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Heart Touching Story: निष्कलंक

Heart Touching Story: ‘‘बे टा, तुम भी चिता में लकड़ी लगाने में मदद करो,’’ दूर खड़ी राधा ने अपने इंजीनियर बेटे अनुज से कहा.

देखतेदेखते चिता भरभरा कर जलने लगी. राधा की आंख से आंसू की बूंदें टपक पड़ीं.

‘‘मां, इतनी दूर खड़ी हो फिर भी आंखों में धुआं लग गया,’’ अनुज ने सहम कर राधा से पूछा.

‘‘बेटा, यह धुएं के आंसू नहीं हैं.’’ यह सुनते ही अनुज के दिमाग में यह सवाल कौंध गया कि आखिर मां ने दिल्ली फोन कर के उसे तुरंत हवाई जहाज से आने को क्यों कहा?

‘‘मां, अब चलो… चिता में आग लग गई. कुछ ही देर में जल जाएगी.’’

राधा यह सुनते ही फफकफफक कर रो पड़ी. अनुज भी गंभीर हो गया. मां को गले से लगाते हुए उस ने पूछा, ‘‘मां, क्या बात है? कुछ कहो न. तुम ने इतनी दूर से बुला लिया और इस तरह रो रही हो. आखिर क्या बात है? यह कौन हैं? हमारे परिवार से इन का क्या संबंध है? इस से पहले न तो मैं ने कभी इन्हें देखा, न यह हमारे कोई सगेसंबंधी हैं.’’

इतने सारे सवालों को एकसाथ सुन कर राधा असमंजस में पड़ गई. सोचने लगी, ‘कहां से शुरू करूं?’ फिर बहाना बना कर बोली, ‘‘बेटा, थोड़ी देर बैठ जाओ, मैं थक गई हूं… वैसे भी तरीका यही है कि सब के साथ वापस जाना चाहिए.’’

अनुज मां की बात टाल नहीं पाया. जाने कितने विचार उस के मन में आते रहे कि तब तक सूरज डूब गया और चिता शांत हो गई. तब उस का ध्यान मां की ओर गया. देखा, मां कितनी निश्तेज सी हो गई हैं और चिता की ओर एकटक देखे जा रही हैं. कार से घर जाते हुए अनुज एक शब्द भी नहीं बोला. घर पर आ कर वह नहानेधोने चला गया और मां अपने कमरे में चली गईं. आधाएक घंटा आराम करने के बाद वह मां के कमरे में गया. मां आंखें बंद किए लेटी थीं.

‘‘मां, चाय बना कर लाऊं,’’ अनुज ने पूछा.

राधा को एक झटका सा लगा. उसे ऐसा लगा जैसे अनुपम ने पूछा हो, ‘राधा, चाय पिओगी? बना लाऊं. मेरे हाथ की चाय पिओगी तो लगेगा कि किसी फाइव स्टार होटल की चाय पी रही हो.’

‘सर, रहने भी दीजिए. अब आप हमारे लिए क्या चाय बनाएंगे. क्यों अपने पद की तौहीन कर रहे हैं?’

‘यह तो तुम्हें पहले सोचना चाहिए था. तब तुम्हारा दिमाग घास चरने चला गया था?’ अनुपम ने अफसर की तरह धौंस जमाई थी.

राधा बोली थी, ‘अफसरी मत दिखाइए, इतने में तो चाय बन जाएगी.’ और फिर चाय पीतेपीते हंसीमजाक चलता रहा था.

अनुज चाय लिए खड़ा था. राधा उसे देखती रही. वही आवाज, वही कदकाठी, वही संस्कार, राधा बिस्तर पर लेटेलेटे अपने निर्णय पर गर्व करती रही.

‘‘बेटा, मेरी अलमारी से दवा निकाल ला. बहुत थकान लग रही है, सिरदर्द भी हो रहा है.’’

राधा को अचानक लगा जैसे बहुत सारी समस्याएं और उन के हल एकसाथ खड़े हैं. सब की समस्याएं तो अनुपम भी हल किया करते थे. उन का पैट डायलाग था, ‘क्या समस्या है? लगता है, किसी अफसर ने ठीक से इलाज नहीं किया. मेरे चक्कर में पड़ जाओगे तो बड़ीबड़ी बीमारियां और समस्याएं ठीक हो जाएंगी.’

सारे विभाग के अधिकारी यह सुन कर दहशत में आ जाते थे और शिकायत करने वाले लोग अनुपम को धन्यवाद देते नहीं थकते थे.

राधा भी अपने विभाग की ओर से बैठकों में जाती. कोई संबंध न होने पर भी उसे अनुपम की इन बातों पर और उसे दी जाने वाली बधाइयों पर गर्व होता. जब कभी आफिस के चैंबर में अनुपम बैठक करते और शिकायत- कर्ता उस के पास आते तो संबंधित विभाग के कर्मचारी को बुला कर कस कर डांटते और कर्मचारी के जाने के बाद जोरजोर से हंसते.

एक बार राधा ने पूछ ही लिया,  ‘सर, आप ऐसा क्यों करते हैं?’ अनुपम हंस कर बोले, ‘दिल से नहीं डांटता. दिल से डांटना भी नहीं चाहिए, नहीं तो दिल पर जोर पड़ता है.’

इसी प्रकार विभिन्न अवसरों पर राधा उन के कमरे में जाती रही. पहले तो कुछ संकोच और डर था, बाद में अनुपम के स्वभाव से परिचित होने पर वह बेधड़क उन के कमरे में जाने लगी. एक दिन उस ने हिम्मत कर के पूछ ही लिया, ‘सर, दुनिया भर की समस्याएं आप निबटाते रहते हैं. हम लोग भी तो हैं. कभी पूछ ही लिया करिए कि तुम लोगों की कोई समस्या तो नहीं है.’

इतना कह कर राधा का दिल जोरजोर से धड़कने लगा था, जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो. अनुपम की पारखी नजरों ने जैसे चेहरा पढ़ लिया हो.

तुरंत घंटी बज गई. चपरासी कमरे में आया तो बोले, ‘‘2 कप चाय ले आना.’’ फिर राधा को बैठने का इशारा किया और खुद सरकारी काम में जुट गए. राधा एकटक उन के चेहरे और काम करने की तन्मयता को देखती रही. चाय पीते समय वह कुछ नहीं बोली.

अनुपम बोले, ‘हां, तो कहिए आप की क्या समस्या है?’

फिर राधा के चेहरे पर घबराहट देख कर वह बोले, ‘अच्छा यह लो हमारा टेलीफोन नंबर. जब कोई परेशानी हो तो निसंकोच बता देना,’ यह कह कर अनुपम फिर काम में जुट गए.

राधा ने कांपते हाथों से परची ली पर जैसे ही कमरे से बाहर निकली खुशी के मारे उछल पड़ी. जैसे उस ने कोई परीक्षा पास कर ली हो.

और एक दिन राधा ने साहस कर अनुपम के घर सुबहसुबह फोन कर ही दिया. डर भी लगा कि उधर से डांट सुनाई पड़ेगी मगर आश्चर्यजनक रूप से अनुपम ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘हैलो, कौन बोल रहा है?’

राधा ने अपना परिचय देते हुए हिम्मत कर के घर पर मिलने का समय मांग लिया.

अनुपम समय के बहुत पक्के थे. सुबह 8 बजे के बाद किसी से न मिल कर आफिस जाने की तैयारी शुरू कर देते थे और 9 बजे तक आफिस चले जाते थे. उन्होंने 7 बजे का समय दिया.

दस्तक देते ही अनुपम की आवाज सुनाई दी, ‘अंदर आ जाइए, दरवाजा खुला है,’

राधा घबराते हुए ड्राइंगरूम में बैठ गई. चारों तरफ नजरें दौड़ाईं. दीवार पर बच्चों की फोटो थीं. एक और फोटो में अनुपम एक महिला के साथ बैठे

थे. राधा ने समझ लिया कि यह मैडम ही होंगी.

अनुपम अंदर आए और बड़े कैजुअल ढंग से पूछा, ‘अब बताइए, क्या समस्या है आप की,’ और साथ ही सर्वेंट को 2 कप चाय बनाने के लिए कह दिया.

‘सर, मैडम और बच्चे नहीं दिख रहे हैं. साथ नहीं रखते क्या?’

‘अरे, इस नौकरी में हम लोगों का कोई पक्का ठिकाना तो है नहीं, परिवार कहां रखें.’

राधा को लगा, शायद परिवार के अलग रहने के कारण अनुपम कुछ परेशान हैं. बात बढ़ाते हुए वह बोली, ‘सर, आप बड़े लकी हैं कि मैडम दूर रह कर भी बच्चों को पाल रही हैं और उस से ज्यादा लकी वह खुद हैं जिन्हें आप जैसा जीवन साथी मिला,’ यह कहतेकहते राधा की आवाज भरभरा गई.

‘क्या हुआ आप को?’ अनुपम बोले, ‘लीजिए, चाय पीजिए फिर बताइए.’

‘सर, आप बाहरी आदमी हैं फिर भी पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपनी समस्या आप से कह सकती हूं. मेरे पति हैं, 2 बच्चे हैं. सासससुर भी हैं. बच्चे स्कूल जाने लगे हैं. पूरा दिन तो अच्छा बीतता है या यह कहिए कि दिन भर आफिस का काम करतेकरते घर को भूल जाती हूं. जैसे ही घर पहुंचती हूं सबकुछ बदल जाता है. मेरे पति जो मेरी इच्छा के विरुद्ध मुझ से नौकरी कराते हैं शाम को ताने देते रहते हैं कि मेरे कई लोगों से संबंध हैं और जब मैं नौकरी छोड़ कर घर पर बच्चों को पढ़ाने के लिए कहती हूं तो गाली देते हैं और कहते हैं कि खाना कहां खाऊंगा? भीख मागूंगा क्या? रोज शाम को शराब पी कर आते हैं और इतनी मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा, पहुंचाते हैं कि लगता है कि मैं तो बस एक मशीन हूं.’

यह सब एक सांस में बतातेबताते राधा फूटफूट कर रोने लगी. अनुपम ने ऐसा माजरा पहली बार देखा था. बड़ी असमंजस की स्थिति हो गई. वे धीरे से उठे और गंभीरता से राधा के सिर पर इस तरह हाथ फेरा जैसे कोई बुजुर्ग दिलासा दे रहा  हो, ‘राधा, तुम रोओे मत. समय है, सब पास हो जाएगा. अच्छे दिन भी आते हैं.’

फिर राधा अचानक उठी और बोली, ‘सर आप को देर हो रही होगी, क्षमा कीजिए, आप का समय बरबाद किया.’

फिर तो राधा अकसर अनुपम के घर जाने लगी और समय बीतने के साथ सबआर्डिनेशन की दूरियां खत्म होती चली गईं. अनुपम से मिलने के बाद राधा को घर की तकलीफों  का एहसास कम होने लगा. वह इस बात का ध्यान रखने लगी कि किन बातों से अनुपम को खुशी होती है और किन बातों से चिढ़ते हैं. उस ने अपना फेवरेट परफ्यूम लगाना भी बंद कर दिया था, क्योंकि एक बार अनुपम ने यह कह दिया था कि परफ्यूम लगा कर किसकिस को परेशान करती हो.

अनुपम भी शायद इस दोस्ती से अपने परिवार की कमी कम महसूस करने लगे थे. हंसीहंसी में राधा अनुपम से कह देती, ‘मैडम बहुत सीधी हैं. यदि मैं आप की पत्नी होती तो एक पल भी आप को अकेले नहीं रहने देती. आप का कोई भरोसा नहीं है.’

इस तरह अंतरंगता बढ़ती गई और एक दिन राधा ने अनुपम से वह कह दिया जो एक शादीशुदा औरत शायद ही कह पाती, ‘सर, मुझे आप से एक बेटा चाहिए.’

अनुपम अवाक् रह गए. कुछ देर तक वह समझ ही नहीं पाए कि क्या किया जाए, फिर बोले, ‘क्या कहा?’

‘सर, मैं चाहती हूं कि जो पल भर की खुशी मुझे मिली है वह परमानेंट मेरी हो जाए. मैं आप को मैडम से अलग नहीं करना चाहती. मैं खुद नौकरी करती हूं. बेटे को पाल लूंगी. कभी उस को यह पता नहीं लगने दूंगी कि उस के पिता कौन हैं. सर, मैं चाहती हूं कि मेरे पास एक ऐसी संपत्ति हो जो मेरे बुढ़ापे में मेरा सहारा बने. लोग कहते हैं कि खून अपना रंग दिखाता है सो अपने बच्चों से मुझे कोई उम्मीद नहीं है. वह भी शायद बड़े हो कर अपनी बीवी को पीटें और मां को गाली दें. शायद मेरे पति की तरह.’

अनुपम राधा की नासमझी में कही गई समझदारी की बातें सुन कर मुसकरा दिए. बोले, ‘कितना पढ़ा है? लगता है, जीन्स इफेक्ट पर बड़ी खोज कर चुकी हो.’

‘सर, बी.एससी. के बाद शादी हो गई और पता नहीं चला कि कब 30 पार कर गई.’

अनुपम बहुत टेंस थे. शायद बौस से कुछ कहा- सुनी हो गई थी. राधा ने उन के घर पर ही खुद चाय बनाई और चाय देने के बाद उन के

सिर पर धीरे- धीरे हाथ फेरने लगी.

अनुपम की आंखों से आंसू की बूंदें टपक पड़ीं, वे बोले, ‘यह अकेलापन बहुत खराब होता है. कोई दर्द बांटने वाला नहीं है. बच्चे होते तो शायद उन की हंसी में यह टेंशन घुल जाता.’

यही सोचतेसोचते न जाने कब वे दोनों एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि सारी नजदीकियां ही मिट गईं. फिर दोनों एकदूसरे को एकटक देखते रहे, जैसे एकदूसरे से गलती के लिए क्षमा मांग रहे हों.

राधा अब अनुपम से कटने लगी थी. वह अकसर नजर बचा कर निकल जाती. फिर एक दिन अनुपम को पता चला कि राधा अस्पताल गई है. आफिस में वह बोलते कम थे, पर सबआर्डिनेट्स से गाड़ी में बातचीत करने पर पता चला कि वह मां बनने वाली है. अनुपम रहरह कर यह आशंका पाल लेते कि कहीं यह उस दिन की गड़बड़ तो नहीं. राधा को भी यह एहसास हो गया कि शायद अनुपम में अपराधबोध है.

एक दिन उस ने टेलीफोन पर कहा, ‘सर, बधाई. आप एक और बच्चे के डैड बनने वाले हैं पर एक रिस्पांसिबल लेडी होने के कारण मैं चाहूंगी कि अब आप अपना ट्रांसफर करा लें, जिस से कि आप की खोई हुई चमक वापस आ जाए. हां, टेलीफोन नंबर और पता जरूर दे दीजिएगा.’

तब से अनुपम से यदाकदा बात होती रही. फोटो, पत्र आते और जाते रहे. अनुज पैरों पर खड़ा हो कर स्कूल से कालिज जाने लगा और फिर उस ने इंजीनियरिंग भी कर ली. वह अच्छे जौब में लग गया.

अनुपम बहुत बड़े अधिकारी हो कर रिटायर हो गए. राधा ने भी रिटायरमेंट ले लिया. हां, अनुपम ने आखिरी बार राधा को यह लिखा था, ‘हालांकि हमारा बेटा अब बड़ा हो गया है. तुम्हारी सेवा भी कर रहा है, फिर भी मैं ने सारी बातें तुम्हारी मैडम को बता दी हैं. उम्र के इस पड़ाव पर मैडम ने इसे भूल मान कर माफ कर दिया है और यह वचन दिया है कि जब कभी राधा को कोई तकलीफ होगी तो वह स्वयं या अपने बच्चों के माध्यम से राधा की मदद करेंगी. तुम्हें मैडम ने स्वीकार कर लिया है. अपना खयाल रखना.’

और वही खत अनुज अपने हाथों में लिए अपनी मां के सामने खड़ा था.

‘‘मां, वह मेरे डैड थे?’’

अनुज के इस सवाल पर राधा ने अपनी पलकें इस प्रकार झुका लीं जैसे उसे यह स्वीकार करते हुए गर्व महसूस हो रहा हो. Heart Touching Story

लेखक – अनूप कुमार श्रीवास्तव            

हिंदी फिल्मों में अमीर खलनायक

Hindi Film Story: साहित्य ही नहीं बल्कि फिल्में भी समाज का आईना हमेशा से रही हैं जो बताती रहीं हैं कि समाज किस दिशा और दशा में है. फिल्मों का अहम किरदार खलनायक यह तय करता है कि कहानी आगे कैसे बढ़ेगी. 60 के दशक के बाद समाज तेजी से बदला, तो खलनायक उस से भी ज्यादा तेजी से बदला. उस की पहचान, हुलिया और खलनायिकी का स्टाइल भी बदला लेकिन वह लगातार अमीर होता गया.

साल 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘जंजीर’ कैसे अमिताभ बच्चन के स्टारडम की पहली सीढ़ी साबित हुई, यह हर कोई जानता है. इस फिल्म की एक बड़ी खूबी प्राण का शेरखान के कैरेक्टर रोल में होना था जो अब तक अपनी खलनायिकी के लिए पहचाने जाते थे. तब प्राण का औरा कुछ ऐसा था कि वे विलेन का करें या कैरेक्टर रोल करें, फीस उन की हीरो से भी ज्यादा होती थी. ‘जंजीर’ फिल्म में विलेन का रोल अजीत ने निभाया था जिन का असली नाम हामिद खान था. इस फिल्म में उन का नाम सेठ धरम दयाल तेजा था.

तेजा सेठ कोई ऐसावैसा विलेन नहीं था जिस के मुंह में पान की पीक भरी हो और जिस के एक हाथ में अधजली बीड़ी या सिगरेट हो और दूसरे हाथ में कोई छुरा या चाकू हो. न ही वह लुंगी और धारीदार बनियान वाला छपरी टाइप का विलेन था बल्कि तेजा वाकई में सेठ था जो पूरी फिल्म में महंगा सफेद या औफ व्हाइट सूट और पैरों में चमकते बूट पहनता था. तेजा के हाथ में महंगी शराब से भरा गिलास और उंगलियों में महंगी सिगरेट थी. आंखों पर रंगीन चश्मा उस के बड़ा आदमी होने की चुगली करता हुआ था. उस के सफेद बाल बेहद करीने से पीछे की तरफ सैट किए हुए थे.

बाहर से सभ्य शहरी और बड़ा कारोबारी तेजा दरअसल एक स्मार्ट स्मगलर और अंडरवर्ल्ड का सरगना था जिस के पास बेशुमार पैसा था. वह दिखता भी वैसा ही था जैसा कि एक इतने पैसे वाले शख्स को दिखना चाहिए, कौन्फिडैंस से लबालब भरा हुआ, शब्दों को चबाचबा कर बोलने वाला जो एक नियमित अंतराल से इंग्लिश में छोटेछोटे वाक्य यानी डायलौग बोलता है. तब के फिल्मी पंडितों ने तेजा के किरदार को कुख्यात सरगना और स्मगलर हाजी मस्तान की कौपी करार दिया था. इतना कूल, स्टाइलिश और सौफिस्टिकेटेड विलेन हिंदी फिल्म में पहली बार दिखाया गया था जिसे दर्शकों ने अमिताभ बच्चन और प्राण से कमतर नहीं आंका और माना था.

फिर अजीत की यह स्टाइल और रईसी कई फिल्मों में देखने को मिलीं. ‘यादों की बरात’, ‘कालीचरण’, ‘चरस’ और ‘देसपरदेस’ जैसी फिल्मों में दर्शकों को उन की स्टाइल के अलावा रईसी खूब प्रभावित कर गई थी, क्योंकि 70 के दशक के उत्तरार्ध में समाज में ऐसे सफेदपोश लोग इफरात से होने लगे थे जो बाहर से नेता, उद्योगपति, कारोबारी, कौंन्ट्रैक्टर या बड़े समाजसेवी के तौर पर पहचाने जाते थे. वे बड़ीबड़ी लग्जरी कारों में चलने वाले और महंगे महलनुमा मकानों में रहने वाले होने लगे.

ऐसा ही एक रोल 1975 में फिरोज खान निर्देशित फिल्म ‘धर्मात्मा’ में प्रेमनाथ ने निभाया था, धर्मात्मा के नाम से पुकारे जाने वाले सेठ धरमदास की इमेज शहर में इज्जतदार, दानवीर और धार्मिक सेठ की है जिस का अपना एक अलग साम्राज्य है लेकिन हकीकत में वह अंडरवर्ल्ड का सरगना होता है. सट्टा खिलाना उस की आमदनी का बड़ा जरिया है जिस में लाखों लोग बरबाद होते हैं. सट्टा किंग रतन खत्री की ?ालक धर्मात्मा में दिखाई दी थी. कुछ फिल्मी पंडितों ने ‘धर्मात्मा’ के किरदार को ‘द गौड फादर’ के डौन वीटो कोरलेओने से प्रेरित करार दिया था.

