Download App

GHKKPM: देवर-भाभी के रोमांस को देख खौला फैंस का खून, पाखी को मिला चुड़ैल का टैग

टीवी सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) में लीप के बाद कहानी में हाईवोल्टेज ड्रामा देखने को मिल रहा है. शो में दिखाया जा रहा है कि सई अपनी बेटी के साथ जिंदगी गुजार रही है. तो वहीं पाखी और विराट ने विनायक को माता-पिता का प्यार देने के लिए शादी कर ली है. शादी के बाद पाखी अपना पूरा समय चौहान परिवार को दे रही है. इसी बीच फैंस ने पाखी को चुड़ैल का टैग दिया है. आइए बताते हैं, क्या है पूरा मामला…

शो के आने वाले एपिसोड में आप देखेंगे कि विराट और पाखी को करीब लाने के लिए भवानी ने दोनों को हनीमून पर भेजने का फैसला किया है. शो में जल्द ही दिखाया जाएगा कि विराट और पाखी हनीमून पर जाएंगे.

 

सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ की कहानी में आये इस बदलाव को फैंस पसंद नहीं कर रहे हैं. यही वजह है जो एक बार फिर से सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ के फैंस ने मेकर्स को ट्रोल करना शुरू कर दिया है. फैंस नील भट्ट और ऐश्वर्या शर्मा को भी जमकर खरीखोटी सुना रहे हैं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by sairat??❤ (@gukkpm_serial)

 

एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा है कि हर बार मेकर्स मुझे गलत साबित करते हैं. जब भी मुझे लगता है कि सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ की कहानी में कुछ अच्छा होता तभी मेकर्स कोई घटिया सा ट्विस्ट ले आते हैं. इस शो के मेकर्स की सोच वाकई बहुत घटिया है. इस शो को तो बंद कर देना चाहिए. इतना ही नहीं कुछ लोग तो मेकर्स को बेवकूफ तक बता रहे हैं.

 

त्यौहार 2022 : कुछ मीठा खाने का मन करे तो बनाएं बेसन का हलवा

कभी- कभी आपका मन करता है कुछ अलग खाने का तो ऐसे में आप चाहे तो घर पर बेसन का हलवा बना सकते हैं. इसे बनाने में भी कम वक्त लगता है. आइए जानते हैं बेसन का हलवा बनाने का तरीका.

सामग्री−

आधा कप देसी घी

एक कप बेसन

दो टेबलस्पून सूजी

ये भी पढ़ें- व्यवहार ‘ना’ कहने की कला और इस का फायदा

आधा कप चीनी

तीन चौथाई कप केसर का पानी

इलायची का पाउडर

मिक्स डाई फ्रूट्स

विधि

बेसन का हलवा बनाने के लिए सबसे पहले आप एक नॉन−स्टिक पैन में आधा कप देसी घी डालकर गर्म करें. अब इसमें करीबन एक कप बेसन डालें. अब गैस को लो फ्लेम करके बेसन को पकाएं. अब इसमें सूजी डालकर तब तक पकाएं, जब तक इसका रंग व टेक्सचर ना बदल जाए. आप जैसे−जैसे इसे पकाते जाएंगे, यह धीरे−धीरे लिक्विड होता चला जाएगा. साथ ही इसका कलर लाइट होता चला जाएगा.

ये भी पढ़ें- फेस्टिवल स्पेशल: मीठा खाने का मन करे तो घर पर बनाएं कच्चे पपीते का हलवा

जब यह अच्छी तरह पक जाए तो इसमें चीनी व केसर का पानी डालें. केसर का पानी बनाने के लिए आप तीन चौथाई कप पानी में सात−आठ केसर के धागे मिलाएं. अगर आपके पास केसर नहीं है तो आप सादा पानी मिलाएं. अब इसे अच्छी तरह चलाएं ताकि वह गाढ़ा हो जाए और वह पैन की साइड्स छोड़ने लगे. अब इसमें एक छोटा चम्मच हरी इलायची का पाउडर व डाई फ्रूट्स मिक्स करें. आखिरी में इसमें एक चम्मच घी डालकर अच्छी तरह मिलाएं.

आपका टेस्टी−टेस्टी बेसन का हलवा बनकर तैयार है. बस आप इसे सर्विंग बाउल में निकालें और फैमिली के साथ मिलकर खाएं.

नोटः बेसन कड़ाही में बेहद जल्दी चिपकता है, इसलिए हलवा बनाने के लिए नॉन−स्टिक पैन का इस्तेमाल करें. साथ ही हलवा बनाते समय पूरे टाइम का गैस का फ्लेम लो ही रखें.

त्यौहार 2022: घर पर बनाएं आटे की बर्फी

घर पर कुछ न कुछ अक्सर मीठा बनते ही रहता है. ऐसे में आपको बता दें कि इन दिनों आपको बाहर का खाना ज्यादा पसंद नहीं आ रहा है तो आप अपने घर पर ही कुछ मीठा बना सकते हैं. ऐसे में आपको बताने जा रहे हैं. आटे की मदद से कैसे बनाएं बर्फी.

सामग्री−

डेढ़ कप गेंहू का आटा

आधा कप घी

ये भी पढ़ें- वक्ता ही नहीं अच्छे श्रोता के भी हैं कई लाभ

आधा कप मिल्क पाउडर

एक कप चीनी

एक कप पानी

आधा छोटा चम्मच इलायची पाउडर

विधि−

ये भी पढ़ें- चावल के आटे से बनाएं पौष्टिक राइस रोल

आटा बर्फी बनाने के लिए सबसे पहले आप एक पैन लें. अब इसमें घी हल्का गर्म करें. इसके बाद इसमें आटा डालें और इसे गोल्डन होने तक रोस्ट होने दें. जब आटे में से खुशबू आए तो आप आंच बंद कर दें. अब इसमें मिल्क पाउडर डालकर अच्छी तरह मिक्स कर दें.

