Download App

Satirical Story In Hindi : सरकारी बाबू

Satirical Story In Hindi : जब से बाबू लोगन की नकेल कसने के लिए बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन लगी है, हर बाबू के कान खड़े हो गए हैं. हालांकि घबराने की बात नहीं है क्योंकि इन्होंने समय का पाबंद होने के बजाय इस मशीन से निबटने का बेहतरीन आइडिया निकाल लिया है. क्या है वह आइडिया, जरा आप भी दिमागी घोड़े  दौड़ाइए.

हमारे सरकारी दफ्तर में सभी कर्मचारियों को समय का पाबंद बनाने के लिए उन के फिंगर इंप्रैशन और फोटो रिकौर्ड में लेने के बाद इलैक्ट्रौनिक ‘बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली’ की नई व्यवस्था चालू कर दी गई. नई व्यवस्था के बाद अब यदि हमारे दफ्तर के कर्मचारियों को ‘सरकारी पिंजरे में बंद पशुपक्षी’ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी.

पशु इसलिए क्योंकि हाथी, घोड़ों, कुत्तों, यहां तक कि गधे जैसा स्वभाव व व्यवहार करने वाले लोग भी यहां पाए जाते हैं, जो अपने अहंकार के आगे इंसान को इंसान नहीं समझते. पक्षी इसलिए कि यहां पर कोयल की सुरीली आवाज वाली और मोर जैसी सुंदर, आकर्षक, शृंगारयुक्त व सुडौल महिलाएं भी होती हैं और बगुला भगत तो एक नहीं कई होते हैं. विशेषकर जिन्हें अपने दूरदराज के क्षेत्रों में स्थानांतरण व शीघ्र ही पदोन्नति पाने की चिंता होती है, उन्हें आला अधिकारियों का बगुला भगत बनते देर नहीं लगती.

कर्मचारियों को समय का पाबंद बनाने के लिए लगी बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली मशीन लगने के बाद एक कर्मचारी ने अपने साथियों से कहा, ‘‘साथियो, सुबह साढ़े 9 बजे बायोमीट्रिक मशीन में अपनी हाजिरी लगा कर सभी लोग दफ्तर के गार्डन में पीछे की तरफ आ जाया करो. अब तो एकएक ताश की बाजी सुबहसुबह 10 से 11 के बीच में भी हो जाया करेगी और लंच टाइम में तो हमें कोई रोक ही नहीं सकता.’’

दूसरे कर्मचारी ने भी चुसकी ली और बोला, ‘‘साथियो, बायोमीट्रिक मशीन में सुबहशाम अपनी हाजिरी के लिए उंगली (फिंगर इंप्रैशन) लगाना ठीक है, परंतु यदि गलती से भी कहीं और लगा दी तो अच्छा नहीं होगा. इसलिए इसे रास्ते चलते अपनी आदत मत बना लेना. गलती से भी यदि आप की उंगली भीड़भाड़ में किसी महिला के शरीर से टच हो गई तो जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है. पता होना चाहिए कि महिलाओं के संबंध में कानून व्यवस्था अब बहुत सख्त हो गई है.’’

लेखानुभाग में उपस्थित एक क्लर्क पुरुष बोला, ‘‘साथियो, सुबहसवेरे बायोमीट्रिक मशीन में उंगली लगा कर सीधे ही सभी लोग सभागार में पहुंच जाया करो. थोड़ी गपशप और चायशाय हो जाया करेगी. काम तो 11 बजे से पहले नहीं शुरू हो पाएगा. जब तक सफाई कर्मचारी कक्ष का अच्छी तरह से झाड़ूपोंछा नहीं कर लेते तब तक हम तो अपने कक्ष में बिलकुल भी नहीं बैठ सकते.’’

दूसरा क्लर्क पुरुष बोला, ‘‘अरे यार, क्या बात करते हो, केवल गपशप और चायशाय से क्या होगा. मेरी राय में तो समय बिताने के लिए अब करना है कुछ नया काम, सुबहसुबह ही किसी कोने में इंटरनैट खोल कर बैठिए और देखिए तमाम ब्लू फिल्में.’’

उस के इतना कहते ही सभी ने जोरदार ठहाका लगाते हुए एक स्वर में कहा, ‘‘हां, आप ठीक कह रहे हैं, यही ठीक रहेगा.’’

दफ्तर में बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन लग जाने के कारण संभ्रांत महिलाओं की चिंता थी कि सुबह साढ़े 9 बजे तक दफ्तर आने और शाम को 7 बजे से पहले न जाने पर उन के घर के कई काम अधूरे रह जाते हैं.

उन की समस्या सुन कर एक समझदार साथी ने अपनी महिला साथी की समस्या का समाधान कुछ इस प्रकार किया और बोला, ‘‘मैडम, आप तो एक इलैक्ट्रिक कुकिंग प्लेट, कुछ बरतन व जरूरी मसाले आदि ला कर यहीं अपनी अलमारी में रख लीजिए और सुबहसुबह साढ़े 9 बजे आ कर बायोमीट्रिक मशीन में अपनी हाजिरी लगा कर तुरंत दफ्तर के पास वाली मार्केट चली जाया कीजिए और वहां से ताजी सब्जियां खरीद कर ले आया कीजिए. शाम तक उसे धो कर व काटकूट कर सायं 5 बजे के बाद उसे अपने दफ्तर के कक्ष में ही तैयार कर, यहीं से सब्जी पका कर ही 6 बजे के बाद घर ले जाया करें और पहुंचते ही चपातियां सेंक कर अपने परिवार के सदस्यों को सर्व कर दिया करें.’’

वे बोलीं, ‘‘कैसी बातें करते हैं, किसी अधिकारी ने देख लिया तो?’’

समझदार साथी ने पलट कर जवाब दिया, ‘‘मैडम, इस में डरने वाली कोई बात नहीं है. जब अधिकारी अपने कक्ष में इलैक्ट्रिक कैटल और नाश्ते का सामान रख सकते हैं तो आप भला क्यों नहीं रख सकतीं. आप तो खांमखां डर रही हैं.’’

एक कर्मचारी ने बताया, ‘‘दफ्तर में जब से बायोमीट्रिक मशीन लगी है मैं ने तो अपने सुबह के टहलने के समय में परिवर्तन कर लिया है और यहां साढ़े

9 क्या, 9 बजे ही आ जाता हूं और हाजिरी मशीन में अपनी उंगली का इंप्रैशन लगा कर सीधे ही पास वाले गार्डन में जा कर 11 बजे तक चक्कर लगाता हूं और फिर दफ्तर लौट कर कैंटीन में चाय पीता हूं तब जा कर सीट पर बैठ कर 2-4 फाइलें निबटा देता हूं. तब तक लंच टाइम हो जाता है. इसी प्रकार शाम को पहले 5 बजे घर भाग जाया करता था. अब 4 बजे निकलता हूं और पास वाले सुपर मार्केट से शाम के 6 बजे तक सामान गाड़ी में डाल कर ले आता हूं और यहां आ कर मशीन में दफ्तर छोड़ने के लिए उंगली का इंप्रैशन लगाता हूं और वापस घर चला जाता हूं.’’

साथी बोला, ‘‘यार, तुम्हारे कमरे की लाइट व कंप्यूटर वगैरह कौन स्विच औफ करता है?’’

वह बोला, ‘‘मुझे उस की बिलकुल भी परवा नहीं है. प्रत्येक तल पर सुरक्षा संतरी किस लिए है. वह खुली देखता होगा तो खुद ही बंद कर देता होगा. आखिर उसे भी तो कुछ काम करना चाहिए…वह भी तो तनख्वाह लेता है.’’

सच कहूं तो मुझे तो अपने दफ्तर में बायोमीट्रिक मशीन द्वारा हाजिरी लगने से केवल एक लाभ ही दिखाई दे रहा है कि जिन सरकारी कर्मचारियों को अपने दफ्तर के कार्यदिवसों में खुलने का समय व बंद होने का समय मालूम ही नहीं था, इस बहाने उन्हें पता चल गया वरना पूरी 60 वर्ष की नौकरी हो जाती और वे रिटायर भी हो जाते, उन्हें सरकारी दफ्तर के प्रत्येक दिन का सही कार्यसमय ही न मालूम हो पाता.

बंदा तो पहले घर से ही देरी से दफ्तर आता था और जल्दी चला जाता था, इसलिए अपनी सीट पर नहीं मिलता था और अब अपने कार्यदिवसों में आता तो जल्दी है और प्रत्येक दिन जाता भी दफ्तर के समाप्त होने के निर्धारित समय के बाद है मगर फिर भी वह दिनभर सीट पर कम ही दिखता है. कहां जाता है और क्याक्या करता है, किसी को पता ही नहीं रहता.

जिस किसी से पूछो कि फलां कर्मचारी कहां है तो यही कहते मिलता है कि आए तो हैं लेकिन कहां हैं, पता नहीं. देखिए, उन का चश्मा और पैन तो उन की सीट पर रखा है और कंप्यूटर भी औन है न. बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन के कंप्यूटरीकृत सौफ्टवेयर में ताकझांक करने पर वह वहां सुबह साढ़े 9 बजे तक रोजाना ही दफ्तर आता है और शाम को भी सायं 6 बजे के बाद ही दफ्तर छोड़ता है. वहां लगे हुए उस के फिंगर इंप्रैशन व फोटो तो यही सत्यापित करते हैं. इसलिए दफ्तर के आला अधिकारियों द्वारा कभी भी उस की एक क्या, आधे दिन तक की भी, न तो छुट्टी काटी जा सकती है और न ही वेतन. Satirical Story In Hindi

Famous Kota Kachori : कोटा कचौरी, स्वाद का अनुपम खजाना

Famous Kota Kachori : कोटा की कचौरी सिर्फ एक नाश्ता नहीं, बल्कि कोटा की पहचान है. इस के बिना यहां की दावतें भी अधूरी रहती हैं. आइए यहां के जायके को ले कर एक खास आनंद की अनुभूति लीजिए.

कोटा, राजस्थान का एक प्रमुख शहर, जिस ने कोचिंग के लिए शैक्षणिक नगरी के रूप में पूरे देश के मानचित्र पर एक अलग पहचान बनाई.
कोचिंग के साथसाथ यहां की कचौरियों का जायका लोगों की जबान पर कब चढ़ गया, पता ही नहीं चला.

कचौरी, जी हां, एक स्वाद से भरपूर व्यंजन जिसे लोग किसी भी समय खाने का मन रखते हैं.

यों तो कचौरी उत्तर भारत में सभी जगह बनाई जाती है लेकिन राजस्थान के कोटा शहर की कचौरी का स्वाद अनूठा होता है.

उड़द की दाल से बनने वाली कचौरी दो तरह की चटनी के साथ दी जाती है. खट्टी चटनी और मीठी चटनी कचौरी के स्वाद को दोगुना कर देती हैं.

कचौरी के स्वाद के लिए लोग इस पर नमकीन डाल कर भी खाते हैं. तीखी हींग के साथ, तेज मिर्च इस के जायके को और बढ़ा देती है.

शहर में अनेक, सिर्फ कचौरी और नमकीन की दुकानें हैं, जो दिनभर कचौरी बनाने में व्यस्त हैं.

सुबह के समय तो प्रसिद्ध दुकानों पर खासी भीड़ होती है.

देश के विभिन्न हिस्सों से आए कोचिंग छात्र न केवल कचौरी खाते हैं बल्कि यहां से अपने घर भी भेजते हैं. कई दिनों तक खराब न होने वाली ये कचौरियां विदेश तक में भेजी जाती हैं.

कचौरी, दाल के अलावा, आलू प्याज की भी बनाई जाती है, जो बड़ी होती है और स्वाद से भरपूर होती है. आलू, प्याज की कचौरी एक दिन के बाद खराब हो जाती है.

कोटा के कुछ लोग तो प्रतिदिन कचौरी का सेवन करते हैं. उन का कहना है कि बिना कचौरी खाए उन का दिन पूरा नहीं होता.

प्रसिद्ध कचौरी की दुकान वाले प्रतिदिन हजारों की संख्या में कचौरी बनाते हैं. उन के कारीगर फ्री नहीं रहते.

रतलामी, जय अंबे, जोधपुर, रतन, सुवालाल, जैन यहां की प्रमुख दुकानें हैं. हर दुकान की अपनी खासीयत है. किसी के स्वाद में हींग तेज है तो किसी की चटनी में स्वाद है. यहां इसी कचौरी के मसाले से छोटी कचौरियां भी बनाई जाती हैं.

कचौरी कोटा का प्रमुख व्यंजन है. इस के बिना यहां की दावतें भी अधूरी रहती हैं. दफ्तरों, पिकनिक, घरेलू आयोजनों सभी में कचौरी ने अपना विशिष्ट स्थान बना रखा है.

कचौरी, कोचिंग, कोटा डोरिया और कोटा स्टोन के लिए मशहूर कोटा देश अहम राज्य राजस्थान का एक प्रमुख शहर है. तो आइए यहां के जायके के साथ एक खास आनंद की अनुभूति लीजिए.

मेरा पूरा यकीन है कि यहां की कचौरी का स्वाद आप जीवनभर याद रखेंगे. Famous Kota Kachori

Arvind Kejriwal : सीबीआई, ईडी और सीएजी – पिंजरों में डालने वाले तोते

Arvind Kejriwal : शराब घोटाले मामले में अरविंद केजरीवाल सरकार बेदाग साबित हुई है. अदालत ने सिर्फ फैसला ही नहीं दिया है बल्कि सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों की जम कर खिंचाई भी की है. ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है लेकिन सुधरने का नाम ये दोनों ही एजेंसियां नहीं ले रहीं जो सरकार के इशारे पर नाचती, खासतौर से, विपक्षी नेताओं को फंसाती हैं लेकिन अदालत में वे कुछ साबित नहीं कर पातीं, यानी, इन का काम भाजपाविरोधी नेताओं का मनोबल गिराना रह गया है. यही हाल सीएजी का भी है, जिस का औडिट अकसर मनगढ़ंत होता है , जो जांच में अहम रोल निभाता है.

27 फरवरी, 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू स्थित विशेष सीबीआई अदालत के विशेष जज जितेंद्र सिंह के एक फैसले ने भारत के चुनावी लोकतंत्र और देश की सर्वोच्च जांच एजेंसियों की कलई एक बार फिर खोल कर रख दी. दिल्ली की पिछली केजरीवाल सरकार, जिस के खिलाफ 100 करोड़ रुपए के शराब घोटाले की जांच देश की सब से बड़ी जांच एजेंसियां सैंट्रल ब्यूरो औफ इन्वैस्टीगेशन (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) कर रही थीं, के सभी आरोपियों को कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया. कानूनी तौर पर इसे डिस्चार्ज करना कहते हैं जिस में आरोप तय होने से पहले ही आरोपमुक्त कर दिया जाता है, यानी, मामला ट्रायल पर ही नहीं आता.
पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित सभी 23 आरोपी अब इस घोटाले से मुक्त हैं. यही नहीं, कोर्ट ने सीबीआई और ईडी के काम के तरीके और उन की नीयत पर सवाल भी उठाए, कहा कि यह पूरा केस एक फ्रौड केस है, जिस में न कोई रिकवरी हुई, न पैसे के लेनदेन को कोई एजेंसी साबित कर पाई.

अदालत का फैसला गौर से देखें तो वह मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों का सटीक विश्लेषण होने के साथसाथ जांच एजेंसियों को कठघरे में खड़ा करते हुए उन के सत्ता का दलाल होने की तरफ भी इशारा करता है. सीबीआई से उम्मीद होती है कि बिना पक्षपात काम करे, खासकर, उन मामलों में जिन में किसी की आजादी और प्रतिष्ठा दांव पर हों. लेकिन इस मामले में सुबूतों के बिना केजरीवाल सरकार के खिलाफ जाल फैलाया गया और जायज राजनीतिक गतिविधियों को आपराधिक रंग देने की कोशिश की गई.

सीबीआई की कार्यशैली पर तंज कसते हुए फैसले में कहा गया है कि सीबीआई मान बैठी थी कि अपराध हुआ और फिर अपनी बात साबित करने के लिए वह लोगों को फंसाती गई. कानूनी तौर पर ढिलाई और मनमानी की तरफ इशारा करते हुए फैसले में कहा गया है कि कुछ लोग संदिग्ध की सूची में थे, उन्हें गवाह भी बना लिया गया ताकि अगर वे मुकर जाएं तो उन्हें आरोपी बनाया जा सके. जो लोग नकद पैसे इधरउधर करना मान चुके थे, उन्हें आरोपी नहीं बल्कि गवाह बनाया गया, उन के बयानों के आधार पर भी लोग फंसाए गए.

इतना ही नहीं, सीबीआई की खिल्ली सी उड़ाते फैसले के ये शब्द काबिलेगौर हैं कि- सीबीआई ने चुनावप्रचार, होटल बुकिंग भुगतान की भी जांच की जो निर्वाचन आयोग का काम है, यानी, संवैधानिक सीमाएं पार की गईं. सत्ता के हाथों कठपुतली बन चुकी इस जांच एजेंसी के एक झूठ पर भी फैसले में कहा गया है कि- सीबीआई ने कहा था कि एक अभियोजक के बयान की कौपी नहीं मिली, रिकौर्ड में यह बात झूठ साबित हुई.

शराब घोटाले मामले को कैसे एक नपीतुली सियासी साजिश के तहत क्रिएट किया गया था, इस पर हैरानी जताते हुए फैसले में कहा गया है कि जांच ऐसे बढ़ी जैसे बहुत सारे लोगों को इस के दायरे में लाना हो. सुबूत के बजाय पुरानी कड़ियां खोल कर ऊपर तक जोड़ी गईं.

गौरतलब है कि 100 करोड़ रुपए के तथाकथित शराब घोटाले का मामला तब उछाला गया जब दिल्ली में चुनाव होने थे. सीबीआई ने पूरे फ्रौड मामले में राज्य के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और सरकार के सभी बड़े नेताओं को जेल में ठूंस दिया. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत नहीं दी, जमानत दी भी तो इस अलोकतांत्रिक शर्त पर कि आप चुनावप्रचार नहीं करेंगे.

इन सब के बीच सीएजी यानी कैग की रिपोर्ट भी आई जिस में कहा गया कि केजरीवाल की शराब नीतियां गड़बड़ थीं. इस रिपोर्ट के आने के बाद सीबीआई जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो गई. लगे हाथ ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय ने भी 100 करोड़ रुपए का खेल बतला दिया.

और भी हैं ऐसे मामले

कैग की रिपोर्टें पहले भी ऐसे कई गुल खिला चुकी हैं. बरबस ही इस मामले ने सीडब्ल्यूजी (कामन वैल्थ गेम्स) और 2 जी स्पैक्ट्रम मामलों की याद दिला दी. उस वक्त कैग के मुखिया विनोद राय थे. इन दोनों ही मामलों पर भाजपा के होहल्ले ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने और खुद सत्ता हथियाने में कामयाबी हासिल कर ली थी.

सीडब्ल्यूजी मामले में कैग ने साल 2011 की अपनी रिपोर्ट में भारी वित्तीय अनियमितताओं की तरफ इशारा किया था. इस आयोजन समिति के अध्यक्ष उड्डयन मंत्री रह चुके दिग्गज कांग्रेसी नेता सुरेश कलमाड़ी थे जो 16 साल भारतीय ओलिंपिक संघ के भी अध्यक्ष रहे थे. उन्हें 2011 में ही गिरफ्तार कर लिया गया था. कैग का एक अहम आरोप यह भी था कि कई ठेके मनचाही कंपनियों को दिए गए हैं. इस मामले की जांच भी सीबीआई और ईडी दोनों ने की थी लेकिन अधिकतर मुकदमे अभी भी सुनवाई के स्टेज पर ही हैं. किसी को सजा नहीं हुई है.

2 जी मामले ने तो देश की राजनीति की दशा और दिशा ही बदल कर रख दी थी. इस मामले में भी रिपोर्ट विनोद राय ने तैयार की थी. 2 जी मामला देश के दूरसंचार क्षेत्र से जुड़ा हुआ था जिस में साल 2008 में लाइसैंस आवंटित किए गए थे. लाइसैंस देने का अधिकार दूरसंचार मंत्रालय के पास था, जिस ने बहुत पारदर्शी तरीके से पहले आओ पहले पाओ की नीति पर तवज्जुह दी थी.

इसी नीति के तहत जनवरी 2008 में कुछ घंटों में ही लाइसैंस बंट गए थे. दूरसंचार मंत्रालय ने 2001 की कीमतों को ही लागू रखा था जबकि 2008 तक मोबाइल का बाजार काफी बढ़ चुका था.

साल 2010 में विनोद राय ने कैग की रिपोर्ट पेश की जिस में कहा गया था कि इस से सरकार को लगभग 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. इस आंकड़े ने देशभर में हलचल मचा दी थी. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उस ने 2 फरवरी, 2012 को 122 लाइसैंस रद्द कर दिए. तब सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि आवंटन प्रक्रिया मनमानी और असंवैधानिक थी. उस ने आइंदा स्पैक्ट्रम नीलामी के जरिए देने के भी निर्देश दिए थे. इस मामले की जांच भी सीबीआई और ईडी ने की थी.

भाजपा ने इसे ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल करते देशभर में इतना हाहाकार मचाया था कि एक बार तो हर किसी को यह लगने लगा था कि यूपीए गठबंधन के प्रमुख घटक डीएमके के ए राजा, जो उस वक्त दूरसंचार व आईटी मंत्री थे, और डीएमके सांसद कनिमोझी बहुत बड़े घोटालेबाज हैं. यह अंतिम फैसला आने के पहले की बात है.

समाजसेवी अन्ना हजारे भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन छेड़ चुके थे, जिसे देशभर से व्यापक समर्थन मिला था, लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही अन्ना जंतरमंतर से छूमंतर हो गए मानो उन का मकसद पूरा हो चुका हो. दिल्ली की शराब नीति मामले में भी ऐसा ही हल्ला भारतीय जनता पार्टी द्वारा मचाया गया था कि आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल हर किसी को महाभ्रष्ट और अव्वल दर्जे के घोटालेबाज नजर आने लगे थे.

यह कहना गलत न होगा कि भगवा गैंग के संस्कार ही दुष्प्रचार के हैं, ठीक वैसे ही जैसे पौराणिककाल में हुआ करते थे. महाभारत का एक पात्र अश्वत्थामा तब के युद्ध गुरु द्रोणाचार्य का लाड़ला बेटा था. महाभारत के युद्ध में द्रोणाचार्य ने त्राहित्राहि मचा रखी थी. लाख कोशिशों के बाद भी वे हथियार डालने के लिए तैयार नहीं थे और पांडव पक्ष के योद्धाओं को मारते जा रहे थे. तब पांड्वों की तरफ से यह रणनीति बनी कि अगर द्रोणाचार्य को यह भरोसा दिला दिया जाए कि अश्वत्थामा मर चुका है तो वे हताश हो कर हथियार छोड़ देंगे.

तब भी थे तो सब के सब एक नंबर के झुठेले ही लेकिन सिर्फ युधिष्ठिर झूठ नहीं बोलते थे, इस पर किसी को शक नहीं था, यहां तक कि द्रोणाचार्य को भी नहीं. सत्यवादी युधिष्ठिर झूठ बोलने को तैयार नहीं हुए. इस धर्मसंकट से बचने के लिए कृष्ण द्वारा तय यह किया गया कि एक हाथी का नाम अश्वत्थामा रखा जाए और युधिष्ठिर इस का ऐलान करें कि अश्वत्थामा मर गया लेकिन हाथी.

