाली टीशर्ट, बैगी जींस, हूडी और स्नीकर्स के साथ स्ट्रीट स्टाइल लुक बनाती हैं. इस का सब से बड़ा कारण कंफर्ट है. साथ ही, यह स्टाइल सोशल मीडिया पर भी काफी कूल दिखता है. इस की केयर भी बहुत नहीं करनी पड़ती है. बौडी की फिटनैस से भी इस का कोई मतलब नहीं होता है. सोशल मीडिया की रील्स से आगे निकल कर यह फैशन घर और औफिस तक पहुंच गया है.

इस के अलावा पहले मशहूर हुआ पौप कल्चर दोबारा ट्रैंड में है. लड़कियां क्रौप टौप, मिनी स्कर्ट, लो राइज जींस और रंगीन एक्सेसरीज का खूब प्रयोग कर रही हैं. रील्स बनाते समय हर बार फुल मेकअप और स्टाइल करना संभव नहीं होता, ऐसे में ये लड़किया कई बार सिंपल एलिगेंट लुक पसंद करती हैं जिसे क्लीन गर्ल एस्थेटिक कहा जाता है. इस स्टाइल में न्यूट्रल कलर, हलका मेकअप, सिंपल ज्वैलरी का इस्तेमाल किया जाता है. यह स्टाइल खासतौर पर इंस्टाग्राम पर तेजी से वायरल हुआ है.

लड़कियां पुराने कपड़ों को नए तरीके से पहन कर भी रील्स बना रही हैं. इस को पंसद भी किया जा रहा है. इन में पुराने कार्डिगन, साड़ी, सलवार सूट, विंटेज डैनिम और जैकेट प्रमुख होते हैं. इस के जरिए रील्स में सस्टेनेबल फैशन को बढ़ावा मिल रहा है. समाज में वैस्टर्न ड्रैस की आलोचना भी होती है. सोशल मीडिया पर उस को ले कर अलगअलग तरह के कमैंट भी होते हैं. इस से बचने के लिए इंडोफ्यूजन यानी देसी और मौडर्न ड्रैसेस का प्रयोग बढ़ रहा है. इन में साड़ी के साथ स्नीकर्स, कुरती के साथ डैनिम, एथनिक टौप के साथ स्कर्ट खास होते हैं. सोशल मीडिया बनने वाली रील्स ने फैशन को किसी एक स्टाइल तक सीमित नहीं रखा है. वे अलगअलग एस्थेटिक्स को मिला कर नया लुक बनाते हैं.

अब लड़कियों का फैशन सिर्फ ट्रैंड फौलो करना नहीं है, बल्कि वे खुद को एक्सप्रैस करना चाहती हैं. यही कारण है कि इन के फैशन में ओवरसाइज स्ट्रीट स्टाइल से ले कर इंडो फ्यूजन तक सबकुछ साथसाथ देखने को मिलता है. साड़ियों के साथ स्टाइलिश और बोल्ड ब्लाउज डिजाइन भी रील्स पर बहुत वायरल हो रहे हैं, जो ट्रेडिशनल लुक को मौडर्न टच देते हैं.

इंस्टाग्राम की रील्स से कैसे होती है कमाई

इंस्टाग्राम पर रील बनाने वाली हर लड़की की चाहत यही होती है कि उस को पैसे मिलें. जिन को पैसा मिलता है उन का कंटैंट बदलने लगता है और अच्छा दिखने लगता है. भारत में इंस्टाग्राम व्यूज के बदले सीधे पैसे नहीं देता. यानी, अगर आप की रील पर 10 हजार व्यूज आ गए हैं तो इस का मतलब यह नहीं कि आप के अकाउंट में अपनेआप पैसे आ जाएंगे. इंस्टाग्राम की कमाई पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि आप अपने कंटैंट को किस तरह से मोनेटाइज कर रहे हैं. इंस्टाग्राम पर ज्यादातर क्रिएटर्स की असली कमाई ब्रैंड डील और प्रमोशन से होती है.

अगर आप की रील पर 10 हजार व्यूज आते हैं और आप की औडियंस ऐक्टिव और भरोसेमंद है, तो ब्रैंड आप को प्रमोशनल पोस्ट या प्रमोशन के लिए पैसे औफर कर सकते हैं. आमतौर पर 10 हजार व्यूज वाले छोटे क्रिएटर को 500 रुपए से ले कर 2,000 रुपए तक मिल सकते हैं. इंस्टाग्राम पर कमाई का दूसरा तरीका एफिलिएट मार्केटिंग है. इस में क्रिएटर किसी प्रोड़क्ट या सर्विस का लिंक अपनी रील, स्टोरी या बायो में शेयर करता है. हर सेल पर कमीशन मिलता है.

इस के लिए ही छोटे गांव से ले कर बड़ेबड़े शहरों की लड़कियां अंधीदौड़ का हिस्सा बन रही हैं. हकीकत में यह हुनर नहीं है. इस को स्थाई रोजगार नहीं माना जा सकता. सोशल मीडिया की चमक पानी के बुलबुले जैसी होती है. सभी फौलोअर्स रील को देखें, यह संभव नहीं होता. ऐसे में पैसा नहीं मिलता. आंकड़ों के हिसाब से समझें तो केवल 8-10 फीसदी कंटैंट क्रिएटर ही पैसा कमाते हैं. बाकी बचे 90 फीसदी क्रिएटर केवल कमाई की आस में अंधीदौड़ का हिस्सा बने रहते हैं. Girls Fashion Trends

एनटीए का युवाओं के सपनों के साथ निरंतर खिलवाड़

NEET Paper Leak 2026: फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में इंपीरियल कालेज औफ इंजीनियरिंग के प्रिसिंपल वीरू सहस्त्रबुद्धे यानी वायरस का मशहूर डायलौग था ‘लाइफ इज ए रेस…’ यानी जिंदगी एक रेस है अगर तेज नहीं भागोगे तो कोई तुम्हें कुचल कर आगे निकल जाएगा. सरकारी नीतियां युवाओं को कुछ इसी तरह से तैयार होने को प्रेरित कर रही हैं. दूसरे को कुचल कर आगे निकलने के लिए छात्र कोचिंग संस्थाओं के झांसे में फंस कर उन की मुंहमांगी कीमत देने को तैयार हो जाते हैं. दूसरे को कुचल कर आगे निकलने की होड़ से कोचिंग और एनटीए का गठजोड़ मजबूत हो रहा है. इसी गठजोड़ का नतीजा है कि लाखों रुपए की अवैध कमाई की चाहत में पेपर लीक कराए जाते हैं.

पहले मैडिकल में प्रवेश के लिए स्टेट लैवल पर पीएमटी और औल इंडिया लैवल पर सीपीएमटी प्रवेश परीक्षाएं होती थीं जिन में 12वीं की पढ़ाई के आधार पर सवाल होते थे. छात्रों को किसी कोचिंग करने की जरूरत नहीं होती थी. जैसे ही मैडिकल में प्रवेश के लिए नीट परीक्षा का आयोजन हुआ, छात्रों को कोचिंग की जरूरत पड़ने लगी. कोचिंग संस्थाओं का काम पढ़ाना नहीं बल्कि छात्र को नीट के लिए तैयार करने का हो गया. अब छात्र कक्षा 9 से ही नीट की तैयारी करने लगते हैं. इस में सफल होने के लिए कोचिंग सस्थाओं ने पेपर लीक करने शुरू कर दिए. नीट को ले कर सुधार न होता देख अब इस को खत्म करने की मांग भी शुरू हो गई है.

3 मई, 2026 को आयोजित नीट परीक्षा के पेपर आउट होने के बाद इस परीक्षा को 12 मई को रद्द कर दिया गया. इस में 22 लाख 75 हजार 11 छात्रों ने रजिस्ट्रेशन कराया था. 96 फीसदी यानी 22 लाख 5 हजार 35 छात्रों ने परीक्षा दी थी. देश के 551 शहरों और विदेश के 14 शहरों में 5,400 सैंटरों पर परीक्षा आयोजित हुई थी. परीक्षा के 4 दिनों बाद 7 मई को एनटीए को पता चला कि नीट के पेपर आउट हो चुके हैं.

राजस्थान में एक गेसपेपर बाजार में आया था. गेसपेपर के 410 में से 120 सवाल नीट पेपर से मिलतेजुलते थे. पेरैंट्स नीट के पेपर को पहले पाने और सही जवाब हल कराने के लिए 50-60 लाख रुपए देने को तैयार थे. पेपर लीक को ले कर छात्र बवाल जरूर करेंगे, इस डर को देखते हुए एनटीए ने खुद ही पहल कर के न केवल परीक्षा रद्द कर दी बल्कि सीबीआई को जांच भी दे दी. बड़ा सवाल यह है कि क्या एनटीए इतना ताकतवर है कि वह सीबीआई को आदेश दे सकती है, जिस से आननफानन सीबीआई ने जांच के काम को शुरू कर दिया? इतनी जल्दी तो पुलिस भी मुकदमा नहीं लिखती?

सीबीआई से जांच के लिए केंद्र सरकार के गृह विभाग से सिफारिश की जाती है. इस के बाद वह आदेश देता है तब सीबीआई जांच शुरू करती है. नीट मामले में इस तेजी के पीछे की वजह लीपापोती करना तो नहीं? सीबीआई की जांच जैसेजैसे आगे बढ़ने लगी, एनटीए और कोचिंग का गठजोड़ सामने दिखने लगा. ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस बार पेपर लीक के केंद्र में राजस्थान और महाराष्ट्र प्रदेश हैं जहां ‘डबल इंजन’ की सरकारें हैं.

पेपर लीक की कैसे खुली पोल

सीबीआई ने जांच शुरू करने के दो दिनों बाद 14 मई को मनीषा वाघमारे को गिरफ्तार किया. वहां से सीबीआई को क्लू मिलने शुरू हुए. मनीषा वाघमारे से पूछताछ के बाद सीबीआई ने 15 मई, 2026 को प्रहलाद विट्ठलराव कुलकर्णी उर्फ पी वी कुलकर्णी को पुणे से गिरफ्तार किया था. वहां से सीबीआई मनीषा मांढ़रे तक पहुंची. वो एनटीए में नीट के पेपर बनाने की प्रक्रिया से जुड़ी थी. सीबीआई को यह खोजना था कि पेपर छात्रों तक कैसे पहुंचा. सीबीआई कड़ी दर कड़ी नीट यूजी परीक्षा 2026 में पेपर लीक का परदाफाश करने के लिए तह तक पहुंच गई.

पेपर आउट खेल के मास्टरमाइंड पी वी कुलकर्णी मूल रूप से लातूर के रहने वाले थे. वहां वे लातूर के दयानंद कालेज में रसायन विज्ञान पढ़ाते थे. 27 साल पढ़ाने के बाद 2022 में जब वे रिटायर हुए तब से पुणे में ही रहने लगे. कालेज में पढ़ाने के बाद उन्होंने लातूर में अपनी क्लासेज शुरू कीं. इस के अलावा, पी वी कुलकर्णी पुणे स्थित एमसीएएस नामक संस्था से भी जुड़े थे. एमसीएएस नीट, जेईई, जेईई मेन और एमएचटी सीईटी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मौक टैस्ट, क्वेश्चन सैट और गाइडैंस मुहैया कराते थे.

अप्रैल 2026 के आखिरी सप्ताह में पी वी कुलकर्णी के पुणे स्थित घर पर कुछ स्टूडैंट्स के लिए खास कोचिंग सैशन चलाए गए थे. यहां कुलकर्णी ने कुछ स्टूडैंट्स को पैसे के बदले ‘गेसपेपर’ दिए थे. पी वी कुलकर्णी मनीषा वाघमारे के जरिए मनीषा मांढ़रे को जानता था. इन दोनों की गिरफ्तारी के बाद सीबीआई ने मनीषा मांढ़रे को गिरफ्तार किया. मनीषा मांढ़रे की गिरफ्तारी बेहद अहम थी क्योंकि मनीषा मांढ़रे नीट यूजी 2026 की परीक्षा के पेपर बनाने की प्रक्रिया से जुड़ी हुई थीं.

नैशनल टैस्टिंग एजेंसी यनरी एनटीए ने उन को बौटनी और जूलौजी एक्सपर्ट के तौर पर नियुक्त किया था. इस वजह से उन को बौटनी और जूलौजी के पेपरों तक पूरी एक्सेस दी गई थी. मनीषा मांढ़रे 5-6 सालों से एनटीए के पैनल थीं. अप्रैल 2026 के दौरान मनीषा मांढ़रे ने पुणे में मनीषा वाघमारे के जरिए नीट उम्मीदवारों को इकट्ठा किया. अपने घर पर नीट के लिए विशेष कोचिंग क्लास चलाई. इन कक्षाओं में मनीषा मांढ़रे ने बौटनी और जूलौजी के कई सवाल समझाए और उन की जानकारी दी. छात्रों से कहा गया कि वे इन सवालों को अपनी नोटबुक में लिखें और किताबों में भी मार्क करें. जांच में पाया गया कि इन में से ज्यादातर सवाल 3 मई, 2026 को हुई नीट यूजी 2026 परीक्षा के प्रश्नपत्र के सवालों से मिलते थे.

मनीषा मांढ़रे पुणे के मौडर्न कालेज औफ आर्टस, साइंस और कौमर्स में बौटनी की प्रोफैसर के रूप में काम कर रही थीं. उन के रिटायमैंट में 7 माह बाकी थे. मौडर्न कालेज भाजपा और आरएसएस के करीबी लोगों द्वारा चलाया जा रहा है. समस्त हिंदू आघाड़ी से संबंध रखने वाले मिलिंग एकबोटे के भाई गजानन एकबोटे कालेज के चेयरमैन हैं. कालेज की प्रिसिंपल प्रोफैसर डाक्टर निवेदिता गजानन एकबोटे भाजपा युवा मोरचा की वाइस प्रैसिडैंट हैं. डाक्टर निवेदिता गजानन एकबोटे की सोशल मीडिया पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के साथ फोटो वायरल होने लगी.

इस के बाद अपनी सफाई देते निवेदिता एकबोटे ने कहा कि सीनियर प्रोफैसर मनीषा मांढ़रे पिछले 24 वर्षों से यहां काम कर रही थीं और एनटीए के साथ गोपनीय शर्तों के तहत जुड़ी हुई थीं. मनीषा मांढ़रे 7 महीने बाद रिटायर होने वाली थीं. एनटीए, नीट परीक्षा और प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है. मनीषा मांढ़रे के साथ कालेज और मैनेजमैंट का कोई रिश्ता नहीं था. एनटीए से कालेज का कोई संबंध नहीं था. कालेज ने मनीषा मांढ़रे को निलंबित कर दिया है.

सीबीआई ने पकड़े गए लोगों पेपर टेल बनाते कहा कि नीट पेपर लीक के मास्टर माइंड पी वी कुलकर्णी ने मनीषा मांढ़रे के जरिए पेपर हासिल किए. इस के बाद मनीषा वाघमारे के जरिए धनंजय लोखंड़े को अपने ग्रुप का हिस्सा बनाया. धनंजय लोखंड़े को सीबीआई ने अहल्यानगर जिले से गिरफ्तार किया. सीबीआई के मुताबिक, धनंजय लोखंड़े ने मनीषा वाघमारे से नीट परीक्षा से संबंधित पेपर हासिल किया और उसे शुभम खैरनार को दे दिया था.

शुभम खैरनार और धनंजय लोखंड़े एकदूसरे को जानते थे. बाद में शुभम ने धनंजय लोखंड़े से मिले पेपर जयपुर में जमवारामगढ़ के रहने वाले मांगीलाल बिवाल को दिए. मांगीलाल बिवाल का बेटा विकास बिवाल सवाई माधोपुर के मैडिकल कालेज में एमबीबीएस पहले साल में पढ़ाई कर रहा है. सीबीआई का यह आरोप भी है कि नीट 2025 में भी हरियाणा के यश यादव के जरिए मांगीलाल बिवाल ने पेपर खरीदा था.

इसी परीक्षा में मांगीलाल बिवाल के परिवार से 5 बच्चों का सिलैक्शन हुआ था. दिनेश बिवाल मांगीलाल बिवाल का भाई है जबकि विकास बिवाल बेटा है. दिनेश बिवाल को जयपुर से ही गिरफ्तार किया गया. वह भाजपा के युवा मोरचा का पदाधिकारी है. नीट परीक्षा पेपर लीक मामले में गिरफ्तार यश यादव गुरुग्राम का रहने वाला है. वह उत्तरकाशी से बीएएमएस (बैचलर औफ आयुर्वेदिक मैडिसिन एंड सर्जरी) की पढ़ाई कर रहा था.

सीबीआई ने नासिक के रहने वाले शुभम खैरनार को भी पकडा. शुभम खैरनार नासिक में ही एस आर एजुकेशन कंसल्टैंसी नाम से अपना बिजनैस चला रहा था. शुभम खैरनार ने 29 अप्रैल, 2026 को धनंजय लोखंड़े से मिले नीट पेपर की पीड़ीएफ यश यादव को दी. शुभम तीसरे वर्ष का मैडिकल छात्र है और नासिक में प्रैक्टिस करता है. शुभम ने मैडिकल में पढ़ाई के लिए दाखिला तो लिया था पर उस ने एक भी सेमेस्टर पढ़ाई नहीं की थी. इस के बाद भी उस ने डाक्टरी करनी शुरू की. इस के साथ ही साथ एस आर एजुकेशन कंसल्टैंसी भी चलाने लगा.

