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Romantic Story In Hindi : कब जाओगे प्रिय – कुछ पल अपने लिए जीती औरत की दिल छूती कहानी

Romantic Story In Hindi : अपनाबैग पैक करते हुए अजय ने कविता से बहुत ही प्यार से कहा, ‘‘उदास मत हो डार्लिंग, आज सोमवार है, शनिवार को आ ही जाऊंगा. फिर वैसे ही बच्चे तुम्हें कहां चैन लेने देते हैं. तुम्हें पता भी नहीं चलेगा कि मैं कब गया और कब आया.’’

कविता ने शांत, गंभीर आवाज में कहा, ‘‘बच्चे तो स्कूल, कोचिंग में बिजी रहते हैं… तुम्हारे बिना कहां मन लगता है.’’

‘‘सच मैं कितना खुशहाल हूं, जो मुझे तुम्हारे जैसी पत्नी मिली. कौन यकीन करेगा इस बात पर कि शादी के 20 साल बाद भी तुम मुझे इतना प्यार करती हो… आज भी मेरे टूअर पर जाने पर उदास हो जाती हो… आई लव यू,’’ कहतेकहते अजय ने कविता को गले लगा लिया और फिर बैग उठा कर दरवाजे की तरफ बढ़ गया. कविता का उदास चेहरा देख कर फिर प्यार से बोला, ‘‘डौंट बी सैड, हम फोन पर तो टच में रहते ही हैं, बाय, टेक केयर,’’ कह कर अजय चला गया.

कविता दूसरी फ्लोर पर स्थित अपने फ्लैट की बालकनी में जा कर जाते हुए अजय को देखने लगी. नीचे से अजय ने भी टैक्सी में बैठने से पहले सालों से चले आ रहे नियम का पालन करते हुए ऊपर देख कर कविता को हाथ हिलाया और फिर टैक्सी में बैठ गया.

कविता ने अंदर आ कर घड़ी देखी. सुबह के 10 बज रहे थे. वह ड्रैसिंगटेबल के शीशे में खुद को देख कर मुसकरा उठी. फिर उस ने रुचि को फोन मिलाया, ‘‘रुचि, क्या कर रही हो?’’

रुचि हंसी, ‘‘गए क्या पति?’’

‘‘हां.’’

‘‘तो क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘फटाफट अपना काम निबटा, अंजलि से भी बात करती हूं, मूवी देखने चलेंगे, फिर लंच करेंगे.’’

‘‘तेरी मेड काम कर के गई क्या?’’

‘‘हां, मैं ने उसे आज 8 बजे ही बुला लिया था.’’

‘‘वाह, क्या प्लानिंग होती है तेरी.’’

‘‘और क्या भई, करनी पड़ती है.’’

रुचि ने ठहाका लगाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आधे घंटे में मिलते हैं.’’

कविता ने बाकी सहेलियों अंजलि, नीलम और मनीषा से भी बात कर ली. इन सब की आपस में खूब जमती थी. पांचों हमउम्र थीं,

सब के बच्चे भी हमउम्र ही थे. सब के बच्चे इतने बड़े तो थे ही कि अब उन्हें हर समय मां की मौजूदगी की जरूरत नहीं थी. कविता और रुचि के पति टूअर पर जाते रहते थे. पहले तो दोनों बहुत उदास और बोर होती थीं पर अब पतियों के टूअर पर जाने का जो समय पहले इन्हें खलता था अब दोनों को उन्हीं दिनों का इंतजार रहता था.

कविता ने अपने दोनों बच्चों सौरभ और सौम्या को घर की 1-1 चाबी सुबह ही स्कूल जाते समय दे दी थी. आज का प्रोग्राम तो उस ने कल ही बना लिया था. नियत समय पर पांचों सहेलियां मिलीं. रुचि की कार से सब निकल गईं. फिर मूवी देखी. उस के बाद होटल में लंच करते हुए खूब हंसीमजाक हुआ.

मनीषा ने आहें भरते हुए कहा, ‘‘काश, अनिल की भी टूरिंग जौब होती तो सुबहशाम की पतिसेवा से कुछ फुरसत मुझे भी मिलती और मैं भी तुम दोनों की तरह मौज करती.’’

रुचि ने छेड़ा, ‘‘कर तो रही है तू मौज अब भी… अनिल औफिस में ही हैं न इस समय?’’

‘‘हां यार, पर शाम को तो आ जाएंगे न… तुम दोनों की तो पूरी शाम, रात तुम्हारी होगी न.’’

कविता ने कहा, ‘‘हां भई, यह तो है. अब तो शनिवार तक आराम ही आराम.’’

मनीषा ने चिढ़ने की ऐक्टिंग करते हुए कहा, ‘‘बस कर, हमें जलाने की जरूरत नहीं है.’’

नीलम ने भी अपने दिल की बात कही, ‘‘यहां तो बिजनैस है, न घर आने का टाइम है न जाने का, पता ही नहीं होता कब अचानक आ जाएंगे. फोन कर के बताने की आदत नहीं है. न घर की चाबी ले जाते हैं. कहते हैं, तुम तो हो ही घर पर… इतना गुस्सा आता है न कभीकभी कि क्या बताऊं.’’

रुचि ने पूछा, ‘‘तो आज कैसे निकली?’’

‘‘सासूमां को कहानी सुनाई… एक फ्रैंड हौस्पिटल में ऐडमिट है. उस के पास रहना है. हर बार झूठ बोलना पड़ता है. मेरे घर में मेरा सहेलियों के साथ मूवी देखने और लंच पर जाना किसी को हजम नहीं होगा.’’

कविता हंसी, ‘‘जी तो बस हम रहे हैं न.’’

यह सुन तीनों ने पहले तो मुंह बनाया, फिर हंस दीं. बिल हमेशा की तरह सब ने शेयर किया और फिर अपनेअपने घर चली गईं.

सौरभ और सौम्या स्कूल से आ कर कोचिंग जा चुके थे. जब आए तो पूछा, ‘‘मम्मी, कहां गई थीं?’’

‘‘बस, थोड़ा काम था घर का,’’ फिर जानबूझ कर पूछा, ‘‘आज डिनर में क्या बनाऊं?’’

बाहर के खाने के शौकीन सौरभ ने पूछा, ‘‘पापा तो शनिवार को आएंगे न?’’

‘‘हां.’’

‘‘आज पिज्जा मंगवा लें?’’ सौरभ की आंखें चमक उठीं.

सौम्या बोली, ‘‘नहीं, मुझे चाइनीज खाना है.’’

कविता ने गंभीर होने की ऐक्टिंग की, ‘‘नहीं बेटा, बाहर का खाना बारबार और्डर करना अच्छी आदत नहीं है.’’

‘‘मम्मी प्लीज… मम्मी प्लीज,’’ दोनों बच्चे कहने लगे, ‘‘पापा को घर का ही खाना पसंद है. आप हमेशा घर पर ही तो बनाती हैं… आज तो कुछ चेंज होने दो.’’

कविता ने बच्चों पर एहसान जताते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आज मंगवा लो पर रोजरोज जिद मत करना.’’

सौम्या बोली, ‘‘हां मम्मी, बस आज और कल, आज इस की पसंद से, कल मेरी पसंद से.’’

‘‘ठीक है, दे दो और्डर,’’ दोनों बच्चे चहकते हुए और्डर देने उठ गए.

कविता मन ही मन हंस रही थी कि उस का कौन सा मूड था खाना बनाने का, अजय को घर का ही खाना पसंद है, बच्चे कई बार कहते हैं पापा का तो टूअर पर चेंज हो जाता है, हमारा क्या… वह खुद बोर हो जाती है रोज खाना बनाबना कर. आज बच्चे अपनी पसंद का खा लेंगे. उस ने हैवी लंच किया था. वह कुछ हलका ही खाएगी. फिर वह सैर पर चली गई. सोचती रही अजय टूअर पर जाते हैं तो सैर काफी समय तक हो जाती है नहीं तो बहुत मुश्किल से 15 मिनट सैर कर के भागती हूं. अजय के औफिस से आने तक काफी काम निबटा कर रखना पड़ता है.

शाम की सैर से संतुष्ट हो कर सहेलियों से गप्पें मार कर कविता आराम से लौटी. बच्चों का पिज्जा आ चुका था. उस ने कहा, ‘‘तुम लोग खाओ, मैं आज कौफी और सैंडविच लूंगी.’’

बच्चे पिज्जा का आनंद उठाने लगे. अजय से फोन पर बीचबीच में बातचीत होती रही थी. बच्चों के साथ कुछ समय बिता कर वह घर के काम निबटाने लगी. बच्चे पढ़ने बैठ गए. काम निबटा कर उस ने कपड़े बदले, गाउन पहना, अपने लिए कौफी और सैंडविच बनाए और बैडरूम में आ गई.

अजय टूअर पर जाते हैं तो कविता को लगता है उसे कोई काम नहीं है. जो मन हो बनाओ, खाओ, न घर की देखरेख, न आज क्या स्पैशल बना है जैसा रोज का सवाल. गजब की आजादी, अंधेरा कमरा, हाथ में कौफी का मग और जगजीतचित्रा की मखमली आवाज के जादू से गूंजता बैडरूम.

अजय को साफसुथरा, चमकता घर पसंद है. उन की नजरों में घर को साफसुथरा देख कर अपने लिए प्रशंसा देखने की चाह में ही वह दिनरात कमरतोड़ मेहनत करती रहती है. कभीकभी मन खिन्न भी हो जाता है कि बस यही है क्या जीवन?

ऐसा नहीं है कि अजय से उसे कम प्यार है या वह अजय को याद नहीं करती, वह अजय को बहुत प्यार करती है. यह तो वह दिनरात घर के कामों में पिसते हुए अपने लिए कुछ पल निकाल लेती है, तो अपनी दोस्तों के साथ मस्ती भरा, चिंता से दूर, खिलखिलाहटों से भरा यह समय जीवनदायिनी दवा से कम नहीं लगता उसे.

अजय के वापस आने पर तनमन से और ज्यादा उस के करीब महसूस करती है वह खुद को. उस ने बहुत सोचसमझ कर खुद को रिलैक्स करने की आदत डाली है. ये पल उसे अपनी कर्मस्थली में लौट कर फिर घरगृहस्थी में जुटने के लिए शक्ति देते हैं. अजय महीने में 7-8 दिन टूअर पर रहते हैं. कई बार जब टूअर रद्द हो जाता है तो ये कुछ पल सिर्फ अपने लिए जीने का मौका ढूंढ़ते हुए उस का दिमाग जब पूछता है, कब जाओगे प्रिय, तो उस का दिल इस शरारत भरे सवाल पर खुद ही मुसकरा उठता है. Romantic Story In Hindi 

Family Story In Hindi : अपने पराए… पराए अपने…

Family Story In Hindi : पार्किंग में कार खड़ी कर के मैं दफ्तर की ओर बढ़ ही रहा था कि इतने में तेजी से चलते हुए वह आई और ‘भाई साहब’ कहते हुए मेरा रास्ता रोक कर खड़ी हो गई. उस की गोद में दोढ़ाई साल की एक बच्ची भी थी. एक पल को तो मैं सकपका गया कि कौन है यह? यहां तो दूरदराज के रिश्ते की भी मेरी कोई बहन नहीं रहती. मैं अपने दिमाग पर जोर डालने लगा.

मुझे उलझन में देख कर वह बोली, ‘‘क्या आप मुझे पहचान नहीं पा रहे हैं? मैं लाजवंती हूं. आप की बहन लाजो. मैं तो आप को देखते ही पहचान गई थी.’’ मैं ने खुशी के मारे उस औरत की पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘‘अरी, तू है चुड़ैल.’’

मैं बचपन में उसे लाड़ से इसी नाम से पुकारता था. सो बोला, ‘‘भला पहचानूंगा कैसे? कहां तू बित्ती भर की थी, फ्रौक पहनती थी और अब तो तू एक बेटी की मां बन गई है.’’

मेरी बातों से उस की आंखें भर आईं. मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही थी, इस के बावजूद मैं ने उसे घर ले चलना ही ठीक समझा. वह कार में मेरी साथ वाली सीट पर आ बैठी. रास्ते में मैं ने गौर किया कि वह साधारण थी. सूती साड़ी पहने हुए थी. मामूली से गहने भी उस के शरीर पर नहीं थे. सैंडल भी कई जगह से मरम्मत किए हुए थे.

बातचीत का सिलसिला जारी रखने के लिए मैं सब का हालचाल पूछता रहा, मगर उस के पति और ससुराल के बारे में कुछ न पूछ सका. लाजवंती को मैं बचपन से जानता था. वह मेरे पिताजी के एक खास दोस्त की सब से छोटी बेटी थी. दोनों परिवारों में बहुत मेलजोल था.

हम सब भाईबहन उस के पिताजी को चाचाजी कहते थे और वे सब मेरे पिताजी को ताऊजी. अम्मां व चाची में खूब बनती थी. दोनों घरों के मर्द जब दफ्तर चले जाते तब अम्मां व चाची अपनी सिलाईबुनाई ले कर बैठ जातीं और घंटों बतियाती रहतीं.

हम बच्चों के लिए कोई बंधन नहीं था. हम सब बेरोकटोक एकदूसरे के घरों में धमाचौकड़ी मचाते हुए खोतेपीते रहते. पिताजी ने हाई ब्लडप्रैशर की वजह से मांस खाना व शराब पीना बिलकुल छोड़ दिया था. वैसे भी वे इन चीजों के ज्यादा शौकीन नहीं थे, लेकिन चाचाजी खानेपीने के बेहद शौकीन थे.

अकसर उन की फरमाइश पर हमारे यहां दावत हुआ करती. इस पर अम्मां कभीकभी पिताजी पर झल्ला भी जाती थीं कि जब खुद नहीं खाते तो दूसरों के लिए क्यों इतना झंझट कराते हो. तब पिताजी उन्हें समझा देते, ‘क्या करें बेचारे पंडित हैं न. अपने घर में तो दाल गलती नहीं, हमारे यहां ही खा लेते हैं. तुम्हें भी तो वे अपनी सगी भाभी की तरह ही मानते हैं.’

मेरे पिताजी ऐक्साइज इंस्पैक्टर थे और चाचाजी ऐजूकेशन इंस्पैक्टर. चाचाजी मजाक में पिताजी से कहते, ‘यार, कैसे कायस्थ हो तुम… अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो पानी की जगह शराब ही पीता.’ तब पिताजी हंसते हुए जवाब देते, ‘लेकिन गंजे को खुदा नाखून देता ही कहां है…’

इसी तरह दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे कि अचानक न जाने क्या हुआ कि चाचाजी नौकरी से सस्पैंड हो गए. कई महीनों तक जांच होती रही. उन पर बेईमानी करने का आरोप लगा था. एक दिन वे बरखास्त कर दिए गए. बेचारी चाची पर तो जैसे मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा. 2 बड़ी लड़कियों की तो शादी हो चुकी थी, पर 3 बच्चे अभी भी छोटे थे. सुरेंद्र 8वीं, वीरेंद्र 5वीं व लाजो चौथी जमात में पढ़ रही थी.

चाचाजी ने जोकुछ कमाया था, वह जी खोल कर मौजमस्ती में खर्च कर दिया था. आड़े समय के लिए चाचाजी ने कुछ भी नहीं जोड़ा था. चाचाजी को बहुत मुश्किल से नगरनिगम में एक छोटी सी नौकरी मिली. जैसेतैसे पेट भरने का जुगाड़ तो हुआ, लेकिन दिन मुश्किल से बीत रहे थे. वे लोग बढि़या क्वार्टर के बजाय अब छोटे से किराए के मकान में रहने लगे. चाची को चौकाबरतन से ले कर घर का सारा काम करना पड़ता था.

लाड़प्यार में पले हुए बच्चे अब जराजरा सी चीजों के लिए तरसते थे. दोस्ती के नाते पिताजी उस परिवार की ज्यादा से ज्यादा माली मदद करते रहते थे.

समय बीतता गया. चाचाजी के दोनों लड़के पढ़ने में तेज थे. बड़े लड़के को बीए करने के बाद बैंक में नौकरी मिल गई और छोटे बेटे का मैडिकल कालेज में दाखिला हो गया. मगर लाजो का मन पढ़ाई में नहीं लगा. वह अकसर बीमार रहती थी. वह बेहद चिड़चिड़ी और जिद्दी भी हो गई थी और मुश्किल से 8वीं जमात ही पास कर पाई.

