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कठघरे में एनसीईआरटी स्कूली किताबों को नकली तौर

एनसीईआरटी पर छापने व बेचने पर रेवाड़ी, हरियाणा में मुख्यमंत्री दस्ते ने कुछ छापे मारे और एनसीईआरटी की नकली पायरेटेड किताबें पकड़ीं. अगर मामला सही है तो यह सीधे कौपीराइट कानून का उल्लंघन है, पर नकली किताबों के इस उद्योग से यह भी साफ होता है कि एनसीईआरटी, जो केंद्र सरकार की एक कंपनी है, ज्यादा दामों पर किताबें बेच रही है. नकली किताबों द्वारा पैसा बना लेने का मतलब है कि एनसीईआरटी लागत से ज्यादा दाम पर किताबें बेच रही है.

एनसीईआरटी का गठन व्यवसाय करने के लिए नहीं, पढ़ने के सिलेबस में एकरूपता लाने के लिए हुआ था. अब यह मोनोपोली का फायदा उठा कर किताबें छापता है, बेचता है और मोटा पैसा बनाता है. यह जो पैसा बनाता है वह असल में उन गरीब मांबापों की जेबों से जाता है जो बच्चों को शिक्षा दिलाने के नाम पर मजबूरी में एनसीईआरटी के खजाने भरते हैं.

वर्ष 2021 में एनसीईआरटी ने खुद

402 करोड़ रुपए की किताबें बेचीं जबकि इन किताबों को छापने पर 234 करोड़ रुपए ही खर्च हुए. यह अंतर क्यों है? इतना मुनाफा कमाने का क्या हक है एनसीईआरटी को जिस का गठन छात्रों की सेवा और शिक्षा के प्रचारप्रसार के लिए किया गया है? मजेदार बात यह है कि इन 234 करोड़ रुपयों के अलावा 381 करोड़ रुपए एक साल में एनसीईआरटी वेतनों में हड़प कर जाता है. यानी पैसा जो आम छात्रों की भलाई के लिए खर्च होना चाहिए वह या तो प्रिंटरों और कागज वालों को चला जाता है या फिर इस संस्थान के भारीभरकम कर्मचारी हड़प कर जाते हैं.

यह संस्थान, जो निपट सरकारी है, चल रहा है तो सरकार से मिलने वाली ग्रांट पर ही. मगर अगर सरकार ग्रांट देती है तो किताबें विद्यार्थियों को मुफ्त क्यों न दी जाएं और उन को इतना महंगा क्यों किया जाए कि उन की पायरेसी संभव हो?

कोई भी किताब तब ही पायरेटेड हो सकती है जब उस के बिक्री मूल्य से छपाई और कागज के साथ बेचने

वालों का कमीशन भी निकल आए. एनसीईआरटी की किताबों का दाम इतना ज्यादा है कि धोखेबाज मुद्रक उसे बाजार से कागज खरीद कर, प्रिंटर से छपवा कर, एनसीईआरटी से सस्ते दामों पर वितरक को दे कर पैसा बना रहे हैं?

हरियाणा के मुख्यमंत्री ने आखिर ऐसे दस्ते क्यों बना रखे हैं जो छात्रों की पढ़ाई के बीच चल रहे हैं? अगर यह दस्ता है तो क्यों नहीं एनसीईआरटी के दफ्तरों और गोदामों पर छापा डालता कि वे महंगी किताबों कों क्यों छाप रहे हैं और किस बात के 381 करोड़ रुपए का भुगतान अपने कर्मचारियों को दे रहे हैं?

एनसीईआरटी के जरिए बच्चों को तोड़मरोड़ कर इतिहास, भूगोल और साहित्य तो पढ़ाया जा ही रहा है, साथ में उन से जेबें भी ढीली करने को कहा जा रहा है. यह कौन सी नीति है? क्या यह द्रोणाचार्य वाली नीति है कि गरीब को शिक्षा न मिले और मिले तो गुरुदक्षिणा के नाम पर उस का पेट काट कर दी जाए?

अक्तूबर 2021 में भी दिल्ली में पुलिस ने 500 किताबें एक प्रिंटर के यहां पकड़ी थीं, वह कक्षा 6 से 8 की किताबें छाप रहा था. वर्ष 2019 में एनसीईआरटी की शिकायत पर एक प्रिंटर राजन कुमार को गिरफ्तार किया गया था, वह 10वीं व

12वीं कक्षाओं की किताबें छाप कर बेच रहा था. वर्ष 2020 में मेरठ में एनसीईआरटी की किताबों का विशाल भंडार पकड़ा गया था. मेरठ में तो इस धंधे में भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता का भतीजा अभियोगी था जबकि इन किताबों के जरिए भारतीय जनता पार्टी छात्रों का ‘चरित्र’ बनाना चाहती है.

कठघरे में छापने वालों को नहीं, एनसीईआरटी और केंद्र सरकार को खड़ा किया जाना चाहिए.

हिंसा और सरकारी सुरक्षा

नेताओं को सरकारी सुरक्षा देने की परंपरा नई नहीं है. नेताओं को जहां सिरफिरे अपराधियों से डर रहता है तो वहीं उन से प्रेम करती उन्मुक्त भीड़ से भी. उन्हें सुरक्षा का घेरा मिलता रहे तो उन का थोड़ा धैर्य बना रहता है. जिन प्रसिद्ध लोगों को सरकारी सुरक्षा नहीं मिल पाती, वे प्राइवेट बाउंसर रखने लगे हैं.

भाजपा सरकार पहले से मिली सरकारी सुरक्षा हटा कर विपक्षी नेताओं को उन की औकात बताने का काम करती रही है और पूर्व प्रधानमंत्रियों के परिवारों को मिलने वाली सुरक्षा को कम कर के उस ने अपनी पीठ भी थपथपाई थी, पर यही सरकार अब अपने विधायकों व वरिष्ठ नेताओं को या तो सुरक्षा दे रही है या बढ़ा रही है क्योंकि चुनावों के दिनों में कितने ही गांवों में गांव वालों ने इस तरह का व्यवहार भाजपा प्रत्याशियों के साथ किया कि एक नया शब्द ‘खदेड़ा’ बन गया है.

इस शब्द का अर्थ है भगा देना. विधायक जब अपने चुनाव क्षेत्र में जा रहे हैं तो गांवों के लोग राममंदिर और हिंदूमुसलिम पर तालियां पीटने के स्थान पर बेरोजगारी, महंगाई, आवारा पशुओं, खराब सड़कों, अस्पतालों की कमी, भ्रष्टाचार, स्कूलों में लापरवाही को ले कर नारेबाजी करने लगते हैं और कई जगह भीड़ हिंसक भी हो चुकी है. विपक्षी नेताओं से सुरक्षा कवच छीनने वाले अमित शाह अब अपने विधायकों को सुरक्षा दे रहे हैं.

नेताओं को थोड़ीबहुत सुरक्षा मिलनी चाहिए पर यहां तो सरकारी गनमैन का साथ होना प्रतिष्ठा का एक सवाल भी बन गया है. जिस देश में अपने घरों में लड़कियां सुरक्षित न हों, आएदिन राह चलते लड़कियों को उठा लिया जाता हो, दलितों व पिछड़ों को एकदूसरे के खिलाफ भड़का कर पिटवा दिया जाता हो वहां उन्हें सुरक्षा न दे कर, नेताओं के इर्दगिर्द बड़ा काफिला चलाना एक दिखावा भी है और जनता के साथ छलावा भी. सुरक्षा मुफ्त नहीं होती. सरकार को बहुत मोटा पैसा खर्च करना पड़ता है.

अपने जीवन का पलपल पहले से लिखा हुआ मानने वाले भाजपाई नेता आखिर हिंसा से इतना डरते क्यों हैं जबकि उन के आदर्श विनायक दामोदर सावरकर और माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने अपने विचारों में संघर्ष के दौरान जम कर हिंसा की वकालत की थी.

जो दूसरों के प्रति हिंसा को सही ठहराएगा, वह हिंसा का शिकार होगा ही, यह तय है. भाजपा विधायक व उम्मीदवार अब इस का स्वाद चख रहे हैं.

धोखेबाजी का धंधा

धर्म का धंधा अपनेआप में धोखेबाजी का है जिस में कल्पित भगवान, देवी, देवता, अवतार बना दिए गए हैं और कहा गया है कि इन को पूजोगे तो ही सुखी रहोगे, पैसा आएगा और इस के लिए उन के दर्शन करने जाना होगा व वहां दान भी देना होगा. इस महाप्रचार का लाभ, अब ही नहीं, सदियों से चोरउचक्के भी उठा रहे हैं. चारधाम यात्रा का बड़ा गुणगान किया गया व किया जा रहा है और उत्तराखंड की कमजोर पहाडि़यों पर चौड़ी सड़कें, होटल, धर्मशालाएं, ढाबे, पार्किंग, एम्यूजमैंट सैंटर, रोपवे बनाए जा रहे हैं. वहां ले जाने के लिए फर्जी ट्रैवल एजेंसियां भी इंटरनैट पर छा गई हैं.