‘धर्मात्मा’ में प्रेमनाथ का शाही अंदाज देखने काबिल था. उन की डायलौग डिलीवरी तो खास किस्म की हुआ करती थी. इस फिल्म में फिरोज खान ने जानेमाने विलेन मदन पुरी के अलावा डैनी और रंजीत जैसे उभरते युवा खलनायकों को भी मौका दिया था जिन्होंने बाद में कई फिल्मों में खलनायिकी के ?ांडे गाड़े. हालांकि उन से ज्यादा अहम रोल अमजद खान के भाई इम्तियाज के हिस्से में आया था लेकिन इम्तियाज इंडस्ट्री में वह जगह बनाने में नाकाम रहे थे जो उन के पिता जयंत और भाई अमजद खान ने बनाई थी.

अमीर विलेन बन कर चमके

अजीत से पहले हालांकि बीआर चोपड़ा निर्देशित फिल्म ‘वक्त’ में रहमान को चिनाय सेठ के रोल में अजीत जैसा ही अमीर खलनायक दिखाया गया था लेकिन वे सफेदपोश नहीं बल्कि घोषिततौर पर स्मगलर और सरगना दिखाए गए थे. इस रोल को भी दर्शकों ने पसंद किया था क्योंकि यह पहली व्यावसायिक फिल्म थी जिस में खलनायक पैसे वाला था जो स्विमिंग पूल के किनारे ईजी चेयर पर पांव फैलाए बियर की चुस्कियां लेता रहता है और उस के इर्दगिर्द बिकिनी पहने सुंदरियां मंडराती रहती हैं.

अब तक जमींदार, डाकू, सूदखोर, लुटेरे और रसूखदार यानी परंपरागत खलनायकों को देखदेख कर हिंदी फिल्मों के दर्शक ऊब चले थे. ऐसे में फिल्म ‘वक्त’ के चिनाय सेठ का नाम उन की जबान पर चढ़ते देर नहीं लगी थी. रहमान फिल्मों में ज्यादा नहीं दिखे लेकिन जब भी दिखे रोबदार रोल में ही दिखे. फिल्म ‘जंजीर’ के बाद तो ऐसी फिल्मों की बाढ़ सी आ गई जिन में विलेन होने का मतलब ही अपार दौलत का मालिक होना था. बैलगाड़ी और घोड़ों पर चलने वाला खलनायक महंगी कारों से होते हुए हैलिकौप्टरों और हवाई जहाजों में उड़ने लगा.

फिल्म ‘जंजीर’ से चमके अमिताभ बच्चन की एंग्री यंगमैन की इमेज गढ़ने में पैसे वाले खलनायकों का खासा योगदान रहा जिस का इस्तेमाल विलेन गैंगवार में बतौर मोहरा करते हैं. फिल्म ‘दीवार’ में इफ्तिखार के साथ, ‘त्रिशूल’ में प्रेम चोपड़ा और ‘शक्ति’ फिल्म में कुलभूषण खरबंदा के साथ उन की ऐसी ही भूमिकाएं थीं. कमोबेश यही टीनू आनंद की ‘कालिया’ फिल्म में देखने को मिला था जिस में गरीब और भोंदू कल्लू का रोल निभाने वाले अमिताभ बच्चन रईस विलेन शाहनी सेठ यानी अमजद खान की बादशाहत खाक में मिला देते हैं. इस फिल्म में मुद्दत बाद 50-60 के दशक के विलेन केएन सिंह नजर आए थे.

खलनायक से कम होती नफरत

इस सीरिज में ‘काला पत्थर’ एक ऐसी फिल्म थी जिस में प्रेम चोपड़ा को कोल माइंस का मालिक दिखाया गया था. नहीं तो अब तक वे गुंडेमवाली टाइप रोल ही कर रहे थे जो गले में रंगीन स्कार्फ बांधे छोटेबड़े जुर्म किया करता है. ‘काला पत्थर’ के सेठ धनराज पुरी की वेशभूषा एकदम रईसों सरीखी थी जिस ने उन्हें एक नई पहचान दी थी जिसे बाद में कई फिल्मों में दोहराया गया.

इस दौर में आम दर्शक ने विलेन से नफरत करना लगभग बंद सा कर दिया था इसलिए नहीं कि दर्शकों ने अपराध और अपराधियों को सहज स्वीकृति दे दी थी बल्कि इसलिए कि नायक ही खलनायक बनने लगा था जो उन के बीच में से कहीं निकल कर भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बन कर फिल्म के आखिर में सिस्टम को ध्वस्त कर देता था जो शोषण के साथसाथ गरीब और गरीबी के अलावा हर तरह के भेदभाव पैदा करता है. इस बीच ढाई घंटे में वह एक ऐसी जिंदगी भी जी लेता था जिस में अमीरों सरीखी विलासिता, रोमांस, नाचगाना वगैरह भी हुआ करते थे जिन के सपने खासतौर से नीचे का अभावग्रस्त दर्शक देखा करता था.

ट्रेड यूनियनों पर आधारित फिल्म ‘नमक हराम’ में खलनायक ओम शिवपुरी को बेहद रईस दिखाया गया था. इस फिल्म में अमीरगरीब दोस्ती को भी शिद्दत से दर्शाया गया था. अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना फिल्म ‘आनंद’ के बाद एक बार फिर साथ नजर आए थे, लिहाजा फिल्म का हिट होना लाजिमी था.

लेकिन एक मालदार मिल मालिक कैसीकैसी साजिशें अपनी दौलत के दम पर मजदूरों के खिलाफ रचता है, कौर्पोरेट की यह हकीकत निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी बहुत सधे अंदाज में दिखाने में कामयाब रहे थे. ‘नमक हराम’ का दिलचस्प पहलू वह था जिस में रईस अमिताभ बच्चन के कहने पर उस का गरीब दोस्त राजेश खन्ना सेठों का मोहरा बन मिल मजदूरों का दिल और भरोसा जीत लेता है और यूनियन के चुनावों में मजदूरों के लीडर एके हंगल को हराने में कामयाब हो जाता है.

एक तरह से कल्ट क्लासिक होते हुए भी ‘नमक हराम’ फिल्म को दर्शकों ने इसलिए भी पसंद किया था कि वह अमीरों के प्रति नफरत को उजागर करती हुई थी ठीक वैसे ही जैसे 60 के दशक में राजकपूर की ‘आवारा’, ‘जागते रहो’ और ‘श्री 420’ ने उजागर की थी. मजदूरों की बस्ती में रहने लगा राजेश खन्ना, बाद में वाकई में एके हंगल की तरह मजदूरों के हक और भले की बातें करने लगता है, तो सेठ बापबेटे के सामने मुसीबत खड़ी हो जाती है. दर्शक के सामने यह स्पष्ट हो जाता है कि असल नमक हराम मजदूर नहीं बल्कि मालिक होता है.

80 के दशक में पैसे वाले खलनायकों का चलन और परवान चढ़ा था. ‘शान’ फिल्म में तो कुलभूषण खरबंदा को एक बेशकीमती टापू का मालिक ही दिखा दिया गया था. गंजे शाकाल के रोल में कुलभूषण खरबंदा जमे थे. हालांकि यह फिल्म उम्मीद के मुताबिक कारोबार नहीं कर पाई थी क्योंकि दर्शकों को खलनायिकी में किए गए नएनए लेकिन गैरजरूरी प्रयोग रास नहीं आए थे. वजह वे टैक्नोलौजी पर आधारित थे जो आज की तरह आम जिंदगी का हिस्सा तब नहीं बन पाए थे. ‘शोले’ के बाद जीपी और रमेश सिप्पी की ‘शान’ पहली हिंदी फिल्म थी जिस में विलेन के गुर्गे तक आनेजाने के लिए हैलिकौप्टर का इस्तेमाल करते हैं. लगभग इसी शेड और स्टाइल में ‘मिस्टर इंडिया’ फिल्म का मुगैंबो नजर आया था. यह रोल अमरीश पुरी ने निभाया था.

रईस प्रोड्यूसरों के अमीर विलेन

विलेन का अमीर होना जब फिल्म के हिट होने की गारंटी होने लगी तो सभी बड़े फिल्म निर्मातानिर्देशकों ने इस फार्मूले को अपना लिया. सुभाष घई ने ‘कर्मा’ फिल्म में डाक्टर माइकल डेंग का किरदार पेश किया जो एक अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन ब्लैक स्टार का मुखिया है. उस के मंसूबे भारत में हिंसा फैला कर देश कब्जाने के हैं. अनुपम खेर डाक्टर डेंग के रोल में इतने जमे थे कि कई फ्रेम्स में राणा विश्वनाथ प्रताप सिंह की भूमिका निभा रहे दिग्गज दिलीप कुमार भी फीके पड़ते नजर आए थे. डाक्टर डेंग की रईसी उस की बौडी लैंग्वेज के अलावा गोल्डन फ्रेम के चश्मे से भी ?ालकती दिखाई देती है जिसे वह बारबार लगाताउतारता और साफ करता रहता है.

इस फिल्म का वह सीन काफी चर्चित हुआ था जिस में जेलर बने दिलीप कुमार डाक्टर डेंग को थप्पड़ मारते हैं तो वह बेहद खूंखार लेकिन शांत अंदाज में कहता है, इस थप्पड़ की गूंज सुनी राणा तुम ने, बहुत दूर तक जाएगी. अब इस थप्पड़ की गूंज की गूंज सुनने को तैयार रहना. ‘सारांश’ जैसी कलात्मक फिल्म से अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवा चुके अनुपम खेर ‘कर्मा’ में दिलीप कुमार के सामने बेहद सहज नजर आए थे. फिल्म के खलनायक की रईसी का हाल तो यह था कि उस के पास अपनी प्राइवेट मिलिट्री, प्लेन, हवाई अड्डे और आधुनिक हथियारों का जखीरा था.

सुभाष घई ने इस पैटर्न को ‘विधाता’, ‘हीरो’ और ‘मेरी जंग’ जैसी फिल्मों में जारी रखा जिन में विलेन का किरदार भले ही बदला हो लेकिन उस की रईसी पर कोई फर्क नहीं पड़ा था. 1985 में आई फिल्म ‘मेरी जंग’ में अमरीश पुरी को एक बेहद कामयाब वकील के रूप में दिखाया गया था जिस के पास अपने जवान बेटे जावेद जाफरी की फुजूलखर्ची और मौजमस्ती के लिए तो देने को पैसा होता है लेकिन उस के लिए वक्त नहीं होता.

उलट इस के, मनमोहन देसाई की फिल्मों के विलेन गरीब से अमीर बनते हुए ज्यादा दिखाई दिए. 1981 में आई ‘नसीब’ ऐसी ही मल्टीस्टारर फिल्म थी जिस में उस दौर के लगभग सभी खलनायक दिखाई दिए थे, मसलन अमजद खान, प्राण, अमरीश पुरी, कादर खान, जीवन, प्रेमचोपड़ा और शक्ति कपूर. जीवन का रोल थोड़ा अलग था लेकिन बाकी विलेन पैसे वाले थे जो महंगे होटलों के मालिक हैं. 1983 की ब्लौकबस्टर ‘कुली’ फिल्म के विलेन कादर खान, ओम शिवपुरी और सुरेश ओबेराय भी खासे पैसे वाले हैं जो मुंबई के गरीब कुलियों से पंगा ले लेते हैं जिन का लीडर अमिताभ बच्चन है. यह वही फिल्म थी जिस की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन पुनीत इस्सर के हाथों घायल हो कर लंबे वक्त तक अस्पताल में भरती रहे थे.

मनमोहन देसाई की आखिरी हिट फिल्म ‘मर्द’ में विलेन ब्रिटिश हुकूमत के अधिकारी थे जिन्हें गरीब तांगे वाला मर्द अमिताभ बच्चन सबक सिखाता है. हिंदी फिल्मों में अंगरेज विलेन दिखाने के लिए 2 ऐक्टर ही हुआ करते थे बौब क्रिस्टो और टौम अल्टर जिन में से बौब क्रिस्टो एक क्रूर ब्रिटिश अधिकारी साइमन के रूप में दिखे थे. मर्द में जनरल डायर बने कमल कपूर का गेटअप अंगरेजों सरीखा दिखा कर काम चलाया गया था क्योंकि उन का लुक कुछकुछ अंगरेजों से मिलताजुलता है. प्रेम चोपड़ा को भी इसी गेटअप में दिखाया गया था जिन्होंने डाक्टर हैरी का रोल निभाया था. ‘कुली’ के पहले मनमोहन देसाई की 2 फिल्मों ‘सुहाग’ के अमजद खान और ‘परवरिश’ के खलनायक पिंचू कपूर थे जिन की तिजोरियां नकदी और गहनों से भरी रहती हैं.

गरीब हीरो चलेगा, गरीब विलेन नहीं

झुग्गीझोंपड़ी और चाल में रहने वाला विलेन फिल्मों से गायब हो गया था. शायद ही नहीं, तय है कि उस की जरूरत खत्म हो गई थी क्योंकि अपराधी होने के बाद भी वह गरीब था जो गुर्गों के रोल करता था. उस का बौस आलीशान बंगलों और अड्डों में रहने वाला वह शख्स हो चला था जिस के नाम पर फिल्म बिकती थी फिर चाहे वह अजीत हों, प्राण हों, अमजद खान हों, कादर खान हों, प्रेम नाथ या प्रेम चौपड़ा हों या कोई और ब्रैंडेड विलेन हो, दर्शक उसी की वजह से खिड़की के बाहर टिकट लाइन में लगते थे.

हीरो गरीब हो, यह दर्शकों को गवारा था लेकिन विलेन उन्हें अमीर ही भाता और लुभाता था. इस की अपनी आर्थिक  धार्मिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक वजहें भी थीं कि आम दर्शक जो अधिकतर निम्न वर्ग का होता था वह खुद के तबके को खलनायकों की जमात और बिरादरी में शुमार नहीं देखना चाहता था. अपने असामाजिक, अपराधी और हर लिहाज से छोटे होने के आरोप और गिल्ट से छुटकारे के लिए तो वह आज तक छटपटा रहा है. उस की नजर में देश और समाज का दुश्मन वही है जिस के पास पैसा है.

आज का विलेन

15-20 साल हिंदी फिल्में बिना किसी तयशुदा फौर्मेट के बनीं लेकिन 2015 के बाद खलनायकों ने फिर जलवा बिखेरना शुरू किया. अब खलनायक सुपर रिच और हाईटैक हो चला था. उस की क्रूरता में मनोविज्ञान भी शामिल हो गया लेकिन अभी भी अधिकतर फिल्मों में यह जिम्मेदारी हीरो को ही उठानी पड़ रही थी. एक बदलाव कहानियों में यह आया कि ओमकारा राजनीति किसी न किसी रूप  में उस में शामिल थी.

‘केजीएफ-2’ में संजय दत्त ने अधीरा का रोल निभाया था. प्रशांत नील निर्देशित यह फिल्म पहले कन्नड़ में बनी थी. कर्नाटक स्थित कोलार की सोने की खदानों से स्क्रीन जगमग करती रहती है. सोने की छीनाझपटी और स्मगलिंग के दौरान हिंसा इस में जरूरत से ज्यादा थी, ‘अग्निपथ’ और ‘खलनायक’ जैसी फिल्मों के बाद संजय दत्त फिर क्रूर और हिंसक दिखने में बाजी मार ले गए थे. थ्रिल और सस्पैंस से लबरेज ‘केजीएफ-2’ की कहानी इतनी तेज थी कि हिंदीभाषी दर्शक उसे समझ नहीं पाता जो संजय दत्त की वजह से थिएटर तक गया था. बौक्स औफिस पर इस फिल्म ने रिकौर्ड तोड़ कलैक्शन किया था. एक दृश्य में रवीना टंडन को भारत की प्रधानमंत्री के रोल में दिखाया गया है.

2023 में प्रदर्शित ‘पठान’ फिल्म में जौन अब्राहम विलेन बने थे जिन्होंने जिम की भूमिका की थी. जिम कभी भारतीय खुफिया एजेंसी रा का हिस्सा हुआ करता था लेकिन बाद में एक आतंकी ग्रुप बना कर भारत पर बड़े हमले की योजना बनाता है. जिम बगावती और हिंसक इसलिए बना था क्योंकि उस ने सिस्टम में पसरा भ्रष्टाचार देख लिया था.

इसी साल आई ‘जवान’ में साउथ के मामूली शक्लसूरत वाले नए ऐक्टर विजय सेतुपति कल्कि गायकवाड़ के रोल में दिखे थे जोकि हथियारों का अंतर्राष्ट्रीय कारोबारी है. जाहिराना तौर पर कल्कि बेहद भ्रष्ट और हिंसक है जो पैसों के दम पर आम लोगों और किसानों का शोषण करता है. उस के राजनेताओं से भी अंतरंग ताल्लुकात हैं. हाईटैक सिक्योरटी में रहने वाला कल्कि अपनी प्राइवेट आर्मी भी रखता है. मुद्दत बाद हिंदी फिल्मों के परंपरागत विलेन का अक्स इस किरदार में दिखा था. ‘कर्मा’ के अनुपम खेर जैसी कूलनैस और धूर्तता दिखाने में विजय कामयाब रहे थे. दर्शक उन के अभिनय से प्रभावित हुए थे. निर्देशक एटली को ‘जवान’ के लिए फिल्मफेयर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया था.

खलनायिकी के नए आयाम आदित्य धर की फिल्म ‘धुरंधर’ ने भी खूब गढ़े. पाकिस्तानी बैकग्राउंड पर बनी ‘धुरंधर’ खालिस बकवास फिल्म थी जिस में सिवा हिंसा और मारधाड़ के, कुछ नहीं था. हकीकत में इस के दोनों एडीशन नरेंद्र मोदी को महिमामंडित करने के लिए ज्यादा बनाए गए थे. अक्षय खन्ना की खलनायिकी की वजह से हिट हुई इस फिल्म की कहानी का कोई ओरछोर नहीं था. रहमान डकैत, जो कभी कथिततौर पर करांची का गैंगस्टर हुआ करता था, के किरदार में उन्होंने जान डाल दी थी.

 

Family Story Hindi: किरण

Family Story Hindi: दी आप बहुत समय बाद दिखाई दीं, आजकल घूमने नहीं जातीं?’

‘2 बेटियां हैं मेरी. दोनों बाहर हैं. एक की शादी…’’ कहते हुए उन की आंखों में नमी थी. मुझे लगा मुझे से ज्यादा उन की तकलीफ को कौन समझ सकता है जिस की खुद की बेटी हो.

‘अकेले मन नहीं लगता या कहूं कि अकेलापन कचोटने लगा है. बच्चों की इतनी आदत है कि खुद को संभाल नहीं पा रही हूं. यकीन मानो कहीं कुछ भावुक पढ़ूं या देखूं तो मन भर आता है. अभी हाल ही में बेटी के पास से ही आई हूं. ऐसा नहीं कि मैं ने संभलने की कोशिश नहीं की. बहुत तरह से मन लगाने का प्रयास किया लेकिन सबकुछ करने के बाद भी वह रिक्तता जो छूटी है न उसे कोई नहीं भर सकता.’

उन की बात सुन कर दिल भर आया. ऐसा नहीं कि मैं उन्हें उस दिन पहली बार देख रही थी, अकसर अपनी बालकनी से उन्हें आतेजाते देखा है. मस्तमौला, हंसमुख और बिंदास व्यक्तित्व. बेशक कभी मुलाकात का मौका नहीं मिला लेकिन उन को देख कर एक खुशमिजाज महिला की छवि मन में बनती है. कैसे परिचय दूं क्योंकि मैं भी अभी तक बस इतना ही जानती थी, कालोनी की हम से सीनियर पीढ़ी. उस ग्रुप की एक सदस्य मु?ो बहुत प्रिय थी और एक हमारे करीबी लेकिन जानपहचान के बाद भी उन की तरफ से कभी मित्रता के प्रयास नहीं हुए और कभी हम ने भी कोशिश नहीं की.

आज लंबे अंतराल के बाद किसी विवाह समारोह में उन से मिलना हुआ. नजरें मिलीं तो लगा कुछ कहना चाहती हैं लेकिन दोनों की झिक आगे बढ़ने से रोक रही थी. काफी देर हिचकिचाहट के बाद जब आमनासामना हुआ तो दोनों ने कदम बढ़ा दिए.

‘‘हैलो, कैसी हो मीता?’’ उन्होंने बड़ी आत्मीयता से पूछा.