अब एक दूसरा पैन लें. अब इसमें चीनी और पानी डालें. इसे तब तक गर्म करें, जब तक कि चीनी मेल्ट ना हो जाए. अब एक प्लेट लेकर उस पर घी की मदद से हल्का ग्रीस करें. ध्यान रखें कि चीनी की चाशनी बहुत अधिक ना उबलें. बस आप चिपचिपी चाशनी तैयार करें. अब आंच बंद कर दें और एक तरफ रखें. अब गैस को धीमा करके आटे के मिश्रण में चीनी का सिरप डालकर मिक्स करें. इसे तब तक पकाएं, जब तक कि वह पैन ना छोड़ने लगे.

ये भी पढ़ें- सेब और नारियल की बर्फी घर पर बनाएं मेहमान भी हो जाएंगे हैरान

इसके बाद आंच बंद करें और ट्रे में ट्रांसफर करें. इसे फैलाएं और इसे ऊपर से चिकना करें. किसी भी ड्राई फ्रूट्स / सिल्वर वार्क से गार्निश करें. करीबन 15−30 मिनट के लिए सेट होने दें. 15 मिनट बाद चेक करें. अगर बर्फी सेट हो गई है तो उसे टुकड़ों में काटें.

आपकी आटे की बर्फी तैयार है. आप इसे फैमिली के साथ एन्जॉय कर सकते हैं.

जब हमने इस रेसिपी से आटा बर्फी को बनाया तो यकीनन यह बेहद ही टेस्टी थी. अगर आप आटा हलवा नहीं खाते तो आटा बर्फी आपको एक बार जरूर ट्राई करनी चाहिए.

मैं अपने हसबैंड और प्रेमी दोनों को चाहती हूं, क्या करूं?

सवाल

मेरी उम्र 27 साल है, शादीशुदा हूं. पति और मेरे संबंध ठीक नहीं हैं. वे सैक्स में रुचि नहीं लेते. इसलिए मेरा कुछ समय से किसी दूसरे व्यक्ति के साथ अफेयर चल रहा है. समस्या यह है कि मैं अपने हसबैंड और प्रेमी दोनों को चाहती हूं. इस वजह से मैं डिप्रैशन में आ गई हूं?

जवाब

कई बार हमें अपने घर की चीज अच्छी नहीं लगती और बाहर की चीजों की तरफ हमारा अधिक रुझान होता है. अपने मन को इधरउधर भटकाने के बजाय स्थिर रखें और अपने हसबैंड के साथ समय बिताएं. वैसे भी एक हसबैंड अच्छा प्रेमी नहीं बन सकता और एक प्रेमी बेहतर हसबैंड नहीं बन सकता. यदि किसी को ये दोनों मिल जाएं तो उस की तो बल्लेबल्ले हो जाए. आप दोनों को समानरूप से चाहती हैं, यह संभव नहीं है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem 

छात्र प्रतिनिधि: क्या छात्र प्रतिनिधि के चुनाव में जयेश सफल हो पाया?

स्कूल में अपनी समस्या को ले कर जयेश प्रिंसिपल के पास गया, लेकिन उसे निराश ही लौटना पड़ा. तभी उस की  नजर नोटिस बोर्ड पर गई. स्कूल में छात्र प्रतिनिधि का चुनाव है. जयेश चुनाव इंचार्ज नीलेंदु सर से मिला और अपना नामांकनपत्र दाखिल कर दिया. उस का प्रतिद्वंद्वी अनुरंजन नावे था, जो कि उस का सीनियर था. दोनों प्रतिद्वंदी के बीच एक सभा में वादविवाद रखा गया. हाल में अनुरंजन ने अपनी बात गर्वीले तरीके से रखी, तो हाल तालियों से गूंज उठा, पर जयेश के हाथपैर ठंडे पड़ गए, उसे कुछ सूझ नहीं रहा था, तभी संदेश ने जयेश को अनुरंजन के बारे में कुछ निजी बात बताई, तो उस के चेहरे पर मुसकान तैर गई. क्या छात्र प्रतिनिधि का चुनाव जयेश जीत पाने में सफल हो पाया या अनुरंजन बाजी मार ले गया? जानने के लिए पढ़िए :

 

तीज 2022: इस आसान रेसिपी से बनाएं बनारसी दम आलू

बनारसी दम आलू लगभग हर किसी को पसंद आता है. इसे ज्यादातर लोग अपे गर में किसी छोटे-मोटे कार्यक्रम में बनाना पसंद करते हैं. दम आलू की सबसे खास बात यह है कि इसे बिा लहसून प्याज के बनाया जाता है. इसलिए ये काफी ज्यादा मशहूर है. तो आइए आज चलते हैं बनारसी दम आलू बनाने

समाग्री

छोटे आलू

तेल तलने के लिए

जीरा

सौफ

कड़ी लाल मिर्च

काजू टमाटर

अदरक

घी

हरी इलायची

कसूरी

नमक

ताजा क्रीम

पानी

धनिया पत्ती

विधि

आलू को उबालकर छील लें, अब कड़ाही में तेल गर्म होेने के लिए रख दें,  अब उसमें आलू को लाल होने तक भूने जब आलू लाल हो जाए तो उसे  निकाल दें,अब तेल थोड़ा गर्म हो जाए तो उसमें जीरा और हींग डाले.

अब आलू को माइक्रोवेव में डालकर उसे कुछ देर के लिए फ्राइ कर लें,तब तक कड़ाही में जब जीरा और हींग गर्म हो जाए तो सभी मसाले को एक कटोरी में निकालकर उसे अच्छे से मिक्स करके काडाही में डाल दें. उसके बाद कुछ देर तक लगातर चलाकर भूते रहें. जब मसाले भून जाएं तो उसमें सभी आलू को डालकर अच्छे से भून लें उसके बाद उसमें एक कप पानी डालकर अच्छे कुछ देर के लिए ढंक दें.

थोड़ी देर बाद आप देखेंगे कि मसाले भून चुके हैं और सब्जी पक गई है. ऐसे में आप इसे धनिया के पत्ते से सजा दें. और पूरी और चावल के साथ सर्व करें.