बहुत सी ट्रैवल एजेंसियां बहुत सस्ते पैकेज देने लगी हैं और एक बार पैसा उन के अकाउंट में आया नहीं कि वे गायब. चारधाम की भव्य तसवीरों, देवीदेवताओं की मूर्तियों, संस्कृत श्लोकों व मंत्रों से भरपूर ये वैबसाइटें शातिर लोग बनाते हैं और आमतौर पर खुद को किसी संतमहंत का शिष्य बताते हैं. जिन्हें वैसे ही मूर्ख बनाना आसान है, वे सस्ते पैकेज के चक्कर में आसानी से मूर्ख बन रहे हैं.

अब यह काम इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है कि पुलिस भी सिर्फ चेतावनी देने के अलावा कुछ नहीं कर सकती. इंटरनैट पर जाओ, गूगल सर्च करो तो उन के एड वाले रिजल्ट सब से पहले आ जाते हैं. गूगल को तो पैसे लेने से मतलब है, वह कभी भी विज्ञापनदाता का बैकग्राउंड चैक नहीं करता. यह काम यूजर का है. यूजर की मति गुम है. वह तो चारधाम यात्रा कर के पुण्य कमा कर अपना वर्तमान व भविष्य, बिना काम किए, गारंटिड करना चाहता है. सो, वह जल्दी ही ?ांसे में आ जाता है और जब स्टेशन या बसस्टैंड पर सामान व परिवार के साथ पहुंचता है तो पता चलता है कि फंस गया.

इन फंसने वालों से लंबीचौड़ी सहानुभूति नहीं हो सकती क्योंकि जो हमेशा फंसने को तैयार रहते हैं उन्हें भला कोई सम?ा भी कैसे सकता है. जो लाखों में छपी तसवीर से पैसा मिलने की आशा करते हैं वे भला कब और कैसे यकीन करेंगे कि इंटरनैट की स्क्रीन पर जो देवीदेवताओं की तसवीरें हैं, भव्य मंदिर दिख रहे हैं, निर्मल जल बह रहा है, वे सब नकली हैं. वहां नकली होटलों के फोटो हैं, नकली रिव्यू हैं, ?ाठे वादे हैं. दरअसल, ये बेवकूफ तो खुद के शिकार होने का निमंत्रण खुलेआम देते हैं. अब घर्म के दुकानदार उन्हें लूटें या दुकानदारों की आड़ में शातिर, उन्हें क्या फर्क पड़ता है, उन्हें तो लुटना है.

भारत भूमि युगे युगे: बिना शह के मात

भले ही अंगूठा छाप हो लेकिन राज्यपाल खामखां राज्य के तमाम विश्वविद्यालयों का चांसलर हुआ करता है. करने के नाम पर उसे सरकारी आदेश वाले कागजों पर दस्तखत भर करने होते हैं. कभीकभी वह वाइस चांसलरों को चायनाश्ते पर बुला लेता है. जनता के पैसे से ड्राईफ्रूट और स्वीट्स का भक्षण राजभवनों में होता है और इस संक्षिप्त समारोह का समापन तथाकथित बौद्धिक हंसीठट्ठे से हो जाता है.

इस रिवाज पर लगाम कसने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री कामयाब होती दिख रही हैं जो यह कानून पास करवाने जा रही हैं कि राज्य सरकार की ओर से संचालित विश्वविद्यालयों की चांसलर मुख्यमंत्री यानी वे खुद होंगी. अब राज्यपाल जगदीप धनखड़ न तो मनमानी कर पाएंगे और न ही सरकारी फाइलें अटका पाएंगे. भगवा मंसूबों पर लगातार पानी फेर रहीं ममता के इस कदम से भाजपा सकते में है कि ये तो पातपात साबित हो रही हैं जिन्होंने राज्य को भाजपामुक्त सा कर दिया है.

‘नकवी’ टू

संसद में भाजपा मुसलिममुक्त हो गई है. उस ने हालिया राज्यसभा चुनाव में अपने तीनों मुसलिम सदस्यों- मुख्तार अब्बास नकबी, मी टू वाले एम जे अकबर और जफर इसलाम को खुदाहाफिज कह दिया है. भाजपा अभी तक सिकंदर बख्त, आरिफ बेग और नजमा हेपतुल्ला से ले कर इन तीनों को शो पीस की तरह लटकाए हुए थी. अब उस ने यह जता दिया है कि आगे उसे मुसलिमों की जरूरत नहीं.

इस त्रिमूर्ति में सब से ज्यादा दुखी मुख्तार अब्बास नकवी हैं जिन्हें दोबारा लिए जाने की उम्मीद थी क्योंकि वे अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री भी हुआ करते थे. अब अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस यूज एंड थ्रो के पीछे भगवा गैंग की मंशा कांग्रेस निर्मित इस मंत्रालय को खत्म करने की है जिस से न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी. देश में मुसलिमों की दुर्दशा किसी सुबूत की मुहताज नहीं रह गई है. नकवी की विदाई इस बात का नया सुबूत है.

मोहंती का कटु अनुभव

इस बार बात किसी आम आदमी की नहीं, बल्कि बीजू जनता दल के सांसद और अभिनेता अनुभव मोहंती की है जिन की उम्र महज 40 साल है. उन की बेइंतहा खुबसूरत पत्नी वर्षा प्रियदर्शिनी उडि़या फिल्मों की जानीमानी ऐक्ट्रैस हैं. इन दोनों का विवाद कटक की एक अदालत में पहुंचा जहां अनुभव ने कई गंभीर आरोप वर्षा पर लगाए जिन में सब से दिलचस्प यह कि उन की कई कोशिशों के बाद भी उस ने उन्हें शादी के बाद से ही शारीरिक संबंध बनाने की इजाजत नहीं दी.

ऐसी स्थिति में पति कितना बेचारा हो जाता है, यह तो अनुभव सरीखा कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है जो कुएं के पास प्यासा बैठा रह जाता है. पतिपत्नी में से किसी का भी पार्टनर को यौन सुख से वंचित रखना व्यक्तिगत अत्याचार और कानूनी व सामाजिक ज्यादती है जिसे ले कर लोगों की राय अलगअलग हो सकती है. अनुभव की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी जो वे इस समस्या को सार्वजनिक करने से हिचकिचाए नहीं.

योगीजी मुक्ति दो या नियुक्ति

योगी आदित्यनाथ बेचारे बुलडोजर कल्चर और पूजापाठ में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन के पास इतनी फुरसत ही नहीं रहती कि मुद्दत से मुक्ति या नियुक्ति की मांग कर रहे 6,800 दलित युवाओं को उन के पद पर नियुक्ति दिला पाएं. इन युवाओं का नाम चयनित शिक्षकों की लिस्ट में आ चुका है लेकिन ज्ञानवापी वगैरह में उलझे योगीजी के पास इन एकलव्यों की पीड़ा सुनने का वक्त नहीं कि उन्हें पोस्ंिटग क्यों नहीं दी जा रही.

सड़कों पर आ गए इन आक्रोशित दलित युवाओं का सरकार पर खुला आरोप है कि दलित होने के कारण उन के साथ भेदभाव किया जा रहा है. ये लोग नादान हैं जिन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि उन के सीएम देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की मुहिम में जुटे हुए हैं, जब बन जाएगा तब देखा जाएगा कि किस को कहां ‘नियुक्त’ करना है.   -भारत भूषण श्रीवास्तव द्य

मुद्दा: मृत देह का अभाव

मैडिकल संस्थानों में मृत देह का अभाव होना विज्ञान व स्वास्थ्य उपचारों में नई खोजों पर अडं़गा पड़ने जैसा है. मृत देह की कमी होने का मुख्य कारण लोगों का विज्ञान के लिए देह दान न करना है जो समाज में फैले धार्मिक अंधविश्वास से पैदा हो रहा है.

ग्वालियर के गजरा राजा मैडिकल कालेज में कोविड के बाद देह दान न होने से मृत शरीर पर पढ़ाई करने का मौका न मिलने का असर अब मैडिकल कालेजों पर पड़ रहा है. मैडिकल काउंसिल की सलाह है कि एक मृत शव पर 10 छात्र तक काम करें पर आजकल 30-35 छात्रों को एक शव प्राप्त होता है. काठमांडू के मणिपाल मैडिकल कालेज में पढ़ रही एक युवती का कहना है कि नेपाल में तो शवों की इतनी कमी है कि सारी पढ़ाई प्लास्टिक की डमी पर करनी होती है.