प्लान कामयाब रहा. जैसे ही युधिष्ठिर ने अश्वत्थामा मर गया कहा तो पांड्वों ने इतना शोरशराबा किया कि हाथी कोई नहीं सुन पाया. द्रोणाचार्य ने जैसे ही युधिष्ठिर के मुंह से यह सुना कि अश्वत्थामा मर गया वैसे ही उन के हाथपैर ढीले पड़ गए और उन्होंने हथियार फेंक दिए. बस, फिर क्या था, पांड्वों की तरफ से धृष्टधुम्न ने उन्हें मार डाला.

यही शोर भगवा गैंग ने दिल्ली की शराब नीति के वक्त मचाया था और यही 2 जी स्पैक्ट्रम और सीडब्ल्यूजी मामले के वक्त मचा कर जीत हासिल कर ली थी. सुरेश कलमाड़ी, ए राजा, कनिमोझी और अरविंद केजरीवाल इतने बदनाम कर दिए गए कि जनता की निगाह से ही उतर गए. इन से भी ज्यादा और निर्णायक नुकसान कांग्रेस को हुआ जिस के हाथ से सत्ता खिसकी, तो वापस आने का नाम ही नहीं ले रही. हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजे उसे उम्मीद बंधाते हुए हैं.

सो, इस तरह इन मामलों में भी जनता ने द्रोणाचार्य की तरह अश्वत्थामा मर गया तो सुना लेकिन हाथी नहीं सुना क्योंकि भगवा शोर ने उस के कान बंद कर दिए थे. बहरहाल, 2 जी मामला सीबीआई की विशेष अदालत में चला तो उस ने ए राजा और कनिमोझी सहित दूसरे आरोपियों को बरी कर दिया. विशेष न्यायाधीश ओ पी सोनी ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा था कि अभियोजन पक्ष कोई ठोस सुबूत पेश नहीं कर पाया, पूरा मामला अनुमानों और धारणाओं पर आधारित था. यह फैसला 21 दिसंबर, 2017 को आया था, तब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 3 साल गुजर चुके थे.

ए राजा को 2010 में इस्तीफा देना पड़ा था और सवा साल तिहाड़ जेल में सजा भी उन्होंने काटी थी, लेकिन उस गुनाह की जो उन्होंने किया ही नहीं था, बल्कि तकनीकी तौर पर इस के जिम्मेदार विनोद राय थे जिन्होंने, तय है, जानबूझ कर ऐसी रिपोर्ट तैयार की थी जो यूपीए की इमेज बिगाड़े जिस से फायदा एनडीए को मिले और ऐसा हुआ भी तो सहज समझ में आता है कि खासतौर से भाजपा साम, दाम, दंड और भेद सबकुछ अपनाती व आजमाती है. 2011 में ही गिरफ्तार हो कर 6 महीने जेल की सजा कनिमोझी ने भी भुगती थी और सुरेश कलमाड़ी भी 9 महीने जेल में रहे थे, मार्च 2025 में उन की मौत हो गई थी.

इन की हुई सियासी मौत

ए राजा, कनिमोझी, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के बारे में बेहिचक कहा जा सकता है कि उन्हें सियासी तौर पर कैग, सीबीआई और ईडी की तिकड़ी ने मार डाला है.

सीबीआई, ईडी और कैग न जाने कितने राजनेताओं का कैरियर उन पर झूठे आरोप लगाकर बरबाद कर दिया. एवज में उन के अधिकारियों को सत्तारूढ़ दल का संरक्षण, कृपा और बख्शिश मिली. कांग्रेस के दौर में भी ऐसा होता था और भाजपा के 12 साल के राज में तो कुछ ज्यादा ही हो रहा है.

अरविंद केजरीवाल आरोपमुक्त होने के बाद भाजपा, अमित शाह और नरेंद्र मोदी पर हमलावर जरूर हैं, वे मोदी को मनोरोगी तक कह रहे हैं लेकिन अब उन की पहले सी वापसी शक के दायरे में है. उन की हालत तो उस कथित बलात्कार पीड़िता सरीखी हो गई है जिसे समाज आसानी से स्वीकार नहीं करता. जबकि जानते सब हैं कि वह सीता की तरह पवित्र है पर हकीकत तो यह भी है कि लोगों ने बख्शा तो सीता को भी नहीं था, तो इन की क्या बिसात.

इस के बाद भी राजनीति में कुछ नहीं कहा जा सकता. कभी भी कुछ भी होने के लिए इस का चरित्र कुख्यात तो है. दिल्ली की मूडी जनता को अगर भगवा गैंग की बदमाशी समझ में आ गई और उस ने बेईमानी का सबक सिखाने की ठान ली तो अरविंद केजरीवाल खुद ही साबित कर देंगे कि उन के दामन में बदनामी के दाग साहब ने लगवाए थे. अगले साल गोवा, गुजरात और पंजाब में विधानसभा चुनाव हैं. इन तीनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी का खासा प्रभाव है. पंजाब में तो वह सरकार चला ही रही है. ‘आप’ को इस फैसले का फायदा मिल सकता है.

27 फरवरी के फैसले के बारे में सभी विपक्षी नेताओं ने कुछ न कुछ कहा लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस की सटीक व्याख्या की. बकौल सिब्बल, अगर पूरा मामला एक फ्रौड केस था तो ये जो 126 दिन दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जेल में बिताए उस का खमियाजा कौन भुगतेगा? 503 दिन दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने जेल में बिताए, उस का खमियाजा कौन भुगतेगा? आखिर किसी की जवाबदेही तो होनी चाहिए.

सिब्बल ने कहा- मोदी सरकार कहती थी 100 करोड़ रुपए का घोटाला है मगर उन की एजेंसी न कोई रिकवरी कर पाईं, न कोई फाइनैंशियल ट्रेड साबित हुआ. जज ने कहा कि पहले यह तय किया गया कि इन को फंसाना है. फिर उन्होंने यह सोचा कि कैसे फंसाना है. सबकुछ प्रीमेडीटेटेड था. यह क्या तरीका है?

ऐसे फंसी केजरीवाल सरकार

दिल्ली में भाजपा चुनाव जीत जाए, सिर्फ इसलिए देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सक्रिय हो गए क्योंकि तीन चुनावों में तमाम हथकंडे अपना कर भी भाजपा केजरीवाल का कुछ नहीं बिगाड़ पाई थी. सो, उस ने इस बार चरित्र हनन का दांव खेला. तमाम बड़ी जांच एजेंसियों जिन में सीबीआई सब से आगे थी, को केजरीवाल सरकार के एकएक नेता के पीछे छोड़ दिया गया. अदालतों को सैट किया गया. लिहाजा, अदालतें उन्हीं के साथ चल पड़ीं. केजरीवाल ने गोवा चुनाव में 44 करोड़ रुपए खर्च किए, गोदी मीडिया में इस का बढ़चढ़ कर प्रचार किया गया. लेकिन 27 फरवरी, 2026 को जब अदालत ने कहा- सबकुछ झूठ है. पूरा केस ही फ्रौड है, तब बीजेपी की साजिश खुली और उस की साजिश में संलिप्त सीबीआई और ईडी की असलियत जनता ने देखी.

कोर्ट ने कहा- शराब घोटाले का कोई सुबूत नहीं, कोई साक्ष्य नहीं, पूरा केस साजिशन बनाया लगता है. ऐसी परिस्थिति इस देश में कभी नहीं थी. जज ने यहां तक कह दिया कि सीबीआई के उस अधिकारी के खिलाफ तुरंत जांच की जाए जो पूरे मामले की जांच कर रहा था.

अदालत द्वारा केस को आधारहीन या त्रुटिपूर्ण ठहराने और जांच अधिकारी के खिलाफ जांच के आदेश देने से यह प्रश्न और तीखा हो गया है कि क्या हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में सत्ता और संस्थाओं के बीच संतुलन सही दिशा में है भी?

भारत में सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियां शुरू से ही विवादों में रही हैं. विपक्षी आरोप लगाते हैं कि इन जांच एजेंसियों का इस्तेमाल सत्ता पक्ष अपने विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए करता है. वहीं, सरकार का तर्क होता है कि कानून अपना काम कर रहा है.

देश में सीबीआई का गठन भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और गंभीर आर्थिक अपराधों की जांच के लिए किया गया था, जिस के तार कई राज्यों में फैले हों ताकि केंद्र सरकार के कर्मचारियों और सार्वजनिक संस्थानों में बढ़ते भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके. मगर देखा यह गया कि अपने मूल काम से हट कर सीबीआई उन मामलों में सुर्खियां बटोरने लगी जो हत्या से जुड़े थे. जैसे, नोएडा का निठारी कांड, आरुषि हत्याकांड, किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट, मधुमिता शुक्ल हत्याकांड, प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड या कविता रानी हत्याकांड, जबकि इन मामलों की जांच राज्य पुलिस, सीआईडी, सीबीसीआईडी आदि को करनी चाहिए थी.

परंतु इन मामलों को सीबीआई ने अपने ऊपर ओढ़ कर अखबारों की सुर्खियां बटोर लीं, जबकि असल और बड़े वित्तीय घोटालों से नजरें हटा लीं. सीबीआई ने सत्ता के इशारे पर उन वित्तीय घोटालों के मामलों, जिन में देश के बड़ेबड़े मंत्रीअधिकारी लिप्त हैं और जिन की वजह से देश की आम जनता महंगाई के बोझ तले दबती चली जा रही है, की ऐसी लचर जांचें कीं कि असली अपराधी कभी जेल की सलाखों के पीछे नहीं पहुंचा. जबकि, विपक्षी दलों के नेताओं को खूब प्रताड़ित किया.

कठघरे में सजा की दर

आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि ईडी ने जिन नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए उन में सजा की दर न के बराबर है. खुद वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने संसद में स्वीकारा था कि ईडी ने अप्रैल 2015 से ले कर फरवरी 2025 के बीच 193 लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए थे जिन में से केवल दो मामलों में ही सजा हुई यानी सजा की दर 1 फीसदी रही. जो दो नेता दोषी पाए गए वे दोनों ही झारखंड के थे. वहां के पूर्व मंत्री हरिनारायण राय को 7 साल की कैद और 5 लाख रुपए के जुर्माने की सजा हुई जबकि एक और पूर्व मंत्री एनोस एक्का को 7 साल की कैद और 2 करोड़ रुपए के जुर्माने की सजा हुई.

इस खामी या साजिश पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार मनीलौंड्रिंग के मामलों में कम दोषसिद्धि पर कमैंट किए हैं. टीएमसी विधायक पार्थ चटर्जी की जमानत याचिका पर सुनवाई करते सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी की थी कि ईडी की दोषसिद्धि की दर खराब है. कोर्ट ने यह सवाल भी किया था कि आखिर किसी व्यक्ति को कितने समय तक विचाराधीन रखा जा सकता है. इस गंभीर मसले पर देश के मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने भी एक मामले की सुनवाई के दौरान 7 अगस्त, 2025 को यह कहते हुए तंज कसा था कि ईडी बिना दोष सिद्ध किए लोगों को सालों तक जेल में रखने में सफल रही है.

यह एजेंसी कितने मनमाने ढंग से सरकार के इशारे पर नाचती हुई काम करती है, इस पर टीएमसी नेता साकेत गोखले की मानें तो ईडी द्वारा राजनेताओं के खिलाफ दर्ज किए 98 फीसदी मामले विपक्षी नेताओं के खिलाफ थे. महज 2 फीसदी भाजपा नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए गए. ये 2 फीसदी भी भाजपा वाशिंगमशीन में शामिल हो गए. जाहिर है, उन का इशारा हिमंत बिस्वा सरमा, नारायण राणे और शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं की तरफ था.

बकौल साकेत गोखले, पिछले 11 सालों में 1,000 मामलों में से केवल 7 को ही दोषी पाया गया. यानी, 993 को महज जेल में ठूंसने के लिए मामले दर्ज किए गए क्योंकि सख्त पीएमएलए (प्रिवैंशन औफ मनीलौंड्रिंग एक्ट 2002) के तहत जमानत मिलना कठिन है. यही हाल सीबीआई का है जो राजनेताओं और दूसरे अपराधियों के आंकड़े अलगअलग पेश नहीं करती लेकिन विपक्ष का यह आरोप आंकड़ों और हकीकत के बेहद नजदीक है कि उस ने भी 95 फीसदी मामले विपक्षी नेताओं के खिलाफ दर्ज किए और उस की भी दोषसिद्धि और सजा दर 3 फीसदी के लगभग ही है.

सत्ता से सीबीआई का गठजोड़ नया नहीं है. इतिहास गवाह है कि पहले कि सरकारों, खासकर कांग्रेस के शासनकाल, में भी सीबीआई को ‘कांग्रेस ब्यूरो औफ इन्वैस्टिगेशन’ कहा जाता था. सीबीआई की तसवीर और तासीर ऐसी है कि 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ कह दिया. यह टिप्पणी बताती है कि राजनीतिक हस्तक्षेप सीबीआई के कामकाज पर कितना प्रभावकारी है.

2014 में जब केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी तो सीबीआई और ईडी सत्ता की कठपुतली बन कर नाचने लगीं. मोदीशाह के इशारे पर तमाम विपक्षी नेताओं पर छापे, गिरफ्तारियां और जांचों में तेजी आ गई. सीबीआई का इस्तेमाल, बस, राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने, राज्य सरकारों को अस्थिर करने और चुनावी फायदे के लिए होने लगा. चुनाव के समय विपक्षी नेताओं के चुनावप्रचार में व्यवधान डालने के लिए सीबीआई और ईडी का सीधा इस्तेमाल मोदीशाह ने किया, यह कोई ढकीछिपी बात नहीं है.

याद होगा जब 2022 में उत्तर प्रदेश में चुनाव की रणभेरी बजी थी तब कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा की चुनावी यात्राओं में व्यवधान डालने के लिए उन के पति रौबर्ट वाड्रा को ईडी ने कई बार अपने औफिस में पूछताछ के लिए तलब किया. प्रियंका गांधी सुबह रौबर्ट वाड्रा को ईडी औफिस छोड़ कर चुनावप्रचार के लिए निकलती थीं. चुनाव समाप्त हुए और ईडी की पूछताछ भी खत्म हो गई. जमीन घोटाले में रौबर्ट वाड्रा के खिलाफ ईडी कुछ भी साबित नहीं कर पाई. दरअसल, साबित तो कुछ करना भी नहीं था. मकसद तो, बस, विपक्षी नेताओं को प्रताड़ित और हतोत्साहित करने भर का था. जिस के लिए इन एजेंसियों में बैठे बड़ेबड़े अधिकारी जनता की गाढ़ी कमाई से बड़ीबड़ी तनख्वाह पा रहे हैं और बीजेपी की उंगलियों पर नाच रहे हैं.

सीबीआई द्वारा जिन इनेगिने मामलों में नेताओं को सजा हुई है उन में से एक प्रमुख बिहार का चारा घोटाला है जिस के लीडर पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव हैं. यह बहुचर्चित घोटाला साल 1996 में उजागर हुआ था. यह साल राजनीतिक अस्थिरता और उठापटक वाला था. तब केंद्र में पी वी नरसिम्हा राव वाली कांग्रेस सरकार थी. उस ने कोई दखल इस में नहीं दिया था क्योंकि सीबीआई जांच पटना हाईकोर्ट के आदेश पर शुरू हुई थी जिस के चलते लालू यादव को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था. तब उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को कुरसी सौंप दी थी.
लालू यादव के चारा घोटाले से ताल्लुक रखते मुकदमे अभी कोर्टों में चल रहे हैं लेकिन यह भी दिख रहा है कि घोटाले तो उन्होंने किए हैं. अब यह और बात है कि उन के वकील बचाव सलीके से नहीं कर पाए और खुद लालू भी अतिआत्मविश्वास के शिकार रहे. इन दिनों खराब सेहत के चलते वे जमानत पर हैं. यहां यह सवाल मौजूद है कि भ्रष्ट तो सौ फीसदी नेता हैं लेकिन अधिकतर अपने कुकर्म ढकने और कमाई को मैनेज करने की कला जानते हैं. लालू की हालत देख तो सभी एहतियात से कमानेखाने लगे हैं. कोई कम खाता है तो कोई ज्यादा खाता है. राजनीति काजल की कोठरी है जिस में से बिना कालिख के तो किसी का बाहर आना शायद मुमकिन नहीं. ऐसे में जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपनी जांचों में निष्पक्ष रहें और सत्ता के तलवे चाटने से दूर रहें.

गैरों पे सितम और अपनों पर रहम

मजे की बात यह है कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी और सीबीआई की जांचें चुनावी मौसम में तेज होती रहती हैं और जब विपक्षी नेता बीजेपी में शामिल हो जाते हैं तो मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं. उदाहरण के लिए, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, जो पहले कांग्रेस में थे, पर शारदा चिट फंड घोटाले के आरोप थे, लेकिन बीजेपी में शामिल होने के बाद जांच रुक गई. इस पैटर्न ने ही सीबीआई की अहमियत खाक में मिला दी है हालांकि, मोदी सरकार इन आरोपों को खारिज करती है और कहती है कि जांचें कानूनी आधार पर होती हैं. लेकिन तथ्य क्या कहते हैं? आइए कुछ प्रमुख उदाहरणों पर नजर डालें.

पहला प्रमुख उदाहरण है सीबीआई डायरैक्टर आलोक वर्मा मामला. आलोक वर्मा 2018 में सीबीआई के निदेशक थे, जिन्होंने राफेल लड़ाकू विमान सौदे में हुई अनियमितताओं की जांच शुरू करने की तैयारी की थी. तभी मोदी सरकार ने वर्मा के कार्यालय को सील कर दिया और उन्हें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में पद से हटा दिया गया. आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने इसे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़ा और कहा कि यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि वर्मा के पास राफेल घोटाले से जुड़े दस्तावेज थे. अगर आलोक वर्मा यह जांच शुरू करते तो बीजेपी के शीर्ष पद पर आसीन माननीयों के चेहरे बेनकाब हो जाते.

यह घटना सीबीआई की स्वतंत्रता पर सवाल उठाती है, क्योंकि वर्मा को हटाने के बाद उन की पैंशन और अन्य लाभ भी रोक दिए गए. विपक्ष ने इसे ‘संस्थागत हत्या’ करार दिया, जबकि सरकार ने इसे सीबीआई का ही आंतरिक विवाद बताया. लेकिन इस मामले ने साफ कर दिया कि सीबीआई के शीर्ष पदों पर नियुक्तियां और बर्खास्तगी राजनीतिक इच्छाशक्ति से अपने फायदे के लिए होती हैं.

दूसरा उदाहरण है पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का केस. वर्ष 2015 में एयरसेल-मैक्सिस मामले में पहली चार्जशीट दाखिल हुई थी, लेकिन 4 साल बाद, 2019 में बीजेपी सरकार के दौरान नई चार्जशीट दाखिल की गई. यह राजनीतिक बदला था, क्योंकि चिदंबरम कांग्रेस के प्रमुख नेता हैं. इसी तरह, आईएनएक्स मीडिया मामले में चिदंबरम को गिरफ्तार किया गया, जो कई महीनों तक जेल में रहे. फिर उन्हें जमानत मिल गई. मामला अभी तक लंबित है. ईडी ने कहा- मनीलौंड्रिंग के सुबूत हैं मगर 11 साल हो गए, अदालत में वे सुबूत पेश नहीं किए गए. जो अधिकारी इस केस को देख रहे थे वे अब बीजेपी में एमएलए हैं.

मध्यप्रदेश के बहुचर्चित व्यापमं घोटाले में सीबीआई की सब से ज्यादा किरकिरी हुई. मध्य प्रदेश का बहुचर्चित व्यापमं घोटाला देश के सब से बड़े भरती और प्रवेश परीक्षा घोटालों में गिना जाता है. मैडिकल कालेजों में दाखिला, सरकारी नौकरियों की भरती और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में फर्जीवाड़े के आरोपों ने वर्षों तक राज्य और देश की राजनीति को हिला कर रखा. व्यापमं यानी मध्य प्रदेश प्रोफैशनल एग्जामिनेशन बोर्ड पर आरोप था कि उस ने पैसे ले कर फर्जी अभ्यर्थियों को परीक्षाओं में बैठाया, ओएमआर शीट्स बदलीं और अयोग्य उम्मीदवारों को चयनित कराया. जब मामले की छानबीन शुरू हुई तो बीजेपी के कई प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आए. इस के बाद मौतों की एक लंबी श्रृंखला चालू हो गई. इन में सब से संदिग्ध मौत चिकित्सा शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की थी जिन के बारे में कहा जाता है कि भगवा गैंग ने ही उन्हें फंसाया था.

2015 में, लगातार विवाद, हाईकोर्ट की निगरानी और संदिग्ध मौतों की लंबी श्रृंखला के बीच जांच राज्य पुलिस से ले कर सीबीआई को सौंपी गई. मगर व्यापमं में लिप्त कई आरोपियों, केस से जुड़े गवाहों की मौतों का सिलसिला रुका नहीं. सीबीआई से लोगों को उम्मीद थी कि वह दूध का दूध, पानी का पानी कर देगी. मगर सीबीआई ने अधिकांश मौतों में ‘प्राकृतिक कारण’ या ‘आत्महत्या’ की बात कही, जिस से विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए.

सीबीआई ने निचले स्तर के दलालों और अभ्यर्थियों पर तो कार्रवाई की लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर के बड़े चेहरों तक जांच की आंच नहीं पहुंची. अदालत में सीबीआई की कमजोर पैरवी, सुबूतों की कमी और गवाहों के मुकर जाने के कारण आरोपियों को राहत मिली. यह मामला वर्षों तक चलता रहा. हजारों पन्नों की चार्जशीट, सैकड़ों आरोपी, लेकिन अंतिम नतीजे ढाक के तीन पात. अनेक आरोपियों को सुबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया और इस तरह ‘बड़ी मछलियां’’ बच गईं. इन बड़ी मछलियों में एक चर्चित और संदिग्ध नाम पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भी है.

व्यापमं घोटाला केवल एक भरती घोटाला नहीं था; यह भारत की जांच प्रणाली, राजनीतिक जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया की परीक्षा भी था. सीबीआई को मामला सौंपे जाने के बाद जनता को बहुत उम्मीदें थीं कि उन के साथ न्याय होगा. मगर जांच की दिशा, गति और परिणामों को जिस बुरी तरह प्रभावित किया गया उस ने एजेंसी के मुंह पर कालिख पोत दी.

चौथा उदाहरण पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से जुड़ा है. 2014 में शारदा चिट फंड घोटाले में सीबीआई ने जांच शुरू की, लेकिन ममता ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार सीबीआई का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में कर रही है. उन्होंने कहा, “अन्य चिट फंड कंपनियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या सीबीआई सरकार का औजार है?”

2019 में हाल यह हुआ कि सीबीआई अधिकारियों को कोलकाता पुलिस ने हिरासत में ले लिया, जो एक बड़ा राजनीतिक विवाद बना. ममता ने सीबीआई की कार्रवाइयों को ‘संघीय ढांचे पर हमला’ बताया.