 

आठ सौ करोड़ का ट्विन टावर और संदेश

सुपरटेक बिल्डर्स की एपेक्स और सियान नाम की सौ मीटर ऊंची इमारतें अवैध घोषित करके देश के उच्चतम न्यायालय के आदेश पर अंततः ध्वस्त हो गई. यह एक ऐसा ऐतिहासिक मौका था जो देश के इतिहास में दर्ज हो गया है. यह मामला कई संदर्भों में इतिहास का हिस्सा बन गया है, ऐसा बहुत कम होता है जब लगभग 800 करोड की प्रॉपर्टी को समूल नष्ट करने की प्रक्रिया को आंखों से देखने का मौका मिले.

यही कारण है कि ट्विन टावर की इमारतों को अपनी आंखों से गिरते हुए मिट्टी में मिलते हुए देखने के लिए लगभग 1 लाख लोगों का हुजूम आ जुटा था. जिसमें  आगरा , कानपुर, मैनपुरी से आए हुए लोग भी थे.

ट्विन टावर तो जमींदोज  हो गया मगर इसके साथ अनेक सवाल अपने पीछे छोड़ गया है, जिसका प्रतिउत्तर अभी तक नहीं मिला है.

आइए देखिए कुछ ऐसे प्रश्न जिन्हें पर समझ करके आप भी इस संपूर्ण मसले को इसकी गंभीरता को समझ सकते हैं.

प्रथम प्रश्न –

300 करोड़ की लागत से बने ये  टावर अगर नियमों को अनदेखी कर बनाए गए तो इसके दोषियों को जेल कब भेजा जाएगा .

दूसरा प्रश्न –

ट्विन टावर लगभग 18 वर्ष पूर्व बनना प्रारंभ हुआ इस बीच कई अधिकारियों ने जो इसे रोक सकते थे या जिन्होंने मंजूरी दी उन्हें न्यायालय में क्या सजा मिलेगी.

तीसरा प्रश्न –

सौ प्रश्नों का एक प्रश्न क्या ट्विन टावर को ध्वस्त करना अपरिहार्य था एक गरीब देश विकासशील देश में और आठ सौ करोड़ रुपए की संपत्ति को राजसात करके उसका सदुपयोग नहीं किया जा सकता था.

निर्माण के ध्वंस को देख कर के देश के लोगों में तरह-तरह के प्रश्न उठ रहे हैं, कयास लगाए जा रहे हैं. निसंदेह यह एक ऐसा ज्वलंत मसला है जिस पर देश को गंभीरता से विचार करना ही चाहिए ताकि आगामी समय में ऐसी गलतियां दोबारा ना हो.

सवाल दोषियों की सजा का

घटनाक्रम के बाद सबसे उत्तर प्रदेश सरकार से महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए ताकि यह संदेश जाए कि नियमों का उल्लंघन कतई बर्दाश्त नहीं होगा.

घर मकान खरीददारों की संस्था फोरम फार पीपल्स कलेक्टिव एफर्ट्स (एफपीसीई) ने नोएडा में सुपरटेक के जुड़वां इमारत गिराए जाने को फ्लैट खरीदारों के लिए एक बड़ी जीत माना है. संस्था के मुताबिक – इस कदम से बिल्डरों और विकास प्राधिकरणों का अहंकार भी ध्वस्त हुआ है.

एफपीसीई ने कहा कि इस मामले में विकास प्राधिकरणों की जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए. करीब 100 मीटर ऊंचे जुड़वां इमारत, एपेक्स और सियान को ढहाने का आदेश पहले पहल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया था फिर सुप्रीम कोर्ट ने करीब एक साल पहले दिया था.    उच्चतम न्यायालय के फैसले के बावजूद यह हुआ कि प्राधिकरण के जो लोग इसमें शामिल थे, फिलहाल उनकी पहचान और जिम्मेदारी तय नहीं की गई है. साथ ही उन लोगों की भी जिम्मेदारी अभी तय नहीं हो सकी है, जो बिल्डरों के कहने पर उन्हें प्रभावित कर रहे थे. इसके लिए सीबीआइ जांच कराए जाने की जरूरत है, ताकि जिन लोगों ने लाखों रुपए खर्च करके ट्विन

टावर में इन्वेस्ट किया और लगातार परेशान हुए उन्हें पूरी तरह से न्याय मिल सके.

कब, क्या और कैसे हो गया

2004: नोएडा प्राधिकरण ने सुपरटेक को भूखंड आबंटित किया, 10 मंजिला इमारत बननी थी.

2006: मानचित्र में बिल्डर ने पहलासंशोधन कराया.

2009: पुनः संशोधन कर 24 मंजिल मंजूर कराई.

2012: 24 मंजिला इमारत की ऊंचाई बढ़ाकर संशोधन के

जरिए 40 मंजिल कराई गई .

2012 : ‘एमराल्ड कोर्ट आरडब्लूए ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की

2014: हाईकोर्ट ने इमारत गिराने का आदेश दिया गया .

2021 : 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया, नवंबर 2021 तक जुड़वां इमारत गिराने का आदेश दिया.

2022: फिर 22 मई नई तारीख तय की गई.

2022:20 फरवरी को ‘एडिफिस और जेट डिमोलिशन’ ने स्थल को अपने कब्जे में लिया

2022: 10 अप्रैल को परीक्षण विस्फोट किया गया 2022 : ध्वस्तीकरण के लिए 21 अगस्त को नई तारीख दी गई.

आखिरकार 28 अगस्त2022 को इमारतें ध्वस्त हो गई.

सीयूईटी का थोपना

जैसी आशा थी, उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए सरकार की खुराफाती सीयूईटी (सैंट्रल यूनिवर्सिटी एंट्रैस टैस्ट) में लगातार अफरातफरी और कुप्रबंध की शिकायतें मिल रही हैं और टैस्ट देने वालों को बारबार परीक्षाओं में बैठना पड़ रहा है जबकि अभी तो शुरुआत है. जल्दबाजी में शुरू की गई अंगूठा काटने की द्रोणाचार्य के षड्यंत्र जैसी जटिल परीक्षा का उद्देश्य एक तरफ कोचिंग व्यवस्था को एक नई जान देना है तो दूसरी तरफ मनचाहे क्षेत्रों में छात्रों के लिए उच्च केंद्रीय व चुनिंदा संस्थानों को ही प्रवेश के लिए खुला रखना है.