आजकल शव बेचने का धंधा पनपने लगा है. तिरुअंनतपुरम मैडिकल कालेज अनक्लेम्ड बौडीज के लिए 6-7 लाख रुपए तक दे रहा है. इस कालेज को 2017 से 2021 तक 4 वर्षों में एकचौथाई शव खरीदने पड़े थे ताकि मैडिकल छात्र सही पढ़ाई कर सकें. मृत शव को मैडिकल भाषा में ‘केडेबर’ कहते हैं. औरतों के शरीर तो और कम मिलते हैं क्योंकि लावारिस शवों में औरतें बहुत कम होती हैं.

जैसे ही चिकित्सा जगत से जुड़े शासकीय अथवा प्राइवेट कालेजों को पता चला कि कोई लावारिस व्यक्ति मरा है या किसी ने अपना मृत देह दान किया है तो उसे हासिल करने के लिए छीना?ापटी मच जाती है.

भारतभर का चिकित्सा जगत आज मृत मानव देह के अभाव से जू?ा रहा है. देह न मिलने की वजह से मैडिकल कालेजों में बिना देह के ही पढ़ाई करनी पड़ती है.

एक हड्डी रोग विशेषज्ञ के अनुसार, ‘‘एनोटौमी डिपार्टमैंट में 6 छात्रों की पढ़ाई एक मृत देह से अच्छी तरह से होती है. आजकल मृत देह की कमी होने की वजह से कुछ कालेजों में तो 120 छात्रों की पढ़ाई एक देह से होती है.’’

एक और जनरल प्रैक्टिशनर बताते हैं, ‘‘मैडिकल कालेज में डैथ बौडी के लिए मारामारी हमेशा थी, पहले भी 50-50 स्टूडैंट्स के बीच एक बौडी होती थी.’’

छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक समाजसेवी संस्था, जो देहदान के प्रोजैक्ट पर कार्य करती है, के प्रवक्ता का कहना है, ‘‘हमारे पास शासकीय या प्राइवेट मैडिकल कालेज, आयुर्वेदिक कालेज, होम्योपैथिक, डैंटल कालेजों के

आवेदनों की भरमार रहती है. ये हम से गुजारिश करते हैं कि हमें डैथ बौडी उपलब्ध कराएं.’’

चिकित्सा छात्रों को क्यों जरूरी है मृत देह

एमबीबीएस, वीओएस और बीपीटी जैसे कोर्स के प्रथम वर्ष के छात्रों को शरीर रचना विज्ञान विभाग (एनोटौमी डिपार्टमैंट) की पढ़ाई कराई जाती है. उस में मृत मानव देह की आवश्यकता होती है. प्रैक्टिकल नौलेज के लिए बौडी खोल कर देखी जाती है कि फेफड़े, किडनी, हार्ट, नसें, हड्डियां शरीर में कहां हैं और किस तरह से कार्य करते हैं.

चिकित्सक बनने के लिए प्रैक्टिकल नौलेज की जरूरत ज्यादा होती है. अगर किताबी ज्ञान हो, प्रैक्टिकल नौलेज न हो तो भ्रम की स्थिति बनी रहती है, जिस का सीधा असर चिकित्सक की काबीलियत पर पड़ता है. 6 छात्रों की पढ़ाई के लिए एक मानव देह की जरूरत शिद्दत से होती है. इस स्थिति में पढ़ना और पढ़ाना उच्चकोटि का होता है.

कहां से मिलती है डैथ बौडी चिकित्सा जगत को डैथ बौडी 2 तरीके से मिलती हैं.

लावारिस लाशें : लावारिस लाशें पुलिस के माध्यम से प्राप्त होती हैं. ज्यादातर लावारिस लाशों का पोस्टमार्टम हो जाता है. लिहाजा, ये मैडिकल विभाग के काम नहीं आतीं. जिन लावारिस लाशों की मौत का कारण पता होता है उन का पोस्टमार्टम नहीं होता. इस के बावजूद प्रशासन ऐसी लाशों को मैडिकल विभाग को न सौंपने की लाचारी बताता है कि लावारिस लाशों, जिन का पोस्टमार्टम नहीं होता, को भी दफनाना होता है.

कारण, उन के परिजन हुए तो कभे भी उन्हें ढूंढ़ते हुए आ सकते हैं. ऐसे में दफनाई हुई लाश निकाल कर उन्हें सौंप देते हैं. यदि लाश मैडिकल कालेज को देते हैं तो कई परेशानियां खड़ी हो सकती हैं. यदि मैडिकल कालेज आवेदन करते हैं तो वे लाशें जिन के परिजन नहीं मिलते, उन्हें सौंप देते हैं.

देहदान से : कोई व्यक्ति अपनी जीवित अवस्था में अपनी इच्छा से मृत्यु के बाद अपने शरीर दान की घोषणा करता है. परिजन उन की अंतिम इच्छा पूरी करते हुए समाज हित में चिकित्सा की पढ़ाई हेतु शरीर दान करते हैं. लोग पुरानी दकियानूसी परंपराओं से जकड़े हुए हैं, लिहाजा, शरीर दान के प्रति उन में जागरूकता की बहुत कमी देखी जाती है.

दकियानूसी सोच का परिणाम

अंधपूजक परंपराओं का ही परिणाम है कि लोग समाजहित, जनहित में शरीरदान का संकल्प नहीं ले पाते. सदियों से पुरोहित वर्ग ने हमारे दिमाग में कूटकूट कर भर दिया है कि जब तक मृत मानव देह का अंतिम संस्कार कर उसे पंचतत्त्व में विलीन नहीं किया जाएगा तब तक उसे स्वर्ग, मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती. उस की आत्मा भटकती रहेगी.

यही कारण है कि लोग सदियों पुरानी इस सोच से अपने को निकाल नहीं पाते. कोविड के दिनों में भी पंडितों ने अपना धंधा चालू रखा और औनलाइन संस्कार करा के, हवन मंत्र पढ़ कर उन जजमानों से पैसे वसूल लिए जिन के शव सीधे शमशानों में ले जाए गए थे.

शरीरदान भी, परंपराओं का निर्वाह भी

रायपुर निवासी ने हिम्मत के साथ अपनी पत्नी का शरीर दान तो किया लेकिन अंधपूजा भावना इतनी ज्यादा थी कि साथ ही पत्नी का पुतला बना कर बाकायदा पंडितजी से पूजापाठ करवा कर सम्मान के साथ उस का अंतिम संस्कार किया और उस की राख को गंगा में प्रवाहित करने इलाहाबाद भी गए.

यह घटना सदियों पुरानी रूढि़यों की दास्तां की ओर इशारा करती है जिस से व्यक्ति मुक्त नहीं हो पा रहा.

दुर्गति

शरीर दान न करने के पीछे अंधविश्वास के साथ एक दूसरा बड़ा कारण है कि लोगों में डर रहता है कि दान में दिए गए शरीर की काटपीट होती है जिस से उस की दुर्गति होती है. दुर्गति का सोच कर ही लोग शरीर दान करने से पीछे हटते हैं.

शिक्षित लोग भी अंधविश्वासी

कुछ लोग कहते हैं शिक्षा की कमी है इसलिए लोग अंधविश्वासी हैं. जबकि सच यह है कि शिक्षित लोग भी रूढि़वादी होते हैं. छत्तीसगढ़ शासकीय मैडिकल कालेज की एचओडी से जब पूछा गया कि क्या आप अपना शरीर दान करेंगी तो इस सवाल के जवाब में उन्होंने तुरंत ‘न’ कहा.

वजह पूछने पर उन का कहना था, ‘‘मेरे बच्चे पुराने खयालात के हैं. वे ऐसा नहीं करेंगे. जब से धर्म का धंधा एक बार फिर बढ़ने लगा है, यह भावना और तेज हो गई है. अब तो गरीब घरों में भी देह को यों ही जलाया नहीं जाता, कर्मकांड कराया जाता है.’’

एमबीबीएस इशांत तिवारी शरीर दान के सवाल पर तुरंत ही कोई जवाब नहीं देते हैं. अपनी राय न दे कर वे परिजनों के ऊपर डाल देते हैं कि वे कर दें तो ठीक. कहने का मतलब है शिक्षित वर्ग को भी रूढि़यों की जकड़न से बाहर निकालने के लिए जागरूक करने की जरूरत है.

छत्तीसगढ़ के दुर्ग में एक स्वयंसेवी संस्था ‘प्रनाम’ जागरूक कर रही है. मानव सेवा के उद्देश्यों को ले कर बनी ‘प्रनाम’ संस्था सरकार से कोई मदद नहीं लेती.

अपने मृत शरीर की वसीयत कैसे करें

जीवित अवस्था में अपने शरीर के दान की वसीयत करने के लिए मैडिकल कालेज से मृत्यु उपरांत शरीर दान घोषणा पत्र (वसीयतनामा) लें. यह घोषणापत्र

3 पृष्ठों का एक सैट होता है जिसे अपने शरीर का दान करने वाला भरता है. उस घोषणापत्र में उस के उत्तराधिकारियों के हस्ताक्षर होते हैं जिस में वे अपनी अनापत्ति देते हैं. तीनों फौर्म भरने के बाद एक प्रति दान करने वाला अपने पास रखता है, दूसरी प्रति अपने उत्तराधिकारी को सौंपता है और तीसरी प्रति मैडिकल विभाग को सौंपता है.

वर्ष 1700 के बाद मैडिकल की पढ़ाई काफी नियमित होने लगी, पश्चिमी देशों में मृतकों के शवों की जरूरत पड़ने लगी. लेकिन लोग अपने संबंधी के शव देने को तैयार न थे. उन का मानना था कि जब ईश्वर जजमैंट डे के दिन सारी कब्रों से शव निकालेगा और उन्हें स्वर्ग में भेजेगा तो उन का संबंधी बिना अंगों के होगा. वर्ष 1784 में एक शहर में दंगे इसलिए हो गए क्योंकि एक शख्स कहीं से शव लाया पर अफवाह यह फैल गई कि वह किसी ताजा कब्र को खोद कर शव लाया था.

नाजियों ने तो जिंदा यहूदियों को शव मान कर उन पर पढ़ाई करने तक की छूट दे दी थी. आज जो शवों की कमी हो रही है उसे वर्चुअल कोडिंग और प्लास्टिक डमीज से पूरा तो किया जा रहा है पर यह पढ़ाई आधीअधूरी रह जाती है और तथाकथित डिग्री प्राप्त डाक्टर पूरी बीमारी सम?ा न पाने के कारण कुछ रोगियों, जो ठीक हो सकते थे, को खो देते हैं.

फालसा की खेती

डा. बालाजी विक्रम, डा. पूर्णिमा सिंह सिकरवार

फालसा उत्तराखंड के हिमालय की पहाडि़यों पर झाड़ीनुमा रूप में पाया जाता है और पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, मुंबई, बिहार, पश्चिम बंगाल में एक बहुत ही सीमित पैमाने पर इस की खेती की जाती है. उत्तर प्रदेश में इस की खेती तकरीबन 300 हेक्टेयर जमीन में की जाती है.

फालसा उपोष्ण कटिबंधीय फल है. इस का पौधा झाड़ीनुमा होता है. इन पर कीड़े और बीमारियां कम लगती?हैं. फल छोटेछोटे अम्लीय स्वाद के होते हैं. इस के फल गोल होते?हैं. इस के फलों का रंग कच्ची अवस्था में हरा होता?है और पक जाने पर इस का रंग हलका भूरा या हलका बैगनी हो जाता है.

पकने के बाद फलों को ज्यादा दिनों तक नहीं रखा जा सकता है. वे 1 या 2 दिन बाद ही खराब होने लगते हैं.

कैसे करें खेती

जलवायु और मिट्टी : फालसा केवल उत्तरी भारत के ऊंचे पहाड़ी इलाकों को?छोड़ कर देश में सभी जगहों पर पैदा किया जा सकता है. यह गरम और अधिक शुष्क मैदानी भागों में और अधिक वर्षा वाली नम जगहों पर दोनों ही प्रकार की जलवायु में पैदा किया जाता है. सर्दियों में पत्तियां गिर जाती हैं. फालसा पाले को भी सहन कर लेता है.

खेत में जो मिट्टी दूसरे फलों के लिए सही नहीं होती, फालसा की खेती उस में की जा सकती है यानी इस की खेती सभी तरह की मिट्टियों में संभव है, पर फिर भी अच्छी बढ़वार और उपज के लिए जीवांशयुक्त दोमट मिट्टी होनी चाहिए.

प्रजातियां : फालसा की कोई विशेष प्रजाति नहीं है. विभिन्न क्षेत्रों में इस की किस्म को लोकल या शरबती के नाम से पुकारते हैं. शरबती फालसे के पेड़ की ऊंचाई 3 फुट तक होती है. पेड़ पर लगने वाले कच्चे फल का?स्वाद खट्टा होता है और पके हुए फल का स्वाद खाने में कुछ खट्टा और कुछ मीठा होता है.

हिसार, हरियाणा में इस के पौधे 2 तरह से पहचाने जाते हैं, नाटे फल और लंबे फल. उत्पादकता के लिहाज से नाटे पौधे के पेड़ की ऊंचाई 25 फुट तक होती है. इस पेड़ पर लगने वाला कच्चा फल मीठा और खट्टा होता है. जब यह फल अच्छी तरह से पक जाता?है, तो बहुत ही मीठा हो जाता है.

फैलाव : फालसा का फैलाव ज्यादातर बीज की मदद से किया जाता है. मई महीने में सेहतमंद और पके फलों से बीजों को निकाल लिया जाता?है. बीजों को ज्यादा दिनों तक रखने से उगाने की कूवत खत्म हो जाती है, इसलिए इस को निकालने के 15-20 दिनों के अंदर बो देना चाहिए.

बीजों को पहले क्यारियों या गमलों में बोते हैं. उस के बाद उन्हें गमलों में से निकाल कर खेतों में लगा दिया जाता?है. फालसा का फैलाव कर्तनों द्वारा?भी मुमकिन है. लेकिन कर्तनें देर से और कठिनाई से जड़ें फोड़ती हैं. बीज को उगाने के लिए 15-20 दिन और रोपित करने के लिए 3-4 महीने की जरूरत होती है.

फिलीपींस में कलिकायन तरीके से फालसा बीज रोप कर भी कामयाबी पाई है, लेकिन भारत में अभी तक ऐसा कोई भी प्रयोग नहीं किया गया है.

रोपने का तरीका : फालसा को लगाने के लिए जनवरी या गरमियों में गड्ढे तकरीबन 30 सैंटीमीटर लंबे, ऊंचे और चौड़े आकार के तैयार किए जाते हैं. गड्ढों में 2 टोकरी गोबर की सड़ी हुई खाद और उसे मिट्टी के मिश्रण से भर दिया जाता है.

पौधों को रोपते समय कतार से कतार की दूरी और पौधे से पौधे की दूरी 1.5 से 2.0 मीटर की होनी चाहिए. जब पौधों की ऊंचाई 20-22 सैंटीमीटर हो जाती है, तो बारिश में उन को सही जगह पर रोप दिया जाता है.

नर्सरी में लगे हुए पौधे, जिन में सुषुप्तावस्था में आने से पहले काफी बढ़वार हो चुकी हो, फरवरी में खेत में रोप देना चाहिए.

खाद और उर्वरक : फालसा में खाद देने से उपज को और ज्यादा बढ़ाया जा सकता?है. तकरीबन 10-15 किलोग्राम अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद हर साल देनी चाहिए. फालसा का ज्यादा उत्पादन लेने के लिए 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 25 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर देनी चाहिए.

यह जरूरी है कि नाइट्रोजन वाली खाद 2 भागों में देनी चाहिए. पहला भाग फूल आते समय और दूसरा फल होने के बाद. साथ ही, एक किलोग्राम अमोनियम सल्फेट प्रति पौधा देना चाहिए.

यह फल आकार में बढ़ता है, जिस में जिंक सल्फेट 0.4 फीसदी फल पकने के पहले दिया जाना चाहिए, जिस से फल में जूस की मात्रा बढ़ती है यानी काटने के तुरंत बाद या सर्दी के अंत में खाद को पौधों के चारों तरफ एक मीटर के व्यास में फैला कर मिला देना चाहिए. खाद देने के तुरंत बाद सिंचाई करना जरूरी है.

हैदराबाद में भेड़ की मैगनी, तालाब की सिल्ट, पत्तियों की राख वगैरह देने से फायदा देखा गया है. सिंचाई और निराईगुड़ाई इस के पौधे सहनशील प्रकृति के होते?हैं, इसलिए पूरी तरह से विकसित पौधों को सिंचाई की जरूरत कम होती है. फालसा में पहली सिंचाई खाद डालने के बाद या फरवरी के दूसरेतीसरे हफ्ते में दें, उस के बाद मार्चअप्रैल में सिंचाई 20-25 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए और मई के महीने में इस अंतर को घटा कर 15-20 दिन कर देना चाहिए.

पौधों से अच्छी उपज लेने के मकसद से जनवरी से मई तक 15 दिनों के अंतराल से सिंचाइयां देते रहते हैं. प्रत्येक सिंचाई के बाद थालों की मिट्टी को उथले रूप में गाड़ देना चाहिए, जिस से मिट्टी में नमी रहने के साथसाथ खरपतवार खत्म किए जा सकते हैं.

कीट और बीमारियां

फालसा का पौधा ज्यादा सहनशील होने की वजह से इस पर कीड़े और बीमारियां कम लगती हैं. कभीकभी छिलका खाने वाला कीड़ा देखा जाता है. इन से फालसा में विशेष नुकसान पहुंचाने की संभावना नहीं होती है, क्योंकि फालसे के पौधों में हर साल गहन कृंतन किया जाता है. पत्तियों के धब्बों के लिए डाइथेन जैड-78 के 0.3 फीसदी घोल का 15 दिन के फासले पर छिड़काव करते हैं.

फालसा के सफल उत्पादन के लिए प्रयुक्त तकनीक के जरीए 1,05,000 की लागत आती है. फालसा का अच्छा उत्पादन लेने के लिए 3-5 किलोग्राम प्रति पौधा है और जिस का बाजार मूल्य 170 रुपए प्रति किलोग्राम मिल जाता है. इस से एक किसान कुल 89,000 रुपए प्रति हेक्टेयर आमदनी ले सकता है.

अंत:फसल चक्र : कुछ सालों तक कम दूरी तक जड़ें फैलने वाली सब्जियां या 2 दाल वाली फसलें पैदा की जा सकती हैं. फालसा एक पत्ते वाली झाड़ी है और अगर काटाछांटा न जाए, तो यह बढ़ कर पेड़ की तरह हो सकता है.

हर साल पौधों को दिसंबरजनवरी माह में जब पौधा सुषुप्तावस्था में होता है, सिरे को काटना जरूरी होता है. अगर फालसा को ज्यादा दूरी पर (3 मीटर) लगाया जाता है, तो कृंतन जमीन से 90 सैंटीमीटर की ऊंचाई से करना चाहिए और अगर इन के लगाने का अंतर कम (2 मीटर) रखा गया है, तो पौधों को 30 सैंटीमीटर से 45 सैंटीमीटर ऊंचाई दे कर सिरे से काटते हैं.

दक्षिण भारत में फालसा को बिना काटे हुए पेड़ के रूप में बढ़ने दिया जाता है और कहींकहीं पर इन को जमीन के बहुत पास से काट देते हैं. बहुत से फल उत्पादन करने वाले फालसा के पौधों को बिलकुल ही जला देते हैं, जिस से उस के ऊपर कोई भी अंश दिखाई न दे. पंजाब कृषि विभाग, लायलपुर ने अनुसंधान का काम कर के ऐसी जानकारी हासिल की थी कि फालसा के पौधों को जमीन से 120 से 150 सैंटीमीटर की ऊंचाई से काटना चाहिए. ऐसा करने से उन में नई बढ़वार ज्यादा होती है और फल भी ज्यादा होते हैं.

फूल आना और फलना

फालसा में फूल जल्दी पैदा होते?हैं. पौधा लगाने के 3 साल बाद यह अच्छी उपज देने लगते हैं. दक्षिणी भारत में इस के फल मार्च महीने में पकने लगते?हैं और मई महीने के अंत या जून महीने के शुरू तक खत्म हो जाते हैं.

पंजाब और उत्तर प्रदेश में फल मई महीने के अंत तक चलते?हैं और कभीकभी जुलाई महीने तक भी चलते रहते हैं. प्रति पौधे से 3-10 किलोग्राम फल मिलते हैं. इस के फल एकएक कर के तोड़े जाते हैं. जब फलों का रंग लाल हो जाता है, तो फलों को हाथ से सावधानीपूर्वक तोड़ लिया जाता है.

फलों की तुड़ाई सुबह के समय करनी चाहिए. फल तोड़ने के एक दिन बाद ही यह खराब होने लगते?हैं, इसलिए इन को तोड़ कर पास वाले बाजार में बेच दिया जाता है. इस के उद्यान ज्यादातर ठेकेदारों को बेच दिए जाते हैं और फलों को तोड़ कर बाजार में फुटकर रूप में बेचते रहते हैं.

सहयोग- भाग 1: क्या सीमा और राकेश का तलाक हुआ?

सीमा को मायके गए2 महीने बीत चुके थे. अकेलेपन की बेचैनी और परेशानी महसूस करने के साथसाथ राकेश को अपने 5साल केबेटे मोहित की याद भी बहुत सता रही थी.

कुछ रिश्तेदारों ने सीमा को वापिस बुलाया भी, पर वो लौटने को तैयार नहीं थी. राकेश और सीमा की कोविड के दिनों में कई बार जमकर झड़प हुई थी और जैसे ही छूट मिली सीमा मायके जा बैठी.

राकेश ने अब तक सीमा से सीधे बात नहीं की थी. दबाव बनाने के लिए अब उस ने टकराव का रास्ता अपनाने का फैसला कर लिया.

एक रविवार की सुबहसुबह वो सीमा की अनिता बुआ से मिल उन के घर पहुंच गया. राकेश बुआ की बुद्धिमता का कायल था. वो राकेश को काफी पसंद करती थी. सब से महत्वपूर्ण बात ये थी कि उन की अपने भाई के घर में खूब चलती थी. वह विधवा थी शायद इसलिए लोग लिहाज करते थे. उन की बात को नकारने का साहस किसी में न था.

राकेश ने सीमा से झगड़े का जो ब्यौरा दिया, उसे अनिता बुआ ने बड़े ध्यान से खामोश रह कर सुना. हुआ यह था कि एक रविवार की सुबह राकेश मां के घुटनों के दर्द का इलाज कराने उन्हें डाक्टर को दिखाने ले गया था.

रिपोर्ट और एक्सरे घर में छूट जाने के कारण उसे घंटे भर बाद ही अकेले घर लौटना पड़ा.

ड्राइंग रूम की खिड़की खुली हुई थी. इस के पास खड़े हो कर राकेश ने वो बातें सुन ली जिन्हें सीमा ने उस से छिपा रखा था.

ड्राइंगरूम में सीमा के साथ उस का सहयोगी अध्यापक अजय मौजूद था. अजय पहले भी उन के घर कई बार आया था, पर हमेशा राकेश की मौजूदगी में. उस की पत्नी का करीब 4 साल पूर्व अपने पहले बच्चे को जन्म देते हुए देहांत हो गया था. बाद में वो शिशु भी बचाया नहीं जा सका.

‘‘अरे, यहां बैठों, सीमा. चायनाश्ते के चक्कर में न पड़ के कुछ प्यारमोहब्बत की बात करो और अपने हाथों को काबू में रखो.’’ सीमा ने अजय को डांटा था, पर उस की आवाज में गुस्से व नाराजगी के भाव नाटकीय लगे राकेश को.

‘‘अरे, जब दिल काबू में नहीं रहा, तो हाथ कैसे काबू में रखूं?’’

‘‘बेकार की बात न करो और सीधी तरह अपनी जगह बैठे रहो. मैं चाय बना कर लाती हूं.’’

‘‘भाई डियर, चाय की जगह अपने प्यारे हाथों से मीठी सी काफी मिला दो, तो मजा आ जाए.’’

‘‘रसोई में आने की जरूरत मत करना, नहीं तो बेलन पड़ेगा.’’

‘‘क्यों इतना दूर भागती हो? और कब तक भागोगी?’’

सीमा ने अजय के इन सवालों का कोई जवाब नहीं दिया था. अंदर से अखबार के पन्ने पलटने की आवाजें आने लगी, तो राकेश खिड़की के पास से हट कर बाहर सड़क पर आ गया.

उस का तनमन ईर्ष्या, गुस्से व नफरत की आग में सुलग रहा था. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि सीमा ने अपने सहयोगी के साथ अवैध प्रेम संबंध बना रखे थे.

राकेश ने गुस्से भरे लहजे में आगे बुआ को कहा, ‘‘बुआजी, अपनी काली करतूत नहीं देख रही है आप की भतीजी और मैं ने जरा हाथ उठा दिया, तो भाग कर मायके जा बैठी है. अब मेरे सब्र का बांध टूटने को तैयार है. अगर वो फौरन नहीं लौटी, तो बैठी रहेगी मायके में जिंदगी भर.’’