इस के बाद 2023 में तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी को सीबीआई ने पूछताछ के लिए बुलाया, जिसे तृणमूल कांग्रेस ने ‘राजनीतिक उत्पीड़न’ करार दिया. ये घटनाएं दिखाती हैं कि सीबीआई का उपयोग राज्य सरकारों को अस्थिर करने के लिए किस तरह होता है.

पांचवा उदाहरण उन्नाव रेप केस में कुलदीप सिंह सेंगर का है. सेंगर बीजेपी का पूर्व विधायक, जो रेप और हत्या का दोषी पाया गया. सीबीआई ने शुरुआत में मामले को दबाने की कोशिश की लेकिन बाद में राजनीतिक दबाव में कार्रवाई की. हाल ही में सेंगर को जमानत मिली, जिस पर राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि पीड़िता को प्रताड़ित किया जा रहा है, जबकि आरोपी को राहत दी जा रही है. यह मामला भी दिखाता है कि सीबीआई की जांचें राजनीतिक दबाव के अनुसार चलती हैं.

गौरतलब है कि बीजेपी नेता और वर्तमान में देश के गृहमंत्री अमित शाह ने 2010 में खुद सीबीआई को ‘केंद्र का औजार’ कहा था, जब वे गुजरात के गृहमंत्री हुआ करते थे. उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी और शाह पर लोगों के एनकाउंटर के आरोप थे. आज वही बीजेपी केंद्रीय सत्ता में है, और विपक्ष उसी भाषा का इस्तेमाल कर रहा है.

1989 में इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि सीबीआई ‘सत्तारूढ़ पार्टी का राजनीतिक औजार’ बन चुकी है. इसी तरह, 2013 में ओपन मैगजीन ने सीबीआई को ‘कांग्रेस ब्यूरो औफ इन्वैस्टिगेशन’ कहा था. यह दिखाता है कि हर सरकार सीबीआई का दुरुपयोग करती आई है.

सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ कहा और स्वतंत्रता के लिए सुधार सुझाए हैं. 1997 के विनीत नारायण मामले में कोर्ट ने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए समिति बनाई, लेकिन आज भी इन जांच एजेंसियों पर सरकार का प्रभाव बना हुआ है. केंद्र की सत्ता में मोदी सरकार के आने के बाद भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम में 2018 के संशोधन ने सीबीआई की शक्तियों को और कमजोर किया है.

सवाल यह है कि यदि अदालत जांच एजेंसियों की किसी जांच को त्रुटिपूर्ण या दुर्भावनापूर्ण बताती है, तो क्या एजेंसियों की जवाबदेही तय होगी? क्या संस्थागत सुधार की आवश्यकता है? और क्या जांच प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत है?

लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है, वह देश की उन तमाम संस्थाओं की विश्वसनीयता पर टिका होता है जिन से आम आदमी निष्पक्षता की उम्मीद लगाए बैठा है. यदि जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठते रहे, तो यह लोकतंत्र की बुनियाद को हिला देगा.

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के बारे में कब क्या कहा :

1. सभी संस्थाओं को तोड़ दिया गया है. कुछ भी स्वतंत्र नहीं बचा है. जब अभियुक्त अपने बचाव की कोशिश करता है तो सीबीआई उसे असहयोग करना कह कर कठघरे में खड़ा करती है.
– जस्टिस अमानुल्ला – नवंबर 2025 के विमल नेगी के मामले में.

2. आप सब कोर्ट्स को विद्वेषपूर्ण मान रहे हो क्योंकि कोर्ट्स ने बिना आप की सुने आरोपियों को जमानत दे दी. आप का यह मानना न्यायपालिका का अपमान है.
– जस्टिस अमन ओझा और पंकज मित्तल की सीबीआई के 42 मामलों की सुनवाई पश्चिमी बंगाल त्रिणमूल कांग्रेस शासित राज्य पश्चिम बंगाल से बाहर भारतीय जनता पार्टी शासित राज्य में ट्रांसफर करने की याचिका पर टिप्पणी सितंबर 2024 में.

3. आलोक कुमार वर्मा को सीबीआई के निदेशक के पद से हटाए जाने के मामले में सरकार की सिफारिश पर सैंट्रल विजिलैंस कमीशन को फटकार लगाई गई और अक्तूबर 2018 का आदेश निरस्त किया गया. हालांकि आलोक कुमार वर्मा फिर पद पर बहाल नहीं हुए पर सीबीआई और सरकार की खिंचाई हुई.

4. अनिल अंबानी की कंपनियों द्वारा 40,000 करोड़ रुपए के बैंकों से किए गए घपले पर सीबीआई द्वारा पैर घसीटने पर फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच न्यायिक, तुरंत और बिना भेदभाव वाली होनी चाहिए. यानी, सुप्रीम कोर्ट मानती है कि सीबीआई अपनी जांच में अकसर न फेयर होती है, न प्रौम्प्त होती है और न डिसपैशनेट होती है. सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बावजूद अनिल अंबानी का कुछ खास बिगड़ेगा, इस के आसार कम हैं क्योंकि सीबीआई मामले में ढीलढाल ही रखेगी.

5. सीबीआई के जिन मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट कर रही होती है उन में कोशिश होती है कि मामला ऐसे वक्त के पास सामने लाया जाए जो सत्ता का हमदर्द हो. दिसंबर 2023 के आसपास 8 विपक्षी नेताओं के बारे में मामले दूसरी बैंचों से ले कर जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की कोर्ट में ट्रांसफर कर दिए गए.
इन में दिल्ली के उमर खालिद की जमानत, तमिलनाडू के पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पाडी करप्पा पलानीसामी, आंध्र प्रदेश में तब पूर्व मुख्यमंत्री पर भाजपा सहयोगी चंद्रबाबू नायडू, कांग्रेस के कर्नाटक के नेता डी के शिवकुमार और भाजपा विरोधी डीएमके सरकार के मंत्री सेंथिल बालाजी के मामले हैं.
जस्टिस बेला एम त्रिवेदी गुजरात हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट आई हैं. वे नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री शासन के दौरान विधि सचिव रही हैं.
सीबीआई का गठन दिल्ली स्पैशल पुलिस एस्टैब्लिशमैंट एक्ट 1946 के अंतर्गत हुआ था. लेकिन यह अब प्रधानमंत्री सचिवालय द्वारा नियंत्रित है. सैंट्रल विजिलैंस कमिशन, जो प्रिवैंशन औफ करप्शन एक्ट 1988 के अंतर्गत गठित हुआ है, इस की निगरानी करता है. इस का निदेशक प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और मुख्य न्यायाधीश की एक कमेटी करती है. हालांकि, सीबीआई पूरी तरह से प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के इशारे पर काम करती है.

इस का मुख्य कार्यालय दिल्ली में लोधी रोड पर सीजीओ कौम्पलैक्स में है. इस के अधिकारी आमतौर पर राज्यों की पुलिस सेवाओं से आते हैं. Arvind Kejriwal

Epstein files : नैतिकता बनाम सत्ता – एपस्टीन प्रकरण में भारत की चुप्पी

Epstein files : एपस्टीन फाइल में नाम आने के बाद दुनिया भर के बड़े नामों में से कइयों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया तो कइयों की गिरफ्तारियां हुई हैं. इनमें नेता, व्यवसायी, शाही घराने के सदस्य और कई सेलेब्रिटीज शामिल हैं. मगर भारत सरकार इस मामले में चुप्पी साधे हुए है जबकि केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उद्योगपति अनिल अंबानी का नाम इन फाइलों में प्रमुखता से आया है.

अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस ने एपस्टीन फाइल्स का कुछ अंश जारी कर दिया है. नाबालिग लड़कियों से यौन शोषण के संगठित नेटवर्क का दोषी जेफ्री एपस्टीन और उससे जुड़े दुनिया के तमाम नामचीन लोगों के कारनामे अब पब्लिक डोमेन में हैं. जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी कोई 30 लाख फ़ाइलें अभी तक रिलीज़ हुई हैं और लाखों फाइलें रिलीज होनी बाकी हैं. इन फाइलों में दुनिया के धुरंधर और चर्चित राजनेताओं, उद्यमियों और सेलेब्रिटीज का नाम शामिल है, जिनके इस नरपिशाच से करीबी रिश्तों का जिक्र फाइलों में हैं. एपस्टीन के नजदीकियों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, हिलेरी क्लिंटन, बिल क्लिंटन, एलोन मस्क, बिल गेट्स, माइकल जैक्सन के नाम सुन कर लोग सकते में हैं.

एपस्टीन फाइल में नाम आने के बाद दुनिया भर के बड़े नामों में से कइयों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है तो कइयों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू होने के बाद उनकी गिरफ्तारियां जारी हैं. इनमें नेता, व्यवसायी, शाही घराने के सदस्य और कई सेलेब्रिटीज शामिल हैं.

सीबीएस न्यूज़ के स्वास्थ्य विशेषज्ञ के जेफ्री एपस्टीन के साथ कई ईमेल एक्सचेंज उजागर हुए, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया. गोल्डमैन सैक्स की मुख्य वकील कैथी रूएम्लर एपस्टीन से जुड़े ई-मेल्स की वजह से पद से हट गयीं. अमेरिकी अटॉर्नी (वकील) ब्रैड कार्प ने इस्तीफा दिया. हार्वर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर लैरी समर्स के जेफ्री एपस्टीन से बातचीत के रिकॉर्ड्स सामने आने के बाद इस्तीफा लिया गया. कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. रिचर्ड एक्सेल एपस्टीन से संपर्कों के खुलासे के बाद नेतृत्व से हटे. वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम (WEF) के अध्यक्ष बोर्गे ब्रेंडे ने एपस्टीन के साथ संचार दस्तावेज़ सामने आने के बाद पद छोड़ दिया.

रॉयल मार्सडेन कैंसर चैरिटी के ट्रस्टी और यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर निकोल जंकेरमन का इस्तीफा हुआ. वहीं स्लोवाकिया के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मियोज़्लाव लाइचक ने विवाद बढ़ने पर इस्तीफा दे दिया. यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज से सलाहकार बोर्ड के डेविड स्टर्न से इस्तीफा लिया जा चुका है. अरब वर्ल्ड इंस्टीट्यूट के प्रमुख जैक लांग ने जेफ्री से संबंधों के चलते इस्तीफा दिया. डीपी वर्ल्ड के चेयरमैन सुल्तान अहमद बिन सुलायेम ई-मेल्स में नाम सामने आने के बाद पद से हटे. नार्वेजियन राजनयिक  मोना जूल की प्रशासनिक पद से छुट्टी कर दी गयी. हालांकि अभी तक ये तमाम लोग सीधे ‘कानून तोड़ने के दोषी’ साबित नहीं हुए हैं मगर एक घृणित यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से दोस्ताना सम्बन्ध रखने के चलते इन लोगों को नैतिकता के आधार पर पद से हटने को मजबूर होना पड़ा.

एपस्टीन मामले में दुनिया भर के कई प्रमुख पदों पर बैठे लोगों की गिरफ्तारियां भी हो चुकी हैं, जिसमें मुख्य नाम पूर्व ब्रिटिश राजकुमार एंड्रयू माउंटबेटन-विंडसर का है. एंड्रयू को उनके अनुचित व्यवहार के चलते पहले ही शाही घराने से बाहर किया जा चुका है. इनके अलावा ब्रिटेन के पूर्व राजदूत और नेता पिटर मंडेलसन, नॉर्वेजियन राजनैतिक नेता थोरबॉर्न जगलैंड, एपस्टीन की साझेदार गिस्लेन मैक्सवेल जो पहले से नाबालिग बच्चों की तस्करी की दोषी है, को भी गिरफ्तार किया जा चुका है. ब्रिटेन और यूरोप में एपस्टीन फाइल्स के खुलासों के बाद जांचें तेज हो रही हैं और दुनिया के कुछ बड़े राजनीतिज्ञों पर कानूनी दबाव बढ़ता जा रहा है.

मगर भारत में इस मामले में ख़ामोशी पसरी हुई है. भारत के केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, अनिल अंबानी का नाम भी इन फाइलों में है.

गौरतलब है कि 2008 तक इस बात का खुलासा हो चुका था कि जेफ्री एपस्टीन एक यौन अपराधी है जिसने अनेक बच्चियों का यौनशोषण किया और उनको वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर किया. आरोप है कि एपस्टीन ने अपने आइलैंड पर बने महल में दुनिया के तमाम नामचीन लोगों को इन्वाइट करता था और  उनके मनोरंजन व कामपिपासा शांत करने के लिए कमसिन लड़कियों को ही नहीं परोसता था बल्कि उस जगह पर दुधमुहे बच्चों का मांस भी खाने के लिए परोसा जाता था.

2008 में एपस्टीन पर फ्लोरिडा (पामबीच) में नाबालिग लड़कियों से देह व्यापार कराने और यौन शोषण के आरोप लगे. इस आरोप को स्वीकारने के बाद जेफ्री एपस्टीन को 18 महीने की सजा हुई, पर वह लगभग 13 महीने ही जेल में रहा. उसे “वर्क रिलीज़” की अनुमति थी, यानी दिन में बाहर काम करने जाता था और रात में जेल लौटता था. 2009 में वह जेल से रिहा हो गया और उसके कुकर्म ज्यों के त्यों जारी रहे.

बताते चलें कि अगले दस सालों में जेफ्री एपस्टीन के पाप का घड़ा धीरे धीरे भर गया और 2019 में न्यूयॉर्क में फेडरल सेक्स ट्रैफिकिंग के नए आरोपों में उसे फिर गिरफ्तार किया गया. मगर इस बार मामला जटिल था और जेफ्री एपस्टीन अगर अदालत में मुंह खोलता तो कई अन्य लोगों के नाम उजागर हो सकते थे. लिहाजा जेल में मुकदमे के दौरान उसकी संदिग्ध मौत हो गयी. आधिकारिक तौर पर इसे आत्महत्या बताया गया, मगर सूत्रों की मानें तो जेफ्री एपस्टीन को जेल के भीतर ही मरवा दिया गया.

यह जानते हुए कि अत्यंत घिनौने कृत्य में जेफ्री एपस्टीन को 2008 में सजा सुनाई गयी थी, जिसका कैरेक्टर इस लायक नहीं था कि भारत में रामराज्य लाने का नारा देने वाली सरकार रावण से भी बदतर व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का नाता रखती, बावजूद इसके भारत सरकार के केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी जेफ्री एपस्टीन से लगातार संपर्क में रहे. कहा जा रहा है कि एपस्टीन फाइल्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी शामिल है. जो भारत में विभिन्न योजनाओं में विदेशी निवेश के लिए हरदीप पुरी के माध्यम से जेफ्री एपस्टीन की मदद ले रहे थे.

13 फरवरी को विपक्षी दल खासकर कांग्रेस सांसदों ने दिल्ली के संसद भवन के मुख्य मकर द्वार पर भारी विरोध प्रदर्शन किया. यह विरोध प्रदर्शन एपस्टीन फाइल में केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से निकट संबंधों के खुलासे को लेकर था. विपक्ष लगातार हरदीप सिंह पुरी के इस्तीफे की मांग कर रहा है. मगर मोदी सरकार इस विषय पर चुप्पी मारे बैठी है. मामला जब विपक्ष द्वारा संसद में उठाया गया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदन से ही गायब रहे.

हरदीप सिंह पुरी की जेफ्री एपस्टीन को की गयी तमाम इमेल्स अब पब्लिक डोमेन में हैं, जिनमें वे जेफ्री से ऐसे बातचीत कर रहे हैं मानों वह उनका लंगोटिया यार था. हरदीप पुरी और जेफ्री के बीच हुए ईमेल दस्तावेजों से पता चलता है कि वर्ष 2014 और 2015 के बीच एपस्टीन और हरदीप सिंह के बीच दर्जनों बार ईमेल पर बातचीत हुई.

एक नजर इस बातचीत पर –

18 जून 2014 को जेफ्री हरदीप पुरी को लिखता है – ”मेरी टेरजे से बात हुई. रीड हॉफमैन भारत आने के लिए तैयार हैं.”  गौरतलब है कि रीड हॉफमैन अमेरिकी इंटरनेट उद्यमी और लिंक्डइन एक सह संस्थापक हैं.

23 जून 2014 को हरदीप पुरी ने जेफ्री को जवाब भेजा – ”रीड हॉफमैन की यात्रा के लिए सहायता और सुविधा प्रदान करके मुझे ख़ुशी होगी.”

सवाल यह कि आखिर किसने कहा था कि पुरी जेफ्री के जरिये रीड हॉफमैन को भारत में इन्वाइट करें. जाहिर है पुरी नरेंद्र मोदी के आदेशों पर यह बातचीत कर रहे थे.

24 सितम्बर 2014 को जेफ्री एपस्टीन ने रीड हॉफमैन और हरदीप पुरी का आपस में परिचय कराते हुए एक मेल में हॉफमैन को लिखा कि भारत में हरदीप उनके मददगार व्यक्ति हैं. इस मेल के जवाब में रीड हॉफमैन ने हरदीप सिंह पुरी को लिखा – ”हरदीप, आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा. लोगों को चुनने में जेफ्री की पसंद बहुत अच्छी है (मैं अपवाद हूँ)”

25 सितम्बर को हरदीप पुरी ने हॉफमैन को जवाब भेजा – “लोगों के बारे में जेफ्री की समझ पर मुझे कोई शक नहीं है. उनके ‘इंस्टिंक्टस’ तो और भी बेहतर हैं.

इसके बाद 4 अक्टूबर 2014 को जेफ्री एपस्टीन ने हरदीप सिंह पूरी को फिर मेल भेज कर पूछा – “क्या रिड से मीटिंग हुई?”

जवाब में उसी दिन हरदीप पुरी ने लिखा – “मैं आज दोपहर की मीटिंग के लिए एसएफ (सैन फ्रांसिस्को) में हूँ. आप, मेरे दोस्त, सच में काम करवा लेते हैं.”

“कोई  और सलाह?”

इस पर एप्सटीन ने जवाब दिया – “उन्हें बताओ कि विज्ञान और तकनीक से जुड़े लोगों और सोशल नेट्वर्किंग गुरुओं से मिलने के लिए आप उनकी भारत यात्रा का इंतजाम करेंगे.”

11 अक्टूबर 2014 से 24 अक्टूबर 2014 के बीच कई ईमेल एक्सचेंज हुए जिसमें जेफ्री के कहने पर हरदीप सिंह पुरी ने उसके कई सहयोगियों को भारतीय वीजा उपलब्ध कराने में सहायता पहुंचाई.

24 दिसम्बर का एक ईमेल सामने आया है जिसमें हरदीप सिंह पुरी ने जेफ्री एपस्टीन से ‘एक्सोटिक आइलैंड’ या ‘अनूठे टापू’ का ज़िक्र किया और कहा कि – ”जब आप अपने ‘एक्सोटिक आइलैंड’ से वापस आएं तो बताइयेगा, मैं  आपसे मिल कर थोड़ी बातचीत करना चाहता हूँ और आपको भारत में रूचि जगाने वाली कुछ किताबें भी देना चाहता हूँ.”

एपस्टीन के आइलैंड को ‘एक्सोटिक आइलैंड’ कहने का तात्पर्य यही है कि हरदीप सिंह पुरी उसके आइसलैंड के बारे में सब कुछ जानते थे. यानी पुरी एक नरपिशाच की रुचि भारत में जगाने के लिए प्रयासरत थे.

गौरतलब है कि 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनी और जुलाई 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘डिजिटल इंडिया’ प्रोग्राम को लांच किया. मगर इससे करीब सात महीने पहले ही यानि 13 नवम्बर 2014 को इस प्रोग्राम के बारे में हरदीप सिंह पुरी जेफ्री एपस्टीन को बता चुके थे.

हरदीप सिंह पुरी ने जेफ्री को लिखा, “जेफ़, मैंने आपको 3 अक्टूबर को सिलिकॉन वैली में रीड के साथ हुई अपनी बातचीत के बारे में बताया था. आपकी प्रतिक्रिया थी कि रीड को जल्द से जल्द भारत का दौरा करना चाहिए. अक्टूबर के मध्य में भारत लौटने के बाद, मैं पहले से कहीं अधिक आश्वस्त हूँ कि आज भारत में इंटरनेट आधारित आर्थिक गतिविधियों के लिए शानदार मौका है.”

हरदीप सिंह पुरी ने इस मेल में आगे लिखा, “उदाहरण के लिए जापानी दूरसंचार और इंटरनेट दिग्गज सॉफ्ट बैंक ने हाल ही में घोषणा की है कि उसने अगले 10 सालों में भारतीय ई-कॉमर्स क्षेत्र में 10 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश करने की योजना बनाई है. भारतीय कंपनी स्नैपडील 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर की फंडिंग प्राप्त करने वाली पहली कंपनी है. मजबूत जनादेश के साथ चुनी गई नई सरकार के आने से बाजार में हलचल और बढ़ गई है. यह ‘डिजिटल इंडिया’ पर ख़ास फ़ोकस के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए प्रतिबद्ध है.”

सवाल यह कि जब डिजिटल इंडिया साल 2015 में लांच हुआ तो हरदीप सिंह पुरी नवंबर 2014 में ही एपस्टीन से इसकी चर्चा कैसे कर रहे थे? इसका सीधा सा अर्थ यह है कि मोदी सरकार की योजनाएं एक अपराधी के सलाह मशवरे से चलाई गयी.

2014 से 2017 के बीच केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन के बीच 62 बार ईमेल का आदान-प्रदान हुआ और 14 बार मुलाकातें हुईं. यानि जनवरी 2014 में भाजपा ज्वाइन करने के बाद पुरी ने मोदी के हरकारे के तौर पर काम किया हालांकि उनको 2014–2015 के दौरान किसी सरकारी विभाग में अधिकारी या राज्य मंत्री का पद नहीं मिला था. 2014 से पहले वे भारतीय विदेश सेवा अधिकारी (IFS) और राजनयिक थे. अपने विदेश मंत्रालय और विदेश मंत्री को हाशिये पर रख कर बिना किसी प्रशासनिक पद वाले हरदीप सिंह पुरी का इस्तेमाल मोदी सरकार ने क्यों किया?

इस सब में फॉरेन ऑफिस का कोई रोल नहीं था. इसमें मिनिस्ट्री ऑफ़ एक्सटर्नल अफेयर्स की कोई भूमिका नहीं थी, इस सब में भारत का राजदूत हाशिये पर था. 2014 से लेकर आज तक हरदीप सिंह, अनिल अंबानी, जेफ्री एपस्टीन और इन जैसे लोग ही देश की विदेश नीति चला रहे है.

29 मार्च 2017 को अनिल अंबानी जेफ्री एपस्टीन को लिखते हैं – वाइट हाउस से एक घोषणा हुई है कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका आ रहे हैं, क्या आपको मालूम है कि तारीख क्या है?

कुछ मिनटों के बाद ही जेफ्री का जवाब आया – ”ये इजरायल स्ट्रैटजी का पार्ट है.” यानी भारत और इजरायल संबंधों की रूपरेखा जेफ्री एपस्टीन के द्वारा तय की जा रही थी. 2017 में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा उसका एक हिस्सा थी, जिसके बारे में जेफ्री एपस्टीन बखूबी जानता था. और शायद उसी ने यह यात्रा अरेंज करवाई थी और उसके बाद 4 जुलाई से 6 जुलाई 2017 को मोदी पहली बार इजरायल यात्रा पर गए. अब एपस्टीन फाइल्स के रिलीज होने के बाद एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी भारतीय संसद से मुँह चुरा कर भागे भागे इजरायल गए. उनके वापस लौटते ही अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया और मीडिया से एपस्टीन फाइल्स का जिक्र गायब हो गया.Epstein files

Family Story in Hindi : मंथर हत्या

Family Story in Hindi : बड़े भैया और सुरेश दोनों सगे भाई थे लेकिन दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर था. मैं अनीता जोशी, माताजी की नर्स हूं. माताजी जब बड़े भैया के यहां से वापस आई थीं, एकदम चुस्त- दुरुस्त थीं. खूब हंसहंस कर बाबूजी को बता रही थीं कि क्या खाया, क्या पिया, किस ने पकाया.

बड़े भैया जब भी कनाडा से भारत आते मां को अपने फ्लैट पर ले जाते और अमृतसर से अपनी छोटी बहन मंजू को भी बुला लेते. कई सालों से यह सिलसिला चल रहा है. महीना भर के लिए मेरी भी मौज हो जाती. मैं भी उधर ही रहती. माताजी पिछले 4 सालों से मेरे ऊपर पूरी तरह निर्भर थीं. 90 साल की उम्र ठहरी, शरीर के सभी जरूरी काम बिस्तर पर ही निबटाने पड़ते थे.

वैसे देखा जाए तो सुरेश और उन की पत्नी संतोष को सेवा करनी चाहिए. मांबाप के घर में जो रह रहे हैं. कभी काम नहीं जमाया. एक तरह से बाबूजी का ही सब हथिया कर बैठ गए हैं. संतोष बीबीजी भी एकदम रूखी हैं. पता नहीं कैसे संस्कार पाए हैं. औरत होते हुए भी इन का दिल कभी अपनी सास के प्रति नहीं पसीजता. बस, अपने पति और बच्चों से मतलब या पति की गांठ से.

इधर कई महीनों से माताजी रात को आवाज लगाती थीं तो सुरेश का परिवार सुनीअनसुनी कर देता था. एक दिन बाबूजी ने सुरेश के बच्चों को फटकारा तो वह कहने लगे कि ऊपर तक आवाज सुनाई नहीं देती. आवाज लगाना फुजूल हुआ तो माताजी ने कटोरी पर चम्मच बजा कर घंटी बना ली. इस पर संतोष बीबीजी ने यह कह कर कटोरी की जगह प्लास्टिक की डब्बी रखवा दी कि कटोरी बजाबजा कर बुढि़या ने सिर में दर्द कर दिया.

मैं ड्यूटी पर आई तो माताजी ने कहा कि अनीता, तू ने मुझे रात को खाना क्यों नहीं दिया. मैं बोली कि खाना तो मैं बना कर जाती हूं और आशीष आप को दोनों समय खाना खिलाता है. मैं ने ऊपर जा कर छोटी बहू संतोष से पूछा तो वह बोलीं, ‘‘अरे, इस बुढि़या का तो दिमाग चल गया है. खाऊखाऊ हमेशा लगाए रखती है. खाना दिया था यह भूल गई.’’

अगले दिन बाबूजी से पूछा तो वह कहने लगे कि डाक्टर ने खाने के लिए मना किया है. रात का खाना खिलाने से इन का पेट खराब हो जाएगा. ताकत की दवाइयां दे गया है. आशीष खिला देता है.

मैं ने माताजी से पूछा, ‘‘डाक्टर आप को देखने आया था लेकिन आप ने तो नहीं बताया.’’

माताजी हैरान हो कर बोलीं, ‘‘कौन सा डाक्टर? अरे, मैं तो डा. चावला को दिखाती थी पर उन को मरे हुए तो 2 साल हो गए. दूसरे किसी डाक्टर को ये इसलिए नहीं दिखाते कि मुझ पर इन को पैसा खर्च करना पड़ेगा.’’

मैं ने फिर पूछा, ‘‘ताकत की गोलियां कहां हैं मांजी, दूध के संग उन्हें मेरे सामने ही ले लो.’’

वह बोलीं, ‘‘कौन सी गोलियां? मरने को बैठी हूं… झूठ क्यों बोलूंगी? 3 दिन से रात का खाना बंद कर दिया है मेरा. जा, पूछ, क्यों किया ऐसा.’’

मैं ने तरस खा कर जल्दी से एक अंडा आधा उबाला और डबल रोटी का एक स्लाइस ले कर अपने घर जाने से पहले उन्हें खिला दिया.

अगले दिन मेरी आफत आ गई. सुरेश बाबू ने मुझे डांटा और कहा कि जो वह कहेंगे वही मुझे करना पड़ेगा. रात को उन्हें पाखाना कौन कराएगा.

मैं ने दबी जबान से दलील दी कि भूख तो जिंदा इनसान को लगती ही है, तो चिल्ला पड़े, ‘‘तू मुझे सिखाएगी?’’

मैं भी मकानजायदाद वाली हूं. घर से कमजोर नहीं हूं. मेरा बड़ा बेटा डाक्टरी पढ़ रहा है. छोटा दर्जी की दुकान करता है. उसी की कमाई से फीस भरती हूं. दोनों मुझे यहां कभी न आने देते. मगर माताजी मेरे बिना रोने लगती हैं. मैं हूं भी कदकाठी से तगड़ी. माताजी 80 किलो की तो जरूर होंगी. उन्हें उठानाबैठाना आसान काम तो नहीं और मैं कर भी लेती हूं.

एक बार कनाडा से माताजी जिमर फ्रेम ले आई थीं जो वजन में हलका और मजबूत था. माताजी उसे पकड़ कर चल लेती थीं. अंदरबाहर भी हो आती थीं. पर तभी छोटी बहू के पिताजी को लकवा मार गया. अत: उन्होंने जिमर फ्रेम अपने पिताजी को भिजवा दिया.

बड़े भैया जब अगली बार आए तो अपनी मां को एक पहिएदार कुरसी दिला गए. मैं उसी पर बैठा कर उन को नहलानेधुलाने बाथरूम में ले जाती थी. मगर 2 साल पहले जब आशीष ने कंप्यूटर खरीदा तो संतोष बीबीजी ने उस की पुरानी मेज माताजी के कमरे में रखवा दी जिस से व्हील चेयर के लिए रास्ता ही नहीं बचा.

बड़े भैया कनाडा से आते तो अपनी मां के लिए जरूरत का सब सामान ले आते. भाभीजी सफाईपसंद हैं, एकदम कंचन सा सास को रखतीं. भाभीजी अपने हाथ से माताजी की पसंद का खाना बना कर खिलातीं. बाबूजी बड़े भैया के घर नहीं जाते थे. सुरेश ने कुछ ऐसा काम कर रखा था कि बाप बेटे से जुदा हो गया. बाबूजी के मन में अपने बड़े बेटे के प्रति कैसा भाव था यह तब देखने को मिला जब भैया माताजी से मिलने आए तो बाबूजी परदे के पीछे चले गए. इस के बाद ही बड़े भैया ने अलग मकान लिया और मां को बुलवा कर उन की सारी इच्छाओं को पूरा करते थे. तब मेरी भी खूब मौज रहती. वह मुझे 24 घंटे माताजी के पास रखते और उतने दिनों के पैसों के साथ इनाम भी देते.

फिर जब उन के कनाडा जाने का समय आता तो वह माताजी को वापस यहां छोड़ जाते और वह फिर उसी गंदी कोठरी में कैद हो जातीं. भाभीजी की लाई हुई सब चीजें एकएक कर गायब हो जातीं. मैं ने एक बार इस बात की बाबूजी से शिकायत की तो उलटा मुझ पर ही दोष लगा दिया गया. मैं ने जवाब दे दिया कि कल से नहीं आऊंगी, दूसरा इंतजाम कर लो. मगर माताजी ने मेरे नाम की जो रट लगाई कि उन का चेहरा देख कर मुझे अपना फैसला बदलना पड़ा.

खाना तो रोज बनता है इस घर में. बाबूजी को खातिर से खिलाते हैं मगर मांजी के लिए 2 रोटी नहीं हैं. यह वही मां है जिस ने किसी को कभी भूखा नहीं सोने दिया. देवर, ननद, सासससुर, बच्चे सब संग ही तो रहते थे. आज उसी का सब से लाड़ला बेटा उसे 2 रोटी और 1 कटोरी सब्जी न दे? क्या कोई दुश्मनी थी?

माताजी की सहेली भी मैं ही थी. एक दिन उन से पूछा तो कहने लगीं कि बाबूजी की ये खातिरवातिर कुछ नहीं करते. सब नीयत के खोटे हैं. बाबूजी के बैंक खाते में करोड़ों रुपए हैं इसलिए उन्हें मस्का लगाते हैं. मैं ठहरी औरत जात. 2-4 गहने थे उन्हें बेटी के नेगजोग में दे बैठी. इन पर बोझ नहीं डाला कभी. अब मैं खाली हाथ खर्चे ही तो करवा रही हूं. रोज दवाइयां, डाक्टर. ऊपर से मुझे दोष लगाते हैं कि तू मेरे गहने परायों को दे आई.

आज सुरेश अपनी बीवी को 5 हजार रुपया महीना जेबखर्च देता है. मेरा आदमी इसे देख कर भी नहीं सीखता. पहले तो ऐसा रिवाज नहीं था. औरतों को कौन जेबखर्च देता था.

माताजी की बाबूजी से नहीं बनती. कैसे बने? शराबी का अपना दिमाग तो होता नहीं. सुरेश के हाथ कठपुतली बन कर रह गए हैं. 10वीं में बेटा फेल हुआ तो उसे अपने साथ दुकानदारी में लगा लिया और पीना भी सिखा दिया. अब उसी नालायक से यारी निभा रहे हैं. माताजी कहती थीं कि देखना अनीता, जिस दिन मेरी आंखें बंद हो जाएंगी यह बाप की रोटीपानी भी बंद कर देगा. बाप को बोतल पकड़ा कर निचोड़ रहा है, ताकि जल्दी मरे.

माताजी कोसतीं कि इतनी बड़ी कोठी कौडि़यों के मोल बेच दी और इस दड़बे जैसे घर में आ बैठा, जहां न हवा है न रोशनी. मेरे कमरे में तो सूरज के ढलने या उगने का पता ही नहीं चलता. ऊपर से संतोष ने सारे घर का कबाड़ यहीं फेंक रखा है.

माताजी रोज अपनी कोठी को याद करती थीं. सुबह चिडि़यों को दाना डालती थीं. सूरज को निकलते देखतीं, पौधों को सींचतीं. ग्वाला गाय ले कर आता तो दूध सामने बैठ कर कढ़वातीं. लोकाट और आम के पेड़ थे, लाल फूलों वाली बेल थीं.

बड़े भैया के बच्चे सामने चबूतरे पर खेलते थे. बड़े भैया अच्छा कमाते थे. सारे घर का खर्च उठाते थे. सारा परिवार एक छत के नीचे रहता था और यह सुरेश की बहू डोली से उतरने के 4 दिन बाद से  ही गुर्राने लगी. अपने घर की कहानी सुनातेसुनाते माताजी रो पड़तीं.

इस बार बड़े भैया जब आए तब जाने क्यों बाबूजी खुद ही उन से बोलने लगे. भाभीजी ने पांव छुए तो फल उठा कर उन के आंचल में डाले. पास बैठ कर घंटों अच्छे दिनों की यादें सुनाने लगे. जब वह लोग माताजी को अपने फ्लैट पर ले गए तो मैं ने देखा कि उस रोज बाबूजी पार्क की बेंच पर अकेले बैठे रो रहे थे.

मैं रुक गई और पूछा, ‘‘क्या बात हो गई?’’ तो कहने लगे कि अनीता, आज तो मैं लुट गया. मेरा एक डिविडेंड आना था. सुरेश फार्म पर साइन करवाने कागज लाया था. मगर मैं ने कुछ अधिक ही पी रखी थी. उस ने बीच में सादे स्टांप पेपर पर साइन करवा लिए. नशा उतरने के बाद अपनी गलती पर पछता रहा हूं. अरे, यह सुरेश किसी का सगा नहीं है. पहले बड़े भाई के संग काम करता था तो उसे बरबाद किया. वह तो बेचारा मेहनत करने परदेस चला गया. मुझ से कहता था, भाई ने रकम दबा ली है और भाग निकला है. मैं भी उसे ही अब तक खुदगर्ज समझता रहा मगर बेईमान यह निकला.

मैं ने कहा, ‘‘अभी भी क्या बिगड़ा है. सबकुछ तो आप के पास है. बड़े को उस का हक दो और आप भी कनाडा देखो.’’

वह हताश हो कर बोले, ‘‘अनीता, कल तक सब था, आज लुट गया हूं. क्या मुंह दिखाऊंगा उसे. मुझे लगता है कि मैं ने इस बार बड़े से बात कर ली तो छोटे ने जलन में मुझे बरबाद कर दिया.’’

मन में आया कह दूं कि आप को तो रुपए की बोरी समझ कर संभाल रखा है. मांजी पर कुछ नहीं है इसलिए उन्हें बड़े भाई के पास बेरोकटोक जाने देता है. मगर मैं क्यों इतनी बड़ी बात जबान पर लाती.

होली की छुट्टियों में मैं गांव गई थी. जाते समय जमादारिन से कह गई थी कि माताजी को देख लेगी. 4 दिन बाद गांव से लौटी तो देखा माताजी बेहोश पड़ी थीं. बड़े भैया 1 माह की दवाइयां, खाने का दिन, समय आदि लिख कर दे गए थे. उसी डा. चावला को टैक्सी भेज कर बुलवाया था जिसे इन लोगों ने मरा बता दिया था. माताजी देख कर हैरान रह गई थीं. डाक्टर साहब ने हंस कर कहा था, ‘‘उठिए, मांजी, स्वर्ग से आप को देखने के लिए आया हूं.’’

बाबूजी ने मुझे बताया कि जब से तू गांव गई सुरेश ने एक भी दवाई नहीं दी. कहने लगा कि आशीष और विशेष की परीक्षाएं हैं, उस के पास दवा देने का दिन भर समय नहीं और मुझे तो ठीक से कुछ दिखता नहीं.

माताजी ब्लड प्रेशर की दवा पिछले 55 साल से खाती आ रही हैं. मुझे बाबूजी से मालूम हुआ कि दवा बंद कर देने से उन का दिल घबराया और सिर में दर्द होने लगा तो सुरेश ने आधी गोली नींद की दे दी थी. उस के बाद ही इन की हालत खराब हुई है.

मैं ने माताजी की यह हालत देखी तो झटपट बड़े भैया को फोन लगाया. सुनते ही वह दौड़े आए. बड़ी भाभी ने हिलाडुला कर किसी तरह उठाया और पानी पिलाया. माताजी ने आंखें खोलीं. थोड़ा मुसकराईं और आशीर्वाद दिया, ‘‘सुखी रहो…सदा सुहागिन बनी रहो.’’

बस, यही उन के आखिरी बोल थे. अगले 7 दिन वह जिंदा तो रहीं पर न खाना मांगा न उठ कर बैठ पाईं. डाक्टर ने कहा, सांस लेने में तकलीफ है. चम्मच से पानी बराबर देते रहिए.

मैं बैठी रही पर उन्होंने आंखें नहीं खोलीं. ज्यादा हालत बिगड़ी तो डाक्टर ने कहा कि इन्हें अस्पताल में भरती करवाना पड़ेगा.

सुरेश झट से बोला, ‘‘देख लो, बाबूजी. क्या फायदा ले जाने का, पैसे ही बरबाद होंगे.’’

तभी बड़ी भाभी ने अंगरेजी में बाबूजी को डांटा कि आप इन के पति हैं. यह घड़ी सोचने की नहीं बल्कि अपनी बीवी को उस के आखिरी समय में अच्छे से अच्छे इलाज मुहैया कराने की है, अभी इसी वक्त उठिए, आप को कोई कुछ करने से नहीं रोकेगा.

2 दिन बाद माताजी चल बसीं. उन का शव घर लाया गया. महल्ले की औरतें घर आईं तो संतोष बीबीजी ऊपर से उतरीं और दुपट्टा आंखों पर रख कर रोने का दिखावा करने लगीं.

अंदर मांजी को नहलानेधुलाने का काम मैं ने और बड़ी भाभी ने किया. बड़े भैया ने ही उन के दाहसंस्कार पर सारा खर्च किया.

कल माताजी का चौथा था. कालोनी की नागरिक सभा की ओर से सारा इंतजाम मुफ्त में किया गया. पंडाल लगा, दरी बिछाई गई. रस्म के मुताबिक सुरेश को सिर्फ चायबिस्कुट खिलाने थे.

सुबह 11 बजे मैं घर पहुंची तो देखा, बाबूजी उसी पलंग पर लेटे हुए थे जिस पर माताजी लेटा करती थीं. मैं ने उन्हें उठाया, कहा कि पलंग की चादरें भी नहीं बदलवाईं अभी किसी ने.

यह सुनते ही सुरेश चिल्लाए, ‘‘तेरा अब यहां कोई काम नहीं, निकल जा. होली की छुट्टी लेनी जरूरी थी. मार डाला न मेरी मां को. अब 4 दिन की नागा काट कर हिसाब कर ले और दफा हो.’’

‘‘माताजी को किस ने मारा, यह इस परिवार के लोगों को अच्छी तरह पता है. मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा हिसाब.’’

मैं चिल्ला पड़ी थी. मेरा रोना निकल गया पर मैं रुकी नहीं. लंबेलंबे डग भर कर लौट पड़ी.

बाबूजी मेरे पीछेपीछे आए. मेरे कंधे पर हाथ रखा. उन की आंखों में आंसू थे, भर्राए गले से बोले, ‘‘अब मेरी बारी है, अनीता.’’ Family Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : कृपया शोर न मचाएं

Satirical Story In Hindi : अब पानी जैसे अदने से मुद्दे को ही लीजिए. कभी तो ये लोग पानी की कमी का रोना ले कर बैठ जाते हैं, कभी अधिकता का. इस साल तो दोनों मुद्दों पर एकसाथ शोर उठ रहा है.

दिल्ली शोर मचाने वालों के मामले में अव्वल है. देश की राजधानी है, आए- दिन यहां झंडेडंडे के साथ नारों का शोर मचता रहता है. शोर के मर्म को समझ कर ही दिल्ली के लोग बिजलीपानी की कमी का शोर मचा रहे हैं.

मुझे तो अनधिकृत कालोनियों से ले कर गरीबों की जे.जे. कालोनी तक इन चीजों का कोई अभाव नहीं दिखता. बिजलीपानी जैसी सभी सुविधाएं उन्हें लगभग मुफ्त मिल रही हैं. गरीब मानी जाने वाली दिल्ली की आधी आबादी 24 घंटे फुल स्पीड पर टीवी, म्यूजिक प्लेयर, हीटर, कूलर आदि चलाती है. सुबह और शाम जलबोर्ड के पानी से घर, आंगन और सड़कें धोती है. दिल्ली जल बोर्ड बेशकीमती गंगाजल दशकों से नालों में बहा रहा है.

विद्युत विभाग भी अपनी बिजली खुले दिल से लोगों में मुफ्त बांटता है. शहर भर में बिजली के तारों में फंसे कांटे इस के गवाह हैं.

अब यह सबकुछ तो वहीं हो सकता है जहां ये चीजें अधिक मात्रा में हों.

दिल्ली के मूल निवासियों के संसाधन (जल, जमीन, उद्योग, रोजगार) पर रोज दूसरे प्रदेशों से आ रही भीड़ कब्जा जमाती जा रही है. नेता, सरकार उन्हें हर तरह की सहायता देने को वचनबद्ध हैं. यहां तक कि बड़ी संख्या में विदेशी भी सरकारी जमीन पर अपनी झुग्गियां बसा कर शहर के असीमित संसाधनों को जल्दी खत्म करने में अपना कीमती सहयोग दे रहे हैं.

एम.सी.डी. के सफाई विभाग को काम न होने की शिकायत रहती है. झुग्गी वाले बंधुओं ने उन की यह शिकायत भी दूर कर दी है. संभ्रांत कालोनियों के फुटपाथ तक उन्होंने मलमूत्र से भरना शुरू कर दिया है. म्यूनिसिपल वाले चाहे दोनों समय सफाई का रोना रोएं, काम कम नहीं होगा.

कुछ लोगों को यह भी रास नहीं आता. वे नाक बंद कर के बड़बड़ाते हैं. ऐसा कैसे चलेगा? गीता का मर्म लोग नहीं समझते.

हर चीज नश्वर है. चाहे खाना, पानी बिजली, मकान जो हो. यह यों ही बरबाद हो जाएं इस से बेहतर है कि इस का उपभोग करें.

क्या कहा, आने वाली पीढि़यों का क्या होगा? क्या बच्चों जैसी बातें करते हो? कल किस ने देखा है? आप अपना देखिए, बच्चे अपना देखेंगे. और वैसे भी बच्चे भगवान की देन हैं. जो मुंहपेट दे कर भेजता है वह रोटीपानी का भी इंतजाम करता है.

उस की तरफ से देर होने पर हम विश्व बैंक या दुनिया के विकसित देशों से थोड़ा कर्ज ले लेंगे. ये हमारे लिए अपने खजाने का मुंह खोले बैठे हैं.

आखिर हम ने उन्हें बताया है कि हमें करोड़ों डालर दे कर वे ईश्वर के खजाने में अरबों डालर के अधिकारी हो जाएंगे. नहीं तो भगवान की कृपा होते ही हमारे बच्चे विदेशियों का कर्ज चुका देंगे.

अत: बेकार में शोर न मचाएं. खाएं, पीएं, ऐश करें और समय मिलने पर शांति से बैठ कर गीता के उपदेश स्मरण करें. Satirical Story In Hindi

Social Story in Hindi : भयंकर भूल

Social Story in Hindi : जब से पंडित रामसनेही पर मोबाइल लेने की सनक सवार हुई थी तभी से वह पैसों की जुगाड़ के लिए किसी बड़े रईस के यहां कोई कर्मकांड होने का इंतजार करने लगे थे, लेकिन वह कर्मकांड उन पर इतना भारी पड़ेगा तब उन्होंने सोचा ही न था…

पंडित रामसनेही जवानी की दहलीज लांघ कर अधेड़ावस्था के आंगन में खड़े थे. अपने गोरे रंग और ताड़ जैसे शरीर पर वह धर्मेंद्र कट केश रखना पसंद करते थे. ज्यादातर वह अपने पसंदीदा हीरो की पसंद के ही कपड़े पहनते थे लेकिन कर्मकांड कराते समय उन का हुलिया बदल जाता था और ताड़ जैसे उन के शरीर पर धोतीकुरते के साथ एक कंधे पर रामनामी रंगीन गमछा दिखाई देता तो दूसरे कंधे पर मदारी की तरह का थैला लटका होता जिस में पत्रा, जंत्री और चालीसा रखते थे. माथे पर लाल रंग का बड़ा सा तिलक लगाए रामसनेही जब घर से निकलते तो गलीमहल्ले के सारे लड़के दूर से ही ‘पाय लागे पंडितजी’ कहते थे. सफेद लिबास के रामसनेही और पैंटशर्ट के रामसनेही में बहुत फर्क था.

रामसनेही को पुरोहिताई का काम अपने पुरखों से विरासत में मिला था क्योंकि बचपन से ही उन के पिता उन को अपने साथ रखते थे. विरासत की परंपरा में रह कर उन्होंने विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और मरने के बाद के तमाम कर्मकांड कराने की दीक्षा बखूबी हासिल कर ली थी. हर कार्यक्रम पर बोले जाने वाले श्लोक उन को कंठस्थ हो गए थे.

