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Hindi Story: तुम्हीं ने दर्द दिया है- चारू हुई एड्स से पीड़ित

Hindi Story: उस दिन मैं टेलीविजन के सामने बैठी अपनी 14 साल की बेटी के फ्राक में बटन लगा रही थी. पति एक हाथ में चाय का गिलास लिए अपना मनपसंद धारावाहिक देखने में व्यस्त थे. तभी दरवाजे पर घंटी बजी और मैं उठ कर बाहर आ गई.

दरवाजा खोला तो सामने मकानमालिक वर्माजी खड़े थे. मैं ने बड़े आदर से उन्हें भीतर बुलाया और अपने पति को आवाज दे कर ड्राइंगरूम में बुला लिया और बड़े विनम्र स्वर में बोली, ‘‘अच्छा, क्या लेंगे आप. चाय या ठंडा?’’

‘‘नहीं, इन सब की तकलीफ मत कीजिए. बस, आप बैठिए, एक जरूरी बात करनी है,’’ वर्माजी बेरुखी से बोले.

मैं अपने पति के साथ जा कर बैठ गई. थोड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी सुबहसुबह कैसे आना हुआ. फिर अपने विचारों को विराम दे कर चेहरे पर बनावटी मुसकान ला कर उन्हें देखने लगी.

‘‘मुझे इस मकान की जरूरत है. आप कहीं और मकान ढूंढ़ लीजिए,’’ उन्होंने एकदम सपाट स्वर में कहा.

‘‘क्या?’’ मेरे पति के मुंह से निकला, ‘‘पर मैं ने तो 11 महीने की लीज पर आप से मकान लिया है. आप इस तरह बीच में छोड़ने के लिए कैसे कह सकते हैं.’’

‘‘सर, मेरी मजबूरी है इसलिए कह रहा हूं. और फिर यह मेरा हक है कि मैं जब चाहे आप से मकान खाली करवा सकता हूं.’’

दोनों के बीच विवाद को बढ़ता देख कर मैं ने बेहद विनम्र स्वर में कहा, ‘‘पर ऐसा क्या कारण है भाई साहब जो आप को अचानक इस मकान की जरूरत पड़ गई. हम ने तो हमेशा समय पर किराया दिया है. फिर आप का तो और भी एक मकान है. आप उसे क्यों नहीं खाली करवा लेते.’’

‘‘कारण आप भी जानती हैं. मुझे पहले से पता होता तो आप को कभी भी यह मकान न देता. मेरा 1 महीने का कमीशन और सफेदी कराने में जो पैसा खर्च हुआ, सो अलग.’’

‘‘पर ऐसा क्या किया है हम ने?’’ मैं चौंक गई.

‘‘कारण आप की बेटी है और उस की बीमारी है. पिछले मकान से भी आप को इसलिए निकाला गया क्योंकि आप की बेटी को एड्स है और ऐसी घातक बीमारी के मरीज को मैं अपने घर में नहीं रख सकता. फिर कालोनी के कई लोगों को भी एतराज है.’’‘‘भाई साहब, यह बीमारी कोई संक्रामक रोग तो है नहीं और न ही छुआछूत से फैलती है. यह तो हर जगह साबित हो चुका है और फिर हम दोनों में से यह किसी को भी नहीं है.’’

‘‘यह सब न मैं सुनना चाहता हूं और  न ही पासपड़ोस के लोग. अधिक पैसा कमाने की होड़ में आप लोग जरा भी नहीं समझते कि बच्चे किस तरफ जा रहे हैं. किन से मिलते हैं. बाहर क्याक्या गुल खिलाते हैं.’’

‘‘वर्माजी,’’ मेरे पति चीख पड़े, ‘‘आप के मुंह में जो आए कहते चले जा रहे हैं. आप को मकान खाली चाहिए मिल जाएगा पर इस तरह के अपशब्द और लांछन मुंह से मत निकालिए.’’

‘‘10 दिन बाद मकान की चाबियां लेने आऊंगा,’’ कह कर वर्माजी उठ कर चले गए.

उन के जाते ही मैं निढाल हो कर सोफे पर पसर गई. तभी भीतर से चारू आई और मुझ से आ कर लता की तरह लिपट कर रोने लगी. मेरे पति मेरे पास आ कर बैठ गए. कुछ कहतेकहते उन की  आवाज टूट गई, चेहरा पीला पड़ गया मानो वही दोषी हों.

अतीत चलचित्र सा मानसपटल पर तैरने लगा और एक के बाद एक कितनी ही घटनाएं उभरती चली गईं,

मैं उस दिन किटी पार्टी से लौटी ही थी कि फोन की घंटी बजने लगी. फोन चारू के स्कूल से उस की क्लास टीचर का था. मेरे फोन उठाते ही वह हांफती हुई बोलीं, ‘आप चारू की मम्मी बोल रही हैं.’

मेरे ‘हां’ कहने पर वह बिना रुके बोलती चली गईं, ‘कहां थीं आप अब तक. मैं तो काफी समय से आप को फोन मिला रही हूं. आप के पति भी अपने आफिस में नहीं हैं.’

‘क्यों, क्या हुआ?’ मैं थोड़ा घबरा गई.

‘चारू सीढि़यों से फिसल कर नीचे गिर गई थी. काफी खून बह गया है. हम ने फौरन उसे फर्स्ट एड दे दी है. अब वह ठीक है. आप उसे यहां से ले जाइए,’ वह एक ही सांस में बोल गईं.

मैं ने बिना देर किए आटो किया और चारू के स्कूल पहुंच गई. वह मेडिकल रूम में लेटी थी और मुझे देख कर थोड़ा सुबकने लगी. मैं ने झट से उसे सीने से लगाया. तब तक वहां पर बैठी एक टीचर ने बताया कि आज हमारी नर्स छुट्टी पर थी. इसलिए पास के क्लीनिक से उस को मरहमपट्टी करवा दी है तथा एक पेनकिलर इंजेक्शन भी दिया है. मैं उसे थोड़ा सहारा दे कर घर ले आई. 1-2 दिन में चारू पूरी तरह ठीक हो गई और स्कूल जाने लगी.

इस बात को कई महीने हो गए. एक दिन सुबहसुबह मेरे पति ने बताया कि प्रगति मैदान में पुस्तक मेला चल रहा है. मैं भी जाने को तैयार हो गई पर चारू थोड़ा मुंह बनाने लगी.

‘ममा, वहां बहुत चलना पड़ता है. मैं घर पर ही ठीक हूं.’

‘क्यों बेटा, वहां तो तुम्हारी रुचि की कई पुस्तकें होंगी. तुम्हें तो किताबों से काफी लगाव है. खुद चल कर

अपनी पसंद की पुस्तकें ले लो,’ मेरे पति बोले.

‘नहीं पापा, मेरा मन नहीं है,’ कह कर वह बैठ गई, ‘अच्छा, आप मेरे लिए कामिक्स ले आना और इंगलिश हैंडराइटिंग की कापी भी. टीचर कहती हैं मेरी हैंडराइटिंग आजकल इतनी साफ नहीं है.’

‘क्यों तबीयत ठीक नहीं है क्या?’ मैं ने उस को अलग कमरे में ले जा कर पूछा. मुझे लगा कहीं उस के पीरियड्स न होने वाले हों, शायद इसीलिए वह थोड़ा जाने के लिए आनाकानी कर रही हो.

पति ने थोड़ा जोर से कहा, ‘नहीं बेटा, तुम को साथ ही चलना पड़ेगा. मैं ऐसे तुम को घर पर अकेला नहीं छोड़ सकता.’

वह अनमने मन से तैयार हो गई. पर मैं ने महसूस किया कि वह मेले में जल्दी ही बैठने की जिद करने लगती. फिर उसे एक तरफ बिठा कर हम लोग घूमने चले गए.

घर आतेआते वह फिर से एकदम निढाल हो गई. अगले दिन स्कूल की छुट्टी थी. मैं उसे ले कर डाक्टर के पास गई. उस ने थोड़े से टेस्ट लिख दिए जो 1-2 दिन में कराने थे. 2 दिन बाद फिर से ब्लड टेस्ट के लिए खून लिया चारू का.

अगले दिन सुबहसुबह डाक्टर का फोन आ गया और मुझे फौरन अस्पताल में बुलाया. पति तब आफिस जाने वाले थे. उन की कोई जरूरी मीटिंग थी. मैं ने कहा कि 12 बजे के बाद मैं आ कर मिल लेती हूं. पर वह बड़े सख्त लहजे में बोलीं कि आप दोनों ही फौरन अभी मिलिए. मैं थोड़़ा बिफर सी गई कि ऐसा भी क्या है कि अभी मिलना पड़ेगा पर वह नहीं मानीं.

हमारे पहुंचते ही डाक्टर बोलीं, ‘मुझे आप दोनों का ब्लड टेस्ट करना पड़ेगा.’

‘हम दोनों का?’ मैं एकदम मुंह बना कर बोली.

‘मैं ने आप की बेटी का 2 बार ब्लड टेस्ट किया है. मुझे बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि उसे एड्स है.’

‘क्या?’ हम दोनों ही चौंक गए. मेरी सांसें तेज होती गईं और छाती जोरजोर से धड़कने लगी. मैं ने अविश्वास से डाक्टर की तरफ देख कर कहा, ‘आप ने सब टेस्ट ठीक से तो देखे हैं, ऐसा कैसे हो सकता है?’

‘ऐसा ही है. अब देखना यह है कि यह बीमारी कहीं आप दोनों में तो नहीं है.’

मेरे तो प्राण ही सूख गए. मुझे स्वयं पर भरोसा था और अपने पति पर भी. फिर भी एक बार के लिए मेरा विश्वास डोल गया. यह सब कैसे हो गया था. हमारा ब्लड ले लिया गया. लगा जैसे सबकुछ खत्म हो गया है. मेरे पति उस दिन आफिस नहीं गए और न ही मेरा मन किसी काम में लगा.

दूसरे दिन हम दोनों की रिपोर्ट आ गई और रिपोर्ट निगेटिव थी. मैं ने डाक्टर को चारू के बारे में सबकुछ बताया और आश्वासन दिलाया कि उस के साथ कहीं कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ.

बातोंबातों में डाक्टर ने एकएक कर के बहुत सारे प्रश्न पूछे. तभी अचानक मुझे याद आया कि जब वह स्कूल में सीढि़यों से नीचे गिरी थी तो बाहर से एक इंजेक्शन लगवाया था. डाक्टर की आंखें फैल गईं.

‘आप के पास उस के ट्रीटमेंट और इंजेक्शन की परची है?’

‘ऐसा तो मुझे स्कूल वालों ने कुछ नहीं दिया पर एक टीचर कह रही थी कि उसे इंजेक्शन दिया था और इस बात की पुष्टि चारू ने भी की थी.’

हम लोग उसी क्षण स्कूल में जा कर प्रिंसिपल से मिले और अपनी सारी व्यथा सुनाई.

प्रिंसिपल पहले तो बड़े मनोयोग से सारी बातें सुनती रहीं फिर थोड़ी देर के लिए उठ कर चली गईं. उन के वापस आते ही मेरे पति ने कहा कि यदि आप उस टीचर को किसी तरह बुला दें जो चारू को क्लीनिक में ले कर गई थी तो हमें कारण ढूंढ़ने में आसानी होगी. कम से कम हम उस पर कोई कानूनी काररवाई तोकर सकते हैं.

‘क्या आप को उस का नाम मालूम है?’ वह बड़े ही रूखे स्वर में बोलीं.

चारू उस समय हमारी साथ थी पर वह इस बात का कोई ठीक से उत्तर नहीं दे सकी. इस पर प्रिंसिपल ने बड़ी लापरवाही से उत्तर दिया कि मैं मामले की छानबीन कर के आप को बता दूंगी.

मेरे पति आपे से बाहर हो गए. उन की खीज बढ़ती गई और धैर्य चुकता गया.

‘हमारे साथ इतना बड़ा हादसा हो गया और हम किस मानसिक दौर से गुजर रहे हैं, इस बात का अंदाजा है आप को. एक तो आप के स्कूल में उस दिन नर्स नहीं थी, उस पर जो उपचार बच्ची को दिया गया उस का भी आप के पास ब्योरा नहीं है. आप सबकुछ कर सकती हैं पर आप कुछ करना नहीं चाहती हैं. इसीलिए कि आप का स्कूल बदनाम न हो जाए. मैं एकएक को देख लूंगा.’

‘आप को जो करना है कीजिए, पर इस तरह चिल्ला कर स्कूल की शांति भंग मत कीजिए,’ वह लगभग खड़े होते हुए बोलीं.

दोषियों को दंड दिलवाने की इच्छा भी बेकार साबित हुई. चारू की रिपोर्ट से हम ने थोड़ेबहुत हाथपैर मारे पर सुबूतों के अभाव में दोषी डाक्टर एवं उस का स्टाफ बिना किसी बाधा के साफ बच कर निकल गया और जो हमारी बदनामी हुई, वह अलग.

हां, यदि प्रिंसिपल चाहती तो उन को सजा हो सकती थी पर वह क्लीनिक तो चलता ही प्रिंसिपल के इशारे पर था. स्कूल में प्रवेश से पहले सभी विद्यार्थियों को एक सामान्य हेल्थ चेकअप एवं सर्टिफिकेट की जरूरत होती थी जो वहीं से मिल सकता था.

चारू को एड्स होने की बात दावानल की भांति शहर भर में फैल गई. हम लोगों को हेय नजरों से देखा जाने लगा. चारू की स्कूल में भी हालत लगभग ऐसी ही थी.

सरकार के सारे बयान कि एड्स कोई छुआछूत की बीमारी नहीं है व छूने से एड्स नहीं फैलता, लगभग खोखले हो चुके थे. मेरे घर पर भी कालोनी वालों का आना लगभग न के बराबर हो गया. किटी पार्टी छूट गई. बरतन मांजने वाली भी काम से किनारा कर गई. हम लोग उपेक्षित एवं दयनीय से हो कर रह गए थे. हम सुबह से शाम तक 20 बार जीते 20 बार मरते.