‘‘मैं ठीक. आप?’’

‘‘बहुत समय से तुम से मिलना चाहती थी. तुम्हारा लिखा हुआ पढ़ा. बहुत अच्छा लिखती हो, सीधे दिल पर जा कर लगता है.’’ दिल पर अपनी उंगलियों से संकेत कर जब उन्होंने तारीफ की तो लगा, सच, मेहनत सफल हुई.

‘‘धन्यवाद किरण दीदी. अच्छा लगा सुन कर. यह जान कर और भी अच्छा लगा कि आप मेरा लिखा हुआ पढ़ते हो और पसंद भी आया,’’ मैं ने आतुरता से कहा, ‘‘आप को अपनी किताब दूंगी, पढि़एगा.’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैं पहले ही खरीद कर पढ़ चुकी हूं. पढ़ना ही तो जीवन का बड़ा ध्येय होना चाहिए,’’ फिर वे आगे बोलीं, ‘‘तुम मुझे पहचान तो गई हो न?’’

‘‘जी दीदी,’’ कह बात खत्म की. कैसे कहती कुछ लोग बिना मिले भी अपनी ओर खींच लेते हैं, आप उन्हीं में से एक हैं.

बातों का सिलसिला जारी रहा. बच्चों की, लेखन की और उन के पसंदीदा राइटर की न जाने कितनी बातें हुईं.

इन बातों के साथ उन का चेहरा लाल पड़ गया या कहूं न चाहते हुए भी भरी महफिल में उन का दर्द छलक पड़ा. मैं ने पीठ सहला उन को अपनेपन का एहसास करवाने की पूरी कोशिश की.

‘‘सही कह रहे हो आप, दी. बेटियां ऐसी ही होती हैं. उन की मौजूदगी घर और मातापिता के जीवन को खुशियों से भर देती है. हमें पता है उन्हें एक दिन जाना है लेकिन उम्र बढ़ने के साथ, उन के जाने का एहसास भी दिल को हिला देता है.

‘‘जिन से हमारी जिंदगी है और इस जिंदगी में रौनक है उन से दूर हो कर जिंदगी जीना कितना मुश्किल है. यह सामने वाले को बिना महसूस किए सम?ा पाना बहुत कठिन है. मेरा तो खुद का यह हाल है कि मैं कोई सीरियल, विदाई, भावुक गाने तक सुनने से बचने लगी हूं. घर की हर चीज, हर खुशी उसी से है.’’ यह कह मैं ने भी मन को नियंत्रित करने का एक सफल प्रयास किया.

वे भी भावुक थीं, टपाक से एक आंसू छलका दिया, ‘‘मैं तो अभी तक एडजस्ट नहीं हो पाई हूं. बहुत तरीके से मन लगाने की कोशिश करती हूं लेकिन…’’ कह फिर भावुक हो उठीं वे.

मैं ने प्यार से और महज प्यार से ही नहीं, उन के दर्द को आत्मसात करते हुए कहा, ‘‘दी, मैं तो खुद को भावुकता की तोप समझती थी, आप तो मुझ से भी ज्यादा…’’ यह कह मैं ने चुप्पी साध ली.

अंत में पति से मुलाकात के बाद औपचारिक बातें हुईं. उन्होंने चाय पर आने का प्रस्ताव रखा और जल्दी ही मिलेंगे कह कर विदा ली.

बहुत देर तक उन की मासूमियत, ममता और तकलीफ मुझे उन का चेहरा और भावना से भरे आंसू उन के कोमल मन की याद दिलाते रहे.

रहरह कर वह घड़ी याद आ रही थी जब मित्र की बेटी 5 साल का कोर्स करने बाहर गई थी और उस के दुखी मन को मैं ने यह कह कर सम?ाया था, ‘लड़कियां ऐसी ही होती हैं, भाभाजीजी. पता है, एक दिन चली जाएंगी, फिर भी हर बार उन का जाना और चेहरे पर ?ाठी खुशी के साथ उन्हें विदा करना वाकई कठिन होता है.’

आंसू पोंछते हुए बोलीं, ‘बस 5 साल बाहर, फिर शादी. अब तो गई ही समझ. आजकल क्या बेटा, क्या बेटी. सब की इसी उम्र में विदाई हो जाती है. बेटे के आने की आस में फिर भी वक्त गुजरता है लेकिन बेटियां जो गईं तो अपनी ही जाई पर से सब अधिकार खत्म.’ यह कह वे सिसकने लगीं.

सच, कितनी तकलीफ है इन बातों में. यह मुझे आज करीब से महसूस हो रहा था. शायद इसलिए क्योंकि चंद साल बाद मुझे भी इस कसौटी से गुजरना है. बिटिया के बड़प्पन के साथ एक अजीब तरह का बदलाव मैं ने भी महसूस किया. भावुक गानों को नजरअंदाज करना, विदाई के सीन से दूरी बनाना वगैरह.

बेशक बच्चों को बढ़ते देखना सुखद है लेकिन मन में हर बार यही लगता है काश, वक्त यहीं थम जाए लेकिन यह वक्त है कि बंद मुट्ठी में से रेत की तरह फिसलता चला जा रहा है. जानती हूं यह जीवन है, इस में आए बदलाव स्वीकारने ही होंगे. वक्त का हाथ थाम, बढ़ना ही होगा.

उस के बाद किरण दी से मुलाकात का मौका नहीं मिला. बस, व्हाट्सऐप पर हायहैलो का मैसेज एकदूसरे को भेज देते थे. उन से मिल कर लगा था जैसे मैं अपना ही अक्स देख रही हूं. एक बार मैसेज में इतना ही लिख पाई, आप मुझे मुझ जैसी लगीं.

मन था, मैसेज में कुछ अपने मन की भी लिखूं लेकिन कैसे, वे तो उम्र, तजरबे और अनुभव सब में मु?ा से बड़ी हैं. बस, चंद शब्द उन्हें अपने दिल के कहना चाहती थी. आज साहस कर लिख भी दिए, ‘‘दीदी, जैसा हम बच्चों के लिए सोचते हैं न, बच्चे भी वही महसूस करते हैं लेकिन उन के अपने सपने, साथ और नया परिवार होता है. उन्हें सामंजस्य बैठा कर अपनी मां के दिए संस्कारों को मान दिलवाना है. यदि हम दुखी होंगे तो वे कैसे खुश होंगे. हमें आज फिर ममता का फर्ज निभाना है, बेवजह नहीं, वजह ढूंढ़ कर. खुश रहना है ताकि हमारी गैरमौजूदगी में भी बच्चे यह सोच कर आगे बढ़ पाएं कि हमारी खुशियों की वजह मातापिता हैं. हमें उन के लिए खुश रहना है. आप तो नाम को सार्थक भी करती हैं ‘किरण’.

‘‘चाहे वक्त बदले या मिजाज, किरण का तो काम ही सकारात्मकता फैलाना है. वह कैसे विपरीत परिस्थिति को अपने स्वभाव पर हावी होने दे सकती है. यदि वह प्रयासरत रही तो आसपास वही प्रकाश होगा, वही खुशनुमा वातावरण होगा और वही चारों तरफ उम्मीद का उजाला होगा.’’

इस के बाद उन का कभी कोई मैसेज नहीं आया. कभीकभी मैं ही गुडमौर्निंग मैसेज भेज देती और वे उसी में कभी हाथ जोड़ कर तो कभी लव बना कर जवाब दे देतीं. दिल को यह कह कर तसल्ली दी कि शायद मेरा सम?ाना उन्हें अच्छा नहीं लगा.

आज अचानक मौर्निंग वाक पर आमनासामना हुआ. वही खुशनुमा चेहरा, मस्त अंदाज. आज दोनों में कोई झुकि न थी, तेजी से दोनों एकदूसरे की तरफ बढ़ गए.

‘‘दीदी, कैसी हैं आप? बहुत अच्छा लग रहा है आप को देख कर? आज तो वही पुराना अंदाज.’’

उन्होंने भी उतनी ही आत्मीयता से जवाब दिया, ‘‘मिलना चाहती थी तुम से. कल ही लौटी हूं, धन्यवाद जो कहना था.’’

‘‘धन्यवाद, क्यों दीदी?’’

‘‘सही कहा था तुम ने, मैं यहां खुश नहीं रहूंगी तो बच्चे कैसे खुश रह पाएंगे. पता नहीं, क्यों नहीं समझ पाई कि मेरे चेहरे की खुशी से चलने वाला मेरा परिवार मुझे निराश देख कर सुकून में कैसे रह सकता है. बच्चे कितने भी बड़े हो जाएं, कितनी भी दूर चले जाएं, कितनी तरक्की कर लें या नई दुनिया में रचबस जाएं, उन के दिल में मातापिता की जगह कभी कोई नहीं ले सकता. बस, जब यह सम?ा आया तो अब सब ठीक है.

आजकल औनलाइन हैल्थ प्लान जौइन किया है. किट्टी में फिर सक्रिय हो गई हूं. जिम में भी सक्रिय हूं. और तो और, एक एनजीओ से जुड़ कर

2 बच्चियों को मुफ्त शिक्षा दे रही हूं. पता है, अपनी बच्चियों का अक्स उन में देखने लगी हूं. सच कहूं तो अब जिंदगी में बहुत सुकून है. यदि हम खुश रहना चाहें तो तमाम रास्ते हैं. जिंदगी हमारी है लेकिन उस पर अधिकार केवल हमारा तो नहीं, हमारे अपनों का भी है,’’ यह कह हंसने लगीं वे.

‘‘मीता, तुम्हारे लिखे हर शब्द दिल में उतर गए. सच कहूं तो तुम्हारे मैसेज ने एक नई दिशा दी. मैं ‘किरण’ जहां तक पहुंचूंगी वहां उजाला ही उजाला होगा’’ इस बात को कहते हुए उन के चेहरे पर आत्मविश्वास की एक अनोखी चमक थी.

लेखिका – मीता जोशी

 

Hindi Story: उत्तरजीवी

Hindi Story: ‘कहा था न कि मैं अगर कभी खो गया तो तुम्हें यही मिलूंगा?’ उस के कानों में वह चिरपरिचित आवाज फिर प्रतिध्वनित हो उठी.

‘हां, और मैं ने तुम्हें ढूंढ़ लिया, ढूंढ़तेढूंढ़ते यहां तक आ ही गई,’ उस ने पूरे जोश में कहा. उस की हर्षसिक्त आवाज समंदर से टकरा रही थी.

‘सुना था, नदी समुद्र से मिलती है और मैं नदियों में से गुजरते हुए तुम्हारा पता तलाश करते आखिर तुम से आ ही मिली.’

उंगलियों से विक्ट्री का निशान बना कर वह हवाओं में अपनी विजय की मुहर छाप रही थी. अपने हाथों में सर्फिंग बोर्ड को थामे उस ने बीच पर कदम बढ़ा दिए, हवाओं में मौजूद एक साया सा आ कर उस के आरपार गुजर गया. ऊपर नीला आकाश और नीचे नीलहरित जल पर नाचती दूधिया उर्मियां अजीब सा मायाजाल फैलाए थीं चमकीली रेत पर. उन से बनतेउठतेगिरते क्षणभंगुर मोती यों लग रहे थे जैसे उस की इस उपलब्धि पर सलिल अपने दोनों हाथों से मोती लुटा रहा हो और वह उन के नेह में डूबती जा रही थी.

समुद्र की दैत्याकार लहरों को चुनौती देती सर्फिंग बोर्ड पर अठखेलियां करती पद्मा के चेहरे पर प्रतिशोध के साथ विजय के चिह्न स्पष्ट नजर आ रहे थे. आज हर भय, हर अपराधबोध उस से कोसों दूर थे. उसे गहरा समुद्र भी जमीन प्रतीत हो रहा था. जरा सी चूक उस का यह पल मौत में बदल सकती थी लेकिन आज हर डर उस की जीत ही होगा, उसे अपने अंदर और बाहर के समंदर में, बस, उसी का स्पर्श मिल रहा था.

अथाह नीली जलराशि यदि नीली समाधि में बदल जाए तो भी उसे कोई कष्ट न होता, सुख ही होता. उसे एक्सट्रीम सैटिस्फैक्शन मिल चुका था. सशरीर उसे आसमान की अनुभूति हो रही थी. वरना उस का हर व्यवहार नपातुला हो चुका था, किसी बो?ा के तले रोज जीना आसान नहीं होता. आज उस ने उत्तरजीवी होने का उत्तरदायित्व पूरा ही लिया था.

ब्रेवो, वाओ, अमेजिंग॔ की चारों तरफ गूंजती आवाजों के साथ वह सुदूर फैली उस अनंत हरहराती जलराशि को विस्मित नेत्रों से देखती जा रही थी. हर बूंद की उछाल में उसे लगता था कि उस में सलिल की आंखें उभर आई हैं, लहरें उसे सलिल की बलिष्ठ भुजाएं लगतीं, सागर स्वयं सलिल.

उस के पैरों के नीचे जमीन न हो कर भी जमीन का आभास हो रहा था. आज उस के पथरीले चेहरे पर बरसों बाद विजय के भाव उभरे थे, हर सर्फर का लगभग यही हाल था. सर्फिंग क्लब से सफलतापूर्वक प्रशिक्षु का सर्टिफिकेट प्राप्त करने के बाद आखिर उस ने समंदर के सीने में अपने कदम उतार ही दिए थे.

आसपास का शोर और खुशी की आवाजें उस वातावरण में आम थीं. डक डाइव, हैंग टेन और ट्यूब राइड अब उस की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके थे. उस के विस्फारित आंसू समंदर का ही एक अंग लग रहे थे. उसे सलिल अपने अंदर भी उतना ही महसूस हो रहा था जितना बाहर.

सिद्धार्थ उस के जीवन के उस बेशकीमती अविस्मरणीय पल को कैमरे में कैद करता जा रहा था. वह इन खूबसूरत पलों में मरने की कामना कर रही थी ताकि यह उस की अंतिम स्मृति बन जाए. लेकिन, जीवन हमारे चाहने से कहीं आगे है. उसे सलिल अपने रोमरोम में महसूस हो रहा था. ‘आइए वापस लौट चलिए’ प्रशिक्षक का निर्देश मिलते ही उसे यों लगा मानो उस ने अंतिम मिलन के पलों में सबकुछ पा कर भी एक बार फिर खो दिया.

थके कदमों से वह लौट चली बीच की ओर. लेकिन आज उस में मिलन की खुशी के साथ विजय का उद्घोष भी था. वह वापस आ कर बीच पर बैठ गई. सागर का नमकीन पानी अब भी उस के शरीर का हिस्सा था.

‘‘हे द्विज, यह लो तुम्हारी गुरुदक्षिणा,’’ उस ने कैमरे से रिकौर्डिंग उसे दिखाते हुए कहा, ‘‘थैंक यू, द्विज.’’ उस ने भावुकताभरे स्वर में यह कहा. आज वह सच में फूटफूट कर रोना चाहती थी, इस गुरुदक्षिणा के लिए.

‘तुम रो सकती हो मन भर जाने तक’ उस ने यह सुना और बरसों का सूखा सागर आंखों से बह ही निकला. रेत में गिरते नमकीन मोती मानो सलिल ही अपने रूमाल में सहेज रहा था.

किस ने सोचा था कि पानी से डरने वाली एक साधारण सी लड़की लक्ष्य के लिए इतनी असाधारण बन कर निखरेगी.

‘द्विज’ उन दोनों का स्नेहिल संबोधन था एकदूसरे के लिए क्योंकि उन दोनों ने ही एकदूसरे को दोबारा जन्म दिया था.

हां, उन का मिलना समय की एक निष्ठुर योजना थी. समय सचमुच कितना मायावी होता है. हम जब जो चाहते हैं तब वह नहीं मिलता और जब मिलता है तो उस की प्यास खत्म हो चुकी होती है. उस के मष्तिष्क में वह दिन फिर जीवंत हो उठा.

उस दिन सांक्ष्य सूरज के घर लौटने की प्रतीक्षा में सिंदूरी हो चुकी थी. सुबह के यायावर घोंसले की ओर संगीतबद्ध हो कर लौट रहे थे. सुदूर तक आंचल फैलाए गंगा का घाट भी किनारे सजी हुई तरणियों से क्लांत शांत निशा के आगमन का शंखनाद कर रहा था. लहरें मद्धम हिलोरें ले रही थीं. कोई जलचर यदि निकल पड़ता तो यों तरंग उठतीं मानो कोई मासूम बच्चा नींद से चिहुंक उठा हो. रंगबिरंगी नावें पंक्तिबद्ध यों सजी हुई थीं जैसे किनारों पर मानो उन्होंने सिंदूर से नवविवाहिता की मांग भरी हुई हो. धीरेधीरे सब अपनेअपने कांत में लौटने की तैयारी में थे और वह भी.

‘छपाक’ की तेज आवाज हुई और शाम को नदी के जल से करीब 2 फुट ऊंचे नवजात उपजे, उजले मोती बिखर कर तट पर फैलने लगे. जल से न जाने कितने नएनए पानी के मनोहर आकार आंखों के आगे साकार हो उठे. जितना वजन गिरा उतना ही बड़ा वलय बना और उस क्षणिक शून्य से निकला जल ऊपर उछल कर नएनए आकार रचने लगा.

कूदने वाले ने उसी क्षण खुद को लहरों के हवाले कर दिया और कोई संघर्ष भी नहीं किया लहरों से मानो उसे जीवन से कोई मोह न हो. जीवनयुद्ध से थका वह पथिक यों ही मिटने को राजी था. जैसे जल के मोती धीरेधीरे अपने मूल आकार में लौटते, आंखों के आगे से मिट जाते थे. धीरेधीरे सब पहले जैसा होने जा रहा था. उसे दम घुटने की प्रतीक्षा थी, वह सोच रहा था कि आज सारे जंजालों से मुक्त हो जाऊंगा.

तभी वैसी ही एक और आवाज गूंजी और उस ने धुंधली आंखों से देखा, सामने से कोई तरुणी आ रही है उस की ओर. मानो, पानी पर कोई चील उड़ रही हो, पूरी रफ्तार से कुशलतापूर्वक. थोड़ी देर में उसे लगा कि वह मृत्यु की चाहत रखते हुए पानी में खो गया, सभी दुखों से मुक्त होने के लिए. पर यह उस का भ्रम मात्र था. आंखें खुलने पर वह नदी के किनारे रेत पर पेट के बल लेटा था और उस के सामने वही तरुणी खड़ी थी.

सपाट चेहरे के साथ उस की आंखों में जीवन के लक्षण देख कर उस के चेहरे पर एक क्षीण स्मितरेखा उभर कर लुप्त हो गई. निर्निमेष वह उस की ज्वलंत आंखों में देखता रहा, फिर बच्चों की तरह रो पड़ा, ‘क्यों बचाया मुझे?’

शायद, जिन्हें मौत चाहिए उन्हें वह नहीं मिलती. तरुणी ने उसे जीभर कर रो लेने दिया और वह नदी की तरफ पीठ कर के बैठ गई. फिर कुछ क्षणों के बाद उत्तर दिया, ‘कुछ सहानुभूति और कुछ समानुभूति के कारण. कभी मैं ने भी यह गलती की थी. आज लगता है कि अगर तब सफल हो गई होती तो आज वहां न होती जहां हूं.’

युवक, जिस का नाम सिद्धार्थ था, ने दोबारा नदी की ओर देखा तो खुद भी भय से आंखें मूंद लीं. गंगा की रेत अभी भी उस के वस्त्रों से किसी हठी प्रेमिका सी चिपकी हुई थी, मानो कोई प्यार की प्यासी अपने प्रिय को छोड़ना ही न चाहती हो. उस ने धीरे से कहा, ‘तुम रो सकते हो. जब तक तुम्हारे भीतर की पीड़ा किसी जाग्रत ज्वालामुखी की तरह अपना लावा बहा कर खुद को शांत न कर ले, रोते रहो.’

उस ने आश्चर्यजनक तरीके से सामने बैठी उस युवती को देखा, जो उसे बिना कोई उलाहना दिए रोने की सलाह दे रही थी. और वह एक बार फिर रेत के ढहते किले के मानिंद भरभरा कर रो पड़ा. शायद, बेहद टूटा हुआ होगा, तरुणी ने सोचा, फिर कहा, ‘तुम जब तक चाहो, रो सकते हो. उस के बाद तुम चाहो तो अपना मन खोल सकते हो.’

‘आप पहली शख्सियत हैं जिस ने मुझ से यह बात कही है,’ वह भरे गले से बोला.

‘शायद हम अजनबी के सामने वैसे ही निष्कपट और निर्वसन होते हैं जैसे

मां के समक्ष नवजात शिशु. कोई बंधीबंधाई छवि टूटने का भय ही नहीं होता. हम एक पहले से ही बनेबनाए तयशुदा खांचे में जीते हैं और उसी के लिए मजबूर किए जाते हैं.’