‘‘राकेश बेटा, औरतों पर हाथ उठाना ठीक बात नहीं है,’’ बुआ सोचपूर्ण लहजे में बोली, ‘‘फिर सीमा का कहना है कि वो चरित्रहीन नहीं है. तुम मारपीट करने के लिए पछतावा जाहिर कर देते, तो सारा मामला कब का सुलझ गया होता.’’

‘‘बुआजी, मैं कभी नहीं झुकूंगा इस मामले में.’’

‘‘और सीमा भी झुकने को तैयार नहीं है. फिर बात कैसे बनेगी?’’

‘‘मैं ने कोर्ट का रास्ता पकड़ लिया, तो सारी अक्ल ठिकाने आ जाएगी उस की.’’

राकेश की इस धमकी को ले कर बुआ ने फौरन कोई प्रतिक्रिया प्रकट नहीं करी. वो सोच में डूबी खामोश रही.

सौतेली- भाग 4: शेफाली के मन में क्यों भर गई थी नफरत

‘‘मैं इस के लिए तुम पर जोर भी नहीं डालूंगा, मगर तुम उस से एक बार मिल लो…शिष्टाचार के नाते. वह ऊपर कमरे में है,’’ पापा ने कहा.

‘‘मैं सफर की वजह से बहुत थकी हुई हूं, पापा. इस वक्त आराम करना चाहती हूं. इस बारे में बाद में बात करेंगे,’’ शेफाली ने अपने कमरे की तरफ बढ़ते हुए रूखी आवाज में कहा.

शेफाली कमरे में आई तो सबकुछ वैसे का वैसा ही था. किसी भी चीज को उस की जगह से हटाया नहीं गया था.

मानसी और अंकुर वहां उस के इंतजार में थे.

कोशिश करने पर भी शेफाली उन के चेहरों या आंखों में कोई मायूसी नहीं ढूंढ़ सकी. इस का अर्थ था कि उन्होंने मम्मी की जगह लेने वाली औरत को स्वीकार कर लिया था.

‘‘तुम दोनों की पढ़ाई कैसी चल रही है?’’ शेफाली ने पूछा.

‘‘एकदम फर्स्ट क्लास, दीदी,’’ मानसी ने जवाब दिया.

‘‘और तुम्हारी नई मम्मी कैसी हैं?’’ शेफाली ने टटोलने वाली नजरों से दोनों की ओर देख कर पूछा.

‘‘बहुत अच्छी. दीदी, तुम ने मां को नहीं देखा?’’ मानसी ने पूछा.

‘‘नहीं, क्योंकि मैं देखना ही नहीं चाहती,’’ शेफाली ने कहा.

‘‘ऐसी भी क्या बेरुखी, दीदी. नई मम्मी तो रोज ही तुम्हारी बातें करती हैं. उन का कहना है कि तुम बेहद मासूम और अच्छी हो.’’

‘‘जब मैं ने कभी उन को देखा नहीं, कभी उन से मिली नहीं, तब उन्होंने मेरे अच्छे और मासूम होने की बात कैसे कह दी? ऐसी मीठी और चिकनीचुपड़ी बातों से कोई पापा को और तुम को खुश कर सकता है, मुझे नहीं,’’ शेफाली ने कहा.

शेफाली की बातें सुन कर मानसी और अंकुर एकदूसरे का चेहरा देखने लगे.

उन के चेहरे के भावों को देख कर शेफाली को ऐसा लगा था कि उन को उस की बातें ज्यादा अच्छी नहीं लगी थीं.

मानसी  से चाय और साथ में कुछ खाने के लिए लाने को कह कर शेफाली हाथमुंह धोने और कपडे़ बदलने के लिए बाथरूम में चली गई.

सौतेली मां को ले कर शेफाली के अंदर कशमकश जारी थी. आखिर तो उस का सामना सौतेली मां से होना ही था. एक ही घर में रहते हुए ऐसा संभव नहीं था कि उस का सामना न हो.

मानसी चाय के साथ नमकीन और डबलरोटी के पीस पर मक्खन लगा कर ले आई थी.

भूख के साथ सफर की थकान थी सो थोड़ा खाने और चाय पीने के बाद शेफाली थकान मिटाने के लिए बिस्तर पर लेट गई.

मस्तिष्क में विचारों के चक्रवात के चलते शेफाली कब सो गई उस को इस का पता भी नहीं चला.

शेफाली ने सपने में देखा कि मम्मी अपना हाथ उस के माथे पर फेर रही हैं. नींद टूट गई पर बंद आंखों में इस बात का एहसास होते हुए भी कि? मम्मी अब इस दुनिया में नहीं हैं, शेफाली ने उस स्पर्श का सुख लिया.

फिर अचानक ही शेफाली को लगा कि हाथ का वह कोमल स्पर्श सपना नहीं यथार्थ है. कोई वास्तव में ही उस के माथे पर धीरेधीरे अपना कोमल हाथ फेर रहा था.

चौंकते हुए शेफाली ने अपनी बंद आंखें खोल दीं.

आंखें खोलते ही उस को जो चेहरा नजर आया वह विश्वास करने वाला नहीं था. वह अपनी आंखों को बारबार मलने को विवश हो गई.

थोड़ी देर में शेफाली को जब लगा कि उस की आंखें जो देख रही हैं वह सच है तो वह बोली, ‘‘आप?’’

दरअसल, शेफाली की आंखों के सामने वंदना का सौम्य और शांत चेहरा था. गंभीर, गहरी नजरें और अधरों पर मुसकराहट.

‘‘हां, मैं. बहुत हैरानी हो रही है न मुझ को देख कर. होनी भी चाहिए. किस रिश्ते से तुम्हारे सामने हूं यह जानने के बाद शायद इस हैरानी की जगह नफरत ले ले, वंदना ने कहा.

‘‘मैं आप से कैसे नफरत कर सकती हूं?’’ शेफाली ने कहा.

‘‘मुझ से नहीं, लेकिन अपनी मां की जगह लेने वाली एक बुरी औरत से तो नफरत कर सकती हो. वह बुरी औरत मैं ही हूं. मैं ही हूं तुम्हारी सौतेली मां जिस की शक्ल देखना भी तुम को गवारा नहीं. बिना देखे और जाने ही जिस से तुम नफरत करती रही हो. मैं आज वह नफरत तुम्हारी इन आंखों में देखना चाहती हूं.

‘‘हम जब पहले मिले थे उस समय तुम को मेरे साथ अपने रिश्ते की जानकारी नहीं थी. पर मैं सब जानती थी. तुम ने सौतेली मां के कारण घर आने से इनकार कर दिया था. किंतु सौतेली मां होने के बाद भी मैं अपनी इस रूठी हुई बेटी को देखे बिना नहीं रह सकती थी. इसलिए अपनी असली पहचान को छिपा कर मैं तुम को देखने चल पड़ी थी. तुम्हारे पापा, तुम्हारी बूआ ने भी मेरा पूरा साथ दिया. भाभी को सहेली के बेटी बता कर अपने घर में रखा. मैं अपनी बेटी के साथ रही, उस को यह बतलाए बगैर कि मैं ही उस की सौतेली मां हूं. वह मां जिस से वह नफरत करती है.

‘‘याद है तुम ने मुझ से कहा था कि मैं बहुत अच्छी हूं. तब तुम्हारी नजर में हमारा कोई रिश्ता नहीं था. रिश्ते तो प्यार के होते हैं. वह सगे और सौतेले कैसे हो सकते हैं? फिर भी इस हकीकत को झुठलाया नहीं जा सकता कि मैं मां जरूर हूं, लेकिन सौतेली हूं. तुम को मुझ से नफरत करने का हक है. सौतेली मांएं होती ही हैं नफरत और बदनामी झेलने के लिए,’’ वंदना की आवाज में उस के दिल का दर्द था.

‘‘नहीं, सौतेली आप नहीं. सौतेली तो मैं हूं जिस ने आप को जाने बिना ही आप को बुरा समझा, आप से नफरत की. मुझ को अपनेआप पर शर्म आ रही है. क्या आप अपनी इस नादान बेटी को माफ नहीं करेंगी?’’ आंखों में आंसू लिए वंदना की तरफ देखती हुई शेफाली ने कहा.

‘‘धत, पगली कहीं की,’’ वंदना ने झिड़कने वाले अंदाज से कहा और शेफाली का सिर अपनी छाती से लगा लिया.

प्रेम के स्पर्श में सौतेलापन नहीं होता. यह शेफाली को अब महसूस हो रहा था. कोई भी रिश्ता हमेशा बुरा नहीं होता. बुरी होती है किसी रिश्ते को ले कर बनी परंपरागत भ्रांतियां.