छोटे भाई से यजमानी के बंटवारे के समय पंचायत में तिकड़म भिड़ा कर ऊंचे तथा रईस घरों की यजमानी उन्होंने हथिया ली थी. छोटे भाई को जो यजमानी मिली थी वह कम आय वालों की थी, जहां पैसे कमाने की गुंजाइश बहुत कम थी. परिवार के नाम पर रामसनेही की एक अदद बीवी और बच्ची थी.

आज की पुरोहिताई के सभी गुण रामसनेही में कूटकूट कर भरे थे. और होते भी क्यों न, आखिर 15 सालों से शंख फूंकफूंक कर पारंगत जो हो चुके थे. लड़केलड़कियों की जन्मकुंडली न मिल रही हो तो वह कोई जुगत निकाल देते थे. विवाह का मुहूर्त या तिथि इधरउधर करना उन के बाएं हाथ का खेल था. कुंडली देख कर भविष्यवाणी भी करते थे. शनी से ले कर राहूकेतू की दशा का निराकरण भी करवाते थे. झाड़फूंक, जादुई अंगूठियों से वशीकरण जैसे कार्यों में उन्हें महारत हासिल थी.

व्यावसायिक तो रामसनेही इतना थे कि कंजूस की पोटली से भी अशरफी निकाल लें. जैसा यजमान वैसा काम के सिद्धांत पर चल कर उन्होंने अपने गुणों को और भी पैना कर लिया था. वह सब तरह का नशा करते थे पर जब गांजा का नशा करते तो मन ही मन औरतों के शृंगार का आनंद भी लेते थे. कुल मिला कर उन के बारे में हम यही कह सकते हैं कि 21वीं सदी की पंडिताई के साथसाथ वह बेहतरीन हरफनमौला इनसान थे.

इधर बीच उन्हें भी एक मोबाइल लेने की सनक सवार हुई ताकि अपने काम को वह अच्छी तरह से अंजाम दे सकें. यही नहीं व्यस्त दिनों में वह पूरे दिन का एक रिकशा किराए पर लेने की बात भी सोच रहे थे ताकि मुनाफे को अधिक से अधिक बढ़ाया जा सके.

रामसनेही को जो मोबाइल पसंद आया उस की कीमत 5 हजार रुपए थी. जोड़बटोर कर उन के पास कुल 3 हजार रुपए हो रहे थे. बाकी 2 हजार रुपए किसी से मांगना वह अपनी शान के खिलाफ समझ रहे थे. इसलिए मोबाइल के विचार को फिलहाल टाल कर किसी बड़े रईस के यहां कर्मकांड होने का इंतजार करने लगे. इस के लिए उन्हें अधिक दिन तक इंतजार नहीं करना पड़ा. जैसे ही सेठ चुन्नीलाल की गद्दी से नई कोठी में गृहप्रवेश कराने का बुलावा आया उन की बांछें खिल गईं.

चुन्नीलाल शहर के रईस आदमी थे. कोई भी कार्यक्रम रहा हो पंडितजी उन के यहां से काफी पैसे पाते रहे थे. उन के लिए यह घर मोटी यजमानी का था. चूंकि उस दिन पंडितजी का कार्यक्रम कहीं और नहीं था इसलिए समय से काफी पहले ही वह चुन्नीलाल के नए घर पहुंच गए.

गली में घुसते ही विभिन्न पकवानों की खुशबू का एहसास पंडितजी को होने लगा. दरवाजे पर पहुंचे तो चुन्नीलाल के बड़े लड़के नंदू ने पंडितजी के पैर छुए. आंगन में पहुंचे तो आकारप्रकार देख कर वह चौंधिया गए. विशालकाय आंगन में कम से कम 200 आदमी एकसाथ बैठ सकते थे. राजामहाराजाओं के महल जैसा उन का घर चमक रहा था.

घर मेहमानों से खचाखच भरा था. आंगन के एक ओर की दालान में महिलाएं बैठी थीं, तो दूसरी ओर की बड़ी दालान में पुरुष बैठे थे. सभी लोग कार्यक्रम शुरू होने का इंतजार कर रहे थे. कार्यक्रम के अनुसार यह तय हुआ कि पूजा शुरू होते ही पूडि़यां बनने का काम शुरू कर दिया जाए और पूजा खत्म होते ही मेहमानों की पंगतें बैठा दी जाएं.

इस दौरान ही पंडितजी को सेठ चुन्नीलाल नजर आ गए. वह सफेद धोतीकुरता, गले में कम से कम 10 तोले की सोने की जंजीर और हाथ की उंगलियों में हीरे की अंगूठियां पहने थे. अपने भारीभरकम शरीर के साथ चुन्नीलाल पंडितजी के पैर छूने की रस्म अदायगी के लिए झुके तो उन के हाथ पंडितजी के घुटनों तक मुश्किल से पहुंच पाए. यद्यपि चुन्नीलाल पंडित से उम्र में काफी बड़े थे पर रिवाज तो पूरा करना ही था. शायद अपने बड़प्पन की रक्षा के लिए ही उन्होंने रईसी अंदाज में पंडितजी को अपनेपन की एक मधुर धौल जमाते हुए कहा, ‘‘पंडितजी, इतनी देर कहां लगा दी.’’

पंडित रामसनेही तो समय से पहले ही पहुंचे थे इसलिए चुन्नीलाल के धौल पर थोड़ा खिसिया गए. कान के पास बजते मोबाइल के एहसास ने अपमान के इस घूंट को शरबत समझ कर पीते हुए होंठों पर मुसकान ला कर पंडितजी बोले, ‘‘सेठजी, आप चिंता क्यों कर रहे हैं. आप बैठें तो सही, देखिए कैसे जल्दी मैं काम को पूरा करता हूं.’’

आदेश के स्वर में सेठ चुन्नीलाल ने फिर मुंह खोला, ‘‘अरे, शार्टकट मत कर देना. पूरे विधिविधान से पूजा करानी है?’’

विधिविधान से पूजा कराने की बात चुन्नीलाल ने सिर्फ अपनी पत्नी को खुश करने के लिए कही थी अन्यथा मन से तो वह पूजापाठ के पक्ष में ही नहीं थे. वह तो शहर भर से आने वाले समाज के प्रतिष्ठित लोगों का स्वागत करना चाह रहे थे लेकिन घर में बड़े होने के नाते इस कार्यक्रमरूपी मटके को पत्नी के साथ बैठ कर उन्हें अपने सिर पर फोड़ना पड़ रहा था.

‘‘लालाजी, मैं आप के घर का सारा धार्मिक कार्यक्रम विधिविधान से पूरा करता हूं,’’ पंडितजी गर्व से बोले.

‘‘वह तो ठीक है पंडितजी,’’ चुन्नीलाल जल्दी में बोले, ‘‘यह तो बताइए कि कितना खर्च आएगा जिस में भेंट, पूजा का चढ़ावा, न्योछावर एवं दक्षिणा सभी कुछ शामिल हो.’’

इस सवाल पर पंडितजी थोड़ा रुके और माथे पर बनावटी सलवटें डाल कर मन ही मन कुछ गणना करते हुए बोले, ‘‘2 हजार रुपए से थोड़ा ऊपर.’’

‘‘2 हजार रुपए ज्यादा नहीं हैं. खैर, जल्दी शुरू करो. लंच का समय हो रहा है. आने वालों को समय से खाना भी खिलाना है.’’

पंडितजी ने मंत्रोच्चारण के साथ अपना कार्यक्रम शुरू कर दिया. हवन करने के लिए एक तरफ चुन्नीलाल अपनी पत्नी कमला के साथ बैठे थे, उन से थोड़ा हट कर मुन्नीलाल पैसों की गठरी संभाले बैठा था. दूसरी ओर पंडित रामसनेही खुद विराजमान थे. उन की नजर बारबार मुन्नीलाल के हाथ की गठरी पर जा कर रुक जाती. मन में यही हूक उठती कि आज यह गठरी खाली करा लेनी है.

गृहप्रवेश के श्लोक वह निर्धारित शैली के अनुसार बोलते चले गए और यजमान को बीचबीच में आचमन करने का तो कभी चावल छिड़कने का, सिंदूर लगाने का, पान के पत्ते से पानी छिड़कने का निर्देश देते रहे. इस दौरान चढ़ावा चढ़ाने की बात भी वह नहीं भूलते.

गृहप्रवेश का धार्मिक कार्यक्रम बेरोकटोक चल रहा था लेकिन पंडितजी और चुन्नीलाल दोनों ही दिमागी उलझनों में उलझे हुए थे. चुन्नीलाल सोच रहे थे कि डेढ़ घंटे के काम के लिए पंडित ने उन से 2 हजार रुपए मांगे हैं जो इस काम को देखते हुए बहुत अधिक हैं लेकिन वह करते भी क्या, मौका ऐसा था कि जबरन उन्हें अपने मुंह पर ताला लगाना पड़ रहा था. नातेरिश्तेदार, महल्ले वालों के साथ शहर के इज्जतदार लोग भी उन की खुशी में शरीक होने आए थे. ऐसे समय पैसे के लिए पंडित से विवाद करना ठीक नहीं था. लेकिन मन ही मन फैसला ले लिया था कि आगे इस लालची पंडित को नहीं बुलाएंगे.

उधर पंडित रामसनेही मन ही मन मुसकरा रहे थे कि सेठ को तो उन्होंने यह सोच कर अधिक पैसा बताया था कि कुछ मोलतोल होगा पर यजमान ने तो कोई मोलभाव ही नहीं किया. फिर उन के दिमाग में आया कि इतने बड़े सेठ से मुझे 4 हजार रुपए बोलना चाहिए था तो बात 3 तक आ कर पट जाती. इसी विचार मंथन के क्रम में शुरू की खुशी अब पछतावे में बदल गई थी.

अचानक पंडितजी के दिमाग में बिदाई की दक्षिणा वाली बात आ गई और उन के चेहरे पर फिर से खुशी की लहर दौड़ गई. सोचने लगे, यजमान से कितनी दक्षिणा मांगी जाए. मन की बात मन में 2 हजार रुपए से शुरू हुई, लेकिन इस कार्यक्रम में हजारों रुपए पानी की तरह बहता देख कर अंतिम दक्षिणा की रकम मन ही मन 2 हजार रुपए से बढ़ कर 5 हजार रुपए हो गई.

पूजा समाप्त होने से 5 मिनट पहले ही चुन्नीलाल ने खाना शुरू करने का इशारा अपने छोटे भाई को कर दिया. मुन्नीलाल खाने की व्यवस्था करने जैसे ही ऊपरी मंजिल की ओर चले उन के साथ परिवार के दूसरे लोग भी चल दिए. चूंकि पेटपूजा का कार्यक्रम ऊपर वाली मंजिल में शुरू होने जा रहा था इसलिए आंगन से काफी लोग छंट चुके थे. पूजा खत्म होते ही पंडितजी ने अधिकार के साथ कहा, ‘‘यजमान अंतिम दक्षिणा.’’

चुन्नीलाल दरियादिली से बोले, ‘‘हां, पंडितजी, कितनी दक्षिणा चाहिए.’’

शिकारी बिल्ली की तरह चुन्नीलाल रूपी चूहे पर झपट्टा मारने को तैयार पंडितजी कुछ धीमे स्वर में बोले, ‘‘यजमान 5 हजार रुपए.’’

चुन्नीलाल समझे कि भूल से पंडितजी 500 की जगह 5 हजार रुपए कह गए होंगे इसलिए फिर से पूछा, ‘‘कितने रुपए दे दूं.’’

पंडितजी इस बार आवाज तेज कर उस में चाटुकारिता का पुट घोलते हुए बोले, ‘‘मालिक, महज 5 हजार रुपए.’’

चुन्नीलाल इतनी रकम सुन कर सन्न रह गए. भौचक हो कर बोले, ‘‘पंडित, तुम्हारा दिमाग तो नहीं फिर गया है. जानते हो कि तुम कितनी बड़ी रकम मांग रहे हो.’’

‘‘हुजूर, आप बड़े लोग हैं,’’ चाटुकारिता की चाशनी में अपने शब्दों को लपेट कर पंडितजी बोले, ‘‘आप के लिए 5 हजार रुपए चुटकी है. पूरे शहर में आप का नाम है. किस जमाने से हमारे बापदादों ने आप के यहां पुरोहिती शुरू की थी.’’

2 हजार रुपए के चक्कर में चुन्नीलाल तो पहले से ही पंडितजी पर खार खाए बैठे थे, इस 5 हजार रुपए की नई मांग ने आग में घी का काम किया. तमतमाए चेहरे से चुन्नीलाल दहाड़े, ‘‘पंडितजी, आप अपने आपे में रहिए. इतना तो मैं कदापि नहीं दूंगा. 5 हजार रुपए हंसीठट्ठा समझ रखा है क्या?’’

इतने में कमला पति चुन्नीलाल को इशारे से चुप कराती हुई बोलीं, ‘‘पंडितजी, यह तो संयुक्त परिवार है इसलिए आप को हम लोग धनी दिख रहे हैं. हम लोग भी घर में दालरोटी ही खाते हैं. आप तो बहुत ज्यादा मांग रहे हैं. 5 हजार रुपए आप को मैं अपने बेटे नंदू की शादी में इन्हीं से दिलवाऊंगी, अभी तो 500 रुपए आप रख लें.

पंडितजी ने कमला की कोमलता को टटोल लिया. आंतरिक शक्ति बटोर कर उन्होंने कमला की तरफ मुंह कर के कहा, ‘‘अरे, मालकिन, यह गरीब ब्राह्मण आप लोगों से नहीं मांगेगा तो इस शहर में किस के पास मांगने जाएगा. यह तो धर्मकर्म का काम है. पुरोहित को देना तो सब से बड़ा पुण्य का काम होता है. यही दिया तो आगे काम आता है.’’

इसी बीच चुन्नीलाल ने 500 रुपए पंडितजी के हाथ में पकड़ाने का प्रयास किया पर वह उन रुपयों को छूने को तैयार न थे.

लिहाजा, 500 रुपए का वह नोट जमीन पर गिर पड़ा. लक्ष्मी का इस तरह अपमान होता देख कर मुन्नीलाल भड़क उठे, ‘‘500 रुपए लेना हो तो लो नहीं तो अपने घर का रास्ता नापो.’’

मोलतोल एवं तय तोड़ की सारी गुंजाइशें खत्म हो चुकी थीं. पंडितजी हाथ आई चिडि़या को किसी भी सूरत में छोड़ना नहीं चाह रहे थे. उधर दोनों भाई चुन्नीलाल और मुन्नीलाल वीर योद्धा की तरह अपनी बात पर डटे रहे. कमला भी अपनी दाल गलती न देख थोड़ी दूर जा कर खड़ी हो गईं. दोनों ओर आवेश बढ़ने लगा. वाक्युद्ध अपने पूरे उफान पर था. यद्यपि पंडितजी अकेले थे पर वाक्पटुता में निपुण थे, तभी तो अपनी चाटुकारिता से बात को बीच में संभाल लेते थे.

पंडित रामसनेही जब हर तरफ से यजमान को झुकाने की कोशिश में हार गए तो अपने पूर्वजों के अंतिम ब्रह्मास्त्र ‘शाप’ का सहारा लिया और फिल्मी अंदाज में भड़क कर बोले, ‘‘यजमान, यह ब्राह्मण की दक्षिणा है, मुझे नहीं दोगे तो तुम्हें कहीं और देना पड़ेगा. अगर मैं ने मन से शाप दे दिया तो सारा घर भस्म हो जाएगा.’’

यह सुन कर वहां खड़े घर के लोग अवाक् रह गए. मगर बाहर से आंगन की तरफ आता चुन्नीलाल का छोटा बेटा पल्लू का धैर्य जाता रहा. पंडितजी का आखिरी कहा शब्द उस के हृदय में भाले की तरह चुभा था इसलिए वह भी युद्ध के मैदान में कूद पड़ा.

पंडितजी की तरफ पल्लू झपट्टा मार कर गरजते हुए बोला, ‘‘सौ जूते मारो इस ढोंगी पंडित को. इस ने अपने आप को समझ क्या रखा है?’’

इसी के साथ हाथ में चप्पल ले कर पल्लू पंडितजी पर टूट पड़ा.

बात एकदम उलटी हो गई. पंडितजी का ब्रह्मास्त्र उन्हीं पर बज्र बन कर गिर पड़ा था. सेर को सवा सेर मिल गया था. पंडितजी इस युद्ध में चारों खाने चित हो चुके थे. तभी पल्लू और पंडितजी के बीच मुन्नीलाल और चुन्नीलाल आ गए. एक ने पल्लू की कमर पकड़ी तो दूसरे ने हाथ पकड़े और मौका देख कर पंडित रामसनेही बिना झोला उठाए और चप्पलें पहने अपनी जान हथेली पर रख कर त्वरित गति से एक प्रशिक्षित धावक की तरह संकटमोचन का नाम मन में ले कर भागे तो जा कर घर की चौखट पर ही रुके. उन के कानों में मोबाइल की घंटी तो नहीं अपने ही दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी, जो किसी धौंकनी की रफ्तार से धड़क रही थी.

पंडित रामसनेही का झोला, पुस्तकें, 500 रुपए और उन की चप्पलें शहर में लगे कर्फ्यू की तरह आंगन में अनाथ पड़ीं अपनी कहानी बयां कर रही थीं. Social Story in Hindi

Romantic Story in Hindi : फैसला

Romantic Story in Hindi : रजनी ने थोड़ी सी अनिश्चितता की हालत में फुलवारी रैस्तरां में प्रवेश किया, उन के हाथ पसीने से भीगे हुए थे. उन्हें घबराहट हो रही थी पर फिर भी बिस्कुटी रंग की साड़ी और लाल ब्लाउज में वे बहुत ही संजीदा और गरिमामय लग रही थीं.

राजीव ने कौर्नर वाली टेबल से हाथ हिलाया तो रजनी तेज कदमों से उस दिशा में चली गईं. राजीव हंस कर बोले, ‘‘मुझे लगा था आप नहीं आएंगी, पर फिर भी एक घंटे से यहां बैठ कर चाय का आनंद ले रहा हूं.’’

रजनी ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘नहीं, आना तो था पर थोड़ी सी अनिश्चितता थी.’’

वेटर और्डर ले कर चला गया तो राजीव बोले, ‘‘रजनी, मेरे प्रस्ताव के बारे में क्या सोचा.’’

रजनी थोड़ा सा झिझकते हुए बोलीं, ‘‘बहुत दुविधा में हूं.’’

राजीव मुसकराते हुए बोले, ‘‘अपने बारे में कब सोचोगी, हमारी जिंदगी हमारी अपनी है, कब तक दूसरों के बारे में सोचती रहोगी?’’

इस से पहले वे कुछ और बोलते, एक कर्कश महिला की आवाज ने उन की बातचीत को कहीं दबा दिया, ‘‘देखा तुम ने, मम्मी इस उम्र में क्या गुल खिला रही हैं?’’

यह रजनी की बहू वंदना की आवाज थी.

रजनी का पुत्र आलोक अपनी मां को आग्नेय नेत्रों से घूरता हुआ बोला, ‘‘मम्मी, आप को क्या हो गया है, क्यों अपना बुढ़ापा खराब कर रही हो, हमारा नहीं, तो कम से कम दीया के बारे में तो सोचा होता, कौन उस का हाथ थामेगा?’’

इस से पहले वंदना कोई और तीर चुभोती, रजनी किसी अपराधिन की तरह सिर नीचा किए जाने लगी. राजीव बरबस बोल उठे, ‘‘रुको रजनी, तुम क्यों ऐसे जा रही हो?’’

उन्होंने आलोक और वंदना से शांत स्वर में कहा, ‘‘आप दोनों शांति से बैठ कर भी तो बात कर सकते हैं?’’

वंदना फिर तेज स्वर में बोली, ‘‘आप की बहन, बेटी या मां अगर ऐसे काम करेगी तो आप को पता चलेगा.’’

राजीव अपना आपा खो बैठे, ‘‘क्या किया है रजनी ने, सिवा अपना सुखदुख बांटने के?’’

बहुत सारे लोगों की उत्सुक नजरें उन की टेबल की तरफ ही उठ रही थीं.

वंदना फिर भी डटी रही, ‘‘हां, हम तो दुश्मन हैं. आप ही हो सबकुछ. पता नहीं हम क्या जवाब देंगे अपने घरपरिवार को. तभी तो सोचूं, रोज घंटोंघंटों कौन सी वाकिंग हो रही है. सोच कर भी शर्म आती है, अनिता दीदी क्या कहेंगी अपने पति और सासससुर से कि उन की मम्मी इस उम्र में रासलीला रचा रही हैं.’’

रजनी आंखों में आंसू लिए रैस्तरां से बाहर आ गईं. राजीव ने आलोक को गुस्से से देख कर कहा, ‘‘पब्लिक में तमाशा करने से बेहतर था, हम शांति से बात करते. मेरा और रजनी का फैसला अटल है, हम दोनों कुछ ऐसा नहीं कर रहे हैं जिस से किसी को कोई शर्मिंदगी हो.’’

आलोक ने बेशर्मी से कहा, ‘‘मम्मी के नाम शामली में जो जमीन है, वह किस की होगी शादी के बाद?’’

राजीव बोले, ‘‘जैसा रजनी चाहेंगी.’’

वंदना बोली, ‘‘वाह, करोड़ों की संपत्ति हम ऐसे ही नहीं रासलीला में जाने देंगे, हम कोर्ट जाएंगे.’’

रजनी एक झील की तरह शांत 65 वर्षीय महिला थीं. जितना भी जीवन उन्हें मिला था, उसी में संतुष्ट रहती थीं. यह अलग बात है कि इस कारण कभीकभी वे खुद ही विचलित हो जाती थीं. कुछ समय पहले राजीव नामक कंकर ने उन के जीवन में उथलपुथल मचा दी थी. राजीव उन की जिंदगी की शाम को कुछ इंद्रधनुषी रंगों से सजाना चाहते थे, वे एक विशाल सागर की तरह थे.

रजनी अपने बेटे आलोक के पास आने से पहले शामली में रहती थीं जो न तो पूरी तरह कस्बा था न ही वहां पर महानगर की आजादी थी. वहां पर जब वे शादी कर के आई थीं तो 20 वर्ष की थीं. उन्हें पढ़नेलिखने का बहुत शौक था. पर घर की जिम्मेदारियों में वे कभी भी सिर नहीं उठा पाईं. पहले आलोक का जन्म हुआ, फिर अनिता का. फिर तो उन के सारे शौक बच्चों के शौक में ही ढल गए. सासससुर के साथ रहने के कारण घर पर रिश्तेदारों का आनाजाना लगा ही रहता था. पर रजनी ने कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया.

रजनी बहुत ही सुघड़ महिला थीं. अचार, पापड़, बडि़यां सब घर पर ही बनाती थीं. रजनी के पति सुरेश वहीं पर स्थित एक गन्ना मिल में मैनेजर थे. अपना मकान था और रजनी की सुघड़ता के कारण बिना किसी दिक्कत के खर्च चल जाता था. आलोक पढ़लिख कर, शादी के बाद बेंगलुरु में बस गया. एकएक कर के सासससुर अपनी पूरी उम्र कर के चले गए. फिर दोनों मियांबीवी रह गए. फिर अचानक एक दिन सुरेश भी रजनी को रोतेबिलखते छोड़ कर चले गए. आलोक मां को वहां पर अकेले नहीं छोड़ना चाहता था. पर रजनी अपने घर को छोड़ना नहीं चाहती थीं. वहां पर उन के जीवन की खट्टीमीठी यादें बसी हुई थीं.

पासपड़ोस की बहूबेटियों और भाभियों के साथ वे अकेले हो कर भी अकेली नहीं थीं. पर फिर 3 वर्षों बाद उन को अपना घर बेचना पड़ा क्योंकि आलोक बेंगलुरु में अपना फ्लैट लेना चाहता था. घर बेच कर रजनी ने उस राशि के 3 हिस्से कर दिए, एक बेटी को, एक अपने पास रखा और एक हिस्सा आलोक को दे दिया. उस के बाद वे शामली में ही अपने लिए एक छोटा घर देखने लगीं. पर आलोक के कुछ और ही प्लान थे. वह मां को अपने साथ बेंगलुरु ले कर आ गया.

3 कमरों के फ्लैट में रजनी का दम घुटता था. उस का मन अपने शामली के घर के लिए छटपटाने लगा. सबकुछ नया और अनजाना था, या तो लोग इंग्लिश बोलते या वहीं की टूटीफूटी हिंदी, अपने यहां की खड़ी हिंदी के लिए वे तरस गईं. लिफ्ट में आनेजाने से उन को बहुत डर लगता था. वह तो दीया ही थी जिस में उन्हें अपनापन लगता था. उन की दुनिया दीया के कमरे तक सिमट गई. दीया जब तक स्कूल से न आती, वे सहमी, सकुची एक कोने में बैठी रहतीं. दीया भी 2 साल बाद 12वीं पास कर के इंजीनियरिंग के लिए पुणे चली गई. उस के कालेज की ऐडमिशन फीस का आधा खर्च रजनी ने अपनी बचत से ही दिया था.

बहू के साथ रजनी की अनबन नहीं थी, पर रिश्ते में एक ठंडापन था. जब भी उन की पोती दीया अपनी छुट्टियां खत्म कर के वापस होस्टल जाती, उन्हें बहुत अकेलापन लगता था. दीया के आ जाने से उन्हें बड़ा अपनापन लगता था. वह रजनी को ले कर मौल, सिनेमाहौल और न जाने कहांकहां जाती. दोनों दादीपोती दिनदिनभर गायब रहतीं. जब दिन ढले वापस आतीं तो बहुत बार तो बहू वंदना ताना भी दे देती, ‘मांजी, आप के जोड़ों का दर्द कैसा है आजकल?’

आलोक भी कभीकभी झुंझला कर बोल देता, ‘मम्मी, अब तो आप दिन को दिन और रात को रात नहीं समझ रही हो. पर दीया के जाने के बाद यह मुझे और वंदना को बहुत भारी पड़ने वाला है.’ रजनी खूब समझती थी कि उन के बेटे के कान किस ने भरे हैं पर वे क्या करें, उन्हें तो अपने जिंदा होने का एहसास ही दीया की मौजूदगी कराती थी.

ऐसा नहीं था कि रजनी के बेटेबहू उन के साथ बुरा बरताव करते थे या उन को किसी प्रकार की समस्या थी पर रजनी उन की जिंदगी के किसी कोने में फिट नहीं बैठती थीं. रजनी को हर समय यह एहसास होता था कि वे एक फालतू सामान हैं जिन का कोई काम नहीं है. रसोई में भी ऐसेऐसे उपकरण थे जो उन्होंने अपनी कसबाई रसोई में कभी प्रयोग नहीं किए थे.

दीया ने ही पहल कर के उन्हें मोबाइल से परिचित कराया. उस छोटे से यंत्र को सीखने में उन्हें ज्यादा समय नहीं लगा और वे रोज नियम से अपनी पोती और बेटी से बात करने लगीं. मन थोड़ा हलका हो जाता था. फिर वे धीरेधीरे लिफ्ट का भी प्रयोग करना सीख गईं. इस से उन्हें ऐसी स्वतंत्रता का आभास होता था जैसे पिंजरे में कैद पक्षी को थोड़ी देर पिंजरे से बाहर होने पर अनुभव होता है.

अब वे रोज नियम से सुबह और शाम की सैर को जाने लगीं. उन्हें अब अपने शरीर में स्फूर्ति महसूस होने लगी. दिनचर्या बनी तो वे बहू की रोकटोक के बावजूद छोटेछोटे कार्य जैसे डस्ंिटग इत्यादि करने लगीं. इस से उन की बहू को भी मदद मिल जाती और बहू की कार्यशैली में भी खलल नहीं पड़ता था.एक सुबह वे चलतेचलते थोड़ा थकान का अनुभव कर रही थीं,

तो पार्क की बैंच पर बैठ कर सुस्ताने लगीं. तभी उन्हें लगा कोई उन के बराबर में बैठ गया. उन्होंने कनखियों से देखा, एक उन की हमउम्र सज्जन बैठे हैं. रजनी को बातचीत में पहल करने में बहुत दिक्कत होती थी, इसलिए वे थोड़ा सा अचकचा गईं. जैसे ही वे उठने लगीं, वे सज्जन बोले, ‘अरे, आप बैठी रहें, आप को रोज सुबहशाम सैर करते हुए देखता हूं, इसलिए आप को ऐसा बैठा देख कर ठिठक गया.’

रजनी सकुचाती हुई बोली, ‘नहीं, बस यों ही थकान महसूस हो रही थी.’

वे सज्जन बोले, ‘मेरा नाम राजीव है. आप को देख कर ऐसा लगा, आप अपने ही इलाके की हैं. आप क्या मेरठ से हैं?’

रजनी बोली, ‘जी, शामली से हूं. यहां अपने बेटेबहू के साथ रहती हूं.’

राजीव बोले, ‘मैं तो अकेला रहता हूं. मेरे तो बेटा और बेटी दोनों ही विदेश में रहते हैं. आप को मैं बहुत दिनों से घूमते हुए देख रहा था पर आप इतनी खोईखोई रहती हैं कि पूछने की हिम्मत न हुई कि कहीं आप गलत न समझ बैठें.’

रजनी हंस पड़ी और राजीव रजनी की हंसी से अपनी कुछ पुरानी यादों में खो गए. उन की एक पुरानी सहपाठी थी कालेज की जिसे वे मन ही मन बहुत पसंद करते थे. पर इस से पहले वे कुछ कह पाते, उस की शादी हो गई थी. न जाने क्यों रजनी को देख कर उन्हें उस की याद आ जाती थी, इसलिए उन से बात करने से वे खुद को नहीं रोक पाए. वे दोनों 10 मिनट तक बैठे रहे और इधरउधर की बातें करते रहे.

आज जब रजनी वापस घर आईं तो न जाने क्यों उन का मन बड़ा खुश था. ऐसा कुछ भी नहीं था पर अपने हमउम्र साथी के साथ की बात ही कुछ और होती है. फिर तो यह रोज का नियम हो गया. दोनों साथसाथ घूमते और अपनेअपने घर की ओर चल पड़ते. अब रजनी अपने रखरखाव पर पहले से ज्यादा ध्यान रखती थी. स्त्री चाहे 60 वर्ष की हो या 16 साल की, पुरुष की प्रशंसाभरी निगाहों को वह तुरंत पहचान लेती है.

एक दिन घूमते हुए राजीव ने रजनी से मजाक में कहा, ‘रजनीजी, आज मैं आप के घर चलूंगा, आप के बेटे और बहू से मिलने.’

पर रजनी के चेहरे का रंग बदल गया. यह राजीव से छिपा न रह सका, इसलिए उन्होंने दोबारा यह प्रसंग न छेड़ा. राजीव को रजनी का साथ बहुत भाता था. उन्हें वे बेहद ही सुलझी हुई लगती थीं. पर रजनी ने अपने चारों ओर उम्र, समाज और रिवाजों का दायरा बना रखा था जो राजीव पार नहीं कर पा रहे थे.

राजीव ने मेरठ शहर करीब 40 साल पहले छोड़ दिया था. वे बरसों से यहीं रह रहे थे, इसलिए उन की सोच काफी अलग थी. 4 वर्षों पहले पत्नी के देहांत के बाद वे अकेले रह गए थे. उन के बेटेबेटी विदेश में रहते थे. संतानों की इच्छा थी कि वे भी वहीं आ जाएं पर जब राजीव ने मना कर दिया तो उन्होंने राजीव से यह कहा कि दोबारा विवाह कर लें. राजीव ने इसे हंसी में उड़ा दिया, पर रजनी को देख कर उन में दोबारा से यह इच्छा जागृत हो गई.

उन के दिल में रजनी के लिए एक एहसास था जिस में वासना नहीं थी पर था एक ऐसा लगाव और खिंचाव जिस के कारण उन्हें दोबारा से जीने की ललक पैदा हो गई थी. बहुत बार उन्हें अपना ही व्यवहार अनजाना लगता पर वे चाह कर भी खुद को रोक नहीं पा रहे थे. उन का बहुत मन था रजनी को अपने घर लाने का, पर वे जानते थे कि रजनी कोई न कोई बहाना बना लेगी. उन्हें मालूम था, वे दोनों उस पीढ़ी के हैं जहां पर महिलाएं अपनी इच्छाओं को कभी जाहिर नहीं करतीं.

आज दूर से ही उन्होंने रजनी को देखा तो देखते ही रह गए. आज रजनी ने ग्रे और काले रंग का पजामाकुरता पहना हुआ था जो उन के गेहुएं रंग पर बहुत फब रहा था. जैसे ही रजनी करीब आईं तो बरबस उन के मुख से निकल गया, ‘आज उम्र के 10 साल कहां छोड़ आई हो?’

रजनी झेंप गई, बोली, ‘दीया ने जन्मदिन पर तोहफा दिया है, तो बच्ची का दिल रखने के लिए आज पहन लिया.’

राजीव बोले, ‘वाह, पोती आई हुई है. गुडि़या से मिलने मैं आज जरूर आऊंगा.’

इस से पहले रजनी कुछ बोल पातीं, तभी न जाने कहां से दीया आ गई और बोली, ‘जरूर अंकल, शाम को मैं दादी के लिए केक भी ला रही हूं.’

रजनी अजीब धर्मसंकट में थीं. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. लिफ्ट में उन्होंने दीया से शिकायती लहजे से बोला, ‘दीया, क्या जरूरत थी, राजीवजी को बुलाने की?’

दीया बेबाक अंदाज में बोली, ‘क्योंकि वे आप के मित्र हैं और आप मम्मीपापा की मां हो, वो आप के मम्मीपापा नहीं हैं.’

शाम को रजनी का दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था यह सोचसोच कर कि आलोक और वंदना क्या सोचेंगे. दीया ने जबरदस्ती उन्हें कांजीवरम सिल्क की पिस्ता रंग की साड़ी पहनाई और मोतियों का एक सैट भी पहना दिया. वंदना ने मुसकरा कर कहा, ‘दीया, तू तो दादी को दुलहन की तरह सजा रही है.’ यह सुन कर रजनी कट कर रह गई.

शाम को 5 बजे घंटी बजी, राजीव जी खड़े थे हाथों में सफेद फूलों का गुलदस्ता लिए हुए, साथ में था एक चौकलेट का बौक्स जो उन्होंने बड़े प्यार से दीया को थमा दिया. सभी लोग कुछ देर तक चुप बैठे रहे. फिर राजीव ने ही बातचीत की पहल की और देखते ही देखते राजीव और आलोक में कार्य संबंधी बहुत सारी बातें मिल गईं. जब राजीव रात का खाना खा कर बाहर की तरफ निकले तो सब से काफी घुलमिल चुके थे.

बहू वंदना ने आलोक से मुखातिब हो कर पूछा, ‘आलोक, तुम तो बोलते थे, मम्मी की शामली में भी कोई मित्र नहीं हैं पर मम्मी तो बेंगलुरु के रंग में बड़ी जल्दी रंग गईं.’

रजनी इस से पहले कुछ बोलती, दीया बोली, ‘मम्मी, इस में क्या गलत है?’ आलोक ने भी अपनी चुप्पी से दीया को मूक समर्थन दिया. पर वंदना की बात के बाद रजनी ने खुद ही अपने घूमने का समय बदल दिया.

एकदो दिनों तक तो राजीव ने कोई ध्यान न दिया पर तीसरे दिन उन का माथा ठनका और उन्होंने रजनी को उन के  मोबाइल पर कौल कर दिया. रजनी ने फोन उठाया तो राजीव चिंतित स्वर में बोले, ‘क्या हुआ, आप की तबीयत तो ठीक है?’

रजनी ने रूखे स्वर में उत्तर दिया, ‘जी, पर आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं, मेरा आप से कोई अनुबंध थोड़े ही है कि मैं और आप एकसाथ सैर करेंगे?’

राजीव ने हंस कर कहा, ‘कृपया अन्यथा न लें, एक मित्र के नाते पूछ रहा हूं.’

दीया उसी कमरे में थी जो रजनी से बोली, ‘दादी, यह गलत बात है. राजीव अंकल बहुत अच्छे हैं.’

रजनी बोली, ‘बिट्टो, समाज के कुछ नियम हैं जो हम औरतों को निभाने ही पड़ते हैं चाहे हम 16 साल के हों या 65 साल के.’

आज दीया फिर से वापस अपने कालेज जा रही थी. जाने से पहले वह बोली, ‘दादी, ये कायदे और नियमरूपी बेडि़यों में आप अपने को कैद मत करो. आप अगर खुश रहोगे तो वह ही खुशी आप हमें दोगे. मम्मी या किसी और के कहने पर अपनी जिंदगी को जीना मत छोड़ो.’ रजनी कुछ न बोली.

कुछ दिनों बाद आलोक का औफिस की तरफ से विदेश जाने का कार्यक्रम बना. औफिस पत्नी का खर्चा भी वहन कर रहा था. पर मां के कारण आलोक का मन नहीं था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि उस की मम्मी 2 माह तक सब कैसे अकेले संभालेगी. यह सब सुन कर वंदना का मुंह सूज गया. पर जब रजनी को इस बात का मालूम हुआ तो उन्हें बहुत दुख हुआ. सुबह नाश्ते की टेबल पर वे आलोक से बोलीं, ‘बेटे, मैं तुम दोनों को किसी प्रकार के बंधन में बांधने नहीं आई हूं. तुम जाओ और अपने साथ वंदना को भी ले जाओ.’ वंदना खुश हो गई और आलोक भी अब बिना किसी हिचक के अपनी ट्रिप की तैयारी करने लगा.

जैसे कि हमारे देश की परंपरा है, हम बुजर्गों को आदरणीय समझते हैं. पर उन में कुछ भावनाएं हैं, यह हम नहीं मान सकते. रजनी भी यही मानती थीं, इसलिए अब तक राजीव रजनी के मन की थाह नहीं ले पा रहे थे.

एक दिन सुबहसुबह राजीव के पास

दीया का फोन आया. वह रोंआसी,

हो ?कर बोली, ‘‘अंकल, मैं सुबह से मोबाइल मिला रही हूं, दादी फोन नहीं उठा रही हैं, वे ऐसा कभी नहीं करतीं.’’

राजीव बोले, ‘कल ही तो हम मिले थे, तुम चिंता मत करो, मैं अभी जाता हूं.’

चिंतित राजीव फौरन रजनी के फ्लैट पर पहुंच गए. बहुत देर तक घंटी बजाने के बाद भी जब कोई आहट नहीं मिली तो उन्होंने सोसाइटी के गार्ड की मदद से अंदर से दरवाजा खुलवाया. किसी अनहोनी की आशंका से उन्होंने एक झटके से दरवाजा खोला.

कमरे में बैड पर लेटी बुखार से तपती रजनी बुरी तरह से कंपकंपा रही थीं. राजीव ने बिना कुछ कहे उन्हें उठाया और गार्ड की मदद से अपनी कार में बैठाया. हौस्पिटल पहुंच कर उन्होंने उन्हें दाखिल कराया और फिर दीया को फोन पर सारी स्थिति से अवगत कराया. उन्होंने दीया से कहा कि वह चिंता न करे, अपनी परीक्षा पर पूरा ध्यान लगाए. साथ ही यह ताकीद भी की कि वह अपने मम्मीपापा को इस बात से अवगत न कराए.

पूरे हफ्ते दिन को दिन और रात को रात न मान कर राजीव ने रजनी की सेवा की. अब रजनी पहले से काफी स्वस्थ थीं और कल उन्हें वापस घर जाना था. आलोक के आने में अभी 25 दिन शेष थे. राजीव अब रजनी को अकेले नहीं छोड़ना चाहते थे. हौस्पिटल के बाद वे रजनी को अपने फ्लैट पर ले आए.

रजनी हाथ जोड़ कर बोलीं, ‘आप ने मेरे लिए बहुतकुछ किया है. यह जीवन आप की ही देन है. पर कृपया मुझे मेरे घर पर छोड़ दीजिए. वैसे, आप खुद भी समझदार हैं.’

राजीव संयत स्वर में बोले, ‘आप मुझे बेहद पसंद हो, मैं आप के साथ अपनी जीवन की सांझ बांटना चाहता हूं. पर आप के लिए मैं जो कुछ भी कर रहा हूं या करूंगा, इस में मेरा स्वार्थ निहित नहीं है. यह, बस, इंसानियत के नाते कर रहा हूं. मैं एक मित्र और हितैषी होने के नाते आप को अकेला नहीं छोड़ूंगा.’

तभी घंटी बजी और दीया ने खिलखिलाते हुए प्रवेश किया और रजनी के गले लग कर फफक कर रो पड़ी. राजीव ने उन दोनों के लिए खाना लगाया और खाने के बाद उन्हें सोने के लिए कमरा दिया. शाम को दोनों दादीपोती को राजीव ने उन के फ्लैट पर छोड़ दिया.

दीया पूरे एक हफ्ते रही और इन दिनों में वह राजीव के बहुत करीब आ गई थी. अब वह कालेज के लिए निकली, तो राजीव और रजनी का रिश्ता दोबारा से पुरानी लीक पर चलने लगा. न राजीव ने कभी अपनी बात दोबारा दोहराई, न रजनी अब पहले की तरह हिचकिचाईं.

रजनी को राजीव का साथ पहले भी भाता था पर कुछ दिनों पहले तक वे जिस परिधि में अपने को बांध कर रख रही थीं, उस घटना के बाद उन्होंने अपने को उस कैद से आजाद कर लिया था. उन्हें समझ आ गया था कि जीवनसाथी की सब से ज्यादा जरूरत सांझ की बेला में ही होती है.

आज सवेरे की फ्लाइट से आलोक और वंदना आ गए थे. रजनी ने पिछले दिनों में अपना मन स्थिर कर के एक फैसला ले लिया था, एक ऐसा फैसला शायद जो अपने 65 साल की जिंदगी में उन्होंने पहली बार अपनी खुशी के लिए लिया था और अब वे खुलेदिल से अपनी जिंदगी की शाम को राजीव के साथ बांटना चाहती थीं.

आज रात खाने पर उन्होंने राजीव को बुलाया था और राजीव के सामने ही उन्होंने अपने परिवार को अपने निर्णय से अवगत कराया. आलोक थोड़ा अनमना हो गया और सब से पहले उस ने अपनी बहन को सूचित किया. अनिता, जो अपनी मम्मी के हौस्पिटल में ऐडमिट होने पर अपनी ससुराल की जिम्मेदारियों के कारण बड़ी सफाई से कन्नी काट गई थी, आज अपनी मां के आगे ससुराल वालों की दुहाई दे रही थी. उधर आलोक को भी सबकुछ बहुत अजीब लग रहा था. पर वंदना को सब से ज्यादा चिंता अपनी सास के अकाउंट में जमा धनराशि की हो रही थी. दीया ही इस बात से सब से ज्यादा खुश थी.

रात को खाने की मेज पर तनावभरा माहौल था, खुल कर कोई कुछ नहीं बोल पा रहा था. अनिता ने ही पहल कर के कहा, ‘मम्मी, आप के इस फैसले से मेरी जिंदगी पर असर पड़ेगा और आप अकेली कहां हो, मैं और आलोक भैया हैं न. अगर आप के आगेपीछे कोई न होता तो बात कुछ और थी.’

रजनी बोली, ‘अनिता बेटा, मेरा फैसला अब नहीं बदलेगा. यह मैं ने बहुत सोचसमझ कर लिया है. अगर तुम्हें इतनी शर्म आ रही है तो मैं खुद दामादजी से बात कर लूंगी.’ उस के बाद अनिता पैर पटकते हुए अपने घर वापस चली गई.

वंदना अब हर समय रजनी को शकभरी नजरों से देखती रहती और जैसे ही वे बाहर जाने के लिए कदम उठातीं, एक व्यंग्यबाण जरूर छोड़ती.

रजनी ने सोचा भी कि क्यों वे राजीव के साथ के लिए इतनी आतुर हो रही हैं और इसलिए जब आज राजीव का फोन आया कि वे शादी की तारीख तय करने के लिए रैस्तरां में बात करना चाहते हैं तो उन्होंने यह सोच कर हां कर दी कि वे मना कर देंगी पर रैस्तरां में तो वे इस से पहले कि अपनी बात कर पातीं, यह तमाशा हो गया था. रजनी को मालूम था कि उन के फैसले में उन के साथ कोई नहीं होगा सिवा दीया के. पर उन की बहू ऐसी बातें कहेगी, ऐसा उन्होंने नहीं सोचा था.

राजीव भी गुस्से और दुख में अपने फ्लैट की तरफ चल दिए. तभी मोबाइल की घंटी बजी. दूसरी तरफ से उन की बेटी थी कौल पर, ‘‘पापा, आप लिवइन क्यों कर रहे हो, आप शादी कर लो न रजनी आंटी से.’’

राजीव को समझ आ गया कि किसी हितैषी ने उन के बच्चों तक खबर पहुंचा दी है. उन्होंने बिना कुछ जवाब दिए फोन काट दिया.

फिर अगले दिन उन के बेटे और बहू की वीडियोकौल थी. उन दोनों को भी यह ही शक था और जब उन्होंने शांति से यह कहा, ‘‘तुम ने जैसे भी अपनी जिंदगी गुजारी, मैं ने उस में हमेशा तुम्हारा साथ दिया. अब मैं लिवइन करूं या शादी, तुम्हें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए.’’

दीया ने राजीव अंकल और रजनी के फैसले का पूरा समर्थन किया. बस, वही थी जो अडिग चट्टान की तरह उन के साथ खड़ी रही थी.

रजनी पर अब आलोक और वंदना की बातों का कोई फर्क नहीं पड़ता था. उन्हें समझ आ गया था कि उन से ज्यादा आलोक, अनिता और वंदना को उस धनराशि व जमीन की चिंता थी जो उन के नाम थी. अब माह में एक बार गाहेबगाहे फोन करने वाले राजीव के बच्चे भी हर तीसरे दिन उन को फोन करते. दोनों के बच्चों को अब यह लग रहा था, अगर यह शादी हो गई तो उन के मातापिता के नाम पर जो जमीनजायदाद है वह किस को मिलेगी?

यह बात सब से पहले राजीव को समझ आई. फिर राजीव और रजनी ने एक अनोखा फैसला लिया. 10 दिनों बाद एक सादे समारोह में रजनी और राजीव ने पहले फेरे लिए और फिर कोर्ट में जा कर उन्होंने अपने विवाह को रजिस्टर्ड करवा लिया. रजनी को एक अलग सी खुशी थी, खुशी अपनी मरजी से एक फैसला अपने लिए लेने की. पर दुख भी था क्योंकि उन के परिवार से कोई नहीं था सिवा दीया के.

राजीव ने शानदार रिसैप्शन दिया और उस में अपने और रजनी के परिवार को भी बुलाया था. उन्हें बुलाने के लिए उन्होंने वसीयत का जाल बिछाया था.

वसीयत जानने को बेताब और उत्सुक उन के बच्चे आए थे और जब वकील ने वसीयत पढ़ कर सुनाई, तो वे सब, बस, बैठे ही रह गए.

वसीयत के अनुसार, रजनी और राजीव ने अपनी 50 प्रतिशत जमापूंजी एक वृद्धाश्रम में दान कर दी थी. वहीं पर वे दोनों अपनी जिंदगी की सांझ बिताएंगे. बाकी की जमापूंजी उन्होंने अपने नाम पर ही रखी थी और उन के मरने के बाद अगर कुछ धनराशि बचती है, तो वह एक अनाथ आश्रम में दान दी जाएगी. कल रात की फ्लाइट से वे दोनों पहले पेरिस और फिर स्विट्जरलैंड जा रहे थे.

दोनों के बच्चे एकदूसरे पर दोषारोपण कर रहे थे कि उन के मातापिता ने एकदूसरे के बहकावे में आ कर यह वसीयत लिखवाई है.

वंदना बहुत तीखे स्वर में बोल रही थी, ‘‘अब हनीमून मन रहा है, यह भी नहीं सोचा मम्मी ने कि दीया की पढ़ाई और शादी के लिए कुछ नाम कर देतीं.’’

‘‘अरे, हम से दुश्मनी थी पर अपने नातीपोतों से भी कुछ लगाव नहीं था,’’ अनिता बोल रही थी.

दीया ने कड़वे स्वर में कहा, ‘‘मम्मी, मैं आप और पापा की जिम्मेदारी हूं, दादी की नहीं.’’

वहीं, आलोक को लगा उस का अपनी मम्मी को बेंगलुरु लाने का प्लान फेल हो गया है.

राजीव के बच्चे हालांकि नाखुश थे पर कुछ कह न पाए. बस, राजीव की बेटी चलते हुए यह बोली, ‘‘पापा, उम्मीद करते हैं कि आप की नई पत्नी आप का पूरा खयाल रखेंगी. आप को विदेश में आ कर स्वास्थ्य लाभ की जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

संकेतों से ही सही, रजनी और राजीव को यह बता दिया गया था कि अब उन के बच्चे उन के लिए कुछ भी नहीं करेंगे, आगे के जीवन में वे ही एकदूसरे के साथ हैं.

नीचे राजीव अपनी कार लिए खड़े थे. रजनी ने अपना सूटकेस कार में रखा. आंखों के कोनों से खुशी की नमी को पोंछा और दोनों चल पड़े जिंदगी की खुशनुमा शाम की शुरुआत करने. शायद फिर से जीवनसंध्या में गुनगुनी धूप ने दस्तक दी थी. Romantic Story in Hindi

Social Story in Hindi : चुनाव मेरा है

Social Story in Hindi : सर्जिकल वार्ड में शाम का राउंड लगाने के बाद डा. प्रशांत और सिस्टर अंजलि ड्यूटी रूम में आ बैठे. एक जूनियर सिस्टर उन दोनों के सामने चाय का कप रख गई.

‘‘आज का डिनर मेरे साथ करोगी?’’ प्रशांत ने रोमांटिक अंदाज में अंजलि की आंखों में झांका.

‘‘मेरे साथ डिनर करने के बाद घर देर से पहुंचोगे तो रीना मैडम को क्या सफाई दोगे?’’ अंजलि की आंखों में शरारत भरी चमक उभरी.

‘‘कह दूंगा कि एक इमरजेंसी आपरेशन कर के आ रहा हूं.’’

‘‘पत्नी से झूठ बोलोगे?’’

‘‘झूठ क्यों बोलूंगा?’’ प्रशांत मेज के नीचे अपने दाएं पैर के पंजे से अंजलि की पिंडली सहलाते हुए बोला, ‘‘डिनर के बाद तुम्हारे रूम पर चल कर ‘इमरजेंसी’ आपरेशन करूंगा न मैं.’’

‘‘बीमारी डाक्टर को हो और आपरेशन कोई और कराए, ऐसा इलाज मेरी समझ में नहीं आता,’’ और अपने इस मजाक पर अंजलि खिलखिला कर हंसी तो उस के व्यक्तित्व का आकर्षण प्रशांत की नजरों में और बढ़ गया.

अविवाहित अंजलि करीब 30 साल की थी. रंगरूप व नैननक्श खूबसूरत होने के साथसाथ उस में गजब की सेक्स अपील थी. उस के चाहने वालों की सूची में बडे़छोटे डाक्टरों के नाम आएदिन जुड़ते रहते थे. अपनी जिम्मे- दारियों को निभाते समय उस की कुशलता भी देखते बनती थी.

प्रशांत के मोबाइल की घंटी बजने से उन के बीच चल रहा हंसीमजाक थम गया. उस ने कौल करने वाले का नंबर देख कर बुरा सा मुंह बनाया और अंजलि से बोला, ‘‘कबाब में हड्डी बनाने वाली छठी इंद्री कुदरत ने सब पत्नियों को क्यों दी हुई है?’’

‘‘पत्नी के साथ बेईमानी करते हो और ऊपर से उसे ही भलाबुरा कह रहे हो. यह गलत बात है जनाब, चलो, प्यारीप्यारी बातें कर के रीना मैडम को खुश करो,’’ अंजलि बिलकुल सामान्य व सहज बनी रही.

‘‘तुम मेरी गर्लफ्रैंड हो कर मेरी पत्नी से ईर्ष्याभाव नहीं रखती हो क्या?’’

‘‘जिस पर हंसने की उस के पति ने ही ठान रखी हो, उस से क्या जलना?’’ यह जवाब दे कर अंजलि एक बार और खिलखिला कर हंसी और फिर अपने काम में जुट गई.

अपनी पत्नी रीना से प्रशांत ने 5-7 मिनट बातें कीं, फिर अपना मोबाइल चार्जर पर लगाने के बाद वह अंजलि से गपशप करने लग गया.

‘‘सोचती हूं तुम्हारे साथ डिनर पर चली ही चलूं,’’ अंजलि शरारत भरे अंदाज में मुसकराई, ‘‘बोलो, कहां ले चलोगे?’’

‘‘जहन्नुम में,’’ प्रशांत भन्ना उठा, ‘‘तुम ने सुन लिया न कि रीना ने रात वाले शो के टिकट ले कर आने की बात अभीअभी फोन पर मुझ से की है. मुझे किलसाने को तुम अब डिनर पर चलने की बात नहीं करोगी तो कब करोगी?’’

‘‘यों क्यों गुस्सा हो रहे हो जानेमन,’’ अंजलि ने प्रशांत की आवाज की बढि़या नकल उतारी, ‘‘आज रात बीवी को खुश करो और कल प्रेमिका का नंबर लगाना. कितने लकी हो तुम. पांचों उंगलियां घी में हैं तुम्हारी.’’

‘‘हां, ठीक कह रही हो,’’ प्रशांत बोला, ‘‘जिस दिन रीना को इस चक्कर का पता लगेगा, उसी दिन मेरा सिर कड़ाही में भी होगा.’’

‘‘देखो रोमियो, तुम क्या समझते हो कि मैडम को इस बारे में पता नहीं है. अरे, ऐसे चक्करों की खबर दुनिया वाले फटाफट पत्नी तक पहुंचा देते हैं. मैडम जिस तरह से मुझे मुलाकात होने पर पहली बार देखती हैं, उन नजरों में समाए कठोरता और चिढ़ के क्षणिक भावों को मैं खूब पहचानती हूं.’’

‘‘पर मैं ने तो तुम दोनों को सदा आपस में खूब हंसहंस कर बातें करते ही देखा है.’’

‘‘वह हंसना झूठा है, जानेमन.’’

‘‘किसी दिन वह तुम से लड़ पड़ी तो क्या होगा?’’

‘‘वैसा कुछ नहीं होगा क्योंकि जिंदगी के प्रति मेरा जो नजरिया है… जो मेरी फिलौसफी है वह मैं ने उन्हें कई बार समझाई है.’’

‘‘मुझे भी बताओ न जो तुम ने रीना से कहा है.’’

‘‘फिलहाल मेरी उस फिलौसफी को तुम नहीं समझोगे…और न ही उसे तुम्हें समझाने का सही समय अभी आया है,’’ रहस्यमयी अंदाज में अंजलि मुसकराई और फिर दोनों का ध्यान एक मरीज के तीमारदार की तरफ चला गया जो उन से कुछ कहना चाहता था.

प्रशांत को उस व्यक्ति के साथ एक मरीज को देखने जाना पड़ा. उस की गैरमौजूदगी में उस के मोबाइल की घंटी बज उठी और जो नंबर उस में नजर आ रहा था उसे अंजलि ने पहचाना. उस की आंखों में पहले सोचविचार के भाव उभरे और फिर उस की मुखमुद्रा कठोर होती चली गई.

प्रशांत के लौटने तक उस ने खुद को पूरी तरह सहज बना लिया था. उस ने आ कर ‘मिस्ड’ कौल का नंबर पढ़ा और फिर बाहर कोरिडोर में चला गया.

वहां उस ने 10 मिनट किसी से फोन पर बातें कीं. अंजलि को वह इधर से उधर घूमता ड्यूटी रूम से साफ नजर आ रहा था.

‘यू बास्टर्ड,’ अंजलि होंठों ही होंठों में हिंसक लहजे में बुदबुदाई, ‘‘अगर मेरे साथ ज्यादा चालाकी दिखाने की कोशिश की तो वह सबक सिखाऊंगी कि जिंदगी भर याद रखोगे.’

प्रशांत के वापस लौटने तक अंजलि  ने अपनी भावनाओं पर पूरी तरह नियंत्रण कर के उस से मुसकराते हुए पूछा, ‘‘किस से यों हंसहंस कर बातें कर रहे थे?’’

‘‘एक पुराने दोस्त के साथ,’’ प्रशांत ने टालने वाले अंदाज में जवाब दिया.

‘‘रीना मैडम से मेरे सामने बात करते हो तो इस पुराने दोस्त से बातें करने बाहर क्यों गए?’’

‘‘यों ही कुछ व्यक्तिगत बातें करनी थीं,’’ प्रशांत हड़बड़ाया सा नजर आने लगा.

‘‘सौरी, जानेमन.’’

‘‘सौरी क्यों कह रही हो? तुम सोचती हो कि मैं किसी दोस्त से नहीं बल्कि किसी सुंदर लड़की से बातें कर रहा था? उस पर लाइन मार रहा था?’’ प्रशांत अचानक ही चिढ़ा सा नजर आने लगा.

‘‘अरे, मैं ऐसा कुछ नहीं सोच रही हूं क्योंकि मुझ जैसी सुंदर प्रेमिका के होते हुए तुम किसी दूसरी लड़की पर लाइन मारने की बेवकूफी भला क्यों करोगे?’’ अपना चेहरा उस के चेहरे के काफी पास ला कर अंजलि ने कहा और फिर रात वाली सिस्टर को चार्ज देने के काम में व्यस्त हो गई.

कुछ देर बाद ड्यूटी समाप्त कर के प्रशांत चला गया. अंजलि जानती थी कि उसे घर पहुंचने में आधे घंटे से कम  समय लगेगा.

आधे घंटे के बाद उस ने प्रशांत के घर फोन किया. उस की पत्नी रीना ने उखड़े मूड़ में उसे खबर दी कि प्रशांत घर पर नहीं है. इमरजेंसी आपरेशन आ जाने के कारण वह देर तक आपरेशन थिएटर में रुकेगा.

यह खबर सुनते ही अंजलि की आंखों में गुस्से और नाराजगी के भाव एकदम से बढ़ गए. वह अस्पताल से बाहर आई और रिकशा कर के शास्त्री नगर पहुंची.

उस का शक सही निकला था.

डा. प्रशांत की लाल मारुति कार सिस्टर सीमा के घर के सामने खड़ी थी. उस के मोबाइल पर उस ने सीमा के घर के फोन का नंबर शाम को पढ़ लिया था.

उस ने रिकशे वाले को अपने घर की तरफ चलने की हिदायत दी. सारे रास्ते वह क्रोध व ईर्ष्या की आग में सुलगती रही.

सीमा और वह कभी अच्छी सहेलियां हुआ करती थीं. दोनों बेइंतहा खूबसूरत थीं. उन की जोड़ी को साथ चलते देख कर लोग अपनी राह से भटक जाते थे.

सीमा का बौयफ्रैंड उन दिनों रवि होता था और उस के साथ जरा खुल कर हंसनेबोलने के कारण सीमा को शक हो गया और वह अंजलि से एक दिन बुरी तरह से लड़ी थी.

तब से उन के बीच कभी सीधे मुंह बातें नहीं हुईं. दोनों डाक्टरों के बीच बराबर की लोक प्रियता रखती थीं. यह भी सच था कि जो व्यक्ति एक के करीब होता वह दूसरी को फूटी आंख न भाता.

‘‘कमीनी, जान- बूझ कर मेरा दिल दुखाने के लिए प्रशांत पर जाल फेंक रही है. इस बेवकूफ डाक्टर को जल्दी ही मैं ने तगड़ा सबक नहीं सिखाया तो मेरा नाम अंजलि नहीं.’’

घर पहुंचने तक अंजलि का पारा सातवें आसमान तक पहुंच गया था.

अगली सुबह अपने असली मनोभावों को छिपा कर उस ने प्रशांत से मुसकराते हुए पूछा, ‘‘कैसी थी कल की फिल्म?’’

पहले प्रशांत उलझन का शिकार बना और फिर जल्दी से बोला, ‘‘कोई खास नहीं… बस, ठीक ही थी.’’

‘‘गुड,’’ अंजलि दवाओं की अलमारी की तरफ चल पड़ी.

‘‘सुनो, आज शाम डिनर पर चल रही हो?’’

‘‘सोचूंगी,’’ लापरवाह अंदाज में जवाब दे कर वह अपने काम में व्यस्त हो गई.

उस दिन उस ने डा. प्रशांत से सिर्फ काम की बातें बड़ी औपचारिक सी मुसकान होंठों पर सजा कर कीं. शाम तक वह समझ गया कि उस की प्रेमिका उस से नाराज है.

प्रशांत के कई बार पूछने पर भी अंजलि ने अपने खराब मूड का कारण उसे नहीं बताया. ड्यूटी समाप्त करने के समय तक प्रशांत का मूड भी पूरी तरह से बिगड़ चुका था.

अगले दिन भी जब अंजलि ने अजीब सी दूरी उस से बनाए रखी तब प्रशांत गुस्सा हो उठा.

‘‘तुम्हारी प्राबलम क्या है? क्यों मुंह फुला रखा है तुम ने कल से?’’ और अंजलि का हाथ पकड़ कर प्रशांत ने उसे अपने सामने खड़ा कर लिया.

‘‘मेरे व्यवहार से तुम्हें तकलीफ हो रही है, मेरे हीरो?’’ भौंहें ऊपर चढ़ा कर  अंजलि ने नाटकीय स्वर में पूछा.

‘‘बिलकुल हो रही है.’’

‘‘और तुम्हें मेरे बदले व्यवहार का कारण भी समझ में नहीं आ रहा है?’’

‘‘कतई समझ में नहीं आ रहा है,’’ प्रशांत कुछ बेचैन हो उठा.

‘‘इस बारे में रात को बात करें?’’

‘‘इस का मतलब तुम डिनर पर चल रही हो मेरे साथ,’’ प्रशांत खुश हो गया.

‘‘डिनर मेरे फ्लैट में हो तो चलेगा?’’

‘‘चलेगा नहीं दौड़ेगा,’’ प्रशांत ने उस का हाथ जोशीले अंदाज में दबा कर छोड़ दिया.

ड्यूटी समाप्त करने के बाद दोनों साथसाथ प्रशांत की कार में अंजलि के फ्लैट में पहुंचे.

अंदर प्रवेश करते ही प्रशांत ने उसे अपनी बांहों के घेरे में ले कर चूमना शुरू किया. अंजलि के खूबसूरत जिस्म से उठने वाली मादक महक उस के अंगअंग में उत्तेजना भर रही थी.

अंजलि ने उसे जबरदस्ती अपने से अलग किया और संजीदा लहजे में बोली, ‘‘मैं तुम्हें अपने बारे में कुछ बताने के लिए आज यहां लाई हूं. शांति से बैठ कर पहले मेरी बात सुनो, रोमियो.’’

‘‘बातें क्या हम बाद में नहीं कर सकते हैं?’’

‘‘बाद में तुम कुछ सुनने की स्थिति में कभी रहते हो?’’

‘‘देखो, मैं ज्यादा देर बातें कहनेसुनने के मूड में नहीं हूं, इस का ध्यान रखना,’’ प्रशांत पैर फैला कर सोफे पर बैठ गया.

कुछ पलों तक अंजलि ने प्रशांत के चेहरे को ध्यान से देखा और फिर बोली, ‘‘तुम्हें 3 महीने पुरानी वह रात याद है जब मैं अपनेआप बिना किसी काम के तुम से मिलने डाक्टरों के आराम करने वाले कमरे में पहुंची थी?’’

‘‘जिस दिन किसी इनसान की लाटरी खुले उस दिन को वह भला कैसे भूल सकता है?’’

‘‘अपने प्रेमी के रूप में तुम्हें चुनने के बाद उस रात तुम्हारे साथ सोने का फैसला मैं ने अपनी खुशी व इच्छा को ध्यान में रख कर लिया था और अब तक सैकड़ों पुरुषों ने मुझ से शादी करने की इच्छा जाहिर की है पर

कभी शादी न करने का चुनाव भी मेरा अपना है.’’

‘‘ऐसा कठिन फैसला क्यों किया है तुम ने?’’

‘‘अपने स्वभाव को ध्यान में रख कर. मैं उन औरतों में से नहीं हूं जो किसी एक पुरुष की हो कर सारा जीवन गुजार दें. मेरी जिंदगी में प्रेमी सदा रहेगा. पति कभी नहीं.’’

‘‘तुम्हारी विशेष ढंग की सोच ही शायद तुम्हें और औरतों से अलग कर तुम्हारी खास पहचान बनाती है, जानेमन. मैं तुम्हारी जैसी आकर्षक स्त्री के संपर्क में पहले कभी नहीं आया हूं. प्रशांत की आंखों में उस के लिए प्रशंसा के भाव उभरे.’’

‘‘शायद कभी आओगे भी नहीं,’’ अंजलि उठ कर उस के पास आ बैठी, ‘‘क्योंकि अपने व्यक्तित्व को पुरुषों की नजरों में गजब का आकर्षक बनाने के लिए मैं ने खासी मेहनत की है. अपने प्रेमी के शरीर, दिल और दिमाग तीनों को सुख देने की कला मुझे आती है न?’’

अंजलि ने झुक कर प्रशांत का कान हलके से काटा तो उस के पूरे बदन में करंट सा दौड़ गया. अंजलि ने उसे अपने होंठों का भरपूर चुंबन लेने दिया. प्रशांत की सांसें फिर से उखड़ गईं.

प्रशांत के आवारा हाथों को अपनी गिरफ्त में ले कर अंजलि ने आगे कहा, ‘‘अपने प्रेमी मैं बदलती आई हूं और बदलती रहूंगी, फिर भी मैं खुद को बदचलन नहीं समझती हूं क्योंकि एक वक्त में मेरा सिर्फ एक प्रेमी होता है जिस के प्रति मैं पूरी तरह से वफादार रहती हूं. और ऐसी ही आशा मुझे अपने प्रेमी से भी रहती है.’’

‘‘तब यह बताओ कि मेरे जैसे शादीशुदा प्रेमी की पत्नी से तुम्हें चिढ़ नहीं होती है, ऐसा क्यों, अंजलि? तुम्हें उस पत्नी की अपने प्रेमी के जीवन में मौजूदगी क्यों स्वीकार है? वफादारी महत्त्वपूर्ण है तो तुम अविवाहित पुरुषों को ही अपना प्रेमी क्यों नहीं चुनती

हो?’’ अंजलि के मनोभावों को समझने की उत्सुकता प्रशांत के मन में बढ़ गई.

‘‘प्रेमी चुनते हुए मैं विवाहित- अविवाहित के झंझट में न पड़ कर सिर्फ अपने मन की पसंद को ध्यान में रखती

हूं. जनाब, जो विवाहित पुरुष मेरा होने को तैयार है वह अपनी पत्नी के प्रति बेवफा या उस से ऊबा हुआ तो साबित हो ही गया. जो पत्नी अपने पति को अपने आकर्षण में बांध कर रखने में अक्षम है, उस से मुझे भला

क्यों ईर्ष्या होगी. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’ प्रशांत ने साफ देखा कि अंजलि की आंखों में कठोरता के भाव पैदा हो गए थे.

‘‘लेकिन मैं अपने वर्तमान प्रेमी के प्रति सदा वफादार रहती हूं, इसलिए उस का पत्नी के अलावा कहीं इधरउधर मुंह मारना भी मुझे पसंद नहीं. मैं ने आज तक किसी पुरुष के सामने उस के प्रेम को पाने के लिए हाथ नहीं फैलाए हैं. अपने प्रेम संबंधों को शुरू भी मैं करती हूं और उन का अंत भी.

‘‘अपनी जीवनशैली मैं ने खुद चुनी है. पापपुण्य, सहीगलत व नैतिकअनैतिक को नहीं बल्कि अपनी खुशियों को मैं ने अपने जीवन का आधार बनाया है और अपने जीवन से मैं पूरी तरह से संतुष्ट व सुखी हूं,’’ आवेश भरे अंदाज में बोलते हुए अंजलि का मुंह लाल हो उठा.

‘‘यों तनावग्रस्त हो कर तुम यह सब बातें मुझे क्यों सुना रही हो?’’ प्रशांत ने माथे पर बल डाल कर पूछा.

‘‘तुम्हें यह एहसास कराने के लिए कि तुम कितने खुशकिस्मत हो,’’ अंजलि की आवाज और सख्त हो गई, ‘‘मैं तुम्हें खुश रखने में एक्सपर्ट हूं, डाक्टर प्रशांत. मेरा रूप और जिस्म अनूठा है. तुम्हारे मन को समझ कर उसे सुखी रखने की कला मुझे बखूबी आती है. लोग तुम से इस कारण ईर्ष्या करते हैं कि मैं तुम्हारी प्रेमिका हूं…चाहे मुंह से वह मुझे चरित्रहीन कहें पर दिल से वे भी मुझ पर लट्टू हुए रहते हैं. इतना सबकुछ पा कर भी तुम ने सिस्टर सीमा के प्रेमजाल में फंसने की मूर्खतापूर्ण इच्छा को अपने मन में क्यों पनपने दिया?’’

‘‘तुम्हें जबरदस्त गलतफहमी…’’

‘‘डा. प्रशांत, अगर तुम इस वक्त झूठ बोलोगे, तो तुम्हारी मुझ से जुडे़ रहने की सारी संभावना समाप्त हो जाएगी,’’ अंजलि ने साफ शब्दों में उसे धमकी दी.

‘‘सीमा के साथ थोड़ाबहुत हंसी- मजाक करने का यों बुरा मत मानो जानेमन. तुम चाहोगी तो मैं उस से बिलकुल बात करना छोड़ दूंगा,’’ अंजलि  का गुस्सा कम करने के लिए प्रशांत ने फौरन सुलह का प्रयास शुरू किया.

कुछ देर गंभीरता से उस का चेहरा निहारने के बाद अंजलि ने उसे चेतावनी दी, ‘‘आज पहली और आखिरी वार्निंग मैं तुम्हें दे रही हूं. मुझे ‘डबलक्रौस’ करने की कोशिश कभी की तो फिर मुझे सदा के लिए भूल जाना. अपनी पत्नी से जितनी खुशियां पा सकते हो पा लेना लेकिन किसी सीमा जैसी की तरफ आंख उठा कर देखा तो पछताओगे.’’

‘‘मैं तुम्हारी बात समझ गया और अब तुम ये किस्सा समाप्त भी करो,’’ प्रशांत ने पास आ कर उसे अपनी बांहों में भर लिया.

अंजलि का मूड फौरन बदला. उस ने गर्मजोशी के साथ प्रशांत की इस पहल का स्वागत किया.

चंद मिनटों का आनंद देने के बाद अंजलि ने उसे कठिनाई से अलग कर के हलकेहलके अंदाज में कहा, ‘‘टे्रलर यहीं खत्म होता है जानेमन. पूरी फिल्म कल रात पर छोड़ो.’’

‘‘क्या मतलब?’’ प्रशांत चौंका.

‘‘मतलब यह कि अब तुम रीना मैडम के पास अपने घर चले जाओ.’’

‘‘पर क्यों?’’

‘‘क्योंकि मैं तुम्हें सोचने का समय दे रही हूं. अगर कल मेरे आगोश में लौटने की इच्छा तुम्हारे मन में हो तो मेरी शर्तों को ध्यान रखना नहीं तो गुडबाय.’’

अंजलि की बात सुन कर एक बार तो प्रशांत की आंखों में तेज गुस्सा झलका लेकिन जब अपने दिल को टटोला तो पाया कि जादूगरनी अंजलि से दूर वह नहीं रह सकता.

‘‘कम से कम एक कप चाय तो पिला कर विदा करो,’’ प्रशांत की बेमन वाली मुसकान में उस की हार छिपी थी और अपनी जीत पर अंजलि दिल खोल कर हंसने लगी. Social Story in Hindi

Romantic Story in Hindi : इंद्रधनुष

Romantic Story in Hindi :

‘‘वाह, आज तो आप सचमुच बिजली गिरा रही हैं. नई साड़ी है क्या?’’ ऋचा को देखते ही गिरीश मुसकराया.

‘‘न तो यह नई साड़ी है और न ही मेरा किसी पर बिजली गिराने का इरादा है,’’ ऋचा रूखेपन से बोली, जबकि उस ने सचमुच नई साड़ी पहनी थी.

‘‘आप को बुरा लगा हो तो माफी चाहता हूं, पर यह रंग आप पर बहुत फबता है. फिर आप की सादगी में जो आकर्षण है वह सौंदर्य प्रसाधनों से लिपेपुते चेहरों में कहां. मैं तो मां से हमेशा आप की प्रशंसा करता रहता हूं. वह तो मेरी बातें सुन कर ही आप की इतनी बड़ी प्रशंसक हो गई हैं कि आप के मातापिता से बातें करने, आप के यहां आना चाहती थीं, पर मैं ने ही मना कर दिया. सोचा, जब तक आप राजी न हो जाएं, आप के मातापिता से बात करने का क्या लाभ है.’’

गिरीश यह सब एक ही सांस में बोलता चला गया था और ऋचा समझ न सकी थी कि उस की बातों का क्या अर्थ ले, ‘अजीब व्यक्ति है यह. कितनी बार मैं इसे जता चुकी हूं कि मेरी इस में कोई रुचि नहीं है.’ सच पूछो तो ऋचा को पुरुषों से घृणा थी, ‘वे जो भी करेंगे, अपने स्वार्थ के लिए. पहले तो मीठीमीठी बातें करेंगे, पर बाद में यदि एक भी बात मनोनुकूल न हुई तो खुद ही सारे संबंध तोड़ लेंगे,’ ऋचा इसी सोच के साथ अतीत की गलियों में खो गई.

तब वह केवल 17 वर्ष की किशोरी थी और अनुपम किसी भौंरे की तरह उस के इर्दगिर्द मंडराया करता था.

खुद उस की सपनीली आंखों ने भी तो तब जीवन की कैसी इंद्रधनुषी छवि बना रखी थी. जागते हुए भी वह स्वप्नलोक में खोई रहती थी.

उस दिन अनुपम का जन्मदिन था और उस ने बड़े आग्रह से ऋचा को आमंत्रित किया था. पर घर में कुछ मेहमान आने के कारण उसे घर से रवाना होने में ही कुछ देर हो गई थी. वह जल्दी से तैयार हुई थी. फिर उपहार ले कर अनुपम के घर पहुंच गई थी. पर वह दरवाजे पर ही अपना नाम सुन कर ठिठक गई थी.

‘क्या बात है, अब तक तुम्हारी ऋचा नहीं आई?’ भीतर से अनुपम की दीदी का स्वर उभरा था.

‘मेरी ऋचा? आप भी क्या बात करती हैं, दीदी. बड़ी ही मूर्ख लड़की है. बेकार ही मेरे पीछे पड़ी रहती है. इस में मेरा क्या दोष?’

‘बनो मत, उस के सामने तो उस की प्रशंसा के पुल बांधते रहते हो,’ अब उस की सहेली का उलाहना भरा स्वर सुनाई दिया.

‘वह तो मैं ने विवेक और विशाल से शर्त लगाई थी कि झूठी प्रशंसा से भी लड़कियां कितनी जल्दी झूम उठती हैं,’ अनुपम ने बात समाप्त करतेकरते जोर का ठहाका लगाया था.

वहां मौजूद लोगों ने हंसी में उस का साथ दिया था.

पर ऋचा के कदम वहीं जम कर रह गए थे.

‘आगे बढ़ूं या लौट जाऊं?’ बस, एकदो क्षण की द्विविधा के बाद वह लौट आई थी. वह अपने कमरे में बंद हो कर फूटफूट कर रो पड़ी थी.

कुछ दिनों के लिए तो उसे सारी दुनिया से ही घृणा हो गई थी. ‘यह मतलबी दुनिया क्या सचमुच रहने योग्य है?’ ऋचा खुद से ही प्रश्न करती.

पर धीरेधीरे उस ने अपनेआप को संयत कर लिया था. फिर अनुपम प्रकरण को वह दुस्वप्न समझ कर भूल गई थी.

उस घटना को 1 वर्ष भी नहीं बीता था कि घर में उस के विवाह की चर्चा होने लगी. उस ने विरोध किया और कहा, ‘मैं अभी पढ़ना चाहती हूं.’

‘एकदो नहीं पूरी 4 बहनें हो. फिर तुम्हीं सब से बड़ी हो. हम कब तक तुम्हारी पढ़ाई समाप्त करने की प्रतीक्षा करते रहेंगे?’ मां ने परेशान हो कर प्रश्न किया था.

‘क्या कह रही हो, मां? अभी तो मैं बी.ए. में हूं.’

‘हमें कौन सी तुम से नौकरी करवानी है. अब जो कुछ पढ़ना है, ससुराल जा कर पढ़ना,’  मां ने ऐसे कहा, मानो एकदो दिन में ही उस का विवाह हो जाएगा.

ऋचा ने अब चुप व तटस्थ रह कर पढ़ाई में मन लगाने का निर्णय किया. पर जब हर तीसरेचौथे दिन वर पक्ष के सम्मुख उस की नुमाइश होती, ढेरों मिठाई व नमकीन खरीदी जाती, सबकुछ अच्छे से अच्छा दिखाने का प्रयत्न होता, तब भी बात न बनती.

इस दौरान ऋचा एम.ए. प्रथम वर्ष में पहुंच गई थी. उस ने कई बार मना भी किया कि वरों की उस नीलामी में बोली लगाने की उन की हैसियत नहीं है. पर हर बार मां का एक ही उत्तर होता, ‘तुम सब अपनी घरगृहस्थी वाली हो जाओ, और हमें क्या चाहिए.’

‘पर मां, ‘अपने घर’ की दहलीज लांघने का मूल्य चुकाना क्या हमारे बस की बात है?’ मां से पूछा था ऋचा ने.

‘अभी बहुत भले लोग हैं इस संसार में, बेटी.’

‘ऋचा, क्यों अपनी मां को सताती हो तुम? कोशिश करना हमारा फर्ज है. फिर कभी न कभी तो सफलता मिलेगी ही,’ पिताजी मां से उस की बातचीत सुन कर नाराज हो उठे तो वह चुप रह गई थी.

पर एक दिन चमत्कार ही तो हो गया था. पिताजी समाचार लाए थे कि जो लोग ऋचा को आखिरी बार देखने आए थे, उन्होंने ऋचा को पसंद कर लिया था.

एक क्षण को तो ऋचा भी खुशी के मारे जड़ रह गई, पर वह प्रसन्नता उस वक्त गायब हो गई जब पिताजी ने दहेजटीका की रकम व सामान की सूची दिखाई. ऋचा निराश हो कर शून्य में ताकती बैठी रह गई थी.

‘25 हजार रुपए नकद और उतनी ही रकम का सामान. कैसे होगा यह सब. 3 और छोटी बहनें भी तो हैं,’ उस के मुंह से अनायास ही निकल गया था.

‘जब उन का समय आएगा, देखा जाएगा,’ मां उस का विवाह संबंध पक्का हो जाने से इतनी प्रसन्न थीं कि उस के आगे कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थीं.

जब मां ने अजित को देखा तो वह निहाल ही हो गईं, ‘कैसा सुंदरसजीला दूल्हा मिला है तुझे,’ वह ऋचा से बोलीं.

पर वर पक्ष की भारी मांग को देखते हुए ऋचा चाह कर भी खुश नहीं हो पा रही थी.

धीरेधीरे अजित घर के सदस्य जैसा ही होता जा रहा था. लगभग तीसरेचौथे दिन बैंक से लौटते समय वह आ जाता. तब अतिविशिष्ट व्यक्ति की भांति उस का स्वागत होता या फिर कभीकभी वे दोनों कहीं घूमने के लिए निकल जाते.

‘मुझे तो अपनेआप पर गर्व हो रहा है,’ उस दिन रेस्तरां में बैठते ही अजित, ऋचा से बोला.

‘रहने दीजिए, क्यों मुझे बना रहे हैं?’ ऋचा मुसकराई.

‘क्यों, तुम्हें विश्वास नहीं होता क्या? ऐसी रूपवती और गुणवती पत्नी बिरलों को ही मिलती है. मैं ने तो जब पहली बार तुम्हें देखा था तभी समझ गया था कि तुम मेरे लिए ही बनी हो,’ अजित अपनी ही रौ में बोलता गया.

ऋचा बहुत कुछ कहना चाह रही थी, पर उस ने चुप रहना ही बेहतर समझा था. जब अजित ने पहली ही नजर में समझ लिया था कि वह उस के लिए ही बनी है तो फिर वह मोलभाव किस लिए. कैसे दहेज की एकएक वस्तु की सूची बनाई गई थी. घर के छोटे से छोटे सदस्य के लिए कपड़ों की मांग की गई थी.

ऋचा के मस्तिष्क में विचारों का तूफान सा उठ रहा था. पर वह इधरउधर देखे बिना यंत्रवत काफी पिए जा रही थी.

तभी 2 लड़कियों ने रेस्तरां में प्रवेश किया. अजित को देखते ही दोनों ने मुसकरा कर अभिवादन किया और उस की मेज के पास आ कर खड़ी हो गईं.

‘यह ऋचा है, मेरी मंगेतर. और ऋचा, यह है उमा और यह राधिका. हमारी कालोनी में रहती हैं,’ अजित ने ऋचा से उन का परिचय कराया.

‘चलो, तुम ने तो मिलाया नहीं, आज हम ने खुद ही देख लिया अपनी होने वाली भाभी को,’ उमा बोली.

‘बैठो न, तुम दोनों खड़ी क्यों हो?’ अजित ने औपचारिकतावश आग्रह किया.

‘नहीं, हम तो उधर बैठेंगे दूसरी मेज पर. हम भला कबाब में हड्डी क्यों बनें?’

राधिका हंसी. फिर वे दोनों दूसरी मेज की ओर बढ़ गईं.

‘राधिका की मां, मेरी मां की बड़ी अच्छी सहेली हैं. वह उस का विवाह मुझ से करना चाहती थीं. यों उस में कोई बुराई नहीं है. स्वस्थ, सुंदर और पढ़ीलिखी है. अब तो किसी बैंक में काम भी करती है. पर मैं ने तो साफ कह दिया था कि मुझे चश्मे वाली पत्नी नहीं चाहिए,’ अजित बोला.

‘क्या कह रहे हैं आप? सिर्फ इतनी सी बात के लिए आप ने उस का प्रस्ताव ठुकरा दिया? यदि आप को चश्मा पसंद नहीं था तो वह कांटेक्ट लैंस लगवा सकती थीं,’ ऋचा हैरान स्वर में बोली.

‘बात तो एक ही है. चेहरे की तमाम खूबसूरती आंखों पर ही तो निर्भर करती है, पर तुम क्यों भावुक होती हो. मुझे तो तुम मिलनी थीं, फिर किसी और से मेरा विवाह कैसे होता?’ अजित ने ऋचा को आश्वस्त करना चाहा.

कुछ देर तो ऋचा स्तब्ध बैठी रही. फिर वह ऐसे बोली, मानो कोई निर्णय ले लिया हो, ‘आप से एक बात कहनी थी.’

‘कहो, तुम्हारी बात सुनने के लिए तो मैं तरस रहा हूं. पर तुम तो कुछ बोलती ही नहीं. मैं ही बोलता रहता हूं.’

‘पता नहीं, मांपिताजी ने आप को बताया है या नहीं, पर मैं आप को अंधेरे में नहीं रख सकती. मैं भी कांटेक्ट लैंसों का प्रयोग करती हूं,’ ऋचा बोली.

‘क्या?’

पर तभी बैरा बिल ले आया. अजित ने बिल चुकाया और दोनों रेस्तरां से बाहर निकल आए. कुछ देर दोनों इस तरह चुपचाप साथसाथ चलते रहे, मानो कहने को उन के पास कुछ बचा ही न हो.

‘मैं अब चलूंगी. घर से निकले बहुत देर हो चुकी है. मां इंतजार करती होंगी,’  वह घर की ओर रवाना हो गई.

कुछ दिन बाद-

‘क्या बात है, ऋचा? अजित कहीं बाहर गया है क्या? 3-4 दिन से आया ही नहीं,’ मां ने पूछा.

‘पता नहीं, मां. मुझ से तो कुछ कह नहीं रहे थे,’ ऋचा ने जवाब दिया.

‘बात क्या है, ऋचा? परसों तेरे पिताजी विवाह की तिथि पक्की करने गए थे तो वे लोग कहने लगे कि ऐसी जल्दी क्या है. आज फिर गए हैं.’

‘इस में मैं क्या कर सकती हूं, मां. वह लड़के वाले हैं. आप लोग उन के नखरे उठाते हैं तो वे और भी ज्यादा नखरे दिखाएंगे ही,’ ऋचा बोली.

‘क्या? हम नखरे उठाते हैं लड़के वालों के? शर्म नहीं आती तुझे ऐसी बात कहते हुए?  कौन सा विवाह योग्य घरवर होगा जहां हम ने बात न चलाई हो. तब कहीं जा कर यहां बात बनी है. तुम टलो तो छोटी बहनों का नंबर आए मां की वर्षों से संचित कड़वाहट बहाना पाते ही बह निकली.

ऋचा स्तब्ध बैठी रह गई. अपने ही घर में क्या स्थिति थी उस की? मां के लिए वह एक ऐसा बोझ थी, जिसे वह टालना चाहती थी. अपना घर? सोचते हुए उस के होंठों पर कड़वाहट रेंग आई, ‘अपना घर तो विवाह के बाद बनेगा, जिस की दहलीज पार करने का मूल्य ही एकडेढ़ लाख रुपए है. कैसी विडंबना है, जहां जन्म लिया, पलीबढ़ी न तो यह घर अपना है, न ही जहां गृहस्थी बसेगी वह घर अपना है.’

जाने और कितनी देर ऋचा अपने ही खयालों में उलझी रहती यदि पिताजी का करुण चेहरा और उस से भी अधिक करुण स्वर उसे चौंका न देता, ‘क्या बात है, ऋचा? हम तुम्हारी भलाई के लिए कितने प्रयत्न करते हैं, पर पता नहीं क्यों तुम अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने पर तुली रहती हो.’

‘क्या हुआ, पिताजी?’ ऋचा हैरान स्वर में पूछने लगी.

‘तुम्हें अजित से यह कहने की क्या जरूरत थी कि तुम कांटेक्ट लैंसों का प्रयोग करती हो?’

‘मैं ने जानबूझ कर नहीं कहा था, पिताजी. ऐसे ही बात से बात निकल आई थी. फिर मैं ने छिपाना ठीक नहीं समझा.’

‘तुम नहीं जानतीं, तुम ने क्या कह दिया. अब वे लोग कह रहे हैं कि हम ने यह बात छिपा कर उन्हें अंधेरे में रखा,’ पिताजी दुखी स्वर में बोले.

‘पर विवाह तो निश्चित हो चुका है, सगाई हो चुकी है. अब उन का इरादा क्या है?’ मां ने परेशान हो कर पूछा था, जो जाने कब वहां आ कर खड़ी हो गई थीं.

‘कहते हैं कि वे हमारी छोटी बेटी पूर्णिमा को अपने घर की बहू बनाने को तैयार हैं. पर मैं ने कहा कि बड़ी से पहले छोटी का विवाह हो ऐसी हमारे घर की रीति नहीं है. फिर भी घर में सलाह कर के बताऊंगा. लेकिन बताना क्या है, हमारी बेटियों को क्या उन्होंने पैर की जूतियां समझ रखा है कि अगर बड़ी ठीक न आई तो छोटी पहन ली,’  वह क्रोधित स्वर में बोले.

‘इस में इतना नाराज होने की बात नहीं है, पिताजी. यदि उन्हें पूर्णिमा पसंद है तो आप उस का विवाह कर दीजिए. मैं तो वैसे भी पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं,’ ऋचा ने क्षणांश में ही मानो निर्णय ले लिया.

कुछ देर सब चुप खड़े रहे, मानो कहने को कुछ बचा ही न हो.

‘ऋचा ठीक कहती है. अधिक भावुक होने में कुछ नहीं रखा है. इतनी ऊंची नाक रखोगे तो ये सब यहीं बैठी रह जाएंगी,’ मां ने अपना निर्णय सुनाया.

फिर तो एकएक कर के 8 वर्ष बीत गए थे. उस से छोटी तीनों बहनों के विवाह हो गए थे. ऋचा भी पढ़ाई समाप्त कर के कालिज में व्याख्याता हो गई थी. पिताजी भी अवकाश ग्रहण कर चुके थे.

अब तो वह विवाह के संबंध में सोचती तक नहीं थी. पर गिरीश ने अपने   व्यवहार से मानो शांत जल में कंकड़ फेंक दिया था. अब अतीत को याद कर के वह बहुत अशांत हो उठी थी.

‘‘अरे दीदी, यहां अंधेरे में क्यों बैठी हो? बत्ती भी नहीं जलाई. नीचे मां तुम्हें बुला रही हैं. तुम्हारे कालिज के कोई गिरीश बाबू अपनी मां के साथ आए हैं. अरे, तुम तो रो रही हो. तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’ ऋचा की छोटी बहन सुरभि ने आ कर कहा.

‘‘नहीं, रो नहीं रही हूं. ऐसे ही कुछ सोच रही थी. तू चल, मैं आ रही हूं,’’ ऋचा अपने आंसू पोंछते हुए बोली.

ड्राइंगरूम में पहुंची तो एकाएक सब की निगाहें उस की ओर ही उठ गईं.

‘‘आप की बेटी ही पहली लड़की है, जिसे देख कर गिरीश ने विवाह के लिए हां की है. नहीं तो यह तो विवाह के लिए हां ही नहीं करता था,’’ ऋचा को देखते ही गिरीश की मां बोलीं.

‘‘आप ने तो हमारा बोझ हलका कर दिया, बहनजी. इस से छोटी तीनों बहनों का विवाह हो चुका है. मुझे तो दिनरात इसी की चिंता लगी रहती है.’’

ऋचा के मां और पिताजी अत्यंत प्रसन्न दिखाई दे रहे थे.

‘तो मुझ से पहले ही निर्णय लिया जा चुका है?’ ऋचा ने बैठते हुए सोचा. वह कुछ कहती उस से पहले ही गिरीश की मां और उस के मातापिता उठ कर बाहर जा चुके थे. बस, वह और गिरीश ड्राइंगरूम में रह गए थे.

‘‘एक बात पूछूं, आप कभी हंसती- मुसकराती भी हैं या यों ही मुंह फुलाए रहती हैं?’’ गिरीश ने नाटकीय अंदाज में पूछा.

‘‘मैं भी आप से एक बात पूछूं?’’ ऋचा ने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न कर दिया, ‘‘आप कभी गंभीर भी रहते हैं या यों ही बोलते रहते हैं?’’

‘‘चलिए, आज पता चल गया कि आप बोलती भी हैं. मैं तो समझा था कि आप गूंगी हैं. पता नहीं, कैसे पढ़ाती होंगी. मैं सचमुच बहुत बोलता हूं. अब क्या करूं, बोलने का ही तो खाता हूं. पर मैं इतना बुरा नहीं हूं जितना आप समझती हैं,’’ गिरीश अचानक गंभीर हो गया.

‘‘देखिए, आप अच्छे हों या बुरे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. पुरुषों में तो मुझे विशेष रूप से कोई रुचि नहीं है.’’

‘‘आप के अनुभव निश्चय ही कटु रहे होंगे. पर जीवन में किसी न किसी पर विश्वास तो करना ही पड़ता है. आप एक बार मुझ पर विश्वास तो कर के देखिए,’’ गिरीश मुसकराया.

‘‘ठीक है, पर मैं आप को सबकुछ साफसाफ बता देना चाहती हूं. मैं कांटेक्ट लैंसों का प्रयोग करती हूं. दहेज में देने के लिए मेरे पिताजी के पास कुछ नहीं है,’’ ऋचा कटु स्वर में बोली.

‘‘हम एकदूसरे को समस्त गुणों व अवगुणों के साथ स्वीकार करेंगे, ऋचा. फिर इन बातों का तो कोई अर्थ ही नहीं है. मैं तुम्हें 3 वर्षों से देखपरख रहा हूं. मैं ने यह निर्णय एक दिन में नहीं लिया है. आशा है कि तुम मुझे निराश नहीं करोगी.’’

गिरीश की बातों को समझ कर ऋचा खामोश रह गई. इतनी समझदारी की बातें तो आज तक उस से किसी ने नहीं कही थीं. फिर उस के नेत्र भर आए.

‘‘क्या हुआ?’’ गिरीश ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘कुछ नहीं, ये तो प्रसन्नता के आंसू हैं,’’ ऋचा ने मुसकराने की कोशिश की. उसे लगा कि आंसुओं के बीच से ही दूर क्षितिज पर इंद्रधनुष उग आया है. Romantic Story in Hindi

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें