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कहां हैं हंसराज

सियासत और संगीत में समान रूप से सक्रिय सूफी गायक हंसराज ‘हंस’ इन दिनों धर्म परिवर्तन को ले कर चर्चा में हैं. पिछले दिनों कई न्यूज साइट्स पर ऐसी खबर देखने को मिली कि उन्होंने इसलाम धर्म कबूल कर लिया है और अब उन का नया नाम मोहम्मद यूसुफ होगा, लेकिन म्यूजिक इंडस्ट्री में उन का नाम हंसराज ‘हंस’ ही होगा. इस अफवाह को हंसराज की तरफ से कोई अधिकारिक प्रतिक्रिया तो नहीं आई लेकिन उन के बेटे युवराज हंस ने जरूर इन बातों को महज अफवाह और बेबुनियाद करार दिया है. युवराज के मुताबिक, हंसराज ‘हंस’ ने ऐसा कुछ नहीं किया है बल्कि वे जालंधर में ही हैं और खराब स्वास्थ्य के चलते मीडिया से बात नहीं कर पा रहे हैं.      

क्यों रो पड़े नदीम

सालों पहले गुलशन कुमार की हत्या के दौरान देश छोड़ कर ब्रिटेन में रह रहे संगीतकार नदीम सैफी को भारत की याद सता रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि वे अपने मातापिता के साथ अपने पुराने घर में रहना चाहते हैं. 90 के दशक में सुपरहिट संगीत के लिए मशहूर जोड़ी नदीमश्रवण का हिस्सा रहे नदीम गुलशन कुमार की हत्या के मामले में कई आरोपों से घिरे थे, हालांकि वे खुद को बेकुसूर होने का दावा करते हैं. पिछले दिनों एक इंटरव्यू के दौरान वे रोने लगे. उन के मुताबिक, मैं नहीं चाहता कि मुझे बेकुसूर सुने बिना मेरे मांबाप की मौत हो. वे काफी अरसे से बीमार चल रहे हैं और उन्हें मेरी जरूरत है. ऐसे वक्त में मेरा उन के साथ होना बेहद जरूरी है. मैं उन्हें देखना चाहता हूं. आखिर मैं भी इंसाफ का हकदार हूं.

 

यौन शोषण का आरोप

बौलीवुड में कास्टिंग काउच के अस्तित्व को ले कर हमेशा बहस होती रही है. काफी समय पहले एक न्यूज चैनल के स्ंिटग औपरेशन ने इस मसले को अचानक सुर्खियों में ला दिया था. इस के बाद मधुर भंडारकर समेत कई बड़ी फिल्मी हस्तियों पर यौन शोषण के आरोप लगे. एक बार फिर से ऐसा ही मामला सामने आया है. हुआ यों कि निर्देशक सुभाष कपूर पर अभिनेत्री गीतिका त्यागी ने यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया है. जौली एलएलबी फिल्म को निर्देशित कर चुके सुभाष कपूर को गीतिका द्वारा रिकौर्ड किए गए वीडियो में शर्मिंदा होते दिखाया गया है. कई फिल्मों में काम कर चुकीं गीतिका ने इस वीडियो को अपने ट्वीटर पर अपलोड किया जिस से इस को ले कर हंगामा मचा.

यह किस्सा पुराना है. अभी इसे तूल देने के पीछे पब्लिसिटी स्टंट की मंशा बताई जा रही है.

 

महंगी पड़ गई शादी

अभिनेता रघुवीर यादव को दूसरी शादी महंगी पड़ रही है. पहले इस बात को ले कर मीडिया में उन की अच्छीखासी फजीहत हुई. अब एक अदालती आदेश ने उन्हें मुश्किल में डाल दिया है. दरअसल, दिल्ली की एक अदालत ने रघुवीर यादव को उन से अलग रह रही उन की पत्नी को 40 हजार रुपए प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया है.

हालांकि इस से पहले रघुवीर यादव ने अपनी सालाना आय 2 से सवा 2 लाख बताते हुए गुजारा भत्ते की राशि कम करने के लिए याचिका दी थी लेकिन अदालत ने उसे यह कह कर खारिज कर दिया कि उन की आमदनी इतनी कम नहीं हो सकती. ‘पीपली लाइव’ में ‘महंगाई डायन…’ गीत गाने वाले रघुवीर यादव को महंगाई शब्द का मतलब अब समझ आया होगा.

 

अमन की आशा

फिल्म विकी डोनर से जो स्डारडम लीड ऐक्टर आयुष्मान खुराना को मिला वैसा स्टारडम फिल्म की लीडिंग लेडी यामी गौतम को नहीं मिला. बहरहाल, इन दिनों यामी के पास खुश होने की वजह है. उन्हें फिल्म ‘ए वैडनेसडे’ और ‘स्पैशल 26’ बनाने वाले निर्देशक नीरज पांडे की फिल्म ‘टोटल सियापा’ जो मिल गई है.