सीबीआई ने 18 मई को लातूर से ही रेनूकाई कैरियर कोचिंग सैंटर के संस्थापक शिवराज रघुनाथ मोटेगांवकर को गिरफ्तार किया. शिवराज को 3 मई को हुई परीक्षा के पेपर और उस के जवाब 10 दिनों पहले ही मिल गए थे. शिवराज की मिलीभगत एनटीए के परीक्षा कराने वाले मुख्य कर्ताधर्ताओं से थी जिस से ही पेपर लीक हो सका और परीक्षा के पहले ही शिवराज को पेपर और उस के हल मिल गए.

एनटीए के खोखले दावे

सीबीआई की जांच ने एनटीए के चेहरे को बेनकाब कर दिया है. वैसे, नीट परीक्षा पहली बार विवादों में नहीं घिरी है. 2024 में पेपर लीक ओर ग्रेस मार्क्स विवाद हुआ था. नीट परीक्षा कराने वाली एनटीए परीक्षा की गोपनीयता को ले कर बड़ेबड़े दावे करती रही. वह इस परीक्षा को मल्टीलेयर सिक्योरिटी सिस्टम बताती थी. लगातार परीक्षा का विवादों में होना बताता है कि उस के दावे खोखले हैं. नीट परीक्षा के पेपर तैयार करने के लिए गोपनीयता के साथ देशभर के वरिष्ठ प्रोफैसरों, वैज्ञानिकों और विषय विशेषज्ञों की एक गुप्त समिति बनती है.

पेपर तैयार होने के बाद दूसरा सब से मुख्य स्टैप इस की प्रिंटिंग होती है. टैंडर द्वारा प्रिंटिंग प्रैस का चुनाव होता है. प्रोटोकौल बेहद सख्त होता है. जिस प्रिंटिंग प्रैस को यह काम सौंपा जाता है, कंपोजिंग से ले कर प्रिंटिंग और पैकेजिंग तक सारा काम एनटीए के अधिकारी अपनी निगरानी में कराते हैं. प्रैस परिसर में हर जगह सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं और इन का कम से कम एक साल तक बैकअप सुरक्षित रखा जाता है. प्रिंटिंग प्रैस की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती.

प्रिंटिंग प्रैस के कर्मचारियों को मोबाइल फोन या कैमरा लाने की अनुमति नहीं होती. प्रश्नपत्र डिजिटल एनक्रिप्टेड फौर्म में प्रैस तक पहुंचता है. हर पन्ने पर एक यूनिक कोड होता है ताकि किसी भी गड़बड़ी की स्थिति में तुरंत उस के सोर्स तक पहुंचा जा सके. अगर प्रिंटिंग के दौरान कोई भी कौपी मिसप्रिंट हो जाती है तो उसे भी एनटीए की जानकारी में ला कर तुरंत नष्ट कर दिया जाता है. छपाई पूरी होने के बाद प्रश्नपत्रों को लोहे के बक्सों में सीलबंद कर दिया जाता है.

नीट परीक्षा के लिए आमतौर पर 3 सैट तैयार किए जाते हैं ताकि परीक्षा के दौरान किसी एक सैट के आधार पर नकल या गड़बड़ी न हो सके. प्रिंटिंग के बाद प्रश्नपत्रों को पूरी तरह सील कर के पहले वाहनों से स्ट्रौंगरूम और फिर परीक्षा केंद्रों तक भेजा जाता है. इस दौरान भी हर मूवमैंट रिकौर्ड की जाती है. परीक्षा केंद्रों पर प्रश्नपत्र तय समय से पहले नहीं खोले जाते और वहां भी निगरानी के कई स्तर होते हैं.

जहां भाजपा वहां पेपर लीक

सीबीआई की छानबीन से पता चलता है कि पेपर लीक करने में एनटीए के लोगों का ही हाथ हो सकता है. इस से यह भी पता चला कि 2024 और 2025 में भी जब नीट परीक्षा में धांधली हुई तो एनटीए की मिलीभगत से ही हुई थी. इस के बाद भी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान एनटीए को क्लीन चिट देते रहे. वे यह मानते रहे कि नीट बहुत सुरक्षित हाथों में है. धर्मेंद्र प्रधान के ऐसा कहने के पीछे का राज यह है कि एनटीए के चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी और शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग में सचिव के रूप में आईएएस अफसर विनीत जोशी काम देखते हैं. दोनों पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पूरा भरोसा है.

एनटीए के चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी आरएसएस प्रचारक होने के साथ ही साथ आरएसएस के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी के जबलपुर प्रमुख रहे हैं. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक कैरियर की शुरुआत भी एबीवीपी से हुई थी. प्रदीप कुमार जोशी 2006 में मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग यानी एमपीएससी के अध्यक्ष भी रहे हैं. मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले में भी इन का नाम चर्चा में था.

नीट धांधली के चलते 2 साल में 3 बार एनटीए के डीजी बदले गए. 2024 में पेपर लीक विवाद के बाद डीजी सुबोध कुमार सिंह को हटा दिया गया. इस के बाद आईटीपीओ के चेयरमैन को डीजी एनटीए बनाया गया. 2025 में आईएएस राजेश लखानी को डीजी बनाया गया. नीट यूजी परीक्षा 2026 से पहले ही आईएएस अभिषेक सिंह को एनटीए का डीजी बना दिया गया. एनटीए के डीजी भले ही बदलते रहे हों पर इस के चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी को हटाया नहीं गया. प्रदीप जोशी लंबे समय से चेयरमैन की कुरसी पर बने हुए हैं.

एनटीए की अपनी 10 सदस्यों वाली गवर्निंग बौडी बनी है. इस में अलगअलग संस्थाओं के भारीभरकम लोगों को शामिल किया गया है. चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी और डीजी आईएएस अभिषेक सिंह के अलावा 3 डायरैक्टर आईआईटी से हैं. 2 डायरैक्टर एनआईटी से हैं. 2 डायरैक्टर आईआईएम, डायरैक्टर आईआईएसईआर पूणे, वाइस चांसलर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, वाइस चांसलर इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी, चेयरमैन एनएएसी और हरीश पांडेय एमडी डाक्टर हीरानंदानी अस्ताल मुंबई से हैं. भारीभरकम टीम और ढांचे के बाद भी एनटीए पेपर लीक को रोक नहीं पाई है.

एनटीए का गठन करते समय सरकार ने इस का 25 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया था. 10 साल में एनटीए के पास 500 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि है. एनटीए का काम भी पारदर्शी नहीं है. इन की वैबसाइट देखने पर ही तमाम गड़बड़ी दिखती है. टैंडर फाइलें ओपन नहीं होती हैं. एक जगह दिखा कि एनटीए द्वारा ओएमआर शीट स्कैनर की खरीदारी की गई जिन के मौडल और उन की कीमतों में लंबा अंतर दिखता है. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 3 मई, 2026 को रद्द की गई परीक्षा 21 जून, 2026 को कराने की बात करते कहा कि 2027 से नीट की परीक्षा कंप्यूटर पर ली जाएगी.

एनटीए के पास अभी केवल एक लाख 50 हजार छात्रों की एकसाथ परीक्षा लेने के लिए कंप्यूटर क्लासेस हैं. ऐसे में या तो 22 लाख छात्रों के लिए कंप्यूटर क्लासेस बनेंगी या फिर यह परीक्षा 15 बार में कराई जाएगी. इस के लिए एनटीए को बड़ी संख्या में कंप्यूटर चाहिए होंगे. ऐसे में इन की खरीदारी में भी गड़बड़ी हो सकती है. सो, एनटीए की गहन जांच होनी चाहिए. इस की व्यवस्था को अधिक से अधिक पारदर्शी बनाया जाए जिस से इस की वैबसाइट को देखने से ही सच्चाई दिख सके.

9 साल बाद भी पेपर लीक रोकने में असफल

वर्ष 2026 में नीट परीक्षा में धांधली सामने आने के बाद की सरकार की नाकामी ही नहीं, उस की मिलीभगत भी सामने आ रही है. पहली बार सीधे एनटीए से जुड़े लोगों को सीबीआई ने गिरफ्तार किया है. नीट यूजी परीक्षा में गड़बड़ियों को ले कर राजस्थान के पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने कहा कि, ‘नीट प्रवेश परीक्षा का रद्द होना यह दिखाता है कि इस में बड़े स्तर पर गड़बड़ी हुई थी. राजस्थान की भाजपा सरकार ने जानबूझ कर दो सप्ताह तक इसे छिपाने की कोशिश की. इस से भाजपा सरकार का असली चेहरा बेनकाब हो गया है.’

भारत में पिछले 15 सालों में पेपर लीक के मामले चिंताजनक रूप से बढ़े हैं. केंद्र और राज्य स्तर की परीक्षाओं को देखें तो यह संख्या सैकड़ों में हैं. 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार 2017 से 2024 के बीच 70 से अधिक परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं. इस से लगभग एक करोड़ 70 लाख छात्र प्रभावित हुए. सब से अधिक पेपर लीक के मामले उन राज्यों में हुए जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं. इन में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र शामिल हैं.

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि, ‘भ्रष्ट भाजपाई व्यवस्था ने 22 लाख छात्रों के सपनों को कुचल दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तथाकथित अमृतकाल ‘विषकाल’ बन गया है. छात्र आत्महत्या कर रहे हैं. यह आत्महत्या नहीं सिस्टम द्वारा की गई हत्या है. 2015 से ले कर 2026 तक 148 परीक्षा घोटाले हुए. 87 परीक्षाएं रद्द हो गईं जिस से 9 करोड़ बच्चों का भविष्य खराब हो गया. 148 घोटालों में केवल एक को सजा हुई. सीबीआई ने 17 मामले लिए और ईडी ने 11 लिए. इन में से किसी को सजा नहीं हुई. नीट और एआईपीएमटी में अकेले 15 घोटाले हुए. इन के जिम्मेदार अफसरों और मंत्रियों को कभी सजा नहीं दी गई.’

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा, ‘पेपर लीक की बारबार हो रही घटनाओं से लाखों छात्र और उन के परिजन नाराज हैं. क्या गारंटी है कि परीक्षा दोबारा करवाने पर प्रश्नपत्र लीक नहीं होगा. नीट की परीक्षा के रद्द होने की घटना से लाखों बच्चों और परिजनों के बीच भाजपा की भ्रष्टाचारी व्यवस्था के विरुद्ध बेहद आक्रोश और हताशा है. जब तक भाजपा सरकार रहेगी, परीक्षा होती रहेगी लीक, भाजपा के जाने के बाद ही परीक्षा प्रणाली होगी ठीक. भाजपा सरकार मतलब नाकाम सरकार.’

कैसे हुआ नीट का गठन

21 दिसंबर, 2010 को मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया यानी एमसीआई और डैंटल काउंसिल औफ इंडिया यानी डीसीआई ने मैडिकल परीक्षाओं को कराने के लिए अधिसूचना जारी की. इस अधिसूचना में मैडिकल प्रवेश के लिए पूरे देश में एकसमान परीक्षा ‘नीट’ कराने की बात कही गई थी. अधिसूचना में निजी कालेजों की अलगअलग परीक्षाएं खत्म करने को कहा गया था. इस का उद्देश्य कैपिटेशन फीस और मैडिकल प्रवेश की सीट की बिक्री को रोकना बताया गया था. इस को लागू करने के लिए इंडियन मैडिकल काउंसलिग एक्ट का प्रयोग कर के ग्रेजुएट मैडिकल एजुकेशन रैगुलेशन 1997 में संशोधन किया गया था.

इस का सब से अधिक विरोध क्रिश्चियन मैडिकल कालेज, प्राइवेट मैडिकल कालेज और अल्पसंख्यक कालेजों ने किया था. इन का तर्क था कि इस से मैडिकल प्रवेश परीक्षा का केंद्रीयकरण होगा जिस से राज्यों और अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकार खत्म हो जाएंगे. यह परीक्षा सीबीएसई पैटर्न पर होनी थी जिस से स्टेट बोर्ड में पढ़ने वाले छात्रों के परीक्षा में पिछड़ने का खतरा था. एमसीआई और डीसीआई के इस फैसले के खिलाफ क्रिश्चियन मैडिकल कालेज सुप्रीम कोर्ट गया.

18 जुलाई, 2013 को चीफ जस्टिस अलमतास कबीर, जस्टिस विक्रमजीत सेन और जस्टिस ए आर दवे की पीठ ने 2-1 के बहुमत से एमसीआई और डीसीआई की अधिसूचना को रद्द कर दिया. इस से नीट परीक्षा का खतरा भी टल गया था. जस्टिस अलमतास कबीर, जस्टिस विक्रमजीत सेन ने इस के पक्ष में और जस्टिस ए आर दवे इस के विपक्ष में थे. कोर्ट ने कहा कि एमसीआई को सभी कालेजों पर एकपरीक्षा थोपने का अधिकार नहीं है. इस से निजी और अल्पसंख्यक कालेजों की स्वतंत्रता प्रभावित होती है.

इस के बाद केंद्र में सरकार बदल चुकी थी. कांग्रेस की डाक्टर मनमोहन सिंह सरकार की विदाई हो चुकी थी. एनडीए गठजोड़ की सरकार बनी. इस के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा नेता और गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके थे. सरकार बदलने के साथ ही साथ विचारधारा भी बदल चुकी थी. नीतियों में भी बदलाव आ गया था. अल्पसंख्यकों को ले कर सरकार की सोच में बदलाव आ चुका था.

भाजपा के पीछे काम करने वाली आरएसएस की सोच अपनी विचारधारा को फैलाने की होती है. इस के लिए कई रास्तों में सब से प्रमुख शिक्षा होती है. आरएसएस को पता था कि भारत के अलगअलग राज्यों की शिक्षा व्यवस्था का जब तक केंद्रीयकरण नहीं होगा, उस को एक जगह से संभाला नहीं जा सकता. भारत के अलगअलग प्रदेशों में अलगअलग विचारधारा को मानने वाले लोग हैं. ऐसे में राज्यों तक सीधे पहुंचना सरल नहीं है. केंद्र सरकार के आधीन काम करने वाली व्यवस्था इस में मददगार हो सकती है.

11 अप्रैल, 2016 को मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया और संकल्प चैरिटेबल ट्रस्ट ने मैडिकल परीक्षा वाली अधिसूचना को ले कर रिव्यू पिटीशन सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की. संकल्प चैरिटेबल ट्रस्ट ने अपने वकील अमित कुमार के जरिए पीआईएल दाखिल की थी. संस्था ने कोर्ट से मांग की कि नीट मैडिकल प्रवेश परीक्षा एकसाथ पूरे देश में लागू हो. निजी मैडिकल कालेज अपनी अलगअलग परीक्षाएं न कराएं ताकि छात्रों को कई परीक्षाओं के बोझ से राहत मिले.

जस्टिस ए आर दवे, जस्टिस शिवकीर्ति सिंह और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के नीट को ले कर 2013 में दिए गए फैसले को रिकौल कर लिया. इस से नीट के फिर से लागू होने का रास्ता साफ हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई, 2016 को नीट पर अपना फैसला विस्तार से सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एमबीबीएस और बीडीएस में प्रवेश केवल नीट के जरिए ही मिलेंगे. इस को निजी, सरकारी, डीम्ड और अल्पसंख्यक सहित सभी कालेजों में लागू कर दिया गया. 2016 में औल इंडिया नीट को फेज 1 माना गया. नीट फेज 2 कराने का आदेश दिया गया जिस से कि उस दौरान हुई परीक्षा में शामिल हुए छात्रों को कोई नुकसान न हो.

कोर्ट ने कहा कि नीट आयोजित न करने को ले कर किसी भी कोर्ट द्वारा पहले पारित आदेश इस निर्णय के सामने प्रभावी नहीं रहेंगे, यही आदेश लागू माना जाएगा. कोर्ट ने यह दलील भी दी कि क्रिश्चियन मैडिकल कालेज बनाम भारत संघ 2014 2 एससीसी 305 के फैसले को देखते हुए नीट आयोजित कराना उचित नहीं होगा और इस आदेश का असर लंबित मामलों पर नहीं पड़ना चाहिए.

कोर्ट ने कहा कि मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया बनाम क्रिष्चियन मैडिकल कालेज, वल्लोर 2016 4 एससीसी 342 वापस लिया जा चुका है. इसलिए 21.12.2010 की अधिसूचनाए वर्तमान में प्रभावी हैं और लागू मानी जाएंगी.

तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, जम्मूकश्मीर, पश्चिम बंगाल और गुजरात सहित कई राज्यों ने इस का कड़ा विरोध किया था. उन का तर्क जायज था. स्टेट एजुकेशन बोर्ड का सिलेबस अलगअलग था. नीट परीक्षा सीबीएसई पैटर्न पर होती थी तो इस से गांव से आने वाले छात्रों को पिछड़ने का खतरा था. इस के साथ ही साथ क्षेत्रीय भाषाओं की समस्या भी थी. इन के विरोध को खारिज कर दिया गया. अब नीट के जरिए पूरे देश में मैडिकल शिक्षा की प्रवेश परिक्षा को पूरे देश में एकसाथ कराने का रास्ता खुल चुका था.