यह जानते हुए भी कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है फिर भी अपने मन को समझाने के लिए जिस ने जो बताया मैं ने कर डाला. जिस का असर मेरे तनमन पर यह पड़ा कि मैं खुद को बीमार जैसा अनुभव करने लगी थी. यह जिंदगी तो मौत से भी कहीं ज्यादा कष्ट- दायक थी.

एक दिन चारू रोती हुई स्कूल से आई और कहने लगी कि क्लास टीचर ने उसे सब से अलग और पीछे बैठने के लिए कह दिया है. कहा ही नहीं, अलग से इस बात की व्यवस्था भी कर दी है. मेरा दिल भीतर तक दहल गया. इस छोटे से दिल के टुकड़े को जीतेजी अलग कैसे कर दूं. वह बिलखती रही और मैं चुपचाप तिलतिल सुलगती रही.

मैं ने वह स्कूल और घर छोड़ दिया तथा इस नई कालोनी में घर ले लिया और पास ही के स्कूल में चारू को एडमिशन दिलवा दिया, यही सोच कर कि जब तक यह स्कूल जा सकती है जाए. उस का मन लगा रहेगा. पर यहां भी हम से पहले हमारा अतीत पहुंच गया.

अचानक पति के कहे शब्दों से मेरी तंद्रा टूटी और मैं वर्तमान में आ गई.

हमें 10 दिन के भीतर मकान खाली करना है यह सोच कर हम फिर से परेशान हो उठे. जैसेजैसे समय बीतता जा रहा था हमारी चिंता और बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी.

एक दिन सुबहसुबह दरवाजे की घंटी बजी तो मैं परेशान हो उठी. मुझे दरवाजे और टेलीफोन की घंटियों से अब डर लगने लगा था. मैं ने दरवाजा खोला. सामने एक बेहद स्मार्ट सा व्यक्ति खड़ा था. उस ने मेरे पति से मिलने की इच्छा जाहिर की. मैं बड़े सत्कार से उसे भीतर ले आई. मेरे पति के आते ही वह खड़ा हो गया. फिर बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मैं डा. चौहान हूं, चाइल्ड स्पेशलिस्ट. आप ने शायद मुझे पहचाना नहीं.’’

‘‘मैं आप को कैसे भूल सकता हूं,’’ सकते में खड़े मेरे पति बोले, ‘‘आप की वजह से तो मेरी यह हालत हुई है. आप के क्लीनिक के इंजेक्शन की वजह से तो मेरी बच्ची को एड्स हो गया. अदालत से भी आप साफ छूट गए. अब क्या लेने आए हैं यहां? एक मेहरबानी हम पर और कीजिए कि हम तीनों को जहर दे दीजिए.’’

‘‘सर, आप मेरी बात तो सुनिए. आप जितनी चाहे बददुआएं मुझे दीजिए, मैं इसी का हकदार हूं. जो गलती मेरे क्लीनिक से हुई है उस के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं. मेरी ही लापरवाही से यह सबकुछ हुआ है. कोर्ट ने मुझे बेशक छोड़ दिया पर आप का असली गुनहगार मैं हूं. और यह एक बोझ ले कर मैं हर पल जी रहा हूं,’’ और हाथ जोड़ कर वह मेरी ओर देखने लगा. स्वर पछतावे से भरा प्रतीत हुआ.

‘‘मैं ने इस शहर को छोड़ कर पास के शहर में अपना नया क्लीनिक खोल लिया है. इनसान दुनिया से तो भाग सकता है पर अपनेआप से नहीं. मैं मानता हूं कि मेरा अपराध अक्षम्य है पर फिर भी मुझे प्रायश्चित्त करने का मौका दीजिए.

‘‘मैं अपने सूत्रों से हमेशा आप के परिवार पर नजर तो रखता रहा पर यहां तक आने और माफी मांगने की हिम्मत नहीं जुटा सका. अभी कल ही मुझे पता चला कि आप पर फिर से मकान का संकट आ पड़ा है तो मैं यहां तक आने की हिम्मत कर सका हूं.

‘‘मैं जहां रहता हूं वहीं नीचे मेरा क्लीनिक है. मैं चाहता हूं कि आप लोग मेरे साथ चल कर मेरे मकान में रहिए. मुझे आप से कोई किराया नहीं चाहिए बल्कि आप की चारू का उपचार मेरी देखरेख में चलता रहेगा. मुझे एक बड़ी खुशी यह होगी कि मेरे लिए आप लोगों की सेवा का मौका मिलेगा,’’ कहतेकहते वह मेरे चरणों में गिर पड़ा. उस का स्वर जरूरत से ज्यादा कोमल एवं सहानुभूति भरा था.

मुझे समझ में नहीं आया कि मैं क्या करूं. उस का स्वर भारी और आंखें नम थीं. उस के यह क्षण मुझे कहीं भीतर तक छू गए. अचानक मां के स्वर याद आ गए, ‘अतीत कड़वा हो या मीठा, उसे भुलाने में ही हित है.’

‘‘मुझे सोचने के लिए समय चाहिए. मैं कल तक आप को उत्तर दूंगी.’’

‘‘मैं कल आप का उत्तर सुनने नहीं बल्कि आप को लेने आ रहा हूं. मेरा आप का कोई खून का रिश्ता तो नहीं पर अपना अपराधी समझ कर ही मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लीजिए,’’ कहते- कहते उस का गला भर गया और आंसू छलक आए.

उस के इन शब्दों में आत्मीयता और अधिकार के भाव थे. आंखें क्षमायाचना कर रही थीं. Hindi Story.

Hindi Family Story: दो भूत- अंदर पहुंचकर उर्मिला ने क्या किया?

Hindi Family Story: मेरी निगाह कलैंडर की ओर गई तो मैं एकदम चौंक पड़ी…तो आज 10 तारीख है. उर्मिल से मिले पूरा एक महीना हो गया है. कहां तो हफ्ते में जब तक चार बार एकदूसरे से नहीं मिल लेती थीं, चैन ही नहीं पड़ता था, कहां इस बार पूरा एक महीना बीत गया.

घड़ी पर निगाह दौड़ाई तो देखा कि अभी 11 ही बजे हैं और आज तो पति भी दफ्तर से देर से लौटेंगे. सोचा क्यों न आज उर्मिल के यहां ही हो आऊं. अगर वह तैयार हो तो बाजार जा कर कुछ खरीदारी भी कर ली जाए. बाजार उर्मिल के घर से पास ही है. बस, यह सोच कर मैं घर में ताला लगा कर चल पड़ी.

उर्मिल के यहां पहुंच कर घंटी बजाई तो दरवाजा उसी ने खोला. मुझे देखते ही वह मेरे गले से लिपट गई और शिकायतभरे लहजे में बोली, ‘‘तुझे इतने दिनों बाद मेरी सुध आई?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘मैं तो आखिर चली भी आई पर तू तो जैसे मुझे भूल ही गई.’’

‘‘तुम तो मेरी मजबूरियां जानती ही हो.’’

‘‘अच्छा भई, छोड़ इस किस्से को. अब क्या बाहर ही खड़ा रखेगी?’’

‘‘खड़ा तो रखती, पर खैर, अब आ गई है तो आ बैठ.’’

‘‘अच्छा, क्या पिएगी, चाय या कौफी?’’ उस ने कमरे में पहुंच कर कहा.

‘‘कुछ भी पिला दे. तेरे हाथ की तो दोनों ही चीजें मुझे पसंद हैं.’’

‘‘बहूरानी, कौन आया है?’’ तभी अंदर से आवाज आई.

‘‘उर्मिल, कौन है अंदर? अम्माजी आई हुई हैं क्या? फिर मैं उन के ही पास चल कर बैठती हूं. तू अपनी चाय या कौफी वहीं ले आना.’’

अंदर पहुंच कर मैं ने अम्माजी को प्रणाम किया और पूछा, ‘‘तबीयत कैसी है अब आप की?’’

‘‘बस, तबीयत तो ऐसी ही चलती रहती है, चक्कर आते हैं. भूख नहीं लगती.’’

‘‘डाक्टर क्या कहते हैं?’’

‘‘डाक्टर क्या कहेंगे. कहते हैं आप दवाएं बहुत खाती हैं. आप को कोई बीमारी नहीं है. तुम्हीं देखो अब रमा, दवाओं के बल पर तो चल भी रही हूं, नहीं तो पलंग से ही लग जाती,’’ यह कह कर वे सेब काटने लगीं.

‘‘सेब काटते हुए आप का हाथ कांप रहा है. लाइए, मैं काट दूं.’

‘‘नहीं, मैं ही काट लूंगी. रोज ही काटती हूं.’’

‘‘क्यों, क्या उर्मिल काट कर नहीं देती?’’

‘‘तभी उर्मिल ट्रे में चाय व कुछ नमकीन ले कर आ गई और बोली, ‘‘यह उर्मिल का नाम क्यों लिया जा रहा था?’’

‘‘उर्मिल, यह क्या बात है? अम्माजी का हाथ कांप रहा है और तुम इन्हें एक सेब भी काट कर नहीं दे सकतीं?’’

‘‘रमा, तू चाय पी चुपचाप. अम्माजी ने एक सेब काट लिया तो क्या हो गया.’’

‘‘हांहां, बहू, मैं ही काट लूंगी. तुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है,’’ तनाव के कारण अम्माजी की सांस फूल गई थी.

मैं उर्मिल को दूसरे कमरे में ले गई और बोली, ‘‘उर्मिल, तुझे क्या हो गया है?’’

‘‘छोड़ भी इस किस्से को? जल्दी चाय खत्म कर, फिर बाजार चलें,’’ उर्मिल हंसती हुई बोली.

मैं ठगी सी उसे देखती रह गई. क्या यह वही उर्मिल है जो 2 वर्ष पूर्व रातदिन सास का खयाल रखती थी, उन का एकएक काम करती थी, एकएक चीज उन को पलंग पर हाथ में थमाती थी. अगर कभी अम्माजी कहतीं भी, ‘अरी बहू, थोड़ा काम मुझे भी करने दिया कर,’ तो हंस कर कहती, ‘नहीं, अम्माजी, मैं किस लिए हूं? आप के तो अब आराम करने के दिन हैं.’

तभी उर्मिल ने मुझे झिंझोड़ दिया, ‘‘अरे, कहां खो गई तू? चल, अब चलें.’’

‘‘हां.’’

‘‘और हां, तू खाना भी यहां खाना. अम्माजी बना लेंगी.’’

मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, ‘‘उर्मिल, तुझे हो क्या गया है?’’

‘‘कुछ नहीं, अम्माजी बना लेंगी. इस में बुरा क्या है?’’

‘‘नहीं, उर्मिल, चल दोनों मिल कर सब्जीदाल बना लेते हैं और अम्माजी के लिए रोटियां भी बना कर रख देते हैं. जरा सी देर में खाना बन जाएगा.’’‘‘सब्जी बन गई है, दालरोटी अम्माजी बना लेंगी, जब उन्हें खानी होगी.’’

‘‘हांहां, मैं बना लूंगी. तुम दोनों जाओ,’’ अम्माजी भी वहीं आ गई थीं.

‘‘पर अम्माजी, आप की तबीयत ठीक नहीं लग रही है, हाथ भी कांप रहे हैं,’’ मैं किसी भी प्रकार अपने मन को नहीं समझा पा रही थी.

‘‘बेटी, अब पहले का समय तो रहा नहीं जब सासें राज करती थीं. बस, पलंग पर बैठना और हुक्म चलाना. बहुएं आगेपीछे चक्कर लगाती थीं. अब तो इस का काम न करूं तो दोवक्त का खाना भी न मिले,’’ अम्माजी एक लंबी सांस ले कर बोलीं.

‘‘अरे, अब चल भी, रमा. अम्माजी, मैं ने कुकर में दाल डाल दी है. आटा भी तैयार कर के रख दिया है.’’

बाजार जाते समय मेरे विचार फिर अतीत में दौड़ने लगे. बैंक उर्मिल के घर के पास ही था. एक सुबह अम्माजी ने कहा, ‘मैं बैंक जा कर रुपए जमा कर ले आती हूं.’

‘नहीं अम्माजी, आप कहां जाएंगी, मैं चली जाऊंगी,’ उर्मिल ने कहा था.

‘नहीं, तुम कहां जाओगी? अभी तो अस्पताल जा रही हो.’

‘कोई बात नहीं, अस्पताल का काम कर के चली जाऊंगी.’

और फिर उर्मिल ने अम्माजी को नहीं जाने दिया था. पहले वह अस्पताल गई जो दूसरी ओर था और फिर बैंक. भागतीदौड़ती सारा काम कर के लौटी तो उस की सांस फूल आई थी. पर उर्मिल न जाने किस मिट्टी की बनी हुई थी कि कभी खीझ या थकान के चिह्न उस के चेहरे पर आते ही न थे.

उर्मिल की भागदौड़ देख कर एक दिन जीजाजी ने भी कहा था,

‘भई, थोड़ा काम मां को भी कर लेने दिया करो. सारा दिन बैठे रहने से तो उन की तबीयत और खराब होगी और खाली रहने से तबीयत ऊबेगी भी.’

इस पर उर्मिल उन से झगड़ पड़ी थी, ‘आप भी क्या बात करते हैं? अब इन की कोई उम्र है काम करने की? अब तो इन से तभी काम लेना चाहिए जब हमारे लिए मजबूरी हो.’

बेचारे जीजाजी चुप हो गए थे और फिर कभी सासबहू के बीच में नहीं बोले.  मैं इन्हीं विचारों में खोई थी कि उर्मिल ने कहा, ‘‘लो, बाजार आ गया.’’ यह सुन कर मैं विचारों से बाहर आई.

बाजार में हम दोनों ने मिल कर खरीदारी की. सूरज सिर पर चढ़ आया था. पसीने की बूंदें माथे पर झलक आई थीं. दोनों आटो कर के घर पहुंचीं. अम्माजी ने सारा खाना तैयार कर के मेज पर लगा रखा था. 2 थालियां भी लगा रखी थीं. मेरा दिल भर आया.