यह फिल्म पहले ‘अमन की आशा’ टाइटल से बनाई जा रही थी. चूंकि फिल्म में नायक पाकिस्तानी व नायिका हिंदुस्तानी है और दोनों के किरदारों का नाम अमन और आशा है, इसलिए अमन की आशा टाइटल सब को ठीक लग रहा था लेकिन ऐन वक्त पर टाइटल बदल कर ‘टोटल सियापा’ कर दिया गया है. पर किरदारों के नाम वही रखे गए हैं जो पहले थे. वैसे इतने लंबे बे्रक के बाद बड़े परदे पर लौट रही यामी के लिए यह फिल्म सभी आशाएं पूरी करें तो बात बने.

 

हाईवे

‘हाईवे’ फिल्म देख कर लगा कि यह फिल्म उन इम्तियाज अली की तो नहीं लगती जिन्होंने ‘लव आजकल’ और ‘रौकस्टार’ जैसी रोमांटिक फिल्में बनाई थीं. दर्शकों में इम्तियाज अली की जो छवि बनी थी इस फिल्म से वह खराब ही होगी.

‘हाईवे’ किडनैपिंग पर बनी फिल्म है. एक लड़की, जिसे किडनैप कर लिया जाता है, किडनैपर से प्यार कर बैठती है, मगर किडनैपर उसे एक ट्रक के अंदर छिपा कर कई रातों तक अंधेरी सड़कों पर घूमता रहता है. यह भी बौलीवुड का एक सैट फार्मूला है जिसे अंगरेजी फिल्मों से काफी पहले उड़ाया गया था. इसी फार्मूले पर यह फिल्म बनी है.

‘हाईवे’ में जो रफ्तार होनी चाहिए थी वह नदारद है. आलिया भट्ट की यह दूसरी फिल्म है. पहली फिल्म ‘स्टूडैंट औफ द ईयर’ में तो वह ग्लैमरस लगी थी मगर इस फिल्म में उस का ग्लैमर गायब है.

इम्तियाज अली ने इस फिल्म को खूबसूरत बनाने के लिए हालांकि दिल्ली, हरियाणा, गुजरात और हिमाचल की खूबसूरत लोकेशनों का सहारा लिया है मगर उन्होंने पटकथा पर जरा सी भी मेहनत नहीं की है.

वीरा (आलिया भट्ट) की शादी की तैयारियां चल रही हैं. वह फोन कर के अपने मंगेतर को बुलाती है और उस से लौंग ड्राइव पर चलने को कहती है. रास्ते में एक पैट्रोल पंप पर एक अपराधी महावीर (रणदीप हुड्डा) उस का अपहरण कर लेता है. वह वीरा को ले कर अनजान सफर पर निकल पड़ता है.

इस सफर में वीरा, महावीर को चाहने लगती है. महावीर की कैद में रह कर भी वह खुद को आजाद महसूस करती है. एक मुकाम पर पहुंचने के बाद महावीर, वीरा से पिंड छुड़ाना चाहता है. तभी वीरा का पिता पुलिस के साथ आ धमकता है. पुलिस की गोली से महावीर मारा जाता है. वीरा की मानसिक हालत खराब हो जाती है. उसे लगता है कि अपने पिता के घर में भी वह असुरक्षित है. यहां वीरा के साथ बचपन में उस के अंकल द्वारा किए गए यौन शोषण का जिक्र किया गया है. वीरा घर छोड़ कर पहाड़ों पर उसी घर में चली जाती है जहां वह महावीर के साथ रही थी.

फिल्म की यह कहानी कछुआ चाल से चलती है. वीरा बजाय किडनैपर से डरने के उस से ऐसे बात करती है मानो वह उस के स्कूल का साथी हो.

फिल्म का निर्देशन सुस्त है. आलिया भट्ट के किरदार को विकसित होने का मौका नहीं मिला है. रणदीप हुड्डा का अभिनय भी रूखा सा है. ए आर रहमान का संगीत कुछ अच्छा है. छायांकन ठीक है. मगर शुरुआत की 1 घंटे की फिल्म रात के अंधेरे में शूट की गई है, इसलिए दर्शकों की आंखों को नहीं सुहाती. हमारी तो यही सलाह है कि इस हाईवे पर जाने से बचें.

