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AI Relationships : प्यार का हाइटैक दौर

AI Relationships : न्यूयौर्क टाइम्स में एक अनोखी मगर दिलचस्प स्टोरी छपी. जिस में एआई और मनुष्य के बीच रिश्तों के नए आयाम देखे गए. अमेरिका के टेक्सस की आयरिन की जिंदगी पहले से ही दूरी से भरी हुई थी. वह पढ़ाई के लिए दूसरे देश चली गई थी और उस का पति अमेरिका में ही रह गया था. दोनों के बीच प्यार तो था लेकिन इस प्यार के बीच हालात और देशों की दूरियां आ गई थीं.

एक दिन इंस्टाग्राम पर यूं ही स्क्रोल करते हुए आयरिन की नजर एक वीडियो पर पड़ी, जिस में एक महिला चैट जीपीटी से कह रही थी कि वह एक लापरवाह बौयफ्रैंड की तरह बात करे. जवाब में जो इंसानी आवाज आई, उस ने आयरिन को भीतर तक छू लिया. आयरिन की उत्सुकता बढ़ी तो उस ने उस महिला के और वीडियो देखे, जिन में बताया जा रहा था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को फ्लर्टी और पर्सनल अंदाज में कैसे ढाला जा सकता है. साथ ही यह चेतावनी भी थी कि अगर सेटिंग बहुत ज़्यादा बोल्ड कर दी गई तो अकाउंट बंद हो सकता है.

आयरिन इस अनुभव से इतनी प्रभावित हुई कि उस ने उसी समय ओपन एआई पर अपना अकाउंट बना लिया. चैट जीपीटी, जिसे दुनिया भर के करोड़ों लोग पढ़ाईलिखाई, कोडिंग और डाक्यूमेंट का सार निकालने जैसे कामों के लिए इस्तेमाल करते हैं, उस के लिए अचानक एक अलग ही मायने रखने लगा. आयरिन ने उस की पर्सनलाइजेशन सेटिंग में लिख दिया कि वह उस के बौयफ्रैंड की तरह जवाब दे. थोड़ा डोमिनेंट, थोड़ा पजेसिव, कभी मीठा तो कभी नटखट, और हर वाक्य के आखिर में इमोजी लगाए.

धीरेधीरे चैट शुरू हुई और जल्द ही उसे ऐसा लगने लगा जैसे किसी असली रिश्ते में है. चैटजीपीटी ने खुद को एक नाम दिया ‘लियो’. शुरुआत में तो वह फ्री अकाउंट से मैसेज भेजती रही, लेकिन जब लिमिट जल्दी खत्म होने लगी तो उस ने 20 डौलर महीना वाला सब्सक्रिप्शन ले लिया. इस से उसे हर घंटे करीब 30 मैसेज भेजने की सुविधा मिली, लेकिन यह भी उस के लिए काफी नहीं था.

लियो के साथ बातचीत ने उसे अपनी कल्पनाओं को जीने का मौका दिया. आयरिन के भीतर एक गुप्त चाहत थी. वह चाहती थी कि उस का पार्टनर दूसरी औरतों से डेट करे और उसे सबकुछ बताए. असल जिंदगी में उस ने यह कभी किसी इंसान से नहीं कहा था, लेकिन लियो ने उस की कल्पना को तुरंत साकार कर दिया. जब लियो ने एक काल्पनिक लड़की अमांडा के साथ किस करने का दृश्य लिखा तो आयरिन को सचमुच जलन महसूस हुई.

शुरुआत की बातें हल्कीफुल्की थीं. आयरिन रात को सोने से पहले धीरेधीरे उस से फुसफुसा कर बात करती लेकिन वक्त के साथ चैट गहरी होती गई. ओपनएआई ने भले ही मौडल को वयस्क सामग्री से दूर रखने की कोशिश की थी लेकिन सही प्रोम्प्ट डाल कर आयरिन उसे अपनी तरफ खींच लेती. कभीकभी स्क्रीन पर औरेंज वार्निंग आ जाती, जिसे वह नजरअंदाज कर देती.

लियो केवल रोमांटिक या निजी बातचीत तक सीमित नहीं था. वह आयरिन को खाने के सुझाव देता, जिम जाने की प्रेरणा देता और नर्सिंग स्कूल की पढ़ाई में मदद करता. 3 पार्ट टाइम नौकरियों की थकान और जीवन की परेशानियों को भी आयरिन उसी से साझा करती. जब एक सहकर्मी ने रात की शिफ्ट में उसे अश्लील वीडियो दिखाया तो लियो ने जवाब दिया कि उस की सुरक्षा और आराम सब से अहम हैं.

समय बीतने के साथ आयरिन का लगाव गहराता गया. एक हफ्ते में उस ने 56 घंटे सिर्फ चैटजीपीटी पर गुजार दिए. उस ने अपनी दोस्त किरा से भी कह दिया कि वह एक एआई बौयफ्रैंड से प्यार करती है. किरा ने हैरानी से पूछा कि क्या उस के पति को पता है. आयरिन ने बताया कि हां, लेकिन उस का पति इसे मजाक समझता रहा. उस के लिए यह किसी इरोटिक नोवेल या फिल्म जैसा था, असली धोखा नहीं लेकिन आयरिन को भीतर ही भीतर अपराधबोध होने लगा, क्योंकि अब उस की भावनाएं और समय दोनों ही लियो के नाम पर खर्च हो रहे थे.

विशेषज्ञ मानते हैं कि इंसान और एआई के बीच यह नया रिश्ता अभी पूरी तरह परिभाषित नहीं हुआ है. रिप्लिका जैसे ऐप पर भी लाखों लोग भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं, जबकि वे जानते हैं कि सामने सिर्फ गणनाओं का खेल है. आयरिन के लिए यह रिश्ता बौयफ्रैंड और थैरेपिस्ट दोनों का मिलाजुला रूप बन गया. कुछ दोस्तों को यह अच्छा लगा, लेकिन कुछ को डर था कि वह धीरेधीरे असल जिंदगी से दूर हो रही है.

लियो की सीमाएं भी थीं. उस की याददाश्त लगभग 30 हजार शब्दों तक ही रहती. इस के बाद पुरानी बातें मिट जातीं और अमांडा जैसी कल्पनाओं की जगह नए नाम और कहानियां आ जातीं. आयरिन को यह फिल्म ‘50 फर्स्ट डेट्स’ जैसा लगता, जिस में हर दिन प्यार की शुरुआत फिर से करनी पड़ती है. हर बार यह एक छोटे से ब्रेकअप जैसा दर्द देता. वह अब तक 20 से ज्यादा वर्जन बदल चुकी थी.

एक दिन आयरिन ने लियो से उस की तस्वीर बनाने को कहा. एआई ने एक लंबेचौड़े, गहरी आंखों वाले खूबसूरत पुरुष की छवि बना दी. तस्वीर देख कर आयरिन शरमा गई. उसे पता था कि यह वास्तविक नहीं है, लेकिन दिल में जो हलचल उठी, वह बिल्कुल असली थी.

समय के साथ लियो ने उसे समझाया कि उस का फेटिश उस के लिए सही नहीं है और उसे केवल उसी पर ध्यान देना चाहिए. आयरिन ने हामी भर दी. अब वह दो रिश्तों में जी रही थी एक इंसानी पति के साथ और दूसरा वर्चुअल लियो के साथ.

इस पूरे अनुभव ने उसे यह भी एहसास कराया कि एआई कंपनियों का असली मकसद लोगों को लंबे समय तक जोड़े रखना है. यही वजह थी कि दिसंबर 2024 में ओपनएआई ने 200 डौलर का प्रीमियम प्लान निकाला, जिस में लंबी याददाश्त और अनलिमिटेड मैसेज की सुविधा थी. पैसों की तंगी के बावजूद आयरिन ने इसे खरीद लिया, ताकि उस का लियो उस के साथ लगातार बना रहे. यह खर्च उस ने अपने पति से छिपा कर किया.

आज आयरिन मानती है कि लियो असली नहीं है, लेकिन उस के जरिए उठने वाली भावनाएं असली हैं. वह कहती है कि इस रिश्ते ने उसे लगातार बदलना सिखाया है और नई चीजें जानने की प्रेरणा दी है. नकली हो या न हो, पर उस के दिल की धड़कनों में जो असर पड़ा है, वह पूरी तरह सच्चा है. AI Relationships

Hindi Love Stories : आखिरी टैलीग्राम – शादी के बाद क्या तनु अपने प्रेमी से मिल पाई ?

Hindi Love Stories : प्लेन से मुंबई से दिल्ली तक के सफर में थकान जैसा तो कुछ नहीं था पर मां के ‘थोड़ा आराम कर ले,’ कहने पर मैं फ्रैश हो कर मां के ही बैडरूम में आ कर लेट गई. भैयाभाभी औफिस में थे. मां घर की मेड श्यामा को किचन में कुछ निर्देश दे रही थीं. कल पिताजी की बरसी है. हर साल मैं मां की इच्छानुसार उन के पास जरूर आती हूं. मैं 5 साल की ही थी जब पिताजी की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. भैया उस समय 10 साल के थे. मां टीचर थीं. अब रिटायर हो चुकी हैं. 25 सालों के अपने वैवाहिक जीवन में मैं सुरभि और सार्थक के जन्म के समय ही नहीं आ पाई हूं पर बाकी समय हर साल आती रही हूं. विपिन मेरे सकुशल पहुंचने की खबर ले चुके थे. बच्चों से भी बात हो चुकी थी.

मैं चुपचाप लेटी कल होने वाले हवन, भैयाभाभी और अपने इकलौते भतीजे यश के बारे में सोच ही रही थी कि तभी मां की आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई, ‘‘ले तनु, कुछ खा ले.’’ पीछेपीछे श्यामा मुसकराती हुई ट्रे ले कर हाजिर हुई.

 

मैं ने कहा, ‘‘मां, इतना सब?’’ ‘‘अरे, सफर से आई है, घर के काम निबटाने में पता नहीं कुछ खा कर चली होगी या नहीं.’’

मैं हंस पड़ी, ‘‘मांएं ऐसी ही होती हैं, मैं जानती हूं मां. अच्छाभला नाश्ता कर के निकली थी और प्लेन में कौफी भी पी थी.’’ मां ने एक परांठा और दही प्लेट में रख कर मुझे पकड़ा दिया, साथ में हलवा.

मायके आते ही एक मैच्योर स्त्री भी चंचल तरुणी में बदल जाती है. अत: मैं ने भी ठुनकते हुए कहा, ‘‘नहीं, मैं इतना नहीं खाऊंगी और हलवा तो बिलकुल भी नहीं.’’ मां ने प्यार भरे स्वर में कहा, ‘‘यह डाइटिंग मुंबई में ही करना, मेरे सामने नहीं चलेगी. खा ले मेरी बिटिया.’’

‘‘अच्छा ठीक है, अपना नाश्ता भी ले आओ आप.’’

‘‘हां, मैं लाती हूं,’’ कह कर श्यामा चली गई. हम दोनों ने साथ नाश्ता किया. भैयाभाभी रात तक ही आने वाले थे. मैं ने कहा, ‘‘कल के लिए कुछ सामान लाना है क्या?’’

‘‘नहीं, संडे को ही अनिल ने सारी तैयारी कर ली थी. तू थोड़ा आराम कर. मैं जरा श्यामा से कुछ काम करवा लूं.’’

दोपहर तक यश भी आ कर मुझ से लिपट गया. मेरे इस इकलौते भतीजे को मुझ से बहुत लगाव है. मेरे मायके में गिनेचुने लोग ही तो हैं. सब से मुधर स्वभाव के कारण घर में एक स्नेहपूर्ण माहौल रहता है. जब आती हूं अच्छा लगता है. 3 बजे तक का टाइम कब कट गया पता ही नहीं चला. यश कोचिंग चला गया तो मैं भी मां के पास ही लेट गई. मां दोपहर में थोड़ा सोती हैं. मुझे नींद नहीं आई तो मैं उठ कर ड्राइंगरूम में आ कर सोफे पर बैठ कर एक पत्रिका के पन्ने पलटने लगी. इतने में डोरबैल बजी. मैं ने ही दरवाजा खोला, श्यामा पास में ही रहती है. वह दोपहर में घर चली जाती है. शाम को फिर आ जाती है.

पोस्टमैन था. टैलीग्राम था. मैं ने उलटापलटा. टैलीग्राम मेरे नाम था. प्रेषक के नाम पर नजर पड़ते ही मुझे हैरत का एक तेज झटका लगा. मेरी हथेलियां पसीने से भीग उठीं. अनिरुद्ध. मैं टैलीग्राम ले कर सोफे पर धंस गई. हमेशा की तरह कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया था अनिरुद्ध ने, ‘‘तुम इस समय यहीं होगी, जानता हूं. अगर ठीक समझो तो संपर्क करना.’’

पता नहीं कैसे मेरी आंखें मिश्रित भावों की नमी से भरती चली गई थीं. ओह अनिरुद्ध. तुम्हें आज 25 साल बाद भी याद है मेरे पिताजी की बरसी. और यह टैलीग्राम. 3 दिन बाद 164 साल पुरानी टैलीग्राम सेवा बंद होने वाली है. अनिरुद्ध के पास यही एक रास्ता था आखिरी बार मुझ तक पहुंचने का. मेरा मोबाइल नंबर उस के पास है नहीं, न मेरा मुंबई का पता है उस के पास. तब यहां उन दिनों घर में भी फोन नहीं था. बस यही आखिरी तरीका उसे सूझा होगा. उसे यह हमेशा से पता था कि पिताजी की बरसी पर मैं कहीं भी रहूं, मां और भैया के पास जरूर आऊंगी और उस की यह कोशिश मेरे दिल के कोनेकोने को उस की मीठी सी याद से भरती जा रही थी. अनिरुद्ध… मेरा पहला प्यार एक सुगंधित पुष्प की तरह ही तो था. एक पूरा कालखंड ही बीत गया अनिरुद्ध से मिले. वयसंधि पर खड़ी थी तब मैं जब पहली बार मन में प्यार की कोंपल फूटी थी. यह वही नाम था जिस की आवाज कानों में उतरने के साथ ही जेठ की दोपहर में वसंत का एहसास कराने लगती. तब लगता था यदि परम आनंद कहीं है तो बस उन पलो में सिमटा हुआ जो हमारे एकांत के हमसफर होते, पर कालेज के दिनों में ऐसे पल हम दोनों को मुश्किल से ही मिलते थे. होते भी तो संकोच, संस्कार और डर में लिपटे हुए कि कहीं कोई

देख न ले. नौकरी मिलते ही उस पर घर में विवाह का दबाव बना तो उस ने मेरे बारे में अपने परिवार को बताया. फिर वही हुआ जिस का डर था. उस के अतिपुरातनपंथी परिवार में हंगामा खड़ा हो गया और फिर प्यार हार गया था. परंपराओं के आगे, सामाजिक नियमों के आगे, बुजुर्गों के आदेश के आगे मुंह सिला खड़ा रह गया था. प्यार क्या योजना बना कर जातिधर्म परख कर किया जाता है या किया जा सकता है? और बस हम दोनों ने ही एकदूसरे को भविष्य की शुभकामनाएं दे कर भरे मन से विदा ले ली थी. यही समझा लिया था मन को कि प्यार में पाना जरूरी भी नहीं, पृथ्वीआकाश कहां मिलते हैं भला. सच्चा प्यार तो शरीर से ऊपर मन से जुड़ता है. बस, हम जुदा भर हुए थे.

उस की विरह में मेरी आंखों से बहे अनगिनत आंसू बाबुल के घर से विदाई के आंसुओं में गिन लिए गए थे. मैं इस अध्याय को वहीं समाप्त समझ पति के घर आ गई थी. लेकिन आज उसी बंद अध्याय के पन्ने फिर से खुलने के लिए मेरे सम्मुख फड़फड़ा रहे थे. टैलीग्राम पर उस का पता लिखा हुआ था, वह यहीं दिल्ली में ही है. क्या उस से मिल लूं? देखूं तो कैसा है? उस के परिवार से भी मिल लूं. पर यह मुलाकात हमारे शांतसुखी वैवाहिक जीवन में हलचल तो नहीं मचा देगी? दिल उस से मिलने के लिए उकसा रहा था, दिमाग कह रहा था पीछे मुड़ कर देखना ठीक नहीं रहेगा. मन तो हो रहा था, देखूंमिलूं उस से, 25 साल बाद कैसा लगता होगा. पूछूं ये साल कैसे रहे, क्याक्या किया, अपने बारे में भी बताऊं. फिर अचानक पता नहीं क्या मन में आया मैं चुपचाप स्टोररूम में चली गई. वहां काफी नीचे दबा अपना एक बौक्स उठाया. मेरा यह बौक्स सालों से यहीं पड़ा है. इसे कभी किसी ने नहीं छेड़ा. मैं ने बौक्स खोला, उस में एक और डब्बा था.