अम्माजी बोलीं, ‘‘तुम लोग हाथ धो कर खाना खा लो. बहुत देर हो गई है.’’

‘‘अम्माजी, आप?’’  मैं ने कहा.

‘‘मैं ने खा लिया है. तुम लोग खाओ, मैं गरमगरम रोटियां सेंक कर लाती हूं.’’

मैं अम्माजी के स्नेहभरे चेहरे को देखती रही और खाना खाती रही. पता नहीं अम्माजी की गरम रोटियों के कारण या भूख बहुत लग आने के कारण खाना बहुत स्वादिष्ठ लगा. खाना खा कर अम्माजी को स्वादिष्ठ खाने के लिए धन्यवाद दे कर मैं अपने घर लौट आई.

कुछ दिनों बाद एक दिन जब मैं उर्मिल के घर पहुंची तो दरवाजा थोड़ा सा खुला था. मैं धीरे से अंदर घुसी और उर्मिल को आवाज लगाने ही वाली थी कि उस की व अम्माजी की मिलीजुली आवाज सुन कर चौंक पड़ी. मैं वहीं ओट में खड़ी हो कर सुनने लगी.

‘‘सुनो, बहू, तुम्हारी लेडीज क्लब की मीटिंग तो मंगलवार को ही हुआ करती है न? तू बहुत दिनों से उस में गई नहीं.’’

‘‘पर समय ही कहां मिलता है, अम्माजी?’’

‘‘तो ऐसा कर, तू आज हो आ. आज भी मंगलवार ही है न?’’

‘‘हां, अम्माजी, पर मैं न जा सकूंगी. अभी तो काम पड़ा है. खाना भी बनाना है.’’

‘‘उस की चिंता न कर. मुझे बता दे, क्याक्या बनेगा.’’

‘‘अम्माजी, आप सारा खाना कैसे बना पाएंगी? वैसे ही आप की तबीयत ठीक नहीं रहती है.’’

‘‘बहू, तू क्या मुझे हमेशा बुढि़या और बीमार ही बनाए रखेगी?’’

‘‘अम्माजी मैं…मैं…तो…’’

‘‘हां, तू. मुझे इधर कई दिनों से लग रहा है कि कुछ न करना ही मेरी सब से बड़ी बीमारी है, और सारे दिन पड़ेपड़े कुढ़ना मेरा बुढ़ापा. जब मैं कुछ काम में लग जाती हूं तो मुझे लगता है मेरी बीमारी ठीक हो गई है और बुढ़ापा कोसों दूर चला गया है.’’

‘‘अम्माजी, यह आप कह रही हैं?’’ उर्मिल को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ.

‘‘हां, मैं. इधर कुछ दिनों से तू ने देखा नहीं कि मेरी तबीयत कितनी सुधर गई है. तू चिंता न कर. मैं बिलकुल ठीक हूं. तुझे जहां जाना है जा. आज शाम को सुधीर के साथ किसी पार्टी में भी जाना है न? मेरी वजह से कार्यक्रम स्थगित मत करना. यहां का सब काम मैं देख लूंगी.’’

‘‘ओह अम्माजी,’’  उर्मिल अम्माजी से लिपट गई और रो पड़ी.

‘‘यह क्या, पगली, रोती क्यों है?’’ अम्माजी ने उसे थपथपाते हुए कहा.

‘‘अम्माजी, मेरे कान कब से यह सुनने को तरस रहे थे कि आप बूढ़ी नहीं हैं और काम कर सकती हैं. मैं ने इस बीच आप से जो कठोर व्यवहार किया, उस के लिए क्षमा चाहती हूं.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. चल जा, जल्दी उठ. क्लब की मीटिंग का समय हो रहा है.’’

‘‘अम्माजी, अब तो नहीं जाऊंगी आज. हां, आज बाजार हो आती हूं. बच्चों की किताबें और सुधीर के लिए शर्ट लेनी है.’’

‘‘तो बाजार ही हो आ. रमा को भी फोन कर देती तो दोनों मिल कर चली जातीं.’’

‘‘अम्माजी, प्रणाम. आप ने याद किया और रमा हाजिर है.’’

‘‘अरी, तू कब से यहां खड़ी थी?’’

‘‘अभी, बस 2 मिनट पहले आई थी.’’

‘‘तो छिप कर हमारी बातें सुन रही थी, चोर कहीं की.’’

‘‘क्या करती? तुम सासबहू की बातचीत ही इतनी दिलचस्प थी कि अपने को रोकना जरूरी लगा.’’

‘‘तुम दोनों बैठो, मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ अम्माजी रसोई की ओर बढ़ गईं.

मैं अपने को रोक न पाई. उर्मिल से पूछ ही बैठी, ‘‘यह सब क्या हो रहा था? मेरी समझ में तो कुछ नहीं आया. यह माफी कैसी मांगी जा रही थी?’’

‘‘रमा, याद है, उस दिन, तू मुझ से बारबार मेरे बदले हुए व्यवहार का कारण पूछ रही थी. बात यह है रमा, अम्माजी के सिर पर दो भूत सवार थे. उन्हें उतारने के लिए मुझे नाटक करना पड़ा.’’

‘‘दो भूत? नाटक? यह सब क्या है? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा. पहेलियां न बुझा, साफसाफ बता.’’

‘‘बता तो रही हूं, तू उतावली क्यों है? अम्माजी के सिर पर चढ़ा पहला भूत था उन का यह समझ लेना कि बहू आ गई है, उस का कर्तव्य है कि वह प्राणपण से सास की सेवा और देखभाल करे, और सास होने के नाते उन का अधिकार है दिनभर बैठे रहना और हुक्म चलाना. अम्माजी अच्छीभली चलफिर रही होती थीं तो भी अपने इन विचारों के कारण चायदूध का समय होते ही बिस्तर पर जा लेटतीं ताकि मैं सारी चीजें उन्हें बिस्तर पर ही ले जा कर दूं. उन के जूठे बरतन मैं ही उठा कर रखती थी. मेरे द्वारा बरतन उठाते ही वे फिर उठ बैठती थीं और इधरउधर चहलकदमी करने लगती थीं.’’

‘‘अच्छा, दूसरा भूत कौन सा था?’’

‘‘दूसरा भूत था हरदम बीमार रहने का. उन के दिमाग में घुस गया था कि हर समय उन को कुछ न कुछ हुआ रहता है और कोई उन की परवा नहीं करता. डाक्टर भी जाने कैसे लापरवाह हो गए हैं. न जाने कैसी दवाइयां देते हैं, फायदा ही नहीं करतीं.’’

‘‘भई, इस उम्र में कुछ न कुछ तो लगा ही रहता है. अम्माजी दुबली भी तो हो गई हैं,’’ मैं कुछ शिकायती लहजे में बोली.

‘‘मैं इस से कब इनकार करती हूं, पर यह तो प्रकृति का नियम है. उम्र के साथसाथ शक्ति भी कम होती जाती है. मुझे ही देख, कालेज के दिनों में जितनी भागदौड़ कर लेती थी उतनी अब नहीं कर सकती, और जितनी अब कर लेती हूं उतनी कुछ समय बाद न कर सकूंगी. पर इस का यह अर्थ तो नहीं कि हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाऊं,’’ उर्मिल ने मुझे समझाते हुए कहा.

‘‘अम्माजी की सब से बड़ी बीमारी है निष्क्रियता. उन के मस्तिष्क में बैठ गया था कि वे हर समय बीमार रहती हैं, कुछ नहीं कर सकतीं. अगर मैं अम्माजी की इस भावना को बना रहने देती तो मैं उन की सब से बड़ी दुश्मन होती. आदमी कामकाज में लगा रहे तो अपने दुखदर्द भूल जाता है और शरीर में रक्त का संचार बढ़ता है, जिस से वह स्वस्थ अनुभव करता है, और फिर व्यस्त रहने से चिड़चिड़ाता भी नहीं रहता.’’

मुझे अचानक हंसी आ गई. ‘‘ले भई, तू ने तो डाक्टरी, फिलौसफी सब झाड़ डाली.’’

‘‘तू चाहे जो कह ले, असली बात तो यही है. अम्माजी को अपने दो भूतों के दायरे से निकालने का एक ही उपाय था कि…’’

‘‘तू उन की अवहेलना करे, उन्हें गुस्सा दिलाए जिस से चिढ़ कर वे काम करें और अपनी शक्ति को पहचानें. यही न?’’  मैं ने वाक्य पूरा कर दिया.

‘‘हां, तू ने ठीक समझा. य-पि गुस्सा और उत्तेजना शरीर और हृदय के लिए हानिकारक समझे जाते हैं पर कभीकभी इन का होना भी मनुष्य के रक्तसंचार को गति देने के लिए आवश्यक है. एकदम ठंडे मनुष्य का तो रक्त भी ठंडा हो जाता है. बस, यही सोच कर मैं अम्माजी को जानबूझ कर उत्तेजित करती थी.’’

‘‘कहती तो तू ठीक है.’’

‘‘तू मेरे नानाजी से तो मिली है न?’’

‘‘हां, शादी से पहले मिली थी एक बार.’’

‘‘जानती है, कुछ दिनों में वे 95 वर्ष के हो जाएंगे. आज भी वे कचहरी जाते हैं. जितना कर पाते हैं, काम करते हैं. कई बार रातरातभर अध्ययन भी करते हैं. अब भी दोनों समय घूमने जाते हैं.’’

‘‘इस उम्र में भी?’’  मुझे आश्चर्य हो रहा था.

‘‘हां, उन की व्यस्तता ही आज भी उन्हें चुस्त रखे हुए है. भले ही वे बीमार से रहते हैं, फिर भी उन्होंने उम्र से हार नहीं मानी है.’’

मैं ने आंख भर कर अपनी इस सहेली को देखा जिस की हर टेढ़ी बात में भी कोई न कोई अच्छी बात छिपी रहती है. ‘‘अच्छा एक बात तो बता, क्या जीजाजी को पता था? उन्हें अपनी मां के प्रति तेरा यह रूखा व्यवहार चुभा नहीं?’’

‘‘उन्होंने एकदो बार कहा, पर मैं ने उन्हें यह कह कर चुप करा दिया कि यह सासबहू का मामला है, आप बीच में न ही बोलें तो अच्छा है.’’

मैं चाय पीते समय कभी हर्ष और आत्मसंतोष से दमकते अम्माजी के चेहरे को देख रही थी, कभी उर्मिल को. आज फिर एक बार उस का बदला रूप देख कर पिछले माह की उर्मिल से तालमेल बैठाने का प्रयत्न कर रही थी. Hindi Family Story.

Best Family Story in Hindi: राशिफल का चक्कर- निर्मला चाची ने क्या तर्क प्रस्तुत किया?

Best Family Story in Hindi: आशु तोषी और सुधीर से कह रही थी, ‘‘मैं ने पिछले सप्ताह अपने राशिफल में पढ़ा था कि किसी नजदीकी रिश्तेदार से अचानक भेंट होगी और उसी शाम को मामाजी आ गए.’’ तभी रोमा और अलका ने प्रवेश किया और वे भी उन की बातचीत में शामिल हो गईं. सुधीर बोला, ‘‘ऐसा एक बार मेरे साथ भी हुआ था. मेरे राशिफल में लिखा था कि कोई अच्छा समाचार मिलने की संभावना है और उसी दिन मेरे बड़े भैया की नौकरी का बुलावा आ गया. मुझे लगता है कि राशिफल में कुछ तो सचाई होती ही है.’’

अलका ने कहा, ‘‘आशु भैया, मामाजी को तो आना ही था. उन्होंने अपने पत्र में लिखा था कि वे अगले महीने आ रहे हैं. सुधीर, तुम्हारी बात भी तर्कयुक्त नहीं है. राशिफल तुम ने अपना देखा और नियुक्तिपत्र तुम्हारे बड़े भाई का आया.’’

रोमा, जो अभी तक सिर्फ सुन रही थी. बोली, ‘‘यह तो संयोगवश भी हो सकता है कि किसी दिन का राशिफल उस दिन की घटना से मेल खा जाए, तब हम उसे याद रख लेते हैं, लेकिन 10 में से 8 दिन की जो बातें गलत निकलती हैं, उन्हें हम भुला देते हैं.’’ तोषी ने आशु का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘मेरा तो राशिफल में बहुत विश्वास है. मैं तो हर दिन राशिफल अवश्य देखता हूं. यह कई बार सही भी निकलता है.’’

अभी उन की बातें चल ही रही थीं कि निर्मला चाची आ गईं. अलका ने उन से पूछा, ‘‘चाचीजी, राशिफल के बारे में आप की क्या राय है?’’ ‘‘मैं राशिफल नहीं देखती. एक दिन सभी अपनाअपना राशिफल देख रहे थे. मुझ से भी रमा ने मेरी राशि पूछी और मेरा राशिफल सुनाया कि आप को आज अचानक धन लाभ होने की संभावना है. कहीं से अच्छे समाचार भी मिल सकते हैं. स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा,’’ निर्मला चाची ने कहा.

‘‘चाची, फिर क्या सभी बातें सही निकलीं?’’ रोमा ने पूछा.

निर्मला चाची हंसते हुए बोलीं, ‘‘मैं वही तो बता रही हूं. पूरी बात सुनने के बाद राशिफल का चक्कर समझ में आ जाएगा. तुम तो जानती ही हो कि तुम्हारे चाचाजी 10 बजे दफ्तर जाते हैं और 4 बजे लौटते हैं. मैं दोपहर 12 बजे स्कूल जाती हूं और 5 बजे तक लौटती हूं. उस दिन काम की अधिकता के कारण मैं बहुत व्यस्त रही और जल्दीजल्दी काम निबटा कर स्कूल चली गई.