 

 

हार्टलैस

अभिनेता से निर्देशक बने शेखर सुमन की फिल्म ‘हार्टलैस’ हौलीवुड की फिल्म ‘अवेक’ से प्रेरित है. शेखर सुमन ने अपने बेटे अध्ययन सुमन को हीरो बनाने के मकसद से इस फिल्म को बनाया है. लेकिन जब अपना सिक्का ही खोटा हो तो कोई क्या कर सकता है.

अध्ययन सुमन पिछले 5-6 वर्षों से फिल्मों में हाथपैर मार रहा है. लगभग 5 साल पहले उस की पहली फिल्म ‘हाले दिल’ का बुरा हश्र हुआ था. अभी लगभग 1 साल पहले साजिद खान ने उसे ‘हिम्मतवाला’ में खलनायक का रोल दिया था परंतु वह फिर भी नहीं चल पाया.

‘हार्टलैस’ शेखर सुमन के दिल के बहुत करीब है. उस के बड़े बेटे की करीब12 साल की उम्र में दिल की बीमारी की वजह से मौत हो गई थी. अपनी इस फिल्म में शेखर सुमन ने अपने दिल के दर्द को बयां करने की कोशिश की है. लेकिन फिल्म देख कर लगा कि निर्देशन के मामले में अभी उसे बहुतकुछ सीखना बाकी है.

फिल्म की कहानी एक बिजनैसमैन आदित्य (अध्ययन सुमन) की है. उसे दिल की बीमारी है और उस के दिल का प्रत्यारोपण होना है. अपनी इस बीमारी की वजह से आदित्य जीना नहीं चाहता. उस की मुलाकात दुबई के एक होटल में रिसैप्शनिस्ट रिया (एरियाना) से होती है. उस से मिलने के बाद आदित्य में जीने की चाह पैदा होती है. तभी अचानक आदित्य की तबीयत बिगड़ने लगती है. तुरंत हार्ट ट्रांसप्लांट कराने के लिए वह अपने एक सर्जन दोस्त (शेखर सुमन) की मदद लेता है. औपरेशन टेबल पर आदित्य को एनेस्थीसिया दिया जाता है और वह बेहोश भी हो जाता है परंतु उसे औपरेशन थिएटर की सारी आवाजें सुनाई पड़ती हैं और दर्द भी महसूस होता है.

तभी उस की जिंदगी में एक भूचाल सा आ जाता है. बेहोशी की हालत में उसे सुनाई पड़ता है कि उसे एक षड्यंत्र के तहत मारा जा रहा है. वह मर भी जाता है परंतु उस की मां आत्महत्या कर उसे अपना दिल दे जाती है. उस का दिल ट्रांसप्लांट होता है और वह बच जाता है. षड्यंत्र करने वाले पकड़े जाते हैं.

फिल्म की इस कहानी में बिलकुल दम नहीं है. नीना अरोड़ा की लिखी पटकथा कमजोर है. अध्ययन सुमन के चेहरे पर भाव नहीं आ पाते. फिल्म की यह कहानी एनेस्थीसिया अवेयरनैस का संदेश तो देती है लेकिन दर्शकों को अवेयर नहीं कर पाती. फिल्म का निर्देशन कमजोर है.

आदित्य और रिया के बीच दुबई की लोकेशनों पर 3 गाने भी फिल्माए गए हैं. ये गाने कहानी के प्रवाह में बाधा ही डालते हैं. ओमपुरी और दीप्ती नवल का काम कुछ अच्छा है. नई नायिका एरियाना ने निराश किया है. फिल्म का छायांकन अच्छा है.

गुंडे

आजकल जितनी भी फिल्में बन रही हैं, युवाओं को ध्यान में रख कर बनाई जा रही हैं. नएनए हीरो, हीरोइनें आएदिन परदे पर नजर आते हैं. रणवीर सिंह और अर्जुन कपूर भी ज्यादा पुराने नहीं हैं, मगर इन दोनों ने अपनी इमेज बना ली है. हाल ही में प्रदर्शित ‘…राम-लीला’ में रणवीर सिंह युवाओं की कसौटी पर खरा उतरा है. अर्जुन कपूर ने भी ‘इशकजादे’ में बेहतरीन परफौर्मेंस दे कर युवाओं में अपनी पैठ बना ली है.

‘गुंडे’ में अब इन दोनों युवा हीरो ने अपना जलवा दिखाया है. इन दोनों ने एंग्री यंगमैन का रोल कर युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश की है. ‘गुंडे’ दोस्ती पर बनी फिल्म है. दोस्ती भी ऐसीवैसी नहीं, ‘यह दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ वाली. मगर जब इन दोस्तों के बीच एक खूबसूरत लड़की आ जाती है तो दोस्ती की सारी कसमें धरी की धरी रह जाती हैं और दोनों एकदूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं. यही है फिल्म का मूल विषय यानी कि लव ट्राएंगल.

निर्देशक अली अब्बास जफर ने दोस्ती के इस आइडिया को फिल्म ‘शोले’ से उड़ाया है. ‘शोले’ के जय और वीरू की ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ दर्शक आज भी नहीं भूले हैं. निर्देशक ने फिल्म को दोस्ती के नाम पर बजाय कुछ नया कहने के इमोशंस, ऐक्शन और ड्रामा डाल कर एक चटपटी चाट की तरह बना डाला है.

फिल्म की कहानी 1971 की है. उस दौरान पाकिस्तान का विभाजन हुआ था और एक नए देश बंगलादेश का उदय हुआ था. हजारों शरणार्थी ढाका से भाग कर कोलकाता आए थे. इन शरणार्थियों में 2 किशोर विक्रम (रणवीर सिंह) और बाला (अर्जुन कपूर) भी थे. कोलकाता आ कर दोनों कोयले की चोरी करने लगते हैं. वे चलती ट्रेन से कोयला लूटते हैं.

कोलकाता में आए उन्हें कई साल हो चुके हैं. अब वे नामी गुंडे बन चुके हैं. शहर में उन के कई बिजनैस चलते हैं. इस मोड़ पर फिल्म में एंट्री होती है एसीपी सत्यजीत सरकार (इरफान खान) की. उसे गैरकानूनी कामों को खत्म करने का जिम्मा सौंपा गया है. वह विक्रम और बाला के पीछे पड़ जाता है. तभी विक्रम और बाला की मुलाकात एक कैबरे डांसर नंदिता (प्रियंका चोपड़ा) से होती है. दोनों गुंडे नंदिता से प्यार करने लगते हैं. मगर नंदिता सिर्फ विक्रम को पसंद करती है. इधर, सत्यजीत सरकार एक प्लान बना कर विक्रम और बाला के बीच दरार पैदा कराता है. विक्रम और बाला नंदिता को ले कर एकदूसरे के दुश्मन बन जाते हैं. तभी उन दोनों के सामने रहस्य खुलता है कि नंदिता तो पुलिस अफसर है और उन्हें फंसाने के लिए सत्यजीत सरकार ने नंदिता का इस्तेमाल किया है. वे दोनों नंदिता और सरकार को चकमा दे कर भाग निकलते हैं.

फिल्म की यह कहानी बंगलादेश से भाग कर कोलकाता आए शरणार्थियों से शुरू होती है. कहानी की शुरुआत में विक्रम और बाला के बचपन का किरदार कर रहे 2 किशोरों ने बहुत बढि़या काम किया है. बड़े होने पर ये दोनों किरदार ‘दो जिस्म एक जान’ बने रहते हैं.

निर्देशक ने विक्रम और बाला के किरदारों को इस तरह गढ़ा है कि साफ लगता है, विक्रम समझदार है और कोई भी काम बिना सोचेसमझे हाथ में नहीं लेता जबकि उस ने बाला को एकदम गुस्सैल दिखाया है.

फिल्म की शुरुआत तो काफी तेज है, मगर शीघ्र ही कहानी में ठहराव सा आ जाता है. मध्यांतर के बाद फिल्म की गति फिर से तेज हो जाती है. क्लाइमैक्स काफी लंबा है. निर्देशक विक्रम और बाला की दोस्ती में दरार को दमदार ढंग से पेश नहीं कर पाया.

इस फिल्म में बरसों पहले रिलीज हुई ‘कोयला’ और ‘काला पत्थर’ फिल्मों की झलक मिल जाती है. इस फिल्म के कई दृश्यों की शूटिंग असली कोयला खदानों में की गई है. अर्जुन कपूर का रणवीर सिंह के गोदामों को बारूद से उड़ाना बचकाना लगता है. रणवीर सिंह ने अच्छा काम किया है. अर्जुन कपूर का काम भी अच्छा है परंतु उस की संवाद अदायगी कमजोर है. प्रियंका चोपड़ा कमजोर रही. इरफान खान के किरदार को निर्देशक सही दिशा नहीं दे सका है.

फिल्म का गीतसंगीत साधारण है. एक गीत ‘तुम ने मारी एंट्रियां तो बजने लगी घंटियां…’ अच्छा बन पड़ा है. इस गाने में रणवीर सिंह और अर्जुन कपूर दोनों खूब नाचे हैं और मस्ती की है. एक और इंगलिश कैबरे ‘सलामे इश्क ओ यारा…’ पर प्रियंका चोपड़ा खूब थिरकी है. यह गीत भी कुछ अच्छा बन पड़ा है. फिल्म का छायांकन ठीक है.

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