भाजपा सरकार को इतने से राहत नहीं मिलने वाली थी. वह ‘एक देश एक चुनाव’ और ‘एक देश एक टैक्स‘ की तर्ज पर ‘एक देश एक परीक्षा’ की तर्ज पर काम करने की सोच रही थी. वह पूरे देश के छात्रों के लिए एक परीक्षा कराने की व्यवस्था बनाने की सोच रही थी. इस सोच के बाद ही नैशनल टैस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए बनाने का काम शुरू हो गया. 2016 के केंद्रीय बजट भाषण में वित्त मंत्री अरूण जेटली ने नैशनल टैस्टिग एजेंसी बनाने की घोषणा की. अरुण जेटली ने कहा कि इस का उद्देश्य प्रवेश परिक्षाओं को प्रोफैशनल तरीके से आयोजित करना होगा. यह संस्था टैक्नलौजी आधारित प्रवेश परीक्षा कराएगी.

एनटीए बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक हुई. जे पी नड्डा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री थे. बैठक में इंडियन मैडिकल काउंसिल (अमेंडमैंट) आर्डिनैंस 2016 पारित किया गया. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इस को लागू करने की अनुमति दी. इस को सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम 1860 के तहत स्वायत्त संस्था के रूप में शिक्षा मंत्रालय के अधीन गठित किया गया. 2018 से एनटीए ने काम करना शुरू किया. एक तरह से यह संस्था सरकारी नियंत्रण से बाहर एक स्वतंत्र संस्था है, शिक्षा मंत्रालय का एक विभाग नहीं. ऐसा शायद इसलिए किया गया है ताकि इस में अनमने ढंग से नियुक्तियां की जा सकें और किसी तरह का औडिट न किया जाए.

नरेंद्र मोदी की सरकार एक देश एक चुनाव, एक देश एक टैक्स और एक राशन कार्ड जैसे बदलाव कर रही थी. वह राज्यों को अधिकार देने की जगह अधिकारों का केंद्रीयकरण कर रही थी तो उसे एक प्रवेश परीक्षा के रूप में नीट भी पसंद आई. इस को आयोजित कराने के लिए जिस एनटीए का गठन हुआ उस के जिम्मे और भी परीक्षाएं कराने का काम सौंप दिया गया. अब एनटीए देश की सब से बड़ी परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था बन गई. इस पर सरकार का नहीं बल्कि पार्टी यानी भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अपरोक्ष कंट्रोल है.

एनटीए के जिम्मे जौइट एंट्रैंस एग्जाम यानी जेईई मेन, नैशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रैंस टैस्ट यानी नीट, कौमन यूनिवर्सिटी एंट्रेस टैस्ट यानी सीयूईटी यूजी और यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन नैशनल एलिजिबिलिटी टैस्ट यानी यूजीसी नेट परीक्षा कराने का काम आ गया. नैशनल टैस्टिंग एजेंसी का काम छात्रों के लिए प्रवेश परीक्षा कराने का काम किया गया. इन में से कुछ परीक्षाएं वर्ष में एक बार तो कुछ साल में 2 बार आयोजित की जाती हैं. एनटीए ने प्रवेश परीक्षा फौर्म भरने के पैटर्न में पहला बदलाव किया. साधारण हाथ से फौर्म भरा जाना बंद हो गया. कंप्यूटर पर औनलाइन फौर्म भरना कठिन काम हो गया.

आसान नहीं है परीक्षा फौर्म भरना

एनटीए ने परीक्षा देने की प्रक्रिया को इतना जटिल कर दिया कि परीक्षा प्रवेश फौर्म भरने के समय से ही कोचिंग का खेल शुरू हो जाता है. सब से अधिक परेशानी ग्रामीण इलाकों से आने वाले छात्रों को होती है. परीक्षा फौर्म भरने के लिए छात्रों को कोचिंग, साइबर कैफे या एजेंट्स के ऊपर निर्भर रहना होता है. कोचिंग दुकानें इस के लिए रजिस्ट्रेशन कैंप लगाती हैं. वे इस सुविधा को अपने पैकेज में शामिल कर लेती हैं. छात्रों को कोचिंग दुकानों की मदद की दरकार इसलिए होती है कि छोटी सी भूल से परीक्षा फौर्म रद्द हो सकता है.

ग्रामीण इलाकों से आने वाले छात्रों को औनलाइन फौर्म भरने में दिक्कत आती है. उन को डिजिटल फौर्म भरने का तरीका नहीं पता होता. औनलाइन फौर्म इंग्लिश में भरना होता है तो पढ़ने और समझने में दिक्कत होती है. औनलाइन फौर्म भरने में सहयोग करने वाले इस के बदले मोटे पैसे भी लेते हैं. साइबर कैफे वाले 100-200 रुपए लेते हैं. कई दस्तावेज और हस्ताक्षर स्कैन करने पड़ते हैं. कोचिंग वाले अपने पैकेज में ही 2 हजार रुपए इस के लिए जोड़ लेते हैं. ये पैसे नीट की अधिकृत फीस से अलग होते हैं.

सस्ती नहीं है नीट की तैयारी

एनटीए नीट परीक्षा फौर्म भरने वाले सामान्य छात्रों से 1,700 रुपए, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस से 1,600 और एससी व एसटी से 1,000 और अगर विदेश में परीक्षा केंद्र है तो 9,500 रुपए फीस के रूप में लेती है. फीस के अलावा परीक्षा फौर्म भरने की फीस 200 रुपए से 2,000 रुपए तक होती है. दस्तावेज की फोटोकौपी और प्रिंटआउट के लिए 100 से ले कर 500 रुपए खर्च हो जाते हैं. परीक्षा देने के लिए अगर सैंटर अपने शहर में मिल जाए तो 100 रुपए से ले कर 1,000 रुपए तक खर्च आता है. अगर दूसरे शहर में जाना हो तो 2,000 से ले कर 15,000 रुपए तक का खर्च आता है.

नीट की तैयारी में कोचिंग की फीस के बाद स्टडी मैटीरियल सब से मंहगा होता है. इस में किताबें, टैस्ट सीरीज और इंटरनैट का खर्च आता है. यह खर्च 5,000 से 30,000 रुपए के बीच आता है. औनलाइन कोचिंग का खर्च 10 हजार से 60 हजार रुपए का होता है. औफलाइन कोचिंग का खर्च 2 लाख से 10 लाख रुपए के बीच आता है. यह खर्च कोचिंग और छोटेबड़े शहर के अनुसार घटताबढ़ता रहता है. नीट की परीक्षा के बाद भी खर्च होता है. इस में काउंसलिंग, रजिस्ट्रेशन, चौइस फीलिंग, सिक्योरिटी डिपौजिट और कालेज रिपोर्टिंग पर भी पैसा लिया जाता है. काउंसलिंग फीस अलगअलग राज्यों में अलग है. यह 5 हजार रुपए तक है.

हर साल 22-24 लाख छात्र नीट की तैयारी करते हैं. एक छात्र 1 से 3 साल का समय खर्च करता है. बड़ी संख्या में छात्रों को दूसरे शहरों में जा कर पढ़ना पड़ता है. इस से कोचिंग ही नहीं, पूरा एक बाजार बन जाता है. जिन जगहों पर कोचिंग होती है वहां खानेपीने की दुकानों में सब से अधिक ब्रेडरोल की दुकानें खुल जाती हैं. छात्र कोचिंग से निकलते हैं, ब्रेडरोल हाथ में लेते हैं, चलते हुए खातेखाते मंजिल तक पहुंच जाते हैं. नीट की तैयारी केवल परीक्षा भर नहीं रह गई है, यह एजुकेशन इकोनौमी बन गई है. पैसा बढ़ने से इस में भ्रष्टाचार और अपराध बढ़ता जा रहा है. लाखों छात्र परीक्षा की तैयारी, कोचिंग, किताबों, होस्टल, औनलाइन क्लास और टैस्ट सीरीज का सहारा लेते हैं.

निशाने पर क्यों हैं कोचिंग संस्थान

नीट पेपर लीक के पीछे का काला सच सामने आने के बाद यह साफ हो गया है कि नीट केवल एक परीक्षा भर नहीं है. यह हजारों करोड़ रुपयों के कोचिंग कारोबार का आधार बन चुकी है. नीट और जेईई की तैयारी कराने वाली कोचिंग संस्थाओं ने अपना एक पैरेलल एजुकेशन सिस्टम बना लिया है. इस का आधार कई राज्यों की शिक्षा व्यवस्था से भी बड़ा है. औनलाइन टैस्ट प्रैप और कोचिंग बिजनैस 2025 तक 45 हजार करोड़ से 55 हजार करोड़ रुपए के बीच पहुंच गया है. जिस तरह से शहरों में छोटे डाक्टर की प्रैक्टिस बंद हो गई, उस की जगह बड़े कौर्पोरेट अस्पतालों ने ले ली ठीक उसी तरह से शिक्षकों के नाम से जाने जानी वाली कोचिंग संस्थाए खत्म हो गई हैं. उन की जगह ब्रैंडेड कोचिंग संस्थानों ने ले ली है.

ये कोचिंग दुकानें दिल्ली और कोटा के साथ ही साथ पूरे देश में फैल गई हैं. बड़ी कोचिंग में एलन, कैरियर, आकाश, फिजिक्सवाला, फिटजी, नारायण ग्रुप और सर चैतन्य प्रमुख हैं. 2024 में एलन का राजस्व 3,200 करोड़ रुपए, आकाश का 2,000-4,000 करोड़ रुपए और फिजिक्सवाला का 2,000 करोड़ रुपए बताया जाता है. नीट, क्यूट और जेईई जैसी परीक्षाओं में हर साल 60 लाख से अधिक छात्र एनटीए के माध्यम से परीक्षा देते हैं. इन सभी छात्रों के बीच आगे निकलने की रेस होती है. इस भारी रेस ने कोचिंग संस्थानों को एक बड़े बिजनैस में बदल दिया है. ऐसे में यह साफ नजर आने लगा है कि नीट के गठन के पीछे कोचिंग करोबार को बढ़ाना भी एक कारण था.

प्रतियोगी परीक्षाओं के घोटालों में कोचिंग संस्थानों या उन से जुड़े लोगों के नाम पहले भी सामने आते रहे हैं. मध्य प्रदेश का व्यापमं घोटाला देश के सब से चर्चित परीक्षा घोटालों में गिना जाता है. इस में सौल्वर गैंग, फर्जी अभ्यर्थी और परीक्षा नैटवर्क का खुलासा हुआ था. जांच में कई बिचैलियों और कोचिंग से जुड़े लोगों के नाम सामने आए थे. यह बात और है कि इस के मुख्य कर्ताधर्ता गायब रहे और यह राज फाइलों में दब कर रह गया. इस के अलावा बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के पेपर लीक मामले सामने आते रहे हैं. पुलिस ने ऐसे गिरोह पकड़े जिन का संबंध कोचिंग सैंटरों या ट्यूटर नैटवर्क से था. ये छात्रों से लाखों रुपए ले कर उन को पेपर देते हैं. टैक्नलौजी के दौर में व्हाट्सऐप और टैलीग्राम के जरिए प्रश्नपत्र भेजना सरल हो गया है.

शिक्षा व्यवस्था में जैसेजैसे केंद्रीयकरण होने लगा, फौर्म भरने से ले कर परीक्षा देने तक का काम छात्रों के लिए कठिन होने लगा. इस काम को सरल करने का काम कोचिंग संस्थाओं ने शुरू किया. जो छात्र स्टेट बोर्ड से 12वीं की परीक्षा पास कर के नीट, जेईई और क्यूट जैसी प्रवेश परीक्षा देते हैं उन के लिए जरूरी है कि वे प्रवेश परीक्षा के पैटर्न को समझें. 12वीं तक की परीक्षाओं में छात्रों को लिखने के लिए कहा जाता है. नीट, जेईई और क्यूट में छात्र को चार में से एक सवाल के सामने गोला करना होता है. इस में उस को दिक्कत होती है क्योंकि उसे 180 सवालों के उत्तर देने होते हैं. कोचिंग दुकानें इस की प्रैक्टिस कराती हैं.

मसला केवल प्रवेश परीक्षा तक नहीं होता. आगे की पढ़ाई के लिए अच्छा रैंक लाना होता है. इसलिए छात्र मजबूर हो कर कोचिंग जौइन करते हैं. कई कोचिंग संस्थाएं रैंक की गारंटी देती हैं. कोचिंग सफल तभी होगी जब उन के यहां से अधिक से अधिक छात्र सिलैक्ट होंगे. इस के लिए वे कोचिंग परीक्षा कराने वाली संस्थाओं से संपर्क करती हैं. इन के टारगेट पर परीक्षा केंद्र कर्मचारी, प्रिंटिंग प्रैस, आईटी सिस्टम से जुड़े लोग, पेपर बनाने वाले शिक्षक और बिचैलिए होते हैं. पेपर बनने से ले कर छात्र तक पहुंचने में किसी न किसी लैवल पर पेपर लीक करने की सेंधमारी संभव हो सकती है. इस को रोका नहीं जा सकता है.

पेपर लीक का पूरा नैटवर्क संगठित गिरोह की तरह काम करते हैं. कोचिंग संस्थानों के पास बड़ी संख्या में छात्रों का डेटा और संपर्क नैटवर्क होता है. उन को जरूरत केवल पेपर की होती है. पेरैंट्स इस के लिए पूरी कीमत देने को तैयार होते हैं. ऐसे में पैसे की कोई कमी नहीं होती. रैंक और रिजल्ट कोचिंग संस्था का सब से बड़ा प्रचार करते हैं. तभी छात्रों की भीड़ बढ़ती है और छात्र मुहंमागी कीमत देने को तैयार होते हैं. इस दबाव में अनैतिक तरीकों की आशंका बढ़ती है.

एनटीए और कोचिंग संस्थाओं का खतरनाक गठजोड जिस तरह से नीट परीक्षा में सामने आ रहा है कि उस से निबटने के लिए कंप्यूटर बेस्ड टैस्टिंग से परीक्षा लेना कोई हल नहीं है. शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत है. परिक्षाओं को पहले की तरह से स्टेट लैवल पर आयोजित किया जाए ताकि 12वीं पास करने वाले बच्चों को कोचिंग न करनी पड़े. अपने प्रदेश में रह कर वे पढ़ेंगे तो बड़े शहरों में रह कर पढ़ने के खर्च से बच जाएंगे. छात्रों की बढ़ती संख्या को देखते हुए कालेजों की संख्या और सीटों की संख्या को बढ़ाया जा सकता है. सरकारी शिक्षा के कमजोर होने पर छात्र महंगी कोचिंग पर निर्भर हो जाते हैं. इस दिशा में काम करने की जरूरत है.

जितनी बड़ी परीक्षा होगी उस में गड़बड़ी की उम्मीद भी उसी हिसाब से बड़ी होगी. यह परीक्षा आधारित बाजार बन जाता है. पेपर ट्रांसपोर्ट, डिजिटल सुरक्षा, परीक्षा केंद्र निगरानी जैसे काम बढ़ जाते है. इन में सेंधमारी करने के लिए माफिया सक्रिय हो जाते हैं. परीक्षाएं स्टेट लैवल पर होंगी तो उन पर नियंत्रण करना सरल होगा. अगर पेपर एक जगह आउट भी हो गया तो कम छात्रों का नुकसान होगा. जैसे अलगअलग राज्यों में अलगअलग समय में चुनाव होते हैं तो गडबड़ी कम होती है.

अगर एकसाथ पूरे देश में चुनाव होंगे तो व्यवस्था करना सरल नहीं होगा. सरकार को केंद्रीयकरण की जिद छोड़नी चाहिए. डिजिटल जमाने में एक ही जगह से चीजों में सेंधमारी करना सरल होता है. समाज चढ़ावा संस्कृति पर भरोसा करता है. उसे अपनी मेहनत पर भरोसा नहीं है. वह मंदिर के साथसाथ कोचिंग को शिक्षा का मंदिर मान कर पैसा देता है. उसे उम्मीद होती है कि कोचिंग किसी न किसी तरह से उस के सपनों को साकार कर देगी. इस के लिए पेपर लीक से ले कर परीक्षा की तैयारी के पैसे देने को तैयार रहता है.

शिक्षा व्यवस्था को बदलने में सरकार के साथ पेरैंट्स और छात्रों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. नहीं तो देश में क्लास का अंतर कभी मिट नहीं पाएगा. जो छात्र पेपर खरीदने लायक होगा वह परीक्षा पास कर लेगा. गरीब गरीब ही रह जाएगा क्योंकि उस के पास न अच्छे स्कूल होंगे और न पेपर लीक कराने के लिए पैसे.

कैसा होता है नीट का पेपर

नीट के पेपर में आने वाले सवालों को अलगअलग श्रेणियों में बांटा जाता है. करीब 30 प्रतिशत सवाल बेसिक थ्योरी और फार्मूलों पर आधारित होते हैं. लगभग 50 प्रतिशत सवाल कौन्सैप्ट और एप्लिकेशन आधारित होते हैं. 20 प्रतिशत सवाल कठिन और विश्लेषणात्मक होते हैं. सवालों की कुल संख्या 180 होती है. 45 सवाल फिजिक्स, 45 सवाल कैमेस्ट्री के होते हैं. 90 सवाल बायोलौजी से आते हैं. इन में 45-45 सवाल बौटनी और जुलौजी के होते हैं. हर सही उत्तर पर 4 अंक मिलते हैं. गलत उत्तर पर एक अंक कट जाता है. कुल 720 अंक होते हैं. परीक्षा औफलाइन ओएमआर शीट पर होती है. सवाल के सामने बने 4 गोलों में से सही जवाब वाले एक गोले को काला करना होता है. परीक्षा का समय 3 घंटा 20 मिनट का होता है.