‘‘स्कूल में भी राशिफल की बातें याद आईं तो मैं सोचने लगी कि धनलाभ कहां से हो सकता है? इस की तो कोई संभावना दिखाई नहीं दे रही थी. सोचा, हो सकता है कहीं से कोई अच्छा समाचार मिल जाए. हलकी सी ठंड थी. मैं जल्दी में शौल लाना भूल गई थी. करीब साढ़े 3 बजे बारिश होने लगी जो शाम साढ़े 5 बजे तक नहीं रुकी. ‘‘मैं हलकी बारिश में ही घर पहुंची. तुम्हारे चाचाजी के लौटने में भी किसी मीटिंग के कारण विलंब हो गया था. वह भी मेरे साथ ही ऊपर आए. मैं ने कमरा खोला. वहां बड़ा अजीब दृश्य था. मेरा माथा ठनका. कमरे में कई जगह गंदगी पड़ी थी और 1-2 जगह उलटी भी थी. अंदर वाले कमरे में दूध, दही और घी फैला हुआ था. कुछ फल और बिस्कुट भी बिखरे पड़े थे. फ्रिज का दरवाजा खुला पड़ा था.

‘‘चाचाजी कहने लगे कि मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि यह सब कैसे हुआ. कमरे का ताला तो बंद था.

‘‘मैं जल्दीजल्दी बालटी में पानी भरने लगी. इतने में एक बिल्ली अलमारी के नीचे से निकल कर भागी. अब हम दोनों पूरी बात समझ गए. मैं दोपहर में फ्रिज का दरवाजा ठीक से बंद करना भूल गई थी. बाहर ताला लगाते समय मुझे यह ध्यान ही नहीं रहा कि अंदर बिल्ली बंद हो गई है. नतीजा सामने था. उस ने जो कुछ भी खाया था, सब बाहर निकाल दिया. दूध, दही, घी आदि का जो नुकसान हुआ, उस की कीमत लगभग 200 रुपए थी. गंदगी साफ करने में मुझे काफी परेशानी हुई. ‘‘तभी मेरे मोबाइल की घंटी बजी मेरे देवर का फोन था वह बोला कि मंजू की तबीयत बहुत खराब हो गई है. आप शीघ्र जयपुर आ जाएं. मैं अकेला उसे संभालूं या बच्चों को? ‘‘यह खबर सुनते ही हम चिंतित हो गए. स्कूल से आते समय मैं कुछ भीग गई थी और ठंड के कारण मुझे बुखार भी हो गया था.

अगले दिन तबीयत ठीक न होते हुए भी मुझे जयपुर जाना पड़ा. अब तुम्हीं फैसला कर लो कि राशिफल कैसा रहा? अचानक धन प्राप्ति के स्थान पर मुझे लगभग 200 रुपए का नुकसान हुआ. अच्छा समाचार मिलने के बदले देवरानी की तबीयत खराब होने की खबर आई और स्वास्थ्य ठीक होने की जगह मुझे बुखार हो गया.’’

सभी लड़केलड़कियां समझ गए थे कि राशिफल का चक्कर बेकार होता है. इस के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए. Best Family Story in Hindi.

Best Social Story in Hindi: अक्ल वाली दाढ़- कयामत बन कर कैसे आई दाढ़?

Best Social Story in Hindi: हम बचपन से सुनते-सुनते तंग आ चुके थे कि तुम्हें तो बिलकुल भी अक्ल नहीं है. एक दिन जब हम इस बात से चिढ़ कर रोंआसे से हो गए तो हमारी बुआजी ने हमें बड़े प्यार से समझाया, ‘‘बिटिया, अभी तुम छोटी हो पर जब तुम बड़ी हो जाओगी तब तुम्हारी अक्ल वाली दाढ़ आएगी और तब तुम से कोई यह न कहेगा कि तुम में अक्ल नहीं है.’’ बुआ की बातें सुन कर हमारे चेहरे पर मुसकान आ गई और हम रोना भूल कर खेलने चले गए. अब हम पूरी तरह आश्वस्त थे कि एक न एक दिन हमें भी अक्ल आ ही जाएगी और देखते ही देखते हम बड़े हो गए और इंतजार करने लगे कि अब तो जल्द ही हमें अक्ल वाली दाढ़ आ जाएगी. इस बीच हमारी शादी भी हो गई.

अब ससुराल में भी वही ताने सुनने को मिलते कि तुम्हें तो जरा भी अक्ल नहीं. मां ने कुछ सिखाया नहीं. यही सब सुनते-सुनते वक्त बीतता चला गया पर अक्ल वाली दाढ़ को न आना था न वह आई. अब जब 40वां साल भी पार कर लिया तो हम ने उम्मीद ही छोड़ दी पर एक दिन हमारी चबाने वाली दाढ़ में बहुत तेज दर्द उठा. यह दर्द इतना बेदर्द था कि इस की वजह से हमारे गाल, कान यहां तक कि सिर भी दुखने लगा. हम दर्द से बेहाल गाल पर हाथ धरे आह-उह करते फिर रहे थे. जिस ने भी हमारे दांत के दर्द के बारे में सुना उस ने यही कहा, ‘‘अरे, तुम्हारी अक्ल वाली दाढ़ आ रही होगी. तभी इतना दर्द हो रहा है.’’

हम बड़े खुश हुए कि चलो देर से ही सही पर अब हमें भी अक्ल आ ही जाएगी. पर जब हमारा दर्द के मारे बुरा हाल हुआ तो हम ने सोचा इस से हम बिना अक्ल के ही ठीक थे. डैंटिस्ट के पास गए तो उन्होंने बताया आप की अंतिम वाली दाढ़ कैविटी की वजह से सड़ चुकी है. उसे निकालना होगा. तब हम ने जिज्ञासावश पूछ लिया, ‘‘क्या यह हमारी अक्ल वाली दाढ़ थी?’’

हमारे इस सवाल पर डैंटिस्ट महोदय मुसकराते हुए बोले, ‘‘जी मैम, यह आप की अक्ल वाली दाढ़ ही थी.’’ अब बताइए देर से आई और कब आई यह हमें पता ही नहीं चला और सड़ भी गई. दर्द बरदाश्त करने से तो अच्छा यही था कि हम उसे निकलवा ही दें. डैंटिस्ट ने तीसरे दिन बुलाया था सो हम तीसरे दिन दाढ़ निकलवाने वहां पहुंच गए. वहां दांत के दर्द से पीडि़त और लोग भी बैठे थे, जिन में एक छोटी सी 5 साल की बच्ची भी थी. उस के सामने वाले दूध के दांत में कैविटी थी. वह भी उस दांत को निकलवाने आई थी. हम ने उस से उस का नाम पूछा तो वह कुछ नहीं बोली. बस अपना मुंह थामे बैठी रही.

उस की मम्मी ने बताया कि 3 दिन से दर्द से बेहाल है. पहले तो दांत निकलवाने को तैयार नहीं थी पर जब दर्द ज्यादा होने लगा तो बोली चलो दांत निकलवाने. हमारा नंबर उस बच्ची के पीछे ही था. पहले उसे बुलाया गया और सुन्न करने वाला इंजैक्शन लगाया गया, जिस से उस के पूरे मुंह में सूजन आ गई. अब हमारी बारी थी. वैसे आप को बता दें हम देखने में हट्टेकट्टे जरूर हैं पर हमारा दिल एकदम चूहे जैसा है. खैर, हमें भी इंजैक्शन लगा और 10 मिनट बाद आने को कहा गया. हम मुंह पकड़े वहीं सोफे पर ढेर हो गए.

अभी हमें चकराते हुए 10 मिनट ही बीते थे कि हमें फिर अंदर बुलाया गया और निकाल दी गई हमारी अक्ल वाली दाढ़. जब दाढ़ निकाली तो हमें दर्द का एहसास नहीं हुआ पर डैंटिस्ट ने एक रुई का फाहा हमारी निकली हुई दाढ़ वाली खाली जगह लगा दिया. उस पर लगी दवा का स्वाद इतना गंदा था कि हम ने वहीं उलटी कर दी. इस पर हमें नर्स ने खा जाने वाली नजरों से देखा तो हम गाल पकड़े बाहर आ गए. हमारा छोटा बेटा जो हमारे साथ ही था ने बताया कि डैंटिस्ट अंकल ने कहा है कि 1 घंटे तक रुई नहीं निकालनी है. बड़ी मुश्किल से यह वक्त बीता और फिर हमें आइस्क्रीम खाने को मिली. एक तरफ से सूजे हुए मुंह से आइस्क्रीम खाते हुए हम बड़े फनी से लग रहे थे. बच्चे हमारी मुद्राएं देखदेख कर हंसे जा रहे थे. अब हम ने जो दर्द सहा सो सहा पर यह तो हमारे साथ बड़ी नाइंसाफी हुई न कि जिस अक्ल दाढ़ का सालों इंतजार किया वह आई भी तो कैसी. जो भी हो हम तो आखिर रह गए न वही कमअक्ल के कमअक्ल. Best Social Story in Hindi.

Best Family Story in Hindi: सवेरा होने को है- कोरोना को कैसे दी मात?

Best Family Story in Hindi: कमरे के अंदर पापा दर्द से बेचैन हो रहे थे. बुखार था कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था. मैं एयरकंडीशनर चला कर कमरे को ठंडा करने की कोशिश कर रही थी और फिर गीली पट्टियों से बुखार को काबू करने की कोशिश में लगी हुई थी. बाहर फिर से मनहूस एंबुलेंस का सायरन बज रहा था. ना जाने कोविड नामक राक्षस किस के घर की खुशियों को लील कर गया है आज?

मेरी निराशा अपने चरम पर थी. इतना हताश, इतना बेबस शायद ही कभी मानव ने महसूस किया होगा. सब
अपने ही तो हैं, जो शहर के विभिन्न कोनों में हैं, पर साथ खड़े होने के लिए कोई तैयार नहीं था.

पापा न जाने तेज बुखार में क्या बड़बड़ा रहे थे? जितना सुनने या समझने की कोशिश करती, उतनी ही मेरी अपनी बेचैनी बढ़ रही थी. बारबार मैं घड़ी को
देख रही थी. किसी तरह से ये काली रात बीत जाए. पर पिछले हफ्ते से ना जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि
मानो इस रात की सुबह नहीं है.

पापा का शरीर भट्टी की तरह तप रहा था और औक्सिलेवेल 90 से नीचे जा रहा था. व्हाट्सएप पर बहुत सारे मैसेज थे, कुछ ज्ञानवर्धक तो कुछ हौसला देने वाले और कुछ बस यों ही. फिर खुद के शरीर को जबरदस्ती उठाया और पापा को एक बिसकुट खिलाया और फिर बुखार कम करने की टेबलेट दी.

मन में तरहतरह के बुरे खयाल आ रहे थे, चाह कर भी विश्वास का दीया नहीं जला पा रही थी. किस पर
भरोसा रखूं, इस मुश्किल घड़ी में? समाचार ना सुन कर भी पता था कि बाहर अस्पताल में घर से भी ज्यादा खतरा है. औक्सीजन क्या इतनी महंगी पड़ सकती है कभी, सोचा नहीं था. न गला खराब होता है और न ही
जुकाम पर कोविड वायरस का अंधकार आप के अंदर के इनसान को धीमीधीमे लील जाता है.

मैं खुद इस बीमारी से लड़ रही थी, पर अपने हीरो पापा की लाचारी देखी नहीं जा रही थी. ऐसा लग रहा
था कि वो एक छोटे बच्चे बन गए हों और मैं उन की बूढ़ी, डरपोक मां. कब किस पहर पापा का बुखार कम हुआ, मुझे नहीं पता, पर फिर से यमराज एंबुलेंस के सायरन के झटके से मेरी आंख खुली.

हंसतेखेलते गुप्ता अंकल के दिल स्टेरौइड्स को झेल नहीं पाए और 5 दिन बाद ही संसार को अलविदा कह
कर चले गए. ये यमराज का वाहन गुप्ता अंकल को ले कर जाने के लिए आया था.
इतना सहमा हुआ और इतना विचलित कभी खुद को महसूस नहीं किया था. ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम एक स्वतंत्र देश में रहते हैं. हर छोटी सी दवाई से ले कर औक्सीजन सिलिंडर तक की कालाबाजारी थी.

सोसाइटी में रहने वाले संदीप का ग्रुप में मैसेज था. उस की मम्मी को वेंटिलेटर की आवश्यकता है. वह हाथ जोड़ कर सब से गुहार लगा रहा था. सब उसे हिम्मत और हौसले का ज्ञान बांट रहे थे. परंतु कोई राह नहीं सुझा रहा था. कोई साथ खड़े होने को राजी नहीं था.

2-2 वैक्सीन लगवाने के बावजूद भी लोग अपनों को अकेले जूझते हुए देख रहे थे. कोरोना हो चुका है, मगर फिर भी वो लोग पास आ कर साथ खड़े होने को तैयार नहीं हैं. सब दूर से गीता का ज्ञान दे रहे हैं कि
‘मनुष्य अकेला आया है और अकेले ही जाएगा.’

मगर आज इस नीरव रात में किसी मनुष्य के स्पर्श की चाह करती हुई मैं जारजार बच्चों की तरह रो उठी हूं.
कोई तो एक ढांढ़स भर स्पर्श दे कर बोल दे, ‘सब ठीक हो जाएगा.’

स्पर्श में कितनी ताकत है, यह आज जान पाई हूं. कोई तो हो ऐसा, जो आज इस अंधकार में चाहे दूर से ही मेरी थकी हुई और सहमी हुई कोशिकाओं को स्पर्श के स्पंदन से जीवित और निडर कर दे.

आज इस अंधकार में बैठी हुई उन तमाम लोगों का दर्द समझ पा रही हूं, जिन्हें लोग अछूत समझते हैं. अछूतों
की तरह हम लोग हर रोज इस विषाणु से अकेले लड़ रहे हैं. सारी ताकत, जिंदगी की उमंग और हंसी तो इस
वायरस ने सोख ली है. खून का स्थान अब नफरत ने ले लिया है. इतनी विषैली हो गई हूं अंदर से कि मन करता है, अगर मेरे घर में
हुआ है तो सब के घर में हो. ऊपर वाला उन्हें भी शक्तिशाली होने का मौका दे.

