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ICC Women’s World Cup 2025: क्रिकेट- भारतीय महिला खिलाड़ियों ने जीता वर्ल्ड कप

ICC Women’s World Cup 2025: इस जीत ने न सिर्फ इतिहास रचा है, बल्कि उन सभी लड़कियों को नई दिशा दी है जो तमाम मुश्किलों के बावजूद खेल के मैदान में अपना कैरियर बनाने का सपना देखती हैं. मेहनत, समर्पण और पसीने से उन्होंने साबित कर दिया कि अगर हौसले बुलंद हों तो कोई मंजिल दूर नहीं. यह जीत हर उस भारतीय बेटी के नाम है जो अपने सपनों को उड़ान देना चाहती है.

शुरुआत एक ऐसे शख्स से करते हैं, जिस का नाम है अमोल मजूमदार. क्रिकेट को समर्पित ऐसा इनसान, जो एक समय मुंबई रणजी की जान हुआ करता था. उन्होंने फर्स्ट क्लास क्रिकेट में 11,000 से ज्यादा रन बनाए हैं, जिन में 30 सैंचुरी भी शामिल हैं.

अक्तूबर, 2023 में जब अमोल मजूमदार को भारतीय महिला टीम का हैड कोच बनाया गया था, तब टीम बदलाव के दौर से गुजर रही थी. नए हैड कोच को नई मजबूत टीम बनानी थी. ठीक वैसे ही जैसे हिंदी फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में कबीर खान (शाहरुख खान) ने अपनी हौकी टीम को बनाया और चमकाया था.

अमोल मजूमदार की मेहनत से आई इसी चमक का नतीजा आज यह है कि 2 नवंबर, 2025 को नवी मुंबई के डीवाई पाटिल स्टेडियम में भारत ने फाइनल मुकाबले में दक्षिण अफ्रीका को हरा कर खिताब अपने नाम किया.

बारिश के खलल से मैच थोड़ा देरी से शुरू हुआ था, पर जब भारतीय महिला टीम बल्लेबाजी करने मैदान पर उतरी, तो उस के बाद वह नया इतिहास बना कर ही खुशी के मारे नाचतीकूदती ड्रैसिंग रूम में लौटी.

टीम इंडिया ने महिला वनडे वर्ल्ड कप 2025 के फाइनल मुकाबले में दक्षिण अफ्रीका को 52 रन से हरा दिया. पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने 50 ओवर में 7 विकेट पर 298 रन बनाए थे, जिस के जवाब में दक्षिण अफ्रीका की टीम 246 रन पर सिमट गई.

यह भारत का पहला महिला वनडे वर्ल्ड कप का खिताब है. याद रहे कि पहला महिला वनडे वर्ल्ड कप साल 1973 में खेला गया था.

फाइनल मुकाबले में भारत की ओर से दीप्ति शर्मा के अलावा शेफाली वर्मा ने भी कमाल का खेल दिखाया. शेफाली ने बल्लेबाजी में 87 रन बनाने के अलावा 2 विकेट भी झटके. वे ‘प्लेयर औफ द मैच’ रहीं. दीप्ति शर्मा ने 5 विकेट अपने नाम किए. वे ‘प्लेयर औफ द सीरीज’ बनीं और फाइनल मुकाबले में उन्होंने 58 रन भी बनाए.

यह वर्ल्ड कप जीतने के बाद भारतीय महिला क्रिकेट टीम पर पैसों की बरसात हुई है. लोगों से मिली शाबाशी के बाद वे हर लिहाज से मजबूत दिख रही हैं और कप्तान हरमनप्रीत कौर की अगुआई में एकजुट भी लग रही हैं. पर सब से बड़ी बात यह है कि भारत में महिला क्रिकेट खिलाड़ियों को अब दर्शक मिल रहे हैं. फाइनल मुकाबले में स्टेडियम भरा हुआ था और टैलीविजन पर भी करोड़ों लोगों ने इसे देखने का लुत्फ उठाया.

अगर कहें कि इस मैच के शुरू होने से पहले भारत की पुरुष क्रिकेट टीम ने आस्ट्रेलिया में हुए तीसरे टी20 मैच को जीतने के रंग को फीका कर दिया, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी. वहां हो रही हिंदी कमैंट्री में महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले की चर्चा ज्यादा हो रही थी.

होती भी क्यों न, यह जीत ही इतनी शानदार रही कि इस ने भारतीय महिला क्रिकेट टीम के सपने को पूरा कर दिया है. साथ ही, इस जीत ने हर उस लड़की को नई दिशा दी है, जो तमाम तरह की मुसीबतें झेलते हुए खेल के मैदान पर अपना कैरियर तलाशती है. अपनी कड़ी मेहनत और मैदान पर बहाए गए पसीने से देश का नाम दुनिया में रोशन करने का सपना देखती है. यह जीत हर भारतीय बेटी के नाम है. ICC Women’s World Cup 2025.

Romantic Story in Hindi: बदबू- कमली ने किसना को किस हालत में देखा?

Romantic Story in Hindi: ‘‘इतनी रात गए कहां से आ रहा है  हम सब परेशान हो रहे थे कि शाम से तू किधर है…’’ बापू की यह पूछताछ किसना को अखर गई.

‘‘तुम से चुपचाप सोया भी नहीं जाता है  अरे, जरा मुझे भी सुकून से अपने हिसाब से जीने दो,’’ किसना की तल्खी देख बापू समझ गए कि उन का बेटा जरूर कोई तीर मार कर आया है.

‘चलो, इस निखट्टू ने आज कुछ तो किया,’ यह सोचते हुए बापू नींद के आगोश में गुम हो गए.

कमरे में कमली अधनींदी सी लेटी हुई थी. आहट सुन कर वह उठ बैठी. देखा कि किसना ने कुछ नोट निकाले और उन्हें अलमारी में रखने लगा.

कमली की आंखें खुशी से चमक उठीं. उसे लगा कि 2 महीने ईंटभट्ठे पर काम करने की तनख्वाह आखिरकार किसना को मिल ही गई. कमली को पलभर में जरूरतों की झिलमिल करती लंबी फेहरिस्त पूरी होती दिखने लगी.

‘‘लगता है कि रज्जाक मियां ने आखिरकार तुम्हारी पूरी तनख्वाह दे ही दी. मैं तो सोच रही थी कि हर बार की तरह इस बार भी आजकल कर के 6 महीने में आधी ही तनख्वाह देगा,’’ कमली ने चहकते हुए पूछा.

‘‘अरे, वह क्यों देने लगा  इतना ही सीधा होता, तो हमारा खून क्यों पीता ’’ किसना ने खाट पर पसरते हुए कहा.

कमली ने देखा कि किसना पसीने से भीगा हांफ रहा था.

‘बेचारा दिनभर मजदूरी और काम की तलाश में भटकतादौड़ता रहता है,’ कमली ने सोचा.

कोई और दिन होता, तो कमली भी किसना को काट खाने ही दौड़ती कि कुछ कमा कर लाओ नहीं तो घर कैसे चलेगा, पर आज तो अलमारी में रखे नोट उस के दिल में हलचल मचा रहे थे.

कमली गुनगुनाती हुई एक लोटा पानी ले आई.

‘‘लो, पानी पी लो. लग रहा है कि तुम बहुत थक गए हो…

‘‘क्या हुआ… तुम्हारी छाती धौंकनी सी क्यों चल रही है

‘‘अरे, रज्जाक भाई ने पैसा नहीं दिया, तो फिर किस ने दिया पैसा ’’ कमली ने लाड़ जताते हुए पूछा.

‘‘जब से आया हूं, पहले बापू ने, फिर तुम ने मेरा दिमाग चाट कर रख दिया है. क्या कुछ देर शांति नहीं मिल सकती मुझे ’’ लोटा फेंकते हुए किसना ने कहा और करवट ले कर सोने की कोशिश करने लगा.

कमली ने चुपचाप किसना को एक चादर ओढ़ा दी और बगल में लेट गई.

किसना बेचैन सा रातभर करवटें बदलते रहा. वह कभी उठ बैठता, तो कभी लेट जाता.

सुबह के 5 बजे कमली उठी और तैयार हो कर उस ने ग्रेटर नोएडा की बस पकड़ी, जहां वह कुछ घरों में झाड़ूपोंछा और बरतन धोने का काम करती थी.

बिजली की फुरती से काम निबटाती कमली 5वें घर में जा पहुंची. वहां वह चाय नाश्ता बनाती थी. साहब और बीबीजी को दे कर वह खुद भी खाती थी.

कमली के वे साहब और बीबीजी नौकरी से रिटायर हो चुके थे. सो, वहां सुबह की हड़बड़ी नहीं रहती थी. वे दोनों देर तक सोने के आदी थे. आज भी सवा 10 बज गए थे. डोरबैल की आवाज से ही बीबीजी जागी थीं.

‘‘आओ कमली… पहले चाय बना ले… मैं तुम्हारे साहब को जगाती हूं…’’ कह कर बीबीजी बाथरूम में हाथमुंह धोने चली गईं.

जब तक चाय उबली, फुरतीली कमली ने सब्जीभाजी काट ली और कुकर में छौंक दी.

इस के बाद कमली ने साहबजी और बीबीजी को चाय थमा दी और खुद भी वहीं फर्श पर बैठ कर चाय पीने लगी. लगातार 4-5 घंटे काम करने के बाद वह हर दिन यहीं पलभर के लिए आराम करती थी.

साहबजी ने टैलीविजन चला दिया था. बारबार ‘दादरीदादरी’ सुन कर कमली के कान खड़े हुए, चाय हाथ से छलकतेछलकते बची.

जब दादरी के बिसाहड़ा गांव का नाम भी सुना, तो बीबीजी ने पूछा, ‘‘कमली, तुम भी तो काम करने दादरी से ही आती हो न  क्या तुम इन को जानती हो  रात एक भीड़ ने इन की हत्या कर दी…’’ मारे गए आदमी के फोटो को दिखाते हुए बीबीजी ने पूछा.

‘‘हाय… हम तो इन के पीछे वाली बस्ती में ही रहते हैं. इन्हें किस ने मारा ’’ कमली एकदम से चिल्लाई.

अब कमली के हलक से चाय नहीं उतर रही थी. वह गुमसुम सी वहीं खड़ी हो गई.

‘‘बीबीजी, आज मुझे जल्दी जाने दो. मैं ने सब्जी बना दी है… रोटी आप बना लेना…’’ कहते हुए कमली घर लौटने को बेचैन हो उठी.

जैसेतैसे कमली अपनी बस्ती के पास पहुंची, तो देखा कि वहां जमघट लगा हुआ था. टैलीविजन पर रिपोर्ट दिखाने वाले, पुलिस और भी न जाने कौनकौन से लोग दिख रहे थे. आज तक इस जगह कोई नेता नहीं पहुंचा था, वहीं आज पूरी भीड़ लगी हुई थी. Romantic Story in Hindi.

(क्रमश:)

मारा गया शख्स कौन था  पैसे होने के बावजूद किसना का मूड क्यों उखड़ा हुआ था  पढि़ए अगली किस्त में…

 

Hindi Family Story: ताऊजी डीजे लगवा दो- क्या बदली ताऊ की सोच?

Hindi Family Story: ‘ताऊजी डीजे लगवा दो… ताऊ…’ के नारे लगाते हुए युवकों के शोर से ताऊजी की तंद्रा भंग हुई और वे उचक कर बाहर देखने लगे. बाहर का दृश्य अचंभित करने वाला था. ढोलक की ताल पर संग में हाथों में लट्ठ लिए गांव के कई युवक उन के दरवाजे पर खड़े नारे लगा रहे थे और अगुआई कर रहा था उन का अपना भतीजा कपिल, जो होने वाला दूल्हा था. हां भई, अगले महीने उस का विवाह जो था.

पंचों के पंचायती फरमानों ने युवाओं के हितों पर सदा से कुठाराघात किया है. आज समाज भले ही विकसित हो गया हो पर इन के तुगलकी फरमानों में बरसों पुरानी दकियानूसी सोच दिखती है. कभी युवतियों के कपड़ों पर आपत्ति जताएंगे तो कभी जातिधर्म के नाम पर प्रेम करने वालों को हमेशाहमेशा के लिए जुदा करते दिखेंगे.

युवाओं को कभी न भाने वाले इन के तुगलकी फरमानों की फेहरिस्त काफी लंबी है, लेकिन हाल में हरियाणा के 100 गांवों में डीजे पर लगाई गई पाबंदी युवाओं को नागवार गुजरी. इसी के विरोध में युवा नारे लगा रहे थे.

आज शादीविवाह में डीजे का उतना ही महत्त्व है जितना बैंडबाजे, बरात का या फूलमालाओं से सजी नवविवाहित जोड़े की गाड़ी का, जयमाला या फिर लजीज खाने का, भले ही विवाह में खाने में सौ व्यंजन परोस दें, तरहतरह के स्नैक्स से ले कर चाइनीजमुगलई खाने और अंत में जातेजाते तरहतरह के हाजमिक पान का स्वाद चखने के बावजूद  युवकयुवतियों का विवाह का सारा मजा तब तक अधूरा रहता है जब तक कि उन्हें डीजे पर थिरकने का मौका न मिले.