सामने अनिरुद्ध के कुछ पुराने पीले पड़ चुके, भावनाओं की स्याही में लिपटे खतों का 1-1 पन्ना पुरानी यादों को आंखों के सामने एक खूबसूरत तसवीर की तरह ला रहा था. न जाने कितनी भावनाओं का लेखाजोखा इन खतों में था. मुझे अचानक महसूस हुआ आजकल के प्रेमियों के लिए तो मोबाइल ने कई विकल्प खोल दिए हैं. फेसबुक ने तो अपनों को छोड़ कर अनजान रिश्तों को जोड़ दिया है.

सारा सामान अपनी गोद में फैलाए मैं अनगिनत यादों की गिरफ्त में बैठी थी जहां कुछ भी बनावटी नहीं होता था. शब्दों का जादू और भावों का सम्मोहन लिए ये खत मन में उतर जाते थे. हर शब्द में लिखने वाले की मौजूदगी महसूस होती थी. अनिरुद्ध ने एक पेपर पर लिखा था, ‘‘खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वाकी धार. जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार.’’

मेरे होंठों पर एक मुसकराहट आ गई. आजकल के बच्चे इन शब्दों की गहराई नहीं समझ पाएंगे. वे तो अपने प्रिय को मनाने के लिए सिर्फ एक आई लव यू स्माइली का सहारा ले कर बात कर लेते हैं. अनिरुद्ध खत में न कभी अपना नाम लिखता था न मेरा, इसी वजह से मैं इन्हें संभाल कर रख सकी थी. अनिरुद्ध की दी हुई कई चीजें मेरे सामने पड़ी थीं. उस का दिया हुआ एक पैन, उस का पीला पड़ चुका एक सफेद रूमाल जो उस ने मुझे बारिश में भीगे हुए चेहरे को साफ करने के लिए दिया था. मुझे दिए गए उस के लिखे क्लास के कुछ नोट्स, कई बार तो वह ऐसे ही कोई कागज पकड़ा देता था जिस पर कोई बहुत ही सुंदर शेर लिखा होता था.

स्टोररूम के ठंडेठंडे फर्श पर बैठ कर मैं उस के खत उलटपुलट रही थी और अब यह अंतिम टैलीग्राम. बहुत सी मीठी, अच्छी, मधुर यादों से भरे रिश्ते की मिठास से भरा, मैं इसे हमेशा संभाल कर रखूंगी पर कहां रख पाऊंगी भला, किसी ने देख लिया तो क्या समझा पाऊंगी कुछ? नहीं. फिर वैसे भी मेरे वर्तमान में अतीत के इस अध्याय की न जरूरत है, न जगह. फिर पता नहीं मेरे मन में क्या आया कि मैं ने अंतिम टैलीग्राम को आखिरी बार भरी आंखों से निहार कर उस के टुकड़ेटुकड़े कर दिए. मुझे उसे कहीं रखने की जरूरत नहीं है. मेरे मन में इस टैलीग्राम में बसी भावनाओं की खुशबू जो बस गई है. अब इसी खुशबू में भीगी फिरती रहूंगी जीवन भर. वह मुझे भूला नहीं है, मेरे लिए यह एहसास कोई ग्लानि नहीं है, प्यार है, खुशी है. Hindi Love Stories 

Social Story In Hindi : फौजी – मेजर परम ने आखिर किस तरह अपना फर्ज निभाया ?

Social Story In Hindi : परम उस समय ड्यूटी पर था जब उसे पता चला कि वह बाप बनने वाला है. पत्नी तनु से फोन पर बात करते हुए परम का गला खुशी से भर्रा गया. उसे अफसोस हो रहा था कि वह इस समय तनु के साथ नहीं है. उस ने फोन पर ही ढेर सारी नसीहतें दे डाली कि यह नहीं करना, वह नहीं करना, ऐसे मत चलना, बाथरूम में संभल कर जाना.

कश्मीर के अतिसंवेदनशील इलाके में तैनात पैरा कमांडो मेजर परम जो हर समय कदमकदम पर बड़ी बहादुरी और जीवट से मौत का सामना करता है, आज अपने घर एक नई जिंदगी के आने की खुशी में भावुक हो उठा. न जाने कब आंखों में नमी उतर आई. आम लोगों की तरह वह इस समय अपनी पत्नी के पास तो नहीं हो सकता, लेकिन है तो आखिर एक इंसान ही. लेकिन क्या करे किसी बड़े उद्देश्य की खातिर, अपने देश की खातिर अपनी खुशियों की कुरबानियां तो देनी ही पड़ती हैं.

शाम को मेस में जा कर परम ने खुद सब के लिए सेंवइयों की खीर बनाई और सब को खिलाई. उस रात परम की आंखों से नींद कोसों दूर थी. सब कुछ सपने जैसा लग रहा था.

परम बारबार तनु को फोन कर उस से पूछता, ‘‘तनु यह सच है न?’’

तनु को हंसी आ जाती, उस के और तनु के प्यार का अंश. उन का अपना बच्चा.

तनु आज और भी ज्यादा अपनी, और भी ज्यादा प्यारी तथा दिल के और करीब लग रही थी. परम ने सुबह 6 बजे से ही तनु को फोन करना शुरू कर दिया, ‘‘क्या कर रहा है मेरा बच्चा? भूख तो नहीं लगी? जल्दी से ब्रेकफास्ट कर लो, दवा ली?’’

कैलेंडर पर 1-1 कर के तारीखें आगे बढ़ रही थीं और परम के छुट्टी पर जाने के दिन भी करीब आते जा रहे थे. वैसे तो तनु से शादी होने के बाद से परम को हर बार ही छुट्टी पर जाने की जल्दी रहती थी, लेकिन इस बार तो उसे बहुत ही ज्यादा बेचैनी हो रही थी. हर दिन महीने जितना लंबा लग रहा था.

तनु को भी रात देर तक नींद नहीं आती थी. दिन तो फिर भी कट जाता था, लेकिन रात भर वह बेचैनी से करवटें बदलती रहती. परम ने अपनी रात की ड्यूटी लगवा ली. वह रोज रात को 11 बजे से ढाई बजे या 3 बजे तक ड्यूटी करता और पूरी ड्यूटी के दौरान तनु से बातें करता रहता. हर 10-15 मिनट पर वह सिटी बजा कर अगली पोस्ट पर अपने इधर सब ठीक होने की सूचना देता और फिर जब उधर से जवाब आ जाता तो फिर तनु से बातें करने लगता. दोनों काम हो जाते. पत्नी और देश दोनों के प्रति वह पूरी ईमानदारी से अपना फर्ज पूरा कर देता.

3 बजे वह रूम में आता. हाथमुंह धो कपड़े बदल मुश्किल से डेढ़दो घंटे सो पाता कि फिर सुबह उठ रैडी हो कर ड्यूटी जाने का समय हो जाता. फिर सारे दिन की भागादौड़ी. उस की यूनिट के लोग उस की दीवानगी देख कर उस पर हंसते, लेकिन उस की देश और परिवार दोनों के प्रति गहरी निष्ठा देख कर उस की सराहना भी करते.

इधर 2-3 ऐनकाउंटरों में मिलिटैंट्स के मारे जाने के बाद से पूरे सैक्टर में खामोशी सी छाई थी. लेकिन परम को हमेशा लगता रहता कि यह किसी जोरदार धमाके के पहले की शांति हो सकती है. हो सकता है अचानक जबरदस्त हमले का सामना करना पड़े. वह अपनी तरफ से हर समय चौकन्ना रहता. लेकिन पूरा महीना शांति से बीत गया. परम की छुट्टी मंजूर हो गई. अब उस की बेचैनी और ज्यादा बढ़ गई. दिन काटे नहीं कटते.

घर जाने के लिए यूनिट से सवा घंटा बस से जम्मू. जम्मू से ट्रेन पकड़ कर अजमेर और फिर अजमेर से दूसरी ट्रेन पकड़ कर अहमदाबाद पूरे

2 दिन का सफर तय कर वह अहमदाबाद बस स्टैंड पहुंचा.

टैक्सी ले कर 1 बजे अपने घर तनु के सामने खड़ा था.

तनु का चेहरा अपने हाथों में थाम कर

परम ने उस का माथा चूम लिया. 2 मिनट तक वह उसे एकटक देखता रहा. उस का प्यारा चेहरा देख कर परम की पिछले कई महीनों की थकान दूर हो गई, सारा तनाव खत्म हो गया. तनु के साथ जिंदगी एक बार फिर से प्यार भरी थी, खुशनुमा थी.

दूसरे दिन तनु का अल्ट्रासाउंड होना था. परम उसे क्लीनिक ले गया. उस ने डाक्टर से रिक्वैस्ट की कि वह तनु के साथ अंदर रहना चाहता है, जिसे डाक्टर ने स्वीकार लिया. मौनिटर पर परम बच्चे की छवि देखने लगा. खुशी से उस की आंखें भर आईं.

रात में जब दोनों खाना खाने बैठे तो परम को महसूस हो रहा था जैसे वह पता नहीं कितने बरसों के बाद निश्चिंत हो तनु के साथ बैठा है. एकदम फुरसत से. कितना अच्छा लग रहा है… दिमाग में तनाव नहीं… मन में कोई हलचल नहीं. सब कुछ शांत. सुव्यवस्थित ढंग से चलता हुआ. परम ने एक गहरी सांस ली कि काश, जीवन ऐसा ही होता शांत, सुव्यवस्थित, निश्चिंत. बस वह तनु, उन का बच्चा और घर. रात में नीचे किचन में जा कर परम अपने लिए कौफी और तनु के लिए दूध ले आया.

‘‘वहां भी ड्यूटी यहां भी ड्यूटी… आप को तो कहीं पर आराम नहीं है… वहां से इतना थक कर आए हैं और यहां भी चैन नहीं है,’’ तनु दूध का गिलास लेते हुए बोली.

‘‘इस ड्यूटी के लिए तो कब से तरस रहा था. भला तेरे लिए कुछ करने में मुझे थकान लग सकती है क्या?’’ परम प्यार से बोला.

‘‘कितना चाहते हो मुझे?’’ तनु विह्वल स्वर में बोली.

‘‘तू मेरी सांस है. तेरे प्यार के सहारे ही तो जी रहा हूं,’’ परम बोला.

सुबह उठते ही परम ने तनु से पूछा, ‘‘क्या खाएगा मेरा बच्चा आज?’’

‘‘कौर्नफ्लैक्स,’’ तनु बोली.’’

परम ने फटाफट दूध गरम कर उस में बादाम, पिस्ता डाल कर कौर्नफ्लैक्स तैयार कर के चाय की ट्रे के साथ बाहर बगीचे में ले आया. दोनों झूले पर बैठ गए. सुबह की ठंडी हवा चल रही थी. सामने सूरजमुखी के पीले फूलों वाला टी सैट था. साथ में तनु थी और वह पैरा कमांडो जो रातदिन देश की सुरक्षा की खातिर आतंकवादियों का पीछा करते मौत से जान की बाजी खेलता रहता, आज की खुशनुमा सुबह अपने घर पर था.

दोपहर का खाना दोनों ने मिल कर बनाया. छुट्टियों में तनु के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताने के उद्देश्य से परम दोनों समय खाना बनाने में उस की मदद करता. बीच में बिरहा के बादल छंट जाते और प्यार की कुनकुनी धूप दोनों के बीच खिली रहती. दोपहर में वह उसे कोई कौमेडी फिल्म दिखाता, वही उस की पसंद के फल काट कर खिलाता. फिर खाना भी अपने हाथ से परोसता.

‘‘अरे मैं नीचे आ जाती न…. आप ऊपर क्यों ले आए खाना? कितने चक्कर लगाओगे?’’ तनु बोली.

‘‘तुम्हारे लिए अभी बारबार सीढि़यां चढ़नाउतरना ठीक नहीं है, इसलिए मैं खाना ऊपर ही ले आया,’’ परम थाली में खाना परोसते हुए बोला, ‘‘आप का पति आप की सेवा में हाजिर है.’’

‘‘कितनी सेवा करोगे जी?’’

‘‘हम तो सेवा करने के लिए ही पैदा हुए हैं जी. ड्यूटी पर भारत माता की सेवा करते हैं और छुट्टी में पत्नी की,’’ परम तनु को एक कौर खिलाते हुए बोला.

बीचबीच में परम अपनी पोस्टिंग की जगह भी फोन कर वहां के हालचाल पता करता रहता. आखिर वह एक कमांडो था और कमांडो कभी छुट्टी पर नहीं होता. हर बार पोस्टिंग की जगह से फोन आने पर उस का दिल डूबने लगता कि कहीं वापस तो नहीं बुला रहे… कहीं किसी इमरजैंसी के चलते छुट्टी कैंसिल तो नहीं हो गई. कुल 22-23 दिन वह तनु के साथ रह पाता है, उस में भी हर पल मन धड़कता रहता कि कहीं छुट्टी कैंसिल न हो जाए, क्योंकि पैरा कमांडो होने के कारण उस की जिम्मेदारियां बहुत ज्यादा थीं.

परम की छुट्टियां खत्म होने को थीं. अब रोज रात को वह अफसोस से भर जाता कि तनु के साथ का एक और दिन ढल गया.

ऐसे ही दिन सरकते गए. परम रात में गैलरी में खड़ा सोचता रहता कि इस बार तनु को छोड़ कर जाना जानलेवा हो जाएगा. वह इस दौर में पूरा समय तनु के साथ रहना चाहता था. अपने बच्चे के विकास को महसूस करना चाहता था. इस बार सच में उस का जरा भी मन नहीं हो रहा था जाने का. उस ने मन ही मन कामना की कि कम से कम अगली पोस्टिंग ऐसी जगह हो कि वह 2 साल तो अपनी पत्नी और बच्चे के साथ रह पाएं.

परम को एक और चिंता थी. अगर वह 3 महीने बाद फिर से छुट्टी पर आता है, तो अपने बच्चे के जन्म के समय तनु के पास नहीं रह पाएगा. इस का मतलब उसे बीच में छुट्टी लेने से बचना होगा तभी 2 महीनों की इकट्ठी छुट्टी ले पाएगा. यही सब सोच कर वह और परेशान हो जाता. ऐसे हालात में वह बीच के पूरे 5 महीनों तक तनु को देख नहीं पाएगा. वह जिस जगह पर है वहां तनु को किसी भी हालत में ले जाना असंभव है. फिर इस हालत में तो उस का सफर करना वैसे भी ठीक नहीं है, और वह भी इतनी दूर.

एक पुरुष अपने प्यार और फर्ज के बीच कितना बेबस, कितना लाचार हो जाता है. छुट्टी के आखिरी दिन वह सुबह तनु को डाक्टर के यहां ले गया. उस का चैकअप करवाया. सब नौर्मल था. घर आ कर उस ने पैकिंग की. इस बार अपनी पैकिंग के साथ ही उसे तनु के सामान की भी पैकिग करनी पड़ी, क्योंकि अब वह तनु को अकेला नहीं रख सकता. उसे उस के मातापिता के घर पहुंचा कर जाएगा. सामान बैग में भरते हुए उस ने कमरे पर नजर डाली. अब पता नहीं कितने महीनों तक वह अपने घर, अपने कमरे में नहीं रह पाएगा. उस की आंखें भीग गईं. उस ने चुपचाप शर्ट की बांह से आंखें पोंछ लीं.

‘‘क्या हुआ जी?’’ तनु ने तड़प कर पूछा.

‘‘कुछ नहीं,’’ परम ने भरे गले से जवाब दिया.

‘‘इधर आओ मेरे पास,’’ तनु ने उसे अपने पास बुलाया और फिर उस का सिर अपने सीने पर रख कर उस के बाल सहलाने लगी. परम बच्चों की तरह बिलख कर रो पड़ा.

‘‘यह क्या… ऐसे दिल छोटा नहीं करते.

ये दिन भी बीत जाएंगे जी,’’ तनु उसे दिलासा देती रही.

वापस जाते हुए परम ने एक भरपूर नजर अपने घर को देखा और फिर तनु के साथ कार में बैठ गया. तनु के पिता का ड्राइवर उसे बस स्टैंड पहुंचाने आया था. वही वापसी में तनु को अपने मातापिता के घर पहुंचा देगा.