किस काम का एंटी पेपर लीक कानून             

2024 में नीट परीक्षा में पेपर लीक के बाद देशभर में छात्रों का विरोध प्रदर्शन होने लगा. इस के दबाव में मोदी सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम 2024 बनाया. इस को एंटी पेपर लीक कानून भी कहा जाता है. इस की जरूरत प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, नकल और संगठित धोखाधड़ी को रोकने के काम में कानूनी कार्यवाही किए जाने के लिए थी. 21 जून, 2024 से लागू इस कानून के तहत दोषियों को 3-5 साल की जेल, 1 करोड़ रुपए तक का जुर्माना हो सकता है. इस में दोषी पाए जाने पर परीक्षा केंद्रों और उन के सर्विस प्रोवाइडर पर 4 साल तक का प्रतिबंध और 1 करोड़ रुपए तक का जुर्माना लग सकता है.

यह कानून यूपीएससी, एसएससी, बैंक, रेलवे और एनटीए जैसी केंद्रीय भरती संस्थाओं द्वारा आयोजित परीक्षाओं पर लागू होता है. 2024 में यह कानून बनने के बाद 2026 में नीट परीक्षा के पेपर आउट होने के कारण रद्द किया गया. ऐसे में परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था एनटीए दोषी है. तो क्या एनटीए की गवर्निंग बौडी को सजा दी जाएगी? एंटी पेपर लीक कानून लागू होने के बाद भी परीक्षाओं में नकल रुक नहीं रही है तो इस कानून को बनाने का क्या लाभ हुआ? NEET Paper Leak 2026

जेनजी : टैक जीनियस, स्किल में जीरो

Gen Z: जेनजी ऐसी पीढ़ी है जिस की बुद्धि स्मार्टफोन की तरह है लेकिन विवेक एयरोप्लेन मोड पर है. यह वह पीढ़ी है जिस के पास हर सवाल का जवाब एक गूगल क्लिक पर मौजूद है लेकिन जीवन में क्या करना है, स्ट्रगल किसे कहते हैं और अनुशासन किस चिडि़या का नाम है? ये जरूरी सवाल जेनजी की जिंदगी से कोसों दूर हैं.

ज नरेशन जेड या जेनजी एक ऐसी पीढ़ी है जिसे भ्रम है कि वह टैक्नोलौजी को उंगलियों पर नचाती है. सच तो यह है कि यह पीढ़ी टैक्नोलौजी के इशारों पर नाच रही होती है. सोशल मीडिया ने इस पीढ़ी को इतना कनैक्टेड बना दिया कि इस पीढ़ी का असली दुनिया से कनैक्शन ही टूट गया. यह वह पीढ़ी है जो 15 सैकड के शौर्ट वीडियोज में टिपिकल डांस को कौपी कर लेती है लेकिन 15 मिनट की मीटिंग में बोर हो जाती है. जेनजी वह पीढ़ी है जो स्क्रीन पर ग्लोबल सिटिजन बन जाती है लेकिन घर में पेरैंट्स को नहीं पहचान पाती.

टैक्नोलौजी में अव्वल लेकिन स्किल्स में पिछड़े हुए चैंपियन हैं ये युवा. जेन जेड को देख कर लगता है जैसे ये लोग जन्म से ही एआई और रील्स के साथ पैदा हुए हों. डिलौयट की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, 74 प्रतिशत जेन जेड मानते हैं कि दुनिया में जीने के लिए सिर्फ सोशल मीडिया का साथ काफी है. धूमकेतु आ जाए, सुनामी आ जाए या 12 स्केल का भूकंप आ जाए, जेन जी के हाथों से मोबाइल नहीं छूट सकता. यही वजह है कि दुनिया के 70 प्रतिशत बिजनैस लीडर्स यह मानते हैं कि जेन जी में कम्युनिकेशन स्किल्स जीरो है. 41 प्रतिशत बिजनैस लीडर्स कहते हैं जेन जेड ग्रेजुएट्स वर्कफोर्स के लिए तैयार ही नहीं है. गार्टनर के अनुसार, 51 प्रतिशत जेन जेड खुद मानते हैं कि वे रियल जौब के लिए तैयार नहीं हैं.

असल में इस पीढ़ी को सोशल मीडिया ने अपंग बनाया है. यह जहर धीमेधीमे नसों में समा चुका है. मांबाप भी दोषी हैं. शुरुआत में परवा नहीं की. मोबाइल में घंटों बिताते रहे पेरैंट्स को लगा कि चलो, बच्चा कहीं तो बिजी है. लेकिन यही मोबाइल की लत धीरेधीरे जहर बन गई. ऐसा जहर जिस ने जेन जी के दिमाग को पूरी तरह खोखला बना दिया. स्क्रौलिंग, शौर्ट वीडियो और 2× स्पीड ने ध्यान का स्पैन इतना छोटा कर दिया कि 51 प्रतिशत युवाओं का फोकस ही खत्म हो गया.

प्यू रिसर्च 2025 की रिपोर्ट कहती है, 48 प्रतिशत टीनऐजर्स के पीयर्स पर सोशल मीडिया नैगेटिव असर डाल रहा है. नतीजा? सौफ्ट स्किल्स, एम्पैथी, लीडरशिप में जीरो हो गए. जेन जी को ये सब बूढ़ों की बातें लगती हैं. समय की कोई कीमत नहीं, स्क्रीन ही सबकुछ है. हालत यह है कि औसतन जेनजी रोज 4 से

9 घंटे स्क्रीन पर बिताता है. साइबर स्माइल 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 60 प्रतिशत जेन जेड 4 घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर बिताते हैं. जबकि सर्जन जनरल की चेतावनी है कि 3 घंटे से ज्यादा स्क्रीनटाइम हो तो डिप्रैशन व एंग्जाइटी का रिस्क डबल हो जाता है. ये लोग समय को स्टोरी सम?ाते हैं. 24 घंटे में 24 स्टोरी पोस्ट लेकिन इन के पास पेरैंट्स के लिए 24 मिनट भी नहीं होते. असल में सोशल मीडिया ने समय को इतना सस्ता कर दिया कि जेन जेड को लगता है कि लाइफ एक इन्फिनिटी स्क्रौल है और पैसा फोमो. सो, खर्च करो, कल देखेंगे.

हैल्पेज इंडिया और दूसरी स्टडीज दिखाती हैं कि जेन जेड अपने पेरैंट्स को ‘आउटडेटेड’ मानता है, इसलिए पेरैंट्स के साथ इंटरैक्शन जीरो है. 52 प्रतिशत भारतीय जेन जेड पेरैंट्स से बात करने के बजाय चैटजीपीटी से पूछ लेते हैं. हालांकि भारत में 82 प्रतिशत जेन जी घर में रहते हैं और पूरी तरह पेरैंट्स की कमाई पर निर्भर हैं. फिर भी रिस्पैक्ट के नाम पर बस इतना काफी है कि वो पौकेटमनी देते हैं. पेरैंट्स की सुनें क्यों? क्योंकि मेरी जिंदगी मेरी मरजी. सोशल मीडिया ने इन्हें इतना आत्मकेंद्रित बना दिया है कि परिवार सैकंडरी हो गया है.

जेनजी वह पीढ़ी है जिस में इंटैलिजैंस तो भरपूर है लेकिन बेसिक व्यावहारिक ज्ञान से वह कोसों दूर है. ये युवा किसी भी ऐप को 47 सैकंड में क्रैक कर लेते हैं. एआई से बेहतर प्रौम्प्ट लिख देते हैं, 15 सैकंड की रील में पूरी फिलौसफी समझा देते हैं लेकिन समझदारी थोड़ी बफरिंग में अटकी हुई है. बुद्धि तेज है बिलकुल 5जी वाली लेकिन समझदारी अभी 2जी नैटवर्क पर है. कुल मिला कर बात यह है कि जेनजी वह पीढ़ी है जो दुनिया बदलने की क्षमता तो रखती है लेकिन पहले यह तय करना भूल जाती है कि बदलाव किस दिशा में करना है. गलतियां ये इतनी तेजी से करते हैं कि सीखने की स्पीड स्लो हो जाती है.

बरबाद पीढ़ी जेनजी

जेनजी टैक्नोलौजी में अव्वल है, इस बात में कोई शक नहीं लेकिन स्किल्स, सम्मान, व्यावहारिकता, समय और पैसे के मामले में यह पीढ़ी पूरी तरह बरबाद है. यह पीढ़ी स्क्रीन के पीछे परफैक्ट लाइफ जी रही है लेकिन असल में एंग्जाइटी, शौर्ट अटैंशन और इमोशनल डिसकनैक्ट का शिकार है. सोशल मीडिया ने इन्हें कनैक्टेड जरूर बनाया लेकिन खुद से, परिवार से और रियलिटी से सब से जरूरी कनैक्शन तोड़ दिया है. सब से बड़ा सवाल यह है कि जेनजी खुद जागेगी या स्क्रौल करतेकरते नैक्स्ट जनरेशन को भी यही विरासत देगी? Gen Z

पढ़ाई के साथ दुनियादारी भी सिखाते औनलाइन टीचर

Online Education: समय की बचत करने के लिए आजकल के स्टूडैंट्स औफलाइन क्लासेज के बजाय औनलाइन क्लासेज को प्रिफरैंस दे रहे हैं लेकिन इसी बीच कुछ पेरैंट्स और स्टूडैंट्स को यह शिकायत रहती है कि औनलाइन वाले टीचर्स पढ़ाने के अलावा इधरउधर की बातें ज्यादा करते हैं जिस से पढ़ाई का टाइम वेस्ट होता है लेकिन यह जानना जरूरी है कि ये इधरउधर की बातें टाइम वेस्ट नहीं बल्कि लाइफ की स्मार्ट इन्वैस्टमैंट होती हैं.

आ जकल अगर आप किसी औनलाइन क्लास में बैठ जाएं तो आप को जल्दी समझ आ जाएगा कि वहां सिर्फ किताबों की बातें नहीं होतीं. कई बार टीचर पढ़ाई के बीचबीच में अपनी जिंदगी के किस्से सुनाने लगते हैं. कभी अपने संघर्ष के दिनों की कहानी, कभी किसी स्टूडैंट की सफलता की कहानी तो कभी कोई लव स्टोरी.

कई बार यह सब टाइम वेस्ट लगता है. कई लोग कहते हैं कि ‘क्लास में पढ़ाई होनी चाहिए, ये सब बातें क्यों?’ लेकिन अगर थोड़ा सोचें तो सम?ा आएगा कि आज की जनरेशन के लिए ये बातें उतनी ही जरूरी हैं जितनी पढ़ाई.

आज के समय में बच्चों के पास जानकारी तो बहुत है लेकिन जीवन की समझ बहुत कम है. मोबाइल, इंटरनैट और सोशल मीडिया ने उन्हें हर तरह का कंटैंट तो दे दिया है लेकिन सहीगलत का फर्क सम?ाने वाला कोई नहीं है. आज के जेनजी बच्चे घर में किसी की नहीं सुनते. पेरैंट्स चाहे कितना भी समझाएं, वे एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देते हैं, यह सोच कर कि मम्मीपापा पुराने जमाने के हैं, वे कुछ नहीं समझते.

स्कूल में हालत और भी खराब है. ज्यादातर बच्चे वहां सिर्फ टाइम पास करने के लिए जाते हैं. क्लास में मोबाइल, दोस्तों से गप्पें या फिर टीचर की क्लास को इग्नोर करना. स्कूल टीचर भी इतने सारे बच्चों पर व्यक्तिगत ध्यान नहीं दे पाते. नतीजतन, बच्चे स्कूल से भी कुछ खास सीखे बिना निकल आते हैं.

लेकिन जब बच्चा कोचिंग या औनलाइन क्लास लेने को बैठता है तब उस की मानसिकता थोड़ी बदल जाती है. वहां पैसे दिए जाते हैं, इसलिए थोड़ी सीरियसनैस आ जाती है. टीचर छोटा सा भी पौइंट बताते हैं तो ध्यान से सुनते हैं. उन्हें पता होता है कि वे वहां पढ़ाई के लिए आए हैं. उसी दौरान अगर टीचर पढ़ाई के साथसाथ जिंदगी की कुछ बातें भी बता दें, जैसे मेहनत का महत्त्व, गलत संगत से बचना या रिश्तों को संभालना तो वह बात उन के दिमाग में ज्यादा असर करती है.

कई औनलाइन टीचर जानबूझ कर क्लास में अपने संघर्ष के किस्से बताते हैं. वे बताते हैं कि कैसे उन्होंने कम संसाधनों में पढ़ाई की, कैसे असफलताओं का सामना किया और फिर आगे बढ़े. ये बातें सुन कर कई स्टूडैंट्स को प्रेरणा मिलती है कि अगर कोई साधारण इंसान इतना आगे बढ़ सकता है तो वे भी कोशिश कर सकते हैं. इसी तरह के एक जानेमाने टीचर हैं खान सर, जो बच्चों को न सिर्फ आसान भाषा में कठिन विषय सम?ा देते हैं बल्कि पढ़ाई के बीच में ही वे टौपिक से जुड़े अपने जीवन के किसी किस्से को भी बताने लगते हैं. जो इंट्रैस्ंिटग होने के साथ प्रेरणादायी भी बन जाता है. फिजिक्सवाला, नेक्सट टौपर, वेदांतु, अनअकैडमी जैसे आज सैकड़ों औनलाइन क्लासेज चलती हैं जिन में हर सब्जैक्ट के अलगअलग टीचर्स भी होते हैं और ये सभी टीचर्स एक घंटे की क्लास में बच्चों का ध्यान बंटाने के लिए मोटिवेशनल बातें भी करते हैं.

रियल लाइफ स्किल्स जरूरी

अच्छे औनलाइन टीचर समझते हैं कि आज का छात्र सिर्फ 95 फीसदी मार्क्स या आईआईटी या नीट की तैयारी नहीं कर रहा. वह एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां उसे रियल लाइफ स्किल्स की बहुत जरूरत है : जैसे फेलियर से कैसे उबरें, रिलेशनशिप में क्या सही है क्या गलत, डिसिप्लिन कैसे बनाए रखें, गलत दोस्तों से कैसे बचें आदि. कई बार बच्चे पेरैंट्स के डर की वजह से भी उन से हर बात शेयर नहीं कर पाते और रही बात दोस्तों की तो इस उम्र में लगभग हर बच्चा अपने कैरियर के पीक पर होता है. कुछ दोस्तों से वे कटऔफ कर लेते हैं तो कुछ इन्फीरियोरिटी कौम्प्लैक्स के चलते दोस्तों से बात करने में हिचकिचाते हैं और रिश्तेदारों से तो कोसों दूर भागते हैं. ऐसे में बचते हैं तो बस कोचिंग टीचर, जिन से बात करने में स्टूडैंट्स को हिचकिचाहट नहीं होती.

दिल्ली के मानव ने इस साल बोर्ड की परीक्षा दी. उस ने नैक्सट टौपर नाम से एक औनलाइन बैच खरीदा था. सालभर साइंस पढ़ने के बाद उस ने बताया कि 12वीं क्लास में आते ही मेरे अंदर कन्फ्यूजन शुरू हो गया था कि मैं कौन सा कोर्स करूं लेकिन हर दिन उस बैच की क्लास लेने के दौरान टीचर जब अपनी स्टूडैंट लाइफ की स्ट्रगल स्टोरी सुनाते हैं तो बच्चे खुद से रिलेट करते हैं. ‘सर भी तो ऐसे ही थे’, ‘तो सर ने भी यह मुश्किल देखी थी’ यह सोच कर उन में उम्मीद जागती है.

अनुभव व कहानियां दूर करे कन्फ्यूजन

लव स्टोरी वाली बातें सुन कर वे समझते हैं कि प्यार में भी सीमाएं होती हैं. भावनाओं को कैसे हैंडल करें, ये सब किताबों में नहीं लिखा होता. असल में यह सब दुनियादारी का ज्ञान होता है जो किताबों में नहीं मिलता. किताबें आप को फार्मूले, थ्योरी और फैक्ट्स सिखाती हैं, लेकिन जिंदगी कैसे जीनी है, यह अनुभव और कहानियां सिखाती हैं.

पहले बच्चे दादादादी की कहानियां सुनते थे, पड़ोस के बड़ेबुजुर्ग से बातें करते थे, रिश्तेदारों के साथ समय बिताते थे. वहीं से उन्हें जिंदगी की समझ मिलती थी. आज वह माहौल बहुत कम रह गया है.

अब ज्यादातर समय मोबाइल स्क्रीन पर गुजरता है, वहां गहरी सीख कम ही मिलती है. ऐसे में अगर कोई टीचर क्लास में थोड़ी देर के लिए पढ़ाई से हट कर जीवन की बात कर देता है तो वह शायद उस स्टूडैंट के लिए बहुत काम की चीज होती है.