यूजीसी के चेयरमैन जगदीश कुमार ने माना कि परीक्षा केंद्रों पर प्रश्नपत्र समय पर तुरंत डाउनलोड नहीं हुए. कुछ केंद्रों ने प्रश्नपत्र पहले ही डाउनलोड़ कर लिए और उन्हें बाजार में बेच दिया गया. दोबारा परीक्षा ली जाएगी पर यह बताने पर कि पिछली परीक्षा क्यों नहीं दी जा सकी. कुछ जगह तो पिछली परीक्षा के दिन पर्यवेक्षक पहुंचे ही नहीं.

बात यह नहीं है कि इस बड़ी परीक्षा के प्रबंध में चूक क्यों रही, बात तो यह है कि 12वीं की बोर्ड की परीक्षा लेने के बाद यह परीक्षा लेने की आवश्यकता क्यों? यह क्यों थोपी गई है. इस से जो शिक्षा सत्र जुलाई में शुरू होना था, अभी सितंबर में उस में प्रवेश प्रक्रिया भी शुरू नहीं हो सकी. इस में नुकसान न तो मोदीशाह जोड़ी का होगा, न नीति आयोग का, न यूजीसी का. यूजीसी के चेयरमैन जगदीश कुमार कह रहे हैं कि सीयूईटी की परीक्षा में जानबूझ कर षड्यंत्र के तहत गड़बड़ी की गई. यह कैसे संभव है जब सर्वज्ञाता, सर्वज्ञानी, उच्चवर्गीय, योग्य, राष्ट्रप्रेमी लोगों ने दिव्य दृष्टि से इस परीक्षा की कल्पना की थी और इसे एक अतिरिक्त परीक्षा के रूप में लाखों छात्रों पर इस वर्ष और आने वाले हर वर्ष के लिए थोपा गया? इस परीक्षा प्रणाली के लिए न संसद में चर्चा की गई, न व्यापक विचार लिए गए. कृषि कानूनों, नोटबंदी और अग्निपथ योजनाओं की तरह इस का संदेश स्वयं ईश्वर ने, वेदों की तरह, ज्ञानियों को दिया और अब इस पर सवाल उठाने वाला हर कोई षड्यंत्रकारी, देशद्रोही हो गया.

छात्रों की जो मानसिक वेदना इस परीक्षा के कारण हुई है, जिस तरह उन्हें सैंटर से सैंटर भटकना पड़ा है, इस परीक्षा में होगा क्या, यह जानने के लिए न जाने क्याक्या कयास लगाने पड़े. इन का अंदाजा छात्र, उन की मांएं और पिता ही लगा सकते हैं, शीर्ष सत्ता में बैठे लोग नहीं क्योंकि उन्हें तो विपक्षी सरकारें गिराने से फुरसत नहीं है.

जांच करना, नए सिरे से परीक्षाएं लेना, दोषियों को सजा देना कहना आसान है पर जो जख्म इस बेसिरपैर की परीक्षा ने छात्रों को दिए हैं, उन की व्यापकता का अनुमान भी लगाना कठिन है. सरकार को इस की चिंता नहीं है क्योंकि वह तो वाहवाही के शोर में सुन नहीं सकती और तालियां बजाने के लिए लाखों कोचिंग संस्थान हैं जिन्हें अतिरिक्त आय बैठेबिठाए इस साल में इस परीक्षा के कारण मिलनी शुरू हो गई है. जैसे पिंडदान में खुशी दान लेने वाले को होती है, कुछ वैसे ही शासन और कोचिंग संस्थान मृतकों के संबंधियों के दुख में अपना सुख देख रहे हैं. जो इस परीक्षा प्रणाली के खिलाफ बोलेगा वह नए भारत के निर्माण में अड़चन डालने का पापी है.

केले की व्यावसायिक खेती की ओर बढ़ रहे कदम

किसानों को काबिल बनाने में जुटे हैं डा. आरएस सेंगर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथसाथ राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके डा. आरएस सेंगर  ने  किसानों को प्रशिक्षित कर उन को और्गैनिक केला उत्पादन की तरफ मोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया है.

तकरीबन 27 साल से शिक्षा शोध और प्रसार के काम में लगे डा. आरएस सेंगर ने अनेक लेख लिखे, लघुकथाएं, विज्ञान के चमत्कार को रोचक हिंदी भाषा में लिख कर और विज्ञान साहित्य को सरल और सुबोध भाषा हिंदी में लिख कर आम जनता तक पहुंचाने का काम किया है.

डा. आरएस सेंगर औरैया जिले के एक छोटे से गांव आयाना में पैदा हुए. उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव से ही हासिल की, जहां पर खेती को पास से देखा, खेती की समस्याओं को सम झा और उन को करीब से महसूस किया.

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड से साल 1993 में अपनी नौकरी की शुरुआत की थी, जहां पर रह कर उन्होंने पाया कि किसानों के खेतखलिहान और उन के द्वार तक किसानों को तकनीकी जानकारी पहुंचाने के लिए काफी काम किया. किसानों के बीच जा कर उन को मुफ्त प्रशिक्षण देने का काम भी उन्होंने किया.

उन्होंने टिशु कल्चर विधि से केले के रोगरहित पौधों को बना कर न्यूनतम दाम पर किसानों को उपलब्ध कराने का प्रयास किया. साथ ही, छात्रों व किसानों को प्रशिक्षित किया, ताकि वे अपने खेतों पर अधिक से अधिक केले की खेती कर सकें.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान गन्ने की खेती करते थे. इस के अलावा वह कोई अन्य खेती नहीं करना चाहते थे, लेकिन डा. आरएस सेंगर के प्रयासों के बाद किसानों ने केले

की खेती का महत्त्व सम झा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी केले की खेती शुरू की. उसी का नतीजा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अब लगभग 200 से 300 किसान केले की खेती कर रहे हैं.