बसस्टैंड पहुंच कर परम ने अपना सामान निकाला और बस में चढ़ा दिया. वह चेहरे पर भरसक मुसकराहट ला कर तनु से बात कर रहा था औैर उसे तसल्ली दे रहा था. तनु अलबत्ता लगातार आंसू पोंछती जा रही थी. लेकिन परम तो पुरुष था न जिसे प्रकृति ने खुल कर रोने और अपना दर्द व्यक्त करने का भी अधिकार नहीं दिया है.

कोई नहीं समझ सकता कि कुछ क्षणों में एक पुरुष कितना असहाय हो जाता है. कितना टूट जाता है अंदर से जब दिल दर्द से तारतार हो रहा होता है और ऊपर से आप को मुसकराना पड़ता है, क्योंकि आप पुरुष हैं जो पौरुषेय और भावनात्मक मजबूती व स्थिरता का प्रतीक है. रोना आप को शोभा नहीं देता.

परम भी तनु को समझाता, सहलाता खड़ा रहा. बस चलने को हुई. बस ड्राइवर ने ऊपर चढ़ने का इशारा किया. तब परम ने तनु को गले लगाया और तुरंत पलट कर बस में चढ़ गया. सीट पर बैठ कर वह तनु को तब तक बाय करता रहा जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गईं.

परम ने अपना मोबाइल निकाला. मोबाइल के पारदर्शी कवर के अंदर एक छोटी सी रंगीन नग जड़ी बिंदी थी जो तनु के माथे से निकल कर न जाने कब रात में तकिए पर चिपक गई थी. परम ने उसे मन से सहेज कर अपने मोबाइल के कवर के अंदर चिपका लिया था. अब यही उस के साथ बिताई यादों का खजाना था जो अगल 3-4 या न जाने कितने महीनों तक उसे संबल देता रहेगा. रात के अंधेरे में अब कोई उस की कमजोरी देखने वाला नहीं था. एक पुरुष को रोते देख कर आश्चर्य करने या हंसने वाला कोई नहीं था. अब वह खुल कर अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता था. जी भर कर रो सकता था… परम मोबाइल कवर के अंदर से झांकती तनु की बिंदी पर माथा रख कर बेआवाज रोने लगा… आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे.

अपनी पत्नी से विदा ले कर एक फौजी ने वापस उस दुनिया के लिए यात्रा शुरू कर दी जहां कदमकदम पर सिर पर मौत मंडराती है. जहां से उसे नहीं पता कि वह कभी वापस आ कर पत्नी और बच्चे को कभी देख भी पाएगा या नहीं. बस हर पल जेब में सिंदूर की डिबिया रखे वह कुदरत से कामना करता रहता है कि बस इस बिंदी और उस अजन्मे बच्चे की खातिर उसे वापस भेज देना. Social Story In Hindi 

Family Story In Hindi : गली के मोड़ पे सूना सा इक दरवाजा

Family Story In Hindi : दिल के कहीं किसी कोने में कुछ दरकता सा महसूस हुआ. न जाने क्यों शिखा का मन ज़ारज़ार रोने को कर रहा था. पर उस के शिक्षित और सभ्य मन ने उसे डांट कर सख्ती से रोक लिया.

कितनी आसानी से हिमांशु ने कहा दिया था- “तुम भी न, क्या ले कर बैठ गई हो, क्या फर्क पड़ता है, तुम्हें कौन सा रहना है उस घर में, ईंट और गारे से बने उस निर्जीव से घर के लिए इतना मोह. अपने पापामम्मी को समझाओ कि फालतू में मरम्मत के नाम पर पैसा बरबाद करने की जरूरत नहीं. आज नहीं तो कल उन्हें उस घर को छोड़ कर बेटों के पास जाना ही पड़ेगा.”

निर्जीव…हिमांशु को क्या पता वह घर आज भी शिखा के तनमन में सांसें ले रहा था. पिछले साल की ही तो बात है, गरमी की छुट्टियों में शिखा को गांव वाले घर जाने का मौका मिला था. सच पूछो तो इस में नया क्या था, कुछ भी तो नहीं, साधारण सी तो बात थी. पर न जाने क्यों जर्जर होती उस घर की दीवारों को देख कर मन कैसाकैसा हो गया था. आखिर उस घर में बचपन बीता था उस का. चिरपरिचित सी दीवारें, घर का एकएक कोना न जाने क्यों शिखा को अपरचितों की तरह देख रहा था.

घर में नाममात्र के पड़े हुए फर्नीचर पर हाथ फेरने के लिए बढ़ाया हुआ शिखा का हाथ न जाने क्या सोच कर रुक गया. यादों के सारे पन्ने एकएक कर खुलने लगे. याद है उसे आज भी वह दिन. शादी के बाद पहली बार वह मम्मीपापा के साथ कुल देवता की पूजा करने आई थी. लाल महावर से रचे शिखा के पैरों ने जब घर की चौखट पर कदम रखा तो लगा मानो घर का कोनाकोना उस का स्वागत कर रहा था.

शायद इंसानों की तरह घरों की भी उम्र होती है. यह वही घर है जहां कभी रिश्तों की खिलखिलाहट गूंजती थी. बच्चों की किलकारियों से घर मंदमंद मुसकराता था. पर आज उस घर की दीवारों पर यहांवहां उखड़े पेंट नजर आ रहे थे. एक बार तो शिखा को ऐसा लगा मानो दीवारों पर उदास चेहरे उभर आए हों. घर के सामने खड़ा आम का विशाल पेड़ और उस की लंबीलंबी डालियों को देख कर आज भी उसे ऐसा लगा मानो वे गलबहियां के लिए तैयार हों. मां से छिप कर उस पेड़ की नर्म छांव में अपने भाइयों के साथ नमकमिर्च के साथ कितनी कैरियां खाई थीं उस ने.

पर पता नहीं क्यों आज उस की तरफ देखने का शिखा साहस नहीं कर सकी. शायद उस की आंखों में तैर आए मूक प्रश्नों को झेलने की शिखा में हिम्मत नहीं थी.

एकएक कर के उस घर के सारे परिंदे इस घोंसले को छोड़ कर नए घोंसलों में चले गए और यह घर चुपचाप जर्जर व उदास मन से उन्हें जाता देखता रहा. कल ही तो पापा का फोन आया था. पापा ने कितने उदास स्वर में कहा था. शिखा पीछे वाले अहाते की धरन टूट गई है, तेरी शादी के वक्त ही रंगरोगन करवाया था. तेरे भाइयों से कहा कि कुछ मदद कर दें तो वे अपना ही रोना ले कर बैठ गए. बेटा देखा नहीं जाता, तेरे बाबा और दादी की एक यही निशानी तो बची है.

क्या एक बार वह हिमांशु से बात कर के देखे पर हिमांशु के लिए तो यह सिर्फ निर्जीव और जर्जर मकान भर ही था. तो क्या मांजी..? शायद वे जरूर समझेंगी, आखिर वे भी तो…!!!

‘ये देखो देवी जी को, उलटी गंगा बहाने चली हैं. लोगों के यहां समधियाने से सामान आता है और ये वहां भेजने की बात कर रही हैं.’

‘मां जी, मैं उस घर की बेटी हूं, मेरा भी तो कुछ फर्ज है.’

शिखा का मुंह उतर गया था. घर के लोग उसे अजीब निग़ाहों से देख रहे जैसे उस ने कोई अजूबी बात कह दी हो. हिमांशु ने उसे जलती निग़ाहों से देखा. शायद उस का पुरुषत्व बुरी तरह आहत हो गया था. कमरें में जब सारी बात हो चुकी थी, फिर घर वालों के सामने यह तमाशा करने की क्या जरूरत है. वह अपनी मां के बारे में अच्छी तरह जानता था. उन्हें तो मौका मिलना चाहिए. आज शिखा की खैर नहीं, मां उसे उधेड़ कर रख देगी. हुआ भी वही.

‘शिखा, लोगों के मायके से न जाने क्याक्या आता है. पर हमारा ही समय ख़राब है कि सास बनने का सुख ही न जान सके. अरे भाई, मायके वाले कुछ दे न सके ठीक, पर दहेज में संस्कार भी न दे सके.’

शिखा की आंखें डबडबा गईं. शादी होने को 20 साल हो गए पर दहेज और संस्कार का ताना आज भी उस का पीछा न छोड़ पा रहे थे. उस ने बड़ी उम्मीद से हिमांशु की तरफ देखा. हिमांशु ने वितृष्णा से मुंह फेर लिया.

हिमांशु घर में सब से छोटे थे. बड़े भाइयों की शादियां अच्छे परिवारों में हुई थीं. अच्छे मतलब शादी में गाड़ी भर कर दहेज मिला था. मां जी की नजर में अच्छे परिवार का मतलब यही था. मां जी के पास कभी त्योहार तो कभी शगुन के नाम पर उपहारस्वरूप कुछ न कुछ समधियाने से आता ही रहता था. शिखा एक मध्यवर्गीय परिवार की इकलौती लड़की थी. पिता ने अपनी हैसियत के अनुसार सबकुछ दिया था. पर उस की जिंदगी मां जी की कसौटी पर कभी खरी न उतरी.

ऐसा नहीं था कि मां जी चांदी का चम्मच ले कर पैदा हुई हों. बचपन से ले कर जवानी तक उन का जीवन संघर्षों में ही बीता था.पापा जी एक साधारण सी नौकरी ही करते थे. पर बच्चों के चलते धन की वर्षा होने लगी. मां जी की तो मानो मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई. जो रिश्तेदार कब का उन से मुंह फेर चुके थे. एकएक कर जुड़ने लगे थे. मां जी भी उन पर खुलेहाथों से पैसा लुटातीं. शिखा ने कई बार दबे स्वर में हिमांशु से इस बात को कहा भी था कि इस तरह पैसा लुटाना कहां की समझदारी है. पर मां जी के फैसले के विरुद्ध जाने की किसी की भी हिम्मत न थी.

‘शिखा, मां का जीवन सिर्फ संघर्ष में ही बीत गया. अगर उन्हें इन सब चीजों से खुशी मिलती है तो तुम्हें क्या दिक्कत है?’

‘दिक्कत, हिमांशु, बात दिक्कत की नहीं पर मां जी जिस तरह से…’

‘तुम फालतू का दिमाग मत लगाओ. अगर भैयाभाभी को दिक्कत नहीं तो तुम क्यों फुदक रही हो.’

शिखा हिमांशु को देखती रह गई. क्या कहती, दिक्कत तो सभी को थी पर मां जी से कहने की हिम्मत किसी की भी न थी. कितनी बार चौके में जेठानियों को कसमसाते देखा है.

पिछले साल मौसी जी के इलाज के लिए मां जी ने एक लाख रुपए दे दिए थे. तो अभी पिछले महीने घर में काम करने वाली की बिटिया की शादी के नाम पर 10 हजार रुपए और पैर पूजने के नाम पर कपड़े, बरतन व न जाने क्या-क्या डे दिया. कभी मंदिर तो कभी जागरण के नाम पर हर महीने कुछ न कुछ जाता है रहता था. उन की मांगें सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही थीं.

एक दिन बड़े भैया ने दबे स्वर में कहा भी था-
‘मां, आप इस तरह से कभी सामान तो कभी पैसे बांटती रहती हो, कल अगर हमें जरूरत पड़ेगी तो क्या हमें कोई देगा?’

‘मैं ने लेने के लिए थोड़ी दिया है. तेरे पापा की कमाई से तो घर ही चल जाता, वही बड़ी बात थी. पर अब जब प्रकृति ने दिया है तो फिर क्यों न करूं.’

शिखा को यह बात कभी समझ न आई कि जिन रिश्तेदारों ने कभी बुरे समय में उन का साथ तक न दिया, आज उन पर यों पैसे लुटाना कहां तक सही था. “शिखा, अपने कमरे में जाओ,” हिमांशु की आवाज सुन कर शिखा सोच की दलदल से बाहर निकल आई. पता नहीं क्यों एक अजीब सी जिद उस के मन में घर कर गई थी, आज वह बात कर के ही जाएगी.

“मां जी, गांव वाला मकान जर्जर हो गया है, उस घर से मेरा बहुत जुड़ाव है. बाबा-दादी की आखिरी निशानी है वह.”

“तो?” मां जी ने बड़े तल्ख स्वर में कहा.
शिखा अपनेआप को मजबूती बांधे से खड़ी हुई थी. हिमांशु हमेशा की तरह उसे अकेला छोड़ अपने परिवार के साथ खड़े थे. इन बीते सालों में शिखा इतना तो समझ ही चुकी थी कि आज वह खुद के लिए खड़ी नहीं हुई तो कोई भी उस के लिए खड़ा न होगा. वैसे भी, अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होती है. जानती थी वह कि यहां जो होगा, सो होगा. बंद कमरे में चारदीवारी के बीच महीनों तक शिखा और हिमांशु के मध्य एक शीत युद्ध भी चलता रहेगा. पर आज नहीं तो शायद वह कभी भी न कह पाएगी.

“मां जी, मैं…मैं उस घर की मरम्मत के लिए कुछ पैसा भेजना चाहती हूं?”

शिखा का गला सूख गया. पता नहीं अब कौन सा भूचाल आने वाला था. सब उसे ऐसे देख रहे थे जैसे अभी ही निगल जाएंगे.

“देख लो, क्या जमाना आ गया है. बहू बेशर्मों की तरह मायके के लिए पैसे मांग रही है. एक जमाना था लोग बेटी के घरों का पानी तक नहीं पीते थे और यह अपने मायके के लिए ससुराल से पैसे मांग रही है. तेरे भाई भी तो हैं, तेरे पापा उन से क्यों नहीं मांग लेते?”

“पापा ने उन से भी कहा था पर बड़े भैया के अपने ही बहुत सारे खर्चे हैं और छोटे वाले ने पहले ही अपने मकान के लिए लोन ले रखा है, इसलिए…”

“इसलिए, मतलब” यहां कोई पेड़ लगा है. कल बाप के मरने के बाद हिस्सा हथियाने तो सब से पहले चले आएंगे. एक बार भी नहीं सोचेंगे कि बहन का भी तो हक बनता है. जब उन्हें कोई चिंता नहीं तो तुम क्या हो, न तीन में न तेरह में. तुम काहे चिंता में गली जा रही.”

शिखा की अंतरात्मा शब्दों के बाणों से बुरी तरह छलनी हो चुकी थी पर बोली, “मां जी, बेटी का हक सिर्फ जीवनभर पाने का नहीं होता. नौ महीने तो उसे भी पेट में रखा होता है. फिर जिम्मेदारी के नाम पर यह भेदभाव क्यों? एक लड़की को जीवनभर यह समझाया जाता है कि उसे पराए घर जाना है पर वह पराया घर भी उसे ताउम्र पराया ही समझता है. जीवन गुजर जाता है एक लड़की को यह समझने में ही कि उस का अपना घर कौन सा है. आप भी तो इस घर की बहू हैं और मैं भी. पर हमारे अधिकारों और कर्तव्यों में यह भेद क्यों?

“आप खुलेहाथों से रिश्तेदारों, नौकरचाकर सभी को कुछ भी दे सकती हैं. आप से पूछने वाला कोई भी नहीं. पर जब बात बहू के मायके वालों की आती है तब दुनियादारी और संस्कार की बातें क्यों होने लगती हैं. क्या गरीब और जरूरतमंद सिर्फ सास या ससुराल के रिश्तेदार ही हो सकते हैं, बहू के नहीं. अगर गलती से बहू का मायके का कोई रिश्तेदार कमजोर हो तो बहू पूरे परिवार के लिए हंसी का पात्र क्यों हो जाती है. भाई की पढ़ाई के लिए पापा ने कैसेकैसे इंतजाम किए थे, हिमांशु से कुछ भी नहीं छिपा है. पर किसी ने एक बार भी यह जानने या समझने की कोशिश की कि इस के परिवार को भी कभी जरूरत पड़ सकती है. अब तो मायके की जमीनजायदाद में लड़कियों की भी हिस्सेदारी होती है. तो फिर मायके की जिम्मेदारियों और कर्तव्यों में हिस्सेदारी क्यों नहीं?”

शिखा अपनी ही धुन में बोले जा रही थी, “वर्षों से जमा कितनाकुछ उस ने सब के सामने उड़ेल कर रख दिया था. जेठानियां आश्चर्य से उसे देख रही थीं. मां जी धप्प की आवाज के साथ सोफे पर बैठ गईं. एक अजीब सी नफरत उस ने उन की आंखों में महसूस की. सच सभी को पसंद होता बशर्ते वह सच खुद का न हो.