जो लोग कहते हैं कि औनलाइन क्लास में ये सब एक्स्ट्रा बातें टाइम वेस्ट हैं, वे शायद आज के बच्चों की असली समस्या नहीं सम?ा रहे. पढ़ाई तो कई जगह से हो सकती है : यूट्यूब, बुक्स, नोट्स. लेकिन दुनियादारी, जीवन के सबक, इमोशनल इंटैलिजैंस और सहीगलत की सम?ा, ये सिर्फ एक अनुभवी इंसान से ही आ सकता है.

अगर कोई टीचर अपनी क्लास में

10 मिनट दुनियादारी की बात कर लेता है और उस के बाद बच्चा 50 मिनट ज्यादा फोकस्ड रहता है, तो वे 10 मिनट वेस्ट नहीं, बल्कि सब से स्मार्ट इन्वैस्टमैंट हैं. आज की जनरेशन को नंबर्स और फार्मूले से ज्यादा जरूरत है सम?ादार इंसान बनने की. और वह समझदार इंसान बनाने का काम अब किताबें नहीं, बल्कि ये स्टोरी टैलिंग  वाले टीचर्स कर रहे हैं.

व्हाइट हाउस में वार गेन की जगह गौड गेन

International Politics: अमेरिका +इजरायल के ईरान से चल रहे वार ने कई मिथ तोड़े हैं. सोशल मीडिया पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जो कट्टर चर्च फौलोअर्स हैं उन्हें बुरी तरह शौक लगा है कि ईरान जिसे इंटरनैट की एबीसीडी नहीं आती होगी, कैसे इस तरह की मिसाइलें बना चुका था कि अमेरिका की टैं बोल गई.

इस की जिम्मेदारी पूरी तरह अमेरिकी पढ़ाईलिखाई और नौलेज एक्वीजीशन में घुसी इंटरनैट रिवोल्यूशन है. इंटरनैट ने हर हाथ से किताब छीन ली और उसे मोबाइल पकड़ा दिया जिस में नौलेज अपनेआप नहीं आती, ढूंढ़ो, तो दिखती है. अपनेआप तो गौसिप आता है, ईमेल आते हैं, ग्रुप मैसेज आते हैं, चैट होती है जिस में न लैंग्वेज होती है न लौजिक.

ईरान कोई खुले दिमाग वाला देश नहीं है पर वह चाहे धर्म का गुलाम हो, इंटरनैट का गुलाम नहीं है. ईरान ने इंटरनैंट का इस्तेमाल मैसेजिंग के लिए किया वरना उन्होंने आपसी किताबें पढ़नेलिखने के सदियों पुराने ट्रैडिशन को जिंदा रखा है.

पियू रिसर्च ने पाया था कि अमेरिकी हर समय सोशल मीडिया से जुड़े रहते हैं और दिन में 5-6 घंटे वे औनलाइन रहते हैं. उन का पेनेट्रेशन 100 परसैंट है. यानी, सभी अमेरिकियों के पास इंटरनैट है. जबकि, ईरानी एक घंटा भी इंटरनैट पर नहीं रहते. वहां जिन्हें इंटरनैट कनैक्शन मिल सकता है उन में से भी 70 फीसदी केवल बात करने लिए मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं.

भारत में अब सोशल मीडिया का इस्तेमाल देशनिर्माण के लिए नहीं बल्कि धर्मप्रचार के लिए हो रहा है और जम कर धर्म का धंधा हो रहा है. भारत में इंटरनैट लोगों को 15वीं सैंचुरी में ले जा रहा है. अमेरिका का पेंटागन सोच रहा था कि कट्टरपंथी ईरान इंडियंस की तरह ही होगा. ईरानियों ने फौरन वार इक्विपमैंट खरीदे, उन्हें खोल कर सम झा, इंप्रूव किया और अपने पहाड़ों का एडवांटेज लेते हुए उन्हें गुफाओं में बनाना शुरू कर दिया.

ट्रंप जो वार घंटों में खत्म करना चाह रहे थे वह महीना गुजर जाने के बाद भी थमता नहीं दिख रहा. अमेरिका के यूरोप के साथी भी अब सम झ रहे हैं कि अमेरिका एक मैंटली बैंकरप्ट नैशन बन चुका है जहां साइंस और टैक्नोलौजी की जगह चर्च ने ले ली है.

जैसेजैसे अमेरिकी एयरोप्लेन गिर रहे हैं, इजरायली शहरों पर हमले हो रहे हैं, अमेरिका के प्रैसिडैंट डोनाल्ड ट्रंप के घर व्हाइट हाउस में पादरियों की गिनती बढ़ रही है. वहां वार गेन की जगह गौड गेन शब्द गूंजने लगे हैं.

भारत का भी ऐसा ही कुछ होने वाला है. हम ने जो पहले कर भी लिया था उसे अब गंगायमुना में बहाने की तैयारी है. इंटरनैट पर गंगायमुना की हालत की रीलें देख लो. भरी पड़ी हैं. यही पूरे देश के साथ हो रहा है.

क्रिएटर के क्राइम में पार्टनर होते हैं फौलोअर

रील बनाने के चक्कर में बहुत से इन्फ्लुएंसर्स अपनी हड्डीपसली तो तुड़वा ही रहे हैं, दूसरों की जान भी खतरे में डाल रहे हैं. दिल्ली पुलिस ने एक रील क्रिएटर को पकड़ा जिस के वीडियो में वह रौंग साइड पर बाइक चला रहा था और सामने से आती कारों और ट्रकों से बच कर निकल रहा था. यह तो नैचुरल है कि ड्राइवर के पीछे वीडियो शूट करने वाले कम से कम 2 बाइक्स पर 4 जने होंगे जो सभी रौंग साइड पर ही चल रहे होंगे बिना वार्निंग के, बिना पुलिस परमिशन के.

रौंग साइड और सिविक इरिस्पौंसिबिलिटी सोशल मीडिया का हालमार्क बन गया. जितना ज्यादा चौंका सको, जितना ज्यादा डेयरिंग बन सको, जितने ज्यादा रिस्क ले सको, रील उतनी ही पौपुलर होगी. यह कुछ अच्छा करने के लिए नहीं दूसरों को डिस्टर्ब नहीं किया जा रहा बल्कि यह अपने स्वार्थ के लिए किया जा रहा है.

बंद कमरे में आप जो चाहो शूट करो, जो चाहो रिस्क लो, खुद के पैट्रोल से नहा कर लाइटर जलाओ, यह सब आप की मरजी. लेकिन इस से किसी का घर न जल जाए, यह तो देखना होगा न. आज के रील क्रिएटर लिमिट क्रौस कर रहे हैं. उन से ज्यादा उन के व्यूअर्स और फौलोअर्स जिम्मेदार हैं जो एक तरह से उन्हें गाल पर पप्पी दे रहे हैं कि वाह, क्या कमाल किया है.

आज की जेनजी इन तमाशों में बिजी हो गई है. पुराने रूल्स को चैलेंज करना हर नई जनरेशन का राइट भी है और रिस्पौंसिबिलिटी भी. लेकिन दूसरों को खतरों में डालने का राइट किसी को नहीं. इन दूसरों में शूटिंग करने में साथ लगे जहां एसोसिएट शामिल हैं वहीं घरवाले भी शामिल हैं और घर का सामान व अपना उन का खुद का फ्यूचर भी शामिल है.

रौंग साइड ड्राइविंग में पूरी सड़क डैंजर जोन बन जाती है. पुलिस तो बाद में आती है. सामने आने वाले और साइड में चलने वाले सभी घबरा जाते हैं कि क्या हो रहा है, कौन रौंग साइड पर क्यों चल रहा है. आज की रोड्स इतनी अनसेफ हैं कि सड़कों पर ध्यान बंटने से सीरियस ऐक्सिडैंट हो सकता है.

सब रील क्रिएटर नहीं जानते कि एक बार डिजिटल प्लेटफौर्म पर कुछ गया नहीं कि वह बरसों तक जिंदा रहेगा. और अब डिजिटल टैक्निक और फेसप्लेस रिकौग्नीशन टैक्निक सैकंडों में वर्षों पुराने डिलीट किए फोटो व वीडियो ढूंढ़ कर निकाल सकते हैं. क्रिएटर का पूरा फ्यूचर इन से बिगड़ सकता है.

फौलोअर्स को भी नहीं भूलना चाहिए कि वे जिसे फौलो कर रहे हैं उस का रिकौर्ड भी जमा हो रहा है. नैटफिलक्स पर बनी सीरीज ‘एडोल्सैंस’ में पुलिस कुछ घंटों में 13 साल के मर्डर एक्यूज्ड के मोबाइल इन अकाउंट्स के बल पर बेल नहीं देने का और्डर पा लेती है जिन्हें एक्यूज्ड फौलो कर रहा था. क्रिएटर के क्राइम में वे भी पार्टनर हैं. रौंग साइड औफ रोड हो या रौंग साइड औफ नौर्म हो, गलत ही है. International Politics

 

Hindi Story: खींची हुई लकीर

Hindi Story: सुबह से प्रभा किचन में व्यस्त थी. आज उस के पति डा. प्रेम को सरकारी सेवा में पूरे 10 वर्ष हो गए थे. इसी खुशी में प्रभा ने विशेष लंच का इंतजाम किया था. बाहर का कोई मेहमान इस आयोजन में शामिल नहीं था. घर के सारे सदस्यों के लिए सब की पसंद के व्यंजन बनाए थे प्रभा ने. अम्मां की पसंद का राजमा, बाबूजी के लिए भरवां बैगन, प्रेम के लिए दमआलू. बडे़ देवर को लौकी के कोफ्ते पसंद थे तो छोटे को छोले. बच्चों के लिए स्वीट डिश बनी हुई थी और अपने लिए पुलाव. सब से छोटी ननद को आलू के परांठे बहुत प्रिय थे. इतना सारा इंतजाम करने में उसे काफी समय लग गया. डेढ़ बजे घर के सारे सदस्य इकट्ठे हो गए.

मेज सजी देख कर शुभम बोला, ‘‘वाह भाभी, मजा आ गया आज तो. कोई खास बात है क्या?’’

‘‘खास बात ही तो है. इस माह से एक और इनक्रीमेंट जो मिलने वाला है,’’ डा. प्रेम मजाक के लहजे में बोले.

‘‘अच्छा, तो आज भाई साहब की नौकरी का जन्मदिन है,’’ विवेक की बात सुन कर सब खिलखिला उठे.

‘‘चलो भई, खाना शुरू करो. यों ही ढंके हुए डोंगों की खुशबू से पेट भरने का इरादा है क्या?’’ बाबूजी बोले.

‘‘मम्मी आती ही होंगी. तभी खाने की शुरुआत होगी. ये लो, वह आ भी गईं शर्मा आंटी के घर से,’’ लता बोली.

अम्मां के बैठते ही सब ने खाना निकालना शुरू किया. पहले भरवां बैगन के डोंगे का ढक्कन उठा कर वह बोलीं, ‘‘यह क्या, प्रभा, महीने भर का तेल आज के ही खाने में डाल दिया है तुम ने. कितनी बार कहा है, किफायत से चला करो पर तुम्हारी फुजूलखर्ची की आदत गई नहीं.’’

अम्मां की बात से प्रभा का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. उसे उदास देख कर शुभम बोला, ‘‘क्या मम्मी, कभी तोभाभी के खाने की तारीफ कर दिया करो. कितनी मेहनत की है उन्होंने आज के लंच के लिए.’’

‘‘तू चुप कर. बड़ा आया भाभी का हिमायती. पूरे महीने का खर्च तो मुझे ही चलाना पड़ता है. इतने सारे व्यंजन बनाने की क्या जरूरत थी.’’

‘‘हमें कौन सी रुपयों की कमी है, मम्मी. बड़े भैया डाक्टर हैं, शुभम इंजीनियर और मैं एम.बी.ए. कर के कहीं अच्छी नौकरी कर ही लूंगा. बाबूजी को भी अच्छी पेंशन मिलती है,’’ विवेक बोला.

‘‘जिन्हें रुपयों की कमी होती है वे ही किफायत करते हैं क्या? और लोग नहीं करते? आड़े वक्त पर रुपए ही काम आते हैं, समझे,’’ चंदा देवी बोलीं.

चंदा देवी की बातों से खाने का मजा किरकिरा हो गया था. प्रभा की भावनाओं की कद्र करते हुए सब उस की तारीफ कर रहे थे. यह सब सुन कर चंदा देवी की भौंहें और तन गई थीं. वह चुपचाप खाना खा कर उठ गईं. बड़ा बेटा मां को मनाते हुए बोला, ‘‘मां, नाराज हो गईं. मुझे बधाई तो दे दो. आज तुम्हारे बेटे की ज्वाइनिंग की तारीख है. तभी तो प्रभा ने थोड़ा बजट बढ़ा दिया.’’

‘‘बहू का पक्ष लेने आया होगा तू यहां. कहे देती हूं, उसे समझा दे कि मां को फुजूलखर्ची कतई पसंद नहीं है.’’

‘‘कह दूंगा. अब तो नाराजगी छोड़ दो,’’ प्रेम बोला.

बेटे के मनुहार से चंदा देवी थोड़ी देर में सामान्य हो गईं. अभी प्रेम के लिए प्रभा को मनाना बाकी था. किचन का काम निबटा कर वह भी बेडरूम में उसी का इंतजार कर रही थी.

कमरे में आ कर प्रभा को समझाते हुए वह बोले, ‘‘मां की बात का बुरा नहीं मानते. वह हमारी भलाई  के लिए ही तो कहती हैं.’’

‘‘हर काम में मीनमेख और टोकाटाकी मुझ से सहन नहीं होती. 6 साल हो गए मुझे इस घर में आए हुए. 2 बच्चों की मां हूं मैं. मुझे क्या इस घर की फ्रिक नहीं है. सब की इच्छा का ध्यान रखो तब भी कुछ न कुछ सुनना पड़ता है,’’ प्रभा बोली.

‘‘तुम्हारी सहनशीलता की तो सब तारीफ करते हैं.’’

‘‘मांजी तो नहीं करतीं न. अच्छा खाना, अच्छा पहनना कुछ अच्छा नहीं लगता उन्हें. हमारे भी तो यही दिन हैं ओढ़नेखाने के. बाकी शौक क्या बुढ़ापे में पूरे करेंगे?’’

‘‘तुम बेकार में मां की बातों को गंभीरता से ले रही हो. हमें यहां तक पहुंचाने में बहुत संघर्ष और त्याग किया है उन्होंने. तभी हम यहां तक पहुंच सके हैं. यह बात तुम्हें भी याद रखनी चाहिए.’’

‘‘यही सब सोच कर तो मैं चुप रह जाती हूं, जवाब नहीं देती. एक मेरा मुंह तो वह बंद करवा देंगी, कल शुभम और विवेक की शादी होगी. उन्हें यही आदत पड़ी रहेगी तो उन की बीवियां तो चुप नहीं बैठेंगी. समय के साथ मांजी को भी तो समझौता कर लेना चाहिए. यह बात आप भी तो उन्हें समझा सकते हैं.’’

‘‘मां का बदलना आसान काम नहीं है. शुभम और विवेक की होने वाली बीवियों की ंिचंता तुम अभी से क्यों कर रही हो. जो होगा देखा जाएगा,’’ प्रेम ने कहा. पति की प्यार और समझदारी की बातें प्रभा की नाराजगी आसानी से दूर कर देतीं. वह खुद भी मांजी की जीतोड़ मेहनत से बने इस परिवार को तोड़ना नहीं चाहती थी. यही सोच कर उस ने कभी पति पर इस शहर को छोड़ कर दूसरे शहर ट्रांसफर के लिए जोर नहीं डाला.

2 साल के अंदर शुभम का रिश्ता तय हो गया. पूरे रस्मोरिवाज के साथ उषा इस घर में मंझली बहू बन कर आ गई. चंदा देवी दूसरी बहू के आ जाने से बहुत खुश थीं. पहली बहू प्रभा से उषा अधिक सुंदर भी थी और अमीर भी. दहेज में भी ढेर सारा सामान लाई थी. बढ़ते लोगों की आवश्यकता के अनुरूप घर छोटा पड़ने लगा था. तभी प्रमोशन के साथ प्रेम का ट्रांसफर दिल्ली हो गया. प्रभा ने राहत की सांस ली. ‘यह तो अच्छा हुआ उषा के आने के बाद इन का तबादला हुआ, नहीं तो अम्मां इस के लिए भी मुझे ही दोषी मानतीं और दिनरात ताने सुनातीं,’ उस ने सोचा.

शीघ्र ही परिवार से विदा ले कर डा. प्रेम पत्नी एवं बच्चों सहित दिल्ली के सरकारी आवास में आ गए. घर से चलते हुए चंदा देवी ने उन्हें ढेर सारी नसीहतें दे डालीं, ‘‘बेटा, नए शहर में ठीक से रहना. बहुत बड़ी जगह है दिल्ली. घूमनेफिरने, सैरसपाटे में मगन मत रहना. बच्चों पर भी पूरा ध्यान देना. उतने ही पैर पसारना जितनी बड़ी चादर हो. जब भी मौका मिले हम बूढ़ों की भी कुशलखबर लेते रहना.’’