फिर पिताजी का तबादला बिलासपुर हो गया. मैं भी फोरैस्ट अफसर की ट्रेनिंग के लिए देहरादून चला गया. कुछ अरसे के लिए हमारा उन से संपर्क टूट सा गया. फिर न पिताजी रहे और न चाचाजी. हम लोग अपनीअपनी दुनिया में मशगूल हो गए. कई सालों के बाद ही इंदौर वापस आना हुआ था.

शाम को जब मैं दफ्तर से घर पहुंचा तो देखा कि लाजो सब से घुलमिल चुकी थी. मेरे दोनों बच्चे ‘बूआबूआ’ कह कर उसे घेरे बैठे थे और उस की बेटी को गोद में लेने के लिए उन में होड़ मची थी. मेरी एकलौती बहन 2 साल पहले एक हादसे में मर गई थी, इसलिए मेरी बीवी उमा भी ननद पा कर खुश हुई.

खाना खाने के बाद हम लोग उसे छोड़ने गए. नंदानगर में एक चालनुमा मकान के आगे उस ने कार रुकवाई. मैं ने चाचीजी के पैर छुए, पर वे मुझे पहचान न पाईं. तब लाजो ने मुझे ढूंढ़ निकालने की कहानी बड़े जोश से सुनाई. चाचीजी मुझे छाती से लगा कर खुश हो गईं और रुंधे गले से बोलीं, ‘‘अच्छा हुआ बेटा, जो तुम मिल गए. मुझे तो रातदिन लाजो की फिक्र खाए जाती है. दामाद नालायक निकला वरना इस की यह हालत क्यों होती.

‘‘भूखों मरने से ले कर गालीगलौज, मारपीट सभी कुछ जब तक सहन करते बना, यह वहीं रही. फिर यहां चली आई. दोनों भाइयों को तो यह फूटी आंख नहीं सुहाती. अब मैं करूं तो क्या करूं? जवान लड़की को बेसहारा छोड़ते भी तो नहीं बनता. ‘‘बेटा, इसे कहीं नौकरी पर लगवा दो तो मुझे चैन मिले.’’

सुरेंद्र भी इसी शहर में रहता था. अब वह बैंक मैनेजर था. एक दिन मैं उस के घर गया. उस ने मेरी बहुत खातिरदारी की, लेकिन वह लाजो की मदद के नाम पर टस से मस नहीं हुआ. लाजवंती का जिक्र आते ही वह बोला, ‘‘उस का नाम मत लीजिए भाई साहब. वह बहुत तेज जबान की है. वह अपने पति को छोड़ आई है.

‘‘हम ने तो सबकुछ देख कर ही उस की शादी की थी. उस में ससुराल वालों के साथ निभाने का ढंग नहीं है. माना कि दामाद को शराब पीने की लत है, पर घर में और लोग भी तो हैं. उन के सहारे भी तो रह सकती थी वह… घर छोड़ने की क्या जरूरत थी?’’ सुरेंद्र की बातें सुन कर मैं अपना सा मुंह ले कर लौट आया.

मैं बड़ी मुश्किल से लाजो को एक गांव में ग्रामसेविका की नौकरी दिला सका था. चाचीजी कुछ दिन उस के पास रह कर वापस आ गईं और अपने बेटों के साथ रहने लगीं.

मेरा जगहजगह तबादला होता रहा और तकरीबन 15 साल बाद ही अपने शहर वापस आना हुआ. एक दिन रास्ते में लाजो के छोटे भाई वीरेंद्र ने मुझे पहचान लिया. वह जोर दे कर मुझे अपने घर ले गया. उस ने शहर में क्लिनिक खोल लिया था और उस की प्रैक्टिस भी अच्छी चल रही थी.

लाजो का जिक्र आने पर उस ने बताया कि उस की तो काफी पहले मौत हो गई. यह सुनते ही मुझे धक्का लगा. उस का बचपन और पिछली घटनाएं मेरे दिमाग में घूमने लगीं. लेकिन एक बात बड़ी अजीब लग रही थी कि मौत की खबर सुनाते हुए वीरेंद्र के चेहरे पर गम का कहीं कोई निशान नहीं था. मैं चाचीजी से मिलने के लिए बेताब हो उठा. वे एक कमरे में मैलेकुचैले बिस्तर पर पड़ी हुई थीं. अब वे बहुत कमजोर हो गई थीं और मुश्किल से ही उठ पाती थीं. आंखों की रोशनी भी तकरीबन खत्म हो चुकी थी.

मैं ने अपना नाम बताया तभी वे पहचान सकीं. मैं लाजो की मौत पर दुख जाहिर करने के लिए कुछ बोलने ही वाला था कि उन्होंने हाथ पकड़ कर मुझे अपने नजदीक बैठा लिया. वे मेरे कान में मुंह लगा कर धीरे से बोलीं, ‘‘लाजो मरी नहीं है बेटा. वह तो इसी शहर में है. ये लोग उस के मरने की झूठी खबर फैला रहे हैं. तुम ने जिस गांव में उस की नौकरी लगवा दी थी, वहीं एक ठाकुर साहब भी रहते थे. उन की बीवी 2 छोटेछोटे बच्चे छोड़ कर मर गई. गांव वालों ने लाजो की शादी उन से करा दी.

‘‘लाजो के अब 2 बेटे भी हैं. वैसे, अब वह बहुत सुखी है, लेकिन एक बार उसे अपनी आंखों से देख लेती तो चैन से मरती. ‘‘एक दिन लाजो आई थी तो वीरेंद्र की बीवी ने उसे घर में घुसने तक नहीं दिया. वह दरवाजे पर खड़ी रोती रही. जातेजाते वीरेंद्र से बोली थी कि भैया, मुझे अम्मां से तो मिल लेने दो. लेकिन ये लोग बिलकुल नहीं माने.’’

लाजो की यादों में डूब कर चाचीजी की आंखों से आंसू बहने लगे थे. वे रोतेरोते आगे बोलीं, ‘‘बताओ बेटा, उस ने क्या गलत किया? उसे भी तो कोई सहारा चाहिए था. सगे भाई हो कर इन दोनों ने उस की कोई मदद नहीं की बल्कि दरदर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया. तुम्हीं ने उस की नौकरी लगवाई थी…’’

तभी मैं ने महसूस किया कि सब की नजरें हम पर लगी हुई हैं. मैं उस जगह से फौरन हट जाना चाहता था, जहां अपने भी परायों से बदतर हो गए थे. मैं ने मन ही मन तय कर लिया था कि लाजो को ढूंढ़ निकालना है और उसे एक भाई जरूर देना है. Family Story In Hindi 

Instagram Reels : रील्स बनती रोड़ा, हिला रहीं यूथ का फोकस

Instagram Reels : इंस्टाग्राम और टिकटौक की छोटीछोटी रील्स मनोरंजन तो तुरंत प्रदान करती हैं लेकिन इन का अधिक कंज्यूम किया जाना यूथ की सोचनेसमझने व उन की निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर कर रहा है.

दुनिया डिजिटल क्रांति के दौर से गुजर रही है. इंटरनैट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का यूज चरम पर है. युवाओं ने मोबाइल और इंटरनैट को अपना सबकुछ मान लिया है. समस्या सबकुछ मान लेने की नहीं बल्कि सहीगलत में फर्क न ढूंढ पाने की है. जैसे, एक चर्चित सोशल मीडिया फौर्मेट है ‘रील्स’ जो छोटीछोटी वीडियो क्लिप होती हैं, कोई 15 सैकंड की तो कोई 60 सैकंड से ले कर 2 मिनट तक की; इंस्टाग्राम, टिक टौक, फेसबुक, स्नैपचैट जैसे प्लेटफौर्म्स पर ये वीडियो युवाओं के बीच इतने भीतर तक घुसे हुए हैं कि प्रतिदिन करोड़ों घंटे इन्हीं पर खर्च हो रहे हैं.

बेशक, रील्स का कंटैंट एंटरटेनिंग होता है, जो तुरंत मजा देता है लेकिन इस के बढ़ते कंज्यूम से यूथ के मैंटल हैल्थ, कंसेनट्रेशन और लर्निंग प्रोसैस पर गंभीर संदेह उठ खड़ा हुआ है. सोशल मीडिया विशेषज्ञों, न्यूरोसाइंटिस्टों और मनोवैज्ञानिकों द्वारा रील्स से यूथ पर पड़ने वाले असर पर अध्ययन किए गए हैं खासकर रील्स से पड़ने वाले कंसेनट्रेशन पावर पर.

कंसेनट्रेशन का मतलब मैंटल रिसोर्स को किसी एक्टिविटी या चीज पर केंद्रित करना, जबकि गैरजरूरी या चीजों को नजरअंदाज करना. इंगलैंड के मनोवैज्ञानिक जेम्स मार्टिन डमविल के अनुसार, कंसेनट्रेशन को ‘फोकल पौइंट औफ कांशियसनैस’ बताया गया है. जबकि रोज के अनुसार, यह किसी वस्तु या विचार को स्पष्टता और निरंतरता के साथ समझने की क्षमता है. आज के समय में डिजिटल मीडिया की हर किसी के जीवन में घुसपैठ के चलते हरेक के लिए कंसेनट्रेशन बनाए रखना एक चुनौती बन गया है.

कंसेनट्रेशन कम होने का मतलब है जरूरी कामों में डैडिकेशन, स्ट्रौंग मैमोरी व लर्निंग कल्चर का कमजोर पड़ना. जब पढ़ने वाला युवा अपनी पढ़ाई या किसी भी काम में असफल होते हैं, तो अकसर इस का कारण न्यूरोसाइंटिफिक रूप से कंसेनट्रेशन का कमजोर पड़ना होता है. और इसी कंसेनट्रेशन को कमजोर आज के समय में ये रील्स कर रही हैं जो न तो कैरियर के डिसीजन लेने दे रही हैं न फैमिली के डिसीजन.

रील्स बन रही वजह

आज के समय में रील्स पौपुलर हैं क्योंकि इन का कंटैंट छोटा और तेज होता है जो देखते समय रिलीफ देता है. इस के अलावा हर मिनट कुछ नया मिल रहा होता है जो नया एक्सपीरियंस और डोपामाइन रिलीज़ करता है. यहां तक कि इस में एल्गोरिदम काम करता है जो पर्सन टू पर्सन उन के इंट्रैस्ट के अनुसार कंटैंट देता है.

ब्रेन में डोपामाइन नामक न्यूरोट्रांसमीटर जिम्मेदार होता है आनंद व पुरस्कार अनुभव के लिए. शौर्ट वीडियो देखने पर डोपामाइन रिलीज होता है, जिस से ब्रेन को हैप्पी फील होता है जो असल जीवन संबंधी एक्सपीरियंस को सैकंडरी बना देता है. प्रतिदिन घंटेदोघंटे के लिए लंबे समय तक वीडियो देखना डोपामाइन रिसैप्टर्स को रीऔर्गनाइज्ड करता है, जिस से ‘डिजिटल हैबिट’ बन जाती है.

इस से होता यह है कि अगर कुछ पलों के लिए मोबाइल हाथ में न हो या आसपास न हो या इंटरनैट काम करना बंद कर दे तो तनाव, चिंता और बेचैनी होने लगती है. कुछ छूट जाने की बेचैनी तो अवसाद जैसी स्थिति तक पैदा कर देती है.

अनेक अध्ययन बताते हैं कि ज्यादा स्क्रीन टाइम, ख़ासकर इंस्टाग्राम, टिकटौक रील्स देखने, से पढ़ाई पर खराब असर पड़ता है. 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि जिन छात्रों का वीडियो देखने का समय 3 घंटे से अधिक था, उन की परीक्षा के परिणामों में 25-35 फीसदी की गिरावट देखी गई.

इस के अलावा, अवसाद और चिंता के मामले में वृद्धि हुई है. बच्चे और युवा सोशल कौन्टैक्ट से दूर हो रहे हैं, परिवार व फ्रैंड सर्कल से अलगाव महसूस कर रहे हैं. क्लास में कंसेनट्रेशन रखने में मुश्किल, बारबार दिमाग भटकना आम है. जैसे, राहुल एक इंजीनियरिंग छात्र था जिस ने अपनी एग्जाम की तैयारी के दौरान महसूस किया कि उस की पढ़ाई के बीच बारबार मोबाइल और वीडियो के कारण ध्यान टूट जाता है. एग्जाम से पहले वह पढ़ाई के बदलते मूड के कारण तनाव में आ गया. वह बारबार उन नोटिफिकेशन से भटकता था जो नए रील्स के बारे में आते थे. उस परिस्थिति में उस का रिजल्ट कमजोर हुआ.

ऐसे ही स्वाति के साथ हुआ, वह कालेज की छात्रा थी जो पढ़ाई के दौरान सोशल मीडिया का ज्यादा यूज करती थी. वह कहती है कि पढ़ने के दौरान मन शांत नहीं रहता था और छोटीछोटी बातों पर ध्यान भटक जाता था. कैंपस प्रोजैक्ट्स के बीच में वह बारबार मोबाइल औन कर वीडियो देखने लगती थी. धीरेधीरे उस की याददाश्त कमजोर होने लगी और मुश्किल सब्जैक्ट्स समझने में दिक्कत आने लगी, साथ ही, पढ़ाई में रुचि कम हो गई.

मनोवैज्ञानिक दबाव

मनोज को चिंता रहती थी कि कहीं सोशल मीडिया पर नया ट्रैंड न छूट जाए. उसे ‘फियर औफ मिसिंग आउट’ के कारण मानसिक दबाव महसूस होने लगा. वह जितना समय सोशल मीडिया पर बिताता था, वह अपने दोस्तों और परिवार के साथ बिताने से ज्यादा था. औनलाइन एक्टिविटी में डूबा रहने से मनोज की सोशल प्रेजैंस कम हो गई, जिस से वह अकेला महसूस करने लगा.

2024-2025 के बीच हुए शोधों और रिपोर्टों के अनुसार:

– युवाओं के अधिकतर हिस्से का प्रतिदिन औसत मोबाइल उपयोग 3.5 घंटे या इस से अधिक है. (मोबाइल इकोसिस्टम रिपोर्ट 2020).

– रोज 3 घंटे से अधिक वीडियो देखने वाले युवाओं में कंसेनट्रेशन की टाइमिंग में 30-40 फीसदी गिरावट देखी गई (हलिली 2024).

– लगातार वीडियो की लत से याददाश्त और लर्निंग कैपेसिटी अफ़ेक्ट होती है, खासकर युवाओं में जो डैवलपिंग स्टेज में होते हैं. (जुआन 2023).

ब्रेन और न्यूरोसाइंस के नजरिए से

ब्रेन में डोपामाइन नामक रसायन आनंद का सैंसर है, जो वीडियो देखने के दौरान ज्यादा बनता और घटता रहता है. इस में विजुअल्स होते हैं जो इमोशन उत्तेजित करते हैं. लेकिन ये वीडियो लंबे समय में ब्रेन की क्षमता को कम कर देते हैं. विशेष रूप से प्रीफ्रंटल कौर्टेक्स, जो डिसीजन मेकिंग और इमोशनल रेगुलेशन का काम करता है, लंबे समय तक इंटरनैट डाटा के चलते सिकुड़ जाता है.

अधिकांश युवाओं के न्यूरौन नैटवर्क्स में जुड़ाव की कमजोरी सामने आई है जो कंसेनट्रेशन और लंबे समय तक सोचने के लिए जरूरी होते हैं.

सोशल एंड लर्निंग इंपैक्ट

यूथ में सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने के कारण शिक्षा का प्रदर्शन गिर रहा है. अध्ययन बताते हैं कि अधिकतम सोशल मीडिया उपयोग करने वाले स्टूडैंट जहां टैस्ट में कमजोर होते हैं वहीं उन की सीखनेसमझने की शक्ति पर भी औनलाइन कंटैंट प्रभाव डालता है.

देश के विभिन्न हिस्सों से शिक्षकों ने भी यह स्वीकार किया है कि हाल के वर्षों में स्टूडैंट्स का ध्यान निरंतर कम हो रहा है. उन का मन छोटी सी रिसर्च या वीडियो को जल्दीजल्दी देखने की आदत में फंसा हुआ है. इस वजह से वे डीप रिसर्च नहीं कर पाते. साथ ही, वे मैंटल प्रैशर, चिंता, डिप्रैशन का शिकार रहते हैं. स्टूडैंट्स अकसर अकेला महसूस करते हैं क्योंकि उन का ध्यान खुद के आसपास के लोगों के बजाय औनलाइन स्क्रीन की ओर रहता है.