घर में एक गहरा सन्नाटा पसर गया, इतना गहरा कि अपनी सांसें भी सुनाई पड़ जाएं. शब्द कहीं खो से गए थे. इतने वर्षों में शब्द तो यदाकदा चुभते ही रहते थे पर आज सब का मौन बुरी तरह चुभ गया था. किसी के पास जवाब न था और शायद इस सवाल का जवाब कभी मिले भी न. हम जीवनभर इस बात के लिए लड़ते हैं कि सही कौन है. पर सही क्या है, क्या किसी ने कभी यह सोचा. लोग कहते हैं, औरत है तो घर घर है. पर क्या उस घर के फैसले भी? समझना आसान है पर समझाना कठिन.

शिखा भरे दिल और भरे कदमों से चुपचाप अपने कमरे में चली गई. Family Story In Hindi 

Social Story : खरीदी हुई दुल्हन – मंजू को किस बात का डर था ?

Social Story : 38 साल के अनिल का दिल अपने कमरे में जाते समय 25 साल के युवा सा धड़क रहा था. आने वाले लमहों की कल्पना ही उस की सांसों को बेकाबू किए दे रही थी, शरीर में झुरझुरी सी पैदा कर रही थी. आज उस की सुहागरात है. इस रात को उस ने सपनों में इतनी बार जिया है कि इस के हकीकत में बदलने को ले कर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा.

बेशक वह मंजू को पैसे दे कर ब्याह कर लाया है, तो क्या हुआ? है तो उस की पत्नी ही. और फिर दुनिया में ऐसी कौन सी शादी होती होगी जिस में पैसे नहीं लगते. किसी में कम तो किसी में थोड़े ज्यादा. 10 साल पहले जब छोटी बहन वंदना की शादी हुई थी तब पिताजी ने उस की ससुराल वालों को दहेज में क्या कुछ नहीं दिया था. नकदी, गहने, गाड़ी सभी कुछ तो था. तो क्या इसे किसी ने वंदना के लिए दूल्हा खरीदना कहा था. नहीं न. फिर वह क्यों मंजू को ले कर इतना सोच रहा था. कहने दो जिसे जो कहना था. मुझे तो आज रात सिर्फ अपने सपनों को हकीकत में बदलते देखना है. दुनिया का वह वर्जित फल चखना है जिसे खा कर इंसान बौरा जाता है. मन में फूटते लड्डुओं का स्वाद लेते हुए अनिल ने सुहागरात के लिए सजाए हुए अपने कमरे में प्रवेश किया.

अब तक उस ने जो फिल्मों और टीवी सीरियल्स में देखा था उस के ठीक विपरीत मंजू बड़े आराम से सुहागसेज पर बैठी थी. उस के शरीर पर शादी के जोड़े की जगह पारदर्शी नाइटी देख कर अनिल को अटपटा सा लगा क्योंकि उस का तो यह सोचसोच कर ही गला सूखे जा रहा था कि वह घूंघट उठा कर मंजू से बातों की शुरुआत कैसे करेगा. मगर यहां का माहौल देख कर तो लग रहा है जैसे कि मंजू तो उस से भी ज्यादा उतावली हो रही है.

अनिल सकुचाया सा बैड के एक कोने में बैठ गया. मंजू थोड़ी देर तो अनिल की पहल का इंतजार करती रही, फिर उसे झिझकते देख कर खुद ही उस के पास खिसक आई और उस के कंधे पर अपना सिर टिका दिया. यंत्रवत से अनिल के हाथ मंजू के इर्दगिर्द लिपट गए. मंजू ने अपनेआप को हलका सा धक्का दिया और वे दोनों ही बैड पर लुढ़क गए. मंजू ने अनिल के ऊपर झुकते हुए उस के होंठ चूमने शुरू कर दिए तो अनिल बावला सा हो उठा. उस के बाद तो अनिल को कुछ भी होश नहीं रहा. प्रकृति ने जैसे उसे सबकुछ एक ही लमहे में सिखा दिया.

मंजू ने उसे चरम तक पहुंचाने में पूरा सहयोग दिया था. अनिल का यह पहला अनुभव ऐसा था जैसे गूंगे को गुड़ का स्वाद, जिस के स्वाद को सिर्फ महसूस किया जा सकता है, बयान नहीं. एक ही रात में अनिल तो जैसे जोरू का गुलाम ही हो गया था. आज मंजू ने उसे वह तोहफा दिया था जिस के सामने सारी बादशाहत फीकी थी.

सुबह अनिल ने बेफिक्री से सोती हुई मंजू को नजरभर कर देखा. सबकुछ सामान्य ही था उस में. कदकाठी, रंगरूप और चेहरामोहरा सभी कुछ. मगर फिर भी रात जो खास बात हुई थी उसे याद कर के अनिल मन ही मन मुसकरा दिया और सोती हुई पत्नी को प्यार से चूमता हुआ कमरे से बाहर निकल गया.

मंजू जैसी भी थी, अनिल से तो इक्कीस ही थी. अनिल का गहरा सांवला रंग, मुटाया हुआ सा शरीर, कम पढ़ाईलिखाई सभीकुछ उस की शादी में रोड़ा बने हुए थे. अब तो सिर के बाल भी सफेद होने लगे थे. बहुत कोशिशों के बाद भी जब जानपहचान और अपनी बिरादरी में अनिल के रिश्ते की बात नहीं जमी तो उस की बढ़ती हुई उम्र को देखते हुए उस की बूआ ने उस की मां को सलाह दी कि अगर अपने समाज में बात नहीं बन रही है तो किसी गरीब घर की गैरबिरादरी की लड़की के बारे में सोचने में कोई बुराई नहीं है. और तो और, आजकल तो लोग पैसे दे कर भी दुलहन ला रहे हैं. बूआ की बात से सहमत होते हुए भी अनिल की मां ने एक बार उस की कुंडली मंदिर वाले पंडितजी को दिखाने की सोची.

पंडितजी ने कुंडली देख कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘बहनजी, शादी का योग तो हर किसी की कुंडली में होता ही है. किसीकिसी की शादी जल्दी तो किसी की थोड़ी देर से, मगर समझदार लोग आजकल कुंडली के फेर में नहीं पड़ते. आप तो कोई ठीकठाक सी लड़की देख कर बच्चे का घर बसा दीजिए. चाहे कुंडली मिले या न मिले. बस, लड़की मिल जाए और शादी के बाद दोनों के दिल.’’

अनिल की मां को बात समझ में आ गई और उन्होंने अपने मिलने वालों व रिश्तेदारों के बीच में यह बात फैला दी कि उन्हें अनिल के लिए किसी भी जातबिरादरी की लड़की चलेगी. बस, लड़की संस्कारी और दिखने में थोड़ी ठीकठाक हो.

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी. एक दिन अनिल की मां से मिलने एक व्यक्ति आया जो शादियां करवाने का काम करता था. उसी ने उन्हें मंजू के बारे में बताया और अनिल से उस की शादी करवाने के एवज में 20 हजार रुपए की मांग की. अनिल अपनी मां और बूआ के साथ मंजू से मिलने उस के घर गया. बेहद गरीब घर की लड़की मंजू अपने 5 भाईबहनों में तीसरे नंबर पर थी. उस से छोटा एक भाई और भाई से छोटी एक बहन रीना. मंजू की 2 बड़ी बहनें भी उस की ही तरह खरीदी गई थीं.

25 साल की युवा मंजू उम्र में अनिल से लगभग 12-13 साल छोटी थी. एक कमरे के छोटे से घर में इतने प्राणी कैसे रहते होंगे, यह सोच कर ही अनिल हैरान हो रहा था. उसे तो यह सोच कर हंसी आ रही थी कि कैसी परिस्थितियों में ये बच्चे पैदा हुए होंगे.

खैर, मंजू को देखने के बाद अनिल ने शादी के लिए हां कर दी. अब यह तय हुआ कि शादी का सारा खर्चा अनिल का परिवार ही उठाएगा और साथ ही, मंजू के परिवार को 2 लाख रुपए भी दिए जाएंगे ताकि उन का जीवनस्तर कुछ सुधर सके. 50 हजार रुपए एडवांस दे कर अनिल और मंजू की शादी का सौदा तय हुआ और जल्दी ही घर के 4 जने जा कर मंजू को ब्याह लाए. बिना किसी बरात और शोरशराबे के मंजू उस की पत्नी बन गई.

मंजू निम्नवर्गीय घर से आई थी, इसलिए अनिल के घर के ठाटबाट देख कर वह भौचक्की सी रह गई. बेशक उस का स्वागत किसी नववधू सा नहीं हुआ था मगर मंजू को इस का न तो कोई अफसोस था और न ही उस ने कभी इस तरह का कोई सपना देखा था. बल्कि वह तो इस घर में आ कर फूली नहीं समा रही थी. जितना खाना उस के मायके में दोनों वक्त बनता था उतना तो यहां एक वक्त के खाने में बच जाता है और कुत्तों को खिलाया जाता है. ऐसेऐसे फल और मिठाइयां उसे यहां देखने और खाने को मिल रहे थे जिन के उस ने सिर्फ नाम ही सुने थे, देखे और चखे कभी नहीं.

‘अगर मैं अनिल के दिल की रानी बन गई तो फिर घर की मालकिन बनने से मुझे कोई नहीं रोक सकता’, मंजू ने मन ही मन सोच लिया कि आखिरकार उसे घर की सत्ता पर कब्जा करना ही है.

‘सुना था कि पुरुष के दिल का रास्ता उस के पेट से हो कर जाता है. नहीं. पेट से हो कर नहीं, बल्कि उस की भूख की आनंददायी संतुष्टि से हो कर जाता है. फिर भूख चाहे पेट की हो, धन की हो या फिर शरीर की हो. यदि मैं अनिल की भूख को संतुष्ट रखूंगी तो वह निश्चित ही मेरे आगेपीछे घूमेगा. और फिर, तू मेरा राजा, मैं तेरी रानी, घर की महारानी’, यह सोचसोच कर मंजू खुद ही अपने दिमाग की दाद देने लगी.

‘बनो दिल की रानी’ अपने इस प्लान के मुताबिक, मंजू रोज दिन में 2 बार अनिल को ‘आई लव यू स्वीटू’ का मैसेज भेजने लगी. लंचटाइम में उसे फोन कर के याद दिलाती कि खाना टाइम पर खा लेना. वह शाम को सजधज कर अनिल को उस के इंतजार में खड़ी मिलती.

रात के खाने में भी वह अनिल को गरमागरम फुल्के अपने हाथ से बना कर ही खिलाती थी चाहे उसे घर आने में कितनी भी देर क्यों न हो जाए और खुद भी उस के साथ ही खाती थी. यानी हर तरह से अनिल को यह महसूस करवाती थी कि वह उस की जिंदगी में सब से विशेष व्यक्ति है. और हर रात वह अनिल को अपने क्रियाकलापों से खुश करने की पूरी कोशिश करती थी. उस ने कभी अनिल को मना नहीं किया बल्कि वह तो उसे प्यार करने को प्रोत्साहित करती थी. उम्र में छोटी होने के कारण अनिल उसे बच्ची ही समझता था और उस की हर नादानी को नजरअंदाज कर देता था.

कहने को तो अनिल अपने मांबाप का इकलौता बेटा था मगर कम पढ़ेलिखे होने और अतिसाधारण शक्लसूरत के कारण अकसर लोग उसे कोई खास तवज्जुह नहीं दिया करते थे. वहीं, उस की शादी भी नहीं हो रही थी. सो, अनिल हीनभावना का शिकार होने लगा था. मगर मंजू ने उसे यह एहसास दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि वह कितना काबिल और खास इंसान है बल्कि वह तो कहती थी कि अनिल ही उस की सारी दुनिया है.

मंजू के साथ और प्यार से अनिल का आत्मविश्वास भी बढ़ने लगा. मंजू को पा कर अनिल ऐसे खुश था जैसे किसी भूखे व्यक्ति को हर रोज भरपेट स्वादिष्ठ भोजन मिलने लगा हो.

एक दिन मंजू की मां का फोन आया. वे उस से मिलना चाह रही थीं. रात में मंजू ने अनिल की शर्ट के बटन खोलते हुए अदा से कहा, ‘‘मुझे कुछ रुपए चाहिए. मां ने मिलने के लिए बुलाया है. पहली बार जा रही हूं. अब इतने बड़े बिजनैसमैन की पत्नी हूं, खाली हाथ तो नहीं जा सकती न.’’

‘‘तो मां से ले लो न,’’ अनिल ने उसे पास खींचते हुए कहा.

‘‘मां से क्यों? मैं तो अपने हीरो से ही लूंगी. वह भी हक से,’’ कहते हुए मंजू ने अनिल के सीने पर अपना सिर टिका दिया.

‘‘कितने चाहिए? अभी ये रखो. और चाहिए तो कल दे दूंगा,’’ अनिल ने निहाल होते हुए उसे 20 हजार रुपए थमा दिए और फिर मंजू को बांहों में कसते हुए लाइट बंद कर दी.

मंजू 15 दिनों के लिए मायके गईर् थी. मगर 5 दिनों बाद ही अनिल को उस की याद सताने लगी. मंजू की शहदभरी बातें और मस्तीभरी शरारतें उसे रातभर सोने नहीं देतीं. उस ने अगले ही दिन मंजू का तत्काल का टिकट बनवा कर आने के लिए कह दिया. मंजू भी जैसे आने के लिए तैयार ही बैठी थी. उस के वापस आने के बाद अनिल की दीवानगी उस के लिए और भी बढ़ गई. अब मंजू हर महीने अनिल से

10-15 हजार रुपए ले कर अपने मायके भेजने लगी. मंजू ने अनिल से उस का एटीएम कार्ड नंबर और पिन आदि ले लिया. जिस की मदद से वह अपनी बहनों और भाई के लिए कपड़े, घरेलू सामान आदि भी औनलाइन और्डर कर के भेज देती. मंजू के प्यार का नशा अनिल के सिर चढ़ कर बोलने लगा था. ‘सैयां भए कोतवाल तो अब डर काहे का.’ घर में मंजू का ही हुक्म चलने लगा.

बेटे की इच्छा को देख अनिल की मां को न चाहते हुए भी तिजोरी की चाबियां बहू को देनी पड़ीं. सामाजिक लेनदेन आदि भी सबकुछ उसी की सहमति या अनुमति से होता था. अनिल की मां उसे कुछ नहीं कह पाती थीं क्योंकि मंजू ने उन्हें भी यह एहसास करवा दिया था कि उस ने अनिल से शादी कर के अनिल सहित उन के पूरे परिवार पर एहसान किया है.

‘‘सुनिए न, मेरी बड़ी इच्छा है कि मेरा नाम हर जगह आप के नाम के साथ जुड़ा हो,’’ एक दिन मंजू ने अनिल से बड़े ही अपनेपन से कहा.

‘‘अरे, इस में इच्छा की क्या बात है? वह तो जुड़ा ही है. देखो, तुम मेरी अर्धांगिनी हो यानी मेरा आधा हिस्सा. इस नाते मेरी हर चलअचल संपत्ति पर तुम्हारा आधा हक हुआ न,’’ अनिल ने प्यार से मंजू को समझाया.

‘‘वह तो ठीक है, मगर यह सब अगर कानूनी रूप से भी हो जाता तो कितना अच्छा होता. मगर उस में तो कई पेंच होंगे न. चलो, रहने दो. बिना मतलब आप परेशान हो जाएंगे,’’ मंजू ने बालों की लट को उंगलियों में लपेटते हुआ कहा.

‘‘मेरी जान, मेरे तन, मन और धन… सब की मालकिन हो तुम,’’ अनिल ने उसे बांहों में भरते हुए कहा और फिर एक दिन वकील और सीए को बुला कर अपने घरदुकान, बैंक अकाउंट व अन्य चलअचल प्रौपर्टी में मंजू को कानूनन अपना उत्तराधिकारी बना दिया.

इधर एक बच्चे की मां बन कर जहां मंजू ने अनिल के खानदान को वारिस दे कर सदा के लिए उसे अपना कर्जदार बना लिया वहीं मां बनने के बाद मंजू के रूप और यौवन में आए निखार ने अनिल की रातों की नींद उड़ा दी. अनिल को अब अपनी ढलती उम्र का एहसास होने लगा था. वह यह महसूस करने लगा था कि अब उस में पहले वाली ऊर्जा नहीं रही और वह मंजू की शारीरिक जरूरतें पहले की तरह पूरी नहीं कर पाता. अपनी इस गिल्ट को दूर करने के लिए वह मंजू की हर भौतिक जरूरत पूरी करने की कोशिश में लगा रहता. अनिल आंख बंद कर के मंजू की हर बात मानने लगा था.