आशीर्वाद के साथ भरी आंखों से विदा किया चंदा देवी ने अपने बड़े बेटे के परिवार को. उन के दूर जाने का सभी को दुख हो रहा था. उषा ने जल्दी ही प्रभा की कमी को पूरा कर दिया और बड़ी कुशलता से घर चलाने लगी. प्रभा के चले जाने से अब मां के ध्यान का केंद्र उषा थी. कहीं उस से कोई  भूल हो जाती तो वह कहने से न चूकतीं.

उषा दबे स्वर में शुभम से इस की शिकायत करती तो वह कहता, ‘‘तुम इस घर की दूसरी बहू हो. प्रभा भाभी को देखो, पूरे 8 वर्ष रहीं इस घर में पर कभी मम्मी की किसी बात का बुरा मान कर जबान नहीं खोली उन के सामने. तुम्हें भी उसी समझदारी के साथ अपने फर्ज निभाने हैं. इसी में हम सब की भलाई है.’’

‘‘मैं ने फर्ज निभाने से कहां मना किया है पर मांजी की रोकटोक मुझे अच्छी नहीं लगती. हर काम में कमी ही निकालती रहती हैं. और तो और किचन का एकएक डब्बा खोल कर सामान की जांच करती हैं.’’

‘‘दरअसल, मम्मी बहुत गरीब घर की बहू बन कर आई  थीं. पापा तो सिर्र्फ नौकरी करना जानते थे. गृहस्थी का सारा बोझ मम्मी पर था. छोटीछोटी बचतें कर के उन्होंने अपने घर की सारी जिम्मेदारियां निभाईं और हमें भी पढ़ालिखा कर योग्य बनाया. उन की वे आदतें आज भी वैसी ही बनी हुई हैं. इस का बुरा मत माना करो. अब तो वे आदतें छूटने से रहीं. तुम्हें ही उन के साथ ऐडजस्ट करना होगा, उषा.’’

‘‘किचन की तो छोड़ो, वह तो जब तब बेडरूम में घुस कर अलमारी भी देखने लगती हैं. मुझे बड़ा अजीब सा लगता है. आखिर, कुछ तो प्राइवेसी होनी चाहिए.’’

‘‘धीरेधीरे तुम्हें सब बातों की आदत पड़ जाएगी. मम्मी दिल से बुरी नहीं हैं पर आदत से मजबूर हैं. हो सके तो उन की बातों को नजरअंदाज कर दिया करो,’’ शुभम बोला.

शुभम सोचने लगा, ‘भाभी इस घर में इतने वर्ष रहीं, पर हम ने कभी उन की समस्याओं को जानने की कोशिश तक न की. प्रेम भैया से ही कह कर वह मन हलका कर लिया करती होंगी. औरतों को कैसीकैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है इस का एहसास मुझे अब हो रहा है.’

उषा ने भी प्रभा के पदचिह्नों पर चल कर चंदा देवी से तालमेल बिठाने की जीतोड़ कोशिश की. काफी हद तक वह इस में सफल भी हो गई पर जबतब उन का व्यवहार उस के हौसलों को पस्त कर देता. ऐसे में शुभम का मूक बन कर सबकुछ चुपचाप सहन कर लेना उसे बड़ा अखरता. उम्र के साथ चंदा देवी का स्वभाव और भी चिड़चिड़ा होता जा रहा था. महीने भर के बजट में जरा सा भी हेरफेर हो जाता तो वह तूफान खड़ा कर देतीं. शुभम छिप कर बढ़े हुए बजट की क्षतिपूर्ति कर देता था.

एक दिन उस के बैग में राशन का सामान देख कर वह फट पड़ीं, ‘‘बहू की खातिर अब मां से भी छिपाने लगा है तू बातों को. तुम्हारे भले के लिए ही तो टोकाटाकी करती हूं. क्या यह सबकुछ मैं छाती पर रख कर ले जाऊंगी. तुम लोगों के ही तो काम आएंगे आज के बचाए हुए चार पैसे.’’

‘‘मम्मी, आप गलत समझ रही हैं. मैं ने तो आप को बेवजह तनाव से बचाने के लिए यह रास्ता अपनाया था,’’ शुभम बोला.

‘‘चुप, जोरू का गुलाम. उस ने कहा और तू ने कर दिया. मां का खयाल नहीं आया तुझे. समझाने की बात पर यह रास्ता निकाला तू ने. ठीक है, आज से मैं तुझे कुछ नहीं कहूंगी.’’

अपने वादे को निभाने के लिए चंदा देवी बेटेबहू से तो सीधे कुछ न कहतीं, पर दिन भर बाबूजी को ताने सुनाती रहतीं. बाबूजी तो संत स्वभाव के थे. वह घर के पचड़ों में कभी नहीं पड़े थे. चंदा देवी के आगे उन की कभी एक न चली थी, सो उन्होंने इस विषय में सोचना ही छोड़ दिया था. रातदिन बाबूजी से मम्मी का यह व्यवहार देख शुभम से न रहा गया. मां के पैर पकड़ते हुए बोला, ‘‘अब गुस्सा थूक भी दो, मम्मी. कसम खा कर कहता हूं, ऐसी गलती कभी नहीं करूंगा. तुम्हें हमें समझाने का पूरा हक है.’’

बेटे के मनाने पर चंदा देवी ने हठ छोड़ दिया और उसी पल से उन की पुरानी दिनचर्या शुरू हो गई. अब वह शुभम के वादे को परखने के लिए उन के बेडरूम में भी ताकाझांकी करने लगीं. उषा के लिए ये सब असहनीय था, पर वह मजबूर थी. कभीकभार शौक पूरा करने के लिए वह रात को बंद कमरे में झीनी नाइटी पहन लेती थी. एक दिन उस पर नजर पड़ जाने से मांजी ने जिन शब्दों का प्रयोग किया उसे सुन कर उषा शरम से पानीपानी हो गई.

चंदा देवी अपनी बेटी लता पर जान छिड़कती थीं. उस का हर शौक पूरा करना अपना फर्ज समझतीं. जिन परिधानों को बंद कमरे में भी पहने की बहुओं को छूट नहीं थी, उन्हें वह खुलेआम पहन कर घूमती. घर पर सभी को बहूबेटियों का यह भेद फूटी आंख न सुहाता पर अम्मां के स्वभाव को देखते हुए सब मुंह बंद ही रखते.

अपने जीवन के किसी अभाव की बेटी पर उन्होंने छाया भी नहीं पड़ने दी थी. पराई अमानत मानते हुए वह उस की हर छोटीबड़ी इच्छा का सम्मान करतीं. ज्यादा लाड़प्यार के कारण वह कुछ ज्यादा ही नाजुक हो गई थी. 3 भाइयों की 1 बहन होना कोई  कम गर्व की बात तो नहीं थी. चंदा देवी का कड़ा रुख बेटी के सामने एकदम मुलायम हो जाता. मांबेटी के संबंधों को देख कर उषा कभी सोचती, ‘मांजी हमें भी अपनी बेटी की तरह क्यों नहीं मानती हैं? बेटी तो बेटी होती है. सभी को एक दिन पराया होना पड़ता है. हम से जिन बातों की उम्मीद वह करती हैं उस का एक अंश भी तो उन्होंने अपनी बेटी को नहीं सिखाया. कहीं लता को भी मांजी जैसी सास मिल गई तो.’

मन में आए गलत विचार को उषा ने तुरंत झटक दिया और उस के खुशहाल जीवन की कामना करने लगी. लता कितनी ही मां के मुंह लगी क्यों न थी फिर भी भैयाभाभी का पूरा अदब करती. कभीकभी मांजी की नजर बचा कर किचन में आ जाती और भाभी का हाथ बंटाती.

बी.ए. पास करते ही लता के लिए रिश्ते आने लगे. काफी छानबीन के बाद सुरेश से उस का रिश्ता अम्मां को जंच गया. सुरेश विदेश में साफ्टवेयर इंजीनियर था. उस का परिवार दिल्ली में रहता था. मां के कहने पर प्रेम और प्रभा उस की ससुराल देख कर आ गए थे. सबकुछ ठीक था. बड़ी धूमधाम से लता का विवाह हो गया. शादी के 1 हफ्ते बाद ही वह पति के साथ अमेरिका चली गई.

बेटी की जिम्मेदारी निभा कर चंदा देवी बहुत खुश थीं. जबतब बेटी की जुदाई उन्हें परेशान भी करती. ‘अपने देश बेटी दी होती तो महीने दो महीने में मम्मी से मिलने तो आ ही जाती. सात समुंदर पार से साल में एक बार भी आ पाएगी या नहीं.’ सोच कर चंदा देवी उदास हो जातीं. फोन से बात कर के वह लता की कुशलक्षेम पूछ लेतीं.

4 महीने के बाद अचानक लता बिना किसी को कुछ बताए अमेरिका से वापस मायके आ गई तो चंदा देवी भौचक रह गईं. इन 4 महीनों में ही वह क्या से क्या हो गई थी. चेहरे पर रौनक का नामोनिशान नहीं था. आंखें अंदर धंस गई थीं. मांबाबूजी से लिपट कर वह बहुत रोई. लाख पूछने पर भी उस ने कुछ नहीं बताया.

लता गर्भवती थी. ऐसी हालत में उस पर किसी बात का जोर डालना उस के लिए खतरनाक हो सकता था, यही सोच कर सब ने चुप्पी साध ली और उस के सामान्य होने का इंतजार करने लगे. सुरेश से फोन पर बात करने पर भी उस ने कुछ नहीं बताया. बस, यही कहा, लता की जिद शुरू से ही हिंदुस्तान जाने की थी. उस का घर से दूर यहां जरा भी मन नहीं लगा.

उषा ने लता की डिलीवरी तक उस की बहुत सेवा की. लाड़प्यार में पलीबढ़ी ननद की यह हालत देख कर उसे बड़ा दुख होता. उषा हर प्रकार से उस का दिल बहलाने की कोशिश करती, पर लता एक खोखली हंसी हंस कर रह जाती. लता के दुख को सभी महसूस कर रहे थे. यह एहसास चंदा देवी को कहीं अंदर ही अंदर सुकून दे रहा था. उन की सलाह से पहले ही उषा और शुभम लता की हर जरूरत को पूरा कर देते. Hindi Story

Hindi Story: अपना अपना सच

Hindi Story: दिल्ली से तबादला हो कर जालंधर आना हुआ तो सहज सुखद एहसास से मन  भर आया. अभय ने पुराने साथियों के बारे में बताया.

‘‘वे जो मेहरा साहब अहमदाबाद में थे न, अरे, वही जो अपनी बेटी को ‘मिस इंडिया’ बनाना चाहते थे…’’

‘‘गुप्ता साहब याद है, जिन के बच्चे बहुत गाली बकते थे. अंबाला में हमारे साथ थे…’’

‘‘जयपुर में थे. हमारे साथ, वह शर्माजी…’’

इस तरह के जाने कितने ही नाम अभय ने गिना दिए. 10 साल का समय और बीत चुका है, कौन क्या से क्या हो गया होगा. और होगा क्यों न जब मैं ही 10 साल में इतनी बदल गई हूं तो प्रकृति के नियम से वे सब कहां बच पाए होंगे.

10 साल पहले जब हम अहमदाबाद में थे तब एक मेहराजी हमारे साथ थे. उन की बेटी बहुत सुंदर थी. कदकाठी भी अच्छी थी. वह अपनी बेटी को बिलकुल मौड कपड़े पहनाते थे. इस बारे में आज से 10 साल पहले भी मेरी सोच वही थी जो आज है कि कदकाठी और रूपलावण्य तो प्रकृति की देन है. जिस रूप के होने न होने पर अपना कोई बस ही न हो उसी को ले कर इतनी स्पर्धा किसलिए? इनसान स्पर्धा भी करे तो उस गुण को ले कर जिस को विकसित करने में हमारा अपना भी कोई योगदान हो.

मैं किसी की विचारधारा को नकारती नहीं पर यह भी तो एक सत्य है न कि हम मध्यवर्गीय लोगों में एक ही तो एहसास जिंदा बच पाया है कि केवल हम ही हैं जो शायद लज्जा और शरम का लबादा ओढ़े बैठे हैं.

10 साल पहले जब मैं उन की बेटी को निकर और टीशर्ट में देखती थी तब अच्छा नहीं लगता था. 17-18 साल की सुंदर, सजीली, प्यारी सी बच्ची जब खुली टांगें, खुली बांहें लिए डोलती फिरेगी तो किसकिस की नजर को आप रोक पाओगे. अकसर जब हमारे संस्कार उस बच्ची को सलवारसूट पहनाना चाह रहे होते थे तब उस के मातापिता नजरों में गौरव लिए सिर उठा कर सब के चेहरे पर पता नहीं क्या पढ़ना चाहते थे.

‘‘शुभा, तुम तो पुराने जमाने की बातें करती हो. ग्लैमर और चकाचौंध की दुनिया में शोहरत और पैसा दोनों हैं. अगर हम ऐसा सोचते हैं तो इस में बुरा क्या है?’’ अकसर श्रीमती मेहरा कह देतीं.

मेरी सोच मेरी है और उस का दायरा केवल मेरा घर, मेरी गृहस्थी और मेरा परिवार है. भला समय से पहले किसी को गलत या सही कहने का मुझे क्या अधिकार था जो मैं किसी पर कोई मोहर लगाती. कुछ दिन घर को और खुद को व्यवस्थित करने में लग गए.

मेरे दोनों बच्चे पढ़ाई पूरी करने के बाद अपनेअपने लिए अच्छी नौकरी की तलाश में थे सो अकसर कभी कहीं और कभी कहीं साक्षात्कार के लिए जाते रहते थे. एक शाम सोचा, क्यों न नजदीक के बाजार में जा कर थोड़ीबहुत घूम लूं. इस से पता तो चल ही जाएगा कि कहां क्या सामान मिलता है. तबादले की नौकरी वालों का कोई संबंध स्थायी नहीं रह पाता. किसी के प्रति संजोया स्नेह और अपनत्व मात्र यादों में सिमट जाता है या हमारे मन के किसी कोने में दुबक कर हमें कभी पुलकित करता है तो कभी रुलाता है.

दोस्ती द्वारा रोपित रिश्ते आधे भारत में बिखरे पड़े हैं. कहने को हर शहर अपना है, यादों में है लेकिन अब इस उम्र में जब बच्चों के अपनीअपनी दिशा में चले जाने के बाद हमें सुखदुख का साथी चाहिए तो हम खाली हाथ हैं. कभी चाहें भी किसी से बात करना तो किस से करें. नजदीक में छोटी सी मार्केट की 20-25 दुकानों में जरूरत का सब सामान उपलब्ध था. सोचा अगर मार्केट मिल गई है तो कोई अच्छी सी सखी भी मिल ही जाएगी.

मैं ने कुछ जरूरी सामान खरीदा और वापसी पर दुकानों के पीछे से निकली तो सामने दर्जी और ब्यूटी पार्लर की दुकान देख कर सोचा, चलो, अच्छा है यह भी यहीं हैं. तभी एकाएक टांगों में कुछ लिपट सा गया. किसी तरह खुद को संभाल कर देखा तो 3-4 साल का प्यारा सा बच्चा मेरी टांगों में लिपटा नानीनानी की गुहार लगाने लगा.

मैं ने आगेपीछे देखा, किस का होगा यह नन्हा सा रूई का गोले सा बच्चा. दुकानों के पीछे कोई घर भी नहीं था जहां से इस के आने की संभावना हो. सामने दर्जी की 2-3 दुकानें थीं और ब्यूटी पार्लर, कहीं वहीं से तो नहीं आया. हाथ में खरीदे हुए सामान को किसी तरह संभाल कर मैं ने बच्चे का हाथ पकड़ा. शायद ब्यूटी पार्लर में आई किसी महिला का हो यह प्यारा सा बच्चा. यही सोच कर मैं ने किसी तरह उसे धीरेधीरे पैरों से चलाते हुए अपने साथ ब्यूटी पार्लर तक ले गई और दरवाजा खोल कर पूछा, ‘‘सुनिए, यह बच्चा आप का है क्या? बाहर भटक रहा था.’’

‘‘ओहो, यह फिर बाहर निकल गया. मोनू के बच्चे, मैं तेरी पिटाई कर दूंगी. काम करना मुश्किल हो गया है. मुंह से धागा खींचखींच कर किसी महिला की भवें संवारती युवती की आवाज आई, ‘‘कृपया इसे यहीं छोड़ दीजिएगा.’’

बच्चे को भीतर धकेल कर मैं ने दरवाजा बंद कर दिया लेकिन जो थोड़ी सी झलक मैं ने उस लड़की की देखी थी उस ने विचित्र सी जिज्ञासा मन में भर दी. इसे कहीं देखा सा लगता है.

एक दिन अभय बोले, ‘‘सुनो, तुम बता रही थीं न कि यहां मार्केट में एक ब्यूटी पार्लर भी है जहां वह प्यारा सा बच्चा देखा था. जरा जा कर बालों को रंगवा लो न, सफेदी बहुत ज्यादा झलकने लगी है.’’

‘‘क्यों, इस की क्या जरूरत है. चेहरे का ढलका मांस और काले बाल दोनों साथसाथ कितने बेतुके लगते हैं. क्या आप नहीं जानते… मुझे बाल काले नहीं कराने.’’

‘‘अरे बाबा, आजकल, कोई सफेद बालों वाला नजर नहीं आता. समझा करो न…’’

‘‘न आए, हम तो आएंगे न. जवान बच्चे अगलबगल खड़े हों तो क्या पता नहीं चलता कि हम 50 पार कर चुके हैं. फिर इस सत्य को छिपाने की क्या जरूरत है.’’