किसी पार्टी, फंक्शन, बर्थडे, शादीविवाह की शान डीजे भले ही समारोह में एक कोने की शोभा बढ़ाता हो, लेकिन पार्टी में शिरकत करते युवकयुवतियों के लिए समारोह का मुख्य आकर्षण यही कोना रहता है. डीजे की आवाज जितनी अधिक कानफोड़ू होगी मस्ती उतनी ही अधिक होती है और उतने ही अधिक मदहोश हो कर युवकयुवतियां थिरकते हैं.

डीजे पर एक भी गाना पूरा नहीं बजाया जाता बल्कि रीमिक्स कर कई गानों की खासकर पहली लाइन ही बजाई जाती है, जिस से हर किसी का पसंदीदा गाना एकाध मिनट के अंतराल में बज ही उठता है जिस से मनोरंजन का मजा दोगुना हो जाता है. यह गाने अधिकतर लेटैस्ट और प्रचलित होते हैं.

डीजे सिर्फ युवकयुवतियों को ही आनंदित नहीं करता बल्कि अधेड़ और बुजुर्गों में भी नया जोश भर देता है. इस की कानफोड़ू आवाज मदमस्त नाचते बूढ़ों में जवानी का संचार कर देती है वहीं जलतीबुझती लाइटों से डीजे पर थिरकने का मजा दोगुना हो जाता है और युवकयुवतियों संग उम्रदराज भी मदहोश हो कर अपने पसंदीदा गानों पर थिरक उठते हैं.

किसी यारदोस्त की शादी हो और नाचगाने का समां न बंधे, डीजे पर थिरकने को न मिले, तो मन में यही मलाल रहता है कि फलां की शादी में रूखासूखा भात खा कर आ गए. डीजे नहीं होने से न नाचगाना हुआ, न रौनक रही. दूसरी ओर डीजे पर थिरकते क्षणों की अपने कैमरे या मोबाइल द्वारा बनाई वीडियो क्लिपिंग्स सालोंसाल उस मस्ती को तरोताजा बनाए रखती हैं.

लेकिन हर पार्टीफंक्शन की शान बन चुके डीजे पर पाबंदी की बात बरदाश्त से बाहर थी. युवकयुवतियां सब बरदाश्त कर सकते हैं पर अपनी मौजमस्ती में खलल नहीं, सो वे ‘ताऊजी डीजे लगवा दो…‘ की नारेबाजी के साथ पंचों के फैसले के विरुद्ध खड़े थे.

असमंजस में पड़े ताऊजी ने कारण पूछा तो पता चला कि वे जिस डीजे वाले को कपिल की शादी में डीजे बजाने को मना कर आए हैं वे उसी से खफा हैं.

ताऊजी ने अपनी असमर्थता जताई और बताया कि यह पाबंदी गांव के हित में है, लेकिन युवा नहीं माने. ‘अगर शादीविवाह में डीजे नहीं बजेगा तो क्या मातम पर बजेगा,’ युवाओं ने दलील दी और ‘ताऊजी डीजे…’ का पुरजोर नारा लगाया.

बात न बनती देख ताऊजी ने गांव के पंचों के पास चलने को कहा तो सभी नारे लगाते हुए सरपंच के पास जा धमके. ऐसा पहली बार हुआ था कि गांव के युवा अपने बुजुर्गों के सामने तन कर खड़े थे और डीजे पर पाबंदी हटवाने का हरसंभव प्रयत्न कर रहे थे.

सरपंच सभी को शांत करता हुआ बोला, ‘‘भई, इतने उग्र होने से अच्छा है अपनी बात बताओ?’’

बल्लू ने अपना पक्ष रखा, ‘‘सरपंचजी, अगले महीने कपिल की शादी है और हमें नाचनेगाने की भी आजादी नहीं. आप ही बताइए, शादी में डीजे न बजे और रौनक न हो तो क्या मजा आएगा भला.’’

‘‘ओह, तो यह बात है, भाई, तुम लोग तो जानते ही हो कि हरियाणा के 100 गांवों में डीजे पर पाबंदी है, हम तुम्हें यह आजादी कैसे दे दें?’’ सरपंचजी बोले, तो उन की बात पुख्ता करते हुए एक पंच बोला, ‘‘डीजे बजने से बहुत नुकसान होता है. तुम जानते हो डीजे की कानफोड़ू आवाज से विचलित हो कर भैंसें दूध नहीं देतीं और डीजे की धमक से गर्भधारण किए भैंसों के गर्भ भी गिर रहे हैं.’’

अब झबरू ने युवाओं का पक्ष रखा, ‘‘सरपंचजी, सारा दूध हमारे ही गांव का तो नहीं पहुंचता देश में, अगर एकदिन भैंस दूध नहीं देगी तो कौन सी मुसीबत आ जाएगी. शादीब्याह तो जीवन में एक ही बार होता है वह भी इस पाबंदी के कारण दिल में मलाल रह जाए तो क्या फायदा, हमेशा यारदोस्त यही बात कहेंगे कि फलां की शादी में न डीजे बजा और न नाचगाना हुआ, बस, रूखासूखा भात खा आए. पेट तो घर में भी भरते हैं फिर शादी की पार्टी का क्या फायदा?’’

बल्लू ने साथ दिया, ‘‘और जो यह भैंसों के गर्भ गिरने की बात है यह बेकार की बात है. आज तक किसी औरत का इस से गर्भ गिरा क्या? वे भी तो डीजे पर नाचतीगाती हैं और फिर एकाध दिन गर्भधारण की भैंस को विवाह वाले घर से दूर भी तो रखा जा सकता है. हमारी खुशी पर पाबंदी क्यों?’’

अब तीसरा बोला, ‘‘भाई, बात इतनी ही नहीं है. इस से बड़ेबुजुर्गों के सिर में दर्द भी हो जाता है जिस से उन का शादी का सारा मजा किरकिरा हो जाता है. तुम लोग नाचतेगाते हो और वे खाट पर सिर बांध कर पड़े रहते हैं.’’

‘‘वाह, पंचों ने क्या नुक्ता निकाला है. भई, पहले भी तो शादियां होती थीं. महीना पहले से ही जश्न शुरू हो जाता था. आप को तब नहीं खयाल आया अपने बुजुर्गों का. हमारा समय आया तो सिरदर्द होने लगा,’’ बल्लू ने अपना पक्ष रखा.

ताऊजी बोले, ‘‘देख लो पंचो, इन्हें ऐसी बातें करते शर्म भी नहीं आती.’’

‘‘भई, ताऊजी की शर्म वाली बात से एक और बात याद आई. जब युवक-युवतियां डीजे पर नाचते हैं तो बेशर्म हो कर नाचते हैं, भौंड़ी और फूहड़ हरकतें करते हैं जो देखने में भी अच्छी नहीं लगती हैं.’’ चौथे पंच ने कहा, तो 5वां पंच उन की हां में हां मिलाता हुआ बोला, ‘‘हां भई, डीजे पर थिरकते तुम लोग सिर्फ फूहड़ हरकतें ही नहीं करते बल्कि युवतियों से छेड़छाड़ भी करते हो और अश्लील गाने चलवाते हो जो बिलकुल अच्छा नहीं लगता.’’

कपिल आक्रोश में बोला, ‘‘आप हमें नाचते देखते हो या युवतियों के कपड़े और उन के थिरकते अंगों को.’’

झबरू आगे आया और सब को शांत करता हुआ बोला, ‘‘अगर युवक-युवतियां इस उम्र में फैशनेबलकपड़े नहीं पहनेंगे तो क्या बुढ़ापे में पहनेंगे. रही बात अश्लील गानों की तो ताऊजी आप अपना समय याद करो जब आप ने मदनू काका की शादी में गाना चलवाया था, ‘चोली के पीछे क्या है… चुनरी के नीचे क्या है…’ क्या वह फूहड़ अश्लील गाना नहीं था और जो आप ने अपने साथ नाचती युवती के साथ गलत हरकत की थी, सब जानते हैं. वह अलग बात है कि आप की शादी बाद में उसी से हो गई.’’

अब सब पंचों का मुंह देखने वाला था तभी कपिल बोला, ‘‘आप सब जानते हैं कि शादी का माहौल खुशी का होता है ऐसे में युवतियां स्वयं सजधज कर डीजे की धुनों पर नाचती हैं. कोई युवक अगर उन से टकरा जाए या वह टशन मारता हुआ उन के साथ नाचने लगे तो वे आंखें तरेरती हैं. भला, आप ही बताइए युवकों का इस में क्या कुसूर है, वे तो अपने ही नशे में चूर होते हैं.’’

अब सभी पंचों के मुंह पर ताला लग गया था. थोड़ी देर वातावरण में सन्नाटा रहा. सभी पंच और बुजुर्ग आपस में विचारविमर्श करने लगे. उन के भी मन के किसी कोने में विवाह जैसे अवसर पर ठुमकने की चाह थी. फिर सन्नाटा तोड़ते हुए सरपंच बोले, ‘‘भई, हम ने आप की सब दलीलें सुन लीं. हमें आप लोगों से हमदर्दी है और हम भी चाहते हैं कि आप नाचोगाओ, जश्न मनाओ, इसलिए कुछ शर्तों पर यह पाबंदी हटाते हैं.

‘‘युवकों को ध्यान रखना होगा कि शादीविवाह वाले घर के आसपास के घरों से सहमति ले कर ही डीजे लगवाएं. देर रात तक डीजे न बजे और कोई फूहड़ता या छेड़छाड़ की घटना न हो.’’

सरपंच की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि युवक एकसाथ बोल पड़े, ‘‘हुर्रे… हमें आप की शर्तें मंजूर हैं पर डीजे तो बजेगा ही…’’

‘‘चलो, ताऊजी अपने घर और जातेजाते डीजे वाले को भी और्डर दे दो डीजे लगाने का,’’ कपिल ने कहा तो सभी युवक ताऊजी को साथ ले वापस चल दिए. पार्श्व में उन की ‘‘हुर्रे… पार्टी यों ही चालेगी… डीजे यों ही बाजेगा…’’ की आवाजें गूंज रही थीं और पंच भी खुश थे कि उन्होंने बीच का रास्ता निकाल कर युवकों के साथसाथ अपने मनबहलाव का रास्ता भी खोज लिया था. Hindi Family Story.

Romantic Story in Hindi: मिसेज मेघना राघव गुप्ता- खेल सरनेम का

Romantic Story in Hindi: खूबसूरत और खिलीखिली सी मेघना औफिस में सब के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. जब से शाखा में मेघना ने ज्वाइन किया है, तब से ही पुरुषों को गुलाब और महिलाओं को कांटे की अनुभूति दे रही है. अरे नहीं भई, मेघना कोई फैशनपरस्त आधुनिक बाला नहीं है, जो अपने विशेष परिधानों से सब का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करे, वह तो कंधे तक कटे बालों की पोनी बनाए, कभी आरामदायक सूट तो कभीकभार जींस और शार्ट कुरती में नजर आने वाली आम सी लड़की है, लेकिन उस की बड़ीबड़ी कजरारी आंखें… उफ्फ, किसी को भी अपने भीतर बंदी बना लें.

मेघना का रंग बेशक गोरा नहीं है, लेकिन सलोना अवश्य है. ठीक वैसा ही जैसा सावन में काले बादलों का होता है. मनोहारी… सम्मोहक और अपनी तरफ खींचने वाला…

सिर्फ रूप और लावण्य ही नहीं, बल्कि एक अन्य कारण भी है, जो सब को मेघना की तरफ खींचता है. वो है उस का नाम… नहीं नहीं, नाम नहीं, बल्कि उपनाम… दरअसल, मेघना अपने नाम के साथ कोई उपनाम या जाति यानी सरनेम नहीं लगाती. भला आज के समय में भी ऐसा कहीं होता है भला? जब गलीगली में जातिधर्म के नाम पर लोग बंट रहे हैं, ऐसे में किसी साधारण आदमी का अपनी जाति के प्रति मोह नहीं दिखाना कोई साधारण बात तो नहीं.

स्टाफ की महिला कार्मिकों ने अपने तमाम प्रयास कर देख लिए, लेकिन मजाल है कि मेघना अपनी जाति के बारे में कोई सच उगल दे.

“आप को मेरी जाति में इतना इंटरेस्ट क्यों है? क्या मेरा खुद का होना काफी नहीं है?” अकसर ऐसे ही प्रतिप्रश्न दाग कर मेघना सामने वाले को बोलती बंद करने की कोशिश करती थी, लेकिन जनसाधारण की बोलती किसी पालतू तोते की जबान है क्या, जिसे आसानी से नियंत्रित कर के जब चाहो तब बंद किया जा सके? जितने मुंह उतनी बातें… शाखा में मेघना का सरनेम उस से कहीं अधिक चर्चा का विषय होने लगा था.