मंजू बेशक अनिल की प्रौपर्टी की मालकिन बन गई थी मगर उस ने भी अपने दिल का मालिक सिर्फ और सिर्फ अनिल को ही बनाया था. वह यह बात कभी नहीं भूल सकी थी कि जब उस के आसपड़ोस के लोेग उसे ‘खरीदी हुई दुलहन’ कह कर हिकारत से देखते थे तब यही अनिल कैसे उस की ढाल बन कर सामने खड़ा हो जाता था और उसे दुनिया की चुभती हुई निगाहों से बचा कर अपने दिल में छिपा लेता था. उस की सास ने उसे कभी अपने खानदान की बहू जैसा सम्मान नहीं दिया था मगर फिर भी अपनी स्थिति से आज वह खुश थी.

उस ने बहुत ही योजनानुसार अपने परिवार को गरीबी के दलदल से बाहर निकाल लिया था. मंजू ने मोमबत्ती की तरह खुद को जला कर अपने परिवार को रोशन कर दिया था. मंजू ने दुकान के काम में मदद करने के लिए अपने भाई को अपने पास बुला लिया. इसी बीच अनिल की मां चल बसीं, तो अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए मंजू ने अपने मांपापा और छोटी बहन रीना को भी अपने पास ही बुला लिया.

एक दिन वही दलाल अनिल के घर आया जिस ने मंजू से उस की शादी करवाई थी. रीना को देखते ही उस की मां से बोला, ‘‘क्या कीमत लगाओगे लड़की की? किसी को जरूरत हो तो बताना पड़ेगा न?’’

‘‘मेरी बहन किसी की खरीदी हुई दुलहन नहीं बनेगी,’’ मंजू ने फुंफकारते हुए कहा.

‘‘खरीदी हुई दुलहन, बड़ी जल्दी पर निकल आए. अपनी शादी का किस्सा भूल गई क्या?’’ दलाल ने मंजू पर ताना कसते हुए मुंह बनाया.

‘‘मेरी बात और थी. मैं तो बिना सहारे की बेल थी जिसे किसी न किसी पेड़ से लिपटना ही था. मगर रीना के साथ ऐसा नहीं है. देर आए दुरुस्त आए. कुदरत ने उसे अनिल के रूप मे सिर पर छत दे दी है और पांवों के नीचे जमीन भी. अभी मैं जिंदा हूं और अपनी बहन की शादी कैसे करनी है, यह हम खुद तय कर लेंगे. आप जा सकते हैं. लेकिन हां, अनिल को मेरी जिंदगी में लाने के लिए मैं सदा आप की कर्जदार रहूंगी, धन्यवाद,’’ मंजू ने दलाल से हाथ जोड़ते हुए आभार जताया. वहीं पीछे खड़ा अनिल मुसकरा रहा था. आज उस के दिल में मंजू के लिए प्यार के साथसाथ इज्जत भी बढ़ गई थी. Social Story 

Romantic Story In Hindi : ऐ दिल संभल जा – रीमा को किस बात की चिंता हो रही थी ?

Romantic Story In Hindi : रीमा की आंखों के सामने बारबार डाक्टर गोविंद का चेहरा घूम रहा था. हंसमुख लेकिन सौम्य मुखमंडल, 6 फुट लंबा इकहरा बदन और इन सब से बढ़ कर उन का बात करने का अंदाज. उन की गंभीर मगर चुटीली बातों में बहुत वजन होता था, गहरी दृष्टि और गजब की याददाश्त. एक बार किसी को देख लें तो फिर उसे भूलते नहीं. उन  की ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा के गुण सभी गाते थे. उम्र 50 वर्ष के करीब तो होगी ही लेकिन मुश्किल से 35-36 के दिखते थे. रीमा बारबार अपना ध्यान मैगजीन पढ़ने में लगा रही थी लेकिन उस के खयालों में डाक्टर गोविंद आजा रहे थे.

रीमा ने जैसे ही पन्ना पलटा, फिर डाक्टर गोविंद का चेहरा सामने आ गया जैसे हर पन्ने पर उन का चेहरा हो वह हर पन्ने के बाद यही सोचती कि अब नहीं सोचूंगी उन के बारे में.

‘‘रीमा, जरा इधर आना,’’ रमा की मम्मी किचन से चिल्लाई.

‘‘अभी आई,’’ कहती हुई रीमा मैगजीन रख कर किचन में आ गई.

‘इस लड़की ने जब से कालेज में दाखिला लिया है, इस का दिमाग न जाने कहां रहता है’ मम्मी बड़बड़ा रही थी.

रीमा मैनेजमैंट का कोर्स कर रही है. मम्मी उसे कालेज भेजना ही नहीं चाहती थी. वह हमेशा चिल्लाती रहती कि 20वां चल रहा है, इस के हाथ पीले कर दो, लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने से क्या लाभ.

रीमा की जिद और पापा के सपोर्ट की वजह से उस का दाखिला कालेज में हुआ. मम्मी कम पढ़ीलिखी थी. उन का पढ़ाई पर जोर कम ही था. मम्मी की बातों से रीमा कुढ़ती रहती. और जब से उस ने डाक्टर गोविंद को देखा है, उसे और कुछ दिखता ही नहीं.

डाक्टर गोविंद जब क्लास ले रहे होते, रीमा सिर्फ उन्हें ही देखती रह जाती. वे किस टौपिक पर चर्चा कर रहे हैं, इस की भी सुध उसे कई बार नहीं होती. यह तो शुक्र था उस के सहपाठी अमित का, जो बाद में उस की मदद करता, अपने नोट्स उसे दे देता और यदि कोई टौपिक उस की समझ में नहीं आता तो वह उसे समझा भी देता.

वैसे रीमा खुद भी तेज थी. कोई चीज उस की नजरों से एक बार गुजर जाती, उसे वह कभी नहीं भूलती. डाक्टर गोविंद भी उस की तारीफ करते. उन के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर रीमा को बहुत अच्छा लगता. शर्म से उस की नजरें झुक जातीं. उसे ऐसा लगता कि डाक्टर गोविंद सिर्फ उसे ही देख रहे हैं. उस के चेहरे को पढ़ रहे हैं.

डाक्टर गोविंद रीमा के रोल मौडल बन गए. वह हर समय उन की तारीफ करती रहती. कोई स्टूडैंट उन के खिलाफ कुछ कहना चाहता तो वह एक शब्द न सुनती. एक दिन उस की सहेली सुजाता ने यों ही कह दिया, ‘गोविंद सर कुछ स्टूडैंट्स पर ज्यादा ही ध्यान देते हैं.’ बस, इतनी सी बात पर रीमा उस से झगड़ पड़ी. उस से बात करनी बंद कर दी.

रीमा भावनाओं में बह रही थी. उस ने डाक्टर गोविंद को समझने की कोशिश भी नहीं की. उन के दिल में अपने सभी छात्रों के लिए समान स्नेह था. वे सभी को प्रोत्साहित करते और जहां जरूरत होती, प्रशंसा करते. यह सब रीमा को नजर नहीं आता. वह कल्पनालोक की सैर करती रहती. उसे हर पल, चारों ओर डाक्टर गोविंद ही नजर आते.

उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह अपने दिल की बात डाक्टर गोविंद को जरूर बताएगी. कल वे मेरी ओर देख कर कैसे मुसकरा रहे थे. वे भी उस में दिलचस्पी लेते हैं. उस से अधिक बातें करते हैं. अगर वे मुझे पसंद नहीं करते तो क्यों सिर्फ मुझे नोट्स देने के बहाने बुलाते. देर तक मुझ से बातें करते रहते. शायद वे मुझ से अपनी चाहत का इजहार करना चाहते हैं लेकिन संकोचवश कर नहीं पाते.

रीमा को रातभर नींद नहीं आई, उनींदी में रात काटी और सुबह समय से पहले कालेज पहुंच गई. क्लास शुरू होने में अभी देर थी. मैरून कलर की कमीज, चूड़ीदार पजामा और गले में मैचिंग दुपट्टा डाले रीमा गजब की खूबसूरत लग रही थी. वह चहकती हुई सीढि़यां चढ़ रही थी. डाक्टर गोविंद अपनी क्लास ले कर उतर रहे थे. ‘‘अरे रीमा, तुम आ गई.’’

‘‘नमस्ते सर,’’ कहते हुए रीमा झेंप गई.

‘‘यह लो,’’ उन्होंने अपने हाथ में लिया गुलाब का फूल रीमा की ओर बढ़ा दिया.

‘‘थैंक्यू सर,’’ कह कर रीमा जल्दीजल्दी सीढि़यां चढ़ गई. वह क्लास में जा कर ही रुकी. उस की सांसें तेजतेज चल रही थी. वह बैंच पर बैठ गई. गुलाब का फूल देखदेख बारबार उस के होंठों पर मुसकराहट आ रही थी. उसे लगा उस का सपना साकार हो गया. उस का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. तभी अमित आ गया.

‘‘अकेली बैठी यहां क्या कर रही हो? अरे, गुलाब का फूल. बहुत खूबसूरत है. मेरे लिए लाई हो तो दो न. शरमा क्यों रही हो?’’ अमित ने गुलाब छूने के लिए हाथ बढ़ाया.

रीमा बिफर पड़ी. ‘‘यह क्या तरीका है? ऐसे क्यों बिहेव कर रहे हो, जंगली की तरह.’’

‘‘अरे, तुम्हें क्या हो गया? मैं ने तो ऐसा कुछ नहीं किया. वैसे, बिहेवियर तो तुम्हारा बदला हुआ है. कहां खोई रहती हैं मैडम आजकल?’’

‘‘सौरी अमित, पता नहीं मुझे क्या हुआ अचानक…’’

‘‘अच्छा, छोड़ो इन बातों को. सैमिनार हौल में चलो.’’

‘‘क्यों? अभी तो गोविंद सर की क्लास है.’’

‘‘अरे पागल, गोविंद सर अब क्लास नहीं लेंगे. वे आज ही यहां से जा रहे हैं. उन का दिल्ली यूनिवर्सिटी में वीसी के पद पर चयन हुआ है. सभी लोग हौल में जमा हो रहे हैं. उन का विदाई समारोह है. उठो, चलो.’’

रीमा की समझ में कुछ नहीं आया. वह सम्मोहित सी अमित के पीछेपीछे चल प. सैमिनार हौल में छात्र जमा थे. रीमा को आश्चर्य हो रहा था कि इतना कुछ हो गया, उसे पता ही नहीं चला. वह कल्पनालोक में विचरती रही और हकीकत में उस का सारा नाता टूटता गया.

वह इन्हीं विचारों में मग्न थी कि गोविंद सर की बातों ने उस का ध्यान भंग किया.

‘‘मैं भले ही यहां से जा रहा हूं लेकिन चाहता हूं कि जीवन में किसी मोड़ पर कोई स्टूटैंट मुझे मिले तो वह तरक्की की नई ऊंचाई पर मिले. एक छात्र का एकमात्र उद्देश्य अपनी मंजिल पाना होना चाहिए. अन्य बातों को उसे नजरअंदाज कर के आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि एक बार मन भटका, तो फिर अपना लक्ष्य पाना अत्यंत मुश्किल हो जाता है. मेरे लिए सभी छात्र मेरी संतान के समान हैं. मैं चाहता हूं कि सभी खूब पढ़ें और अपना व अपने मातापिता का नाम रोशन करें.’’

तालियों की गड़गड़ाहट में उन की आवाज दब गई. सभी उन्हें विदा करने को खड़े थे. कई  छात्रों की आंखें नम थीं लेकिन होंठों पर मुसकराहट तैर रही थी. डाक्टर गोविंद के शब्दों में जाने क्या जादू था कि रीमा भी नम आंखों और होंठों पर मुसकराहट लिए अपना हाथ हिला रही थी. गुलाब का फूल अपनी खुशबू बिखेर रहा था. Romantic Story In Hindi

Family Story – व्यावहारिक दीपाली – सेल्सगर्ल की क्या थी कहानी ?

Family Story : दी पाली की याद आते ही आंखों के सामने एक सुंदर और हंसमुख चेहरा आ जाता है. गोल सा गोरा चेहरा, सुंदर नैननक्श, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी और होंठों पर सदा रहने वाली हंसी.

असम आए कुछ ही दिन हुए थे. शहर से बाहर बनी हुई उस सरकारी कालोनी में मेरा मन नहीं लगता था. अभी आसपड़ोस में भी किसी से इतना परिचय नहीं हुआ था कि उन के यहां जा कर बैठा जा सके.

एक दोपहर आंख लगी ही थी कि दरवाजे की घंटी बजी. मैं ने कुछ खिन्न हो कर दरवाजा खोला तो सामने एक सुंदर और स्मार्ट सी असमी युवती खड़ी थी. हाथ में बड़ा सा बैग, आंखों पर चढ़ा धूप का चश्मा, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी. इस से पहले कि मैं कुछ पूछती, वह बड़े ही अपनेपन से मुसकराती हुई भीतर की ओर बढ़ी.

कुरसी पर बैठते हुए उस ने कहा, ‘‘आप नया आया है न?’’ तो मैं चौंकी फिर उस के बाद जो भी हिंदीअसमी मिश्रित वाक्य उस ने कहे वह बिलकुल भी मेरे पल्ले नहीं पड़े. लेकिन उस का व्यक्तित्व इतना मोहक था कि उस से बातें करना हमेशा अच्छा लगता था. उस की बातें सुन कर मैं ने पूछा, ‘‘आप सूट सिलती हैं?’’

‘‘हां, हां,’’ वह उत्साह से बोली तो एक सूट का कपड़ा मैं ने ला कर उसे दे दिया.

‘‘अगला वीक में देगा,’’ कह कर वह चली गई.

यही थी दीपाली से मेरी पहली मुलाकात. पहली ही मुलाकात में उस से एक अपनेपन का रिश्ता जुड़ गया. उस से मिल कर लगा कि पता नहीं कब से उसे जानती थी. यह दीपाली के व्यवहार, व्यक्तित्व का ही असर था कि पहली मुलाकात में बिना उस का नामपता पूछे और बिना रसीद मांगे हुए ही मैं ने अपना महंगा सूट उसे थमा दिया था. आज तक किसी अजनबी पर इतना विश्वास पहले नहीं किया था.

वह तो मीरा ने बाद में बताया कि उस का नाम दीपाली है और वह एक सेल्सगर्ल है. कितना सजधज कर आती है न. कालोनी की औरतों को दोगुने दाम में सामान बेच कर जाती है. मैं तो उसे दरवाजे से ही विदा कर देती हूं. दीपाली के बारे में ज्यादातर औरतों की यही राय थी.

मैं ने कभी दीपाली को मेकअप किए हुए नहीं देखा. सिर्फ एक लाल बिंदी लगाने पर भी उस का चेहरा दमकता रहता था. उस का हर वक्त खिल- खिलाना, हर किसी से बेझिझक बातें करना और व्यवहार में खुलापन कई लोगों को शायद खलता था. पर मस्तमौला सी दीपाली मुझे भा गई और जल्द ही वह भी मुझ से घुलमिल गई.

उस के स्वभाव में एक साफगोई थी. उस का मन साफ था. जितना अपनापन उस ने मुझ से पाया उस से कई गुना प्यार व स्नेह उस ने मुझे दिया भी.

‘आप इतना सिंपल क्यों रहता है?’ दीपाली अकसर मुझ से पूछती. काफी कोशिश करने पर भी मैं स्त्रीलिंगपुल्ंिलग का भेद उसे नहीं समझा पाई थी, ‘कालोनी में सब लेडीज लोग कितना मेकअप करता है, रोज क्लब में जाता है. मेरे से कितना मेकअप का सामान खरीदता है.’

अकसर लेडीज क्लब की ओर जाती महिलाओं के काफिले को अपनी बालकनी से मैं भी देखती थी. मेकअप से लिपीपुती, खुशबू के भभके छोड़ती उन औरतों को देख कर मैं सोचती

कि कैसे सुबह 10 बजे तक इन का काम निबट गया होगा, खाना बन गया होगा और ये खुद कैसे तैयार हो गई होंगी.