केले की खेती के फायदे

केले की खेती काफी फायदेमंद है, क्योंकि केला हमेशा बाजार में उपलब्ध रहता है और 12 महीने इस की अच्छी कीमत मिल जाती है. केले में पोषक तत्त्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. इस में बीमारी व नुकसान होने का डर भी कम रहता है.

एक एकड़ में तकरीबन 1,300 से 1,400 पौधे लगाए जाते हैं और एक एकड़ में हर वर्ष तकरीबन 3 से साढ़े 3 लाख रुपए की आमदनी आसानी से हासिल की जा सकती है.

मिले हैं कई पुरस्कार

डा. आरएस सेंगर ने भारत में ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग ही छाप छोड़ी है. साल 1993 से ले कर आज तक कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सोसाइटियों के द्वारा सराहनीय काम करने के लिए तकरीबन 30 पुरस्कारों से भी अधिक बार सम्मानित किया जा चुका है.

शुरू की टैली एग्रीकल्चर

कोरोना महामारी के दौरान पूरा देश परेशान था. ऐसी हालत में भारतीय खेती भी काफी प्रभावित हुई थी. किसानों के सामने तकनीकी जानकारी को पहुंचाने की दिक्कत थी, तो उसी बीच टैली एग्रीकल्चर की शुरुआत डा. आरएस सेंगर द्वारा की गई.

किसानों को ह्वाट्सएप ग्रुप के माध्यम से  जोड़ा और पौधों पर लगने वाली विभिन्न बीमारियों, कीटों और फसलों में आने वाली कई और समस्याओं के अलावा कैसे सुरक्षित रखें फसल को और कटाई के उपरांत अनाज को सुरक्षित भंडारण के लिए जैसी तमाम समस्याओं की जानकारी टैली एग्रीकल्चर के माध्यम से किसानों को पहुंचाई गईं, जिस से खेती पर दुष्प्रभाव कम पड़े और लोगों की तकनीकी जानकारी के प्रति जागरूकता बढ़े.

काफी किसान टैली एग्रीकल्चर से जुड़े और आगे आए. साथ ही, लौकडाउन के दौरान अपनी खेती से संबंधित समस्याओं को भेज कर उन का समाधान तुरंत हासिल किया, जिस से उन के समय और पैसे की बचत हुई.

तकनीकी जानकारी से किसानों की आमदनी बढ़ी

तकनीकी जानकारी पहुंचाने के लिए

डा. आरएस सेंगर के 1,000 से अधिक लेख हिंदी पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं, जिस से देश के किसानों को फायदा हुआ.

उन्होंने अनेक कृषि पत्रिकाओं का संपादन कर किसानों को कृषि की तकनीकी जानकारी पहुंचाने का काम किया है. इस के अलावा आकाशवाणी, दूरदर्शन के साथ ही कई अन्य चैनलों के माध्यम से कृषि की जानकारी, केले की खेती की जानकारी पहुंचाने का काम किया है. इन दिनों वे किसानों को ड्रोन तकनीकी उपयोगिता के बारे में प्रशिक्षित कर रहे हैं.

तीज 2022: झूठा सच- शादी के बाद कंचन के साथ क्या हुआ?

जीवनलाल ने अपने दोस्त गिरीश और उस की पत्नी दीपा को उन की बेटी कंचन के लिए उपयुक्त वर तलाशने में मदद करने हेतु अपने सहायक पंकज से मिलवाया. दोनों को सुदर्शन और विनम्र पंकज अच्छा लगा. वह रेलवे वर्कशौप में सहायक इंजीनियर था. परिवार में सिवा मां के और कोई न था जो एक जानेमाने ट्यूटोरियल कालेज में पढ़ाती थीं. राजनीतिशास्त्र की प्रवक्ता कंचन की शादी के लिए पहली शर्त यही थी कि उसे नौकरी छोड़ने के लिए नहीं कहा जाएगा. स्वयं नौकरी करती सास को बहू की नौकरी से एतराज नहीं हो सकता था. यह सब सोच कर गिरीश ने जीवनलाल से पंकज और उस की मां को रिश्ते के लिए अपने घर लाने को कहा. अगले रविवार को जीवनलाल अपनी पत्नी तृप्ता, दोनों बच्चों-कपिल, मोना और पंकज व उस की मां गीता के साथ गिरीश के घर पहुंच गए.

‘‘मामा, चाचा, मौसा और फूफा वगैरा सब हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में. हैदराबाद आने के बाद उन से संपर्क नहीं रहा या सच कहूं तो पापा के रहते जिन रिश्तेदारों से हमारी सरकारी कोठी भरी रहती थी, पापा के जाते ही वही रिश्तेदार हम बेसहारा मांबेटों से कन्नी काटने लगे थे,’’ पंकज ने अन्य रिश्तेदारों के बारे में पूछने पर बताया, ‘‘इसलिए मैं मां को ले कर हैदराबाद चला आया और यहां के परिवेश में हम एकदूसरे के साथ पूर्णतया संतुष्ट हैं.’’

‘‘पंकज की शादी हो जाए तो मेरा परिवार भरापूरा हो जाएगा,’’ गीता ने जोड़ा.

‘‘आप कंचन को पसंद कर लें तो वह भी जल्दी हो जाएगा,’’ जीवनलाल ने कहा.

‘‘हम तो आप के बताए विवरण से ही कंचन को पसंद कर के यहां आए हैं लेकिन हम भी तो कंचन को पसंद आने चाहिए,’’ गीता हंसी.

‘‘कंचन की पसंद पूछ कर ही आप को यहां आने की तकलीफ दी है,’’ दीपा ने भी उसी अंदाज में कहा, ‘‘हमारी बेटी की एक ही शर्त है कि आप उसे नौकरी छोड़ने को न कहें.’’

‘‘नहीं कहूंगी लेकिन एक शर्त पर कि यह भी कभी मुझे नौकरी छोड़ने को नहीं कहेगी.’’