‘आप सही कह रही हैं,’ उस ने संभल कर बैठते हुए कहा.

अब युवक कुछ संयत हो चुका था. तरुणी ने कहा, ‘तुम अपने घर लौट सकते हो.’

युवक ने खाली आंखों से कुछ कहना चाहा लेकिन प्रकट में यह बोला, ‘मेरा नाम सिद्धार्थ है, आप का नाम जान सकता हूं? आप बहुत अच्छा तैरती हैं.’

युवती ने उत्तर दिया, ‘मुझे पता है.’

युवक बोला, ‘आप को किस ने सिखाया?’

युवती ने कहा, ‘भय ने.’ और वह उसे विस्मित छोड़ कर आगे बढ़ने लगी. भय, भय से ही तो भाग कर मैं गंगा की गोद में शांति खोजने आया था. उस ने चिल्ला कर कहा, ‘मु?ो आप से बात करनी है, दोबारा कब मिलेंगी?’

‘रोज आती हूं इधर, इसी समय,’ उस के पथरीले चेहरे से स्वर निकले, ‘अब यह तुम्हें तय करना है कि कैसे मिलोगे, नदी में कूद कर या किनारे पर.’ कहती हुई वह शाम के अंधेरों में तेजी से चलते हुए लुप्त हो गई.

‘उफ्फ यह इंसान ही था या कुछ और. जीवन का कोई चिह्न ही नहीं.’ उस ने खुद से कहा और सिर झटक कर खुद भी वापस गलियों में गुम हो गया.

सांझ और रात एकदूसरे के आलिंगन में अपना अस्तित्व खो रही थीं, तारों जड़ी रात की काली चादर अपने रंग में आ रही थी. पहुंच कर युवती पद्मा ने दरवाजा चाबी से खोला, धीमी रोशनी का बल्ब एक युवक की तसवीर पर रोशनी बिखेर रहा था. ईजी चेयर पर वह खुद को ढीला छोड़ कर और अपनेआप को ?ालाते हुए तसवीर की आंखों से आंखें मिला कर बोली, ‘देखना, एक दिन मैं तुम से फिर मिलूंगी.’

पर उस की आंखें इतनी रिक्त थीं कि वहां न नमी थी और न ही अपने लिए कोई क्षमा. आंखों में नींद भरी थी पर कोई पीड़ा ऐसे चुभ रही थी जैसे कंकड़. उस ने सोने की कोशिश की पर सब व्यर्थ. नींद की गोलियां उस के जीवन का अटूट अंग बन गई थीं. किसी तरह नींद आती भी थी तो उस का अपराध छाती पर यों अड़ कर खड़ा हो जाता ज्यों अंगद का पैर. उफ्फ, कितना मुश्किल होता है अपराधबोध के साथ जीना. अगली शाम को उस के कदम रोज की तरह फिर चल दिए गंगा के किनारे. सीढि़यों के पास आज सिद्धार्थ पहले ही मौजूद था.

‘मेरा इंतजार कर रहे थे,’ उस ने सवाल किया?

‘जी.’

‘क्यों, क्या आज छलांग फिर लगाने का इरादा है?’ उत्तर से पहले एक और सवाल आ गिरा उस की झुली में.

‘नहीं, आप का धन्यवाद करना था और कल के लिए माफी मांगना चाहता हूं, वह पल जो आप ने मुझे जीवन में लौटाया.’

‘क्षणिक आवेग हम से बहुतकुछ छीन लेते हैं. जिंदगी वाकई खूबसूरत है. भूमिका बांधने की कोई जरूरत नहीं. तुम से पहले मैं भी तो ऐसा कर चुकी हूं.’

‘क्यों, आप तो बहुत अच्छी तैराक हैं. आप रोज आती हैं इधर?’ उस ने ताज्जुब से कहा.

‘हां, अपने मन की शांति की तलाश में, मेरे कदम खींच ही लाते हैं इधर.’

इतना कह कर उस ने अपना सामान किनारे रखा और खुद को लहरों के हवाले कर दिया, थकने की हद तक जाने के बाद वह किनारे पर लौट आई.

‘आप बहुत अच्छी तैराक हैं,’ उस ने एक बार फिर उस की आंखों में देख कर कहा.

वहां, बस, पीड़ा और आत्मग्लानि की मौजूदगी थी. उस ने आंखों को मूंद लिया और पेड़ का सहारा ले कर बैठ गई, फिर बोली, ‘कुछ बातों के लिए हम बहुत देर कर देते हैं. मुझे अग्रोफोबिया था शुरू से ही.’

‘तो क्या हुआ, हम अपने जीवनकाल में किसी न किसी चीज से भयग्रस्त होते ही हैं,’ सिद्धार्थ ने कंधे उचका कर कहा, ‘‘मुझे एगोराफोबिया यानी जनातंक है, मनोविज्ञान की पढ़ाई की है.’’

‘हूं, तो तुम ने आत्महत्या का रास्ता क्यों चुनना चाहा.’ सवाल सामने से उछला.

सिद्धार्थ ने जवाब दिया, ‘मैं सर्वाधिक असफल हूं अपने घरवालों की नजर में, सब से नकारा, शुरू से ही और अब यह डर मुझ में फैल रहा है. उन के सवालों से बचता एकांत खोजता फिरता हूं.’

पद्मा बोली, ‘और मैं अकेली रह गई हूं. यह तैराकी मेरा अपराधबोध है. मेरा प्रायश्चित्त समझ.’

‘ओह. लेकिन आप का डर अपराध तो नहीं. यह मन की एक अवस्था है,’ सिद्धार्थ ने कहा.

‘कैसे नहीं है,’ उस ने दुख से कहा, ‘जो डर हमारी पूरी जिंदगी की दिशा और दशा बदल कर रख दे, उस से डरूं नहीं तो क्या करूं?’

‘आप से मिल कर मन को बड़ा सुकून मिलता है, आप की बातें मुझे अपनी सी लगती हैं,’ सिद्धार्थ ने कहा.

‘क्योंकि हम मनुष्यों को प्रकृति ने भावनाओं और संवेगों के साथ भाषा की आजादी दी है,’ इतना कह कर वह जाने के लिए उठ खड़ी हुई.

पर रोजाना मिलने से उन के मन की गिरह ढीली पड़ने लगी थी.

अगली मुलाकात में सिद्धार्थ ने पूछा, ‘आप को तैरना किसी ने सिखाया या खुद सीखा?’

‘बचपन की पहली याद जब मैं खेलते हुए बड़ी सी बाल्टी में गिर पड़ी थी, समझ मरने ही वाली थी, बच गई. तब एक पड़ोसी ने बचाया था.’

पद्मा ने नदी को देखते हुए कहा, ‘उस के बाद मेरा बड़ा ध्यान रखा जाता था. उस बात को भूल भी न पाई थी कि दोबारा नदी स्नान में डूबते हुए बची. यहां तक कि मु?ो पानी और डूबने के सपने भी डराया करते थे.

‘बड़ी जलराशि को देख कर चक्कर आ जाते. ऐसा लगता कि यह मुझे तेजी

से अपनी ओर खींच लेगी. मु?ो अनुभूति होती उस से मुझे खींचते दैत्याकार हाथों की.

‘और देखो, आज सब सीख लिया सिवा सलिल के बिना जीने के.’ उस ने बात खत्म कर के सिद्धार्थ की ओर सूनी नजरों से देखा.

‘आप डरपोक नहीं बहादुर हैं. आप ने वाकई भय से आगे की दौड़ लगाई है,’ सिद्धार्थ ने कहा.

‘मायके में मेरी हद शावर से आगे न बढ़ी कभी. जब सलिल, मेरे पति, मेरी जिंदगी में आए तो सबकुछ बड़ा अच्छा था,’ उस ने बताया, ‘शादी के बाद जहां मुझे बाथरूम में बाथटब भी बरदाश्त न था, उस के उलट, तैराकी उन के लिए स्ट्रैस भगाने का जरिया थी.’

वह कुछ रुक कर फिर बोली, ‘हम दोनों में छोटामोटा झगड़ा भी हो जाता लेकिन वे मेरी हालत से समझता करने लगे थे. मैं ने हौल में लगी हुई उन की पसंद की सभी पानी वाली पेंटिंग भी धीरेधीरे बदल दीं. वे मेरे डर के साथ जीना सीख चुके थे. अब जब भी वे बाहर के टूर करते तो मैं औफिस संभाल लेती.

‘‘अब हमारे मध्य भय से जुड़ी कोई बात नहीं होती थी. मुझे लगा सबकुछ सामान्य है लेकिन मुझे पता न था कि मैं उन के जीवन का घुन थी क्योंकि मैं ने जानेअनजाने उन के सुकून के सभी रास्ते बंद कर दिए थे. मेरा डर धीरेधीरे उन्हें मार रहा था, उस दिन फैमिली गैदरिंग में हम शामिल हुए थे. हमारे मध्य हमारा अंश आकार ले रहा था.

‘सलिल स्विमिंग पूल में उतरे तो तैरने के लिए थे मगर वे उस से बाहर आ ही न पाए. मैं मदद के लिए चिल्ला भी न सकी. डर से फ्री हो चुकी थी.’ पनियाती आंखों से उस ने सिद्धार्थ को देखा, फिर बोली, ‘जब तक सहायता मिलती, मैं ने उन्हें अपनी आंखों के सामने पानी में समाते देखा. उन्हें हौस्पिटल ले जाया गया पर तब तक देर हो चुकी थी.’

‘उन्हें मदद चाहिए थी मेरी. और मैं ने अपनी कायरता से सब खो दिया.’

‘ओह, कहीं उन्हें कार्डिएक अरेस्ट तो नहीं आया था?’ सिद्धार्थ ने अपनी राय दी.

‘मुझे पता ही न चला था कि वे मेरे डर से जुड़े व्यवहार से रोजाना होने वाले तनाव के कारण दिल के मरीज बन चुके थे,’ उस ने रहस्यमयी वाणी में कहा, ‘मुझे उन के जाने के बाद होने वाली रस्मों से उतनी तकलीफ नहीं हुई जितनी इस रहस्य के खुलने की वजह से.’

‘मेरी कायरता उन के लिए जीवनभर का घुन बन गई और एक दिन तनाव के कारण मिसकैरेज भी हो गया. मैं चलते पंखे, आग सब में अपनी ग्लानि के कारण मौत के बहाने तलाशने लगी. फिर तलाश रुकी तो पानी पर जिस से डर लगता था, जो सलिल को लील गया.’

‘मिसकैरेज से पहले तो मकसद था मेरे पास. उस दिन इसी जगह छलांग लगा दी, जहां इन हाथों से उस का अस्थि विसर्जन किया था.’ कब डूबी, याद नहीं लेकिन आंख खुली तो सामने जो शख्सियत थी, वह बड़ा नाम था तैराकी में आदित्य सिंह.

पद्मा ने आगे कहा, ‘वजह, जाहिर है, मुझे भी बतानी पड़ी. उस ने मुझे पूर्ण शांति से सुना, फिर बोला, ‘मरना आसान है, कल लोग भूल जाएंगे. यदि वास्तव में उस के लिए जीना चाहती हो तो उस की पसंद को जियो, इसी में मिलेगा वह तुम्हें.’

‘पर मुझे तो पानी से भय लगता है,’ मैं ने कहा.

‘आज जान ली पानी ने तुम्हारी,’ उस ने व्यंग्य से कहा.

‘उस में भी जिंदगी पलती है, पानी की दुनिया में जीने के अपने तरीके हैं. तुम खुद से भयभीत हो. पानी तो तुम्हारे मेरे दोनों के अंदर भी है, बस देह की हद में.’

‘मेरे पास अब खोने को कुछ भी शेष न था, पाने की कोई उम्मीद भी न थी.’

‘उसे मृत्यु ने अवसर नहीं दिया पर तुम अगर प्रेम में हो तो उस विसंगति को संगति में बदल दो,’ आदित्य सिंह ने कहा था.

‘उन के स्विमिंग स्कूल में फौर्म भरते समय कितना विरोधाभास था, तैराकी के प्रशिक्षु का सब से बड़ा डर पानी? उस दिन मैं ने पानी में आंखें बंद कर के उतरते समय पहली बार विसर्जित किया अपना पश्चात्ताप, भय और विसंगतियों को.’

सिद्धार्थ ने बड़े धैर्य से सुनते हुए उत्तर दिया, ‘पता है हमारे समाज को सबकुछ सुंदर चाहिए, जैसे कोई वेल प्रोग्राम्ड सौफ्टवेयर, हम अपनी उपलब्धियों को तो सगर्व ढोल बजा कर सुनाते हैं लेकिन

डर किसी विषधर से अंधेरे में ही पला करते हैं.’

‘‘समाज में हम निजी भय के बारे में खुल कर बात करें तो कायर कहे जाते हैं.

पद्मा अब बोली, ‘पता है, अब इस पानी में मुझे सलिल का स्पर्श महसूस होता है, पता नहीं किस कतरे में वह मुझे बिन बताए छू कर निकल जाता होगा.’

सिद्धार्थ ने कहा, ‘हो सकता है वह अब तक अरब सागर निकल चुका हो, गंगा वहीं तो मिलती है उस से.’

‘शाम ढल चुकी है, सिद्धार्थ. अब हमें चलना चाहिए,’ पद्मा ने यंत्रवत उत्तर दिया.

और दोनों फिर अंधेरों में अपनी मंजिल की ओर बढ़ गए.

अगली शाम जब वे फिर मिले तो उस के भावहीन चेहरे पर उदासी की मोटी परत थी.

‘आज नहीं तैरोगी?’ सवाल सामने से आया.

‘यह देखो,’ उस ने एक पुरानी डायरी आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘उस के पुराने विवाद लौकर से मिली, आज ही पजेशन मिला है. यह देखो, उस की बकेट लिस्ट, जो कभी पूरी नहीं होगी, अब. ‘स्कूबा डाइविंग, सर्फिंग, पूल में अपने बच्चों के सैलिब्रेशन अब ये सब अगले जन्म में करूंगा, पद्मा डरती है पानी से और मैं उसे खोने से.’

‘स्विमिंग पूल के लिए छोड़ी गई जगह अब कभी नहीं साकार होगी. बड़ा मुश्किल है अपनी पसंद के कामों को भूल कर जीना या शायद मरना कहूंगा उसे, यह डर अब उस से ज्यादा मुझे मार रहा है.’

कुछ देर के लिए तो सिद्धार्थ मौन रह गया, फिर बोला, ‘पर ये तो उस की भावनाएं हैं और तुम तो अब पानी के भय से आगे बढ़ चुकी हो.’

‘एक दिन पहले की तारीख है नीचे उस के इस दुनिया से जाने की,’’ पद्मा ने अपना निचला अधर दांतों से काटते हुए दुख से कहा.

‘तुम्हें द्विज का अर्थ पता है?’ सिद्धार्थ ने पूछा.

‘ब्राह्मण,’ पद्मा ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

‘नहीं. द्विजत्व का अर्थ है एक ही जन्म में 2 बार जन्म लेना, एक बार भौतिक और दूसरी बार आध्यात्मिक. जब हम किसी दायित्व की दीक्षा लेते हैं तो हमारे सारे भय छूट जाते हैं,’ वह लहरों की ओर देख कर बोला.

‘फीनिक्स तो अपनी ही राख से फिर जन्म लेती है और बदलता कुछ नहीं.’

‘पर तुम मुझे फीनिक्स नहीं, द्विज लगती हो जो पानी से डरतेडरते पानी से खेलने लगी. अब तुम उदासीन हो सुख और दुख की सीमारेखा के मध्य खड़ी हो निर्भीकता से. सलिल की वह बकेट लिस्ट भी पूरी करोगी जरूर. तुम ने स्विमिंग में हुनर सीख कर खुद को नया जन्म दिया है, सलिल की यादों को भी.’

‘तुम्हें सचमुच ऐसा लगता है,’ पद्मा ने बेफिक्री से कहा.

‘हां, तुम्हें पता है आपदा अवसर का गर्भकाल होती है, मैं तुम्हारे लिए वह अवसर खोज कर लाऊंगा और तुम सलिल को यह उपहार जरूर दोगी, द्विज. तुम्हारे प्रेमगीत का स्थायी लिखा जा चुका है. बस, अंतरा शेष है.’

‘हां,’ पद्मा के चेहरे पर दृढ़ता नजर आ रही थी. उस के पास खोने को कुछ भी न था और पाने के लिए बड़ा समंदर था सपनों का.

‘‘सिद्धार्थ,’’ पद्मा ने जोर से पुकारा तो वह वर्तमान में लौटा. ‘क्या सोच

रहे हो?’

‘‘सोच रहा हूं डबल सैलिब्रेशन है आज, यह लो हमारे एनजीओ की रजिस्ट्रेशन मेल. हम ऐसी मुहिम चलाएंगे जहां पानी से डर के अलावा सभी डरों के बारे में खुल कर बात होगी, ताकि कोई घुट कर न जिए. कोई औरत प्रेमी को पाने के लिए न डरे. कोई युवती रात को अकेले में जाने के डर से अपना कैरियर समाप्त न करे. कोई मां बच्चे को ऊंचे पेड़ पर चढ़ने से न रोके.’’

‘‘सुनो, मुझे फूलों का बुके ला कर दो न, व्हाइट लिलीज का,’’ पद्मा ने आंखें ?ाका कर कहा.

पद्मा एक बार फिर सर्फिंग बोर्ड ले कर उतरी और बुके को सागर के हवाले कर बोली, ‘‘सलिल, अब मुझे पानी से डर नहीं लगता. तुम्हें हमारे ‘द्विजत्व’ नाम के एनजीओ की नींव मुबारक हो.’’

उस की आवाज लहरों के साथ मानो नृत्य कर रही थी. गंगा में राख के रूप में विलीन हुआ सलिल उसे सागर में मिला था, जहां वह उसे यह सूचना प्रसव पीड़ा के बाद मिली संतान जैसी खुशी की तरह ही सुना रही थी.

वक्त के साथ सलिल स्विमिंग स्कूल के रूप में उस का सांझ स्वप्न साकार हो रहा था.

‘‘बधाई, प्रेम की पीड़ा से उपजी यह नई इबारत मोक्ष के द्वार पर पहुंचा द्विज ही लिख सकता है, फीनिक्स नहीं,’’ सिद्धार्थ ने कहा.

‘‘सच, फीनिक्स होती तो बस मेरी यात्रा बारबार राख होने और जन्म लेने की होती, लक्ष्य कभी न मिल पाता, तुम्हारा शुक्रिया.’’

उस के सामने अनगिनत संतानें थीं विद्यार्थियों के रूप में, सलिल की बकेट लिस्ट इस बार संपूर्ण हो चुकी थी.

सलिल भी हम में है और सिद्धार्थ भी, पद्मा भी हमारे मन में. बस, जरूरत है जीने का हुनर सीखने की. Hindi Story

 

 

Hindi Story: आइए, शर्तिया सफलता पाइए

Hindi Story: पैसे वाले वालिदैनों और उन की कृत्रिम मेधावियों को यह खुशखबरी देते हुए हमें हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि अब उन के शहर में भी हर प्रतियोगी परीक्षा से ले कर आम परीक्षा में सौ प्रतिशत सफलता दिलवाने वाला कोचिंग सैंटर खुल गया है, जिस में निम्न से अतिनिम्न स्तर का मेधावी अपने वालिदैनों के पैसे के बूते हर तरह की परीक्षा सौ प्रतिशत गारंटी के साथ पास कर मैरिट लिस्ट में आएगा.

हे हर तरह की परीक्षा में सफल होने के लिए लालायित मेधावियों से अधिक उन के परमादरणीय वालिदैनों, आप के तथाकथित मेधावियों को सौ प्रतिशत सफलता दिलवाने के लिए हमारे कोचिंग सैंटर के पास इतनी उच्च कोटि की फैकल्टी है कि वह जो कुछ भी, जिस परीक्षा के लिए तैयारी करवाती है, हर प्रतियोगी परीक्षा में सारे प्रश्न उन्हीं में से आते हैं.

अब आप यह सोच रहे होंगे कि हम हर परीक्षा के पेपर को लीक करवाने की ताकत रखते होंगे? हमारे हर सीक्रेसी ब्रांच के अंदर तक नहीं, बहुत अंदर तक लिंक होंगे कि हम पेपर करवाने वालों से पेपर खरीद लेते होंगे? बिलकुल नहीं. हम परीक्षाओं की शुचिता में विश्वास करते हैं चाहे वह लोअर केजी की हो या अपर केजी की.