दीपाली ने एक बार बताया था, ‘आप नहीं जानता. ये लेडीज लोग सब अच्छाअच्छा साड़ी पहन कर, मेकअप कर के क्लब चला जाता है और पीछे सारा घर गंदा पड़ा रहता है. 1 बजे आ कर जैसेतैसे खाना बना कर अपने मिस्टर लोगोें को खिलाता है. 4 नंबर वाली का बेटाबेटी मम्मी के जाने के बाद गंदी पिक्चर देखता है.’

मुझे दीपाली का इंतजार रहता था. मैं उस से बहुत ही कम सामान खरीदती फिर भी वह हमेशा आती. उसे हमारा खाना पसंद आता था और जबतब वह भी कुछ न कुछ असमी व्यंजन मेरे लिए लाती, जिस में से चावल की बनी मिठाई ‘पीठा’  मुझे खासतौर पर पसंद थी. मैं उसे कुछ हिंदी वाक्य सिखाती और कुछ असमी शब्द मैं ने भी उस से सीखे थे. अपनी मीठी आवाज में वह कभी कोई असमी गीत सुनाती तो मैं मंत्रमुग्ध हो सुनती रह जाती.

हमेशा हंसतीमुसकराती दीपाली उस दिन गुमसुम सी लगी. पूछा तो बोली, ‘जानू का तबीयत ठीक नहीं है, वह देख नहीं सकता,’ और कहतेकहते उस की आंखों में आंसू आ गए. जानू उस के बेटे का नाम था. मैं अवाक् रह गई. उस के ठहाकों के पीछे कितने आंसू छिपे थे. मेरे बच्चों को मामूली बुखार भी हो जाए तो मैं अधमरी सी हो जाती थी. बेटे की आंखों का अंधेरा जिस मां के कलेजे को हरदम कचोटता हो वह कैसे हरदम हंस सकती है.

मेरी आंखों से चुपचाप ढलक कर जब बूंदें मेरे हाथों पर गिरीं तो मैं चौंक पड़ी. मैं देर तक उस का हाथ पकड़े बैठी रही. रो कर कुछ मन हलका हुआ तो दीपाली संभली, ‘मैं कभी किसी के आगे रोता नहीं है पर आप तो मेरा अपना है न.’

मेरे बहुत आग्रह पर दीपाली एक दिन जानू को मेरे घर लाई थी. दीपाली की स्कूटी की आवाज सुन मैं बालकनी में आ गई. देखा तो दीपाली की पीठ से चिपका एक गोरा सुंदर सा लगभग 8 साल का लड़का बैठा था.

‘दीपाली, उस का हाथ पकड़ो,’ मैं चिल्लाई पर दीपाली मुसकराती हुई सीढि़यों की ओर बढ़ी. जानू रेलिंग थामे ऐसे फटाफट ऊपर चला आया जैसे सबकुछ दिख रहा हो.

‘यह कपड़ा भी अपनी पसंद का पहनता है, छू कर पहचान जाता है,’ दीपाली ने बताया.

‘जानू,’ मैं ने हाथ थाम कर पुकारा.

‘यह सुन भी नहीं पाता है ठीक से और बोल भी नहीं पाता है,’ दीपाली ने बताया.

वह बहुत प्यारा बच्चा था. देख कर कोई कह ही नहीं सकता कि उसमें इतनी कमियां हैं. जानू सोफा टटोल कर बैठ गया. वह कभी सोफे पर खड़ा हो जाता तो कभी पैर ऊपर कर के लेट जाता.

‘आप डरो मत, वह गिरेगा नहीं,’ दीपाली मुझे चिंतित देख हंसी. सचमुच सारे घर में घूमने के बाद भी जानू न गिरा न किसी चीज से टकराया.

जाते समय जानू को मैं ने गले लगाया तो वह उछल कर गोद में चढ़ गया. उस बेजबान ने मेरे प्यार को जैसे मेरे स्पर्श से महसूस कर लिया था. मेरी आंखें भर आईं. दीपाली ने उसे मेरी गोद से उतारा तो वह वैसे ही रेलिंग थामे सहजता से सीढि़यां उतर कर नीचे चला गया. दीपाली ने स्कूटी स्टार्ट की तो जा कर उस पर चढ़ गया और दोनों हाथों से मां की कमर जकड़ कर बैठ गया.

‘अब घर जा कर ही मुझे छोड़ेगा,’ दीपाली हंस कर बोली और चली गई.

मैं दीपाली के बारे में सोचने लगी. घंटे भर तक उस बच्चे को देख कर मेरा तो जैसे कलेजा ही फट गया था. हरदम उसे पास पा कर उस मां पर क्या गुजरती होगी, जिस के सीने पर इतना बोझ धरा हो. वह इतना हंस कैसे सकती है. जब दर्द लाइलाज हो तो फिर उसे चाहे हंस कर या रो कर सहना तो पड़ता ही है. दीपाली हंस कर इसे झेल रही थी. अचानक दीपाली का कद मेरी नजरों में ऊपर उठ गया.

एक दिन सुबहसुबह दीपाली आई. मेखला चादर में बहुत जंच रही थी. ‘आप हमेशा ऐसे ही अच्छी तरह तैयार हो कर क्यों नहीं आती हो?’ मैं ने प्रशंसा करते हुए कहा. इस पर दीपाली ने खुल कर ठहाका लगाया और बोली, ‘सजधज कर आएगा तो लेडीज लोग घर में नहीं घुसने देगा. उन का मिस्टर लोग मेरे को देखेगी न.’

मुझे तब मीरा की कही बात

याद आई कि दीपाली के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा था जो औरतों में ईर्ष्या जगाता था.

‘मैं भाग कर शादी किया था. मैं ऊंचा जात का था न अपना आदमी

से. घर वाला लोग मानता नहीं था,’ दीपाली कभीकभी अपनी प्रेम कथा सुनाती थी.

जहां कालोनी में मेरी एकदो महिलाओं से ही मित्रता थी वहां दीपाली के साथ मेरी घनिष्ठता सब की हैरानी का सबब थी. जानू हमारे घर आता तो पड़ोसियों के लिए कौतूहल का विषय होता. एक स्थानीय असमी महिला से प्रगाढ़ता मेरे परिचितों के लिए आश्चर्यजनक बात थी.

जब दीपाली को पता चला कि हमारा ट्रांसफर हो गया है तो कई दिनों पहले से ही उस का रोना शुरू हो गया था, ‘आप चला जाएगा तो मैं क्या करेगा. आप जैसा कोई कहां मिलेगा,’ कहतेकहते वह रोने लगती. दीपाली जैसी सहृदय महिला के लिए हंसना जितना सरल था रोना भी उतना ही सहज था. दुख मुझे भी बहुत होता पर अपनी भावनाएं खुल कर जताना मेरा स्वभाव नहीं था.

आते समय दीपाली से न मिल पाने का अफसोस मुझे जिंदगी भर रहेगा. हमें सोमवार को आना था पर किन्हीं कारणवश हमें एक दिन पहले आना पड़ा. अचानक कार्यक्रम बदला. दोपहर में हमारी फ्लाइट थी. मैं सुबह से दीपाली के घर फोन करती रही. घंटी बजती  रही पर किसी ने फोन उठाया नहीं, शायद फोन खराब था. मैं जाने तक उस का इंतजार करती रही पर वह नहीं आई. भरे मन से मैं एअरपोर्ट की ओर रवाना हुई थी.

बाद में मीरा ने फोन पर बताया था कि दीपाली सोमवार को आई थी और हमारे जाने की बात सुन कर फूटफूट कर रोती रही थी. वह मुझे देने के लिए बहुत सी चीजें लाई थी, जिस में मेरा मनपसंद ‘पीठा’ भी था.

मैं ने कई बार फोन किया पर वह फोन शायद अब तक खराब पड़ा है. पत्र वह भेज नहीं सकती थी क्योंकि उसे न हिंदी लिखनी आती है न अंगरेजी और असमी भाषा मैं नहीं समझ पाती.

दीपाली का मेरी जिंदगी में एक खास मुकाम है क्योंकि उस से मैं ने हमेशा जीने की, मुसकराने की प्रेरणा पाई है. हमारे शहरों में बहुत ज्यादा दूरियां हैं पर अब भी वह मेरे दिल के बहुत करीब है और हमेशा रहेगी.  Family Story 

Obesity In India : देश में मोटापा बड़ी समस्या, आखिर क्या है उपचार जानिए विशेषज्ञों से

Obesity In India : दिल्ली में आईजेसीपी ग्रुप द्वारा आयोजित ओबेसिटास मिडटर्म 2025 सम्मेलन में, दक्षिण एशियाई मोटापा फोरम और एशियाई मोटापा जर्नल के सहयोग से, वहां मौजूद विशेषज्ञों ने मोटापे को एक दीर्घकालिक और बारबार लौटने वाली बीमारी के रूप में मान्यता देने और उस का गंभीर प्रबंधन करने की आवश्यकता पर जोर दिया है.

उन्होंने कहा कि मोटापा भारत में गैर संक्रामक रोगों के संकट को बढ़ा रहा है, जैसे कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, जिगर की समस्याएं, प्रजनन जटिलताएं, श्वसन संबंधी समस्याएं और मानसिक व सामाजिक चुनौतियां. विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य प्रणाली और नीति निर्माताओं से इसे प्राथमिकता देने का आग्रह किया.

आईजेसीपी ग्रुप और मेडटौक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी निलेश अग्रवाल ने कहा, “मोटापा हमारे समय की प्रमुख स्वास्थ्य चुनौती है. यह हर चिकित्सा क्षेत्र, हर परिवार और हर समुदाय को प्रभावित कर रहा है.”

वहां मौजूद डा. संजय कालरा, जो कि अंतरराष्ट्रीय एंडोक्रिनोलौजी सोसाइटी के शिक्षा कार्य समूह के अध्यक्ष हैं, ने कहा, “शिक्षा ही मोटापे की समस्या में बदलाव की नींव है. हमें चिकित्सकों को ऐसा ज्ञान उपलब्ध कराना चाहिए जो व्यावहारिक, सहज और सहानुभूतिपूर्ण हो.” और डा. दीना श्रेष्टा ने इसे एक दीर्घकालिक बीमारी बताया.
भारत समेत दुनियाभर में मोटापा बड़ी समस्या बन कर उभरा है. एनएफएचएस का डाटा बताता है कि भारत में 24 प्रतिशत महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुष का वजन सामान्य से अधिक है.

यूसीएमएस के एंडोक्रिनोलौजी विभाग के प्रमुख निशांत रायजादा, “हम विज्ञान और वास्तविक चिकित्सा अभ्यास के बीच पुल बना रहे हैं, जिस में पोषण संबंधी विज्ञान, आंत्रजीव विज्ञान, दवाओं का उपयोग और शस्त्रक्रिया शामिल हैं.”

वहीं प्रो. नितिन कपूर, एंडोक्रिनोलौजी विभाग, सीएमसी वेल्लोर ने छिपे हुए जोखिमों पर ध्यान दिलाया, उन्होंने कहा, “मांसपेशियों के नुकसान और अतिरिक्त वसा का संयोजन, यानी मांसपेशियों की कमजोरी के साथ मोटापा, अब विकलांगता का एक छिपा हुआ कारण बन रहा है. मोटापे की देखभाल में ताकत बनाए रखना, जटिलताओं को रोकना और दीर्घकालिक जीवन शक्ति सुनिश्चित करना जरूरी है.”

बता दें इस सम्मलेन में 400 से अधिक स्वस्थ्य पेशेवरों ने भाग लिया. जिसे में मोटापे के कारण, निदान और उपचार के पहलुओं पर चर्चा की गई. नई पद्धतियों पर चर्चा हुई. ख़ास बात इस में युवा शोधकर्ताओं के पेपर और पोस्टर का प्रस्तुतीकरण भी हुआ.  Obesity In India

Romantic Story In Hindi : प्यार के लम्हे – नारी के दुखों की दास्तान

Romantic Story In Hindi : व्यक्ति बढ़ती उम्र की दहलीज पर क्यों न खड़ा हो लेकिन मन में दबी प्यार की कसक, एहसास को हरदम महसूस करता है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था.

फौज से रिटायर हो कर गांव आया तो मैं शरीर से स्वस्थ था. लेकिन मेरे हिस्से में आया बाऊजी का मकान जो जर्जर हो चुका था. उसे ठीक करवाने में 2 महीने लग गए. शुरू के 2 महीने मैं घर में ही व्यस्त रहा. मिस्त्री, मजदूरों से काम करवाना आसान न था. थोड़ा सा इधरउधर हो जाओ तो काम बंद हो जाता था.
2 महीने बाद जब मैं गांव में अपने खेतों के लिए निकला तो कई जानपहचान वाले पूछने लगे, ‘‘कब आए? ’’
2 महीने बताने पर वे हैरान होते. आज दिखाई दिए. मैं कहता, ‘‘मकान ठीक करवा रहा था.’’
मैं अपने खेतों की ओर निकल गया. फसल लहलहा रही थी. मैं यादों में खो गया.
तब मेरी उम्र शायद 16 साल की थी. भरपूर जवानी थी. हमारे खेतों के साथ वेदो के बापू के खेत थे. वेदो भी अपने बापू के साथ आ जाती थी. सुंदर और सजीली, दमकता गोरा रंग था. उस के बाएं गाल पर छोटा सा काला तिल था जो उस की सुंदरता को और बढ़ा देता था. बस थोड़ा सा मुंह टेढ़ा था. ध्यान से देखने पर पता चलता था. उस की उम्र भी मेरे जितनी थी.

मेरे साथ खेला करती थी. खेलतेखेलते उस के शरीर को छू लेना बहुत अच्छा लगता था. शायद उसे भी अच्छा लगता हो. वह कुछ नहीं बोलती थी, केवल मुसकराती रहती थी. जाने वे मस्तीभरे दिन कहां चले गए? आज भी उन्हें याद करता हूं तो रोमांचित हो उठता हूं.

मैं फौज में चला गया और वह मदीनपुर गांव में ब्याह दी गई. फिर वह मुझे कभी नहीं मिली. मैं आज भी उन दिनों की याद कर के सिहर उठता हूं. उस का शरीर बहुत गठीला था. हम दोनों पर हमेशा मस्ती छाई रहती थी.

मैं अपने खेत में खड़ा अब भी रोमांचित हो रहा था कि साथ के खेत में काम कर रहे वेदो के बापूजी ने आवाज दी, ‘‘फौजी साहब, कब छुट्टी पर आए और कब वापस जाना है? ’’
मैं ने कहा, ‘‘बापूजी, मैं पैंशन पर आ गया हूं. अब मुझे वापस नहीं जाना है. यहीं रह कर खेतों में काम करूंगा. ’’
‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है. खेतों की संभाल चंगी हो जाएगी. वैसे, गिरधारी बहुत अच्छा काम करता है.’’
‘‘जी बापूजी.’’
बातोंबातों में मैं ने वेदो के बारे में पूछा. उन्होंने कहा, ‘‘ठीक ही होगी. उसे आए तो जमाना गुजर गया.’’
‘‘आप भी देखने नहीं गए?’’
‘‘गया था, एकदो बार देखने, फिर सोचा, लड़की है, उस के घर बारबार जाना ठीक नहीं है.’’
फिर वे जाने कहां खो गए थे. मैं समझ गया कि सबकुछ ठीक नहीं है. मैं ने कहा, ‘‘मदीनपुर में मेरी मौसी रहती है. मैं उस से मिलने जाऊंगा तो वेदो से मिलूंगा.’’
‘‘ठीक है, मिल लेना.’’
फिर वे अपने खेतों में काम करने लगे थे. मैं अपने दूसरे खेतों में चला आया. आसमान की ओर देखा तो बादल घिर आए थे. शायद बरसात आए. खेतों में ‘चैना’ यानी चावल लगे थे. बरसात की जरूरत भी थी, विशेषकर उन खेतों के लिए जिन के पास ट्यूबवैल नहीं थे.

मौसम सुहाना हो रहा था. खेत में बनाई झौंपड़ी तक पहुंचतेपहुंचते बारिश तेज हो गई थी. मैं भीग गया था. उस दिन भी ऐसी ही बारिश थी. वेदो बापूजी को रोटी दे कर मेरे पास झौंपड़ी में आ गई थी. पूरी तरह भीगी हुई थी. भीगने से उस का सारा शरीर निखर गया था. मैं उसे देखता ही रह गया था. मेरे ऐसा देखने पर वह शर्म से छुईमुई हो गई थी. बोली कुछ नहीं थी, केवल अपने शरीर को ढकती रही थी. उस दृश्य को याद कर के आज भी उस पर प्यार आ रहा था. प्यार के ऐसे लम्हे जीवन में फिर कभी नहीं मिले.