यह एक राष्ट्रीयकृत बैंक की मुख्य शाखा थी, जो जयपुर महानगर में स्थित थी. मेघना की पहली पोस्टिंग यहां सहायक ब्रांच मैनेजर के रूप में हुई थी. मृदु स्वभाव की मल्लिका मेघना हर समय अपने चेहरे पर आभूषण की तरह मुसकान सजाए हर ग्राहक का काम बड़ी तत्परता से निबटाती और दबाव के पलों में भी अपनेआप को सहज और सामान्य बनाए रखती. यह विशेषता भी उस के व्यक्तित्व की गरिमा को सवाया करती थी.

ब्रांच में काम करने वाली अन्य महिलाओं के लिए मेघना एक पहेली की तरह थी, जिसे बूझना तो सब चाहते थे, लेकिन शुरुआत करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा था. एक दिन नव्या ने जरा साहस दिखाया. वह मेघना की हमउम्र भी थी, इसलिए भी उसे मेघना के आवरण में घुसपैठ करने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. लेनदेन के समय के बाद के कुछ सुस्त पलों में मेघना अपने मोबाइल फोन में व्यस्त थी, तभी नव्या उस के पास आई और बोली, “हेलो मेघना, तुम तो यहां नई हो ना? जयपुर घूमा क्या?” नव्या ने बात की शुरुआत करते हुए आत्मीयता दिखाई.

“घूम लेंगे. जयपुर कहां भागा जा रहा है. और वैसे भी जब 2-3 साल यहीं रहना है, तो फिर जल्दी क्या है?” मेघना ने उदासीनता से कहा, तो नव्या थोड़ी निराश हुई.

“कल छुट्टी है, चलो तुम्हें गोविंद देव के दर्शन करवा लाती हूं,” नव्या ने प्रस्ताव दिया, लेकिन मेघना ने कहीं और बिजी होने की कह कर नव्या का प्रस्ताव ठुकरा दिया.

2 दिन बाद बैंक की महिला मंडली में यही हौट टौपिक था.

“अरे, मंदिर में जाने की हिम्मत ही नहीं हुई होगी उस की. मुझे तो पहले से ही उस की जाति पर शक था,” मिसेज कपूर ने दावा किया.

“लेकिन, आजकल मंदिर में कहां कोई किसी से जातिधर्म पूछता है?” नव्या ने मिसेज कपूर की बात का विरोध किया.

“नहीं पूछता, लेकिन कहते हैं ना कि चोर की दाढ़ी में तिनका. मन ही नहीं माना होगा उस का, इसलिए खुद से ही मना कर दिया,” मीनाक्षी ने भी अपना तर्क रखा.

“कल उसे लंच पर अपने साथ बिठाते हैं, तभी कुछ पता चलेगा उस के बारे में,” नव्या ने फैसला सुनाया और सभा बरखास्ता हो गई.

अगले दिन नव्या ने कहीं और लंच पर जाने की बात कह कर एक बार फिर से महिला मंडली का प्रस्ताव खारिज कर दिया.

महिलाओं को ये उन का भारी अपमान लगा. सब ने मिल कर मेघना के खिलाफ मोरचा खोल दिया. एक तरह का असहयोग आंदोलन चलने लगा था औफिस में.

“हेलो फ्रेंड्स, कल मेरे घर पर एक छोटी सी गेट टुगेदर है. आप सब इंवाइटेड हो,” मेघना ने औफिस छोड़ने से पहले घोषणा की, तो सब का चौंकना लाजिमी था.

मेघना को तो किसी ने जवाब नहीं दिया, लेकिन सब के भीतर गहरी उथलपुथल मची हुई थी. इस में कोई शक नहीं था.
सब ने मिल कर मेघना की पार्टी अटेंड करने का फैसला किया. किसी की सचाई बाहर लाने के लिए इतना तो करना ही पड़ेगा ना?

तय समय पर पूरा महिला स्टाफ मेघना के घर मौजूद था. मेघना ने भी आगे बढ़ कर बहुत ही आत्मीयता के साथ उन का स्वागत किया और अपने पूरे परिवार से मिलवाया.

मेघना के परिवार में उस के मम्मीपापा और एक छोटी बहन थी. यह गेट टुगेदर मेघना के मम्मीपापा की शादी की सालगिरह का था.
मेघना जब अन्य मेहमानों में व्यस्त हो गई, तो महिला मंडली उस के घर का अवलोकन करने लगी. दीवार पर लगी बाबा साहेब अंबेडकर की तसवीर देखते ही मिसेज कपूर चौंक गईं. वे नव्या और अन्य महिलाओं को लगभग खींचती हुई सी वहां ले कर आईं.

“ये देखो, मैं न कहती थी कि यह लड़की उस जाति की है,” मिसेज कपूर ने आंखें नचाते हुए कहा. वे अपनी सफलता का श्रेय किसी दूसरे को नहीं लेने देना चाहती थीं. सब ने आंखें फाड़फाड़ कर देखा. वे कभी तसवीर तो कभी मेघना को देख रही थीं.

“शक तो मुझे भी हुआ था, जब ये सब से घुलनेमिलने में आनाकानी करती थी. फिर मुझे लगा कि शायद नई है, इसलिए संकोच करती है. अब पता चला इस के संकोच का कारण. हिम्मत ही नहीं होती होगी सच का सामना करने की,” नव्या ने अपनी दलील रखी.

“अब तो सबकुछ सामने है. क्या अब भी यहां कुछ खानापीना करोगी? वापस चलें क्या?” मीनाक्षी ने कहा. सब एकदूसरे की तरफ देखने लगे. आखिर सब को यों अकारण वहां से ना जाना ही सही लगा और फिर सब की सब महिलाएं एक कोने में कुरसी ले कर बैठ गईं.

“अरे, आप लोग यहां कोने में क्यों बैठी हैं? कुछ लीजिए ना?” कहते हुए मेघना ने उन के सामने सौफ्ट ड्रिंक से भरे गिलासों वाली ट्रे कर दी. सब ने एकदूसरे की तरफ देखा, लेकिन गिलास की तरफ हाथ किसी ने भी नहीं बढ़ाया. किसी ने गला खराब होने, तो किसी ने ठंडे से एलर्जी को कारण बताया. हालांकि असल कारण से मेघना अनजान नहीं थी, इसलिए उस ने भी अधिक आग्रह नहीं किया.

खाना टेबल पर लगने की आहट होते ही महिलाओं का दल देरी होने का बहाना बनाते हुए वहां से खिसक लिया.

असली कहानी तो अब शुरू होती है. मेघना की जाति का आभास होते ही अब औफिस में उस का बायकट शुरू हो गया. न उसे लंच टाइम में इनवाइट किया जाता और ना ही उस के साथ अन्य किसी प्रकार की अंतरंगता रखी जा रही थी. औफिशियल काम के लिए जरूरी बातचीत के अतिरिक्त उन में आपस में कोई संवाद भी नहीं होता. सिर्फ नव्या ही थी, जो मेघना और शेष महिलाओं के बीच बातचीत का सेतु बनी हुई थी.

इन सब के बावजूद भी मेघना सब की बातों का मुख्य केंद्र अभी भी बनी हुई थी. कारण था उस की सहज मुसकान और बैंक के ग्राहकों में उस की बढ़ती लोकप्रियता. जो भी ग्राहक मेघना के काउंटर पर जाता, वह संतुष्ट हो कर ही लौटता था. नतीजा ये हुआ कि बैंक ने अपने स्थापना दिवस पर कुछ कर्मठ कर्मचारियों को संभाग स्तर पर सम्मानित करने का निर्णय लिया, जिन में से एक नाम मेघना का भी था.

कहना न होगा कि इस समारोह के बाद मेघना का सामाजिक दायरा और भी अधिक बढ़ गया. उस के मोबाइल में फोन नंबरों की सूची और भी अधिक लंबी हो गई और सोशल मीडिया पर आने वाले संदेशों के कारण उस के मोबाइल पर घड़ीघड़ी मैसेज अलर्ट भी पहले से कुछ अधिक बजने लगे, जिन्हें मजबूरन उसे साइलेंट करना पड़ा.

मेघना का लंच टाइम खाने के साथसाथ मिस्ड काल्स और मैसेज का जवाब देने में बीतने लगा. वैसे भी औफिस में उस के अधिक दोस्त तो थे नहीं, इसलिए वह ये काम बड़ी आसानी से कर पा रही थी. फोन पर बात करती हुई मेघना भी पूरे स्टाफ की निगाहों में रहती थी. फोन पर बात करते समय उस के चेहरे के हावभाव से हर कोई अपनी तरफ से कयास लगाता कि वह किस से बात कर रही होगी.

“आज तो मेघना मैडम के चेहरे की ललाई बता रही है कि बातचीत किसी बेहद दिल के करीब व्यक्ति से हो रही है,” एक दिन नव्या ने अंदाजा लगाया.

“हो सकता है. आखिर शादी की उम्र तो हो ही चली है. और अब तो नौकरी भी सेटल है. कोई न कोई मिल गया होगा,” मिसेज कपूर ने मुंह टेढ़ा करते हुए अपना मत रखा.

“होगा कोई भीम आर्मी का सिपाही,” मीनाक्षी के इतना कहते ही एक मिलजुला ठहाका गूंज गया.

“चलो, फाइनली मेघना को एक सरनेम तो मिलेगा,” कह कर नव्या ने ठहाके को आगे बढ़ाया.

नव्या चूंकि मेघना की हमउम्र थी, इसलिए भी उस के भीतर चल रहे परिवर्तनों को आसानी से समझ सकती थी. इन दिनों उसे महसूस हो रहा था मानो मेघना प्रेम में है. उस ने मेघना को बाथरूम में किसी के साथ वीडियो चैट करते देखा था. हालांकि नव्या उस व्यक्ति का चेहरा नहीं देख पाई थी, क्योंकि उस की आंखों के सामने मोबाइल की पीठ थी. मेघना का चेहरा उस के सामने था और उसी की भावभंगिमा से वह अंदाजा लगा पाई थी कि यह कोई प्रेमालाप चल रहा है. जैसे ही मेघना की निगाह नव्या से टकराई, उस ने झेंपते हुए वीडियो बंद कर दिया था.

“आज मैडम रंगेहाथों पकड़ी गई. अभीअभी बाथरूम में लाइव टेलीकास्ट देख कर आ रही हूं,” नव्या ने जैसे ही यह बम फोड़ा, हर तरफ अफरातफरी मच गई. सब की जिज्ञासा चरम पर पहुंच गई, लेकिन नामपता मालूम न होने के कारण यह एटम बम टांयटांय फिस्स हो गया.

ये वार चाहे खाली गया हो, लेकिन इस घटना ने नव्या को जासूस बना दिया. अब वह हर समय मेघना पर निगाह रखने लगी, लेकिन मेघना ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं, वह नव्या को हवा भी नहीं लगने दे रही थी.

“अब यार शादीवादी कर लो. तुम कहो तो देखें तुम्हारे लिए कोई?” एक दिन नव्या ने मेघना को छेड़ा.

“हांहां, क्यों नहीं. जरूर देखो. दोस्त लोग नहीं देखेंगे तो फिर और कौन देखेगा?” मेघना ने भी मुसकरा कर उत्तर दिया.

“कैसा लड़का चाहती हो अपने लिए?” नव्या ने पूछा.

“बिलकुल वैसा ही जैसा तुम अपने लिए उचित समझती हो,” कह कर मेघना ने नहले पर दहला मारा.

“यार, दिल की बात कहूं तो मुझे सांगानेर ब्रांच वाला मैनेजर राघव गुप्ता बहुत जमता है. क्या पर्सनैलिटी है यार. देखते ही दिल धक से हो जाता है, लेकिन तुम्हारे लिए… दरअसल, पता नहीं वह तुम्हारी जाति की लड़की से… मेरा मतलब समझ रही हो ना?” नव्या कहतेकहते रुकी, फिर टुकड़ोंटुकड़ों में अपनी बात पूरी की. उस की बात खत्म होते ही मेघना ठहाका लगा कर हंस पड़ी.

“बात तो तुम्हारी सही है दोस्त, लेकिन पूछने में हर्ज ही क्या है?” मेघना ने कहा और नव्या को हक्कीबक्की छोड़ अपनी सीट पर चल दी.

दिन गुजरते रहे, समय बीतता रहा… आजकल मेघना हर दिन पहले से अधिक निखरी और तरोताजा नजर आने लगी थी. एक दिन उस की उंगली में सोने की अंगूठी देख कर नव्या चहक उठी.

“अरे वाह, तुम तो छुपी रुस्तम निकली. कौन है वो किस्मत वाला?” नव्या ने उत्सुकता से पूछा. मेघना केवल मुसकरा दी. उन का शोर सुन कर मीनाक्षी और मिसेज कपूर भी वहां आ गईं. वे भी मेघना की अंगूठी को छू कर देखने लगी. सोने की अंगूठी में जड़ा हीरा उन में जलन पैदा कर रहा था.