कोई भी सकारात्मक विचार मन में नहीं आ रहा था. चिड़चिड़ापन और अपनों से नाराजगी बढ़ती ही जा रही थी. सबकुछ जान कर भी ना जाने कौन सी तामसिक प्रवृत्ति अंदर ही अंदर बलशाली हो रही थी. अंदर
का अंधकार जीने की प्रेरणा दे रहा था.

कल पापा का स्कैन कराने जाना था. कैसे जाऊं, कैब की स्थिति कोई ठीक नहीं थी. स्कूटर चलाने की स्थिति में मैं नहीं थी.

जब सुबह की पहली किरण खिड़की से अंदर आई, तो बुद्धि के द्वार भी खुले. सोचा, प्रमोद चाचा के बेटे को फोन कर लेती हूं. कितनी बार तो संचित ने कहा था, ‘दीदी बेझिझक बोल दीजिए.’

‘मुझे एक वैक्सीन लग भी चुकी है और कोरोना भी हो चुका है,’ चाय का पानी चढ़ा कर मैं ने संचित को फोन किया, मगर उधर से ऐसे टालमटोल वाला जवाब आया कि खौलते चाय के पानी के साथ मेरा खून भी खौल उठा.

पापा का बुखार थोड़ा कम लग रहा था, जो मेरे लिए राहत की खबर था. मैं पापा को चाय और बादाम पकड़ा रही थी कि पापा खुद से बोल उठे, ‘मृगया, तू भी कोरोना पौजिटिव है. संचित को बोल दे, वो स्कैन करवा देगा.’

‘कितनी बार तो उस ने कहा था.’

मैं ना जाने क्यों भावनात्मक रूप से इतनी कमजोर हो गई थी कि बरतन धोने के शोर में अपनी रुलाई को
दबा रही थी.

‘क्या करूं,’ ये सोचते हुए मैं नाश्ते की तैयारी कर रही थी. 2 आटो वालों के नंबर सेव थे मेरे पास, सोचा, उन की ही मिन्नत कर के देख लूं.

जब बबलू ने फोन उठाया, तो बड़ी मिन्नतों से कहा, ‘भैया मदद कर दोगे क्या, यहीं पास में ही चलना है.’

बबलू ने कहा, ‘दीदी कितनी देर में आना है?’

एक बार मन में आया छुपा लूं कि मैं और पापा दोनों ही कोविड पौजिटिव हैं. एक हफ्ता बीत गया है और फिर
हम दोनों डबल मास्क पहन कर रखेंगे. पर मन नहीं माना, खुशामदी स्वर में कहा, ‘भैया, पापा और मैं दोनों ही कोविड पौजिटिव हैं, ले कर चल सकते हो क्या?’

बबलू ने कहा, ‘क्यों नहीं दीदी, ये कोरोना से मैं नहीं डरता, एक टीका लगवा लिया हूं और दूसरा भी लग
जाएगा.

‘आप क्यों चिंता कर रही हैं, अंकलजी को कुछ नहीं होगा और ना ही आप को.’

ना जाने क्यों उस दिन पहली बार ऐसा लगा कि इंसानियत से बड़ा कोई रिश्ता, धर्म या जात नहीं होती है.

बबलू का उस दिन आना, मेरे साथ खड़ा होना मैं शायद ताउम्र नहीं भूल पाऊंगी.

मुझे देखते ही बबलू ने अपनी तरफ से एक परदा गिरा दिया, ये देख कर दिल को थोड़ा सुकून मिला कि एक आटो वाला हो कर भी वो सारे कोविड के प्रोटोकाल फौलो कर रहा था.

मुझे और पापा को उतार कर वह दूर से बोला, ‘दीदी, सामान मंगवाना हो, तो मैं ले आता हूं.’

मैं ने तो ये सोचा ही नहीं था. मैं ने फल, जूस, नारियल पानी इत्यादि बता दिए थे.

बबलू के जाने के पश्चात हम अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे. 4,500 रुपए की परची कटवाते हुए ये सोच
खुद को ही आत्मग्लानि से भर रही थी कि कहीं बबलू को ना लग जाए, वो कैसे इन महंगे चोंचलों को सहन
करेगा.

चारों तरफ बड़ा ही निराशात्मक वातावरण था. कुछ लोग औक्सीजन सिलिंडर पर ही थे, तो कुछ लोग दर्द से कराह रहे थे. पर, उस सैंटर में बैठे हुए कर्मचारी शायद पत्थर के बने थे. दोनों रिसेप्शन पर बैठी हुई लड़कियों
के चेहरों पर मानो लाल लिपस्टिक नहीं, इनसानों का खून लगा हुआ हो. बड़ी ही मुर्दानगी से वो परची काट कर ऐसे दूर से पकड़ा रही थी, मानो कोविड पौजिटिव के साथ होना एक अपराध हो.

पापा को इतनी कमजोरी आ चुकी थी कि वे पूरी तरह झुके हुए थे. जैसे ही पापा के नाम का फरमान आया,
मैं पागलों की तरह उन के साथ अंदर जाने लगी. बेहद ही रूखी आवाज आई, ‘तुम यहीं खड़ी रहो.’

मैं मिमियाते हुए बोली, ‘वे बहुत कमजोर हो गए हैं और उन्हें ऊंचा सुनाई देता है.’

‘कमजोर हो गए हैं, पर मरे तो नही हैं ना.’

धपाक से दरवाजा मेरे मुंह पर बंद हो गया. फिर से मेरी आंखें पनीली हो उठीं, दिल में कड़वाहट की लहरें
उठने लगीं. हांफते हुए पापा बाहर आए, ऐसा लग रहा था, उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही थी.

मैं ने प्यार से कहा, ‘पापा, आप 2 सेकंड के लिए मास्क निकाल दो.’

वार्ड ब्वाय बोला, ‘तुम जैसे जाहिल लोगों के कारण ही ये कोरोना फैल रहा है.’

मैं बाहर आई, तो बबलू का आटो ना देख कर लगा कि शायद वो नहीं आएगा, आएगा भी क्यों इस वायरस से सब डरते हैं.

पापा की सांस उफन रही थी और सूरज की तपिश के साथ उन का बुखार भी बढ़ रहा था.

मैं कैब बुक करने की कोशिश कर रही थी कि तभी बबलू आ गया. आते ही वह बोला, ‘दीदी, वो सामान खरीदने में देर हो गई थी.’

आज उस आटो में बैठते हुए ऐसा लग रहा था कि वो आटो नहीं, बल्कि कोई देवदूत का वाहन है.

घर पहुंच कर बबलू ने ग्लव्स पहन कर सामान उतारा. मैं ने उस के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘बबलू, ये 500 रुपए रख लो, एक हफ्ते में पहली बार किसी ने इनसान की तरह व्यवहार किया है.’

बबलू 200 रुपए वापस करते हुए बोला, ‘दीदी, गरीब हूं, पर इनसान हूं, आप की मुसीबत पर रोटियां सेंकने का
मेरा कोई इरादा नहीं है.

‘आप को अगर कुछ मंगवाना हो, तो आप बेझिझक बता दीजिए. मैं घर के दरवाजे पर रख जाऊंगा.’

आज 8 दिन के पश्चात पापा के बुखार ने भी हौसला नहीं तोड़ा. बबलू का आना और मदद करना संबल दे गया
था. ऐसा लगा इंसानियत शायद अभी भी जिंदा है.
शाम होतेहोते मुझे भी तेज बुखार हो गया था. डाक्टर बारबार ये ही कह रहा था कि आप अपना भी ध्यान रखें. आप अगर 35 वर्ष की हैं, तो इस का यह मतलब नहीं कि कोविड आप के लिए आसान रहेगा.

अब तक तो मैनेज कर रही थी, परंतु खुद को बुखार होने के बाद उठने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी.
समझ नहीं आ रहा था कि ये बुखार मुझे तनाव, अकेलेपन या फिर कोविड की वजह से हुआ है?

ना चाहते हुए भी औनलाइन खाना मंगाने की सोच रही थी. घी, तेल और मसालों से भरा हुआ खाना इस
समय मेरे और पापा के लिए सही नहीं होगा, पर क्या करूं?

तभी दरवाजे पर घंटी बजी. देखा, यमुना खड़ी है. यमुना को देख कर मैं बोली, ‘यमुना, तुझे फोन पर बताया तो था कि मुझे और पापा को कोविड हो गया है.’

‘तुझे पैसों की जरूरत है, तो मैं दे देती हूं, तेरी तनख्वाह निकाल रखी है, पर कहीं हम से बीमारी ना लग जाए.’

यमुना मास्क को ठीक करते हुए बोली, ‘अरे दीदी, क्या अपनों का हाल नहीं पूछते हैं, अगर कोई बीमार हो तो…’

‘आप ने तो फिर भी बता दिया था मुझे, 204 वाली मेमसाहब और 809 वाली आंटी ने तो बिना बताए ही
मुझ से पूरा काम करवाया है.’

‘आप कहें तो मैं आप के यहां भी काम कर दूंगी, बस इन दिनों थोड़ी तनख्वाह ज़्यादा दे दीजिए.’

मैं डरतेडरते बोली, ‘वो तो ठीक है, पर क्या तुझे डर नहीं लगेगा.’

यमुना सौंधी सी हंसी हंसते हुए बोली, ‘गरीबी से अधिक कोई भी बीमारी भयानक नहीं होती है.’

‘आप पैसे दीजिए या मैडिकल स्टोर वाले को बोल दीजिए. मैं अपने लिए आप के घर में घुसने से पहले अलग मास्क और सैनिटाइजर ले आती हूं.’

फिर यमुना ने डबल मास्क पहन कर मेरे फ्लैट में प्रवेश किया. मैं और पापा ने खुद को एक कमरे में बंद कर
लिया था.

जाने से पहले उस ने फोन पर ही बता दिया कि क्या क्या काम हो गया है.

यमुना के जाने के बाद जब मैं बाहर आई तो आंखें भर आईं. यमुना ने डिस्पोजेबल क्राकरी डाइनिंग टेबल पर
रखी हुई थी, ताकि मुझे बरतन ना करने पड़े.

सूप, खिचड़ी, चटनी और सलाद काट कर सलीके से लगाया हुआ था. दूध उबाल रखा था. प्रोटेनिक्स का डब्बा भी था. फल भी काट कर रखे हुए थे. बादाम और किशमिश भी शायद सुबह के लिए भीगी हुई थी.

ना जाने क्या हुआ कि मेरा बुखार बिना दवा के ही उतर गया. यमुना को फोन किया, पर गला रुंध गया. कुछ
बोल नहीं पाई मैं. उधर से भी बस ये ही आवाज आई, ‘दीदी, आप चिंता मत करना. मैं हूं आप के और अंकलजी के साथ.’

यमुना के घर में प्रवेश करते ही नकारात्मकता और कोरोना दोनों ही बाहर निकल गए थे. आज शायद 11 दिनों के पश्चात ऐसा लग रहा है सवेरा होने को है. ये दवाओं का असर है या फिर यमुना और बबलू का साथ खड़ा होना, जिस ने अंदर तक मेरे फेफड़ों को इंसानियत की स्वच्छ हवा से भर दिया है. Best Family Story in Hindi.

Thama Movie Review in Hindi: थामा मूवी – नायक बेताल लेकिन फिल्म बेताल नहीं

Thama Movie Review in Hindi: थामा – फिल्म ‘थामा’ हौरर तो नहीं है, हौरर कौमेडी जरूर है. यह फिल्म वैंपायर (खून चूसने वाले राक्षस) पर है. निर्देशक दिनेश विजन की यह 5वीं हौरर कौमेडी फिल्म है.

‘थामा’ से पहले भी बीटल्स पर कई फिल्में बन चुकी हैं. 1986 में ‘बेताल पच्चीसी’ पर आधारित शांतिलाल सोनी की फिल्म ‘विक्रम बेताल’ आई थी. उस फिल्म में शब्बीर कुमार द्वारा गाया गया गाना ‘तेरा बदन तेरा यौवन…’ भी था जिस का संगीत नदीम-श्रवण ने दिया था. इस से पहले आदित्य सरपोतदार  ने ‘मुंज्या’ बनाई. फिल्म ‘थामा’ मैडोक फिल्म्स की ‘स्त्री,’ ‘स्त्री 2’, ‘भेडि़या’ और ‘मुंज्या’ के बाद 5वीं फिल्म है.

‘थामा’ में कहानी का अभाव दिखता है. फिल्म का नायक थामा ताकतवर और बेतालों का नायक है लेकिन फिल्म बेतालों की दुनिया में नहीं जाती, जो एक अच्छी बात है. इसीलिए फिल्म में हौरर कम है, मगर कौमेडी भी तो दमदार नहीं है.

फिल्म की कहानी राजा विक्रमादित्य और बेताल की पुरानी कहानियों से प्रेरित है. इस तरह की कहानियां हम बचपन में ‘चंदा मामा’ पत्रिका में पढ़ा करते थे लेकिन इस कहानी को निर्देशक ने अपने अंदाज में पेश किया है. निर्देशक ने फिल्म में 3-4 स्पैशल अपीयरैंस भी दिखाए हैं. शक्ति शालिनी को कैमियो की भूमिका में दिखाया गया है तो वरुण धवन को भेडि़या के कैमियो में.

फिल्म की कहानी पत्रकार आलोक (आयुष्मान खुराना) के इर्दगिर्द घूमती है. वह अपने दोस्तों के साथ ट्रैकिंग पर जा रहा है. अचानक भालू उस पर हमला कर देता है और तड़ाका (रश्मिका मंदाना) उस की जान बचाती है. इस के बाद वह वैंपायरों की दुनिया में फंस जाता है.

फिल्म की शुरुआत 323 बीसी से होती है. जंगल में वह ऐसे इलाकों में घुस जाता है जहां इंसानों का प्रवेश वर्जित है. कुछ ऐसा होता है कि आलोक भी उन्हीं बेतालों की तरह बन जाता है और बेतालों का बादशाह शैतान थामा (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) आजाद हो जाता है. फिर भेडि़या भी आ जाता है और उसे भी ताकत हासिल करनी है. कुल मिला कर ‘स्त्री’, ‘भेडि़या’ और ‘मुंज्या’ का कनैक्शन इस में मिलता है. निर्देशक ने बखूबी इस कनैक्शन को बनाए रखा है.

‘थामा’ की यह कहानी कमजोर है लेकिन निर्देशन बढि़या है. नवाजुद्दीन सिद्दीकी को थोड़ा मौका और दिया जा सकता था. फिल्म का फर्स्ट हाफ टाइट नहीं है. बेतालों की जंग ज्यादा होती तो कमाल हो जाता. मध्यांतर के बाद फिल्म रफ्तार पकड़ती है. रहस्य, रोमांच की दुनिया दिलचस्प लगने लगती है. बेताल और भेडि़ए का फाइट सीन बढि़या बन पड़ा है. क्लाइमैक्स तो और भी बढि़या है.

फिल्म में बस एक कमी है, कई दृश्यों में दोहराव है. फिल्म के वीएफएक्स, सिनेमेटोग्राफी और संगीत अच्छे हैं. आयुष्मान खुराना और रश्मिका मंदाना के अभिनय की तारीफ करनी होगी. नवाजुद्दीन सिद्दीकी का किरदार अनोखा और अच्छा है. फिल्म में कई कौमिक पंचलाइंस हैं, सस्पैंस भी है जो दर्शकों को बांधे रखता है. कुछ भी कह लीजिए, यह फिल्म ‘स्त्री’ और ‘भेडि़या’ के स्तर की नहीं बन पाई है. Thama Movie Review in Hindi.

Film Review: एक दीवाने की दीवानियत- कहानी दीवानगी की नहीं, जबरदस्ती के प्यार की

Film Review: एक दीवाने की दीवानियत- रोमांटिक फिल्म ‘एक दीवाने की दीवानियत’ से मिलतीजुलती कुछ फिल्में पहले बन चुकी हैं, जिन में अजय देवगन और उर्मिला मातोंडकर की 2002 में बनी ‘दीवानगी’ फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल रही. उस फिल्म के लिए अजय देवगन को खलनायक का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था. वह एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर फिल्म थी.

1992 में ऋषि कपूर, दिव्या भारती, शाहरुख खान को ले कर राजकंवर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘दीवाना’ एक रोमांटिक ड्रामा थी. वह फिल्म 1992 में सब से ज्यादा कमाई करने वाली दूसरी फिल्म थी.

दीवानों और उन की दीवानगी पर बहुत सी फिल्में बन चुकी हैं. शायद ही कोई ऐसी फिल्म होगी जिस में हीरो की दीवानगी न दिखाई गई हो. कहते हैं, जब प्यार हद से ज्यादा गुजर जाए तो दीवानगी बन जाती है और जब दीवानगी सियासत से टकरा जाए तो कहानी बन जाती है ‘एक दीवाने की दीवानियत’ की. इस फिल्म में दिखाई गई कहानी दीवानगी की नहीं, जबरदस्ती के प्यार और औरत की मरजी की है कि एक लड़की सम्मान को पाने के लिए अपने प्यार को सजा बना लेती है.

प्रेम के त्रिकोण पर आधारित यह फिल्म एकतरफा और जबरदस्ती के जनूनी प्यार पर आधारित है. फिल्म 1990 के दशक को फील कराती है. कहानी एक दबंग पौलिटिशियन के बेटे विक्रमादित्य उर्फ विक्रम भोंसले (हर्षवर्धन राणे) की है. मुख्यमंत्री तक उस की पहुंच है. बचपन से उस के पिता (सचिन खेडकर) ने उसे इस तरह पाला कि वह हर बात में हुक्म चलाने लगा. सत्ता के नशे में चूर विक्रम की नजर जब बौलीवुड की सितारा अदा (सोनम बाजवा) पर पड़ती है तो वह उसे पाने की ठान लेता है लेकिन अदा विक्रम को एक अहंकारी मर्द मानती है मगर विक्रम साम, दाम, दंड, भेद अपना कर भी अदा से शादी करना चाहता है. अदा परेशान हो जाती है और उस का जवाब उसी तेवर में देती है.

प्रतिशोध में आ कर वह ऐलान कर देती है कि जो दशहरे तक विक्रमादिव्य को मार डालेगा, अदा उस के साथ रात गुजारेगी. घटनाएं इस तरह बदलती हैं कि विक्रम का पागलपन, अदा का प्रतिरोध, दोनों के बीच की टकराहट उन्हें ऐसे दोराहे पर ले जाते हैं जहां प्यार, नफरत, ताकत, विनाश की सीमाएं धुंधली पड़ जाती हैं.

जब से अदा ने विक्रम को मारने की बात की है तब से उस पर बहुत से अटैक होने लगे. अब विक्रम 100 जोड़ों की शादी करवाने की मुनादी कराता है. अदा की विक्रम के प्रति नफरत बढ़ती जाती है. विक्रम 100 जोड़ों की शादी कराता है लेकिन अदा वहां सफेद साड़ी में पहुंच कर विक्रम की मौत की दुआ मांगती है. यहां विक्रम पर अटैक होते रहते हैं.

इधर विक्रम पर अटैक होते हैं तो वह अदा से माफी मांगने जाता है कि तभी अदा पर गोली चलती है मगर गोली विक्रम को लग जाती है और वह मर जाता है. अदा बच जाती है. मरते वक्त विक्रम अदा से कहता है कि अगले जन्म में भी वह उसी से प्यार करेगा.

यह फिल्म कई टर्न्स और ट्विस्ट्स से भरी पड़ी है. ‘औरत की मरजी ही उस की मरजी है’ जैसे संवादों पर फ्रंट बैंचर्स सीटियां मारते हैं. मुंबई को कलरफुल दिखाया गया है. कोरियोग्राफी अच्छी है, सभी कौस्ट्यूम्स भी अच्छे हैं. गाने प्यारमोहब्बत वाला फील देते हैं. कुछ गाने फिल्म की जान हैं. हर्षवर्धन राणे और सोनम बाजवा की जोड़ी प्यार और नफरत को शिद्दत से दिखाने में कामयाब रही है. सोनम बाजवा ग्लैमरस लगी है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Film Review.

Film Review: चलती रहे जिंदगी – लॉकडाउन के तनाव को उजागर करती फिल्म

Film Review: कोविड 19 महामारी आई और हजारों लोगों को मार कर या संक्रमित कर चली गई. जिन दिनों यह महामारी दुनियाभर में फैल रही थी, अकेले अमेरिका में ही प्रतिदिन हजारों लोग अस्पतालों में भरती हो रहे थे. लाखों लोग मारे गए थे. यह बीमारी विश्वभर में 2019 में शुरू हुई थी. उस वक्त विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सार्वजनिक आपातकाल घोषित किया गया था.

सही इलाज करने और आननफानन विश्वभर में टीकों का उत्पादन बढ़ा कर उन्हें कोविड के मरीजों को लगाया गया. नतीजतन काफी अरसे बाद कोविड पर काबू पाया जा सका.

आज कोविड पूरी तरह खत्म तो नहीं हुआ है पर इन्फ्लेमेटरी सिंड्रोम का खतरा हर वक्त बना रहता है ‘चलती रहे जिंदगी’उसी कोविड 19 पर बनी है. हालांकि आज लोग कोविड 19 को भूलते जा रहे हैं, जिंदगी स्मूथली चल रही है, मगर जरा सी किसी वायरस की आहट सुनाई पड़ती है तो लोग घबरा उठते हैं.

यह फिल्म डराती नहीं है. जो बीत गया सो बीत गया, मगर फिर भी लौकडाउन के दौरान लोगों के अनुभवों, मानसिक और शारीरिक चुनौतियों व उन के बीच के तनाव को दर्शाती है. यह विकट परिस्थितियों में धैर्य की परीक्षा लेती है.

यह फिल्म महानगरों के दौरान एक आवासीय परिसर में रहने वाले 3 परिवारों और उन के ब्रेड सप्लायर की कहानी बताती है. जो कोविड 19 लौकडाउन के दौरान विभिन्न चुनौतियों का सामना करते हैं. इस फिल्म को दिलों को छू लेने वाला ‘लौकडाउन ड्रामा’ बताया जाता है.

इस फिल्म की शुरुआत वहां से होती है जब कोविड 19 वायरस की रोकथाम के लिए देशभर में लौकडाउन लगाया जाता है. कहानी मुंबई की एक सोसाइटी में रहने वाले 3 परिवारों की है. ब्रैड, बिस्कुट सप्लाई करने वाला कृष्णा (सिद्धांत कपूर) आर्थिक समस्याओं से जू?ा रहा है. लौकडाउन से पहले आरु (बरखा सेनगुप्ता) को अपने पड़ोसी अर्जुन (इंद्रनील सेनगुप्ता) की पत्नी के साथ एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर का पता चलता है. आरु की एक बेटी भी है.

एक अन्य परिवार में सुषमा (फ्लोरा जैकब) अपने टीवी पत्रकार बेटे गौरव और बेटी के साथ रहती है. सुषमा ने कृष्णा को 50,000 रुपए दिए थे. अब उस का बेटा उस पर पैसे वापस लेने का दबाव बना रहा है. तीसरे परिवार में बुजुर्ग लीला (सीमा बिस्वास) अपनी डांसर बहू नैना (मंजरी फडणवीस) और किशोर बेटी सिया (अनाया शिव) के साथ तनाव से जू?ा रही हैं. तीनों परिवार लौकडाउन के साथसाथ अपनेअपने दम पर स्ट्रगल्स का सामना कर रहे हैं.

इस बीच, कृष्णा काम न होने के कारण सपरिवार अपने गांव जाने का फैसला करता है ताकि जमीन बेच कर वह पैसों का इंतजाम कर सके. उस सफर में रेल की पटरी पर सोने के दौरान कृष्णा समेत 12 लोगों की मौत हो जाती है. दूसरी ओर नैना को अपनी 70 साल की सास को किसी दूसरे से बीमारी लगने का डर सताता रहता है. नैना की भी डांस क्लासेज बंद हो जाती हैं. दुनिया थम सी जाती है तो सभी अपनेअपने रिश्तों का पुनर्मूल्यांकन करते हैं.

इस फिल्म को महामारी के दौरान जटिल परिस्थितियों में शूट किया गया. शुरुआत में आरु और उस के बेटे गौरव को नहीं दिखाया गया. पात्रों के भीतर कहीं तनाव नहीं दिखता. फिल्म में पति की बेवफाई से आरु आहत दिखाई देती है लेकिन अर्जुन पर इस का असर नहीं होता. रेल की पटरी पर सोते कृष्णा की दर्दनाक मौत देख कर दर्शकों के रोंगटे खड़े नहीं होते. कहानी दिल को छू नहीं पाती. सीमा बिस्वास फिल्म का आकर्षण है.

इंद्रनील सेनगुप्ता और बरखा सेनगुप्ता का काम ज्यादा बढि़या नहीं है. टीवी एंकर बने रोहित खंडेलवाल का किरदार अच्छा है. आकाश की मां बनी फ्लोरा जैकब का बिल्डिंग सारी औरतों की खबर रखने का किरदार दिलचस्प है.

बीचबीच में कोरोना की आहट आजकल भी सुनाई पड़ जाती है. लोगों को लगता है कि एक तो महंगाई, ऊपर से लौकडाउन लग गया तो उन का क्या होगा. फिल्म की कहानी रोंगटे खड़े करने वाली है. फिल्म का गीतसंगीत साधारण है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Film Review.

Hindi Corruption Story: अवैध वसूली- मंगला प्रसाद मुनाफे को कैसे छोड़ सकते थे!

Hindi Corruption Story: चोर चोरी से जाए, हेराफेरी से न जाए. सरकारी महकमे में काम करते हुए मंगला प्रसाद मुनाफे को कैसे छोड़ सकते थे, तभी तो एक हाथ दिया दूसरे हाथ लिया.

कालोनी संपन्नों की थी. ज्यादातर सुविधा संपन्न रिटायर्ड अधिकारियों के बेहतरीन मकान थे. कमलाकांत तो इतने संपन्न थे कि अपने 4 बिस्वे के बंगले में उन्होंने स्विमिंग पूल तक बनवा रखा था. मजाल है जो कोई उस पर हाथ लगाए, इतनी पहुंच थी उन की. कॉलोनी से सटा एक सरकारी तालाब था. उससे लगी जमीन पर कॉलोनी के लोगों ने मंदिर बनवाने की सोची. इस के लिए कॉलोनी के सभी लोगों की मीटिंग बुलाई गई.

‘‘हमें मंदिर में पूजा-अर्चना करने के लिए एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. तकलीफ तब होती है जब शिवरात्रि या सावन के सोमवार के समय हमारी औरतों को परेशानी का सामना करना पड़ता है,’’ कमलाकांत बोले.

‘‘आप ठीक कहते हैं. वहां जिस तरह के लोगों का जमावड़ा होता है वह हमारे स्टेटस के अनुकूल नहीं होता. हमें शर्म और हिचक का सामना करना पड़ता है,’’ चतुर्वेदीजी ने हां में हां मिलाई.

‘‘बिलकुल सही,’’ एक अन्य सदस्य ने हामी भरी.

‘‘कहां सोचा है मंदिर बनवाने का,’’ चतुर्वेदीजी ने पूछा.

‘‘अपनी कालोनी से सटे तालाब के किनारे वाली जमीन पर,’’ कमलाकांत बोले.

‘‘वह तो सरकारी है?’’ वर्माजी से रहा न गया.

‘‘तो क्या हुआ. मंदिर सरकारी जमीन पर नहीं बनेगा तो क्या हमारे घर में बनेगा?’’ एक हंसा.