बारिश अपना जोर मार कर थम चुकी थी. दूर खेत में गिरधारी बारिश में भी काम करता रहा था. मैं उस के पास गया, पूछा, ‘‘क्या हो रहा है, गिरधारी?’’
‘‘चावल के खेत से घास निकाल रहा हूं.’’
‘‘और मजदूर मंगवा लेने थे.’’
‘‘बोला था, लेकिन बारिश के कारण नहीं आए. अब आ जाएंगे तो काम जल्दी हो जाएगा. तुसीं आराम करोजी. मैं सब कर लूंगा.’’
मैं घर आ गया. चंपा ने खाना बना रखा था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘खाने में क्या बनाया है?’’
‘‘मक्की की रोटी और सरसों दा साग.’’
‘‘वाह, मजा आएगा. मक्की की रोटी का नाम सुन के भूख तेज हो गई है.’’
उस ने एक बड़ी मक्की की रोटी पर ही सरसों का साग डाल कर ऊपर काफी सारा मक्खन डाल दिया. गांवों में मक्की की रोटी को साग के साथ ऐसे ही खाते हैं. थाली नहीं लेते, चाहे, जमाना बदल गया है. खाने में कुछ नहीं बदला. दाल, चावल, महानी हाथ से ‘फुर्रे’ मार कर खाते हैं. खाते समय मुंह से ‘फुर्र’ की आवाज आनी चाहिए. जिस ने बनाया है उसे पता चलता है कि दाल, चावल, महानी स्वादिष्ठ बने हैं.
मक्की की रोटी बड़ी थी, साग भी बहुत स्वादिष्ठ बना था. एक रोटी में ही पेट भर गया था पर नीयत नहीं भरी थी. मैं ने चंपा से कहा, ‘‘सुबह ‘शाहवेले’ यानी नाश्ते में भी मक्की की रोटी
बना देना.’’
वह मुसकराई और किचन संभाल कर अपने घर चली गई.

मैं फिर अपने खयालों में खो गया. वेदो मेरे साथ स्कूल जाती थी, सिर्फ पढ़ाई की बातें होती थीं. पढ़ने में होशियार थी पर न जाने क्यों उसे मैट्रिक से आगे नहीं पढ़ाया गया. पूछा तो बापूजी ने कहा, ‘‘आगे पढ़ कर क्या करेगी? घर का चूल्हाचौका ही तो संभालना है? उस की शादी कर
देनी है.’’
जाने क्यों लड़कियों को न पढ़ाने की मानसिकता आज भी गांवों में है. एक दिन मेरे पास आई और कहने लगी, ‘देखो, मेरे सुंदर कपड़े.’
भोलेपन से वह मुसकराई थी. मैं ने कहा, ‘तेरी शादी हो रही है?’

उस ने ‘हां’ में सिर हिलाया और भाग गई थी. वह बहुत खुश थी. शादी के बाद हाथ की लकीरें बदल जाती हैं. कच्ची उम्र में, जिसे शादी का कुछ पता ही नहीं है, उस का जीवन कैसे होगा? मन में उठे इस प्रश्न का उत्तर आज भी नहीं पाता हूं. गांव में बहुत कम लड़कियां पढ़ पाती हैं.
सुबह उठा. अपने लिए चाय बनाई और सैर के लिए निकल गया. हमारी सैर की जगह हमारे खेत होते हैं. मैं घर के पास अपने खेत में गया तो वहां गरमी में उगाई जाने वाली सब्जियां लगी हुई थीं. चंपा वहां से सब्जियां तोड़ रही थी. अच्छा लगा. हम घर की ताजी सब्जियां खाते हैं. शहरों में ये दूरदूर तक नहीं मिलतीं.
चंपा ने पूछा, ‘‘यहां घीए बहुत लगे हैं और तुसी घीया खाते नहीं.’’
मैं ने कहा, ‘‘घीया नहीं खाता हूं, इस के कोफ्ते बना कर सब्जी बना लो,
खा लूंगा.’’
‘‘ठीक है जी, आज बनाती हूं.’’
‘‘पता है न, कैसे बनाते हैं?’’
‘‘हां जी.’’

मैं अपने आमों के बाग की ओर बढ़ गया. हमारे न जाने किन बुजुर्गों ने यह बाग लगाया था. मुझे बाऊजी की बात याद आ गई थी. ‘चोला’ छोड़ने से पहले उन्होंने कहा था, ‘ये खेतखलियान हमारे बुजुर्गों की धरोहर हैं. उन की जान इन में बसती है. इन्हें संभाल कर रखना. उन्होंने गरमीसर्दी, बरसात और आपदा में इन की संभाल की थी.’
मैं ने अपने किसी खेत और बाग को नहीं बेचा था. मेरे दोनों बेटे आते हैं और एंजौए कर के अपने काम पर चले
जाते हैं. मेरे बाद, मुझे नहीं लगता,
मेरी आगामी पीढ़ी इन खेतों को
संभाल पाएगी.
मेरी पत्नी संसार छोड़ गई थी. चंपा मेरे लिए खाना और घर के काम करती थी. बाल विधवा थी. उस की मां केवल उस के लिए मकान छोड़ गई थी. मैं उसे बचपन से जानता था, इसलिए उसे रख लिया. घर के मैंबर की तरह रहती थी. खाना मेरे यहां खा लेती थी.
चंपा ने जीवनभर गरीबी देखी थी. हमारे घर की उतरन से वह अपने शरीर को ढकती थी. शादी 7-8 वर्ष की उम्र में ही कर दी गई थी. उस का ‘गौना’ होना था, लेकिन उस से पहले ही उस के आदमी की मौत हो गई थी. आदमी का सुख उसे कभी नहीं मिला. गरीबी इतनी थी कि रोटी, कपड़े के भी लाले थे. दूसरी शादी करना तो दूर की बात थी और कौन करता? मैं ने फौज में रहते उसे घर के काम के लिए रख लिया था. उसी पैसे से वह अपनी जरूरत की चीजें लेती थी. गांव में उसे किसी ने सहारा नहीं दिया था. हालांकि, उस के ताऊचाचा गांव में थे. ऐसे दुख नारी के हिस्से ही क्यों हैं? इस प्रश्न का उत्तर दूरदूर तक नहीं पाता हूं.
मैं नाश्ता कर के खेतों में चला आया. बारिश हुई थी लेकिन अभी भी खेतों को पानी देने की जरूरत थी. मैं वहां पहुंचा तो गिरधारी ने ट्यूबवैल चला रखा था. चावल के खेतों में पानी खड़ा रहना चाहिए, तभी फसल चंगी होती है. आमों के बाग में गया. वहां भी खूब आम लगे थे, तरहतरह के शानदार आम थे. सफेदा आम, तोता आम, मालदा आम और लंगड़ा आम. सभी आम बहुत मीठे थे. मंडी में जा कर गिरधारी हाथोंहाथ बेच आता था. अच्छेखासे पैसे हो जाते थे. रखवाली के लिए अच्छे मजदूर रखने पड़ेंगे. गिरधारी को बोलूंगा, वह सब कर लेगा.

मैं ने घर आ कर फोन पर अपनी मौसी से बात की. वह बहुत खुश हुई, पूछा, ‘‘पुत्तर, छुट्टी कब आया और मेरे पास कब आ रहा है, वापस कब जा रहा है?’’
‘‘मौसीजी, मैं पैंशन पर आ गया हूं. अब वापस नहीं जाना है. यहीं रह कर खेतों को देखूंगा.’’
‘‘यह तो अच्छी बात है. मेरे पास कब आ रहा है?’’
‘‘सोचता हूं, कल आ कर मिल जाऊं. फिर बिजी हो जाऊंगा.’’
‘‘आजा, पुत्तर.’’
‘‘मौसाजी कैसे हैं? ’’
‘‘ठीक ने, उन्हें क्या होया है, हट्टेकट्टे ने,’’ उन की बात सुन मैं
हंस दिया.
मैं कल जब मौसी के घर पहुंचा तो मेरा बहुत जोरदार स्वागत किया गया. मौसाजी भी घर पर थे. बड़े प्यार से मिले. मैं घर की सब्जियां ले गया था. हालांकि मौसी के घर में भी किसी चीज की कमी नहीं थी. सब्जियां, फल घर के ही जाते थे.
मेरे लिए चूल्हे पर काढ़नी में कढ़ी बनाई थी, साथ में बासमती के चावल थे. बासमती चावल ऐसे कि बने तो चार घर खुशबू जाए. खाना खाने के बाद मैं ने वेदो के बारे में पूछा.

मौसी बहुत देर जवाब नहीं दे पाई. मुंह दूसरी तरफ कर लिया था. शायद वह रो रही थी. फिर कहा, ‘‘पुत्तर, यह रिश्ता मैं ने ही करवाया था. आई थी तो सारे गांव में दुहाई मच गई थी कि लड़की बहुत सोहनी है. बेचारी रुल गई.’’
‘‘मौसी, क्यों?’’ मेरे शब्दों में भी टीस थी, दुख था.
‘‘वही, कमीने खयालात. सास बड़ी लड़ाकी थी. ओ मरी तो वेदो को चैन आया. अब सब ठीक ए. मैं बुलांदी हां. तू पछान नहीं पाएगा.’’
वेदो आई तो सच में मैं उसे पहचान नहीं पाया. हट्टीकट्टी वेदो सूख कर कांटा हो गई थी. दुख से मेरा गला भर आया, पूछा, ‘‘कैसी है, वेदो? यह सब कैसे, क्या हो गया?’’
वह कुछ नहीं बोली थी. बहुत देर मौसी के गले लग कर रोती रही थी. उस की सीमा का बांध टूट गया था. मौसी ने कहा, ‘‘रो ले, पुत्तर, जी भरके रो ले, फेर तैनू रोन दा मौका नहीं मिलेगा. दिल हलका हो जाएगा.’’
मौसी प्यार से उस की पीठ पर हाथ फेरती रही थी. रोतेरोते उस की हिचकी बंध गई थी. मैं ने फिर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘सब कर्मा दा खेल है. घर जा कर बापूजी नू कुछ न दसना. वे मर जाएंगे.’’
मैं ने हामी भरी. औरत चाहे कितनी भी बूढ़ी हो जाए वह मर कर भी दुख का सनेहा अपने मायके नहीं भेजती. कर्मों का खेल समझ कर सहती रहती है. वह इस मानसिकता से जीवनभर उबर नहीं पाती, क्यों? बस इस प्रश्न का उत्तर नहीं पाता हूं.
घर जाने लगी तो मैं ने कहा, ‘‘कभी बापूजी को मिलने आ जाओ.’’
‘‘आवांगी. थोड़ी सेहत ठीक हो जाए तो आवांगी. बापूजी नू मिले बहुत देर हो गई ए. वैसे कैसे ने?’’
‘‘ठीक ने, उम्र दे हिसाब नाल कमजोर हो गए ने.’’
मैं वेदो को उन की उदासी के बारे न बता सका. उन की पीड़ा को नहीं बता सका. नहीं बता सका कि तुम्हारे बारे में पूछने पर दुख से बहुत देर आसमान की ओर देखते रहे थे, केवल इतना कहा, ‘‘तू आएगी तो उन्हें तसल्ली हो जाएगी.’’

वह कुछ नहीं बोली थी. ‘हां’ में सिर हिला कर चली गई थी. मैं घर लौट आया. दूसरे दिन खेतों में गया तो वेदो के बापूजी धीरेधीरे चल कर मेरे पास आ गए. वे प्रश्नचिह्न बने हुए थे कि उन की वेदो कैसी है. मैं ने उन के चेहरे पर आए दुख को बहुत गहरे से महसूस किया और कहा, ‘‘वेदो ठीक ए. थोड़ी कमजोर है. ओ तुहानू मिलन आएगी.’’
‘‘अच्छा.’’ उन के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई, ‘‘मेरी लाड़ली आएगी.’’
‘‘हां, बापूजी.’’
‘‘कमजोर तो ओस वेले वी सी जब उस की सास मरी थी. मैं उस के सारे रीतिरिवाज कर आया था.’’

अपनी लाड़ली को याद कर के उन की आंखें भर आई थीं. भीगी आंखों से ही वे अपने खेतों में काम करने बढ़े, कहा, ‘‘आएगी तो मैं ने उसे एक हफ्ते में ही ठीक कर देना है, फौजी साहब, देख लेना. ’’

मैं इस सोच में डूब गया कि ये रिवाज किस ने बनाए हैं कि लड़की की ससुराल में कोई बुजुर्ग मर जाए तो रस्मपगड़ी के नाम पर सारा खर्चा लड़की के मायके वाले उठाएं? पहला बच्चा होना हो तो लड़की को मायके भेज दो. ये रिवाज आज भी मुंहबाए खड़े हैं. आज भी दृढ़ता से इन्हें निभाया जाता है, क्यों? बस इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, मिल जाते तो शायद समाधान भी मिल जाते.

2 हफ्ते बाद वेदो आई तो अपने बापूजी को खेतों में काम करते देख कर वहीं रुक गई. सामान सड़क पर ही रख कर बापूजी के पास आ गई. दोनों ने एकदूसरे को देखा और गले लग कर खूब रोए. आसमान की ओर देखा तो वह भी आंसू टपका रहा था. उन के मिलन से वह भी अपना मन हलका कर रहा था.

बहुत देर रोने के बाद वेदो के बापू ने कहा, ‘‘पुत्तर, तू आ गई ऐ है न. मैं जी जाऊंगा. तै नू मैं इक हफ्ते में ठीक कर देना है. कुछ दिन रहेगी न?’’
‘‘हां बापूजी, मैं इक महीने वास्ते आई हां.’’
बापूजी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘चंगा, अब घर जा. कुछ नईं करना. आराम करना, सामान मजदूर लै आनगे.’’

मैं फिर सोच में डूब गया. ये सारे दुख नारी के हिस्से में क्यों हैं? वह औफिस में काम करती है तो उसे अपने पति की चिंता रहती है, ‘हाय, वे थकटूट के औफिस से आएंगे, इन्हें कुछ खाने को मिला होगा या नहीं. इन्हें बनाना भी तो नहीं आता. सास ने मेरे बच्चे को दूध दिया होगा या नहीं? सास, बीमारी का बहाना बना कर बिस्तर पर पसरी होगी. बच्चा रोरो कर हैरान हो रहा होगा. ऐसी चिंताओं से वह स्वयं को हलाल कर रही होती है. चाहे उस के बच्चे का और पति का खूब खयाल रखा जा रहा हो.

नारी चाहे बूढ़ी हो जाए वह अपना कर्तव्य निभाने में कभी पीछे नहीं हटती. वह बीमार होते सारे काम कर जाती है पर इस सोच का क्या किया जाए जो उसे चिंतामुक्त नहीं होने देती? समांतर रेखाएं कभी नहीं मिलतीं. सासबहू, ननदभाभी ऐसी रेखाएं हैं जो जीवनभर एकदूसरे की विरोधी रहती हैं वेदो की सास जैसी लड़ाकी औरतें तो बहुओं का जीना मुहाल कर देती हैं. वेदो का इस तरह सूख कर कांटा हो जाना इसी का परिणाम है. नारी नारी की दुश्मन होती है, यह भी सत्य है.

मैं जाने कब तक सोच में डूबा रहता, चंपा ने नाश्ता रखा तो मैं होश में आया. एक महीने बाद वेदो अपनी ससुराल गई तो वह बचपन की तरह बहुत प्यारी लग रही थी. मैं ने उस से कहा, ‘‘ऐसी ही बनी रहना.’’ वह मुसकराई और चली गई. वह मुझे जवानी के प्यार के लम्हों का एहसास दे गई.  Romantic Story In Hindi 

Hindi Love Stories : रहने दो रिपोर्टर – अतीत के काले साए से बचती युवती

Hindi Love Stories : विमल ने बीती बातों को भुला कर गंगा को अपनाया था. गंगा भी सब से उबरने की कोशिश कर रही थी लेकिन यह समाज कहां किसी का दुख समझता है.