“जरूर बताएंगे और मिलवाएंगे भी. जरा सांस तो ले मेरे यार… जरा सब्र तो कर दिलदार…” मेघना ने खिलखिला कर कहा और अपनी सीट की तरफ बढ़ गई.

एक दिन दोपहर को बैंक का लेनदेन समय समाप्त होने के बाद मेघना ने सब को हाल में इकट्ठा किया. सब ने देखा उस के हाथ में मिठाई का डब्बा था. मेघना ने एकएक कर सब को मिठाई खिलाई और शेष डब्बा वहां रखी टेबल पर रख दिया. मेघना रहस्यमई मुसकान के साथ सब को मिठाई खाते हुए देख रही थी.

“अब मिठाई का राज खोल भी दो. किस खुशी में मुंह मीठा करवाया जा रहा है?” बैंक मैनेजर ने पूछा.

“इस की शादी पक्की हो गई होगी,” मिसेज कपूर ने अंदाजा लगाते हुए कहा, तो मेघना के होंठों की मुसकान और भी अधिक चौड़ी हो गई. इतनी अधिक कि उस की सफेद दंतपंक्ति झिलमिलाने लगी.

“आप ने सही अनुमान लगाया मिसेज कपूर. अगले सप्ताह शनिवार को मेरी शादी है. आप सब लोगों को जरूर आना है,” कहती हुई मेघना के चेहरे का गुलाबी रंग किसी से छिपा नहीं था.

मेघना ने एक बैग में से शादी के कार्डों का बंडल निकाला और एकएक कर सब के हाथों में थमाती गई. जैसे ही मेघना ने मिसेज कपूर को कार्ड दिया, उन्होंने लपक कर उसे थाम लिया और सब से पहले होने वाले वर का नाम पढ़ने लगी.

“राघव गुप्ता, बैंक मैनेजर, सांगानेर ब्रांच…” नाम देखते ही उन की आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं. उधर नव्या और मीनाक्षी का भी यही हाल था. मेघना अब भी मुसकरा रही थी.

“यदि आप अनुमति दें तो मैं आज जरा जल्दी घर जाना चाहती हूं, मुझे शादी के लिए शापिंग करनी है.”

मेघना ने बैंक मैनेजर से आग्रह किया. उन के हां के इशारे के बाद मेघना महिला मंडली की तरफ मुड़ी और कहा, “आशा करती हूं कि आप लोगों को मेरे यहां खानेपीने में कोई परेशानी नहीं होगी. अब तो मैं मिसेज मेघना राघव गुप्ता होने जा रही हूं,” मेघना ने कहा और सब को धन्यवाद कहती हुई बैंक से बाहर निकल गई.

सब मिसेज मेघना राघव गुप्ता को जाते हुए अवाक देख रही थीं. Romantic Story in Hindi.

Hindi Family Story: हार- इस खेल में कौन हारा और कौन जीता?

Hindi Family Story: आबादी इतनी बढ़ गई है कि सड़क के दोनों किनारों तक शनीचरी बाजार सिमट गया है. चारों ओर मकान बन गए हैं. मजार और पुलिस लाइन के बीच जो सड़क जाती है, उसी सड़क के किनारे शनीचरी बाजार लगता है. तहसीली के बाद बाजार शुरू हो जाता है, बल्कि कहिए कि तहसीली भी अब बाजार के घेरे में आ गई है.

शनीचरी बाजार के उस हिस्से में केवल चमड़े के देशी जूते बिकते हैं. यहीं पर किशन गौशाला का दफ्तर भी है. अकसर गौशाला मैनेजर की झड़प मोचियों से हो जाती है. मोची कहते हैं कि उन के पुरखे शनीचरी बाजार में आ कर हरपा यानी सिंधोरा, भंदई, पनही यानी जूते बेचते रहे. तब पूरा बाजार मोचियों का था. जाने कहां से कैसे गौसेवक यहां आ गए. अगर सांसद के प्रतिनिधि आ कर बीचबचाव न करते तो शायद दंगा ही हो जाता.

लेकिन सांसद का शनीचरी बाजार में बहुत ही अपनापा है इसलिए मोचियों का जोश हमेशा बढ़ा रहता है. अपनापा भी खरीदबिक्री के चलते है. सांसद रहते दिल्ली में हैं, मगर हर महीने तकरीबन 25-30 जोड़ी खास देशी जूते, जिसे यहां भंदई कहा जाता है, दिल्ली में मंगाते हैं.

भंदई के बहुत बड़े खरीदार हैं सांसद महोदय. मोची तो उन्हें पहचानते ही नहीं, क्योंकि वे खुद तो आ कर भंदई नहीं खरीदते, पर उन के लोग भंदई खरीद कर ले जाते हैं.

गौशाला चलाने वाले भी सांसद का लिहाज करते हैं. आखिर उन्हीं की मेहरबानी से गौशाला वाले नजदीक की बस्ती जरहा गांव में 20 एकड़ जमीन जबरदस्ती कब्जा सके थे.

किशन गौशाला शहर के करीब बसे जरहा गांव में है. इस गौशाला में सांसद कई बार जा चुके हैं. पहले गौशाला वालों ने 10 एकड़ जमीन गांव के किसानों से खरीदी. वहां कुछ गायों को रखा. कृष्ण जन्माष्टमी के दिन एक कार्यक्रम हुआ था, जिस में सांसद चीफ गैस्ट बने थे. सरपंच के दोस्तों ने दही लूटने का कमाल दिखाया, फिर अखाड़े का करतब हुआ.

गांव वाले बहुत खुश हुए कि चलो गांव में गौमाता के लिए एक ढंग का आसरा तो बना. सांसद ने उस दिन गांव के मोचियों को भी इस समारोह में बुलाया. जरहा गांव शहर से सट कर बसा है. गौशाला का दफ्तर शहर में है और गौशाला है जरहा गांव में.

दफ्तर के पास जरहा गांव, बोरिद, अकोली के मोची चमड़े का सामान बेचने शनिवार को आते हैं, पर बाकी दिन वे गांव में भंदई बनाते हैं. जाने कब से यह सिलसिला इसी तरह चल रहा है.

लेकिन जब से सांसद भोलाराम भंदई खरीद कर दिल्ली ले जाने लगे हैं, तभी से मोचियों का कारोबार कुछ नए रंग पर आ गया है. ऊपर से सांसद ने अपनी सांसद निधि से जरहा गांव में मोची संघ के लिए पिछले साल 3 लाख रुपए दिए थे. वे गांवगांव में अलगअलग मंचों के लिए सांसद निधि से खूब पैसे देते हैं, मगर इन दिनों मंचों की धूम है.

इस इलाके में दलितों की तादाद ज्यादा?है, इसलिए सांसद अपने हिसाब से अपना भविष्य पुख्ता करते चल रहे हैं. मोची मंचों का भी लगातार फैलाव हो रहा है, तो गौशाला का भला हो रहा है.

गौशाला के कर्ताधर्ता सब दूसरे राज्य के हैं. वे शहर के जानेमाने कारोबारी हैं. सब ने थोड़ाथोड़ा पैसा लगा कर 10 एकड़ जमीन ले ली और किशन गौशाला खोल कर गांव में घुस गए. वहां 2 दुकानें भी अब इसी तबके की खुल गई हैं. एक स्कूल भी जरहा गांव में चलता है, जिसे किशनशाला नाम दिया गया है.

इस स्कूल में सभी टीचर सेठों के  जानकार लोग हैं. सांसद सेठों और मोचियों में बराबर से इज्जत बनाए हुए हैं. सब को पार लगाते हैं, चूंकि सब उन्हें पार लगाते हैं.

लेकिन इधर जब से बाबरी मसजिद ढही है, जरहा गांव में दूसरा दल भी हरकत में आ गया है. सेठ सांसद के विरोधी दल को पसंद करते हैं. जिले में 2 ही झंडे असर में हैं, तिरंगा और भगवा. 2 ही चिह्न यहां पहचाने जाते हैं, पंजा और कमल.

गौप्रेमी सभी सेठ कमल पर विराजने वाली लक्ष्मी मैया के भगत हैं, वहीं मोची, लुहार, धोबी, कुम्हार, कुर्मी,  तेली, इन्हीं जातियों की तादाद इस इलाके में ज्यादा है, इसीलिए आजादी के बाद कांग्रेस को भी इलाके के लोगों ने अपना समर्थन दिया. लेकिन जब से बाबरी मसजिद को ढहा कर जरहा गांव का नौजवान गांव लौटा है, कमल की नई रंगत देखते ही बन रही है.

लेकिन सांसद भोलाराम परेशान नहीं होते. वे जानते हैं कि सेठों को इस लोक पर राज करने के लिए धंधा प्यारा है और परलोक सुधारने के लिए है ही किशन गौशाला. दोनों के फायदे में है कि वे कभी भोलाराम का दामन न छोड़ें.

ये भोलाराम भी कमाल के आदमी हैं. एक बड़े किसान के घर में पैदा हुए. मैट्रिक पास कर आगे पढ़ना चाहते थे, लेकिन उन के पिताजी ने पैरों में बेड़ी पहनाने की ठान ली.

शादी की सारी तैयारी हो गई, लेकिन बरात निकलने के ठीक पहले दूल्हा अचानक ही गायब हो गया और प्रकट हुआ दिल्ली में. यह बात साल 1946 की है. सालभर में भोलाराम ने दिल्ली के एक बडे़ अखबार में अपने लिए जगह बना ली.

भोलाराम दल के लोग तो चुनाव के समय रोरो कर यह भी बताते हैं कि भोलारामजी तब रिपोर्टिंग के लिए गांधीजी की अंतिम प्रार्थना सभा में भी गए थे. नाथूराम ने जब गोलियां चलाईं, तो गांधीजी ‘हे राम’ कह कर भोलारामजी की गोद में ही गिरे थे.

भोलाराम के खास लोग तो यह भी कहते हैं कि भोलारामजी का खून से सना कुरता आज भी गांधी संग्रहालय में हैं. जिसे देखना हो दिल्ली जा कर देख आए.

इलाके के लोगों में वह कुरता देखने की कभी दिलचस्पी नहीं रही. भोलाराम लगातार आगे बढ़ते गए और दिल्ली में एक नामी पत्रकार हो गए.

एक दिन इंदिरा गांधी ने उन्हें इस इलाके का सांसद बना दिया. इस इलाके के लोग नेताओं की बात नहीं टालते.

इंदिरा गांधी ने पहली चुनावी सभा में कहा, ‘‘यह इलाका भोलेभाले लोगों का है. यहां भोलाराम ही सच्चे प्रतिनिधि हो सकते हैं.’’

इंदिरा गांधी से आशीर्वाद ले कर भोलाराम भी उस दिन जोश से भर गए. उन्होंने मंच पर ही कहा, ‘‘इंदिरा गांधी की बात हम सभी को माननी है. अगर विरोधियों के भालों से बचना है, तो भोले को समर्थन जरूर दीजिए.’’

भोले और भाले का ऐसा तालमेल इंदिरा गांधी को भी भा गया. उन्होंने मुसकरा कर भोलाराम को और अतिरिक्त अंक दे दिया.

तब से लगातार 5 बार भोलाराम ही यहां के सांसद बने. वे इलाके के बड़े लोगों की बेहद कद्र करते हैं, इसीलिए भोलाराम की बात भी कोई नहीं टालता.

महीनाभर पहले शनीचरी बाजार में हंगामा मच गया. हुआ यह कि भोलाराम अपने टोपीधारी विशेष प्रतिनिधि के साथ बाजार आए. चैतराम मोची की दुकान बस अभी लगी ही थी कि दोनों नेता उस के आगे जा कर खड़े हो गए.

चैतराम ने इस से पहले कभी भोलाराम को देखा भी नहीं था. वह केवल साथ में आए गोपाल दाऊ को पहचानता था.

गोपाल दाऊ ने ही चैतराम को भोलाराम का परिचय दिया. खादी का कुरतापाजामा और गले में लाल रंग का  गमछा.

भोलाराम तकरीबन 70 बरस के हैं, मगर चेहरा सुर्ख लाल है. चुनाव जीतने के बाद उन का सूखा चेहरा लाल होता गया और वे 2 भागों में बंट गए.

भोलाराम दिल्ली में रहते तो सूटबूट पहनते. गले में लाल रंग का गमछा तो खैर रहा ही. दिल्ली में रहते तो दिल्ली वालों की तरह खातेपीते, लेकिन अपने संसदीय इलाके में मुनगा, बड़ी, मछरियाभाजी, कांदाभाजी ही खाते.

अपने इलाके में भंदई पे्रमी सांसद भोलाराम को सामने पा कर चैतराम को कुछ सूझा नहीं. भोलाराम ने उस के कंधे पर हाथ रख दिया.

चैतराम ने भोलाराम के पैरों में अपने हाथों की बनी भंदई रख दी. भंदई छत्तीसगढ़ी सैंडल को कहते हैं. मोची गांव में मरे मवेशियों के चमड़े से इसे बनाते हैं. सूखे दिनों की भंदई अलग होती है, जबकि बरसाती भंदई अलग बनती है.