‘‘कल को सरकार उसे तुड़वा दे तब?’’ वर्माजी कहते रहे.

‘‘आप भी नादानों की तरह बात करते हैं वर्माजी. इतने साल सरकारी नौकरी कर के भी नहीं सम?ो?’’

वर्माजी कायदे-कानून वाले आदमी थे, इसलिए वे ऐसी जमीन पर मंदिर बनवाने के पक्ष में नहीं थे. बहुमत मंदिर के साथ था, लिहाजा, मुखरित होने में वे हिचक रहे थे. उन्हें सुमंतजी का समर्थन मिला.

‘‘हम लोग सरकारी आदमी रहे हैं. अगर हम ही ऐसा करेंगे तो दूसरों

को क्या संदेश जाएगा?’’ सुमंतजी बोले.

‘‘संदेश अच्छा ही जाएगा. हम शराब की दुकान थोडे़ ही खुलवा रहे हैं. मंदिर बनवाना तो पुण्य का काम है. सरकार बनवा सकती है तो हम क्यों नहीं,’’ कमलाकांत ने इस का पुरजोर समर्थन किया.

‘‘सवाल पापपुण्य का नहीं. अनैतिकता का है. क्या सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा कर के मंदिर बनवाना पुण्य का काम होगा? दूसरे, मंदिर से क्या हासिल होने वाला है?’’ सुमंतजी ने आगे कहा.

‘‘हम हासिल करने के लिए मंदिर नहीं बनवा रहे.’’

‘‘फिर किस उद्देश्य से बनवा रहे हैं?’’

‘‘यह हमारी आस्था से जुड़ा है.’’

‘‘आस्था बिनावजह तो होती नहीं.’’

‘‘आप कहना क्या चाहते हैं.’’

‘‘मेरा यही कहना है कि बेकार रुपया बरबाद करने से अच्छा है जरूरतमंदों की सहायता की जाए.’’

‘‘आप मंदिर का अपमान कर रहे हैं,’’ एक उखड़ा.

‘‘सैकड़ों मंदिर बने और टूटे, उस से क्या फर्क पड़ा? इतना ही शौक है तो मंदिर घर में भी बनवा लीजिए. इस के लिए सब से अच्छा विकल्प होगा कमलाजी का घर,’’ सुमंतजी बोले.

‘‘मेरा ही क्यों?’’ कमलाजी हत्थे से उखडे़, ‘‘घर तो आप का भी बड़ा है?

‘‘बड़ी मुश्किल से कालेज की अध्यापक की नौकरी कर के मकान बनवाया है. आप को पता होगा जब इस जमीन पर किसी की नजर नहीं पड़ी थी तब इसे हम ने औकात के हिसाब से रकम दे कर खरीदा था. आज तो यह करोड़ों में बिक रही है, तब तो यह पूरी खेत थी, सियार लोटते थे.’’

‘‘इस से क्या होता है. जमीन पर मंदिर बनवा ही सकते हैं,’’ कमलाजी बोले.

‘‘माफ करिए. मैं मंदिर से ज्यादा स्कूल खुलवाने में विश्वास करता हूं.’’

‘‘ठीक है आप स्कूल खोलें और हमें मंदिर बनवाने दें,’’ कमलाजी ने कहा तो सुमंतजी वहां से चले गए. बाकी सदस्यों को सुमंतजी की राय नागवार लगी. वे लोग आपस में सलाहमशवरा करने लगे.

‘‘कहते हैं घर में मंदिर बनवाइए. जब उन के घर की बात की तो स्कूल खुलवाने लगे,’’ नीतीशजी बोले.

‘‘इन की बीवी सब से ज्यादा धार्मिक है,’’ नीतीशजी आगे बोले.

‘‘आप को कैसे पता चला?’’ कमलाजी पूछ बैठे.

‘‘मेरी पत्नी से अच्छी पटती है. बताती है कि सुमंतजी को न समय से नाश्ता मिलता है न खाना. इन की बीवी दिनभर पूजापाठ में लगी रहती हैं. सुमंतजी की 2 बेटियां हैं, जो 32 की हो चली हैं. बेंगलुरु में नौकरी कर के अच्छा कमाती हैं. फिर भी शादी नहीं हो रही.

‘‘तो क्या मां इसीलिए दिनभर पूजापाठ में लगी रहती है?’’

‘‘हां, उन्हें विश्वास है कि ‘भगवान’ कुछ न कुछ रास्ता निकालेंगे. एक दिन

तो हद हो गई जब मेरे ही सामने सुमंतजी अपनी बीवी से कह रहे थे कि इतना पूजापाठ करने से तो पत्थर भी पिघल जाए मगर तुम्हारे भगवान नहीं पिघल रहे.’’

‘‘ऐसे निष्ठुर आदमी के बारे में क्या कहा जाए जिस के दिल में अपनी

धर्मभीरु पत्नी के लिए जरा भी जगह नहीं. आखिर वह भी तो मंदिर में

जल चढ़ाने के लिए एक किलोमीटर दूर जाती होगी?’’ चतुर्वेदीजी का मन कसैला हो गया.

‘‘इन से कुछ मिलने वाला नहीं. इन्हें अपने ग्रुप से हटाइए,’’ एक अन्य सदस्य की राय थी.

‘‘कैसे हटा दें, कल को उन की पत्नी मंदिर में जल चढ़ाने आएगी तो क्या हम उन्हें भगा देंगे? उन से भी चंदा लिया जाएगा न,’’ चतुर्वेदीजी बोले.

‘‘चतुर्वेदीजी ठीक कहते हैं. मंदिर तो सभी के लिए होगा. फिर उन्हें कैसे छोड़ा जाए?’’

एक हफ्ते के बाद दोबारा जब मीटिंग हुई तो मंदिर के खर्च पर चर्चा हुई.

‘‘कुल 4 लाख रुपए का खर्चा है. सभी लोग 20-20 हजार रुपए देंगे तो आसानी से मंदिर बन जाएगा.’’

‘‘यह रकम कुछ ज्यादा नहीं है?’’ चतुर्वेदीजी बोले.

‘‘मंदिर के लिए सब से पहले आप ही ने पहल की है. अब आप ही कदम पीछे खींच रहे हैं?’’

‘‘ऐसी बात नहीं है,’’ वे थोड़ा लजाए.

‘‘यहां किसी की भी पैंशन 50 हजार रुपए से कम नहीं है.’’

‘‘वह तो ठीक है मगर दवाओं और अन्य खर्चों में भी तो चला जाता है. बचता ही क्या है?’’ इस मामले में सभी की राय एक थी. एक बार तो लगा कि शायद यह काम न हो पाए.

‘‘चलिए, मैं एक लाख रुपए देता हूं,’’ मंगला प्रसाद पीडब्लूडी में इंजीनियर थे. उन के रिटायरमैंट होने में 2 साल बाकी थे. ज्यादातर सदस्यों की बांछें खिल गईं. मंदिर के लिए सब तैयार थे मगर जब रुपयों की बात आई तो बगलें देखने लगे.

‘‘किसी से जोरजबरदस्ती न की जाए. स्वेच्छा से जो देना चाहे, देगा,’’ समवेत स्वर में सभी सदस्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया.

‘‘रुपया घटेगा तब?’’

‘‘ऐसी नौबत नहीं आएगी.’’

पहला कमैंट कन्हैयाजी का था. वे पेशे से वकील थे. वे मीटिंग का हिस्सा नहीं थे.

‘‘मैं आप के इस मिशन का हिस्सा नहीं बनना चाहता हूं,’’ बिना लागलपेट के वकील साहब बोले.

वकील साहब की बात सुन कर सब के चेहरे पर निराशा के भाव आ गए.

‘‘ऐसे कैसे हो सकता है. आप इस कालोनी के गणमान्य सदस्य हैं. बिना आप के सहयोग से संभव नहीं.’’

‘‘मैं इसे फुजूलखर्ची सम?ाता हूं. आप लोगों के पास इफरात पैसा है, लगा सकते हैं,’’ वकील साहब बोले.

‘‘हम पैंशनधारी हैं.’’

‘‘मैं नहीं. सरकार पैंशन आप की निजी जरूरतों के लिए देती है न कि मंदिर बनवाने के लिए.’’

‘‘दानपुण्य भी तो कुछ होता है. कल को हम रहें या न रहें, इस मंदिर के कारण लोग हमेशा याद रखेंगे.’’

‘‘मु?ो रोज कुआं खोदना है और पानी पीना है. मेरी इस में कोई दिलचस्पी नहीं है.’’

‘‘आप चंदा नहीं देंगे?’’

‘‘कालोनी सालों बिना सीवर के रही. चाहते तो आप सब मिल कर सीवर का पाइप बिछवा सकते थे. याद होगा, एक बार मैं ने पहल भी की थी. मगर आप लोगों ने सहयोग करने से इनकार कर दिया, कहने लगे कि यह काम सरकार का है.’’

‘‘बिलकुल सही बात है. हम क्यों अपनी तनख्वाह लगाएं?’’

‘‘मंदिर में लगाएंगे?’’

‘‘बिलकुल लगाएंगे.’’

‘‘तो ठीक है, लगाइए.’’

‘‘मंदिर में कदम मत रखिएगा.’’

‘‘मु?ो क्या गरज है. मेरे लिए मेरा काम ही पूजा है. आप की तरह मुफ्त की पैंशन नहीं मिलती जो अनापशनाप योजना पर काम करूं,’’ वकील साहब भी ठनक गए.

लोग भुनभुनाते हुए वकील साहब के घर से बाहर निकल आए.

सारा मूड खराब कर दिया. पता नहीं प्रोफैसर ने भी बाहर का रास्ता दिखा दिया तो रहीसही कसर पूरी हो जाएगी, यह सोचते हुए सब भरे कदमों से चल कर प्रोफैसर सुमंत के घर पर आए.

‘‘प्रोफैसर साहब, आप स्वेच्छा से जो देना चाहें, दे सकते हैं,’’ एक अधिकारी बोला. सुमंतजी रिटायर थे. मगर ईमानदार. मेहनत से कमाए रुपयों से उन्होंने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दी. फिर बैंक और अपने बचाए पैसे से एक सामान्य सा दिखने वाला मकान बनवा लिया. देना तो नहीं चाहते थे मगर कुछ सोच कर एक हजार रुपए थमा दिए.

‘‘इतने से क्या होगा,’’ दूसरे अधिकारी से रहा न गया.

‘‘आप ही ने तो स्वेच्छा से देने के लिए कहा, सो दे दिया,’’ सुमंतजी बोले.

अधिकारी को अपने बयान पर अफसोस हुआ. बेकार में स्वेच्छा शब्द इस्तेमाल किया पर उसे क्या मालूम था कि सुमंतजी उसे पकड़ लेंगे. उस ने तो औपचारिकतावश

कहा था.

‘‘कम से कम 10 हजार रुपए देते तो हमारा काम आसान हो जाता. मंगला प्रसाद ने एक लाख रुपए देने का वादा किया है.’’

‘‘वे मंदिर का पूरा खर्च दे सकते हैं.’’

‘‘आप को बुरा लगा तो माफी मांगते हैं.’’

‘‘माफी तो मु?ो मांगनी चाहिए जो मैं आप लोगों के काम न आ सका.’’

‘‘आप शर्मिंदा कर रहे हैं.’’

‘‘साफसाफ कहूं तो मैं आप लोगों के इस काम में शरीक नहीं होना चाहता,’’ सुमंतजी की स्पष्टवादिता किसी को अच्छी नहीं लगी.

औपचारिकताश सुमंतजी ने पत्नी से चाय बनवाने के लिए बोला. मगर सब ने मना कर दिया.

सुमंतजी की पत्नी राधिका उन्हें चार बातें सुनाने से बाज नहीं आई.

‘‘दे दिए होते 5 हजार रुपए. मंदिर के लिए ही तो मांग रहे थे.’’

‘‘5 हजार रुपए पेड़ पर उगते हैं?’’ सुमंतजी की बात सुन कर राधिका का मन तिक्त हो गया. 2 दिन उन से ठीक से बात तक नहीं की.

एक रोज गुस्से में आ कर सुमंतजी ने राधिका को अच्छे से सुना दिया.

‘‘आज भी तुम्हारी बेटी कुंआरी बैठी है. न तुम्हें कोई चिंता है न तुम्हारी बेटी को.’’

‘‘धैर्य रखो, सब अच्छा ही होगा. सब का समय होता है. जब उस का समय आएगा तो हो ही जाएगा.’’

‘‘बुढ़ापे में आएगा?’’ वे चिढे़, आगे कहा, ‘‘मैं मंदिर के नाम पर फूटी कौड़ी नहीं दूंगा.’’

राधिका का मन बेहद दुखी था. उसे पूजापाठ में बड़ा विश्वास था. उसे लगा, अगर इस महान काम में उन के पति ने हिस्सा नहीं लिया तो अनर्थ हो सकता है. इसलिए चोरी से 5 हजार रुपए सदस्यों को देने के लिए निकल पड़ी.

5 हजार रुपए पा कर सदस्यों के चेहरे खिल उठे. उन्हें लगा, सुमंतजी को अपनेआप पर अफसोस हुआ होगा, सो, पत्नी के हाथों रुपए भिजवा दिए.

मंगला प्रसाद ने अतिउत्साह के चलते हामी तो भर दी मगर बाद में जब दिमाग ठंडा हुआ तो अफसोस करने लगे. जबान और इज्जत की बात थी, सो, कुछ सोच कर एक लाख का चैक देने को निकल पड़े.

‘‘चतुर्वेदीजी, मैं आप से एक बात कहना चाहता हूं.’’

‘‘हांहां, कहिए.’’

‘‘जिनजिन लोगों ने चंदा दिया है उन के नाम एक शिलालेख पर अंकित कर के मंदिर के प्रांगण में लगाया जाए ताकि सब को पता चले कि मैं ने एक लाख रुपए चंदा दिया है.’’