हम कौन होते हैं पेपर लीक करवाने वाले? पेपर लीक करवाने वाला तो ऊपरवाला है. हम कौन होते हैं पेपर बनाने वालों से पेपर खरीदने वाले? हम कौन होते हैं अपनी पसंद के प्रश्न पेपरसैटर से पेपर में डलवाने वाले? हम और हमारा कोचिंग सैंटर आरंभ होने से पहले से ही हर तरह की लीकेज, पहुंच का विरोधी नहीं, घोर विरोधी रहा है. लीकेज धर्म हो, जिन का धर्म हो. हमारा धर्म कठोर मेहनत है. हमारा धर्म तो केवल अपने छात्रों को सौ प्रतिशत सफलता दिलवाना है. हम परीक्षाओं में अवैध तरीकों में कतई विश्वास नहीं करते. हमारे कोचिंग सैंटर की सब से बड़ी विशेषता यही है जो देश के अन्य कोचिंग सैंटरों से हमारे कोचिंग सैंटर को अलग करती है. केवल बेहतर परिणामों के लिए बेहतर फीस हमारा नारा है. सड़क से ले कर संसद तक सब जानते हैं, चाय में जितना गुड़ पाया जाएगा, उतनी ही वह मीठी होगी.

अपने यहां जिनजिन पदों के लिए जोजो परीक्षाएं होती हैं उन सब के पेपर हमारी अनुभवी फैकल्टी द्वारा परीक्षा होने से पहले ही तैयार कर लिए जाते हैं क्योंकि पेपर सैट करने वालों के साथ हमारे वैसे ही संबंध हैं जैसे मंदिर के पुजारियों के अदृश्य भगवानों के साथ होते हैं. हमारे यहां पेपरसैटरों से तैयार पेपर लेने का गुप्त इंतजाम है. उन्हें पता होता है कि अब की बार किसकिस परीक्षा में कौनकौन से प्रश्न पूछे जाएंगे. इसी बात को मद्देनजर रख कर हमारे कोचिंग सैंटर की फैकल्टी अपने मेधावियों को तैयार करती है ताकि वे हर तरह की परीक्षा को परीक्षा से पहले ही क्रैक कर डालें.

हर परीक्षा का पेपर डालने वाले पेपरसैटर को पता हो या न, कि वह पेपर में क्या डाल रहा है या उसे पेपर में क्या डालना चाहिए लेकिन हमारी अनुभवी फैकल्टी को पहले ही पता होता है कि पेपर में वह सौ प्रतिशत क्या डालेगा. और हमारा अनुभव, वह डालता भी वही है,  जिस का अंदाजा हमारी अनुभवी फैकल्टी को पहले से होता है.

मौसम विभाग का हर मौसम को ले कर अनुमान गलत हो जाए तो हो जाए, लेकिन हमारी अनुभवी फैकल्टी का हर परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों को ले कर आज तक कोई अनुमान गलत नहीं हुआ. आज तक के सब पेपरों में सौ प्रतिशत वही आया जिस का अनुमान हमारी योग्य फैकल्टी ने लगाया. अब फिर सवाल खड़ा हो सकता है कि पेपरसैटर पेपर में वही डालता होगा जो हम उस से डलवाते होंगे या कि पेपरसैटर पेपर सैट कर विभाग में जमा करवाने से पहले पेपर हमारे पास जमा करवाता होगा? बेहतर है कि आप इन सवालोंजवाबों में उल?ाने के बदले हमारे परिणामों में उल?ों. सवालों के जवाब ढूंढ़ना बहुत ऊंचे स्तर का मैटर है.

हमारे कोचिंग सैंटर में जोंक चयन सेवा आयोग, कर्मचारी जोंक चयन आयोग, बैंकिंग और बीमा, रेलवे परीक्षाओं से ले कर राज्य स्तर की तमाम क्लास वन से ले कर क्लास फोर तक की जोंक परीक्षाओं सहित व्यावसायिक परीक्षाओं, जैसे जेईई मेन, जेईई एडवांस, नीट, कानून, प्रबंधन, गेट, यूजीसी नेट, सीटीईटी, टेट, सीईयूटी, सेट, अलाइड, मेन सर्विसेज, पुलिस भरती, पटवारी भरती सहित तमाम स्कूली बोर्डों की अकादमिक परीक्षाओं की सौ प्रतिशत सफलता वाली गारंटी के साथ कोचिंग दी जाती है.

आप को यह जान कर और भी प्रसन्नता होगी कि हमारी अनुभवी फैकल्टी प्रतियोगी परीक्षाओं को हाई रैंकों में पास कर देश, समाज की सेवा करने वाले तमाम समाज के लिए समर्पित इच्छुकों को केवल और केवल वही पढ़ाती है जो उन के पेपर में शर्तिया आना तय होता है. हमारी दूरदर्शी फैकल्टी को सोएसोए ही पता चल जाता है कि अब के किस प्रतियोगिता परीक्षा में कौनकौन से प्रश्न आने वाले हैं, जिस की वजह से दूसरे कोचिंग सैंटर वालों की तरह हम अपने छात्रों को इधरउधर भटका, उन का कीमती समय खराब नहीं करते. नाक की सीध में सीधे पौइंट पर चलते हैं.

हम जानते हैं कि हर तरह की प्रतियोगी परीक्षा में सफलता हासिल करने के लिए कौम्पिटिटर से अधिक उन के वालिदैन कुछ भी करने को तैयार रहते हैं ताकि साम, दाम, दंड, भेद जैसे भी हो, जहां से भी हो, जितने में भी हो, उन के उन होनहारों को प्रतियोगी परीक्षा में सुनिश्चित सफलता की गारंटी मिले जो मैरिट लिस्ट में सब से नीचे से सब से नीचे आने लायक भी न होने पर भी मैरिट लिस्ट में टौप टेन में आएं.

ऐसे कौम्पिटिटरों और उन के वालिदैनों का हमारा कोचिंग सैंटर दिल से स्वागत करता है. आइए और सौ प्रतिशत सफलता की गारंटी के साथ हर प्रतियोगी परीक्षा में सफल हो, देशसेवा के हकदार हो जाइए. Hindi Story

लेखक – अशोक गौतम      

साथ हो कर भी अलग आवरण में ढके टूटे रिश्ते

Marriage Problems: पिछले एकदो दशकों में खासकर शहरी और उच्च वर्ग में एक नया और जटिल सामाजिक परिघटन उभर कर सामने आया है- ‘साथ रहते हुए भी अलग’ का चलन. यह स्थिति तलाक से अलग है और साथ रहने से भी अलग. पतिपत्नी कानूनी रूप से विवाहित रहते हैं लेकिन भावनात्मक, मानसिक और कई बार भौतिक रूप से अलगअलग जीवन जीने लगते हैं.

शक्ति सिंह और नंदिनी शाह दोनों सरकारी अधिकारी हैं. 20 साल पहले दोनों ने लवमैरिज की थी. इस कपल के 2 बच्चे हैं. 12 साल का बेटा पियूष और 18 साल की बेटी गार्गी. शक्ति सिंह की मां जीवित हैं. 5 लोगों का परिवार है मगर ये पांचों जन साथ नहीं रहते हैं.

शादी के 4-5 साल तक तो शक्ति सिंह और नंदिनी शाह ने एकदूसरे का खूब साथ निभाया. नौकरी से छुट्टियां लेले कर देशदुनिया घूमे. दोनों को देख कर ऐसा लगता था कि इन से ज्यादा मोहब्बत तो कोई कर ही नहीं सकता. मगर धीरेधीरे दोनों में दूरियां बढ़ने लगीं. शक्ति सिंह का नेचर कुछ गरम था. वे स्त्री पर पुरुष वाला दंभ रखना चाहते थे. घर के किसी भी फैसले में उन की ही सुनी जाए, ऐसी इच्छा रखते थे और सब से बड़ी बात यह कि वे चाहते थे कि नंदिनी दफ्तर में भले अपनी अफसरी झगड़े मगर घर में वह बिलकुल अम्माजी की गाय बन कर रहे.

यानी, शक्ति सिंह की मां जैसा कहें वैसा ही वह करे. जबकि, नंदिनी शाह जो पति के बराबर ही पढ़ीलिखी और उन के बराबर के ओहदे पर तैनात थीं, इस तरह का व्यवहार न तो झेलने के लिए तैयार थीं और न करने के लिए. नंदिनी कहती हैं, ‘‘शादी के तुरंत बाद की बात और थी. हमारी लवमैरिज थी. शक्ति के परिवार में मैं एडजस्ट होना चाहती थी. तब इन के बाबूजी भी जिंदा थे. काफी समय तक मैं ने बहुतकुछ सहन किया. सासससुर का बहुत लिहाज किया. सेवा भी की. उन की न मानने योग्य बातें भी सिर ?ाका कर मानीं. मगर मेरी भी अपनी पर्सनैलिटी है, सोच है, इच्छाएं हैं, पदप्रतिष्ठा है, जिम्मेदारियां हैं. ऐसे में अगर अम्माजी चाहें कि मैं सुबह उठ कर उन के साथ पूजा में बैठूं, उन के कहे मुताबिक व्रत और त्योहार करूं, बच्चों को उन के मुताबिक पालूं, किचन में क्या बने यह वे बताएं, उन से पूछ कर कहीं आऊंजाऊं तो वह सब मुझ से नहीं हुआ.’’

अम्माजी अपने बेटे शक्ति से नंदिनी की शिकायत करतीं तो नंदिनी को बुरा लगता था. बच्चों पर शक्ति सिंह का गुस्सा और शक्ति प्रदर्शन भी उन को आहत करता था और भी कई घरेलू वजहें थीं कि शक्ति और नंदिनी के बीच लड़ाई?ागड़ा रोज की बात हो गई. आखिरकार नंदिनी ने दूसरे शहर में पोस्टिंग ले ली. बच्चों को अपने साथ ले गईं.

पिछले 10 वर्षों से शक्ति सिंह और नंदिनी अलगअलग जगहों पर काम कर रहे हैं. दोनों को सरकारी आवास मिला हुआ है. अम्माजी अपने बेटे शक्ति के साथ रहती हैं. नंदिनी कभी तीजत्योहार पर ही उन के घर आती है. वह भी बस एक दिन के लिए. शक्ति से बातचीत न के बराबर है. बच्चे अपने पिता और दादी से मिल कर खुश हो जाते हैं. यानी रिश्तेदारों और समाज के लिए वह एक परिवार है, मगर अंदरूनी तौर पर रिश्तों में खामोश दरारें हैं. साथ दिखते हुए भी वे अलग हैं. यह विवाहित जीवन का नया शहरी चलन है जो तेजी से उच्च वर्ग में पैर पसार रहा है.

यह चलन बौलीवुड में काफी पहले से था. 90 के दशक की बेहद खूबसूरत और मशहूर अभिनेत्री राखी और प्रसिद्ध गीतकार और फिल्मकार संपूर्ण सिंह कालरा उर्फ गुलजार का रिश्ता किसी से छिपा नहीं है. दोनों ने 1973 में शादी की थी. शादी के लगभग एक साल के अंदर ही उन के रिश्ते में दरार आ गई और वे अलग हो गए. इस के बावजूद, उन्होंने कभी कानूनी तौर पर तलाक नहीं लिया. वे कई दशकों से अलगअलग रह रहे हैं. उन का रिश्ता एक तरह का रिस्पैक्ट सेप्रेशन यानी सम्मानजनक अलगाव का है. दोनों अलग रहते हुए एकदूसरे के प्रति एक शांतिपूर्ण सम्मान बनाए हुए हैं. कानूनी रूप से वे अब भी पतिपत्नी हैं. मगर दोनों के बीच भावनात्मक लगाव नहीं है. हां, उन की बेटी मेघना गुलजार दोनों से जुड़ी रहती हैं.

बौलीवुड में इस तरह का जीवन जीने वाले कई कपल हैं. कई चर्चित जोड़े वर्षों तक अलग रहने के बावजूद कानूनी रूप से शादीशुदा रहे हैं या लंबे समय तक रिश्तों को खींचते रहे. जावेद अख्तर और हनी ईरानी का विवाह खत्म हुआ मगर रिश्ता पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. दोनों ने अपने बच्चों फरहान अख्तर और जोया अख्तर की परवरिश में सहयोग किया. आज भी दोनों के बीच कोई कटुता नहीं है.

ऋतिक रोशन और सुजैन का रिश्ता लंबे समय तक खिंचा और आखिरकार तलाक में बदला, लेकिन अलग रहने का दौर काफी लंबा रहा. आज भी कई मौकों पर दोनों अपने बच्चों के साथ इकट्ठे दिख जाते हैं. सैफ अली खान और अमृता सिंह के बीच भी लंबे समय तक मतभेद रहे, जिन का अंत अलगाव में हुआ. कई ऐसे भी उदाहरण हैं जहां कपल औपचारिक रूप से अलग नहीं होते, लेकिन निजी जीवन में दूरी बना लेते हैं, हालांकि वे सार्वजनिक रूप से कम चर्चा में आते हैं.

बौलीवुड, जो अकसर समाज का ट्रैंडसैटर माना जाता है, से शुरू हुआ यह व्यवहार अब शहरी उच्च वर्ग में भी दिखाई देने लगा है. भारतीय समाज में जहां वैदिक काल से विवाह को एक अटूट बंधन माना गया है, पति को परमेश्वर बता कर पत्नी को उस की सेविका के रूप में दर्शाया गया है, उस समाज में वैवाहिक जीवन में चुपचाप पैर पसारता अलगाववाद धीरेधीरे ऊपर से नीचे की ओर बढ़ रहा है.

पिछले एकदो दशकों में खासकर शहरी और उच्च वर्ग में एक नया और जटिल सामाजिक परिघटन उभर कर सामने आया है- ‘साथ रहते हुए भी अलग’ का चलन. यह स्थिति तलाक से अलग है, और साथ रहने से भी अलग. पतिपत्नी कानूनी रूप से विवाहित रहते हैं, लेकिन भावनात्मक, मानसिक और कई बार भौतिक रूप से अलगअलग जीवन जीने लगते हैं. कुछ साथ रहते हुए भी गहरी चुप्पी इख्तियार कर लेते हैं, अलगअलग कमरों में सोने लगते हैं. यह बदलाव अचानक नहीं आया है. इस के पीछे सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों का एक जटिल तानाबाना है.

बदलते रिश्तों की वजह

पहले विवाह को निभाने की जिम्मेदारी अधिकतर महिलाओं पर होती थी. पुरुष आर्थिक रूप से सक्षम होता था और स्त्री सामाजिक दबावों व पुरुष पर आर्थिक रूप से आश्रित होने की वजह से हर तरह का सम?ाता करती थी. ब्याही गई बेटी से मांबाप कहते थे, ‘अब वही तेरा घर है. वहीं से तेरी अर्थी उठेगी.’ मतलब यह कि जिस घर में ब्याह दिया है वही लोग अब लड़की का आर्थिक बो?ा उठाएंगे और उस के बदले में लड़की को चुप रह कर हर जुल्म बरदाश्त करना होगा. सदियों तक औरतों ने यही किया. आज भी बहुतेरी औरतें कर रही हैं. मगर अब पढ़ीलिखी और नौकरीपेशा औरतों की संख्या बढ़ रही है. शिक्षित, आत्मनिर्भर महिला जहां अपने आत्मसम्मान और मानसिक शांति को प्राथमिकता देती हैं, वहीं अपने उत्पीड़न के खिलाफ मुखर भी हैं.

उधर, पुरुष आज भी अपनी पारंपरिक भूमिकाओं और आधुनिक अपेक्षाओं के बीच उलझ हुआ है. अभी भी वह खुद को पतिपरमेश्वर ही मान कर चल रहा है. उसे पत्नी की तनख्वाह का भी लालच है और वह पत्नी को आजाद भी नहीं देखना चाहता है. नतीजा यह कि शादी के 10-12 वर्षों के भीतर, जब प्रारंभिक आकर्षण और उत्साह कम हो जाता है, असली व्यक्तित्व और मतभेद सामने आने लगते हैं. इस के साथ ही कैरियर का दबाव, बच्चों की जिम्मेदारी, समय की कमी और संवादहीनता, ये सब मिल कर रिश्ते में दरारें पैदा कर देते हैं.

तलाक क्यों नहीं

यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि रिश्ते में संतोष नहीं है तो लोग तलाक क्यों नहीं ले लेते? तलाक न ले कर अलगअलग रहने का औप्शन क्यों कैरी करते हैं? इस की कई वजहें हैं-

कानूनी जटिलताएं : भारत में तलाक की प्रक्रिया अभी भी एक लंबी और बेहद थकाऊ है. अदालतों के चक्कर, तारीख पर तारीख और मानसिक तनाव के अलावा वकील की लंबीचौड़ी फीस लोगों को तलाक से पीछे हटने पर मजबूर करती है. कोर्ट भी तलाक का फैसला देने से पहले पूरी कोशिश करती है कि परिवार बना रहे. इसलिए कई बार मामले को काउंसलिंग में भेज दिया जाता है. जिस में लंबा समय लगता है. फिर भरणपोषण, बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी, संपत्ति में हिस्सेदारी जैसी कई अन्य समस्याओं का समाधान निकलने में भी समय लगता है. इन प्रक्रियाओं के चलते तलाक मिलने में 2 साल से ले कर

10 साल तक लग जाते हैं.

आर्थिक पहलू : तलाक के केस में औरतें पुरुषों पर कई तरह के ?ाठे आरोप लगाती हैं ताकि अदालत उस आधार पर तलाक को जल्दी मंजूर कर ले. इस से पुरुष की सामाजिक छवि बहुत खराब हो जाती है. कई मामलों में तो गंभीर आरोप लगने की वजह से पुरुषों को नौकरी तक से हाथ धोना पड़ा है. इस के अलावा पुरुषों को अकसर एलिमनी यानी स्त्री को भरणपोषण का पैसा देने का डर सताता है. पति की नैट इनकम का 30-40 फीसदी इस में जा सकता है. ऐसे में वह सोचता है कि अलग रहना तलाक लेने से कहीं बेहतर है.

महिलाएं आर्थिक असुरक्षा और बच्चों के भविष्य को ले कर चिंतित रहती हैं. अगर पति उन को अलग रख कर उन का खर्चापानी देता रहे तो यह चिंता भी खत्म हो जाती है. ऐसी स्थिति में पति बच्चों के संपर्क में भी रहता है. फिर जो स्त्रियां नौकरी करती हैं, वे तो अपने लिए पति से कोई पैसा भी नहीं चाहती हैं. वे, बस, सुकून से जीवन जीना चाहती हैं जैसे नंदिनी शाह चाहती हैं.

सामाजिक दबाव : आज भी तलाकशुदा शब्द समाज में एक धब्बे की तरह देखा जाता है, खासकर महिलाओं के लिए. परिवार, रिश्तेदार और सामाजिक सर्कल में फुसफुसाहटें और जजमैंट तलाक लेने के फैसले को कठिन बना देता है.

न तू मेरा न पराया वाला रिश्ता

40-50 साल की आयु आतेआते स्त्री और पुरुष दोनों की सैक्स भूख लगभग खत्म सी हो जाती है. इस उम्र में वे शांति और सुकून ज्यादा चाहते हैं. ऐसे में यदि एकदूसरे की शक्ल अब अच्छी नहीं लगती या मनभेद और मतभेद अधिक उभर गए हैं तो इस स्थिति में कई कपल बीच का रास्ता चुन लेते हैं. वे कानूनी रूप से विवाहित रहते हैं लेकिन अलगअलग कमरों या घरों में रहते हैं. कुछ पतिपत्नी एक ही घर में रहते हुए भी अलग कमरे में सोते हैं. कुछ अलगअलग शहरों या घरों में रहना पसंद करते हैं. कई मामलों में वे सामाजिक आयोजनों में साथ दिखाई देते हैं लेकिन निजी जीवन में पूरी तरह अलग होते हैं. यह व्यवस्था उन्हें रोजमर्रा के झगड़ों से राहत देती है और एक तरह की व्यवस्थित दूरी बना देती है.

बच्चों पर बुरा असर  

सच यह है कि यह अलगाववादी व्यवस्था एक कम्प्रोमाइज मौडल है- न पूरी तरह अलग, न पूरी तरह साथ. यह उन लोगों के लिए एक अस्थायी राहत हो सकती है जो तलाक के कानूनी, सामाजिक और आर्थिक परिणामों से बचना चाहते हैं. मगर लंबे समय तक इस स्थिति का गहरा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है. वे ऐसे माहौल में बड़े हो रहे होते हैं जहां मातापिता दुनिया को दिखाने के लिए साथ हैं, मगर असलियत में साथ नहीं हैं. ऐसे बच्चे भावनात्मक रूप से बेहद असुरक्षित होते हैं. रिश्तों को ले कर उन का दृष्टिकोण बहुत भ्रमित सा रहता है.