अपने हाथ की बनी भंदई पहने देख भोलाराम के सामने चैतराम झुक गया. भोलाराम ने कहा, ‘‘भाई, मुझे पता लगा है कि तुम्हीं मुझे भंदई बना कर देते हो, इसलिए मिलने चला आया. इस बार 100 जोड़ी भंदई चाहिए.’’

‘‘100 जोड़ी…’’ चैतराम का मुंह खुला का खुला रह गया.

भोलाराम ने कहा, ‘‘हां, 100 जोड़ी. दिल्ली में अपने दोस्तों को तुम्हारे हाथ की भंदई बहुत बांट चुका हूं. इस बार विदेशी दोस्तों का साथ होने वाला है.

‘‘मैं जब भी विदेश जाता हूं, तो वहां भंदई पर सब की नजर गड़ जाती है. सोचता हूं कि इस बार एकएक जोड़ी भंदई उन्हें भेंट करूं. बन जाएगी न?’’

चैतराम ने पूछा, ‘‘कब तक चाहिए मालिक?’’

‘‘2 महीने में.’’

‘‘2 महीने में… मालिक?’’

‘‘हांहां, 2 महीने में तुम्हें देनी है. मैं खुद आऊंगा तुम्हारे गांव में भंदई ले जाने के लिए.’’

‘‘मालिक, गांवभर के सारे मोची मिलजुल कर बनाएंगे. मैं गांव जा कर सब को तैयार करूंगा.’’

‘‘तुम जानो तुम्हारा काम जाने. मुझे तो भंदई चाहिए बस.’’

इतना सुनना था कि पास में दुकान लगाए उसी गांव के 2 और मोची एकसाथ बोल पड़े, ‘‘दाऊजी, आप की मेहरबानी से सब ठीकठाक है. हम सब मिल कर बना देंगे भंदई.

‘‘मगर मालिक, ये गौशाला वाले गांव में 20 एकड़ जमीन पर कब्जा कर के बैठ गए हैं. पिछले 2 साल से यहां के किसान अपने जानवरों को रिश्तेदारों के पास पहुंचाने लगे हैं.

‘‘हुजूर, यह जगह जानवरों के चरने के लिए थी, मगर सेठ लोगों ने घेर कर कब्जा कर लिया है.

‘‘2 साल से हम सब लोग फरियाद कर रहे हैं, पर कोई सुनता ही नहीं. अब आप आ गए हैं, तो कुछ तो रास्ता निकालिए. छुड़ाइए गायभैंसों के लिए उस 20 एकड़ जमीन को. गौशाला के नाम से सेठ लोग गाय के चरने की जगह को ही लील ले गए साहब. अजब अंधेर है.’’

भोलाराम को इस बेजा कब्जे की जानकारी तो थी, मगर वे यही सोच रहे थे कि सेठ लोग सब संभाल लेंगे. यहां तो पासा ही पलट सा गया है. भंदई का शौक अब उन्हें भारी पड़ रहा था. फिर भी उन्होंने चैतराम को पुचकारते हुए कहा, ‘‘मैं देख लूंगा. तुम लो ये एक हजार रुपए एडवांस के.’’

‘‘इस की जरूरत नहीं है मालिक,’’ हाथ जोड़ कर चैतराम ने कहा.

‘‘रख लो,’’ भोलाराम ने कहा.

चैतराम ने रखने को तो अनमने ढंग से एक हजार रुपए रख लिए, मगर सौ जोड़ी भंदई बना पाना उसे आसान नहीं लग रहा था.

गांव जा कर उस ने अपने महल्ले के लोगों को इकट्ठा किया. 4 लोगों ने 25-25 जोड़ी भंदई बनाने का जिम्मा ले लिया. चैतराम का जी हलका हुआ.

लेकिन सेठों को भी खबर लग गई कि गांव के मोची किशन गौशाला का विरोध सांसद भोलाराम से कर रहे थे. वे बहुत भन्नाए. उन्होंने गांव के अपने पिछलग्गू सरपंच, पंच और कुछ खास लोगों से बात की और गांव में बैठक हो गई. सरपंच ने मोची महल्ले के लोगों के साथ गांव वालों को भी बुलवाया.

सरपंच ने कहा, ‘‘देखो भाई, आज की बैठक बहुत खास है. गाय की वजह से बैठी है यह सभा.’’

चैतराम ने कहा, ‘‘मालिक, गाय का चारागाह सब गौशाला वाले दबाए बैठे हैं. चारागाह नहीं रहेगा, तो गौधन की बढ़ोतरी कैसे होगी?’’

चैतराम का इतना कहना था कि बाबरी मसजिद तोड़ने गई सेना में शामिल हो कर लौटे जरहा गांव का एकलौता वीर सुंदरलाल उठ खड़ा हुआ. उस ने कहा, ‘‘वाह रे चैतराम, तू कब से हो गया गौ का शुभचिंतक?’’

सुंदरलाल का इतना कहना था कि चैतराम के साथ उस के महल्ले के सभी लोग उठ खड़े हुए. उस ने कहा, ‘‘मालिक हो, मगर बात संभल कर नहीं कर सकते. हम मरे हुए गायभैंसों का चमड़ा उतारते हैं, आप लोग तो जीतीजागती गाय की जगह दबाने वालों के हाथों खेल गए.’’

ऐसा सुन कर सुंदरलाल सिटपिटा सा गया. तभी भोलाराम दल के एक जवान रामलाल ने कहा, ‘‘राजनीति करो, मगर धर्म बचा कर. आदिवासियों को गाय बांटने का झांसा तुम लोग देते हो और गांव की जमीन, जिस में गाएं चरती थीं, उसे पैसा ले कर बाहर से आए सेठों को भेंट कर देते हो.’’

सुंदरलाल ने कहा, ‘‘100 जोड़ी भंदई के लिए गायों को जहर दे कर मरवाओगे क्या…?’’

उस का इतना कहना था कि ‘मारोमारो’ की आवाज होने लगी और लाठीपत्थर चलने लगे. गांव में यह पहला मौका था, जब बैठक में लाठियां चल रही थीं.

3 मोचियों के सिर फट गए. चैतराम का बायां हाथ टूट गया. अखबार में खबर छप गई. सांसद भोलाराम ने जरहा गांव का दौरा किया. उन्होंने मोचियों से कहा, ‘‘तुम लोग एकएक घाव का हिसाब मांगने का हक रखते हो. यह गुंडागर्दी नहीं चलेगी. मैं सब देख लूंगा.’’

भाषण दे कर जब भोलाराम अपनी कार में बैठ रहे थे, तभी उन्हीं की उम्र के एक आदमी ने उन्हें आवाज दे कर रोका. भोलाराम ने पूछा, ‘‘कहो भाई?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘भोला भाई, अब आप न भोले हैं, न भाले हैं. मैं पहले चुनाव से आप का संगी हूं. जहां भाला बनना चाहिए, वहां आप भोला बन जाते हैं. जहां भोला बनना चाहिए, वहां भाला, इसलिए सबकुछ गड्डमड्ड हो गया.‘‘भाई मेरे कोई जिंदा गाय की राजनीति कर रहा है, तो कोई मरी हुई गाय की चमड़ी का चमत्कार बूझ रहा है. हैं दोनों ही गलत. मगर हमारी मजबूरी है कि 2 गलत में से एक को हर बार चुनना पड़ता है. इस तरह हम ही हर बार हारते हैं.’’ Hindi Family Story.

Best Social Story in Hindi: लाडो का पीला झबला- परिवार और प्यार की कहानी

Best Social Story in Hindi: सुबह सुबह ही शाहिस्ता ने सोहेल से कहा, ‘‘आज वक्त निकाल कर अपने लिए नई पतलून ले आइए. अब तो रफू के धागे भी जवाब दे चुके हैं.’’ सोहेल ने बड़ी बुलंद आवाज में कहा, ‘‘बेगम का हुक्म सिरआंखों पर. आज तो दिन भी बाजार का.’’

हर जुमेरात पर शहर के छोर पर नानानानी पार्क के पास वाली सड़क पर बाजार लगता था. सोहेल ने जल्दीजल्दी अपना काम खत्म कर के बाजार का रुख कर लिया. दिमाग में हिसाब चालू था. 2 ईद गुजर चुकी थीं, उसे खुद के लिए नया जोड़ा कपड़ा लिए हुए. इस बार 25 रुपए बचे हैं, महीने के हिसाब से… पूरे 12 किलोमीटर चलने के बाद बाजार आ ही गया. शाम बीतने को थी. अंधेरा हो चुका था. बाजार ट्यूबलाइट और बल्ब की रोशनी से जगमगा रहा था.

सोहेल ने अपनी जेब की गहराई के मुताबिक दुकान समझी और यहांवहां नजर दौड़ाने लगा. अचानक उस की नजर एक तरफ सजे हुए झबलों पर पड़ी. नीले, लाल, हरे, पीले और बहुत से रंग. दुकानदार ने सोहेल को कुछ पतलूनें दिखाईं. मोलभाव शुरू हुआ. 20 रुपए की पतलून तय हुई.

सोहेल ने पूछा, ‘‘भाई, बच्चों के वे रंगबिरंगे झबले कितने के हैं?’’ दुकानदार ने कहा, ‘‘25 के 3. कोई मोलभाव नहीं हो पाएगा इस में.’’सोहेल ने जेब से पैसे निकाले और 3 झबले ले लिए. 12 किलोमीटर चल के घर आतेआते रात काफी हो चली थी.

घर का दरवाजा खटखटाते ही शाहिस्ता ने दरवाजा तुरंत खोला, मानो वह दरवाजे से चिपक कर ही खड़ी थी. सोहेल ने पूछा, ‘‘हमारी लाडो सो गई क्या?’’

 

शाहिस्ता ने जवाब दिया, ‘‘वह तो कब की सो गई. मैं तो तुम्हारी नई पतलून का इंतजार कर रही थी.’’ सोहेल ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘बेगम, आप का इंतजार और लंबा हो गया.’’

शाहिस्ता ने पैकेट खोला और उस में से निकले 3 झबले. उस ने बिना कुछ कहे खाना निकालना सही समझा. खाना लगा कर उस ने सिलाई मशीन में तेल डाला, काला धागा निकाला और पुरानी पतलून को रफू करने लगी.

सोहेल ने खाना खाते हुए मुसकरा कर कहा, ‘‘लाडो के ऊपर पीला झबला तो बड़ा ही खूबसूरत लगेगा. क्यों शाहिस्ता…’’ शाहिस्ता ने दांतों से धागा काटते हुए कहा, ‘‘लो, तुम्हारी पतलून फिर से तैयार हो गई.’’ Best Social Story in Hindi. 

Family Story in Hindi: पीठ पीछे- दिनेश के सम्मुख कैसा सच सामने आया?

Family Story in Hindi: दिनेश हर सुबह पैदल टहलने जाता था. कालोनी में इस समय एक पुलिस अफसर नएनए तबादले पर आए हुए थे. वे भी सुबह टहलते थे. एक ही कालोनी का होने के नाते वे एकदूसरे के चेहरे पहचानने लगे थे. आज कालोनी के पार्क में उन से भेंट हो गई. उन्होंने अपना परिचय दिया और दिनेश ने अपना. उन का नाम हरपाल सिंह था. वे पुलिस में डीएसपी थे और दिनेश कालेज में प्रोफैसर.

वे दोनों इधरउधर की बात करते हुए आगे बढ़ रहे थे कि तभी सामने से आते एक शख्स को देख कर हरपाल सिंह रुक गए. दिनेश को भी रुकना पड़ा. हरपाल सिंह ने उस आदमी के पैर छुए. उस आदमी ने उन्हें गले से लगा लिया.

हरपाल सिंह ने दिनेश से कहा, ‘‘मैं आप का परिचय करवाता हूं. ये हैं रामप्रसाद मिश्रा. बहुत ही नेक, ईमानदार और सज्जन इनसान हैं. ऐसे आदमी आज के जमाने में मिलना मुश्किल हैं.

‘‘ये मेरे गुरु हैं. ये मेरे साथ काम कर चुके हैं. इन्होंने अपनी जिंदगी ईमानदारी से जी है. रिश्वत का एक पैसा भी नहीं लिया. चाहते तो लाखोंकरोड़ों रुपए कमा सकते थे.’’ अपनी तारीफ सुन कर रामप्रसाद मिश्रा ने हाथ जोड़ लिए. वे गर्व से चौड़े नहीं हो रहे थे, बल्कि लज्जा से सिकुड़ रहे थे.

दिनेश ने देखा कि उन के पैरों में साधारण सी चप्पल और पैंटशर्ट भी सस्ते किस्म की थीं. हरपाल सिंह काफी देर तक उन की तारीफ करते रहे और दिनेश सुनता रहा. उसे खुशी हुई कि आज के जमाने में भी ऐसे लोग हैं.

कुछ समय बाद रामप्रसाद मिश्रा ने कहा, ‘‘अच्छा, अब मैं चलता हूं.’’ उन के जाने के बाद दिनेश ने पूछा, ‘‘क्या काम करते हैं ये सज्जन?’’