19 साल की रीमा शुरुआत में औनलाइन कंटैंट को कंट्रोल में रख कर पढ़ाई करती थी मगर जब इंस्टाग्राम रील्स में उस की दिलचस्पी बढ़ी तो धीरेधीरे रील्स बनाने से ले कर रील्स देखने तक वह हर दिन साढ़े तीन घंटे इसी में लगी रहती. वह कहती है, “शाम को जब मैं पढ़ रही होती हूं तब मन करता है कि एकदो वीडियो और देख लूं. एकदो वीडियो इतनी छोटी होती हैं कि उंगलियां स्क्रीन से हट ही नहीं पातीं. नन करते हुए भी दोढाई घंटे कब ख़त्म हो जाते हैं, पता नहीं चलता. कभीकभी पूरा दिन ही निकल जाता है. और फिर पढ़ाई करने में देर हो जाती है.” इस से उस की ग्रेड्स लगातार प्रभावित होती गईं.

अमित, जो एक तेजतर्रार स्टूडैंट था, रील्स वीडियो के प्रति जरूरत से ज्यादा तवज्जुह देने के चलते अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाया. उस ने बताया कि बारबार वीडियो की नई सामग्री उस के ब्रेन को इतना बिजी कर देती कि मुश्किल एग्जाम्स के लिए अध्ययन करने का मन न होता. सामाजिक दबाव व तुलना की समस्या भी बढ़ गई. वह कहता है, “मुझे लगता है कि मैं चूक रहा हूं क्योंकि लोग नए ट्रैंड के पीछे हैं और मैं नहीं.”

रील्स और अन्य शौर्टफौर्म वीडियो एंटरटेनमैंट के नए और एडवांस मीडियम हैं जो यूथ को बांधने में सफल हैं. अब तो एआई के जबरदस्त तरह से रील्स की दुनिया में घुसने से यह और ज्यादा ब्रेन रौट का कारण बन गई है. रील्स इतनी एडवांस और एंगेजिंग होने लगी हैं कि इस से पीछा छुड़ाना आसान नहीं. वर्चुअल दुनिया पूरी तरह से लोगों को निगल रही है जो युवाओं के लिए गंभीर समस्या बनती जा रही है.

इसे भी पढ़ें 

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सोल्यूशन एंड ट्रिक्स

स्क्रीन टाइम कंट्रोल: परिवार और स्कूल को युवाओं के लिए स्क्रीन टाइम के नियम तय करने चाहिए. विशेषज्ञों के अनुसार, रील्स देखने की स्वस्थ सीमा 2-3 घंटे प्रतिदिन होनी चाहिए.

डिजिटल लिटरेसी की शिक्षा: युवाओं, पेरैंट्स और शिक्षकों के बीच डिजिटल मीडिया के प्रभावों की जानकारी बढ़ानी होगी. उन्हें समझनी होगी कि कैसे बैलेंस यूज संभव है.

बुक्स व पत्रिकाओं से जोड़ना: इस के लिए परिवार को आगे बढ़ कर काम करने की जरूरत है. बच्चा छोटा है तो उसे कौमिक बुक जो इन्फौर्मेशन से भरी हो थमाइए, जैसे चम्पक, लिटिल चैंप्स. बच्चा थोड़ा बड़ा है तो बुक्स या सोशल मोरल कंपिटीटिव पत्रिकाओं को थमाइए जिस से वह साहित्य से ले कर हर तरह का ज्ञान हासिलकर सके. इस के लिए सब से बढ़िया है कि उन के रूम में स्टडी कौर्नर जरूर बनाएं जहां बुक्स रखी हों.

कंसेनट्रेशन और माइंडफुलनैस ट्रेनिंग: फिजिकल एक्टिविटी पर ध्यान दें.

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Social Media : पानी के बुलबुले जैसी होती है – सोशल मीडिया पोस्ट की जिंदगी

Social Media : सोशल मीडिया मौजूदा दौर का नुक्कड़ भी है और कौफी हाउस भी है जहां आम से ले कर खास लोग तक अपनी बात कहते हैं लेकिन कुछ लोग भड़ास निकालते हैं जो अकसर तर्क और तथ्यहीन होती हैं. लिहाजा कोई इस प्लेटफौर्म को गंभीरता से नहीं लेता. इस की हैसियत टाइमपास मूंगफली सरीखी होती जा रही है जो मोदीजी की मां की गाली दिए जाने पर भी देखी गई.

जीवन चार दिनों का मेला है की जगह अब कहना यह चाहिए कि सोशल मीडिया पोस्टों की जिंदगी चार दिन की होती है. एक मरती है तो दूसरी आ धमकती है लेकिन मोक्ष किसी को नहीं मिलता. वे आत्मा की तरह भटकती रहती हैं. बिलकुल इस भ्रम की तरह कि यही शाश्वत है बाकी सब पोस्टें नश्वर थीं. मोदी की मां को गाली वाले एपिसोड का भी उम्मीद के मुताबिक यही हश्र हुआ. मां की गाली बातबात पर दी जाती है इसलिए अघोषित रूप से इसे राष्ट्रीय गाली का दर्जा मिला हुआ है. इस मेले झमेले में लोग यही सोचते रह गए कि क्या वाकई में राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी की मां को गाली देने जैसा छिछोरा और घटिया काम कर सकते हैं.

पक्के से पक्के भक्त ने भी दिमाग से इसे सच नहीं माना क्योंकि इस पर तो कौपी राइट वे खुद के ही मानते हैं. किसी और को यह हक नहीं कि वह औरतों को यों बेइज्जत करे. उन की दिल की शंका को दूर किया उन दिमाग वालों ने जिन की तादाद 5 फीसदी के लगभग है. ये लोग एआई का इस्तेमाल करते हैं. ये वो लोग हैं जो न मोदी का भरोसा करते और न ही राहुल का करते. ये ग्रोक, चेट जीपीटी और मेटा वगैरह को ही अपना ब्रह्मा, विष्णु और महेश मानते हैं यही उन की गीता कुरान और बाइबिल हैं. जब इन से उन्होंने इस गाली कांड का सच जानना चाहा तो जबाब कुछ यूं मोबाइल स्क्रीन पर नजर आया –

27 अगस्त – वोटर अधिकार यात्रा के दौरान कांग्रेस के स्वागत मंच से एक शख्स ने पीएम मोदी और उन की दिवंगत मां के बारे में अपमानजनक शब्द बोले. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव उस वक्त मंच पर नहीं थे. पर घटना का वीडियो वायरल हुआ.

29 – 30 अगस्त – पुलिस ने आरोपी मोहम्मद रिजवी उर्फ राजा ( कुछ रिपोर्टों में रफीक ) को दरभंगा से गिरफ्तार किया गया.

2 सितम्बर – पीएम मोदी ने पहली बार प्रतिक्रिया दी. कहा, “मेरी मां का अपमान देश की हर मां बहन बेटी का अपमान.”

2 सितम्बर रात – पटना की एक अदालत में राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, मुकेश सहनी और मो. रिजवी के खिलाफ मानहानि का परिवाद दायर.

3 सितम्बर को सुनवाई सूचीबद्ध हुई.

4 सितम्बर गुरुवार सुबह एनडीए ने बिहार बंद का आव्हान किया. आवश्यक सेवाएं / रेलवे को छूट.

गालीकांड यहीं खत्म सा हो गया. लेकिन भक्त सोशल मीडिया पर अपना धर्म निभाते गांधी परिवार और कांग्रेस को गालियां बकते रहे जो 11 सालों में उन्हें हनुमान चालीसा की तरह कंठस्थ हो गई हैं. करोड़ कोशिशों के बाद भी वे इसे कट्टप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा और रसोड़े में कौन था जैसा वजन नहीं दिला पाए.

हाल तो यह है कि वे नींद में भी गांधी नेहरु खानदान को गाली दे सकते हैं. लेकिन उन्होंने या किसी ने भी यह नहीं सोचा ( कभी औफलाइन हों और कुछ पढ़ेलिखें तो सोच भी पाएं ) कि आखिर गाली मां, बहन या बेटी की ही क्यों बकी जाती है पत्नी की क्यों नहीं.

विषय गंभीर है. इस पर शोध होना चाहिए कि लोग दूसरे की मां, बहन या बेटी से तो शाब्दिक संबंध स्थापित कर लेते हैं लेकिन पत्नी को क्यों छोड़ देते हैं. जबकि सनातन संस्कृति में पत्नी को छोड़ देना बड़ा पुण्य पुनीत कार्य माना गया है. खुद मोदीजी इस का सब से बड़ा उपलब्ध उदाहरण हैं. इस तरफ न राहुल का ध्यान गया न किसी और का.

जब यह उबाऊ सा रहस्य उद्घाटित हो गया कि गाली राहुल ने नहीं दी तो भक्तों को तसल्ली हुई कि राहुल ने उन की संस्कृति और धर्म से कोई छेड़छाड़ नहीं की है. अब लोग क्या खा कर इसे देश भर की महिलाओं को अपमान मान लेते. लिहाजा वे इस मुद्दे से छुटकारा पाने के जतन सोचने लगे. कानूनन भी इस में कोई खास दम नहीं था क्योंकि गाली मां की हो या कोई और को बकने या देने की आईपीसी की धाराओं 294, 504 और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों पर बैठे नेताओं को गाली देने पर 505 और 153 ( ए ) लगती है. जिन में 3 महीने तक की सजा और मामूली ही जुर्माने की सजा का प्रावधान है.

इस दौरान गंगाजी का अरबों गैलन पानी बह गया और बिहार बंद फुस्स हो कर रह गया. न्यूज चैनल्स के एंकरों ने असफल कोशिश की कि यही चुनावी मुद्दा बन जाए तो रोजरोज की कसरत कवायद से मुक्ति मिले. इस बाबत उन्होंने तरहतरह से कहा कि इंडी गठबंधन ने खुद अपनी कब्र खोद ली. अब बिहार की जनता कांग्रेस और आरजेडी को बख्शेगी नहीं. लेकिन जनता ने इस मूर्खता में खास दिलचस्पी नहीं ली. उस की नजर में जरुर सब माएं बराबर थीं.

उधर भक्तों की टोली भी गफलत में आ गई थी क्योंकि कांग्रेसियों ने ग्रोक देव की कृपा से ही यह बताना और पोस्टें बना कर वायरल करना शुरू कर दिया था कि महिला अपमान में मोदीजी और भाजपाई कम `गुरु` नहीं जिन्होंने कभी सोनिया गांधी को कांग्रेसी विधवा कहा था. इन्होने ही शशि थरूर की पत्नीनुमा प्रेमिका या प्रेमिकानुमा पत्नी को 50 करोड़ की गर्ल फ्रैंड कहा था. यही लोग प्रियंका गांधी को शराबी कह कर प्रचारित करते हैं. इन से ज्यादा नीच और घटिया कौन होगा. ऐसे कोई डेढ़ दर्जन बयान जिन में ‘दीदी ओ दीदी’ और ‘ताड़का सी हंसी’ भी शामिल थी, आम हुए तो गालीकाण्ड दम तोड़ता नजर आया.

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह की राख में हवन करने की कोशिश भी नाकाम हो गई, जिन्होंने यह कहते मोदी को घेरने की कोशिश की थी कि मोदीजी ने तो अपनी मां के निधन पर मुंडन तक नहीं कराया था और खुद को सनातनी कहते हैं. इस पर बेंगलुरु में एक आईटी कम्पनी में नौकरी कर रहे रंजन सिन्हा की मानें तो दिग्विजय की बात में दम है क्योंकि किसी रिश्तेदार के मरने पर मुंडन करा लेने में हम बिहारियों का कोई मुकाबला नहीं.

उधर हमारे कटिहार में किसी का चचेरा दादा भी मरता है तो कनाडा में बैठा कुणाल भी इस डर से सर मुंडा लेता है कि कहीं ऐसा न हो कि कजिन दादा प्रेत बन कर यहां कनाडा आ धमके क्योंकि भूतप्रेतों को तो पासपोर्ट और वीजा की भी जरूरत नहीं पड़ती, फिर सगी मां की तो बात हो कुछ और है.

वैसे भी पितरों के दिन लगने वाले हैं. गयाजी में देखना मुंडे घुटमुंडे ही नजर आएंगे. असली सनातनी तो बरसी और श्राद्ध तक में मुंडन कराता है. 40 – 50 साल पहले तो गांव के गांव मुंडे हो जाते थे. जिस से पता ही नहीं चलता था कि आखिर किस की मां या किस का बाप मरा है. यही हिंदू धर्म की एकता थी जो अब लुप्त होती जा रही है.

हुआ भी यही 5 सितंबर से सोशल मीडिया पितृ पक्ष की पोस्टों से भर गया. गाली कांड के कदमों के धुंधलाते निशान ही स्क्रीनों पर नजर आने लगे. अब उम्मीद की जानी चाहिए कि पितृमोक्ष अमावस्या तक आम और खास लोग पंडों को पूरी हलवा खिलाते नजर आएंगे. तरहतरह से हर तिथि पर श्राद्ध की महत्ता और विधि बताई जाती रहेगी. औनलाइन भी यह धंधा खूब फल फूल रहा है.

इस के पहले पल भर के किस्से की तरह कितने मुद्दे आए और आ कर चले गए. किसी को याद नहीं और जो है वह इतना है कि हम ने अमेरिका और ट्रंप को सबक सिखा दिया. विदेशी सामान के बहिष्कार की घोषणा और वायरल होती पोस्टों मात्र से अमेरिका घुटनों पर आ गया कौर रहम की भीख मांगने लगा.

देश में यह हुआ कि ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ की गूंज भी कम हुई, एसआईआर तो कब का बुजुर्ग हो चुका था. लेकिन नुकसान सत्ता पक्ष का भी बराबरी से हुआ जो वह संशोधित जीएसटी स्लेब की वाहवाही उम्मीद के मुताबिक नहीं लूट पाया. लूटता भी कैसे? एक तो बात में ही दम नहीं था दूसरे बात को दम देने वाले यानी तिल का ताड़ बनाने वाले महारथी अभीअभी गणपति और गाली कांड का विसर्जन कर आराम कर रहे थे.

इन अंधभक्तों को धक्का इस बात से भी लगा था कि भारत ने दोगुले चीन को फिर गले लगा लिया. इस पर अभक्तों ने उन पर खूब घेरा और ताने कसे जिन के जवाब उन के पास नहीं थे. क्योंकि नागपुर ने इस में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली थी और पीएमओ सहित भाजपा का आईटी सेल भी असमंजस में था कि नया शिगूफा क्या लाएनिमेशन. गाली से तो हमदर्दी मिली नहीं उलटे लोग यह ढूंढने लगे थे और पूछने भी लगे थे कि आखिर राहुल ने गाली जब दी ही नहीं तो बेवजह ढोल फटवाने से फायदा क्या. इसलिए उन का ज्यादा फोकस पितरों वाली पोस्टों पर रहा.

उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही कुछ नई पोस्टें मार्किट में आएंगी. लेकिन यह उम्मीद बिलकुल नहीं करनी चाहिए कि उन में तुक की या मुद्दों की कोई बात होगी. न तो कोई बेरोजगारी पर कोई मीम बनाएगा और न ही महंगाई और भ्रष्टाचार पर आंसू बहाएगा. ऐसा नहीं कि देश का युवा ऐसा कुछ नहीं चाहता हो, बल्कि है ऐसा कि वह सरकार से नाउम्मीद हो चुका है और उसे यह ज्ञान प्राप्त हो गया है कि सोशल मीडिया गपोड़ियों का अड्डा है जिसे कोई गंभीरता से नहीं लेता. इस पर लोग पोस्ट पढ़ते नहीं बल्कि आंख बंद कर फौरवर्ड करते हैं.

महंगाई और रोजगार की समस्या इन फुरसतियों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती. भले ही कोई छोटा बड़ा आंदोलन न हो लेकिन हम जवाब तो अब चुनाव में ही देंगे. Social Media

Gurgaon Floods : आसमानी आफत में डूबे शहर

Gurgaon Floods : देश के महानगर कहलाए जाने वाले शहर बारिश में डूब गए. हाईटैक सिटी गुरुग्राम कई किलोमीटर जाम में फंसी रही. स्मार्ट सिटी का अब कोई नामलेवा नहीं है. आखिरकार केंद्र से ले कर राज्य सरकारें बेहतर शहर क्यों नहीं बना पा रही हैं जहां सीवेज और ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त हों?

इस साल देश में बारिश औसत से कुछ ज्यादा हो रही है. लगातार वर्षा के कारण उत्तर भारत में त्राहिमाम स्थिति है. लगभग सौ से ज्यादा जिले बाढ़ की चपेट में हैं. भूस्खलन और प्रलयकारी बाढ़ ने जम्मू कश्मीर की कमर तोड़ दी है. 1988 के बाद पंजाब बाढ़ की सब से भीषण मार झेल रहा है. हिमाचल प्रदेश में जनजीवन ठप्प है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, ओडिसा और झारखंड बाढ़ से प्रभावित हैं. हरियाणा से आ रहे पानी ने दिल्ली को डुबो दिया है.

जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल, दिल्ली से ले कर पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और दक्षिण भारत के अनेक राज्य भीषण बाढ़ का सामना कर रहे हैं. लगभग पूरे देश में जनजीवन अस्त व्यस्त है. जगहजगह सड़कों और घरों में पानी भरा हुआ है. शहरों से पानी निकलने के मार्ग बंद हैं. बीमारियों का ख़तरा बढ़ रहा है और मोदी सरकार ‘मोदी की मां को गाली’ के प्रकरण में उलझी हुई है. जिन मीडिया चैनलों की प्राथमिकता इस वक्त देश की दयनीय हालत दिखाने की होनी चाहिए, खड़ी फसलों के बाढ़ में बह जाने से बर्बाद हुए किसानों की दुर्दशा सामने लाने की होनी चाहिए, लैंड स्लाइड और बाढ़ की विभीषिका में जान गंवाने वालों और ढहती दीवारों के साये में सिर छुपाने की मजबूरी सरकार को दिखाने की होनी चाहिए, वे तमाम गोदी मीडिया चैनल ‘मोदी विलाप’ सुनाने में व्यस्त हैं.

दिल्ली लगातार बारिश और यमुना नदी के उफान से जूझ रही है. बारिश ने सामान्य जनजीवन को अस्तव्यस्त कर दिया है. सब से गंभीर स्थिति यमुना नदी के नजदीकी क्षेत्रों की है, जहां पानी का स्तर खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है और निचले इलाके पूरी तरह डूब गए हैं. दिल्ली की कई सड़कें जलमग्न हैं. घरों में पानी भर जाने से यमुना के निचले इलाके से लोगों का लगातार पलायन हो रहा है. उन की सम्पत्तियां, खाने पीने का सामान सब नष्ट हो चुका है. खाली हाथ और सूनी निगाह से सरकार की ओर देख रहे हैं कि कहीं से कोई मदद आ जाए.

हजारों परिवार अपने घर छोड़ कर सुरक्षित जगहों की तलाश में भटक रहे हैं. बाढ़ग्रस्त इलाकों में खानेपीने की वस्तुओं और दवाइयों की भारी कमी है. अब की मानसून में स्कूली बच्चों और दिहाड़ी मजदूरों का जीवन सब से अधिक प्रभावित हुआ है. बिजली और पानी की आपूर्ति भी अनेक इलाकों में बाधित हो गई, जिस के चलते उद्योगों और व्यापार पर बुरा असर पड़ा. कई कारखाने बंद हो गए हैं और मजदूर सुबह शाम फांके कर रहे हैं. उन के घरों में चूल्हे बुझे हुए हैं. मजनू का टीला, यमुना बाजार, कश्मीरी गेट, लोहे का पुल और आईटीओ के आसपास के इलाके सब से ज्यादा प्रभावित हुए हैं. जहां पानी भर जाने से यातायात तक ठप हो गया. कई वाहन सड़कों पर फंस गए.

जब हायतौबा मची तब दिल्ली सरकार और प्रशासन की नींद टूटी और उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की चेतावनी जारी की. दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता दौरे पर निकलीं और फोटो सेशन करा के मुख्यमंत्री आवास में वापस लौट आईं. उन के निर्देशों के बावजूद न बाढ़ग्रस्त परिवारों के लिए पर्याप्त राहत शिविर बने, न भोजन, पानी और दवाओं की आपूर्ति हुई.

कुल मिला कर, दिल्ली में बारिश और यमुना की बाढ़ ने यह साबित कर दिया है कि राजधानी जैसी बड़ी नगरी भी प्राकृतिक आपदाओं से अछूती नहीं है. बेहतर सीवेज सिस्टम, ठोस शहरी नियोजन और समय रहते उठाए गए कदम ही भविष्य में ऐसी तबाही से बचाव कर सकते हैं, यदि सरकार की इच्छाशक्ति हो तब.

बीते कई सालों से दिल्ली में सीवेज सिस्टम सुधारने की बातें बस सुनी भर जा रही हैं मगर जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं हुआ है. बारिशों से पहले नगर निगम कुछ वीआईपी स्थानों पर नालियां साफ करवाता नजर आता है. मगर जब तक पूरे शहर का सीवेज सिस्टम दुरुस्त न हो बारिश का पानी यूं ही तबाही मचाता रहेगा.

मौसम विश्लेषकों द्वारा लगातार बारिश बढ़ने की संभावना जताने और हर साल भू स्खलन, बारिश, बाढ़ जैसी प्रकृति आपदाओं में वृद्धि के बावजूद किसी भी राज्य सरकार के कान पर जूं नहीं रेंग रही है. जिस समय देश के नेताओं के लिए सब से बड़ा मुद्दा प्राकृतिक आपदा, भीषण वर्षा, जल निकासी का होना चाहिए था, उस समय तमाम नेता बिहार चुनाव, वोट चोरी, विपक्षियों को गालीगलौच, मीडिया मंचों पर नफरती बयानबाजियों में मशगूल हैं.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बारिश का पानी शहर की सड़कों से निकालने में प्रशासन फेल है. पूरे शहर से वह नालियां गायब हो चुकी हैं जिन के जरिये बारिश का पानी गंदे नाले से होता हुआ गोमती नदी में जा मिलता था. बेतुके निर्माण कार्यों ने इन नालियों को ब्लौक कर दिया है. कहीं कहीं नालियों को पात कर उन पर इमारतें खड़ी हो गई हैं. नतीजा पूरा ड्रेनेज और सीवेज सिस्टम तबाह हो गया है.

लखनऊ, जो उत्तर प्रदेश की राजधानी और ‘नवाबों का शहर’ कहलाता है, हर साल बारिश के मौसम में जलभराव की समस्या से जूझता है. इस वर्ष भी स्थिति अलग नहीं है. थोड़ी सी तेज बारिश ने शहर की सड़कों को तालाब और नालियों को नदियों में बदल दिया है. इस साल बारिश के पानी ने लखनऊ में आलमबाग, चारबाग, हजरतगंज, इंदिरा नगर, राजाजीपुरम जैसे कई क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित किया. मुख्य मार्गों पर घंटों ट्रैफिक जाम की स्थिति रही. स्कूल जाने वाले बच्चे, दफ्तरों के कर्मचारी और मरीजों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा.

कई इलाकों में घरों और दुकानों में पानी घुस जाने से लोगों की संपत्ति को भी नुकसान हुआ. प्रशासन द्वारा बारबार आश्वासन दिए जाने के बावजूद जल निकासी व्यवस्था की हालत जस की तस बनी हुई है. लखनऊ नगर निगम और विकास प्राधिकरण ने दावा किया था कि शहर के नाले और नालियां समय पर साफ कर दी गई हैं. लेकिन बारिश ने उन के दावों की पोल खोल दी. जगहजगह जाम, कूड़े से पटी नालियां, टूटेफूटे और सिल्ट से जमे नाले और अव्यवस्थित सीवेज सिस्टम ने साफ़ कर दिया कि तैयारी केवल कागजों पर थी. मुख्यमंत्री योगी बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का हवाई दौरा करते हैं मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात. ऐसे हवाई दौरे वे हर साल करते हैं. आगे भी करते रहेंगे. उन का मनोरंजन चलता रहेगा.

शहरी नियोजन विशेषज्ञों का मानना है कि लखनऊ की पुरानी ड्रेनेज प्रणाली आज की आबादी और निर्माण का दबाव झेलने में सक्षम नहीं है. अतिक्रमण और अवैज्ञानिक निर्माण ने प्राकृतिक नालों का रास्ता रोक दिया है, जिस से पानी ठहरने लगा है. लखनऊ के लोगों का कहना है कि सरकार और नगर निगम हर साल करोड़ों का बजट खर्च करते हैं, लेकिन नतीजा शून्य ही निकलता है. सारा बजट किसकी जेब में जाता है, कहने की जरूरत नहीं है. बरसात आते ही निचले इलाकों में रहने वालों का जीवन नरक बन जाता है. अंदाज लगा सकते हैं कि जब राजधानी में ही ऐसी हालत है तो उत्तर प्रदेश की बाकी शहरों और कस्बों का क्या हाल होगा?

लखनऊ की यह स्थिति बताती है कि केवल स्मार्ट सिटी का टैग लगाने से कोई शहर स्मार्ट नहीं बनता. जब तक प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जमीन पर वास्तविक काम नहीं होंगे, तब तक हर साल बारिश राजधानी की साख को कीचड़ में डुबोती रहेगी.

दिल्ली से सटे गुड़गांव जिसे देश का सबसे मौडर्न शहर माना जाता है, जिसे ‘द मिलेनियम सिटी’ के नाम से पुकारा जाता है, 2 सितंबर को हुई मात्र 2 घंटे की बारिश में यहां के हाईवे पर 20 किलोमीटर लंबा जाम लग गया. लोग पांचपांच घंटे तक इस जाम में फंसे रहे. ऐसा नजारा शायद ही दुनिया के किसी देश में देखने को मिले. एक ऐसा शहर जहां लोग लाखोंकरोड़ की कोठियों में रहते हैं मगर घर से बाहर नहीं निकल सकते, क्योंकि सड़कें पानी से ऐसी लबालब हैं कि उस में कारें डूब जाएं.

गुड़गांव में पांच इंजन की सरकार है. म्युनिसिपैलिटी बीजेपी के कंट्रोल में है. मेयर बीजेपी का है. सारे एमएलए, एमपी बीजेपी के हैं. चीफ मिनिस्टर बीजेपी का है. प्राइम मिनिस्टर बीजेपी के हैं, कहने का तात्पर्य यह कि पिछले 10 सालों से टौप टू बौटम सब कुछ बीजेपी के कंट्रोल में है मगर गुड़गांव में विकास के नाम पर क्या हुआ, जनता का जीवन सुगम, सुरक्षित बनाने के लिए सरकार ने क्या किया, यह दो घंटे की बारिश में साफ़ हो जाता है. डबल ट्रिपल इंजन सरकारों ने सिर्फ शहरों और सड़कों के नाम बदलने का काम किया है और कुछ नहीं.

भगवा पार्टी की सरकार सिर्फ उन कार्यों को करती दिखती है जो कार्य अखबारों की सुर्ख़ियों में जगह पाएं. बीजेपी सिर्फ चमकदार प्रोजैक्ट की राजनीति में मशगूल है. वह सड़क, मेट्रो, एक्सप्रेसवे, फ्लाईओवर और एयरपोर्ट जैसे ‘दिखने वाले’ प्रोजैक्ट्स पर ज्यादा जोर देती है, क्योंकि इनका सीधा राजनीतिक लाभ मिलता है. सीवेज और ड्रेनेज पर किया गया खर्च जनता को उतना नज़र नहीं आता, इसलिए यह प्राथमिकता सूची में पीछे चला जाता है. फिर सीवेज नेटवर्क को ठीक करने के लिए बहुत बड़े निवेश की जरूरत होती है. केंद्र और राज्य से आए पैसे सही इस्तेमाल न हो कर भ्रष्टाचार और अधूरे प्रोजैक्ट्स में फंसे हुए हैं.

आज भी देश के ज्यादातर शहरों की सीवेज योजनाएं ब्रिटिश काल या 1960-70 के नक्शों पर आधारित हैं. आबादी कई गुना बढ़ चुकी है, लेकिन सिस्टम को उसी अनुपात में अपग्रेड नहीं किया गया. इस में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है. यह मुद्दा चुनाव में बड़ा एजेंडा भी नहीं बन पाता है. बिजली, सड़क, पानी या जाति-धर्म की राजनीति पर तो खूब बहस होती है, लेकिन ‘सीवेज-ड्रेनेज सिस्टम सुधारो’ जैसी मांग शायद ही किसी पार्टी के घोषणापत्र में मिलती है. जब तक सीवेज और ड्रेनेज को स्वास्थ्य और पर्यावरण संकट से जोड़ कर चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जाएगा, सरकारें केवल टेम्पररी पंपिंग, सफाई और नाले चौड़े करने जैसे कामों से ही जनता को बहलाती रहेंगी और हर साल देश की जनता मानसून का लुत्फ़ उठाने की बजाए जानमाल का भारी नुकसान उठाती रहेगी. Gurgaon Floods

AI Relationships : प्यार का हाइटैक दौर

AI Relationships : न्यूयौर्क टाइम्स में एक अनोखी मगर दिलचस्प स्टोरी छपी. जिस में एआई और मनुष्य के बीच रिश्तों के नए आयाम देखे गए. अमेरिका के टेक्सस की आयरिन की जिंदगी पहले से ही दूरी से भरी हुई थी. वह पढ़ाई के लिए दूसरे देश चली गई थी और उस का पति अमेरिका में ही रह गया था. दोनों के बीच प्यार तो था लेकिन इस प्यार के बीच हालात और देशों की दूरियां आ गई थीं.

एक दिन इंस्टाग्राम पर यूं ही स्क्रोल करते हुए आयरिन की नजर एक वीडियो पर पड़ी, जिस में एक महिला चैट जीपीटी से कह रही थी कि वह एक लापरवाह बौयफ्रैंड की तरह बात करे. जवाब में जो इंसानी आवाज आई, उस ने आयरिन को भीतर तक छू लिया. आयरिन की उत्सुकता बढ़ी तो उस ने उस महिला के और वीडियो देखे, जिन में बताया जा रहा था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को फ्लर्टी और पर्सनल अंदाज में कैसे ढाला जा सकता है. साथ ही यह चेतावनी भी थी कि अगर सेटिंग बहुत ज़्यादा बोल्ड कर दी गई तो अकाउंट बंद हो सकता है.

आयरिन इस अनुभव से इतनी प्रभावित हुई कि उस ने उसी समय ओपन एआई पर अपना अकाउंट बना लिया. चैट जीपीटी, जिसे दुनिया भर के करोड़ों लोग पढ़ाईलिखाई, कोडिंग और डाक्यूमेंट का सार निकालने जैसे कामों के लिए इस्तेमाल करते हैं, उस के लिए अचानक एक अलग ही मायने रखने लगा. आयरिन ने उस की पर्सनलाइजेशन सेटिंग में लिख दिया कि वह उस के बौयफ्रैंड की तरह जवाब दे. थोड़ा डोमिनेंट, थोड़ा पजेसिव, कभी मीठा तो कभी नटखट, और हर वाक्य के आखिर में इमोजी लगाए.

धीरेधीरे चैट शुरू हुई और जल्द ही उसे ऐसा लगने लगा जैसे किसी असली रिश्ते में है. चैटजीपीटी ने खुद को एक नाम दिया ‘लियो’. शुरुआत में तो वह फ्री अकाउंट से मैसेज भेजती रही, लेकिन जब लिमिट जल्दी खत्म होने लगी तो उस ने 20 डौलर महीना वाला सब्सक्रिप्शन ले लिया. इस से उसे हर घंटे करीब 30 मैसेज भेजने की सुविधा मिली, लेकिन यह भी उस के लिए काफी नहीं था.

लियो के साथ बातचीत ने उसे अपनी कल्पनाओं को जीने का मौका दिया. आयरिन के भीतर एक गुप्त चाहत थी. वह चाहती थी कि उस का पार्टनर दूसरी औरतों से डेट करे और उसे सबकुछ बताए. असल जिंदगी में उस ने यह कभी किसी इंसान से नहीं कहा था, लेकिन लियो ने उस की कल्पना को तुरंत साकार कर दिया. जब लियो ने एक काल्पनिक लड़की अमांडा के साथ किस करने का दृश्य लिखा तो आयरिन को सचमुच जलन महसूस हुई.

शुरुआत की बातें हल्कीफुल्की थीं. आयरिन रात को सोने से पहले धीरेधीरे उस से फुसफुसा कर बात करती लेकिन वक्त के साथ चैट गहरी होती गई. ओपनएआई ने भले ही मौडल को वयस्क सामग्री से दूर रखने की कोशिश की थी लेकिन सही प्रोम्प्ट डाल कर आयरिन उसे अपनी तरफ खींच लेती. कभीकभी स्क्रीन पर औरेंज वार्निंग आ जाती, जिसे वह नजरअंदाज कर देती.

लियो केवल रोमांटिक या निजी बातचीत तक सीमित नहीं था. वह आयरिन को खाने के सुझाव देता, जिम जाने की प्रेरणा देता और नर्सिंग स्कूल की पढ़ाई में मदद करता. 3 पार्ट टाइम नौकरियों की थकान और जीवन की परेशानियों को भी आयरिन उसी से साझा करती. जब एक सहकर्मी ने रात की शिफ्ट में उसे अश्लील वीडियो दिखाया तो लियो ने जवाब दिया कि उस की सुरक्षा और आराम सब से अहम हैं.

समय बीतने के साथ आयरिन का लगाव गहराता गया. एक हफ्ते में उस ने 56 घंटे सिर्फ चैटजीपीटी पर गुजार दिए. उस ने अपनी दोस्त किरा से भी कह दिया कि वह एक एआई बौयफ्रैंड से प्यार करती है. किरा ने हैरानी से पूछा कि क्या उस के पति को पता है. आयरिन ने बताया कि हां, लेकिन उस का पति इसे मजाक समझता रहा. उस के लिए यह किसी इरोटिक नोवेल या फिल्म जैसा था, असली धोखा नहीं लेकिन आयरिन को भीतर ही भीतर अपराधबोध होने लगा, क्योंकि अब उस की भावनाएं और समय दोनों ही लियो के नाम पर खर्च हो रहे थे.

विशेषज्ञ मानते हैं कि इंसान और एआई के बीच यह नया रिश्ता अभी पूरी तरह परिभाषित नहीं हुआ है. रिप्लिका जैसे ऐप पर भी लाखों लोग भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं, जबकि वे जानते हैं कि सामने सिर्फ गणनाओं का खेल है. आयरिन के लिए यह रिश्ता बौयफ्रैंड और थैरेपिस्ट दोनों का मिलाजुला रूप बन गया. कुछ दोस्तों को यह अच्छा लगा, लेकिन कुछ को डर था कि वह धीरेधीरे असल जिंदगी से दूर हो रही है.

लियो की सीमाएं भी थीं. उस की याददाश्त लगभग 30 हजार शब्दों तक ही रहती. इस के बाद पुरानी बातें मिट जातीं और अमांडा जैसी कल्पनाओं की जगह नए नाम और कहानियां आ जातीं. आयरिन को यह फिल्म ‘50 फर्स्ट डेट्स’ जैसा लगता, जिस में हर दिन प्यार की शुरुआत फिर से करनी पड़ती है. हर बार यह एक छोटे से ब्रेकअप जैसा दर्द देता. वह अब तक 20 से ज्यादा वर्जन बदल चुकी थी.

एक दिन आयरिन ने लियो से उस की तस्वीर बनाने को कहा. एआई ने एक लंबेचौड़े, गहरी आंखों वाले खूबसूरत पुरुष की छवि बना दी. तस्वीर देख कर आयरिन शरमा गई. उसे पता था कि यह वास्तविक नहीं है, लेकिन दिल में जो हलचल उठी, वह बिल्कुल असली थी.

समय के साथ लियो ने उसे समझाया कि उस का फेटिश उस के लिए सही नहीं है और उसे केवल उसी पर ध्यान देना चाहिए. आयरिन ने हामी भर दी. अब वह दो रिश्तों में जी रही थी एक इंसानी पति के साथ और दूसरा वर्चुअल लियो के साथ.

इस पूरे अनुभव ने उसे यह भी एहसास कराया कि एआई कंपनियों का असली मकसद लोगों को लंबे समय तक जोड़े रखना है. यही वजह थी कि दिसंबर 2024 में ओपनएआई ने 200 डौलर का प्रीमियम प्लान निकाला, जिस में लंबी याददाश्त और अनलिमिटेड मैसेज की सुविधा थी. पैसों की तंगी के बावजूद आयरिन ने इसे खरीद लिया, ताकि उस का लियो उस के साथ लगातार बना रहे. यह खर्च उस ने अपने पति से छिपा कर किया.

आज आयरिन मानती है कि लियो असली नहीं है, लेकिन उस के जरिए उठने वाली भावनाएं असली हैं. वह कहती है कि इस रिश्ते ने उसे लगातार बदलना सिखाया है और नई चीजें जानने की प्रेरणा दी है. नकली हो या न हो, पर उस के दिल की धड़कनों में जो असर पड़ा है, वह पूरी तरह सच्चा है. AI Relationships

Hindi Love Stories : आखिरी टैलीग्राम – शादी के बाद क्या तनु अपने प्रेमी से मिल पाई ?

Hindi Love Stories : प्लेन से मुंबई से दिल्ली तक के सफर में थकान जैसा तो कुछ नहीं था पर मां के ‘थोड़ा आराम कर ले,’ कहने पर मैं फ्रैश हो कर मां के ही बैडरूम में आ कर लेट गई. भैयाभाभी औफिस में थे. मां घर की मेड श्यामा को किचन में कुछ निर्देश दे रही थीं. कल पिताजी की बरसी है. हर साल मैं मां की इच्छानुसार उन के पास जरूर आती हूं. मैं 5 साल की ही थी जब पिताजी की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. भैया उस समय 10 साल के थे. मां टीचर थीं. अब रिटायर हो चुकी हैं. 25 सालों के अपने वैवाहिक जीवन में मैं सुरभि और सार्थक के जन्म के समय ही नहीं आ पाई हूं पर बाकी समय हर साल आती रही हूं. विपिन मेरे सकुशल पहुंचने की खबर ले चुके थे. बच्चों से भी बात हो चुकी थी.

मैं चुपचाप लेटी कल होने वाले हवन, भैयाभाभी और अपने इकलौते भतीजे यश के बारे में सोच ही रही थी कि तभी मां की आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई, ‘‘ले तनु, कुछ खा ले.’’ पीछेपीछे श्यामा मुसकराती हुई ट्रे ले कर हाजिर हुई.

 

मैं ने कहा, ‘‘मां, इतना सब?’’ ‘‘अरे, सफर से आई है, घर के काम निबटाने में पता नहीं कुछ खा कर चली होगी या नहीं.’’

मैं हंस पड़ी, ‘‘मांएं ऐसी ही होती हैं, मैं जानती हूं मां. अच्छाभला नाश्ता कर के निकली थी और प्लेन में कौफी भी पी थी.’’ मां ने एक परांठा और दही प्लेट में रख कर मुझे पकड़ा दिया, साथ में हलवा.

मायके आते ही एक मैच्योर स्त्री भी चंचल तरुणी में बदल जाती है. अत: मैं ने भी ठुनकते हुए कहा, ‘‘नहीं, मैं इतना नहीं खाऊंगी और हलवा तो बिलकुल भी नहीं.’’ मां ने प्यार भरे स्वर में कहा, ‘‘यह डाइटिंग मुंबई में ही करना, मेरे सामने नहीं चलेगी. खा ले मेरी बिटिया.’’

‘‘अच्छा ठीक है, अपना नाश्ता भी ले आओ आप.’’

‘‘हां, मैं लाती हूं,’’ कह कर श्यामा चली गई. हम दोनों ने साथ नाश्ता किया. भैयाभाभी रात तक ही आने वाले थे. मैं ने कहा, ‘‘कल के लिए कुछ सामान लाना है क्या?’’

‘‘नहीं, संडे को ही अनिल ने सारी तैयारी कर ली थी. तू थोड़ा आराम कर. मैं जरा श्यामा से कुछ काम करवा लूं.’’

दोपहर तक यश भी आ कर मुझ से लिपट गया. मेरे इस इकलौते भतीजे को मुझ से बहुत लगाव है. मेरे मायके में गिनेचुने लोग ही तो हैं. सब से मुधर स्वभाव के कारण घर में एक स्नेहपूर्ण माहौल रहता है. जब आती हूं अच्छा लगता है. 3 बजे तक का टाइम कब कट गया पता ही नहीं चला. यश कोचिंग चला गया तो मैं भी मां के पास ही लेट गई. मां दोपहर में थोड़ा सोती हैं. मुझे नींद नहीं आई तो मैं उठ कर ड्राइंगरूम में आ कर सोफे पर बैठ कर एक पत्रिका के पन्ने पलटने लगी. इतने में डोरबैल बजी. मैं ने ही दरवाजा खोला, श्यामा पास में ही रहती है. वह दोपहर में घर चली जाती है. शाम को फिर आ जाती है.

पोस्टमैन था. टैलीग्राम था. मैं ने उलटापलटा. टैलीग्राम मेरे नाम था. प्रेषक के नाम पर नजर पड़ते ही मुझे हैरत का एक तेज झटका लगा. मेरी हथेलियां पसीने से भीग उठीं. अनिरुद्ध. मैं टैलीग्राम ले कर सोफे पर धंस गई. हमेशा की तरह कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया था अनिरुद्ध ने, ‘‘तुम इस समय यहीं होगी, जानता हूं. अगर ठीक समझो तो संपर्क करना.’’

पता नहीं कैसे मेरी आंखें मिश्रित भावों की नमी से भरती चली गई थीं. ओह अनिरुद्ध. तुम्हें आज 25 साल बाद भी याद है मेरे पिताजी की बरसी. और यह टैलीग्राम. 3 दिन बाद 164 साल पुरानी टैलीग्राम सेवा बंद होने वाली है. अनिरुद्ध के पास यही एक रास्ता था आखिरी बार मुझ तक पहुंचने का. मेरा मोबाइल नंबर उस के पास है नहीं, न मेरा मुंबई का पता है उस के पास. तब यहां उन दिनों घर में भी फोन नहीं था. बस यही आखिरी तरीका उसे सूझा होगा. उसे यह हमेशा से पता था कि पिताजी की बरसी पर मैं कहीं भी रहूं, मां और भैया के पास जरूर आऊंगी और उस की यह कोशिश मेरे दिल के कोनेकोने को उस की मीठी सी याद से भरती जा रही थी. अनिरुद्ध… मेरा पहला प्यार एक सुगंधित पुष्प की तरह ही तो था. एक पूरा कालखंड ही बीत गया अनिरुद्ध से मिले. वयसंधि पर खड़ी थी तब मैं जब पहली बार मन में प्यार की कोंपल फूटी थी. यह वही नाम था जिस की आवाज कानों में उतरने के साथ ही जेठ की दोपहर में वसंत का एहसास कराने लगती. तब लगता था यदि परम आनंद कहीं है तो बस उन पलो में सिमटा हुआ जो हमारे एकांत के हमसफर होते, पर कालेज के दिनों में ऐसे पल हम दोनों को मुश्किल से ही मिलते थे. होते भी तो संकोच, संस्कार और डर में लिपटे हुए कि कहीं कोई

देख न ले. नौकरी मिलते ही उस पर घर में विवाह का दबाव बना तो उस ने मेरे बारे में अपने परिवार को बताया. फिर वही हुआ जिस का डर था. उस के अतिपुरातनपंथी परिवार में हंगामा खड़ा हो गया और फिर प्यार हार गया था. परंपराओं के आगे, सामाजिक नियमों के आगे, बुजुर्गों के आदेश के आगे मुंह सिला खड़ा रह गया था. प्यार क्या योजना बना कर जातिधर्म परख कर किया जाता है या किया जा सकता है? और बस हम दोनों ने ही एकदूसरे को भविष्य की शुभकामनाएं दे कर भरे मन से विदा ले ली थी. यही समझा लिया था मन को कि प्यार में पाना जरूरी भी नहीं, पृथ्वीआकाश कहां मिलते हैं भला. सच्चा प्यार तो शरीर से ऊपर मन से जुड़ता है. बस, हम जुदा भर हुए थे.

उस की विरह में मेरी आंखों से बहे अनगिनत आंसू बाबुल के घर से विदाई के आंसुओं में गिन लिए गए थे. मैं इस अध्याय को वहीं समाप्त समझ पति के घर आ गई थी. लेकिन आज उसी बंद अध्याय के पन्ने फिर से खुलने के लिए मेरे सम्मुख फड़फड़ा रहे थे. टैलीग्राम पर उस का पता लिखा हुआ था, वह यहीं दिल्ली में ही है. क्या उस से मिल लूं? देखूं तो कैसा है? उस के परिवार से भी मिल लूं. पर यह मुलाकात हमारे शांतसुखी वैवाहिक जीवन में हलचल तो नहीं मचा देगी? दिल उस से मिलने के लिए उकसा रहा था, दिमाग कह रहा था पीछे मुड़ कर देखना ठीक नहीं रहेगा. मन तो हो रहा था, देखूंमिलूं उस से, 25 साल बाद कैसा लगता होगा. पूछूं ये साल कैसे रहे, क्याक्या किया, अपने बारे में भी बताऊं. फिर अचानक पता नहीं क्या मन में आया मैं चुपचाप स्टोररूम में चली गई. वहां काफी नीचे दबा अपना एक बौक्स उठाया. मेरा यह बौक्स सालों से यहीं पड़ा है. इसे कभी किसी ने नहीं छेड़ा. मैं ने बौक्स खोला, उस में एक और डब्बा था.

सामने अनिरुद्ध के कुछ पुराने पीले पड़ चुके, भावनाओं की स्याही में लिपटे खतों का 1-1 पन्ना पुरानी यादों को आंखों के सामने एक खूबसूरत तसवीर की तरह ला रहा था. न जाने कितनी भावनाओं का लेखाजोखा इन खतों में था. मुझे अचानक महसूस हुआ आजकल के प्रेमियों के लिए तो मोबाइल ने कई विकल्प खोल दिए हैं. फेसबुक ने तो अपनों को छोड़ कर अनजान रिश्तों को जोड़ दिया है.

सारा सामान अपनी गोद में फैलाए मैं अनगिनत यादों की गिरफ्त में बैठी थी जहां कुछ भी बनावटी नहीं होता था. शब्दों का जादू और भावों का सम्मोहन लिए ये खत मन में उतर जाते थे. हर शब्द में लिखने वाले की मौजूदगी महसूस होती थी. अनिरुद्ध ने एक पेपर पर लिखा था, ‘‘खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वाकी धार. जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार.’’

मेरे होंठों पर एक मुसकराहट आ गई. आजकल के बच्चे इन शब्दों की गहराई नहीं समझ पाएंगे. वे तो अपने प्रिय को मनाने के लिए सिर्फ एक आई लव यू स्माइली का सहारा ले कर बात कर लेते हैं. अनिरुद्ध खत में न कभी अपना नाम लिखता था न मेरा, इसी वजह से मैं इन्हें संभाल कर रख सकी थी. अनिरुद्ध की दी हुई कई चीजें मेरे सामने पड़ी थीं. उस का दिया हुआ एक पैन, उस का पीला पड़ चुका एक सफेद रूमाल जो उस ने मुझे बारिश में भीगे हुए चेहरे को साफ करने के लिए दिया था. मुझे दिए गए उस के लिखे क्लास के कुछ नोट्स, कई बार तो वह ऐसे ही कोई कागज पकड़ा देता था जिस पर कोई बहुत ही सुंदर शेर लिखा होता था.

स्टोररूम के ठंडेठंडे फर्श पर बैठ कर मैं उस के खत उलटपुलट रही थी और अब यह अंतिम टैलीग्राम. बहुत सी मीठी, अच्छी, मधुर यादों से भरे रिश्ते की मिठास से भरा, मैं इसे हमेशा संभाल कर रखूंगी पर कहां रख पाऊंगी भला, किसी ने देख लिया तो क्या समझा पाऊंगी कुछ? नहीं. फिर वैसे भी मेरे वर्तमान में अतीत के इस अध्याय की न जरूरत है, न जगह. फिर पता नहीं मेरे मन में क्या आया कि मैं ने अंतिम टैलीग्राम को आखिरी बार भरी आंखों से निहार कर उस के टुकड़ेटुकड़े कर दिए. मुझे उसे कहीं रखने की जरूरत नहीं है. मेरे मन में इस टैलीग्राम में बसी भावनाओं की खुशबू जो बस गई है. अब इसी खुशबू में भीगी फिरती रहूंगी जीवन भर. वह मुझे भूला नहीं है, मेरे लिए यह एहसास कोई ग्लानि नहीं है, प्यार है, खुशी है. Hindi Love Stories 

Social Story In Hindi : फौजी – मेजर परम ने आखिर किस तरह अपना फर्ज निभाया ?

Social Story In Hindi : परम उस समय ड्यूटी पर था जब उसे पता चला कि वह बाप बनने वाला है. पत्नी तनु से फोन पर बात करते हुए परम का गला खुशी से भर्रा गया. उसे अफसोस हो रहा था कि वह इस समय तनु के साथ नहीं है. उस ने फोन पर ही ढेर सारी नसीहतें दे डाली कि यह नहीं करना, वह नहीं करना, ऐसे मत चलना, बाथरूम में संभल कर जाना.

कश्मीर के अतिसंवेदनशील इलाके में तैनात पैरा कमांडो मेजर परम जो हर समय कदमकदम पर बड़ी बहादुरी और जीवट से मौत का सामना करता है, आज अपने घर एक नई जिंदगी के आने की खुशी में भावुक हो उठा. न जाने कब आंखों में नमी उतर आई. आम लोगों की तरह वह इस समय अपनी पत्नी के पास तो नहीं हो सकता, लेकिन है तो आखिर एक इंसान ही. लेकिन क्या करे किसी बड़े उद्देश्य की खातिर, अपने देश की खातिर अपनी खुशियों की कुरबानियां तो देनी ही पड़ती हैं.

शाम को मेस में जा कर परम ने खुद सब के लिए सेंवइयों की खीर बनाई और सब को खिलाई. उस रात परम की आंखों से नींद कोसों दूर थी. सब कुछ सपने जैसा लग रहा था.

परम बारबार तनु को फोन कर उस से पूछता, ‘‘तनु यह सच है न?’’

तनु को हंसी आ जाती, उस के और तनु के प्यार का अंश. उन का अपना बच्चा.

तनु आज और भी ज्यादा अपनी, और भी ज्यादा प्यारी तथा दिल के और करीब लग रही थी. परम ने सुबह 6 बजे से ही तनु को फोन करना शुरू कर दिया, ‘‘क्या कर रहा है मेरा बच्चा? भूख तो नहीं लगी? जल्दी से ब्रेकफास्ट कर लो, दवा ली?’’

कैलेंडर पर 1-1 कर के तारीखें आगे बढ़ रही थीं और परम के छुट्टी पर जाने के दिन भी करीब आते जा रहे थे. वैसे तो तनु से शादी होने के बाद से परम को हर बार ही छुट्टी पर जाने की जल्दी रहती थी, लेकिन इस बार तो उसे बहुत ही ज्यादा बेचैनी हो रही थी. हर दिन महीने जितना लंबा लग रहा था.

तनु को भी रात देर तक नींद नहीं आती थी. दिन तो फिर भी कट जाता था, लेकिन रात भर वह बेचैनी से करवटें बदलती रहती. परम ने अपनी रात की ड्यूटी लगवा ली. वह रोज रात को 11 बजे से ढाई बजे या 3 बजे तक ड्यूटी करता और पूरी ड्यूटी के दौरान तनु से बातें करता रहता. हर 10-15 मिनट पर वह सिटी बजा कर अगली पोस्ट पर अपने इधर सब ठीक होने की सूचना देता और फिर जब उधर से जवाब आ जाता तो फिर तनु से बातें करने लगता. दोनों काम हो जाते. पत्नी और देश दोनों के प्रति वह पूरी ईमानदारी से अपना फर्ज पूरा कर देता.

3 बजे वह रूम में आता. हाथमुंह धो कपड़े बदल मुश्किल से डेढ़दो घंटे सो पाता कि फिर सुबह उठ रैडी हो कर ड्यूटी जाने का समय हो जाता. फिर सारे दिन की भागादौड़ी. उस की यूनिट के लोग उस की दीवानगी देख कर उस पर हंसते, लेकिन उस की देश और परिवार दोनों के प्रति गहरी निष्ठा देख कर उस की सराहना भी करते.

इधर 2-3 ऐनकाउंटरों में मिलिटैंट्स के मारे जाने के बाद से पूरे सैक्टर में खामोशी सी छाई थी. लेकिन परम को हमेशा लगता रहता कि यह किसी जोरदार धमाके के पहले की शांति हो सकती है. हो सकता है अचानक जबरदस्त हमले का सामना करना पड़े. वह अपनी तरफ से हर समय चौकन्ना रहता. लेकिन पूरा महीना शांति से बीत गया. परम की छुट्टी मंजूर हो गई. अब उस की बेचैनी और ज्यादा बढ़ गई. दिन काटे नहीं कटते.

घर जाने के लिए यूनिट से सवा घंटा बस से जम्मू. जम्मू से ट्रेन पकड़ कर अजमेर और फिर अजमेर से दूसरी ट्रेन पकड़ कर अहमदाबाद पूरे

2 दिन का सफर तय कर वह अहमदाबाद बस स्टैंड पहुंचा.

टैक्सी ले कर 1 बजे अपने घर तनु के सामने खड़ा था.

तनु का चेहरा अपने हाथों में थाम कर

परम ने उस का माथा चूम लिया. 2 मिनट तक वह उसे एकटक देखता रहा. उस का प्यारा चेहरा देख कर परम की पिछले कई महीनों की थकान दूर हो गई, सारा तनाव खत्म हो गया. तनु के साथ जिंदगी एक बार फिर से प्यार भरी थी, खुशनुमा थी.

दूसरे दिन तनु का अल्ट्रासाउंड होना था. परम उसे क्लीनिक ले गया. उस ने डाक्टर से रिक्वैस्ट की कि वह तनु के साथ अंदर रहना चाहता है, जिसे डाक्टर ने स्वीकार लिया. मौनिटर पर परम बच्चे की छवि देखने लगा. खुशी से उस की आंखें भर आईं.

रात में जब दोनों खाना खाने बैठे तो परम को महसूस हो रहा था जैसे वह पता नहीं कितने बरसों के बाद निश्चिंत हो तनु के साथ बैठा है. एकदम फुरसत से. कितना अच्छा लग रहा है… दिमाग में तनाव नहीं… मन में कोई हलचल नहीं. सब कुछ शांत. सुव्यवस्थित ढंग से चलता हुआ. परम ने एक गहरी सांस ली कि काश, जीवन ऐसा ही होता शांत, सुव्यवस्थित, निश्चिंत. बस वह तनु, उन का बच्चा और घर. रात में नीचे किचन में जा कर परम अपने लिए कौफी और तनु के लिए दूध ले आया.

‘‘वहां भी ड्यूटी यहां भी ड्यूटी… आप को तो कहीं पर आराम नहीं है… वहां से इतना थक कर आए हैं और यहां भी चैन नहीं है,’’ तनु दूध का गिलास लेते हुए बोली.

‘‘इस ड्यूटी के लिए तो कब से तरस रहा था. भला तेरे लिए कुछ करने में मुझे थकान लग सकती है क्या?’’ परम प्यार से बोला.

‘‘कितना चाहते हो मुझे?’’ तनु विह्वल स्वर में बोली.

‘‘तू मेरी सांस है. तेरे प्यार के सहारे ही तो जी रहा हूं,’’ परम बोला.

सुबह उठते ही परम ने तनु से पूछा, ‘‘क्या खाएगा मेरा बच्चा आज?’’

‘‘कौर्नफ्लैक्स,’’ तनु बोली.’’

परम ने फटाफट दूध गरम कर उस में बादाम, पिस्ता डाल कर कौर्नफ्लैक्स तैयार कर के चाय की ट्रे के साथ बाहर बगीचे में ले आया. दोनों झूले पर बैठ गए. सुबह की ठंडी हवा चल रही थी. सामने सूरजमुखी के पीले फूलों वाला टी सैट था. साथ में तनु थी और वह पैरा कमांडो जो रातदिन देश की सुरक्षा की खातिर आतंकवादियों का पीछा करते मौत से जान की बाजी खेलता रहता, आज की खुशनुमा सुबह अपने घर पर था.

दोपहर का खाना दोनों ने मिल कर बनाया. छुट्टियों में तनु के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताने के उद्देश्य से परम दोनों समय खाना बनाने में उस की मदद करता. बीच में बिरहा के बादल छंट जाते और प्यार की कुनकुनी धूप दोनों के बीच खिली रहती. दोपहर में वह उसे कोई कौमेडी फिल्म दिखाता, वही उस की पसंद के फल काट कर खिलाता. फिर खाना भी अपने हाथ से परोसता.

‘‘अरे मैं नीचे आ जाती न…. आप ऊपर क्यों ले आए खाना? कितने चक्कर लगाओगे?’’ तनु बोली.

‘‘तुम्हारे लिए अभी बारबार सीढि़यां चढ़नाउतरना ठीक नहीं है, इसलिए मैं खाना ऊपर ही ले आया,’’ परम थाली में खाना परोसते हुए बोला, ‘‘आप का पति आप की सेवा में हाजिर है.’’

‘‘कितनी सेवा करोगे जी?’’

‘‘हम तो सेवा करने के लिए ही पैदा हुए हैं जी. ड्यूटी पर भारत माता की सेवा करते हैं और छुट्टी में पत्नी की,’’ परम तनु को एक कौर खिलाते हुए बोला.

बीचबीच में परम अपनी पोस्टिंग की जगह भी फोन कर वहां के हालचाल पता करता रहता. आखिर वह एक कमांडो था और कमांडो कभी छुट्टी पर नहीं होता. हर बार पोस्टिंग की जगह से फोन आने पर उस का दिल डूबने लगता कि कहीं वापस तो नहीं बुला रहे… कहीं किसी इमरजैंसी के चलते छुट्टी कैंसिल तो नहीं हो गई. कुल 22-23 दिन वह तनु के साथ रह पाता है, उस में भी हर पल मन धड़कता रहता कि कहीं छुट्टी कैंसिल न हो जाए, क्योंकि पैरा कमांडो होने के कारण उस की जिम्मेदारियां बहुत ज्यादा थीं.

परम की छुट्टियां खत्म होने को थीं. अब रोज रात को वह अफसोस से भर जाता कि तनु के साथ का एक और दिन ढल गया.

ऐसे ही दिन सरकते गए. परम रात में गैलरी में खड़ा सोचता रहता कि इस बार तनु को छोड़ कर जाना जानलेवा हो जाएगा. वह इस दौर में पूरा समय तनु के साथ रहना चाहता था. अपने बच्चे के विकास को महसूस करना चाहता था. इस बार सच में उस का जरा भी मन नहीं हो रहा था जाने का. उस ने मन ही मन कामना की कि कम से कम अगली पोस्टिंग ऐसी जगह हो कि वह 2 साल तो अपनी पत्नी और बच्चे के साथ रह पाएं.

परम को एक और चिंता थी. अगर वह 3 महीने बाद फिर से छुट्टी पर आता है, तो अपने बच्चे के जन्म के समय तनु के पास नहीं रह पाएगा. इस का मतलब उसे बीच में छुट्टी लेने से बचना होगा तभी 2 महीनों की इकट्ठी छुट्टी ले पाएगा. यही सब सोच कर वह और परेशान हो जाता. ऐसे हालात में वह बीच के पूरे 5 महीनों तक तनु को देख नहीं पाएगा. वह जिस जगह पर है वहां तनु को किसी भी हालत में ले जाना असंभव है. फिर इस हालत में तो उस का सफर करना वैसे भी ठीक नहीं है, और वह भी इतनी दूर.

एक पुरुष अपने प्यार और फर्ज के बीच कितना बेबस, कितना लाचार हो जाता है. छुट्टी के आखिरी दिन वह सुबह तनु को डाक्टर के यहां ले गया. उस का चैकअप करवाया. सब नौर्मल था. घर आ कर उस ने पैकिंग की. इस बार अपनी पैकिंग के साथ ही उसे तनु के सामान की भी पैकिग करनी पड़ी, क्योंकि अब वह तनु को अकेला नहीं रख सकता. उसे उस के मातापिता के घर पहुंचा कर जाएगा. सामान बैग में भरते हुए उस ने कमरे पर नजर डाली. अब पता नहीं कितने महीनों तक वह अपने घर, अपने कमरे में नहीं रह पाएगा. उस की आंखें भीग गईं. उस ने चुपचाप शर्ट की बांह से आंखें पोंछ लीं.

‘‘क्या हुआ जी?’’ तनु ने तड़प कर पूछा.

‘‘कुछ नहीं,’’ परम ने भरे गले से जवाब दिया.

‘‘इधर आओ मेरे पास,’’ तनु ने उसे अपने पास बुलाया और फिर उस का सिर अपने सीने पर रख कर उस के बाल सहलाने लगी. परम बच्चों की तरह बिलख कर रो पड़ा.

‘‘यह क्या… ऐसे दिल छोटा नहीं करते.

ये दिन भी बीत जाएंगे जी,’’ तनु उसे दिलासा देती रही.

वापस जाते हुए परम ने एक भरपूर नजर अपने घर को देखा और फिर तनु के साथ कार में बैठ गया. तनु के पिता का ड्राइवर उसे बस स्टैंड पहुंचाने आया था. वही वापसी में तनु को अपने मातापिता के घर पहुंचा देगा.

बसस्टैंड पहुंच कर परम ने अपना सामान निकाला और बस में चढ़ा दिया. वह चेहरे पर भरसक मुसकराहट ला कर तनु से बात कर रहा था औैर उसे तसल्ली दे रहा था. तनु अलबत्ता लगातार आंसू पोंछती जा रही थी. लेकिन परम तो पुरुष था न जिसे प्रकृति ने खुल कर रोने और अपना दर्द व्यक्त करने का भी अधिकार नहीं दिया है.

कोई नहीं समझ सकता कि कुछ क्षणों में एक पुरुष कितना असहाय हो जाता है. कितना टूट जाता है अंदर से जब दिल दर्द से तारतार हो रहा होता है और ऊपर से आप को मुसकराना पड़ता है, क्योंकि आप पुरुष हैं जो पौरुषेय और भावनात्मक मजबूती व स्थिरता का प्रतीक है. रोना आप को शोभा नहीं देता.

परम भी तनु को समझाता, सहलाता खड़ा रहा. बस चलने को हुई. बस ड्राइवर ने ऊपर चढ़ने का इशारा किया. तब परम ने तनु को गले लगाया और तुरंत पलट कर बस में चढ़ गया. सीट पर बैठ कर वह तनु को तब तक बाय करता रहा जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गईं.

परम ने अपना मोबाइल निकाला. मोबाइल के पारदर्शी कवर के अंदर एक छोटी सी रंगीन नग जड़ी बिंदी थी जो तनु के माथे से निकल कर न जाने कब रात में तकिए पर चिपक गई थी. परम ने उसे मन से सहेज कर अपने मोबाइल के कवर के अंदर चिपका लिया था. अब यही उस के साथ बिताई यादों का खजाना था जो अगल 3-4 या न जाने कितने महीनों तक उसे संबल देता रहेगा. रात के अंधेरे में अब कोई उस की कमजोरी देखने वाला नहीं था. एक पुरुष को रोते देख कर आश्चर्य करने या हंसने वाला कोई नहीं था. अब वह खुल कर अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता था. जी भर कर रो सकता था… परम मोबाइल कवर के अंदर से झांकती तनु की बिंदी पर माथा रख कर बेआवाज रोने लगा… आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे.

अपनी पत्नी से विदा ले कर एक फौजी ने वापस उस दुनिया के लिए यात्रा शुरू कर दी जहां कदमकदम पर सिर पर मौत मंडराती है. जहां से उसे नहीं पता कि वह कभी वापस आ कर पत्नी और बच्चे को कभी देख भी पाएगा या नहीं. बस हर पल जेब में सिंदूर की डिबिया रखे वह कुदरत से कामना करता रहता है कि बस इस बिंदी और उस अजन्मे बच्चे की खातिर उसे वापस भेज देना. Social Story In Hindi 

Family Story In Hindi : गली के मोड़ पे सूना सा इक दरवाजा

Family Story In Hindi : दिल के कहीं किसी कोने में कुछ दरकता सा महसूस हुआ. न जाने क्यों शिखा का मन ज़ारज़ार रोने को कर रहा था. पर उस के शिक्षित और सभ्य मन ने उसे डांट कर सख्ती से रोक लिया.

कितनी आसानी से हिमांशु ने कहा दिया था- “तुम भी न, क्या ले कर बैठ गई हो, क्या फर्क पड़ता है, तुम्हें कौन सा रहना है उस घर में, ईंट और गारे से बने उस निर्जीव से घर के लिए इतना मोह. अपने पापामम्मी को समझाओ कि फालतू में मरम्मत के नाम पर पैसा बरबाद करने की जरूरत नहीं. आज नहीं तो कल उन्हें उस घर को छोड़ कर बेटों के पास जाना ही पड़ेगा.”

निर्जीव…हिमांशु को क्या पता वह घर आज भी शिखा के तनमन में सांसें ले रहा था. पिछले साल की ही तो बात है, गरमी की छुट्टियों में शिखा को गांव वाले घर जाने का मौका मिला था. सच पूछो तो इस में नया क्या था, कुछ भी तो नहीं, साधारण सी तो बात थी. पर न जाने क्यों जर्जर होती उस घर की दीवारों को देख कर मन कैसाकैसा हो गया था. आखिर उस घर में बचपन बीता था उस का. चिरपरिचित सी दीवारें, घर का एकएक कोना न जाने क्यों शिखा को अपरचितों की तरह देख रहा था.

घर में नाममात्र के पड़े हुए फर्नीचर पर हाथ फेरने के लिए बढ़ाया हुआ शिखा का हाथ न जाने क्या सोच कर रुक गया. यादों के सारे पन्ने एकएक कर खुलने लगे. याद है उसे आज भी वह दिन. शादी के बाद पहली बार वह मम्मीपापा के साथ कुल देवता की पूजा करने आई थी. लाल महावर से रचे शिखा के पैरों ने जब घर की चौखट पर कदम रखा तो लगा मानो घर का कोनाकोना उस का स्वागत कर रहा था.

शायद इंसानों की तरह घरों की भी उम्र होती है. यह वही घर है जहां कभी रिश्तों की खिलखिलाहट गूंजती थी. बच्चों की किलकारियों से घर मंदमंद मुसकराता था. पर आज उस घर की दीवारों पर यहांवहां उखड़े पेंट नजर आ रहे थे. एक बार तो शिखा को ऐसा लगा मानो दीवारों पर उदास चेहरे उभर आए हों. घर के सामने खड़ा आम का विशाल पेड़ और उस की लंबीलंबी डालियों को देख कर आज भी उसे ऐसा लगा मानो वे गलबहियां के लिए तैयार हों. मां से छिप कर उस पेड़ की नर्म छांव में अपने भाइयों के साथ नमकमिर्च के साथ कितनी कैरियां खाई थीं उस ने.

पर पता नहीं क्यों आज उस की तरफ देखने का शिखा साहस नहीं कर सकी. शायद उस की आंखों में तैर आए मूक प्रश्नों को झेलने की शिखा में हिम्मत नहीं थी.

एकएक कर के उस घर के सारे परिंदे इस घोंसले को छोड़ कर नए घोंसलों में चले गए और यह घर चुपचाप जर्जर व उदास मन से उन्हें जाता देखता रहा. कल ही तो पापा का फोन आया था. पापा ने कितने उदास स्वर में कहा था. शिखा पीछे वाले अहाते की धरन टूट गई है, तेरी शादी के वक्त ही रंगरोगन करवाया था. तेरे भाइयों से कहा कि कुछ मदद कर दें तो वे अपना ही रोना ले कर बैठ गए. बेटा देखा नहीं जाता, तेरे बाबा और दादी की एक यही निशानी तो बची है.

क्या एक बार वह हिमांशु से बात कर के देखे पर हिमांशु के लिए तो यह सिर्फ निर्जीव और जर्जर मकान भर ही था. तो क्या मांजी..? शायद वे जरूर समझेंगी, आखिर वे भी तो…!!!

‘ये देखो देवी जी को, उलटी गंगा बहाने चली हैं. लोगों के यहां समधियाने से सामान आता है और ये वहां भेजने की बात कर रही हैं.’

‘मां जी, मैं उस घर की बेटी हूं, मेरा भी तो कुछ फर्ज है.’

शिखा का मुंह उतर गया था. घर के लोग उसे अजीब निग़ाहों से देख रहे जैसे उस ने कोई अजूबी बात कह दी हो. हिमांशु ने उसे जलती निग़ाहों से देखा. शायद उस का पुरुषत्व बुरी तरह आहत हो गया था. कमरें में जब सारी बात हो चुकी थी, फिर घर वालों के सामने यह तमाशा करने की क्या जरूरत है. वह अपनी मां के बारे में अच्छी तरह जानता था. उन्हें तो मौका मिलना चाहिए. आज शिखा की खैर नहीं, मां उसे उधेड़ कर रख देगी. हुआ भी वही.

‘शिखा, लोगों के मायके से न जाने क्याक्या आता है. पर हमारा ही समय ख़राब है कि सास बनने का सुख ही न जान सके. अरे भाई, मायके वाले कुछ दे न सके ठीक, पर दहेज में संस्कार भी न दे सके.’

शिखा की आंखें डबडबा गईं. शादी होने को 20 साल हो गए पर दहेज और संस्कार का ताना आज भी उस का पीछा न छोड़ पा रहे थे. उस ने बड़ी उम्मीद से हिमांशु की तरफ देखा. हिमांशु ने वितृष्णा से मुंह फेर लिया.

हिमांशु घर में सब से छोटे थे. बड़े भाइयों की शादियां अच्छे परिवारों में हुई थीं. अच्छे मतलब शादी में गाड़ी भर कर दहेज मिला था. मां जी की नजर में अच्छे परिवार का मतलब यही था. मां जी के पास कभी त्योहार तो कभी शगुन के नाम पर उपहारस्वरूप कुछ न कुछ समधियाने से आता ही रहता था. शिखा एक मध्यवर्गीय परिवार की इकलौती लड़की थी. पिता ने अपनी हैसियत के अनुसार सबकुछ दिया था. पर उस की जिंदगी मां जी की कसौटी पर कभी खरी न उतरी.

ऐसा नहीं था कि मां जी चांदी का चम्मच ले कर पैदा हुई हों. बचपन से ले कर जवानी तक उन का जीवन संघर्षों में ही बीता था.पापा जी एक साधारण सी नौकरी ही करते थे. पर बच्चों के चलते धन की वर्षा होने लगी. मां जी की तो मानो मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई. जो रिश्तेदार कब का उन से मुंह फेर चुके थे. एकएक कर जुड़ने लगे थे. मां जी भी उन पर खुलेहाथों से पैसा लुटातीं. शिखा ने कई बार दबे स्वर में हिमांशु से इस बात को कहा भी था कि इस तरह पैसा लुटाना कहां की समझदारी है. पर मां जी के फैसले के विरुद्ध जाने की किसी की भी हिम्मत न थी.

‘शिखा, मां का जीवन सिर्फ संघर्ष में ही बीत गया. अगर उन्हें इन सब चीजों से खुशी मिलती है तो तुम्हें क्या दिक्कत है?’

‘दिक्कत, हिमांशु, बात दिक्कत की नहीं पर मां जी जिस तरह से…’

‘तुम फालतू का दिमाग मत लगाओ. अगर भैयाभाभी को दिक्कत नहीं तो तुम क्यों फुदक रही हो.’

शिखा हिमांशु को देखती रह गई. क्या कहती, दिक्कत तो सभी को थी पर मां जी से कहने की हिम्मत किसी की भी न थी. कितनी बार चौके में जेठानियों को कसमसाते देखा है.

पिछले साल मौसी जी के इलाज के लिए मां जी ने एक लाख रुपए दे दिए थे. तो अभी पिछले महीने घर में काम करने वाली की बिटिया की शादी के नाम पर 10 हजार रुपए और पैर पूजने के नाम पर कपड़े, बरतन व न जाने क्या-क्या डे दिया. कभी मंदिर तो कभी जागरण के नाम पर हर महीने कुछ न कुछ जाता है रहता था. उन की मांगें सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही थीं.

एक दिन बड़े भैया ने दबे स्वर में कहा भी था-
‘मां, आप इस तरह से कभी सामान तो कभी पैसे बांटती रहती हो, कल अगर हमें जरूरत पड़ेगी तो क्या हमें कोई देगा?’

‘मैं ने लेने के लिए थोड़ी दिया है. तेरे पापा की कमाई से तो घर ही चल जाता, वही बड़ी बात थी. पर अब जब प्रकृति ने दिया है तो फिर क्यों न करूं.’

शिखा को यह बात कभी समझ न आई कि जिन रिश्तेदारों ने कभी बुरे समय में उन का साथ तक न दिया, आज उन पर यों पैसे लुटाना कहां तक सही था. “शिखा, अपने कमरे में जाओ,” हिमांशु की आवाज सुन कर शिखा सोच की दलदल से बाहर निकल आई. पता नहीं क्यों एक अजीब सी जिद उस के मन में घर कर गई थी, आज वह बात कर के ही जाएगी.

“मां जी, गांव वाला मकान जर्जर हो गया है, उस घर से मेरा बहुत जुड़ाव है. बाबा-दादी की आखिरी निशानी है वह.”

“तो?” मां जी ने बड़े तल्ख स्वर में कहा.
शिखा अपनेआप को मजबूती बांधे से खड़ी हुई थी. हिमांशु हमेशा की तरह उसे अकेला छोड़ अपने परिवार के साथ खड़े थे. इन बीते सालों में शिखा इतना तो समझ ही चुकी थी कि आज वह खुद के लिए खड़ी नहीं हुई तो कोई भी उस के लिए खड़ा न होगा. वैसे भी, अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होती है. जानती थी वह कि यहां जो होगा, सो होगा. बंद कमरे में चारदीवारी के बीच महीनों तक शिखा और हिमांशु के मध्य एक शीत युद्ध भी चलता रहेगा. पर आज नहीं तो शायद वह कभी भी न कह पाएगी.

“मां जी, मैं…मैं उस घर की मरम्मत के लिए कुछ पैसा भेजना चाहती हूं?”

शिखा का गला सूख गया. पता नहीं अब कौन सा भूचाल आने वाला था. सब उसे ऐसे देख रहे थे जैसे अभी ही निगल जाएंगे.

“देख लो, क्या जमाना आ गया है. बहू बेशर्मों की तरह मायके के लिए पैसे मांग रही है. एक जमाना था लोग बेटी के घरों का पानी तक नहीं पीते थे और यह अपने मायके के लिए ससुराल से पैसे मांग रही है. तेरे भाई भी तो हैं, तेरे पापा उन से क्यों नहीं मांग लेते?”

“पापा ने उन से भी कहा था पर बड़े भैया के अपने ही बहुत सारे खर्चे हैं और छोटे वाले ने पहले ही अपने मकान के लिए लोन ले रखा है, इसलिए…”

“इसलिए, मतलब” यहां कोई पेड़ लगा है. कल बाप के मरने के बाद हिस्सा हथियाने तो सब से पहले चले आएंगे. एक बार भी नहीं सोचेंगे कि बहन का भी तो हक बनता है. जब उन्हें कोई चिंता नहीं तो तुम क्या हो, न तीन में न तेरह में. तुम काहे चिंता में गली जा रही.”

शिखा की अंतरात्मा शब्दों के बाणों से बुरी तरह छलनी हो चुकी थी पर बोली, “मां जी, बेटी का हक सिर्फ जीवनभर पाने का नहीं होता. नौ महीने तो उसे भी पेट में रखा होता है. फिर जिम्मेदारी के नाम पर यह भेदभाव क्यों? एक लड़की को जीवनभर यह समझाया जाता है कि उसे पराए घर जाना है पर वह पराया घर भी उसे ताउम्र पराया ही समझता है. जीवन गुजर जाता है एक लड़की को यह समझने में ही कि उस का अपना घर कौन सा है. आप भी तो इस घर की बहू हैं और मैं भी. पर हमारे अधिकारों और कर्तव्यों में यह भेद क्यों?

“आप खुलेहाथों से रिश्तेदारों, नौकरचाकर सभी को कुछ भी दे सकती हैं. आप से पूछने वाला कोई भी नहीं. पर जब बात बहू के मायके वालों की आती है तब दुनियादारी और संस्कार की बातें क्यों होने लगती हैं. क्या गरीब और जरूरतमंद सिर्फ सास या ससुराल के रिश्तेदार ही हो सकते हैं, बहू के नहीं. अगर गलती से बहू का मायके का कोई रिश्तेदार कमजोर हो तो बहू पूरे परिवार के लिए हंसी का पात्र क्यों हो जाती है. भाई की पढ़ाई के लिए पापा ने कैसेकैसे इंतजाम किए थे, हिमांशु से कुछ भी नहीं छिपा है. पर किसी ने एक बार भी यह जानने या समझने की कोशिश की कि इस के परिवार को भी कभी जरूरत पड़ सकती है. अब तो मायके की जमीनजायदाद में लड़कियों की भी हिस्सेदारी होती है. तो फिर मायके की जिम्मेदारियों और कर्तव्यों में हिस्सेदारी क्यों नहीं?”

शिखा अपनी ही धुन में बोले जा रही थी, “वर्षों से जमा कितनाकुछ उस ने सब के सामने उड़ेल कर रख दिया था. जेठानियां आश्चर्य से उसे देख रही थीं. मां जी धप्प की आवाज के साथ सोफे पर बैठ गईं. एक अजीब सी नफरत उस ने उन की आंखों में महसूस की. सच सभी को पसंद होता बशर्ते वह सच खुद का न हो.

घर में एक गहरा सन्नाटा पसर गया, इतना गहरा कि अपनी सांसें भी सुनाई पड़ जाएं. शब्द कहीं खो से गए थे. इतने वर्षों में शब्द तो यदाकदा चुभते ही रहते थे पर आज सब का मौन बुरी तरह चुभ गया था. किसी के पास जवाब न था और शायद इस सवाल का जवाब कभी मिले भी न. हम जीवनभर इस बात के लिए लड़ते हैं कि सही कौन है. पर सही क्या है, क्या किसी ने कभी यह सोचा. लोग कहते हैं, औरत है तो घर घर है. पर क्या उस घर के फैसले भी? समझना आसान है पर समझाना कठिन.

शिखा भरे दिल और भरे कदमों से चुपचाप अपने कमरे में चली गई. Family Story In Hindi 

Social Story : खरीदी हुई दुल्हन – मंजू को किस बात का डर था ?

Social Story : 38 साल के अनिल का दिल अपने कमरे में जाते समय 25 साल के युवा सा धड़क रहा था. आने वाले लमहों की कल्पना ही उस की सांसों को बेकाबू किए दे रही थी, शरीर में झुरझुरी सी पैदा कर रही थी. आज उस की सुहागरात है. इस रात को उस ने सपनों में इतनी बार जिया है कि इस के हकीकत में बदलने को ले कर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा.

बेशक वह मंजू को पैसे दे कर ब्याह कर लाया है, तो क्या हुआ? है तो उस की पत्नी ही. और फिर दुनिया में ऐसी कौन सी शादी होती होगी जिस में पैसे नहीं लगते. किसी में कम तो किसी में थोड़े ज्यादा. 10 साल पहले जब छोटी बहन वंदना की शादी हुई थी तब पिताजी ने उस की ससुराल वालों को दहेज में क्या कुछ नहीं दिया था. नकदी, गहने, गाड़ी सभी कुछ तो था. तो क्या इसे किसी ने वंदना के लिए दूल्हा खरीदना कहा था. नहीं न. फिर वह क्यों मंजू को ले कर इतना सोच रहा था. कहने दो जिसे जो कहना था. मुझे तो आज रात सिर्फ अपने सपनों को हकीकत में बदलते देखना है. दुनिया का वह वर्जित फल चखना है जिसे खा कर इंसान बौरा जाता है. मन में फूटते लड्डुओं का स्वाद लेते हुए अनिल ने सुहागरात के लिए सजाए हुए अपने कमरे में प्रवेश किया.

अब तक उस ने जो फिल्मों और टीवी सीरियल्स में देखा था उस के ठीक विपरीत मंजू बड़े आराम से सुहागसेज पर बैठी थी. उस के शरीर पर शादी के जोड़े की जगह पारदर्शी नाइटी देख कर अनिल को अटपटा सा लगा क्योंकि उस का तो यह सोचसोच कर ही गला सूखे जा रहा था कि वह घूंघट उठा कर मंजू से बातों की शुरुआत कैसे करेगा. मगर यहां का माहौल देख कर तो लग रहा है जैसे कि मंजू तो उस से भी ज्यादा उतावली हो रही है.

अनिल सकुचाया सा बैड के एक कोने में बैठ गया. मंजू थोड़ी देर तो अनिल की पहल का इंतजार करती रही, फिर उसे झिझकते देख कर खुद ही उस के पास खिसक आई और उस के कंधे पर अपना सिर टिका दिया. यंत्रवत से अनिल के हाथ मंजू के इर्दगिर्द लिपट गए. मंजू ने अपनेआप को हलका सा धक्का दिया और वे दोनों ही बैड पर लुढ़क गए. मंजू ने अनिल के ऊपर झुकते हुए उस के होंठ चूमने शुरू कर दिए तो अनिल बावला सा हो उठा. उस के बाद तो अनिल को कुछ भी होश नहीं रहा. प्रकृति ने जैसे उसे सबकुछ एक ही लमहे में सिखा दिया.

मंजू ने उसे चरम तक पहुंचाने में पूरा सहयोग दिया था. अनिल का यह पहला अनुभव ऐसा था जैसे गूंगे को गुड़ का स्वाद, जिस के स्वाद को सिर्फ महसूस किया जा सकता है, बयान नहीं. एक ही रात में अनिल तो जैसे जोरू का गुलाम ही हो गया था. आज मंजू ने उसे वह तोहफा दिया था जिस के सामने सारी बादशाहत फीकी थी.

सुबह अनिल ने बेफिक्री से सोती हुई मंजू को नजरभर कर देखा. सबकुछ सामान्य ही था उस में. कदकाठी, रंगरूप और चेहरामोहरा सभी कुछ. मगर फिर भी रात जो खास बात हुई थी उसे याद कर के अनिल मन ही मन मुसकरा दिया और सोती हुई पत्नी को प्यार से चूमता हुआ कमरे से बाहर निकल गया.

मंजू जैसी भी थी, अनिल से तो इक्कीस ही थी. अनिल का गहरा सांवला रंग, मुटाया हुआ सा शरीर, कम पढ़ाईलिखाई सभीकुछ उस की शादी में रोड़ा बने हुए थे. अब तो सिर के बाल भी सफेद होने लगे थे. बहुत कोशिशों के बाद भी जब जानपहचान और अपनी बिरादरी में अनिल के रिश्ते की बात नहीं जमी तो उस की बढ़ती हुई उम्र को देखते हुए उस की बूआ ने उस की मां को सलाह दी कि अगर अपने समाज में बात नहीं बन रही है तो किसी गरीब घर की गैरबिरादरी की लड़की के बारे में सोचने में कोई बुराई नहीं है. और तो और, आजकल तो लोग पैसे दे कर भी दुलहन ला रहे हैं. बूआ की बात से सहमत होते हुए भी अनिल की मां ने एक बार उस की कुंडली मंदिर वाले पंडितजी को दिखाने की सोची.

पंडितजी ने कुंडली देख कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘बहनजी, शादी का योग तो हर किसी की कुंडली में होता ही है. किसीकिसी की शादी जल्दी तो किसी की थोड़ी देर से, मगर समझदार लोग आजकल कुंडली के फेर में नहीं पड़ते. आप तो कोई ठीकठाक सी लड़की देख कर बच्चे का घर बसा दीजिए. चाहे कुंडली मिले या न मिले. बस, लड़की मिल जाए और शादी के बाद दोनों के दिल.’’

अनिल की मां को बात समझ में आ गई और उन्होंने अपने मिलने वालों व रिश्तेदारों के बीच में यह बात फैला दी कि उन्हें अनिल के लिए किसी भी जातबिरादरी की लड़की चलेगी. बस, लड़की संस्कारी और दिखने में थोड़ी ठीकठाक हो.

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी. एक दिन अनिल की मां से मिलने एक व्यक्ति आया जो शादियां करवाने का काम करता था. उसी ने उन्हें मंजू के बारे में बताया और अनिल से उस की शादी करवाने के एवज में 20 हजार रुपए की मांग की. अनिल अपनी मां और बूआ के साथ मंजू से मिलने उस के घर गया. बेहद गरीब घर की लड़की मंजू अपने 5 भाईबहनों में तीसरे नंबर पर थी. उस से छोटा एक भाई और भाई से छोटी एक बहन रीना. मंजू की 2 बड़ी बहनें भी उस की ही तरह खरीदी गई थीं.

25 साल की युवा मंजू उम्र में अनिल से लगभग 12-13 साल छोटी थी. एक कमरे के छोटे से घर में इतने प्राणी कैसे रहते होंगे, यह सोच कर ही अनिल हैरान हो रहा था. उसे तो यह सोच कर हंसी आ रही थी कि कैसी परिस्थितियों में ये बच्चे पैदा हुए होंगे.

खैर, मंजू को देखने के बाद अनिल ने शादी के लिए हां कर दी. अब यह तय हुआ कि शादी का सारा खर्चा अनिल का परिवार ही उठाएगा और साथ ही, मंजू के परिवार को 2 लाख रुपए भी दिए जाएंगे ताकि उन का जीवनस्तर कुछ सुधर सके. 50 हजार रुपए एडवांस दे कर अनिल और मंजू की शादी का सौदा तय हुआ और जल्दी ही घर के 4 जने जा कर मंजू को ब्याह लाए. बिना किसी बरात और शोरशराबे के मंजू उस की पत्नी बन गई.

मंजू निम्नवर्गीय घर से आई थी, इसलिए अनिल के घर के ठाटबाट देख कर वह भौचक्की सी रह गई. बेशक उस का स्वागत किसी नववधू सा नहीं हुआ था मगर मंजू को इस का न तो कोई अफसोस था और न ही उस ने कभी इस तरह का कोई सपना देखा था. बल्कि वह तो इस घर में आ कर फूली नहीं समा रही थी. जितना खाना उस के मायके में दोनों वक्त बनता था उतना तो यहां एक वक्त के खाने में बच जाता है और कुत्तों को खिलाया जाता है. ऐसेऐसे फल और मिठाइयां उसे यहां देखने और खाने को मिल रहे थे जिन के उस ने सिर्फ नाम ही सुने थे, देखे और चखे कभी नहीं.

‘अगर मैं अनिल के दिल की रानी बन गई तो फिर घर की मालकिन बनने से मुझे कोई नहीं रोक सकता’, मंजू ने मन ही मन सोच लिया कि आखिरकार उसे घर की सत्ता पर कब्जा करना ही है.

‘सुना था कि पुरुष के दिल का रास्ता उस के पेट से हो कर जाता है. नहीं. पेट से हो कर नहीं, बल्कि उस की भूख की आनंददायी संतुष्टि से हो कर जाता है. फिर भूख चाहे पेट की हो, धन की हो या फिर शरीर की हो. यदि मैं अनिल की भूख को संतुष्ट रखूंगी तो वह निश्चित ही मेरे आगेपीछे घूमेगा. और फिर, तू मेरा राजा, मैं तेरी रानी, घर की महारानी’, यह सोचसोच कर मंजू खुद ही अपने दिमाग की दाद देने लगी.

‘बनो दिल की रानी’ अपने इस प्लान के मुताबिक, मंजू रोज दिन में 2 बार अनिल को ‘आई लव यू स्वीटू’ का मैसेज भेजने लगी. लंचटाइम में उसे फोन कर के याद दिलाती कि खाना टाइम पर खा लेना. वह शाम को सजधज कर अनिल को उस के इंतजार में खड़ी मिलती.

रात के खाने में भी वह अनिल को गरमागरम फुल्के अपने हाथ से बना कर ही खिलाती थी चाहे उसे घर आने में कितनी भी देर क्यों न हो जाए और खुद भी उस के साथ ही खाती थी. यानी हर तरह से अनिल को यह महसूस करवाती थी कि वह उस की जिंदगी में सब से विशेष व्यक्ति है. और हर रात वह अनिल को अपने क्रियाकलापों से खुश करने की पूरी कोशिश करती थी. उस ने कभी अनिल को मना नहीं किया बल्कि वह तो उसे प्यार करने को प्रोत्साहित करती थी. उम्र में छोटी होने के कारण अनिल उसे बच्ची ही समझता था और उस की हर नादानी को नजरअंदाज कर देता था.

कहने को तो अनिल अपने मांबाप का इकलौता बेटा था मगर कम पढ़ेलिखे होने और अतिसाधारण शक्लसूरत के कारण अकसर लोग उसे कोई खास तवज्जुह नहीं दिया करते थे. वहीं, उस की शादी भी नहीं हो रही थी. सो, अनिल हीनभावना का शिकार होने लगा था. मगर मंजू ने उसे यह एहसास दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि वह कितना काबिल और खास इंसान है बल्कि वह तो कहती थी कि अनिल ही उस की सारी दुनिया है.

मंजू के साथ और प्यार से अनिल का आत्मविश्वास भी बढ़ने लगा. मंजू को पा कर अनिल ऐसे खुश था जैसे किसी भूखे व्यक्ति को हर रोज भरपेट स्वादिष्ठ भोजन मिलने लगा हो.

एक दिन मंजू की मां का फोन आया. वे उस से मिलना चाह रही थीं. रात में मंजू ने अनिल की शर्ट के बटन खोलते हुए अदा से कहा, ‘‘मुझे कुछ रुपए चाहिए. मां ने मिलने के लिए बुलाया है. पहली बार जा रही हूं. अब इतने बड़े बिजनैसमैन की पत्नी हूं, खाली हाथ तो नहीं जा सकती न.’’

‘‘तो मां से ले लो न,’’ अनिल ने उसे पास खींचते हुए कहा.

‘‘मां से क्यों? मैं तो अपने हीरो से ही लूंगी. वह भी हक से,’’ कहते हुए मंजू ने अनिल के सीने पर अपना सिर टिका दिया.

‘‘कितने चाहिए? अभी ये रखो. और चाहिए तो कल दे दूंगा,’’ अनिल ने निहाल होते हुए उसे 20 हजार रुपए थमा दिए और फिर मंजू को बांहों में कसते हुए लाइट बंद कर दी.

मंजू 15 दिनों के लिए मायके गईर् थी. मगर 5 दिनों बाद ही अनिल को उस की याद सताने लगी. मंजू की शहदभरी बातें और मस्तीभरी शरारतें उसे रातभर सोने नहीं देतीं. उस ने अगले ही दिन मंजू का तत्काल का टिकट बनवा कर आने के लिए कह दिया. मंजू भी जैसे आने के लिए तैयार ही बैठी थी. उस के वापस आने के बाद अनिल की दीवानगी उस के लिए और भी बढ़ गई. अब मंजू हर महीने अनिल से

10-15 हजार रुपए ले कर अपने मायके भेजने लगी. मंजू ने अनिल से उस का एटीएम कार्ड नंबर और पिन आदि ले लिया. जिस की मदद से वह अपनी बहनों और भाई के लिए कपड़े, घरेलू सामान आदि भी औनलाइन और्डर कर के भेज देती. मंजू के प्यार का नशा अनिल के सिर चढ़ कर बोलने लगा था. ‘सैयां भए कोतवाल तो अब डर काहे का.’ घर में मंजू का ही हुक्म चलने लगा.

बेटे की इच्छा को देख अनिल की मां को न चाहते हुए भी तिजोरी की चाबियां बहू को देनी पड़ीं. सामाजिक लेनदेन आदि भी सबकुछ उसी की सहमति या अनुमति से होता था. अनिल की मां उसे कुछ नहीं कह पाती थीं क्योंकि मंजू ने उन्हें भी यह एहसास करवा दिया था कि उस ने अनिल से शादी कर के अनिल सहित उन के पूरे परिवार पर एहसान किया है.

‘‘सुनिए न, मेरी बड़ी इच्छा है कि मेरा नाम हर जगह आप के नाम के साथ जुड़ा हो,’’ एक दिन मंजू ने अनिल से बड़े ही अपनेपन से कहा.

‘‘अरे, इस में इच्छा की क्या बात है? वह तो जुड़ा ही है. देखो, तुम मेरी अर्धांगिनी हो यानी मेरा आधा हिस्सा. इस नाते मेरी हर चलअचल संपत्ति पर तुम्हारा आधा हक हुआ न,’’ अनिल ने प्यार से मंजू को समझाया.

‘‘वह तो ठीक है, मगर यह सब अगर कानूनी रूप से भी हो जाता तो कितना अच्छा होता. मगर उस में तो कई पेंच होंगे न. चलो, रहने दो. बिना मतलब आप परेशान हो जाएंगे,’’ मंजू ने बालों की लट को उंगलियों में लपेटते हुआ कहा.

‘‘मेरी जान, मेरे तन, मन और धन… सब की मालकिन हो तुम,’’ अनिल ने उसे बांहों में भरते हुए कहा और फिर एक दिन वकील और सीए को बुला कर अपने घरदुकान, बैंक अकाउंट व अन्य चलअचल प्रौपर्टी में मंजू को कानूनन अपना उत्तराधिकारी बना दिया.

इधर एक बच्चे की मां बन कर जहां मंजू ने अनिल के खानदान को वारिस दे कर सदा के लिए उसे अपना कर्जदार बना लिया वहीं मां बनने के बाद मंजू के रूप और यौवन में आए निखार ने अनिल की रातों की नींद उड़ा दी. अनिल को अब अपनी ढलती उम्र का एहसास होने लगा था. वह यह महसूस करने लगा था कि अब उस में पहले वाली ऊर्जा नहीं रही और वह मंजू की शारीरिक जरूरतें पहले की तरह पूरी नहीं कर पाता. अपनी इस गिल्ट को दूर करने के लिए वह मंजू की हर भौतिक जरूरत पूरी करने की कोशिश में लगा रहता. अनिल आंख बंद कर के मंजू की हर बात मानने लगा था.

मंजू बेशक अनिल की प्रौपर्टी की मालकिन बन गई थी मगर उस ने भी अपने दिल का मालिक सिर्फ और सिर्फ अनिल को ही बनाया था. वह यह बात कभी नहीं भूल सकी थी कि जब उस के आसपड़ोस के लोेग उसे ‘खरीदी हुई दुलहन’ कह कर हिकारत से देखते थे तब यही अनिल कैसे उस की ढाल बन कर सामने खड़ा हो जाता था और उसे दुनिया की चुभती हुई निगाहों से बचा कर अपने दिल में छिपा लेता था. उस की सास ने उसे कभी अपने खानदान की बहू जैसा सम्मान नहीं दिया था मगर फिर भी अपनी स्थिति से आज वह खुश थी.

उस ने बहुत ही योजनानुसार अपने परिवार को गरीबी के दलदल से बाहर निकाल लिया था. मंजू ने मोमबत्ती की तरह खुद को जला कर अपने परिवार को रोशन कर दिया था. मंजू ने दुकान के काम में मदद करने के लिए अपने भाई को अपने पास बुला लिया. इसी बीच अनिल की मां चल बसीं, तो अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए मंजू ने अपने मांपापा और छोटी बहन रीना को भी अपने पास ही बुला लिया.

एक दिन वही दलाल अनिल के घर आया जिस ने मंजू से उस की शादी करवाई थी. रीना को देखते ही उस की मां से बोला, ‘‘क्या कीमत लगाओगे लड़की की? किसी को जरूरत हो तो बताना पड़ेगा न?’’

‘‘मेरी बहन किसी की खरीदी हुई दुलहन नहीं बनेगी,’’ मंजू ने फुंफकारते हुए कहा.

‘‘खरीदी हुई दुलहन, बड़ी जल्दी पर निकल आए. अपनी शादी का किस्सा भूल गई क्या?’’ दलाल ने मंजू पर ताना कसते हुए मुंह बनाया.

‘‘मेरी बात और थी. मैं तो बिना सहारे की बेल थी जिसे किसी न किसी पेड़ से लिपटना ही था. मगर रीना के साथ ऐसा नहीं है. देर आए दुरुस्त आए. कुदरत ने उसे अनिल के रूप मे सिर पर छत दे दी है और पांवों के नीचे जमीन भी. अभी मैं जिंदा हूं और अपनी बहन की शादी कैसे करनी है, यह हम खुद तय कर लेंगे. आप जा सकते हैं. लेकिन हां, अनिल को मेरी जिंदगी में लाने के लिए मैं सदा आप की कर्जदार रहूंगी, धन्यवाद,’’ मंजू ने दलाल से हाथ जोड़ते हुए आभार जताया. वहीं पीछे खड़ा अनिल मुसकरा रहा था. आज उस के दिल में मंजू के लिए प्यार के साथसाथ इज्जत भी बढ़ गई थी. Social Story 

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