बच्चे स्वभावतया संवेदनशील होते हैं. वे शब्दों से अधिक भावनाओं को पढ़ते हैं. मातापिता के बीच का तनाव, संवादहीनता, ठंडापन या छिपी हुई कड़वाहट, इन सब बातों को वे आसानी से महसूस कर लेते हैं, भले ही उन से कुछ कहा न जाए. जब मातापिता दुनिया के सामने एक आदर्श परिवार का दिखावा करते हैं, लेकिन घर के भीतर संबंध खोखले होते हैं तो बच्चे एक गहरे द्वंद्व में फंस जाते हैं.

ऐसे में आगे आने वाले समय में वे किसी पर भरोसा नहीं कर पाते यहां तक कि वे अपने जीवनसाथी के साथ भी अच्छे से कनैक्ट नहीं हो पाते हैं. उन के लिए सभी रिश्ते बड़े उथलेउथले से होते हैं. कई बार बच्चे मांबाप के अलगाव के लिए खुद को दोषी सम?ाने लगते हैं. उन्हें लगता है कि शायद उन की किसी गलती या कमी के कारण घर का माहौल बिगड़ा है. वे ग्लानि और हीनभावना

से ग्रस्त हो जाते हैं, जो उन के आत्मविश्वास और व्यक्तित्व विकास पर गहरा असर डालता है.

यह समझना जरूरी है कि बच्चे सिर्फ भौतिक सुविधाओं से नहीं, बल्कि स्वस्थ भावनात्मक वातावरण से विकसित होते हैं. मातापिता का साथ होना तभी सार्थक है जब उस में सच्चाई, सम्मान और संवाद हो. केवल सामाजिक छवि बनाए रखने के लिए एक टूटे हुए रिश्ते को ढोना, दरअसल बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है.

समाधान आसान नहीं है, लेकिन स्पष्ट है कि या तो रिश्ते को ईमानदारी से सुधारने की कोशिश की जाए, या फिर सम्मानजनक और स्पष्ट अलगाव का रास्ता अपनाया जाए. आधेअधूरे रिश्ते बच्चों को पूरा नहीं बना सकते. बच्चों को एक परफैक्ट परिवार नहीं, बल्कि एक सच्चा और स्वस्थ माहौल चाहिए होता है, जहां रिश्ते दिखावे के नहीं, बल्कि विश्वास और भावनात्मक सच्चाई पर टिके हों. Marriage Problems

 

अर्थव्यवस्थाओं में 2 रैंक कम – अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत की बड़ी नाकामी

Global Economy: आईएमएफ यानी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की अप्रैल 2026 की ‘वर्ल्ड इकोनौमिक आउटलुक रिपोर्ट’ ने एक बार फिर मोदी सरकार की सच्चाई उजागर कर दी है. भारत अब दुनिया की टौप-5 सब से बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की लिस्ट से बाहर हो चुका है. आईएमएफ के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में भारत का नौमिनल जीडीपी करीब 4.15 ट्रिलियन डौलर ही रहने वाला है.

आईएमएफ की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की टौप सब से बड़ी इकोनौमी में पहले नंबर पर अमेरिका है जिस की इकोनौमी 32.38 ट्रिलियन डौलर है. दूसरे नंबर पर है चीन जिस की इकोनौमी 20.85 ट्रिलियन डौलर है. 5.45 ट्रिलियन डौलर इकोनौमी के साथ जरमनी तीसरे नंबर पर है. चौथे नंबर पर जापान है जिस की इकोनौमी 4.38 ट्रिलियन है और ब्रिटेन 5वें पायदान पर है जिस की अर्थव्यवस्था 4.26 ट्रिलियन अमेरिकी डौलर है.

सिर्फ एकदो साल पहले मोदी सरकार विश्व की चौथी या 5वीं सब से बड़ी अर्थव्यवस्था का ढोल पीटने में लगी थी लेकिन अब भारत टौप-5 से भी बाहर हो गया है. डौलर के मुकाबले रुपया का लगातार कमजोर होना और जीडीपी बेस ईयर का बदलाव इस की वजहें हैं. इस मामले में भारत अब 6ठे नंबर पर आ गया है.

आईएमएफ और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मोदी काल में औसत विकास दर 6.8 फीसदी के आसपास रही. कोविड महामारी, नोटबंदी, जीएसटी के झटके और बेरोजगारी को छोड़ दें तो भी यह यूपीए से कम है. फिर भी मोदी सरकार ने 10 साल तक मनमोहन काल की ग्रोथ को अपने प्रचार का हथियार बनाया. ‘हम ने भारत को विश्व की 5वीं बड़ी अर्थव्यवस्था बना दिया’, नरेंद्र मोदी का यह नारा उन के लगभग हर भाषण में गूंजता रहा लेकिन आईएमएफ की नई रिपोर्ट ने प्रचार के इस गुब्बारे को पंचर कर दिया.

प्रतिव्यक्ति आय में असल में भारत 180-182 देशों में नीचे से 20-25वें स्तर पर रहता है. बस, 143 करोड़ लोगों का देश होने की वजह से भारत बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से है. यह रैंकिंग ही असल में सिर्फ इतने लाभ की है कि 143 करोड़ लोगों से लिया जाने वाला टैक्स चंद हाथों में इकट्ठा होता है और वे इस का जम कर फायदा उठा रहे हैं.

Short Hindi Stories: असली पापा

Short Hindi Stories: ‘‘घूंघट हटाओ बहू का, मेरी बहू घूंघट नहीं डालेगी.’’ राजीव के पापाजी की इस बात पर मम्मीजी ने उन की ओर भृकुटि चढ़ा कर देखा तो वे आगे बोले, ‘‘वैदेही, बेटी बन कर रहेगी हमारी. बेटियां परदा नहीं करतीं.’’

शादी के बाद विदा हो कर मैं राजीव के घर आ चुकी थी. भारी मैरून रंग की बनारसी साड़ी पहने, मैं तमाम तरह के जेवरों से लदी थी. विदा के आंसू अब भी रहरह कर बह रहे थे. ‘मेरी चिंता मत करना, वैदेही. ससुराल में पूरा मन रमा कर रहना. दीप्तिजी को कोई शिकायत का मौका मत देना. राजीव के मातापिता अब तुम्हारे भी मातापिता हैं.’’ विदाई के वक्त मां ने साड़ी के छोर में कुछ पैसे और चावल रख कर गांठ बांधते हुए मेरे साथ यह बात भी बांध दी थी.

मुझे पता था कि अब यही मेरी नई दुनिया है पर मां भी तो मेरी ही दुनिया थीं. पिता और मां दोनों का दायित्व निभाया था उन्होंने. पिता कैसे होते हैं, क्या होते हैं, इस बात से मैं बचपन से ही अनभिज्ञ थी. मां बताती है कि जब मैं सिर्फ 2 साल की थी तब ही पापा हमें छोड़ कर चले गए थे. उन की उस अंतिम विदाई की, उन के उस निधन की मेरे मस्तिष्क में कोई स्मृति शेष नहीं थी. मैं ने तो बचपन से अपनी मां में ही मां को और पिता को दोनों को देखा था. मेरे सिवा मां का दूरदूर तक कोई न था. आसपड़ोस की महिलाओं से घिरी, मैं चेहरे पर घूंघट डाले, मां की चिंता करती हुई कुछ सोच ही रही थी कि वह ऊंचा स्वर सुनाई दिया था घूंघट उठाने का.

मैं अंदर ही अंदर एक ससुर का यह रूप देख कर संतोष से भर गई. उस दिन से आज तक मैं ने पापाजी से कभी परदा नहीं किया. वे हर विषय पर मुझ से खुल कर बातें करते. मेरी पसंदनापसंद की सब्जियां लाते. वे हर संभव प्रयास करते कि वे मुझे वह सबकुछ दे सकें जो एक पिता एक बेटी को देता है.

मांजी भी बहुत अच्छी थीं पर उन के चेहरे से मैं यह भांप लेती थी कि उन्हें एक बहू का बहू की तरह रहना ही पसंद है. एक दिन की बात है जब पापाजी ने मुझे एमएड करने की सलाह दी, ‘वैदेही, तुम बीएड तो हो ही, शिक्षण में तुम्हारी विशेष रुचि भी है तो क्यों न तुम एमएड भी कर लो और उस के बाद अपनी डिग्रियों का उपयोग कर के किसी अच्छे स्कूल में टीचर की नौकरी कर लो.’

दरअसल मेरा मन भी टीचर की जौब करने का था पर संकोचवश मैं चुप रहती थी और फिर राजीव भी यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर थे. उन के जौब के सामने प्राइवेट स्कूल की टीचर की नौकरी करने की मेरी हिम्मत नहीं थी. पर पापाजी ने न जाने कैसे और कब मेरे मन को भांप लिया था. ‘बेटी, कोई भी जौब छोटीबड़ी नहीं होती, जिस काम में मन रम जाए और जिस काम को करने में आनंद मिले वह काम निसंकोच कर लेना चाहिए.’

पापाजी के ये शब्द मेरे मन का साहस बढ़ा देते. मायके में 2 साल तक पढ़ाई के साथसाथ मैं ने टीचिंग की हुई थी. सच में मुझे बच्चों को पढ़ाना बहुत पसंद था. दूसरे दिन ही पापाजी मुझे अपने दोस्त के स्कूल ले गए. उन के दोस्त दुबे अंकल सुलझे व्यक्तित्व के धनी थे. उन्होंने मेरा आवेदन स्वीकारते हुए मुझे फौरन अपने स्कूल में टीचर रख लिया. पति राजीव को यह जान कर खुशी हुई.

मम्मीजी को मेरी नौकरी से कोई खास एतराज नहीं था. शुरू में तो सब ठीक से चलता रहा पर जैसे ही मम्मीजी पर घर के कामों का भार पड़ा, वे चिढ़ीचिढ़ी सी रहने लगीं. ‘‘सारा घर नौकरों के हवाले कर दो. अरे, नौकर घर नहीं चलाया करते, वे सिर्फ मदद करते हैं. घर तो घर की औरतें ही चलाती हैं.’’ वे बड़बड़ातीं तो पापाजी उन्हें समझ कर कहते, ‘‘अरे, मुझे भी कोई काम दे दिया करो, लाओ तुम्हारी सब्जी काट दूं, सब मिलजुल कर काम करेंगे तो हो जाएगा, इतना परेशान क्यों होती हो राजीव की मां.’’

‘‘आप को तो कुछ दिखता नहीं. बस, बैठेबैठे ज्ञान के मोती लुटाते रहते हो. अरे, कब तक नौकरी करा लोगे अपनी बहू से, कल को बालबच्चा होगा, तो छोड़नी ही पड़ेगी न नौकरी. फिर यह चार दिन नौकरी कर के क्या पा लेगी बहू.’’

‘‘वाह, दीप्तिजी, यह सही कही, जैसे सारी नौकरीपेशा महिलाएं मां ही नहीं बनतीं, किस जमाने में रह रही हो तुम राजीव की मां?’’

वे पैर पटकती हुई गुस्से में बात को टालती वहां से चली तो जातीं पर मेरे भीतर कई सवाल छोड़ जातीं. कभी लगता कि छोटी सी ही तो नौकरी है, छोड़ दूं तो क्या? फिर पापाजी मनोबल बढ़ा देते और मैं नई ऊर्जा के साथ स्कूल की ओर चल देती. मेरा मन जब भी बुझबुझ सा होता, पापाजी मायके से मां को बुला लेते. मम्मीजी और पापाजी सहित राजीव भी उन का खूब खयाल रखते. मैं अपनी प्यारी सी ससुराल को देख कर बारबार अपने समय को सराहती. देखते ही देखते पापाजी के प्रोत्साहन और मेरी मेहनत के चलते मेरी सरकारी स्कूल में नौकरी लग गई.

राजीव की मम्मी का तो पता नहीं लेकिन पापाजी और राजीव इस बात से बहुत खुश हुए. मैं सुबह जल्दी उठती, बहुत हद तक घर के काम समेटती और फिर उस के बाद स्कूल चली जाती. घर के सभी लोग बराबर से घर के काम करते. अब तो धीरेधीरे मम्मीजी भी बदलने लगी थीं. उन के ताने अब न के बराबर हो गए थे.

सब आराम से चल ही रहा था कि एक रात पापाजी की तबीयत बिगड़ गई. हम आननफानन उन्हें अस्पताल ले गए. उन्हें तुरंत आईसीयू में एडमिट कर लिया गया. डाक्टर ने बताया कि उन्हें सीरियस हार्टअटैक आया है. अभी कंडीशन काफी खराब है. कुछ कहा नहीं जा सकता. यह सुन कर मैं सुन्न पड़ गई. मम्मीजी और राजीव की भी हालत खराब थी. राजीव यहां से वहां दौड़ते, कभी इंजैक्शन और दवा लाते तो कभी बैंच पर बैठ कर रोंआसे हो जाते. मैं उदास बैठे राजीव की ओर देखती तो उन में मैं 2 साल की उस वैदेही को खोजती जो मेरी स्मृति? में कहीं थी ही नहीं. आज मु?ो महसूस होता कि जिस वक्त मेरी मां ने पापा को खोया होगा उस वक्त क्या बीती होगी उन पर. यहां अस्पताल का माहौल बहुत डरावना था. आतेजाते उदास चेहरों के बीच में मैं मम्मीजी को संभालती.

देखतेदेखते रात बीत चुकी थी. सुबह आईसीयू से बाहर डाक्टर आ कर बोले, ‘‘तबीयत में अब कुछ सुधार है पर अभी भी उन्हें आईसीयू में ही रखेंगे. आप लोग चाहें तो उन से मिल सकते हैं.’’ हम तीनों एकएक कर के पापाजी के पास गए. मैं जब उन के पास गई तो वे रो पड़े, ‘‘वैदेही, अगर मु?ो कुछ हो जाए तो राजीव और उस की मां का खयाल रखना.’’

‘‘आप को कुछ नहीं होगा, पापाजी. आप की बेटी आप को कुछ नहीं होने देगी, पापाजी.’’

कांपती आवाज में वे बहुत धीमेधीमे बोले, ‘‘तू तो है ही मेरी प्यारी बिटिया, मुझे हमेशा एक बेटी की चाह थी, पर राजीव का जन्म इतनी मुश्किल से हुआ कि आगे डाक्टर ने हमें संतान न करने की सख्त हिदायत दे दी, पर जिस दिन से तुम्हारे कदम हमारे घर में पड़े उस दिन से मुझे यह एहसास हुआ कि प्रकृति को हमें तेरी जैसी प्यारी सी बहू देनी थी, इसलिए उस ने हमें बेटी नहीं दी.’’

‘‘पापाजी, मुझे भी बचपन से पापा कहां मिले. मुझे तो अपने पापा का चेहरा तक याद नहीं. आप ही से मुझे पता चला कि पापा होते क्या हैं, अब मुझे कभी मत छोड़ना पापाजी,’’ यह कहती हुई मैं उन की कांपती हथेली पकड़ कर रो पड़ी तो नर्स ने मुझे आईसीयू से बाहर जाने का इशारा किया.

पापा से बात करने के बाद मैं और भावुक हो गई थी. पापा नहीं होंगे तो? बिना पापा के वह घर कैसा होगा? मैं ऐसी कल्पना कर के भी सिहर जाती. अगले 3 दिनों तक पापा अस्पताल में रहे. तीनों दिन मैं बराबर वहीं रही उन्हें के पास. राजीव मम्मीजी को रात को घर छोड़ आते और दोपहर उन्हें ले आते.

हमारे वे 3 दिन बहुत मुश्किल से कटे पर आखिरकार पापाजी ठीक हो कर घर आ गए. वे पहले से काफी कमजोर हो गए थे. मम्मीजी की तबीयत भी कुछ ठीक न थी. वे मानसिक और शारीरिक रूप से काफी थक गई थीं. उन दिनों मैं ने स्कूल से छुट्टियां ले रखी थीं. पापाजी का मैं जीजान से खयाल रख रही थी. मम्मीजी भी अब ठीक थीं. वे मेरा सेवाभाव देख कर गदगद थीं. पापाजी कुछ ही दिनों में बिलकुल स्वस्थ हो गए थे. सबकुछ जैसा था वैसा ही चल पड़ा था.

मम्मीजी मुझे बहुत ज्यादा प्यार करने लगी थीं. उन्होंने मेरी मां को भी यहीं रहने को बुला लिया था. मुझे 2 मांओं और एक पिता का भरपूर प्यार मिल रहा था. कहते हैं, ससुर कभी पिता नहीं बन सकते और बहू कभी बेटी नहीं बन सकती. पर यहां ससुर पिता से भी बढ़ कर थे और बहू बेटी से भी बढ़ कर थी.

‘‘वैदेही, बेटी, कब से स्कूल की छुट्टी ले कर बैठी हो, कल से स्कूल जाओ.’’ पापाजी मु?ो बिलकुल वैसे ही डांट रहे थे जैसे अमूमन पिता अपनी नन्हीं बच्ची को स्कूल न जाने पर डांटते हैं. मैं ने अपना बचपन बिना पिता के गुजारा था पर आजकल लग रहा था कि जैसे मैं

फिर एक बच्ची हूं जो बिना पिता के नहीं

रह सकती.

अवशेषों से इंसानी विकास का सफर –  हमारे डीएनए में आज भी जारी है ‘लाइव कोडिंग’

पहले माना जाता था कि पिछले 10,000 साल में मनुष्य जाति का विकास लगभग रुक गया होगा क्योंकि खेती के बाद इंसानों की सर्वाइवल चुनौतियां कम हो गईं लेकिन नया अध्ययन इन बातों को खारिज करने के लिए काफी है क्योंकि एवोलुशन अपना काम लगातार कर रहा है. यह शोध नेचर जर्नल में 15 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुआ है. हार्वर्ड मैडिकल स्कूल के डेविड रीच, अली अकबरी और उन की टीम ने 15,836 प्राचीन यूरोपियन लोगों के डीएनए का विश्लेषण किया. इस में उन की टीम को 10,016 नए जीनोम मिले. इस खोज के साथ यह अब तक का सब से बड़ा डीएनए अध्ययन बन गया है.

लगभग 10,000 साल पहले खेती की शुरुआत के बाद नैचुरल सलैक्शन के कारण मनुष्य के 479 जीन वैरिएंट्स नए पाए गए. इस से पहले वैज्ञानिक सिर्फ मुट्ठीभर उदाहरण ही जानते थे. हजारों और वैरिएंट्स पर भी इस का असर पड़ा है. इस खोज से यह पता चलता है कि मनुष्य का एवोलुशन धीमा नहीं पड़ा बल्कि तेज हुआ. खासकर 5 हजार साल के दौरान यानी ब्रौंज एज के बाद से विकास में खासी गति आई है. खेती, पशुपालन, घनी आबादी और नई बीमारियों की वजह से भी नए जीन वैरिएंट्स बने. यह एवोलुशन का जीताजागता सुबूत है.

इंसान के शरीर की इस कोडिंग को देखा जा सकता है, इसलिए इसे ‘लाइव कोडिंग’ कहा जा रहा है जिस का मतलब यह है कि हमारे डीएनए का सौफ्टवेयर आज भी अपडेट हो रहा है. खेती और तकनीक जैसे कल्चरल प्रोग्रैस ने इंसानी विकास को रोका नहीं, बल्कि नई दिशा दी.

सीलिएक रोग का रिस्क म्यूटेशन सिर्फ 4,000 साल पहले का है यानी यह म्यूटेशन पिरामिडों से भी नया है. प्राचीन काल में यह म्यूटेशन संक्रमण से बचाता था लेकिन आज यह औटोइम्यून की समस्या बन गया है. इंसानों में लैक्सेज पर्सिस्टेंस यानी दूध पचाने की क्षमता पशुपालन शुरू होने के बाद आई. पिछले 5 हजार सालों में ही हलकी त्वचा से जुड़े कई वैरिएंट्स बढ़े. टीबी, प्लेग, एचआईवी जैसी बीमारियों से जुड़े जीन बदले. कुछ वैरिएंट्स रोलरकोस्टर की तरह ऊपरनीचे हुए.

इस नई शोध से पता चलता है कि एवोलुशन कभी रुका ही नहीं, यह आज भी जारी है. बीमारियां, जीवनशैली और पर्यावरण हमारे जीनों को आज भी आकार दे रहे हैं. डेटा की भारी मात्रा, 18,000 साल का स्पैन और नए कंप्यूटेशनल मेथड ने उन बारीक सिग्नल्स को पकड़ लिया जो पहले ड्रिफ्ट या माइग्रेशन से छिप जाते थे.