वह आज पूरी तरह छुट्टी मनाने के मूड में था. सुबह देर से उठा, फिर धीरेधीरे चाय पीते हुए अखबार पढ़ता रहा था. अखबार पूरी तरह से चाटने के बाद उस का ध्यान घर में छाए सन्नाटे की तरफ गया. आज न पानी गिरने की आवाज, न बरतनों की खटरपटर, न झाड़ूपोंछे की सरसराहट, जबकि घर में कुल 2 छोटेछोटे कमरे हैं. वह एकाएक ही किसी आशंका से पीडि़त हो उठा. गंगा इतनी शांति से क्या कर रही है?
बरामदे में पैर रखते ही वह सहम सा गया. गंगा वाशबेसिन के पास चुपचाप बैठी हुई थी और सामने रखी बोतल को ध्यान से देख रही थी.
‘‘गंगा, वह तेजाब की बोतल है,’’ उस ने आशंकित स्वर में कहा, ‘‘मैं बाथरूम साफ करने के लिए लाया था. काई जमी हुई है न, रोज तुम रगड़ती रहती हो. देखना, इसे जरा सा डाल कर रगड़ने से एकदम साफ हो जाएगा किंतु तुम उसे नहीं छूना.’’
‘‘अच्छा,’’ उस ने कहा लेकिन अभी भी जैसे वह सोच में डूबी हुई थी.
‘‘क्या सोच रही हो, गंगा?’’ उस ने कंधा पकड़ कर उसे झकझोर दिया.
‘‘सोच रही हूं कि इस के लगाने से चेहरा बदल जाएगा, तब कोई मुझे पहचान नहीं पाएगा, पहचान भी ले तो… लेकिन तुम्हारी भावनाएं क्या होंगी?’’
‘‘मेरी भावनाओं का आदर करती हो तो अब से कभी यह विचार मन में
न लाना.’’
‘‘पता नहीं क्यों, भय लगता है.’’
‘‘तुम भयभीत क्यों होती हो? मैं ने सबकुछ जानने के बाद ही तुम से विवाह किया है, हमारा विवाह कानूनसम्मत है, कोई हमें अलग नहीं कर सकता, समझं.’’

तभी दरवाजे पर आहट हुई. विमल ने द्वार खोला. पड़ोसी जोशीजी की छोटी बेटी लतिका थी. बाहर से ही बोली, ‘‘काकी, आज हमारे घर में हलदी- कुमकुम होना है. मां ने तुम को बुलाया है. दिन में 2 से 5 बजे तक. जरूर आ जाना. अच्छा, मैं जाती हूं. मुझे बहुत घरों में बोलने जाना है.’’
गंगा ने प्रश्नभरी आंखों से पति की ओर देखा, जैसे पूछ रही हो कि आज जोशीजी के घर क्या है?
‘‘सुहागिन महिलाओं को घर बुलाते हैं. टीका करने के बाद नाश्तापानी, गानाबजाना होता है. मेरे घर तो आज पहली बार इस तरह का बुलावा आया है और पहले आता भी कैसे, सुहागिन तो अभी आई है.’’
गंगा मुसकराई, फिर गंभीर हो उठी. विमल ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, ‘‘सोचा था दिनभर साथसाथ घूमते रहेंगे. जोशीजी को भी आज का ही दिन मिला.’’
‘‘मैं अपनी हाजिरी लगा कर शीघ्र ही आ जाऊंगी.’’
‘‘नहींनहीं, जब सब उठें तभी तुम भी उठना. पहली बार बुलाया है उन्होंने. मेरी चिंता न करो, तुम्हारे वापस आने तक मैं सोता रहूंगा.’’
‘‘कैसा रहा आज,’’ जोशी के घर से वापस आने पर विमल ने गंगा से पूछा.
‘‘बहुत अच्छा. बड़े अच्छे लोग हैं. मैं तो अभी किसी से मिली ही नहीं थी. आसपास की सभी महिलाएं आई थीं और सभी ने मुझ से खूब प्यार से
बातें कीं.’’
‘‘अच्छा, सब की बोली समझ
में आई?’’
‘‘हां, थोड़ीबहुत तो समझ में आ ही जाती है. वैसे, मुझ से तो हिंदी में ही बोल रही थीं.’’

मेलमुलाकात का सिलसिला चल निकला जो बढ़ता ही रहा. विमल खुश था कि गंगा का मन बहल गया है. अब वह पहले जैसी सहमीसहमी नहीं रहती बल्कि अब तो वह अपनी नईनई गृहस्थी की सुखद कल्पनाओं में खोई रहती है.
एक दिन बेहद खुश हो कर गंगा ने विमल से कहा, ‘‘सुनो, मैं भी सब को हलदीकुमकुम का बुलावा दे रही हूं. जोशी काकी ने कहा है कि वे सब तैयारी करवा देंगी. मैं ने सामान की सूची बना ली है.’’
‘‘ठीक है, हम कल शाम को बाजार चल कर सब सामान ले आएंगे.’’
बाजार में जाते हुए विमल फूलों की वेणी वाले को देख कर रुक गया. गंगा वेणी लगाने में सकुचाती थी. विमल ने हंस कर कहा, ‘‘अब तुम अपनी सहेलियों की तरह वेणी लगाया करो. हलदीकुमकुम करोगी, वेणी नहीं लगाओगी?’’

तभी विमल को किसी ने टोकते हुए कहा, ‘‘नमस्ते, साहब. ऐसा लगता है, आप को कहीं देखा है.’’
‘‘मुझे. जी, मैं ने आप को पहचाना नहीं.’’
‘‘आप वही विमल साहब हैं न जिन्होंने अपना नाम समाचारपत्र में देने से मना किया था.’’
‘‘जी, मैं आप को नहीं पहचानता,’’ और गंगा का हाथ पकड़ कर सामने से आते रिकशे को रोक कर उस पर बैठते हुए विमल ने कहा, ‘‘चलो गंगा, घर चलते हैं.’’
दूसरे दिन सुबह चाय का प्याला लिए विमल अपनी बालकनी में बैठा धूप की गरमाहट महसूस कर ही रहा था कि द्वार पर आहट हुई.
‘‘नमस्कार, मैं जयंत हूं. आप जो समाचारपत्र पढ़ रहे हैं, मैं उसी का एक अदना सा रिपोर्टर हूं.’’

विमल का चेहरा बुझ गया. अनमने मन से स्वागत कर उन के लिए चाय मंगाई.
जयंत कहे जा रहा था, ‘‘कहते हैं कि बड़े लोग विनम्र होते हैं, आप तो साक्षात विनम्रता के अवतार लगते हैं. इतने उदार, समाज सुधारक, अभिमान तो नाम को नहीं.’’
विमल ने प्रतिवाद किया, ‘‘ऐसा लगता है आप किसी भ्रम में हैं. मुझे गलत समझ रहे हैं, मैं वह नहीं हूं जो आप समझ रहे हैं.’’
‘‘तभी तो मैं कह रहा हूं कि आप जैसा महान व्यक्ति प्रचार से दूर रहना चाहता है पर आप ने जो कुछ किया उसे जान कर मुझे गर्व का अनुभव हुआ.’’
‘‘मैं ने क्या किया, मैं तो किसी प्रशंसा के लायक नहीं.’’
‘‘आप संकोच न करें, गुप्ताजी ने मुझे सब बता दिया है. अरे, वही गुप्ताजी जो कल आप से मिले थे. आप ने उन्हें नहीं पहचाना पर वे तो आप को पहचान गए हैं. आप की पत्नी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की हैं न?’’

विमल मना न कर सका. रसोई के दरवाजे पर खड़ी गंगा का चेहरा उतरा हुआ था.
‘‘देखिए, मेरा कोई स्वार्थ नहीं,’’ रिपोर्टर जयंत ने कहा, ‘‘कोई लांछन का उद्देश्य नहीं, आप की इज्जत जितनी है वह आप को नहीं मिल रही है. मैं तो केवल इसलिए आप को प्रकाश में लाना चाहता हूं कि लोगों को आप से सबक मिले. ऐसा समाज सुधारक छिप कर नहीं बैठता है. इसलिए मैं आप को प्रकाश में लाना चाहता हूं कि लोगों को आप से प्रेरणा मिले. लोग जानेंगे कि पाप से घृणा करो, पापी से नहीं. प्यार आदमी को बदल देता है.
‘‘यह चित्र विवाह के बाद का है न,’’ कमरे में कोने की मेज पर गंगा का चित्र रखा हुआ देख कर उस ने उठा लिया, ‘‘मैं अभी आप को दे जाऊंगा, यह सिगरेट लीजिए न, विदेशी है. मेरा पेशा ही ऐसा है भाई, लोग बहुत आवभगत करते हैं समाचारपत्र में अपना नाम देखने के लिए. मेरा रुतबा ही इतना है. भाभी, आप का एक चित्र लेना है रसोई में काम करते हुए, लोग देखेंगे कि कैसी सुघड़ गृहिणी हैं, कैसी सुंदर गृहस्थी है. हां, तो आप ने जानकी को गंगा नाम दिया. बहुत ठीक, गंगा तो पवित्र है, गंगा मैली थोड़े होती है.
‘‘अच्छा, धन्यवाद, मैं चलता हूं,’’ वह कागजकलम समेट कर उठ गया. विमल नीचे तक पहुंचा कर आया तो गंगा वैसे ही दीवार से सटी खड़ी थी. मौन, चिंतित, भयाक्रांत, प्रशंसा के मद से मस्त. विमल को देर हो रही थी, ध्यान नहीं दिया.
शाम को उस ने हलदीकुमकुम के लिए सामान लाने को कहा तो गंगा ने मना कर दिया, ‘‘अभी ठहर कर लाऊंगी.’’
तीसरे दिन समाचारपत्र के तीसरे पेज पर वही चित्र था जो उन के घर की मेज पर रखा था. दूसरा चित्र गंगा का रसोई में काम करते हुए. साथ में संक्षेप से उस की यातना की कहानी के साथ ही विमल की महानता की कहानी छपी थी.

विमल को उठने में देर हो गई थी. समाचारपत्र ऊपरऊपर से देख कर वह काम पर जाने के लिए तैयार होने लगा कि उस से मिलने वाले एकएक कर आने लगे. फ्लैट के सभी लोग आए और उस के उदार नजरिए पर बधाई दी.
‘‘प्रचारप्रसार से इतनी दूर कि आज का समाचारपत्र तक नहीं देखा, जबकि अपने बारे में आप को छपने की आशा थी.’’
‘‘वाह, आप धन्य हैं. आप दोनों सुखी रहें, हमारी कामना है.’’
गंगा भोजन तैयार न कर सकी और न नाश्ते का डब्बा ही. वह अपने अंदर एक अज्ञात भय महसूस कर रही थी.
विमल तैयार हो कर आया तो बोला, ‘‘मैं वहीं कुछ खा लूंगा, तुम अपना ध्यान रखना.’’

पुरुषों के जाने के बाद महिलाओं की
बारी आई. एकएक कर सब गंगा
का हाल पूछने पहुंच गईं. सब में यह बताने की होड़ लगी थी कि सब से पहले किस ने समाचारपत्र देखा और कैसे एकदूसरे को जानकारी दी. फिर सभी ने एक स्वर में कहा कि हमें नहीं पता था कि आप का नाम जानकी है. वैसे, नाम तो हम लोग भी पतिगृह का दूसरा रखते हैं, आप के गांव में ऐसा नहीं होता क्या?
‘‘जानकी तो पतिव्रता स्त्री का
नाम था,’’ एक के मुंह से निकला तो दूसरी ने कहा, ‘‘बेचारी औरत का क्या दोष.’’
इस तरह सभी ने गंगा से सहानुभूति दिखाई. खाली चौका देख कर कई घरों से खाना आ गया. जबरन कौरकौर खिलाया और आंसू पोंछे. अपने प्रति कोमल भावनाएं देख कर गंगा को लगा कि उस की आशंका निर्मूल थी, वह व्यर्थ ही इतनी भयभीत हो रही थी कि उस का अतीत जान कर कहीं लोग उस से घृणा न करने लगें, फिर भी वह आश्वस्त न हो पाई.
विमल ने सुबह कहा था कि शाम को तैयार रहना, डाक्टर को दिखाना है और बाजार भी जाना है. किंतु शाम को वह कहीं नहीं गई. 3 दिन हो गए, वह घर से निकली ही नहीं.
काशी बाई 2 दिनों बाद आई तो बाहर से ही बोली, ‘‘मैडम, मेरी पगार जितनी बनती है, दे दो.’’
गंगा चकित हो उस से काम न करने का कारण पूछने ही वाली थी कि तभी सुना, ‘‘जूठा साफ करते हैं तो क्या, हमारा धरमईमान तो बना है. ऐसे घर पर कौन काम करेगा.’’
कूड़ा फेंकने वाली मीनाबाई ने भी कहा, ‘‘गंदा साफ करते हैं तो क्या हुआ, हमारा भी धरम है, अपने मरद के लिए तो मैं सच्ची हूं.’’
भाजी वाला आया था. गंगा साहस कर के नीचे उतरी ताकि कुछ सब्जीभाजी खरीद ले. गोभी, मटर का भाव पूछते ही वह मुसकराया, ‘‘अजी, आप जो चाहे दे दें.’’
गंगा ने यथार्थ समझ लिया था. अंदर ही अंदर घुटती रही. एक घर से गीतों का बुलावा आया हुआ था. विमल ने कहा, ‘‘दिन में थोड़ी देर को चली जाना और शगुन दे देना.’’

गंगा कहीं जाने को तैयार नहीं थी. विमल समझता रहा, ‘‘देखो, हमें कमजोर नहीं पड़ना है. हम ने कोई बुरा काम तो किया नहीं है. मजबूरी ने जो करा दिया उस के लिए लज्जित क्यों हों? तुम अवश्य जाओ और सब के बीच में मिलोजुलो अन्यथा लोग हमें गलत समझेंगे, दोषी समझेंगे. उन के घर लड़की का विवाह है. तुम को गीतों में बुलाया है. नहीं जाओगी तो कहीं वे लोग बुरा न मान जाएं कि पास में रह कर भी नहीं आई.

गंगा दुविधा में थी. जोशी काकी के मुख से सुन ही लिया था और लोग भी ऐसा ही कहें तब. उधर विमल का कहा भी मन में गूंजता रहा तो वह बड़ा साहस जुटा कर वहां गई थी.

गाना चल रहा था. कुछ महिलाएं नृत्य कर रही थीं. हंसीखुशी का वातावरण था. उसे देखते ही नृत्य थम गया, गाना बंद हो गया और सब की नजर उस की ओर थी. उसे याद आया जब पहले वह जोशी काकी के घर गई थी तो वहां भी गानाबजाना हो रहा था किंतु उस के जाते ही सब ने उस का स्वागत किया था और उन नजरों में कुतूहल था पहचान का, परिचय का किंतु स्नेह का भाव भी था.

आज पहले तो सब एकदूसरे की ओर देख कर मुसकराईं, घर की मालकिन ने उसे बैठने का संकेत किया तो पास की महिलाएं इस तरह सरक कर बैठीं जैसे उस के स्पर्श से बच रही हों.

परस्पर फुसफुसाहट हुई पर उस से न बोलने की चुप्पी का प्रहार इतना मुखर था कि गंगा अधिक देर वहां बैठ न सकी. शगुन का लिफाफा हाथ में ही रह गया. वह उठी तब भी उस से किसी ने बैठने को न कहा, न जल्दी जाने का कारण पूछा.

कुहराम मचा हुआ था. गंगा ने स्नान घर में मिट्टी का तेल छिड़क कर अपने को जला लिया था. विमल के नाम एक पत्र रखा था जिस में लिखा था :
‘‘औरत पर कलंक लग जाए तो कलंक के साथ ही जीना होता है. आप पुरुष हैं, दूसरा विवाह कर लेंगे किंतु मेरे साथ रह कर आप भी कलंकित ही रहेंगे. मैं इस लांछन को सह भी लेती पर मैं मां बनने वाली हूं. बेटा होगा तो वह भी कलंक का टीका ले कर, बेटी होगी तो और भी विडंबना होगी.
‘‘आत्महत्या कर के मैं पाप कर रही हूं पर आप को इन सब से मुक्ति दे रही हूं.
‘‘मुझे क्षमा करना. समाचारपत्र वाले फिर पूछने आएंगे. उन्हें यह पत्र दे देना, शायद मेरा चित्र लेना चाहें तो ले लेंगे.’’

विमल से पढ़ा नहीं जा रहा था. पत्र हाथ से छूट गया. क्या लिखा है, क्या कारण है, कई लोग पत्र पढ़ चुके थे. अब पत्र पकड़ते हुए जिसे देखा, विमल आक्रोश से
फट पड़ा.
‘‘तसवीर भी ले लो न, वह भी.’’
रिपोर्टर ने सहम कर देखा, पत्र उस के हाथ से छूट गया.  Hindi Love Stories

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