‘‘तो फिर तो बात पक्की, मुंह मीठा करवाओ दीपा बहन.’’ तृप्ता के कहने पर दीपा मिठाई ले आई. चायनाश्ते के बाद जीवनलाल ने कहा कि अब सगाईशादी की तारीखें भी तय कर लो.

‘‘वह तो आप कब छुट्टी देंगे, उस पर निर्भर करता है, सर,’’ पंकज बोला, ‘‘इस पर भी कि वे स्वयं कब छुट्टी लेते हैं, क्योंकि सबकुछ उन्हें ही तो करना है.’’ गीता गिरीश और दीपा की ओर मुड़ी, ‘‘जिस तरह से उन्होंने यह शादी की बात चलाई है उसी तरह से तृप्ता भाभी और जीवन भैया, पंकज के अभिभावक बन कर बहू के गृहप्रवेश तक की सभी रस्में निबाहेंगे. आप अब क्या करना है या कैसे करना है, उन से ही पूछिएगा. रहा लेनदेन का सवाल तो मुझे बस आप की बेटी चाहिए और अब इस विषय में मुझ से कोई कुछ नहीं पूछेगा.’’ गीता आराम से सोफे से पीठ लगा कर बैठ गई.

‘‘पूछेंगे कैसे नहीं गीताजी, शादी में आने वाले रिश्तेदारों के बारे में तो बताना ही होगा,’’ दीपा ने प्रतिवाद किया, ‘‘शादी में रौनक तो उन लोगों के आने से ही आएगी.’’

‘‘रौनक की फिक्र मत करिए,’’ पंकज बोला, ‘‘मेरे बहुत दोस्त और सहकर्मी हैं, ज्यादा हंगामा चाहिए तो मम्मी के छात्रछात्राएं हैं.’’

‘‘मेरे छात्रछात्राओं की क्या जरूरत है?’’ गीता हंसी, ‘‘कंचन के ननददेवर हैं न मोना और कपिल, अपने दोस्त सहेलियों के साथ धूम मचाने को.’’ शादी बहुत धूमधाम और हंसीखुशी से हो गई. कंचन पंकज के साथ बेहद खुश थी. गीता से भी उसे कोई शिकायत नहीं थी. कोचिंग कक्षाएं तो सुबहशाम ही लगती हैं. सो, गीता सुबह से ही जाती थी और कंचन के कालेज जाने के बाद लौटती थी. दिनभर घर में रहती थी. सो, नौकरानी से सब काम भी करवा लेती थी. कंचन को घर लौटने पर गरम चायनाश्ता मिल जाता था. कुछ देर गपशप के बाद गीता फिर कालेज चली जाती थी और कंचन पूरी शाम पंकज के साथ जैसे चाहे बिता सकती थी. संक्षेप में, सास के संरक्षण का सुख बगैर किसी हस्तक्षेप या जिम्मेदारी के.

1 साल पलक झपकते गुजर गया. मांबेटे में रात को ही बात होती थी लेकिन कुछ रोज से कंचन को लग रहा था कि गीता कुछ असहज है. वह पंकज से अकेले में बात करने की कोशिश में रहती थी. कंचन के आते ही, बड़ी सफाई से बात बदल देती थी. कंचन ने यह बात अपनी मां दीपा को बताई. ‘‘पंकज के उस बेचारी का अपना सगा कोई और तो है नहीं जिस से कोई निजी दुखसुख या पुरानी यादें बांटे. तू खुद ही उन्हें अकेले छोड़ा कर, और पंकज से भी कभी मत पूछना कि मां उस से क्या कह रही थीं,’’ दीपा ने समझाया.

एक रात सब ने खाना खत्म ही किया था कि बिजली चली गई. पंकज और गीता बाहर बरामदे में बैठ गए और कंचन मोमबत्ती की रोशनी में मेज साफ कर के रसोई समेटने लगी. काम खत्म कर के उस ने बेखयाली में मोमबत्ती बुझा दी. स्ट्रीट लाइट की रोशनी में बरामदे का रास्ता नजर आ रहा था. वह धीरे से उसी के सहारे आगे बढ़ गई. तभी उसे बरामदे से मांबेटे की वार्तालाप सुनाई दी. पंकज कह रहा था, ‘‘कितनी भी सिफारिश लगवा लूं रेलवे से तो भी 3 बैडरूम वाला घर नहीं मिल सकता, मां. कई हजार रुपया किराया दे कर बाहर ही घर लेना पड़ेगा. सोच रहा हूं इतना किराया देने से बेहतर है अपना फ्लैट ही खरीद लें. गाड़ी के बजाय मकान के लिए ऋण ले लेता हूं.’’ ‘‘उस सब में समय लगेगा पंकज, हमें तो 3 कमरों का घर जल्दी से जल्दी चाहिए,’’ गीता के स्वर में चिंता थी, ‘‘किराए की फिक्र मत कर, जितना भी होगा मैं देने को तैयार हूं. तू बस इतना देख कि गैस्टरूम तुम्हारे व मेरे कमरे से अलग हो.’’ कंचन चौंक पड़ी. रेलवे की ओर से उन्हें 2 बैडरूम का कौटेजनुमा घर मिला हुआ था. सामने छोटा सा लौन था, पीछे किचन गार्डन और ऊपर खुली छत भी थी. नौकरानी भी पास के बंगले के आउट हाउस में रहती थी. सो, देरसवेर जब बुलाओ, वह आ जाती थी. ये सब छोड़ कर किराए के आधुनिक दड़बेनुमा फ्लैट में जाने की क्या जरूरत आ पड़ी थी? अपने 3 सदस्यों के परिवार के लिए तो यह घर काफी है. तो फिर क्या कोई मेहमान आ रहा है? मगर कौन?

‘‘हड़बड़ाओ मत, मां. बराबर वाले घर में विधुर चौधरीजी बेटे के साथ रहते हैं और बेटा अगले महीने विदेश जा रहा है. वे खुशी से हमें एक कमरा दे देंगे. आप अब इस बारे में न तो फिक्र करो और न ही बात,’’ पंकज ने कहा और पुकारा, ‘‘तुम अंधेरे और गरमी में अंदर क्या कर रही हो, कंचन?’’