जब हम दिल्ली में थे तो मेहंदी लगे काले सुंदर बालों का एक किस्सा मैं आज भी भूली नहीं हूं. मेरी एक हमउम्र सखी जो पलपल खुद को जवान होना मानती थी, इसी बात पर कितने दिन सदमे में रही थी कि बेटे की उम्र का लड़का उसे लगातार छेड़ता रहा था. वह तो उसे बच्चा समझ कर नजरअंदाज करती रही थी, लेकिन एक शाम जब उस युवक ने हद पार कर दी तब सखी से रहा नहीं गया और बोली थी, ‘मेरे बेटे, तुम्हारी उम्र के हैं. शरम नहीं आई तुम्हें ऐसा कहते हुए. तुम्हारी मां की उम्र की हूं मैं.’

‘तो नजर भी तो आइए न मुझे मां की उम्र की. आप तो मेरी उम्र की लगती हैं. मुझ से गलती हो गई तो मेरा क्या कुसूर है.’

वह बेचारी तो झंझावात में थी और हम सुनने वाले न रो पा रहे थे और न ही हंसी आ रही थी. बच्चे तो सफेद बालों से ही उम्र का अंदाजा लगाएंगे न.

एक शाम मेहरा साहब के घर गए तब वास्तव में मिसेज मेहरा को देख कर यही लगा कि उन की उम्र तो वहीं की वहीं खड़ी है जहां आज से 10 साल पहले खड़ी थी.

‘‘अरे शुभा, कितनी बूढ़ी लगने लगी हो,’’ श्रीमती मेहरा ने कहा था.

‘‘बूढ़ी नहीं, बड़ी कहिए श्रीमती मेहरा,’’ और खिलखिला कर हंस पड़ी मैं. कंधों तक कटे बाल और उन पर सफेदी की जगह चमकता भूरा रंग, खुली बांहें और चुस्तदुरुस्त कपड़े. अभय की नजरें मुझ से टकराईं तो मुसकराने लगे, मानो कह रहे हों कि देखा न.

‘‘भई, मेरी बात छोडि़ए न कि मैं कैसी लगती हूं. आप बच्चों के बारे में बताइए कि बेटी क्या करती है और बेटा…’’

अभय और मेहराजी तो बातों में व्यस्त हो गए लेकिन श्रीमती मेहरा की बातों की सूई मेरी बड़ी उम्र पर आ कर रुक गई.

‘‘नहीं शुभा, इस तरह हार मान लेना अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘मैं ने कब कहा कि मैं ने हार मान ली है. हार तो वह मान रहे हैं जो उम्र का बढ़ना स्वीकार ही करना नहीं चाहते. अरे, यह शरीर जिसे हम सब 50 सालों से इस्तेमाल कर रहे हैं, धीरेधीरे कमजोर हो रहा है, इस सत्य को हम लोग मानना ही नहीं चाहते. भई, हम सब बड़़े हो गए हैं. इस सत्य को पूरी इज्जत और सम्मान के साथ हमें मानना चाहिए. बालों का सफेद होना शरम की नहीं गरिमा की बात है, ऐसा मेरा विचार है.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है कि मैं सत्य को झुठला रही हूं?’’ सदा की तरह अपनी ही बात को दबाना चाह रही थीं श्रीमती मेहरा. जिस पर सदा की तरह मैं ने भी झुंझलाना चाहा लेकिन किसी तरह खुद को रोक लिया.

‘‘अरे, छोड़ो भी श्रीमती मेहरा, हमारी बीत गई अब बच्चों की सोचो. बताओ न बच्चे क्या कर रहे हैं? आप की वह प्यारी सी बिटिया क्या कर रही है? अब तक उस की तो शादी भी हो गई होगी? बेटा क्या करता है?’’

मेरे सवालों का कोई ठोस उत्तर नहीं दिया श्रीमती मेहरा ने. बस, गोलमोल सा बता कर बहला दिया मुझे भी.

‘‘हां, ठीक हैं बच्चे. मिनी की शादी कर दी है. आशु भी अपना काम करता है.’’

घर चले आए हम. मुझे तो लगा वास्तव में श्रीमती मेहरा की उम्र रुकी ही नहीं, काफी पीछे लौट गई है. इस उम्र में भी वह स्वयं को 25-30 से ज्यादा का मानना नहीं चाहती रही थीं. बातों की धुरी को बस, अपने ही हावभाव और रूपसज्जा के इर्दगिर्द घुमाती रही थीं. जबकि इस उम्र में हमारी सोच पर बच्चों की चर्चा प्रभावी होनी चाहिए और वह अपना ही साजशृंगार कर रही थीं.

‘‘देखा न, श्रीमती मेहरा आज भी वैसी ही लगती हैं,’’ अभय बोले.

‘‘अरे भई, वैसी ही कहां, वह तो और भी छोटी हो गई हैं. लगता है बहुत मेहनत करती हैं अपनेआप पर.’’

‘‘हां, तभी तो आशु एक वर्कशाप में नौकरी करता है और मिनी भी यहीं कहीं किसी ब्यूटी पार्लर में काम करती है,’’ दुखी मन से अभय ने उत्तर दिया.

सहसा मुझे याद आया कि वह नन्हा सा बच्चा और वह काम करती लड़की… कहीं मिनी तो नहीं थी. मेहरा साहब ने बातोंबातों में अभय को सब बताया होगा जिस से वे काफी उदास थे.

‘‘शुभा, अपना बनावशृंगार बुरी बात नहीं है लेकिन जीवन में एक उचित तालमेल, एक उचित सामंजस्य होना बहुत जरूरी है. मिसेज मेहरा को ही देख लो. 50 की होने को आईं पर अभी भी एक किशोरी सी दिखने की उन की चाह कितनी छिछोरी सी लगती है. मिनी को शुरू से बस, सुंदर ही दिखना सिखाया उन्होंने, कोई भी और गुण विकसित नहीं होने दिया. न पढ़ाईलिखाई न कामकाज. नतीजा क्या निकला? यही न कि वह मिस इंडिया तो बन नहीं पाई और जो होना चाहिए था वह भी न हुई.

यही हाल आशु का है. वह भी ज्यादा पढ़लिख नहीं पाया. तो अब किसी मोटर वर्कशाप में काम करता है. ऐसा ही तो होता है. जिन मांबाप को आज तक अपने ही शौक पूरे करने से फुरसत नहीं वे बच्चों का कब और कैसे सोचेंगे.’’ कहतेकहते अभय चुप हो गए और मैं उन की बातें सुन कर असमंजस में रह गई. एकाएक फिर बोले, ‘‘बच्चों को कुछ बनाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है, शुभा. एक मध्यवर्गीय परिवार को तो बहुत ही ज्यादा. सच है, तुम ने अपने बच्चों को बड़ी मेहनत से पाला है.’’

2 दिन के बाद फुरसत में मैं उसी ब्यूटी पार्लर में जा पहुंची. गौर से उस युवती को देखा तो लगा वही तो थी वह प्यारी सी बच्ची, मिनी.

‘‘आइए मैडम, क्या कराएंगी?’’ यह पूछते हुए उस युवती ने भी गौर से मेरा चेहरा देखा. सामने सोफे के एक किनारे पर उस का बच्चा सो रहा था.

‘‘मुझे पहचाना नहीं, बेटा, मैं शुभा आंटी हूं… याद है, हम अहमदाबाद में साथसाथ रहते थे. तुम मेहरा साहब की बेटी हो न… मिनी?’’

अवाक् सिर से ले कर पैर तक वह बारबार मुझे ही देख रही थी. तभी उस का बच्चा जाग गया. लपक कर उसे थपकने लगी ताकि वह एकाग्र मन से काम कर सके. शायद वह मुझे पहचान नहीं पा रही थी. उस का रूई सा गोरागोरा बच्चा जाग उठा था.

‘‘आजा बेटा, मेरे पास आ. अरे, मैं नानी हूं तुम्हारी,’’ ढेर सारा प्यार उमड़ आया था उस पर. मेरी अपनी बेटी होती तो शायद मैं भी अब तक नानी बन  चुकी होती.

पहले ही दिन इस बच्चे ने मुझे नानी मान लिया था न. बच्चा मेरी गोद में चला आया लेकिन मिनी जड़वतसी खड़ी रही.

‘‘बेटा, क्या मैं इतनी बूढ़ी हो गई हूं जो पहचान में ही नहीं आती?’’

उस का सकपकाया सा चेहरा बता रहा था कि मेरे सामने वह खुद को सामान्य नहीं कर पा रही थी. क्याक्या सपने थे मिनी के? भारत सुंदरी, विश्व सुंदरी के बाद सारे संसार पर छा जाने जैसा कुछ. तब मिनी के जमीन पर पैर कहां थे. उस का भी क्या दोष था? जिस आकार में उस की मां उसे ढाल रही थी उसी में तो मिनी की गीली मिट्टी ढल रही थी. बेचारी, न पढ़ती थी और न ही कोई अन्य काम सीखने की उस में ललक थी तब.

उस का सत्य यही था कि भला एक सुपर माडल को हाथपैर गंदे करने की क्या जरूरत थी. हम सब के जीवन में न जाने कितने पड़ाव आते हैं जिन में हर पड़ाव का अपना ही सत्य होता है. उस  पल का सत्य वह था और आज का सत्य यह कि वही मिनी कुछ नहीं बन पाई और मुझ से यों नजरें चुरा रही थी जैसे मैं उस पर अभी यह प्रश्न दाग दूंगी कि क्या हुआ मिनी, तुम भारत सुंदरी बनना चाहती थीं तो बनी क्यों नहीं?

‘‘मैं शुभा आंटी हूं न, सौरभगौरव की मम्मी.’’

मिनी का स्वर तो नहीं फूटा पर मेरा हाथ उस ने कस कर पकड़ लिया. उस की आंखों में कितना कुछ तैरने लगा था. तभी उस की 2-3 महिला ग्राहक चली आईं और मैं अपने घर का पता उसे दे कर चली आई. अगले दिन सुबह ही मिनी अपने बेटे को कंधे से लगाए मेरे सामने खड़ी थी. लपक कर उस का सोया बच्चा मैं ने बिस्तर में सुला दिया और मिनी की बांह पकड़ कर सस्नेह सहला दिया तो मेरे कंधे से लग कर रो पड़ी मिनी.

मैं जानती थी कि मिनी के भीतर बहुत कुछ होगा जिसे वह मुझ से बांटना चाहती होगी क्योंकि 10 साल पुरानी हमारी मुलाकातों में विषय अकसर यही होता था. मैं कहा करती थी कि तुम्हें पढ़ाईलिखाई और दूसरे कामों में भी रुचि लेनी चाहिए. खूबसूरती कोई स्थायी विशेषता नहीं है जिसे कोई सारी उम्र भुना सके.

‘‘आप सच कहती थीं, आंटी,’’ मिनी मेरे कंधे से अलग होते हुए बोली, ‘‘मैं अपने जीवन में कुछ भी नहीं बन पाई. मेरी खूबसूरती ने मुझे कहीं का नहीं रखा. अगर सुंदर न होती तो ही अच्छा होता.’’

‘‘जो बीत गया सो बीत गया. अब आगे का सोचो. तुम्हारे पति क्या काम करते हैं?’’

‘‘वह भी मेरी तरह ज्यादा  पढ़ेलिखे नहीं हैं. किसी जगह छोटी सी नौकरी करते हैं. हम दोनों काम न करें तो हमारा गुजारा नहीं चलता.’’

क्या कहती मैं. किसी के हालात बदल पाना भला मेरे हाथ में था क्या? मिनी का रोना ही सारी कथा का सार था.

‘‘आंटी, मैं ज्यादा पढ़ीलिखी होती तो किसी स्कूल में नौकरी कर लेती. ट्यूशन का काम भी मिल जाता. सिलाईकढ़ाई आती तो किसी बुटीक में काम मिल जाता. मुझे तो कुछ भी नहीं आता.’’

‘‘खूबसूरती संवारना तो आता है न पगली, जो काम कर रही हो उसी में तरक्की कर लो, क्या बुरा है? कुछ न आने से कुछ तो आना ज्यादा अच्छा है.’’

‘‘मम्मी से कहा था कि थोड़ी देर मोनू को संभाल लिया करें, मम्मी के पास समय ही नहीं है… मेरी मां ने मुझे यह कैसा जीवन दिया है, आंटी, कैसी शिक्षा दी है जिस से मैं अपनी गृहस्थी भी नहीं चला सकती.’’

‘‘मोनू के लिए अगर मैं ठीक लगती हूं तो बेशक इसे कुछ घंटे मेरे पास छोड़ जाया करो. तुम्हारे अंकल से बात करती हूं, बैंक से कर्ज ले कर तुम पतिपत्नी अगर छोटा सा काम खोल सको तो…’’

मैं नहीं जानती कि मिनी का भविष्य संवार पाऊंगी या नहीं क्योंकि भविष्य संवारना तो बचपन से ही शुरू किया जाता है न. अब पीछे लौटा नहीं जा सकता. आज तो मिनी की जरूरत सिर्फ इतनी सी है कि कुछ समय के लिए उस का बच्चा कोई अपने पास रख लिया करे. अफसोस हो रहा है मुझे श्रीमती मेहरा की बुद्धि पर, कम से कम बच्ची का इतना सा साथ तो दे दें कि वह अपना गुजारा चलाने लायक कुछ कर सके.

इस उम्र में मुझे उन के चेहरे पर न बुढ़ापा नजर आया था और न ही संतान के अस्तव्यस्त जीवन के प्रति पैदा हुआ कोई दर्द या पश्चात्ताप. समझ नहीं पा रही हूं कि मेहरा जैसे दंपती किस सोच में जीते हैं, किस सत्य को अपना सत्य मानते हैं और सत्य उन का अपना सत्य होता भी है या नहीं. श्रीमती मेहरा जैसी औरतें न जवानी में बच्चों के

लिए बड़प्पन का एहसास करती हैं और न ही बुढ़ापे में खुद को बड़ा मानने को तैयार होती हैं, न ही अच्छी मां बनना चाहती हैं और न ही नानी कहलाना उन्हें पसंद है.

‘‘मोनू को आप रख लेंगी तो बड़ा उपकार होगा, आंटी. सिर्फ 3-4 महीने के लिए. उस के बाद नर्सरी में डाल दूंगी. मोनू नानी कह सकता है न आप को?’’

आंखें भर आईं मेरी. उम्र के साथ कानों के परदे भी यह शब्द सुनना चाहते हैं, दादी, नानी.

‘‘हांहां क्यों नहीं, बेटी, मुझे तो इस से खुशी ही होगी. तुम चिंता न करो, समय एक समान नहीं रहता. सब ठीक हो जाएगा.’’

कुछ घंटे हर रोज के लिए एक प्यारा सा खिलौना मिल गया मुझे. इतवार को अभय के लिए मेहंदी घोलने लगी तो टोक दिया अभय ने, ‘‘रहने दो, शुभा, सफेद बाल अब अच्छे लगने लगे हैं. हर उम्र का अपना ही रंगरूप, अपना ही सत्य होता है और होना भी चाहिए.’’

अवाक् मैं अभय का चेहरा देखती रही. अभय अखबार के पन्ने पलटते रहे और मेरे होंठों पर मुसकान चली आई. अभय भी समझने लगे थे अपना सत्य. Hindi Story

Hindi Stories: जय गरीब की

Hindi Stories: बात घूमफिर कर फिर गरीबी पर आ गई है. जैसे बारह बरस में घूरे के दिन भी बहुरते हैं, वैसे ही गरीब और गरीबी के दिन बहुरे हैं. आज वे सभी पार्टियों के चहेते बन गए हैं, सत्ताधारी पार्टियों में भी और सत्ता से बेदखल कर दी गई पार्टियों के भी. गरीब आजकल सुर्खियों में हैं. उन की चहुंओर जयजयकार हो रही है. गरीब अपनी गरीबी पर इतराने लगे हैं. देश में गरीबी हटाओ नारे पर राजनीतिक पार्टियों का आधिपत्य सा रहा है. इन्हें गरीब जब भी याद आते हैं तो बहुत याद आते हैं, क्योंकि ये पार्टियां जानती हैं कि गरीबों की स्तुति करने से पार्टी की खुद की गरीबी अवश्य दूर हो सकती है.

बाजार में जिनजिन चीजों पर कभी अमीरों का एकाधिकार हुआ करता था आजकल वे चीजें गरीबों की प्राथमिकता में शामिल हैं. साबुन, मंजन, डिटरजैंट, क्रीमपाउडर, शैंपू, चाय, केशतेल वगैरह के जितने भी लोकप्रिय ब्रैंड हैं, सब 1-2 रुपए वाले गरीब पैक में उपलब्ध हैं, यहां तक कि सिगरेट जैसी चीज भी 5 रुपए के पैक में उपलब्ध है. अब कोई, गरीबी के कारण, उन चीजों से वंचित नहीं रह सकता जिन पर कभी अमीरों का कब्जा माना जाता था. सारे उद्यमी गरीबों पर मेहरबान हैं. गरीबों की हर जरूरत का खयाल रखा जा रहा है. ये सेठ लोग कितने धर्मात्मा, कितने दयालु और कितने परोपकारी हो गए हैं? तभी तो सारी व्यवस्था गरीब केंद्रित हो रही है. गरीबी का शेयर सूचकांक निरंतर उछाल मार रहा है.