‘‘एक समय इंस्पैक्टर थे. उस समय मैं सबइंस्पैक्टर था. इन के मातहत काम किया था मैं ने. लेकिन ऐसा बेवकूफ आदमी मैं ने आज तक नहीं देखा. चाहता तो आज बहुत बड़ा पुलिस अफसर होता लेकिन अपनी ईमानदारी के चलते इस ने एक पैसा न खाया और न किसी को खाने दिया.’’ ‘‘लेकिन अभी तो आप उन के सामने उन की तारीफ कर रहे थे. आप ने उन के पैर भी छुए थे,’’ दिनेश ने हैरान हो कर कहा.

‘‘मेरे सीनियर थे. मुझे काम सिखाया था, सो गुरु हुए. इस वजह से पैर छूना तो बनता है. फिर सच बात सामने तो नहीं कही जा सकती. पीठ पीछे ही कहना पड़ता है. ‘‘मुझे क्या पता था कि इसी शहर में रहते हैं. अचानक मिल गए तो बात करनी पड़ी,’’ हरपाल सिंह ने बताया.

‘‘क्या अब ये पुलिस में नहीं हैं?’’ दिनेश ने पूछा. ‘‘ऐसे लोगों को महकमा कहां बरदाश्त कर पाता है. मैं ने बताया न कि न किसी को घूस खाने देते थे, न खुद खाते थे. पुलिस में आरक्षकों की भरती निकली थी. इन्होंने एक रुपया नहीं लिया और किसी को लेने भी नहीं दिया. ऊपर के सारे अफसर नाराज हो गए.

‘‘इस के बाद एक वाकिआ हुआ. इन्होंने एक मंत्रीजी की गाड़ी रोक कर तलाशी ली. मंत्रीजी ने पुलिस के सारे बड़े अफसरों को फोन कर दिया. सब के फोन आए कि मंत्रीजी की गाड़ी है, बिना तलाशी लिए जाने दिया जाए, पर इन पर तो फर्ज निभाने का भूत सवार था. ये नहीं माने. तलाशी ले ली. ‘‘गाड़ी में से कोकीन निकली, जो मंत्रीजी खुद इस्तेमाल करते थे. ये मंत्रीजी को थाने ले गए, केस बना दिया. मंत्रीजी की तो जमानत हो गई, लेकिन उस के बाद मंत्रीजी और पूरा पुलिस महकमा इन से चिढ़ गया.

‘‘मंत्री से टकराना कोई मामूली बात नहीं थी. महकमे के सारे अफसर भी बदला लेने की फिराक में थे कि इस आदमी को कैसे सबक सिखाया जाए? कैसे इस से छुटकारा पाया जाए? ‘‘कुछ समय बाद हवालात में एक आदमी की पूछताछ के दौरान मौत हो गई. सारा आरोप रामप्रसाद मिश्रा यानी इन पर लगा दिया गया. महकमे ने इन्हें सस्पैंड कर दिया.

‘‘केस तो खैर ये जीत गए. फिर अपनी शानदार नौकरी पर आ सकते थे, लेकिन इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी ये आदमी नहीं सुधरा. दूसरे दिन अपने बड़े अफसर से मिल कर कहा कि मैं आप की भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन सकता. न ही मैं यह चाहता हूं कि मुझे फंसाने के लिए महकमे को किसी की हत्या का पाप ढोना पड़े. सो मैं अपना इस्तीफा आप को सौंपता हूं.’’ हरपाल सिंह की बात सुन कर रामप्रसाद के प्रति दिनेश के मन में इज्जत बढ़ गई. उस ने पूछा, ‘‘आजकल क्या कर रहे हैं रामप्रसादजी?’’

हरपाल सिंह ने हंसते हुए कहा, ‘‘4 हजार रुपए महीने में एक प्राइवेट स्कूल में समाजशास्त्र के टीचर हैं. इतना नालायक, बेवकूफ आदमी मैं ने आज तक नहीं देखा. इस की इन बेवकूफाना हरकतों से एक बेटे को इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ कर आना पड़ा. अब बेचारा आईटीआई में फिटर का कोर्स कर रहा है.

‘‘दहेज न दे पाने के चलते बेटी की शादी टूट गई. बीवी आएदिन झगड़ती रहती है. इन की ईमानदारी पर अकसर लानत बरसाती है. इस आदमी की वजह से पहले महकमा परेशान रहा और अब परिवार.’’ ‘‘आप ने इन्हें समझाया नहीं. और हवालात में जिस आदमी की हत्या कर इन्हें फंसाया गया था, आप ने कोशिश नहीं की जानने की कि वह आदमी कौन था?’’

हरपाल सिंह ने कहा, ‘‘जिस आदमी की हत्या हुई थी, उस में मंत्रीजी समेत पूरा महकमा शामिल था. मैं भी था. रही बात समझाने की तो ऐसे आदमी में समझ होती कहां है दुनियादारी की? इन्हें तो बस अपने फर्ज और अपनी ईमानदारी का घमंड होता है.’’ ‘‘आप क्या सोचते हैं इन के बारे में?’’

‘‘लानत बरसाता हूं. अक्ल का अंधा, बेवकूफ, नालायक, जिद्दी आदमी.’’ ‘‘आप ने उन के सामने क्यों नहीं कहा यह सब? अब तो कह सकते थे जबकि इस समय वे एक प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं और आप डीएसपी.’’

‘‘बुराई करो या सच कहो, एक ही बात है. और दोनों बातें पीठ पीछे ही कही जाती हैं. सब के सामने कहने वाला जाहिल कहलाता है, जो मैं नहीं हूं. ‘‘जैसे मुझे आप की बुराई करनी होगी तो आप के सामने कहूंगा तो आप नाराज हो सकते हैं. झगड़ा भी कर सकते हैं. मैं ऐसी बेवकूफी क्यों करूंगा? मैं रामप्रसाद की तरह पागल तो हूं नहीं.’’

दिनेश ने उसी दिन तय किया कि आज के बाद वह हरपाल सिंह जैसे आदमी से दूरी बना कर रखेगा. हां, कभी हरपाल सिंह दिख जाता तो वह अपना रास्ता इस तरह बदल लेता जैसे उसे देखा ही न हो. Family Story in Hindi.

Hindi Family Story: आलू वड़ा- दीपक मामी की हरकतों से क्यों परेशान था?

Hindi Family Story: ‘‘बाबू, तुम इस बार दरभंगा आओगे तो हम तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे,’’ छोटी मामी की यह बात दीपक के दिल को छू गई. पटना से बीएससी की पढ़ाई पूरी होते ही दीपक की पोस्टिंग भारतीय स्टेट बैंक की सकरी ब्रांच में कर दी गई. मातापिता का लाड़ला और 2 बहनों का एकलौता भाई दीपक पढ़ने में तेज था. जब मां ने मामा के घर दरभंगा में रहने की बात की तो वह मान गया.

इधर मामा के घर त्योहार का सा माहौल था. बड़े मामा की 3 बेटियां थीं, मझले मामा की 2 बेटियां जबकि छोटे मामा के कोई औलाद नहीं थी.

18-19 साल की उम्र में दीपक बैंक में क्लर्क बन गया तो मामा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वहीं दूसरी ओर दीपक की छोटी मामी, जिन की शादी को महज 4-5 साल हुए थे, की गोद सूनी थी.

छोटे मामा प्राइवेट नौकरी करते थे. वे सुबह नहाधो कर 8 बजे निकलते और शाम के 6-7 बजे तक लौटते. वे बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चला पाते थे. ऐसी सूरत में जब दीपक की सकरी ब्रांच में नौकरी लगी तो सब खुशी से भर उठे.

‘‘बाबू को तुम्हारे पास भेज रहे हैं. कमरा दिलवा देना,’’ दीपक की मां ने अपने छोटे भाई से गुजारिश की थी.

‘‘कमरे की क्या जरूरत है दीदी, मेरे घर में 2 कमरे हैं. वह यहीं रह लेगा,’’ भाई के इस जवाब में बहन बोलीं, ‘‘ठीक है, इसी बहाने दोनों वक्त घर का बना खाना खा लेगा और तुम्हारी निगरानी में भी रहेगा.’’

दोनों भाईबहनों की बातें सुन कर दीपक खुश हो गया.

मां का दिया सामान और जरूरत की चीजें ले कर दोपहर 3 बजे का चला दीपक शाम 8 बजे तक मामा के यहां पहुंच गया.

‘‘यहां से बस, टैक्सी, ट्रेन सारी सुविधाएं हैं. मुश्किल से एक घंटा लगता है. कल सुबह चल कर तुम्हारी जौइनिंग करवा देंगे,’’ छोटे मामा खुशी से चहकते हुए बोले.

‘‘आप का काम…’’ दीपक ने अटकते हुए पूछा.

‘‘अरे, एक दिन छुट्टी कर लेते हैं. सकरी बाजार देख लेंगे,’’ छोटे मामा दीपक की समस्या का समाधान करते हुए बोल उठे.

2-3 दिन में सबकुछ सामान्य हो गया. सुबह साढ़े 8 बजे घर छोड़ता तो दीपक की मामी हलका नाश्ता करा कर उसे टिफिन दे देतीं. वह शाम के 7 बजे तक लौट आता था.

उस दिन रविवार था. दीपक की छुट्टी थी. पर मामा रोज की तरह काम पर गए हुए थे. सुबह का निकला दीपक दोपहर 11 बजे घर लौटा था. मामी खाना बना चुकी थीं और दीपक के आने का इंतजार कर रही थीं.

‘‘आओ लाला, जल्दी खाना खा लो. फेरे बाद में लेना,’’ मामी के कहने में भी मजाक था.

‘‘बस, अभी आया,’’ कहता हुआ दीपक कपड़े बदल कर और हाथपैर धो कर तौलिया तलाशने लगा.

‘‘तुम्हारे सारे गंदे कपड़े धो कर सूखने के लिए डाल दिए हैं,’’ मामी खाना परोसते हुए बोलीं.

दीपक बैठा ही था कि उस की मामी पर निगाह गई. वह चौंक गया. साड़ी और ब्लाउज में मामी का पूरा जिस्म झांक रहा था, खासकर दोनों उभार.

मामी ने बजाय शरमाने के चोट कर दी, ‘‘क्यों रे, क्या देख रहा है? देखना है तो ठीक से देख न.’’

अब दीपक को अजीब सा महसूस होने लगा. उस ने किसी तरह खाना खाया और बाहर निकल गया. उसे मामी का बरताव समझ में नहीं आ रहा था.

उस दिन दीपक देर रात घर आया और खाना खा कर सो गया.

अगली सुबह उठा तो मामा उसे बीमार बता रहे थे, ‘‘शायद बुखार है, सुस्त दिख रहा है.’’

‘‘रात बाहर गया था न, थक गया होगा,’’ यह मामी की आवाज थी.

‘आखिर माजरा क्या है? मामी क्यों इस तरह का बरताव कर रही हैं,’ दीपक जितना सोचता उतना उलझ रहा था.

रात खाना खाने के बाद दीपक बिस्तर पर लेटा तो मामी ने आवाज दी. वह उठ कर गया तो चौंक गया. मामी पेटीकोट पहने नहा रही थीं.

‘‘उस दिन चोरीछिपे देख रहा था. अब आ, देख ले,’’ कहते हुए दोनों हाथों से पकड़ उसे अपने सामने कर दिया.

‘‘अरे मामी, क्या कर रही हो आप,’’ कहते हुए दीपक ने बाहर भागना चाहा मगर मामी ने उसे नीचे गिरा दिया.

थोड़ी ही देर में मामीभांजे का रिश्ता तारतार हो गया. दीपक उस दिन पहली बार किसी औरत के पास आया था. वह शर्मिंदा था मगर मामी ने एक झटके में इस संकट को दूर कर दिया, ‘‘देख बाबू, मुझे बच्चा चाहिए और तेरे मामा नहीं दे सकते. तू मुझे दे सकता है.’’

‘‘मगर ऐसा करना गलत होगा,’’ दीपक बोला.

‘‘मुझे खानदान चलाने के लिए औलाद चाहिए, तेरे मामा तो बस रोटीकपड़ा, मकान देते हैं. इस के अलावा भी कुछ चाहिए, वह तुम दोगे,’’ इतना कह कर मामी ने दीपक को बाहर भेज दिया.

उस के बाद से तो जब भी मौका मिलता मामी दीपक से काम चला लेतीं. या यों कहें कि उस का इस्तेमाल करतीं. मामा चुप थे या जानबूझ कर अनजान थे, कहा नहीं जा सकता, मगर हालात ने उन्हें एक बेटी का पिता बना दिया.

इस दौरान दीपक ने अपना तबादला पटना के पास करा लिया. पटना में रहने पर घर से आनाजाना होता था. छोटे मामा के यहां जाने में उसे नफरत सी हो रही थी. दूसरी ओर मामी एकदम सामान्य थीं पहले की तरह हंसमुख और बिंदास.