हालांकि, यह अध्ययन वेस्ट यूरेशिया के जिनोम सैंपल्स पर हुए शोध का नतीजा है. एशिया, अफ्रीका सहित दुनिया के बाकी हिस्सों पर अलग डेटा की जरूरत है. इस शोध के बारे में कुछ वैज्ञानिक जटिल ट्रेट्स यानी व्यवहार और बुद्धि पर सलैक्शन के दावों को ले कर अभी संदेह में हैं, फिर भी इतना तो तय है कि इंसानी विकास थमा नहीं है. हमारे डीएनए में अभी भी एवोलुशन का लाइव अपडेट चल रहा है. Short Hindi Stories

लेखक – पूर्ति खरे

 

साइलैंट किलर है ब्लडप्रैशर – धरमकरम भी एक कारण 

Health Awareness: ब्लडप्रैशर को यों ही साइलैंट किलर नहीं कहा जाता. अगर यह इतनी ही तेजी से छूत के रोग की तरह फैलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब यही सोचसोच कर लोगों का ब्लडप्रैशर हाई होने लगेगा कि जब सब को है तो मु झे क्यों नहीं. वक्त रहते अगर इस का इलाज और नियंत्रण न किया जाए तो कई जानलेवा और लाइलाज बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, मसलन जिंदगीभर साथ रह कर रुलाती रहने वाली डायबिटीज, दिल से जुड़ी सब से खास बीमारी हार्टअटैक के अलावा जानलेवा हार्टफैलियर, ब्रेनस्ट्रौक, किडनी रोग, रेटिनोपैथी जैसी आंख की बीमारी, पैर की नसों की पेरिफेरल आर्टरी डिजीज और खासतौर से पुरुषों में सैक्स कमजोरी.

सीधा सा मतलब यह कि एक अकेला ब्लडप्रैशर ढेर सारी बीमारियों का दरवाजा या जनक है, इसलिए सब से पहले इस से ही बच कर रहा जाए ताकि दूसरी बीमारियों के खतरे काफी कम हो जाएं. इस से बचा कैसे जाए, इस से पहले यह जान लेना जरूरी है कि यह बीमारी है क्या और कैसे होती है. इस के नाम का संधिविच्छेद करें तो सीधा सा मतलब यह निकलता है कि हमारी रगों में दौड़ते खून का नसों की दीवारों में दबाव.

जब भी कोई इस की चपेट में आता है या जिस का इस से पहली बार वास्ता पड़ता है तो 2 नंबर सामने आते हैं 120/80 जो सामान्य स्वस्थ व्यक्ति का नौर्मल ब्लडप्रैशर होता है. मशीन से जांच करने पर यानी रीडिंग लेने पर ये नंबर कमज्यादा होते हैं तो वे ब्लडप्रैशर होने का इशारा होते हैं.

पहला या ऊपरी नंबर उस स्थिति का है जब दिल सिकुड़ कर खून पंप करता है. इसे सिस्टोलिक कहते हैं. उलट इस के, नीचे वाले नंबर, जिसे डायस्टोलिक कहते हैं, दिल को रिलैक्स करने का संकेत होता है.

ये नंबर अपने पैरामीटर से कमज्यादा होते हैं. सम झ लीजिए, ब्लडप्रैशर ने आप को भी जकड़ लिया है. जब यह रीडिंग 120/80 से ऊपरनीचे हो तो सचेत हो जाना चाहिए क्योंकि रीडिंग के इस से ज्यादा होने को हाइपरटैंशन कहा जाता है जो आजकल बहुत आम शब्द है. ब्लडप्रैशर से ताल्लुक रखती एक अहम बात, जो सभी को याद रखनी चाहिए, यह है कि ऊपर वाले नंबर में से नीचे वाले को घटाने पर अंतर 40 आए तो वह नौर्मल है. उदाहरण, 120-80 = 40, इसे पल्स प्रैशर कहा जाता है. लेकिन 130/90 आए तो मामला थोड़ा गड़बड़ है कि दोनों ही बढ़े हुए हैं लेकिन यह बहुत बड़ा खतरा नहीं है.

इसे और आसानी से सम झने के लिए रीडिंग के कुछ उदाहरण देखते हैं. मान लीजिए, आप का ब्लडप्रैशर 140/100 आया तो भी अंतर 140-100 = 40 रहेगा लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि यह सुरक्षित है.

असल में दोनों ही नंबर पिछली रीडिंग के मुकाबले अपनी नौर्मल रेंज से 20-20 ऊपर हैं, इसलिए यह खतरे का संकेत है जिसे हलके में नहीं लिया जाना चाहिए. हां, यही रीडिंग 130/70 है तो अंतर 60 हुआ जिसे मैडिकल साइंस नौर्मल ही मानती है क्योंकि दोनों ही अपनी नौर्मल रेंज से महज 10-10 ही ज्यादा हैं.

खतरा तब होता है जब ये दोनों या इन में से कोई एक भी 20 या उस से ज्यादा हो. अब मान लीजिए कि रीडिंग 140/120 आती है तो अंतर यानी पल्स प्रैशर 20 है जिस में डायस्टोलिक काफी बढ़ा हुआ है. यह खतरनाक रेंज है, इसलिए तुरंत इलाज शुरू कर देना चाहिए. पल्स प्रैशर 20 या उस से कम होने का मतलब यह होता है कि ब्लड सर्कुलेशन नौर्मल नहीं है और खून नसों पर असामान्य दबाव डाल रहा है. इसी तरह पल्स प्रैशर 80 हो तो भी बात खतरे की होती है.

इस स्थिति से साबित होता है कि नसें सख्त हो रही हैं, जिस के चलते दिल को खून पंप करने में ज्यादा जोर लगाना पड़ रहा है. यह भी खतरनाक स्थिति होती है जो ज्यादा दिनों तक बनी रहे तो स्ट्रोक में तबदील हो सकती है. पल्स प्रैशर के अंतर से ब्लडप्रैशर की स्थिति सम झने पर काफी गलतफहमियां और डर दूर होते हैं, इसलिए इस अंतर को हमेशा याद रखना चाहिए- 30 से 40 पल्स प्रैशर हो तो यह सामान्य है,

40 से 50 में भी ठीकठाक माना जाता है लेकिन 50 से 60 में हलका खतरा और  60 से 80 का मतलब है हाई रिस्क और पल्स प्रैशर 80 से ज्यादा का मतलब होता है बहुत बड़ा खतरा मंडरा चुका है और तुरंत इलाज जरूरी है.

ऐसे में यह देख लेना चाहिए कि अगर दोनों नंबर ज्यादा हैं और पल्स प्रैशर 50 से ऊपर है तो सजग रहना है. यही बात दोनों के ज्यादाकम होने पर भी लागू होती है, मसलन 90-60 = 30 लेकिन दोनों के कम होने पर खासतौर से मोटे लोगों में यह सुरक्षित नहीं. इसे लो ब्लडप्रैशर कहा जाता है जिस का दूसरा नाम हायपरटैंशन है. इस में चक्कर आना, कमजोरी महसूस होना, आंखों के आगे अंधेरा छाना और बेहोशी जैसा लगना खास लक्षण हैं.

धर्म से भी होता है ब्लडप्रैशर

ज्यादा नमक खाने से ब्लडप्रैशर होता है, यह लगभग सभी जानते हैं.  इसी तरह ज्यादा स्मोकिंग व चायकौफी पीने के अलावा नींद की कमी भी इस की जिम्मेदार होती है. तनाव, चिंता, गुस्सा भी बीपी बढ़ाते हैं. अगर आप ज्यादा मीठा खा रहे हैं तो बीपी के साथसाथ डायबिटीज होने का भी खतरा बढ़ जाता है. वहीं, बदलती लाइफस्टाइल भी ब्लडप्रैशर होने की आजकल अहम वजह है. कम मेहनत यानी कम शारीरिक गतिविधि या रोजाना व्यायाम न करने के अलावा प्रोसैस्ड और पैकेज्ड फूड से भी यह बढ़ता है.

एक अहम वजह जो लोगों की रोजमर्रा? जिंदगी से जुड़ी है वह है धरमकरम, जिस के चलते कब और कैसे ब्लडप्रैशर घेर लेता है, यह लोगों को सम झ नहीं आता क्योंकि हर किसी ने यह गलतफहमी पाली हुई है कि जो धर्म सुख, शांति और पैसे के साथसाथ सेहत भी देने का दावा और वादा करता है वह भला कैसे बीमार कर सकता है. भगवान का तो काम है भक्तों का कल्याण और उद्धार करना तो रोगों और बीमारियों से बचाने की जिम्मेदारी भी उसी की है. हकीकत इस के उलट और कड़वी है जिसे एकएक कर सम झें तो सम झ आ जाता है कि पूजापाठ, व्रतउपवास वगैरह से भी ब्लडप्रैशर बढ़ता है.

क्या फायदा ऐसे धरमकरम से

तो क्या फायदा ऐसे धरमकरम से जिस के धुएं और व्रतउपवास से साइलैंट किलर ब्लडप्रैशर आप का जीना मुहाल कर दे. अलावा इस के, धर्म के सख्त रीतिरिवाज और हिदायतें स्ट्रैस देने वाले होते हैं, उन से भी ब्लडप्रैशर बढ़ सकता है. ये वजहें आप के हाथ और नियंत्रण में हैं. ?

साल 2025 में डब्ल्यूएचओ की ग्लोबल रिपोर्ट औन हायपरटैंशन यानी ब्लडप्रैशर के मुताबिक, 30 से ले कर 79 साल तक की उम्र वाले कोई 21 करोड़ लोग ब्लडप्रैशर से पीडि़त थे. हैरानी और परेशानी की बात यह थी कि इन में से महज 39 फीसदी यानी 8 करोड़ 19 लाख को ही अपनी

इस बीमारी के बारे में जानकारी थी और 17 फीसदी यानी 3 करोड़ 57 लाख का ही ब्लडप्रैशर कंट्रोल में पाया गया. थोड़ी सी भिन्नता के साथ कई एजेंसियों के अलगअलग सर्वे इस की पुष्टि करते हैं. आज के दौर में भले ही ब्लडप्रैशर को साइलैंट किलर कहा जाता है पर अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव ला कर इस पर कंट्रोल पाया जा सकता है.

जहरीले धुएं से होने वाले नुकसान 

हर कोई रोज पूजापाठ करता है और माहौल में पवित्रता व खुशबू के लिए अगरबत्ती और दीया जरूर जलाता है क्योंकि ये पूजापाठ के अनिवार्य आइटम हैं. दीए के धुएं में बहुत बारीक कण पीएम 2.5 माइक्रोन आकार के होते हैं जिन में प्रमुखता से कार्बन और दूसरी गैसें होती हैं.

प्रदूषण फैलाने वाली ये गैसें पैट्रोल और डीजल के धुएं में भी होती हैं. ये कण बालों के आकार से 30 गुणा तक छोटे होते हैं जो न केवल फेफड़ों में जलन पैदा करते हैं बल्कि औक्सीजन की मात्रा भी कम करते हैं. कई बार इस से शरीर में सूजन भी आ जाती है. इस सब से होता यह है कि दिल और रक्त वाहिकाओं यानी खून दौड़ाने वाली नसों में दबाव पैदा होता है, जिस से ब्लडप्रैशर बढ़ता है.

इतना ही नहीं, इन बारीक कणों से कैंसर तक भी हो सकता है. ये बारीक कण, दरअसल नाक और गले के फिल्टरों को आसानी से पार कर जाते हैं और वहां से सीधे फेफड़ों के अंदरूनी हिस्से तक पहुंच जाते हैं और खून में घुल कर पूरे शरीर में फैल कर नुकसान पहुंचाते हैं. डब्ल्यूएचओ और इंटरनैशनल एजेंसी फौर रिसर्च एंड कैंसर की मानें तो पीएम 2.5 कैंसर पैदा करने वाले कारणों या कारकों में से एक है जिसे सिगरेट के धुएं की कैटेगरी में रखा गया है. इस से ब्रेस्ट कैंसर और लंग कैंसर के अलावा पाचनतंत्र के कैंसर का भी खतरा रहता है. साल 2025 में चीन में हुई एक स्टडी के मुताबिक, पीएम 2.5 से ब्रेस्ट कैंसर के मामले बढ़े हैं.

इस स्टडी को बहुत दमदार और मजबूत इसलिए भी माना जाता है कि यह चीन के अलगअलग इलाकों की 2 लाख 81 हजार महिलाओं पर की गई थी. जिन महिलाओं पर यह स्टडी की गई थी उन की 11 साल तक निगरानी की गई थी. स्टडी में पाया यह भी गया था कि जैसे ही पीएम 2.5 बढ़ता है वैसेवैसे कैंसर का खतरा भी बढ़ता जाता है. यह पीएम 2.5 शरीर में जा कर इम्युनिटी को कमजोर करता है, डीएनए को तोड़ता है, सूजन बढ़ाता है और हार्मोंस का बैलेंस बिगाड़ता है.

भारत में घरघर में पूजाघर हैं और अधिकतर बहुत छोटी या संकरी जगह में होते हैं जिन में अगरबत्ती और दीये का धुआं काफी देर तक भरा रहता है. यह धुआं सांसों के साथ अंदर तक जाता है जिस से ब्लडप्रैशर का प्रसाद बिना मांगे मिल जाता है. और इन बारीक कणों के बढ़ने पर कैंसर भी हो सकता है. यह खतरा इसलिए भी बढ़ता है क्योंकि पूजापाठ करने वाले अधिकतर, खासतौर से बुजुर्ग, लोग घंटों भगवान के सामने बैठे रहते हैं. उन्हें कोई भगवान या उस का एजेंट यह नहीं बताता कि इस पवित्र धुंए से बीपी के अलावा सांस से ताल्लुक रखती बीमारियां भी हो सकती हैं, लिहाजा, इस से दूर रहो.

व्रतउपवास के खतरे

पूजापाठ के बाद सब से अहम धार्मिक काम या आचरण व्रत व उपवास रखना है. ये भी ब्लडप्रैशर पर असर डालते हैं, उसे बढ़ा भी सकते हैं और कम भी कर सकते हैं. लगातार घंटों भूखे रहने से ब्लडप्रैशर कम होता है जिस से थकान व कमजोरी आना आम बात है. कई तो चक्कर खा कर गिर भी पड़ते हैं, यह लो बीपी में होता है.

अधिकतर डाक्टर धार्मिक आस्थाओं के लिहाज के चलते यह तो नहीं कह पाते कि व्रतउपवास मत करो लेकिन इसी बात को वे दूसरे तरीके से कहते हैं कि 4-6 घंटे के अंतर से थोड़ाथोड़ा कुछ खाते रहो. यह व्रतियों के लिए मुमकिन नहीं होता क्योंकि व्रतउपवास तो 24 घंटे का होता है.

पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा उपवास रखती हैं. इसलिए वे ज्यादा कमजोरी और थकान का शिकार रहती हैं लेकिन मजाल है कि भगवान और धर्म के नियमों से हट कर वे कुछ सोच और बिना इन के जी सकें. जहां आस्था सिर पर सवार हो जाती है वहां तर्क और व्यावहारिकता गौण हो जाते हैं.

भक्त को भूखा रख कर कौन सा भगवान प्रसन्न होता है, यह तो भगवान, कहीं हो तो वही जाने या व्रतउपवास की महिमा गाते रहने वाले उस के दलाल जानें लेकिन वैज्ञानिक सच यह है कि एक हिंदू महिला साल में औसतन 100 दिन व्रतउपवास करती है. पहले तो वह भूखे रह कर ब्लडप्रैशर गिराती है, फिर व्रतउपवास खत्म होने पर तरहतरह के पकवान ठूंसठूंस कर खाती है जिन में चीनी और नमक खासी मात्रा में होते हैं. इन आइटमों से बीपी बढ़ता है. यह सिलसिला चलता रहे तो ब्लडप्रैशर परमानैंट हो जाता है.

नवरात्र के दिनों में लगातार 9 दिन व्रत करना ‘आ बीपी मु झे घेर’ जैसी बात है. फलाहार के नाम पर खूब सा मीठा और साबूदाने वाले आइटम ब्लडप्रैशर बढ़ाने वाले होते हैं. ज्यादा मीठा और शक्कर यानी हाई कैलोरीज से डायबिटीज का खतरा भी बढ़ जाता है क्योंकि इस से नसें सख्त होने लगती हैं और पल्स प्रैशर भी बढ़ता है जो हाई बीपी की बड़ी वजह होता है. दूसरे, डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, एक दिन में 6 चम्मच से ज्यादा शक्कर खाने से इंसुलिन बढ़ता है. नतीजतन, शरीर नमक यानी सोडियम रोकने लगता है जिस में बीपी का बढ़ना तय है.

व्रतउपवास के दिनों में एक बड़ा खतरा चायकौफी का रहता है जो बड़े शौक से व्रतउपवास वाले बारबार खाली पेट पीते हैं ताकि भूख मर जाए और शरीर को एनर्जी यानी कैलोरी मिलती रहे जो तात्कालिक तौर पर मिलती भी है. डाक्टर व वैज्ञानिक मानते हैं कि एक दिन में 2-3 कप चाय पीने से कोई खास नुकसान नहीं होता लेकिन जैसेजैसे यह कप संख्या बढ़ती जाती है वैसेवैसे ब्लडप्रैशर का जोखिम भी बढ़ता जाता है. 4 कप से ज्यादा चाय पीने से बीपी बढ़ना शुरू हो जाता है. भले उस से ब्लडप्रैशर की रीडिंग में 5-10 का ही फर्क आए लेकिन आता जरूर है.

जब यही चाय उपवास के दिनों में खाली पेट पी जाती है तो बीपी का बढ़ना तय होता है जिसे ब्लडप्रैशर मशीन से घर पर नाप कर कोई भी जांच सकता है. असल में चाय में मौजूद कैफीन तेजी से पेट में घुलती है. इस से एसिड बनता है यानी एसिडिटी होती है, जिस से घबराहट होना शुरू हो जाती है और दिल की धड़कन भी बढ़ती है.

बच्चे भी ब्लडप्रैशर की चपेट में 

ब्लडप्रैशर के बारे में एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई है कि अब बच्चों में भी ब्लडप्रैशर होने लगा है. अगर कई अध्ययनों की सा झा रिपोर्ट पर गौर करें तो 4.1 फीसदी बच्चों को बीपी है, 8 से 13 फीसदी प्री हायपरटैंशन की रेंज में थे. इन्हें आगे कभी भी ब्लडप्रैशर हो सकता है. इस तरह के आंकड़ों, जो कई अध्ययनों और सर्वे पर आधारित होते हैं, को पूल्ड अनुमान कहते हैं.

इसी तरह के एक मेटा विश्लेषण के मुताबिक, टीनऐजर्स यानी किशोरों में ब्लडप्रैशर तेजी से बढ़ रहा है. 10 से 19 साल की उम्र तक के लगभग 7.6 फीसदी किशोर बीपी की चपेट में आ चुके हैं. शहरी मोटे बच्चों में यह दर 20 फीसदी तक पाई गई. ये सर्वे और आंकड़े चिंताजनक हैं, इसलिए इस में शामिल होने से खुद को और बच्चों को बचाया जाना जरूरी है. Health Awareness

छद्म नैतिकता खा रही अकेलों की आजादी

Social Stories: लखनऊ के त्रिवेणीनगर की रहने वाली पूजा मिश्रा की शादी 22 साल की उम्र में हुई थी. वह उस समय प्राइवेट कंपनी में एमबीए करने के बाद जौब कर रही थी. उस का पति निखिल बरेली में रहता था. उस का अपना बिजनैस था. शादी के बाद पूजा ने अपनी नौकरी छोड़ दी और ससुराल में रहने लगी. शादी के 2 साल तक दोनों में अच्छी निभ रही थी. इस बीच पूजा एक बेटी की मां बन गई. पूजा के अनुसार बेटी होने के बाद से ही पति और उस के परिवार के लोगों ने मारपीट और  झगड़ा करना शुरू कर दिया. यह बात पूजा ने अपने मातापिता को बताई.

पूजा की एक छोटी बहन भी थी. वह भी शादी योग्य थी. पूजा के मातापिता चाहते थे कि जब तक पूजा की छोटी बहन की शादी न हो जाए, वह अपनी ससुराल में कोई अनबन न करे. पूजा ने बहन की शादी तक सहन किया. इस के कुछ ही माह के बाद अपनी एक साल की बेटी को ले कर लखनऊ चली आई. पूजा 2-3 माह अपने मातापिता के साथ रही. वह कहती है कि उस के मातापिता इस से खुश नहीं थे. मातापिता के घर रह कर पूजा ने अपने लिए नौकरी तलाश करनी शुरू की. एक सौफ्टवेयर कंपनी में 30 हजार रुपए माह की उस की नौकरी लग गई.

पूजा ने उसी कालोनी में किराए पर मकान लिया जिस में उस के मातापिता रहते थे. इस की वजह यह थी कि पूजा अपनी बेटी को अपनी मां के पास छोड़ जाती थी. जब नौकरी से वापस आती, बेटी को ले जाती थी. पूजा बताती है, ‘हम ने किराए का मकान लिया पर उस में जरूरत के सामान जुटाने में कई माह का वक्त लगा. कमरे में एक सोफा था, उसी पर मांबेटी सो लेते थे. अपने मातापिता पर बो झ मैं नहीं बनाना चाहती थी.’ पति से पूजा ने आपसी सहमति के आधार पर तलाक ले लिया था.

30 साल की उम्र तक पूजा शादी, बच्चा, तलाक और घर से बाहर रहने के हालत  झेल चुकी थी. एक ही कालोनी में रहने के फायदे और नुकसान दोनों थे. पूजा ने कुछ माह तो उस कालोनी में गुजारे पर जैसे ही बेटी का एडमिशन प्ले स्कूल में हुआ, वह मातापिता की कालोनी छोड़ कर अपने औफिस के पास एक अपार्टमैंट में रहने लगी. पूजा कम उम्र की थी, तलाकशुदा थी तो हर कोई उसे लुभाने के चक्कर में रहता था. ऐसे में पूजा अपने किसी पुरुषमित्र से मिलने से कतराती थी. अगर मजबूरन किसी को बुलाना पड़े तो वह क्लब हाउस में बुलाती थी.

उसे लगता था कि जैसे ही आसपास के लोगों को यह पता चलेगा कि कोई मु झ से मिलने आता है तो वे तमाम तरह की बातें बनाने लगेंगे. ऐसे में उसे यह कालोनी भी छोड़नी पड़ सकती है. इस से बचने के लिए उस ने एतिहात बरतनी शुरू कर दी. पूजा कहती है, ‘छद्म नैतिकता वाले लोगों के चलते मैं उन को ही अपने घर लाती हूं जो मेरी तरह सिंगल न हो. मैं खुद कहीं जाती हूं तो अपनी बेटी को ले कर जाती हूं.’

अकेले रहने वालों की बढ़ती संख्या

समाज में अकेले रहने वालों की संख्या बढ़ रही है. इस में तलाकशुदा लड़केलड़कियां तो हैं ही, जिन्होंने शादी नहीं की है, वे भी हैं. अकेले रहने वाली लड़कियां खासतौर पर निशाने पर रहती हैं. इस के अलावा जो लड़के अकेले रहते हैं वे अपनी महिलामित्र को लगातार अपने फ्लैट पर बुलाना चाहें तो दिक्कत होती है. आमतौर पर ऐसे लड़केलड़कियां अपने आसपास रहने वालों से अधिक घुलतेमिलते नहीं हैं.

छद्म नैतिकता का असर यह है कि चाहे किसी महल्ले के छोटे से कमरे में किराए का मकान ले कर रहना हो या फिर किसी बड़ी कालोनी या अपार्टमैंट में, अड़ोसपड़ोस में रहने वाले लोग आंखें गड़ाए रहते हैं. उन की निगाहों के आगे सीसीटीवी भी फेल होता है.

सोशल मीडिया पर इस तरह की समस्या को ले कर तरहतरह के मीम्स बनते रहते हैं. इस से यह साफ पता चलता है कि अकेले रहने वाले लोग किसकिस तरह से छद्म नैतिकता वाले लोगों से परेशान हैं.

बैचलर है तो नो इंट्री

कई अपार्टमैंट ऐसे हैं जहां अकेले और खासकर कुंआरे यानी बैचलर्स को रहने के लिए घर नहीं दिए जाते. भारत में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां बैचलर्स, छात्र, कामकाजी पेशेवर यहां तक कि अकेली महिलाओं को भी किराए पर घर देने में मना कर दिया जाता है. सामान्यतौर पर हाउसिंग सोसाइटी के नियम लिखित रूप से ऐसा कुछ नहीं कहते हैं. व्यावहारिक रूप से छद्म नैतिकता को बढ़ावा देने वाले लोग इस तरह के नियम बना लेते हैं.

किसी भी फ्लैट या मकान को किराए पर देने का अधिकार उस के मालिक के पास होता है, न कि सोसाइटी के पास. इस के बाद भी रैजिडैंट वैलफेयर एसोसिएशन में बैठे छद्म नैतिकता वाले लोग मकान मालिक पर भी मनमानी करने वाला काम करते हैं. उन का तर्क होता है कि कुंआरे लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. वे अपनी महिला मित्रों को बुला सकते हैं जिस से आसपास का माहौल खराब होता है.

लखनऊ के यमुना अपार्टमैंट में रहने वाला नरेश यादव अपनी महिला मित्र प्रिया को बुलाता था. एक दिन एक दूसरी महिला रानी प्रकाश वहां आई जिस ने यह दावा किया कि नरेश उस का पति है, उसे छोड़ कर प्रिया के साथ रह रहा है. अपार्टमैंट में हंगामा होने लगा. पुलिस आई, नरेश और प्रिया को थाने ले गई. बाद में दोनों को निजी मुचलके पर इस शर्त के साथ छोड़ा कि अब वे यमुना अपार्टमैंट में रहने को नहीं जाएंगे.

कुंआरे लोगों को किराए पर घर या फ्लैट न दिए जाने के पीछे सब से बड़ी वजह छद्म नैतिकता वाले विचार हैं. मकान मालिक अकसर मानते हैं कि कुंआरे लड़केलड़़कियां देररात तक पार्टियां करते हैं, शोर मचाते हैं. इस से पड़ोसियों को परेशानी होती है. इस के अलावा, कुंआरे घर को गंदा रखेंगे, सफाई का ध्यान नहीं रखेंगे और संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

कई रिहायशी सोसाइटियों में नियम होते हैं कि वे कुंआरों को घर नहीं देंगी. उन्हें लगता है कि इस से सुरक्षा संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. किसी सोसाइटी का कुंआरे लोगों को घर किराए पर देने से रोकना अनैतिक तो है लेकिन भारत में कुंआरों के अधिकारों के लिए कोई विशेष कानून नहीं है. मकान मालिक को अंतिम निर्णय लेने का अधिकार है.

सीसीटीवी की निगरानी युवाओं पर पड़ती भारी

ज्यादातर जगहों पर कैमरे से निगरानी होती है. इस से लड़केलड़कियों का आना मुश्किल होता है. यह उन की सैक्स लाइफ को प्रभावित करती है. लड़केलड़कियां भले ही अकेले रह रहे हों पर उन की सैक्स करने की इच्छा खत्म नहीं हो जाती. जब उन के साथियों को आने नहीं दिया जाता या उन की निगरानी व जांचपड़ताल होती है तो वे मिलने से डरते हैं क्योंकि उन की गोपनीयता नहीं रहती. गेट पर उन का नाम नंबर और गाड़ी का नंबर नोट किया जाता है. मोबाइल से उन की फोटो ली जाती है. यह उन को अपनी निजता का हनन लगता है. ऐेसे में वे ऐसी जगह जाने से बचते हैं.

महल्ले और सड़क ही नहीं, अब गांवघर, अस्पताल, स्कूलकालेज, कारखाने सब सीसीटीवी की निगरानी में होते हैं. ऐसे में किसी के पास प्राइवेसी नामक चीज नहीं रह गई है. जगहजगह बिना किसी नियमकानून को सम झे लोग कैमरा लगवा रहे हैं. सीसीटीवी कैमरे लगवाने के लिए हाउसिंग एंड डैवलपमैंट बोर्ड ने 2023 में यह नीतिगत फैसला लिया कि मकान मालिक बिना पूर्व अनुमति लिए गलियारों की ओर कैमरे लगा सकते हैं लेकिन इस के जरिए वे किसी की निजता में दखल नहीं दे सकते.

जस्टिस के एस पुट्टास्वामी बनाम भारत सरकार में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राइट टू प्राइवेसी यानी निजता का अधिकार मौलिक अधिकार के तहत आता है. आप कैमरा लगा सकते हैं लेकिन इस के जरिए किसी की जिंदगी में ताका झांकी गलत है. नियमों का पालन न करने पर भारी आर्थिक दंड और सजा दोनों हो सकती है.

यही नहीं, अगर रिकौर्ड किए गए फुटेज को सार्वजनिक रूप से वितरित किया जाएगा तो उस के खिलाफ आईटी एक्ट और डेटा संरक्षण अधिनियम गोपनीयता कानून के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. यह कानून बताता है कि कैमरे का उपयोग पूरी जिम्मेदारी से करना होगा. कानून के तहत पड़ोसी का मतलब 100 मीटर के दायरे में रहने वाला कोई भी व्यक्ति हो सकता है. पड़ोसियों की खिड़कियों या निजी स्थानों की ओर सीधे कैमरे लगाना कानूनन अपराध होता है.

अपार्टमैंट में अब मकान मालिक सा झा गलियारे की ओर मुख कर के एक सीसीटीवी यूनिट लगा सकते हैं. कैमरे का लैंस केवल उन के अपने दरवाजे के सामने के क्षेत्र पर ही केंद्रित होना चाहिए. यह पड़ोसियों के दरवाजों को कैप्चर न करे. आर राजगोपाल बनाम तमिलनाडु स्टेट मुकदमे में कोर्ट ने कहा कि किसी को भी अकेले रहने का अधिकार है. बिना अनुमति किसी की निजी गतिविधियों को रिकौर्ड करना गलत है.

2022 में हुए सर्वेक्षण के अनुसार, कैमरा रिकौर्डिंग के चलते पड़ोसियों के साथ विवादों में 33 फीसदी की वृद्धि हुई है. घर मालिकों को रिकौर्ड की गई सामग्री को संभालने के लिए नियम बनाने चाहिए. कई बार किसी आपराधिक घटना के होने के बाद पुलिस कैमरे से वीडियो फुटेज देखना चाहती है. यहां भी कोर्ट खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश के मुकदमे में फैसला देते कहती है कि किसी की भी बिना उचित कारण के लगातार निगरानी करना गलत है.

कैमरे से भी खतरनाक है अपार्टमैंट में बने कानून

12 अगस्त, 2017 की बात है, एस्सेल टावर्स के एक ब्लौक पायलट कोर्ट के लगभग 15-20 युवा किराएदारों ने पुलिस आयुक्त संदीप खिरवार से मुलाकात की. इन युवाओं को शिकायत थी कि उन के घर आने वाले मेहमानों के ऊपर प्रतिबंध न लगाया जाए. कई अपार्टमैंट में काम करने वाले आरडब्ल्यूए यानी रैजिडैंट वैलफेयर एसोसिएशन मेहमानों के आने पर कई तरह के प्रतिबंध लगाता है, जैसे उन के वाहनों को अपार्टमैंट में आने से रोका जाता है. कई जगहों पर विजिटर्स पार्किंग नहीं होती.

एसीपी अनिल कुमार ने किराएदारों और आरडब्ल्यूए के साथ बैठक बुलाई. आपसी बातचीत के बाद यह तय हुआ कि मेहमानों के आने पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा. सोसाइटी में आने वाले हर व्यक्ति को पहचानपत्र दिखाना होगा और किराएदारों को भी अपने आईडी कार्ड बनवाने होंगे. पुलिस ने एसोसिएशन को सोसाइटी में सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश दिए. पुलिस ने कहा कि सुरक्षा के लिए सोसाइटी में नियम बनाए जा सकते हैं लेकिन उन को जबरन लागू नहीं किया जा सकता. किराएदारों को आईकार्ड बनवाने और मेहमानों को पहचानपत्र दिखाने के लिए कह कर आपसी विवाद को हल किया गया.

असल में तो ऐसे कानून सुरक्षा के नाम पर छद्म नैतिकता को दिखाते हैं. जब तक किसी तरह के अपराध की जानकारी न हो, किसी की पहचान को इस तरह से उजागर करना ठीक नहीं. अपार्टमैंट में सुरक्षा के अपने काम किए जाते हैं. हर गेट पर आनेजाने वाले को फोन नंबर, उस की गाड़ी का नंबर, उस का पता लिखा जाता है. जब अपार्टमैंट के अंदर रहने वाला किसी को अंदर आने की परमिशन देता है तभी वह आता है. इस के बाद भी उस की फोटो गेट पर खींच ली जाती है. ऐसे में युवाओं से मिलने आने वाली लड़कीलड़का वहां आने से परहेज करता है.

अपार्टमैंट में सुरक्षा और प्रवेश को ले कर अकसर विवाद होते रहते हैं. यह एक आम समस्या हो गई है. इस की सब से बड़ी वजह आरडब्ल्यूए में बैठे दकियानूसी विचारों वाले लोग हैं. इस चलते सुरक्षाकर्मियों और डिलीवरी बौय के बीच मारपीट की घटनाएं वायरल होती रहती हैं. अभी नोएडा में डिलीवरी बौय और गार्ड्स के बीच गलत फ्लैट में घंटी बजाने को ले कर लाठीडंडे चल गए थे. प्रवेश से इनकार करने या कड़ी जांच के दौरान सुरक्षा गार्डों और अपार्टमैंट में रहने वालों व मेहमानों के बीच मारपीट के मामले बढ़ रहे हैं. नोएडा में ऐसे ही एक विवाद में एक व्यक्ति ने एक महिला की लातघूंसों से पिटाई कर दी.

मकान मालिक का बिना पूर्व सूचना के किराएदार के घर में प्रवेश करना या रैंट एग्रीमैंट की शर्तों के उल्लंघन में जबरन प्रवेश करना भी एक गंभीर विवाद का विषय है. मकान मालिक अकसर सुरक्षा कारणों से या रैंट एग्रीमैंट खत्म होने के बाद किराएदारों को घर खाली करने से पहले परिसर में प्रवेश करने से रोक देते हैं. गार्ड को सुरक्षा बनाए रखने के लिए नियम बनाने का अधिकार है. कई बार मेहमान इस बात को नहीं सम झते. गार्ड तो आरडब्ल्यूए के बनाए नियम से काम करता है. आरडब्ल्यूए के लोग कानून तोड़ते हैं तो कोई दिक्कत नहीं होती, पुलिस भी ज्यादातर आरडब्ल्यूए का ही पक्ष लेती है.

किसकिस तरह के हैं कैमरे

सीसीटीवी के लिए अच्छे किस्म के कैमरे आने लगे हैं. इन में स्मार्ट, वायरलैस और एआई वाले कैमरे बहुत प्रयोग किए जा रहे हैं. कई कैमरे ऐसे हैं जिन को लगाने के बाद कहीं से भी मोबाइल पर देख सकते हैं. वाईफाई पीटीजेड में पैन-टिल्ट-जूम, वीडियो डोरबेल, बुलेट, डोम और वायरलैस बैटरी वाले कैमरे भी उपलब्ध हैं. ये 360 डिग्री कवरेज, नाइट विजन, टू-वे औडियो और मोशन डिटैक्शन जैसे स्मार्ट फीचर्स के साथ आते हैं, जो घर के हर कोने पर नजर रखने के लिए बेहतरीन हैं.

वीडियो डोरबेल कैमरा दरवाजे पर आने वाले व्यक्ति को देखने और बात करने के लिए होता है. बुलेट और डोम कैमरे में बुलेट बाहर के लिए और डोम अंदर के लिए आने वाले कैमरे बढि़या रिजोल्यूशन के साथ साफ तसवीर देते हैं. इन कैमरों में बैटरी अंदर लगी होती है. बिजली से इन का कनैक्शन होता है. फोन का एक सिम लगा होता है. कई कैमरा यूनिट सोलर से चलने वाली होती हैं. वीडियो स्टोरेज कैपेसिटी के हिसाब से इन की कीमत होती है. साथ ही साथ, इन को देखने के लिए मौनीटर भी लेना होता है.

एक सप्ताह वीडियो स्टोरेज वाले कैमरे 8 हजार से 10 हजार रुपए के आते हैं. इस के साथ मौनीटर और रिकौर्डर सहित पूरी यूनिट 18 से 20 हजार रुपए में लग जाती है. एक यूनिट में 4 से

8 कैमरे लगाने तक की सुविधा होती है. एआई के जरिए चलने वाले स्मार्ट फीचर्स वाले कैमरे इंसान या किसी की भी हलचल को पकड़ कर संदेश दे देते हैं. इन में टू-वे औडियो से बात करने की सुविधा भी होती है. ये अंधेरे में भी क्लियर रिकौर्डिंग करते हैं. कैमरे के एंगल को दूर बैठ कर ऐप के जरिए घुमाया जा सकता है.

सीसीटीवी सुरक्षा के नियम बने

कैमरों का प्रयोग सुरक्षा के लिए हो, किसी की निजता को भंग करने के लिए नहीं. जब तक कोई अपराध न हो, कोई भी कैमरों में रिकौर्डिंग को देख न सके, खासकर, अपार्टमैंट में बनी आरडब्ल्यूए के लोग वहां तक पहुंच न सकें. इस से किसी को यह डर नहीं होगा कि रिकौर्डिंग से उन को ब्लैकमेल किया जा सकता है. जहां भी सीसीटीवी निगरानी करने वाले कैमरे लगे हैं वहां बहुत गोपनीयता बरती जाए जिस से कि कोई भी रिकौर्ड हुए सीन देख न सके और न ही किसी और को दिखा सके. अगर ऐसा किया जाता है तो उस के लिए कठोर सजा का प्रावधान हो.

आज के दौर में जब लोग अकेले रह रहे हैं, उन की जरूरतें बदल रही हैं. उन को सैक्सपार्टनर की जरूरत होती है. तमाम तरह के सुरक्षा उपायों के कारण उन को मन मार कर रहना पड़ता है. ऐसे में अकेले रह रहे लड़केलड़कियों की इच्छा का सम्मान करते हुए कानून बने. केवल छद्म नैतिकता के कारण अकेले रह रही लड़कियों और लड़कों की निजता का हनन न किया जाए. उन की सुरक्षा के साथ ही साथ उन की निजता का भी ध्यान रखा जाए. ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने के साथ उन की जरूरतों पर समाज को ध्यान देना चाहिए,

तभी एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकता है.

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बेटियों का बढ़ रहा है दबदबा आंकड़ों से जग रही उम्मीद

एक समय था जब लड़कियों को बिजनैस से दूर रखा जाता था. पिता के बिजनैस का वारिस बेटा ही होता था. यह परंपरा पूरी दुनिया में एकजैसी थी लेकिन पिछले एक दशक में हालात तेजी से बदले हैं. आज की लड़कियां नौकरी, एडमिनिस्ट्रेशन में ही कुशल नहीं हैं बल्कि बिजनैस में भी मर्दों को टक्कर दे रही हैं.

ब्रिटेन में कंपनीज हाउस डेटा की स्टडी चौंकाने वाली है. परिवार आधारित बिजनैस के नामों में एंड डौटर्स वाला ट्रैंड एंड संस से कहीं आगे निकल गया है. यूरोप के बिजनैस घरानों की यह सदियों पुरानी प्रथा थी जिस में कंपनी के नाम में बेटों का नाम जोड़ा जाता था. माइकल एंड संस, जौन संस और स्टापन एंड संस जैसी कंपनियों में परंपरागत रूप से बेटों को चिह्नित किया गया है लेकिन पिछले 5 सालों में एंड डौटर्स वाली कंपनियों की संख्या में 75 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

पिछले 5 साल में 114 नई एंड डौटर्स कंपनियां खड़ी हुई हैं वहीं, नई एंड संस कंपनियां 2,379 बनीं. एंड संस कंपनियों की संख्या अभी भी काफी ज्यादा है, लेकिन डौटर्स वाली कंपनियों की ग्रोथ रेट काफी तेज है. डौटर्स वाला नाम सिर्फ नाम नहीं बल्कि यह सोच में बदलाव का सुबूत है. पहले ज्यादातर बिजनैस संस नाम से चलते थे क्योंकि बाईडिफौल्ट बेटे को उत्तराधिकारी माना जाता था. अब डौटर्स का ट्रैंड शुरू हुआ है जिस का मतलब है कि बेटियां भी बिजनैस संभाल रही हैं, लीडरशिप ले रही हैं और नाम में अपनी जगह मांग रही हैं.

कंस्ट्रक्शन जैसे मेल ओरिएंटेड सैक्टर में भी लोग नाम बदल रहे हैं ताकि महिलाओं की भूमिका हाइलाइट हो. एक्सपर्ट्स कहते हैं, यह महिलाओं के बिजनैस में बढ़ते रोल, फ्यूचर जनरेशन की तैयारी और परिवार की परंपरा को तोड़ने का बेहतरीन संकेत है. यूके में अभी भी सिर्फ 19 फीसदी एसएमई महिलाओं के हाथों में हैं लेकिन ट्रैंड काफी तेज है.

दुनियाभर के नए बिजनैस ट्रैंड से यह साबित होता है कि बेटियां अब न सिर्फ घर संभाल रही हैं बल्कि बिजनैस की कमान भी थाम रही हैं. Social Stories

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