Monsoon Special: बारिश के मौसम में ऐसे बनाएं कच्चे पपीते की चटनी

लेखक-डा. रश्मि यादव

पपीता सभी जगह मिलने वाला सदाबहार फल है, पर पेड़ से टूटने के बाद ज्यादा दिनों तक इसे ताजा नहीं रखा जा सकता. ताजा पपीता ही सेहत के लिए अच्छा होता है. इस समय मौसम में हो रहे बदलाव के कारण आंधीपानी के चलते कच्चे पपीते टूट कर गिर जाते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में कच्चे पपीते के उपयोग की जानकारी न होने की कमी में लोग पपीते को फेंक देते हैं. ऐसा न करें, क्योंकि कच्चा पपीता भी हमारी सेहत के लिए लाभकारी होता है,

इसलिए इस का मूल्यसंवर्धन कर संरक्षित करें. पपीता में पकने की अवधि जैसजैसे बढ़ती है, वैसेवैसे इस में विटामिन सी की मात्रा बढ़ती जाती है. वैज्ञानिक शोध के मुताबिक, कच्चे पपीते में विटामिन सी 40 से 90 मिलीग्राम, अधपके पपीते में विटामिन सी 50 से 90 मिलीग्राम और पके पपीते में 60 से 140 मिलीग्राम तक विटामिन सी बढ़ जाता है. इस में शर्करा और विटामिन सी मई से अक्तूबर तक अधिक होता है. पपीते से विभिन्न खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं,

जैसे पके पपीते से जैम और जैली बनाए जाते हैं, वहीं कच्चे पपीते से चटनी, सब्जी आदि बनाई जाती हैं. यहां पर हम आप को कच्चे पपीते की चटनी बनाने के बारे में जानकारी दे रहे हैं :

बनाने की विधि

* पपीते को धो कर छील लें और उसे कद्दूकस कर लें. कद्दूकस किए पपीते को नमक के पानी में मुलायम होने तक पकाएं.

* पके पपीते में चीनी और पिसा प्याज, लहसुन व कटी अदरक मिला कर गाढ़ा होने तक पकाएं.

* अब आंच से उतार कर बनी चटनी में सभी मसाले, छुआरा व किशमिश मिला दें.

* इस के बाद 5 ग्राम सोडियम बैंजोएट मिलाएं.

* तैयार चटनी में 20 से 25 ग्राम एसिटिक एसिड मिला दें.

* अब इस में भुना हुआ जीरा मिला कर अच्छी तरह से मिक्स कर दें.

* गरम अवस्था में ही चटनी को साफ जार में भर कर संरक्षित कर लें. अगर आप चाहें तो इस का अच्छा व्यवसाय भी किया जा सकता है, जो आमदनी का एक अच्छा स्रोत साबित हो सकता है.

Monsoon Special: 4 सप्ताह में आप भी करें 4 किलो वजन कम

नेहा 4 हफ्ते बाद होने वाली अपनी बैस्ट फ्रैंड की बैचलर पार्टी में हौट दिखना चाहती है, लेकिन अपने बढ़ते वजन से परेशान है कि पार्टी में शौर्ट ड्रैस कैसे पहने? इन 4 हफ्तों में अपना वजन कैसे घटाए? नेहा की इस समस्या का समाधान करते हुए पचौली स्पा की ओनर न्यूट्रीशियन प्रीति सेठ कहती हैं, ‘‘आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में वजन घटाना सचमुच एक चैलेंज है. मोटापा मौडर्न युग का रोग है, जो हर तरह की बीमारी को न्योता देता है. अगर आप कम समय में स्लिमट्रिम बनना चाहती हैं तो आप को ऐसे फिटनैस प्लान की जरूरत है जो 4 हफ्तों में आप के फिटनैस से जुड़े सपने को पूरा कर दे.’’

फिटनैस के 4 वीक

एक बार मोटी हो जाएं तो फिर नौर्मल शरीर पाना बहुत कठिन हो जाता है. लेकिन कुछ उपाय ऐसे हैं, जिन्हें तवज्जो दे कर आप सिर्फ 4 वीक में 4 किलोग्राम वजन कम करने में कामयाब हो सकती हैं.

बीएमआर को बढ़ाएं

अगर आप वजन कम करना चाहती हैं, तो सब से पहले अपने बीएमआर यानी बेसल मैटाबोलिक रेट को बढ़ाना जरूरी है. इसे बढ़ाने के लिए आप को अपनी दिनचर्या और खानपान में बदलाव लाने की जरूरत है.

4 बातों को कहें न

– ओवरईटिंग न करें.

– तरल पदार्थों का सेवन बिना सोचेसमझे न करें.

– कृत्रिम शुगर लेने से बचें.

– ब्रेकफास्ट मिस न करें.

4 बातों का ध्यान रखें

– रोज सुबह 1 गिलास कुनकुने पानी में नीबू का रस और शहद मिला कर पीएं.

– संतुलित आहार का सेवन करें.

– स्नैक्स में पौष्टिक चीजों का सेवन करें. जैसे सलाद, गाजर, खीरा, ककड़ी, भुने चने, मुरमुरा आदि.

– तेजी से वेट लौस के लिए जरूरी है आप डाइट के साथसाथ ऐक्सरसाइज भी शुरू कर दें. शुरू में चाहे कम ऐक्सरसाइज करें लेकिन बाद में धीरेधीरे समय बढ़ाती जाएं. ऐक्सरसाइज से पहले जंप करना, टहलना, बौडी स्ट्रैच आदि से खुद को वार्मअप करना न भूलें. इस से बौडी में गरमाहट आएगी.

4 चीजें करें

फिजिकल ऐक्टिविटीज :

वजन कम करने के लिए जितना जरूरी खानपान पर नियंत्रण रखना है, उतना ही जरूरी है शरीर को ऐक्टिव रखना भी. अत: रोज कम से कम 30 मिनट व्यायाम जरूर करें. शरीर के हर हिस्से के लिए ऐक्सरसाइज करें. एरोबिक्स कर सकती हैं, ट्रेडमिल की मदद भी ले सकती हैं.

भोजन में अंतराल :

ज्यादातर महिलाएं हड़बड़ी में सुबह का नाश्ता छोड़ देती हैं और दोपहर में भी ठीक तरह से नहीं खाती हैं तो कई बार जरूरत से ज्यादा खा लेती हैं, क्योंकि सुबह का नाश्ता न करने के कारण तेज भूख लगती है. या फिर रात को डिनर में पूरे दिन की कमी पूरी करती हैं. यह भोजन करने का सही तरीका नहीं है. नियमित अंतराल पर थोड़ाथोड़ा खाते रहना चाहिए ताकि शरीर को नियमित ऊर्जा मिलती रहे और वह निरंतर सही तरीके से चलता रहे.

बौडी को हाईड्रेट करें :

अपनी बौडी को हाईड्रेट करने के लिए रोज कम से कम 4-5 लिटर पानी जरूर पीएं. इस से शरीर के टौक्सिन और हानिकारक चीजें बाहर निकल जाती हैं. यदि आप गरम प्रदेश में रहती हैं तो और ज्यादा पानी पीने की जरूरत है. यदि आप को कोई बीमारी है तो कितना पानी पीना चाहिए इस संबंध में चिकित्सक से परामर्श जरूर लें.

डाइट :

फिट रहने के लिए संतुलित डाइट का सेवन जरूरी है. आप की डाइट में फाइबरयुक्त भोजन जैसे, चोकर, सब्जियां और फल जरूर होने चाहिए. कार्बोहाइड्रेट के बजाय प्रोटीनयुक्त भोजन का सेवन अधिक करना चाहिए. दिन की शुरुआत प्रोटीनयुक्त भोजन जैसे दूध और अन्य दुग्ध उत्पादों से करें. रोज फल, पपीता और सेब जरूर खाएं. नीबू पानी, लस्सी, छाछ, ग्रीन टी, कोल्ड कौफी को मिला कर रोज 15-16 गिलास पानी का सेवन वजन कम करने के लिए जरूरी है.

सैंपल डाइट (पहला और दूसरा दिन)

ब्रेकफास्ट : चाय, कौफी या दूध के साथ पनीर या सोया सैंडविच.

मिड मील : नीबू पानी के साथ 6-7 बादाम.

लंच: सलाद और चोकर की रोटी के साथ पनीर या सोया भुरजी.

शाम का नाश्ता: 2 डाइजैस्टिव बिस्कुट के साथ चाय.

डिनर: सलाद के साथ पनीर या सोया टिक्की.

तीसरा दिन

ब्रेकफास्ट: आमलेट के साथ बेसन का चिल्ला.

मिड मील: नीबू पानी के साथ सब्जियां.

शाम का नाश्ता: 2 डाइजैस्टिव बिस्कुट के साथ चाय.

डिनर: दूध और व्हीट फ्लैक्स.

चौथा दिन

घिया: इसे किसी भी रूप में खाएं. चाहें तो घिया स्टफ्ड रोटी बनाएं या सब्जी.

5वां और छठा दिन

नियमित भोजन, लेकिन चोकर की रोटी के साथ.

7वां दिन

तरल पेयपदार्थ और फलों के साथ डिटौक्स. 4 हफ्ते के इस डाइट चार्ट का पालन करने पर 4 किलोग्राम वजन घटाना आसान हो जाएगा. बस थोड़ी सी मेहनत और इच्छाशक्ति की जरूरत है. इस दौरान समयसमय पर चिकित्सक से परामर्श लेना न भूलें.

Anupamaa: फैंस ने की तोषु से शिकायत, अनुपमा-बरखा ने किया शानदार डांस

सुधांशु पांडे, रूपाली गांगुली स्टारर सीरियल अनुपमा में इन दिनों लगातार ट्विस्ट दिखाया जा रहा है. शो के अपकमिंग एपिसोड में दर्शकों को हाईवोल्टेज ड्रामा देखने को मिलने वाला है. दरअसल शो में राखी दवे की भी एंट्री हो चुकी है. जिससे दर्शकों को एंटरटेनमेंट का जबरदस्त तड़का देखने को मिल रहा है.

शो में दिखाया जा रहा है कि बा भी अनुपमा के ससुराल वालों से बदला ले रही है. वह बरखा की जमकर बेईज्जती कर रही है. शो के अपकमिंग एपिसोड का दर्शकों को बेसब्री से इंतजार है.  इस बीच शो के कलाकारों ने किंजल के बेबी शॉवर की झलक सोशल मीडिया पर शेयर की है.

 

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आशीष मेहरोत्रा (तोषु) ने इंस्टाग्राम पर निधि शाह (किंजल) संग कई तस्वीरें शेयर की हैं. फैंस ने अपना रिएक्शन भी देना शुरू कर दिया तो वहीं कई फैंस आशीष से शिकायत भी करने लगे कि उन्होंने काफी लंबे समय बाद किंजल के साथ तस्वीरें शेयर की हैं.

 

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सेट से एक वीडियो सामने आया है, जिसमें अश्लेषा सावंत यानी कि बरखा भाभी तो हरियाणवी गाने पर जमकर धमाल मचाती हुई नजर आ रही हैं. इस वीडियो में बरखा भाभी के साथ अनुपमा भी नजर आ रही हैं.

 

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शो में दिखाया जाएगा कि बा सभी के सामने बरखा की बेइज्जत करेगी तो दूसरी ओर बरखा भी अपनी अगली चाल चल  देगी. वह राखी दवे को किंजल के साथ हुए हादसे के बारे में बताएगी जिससे शाह हाउस में जमकर हंगामा होगा.

 

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द्रोपदी मुर्मू की प्रशासनिक दक्षता और देश

इन दिनों देश के चाक चौराहे, दफ्तर पर सोशल मीडिया में एक ही चर्चा है प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी का मास्टर स्ट्रोक, राष्ट्रपति चुनाव और उम्मीदवार द्रोपदी मुर्मू के गांव में बिजली लगाए जाने की तैयारियां.

दरअसल,इस सब को सुर्खियों में देख कर के यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि हमारी भावी राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू जो  मंत्री और राज्यपाल रही हैं अपने गांव का विकास नहीं कर पाई अपने गांव में बिजली नहीं पहुंचा पाई हैं तो फिर यह कैसी प्रशासनिक दक्षता है. क्या वे राजनीति में एकदम सीधी साधी भोली भाली है क्या उन्हें समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है. जब आप अपने ही गांव में अपने ही क्षेत्र में विकास नहीं करवा पाईं है तो भला सबसे महत्वपूर्ण “संवैधानिक” पद पर बैठकर किए करके देश का क्या भला कर पाएंगी?

वस्तुत: भारत एक ऐसा देश है जहां कोई पंच और सरपंच बन जाता है तो अपने गली मोहल्ले और गांव का विकास करने लगता है. और उससे भी बड़ा सच यह है कि निककमा है, नहीं करता है तो लोग उसे उकसा करके विकास करने पर मजबूर कर देते हैं.

ऐसे में सीधा सरल सवाल है क्यों द्रोपदी मुर्मू के क्षेत्र में विकास नहीं हो पाया  जबकि आप इतनी प्रभावशाली मंत्री थीं, राज्यपाल थी. और जिनकी सीधी पहुंच मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री से थी, और बातें हुआ करती थी, राजनीति में जिनका इतना  वर्चस्व था अगर उनका अपना गांव अंधेरे में था, तो यह एक आश्चर्य की बात है. कहीं ऐसा तो नहीं सुर्खियां बटोरता उपरोक्त समाचार ही गलत हो.

मगर,आजादी के 75 वर्ष बाद भी अगर ऐसा है तो फिर सवाल तो उठना स्वाभाविक है कि आखिर हमारी भावी राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू की प्रशासनिक दक्षता क्षमता भला कैसी है? जो अपने गांव का विकास नहीं करवा पाई, राष्ट्रपति जैसा सर्वोच्च पद मिलने का उनका गांव इंतजार करता रहा. हमारा विनम्र सवाल यह भी है कि

क्या आप राजनीति में बिल्कुल भी बिल्कुल सन्यासी हैं… आपको अपने गांव और क्षेत्र के विकास से कोई मतलब नहीं है, जो होना है अपने आप होगा, प्रशासन के अधिकारी करेंगे आप किसी से कुछ भी नहीं कहेंगी?

सवाल यह भी है कि आखिर आप इतने साल राजनीति में रह करके  पदों पर रह कर के संवैधानिक हस्ती बनने के बाद भी अगर अपने गांव बिजली नहीं पहुंचा पाई तो फिर आने वाले समय में यह गरीब विकासोन्मुखी देश आपसे क्या अपेक्षा करेगा.

यह है सच्चाई ….

इसे देश का दुर्भाग्य कहा जाए या लालफीताशाही का भयावह मकड़जाल की देश और प्रदेश के वीवीआईपी प्रमुख हस्तियों के गांव मोहल्ले और शहर भी समस्याओं से ग्रस्त हैं जाने किस समय का इंतजार किया जा रहा है जब विकास की गंगा बहेगी.

यह दुर्भाग्य है कि आज राष्ट्रपति पद पर सुर्खियां बटोर रहीं द्रौपदी मुर्मू का पैतृक गांव बिजली की रोशनी से कोसों दूर था. मयूरभंज जिले के कुसुम प्रखंड अंतर्गत डूंगुरीशाही गांव उस दिन का इंतजार कर रहा था जब गांव की बेटी देश के सर्वोच्च पद पर उम्मीदवार बनेगी.

द्रौपदी मुर्मू ओडिशा के मयूरभंज जिले के ऊपरबेडा गांव में पैदा हुई थीं. लगभग 3500 की आबादी वाले इस गांव में दो टोले हैं. बड़ा शाही और डूंगरीशाही. बड़ाशाही में तो बिजली है लेकिन डूंगरीशाही आज भी अंधकार में डूबा हुआ था. यहां के लोग केरोसीन तेल से डीबरी जला कर रात का अंधियारा भगाते रहे और मोबाइल चार्ज करने के लिए आसपास कहीं दूर जाते थे.  द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार बनीं तो डूंगरीशाही चर्चा में आया. इस गांव में जब कुछ पत्रकार पहुंचे तो उन्हें यहां बिजली ही नहीं मिली. इसके बाद ये गांव सुर्खियों में आ गया. मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के निर्देश पर इस गांव में बिजली पहुंचाने की पहल हुई. यह सच है कि  भावी राष्ट्रपति  द्रौपदी मुर्मू के दिवंगत भाई भगत चरण के बेटे बिरंची नारायण टुडू समेत गांव में अन्य 20 परिवार कैरोसीन की रोशनी से रात के अंधकार को दूर भगाते हैं. वहीं, स्थानीय लोगों को मोबाइल चार्ज करने के लिए एक डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव जाना पड़ता था.

द्रौपदी मुर्मू का पैतृक गांव डूंगुरीशाही मयूरभंज जिले के रायरंगपुर से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. गांव के लोगों को आज  गर्व है, क्योंकि उनके गांव की बेटी, उनकी बहन देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद संभालने जा रही है. मगर उनके राजनीतिक और प्रशासनिक कामकाज पर लोग खुल कर बोल रहे हैं की आप अगर सक्रिय होतीं तो गांव में बिजली कब का पंहुच जाती .

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