एक दिन दीपक की मां को मामी ने फोन किया. मामी ने जब दीपक के बारे में पूछा तो मां ने झट से उसे फोन पकड़ा दिया.

‘‘हां मामी प्रणाम. कैसी हो?’’ दीपक ने पूछा तो वे बोलीं, ‘‘मुझे भूल गए क्या लाला?’’

‘‘छोटी ठीक है?’’ दीपक ने पूछा तो मामी बोलीं, ‘‘बिलकुल ठीक है वह. अब की बार आओगे तो उसे भी देख लेना. अब की बार तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे. तुम्हें खूब पसंद है न.’’

दीपक ने ‘हां’ कहते हुए फोन काट दिया. इधर दीपक की मां जब छोटी मामी का बखान कर रही थीं तो वह मामी को याद कर रहा था जिन्होंने उस का आलू वड़ा की तरह इस्तेमाल किया, और फिर कचरे की तरह कूड़ेदान में फेंक दिया.

औरत का यह रूप उसे अंदर ही अंदर कचोट रहा था.

‘मामी को बच्चा चाहिए था तो गोद ले सकती थीं या सरोगेट… मगर इस तरह…’ इस से आगे वह सोच न सका.

मां चाय ले कर आईं तो वह चाय पीने लगा. मगर उस का ध्यान मामी के घिनौने काम पर था. उसे चाय का स्वाद कसैला लग रहा था. Hindi Family Story.

Best Family Story in Hindi: दुनिया पूरी- जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जहां सबकुछ रुक गया

Best Family Story in Hindi: मेरी पत्नी का देहांत हुए 5 वर्ष बीत गए थे. ऐसे दुख ख़त्म तो कभी नहीं होते, पर मन पर विवशता व उदासीनता की एक परत सी जम गई थी. इस से दुख हलका लगने लगा था. जीवन और परिवार की लगभग सभी जिम्मेदारियां पूरी हो चुकी थीं. नौकरी से सेवानिवृत्ति, बच्चों की नौकरियां और विवाह भी.

ज़िंदगी एक मोड़ पर आ कर रुक गई थी. दोबारा घर बसाना मुझे बचकाना खयाल लगता था. चुकी उमंगों के बीज भला किसी उठती उमंग में क्यों बोए जाएं.  अगर सामने भी चुकी उमंग ही हो, तो दो ठूंठ पास आ कर भी क्या करें. मुझे याद आता था कि एक बार पत्नी और अपनी ख़ुद की नौकरी में अलगअलग पोस्टिंग होने पर जाने के लिए अनिच्छुक पत्नी को समझाते हुए मैं ने यह वचन दे डाला था कि मैं जीवन में कभी किसी दूसरी औरत से शरीर के किसी रिश्ते के बारे में होश रहने तक सोचूंगा भी नहीं.

पत्नी का निधन इस तरह अकस्मात दिल का दौरा पड़ने से हुआ कि दोबारा कभी अपने वचन से मुक्ति की बात ही न आ सकी. उस के जाने के बाद यह वचन मेरे लिए पत्थर की लकीर बन गया. मैं तनमन से दुनियाभर की स्त्रियों से हमेशा के लिए दूर हो गया.

कुछ साल बीते, शरीर में एक अजीब सा ठहराव आ गया. एक जड़ता ने घर कर लिया. किताबों में पढ़ा कि इंसान के लिए किसी दूसरे इंसान का जिस्म केवल ज़रूरत ही नहीं, बल्कि एक औषधि है. हर बदन में एक प्यास बसती है जिस का सावन कहीं और रहता है. एकदूसरे को छूना, किसी से लिपटना जीवन की एक अनिवार्य शर्त है, मौत को पास आने से रोकने के लिए एक इम्युनिटी है. यह घर्षण एक जीव वैज्ञानिकता है. और तब, मुझे लगा कि मैं हर कहीं, हर किसी को छूने की कोशिश करता हूं.

मुझे महसूस होता कि किसी समय पति के जीवित न रहने पर किसी स्त्री को उस के साथ ही सती होने के लिए विवश करना या उस का पति के साथ ही जल मरना कैसा व क्या रहा होगा. वह पितृसत्तात्मक समाज था, इसलिए मरने की शर्त केवल स्त्री के लिए थी, पुरुष तुरंत दोबारा विवाह कर लेते थे. मैं अपने वचन के चलते इस से उबरना चाहता था.

जल्दी ही मुझे लगने लगा कि महिलाओं से दूर रहते हुए भी मुझे किसी इंसान से बात करते हुए उसे छू लेना, जरा सी पहचान पर उसे गले लगा लेना, घूमते हुए हाथ पकड़ लेना, बैठते हुए आत्मीयता से उस से सट जाना बहुत जीवनभरा है. मेरे शरीर में इस से स्पंदन आ जाता. जीने की इच्छा बलवती होती. बदन में एक लय आ जाती. अच्छी तरह रहने का मन होता. मैं न जाने क्याक्या सोचने लगा. क्या मैं किसी मंदिर में खड़ा हो कर संकेत रूप में ही पत्थर के ईश्वर को साक्षी मान कर अपना वचन तोड़ दूं? नहीं. यदि मेरी पत्नी जीवित होती तो मैं शायद ऐसा करने का साहस भी जुटा लेता पर अब उस के जाने के बाद नहीं. यह अपराध है.

मैं पुरुष शरीर का ही सान्निध्य और साहचर्य पाने में भलाभला सा महसूस करने लगा. अब मैं इस दिशा में सोचता. इस में किसी तरह की अंतरंगता मुझे भाती. लेकिन मेरे मन के स्वाभाविक तर्क़ मुझे रोकते. अपने हमउम्र लोगों का साथ मुझे खीझभरा लगता. वे हमेशा ऐसी बातें करते कि मेरी आमदनी कितनी है, मेरी जायदाद की कीमत कितनी है, मेरे पास भविष्यनिधि के स्रोत क्या हैं, मेरे मकान या ज़मीन का बाज़ार मूल्य कितना है. इन सवालों से उकता कर मैं उन से दूरी बना लेता.

मेरा ध्यान बच्चों की ओर जाता. लेकिन उन से किसी किस्म की आत्मीयता पनपने से पहले मैं सोचता कि ये इन के जिंदगी बनाने, कैरियर बनाने के दिन हैं, इन का ध्यान भविष्य बनाने पर ही रहे और यह सोचता हुआ मैं उन से पर्याप्त दूरी रखता. लेकिन जल्दी ही मैं ने देखा कि 18 से ले कर 25 साल तक की उम्र के लोगों में मेरी दिलचस्पी रहती है. यह वर्ग मुझे एक विवश, असहाय सा वर्ग नज़र आता. इस की विवशता मुझे कई कारणों से आकर्षित करती. यह उम्र ऐसी थी कि मातापिता से अपने ख़र्च के पैसे मांगना भाता नहीं और अपनी आमदनी का कोई जरिया होता नहीं. यह उम्र ऐसी थी कि किसी साथी की ज़रूरत महसूस होती थी और शादी की बात घर में इसलिए नहीं चलती थी कि अभी कोई नौकरी नहीं.

मैं शाम के समय खाना खाने के बाद सड़क पर अकेला ही टहल कर घर लौट रहा था कि गेट के पास मैं ने एक लड़के को खड़े देखा. लड़का एक पेड़ के नीचे अपनी बाइक खड़ी कर के उसी के सहारे खड़ा था. लड़के की उम्र लगभग 21-22 वर्ष रही होगी और वह बारबार घड़ी देखता, शायद किसी के इंतज़ार में था. मैं दरवाज़े से भीतर दाख़िल होने ही लगा था कि हलकी बूंदाबांदी शुरू हो गई. पेड़ के नीचे खड़े होने पर भी बारिश से पूरी सुरक्षा नहीं थी, लड़का कुछ भीगने लगा.

मैं ने इंसानियत के नाते उस से कहा, ‘भीग क्यों रहे हो, भीतर आ जाओ.’

लड़का झट से मेरे पीछेपीछे चला आया. कमरे का ताला खोल कर मैं ने भीतर की लाइट जलाई, तो लड़के ने कुछ संकोच से पूछा, ‘अकेले रहते हैं अंकल?’  ‘हां,’ कह कर मैं ने लड़के को सोफे पर बैठने का इशारा किया.

वह कुछ सहज हो कर उत्साहित हुआ, फिर बोला, ‘मैं सामने वाली बिल्डिंग में एक आंटी को डांस सिखाने आता हूं.’

‘अच्छा,’ मुझे उस की बात दिलचस्प लगी.

‘उन्होंने मुझे 7 बजे का समय दिया हुआ है, पर कभी समय पर घर नहीं आ पातीं,’ वह कुछ मायूसी से बोला.

‘क्या तुम किसी डांस स्कूल में नौकरी करते हो? मैं ने पूछा.

‘नहीं अंकल, मैं तो कालेज में पढ़ता हूं, पर जहां से मैं ने ख़ुद डांस सीखा था, उन्हीं कोच सर ने मुझे यह ट्यूशन दिलवाई है. मेरा थोड़ा ख़र्च निकल जाता है. डांस स्कूल का समय दिन का है, तब ये आंटी आ नहीं पातीं,’ वह बोला.

‘वो आंटी क्या जौब करती हैं, जो रोज़ देर से घर आती हैं? फ़िर उन्होंने तुम्हें यह समय दिया ही क्यों?’ मैं ने सहज ही कहा.

‘जौब नहीं करतीं, हाउसवाइफ हैं. देर तो उन्हें वैसे ही हो जाती है. कभी शौपिंग में, तो कभी सोशल विजिट्स में,’ लड़का बोला.

मैं ने देखा कि लड़का पर्याप्त संजीदा और शिक्षित था, स्मार्ट भी.

लड़का उस दिन तो थोड़ी देर बाद चला गया, किंतु अब वह कभीकभी मेरे पास आने लगा. जब भी वह फुरसत में होता, चला आता. एकदूसरे के बारे में काफ़ीकुछ जान लेने के बाद हमारे बीच काफ़ी बातें होतीं.

वह मुझ से कहता, ‘अंकल, पहले 15-16 साल की उम्र में लोगों की शादी हो जाती थी, और अब देखिए, 30 साल तक के लड़केलड़कियां कुंआरे घूम रहे हैं. क्या आप को नहीं लगता कि इस उम्र तक शरीर को दूसरे किसी शरीर की चाहत तो रहती ही होगी? क्या शरीर यह बात समझता है कि अभी हमारे मालिक की नौकरी नहीं लगी है तो मुझे दबसिकुड़ कर रहना है, सूखे ठूंठ की तरह.’

मैं उस की बात अच्छी तरह समझ गया क्योंकि यह वही बात थी जो मेरे मन में भी आती ही थी.

‘क्या यह हमारा अपराध है? वह कहता.

मैं उस की बात से सहमत होते हुए भी उसे समझाने लगता, ‘लेकिन शादी के विकल्प भी तो हैं?’

लड़का अब एकाएक थोड़ा खुल गया, बोला, ‘अंकल, कौन सा विकल्प ऐसा है जिसे समाज गलत या अपराध नहीं मानता, बताइए कोई एक? शरीर में मल, मूत्र, लार, कफ बनते हैं तो निकाल कर फेंकने ही पड़ते हैं.’

बात करतेकरते हम दोनों और नज़दीक आ जाते.

मैं अपने अकेलेपन से त्रस्त तो था ही, एक दिन बैठेबैठे मेरे मन में आया कि क्यों न मैं भी डांस सीख लूं? ठीक है कि अब इस उम्र में मुझे कोई कैरियर नहीं बनाना, कहीं प्रस्तुति नहीं देनी, पर अपने मन की ख़ुशी और तन की व्यस्तता का एक उपाय तो यह है ही.

दोचार दिन बीते होंगे कि लड़के को डांस का एक ट्यूशन और मिल गया. यह ट्यूशन मेरा ही था. अब वह सप्ताह में 2 दिन मुझे भी डांस सिखाने लगा. फ़िर रोज़ दरवाज़ा बंद कर के तेज़ संगीत की आवाज़ में मैं लगभग एक घंटे तक अकेले ही उस के सिखाए स्टैप्स दोहराता. एक ही कालोनी में पासपास 2 स्टूडैंट्स होने का यह लाभ उसे भी हुआ कि उस का समय अब इंतजार में खराब नहीं होता था. उस की आमदनी भी दोगनी हो गई. दोनों में से जिस के घर की लाइट्स उसे जली दिखाई देती थीं, वहां वह पहले चला जाता था. इस उम्र के मेरे जैसे नए विद्यार्थी के साथ उसे बहुत मज़ा आता. दोनों झूम कर नाचते. नाचतेनाचते दोनों इतना थक कर चूर हो जाते कि… और सारी थकान उतर जाती.

डांस के बाद थक कर हम दोनों गुरुशिष्य निढाल हो जाते और 10-15 मिनट तक दोनों एकदूसरे से लिपटे पड़े रहते.

एक दिन इसी अवस्था में पड़े हुए देख कर उस ने मेरी ओर अचरज से देखा और बोला, ‘क्या ढूंढ रहे हैं अंकल? लगता है जैसे आप का कुछ खो गया है?’ कहता हुआ वह चेहरे पर कोई रहस्यमय मुसकान ले कर उठ गया. कुछ देर में वह वापस चला गया.

कभीकभी वह कहा करता था कि डांस की क्लास खत्म होते ही हमारा गुरुचेले का रिश्ता खत्म हुआ. आप बड़े हैं, थक गए होंगे, लाइए आप के पांव दबा दूं? मैं कहता कि तुम भी तो दिनभर की मेहनत के बाद थक जाते होगे, लाओ तुम्हारी क़मर को कुछ आराम दूं.

पहले तो लड़के को इस बात पर घोर आश्चर्य हुआ था कि मैं अब इस उम्र में डांस सीखूंगा लेकिन जल्दी ही उस ने समझ लिया कि बुढ़ापे में आदमी मजबूर सा हो जाता है. उसे कोई नचाने वाला हो, तो कितना भी नाच ले.

एक दिन एक चमत्कार हुआ. मैं बैठा ही था कि दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खोला तो सामने एक महिला खड़ी थी. एकाएक मैं उसे पहचाना तो नहीं किंतु ऐसा लगा जैसे शायद ये वही हैं जो मेरे डांसटीचर से डांस सीखती हैं. मैं ने अकसर सड़क पर आतेजाते उन्हें देखा ज़रूर था.

अभिवादन के बाद मैं ने उन्हें बैठाया. वे इधरउधर देखते हुए कुछ संकोच से बोलीं, ‘अभी अभिनव का फ़ोन आया था, वही कोरियोग्राफर सर.’

‘ओह, अच्छा, मुझे पता नहीं था कि उन का नाम अभिनव है,’ मैं ने कहा.

‘जी उन्होंने कहा है कि आज उन्हें कुछ देर हो जाएगी, तो…’

‘क्या वो नहीं आएंगे?’ मुझे लगा कि महिला कुछ झिझक रही हैं.

‘नहीं, नहीं, वे देर से आएंगे पर उन्होंने कहा कि मैं तब तक कुछ ऐसे वो स्टैप्स आप को सिखा दूं जो वो मुझे सिखा चुके हैं, क्योंकि वास्तव में वो 2 लोगों के युगल डांस के स्टैप्स हैं, इसलिए अकेलेअकेले समझ में भी नहीं आते,’ उन्होंने कुछ संकोच से कहा.

यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य था. कुछ मिनट बाद मैं और वो अपरिचित महिला एक तेज़ धुन पर एकसाथ डांस कर रहे थे. मैं जल्दी ही उन के बताए स्टैप्स सीख गया था और अब हम दोनों ही सुविधाजनक ढंग से साथ में नाच रहे थे.

मुझे महिला की अगवानी की हड़बड़ी में शायद यह भी ध्यान नहीं रहा था कि मैं ने दरवाजा बंद नहीं किया है. हम नाचतेनाचते मनोयोग से घूम कर पलटे तो देखा कि अभिनव, हमारा डांस टीचर, सामने खड़ा ताली बजा रहा था.

‘वाह, वाह, ऐक्सीलैंट,’ उस ने कहा तो हम दोनों अचकचा कर रुक गए.

हम तीनों ने एकसाथ चाय पी, जिसे वो महिला ही मेरी रसोई में जा कर बना कर लाई थीं.

अभिनव ने मुझे बताया कि डांस मन की ख़ुशी का प्रदर्शन भी है, आप दोनों इतने नज़दीक रहते हुए भी एकदूसरे से मिले नहीं, जबकि दोनों को ही डांस का शौक़ है. अब से मैं आप को सिखाऊंगा अलगअलग, पर दिन में एक बार किसी भी समय आप लोग एकसाथ प्रैक्टिस किया करेंगे.

मानो, अब से हमारी ज़िंदगी ही बदल गई. अब हम समाज से शिकायतें नहीं करते थे, कि अकेले समय ही नहीं कटता. हम अब ऐसे मित्र बन गए थे कि दिन में एक बार आधे घंटे के लिए मिलते थे, पर उस आधे घंटे की प्रतीक्षा कई घंटों तक रहती. ऐसा लगता था कि तनमन में बने बांध में अब ठहरा पानी हमें तंग नहीं करता था. वह बह कर न जाने कहां ओझल हो जाता था.

मुझे बरसों पहले मुंबई के एक मुशायरे में सुनी पंक्तियां अकसर याद आ जाती थीं- ‘दूर सागर के तल में, बूंदभर प्यास छिपी है, सभी की नज़र बचा कर, वहीं जाता है पानी…’

अब कभीकभी रात को सोने से पहले मैं सोचता था कि अगर रात को सपने में मेरी पत्नी आई और उस ने यह पूछा कि आप के साथ दोपहर को कौन होता है? तो मैं उसे बता दूंगा कि उस से मेरा कोई लेनादेना नहीं है, वह तो मेरी क्लासफैलो है.  हम साथ में एक ही टीचर से पढ़ते हैं और होमवर्क में एकदूसरे की मदद करते हैं. Best Family Story in Hindi.

Family Story in Hindi: थप्पड़- मामू ने अदीबा के साथ क्या किया?

Family Story in Hindi: शाम ढलने को थी. इक्कादुक्का दुकानों में बिजली के बल्ब रोशन होने लगे थे. ऊन का आखिरी सिरा हाथ में आते ही अदीबा को धक्का सा लगा कि पता नहीं अब इस रंग की ऊन का गोला मिलेगा कि नहीं.

अदीबा ने कमरे की बत्ती जलाई और अपनी अम्मी को बता कर झटपट ऊन का गोला खरीदने निकल पड़ी.

जातेजाते अदीबा बोली, “अम्मी, ऊन खत्म हो गई है, लाने जा रही हूं, कहीं दुकान बंद न हो जाए.”

अम्मी ने कहा, “अच्छा, जा, पर जल्दी लौट आना, रात होने वाली है.”

लेकिन यह क्या. जहां सिर्फ दुकान जाने में ही आधा घंटा लगता है, वहां से ऊन खरीद कर आधा घंटा से पहले ही अदीबा वापस आ गई… यह कैसे?

मां ने बेटी के चेहरे को गौर से देखा. बेटी का चेहरा धुआंधुआं सा था और उस की सांसें तेजतेज चल रही थीं.

“क्या हुआ अदीबा, ऊन नहीं लाई?”

अदीबा ने रोते हुए अपनी अम्मी को जो आपबीती सुनाई तो अम्मी के होश उड़ गए.

अदीबा की आपबीती सुन कर अम्मी गुस्से से आगबबूला हो उठीं और उस नामुराद आदमी को तरहतरह की गालियां देने लगीं.

कुछ देर बाद जब अम्मी का गुस्सा ठंडा हुआ, तो उन्होंने कहना शुरू किया, “अब तुझे क्या बताऊं बेटी, यह मर्द जात होती ही ऐसी है. उन की नजरों में औरत का जिस्म बस मर्द की प्यास बुझाने का जरीया होता है.

“मेरे साथ भी ऐसा हो चुका है. वह भी एक दफा नहीं, बल्कि कईकई दफा,”
इतना कह कर अम्मी अपने पुराने दिनों के काले पन्ने पलटने लगीं…

अम्मी ने अदीबा को बताया, “जब मैं 5वीं जमात में थी, तब एक दिन मदरसे के मौलवी साहब ने मुझे अपने पास बुलाया और अपनी गोद में बिठा कर वे मेरे सीने पर हाथ फेरने लगे. वे अपना हाथ चलाते रहे और मुझे बहलाते रहे.

“मैं मासूम थी, इसलिए उन की इस गंदी हरकत को समझ न सकी. उन की इस गलत हरकत की वजह से मेरा सीना दर्द करने लगा था…”

हैरान अदीबा ने पूछा, “फिर क्या हुआ अम्मी?”

“उस जमाने में गलत और सही छूने का पता तो बड़े लोगों को भी ज्यादा नही था, मैं तो भला बच्ची थी. बहरहाल, छुट्टी मिलते ही मैं रोते हुए घर गई और अपनी अम्मी से सबकुछ साफसाफ बता दिया.

“फिर क्या था… अब्बू ने न सिर्फ मौलवी साहब की जबरदस्त पिटाई की, बल्कि उन्हें मदरसे से बाहर भी निकलवा दिया.

“इसी तरह एक बार, एक दिन मेरे दूर के रिश्ते के मामू अपनी 5 साल की बेटी के साथ हमारे घर मेहमान बन कर आए. वे तोहफे में ढेर सारी मिठाइयां और फल लाए थे.

“अपने रिश्ते के भाई की खातिरदारी में मेरी अम्मी ने मटन बिरयानी और चिकन कोरमा बनाया था. सब ने खुश हो कर खाया.

“अरसे बाद मिले भाईबहन अपने पुराने दिनों को याद करते रहे और मैं मामू की बेटी के साथ देर रात तक उछलकूद करती रही…”

यह बतातेबताते जब अदीबा की अम्मी सांस लेने के लिए ठहरीं, तो अदीबा ने बेसब्री से पूछा, “फिर क्या हुआ अम्मी?”

अम्मी ने कहना जारी रखा, “जैसे कि हर बच्चा आने वाले मेहमान के बच्चों के साथ सोना पसंद करता है, वैसा ही मैं ने भी किया और अपनी हमउम्र दोस्त के साथ मामू के बिस्तर पर ही सो गई.

“रात के किसी पहर में मेरी नींद तब खुली, जब मुझे एहसास हुआ कि मेरे तथाकथित मामू मेरी सलवार की डोरी खोल रहे हैं.

“मेरा हाथ फौरन सलवार की डोरी पर चला गया. डोरी खुल चुकी थी. मेरा हाथ अपने हाथ से टकराते ही तथाकथित मामू ने अपना हाथ तेजी से खींच लिया. मैं डर गई और जोरजोर से चिल्लाने लगी.

“यह चिल्लाना सुन कर मेरी अम्मी अपने कमरे से भागीभागी आईं और दरवाजा पीटने लगीं.

“तथाकथित मामू ने उठ कर दरवाजा खोला और अम्मी को देखते ही कहा, ‘अदीबा सपने में बड़बड़ा रही है…’

“अम्मी फौरन हालात की नजाकत भांप गईं और मेरा हाथ पकड़ कर अपने साथ ले चलीं. एक हाथ से सलवार पकड़े मैं थरथर कांपती उन के साथ चल पड़ी. इस बीच उन मामू की बेटी भी जाग चुकी थी और सारा तमाशा हैरत से देख रही थी.

“उस हादसे के बाद से हमेशाहमेशा के लिए उन तथाकथित मामू से हमारे परिवार का रिश्ता खत्म हो गया.”

अदीबा ने जोश में कहा, “अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ. ऐसे गंदे लोग रिश्तेदार के नाम पर बदनुमा दाग होते हैं.”

अम्मी जब यादों के झरोखों से वापस लौटीं, तो फिर कहने लगीं, “छोड़ो, अब इस किस्से को यहीं दफन करो वरना जितने मुंह उतनी बातें होंगी. लड़कियां सफेद चादर की तरह होती हैं, जिन पर दाग बहुत जल्दी लग जाते हैं, जो छुड़ाने से भी नहीं छूटते, इसलिए भूल कर भी किसी से इस बात का जिक्र मत करना.”

दरअसल, ऊन खरीदने के लिए जाते समय रास्ते में अदीबा को दूर के एक रिश्तेदार मिल गए थे. वे बातें करते हुए साथसाथ चलने लगे और चंद मिनटों में ही कुछ ज्यादा ही करीब होने की कोशिश करने लगे. अदीबा फासला बढ़ा कर चलना चाहती और वे फासला घटा कर चलना चाहते.

पहले तो वे अदीबा के साथ सलीके से बातचीत करते रहे, लेकिन जैसे ही गली में अंधेरा मिला, तो वे अपनी असलियत पर उतर आए.

उन का हाथ बारबार किसी न किसी बहाने अदीबा के सीने को छूने लगा. अदीबा उन की नीयत भांप गई, फिर बिना लिहाज के एक जोरदार थप्पड़ उन के चेहरे पर रसीद कर दिया कि वे बिलबिला उठे.

इस के बाद अदीबा ऊन का गोला खरीदने का इरादा छोड़ कर बीच रास्ते से ही घर वापस लौट आई.

बड़े मियां इस अचानक होने वाले हमले के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे. उन के कानों में अचानक सीटियां सी बजने लगीं और आंखों के सामने गोलगोल तारे नाचने लगे. उन्होंने बिना इधरउधर देखे सामने वाली पतली गली से निकलना मुनासिब समझा.

यही वजह थी कि अदीबा जब घर में दाखिल हुई, तो उस का चेहरा धुआंधुआं था और सांसें तेजतेज चल रही थीं.

बहरहाल, इस तरह मांबेटी की बातचीत में कई परतें और कई गांठें खुलती चली गईं. Family Story in Hindi.

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