‘‘हां, बेटी, यहां आ कर बैठ. बड़ी अच्छी हवा चल रही है,’’ गीता भी बोली. इस का मतलब था कि मां ने भी बात खत्म कर दी है. अब पूछने पर भी कोई कुछ नहीं बताएगा और वैसे भी पंकज ने फिलहाल तो मकान बदलना टाल ही दिया था. जयपुर में होने वाली अंतर्राज्यीय बैडमिंटन प्रतियोगिता में कंचन के कालेज की टीम चुनी गई थी. अपने समय में कंचन भी राज्य स्तर की खिलाड़ी रह चुकी थी और अभी भी छात्राओं के साथ अकसर बैडमिंटन खेलती थी. पिं्रसिपल और छात्राएं चाहती थीं कि कंचन भी टीम के साथ जयपुर जाए. कंचन ने पंकज और गीता से पूछा. दोनों ने सहर्ष अनुमति दे दी. लौटने वाले रोज उन सब की ट्रेन रात की थी. लड़कियां जयपुर घूमना और खरीदारी करना चाहती थीं. आयोजकों ने उन के लिए एक प्राइवेट टैक्सी की व्यवस्था करवा दी. ड्राइवर रामसेवक अधेड़ उम्र का संभ्रांत व्यक्ति था, उस ने बड़ी अच्छी तरह से लड़कियों को दर्शनीय स्थल दिखाए. दिनभर घूमने के बाद कंचन थक गई थी. सो, मिर्जा इस्माइल रोड पहुंचने पर उस ने कहा कि वह शौपिंग के बजाय गाड़ी में आराम करना चाहेगी.

‘‘इतनी गरमी में? हम आप को अकेले नहीं छोड़ेंगे, मैडम,’’ लड़कियों ने कहा.

‘‘मैं हूं न मैडम के पास, गाड़ी में एसी भी चलता रहेगा,’’ रामसेवक ने कहा. ‘‘आप लोग इतमीनान से जा कर खरीदारी कर लो.’’

‘‘धन्यवाद, भैयाजी. नाम और बोलचाल से तो आप उत्तर भारत के लगते हैं, यहां कैसे आ गए?’’ कंचन ने पूछा. रामसेवक ने आह भरी, ‘‘अब क्या बताएं मैडम. हालात ही कुछ ऐसे हो गए कि रोटीरोजी के लिए घर से दूर आना पड़ गया.’’

‘‘क्यों, ऐसा क्या हो गया?’’

‘‘अपने घर में सभी पढ़ेलिखे और सरकारी नौकरी में हैं. हमें न पढ़ना पसंद था न नौकरी करना, गाड़ी चलाने का बहुत शौक था. सो, बाबूजी ने हमें टैक्सी दिलवा दी. हम भी सब के मुकाबले में कमा खा रहे थे कि हमारे बड़के भैया ने गड़बड़ कर दी. वे थे तो सरकारी अफसर मगर शबाब और शराब के शौकीन. ‘‘एक रोज नशे की हालत में एक मातहत की बीवी पर हाथ डाल दिया और पकड़े गए. जीजाजी के रसूख से किसी तरह छूट गए. भाभी के चिरौरी करने और बेटे के भविष्य का हवाला देने से कुछ साल तो संभल कर रहे लेकिन बेटे को रेलवे में नौकरी मिलते ही फिर पुराने रंगढंग चालू कर दिए और एक नेता की चहेती के साथ मुंह काला करते हुए पकड़े गए. नेता की चहेती थी, सो मामला तूल पकड़ गया और 7 साल की जेल हो गई.

‘‘परिवार की इतनी बदनामी हुई कि लोग मेरी टैक्सी में बैठने से भी डरने लगे. टैक्सी का धंधा तो शहर के होटल और अन्य संस्थानों से जुड़ने पर ही चलता है. सो उन के नकारे जाने पर यहां आ गया. मुझे ही नहीं, भाभी और उन के बेटे को भी अपना शहर छोड़ कर दूर जाना पड़ा.’’

कंचन की दिलचस्पी थोड़ी बढ़ी, ‘‘दूर कहां?’’

‘‘हैदराबाद. वहां रेलवे में इंजीनियर है हमारा भतीजा लेकिन हमारे ताल्लुकात नहीं हैं अब उन से,’’ उस ने मायूसी से कहा.

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘परिवार वाले उन से कन्नी काटने लगे थे. मांबेटे खुद्दार थे. सो, सब से दूर चले गए. अब तो भैया की सजा की अवधि भी खत्म होने वाली है, तब शायद वे लोग झांसी आएं.’’ तभी लड़कियां शौपिंग कर के आ गईं और ड्राइवर चुप हो गया. कंचन ने जितना भी सुना था उस से साफ जाहिर था कि वह किस की बात कर रहा था और क्यों गीता बड़ा मकान लेने के लिए व्याकुल थी. व्यभिचारी पति को न नकारना चाहती थी और न ही उस के साथ रहना. पंकज सदा की तरह मां की भावनाओं का ध्यान रख रहा था लेकिन कंचन की भावनाओं का क्या? परिवार का यह कलुषित सत्य तो उन्हें शादी से पहले ही बताना चाहिए था. शादी के बाद भी यह कहने वाला पंकज कि पतिपत्नी तो एकदूसरे के लिए खुली किताब होते हैं, कितना बड़ा झूठा था. झूठ की नींव पर टिकी शादी कितने रोज टिक सकेगी? मांबेटे के व्यवहार से तो लग रहा था कि वे उस बदचलन, सजायाफ्ता व्यक्ति को स्वीकार करने वाले थे. भले ही दूर रखें, देरसवेर तो उस से भी वास्ता पड़ेगा ही. फिर उस की अस्मत का क्या होगा? कंचन सोच कर ही सिहर उठी. सिरदर्द के बहाने वह पूरे रास्ते चुप रही और फिर अपने कमरे में जा कर फूटफूट कर रो पड़ी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? खैर, किसी तरह लंबा सफर तय कर के घर पहुंची.