‘‘ऐसा ही होगा,’’ चतुर्वेदी के आश्वासन पर उन्होंने बेहद प्रसन्न हो कर एक लाख रुपए का चैक थमा दिया. मंदिर का काम जोरशोर से शुरू हो गया. सालभर में मंदिर बन कर तैयार हो गया. चतुर्वेदीजी ने प्राणप्रतिष्ठा के लिए काशी से पंडित को बुलवाया. काशी में उन की ससुराल थी. उन्हीं पंडितजी ने ही उन्हें मंदिर बनवाने की राय दी थी.

लगभग सभी लेगों को न्योता दिया था. मगर वकील साहब नहीं आए. सुमंतजी की पत्नी आई थी, वे नहीं आए. मंगला प्रसाद का ध्यान शिलापट पर था जिसे देखते ही वे आगबबूला हो गए.

‘‘मैं ने तो एक लाख रुपए दिए थे मगर नाम चतुर्वेदी का है.’’

‘‘गलती से चढ़ गया है. आप परेशान न हों. आज पहला दिन है. जो हो रहा है, होने दीजिए. कारीगर से कहा गया है. वह आ कर ठीक कर देगा.’’

‘‘क्या खाक ठीक करेगा,’’ वे बमके. किसी तरह उन्हें शांत किया गया. मंगला प्रसाद का मूड उखड़ा हुआ था. उन्हें लगा सब ने उन को बेवकूफ बनाया. घर आए तो उन की पत्नी ने समझाया, ‘‘जाने दीजिए. आप ने दान-पुण्य की नीयत से दिया था. उस का फल आप को अवश्य मिलेगा,’’

तभी एक आदमी ने फाटक के पास खड़े हो कर उन के कमरे की घंटी बजाई. पता चला कि कोई ठेकेदार था. उन्होंने उसे अंदर आने के लिए कहा.

मंगला प्रसाद की तरफ ठेकेदार ने पैकेट बढ़ाया.

‘‘कितना है?’’

‘‘जितना बनता है,’’ ठेकेदार बोला.

मंगला प्रसाद पत्नी की तरफ पैकेट बढ़ाते हुए बोले, ‘‘इसे अलमारी में रख दो.’’ पत्नी के लिए यह नई बात नहीं थी. उलटे खुश हो कर बोली, ‘‘मैं ने कहा था कि फल अच्छा ही मिलेगा.’’

मंगला प्रसाद के दिल से शिकवा-शिकायत के भाव तिर गए. Hindi Corruption Story.

Best Social Story In Hindi: विमलाजी- दूसरों के लिए रहस्यमय सा क्यों था विमलाजी का व्यक्तित्व

Best Social Story In Hindi: विमलाजी का रोरो कर बुरा हाल था. उन का इकलौता बेटा मनीष 10 दिनों से लापता था. सब ने समझाया कि थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा देनी चाहिए, लेकिन इस बात पर वे चुप्पी साध लेती थीं. उन के पति बारबार कालोनी के लोगों के सामने उन को ताने दे रहे थे कि उन के सिर चढ़ाने का ही यह परिणाम है, अवश्य किसी लड़की के साथ भाग गया होगा, जब पैसे खत्म होंगे तो अपनेआप घर लौट कर आएगा. अचानक एक दिन विमला भी घर से गईं और लौट कर नहीं आईं तो उन के पति और कालोनीवासियों का माथा ठनका कि जरूर दाल में कुछ काला है. पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई गई. विमलाजी की खोज जोरशोर से की जाने लगी, सब ने अंदाजा लगाया कि मांबेटे दोनों के लापता होने के पीछे एक ही कारण होगा.

पुलिस ने घर के आसपास तथा उन सभी स्थानों पर उन को तलाशा, जहां उन के जाने की संभावना थी, लेकिन सब बेकार. कालोनी के पास ही एक कोठी थी, जिस में कोई नहीं रहता था. लोगों का मानना था कि उस में भूत रहते हैं, इसलिए वह ‘भुतहा कोठी’ कही जाती थी. किसी की उस के अंदर जाने की हिम्मत नहीं होती थी. पुलिस ने वहां भी छानबीन करनी चाही, अंदर का भयावह दृश्य देख कर पुलिस वाले और कालोनी वाले सन्न रह गए. विमलाजी की लाश वहां पड़ी थी, पूरा शरीर चाकुओं से गुदा हुआ था. हाथों में जो मोटेमोटे सोने के कंगन थे और गले में 5 तोले की चैन पहने रहती थीं, वे सब गायब थे. उन के आभूषण रहित नग्न शरीर को उन की ही साड़ी से ढक कर रखा गया था.

बहुत से लोग अटकलें लगाया करते थे कि उस कोठी को भुतहा कोठी कह कर जानबूझ कर बदनाम किया गया था जिस से उस में डर के मारे कोई प्रवेश न करे. वास्तविकता यह थी कि उस कोठी को आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने के लिए इस्तेमाल किया जाता था. कालोनी में सनसनी फैल गई. पुलिस कार्यवाही कर के चली गई. लाश के क्रियाकर्म की तैयारी आरंभ हो गई, तभी उन का बेटा मनीष आता हुआ दिखाई पड़ा. सब लोग विस्फारित आंखों से अवाक् उस की ओर देख रहे थे. वह भी अपनी मां की लाश देख कर सकते में आ गया था और पेड़ की डाल की तरह टूट कर अपनी मां से लिपट कर खूब रोया. फिर उस ने जो वृतांत सुनाया, उसे सुन कर सभी सन्न रह गए. उस ने बताया, ‘‘मैं घर से भागा नहीं, मुझे दुकान से लौटते हुए कुछ लोगों ने किडनैप कर लिया था और अगले दिन से ही मां से 50 लाख रुपए की फिरौती की मांग करने लगे थे मेरे सामने उन के फिरौती न देने पर मुझे मार देने की धमकी देते थे. उन का फोन स्पीकर पर रहता था. मेरी मां ने इतना रुपया न देने की असमर्थता जताई, तो ऊंची आवाज में उन को धमकाते थे कि चाहे जैसे भी दो, हमें पैसा चाहिए. ‘‘वे पापा से भी कुछ नहीं बता सकती थीं, क्योंकि उन्होंने मां को सख्ती से मना कर रखा था कि वे उन को न बताएं वरना वे लोग पापा को बता देंगे कि वे अकसर एक बाबा से अपनी परेशानियों का समाधान पूछने के लिए मिलती थीं. उन के वार्त्तालाप से ही उसे ये सब जानकारी मिली थी और इस से साफ जाहिर था कि मां उन को अच्छी तरह जानती थीं.

‘‘फिर परसों अचानक उस भुतहा कोठी में अपनी मां को अपने सामने देख मैं हक्काबक्का रह गया. मां के हाथ में एक पोटली थी, जिस में गहने थे. मां तो वहीं खड़ी रहीं और मुझे आधी रात को एक कार में ले जा कर कहीं दूर छोड़ दिया था. मुझे मां से गले लग कर रोने भी नहीं दिया.’’ इतना कह कर वह फूटफूट कर रोने लगा. सारा अप्रत्याशित वृतांत सुन कर, सभी डर कर कांपने लगे. पुलिस ने मनीष से पूछा, ‘‘तुम उन लोगों का चेहरा पहचान सकते हो.’’

‘‘नहीं सर, वे हर समय अपना मुंह ढके रहते थे.’’ पुलिस को सारी स्थिति समझने में देर नहीं लगी. पुलिस ने कहा, ‘‘अपराधियों ने गहने मिलने के बाद लड़के को तो छोड़ दिया क्योंकि वह तो उन्हें पहचान ही नहीं पाया था और मां को जान से मार दिया कि कहीं वह घर जा कर उन का भेद न खोल दे.’’ थोड़ी देर सोच कर जांच अधिकारी ने कहा, ‘‘ठीक है, हम पूरी कोशिश करेंगे अपराधी को ढूंढ़ने की.’’

प्रतिदिन ही कुछ न कुछ इन बाबाओं के कुकृत्य मीडिया के द्वारा तथा इधरउधर से सुनने को मिलते हैं, फिर भी लोग न जाने क्यों इतने अंधविश्वासी होते हैं कि उन के जाल में फंस जाते हैं और एक बार फंसने के बाद ये ढोंगी अपने ग्राहक को ऐसा सम्मोहित कर लेते हैं कि फिर उन से पीछा छुड़ाना असंभव सा हो जाता है. लेकिन बाबाओं के चक्कर में पड़ने के पीछे पारिवारिक पृष्ठभूमि भी बहुत बड़ा कारण होती है, उस का ही ये लोग फायदा उठाते हैं और विमलाजी तथा उन के क्रियाकलाप ऐसे ही थे  विमलाजी कालोनी में फर्स्ट फ्लोर पर पिछले 5 वर्षों से रह रही थीं. अकसर वे आंगन में घूमती दिखाई पड़ जाती थीं. कपड़े धोना, सब्जी काटना, बरतन साफ करना, स्वेटर बुनना, कंघी करना आदि, जैसे उन के घर का सारा काम आंगन में ही सिमट कर आ गया हो. घर का अंदरूनी हिस्सा तो उन्हें काटने को दौड़ता था. आखिर, क्यों न ऐसा हो, सुबह ही दोनों बापबेटे दुकान के लिए निकल जाते थे और रात के 12 बजे तक आते थे. बेटी कोई थी नहीं.

पति को उन से अधिक अपना व्यवसाय प्यारा था. कभी मैं ने उन दोनों को आंगन में एकसाथ बैठे नहीं देखा. छुट्टी वाले दिन भी विमलाजी के पति अपने काम में व्यस्त रहते थे. पैसे की बहुतायत होने के कारण उन का इकलौता बेटा मनीष बुरी आदतों का शिकार हो गया था. इस कारण विमलाजी बहुत परेशान रहती थीं. अकसर उन की अपने बेटे पर चिल्लाने की जोरजोर से आवाजें सब के घर तक आती थीं. उन को इस बात की तनिक भी परवा नहीं थी कि सुनने वालों की क्या प्रतिक्रिया होगी. विमलाजी पढ़ीलिखी नहीं थीं. पति से तिरस्कृत होने के कारण, अपने रखरखाव के प्रति बहुत लापरवाह थीं. यों भी कह सकते हैं कि विमलाजी की इस लापरवाही के कारण ही उन के पति उन से दूरदूर रहते थे. कभी मैं उन के घर के सामने से निकलती तो अकेलेपन के कारण ही वे अकसर गेट पर ही खड़ी दिख जातीं. वे अकसर मुझे बड़े आग्रह से अपने घर के अंदर बुलातीं, लेकिन बैठातीं आंगन में ही थीं. वहीं बैठे हुए घर के अंदर का दृश्य देखने लायक होता था. ऐसा लगता था जैसे अभी चोर आ कर गए हों. उन की ओर दृष्टि जाती तो चेहरा ऐसा लगता जैसे सुबह से धोया तक नहीं है, कपड़े मैचेकुचैले होते, बाल बिखरे होते, लगता जैसे घर के काम में उन का बिलकुल रुझान नहीं है और अपनेआप से भी उन्हें दुश्मनी जैसी है.

समझ नहीं आता था कि कोई गतिविधि न होने के कारण वे सारा दिन काटती कैसे थीं. उन की इस प्रवृत्ति के कारण कोई उन के घर नहीं जाना चाहता था, लेकिन कभीकभी उन के अकेलेपन पर तरस आ जाता था और मैं उन के घर चली जाती थी. पूरी कालोनी में उन के रवैये के चर्चे होते थे कि इतना पैसा होने पर भी उन्होंने अपना यह हाल क्यों बना रखा है. अपनी व्यक्तिगत बातें वे किसी से साझा नहीं करती थीं, इसलिए सब को वे बड़ी रहस्यमय लगती थीं. किसी से तवज्जुह न मिलने के कारण दिशाहीन हो कर अपनेआप में उलझी रहती थीं. उन्हें यह समझ नहीं थी कि जवान होते हुए बेटे के साथ दोस्ताना व्यवहार रखना कितना आवश्यक था. उन के पति को तो बेटे से अपने व्यवसाय में पूरा सहयोग मिल रहा था, पर वह काम के सिलसिले में बाहर जा कर क्या करता था, उन्हें कोई मतलब नहीं था, लेकिन विमला से उस के देर रात घर आने पर उस के क्रियाकलाप देख कर कुछ भी छिपा नहीं था. उन्हें कुछ समझ नहीं आया तो बाबा की शरण ली. वे भविष्य तो बताते ही थे, साथ में उपाय भी बताते थे और विमलाजी उन उपायों को अपने बेटे के लिए अपनाती भी थीं.

धीरेधीरे बाबा के वर्चस्व का उन पर इतना प्रभाव पड़ा कि वे अकसर उन का प्रवचन सुनने उन के पास चली जाती थीं. इस क्रियाकलाप से उन के पति और बेटा अनभिज्ञ थे. यह बात बहुत समय बाद, जब उस का भयंकर दुष्परिणाम, उन की मृत्यु के रूप में सामने आया तब सब को पता लगा. पड़ोसियों को रातदिन अपने आंगन में दिखाई देने वाली विमलाजी का आंगन सूना देख कर मन बहुत व्यथित होता था. काश वे पढ़ीलिखी होतीं और अंधविश्वास में पड़ कर बाबाओं के पास चक्कर लगाने के स्थान पर अच्छी पुस्तकें पढ़तीं, अच्छे लोगों के संपर्क में रह कर अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढ़तीं. कहते हैं, अपना दुख बांटने से वह आधा रह जाता है. उन की नासमझी के कारण, उन की स्वयं की तो दर्दनाक मृत्यु हुई ही, साथ में परिवार की जड़ें भी हिल गईं. इस सब के लिए उन के पति भी कम दोषी नहीं थे, जिन को यह समझ नहीं थी कि पत्नी को भौतिक सुख के साथ भावनात्मक संबल भी चाहिए होता है. विमलाजी की त्रासदी शायद कुछ लोगों की आंखें खोल सके. Best Social Story In Hindi.

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