राष्ट्र की राजधानी दिल्ली समेत झारखंड, जम्मूकश्मीर, बिहार, उत्तर प्रदेश में सत्ता के लिए जय गरीबदेवा की गूंज से सारा वातावरण गरीबमय हो गया है. सारे भक्तगणों को पार्टी के मुखिया ने फरमान जारी कर दिया है, ‘अरे मूर्खो, उठो, गरीबों की चरणवंदना का यही उपयुक्त समय है. इस कलियुग में गरीबों की भक्ति ही सारी भक्तियों में श्रेष्ठ है. गरीब नाम के सुमिरन से जनमजनम के पाप धुल जाते हैं. इस राजनीति के महासागर से यदि पार उतरना चाहते हो तो गरीब को गाय समझ कर उस की पूंछ पकड़ लो, वैतरणी पार हो जाओगे. गरीबों की स्तुति का सुफल तुम्हें चुनाव में अवश्य मिलेगा.’

क्या तुम्हें नहीं पता कि गरीब की झोंपड़ी में तथाकथित ईश्वर का वास होता है. रे अज्ञानियो, फिर तुम किस गफलत में सो रहे हो? देखो, जो सच्चे मन से गरीबों की आराधना करता है तो दरिद्रनारायण उस की भक्ति से प्रसन्न हो कर उस को ‘मंत्रीभव’ का वरदान दे देते हैं. फिर तो उस की जनमजनम की कालिख धुल जाती है. उस की गरीबी हमेशाहमेशा के लिए दूर हो जाती है. गरीबों पर मंडराते आसन्न संकट के मद्देनजर हम ने एक गरीब से पूछा, ‘‘बोलो गरीबजी, अब किधर जाओगे? भारत में तो अब तुम्हारा ठिकाना लगने का नहीं. हमारी जानकारी के मुताबिक, साल 2020 तक गरीब और गरीबी का नामोनिशान मिट जाएगा. इस तरह तुम्हारी हंसतीखेलती दुनिया चंद दिनों की ही मेहमान है.’’

इस पर गरीब ने सख्ती से कहा, ‘‘बाबूजी, अपनी जाति को कोई खतरा नहीं. गरीब तो इस धरती पर सदा से थे, हैं और आगे भी रहेंगे. महंगाई की मार से और भ्रष्टाचार के प्रहार से गरीबों की संख्या में दिनोंदिन बढ़ोत्तरी हो रही है. ऊपर से इनकम टैक्स का हौवा अच्छेअच्छों को खुद को गरीब मानने पर मजबूर कर देता है.’’ उस गरीब के मुताबिक, ‘‘अब तो गरीबों की नित नई पौध तैयार हो रही है. गरीबी में इतनी भिन्नता पहले कभी नहीं देखी गई. आज गरीबों की बहुत सारी वैरायटीज हमारे देश में मौजूद हैं. पहले गरीब उसे समझा जाता था जिस के पास रोटी, कपड़ा और मकान का संकट होता था. लेकिन अब यह परिभाषा बड़ी अस्पष्ट नजर आती है. जब हम अपने सामने स्क्रीन टच मोबाइल मार्का गरीबों को देखते हैं, क्योंकि उन के पास मोबाइल तो होता है लेकिन बिलकुल सादा. गरीबी में स्मार्टफोन खरीदना मुश्किल होता है.’’

आज कपड़े देख कर तो गरीब व अमीर की पहचान एकदम असंभव है. यहां कार वाले गरीब, लैपटौप वाले गरीब, कोठी वाले गरीब आदि श्रेणियों के गरीब पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं. और कौन कहे कि जब करोड़ों के स्वामी चुनाव में अपना पर्चा भरने जाते हैं तो संपत्ति का ऐसा विवरण देते हैं कि देख कर हमें लगता है कि उन से तो हम ही अच्छे हैं. मौजूदा हालात को देख कर हम आश्वस्त हो सकते हैं कि ये दोनों, गरीब और गरीबी,? 20 साल क्या, 200 साल में भी भारत से नहीं जाने वाले Hindi Stories

मैरिज मैटीरियल’ : पार्टनर ढूंढें प्रोडक्ट नहीं

Marriage Material: मौडर्न डेटिंग हो या अरेंज मैरिज, आजकल लोग पार्टनर चुनने में बिलकुल भी कम्प्रोमाइज नहीं करते क्योंकि शादी के लिए सिर्फ प्यार ही नहीं बल्कि और भी फैक्टर्स मायने रखते हैं और कोई पसंद आ जाए तो उसे मैरिज मैटीरियल कह दिया जाता है. लेकिन इस शब्द में ऐसा क्या बुरा है जो लोगों को औफेंसिव लगता है, जानें आप भी.

आजकल रिलेशनशिप में ‘मैरिज मैटीरियल’ शब्द काफी सुनने को मिलता है और इस पर बहस भी उतनी ही होती है. कुछ लोगों को यह शब्द औफेंसिव लगता है क्योंकि उन्हें महसूस होता है कि इस से इंसान को किसी प्रोडक्ट की तरह पेश किया जा रहा है, जैसे उस के गुणों की लिस्ट बना कर तय किया जा रहा हो कि वह शादी के लायक है या नहीं. खासकर तब जब कहा जाता है कि ‘वह डेटिंग के लिए तो ठीक है लेकिन मैरिज मैटीरियल नहीं है,’ तो इस में एक तरह का जजमैंट छिपा होता है. ऐसा लगता है जैसे किसी को 2 हिस्सों में बांट दिया गया हो, एक जो समय बिताने के लिए ठीक है और दूसरा जो जिम्मेदारी के लायक है.

यह शब्द लड़कियों के लिए ज्यादा औफेंसिव माना जाता है, जिन से उम्मीद की जाती है कि वे घर संभालें, एडजस्ट करें, परिवार को प्राथमिकता दें, तभी वे ‘मैरिज मैटीरियल’ कहलाएंगी.

लेकिन अगर इस शब्द को थोड़ा अलग नजर से देखें तो इस का मतलब सिर्फ इतना भी होसकता है कि कोई अपने लिए एक ऐसा जीवनसाथी ढूंढ़ रहा है जो लंबे समय तक साथ निभा सके. शादी कोई खेल नहीं बल्कि सालोंसाल का रिश्ता है. यह एक लंबी सा?ोदारी है जिस में सिर्फ प्यार ही नहीं बल्कि सम?ा, जिम्मेदारी, आर्थिक स्थिरता, इमोशंस और फ्यूचर प्लानिंग भी शामिल होते हैं.

एक ऐसा ही किस्सा है रोहन और मालती का. कालेज में एकदूसरे से बहुत प्यार करते थे वे. उन्हें लगा कि प्यार ही काफी है, लेकिन शादी के बाद जब कैरियर, शहर बदलने और परिवार की जिम्मेदारियों की बात आई तो मतभेद शुरू हो गए. यहां कमी प्यार की नहीं थी. अगर उन्होंने पहले ही यह सोचा होता कि वे एकदूसरे की प्राथमिकताओं के साथ तालमेल बैठा पाएंगे या नहीं तो शायद हालात अलग होते. इसी कारण आएदिन ऐसे किस्से सुनने में आते हैं जहां सालों रिलेशनशिप में रहने के बावजूद लड़कालड़की शादी के बाद तलाक ले लेते हैं. यानी, जिंदगी आगे बढ़ाने के लिए प्यार ही नहीं बल्कि कई फैक्टर्स जरूरी होते हैं.

साथी चुनते समय समझदारी जरूरी है, लेकिन सामने वाले को चैकलिस्ट के आधार पर जज करना गलत है. शादी एक टीमवर्क है, जहां दोनों को एकदूसरे की जरूरतों को सम?ाने व पूरा करने की कोशिश करनी होती है. असली ‘मैरिज मैटीरियल’ शायद वही है जो आप को इंसान की तरह देखे, न कि किसी प्रोडक्ट की तरह.

मैरिज मैटीरियल : प्रोडक्ट या साथी

मैरिज मैटीरियल आखिर है क्या? सीधे शब्दों में, यह वो क्वालिटीज हैं जो कोई इंसान अपने पार्टनर में ढूंढ़ता है ताकि शादी सफल हो सके. मतलब, सिर्फ लुक्स, प्यार या अट्रैक्शन से काम नहीं चलेगा. जरूरी है कि दोनों में कम्पैटिबिलिटी हो, जैसे वैल्यूज, गोल्स, फाइनैंशियल स्टैबिलिटी, इमोशनल सपोर्ट और फैमिली बैकग्राउंड. कई लोग इसे नैगेटिव तरीके से देखते हैं, कहते हैं, यह रिलेशनशिप को कमर्शियल बना देता है लेकिन क्या शादी कोई गेम है जहां सिर्फ दिल की सुनी जाए. जिंदगी में ऐसे कई उतारचढ़ाव आते हैं जब सिर्फ प्यार से काम नहीं चलता.

क्यों कुछ लोग इसे औफेंसिव मानते हैं

आजकल की जेनरेशन, खासकर मिलेनियल्स और जेन जी, फ्रीडम और इंडिपेंडैंस को वैल्यू देते हैं. उन्हें लगता है कि मैरिज मैटेरियल कह कर हम इंसान को चैकलिस्ट में बदल देते हैं, जैसे कोई जौब इंटरव्यू. अगर कोई लड़की कहे कि वह लड़का मैरिज मैटेरियल नहीं क्योंकि उस की जौब अच्छी नहीं. तो यह बात लड़के को इंसल्ट फील करा सकती है. या फिर लड़के की तरफ से, अगर वह कहे कि फलां लड़की घर संभालने में अच्छी नहीं तो मैरिज मैटेरियल नहीं, यह बात लड़की को औफेंसिव लग सकती है. सोशल मीडिया पर तो ऐसी डिबेट्स रोज चलती हैं. इंस्टाग्राम रील्स में देखो, कितनी लड़कियां कहती हैं, ‘‘मैं कोई प्रोडक्ट नहीं, इंसान हूं.’’ यह सही भी है, क्योंकि शादी में इंसानियत सब से ऊपर होनी चाहिए लेकिन क्या यह शब्द वाकई इतना बुरा है? या हम इसे गलत समझ रहे हैं?

दूसरी तरफ, इस शब्द का क्रिटिसिज्म भी जायज है. कई बार लोग इसे इस्तेमाल कर के जजमैंटल हो जाते हैं. जैसे, सोसाइटी में लड़कियों पर प्रैशर कि वे कुकिंग, घर संभालना जानें, वरना मैरिज मैटीरियल नहीं. या लड़कों पर कि अच्छी सैलरी हो, घर हो, कार हो. यह तो पुरानी सोच है, जहां जैंडर रोल्स फिक्स हैं. आज की दुनिया में दोनों पार्टनर्स काम करते हैं तो क्यों न दोनों ही रिस्पौन्सिबल हों? मैरिज मैटीरियल को अगर हम औब्जेक्टिफाई करेंगे तो यह औफेंसिव बनेगा लेकिन अगर इसे कम्पैटिबिलिटी के तौर पर देखें तो यह हैल्पफुल है.

शादी के लिए सिर्फ प्यार क्यों काफी नहीं

प्यार तो शुरुआत है, लेकिन लंबे रिश्ते के लिए ट्रस्ट, रिस्पैक्ट, कम्युनिकेशन और शेयर्ड वैल्यूज चाहिए. एक स्टडी से पता चला है कि कपल्स जो फाइनैंशियल प्लानिंग साथ करते हैं, उन के रिश्ते ज्यादा स्ट्रौंग रहते हैं. इंडिया में, जहां अरेंज्ड मैरिजेस अभी भी कौमन हैं वहां लोग बैकग्राउंड, एजुकेशन, जौब आदि सब चैक करते हैं. यह मैरिज मैटीरियल ही तो है. लेकिन लव मैरिज में लोग ये सब इग्नोर कर देते हैं, बाद में रिग्रेट होता है.

कन्ट्रोवर्सी की बात करें तो, फैमिनिस्ट्स कहते हैं कि यह शब्द महिलाओं को औब्जेक्ट बनाता है क्योंकि ट्रैडिशनली, लड़कियां ‘मैरिज मैटीरियल’ बनाने के लिए तैयार की जाती हैं: सुंदर, आज्ञाकारी आदि. लेकिन मौडर्न कौन्टैक्स्ट में यह दोनों पर अप्लाई होता है. जैसे, अगर एक पार्टनर पार्टी लवर है और दूसरा इंट्रोवर्ट, तो क्या वे मैरिज मैटीरियल हैं? डिपैंड करता है कि क्या वे कम्प्रोमाइज कर सकते हैं. Marriage Material

7 इंटरेस्टिंग फैक्ट्स : दुनिया का सब से महंगा मसाला केसर

Interesting Facts: दुनिया का सब से महंगा मसाला केसर (सैफ्रौन) माना जाता है. यह केसर के फूल की बहुत पतली लाल रेशों जैसी कलियों से प्राप्त होता है. एक किलो केसर बनाने के लिए लगभग डेढ़ लाख से अधिक फूलों की जरूरत पड़ती है, इसलिए इसे तैयार करना बेहद मेहनत और समय का काम होता है. केसर का उपयोग खाने में स्वाद और रंग बढ़ाने के साथसाथ आयुर्वेदिक औषधियों में भी किया जाता है. इस की दुर्लभता और कठिन उत्पादन प्रक्रिया के कारण इस की कीमत बहुत अधिक होती है.

किताबों की खुशबू का रहस्य

पुरानी किताबों से आने वाली खुशबू कई लोगों को बहुत पसंद होती है. यह खुशबू दरअसल कागज, स्याही और समय के साथ होने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं से पैदा होती है. जब कागज पुराना होता है तो उस से हलकी मीठी और मिट्टी जैसी खुशबू आने लगती है. इसलिए पुराने पुस्तकालयों की महक बहुत अलग महसूस होती है.

कार के शीशे का रहस्य

कार के सामने लगा शीशा सामान्य कांच से अलग होता है और इसे विशेष तकनीक से बनाया जाता है. इस कांच को सेफ्टी ग्लास या लैमिनेटेड ग्लास कहा जाता है. इस में कांच की 2 परतों के बीच एक पारदर्शी प्लास्टिक की परत लगाई जाती है. यदि दुर्घटना हो जाए तो यह शीशा बिखर कर छोटेछोटे खतरनाक टुकड़ों में नहीं टूटता, बल्कि दरारें पड़ने के बावजूद अपनी जगह पर ही चिपका रहता है. इस से कार में बैठे यात्रियों को गंभीर चोट लगने की संभावना कम हो जाती है और उन की सुरक्षा बनी रहती है.

दुनिया का पहला होटल

दुनिया का सब से पुराना होटल जापान में स्थित निशियामा ओनसेन केयुनकान माना जाता है. यह होटल वर्ष 705 ईसवी में बनाया गया था और आज भी चल रहा है. दिलचस्प बात यह है कि इसे लगभग 50 से भी अधिक पीढि़यों ने मिल कर संभाला है. सदियों से यहां आने वाले मेहमानों का पारंपरिक जापानी तरीके से स्वागत किया जाता है. यह होटल दुनिया की सब से पुरानी चलती हुई होटल सेवा का उदाहरण माना जाता है.

संदेशवाहक कबूतर

कबूतरों की दिशा पहचानने की क्षमता बहुत अद्भुत होती है. वे सैकड़ों किलोमीटर दूर छोड़ दिए जाने के बाद भी अपने घर का रास्ता ढूंढ़ लेते हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार कबूतर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र, सूरज की दिशा और आसपास की पहचान को देख कर रास्ता तय करते हैं. इसी खास गुण के कारण पुराने समय में ‘संदेशवाहक कबूतर’ का उपयोग किया जाता था. युद्ध के समय और दूरदराज इलाकों में खबर पहुंचाने के लिए लोग कबूतरों के पैरों में छोटा सा कागज बांध कर संदेश भेजते थे. कई ऐतिहासिक घटनाओं में कबूतरों ने महत्त्वपूर्ण जानकारी पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी.

क्रिकेट का सब से लंबा मैच

क्रिकेट के इतिहास में एक ऐसा टैस्ट मैच भी हुआ जो 9 दिन तक चला. यह मैच 1939 में इंगलैंड और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेला गया था. फिर भी मैच का कोई नतीजा नहीं निकला और इसे ड्रा घोषित कर दिया गया. इसे क्रिकेट इतिहास का सब से लंबा मैच माना जाता है.

घोड़ों के गुण

घोड़े खड़ेखड़े भी आराम कर सकते हैं और हलकी नींद ले सकते हैं. उन के पैरों में एक विशेष प्रकार की मांसपेशी और लिगामैंट प्रणाली होती है, जिसे ‘स्टे अप्पारेट्स’ कहा जाता है. इस की वजह से वे बिना गिरे लंबे समय तक खड़े रह सकते हैं. जंगल में रहने वाले घोड़ों के लिए यह गुण बहुत उपयोगी होता है, क्योंकि खतरा महसूस होते ही वे तुरंत दौड़ सकते हैं. हालांकि, गहरी और पूरी नींद लेने के लिए घोड़े कभीकभी जमीन पर लेटते भी हैं. इस तरह उन की यह खास क्षमता उन्हें सुरक्षा और आराम दोनों प्रदान करती है. Interesting Facts

 

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