‘‘शुक्र है तुम आ गईं, जिया ही नहीं जा रहा था तुम्हारे बगैर,’’ पंकज ने विह्वल स्वर में कहा.

‘‘अब तो मेरे बगैर ही जीना पड़ेगा क्योंकि मैं तुम्हें हमेशा के लिए छोड़ कर जा रही हूं,’’ कंचन ने अलमारी में से अपने कपड़े निकालते हुए कहा.

‘‘मगर क्यों? जयपुर में पुराना प्रेमी मिल गया क्या?’’ पंकज ने चुहल की.

‘‘प्रेमी तो नहीं, हां चचिया ससुर रामसेवक जरूर मिले थे. मैं ने तो तुम्हें अपने जीवन के मूक प्रेम के बारे में भी बता दिया था जिस का ताना तुम ने मुझे अभी दिया है लेकिन तुम ने और मां ने अपने परिवार के उस घिनौने सच को छिपाया हुआ है जिस के लिए अपनों से मुंह छिपा कर तुम यहां रह रहे हो. झूठ की बुनियाद पर टिकी शादी का कोई भविष्य नहीं होता पंकज और इस से पहले कि वह भरभरा कर गिरे, मैं स्वयं ही यह रिश्ता खत्म कर देती हूं. तुरंत तलाक लेने के लिए सचाई छिपाने का आरोप काफी है. वैसे तो तुम्हें सजा भी दिलवा सकती हूं लेकिन अगर चुपचाप तलाक दे दोगे तो ऐसा कुछ नहीं करूंगी,’’ कंचन ने सूटकेस में सामान भरते हुए कहा.

पंकज हतप्रभ हो गया था, फिर भी संयत स्वर में बोला, ‘‘तुम ने जो सुना वह सच है लेकिन जो झूठ की बुनियाद वाली बात कही है वह सही नहीं है. इस शहर में किसी ने कभी भी हम से पापा के बारे में नहीं पूछा तो हम स्वयं आगे बढ़ कर क्यों बताते? तुम ने देखा होगा शादी के मंडप में दिवंगत मातापिता की तसवीर रखी जाती है. मगर हम ने तो नहीं रखी, न किसी ने रखने को कहा. तुम ने भी तो कभी नहीं पूछा कि घर में पापा की कोई तसवीर क्यों नहीं है या कभी उन के बारे में कोई और बात पूछी हो? मैं ने और मां ने यह फैसला किया था कि हम स्वयं पापा के बारे में किसी को कुछ नहीं बताएंगे मगर पूछने पर कुछ छिपाएंगे भी नहीं. अब किसी ने कुछ नहीं पूछा तो इस में हमारा क्या कसूर है? एक बात और, मां विधवा की तरह नहीं रहतीं. सादे मगर रंगीन कपड़े पहनती हैं और थोड़ेबहुत जेवर भी.’’

‘‘लेकिन सिंदूर या बिंदी तो नहीं लगातीं?’’ कंचन को पूछने के लिए यही मिला.

‘‘तुम लगाती हो, तुम्हारी मम्मी या तृप्ता आंटी?’’ पंकज ने पूछा, ‘‘कितनी सुहागिनें मांग भरती हैं या पांव में बिछिया पहनती हैं आजकल? हम ने सच को छिपाने का कोई प्रयास नहीं किया है कंचन?’’

‘‘अच्छा? और यह जो मुझे बगैर बताए लोन ले कर बड़ा मकान बनाने की योजना बना रहे हो, उसे क्या कहोगे?’’ कंचन ने व्यंग्य से पूछा. ‘‘योजना ही है, लिया तो नहीं? पापा के यहां आने का पक्का होने पर तुम्हें सब बताने की सोची थी क्योंकि पापा यहां आएंगे, यह अभी पक्का नहीं है. वे बहुत बदल चुके हैं और उन्हें संसार से विरक्ति हो गई है. केरल से कोई सज्जन जेल में सद्वचन देने आते हैं और पापा अपना शेष जीवन उन के त्रिचूर आश्रम में बिताना चाहते हैं…’’

‘‘तुम्हें कैसे मालूम?’’ कंचन ने उस की बात काटी.

‘‘क्योंकि मैं बगैर मां को बताए सरकारी काम का बहाना बना कर पापा से मिलने झांसी जेल में जाता रहता हूं. अदालत की पेशी के दौरान मैं ने पापा की आंखों में पश्चात्ताप देखा था, सो मैं ने उन्हें माफ कर दिया लेकिन मां पर मैं ने अपनी मंशा नहीं थोपी और न ही अभी से उन्हें यह बताना चाहता हूं कि पापा यहां नहीं रहेंगे. रिहाई के रोज मां मेरे साथ उन्हें जेल से लेने जाएंगी, तब कह नहीं सकता दोनों की क्या प्रतिक्रिया होगी. पापा को घर लाना चाहेंगी या स्वयं उन के साथ त्रिचूर जाना या पापा को अपने रास्ते जाने देना और स्वयं जिस रास्ते पर चल रही हैं उसी पर चलते रहना. मेरा यह मानना है कंचन, कि जिस को जो उचित लगता है वही करना उस का जन्मसिद्ध अधिकार है और उस में टांग अड़ाने का मुझे कोई हक नहीं है.’’

‘‘यानी तुम्हें छोड़ने का फैसला मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है?’’ कंचन ने शरारत से पूछा.

‘‘बशर्ते कि तुम यह सिद्ध कर सको कि तुम से झूठ बोल कर तुम्हें धोखा दिया गया या नुकसान पहुंचाया गया.’’

‘‘वह तो सिद्ध नहीं कर सकती,’’ कंचन ने कपड़े अलमारी में वापस रखते हुए कहा, ‘‘क्योंकि झूठ तो तुम ने कभी बोला नहीं. बगैर कभी कुछ पूछे मैं ही अपने सोचे झूठ को सच समझती रही.’’

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें