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Hindi Story : विरासत

Hindi Story : अपराजिता की 18वीं वर्षगांठ के अभी 2 महीने शेष थे कि वक्त ने करवट बदल ली. व्यावहारिक तौर पर तो उसे वयस्क होने में 2 महीने शेष थे, मगर बिन बुलाई त्रासदियों ने उसे वक्त से पहले ही व्यस्क बना दिया था. मम्मी की मौत के बाद नानी ने उस की परवरिश का जिम्मा निभाया था और कोशिश की थी कि उसे मम्मी की कमी न खले.

यह भी हकीकत है कि हर रिश्ते की अपनी अलग अहमियत होती है. लाचार लोग एक पैर से चल कर जीवन को पार लगा देते हैं. किंतु जीवन की जो रफ्तार दोनों पैरों के होने से होती है उस की बात ही अलग होती है. ठीक इसी तरह एक रिश्ता दूसरे रिश्ते के न होने की कमी को पूरा नहीं कर सकता.

वक्त के तकाजों ने अपराजिता को एक पार्सल में तब्दील कर दिया था. मम्मी की मौत के बाद उसे नानी के पास पहुंचा दिया गया और नानी के गुजरने के बाद इकलौती मौसी के यहां. मौसी के दोनों बच्चे उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों में रहते थे. अतएव वह अपराजिता के आने से खुश जान पड़ती थीं.

अपराजिता के बहुत सारे मित्रों के 18वें जन्मदिन धूमधाम से मनाए जा चुके थे. बाकी बच्चों के आने वाले महीनों में मनाए जाने वाले थे. वे सब मौका मिलते ही अपनाअपना बर्थडे सैलिब्रेशन प्लान करते थे. तब अपराजिता बस गुमसुम बैठी उन्हें सुनती रहती थी. उस ने भी बहुत बार कल्पनालोक में भांतिभांति विचरण किया था अपने जन्मदिन की पार्टी के सैलिब्रेशन को ले कर मगर अब बदले हालात में वह कुछ खास करने की न तो सोच सकती थी और न ही किसी से कोई उम्मीद लगा सकती थी.

2 महीने गुजरे और उस की खास सालगिरह का सूर्योदय भी हुआ. मगर नानी की हाल ही में हुई मौत के बादलों से घिरे माहौल में सालगिरह उमंग की ऊष्मा न बिखेर सकी. अपराजिता सुबह उठ कर रोज की तरह कालेज के लिए निकल गई.

शाम को घर वापस आई तो देखा कि किचन टेबल पर एक भूरे रंग का लिफाफा रखा था. वह लिफाफा उठा कर दौड़ीदौड़ी मौसी के पास आई. लिफाफे पर भेजने वाले का नामपता नहीं था और न ही कोई पोस्टल मुहर लगी थी.

‘‘मौसी यह कहां से आया?’’ उस ने आंगन में कपड़े सुखाने डाल रहीं मौसी से पूछा.

‘‘उस पर तो तुम्हारा ही नाम लिखा है अप्पू… खोल कर क्यों नहीं देख लेतीं?’’

अपराजिता ने लिफाफा खोला तो उस के अंदर भी थोड़े छोटे आकार के कई सफेद रंग के लिफाफे थे. उन पर कोई नाम नहीं था. बस बड़ेबड़े अंकों में गहरीनीली स्याही से अलगअलग तारीखें लिखी थीं. तारीखों को गौर से देखने पर उसे पता चला कि ये तारीखें भविष्य में अलगअलग बरसों में पड़ने वाले उस के कुछ जन्मदिवस की हैं. खुशी की बात कि  एक लिफाफे पर आज की तारीख भी थी. अपराजिता ने प्रश्नवाचक निगाहों से मौसी को निहारा तो वे मुसकरा भर दीं जैसे उन्हें कुछ पता ही नहीं.

‘प्लीज मौसी बताइए न ये सब क्या है. ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि आप को इस के बारे में कुछ खबर न हो… यह लिफाफा पोस्ट से तो आया नहीं है… कोई तो इसे दे कर गया है… आप सारा दिन घर में थीं और जब आप ने इसे ले कर रखा है तो आप को तो पता ही होना चाहिए कि आखिर यह किस का है?’’

‘‘मुझे कैसे पता चलता जब कोई बंद दरवाजे के बाहर इसे रख कर चला गया. तुम तो जानती हो कि दोपहर में कभीकभी मेरी आंख लग जाती है. शायद उसी वक्त कोई आया होगा. मैं ने तो सोचा था कि तुम्हारे किसी मित्र ने कुछ भेजा है. हस्तलिपि पहचानने की कोशिश करो शायद भेजने वाले का कोई सूत्र मिल जाए,’’ मौसी के चेहरे पर एक रहस्यपूर्ण मुस्कराहट फैली हुई थी.

अपराजिता ने कई बार ध्यान से देखा, हस्तलिपि बिलकुल जानीपहचानी सी लग रही थी. बहुत देर तक दिमागी कसरत करने पर उसे समझ में आ गया कि यह हस्तलिपि तो उस की नानी की हस्तलिपि जैसी है. परंतु यह कैसे संभव है? उन्हें तो दुनिया को अलविदा किए 2 महीने गुजर गए हैं और आज अचानक ये लिफाफे… उसे कहीं कोई ओरछोर नहीं मिल रहा था.

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‘‘मौसी यह हस्तलिपि तो नानी की लग रही है लेकिन…’’

‘‘लेकिनवेकिन क्या? जब लग रही है तो उन्हीं की होगी.’’

‘‘यह असंभव है मौसी?’’ अपराजिता का स्वर द्रवित हो गया.

‘‘अभी तो संभव ही है अप्पू, मगर 2 महीने पहले तक तो नहीं था. जिस दिन से तुम्हारी नानी को पता चला कि उन का हृदयरोग बिगड़ता जा रहा है और उन के पास जीने के लिए अधिक समय नहीं है तो उन्होंने तुम्हारे लिए ये लैगसी लैटर्स लिखने शुरू कर दिए थे, साथ ही मुझे निर्देश किया था कि मैं यह लिफाफा तुम्हें तुम्हारे 18वें जन्मदिन वाले दिन उपहारस्वरूप दे दूं. अब इन खतों के माध्यम से तुम्हें क्या विरासत भेंट की गई है, यह तो मुझे भी नहीं मालूम. कम से कम जिस लिफाफे पर आज की तारीख अंकित है उसे तो खोल ही लो अब.’’

अपराजिता ने उस लिफाफे को उठा कर पहले दोनों आंखों से लगाया. फिर नजाकत के साथ लिफाफे को खोला तो उस में एक गुलाबी कागज मिला. कागज को आधाआधा कर के 2 मोड़ दे कर तह किया गया था. चंद पल अपराजिता की उंगलियां उस कागज पर यों ही फिसलती रहीं… नानी के स्पर्श के एहसास के लिए मचलती हुईं. जब भावनाओं का ज्वारभाटा कुछ थमा तो उस की निगाहें उस कागज पर लिखे शब्दों की स्कैनिंग करने लगीं:

डियर अप्पू

‘‘जीवन में नैतिक सद््गुणों का महत्त्व समझना बहुत जरूरी है. इन नैतिक सद्गुणों में सब से ऊंचा स्थान ‘क्षमा’ का है. माफ कर देना और माफी मांग लेना दोनों ही भावनात्मक चोटों पर मरहम का काम करते हैं. जख्मों पर माफी का लेप लग जाने से पीडि़त व्यक्ति शीघ्र सब भूल कर जीवनधारा के प्रवाह में बहने लगते हैं. वहीं माफ न कर के हताशा के बोझ में दबा व्यक्ति जीवनपर्यंत अवसाद से घिरा पुराने घावों को खुरचता हुआ पीड़ा का दामन थामे रहता है. जबकि वह जानता है कि वह इस मानअपमान की आग में जल कर दूसरे की गलती की सजा खुद को दे रहा है.

‘‘अप्पू मैं ने तुम्हें कई बार अपने मांबाप पर क्रोधित होते देखा है. तुम्हें गम रहा कि तुम्हारी परवरिश दूसरे सामान्य बच्चों जैसी नहीं हुई है. जहां बाप का जिंदगी में होना न होना बराबर था वही तुम्हारी मां ने जिंदगी के तूफानों से हार कर स्वयं अपनी जान ले ली और एक बार भी नहीं सोचा कि उस के बाद तुम्हारा क्या होगा… बेटा तुम्हारा कुढ़ना लाजिम है. तुम गलत नहीं हो. हां, अगर तुम इस क्रोध की ज्वाला में जल कर अपना मौजूदा और भावी जीवन बरबाद कर लेती हो तो गलती सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी ही होगी. किसी दूसरे के किए की सजा खुद को देने में कहां की अक्लमंदी है?

‘‘मेरी बात को तसल्ली से बैठ कर समझने की चेष्टा करना और एकदम से न सही तो कम से कम अगले जन्मदिन तक धीरेधीरे उस पर अमल करने की कोशिश करना… बस यही तोहफा है मेरे पास तुम्हारे इस खास दिन पर तुम्हें देने के लिए.

‘‘ढेर सारा प्यार,’’

‘‘नानी.’’

वक्त तेजी से आगे बढ़ रहा था. अपराजिता अब इंजीनियरिंग के आखिरी साल में

थी और अपनी इंटर्नशिप में मशगूल थी. वह जिस कंपनी में इंटर्नशिप कर रही थी, प्रतीक भी वहीं कार्यरत था. कम समय में ही दोनों में गहरी मित्रता हो गई.

बीते सालों में अपराजिता नानी से 18वें जन्मदिन पर मिले सौगाती खत को अनगिनत बार पढ़ा था. क्यों न पढ़ती. यह कोई मामूली खत नहीं था. भाववाहक था नानी का. अकसर सोचती कि काश नानी ने उस के हर दिन के लिए एक खत लिखा होता तो कुछ और ही मजा होता. नानी के लिखे 1-1 शब्द ने मन के जख्मों पर चंदन के लेप का काम किया था. उस आधे पन्ने के पत्र की अहमियत किसी ऐक्सपर्ट काउंसलर के साथ हुए 10 सैशन की काउंसलिंग के बराबर साबित हुई थी.

अब अपराजिता के मस्तिष्क में बचपन में झेले सदमों के चलचित्रों की छवि धूमिल सी हो कर मिटने लगी थी. मम्मीपापा की बेमेल व कलहपूर्ण मैरिड लाइफ, पापा के जीवन में ‘वो’ की ऐंट्री और फिर रोजरोज की जिल्लत से खिन्न मम्मी का फांसी पर झूल कर जान दे देना… थरथर कांपती थी वह डरावने सपनों के चक्रवात में फंस कर. नानी के स्नेह की गरमी का लिहाफ उस की कंपकंपाहट को जरा भी कम नहीं कर पाया था.

नानी जब तक जिंदा रहीं लाख कोशिश करती रहीं उस की चेतना से गंभीर प्रतिबिंबों को मिटाने की, मगर जीतेजी उन्हें अपने प्रयासों में शिकस्त के अलावा कुछ हासिल न हुआ. शायद यही दुनिया का दस्तूर है कि हमें प्रियजनों के मशवरे की कीमत

उन के जाने के बाद समझ में आती है.

प्रतीक और अपराजिता का परिचय अगले सोपान  पर चढ़ने लगा था. बिना कुछ सोचे वह प्रतीक के रंग में रंग गई. कमाल की बात थी जहां इंटर्नशिप के दौरान प्रतीक उस के दिल में समाता जा रहा था तो दूसरी तरफ इंजीनियरिंग के पेशे से उस का दिल हटता जा रहा था.

वह औफिस आती थी प्रतीक से मिलने की कामना में, अपने पेशे की पेचीदगियों में सिर खपाने के लिए नहीं. ट्रेनिंग बोझ लग रही थी उसे. अपने काम से इतनी ऊब होती थी कि वह औफिस आते ही लंचब्रेक का इंतजार करती और लंचब्रेक खत्म होने पर शाम के 5 बजने का. कुछ सहकर्मी तो उसे पीठ पीछे ‘क्लौक वाचर’ पुकारते थे.

जाहिर था कि अपराजिता ने प्रोफैशन चुनते समय अपने दिल की बात नहीं सुनी. मित्रों की देखादेखी एक भेड़चाल का हिस्सा बन गई. सब ने इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया तो उस ने भी ले लिया. उस ने जब अपनी उलझन प्रतीक से बयां की तो सपाट प्रतिक्रिया मिली, ‘‘अगर तुम्हें इस प्रोफैशन में दिलचस्पी नहीं अप्पू तो मुझे भी तुम में कोई रुचि नहीं.’’

‘‘ऐसा न कहो प्रतीक… प्यार से कैसी शर्त?’’

‘‘शर्तें हर जगह लागू होती हैं अप्पू…

कुदरत ने भी दिमाग का स्थान दिल से ऊपर

रखा है. मुझे तो अपने लिए इंजीनियर जीवनसंगिनी ही चाहिए…’’

यह सुन कर अपराजिता होश खो बैठी थी. दिल आखिर दिल है, कहां तक खुद को संभाले… एक बार फिर किसी प्रियजन को खोने के कगार पर खड़ी थी. कैसे सहेगी वह ये सब? कैसे जूझेगी इन हालात से बिना कुछ गंवाए?

अगर वह प्रतीक की शर्त स्वीकार लेती है तो क्या उस कैरियर में जान डाल पाएगी जिस में उस का किंचित रुझान नहीं है? उस की एक तरफ कूआं तो दूसरी तरफ खाई थी, कूदना किस में है उसे पता न था.

अगले महीने फिर अपराजिता का खास जन्मदिन आने वाला था. खास इसलिए क्योंकि नानी ने अपने खत की सौगात छोड़ी थी इस दिन के लिए भी. बड़ी मुश्किल से दिन कट रहे थे… उस का धीरज छूट रहा था… जन्मदिन की सुबह का इंतजार करना भारी हो रहा था. बेसब्री उसे अपने आगोश में ले कर उस के चेतन पर हावी हो चुकी थी. अत: उस ने जन्मदिन की सुबह का इंतजार नहीं किया. जन्मदिन की पूर्वरात्रि पर जैसे ही घड़ी ने रात के 12 बजाए उस ने नानी के दूसरे नंबर के ‘लैगसी लैटर’ का लिफाफा खोल डाला. लिखा था:

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‘डियर अप्पू’’

‘‘जल्दी तुम्हारी इंजीनियरिंग पूरी हो जाएगी. बहुत तमन्ना थी कि तुम्हें डिगरी लेते देखूं, मगर कुदरता को यह मंजूर न था. खैर, जो प्रारब्ध है, वह है… आओ कोई और बात करते हैं.’’

‘‘तुम ने कभी नहीं पूछा कि मैं ने तुम्हारा नाम अपराजिता क्यों रखा. जीतेजी मैं ने भी कभी बताने की जरूरत नहीं समझी. सोचती रही जब कोई बात चलेगी तो बता दूंगी. कमाल की बात है कि न कभी कोई जिक्र चला न ही मैं ने यह राज खोलने की जहमत उठाई. तुम्हारे 21वें जन्मदिन पर मैं यह राज खोलूंगी, आज के लिए इसी को मेरा तोहफा समझना.

‘‘हां, तो मैं कह रही थी कि मैं ने तुम्हें अपराजिता नाम क्यों दिया. असल में तुम्हारे पैदा होने के पहले मैं ने कई फीमेल नामों के बारे में सोचा, मगर उन में से ज्यादातर के अर्थ निकलते थे-कोमल, सुघड़, खूबसूरत वगैराहवगैराह. मैं नहीं चाहती थी कि तुम इन शब्दों का पर्याय बनो. ये पर्याय हम औरतों को कमजोर और बुजदिल बनाते हैं. कुछए की तरह एक कवच में सिमटने को मजबूर करते हैं. औरत एक शरीर के अलावा भी कुछ होती है.

‘‘तुम देवी बनने की कोशिश भी न करना और न ही किसी को ऐसा सोचने का हक देना. बस अपने सम्मान की रक्षा करते हुए इंसान बने रहने का हक न खोना.

‘‘मैं तुम्हें सुबह खिल कर शाम को बिखरते हुए नहीं देखना चाहती. मेरी आकांक्षा है कि तुम जीवन की हर परीक्षा में खरी उतरो. यही वजह थी कि मैं ने तुम्हें अपराजिता नाम दिया… अपराजिता अर्थात कभी न पराजित होने वाली. अपनी शिकस्त से सबक सीख कर आगे बढ़ो… शिकस्त को नासूर बना कर अनमोल जीवन को बरबाद मत करो. जिस काम के लिए मन गवाही न दे उसे कभी मत करो, वह कहते हैं न कि सांझ के मरे को कब तक रोएंगे.’’

‘‘बेटा, जीवन संघर्ष का ही दूसरा नाम है. मेरा विश्वास है तुम अपनी मां की तरह हौसला नहीं खोओगी. हार और जीत के बीच सिर्फ अंश भर का फासला होता है. तो फिर जिंदगी की हर जंग जीतने के लिए पूरा दम लगा कर क्यों न लड़ा जाएं.

‘‘बहुतबहुत प्यार’’

‘‘नानी.’’

अपराजिता ने खत पढ़ कर वापस लिफाफे में रख दिया. रात का सन्नाटा गहराता जा रहा था, किंतु कुछ महीनों से जद्दोजहद का जो शिकंजा उस के दिलोदिमाग पर कसता जा रहा था उस की गिरफ्त अब ढीली होती जान पड़ रही थी.

दूसरे दिन की सुबह बेहद दिलकश थी. रेशमी आसमान में बादलों के हाथीघोड़े से बनते प्रतीत हो रहे थे. चंद पल वह यों ही खिड़की से झांकती हुई आसमान में इन आकृतियों को बनतेबिगड़ते देखती रही. ऐसी ही आकृतियों को देखते हुए ही तो वह बचपन में मम्मी का हाथ पकड़ कर स्कूल से घर आती थी.

कल रात वाले लैगसी लैटर को पढ़ने के बाद से ही वह खुद में एक परिवर्तन महसूस कर रही थी… कहीं कोई मलाल न था कल रात से. वह जीवन को अपनी शर्तों पर जीने का निर्णय कर चुकी थी. औफिस जाने से पहले उस ने एक लंबा शावर लिया मानो कि अब तक के सभी गलत फैसलों व चिंताओं को पानी से धो कर मुक्ति पा लेना चाहती हो.

प्रतीक के साथ औफिस कैंटीन में लंच लेते हुए उस ने अपना निर्णय उसे सुनाया, ‘‘प्रतीक मैं तुम्हें भुलाने का फैसला कर चुकी हूं, क्योंकि मेरी जिंदगी के रास्ते तुम से एकदम अलग हैं.’’

‘‘यह क्या पागलपन है? कौन से हैं तुम्हारे रास्ते… जरा मैं भी तो सुनूं?’’ प्रतीक कुछ बौखला सा गया.

‘‘लेखन, भाषा, साहित्य ये हैं मेरे शौक… किसी वजह से 4 साल पहले मैं ने गलत लाइन पकड़ ली, लेकिन इस का यह अर्थ कतई नहीं कि मैं इस गलती के साथ उम्र गुजार दूं या इस के बोझ से दब कर दूसरी गलती करूं… अगर मैं ने तुम से शादी की तो वह मेरी एक और भूल होगी क्योंकि सच्चा प्यार करने वाले सामने वाले को ज्यों का त्यों अपनाते हैं. उन्हें अपने सांचे में ढाल कर अपनी पसंद और अपने तरीके उन पर नहीं थोपते.’’

‘‘भेजा फिर गया है तुम्हारा… जो समझ में आए करो मेरी बला से.’’ तमतमाया प्रतीक लंच बीच में ही छोड़ कर तेजी से कैंटीन से बाहर निकल गया. अपराजिता ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. इत्मीनान से अपना लंच खत्म करने में मशगूल रही.

अपराजिता हर संघर्ष से निबटने को तैयार थी. सच ही तो लिखा था नानी ने कि सांझ के

मरे को कब तक रोएंगे. गलत शादी, गलत कैरियर में फंस कर जिंदगी दारुण मोड़ पर ही चली जानी थी… वह इस अंधे मोड़ के पहले ही सतर्क हो गई.

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‘‘अपराजिता नानी ने तुम्हारे लिए कुछ पैसा फिक्स डिपौजिट में रखवाया था. अब तक मैं इस पौलिसी को 2 बार रिन्यू करा चुकी हूं. पर सोचती हूं अब अपनी जिम्मेदारी तुम खुद उठाओ और यह रकम ले कर अपने तरीके से इनवैस्ट करो,’’ एक शाम मौसी ने कहा.

‘‘जैसा आप चाहो मौसी. अगर आप ऐसा चाहती हैं तो ठीक है.’’

अपराजिता अब काफी हद तक आत्मनिर्भर हो चुकी थी. अब तक उस के 2 उपन्यास छप चुके थे. एक पर उसे ‘बुकर प्राइज’ मिला था तो दूसरे उपन्यास ने भी इस साल सब से ज्यादा प्रतिलिपियां बिकने का कीर्तिमान स्थापित किया. अब उसे खुद के नीड़ की तलाश थी. मौसी के प्रति वह कृतज्ञ थी पर उम्रभर उन पर निर्भर रहने का उस का इरादा न था.

बहुत दिन हो चुके थे उसे लेखनसाधना में खोए हुए. कुछ सालों से वह सिर से पांव तक काम में इतना डूबी रही कि स्वयं को पूरी तरह नजरअंदाज कर बैठी थी. इस बार उस ने 21वें जन्मदिन पर खुद को ट्रीट देने  का फैसला किया. तमाम टूअर पैकेजेस देखनेसमझने के बाद उसे कुल्लूमनाली का विकल्प पसंद आ गया.

कुछ दिन बस खुद के लिए… कहीं बिलकुल अलग कोलाहल से दूर. साथ में होगा तो बस नानी का 21वें जन्मदिन के लिए लिखा गया सौगाती खत :

‘‘डियर अप्पू

‘‘अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा आंसुओं में डुबोने के बाद मैं ने जाना कि 2 प्रकार के व्यक्तियों से कोई संबंध न रखो- मूर्ख और दुष्ट. इस श्रेणी के लोगों को न तो कुछ समझाने की चेष्टा करो न ही उन से कोई तर्कवितर्क करो. मानो या न मानो तुम उन से कभी नहीं जीत पाओगी.

‘‘ऐसे आदमी से नाता न जोड़ो जिस की पहली, दूसरी, तीसरी और आखिरी प्राथमिकता वह खुद हो. ऐसे व्यक्तियों के जीवन के शब्दकोश में ‘मैं’ सर्वनाम के अतिरिक्त कोई दूसरा लफ्ज ही नहीं होता. अहं के अंकुर से अवसाद का वटवृक्ष पनपता है. अहं से मदहोश व्यक्ति अपने शब्द और अपनी सोच को अपने आसपास के लोगों पर एक कानून की तरह लागू करना चाहता है. ऐसों से नाता जुड़ने के बाद दूसरों को रोज बिखर कर खुद को रोज समेटना पड़ता है. तब कहीं जा कर जीवननैया किनारे लग पाती है उन की.

‘‘जोड़े तो ऊपर से बन कर आते हैं जमीं पर तो सिर्फ उन का मिलन होता है, यह निराधार थ्योरी गलत शादी में फंस के दिल को समझाने के लिए अच्छी है, किंतु मैं जानती हूं तुम्हारे जैसी बुद्धिजीवी कोरी मान्यताओं को बिना तार्किक सत्यता के स्वीकार नहीं कर सकती. न ही मैं तुम से ऐसी कोई उम्मीद करती हूं.

‘‘बेटा मेरी खुशी तो इस में होगी कि तुम वे बेडि़यां तोड़ने की हिम्मत रखो जिन का मंगलसूत्र पहन कर तुम्हारी मां की सांसें घुटती रहीं और आखिर में वही मंगलसूत्र उस के गले का फंदा बन कर उस की जान ले गया.

‘‘तुम्हारा बाप तुम्हारी मां की जिंदगी में

था, मगर उस के अकेलेपन को बढ़ाने के लिए. डियर अप्पू शादी का सीधा संबंध भावनात्मक जुड़ाव से होता है. जब यह भावनात्मक बंधन ही न हो तो वह शादी खुदबखुद अमान्य हो जाती है… ऐसी शादियां और कुछ भी नहीं बस सामाजिकता की मुहर लगा हुआ बलात्कार मात्र होती हैं. यह कैसा गठबंधन जहां सांसें भी दूसरों की मरजी से लेनी पड़ें?

‘‘अगर हालातवश ऐेसे रिश्तों में कभी फंस भी जाओ तो अपने आसपास उग आई अवांछित रिश्तों की नागफनियों को काटने का साहस भी रखो अन्यथा ये नागफनियां तुम्हारे पांव को लहूलुहान कर के तुम्हारी ऊंची कुलांचें लेने की शक्ति खत्म कर देंगी, साथ ही तुम्हें जीवन भर के लिए मानसिक तौर पर पंगू बना देंगी.

‘‘ढेर सा प्यार

‘‘तुम्हारी नानी.’’

कुल्लू की वादियों में झरने के किनारे एक चट्टान पर बैठी अपराजिता की

आंखों से अचानक आंसू झरने लगे. जाने क्यों आज प्रतीक की याद आ रही थी. शायद यह इन शोख नजारों का असर था कि मन मचलने लगा था किसी के सान्निध्य के लिए. नामपैसा कमा कर भी वह कितनी अकेली थी… या फिर यह अकेलापन उस की सोच का खेल था?

वह अकेली कहां थी. उस के साथ थे हजारोंलाखों प्रसंशक. क्यों याद कर रही है वह प्रतीक को… क्यों चाहिए था उसे किसी मर्द का संबल? ऐसा क्या था जो वह खुद नहीं कर पाई? क्या प्रतीक भी उस के बारे में सोचता होगा? ऐसा होता तो वह 10 साल पहले ही उसे ठोकर न मार गया होता. दोष क्या था उस का? सिर्फ इतना

कि वह इंजीनियरिंग नहीं लेखन में आगे बढ़ना चाहती थी.

‘‘कौन जानता है प्रतीक को आज की तारीख में? वहीं वह खुद लेखन के क्षेत्र का प्रमुख हस्ताक्षर बन कर शोहरत का पर्यात बन चुकी थी. बड़ा गुमान था प्रतीक को अपने काबिल इंजीनियर होने पर… लकीर का फकीर कहीं का. मध्यवर्गीय मानसिकता का शिकार… जिन्हें सिर्फ इंजीनियरिंग और कुछ दूसरे इसी

तरह के प्रोफैशन ही समझ में आते हैं. लेखन, संगीत और आर्ट उन की सोच से परे की बातें होती हैं.

नहीं चाहिए था उसे दिखावे का हीरो अपनी जिंदगी में. रही बात अकेलेपन की तो राहें और भी थी. उस ने निश्चित किया कि वह दिल्ली लौट कर किसी अनाथ बच्ची को अपना लेगी… गोद ले कर उसे अपना उत्तराधिकारी… अपने सूने आंगन की खुशबू बना लेगी.

खुशबू को अपराजिता के आंगन में महकते हुए करीब 10 साल हो गए थे. जिस दिन अपराजिता किसी बच्चे की तलाश में अनाथाश्रम पहुंची थी तो उस 4-5 साल की पोलियोग्रस्त बच्ची की याचक दृष्टि उस के दिल को भीतर तक भेद गई थी. उस रात आंखों से नींद की जंग चलती रही थी. सारी रात करवटें लेतेलेते बदन थक गया था. दूसरे दिन बिना विलंब किए अनाथाश्रम पहुंच गई अपराजिता जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के लिए.

अगले कुछ महीनों तक गंभीर कागजी कार्यवाही को पूरा करने के बाद वह कानूनी तौर पर खुशबू को अपनी बेटी का दर्जा देने में कामयाब हो गई. हैरान रह गई थी अपराजिता दुनिया का चलन देख कर तब. किसी ने छींटाकशी की कि उस का दिमाग खराब हो गया है जो वह यह फालतू का काम कर रही है.

किसी ने यहां तक कह दिया कि यदि वह एक संस्कारित, खानदानी परिवार का खून होती तो मर्यादा में रह कर शादी कर के अपने बालबच्चे पाल रही होती. कुछ और लोगों के ऐक्सपर्ट कमैंट थे कि वह शोहरत पाने की लालसा में यह सब कर रही है. मात्र उंगलियों पर गिनने लायक ही लोग थे, जिन्होंने उस के इस कदम की दिल से सराहना की थी. खैर, कोई बात नहीं. नेकी और बदी की जंग का दस्तूर जहां में सदियों पुराना है.

बरसों के लंबे इलाज और फिजियोथेरैपी सैशंस के बाद खुशबू काफी हद तक स्वस्थ हो गई थी. गजब का आत्मविश्वास था उस में. उस की हर पेंटिंग में जीवन रमता था. वह हर समय इंद्रधनुषी रंग कैनवस पर बिखेरती हुई उमंगों से भरपूर खूबसूरत चित्र बनाती. शरीर की विकलांगता, अनाथाश्रम में बीता कोमल बचपन दोनों उस की उमंगों के वेग को बांध न सके थे.

खुशबू के प्रयासों की महक से अपराजिता की जीत का मान बढ़ता ही चला गया. अपनी शर्तों पर नेकी के साथ जिंदगी जीते हुए दोनों जहां की खुशियां पा ली थीं अपराजिता ने और अपने नाम को सार्थक कर दिखाया था. आज रात वह अपना 50वां जन्मदिन मनाने वाली थी नानी के आखिरी ‘सौगाती खत’ को खोल कर.

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‘‘डियर अप्पू

तुम अब तक उम्र के 50 वसंत देख चुकी होगी और अपने रिटायरमैंट में स्थिर होने की सोच रही होगी. यह वह उम्र है जिसे जीने का मौका तुम्हारी मां को कुदरत ने नहीं दिया था. इसलिए मुबारक हो… बेटा वक्त तुम पर हमेशा मेहरबान रहे.

‘‘तुम्हारे मन में शायद अध्यात्म और तीर्थ के ख्याल भी आते होंगे. ऐसे ख्याल कई बार स्वेच्छा अनुसार आते हैं और कई बार इस दिशा में दूसरों के दबाव में भी सोचना पड़ता है. विशेषतौर पर महिलाओं से इस तरह की अपेक्षा जरूर की जाती है कि उन का आचरण पूर्णतया धार्मिक हो. यों तो धर्म एक बहुत ही व्यक्तिगत मामला है फिर भी धर्म में रुचि न रखने वाली स्त्रियों पर असंस्कारित होने की मुहर लगा दी जाती है.

‘‘मैं तुम से कहूंगी कि ये सब बकवास है. मैं ने अपने जीवन में अनेक ऐसे महात्मा, मुल्ला और पादरियों के बारे में पढ़ा और सुना है जो

धर्म की आड़ में हर तरह के घृणित कृत्य करते हैं और दूसरों के बूते पर ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं.

‘‘ज्यादा दूर क्यों जाए मैं ने तो स्वयं तुम्हारे नाना को ये सब पाखंड करते देखा है. उन्होंने हवन, जप, मंत्र करने में पूरी उम्र तो बिताई पर उस के सार के एक अंश को कभी जीवन में नहीं उतारा. दूसरों को प्रताड़ना देना ही उन के जीवन का एकमात्र उद्देश्य और उपलब्धि था. अब तुम ही बताओ यह कैसा पूजापाठ और कर्मकांड जिस में आडंबर करने वाले के स्वयं के कर्म और कांड ही सही नहीं हैं.

‘‘तो डियर अप्पू कहने का सार मेरा यह है कि धर्म, पूजापाठ कभी भी मन की शुद्धता के प्रमाण नहीं होते. मन की शुद्धता होती है अच्छे कर्मों में, अपने से कमजोर का संबल बनने में, बाकी सब तो तुम्हारे अपने ऊपर है, पर एक वचन मैं भी तुम से लेना चाहूंगी और मुझे पूरा भरोसा है कि तुम मुझे निराश नहीं करोगी.

‘‘बेटी यह शरीर नश्वर है, जो भी दुनिया में आया है उसे जाना ही है. इस शरीर का महत्त्व तभी तक है जब तक इस में जान है. जान निकलने के बाद खूबसूरत से खूबसूरत जिस्म भी इतना वीभत्स लगता है कि मृतक के परिजन भी उसे छूने से डरते हैं. जीतेजी हम दुनिया

के फेर में इस कदर फंसे होते हैं कि कई बार चाह कर भी कुछ अच्छा नहीं कर पाते. मौत में हम सारी बंदिशों से आजाद हो जाते हैं, तो फिर क्यों न कुछ इंसानियत का काम कर जाएं और दूसरों को भी इंसान बनने का हुनर सिखा जाएं?

‘‘डियर अप्पू, संक्षेप में मेरी बात का अर्थ है कि जैसे मैं ने किया था वैसे ही

तुम भी मेरी तरह मृत्यु के बाद अंगदान की औपचारिकताएं पूरी कर देना. मुझे नहीं लगता कि तुम्हारे 50वें जन्मदिन को मनाने का इस से श्रेष्ठतर तरीका कोई और हो सकता है.

‘‘बस आज के लिए इतना ही अप्पू… तबीयत आज कुछ ज्यादा ही नासाज है. ज्यादा लिखने की हिम्मत नहीं हो रही… लगता है अब जान निकलने ही वाली है. कोशिश करूंगी, मगर फिलहाल तो ऐसा ही महसूस हो रहा है कि यह मेरा आखिरी खत होगा तुम्हारे लिए.

‘‘सदा सुखी रहो मेरी बच्ची.

‘‘नानी.’’

अपराजिता ने पत्र को सहेज कर सुनहरे रंग के कार्डबोर्ड बौक्स में नानी के अन्य पत्रों के साथ रख दिया. इन सभी पत्रों को आबद्ध करा के वह खुशबू के अठारवें जन्मदिन पर भेंट करेगी.

अपराजिता अब तक एक बहुत ही सफल लेखिका थी. उस के लिखे उपन्यासों पर कई दूरदर्शन चैनल धारावाहिक बना चुके थे. ट्राफी और अवार्ड्स से उस के ड्राइंगरूम का शोकेस पूरी तरह भर चुका था. रेडियो, टेलीविजन पर उस के कितने ही इंटरव्यू प्रसारित हो चुके थे. देशभर की पत्रपत्रिकाएं भी उस के इंटरव्यू छापने का गौरव ले चुकी थीं.

इन सभी साक्षात्कारों में एक प्रश्न हमेशा पूछा गया कि अपनी लिखी किताबों में उस की पसंदीदा किताब कौन सी है और इस सवाल का एक ही जवाब उस ने हमेशा दिया था, ‘‘मेरी नानी के लिखे ‘विरासती खत’ ही मेरे जीवन की पसंदीदा किताब है और मेरी इच्छा है कि मैं अपनी बेटी के लिए भी ऐसी ही विरासत छोड़ कर जाऊं जो कमजोर पलों में उस का उत्साहवर्द्धन कर उस का जीवनपथ सुगम बनाए. वह लकीर की फकीर न बन कर अपनी एक स्वतंत्र सोच का विकास करे.’’ Hindi Story

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Short Story : पंडित जी की गाय

Short Story : हमारे गांव के पंडित गिरधारी लाल के पास एक मोटी-ताजी दुधारू गाय थी. बिल्कुल झक सफेद रंग, चमकती काया, ऊंचा कद, खूबसूरत सींघें. देखते ही मन रीझ जाता था उस पर. पंडित जी को यह गाय किसी ने दान में दी थी. वे बड़ा प्यार करते थे उससे. सुबह जल्दी उठ कर अपने हाथों से सानी-पानी देते, नहलाते-धुलाते और उसकी रस्सी थामें चराने ले जाते. उस गाय के कारण घर में दूध, घी, दही की कमी नहीं होती थी. खालिस दूध-घी खा-खा कर पंडित जी भी मोटे तगड़े होते जा रहे थे. एक शाम की बात है, पंडित गिरधारी लाल जैसे ही दूध दुहने गोशाला पहुंचे तो गाय वहां से गायब मिली. खूंटा भी उखड़ा हुआ था. पंडित जी की तो जान सूख गयी. उन्होंने सोचा कि हो न हो गाय कहीं निकल भागी है. वह फौरन उसे ढूंढ़ने निकल पड़े.

शाम का धुंधलका पसर चुका था. थोड़ी दूर पर उन्हें गाय चरती नजर आयी. वह खुश हो गये. लेकिन सांझ के झुरमुट में यह नहीं जान पाए कि जिसे वह अपनी गाय समझ रहे हैं, वह पड़ोसी का मरखना बैल है. उन्होंने लपककर ज्यों ही उसके गले से लटकती रस्सी थामी कि बैल भड़क उठा. जब तक पंडित जी को बात समझ में आती, देर हो चुकी थी. बैल ने हुंकारते हुए गर्दन घुमायी और पंडित जी को मारने दौड़ा. थुलथुल शरीर वाले पंडित गिरधारी लाल भाग खड़े हुए. बैल पीछे लग लिया. पंडित जी गिरते-पड़ते, हांफते-कांपते भागते जा रहे थे. भागते-भागते उनका दम निकला जा रहा था और बदमाश बैल था कि हार मानने को तैयार ही नहीं था. दौड़ाए जा रहा था. आखिरकार एक बड़ा गड्ढा देखकर पंडित जी उसमें धप से कूद गये. बैल फिर भी न माना. वहीं गड्ढे के आसपास फुंफारता घूमता रहा. पंडित जी बड़ी देर तक गड्ढे के गंदे पानी में बैठे रहे. कुछ देर बाद लगा कि बैल थोड़ा किनारे हुआ है तो गड्ढे से निकले और घर की ओर भागे. मगर नामुराद बैल फिर पीछे लग लिया. पंडित जी को कुछ न सूझा तो रामखिलावन के भूसे की कोठरी में घुस गये.

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गड्ढे के पानी से पहले ही कपड़े गीले हो गये थे, भूसे के ढेर में घुसे तो उनका तो रूप ही बदल गया. पूरे बदन में, सिर-मुंह में भूसा चिपक गया. वह किसी दूसरे ग्रह के जीव नजर आने लगे. पंडित जी बड़ी देर तक वहां दम साधे दुबके रहे. बाहर धुंधलका घिर गया था. जब दो घंटे बाद लगा कि बैल टल गया तो बाहर निकले. सामने से रामखिलावन आ रहा था, उसने जो ऐसा विचित्र आदमी देखा तो उसकी डर के मारे चीख निकल गयी. उसकी चीख सुनकर आसपास के आदमी उसकी मदद को आ जुटे. अब आगे-आगे पंडित जी और पीछे-पीछे सारे लोग. पंडित जी भागते हुए सीधे अपने घर में घुसे और चारपाई पर ढेर हो गये. पीछे-पीछे तमाम आदमी भी घुस आये. अंदर से पंडिताइन निकलीं तो पंडितजी का रूप देखकर चिल्लाने लगीं. पंडित जी ने हाथ उठाकर सबको शांत करवाया. चीख-चीख कर बोले – अरे, भाई मैं हूं मैं… तब जाकर लोगों को समझ में आया कि अरे, ये तो अपने पंडित गिरधारी लाल हैं. पंडित जी ने फिर सबको पूरी कथा सुनायी और अपनी प्यारी गाय को याद करके उदास हो गये.

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कथा सुनकर पंडिताइन बोली, ‘नाहक गांव भर चक्कर काटे, गाय तो मैंने वहां पिछवाड़े बांध रखी है. गौशाला में उसका खूंटा उखड़ गया था.’

पंडिताइन की बात सुनकर पंडित जी ने सिर पीट लिया और गांव वाले ठठाकर हंस पड़े.

Film Review : निकिता रौय

Film Review : जब से बौलीवुड में हिंदी भाषा में फिल्में बननी शुरू हुई हैं तब से ही हौरर फिल्में भी बनती रही हैं. ये हौरर फिल्में कुछ तो सुनीसुनाई बातों पर आधारित होती थीं और कुछ में अंधविश्वासों के कारण भूतिया हवेली, चुड़ैल, बुरी आत्माएं और राक्षसी शक्तियों जैसे विषय शामिल होते थे. तांत्रिकों की वजह से लोगों में हौरर फिल्मों की कहानियों पर काफी प्रभाव पड़ा और लोग कहने लगे कि डायन के पांव उलटे होते हैं और उस का चेहरा अति डरावना होता है या फलां पेड़ पर भूत रहता है. ऐसी अंधविश्वासी बातों के कारण लोगों में भूतप्रेत, डायन आदि का खौफ फैलता गया जबकि वास्तव में भूतप्रेत, डायन आदि इंसान का वहम या डर होता है.

हौरर फिल्में बनाने वालों में रामसे ब्रदर्स का नाम टौप पर लिया जाता है. वर्ष 2000 में बनी ‘राज’ फिल्म को बौलीवुड के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ हौरर फिल्म के रूप में मान्यता मिली हुई है. बौलीवुड में हाल ही में ‘स्त्री 2’ और ‘मुंज्या’ शीर्षक से 2 और हौरर फिल्में बनी हैं. इन फिल्मों ने दर्शकों को डराने के साथसाथ कमाई भी तगड़ी की. इन फिल्मों को कौमेडी की गुदगुदाहट में लपेट कर परोसा गया था.

अब जानेमाने सीनियर ऐक्टर शत्रुघ्न सिन्हा और उन की बेटी अदाकारा सोनाक्षी सिन्हा के भाई कुश सिन्हा ‘निकिता रौय’ के रूप में एक ऐसी साइकोलौजिकल हौरर फिल्म ले कर आए हैं जो वास्तविकता और डिसइल्यूजन के बीच की बारीक परतें खोलती है. यह दर्शकों को डराने के साथसाथ उन की आंखों पर पड़ी अंधविश्वास की पट्टी भी उतार देती है. इस फिल्म को इस तरह बनाया गया है कि यह सोचने पर मजबूर करती है. इस फिल्म की कहानी भूतिया तो कतई नहीं है. यह अंधविश्वासों पर तीखी टिप्पणी तो करती है, साथ ही, यह ढोंगी और पाखंडी बाबाओं का परदाफाश भी करती है. यह फिल्म अंधविश्वास और सच्चाई के बीच के संघर्ष को दिखाती है.

कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है. शुरुआत में एक बियाबान घर में सनल राय (अर्जुन रामपाल) एक अनजाने डर से जू?ा रहा है. दरअसल जहां वह रह रहा है वह उत्तराखंड के जंगलों में बनी एक सुनसान हवेली है. स्थानीय लोगों के अनुसार वहां एक साया चलता है. वहां एक भगवाधारी साधु अमरदेव (परेश रावल) आ कर लोगों से कहता है कि वह उस साए को काबू कर लेगा. सनल राय को लगता है, कोई उसे मारना चाहता है. डर कर वह अपनी जान ले लेता है. सुपरनैचुरल दावों पर रिसर्च करने वाली लेखिका व पत्रकार निकिता रौय (सोनाक्षी सिन्हा) उस की बहन है. वह खुद भी निकिता की तरह घटनाओं की पड़ताल कर रहा था.

पुलिस सनल की मौत को आत्महत्या मानती है, मगर हालात निकिता को जानेमाने आध्यात्मिक गुरु बाबा अमरदेव (परेश रावल) के पास जाने को मजबूर करते हैं. वह खुद को भगवान मानता है. हजारों का चढ़ावा उसे चढ़ाया जाता है. जैसेजैसे निकिता अपनी जांच में आगे बढ़ती है, उसे पता चलता है कि सनल अमरदेव के पाखंड का परदाफाश करना चाहता था, मगर तथ्यों और सुबूतों द्वारा साबित करने से पहले उस की मौत हो जाती है. अपने भाई की मौत का कारण पता लगाने में निकिता का साथ उस का दोस्त जौली (सुहैल नय्यर) देता है. जौली और निकिता को जांच में आगे बढ़ने के साथ भयानक सुपरनैचुरल अनुभवों से गुजरना पड़ता है. सनल की आखिरी रिकौर्डिंग के आखिरी मैसेज उन्हें सच की तह तक ले जाते हैं.

सनल की साथी फेमा (कलिरोई) की मौत उन्हें अमरदेव की ओर इशारा करती है. वह अमरदेव को चैलेंज करती है. क्या वाकई अमरदेव सनल की मौत का जिम्मेदार है? अब निकिता अमरदेव की छाती में खंजर घोप देती है. अमरदेव नहीं मरता और कहता है कि, ‘अब मैं तुम में हूं.’ गांव वाले वहां अंदर भागते हैं मगर वहां कोई अमरदेव नहीं. बस, निकिता अकेली खून में लथपथ पड़ी थी. वह पागल सी हो जाती है और जोरजोर से हंसने लगती है. हवेली के फाटक अपनेआप खुलने लगते हैं. निकिता सोच रही थी कि क्या अमरदेव सचमुच मर गया है या उस का डर निकिता के अंदर जी रहा है. क्या अमरदेव एक इंसान था या लोगों के डर का साया. क्या सच्चाई जीत गई या निकिता हार गई, निकिता रौय को मानसिक रोगी करार दे दिया जाता है.

फिल्म अंधविश्वास और नकली बाबाओं के भंडाफोड़ करने वाली एक लेखिका की कहानी पर आधारित है, जो अपने भाई की मौत के रहस्य की जांच करती है. यह अंधविश्वास और सच्चाई के बीच की लड़ाई है. कुश सिन्हा की यह पहली फिल्म है और उस का निर्देशन परिपक्व है, खासकर मनोवैज्ञानिक डर और अकेलेपन के माध्यम से डर दिखाने के लिए कुश सिन्हा की सराहना की गई है. फिल्म में सस्पैंस और थ्रिल को बनाए रखा गया है. कहींकहीं फिल्म उल?ाने लगती है. सोनाक्षी सिन्हा ने नकली बाबाओं का सच सामने लाने वाली का किरदार निभाया है. परेश रावल ने साबित कर दिया है कि डराने के लिए चीखना जरूरी नहीं होता. सिनेमेटोग्राफी ने फिल्म को शानदार बनाया है. फिल्म का क्लाइमैक्स जल्दी में निबटाया गया है. सभी कलाकारों ने बढि़या ऐक्ंिटग की है.

निकिता रौय’ सिर्फ एक डरावनी कहानी नहीं बल्कि एक ऐसी फिल्म है जो डर के बहाने समाज में फैले अंधविश्वास, झूठे गुरुओं और लोगों को गुमराह करने वाले सिस्टम पर सवाल उठाती है. फिल्म में गाने बहुत कम हैं, मगर बैकग्राउंड म्यूजिक ने कहानी को दिलचस्प बना दिया है. अगर आप हौरर या थ्रिलर फिल्मों के शौकीन हैं तो यह फिल्म आप के लिए बनी है. Film Review

 

 

Short Kahani in Hindi : गाय और शास्त्री जी

Short Kahani in Hindi : शास्त्रीजी का असली नाम तो लोगों को मालूम ही नहीं था. सभी बड़े लोगों के समान वह भी दूसरे नाम से ही प्रसिद्ध हो गए थे. लोग उन्हें ‘गोभक्त शास्त्रीजी’ के नाम से ही जानते थे. उन के लिए संसार में सब से अधिक महत्त्वपूर्ण चीज गाय थी. गाय को ही वह अपना सबकुछ समझते थे. गाय ही उन की माता थी और गाय ही उन का पिता, क्योंकि गोभक्ति के कारण ही उन्हें प्रसिद्धि मिली थी.

लोग कहते हैं कि गांव में उन की मां भीख मांग कर गुजारा करती हैं, पर शहर में वह मां रूपी गाय के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर रहे थे. जब कोई उन से उन की मां के बारे में पूछता तो वह भावुक हो कर कहते, ‘‘मेरी मां तो गाय ही है,’’ पर वास्तविकता यह थी कि अपनी पत्नी के डर से उन्होंने अपनी मां से रिश्ता तोड़ लिया था.

उधर उन की पत्नी को भी गाय से अगाध प्रेम था. भक्त लोगों की ओर से उन्हें प्रतिवर्ष गाएं दान में मिल जाती थीं. जब तक वे दूध देने लायक रहतीं, उन की खूब सेवा की जाती, पर बाद में उन का भी शायद उसी तरह परित्याग कर दिया जाता जैसे उन्होंने अपनी जननी का कर रखा था.

कुछ लोगों ने पूछा, ‘‘पंडितजी, आप को तो हर वर्ष दरजनों गाएं दान में मिलती हैं, पर आप के घर में तो सदा

6-7 गाएं ही रहती हैं?’’

इस पर पंडितजी बड़े नम्र हो कर कहते, ‘‘भैया, इतनी गायों को रख कर मैं क्या करूंगा? मैं भी उन्हें दान में दे देता हूं.’’

पर आज तक कोई ऐसा व्यक्ति देखने या सुनने में नहीं आया कि जिस ने शास्त्रीजी से दान में गाय प्राप्त की हो. गाएं कहां जाती थीं, इस का पता या तो शास्त्रीजी को मालूम था या गोमाता को.

शास्त्रीजी ने गोभक्त सभा की स्थापना की थी, जिस के वह संस्थापक अध्यक्ष थे और आजन्म अध्यक्ष रहने की उन्होंने कसम खा रखी थी. नगर के कई धार्मिक कहे जाने वाले धनाढ्य इस संस्था के संस्थापक थे. ऐसे सभी लोगों को गाय से कुछ ज्यादा ही लगाव होता है.

मानव रक्षा के लिए वे कभी तैयार नहीं होंगे. मनुष्यों की तो वे मुक्ति में विश्वास रखते हैं. नकली दवाइयों, मिलावट की वस्तुओं और नशीले द्रव्यों के माध्यम से वे मानव की मुक्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और उन के लिए स्वर्ग का द्वार खोल रहे हैं. फिर उन्हें उन के लिए चिंता करने की क्या आवश्यकता है? पर गोभक्त शास्त्रीजी के बड़े भक्त थे और उन के द्वारा गायों की रक्षा करना चाहते थे.

गोभक्त सभा के सैकड़ों सदस्य थे और सभी अमीर लोग थे. स्वाभाविक है, अमीर ही गाय की रक्षा कर सकते हैं. गरीब, जो अपनी रक्षा नहीं कर सकता वह गाय की क्या खाक रक्षा करेगा? गोभक्त सभा में चूंकि सभी अमीर थे, इसलिए गोभक्त सभा का फंड भी तगड़ा था. सभा की बैठकें कम ही होती थीं.

सभा क्या काम करती है, गायों और सभा के बीच कैसा संबंध है, इस का किसी को पता नहीं था. सदस्य शास्त्रीजी की मांगी हुई रकम दे कर पुण्य प्राप्त कर लेते थे और शास्त्रीजी हर 3 महीने में गोरक्षा के बारे में एक जोरदार लेख लिख कर उन से भी ज्यादा पुण्य प्राप्त कर लेते थे. उस लेख को 3 महीनों तक वह सभी को दिखाते फिरते थे.

अलबत्ता 2-3 वर्षों में एक बार गोरक्षा के लिए वह एक बड़ा कार्यक्रम बनाते थे. जब वह यह अनुभव करते कि उन की लोकप्रियता कम हो रही है तो वह इस कार्यक्रम को दोहरा देते थे. अपनी लोकप्रियता का मूल्यांकन वह गोभक्त सभा को मिलने वाले चंदे और स्वयं को दान में प्राप्त होने वाली गायों से लगाते थे. जैसे ही इन में कमी हो जाती वह समझ जाते कि लोग उन्हें भूलने लगे हैं.

इस विशेष कार्यक्रम के अंतर्गत वह सैकड़ों लोगों के हस्ताक्षर ले कर एक ज्ञापन सरकार को देते और मांग करते कि प्रदेश में गोहत्या पर पूर्ण रूप से पाबंदी लगा दी जाए. इस के अतिरिक्त वह सैकड़ों गायों और हजारों भक्तों को ले कर शहर के मुख्य मार्गों से एक जलूस भी निकालते और सार्वजनिक सभा में घोषणा करते कि 6 महीनों में यदि गोहत्या बंद न हुई तो वह आमरण अनशन कर देंगे.

जिन समाचारपत्रों का संचालन उन के भक्तों द्वारा किया जाता था वे इस समाचार को खूब उछालते थे. पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार जलूस में उन के कार्यकर्ताओं की झड़प पुलिस से हो ही जाती थी जिस से इस खबर को और प्रमुखता मिल जाती थी.

धार्मिक मामलों पर प्रश्न उठाने वाले नेताओं की भी कमी नहीं थी. सरकार भी यथासमय एक वक्तव्य निकाल देती कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है. क्योंकि गाय का प्रश्न हमारी संस्कृति से जुड़ा हुआ है. बस, शास्त्रीजी का उद्देश्य पूरा हो जाता और फिर कुछ वर्षों तक वह निश्ंिचत हो जाते थे.

गत 2 वर्षों से शास्त्रीजी कुछ ज्यादा ही चिंतित थे. शहर में धार्मिक गंगा बह रही थी. सभी लोग अधिक से अधिक धार्मिक हो रहे थे. पर इस धार्मिक आंदोलन में गाय का कहीं नाम नहीं था. लोग किसी और पहलू को ले कर धार्मिक हो रहे थे. अब धर्मयुद्ध की बागडोर नए धार्मिक नेताओं ने अपने हाथों में ले ली थी. शास्त्रीजी को अपना सिंहासन डोलता नजर आया.

उन्होंने इस बार अपना कार्यक्रम और भी जोरदार बनाने का प्रयत्न किया. उन्होंने लोगों को गाय की रक्षा के लिए ललकारा. समय पड़ने पर सभी धार्मिक नेता एक हो जाते हैं, चाहे वे अलगअलग धर्मों के ही क्यों न हों. उन के लिए यह एक स्वर्ण अवसर था. उन्होंने शास्त्रीजी की हां में हां मिलाई और कार्यक्रम तैयार हो गया.

इस बार समाचारपत्रों में और भी जोरशोर से वक्तव्य निकाले गए और सरकार को धमकी दी गई कि यदि उस ने देश की संस्कृति को दृष्टि में रखते हुए गोरक्षा के संबंध में शीघ्र ही कदम नहीं उठाया तो एक जोरदार आंदोलन छेड़ा जाएगा. जलूस में इस बार 1 हजार गायों को रखा गया और साथ में लगभग 25 हजार गोभक्त नारे लगाते हुए निकले. शास्त्रीजी प्रसन्न मुद्रा में जलूस में सब से आगे थे. बैंडबाजे के साथ जलूस कोठी चौरास्ते के आगे की सड़क पर धीरेधीरे बढ़ रहा था.

कोठी चौरास्ते के आगे सागसब्जी का बाजार है जो सदा सड़क पर ही लगता है. इस बाजार की विशेषता यह है कि यहां पर जितने सागसब्जी खरीदने वाले होते हैं उस से भी अधिक संख्या में आवारा गायें होती हैं जो सागसब्जी के ढेर को चट करने की कोशिश में रहती हैं. सब्जी बेचने वाले सदा एक बड़ा डंडा अपने साथ रखते हैं, और जब भी कोई गाय सब्जी पर मुंह मारने की कोशिश करती है तो डंडे से उस की पूजा करते हैं.

जलूस इस बाजार से कोई 25 गज की दूरी पर था. उसी समय एक सब्जी वाली ने एक गाय की पूजा की. गाय घबरा कर मुड़ी पर उतने में ही जलूस वहां तक पहुंच चुका था. अपनी ढेर सारी साथिनों को देख और बैंडबाजे की आवाज सुन गाय घबरा गई. उसे भागने का रास्ता नहीं मिल रहा था. केसरिया शाल पहने शास्त्रीजी नारे लगा रहे थे, गाय को घबराहट में केवल वह ही दिखाई दिए. पहले ही वह परेशान थी. घबरा कर उस ने शास्त्रीजी पर आक्रमण कर दिया और पूरे जोर से अपने दोनों सींग शास्त्रीजी के पेट में घुसेड़ दिए.

यह सब कुछ क्षणों  में  देखतेदेखते हो गया. शास्त्रीजी के पेट से खून की फुहार छूटने लगी और गाय उन्हें गिरा कर भीड़ की ओर भागी. भीड़ तितरबितर हो गई और गाय को रास्ता मिल गया. अब लोगों ने शास्त्रीजी की ओर ध्यान दिया. वह खून से लथपथ बेहोश पड़े थे. तुरंत एक मोटरगाड़ी में उन्हें दवाखाने ले जाया गया. जलूस वहीं पर समाप्त कर दिया गया और आशा की गई कि गोमाता की कृपा से शास्त्रीजी बच जाएंगे.

दूसरे दिन अखबारों में बस शास्त्रीजी का ही नाम था. गाय द्वारा उन के आहत होने की घटना को कुछ वामपंथी अखबारों ने खूब उछाला. उधर धार्मिक पत्रों ने इसे वामपंथियों का षड्यंत्र बताया.

शास्त्रीजी की स्थिति बड़ी गंभीर थी. वह अभी भी बेहोश थे. उन के गुर्दे पूरी तरह नष्ट हो गए थे. अत्यधिक खून बहने के कारण पक्षाघात हो जाने की आशंका बढ़ गई थी. भक्तों ने कोई कसर नहीं छोड़ी. मुंबई से डाक्टरों को बुलाया गया. अवसर पड़ने पर उन को अमेरिका ले जाने की व्यवस्था कर दी गई. 15 दिनों बाद शास्त्रीजी को होश आया. पर उन्हें बातचीत करने से रोक दिया गया. लगभग 10 दिनों तक शास्त्रीजी केवल सोचते ही रहे. डाक्टरों ने कह दिया था कि लगभग 2 वर्षों तक वह ठीक प्रकार से नहीं चल सकेंगे.

जब वह बातें करने लायक हुए तो भक्तों की मंडली उन्हें सांत्वना देने के लिए पहुंची. लोगों ने कहा, ‘‘पंडितजी, गोमाता की कृपा से आप बच गए और उस की कृपा से ही आप शीघ्र अच्छे हो जाएंगे. आप किसी बात की चिंता मत कीजिए. हम और जोरशोर से अभियान चलाएंगे और जब तक सारे देश में गोहत्या पर पाबंदी नहीं लग जाएगी, हम चैन की सांस नहीं लेंगे.’’

शास्त्रीजी थोड़ी देर मौन रहे, फिर उन्होंने कहना प्रारंभ किया, ‘‘नहीं, अब मैं गोहत्या पर पाबंदी का अभियान छोड़ दूंगा. अभी ही इतनी आवारा गाएं सड़कों पर घूम रही हैं और लोगों को आहत कर रही हैं. अगर गोहत्या पर पाबंदी लग जाए तब तो सड़कों पर लोगों से अधिक गाएं ही दिखाई देंगी और लाखों को अस्पताल में इलाज के लिए भरती होना पड़ेगा. अब मैं आवारा गायों को ठिकाने लगाने का अभियान आरंभ करूंगा,’’ इतना कह कर शास्त्रीजी फिर बेहोश हो गए.

उस रात शास्त्रीजी की हालत बहुत गंभीर हो गई. डाक्टरों के लाख प्रयत्न करने पर भी कुछ नहीं हो सका. सूर्योदय से पहले ही शास्त्रीजी का देहावसान हो गया.

सारे शहर में सन्नाटा छा गया. भक्तों ने शास्त्रीजी की शवयात्रा बड़ी शान से निकाली और जोरदार वक्तव्य निकाला, जो इस प्रकार था :

‘‘शास्त्रीजी ने गोवंश की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी. कुछ सूत्रों से पता चला है कि जिस गाय ने शास्त्रीजी पर आक्रमण किया उस का मालिक वामपंथी विचारों वाला है. पर हम चुप नहीं रहेंगे, शास्त्रीजी की हत्या का बदला लेंगे तथा गोहत्या पर पूर्ण पाबंदी लगाने के इस अभियान को और शक्तिशाली बनाएंगे.’’ Short Kahani in Hindi

Short Hindi Stories : सरकारी इनाम

Short Hindi Stories : चौधरी हरचरन दास के बुलाने पर हरिया फौरन हाजिर हो गया. चौधरी साहब निवाड़ के पलंग पर बैठे हुक्का पी रहे थे. चौपाल पर दीनू, बीसे, बांके, बालकिसन और जगदंबा परसाद भी बैठे गप्पें हांक रहे थे. हरिया ने नीची निगाहों से चौधरी साहब को हाजिरी दी. चौधरी साहब ने हुक्के की नली दांतों से पकड़ी और दाईं आंख को कुछ ज्यादा खोल कर हरिया की ओर देखा. हरिया ने जुहार की तो चौधरी साहब के होंठ थोड़े फैल कर पुन: सिकुड़ गए.

‘‘हुकम करो मालिक,’’ हरिया ने बुलाने का कारण जानना चाहा.

‘‘हुकम तो तुम करोगे हरीप्रसादजी, हम तो तुम्हारे गुलाम हैं,’’ चौधरी साहब ने हुक्के को मुंह में ठूंसे हुए ही जवाब दिया.

‘‘आप माईबाप हैं…हम तो गुलाम हैं, हजूर. कोई कुसूर हो गया, मालिक?’’ हरिया ने पिचकते पेट को जरा और अंदर खींच कर पूछा.

‘‘नहीं रे, कुसूर तो हम से हुआ है. हम ने तुम्हें काम दिया था न, उसी का इनाम मिला है हमें. तुम्हें रोटीरोजी दे कर जो अधर्म किया है उस का प्रायश्चित्त करना है हम को. सरकार बड़ी दयालु है रे हरिया. वह तुम जैसे सीधेसच्चे गरीबों को ऊंचा उठाना चाहती है और हम जैसे पापी, नीच लोगों की अक्ल दुरुस्त करना चाहती है.’’

हरिया खड़ाखड़ा थूक निगल रहा था. उस की समझ में आ गया था कि  चौधरी साहब किसी बात पर गुस्सा हैं, लेकिन उस ने तो कुछ भी ऐसावैसा नहीं किया. कल दिन छिपने तक काम किया था. रामेसर के ससुरजी का सामान दिल्लीपुरा तक राजीखुशी पहुंचा दिया था. फिर क्या बात हो गई?

‘‘हरी प्रसादजी, तुम सोच रहे होगे कि चौधरी कैसी उलटीसीधी बक रहा है. अब असली बात सुनो. सरकारी आदेश आया है कि हरी प्रसाद वल्द गया प्रसाद, गांव छीछरपुर, तहसील न्यारा, जिला बदायूं, जो सरकारी योजना के अंतर्गत 320-ए 93 के अंतर्गत प्रार्थी है, के प्रार्थनापत्र को स्वीकार करते हुए उसे 7 बीघा जमीन दी जाती है. इस जमीन का पट्टा पटवारी, न्यारा तहसील के मारफत फाइल करने को भेजा गया है तथा गांव छीछरपुर के पश्चिम नाले के ऊपर 1981 बी के मद से बजरिये पटवारी 7 बीघा जमीन हरी प्रसाद को दी जाएगी,’’ चौधरी ने कागज पढ़ा और फिर संभाल कर जेब में रख लिया.

झुकी गरदन को थोड़ा उठा कर हरिया ने इस का मतलब जानना चाहा.

‘‘अरे बेवकूफ की दुम, सरकार ने 10 पुश्तों से चली आ रही हमारी जोत की धरती में से 7 बीघा जमीन तुम्हें दे दी है. पटवारी राम प्रकाश यह कागज पकड़ा गया है हमें. बोल, कब से संभाल रहा है अपनी जमीन?’’

‘‘मालिक, मैं कैसे संभालूंगा जमीन को? मुझ में ऐसी औकात कहां है?’’

‘‘क्यों? सरकारी दफ्तर में जा कर दरख्वास्त देने की औकात थी तेरी?’’

‘‘माईबाप, मैं ने नहीं दी थी दरख्वास्त. वह तो हरिद्वारीलाल ने अपने मन से लिखी थी.’’

‘‘तेरे दस्तख्त नहीं थे उस पर?’’

‘‘अंगूठा चिपकवाया था हरिद्वारी ने. कहा था कि सरकार सहायता करेगी.’’

‘‘अच्छा, तो सरकारी जमीन दिल्ली से बन के आती और तुम जहां कहते वहां बिछा दी जाती, क्यों?’’

हरिया किसी पेड़ की तरह जड़ हो रहा था. वह जानता था कि चौधरी को गुस्सा आ गया तो जमीन जिंदा गड़वा देंगे, ‘‘अब हम क्या करें मालिक?’’ उस ने झिझकते हुए कहा.

‘‘अरे करेगा क्या? पीली पगड़ी बांध, मिठाई खिला सब को. हम ने तो पटवारी से कह दिया कि तुम जानो तुम्हारा काम जाने. हम हटा लेते हैं अपने हलबैल वहां से. कोई और हमारी धरती की तरफ देखता भी तो आंखें निकाल लेते, लेकिन सरकारी मामला है.

‘‘क्या मैं समझ नहीं रहा हूं कि यह सब तमाशा घनश्याम चौधरी करवा रहा है? पिछले चुनाव की सारी कसर निकाल लेना चाहता है. खैर, अपनीअपनी तूबड़ी है, आज तू बजा ले, कल हम बजाएंगे. अच्छा तो भैया, हरीप्रसादजी, आज से तुम भी जमींदार हो गए. हमारी जमात में आ गए. अब हमारे यहां से तुम्हारी छुट्टी. अब नौकर बन कर नहीं, मालिक बन कर रहो. जाओ भैया, जा कर देख आओ अपनी जमीन. अगले महीने तहसील में मुख्यमंत्रीजी आएंगे. वहां बड़े समारोह में तिलक लगा कर तुम्हें धरती का राज सौंपेंगे. बड़े भाग्यवान हो, हरी प्रसाद. जाओ भैया, जाओ.’’

हरिया चौपाल से निकला. उस के जैसे पंख निकल आए थे. वह उड़ान भरता हुआ अपने नीड़ पर आ पहुंचा. झोंपड़ी में उस की पत्नी नत्थी 4 बच्चों को समेटे पड़ी थी. रात को चूल्हा जलने की उम्मीद में दिन कट ही जाता था. दिन भर मां बच्चों को लोरियां सुनाती और बच्चे कहानी सुनतेसुनते सो जाते.

झोंपड़ी में घुस कर उस ने बड़े प्यार से नत्थी की कमर पर एक लात जमाई. ‘‘अरे उठ री, देख नहीं रही कि हरी प्रसादजी आए हैं?’’

नत्थी ने अपना मैला घाघरा समेटा और बैठ गई. सामने हरिया तन कर खड़ा था. उस के पिचके गालों में हवा भरी थी और बुझीबुझी आंखों में फुलझड़ी सी जल रही थी. उस का होहल्ला सुन कर और तेवर देख कर नत्थी ने समझा कि आज जरूर इस पर बड़े पीपल वाला जिन्न सवार हो गया है. उस ने परीक्षा करनी चाही.

‘‘कौन है रे तू?’’

‘‘मैं जमींदार हरी प्रसाद हूं.’’

‘‘कहां से आया है?’’

‘‘हवेली से आया हूं.’’

नत्थी ने लपक कर कोने में पड़ा डंडा उठा लिया. फिर बिफर कर बोली, ‘‘तेरा सत्यानास हो जमींदार के बच्चे. इस दरिद्र की कोठरी में क्या झख मारने आया है? अरे नासपीटे, यहां तो चूहे भी व्रत रखते हैं. यहां क्या अपनी ऐसीतैसी कराएगा?’’

हरिया समझ गया कि ज्यादा नाटक दिखाया तो अभी पूजा हो जाएगी. वह धम से बैठ गया, फिर अपनी प्यारी हृदयेश्वरी नत्थी को सीने से लगाता हुआ बोला, ‘‘हमारे भाग खुल गए हैं रे नथनिया!’’

नत्थी ने आंखें खोल कर अपने मर्द को देखा, ‘‘लाटरी खुली है, नथनी. सरकार ने 7 बीघा जमीन का मालिक बनाया है तेरे हरी प्रसाद भुक्खड़ को.’’

नत्थी अभी भी उसे टुकुरटुकुर देख रही थी. धीरेधीरे हरिया ने सारी रामकहानी सुना दी. नत्थी का पोरपोर खुशी से भीग उठा था. अपना कालाकलूटा हरिया सचमुच किसी राजकुमार की तरह सुंदर लग रहा था उसे. सारी रात आगामी योजना पर विचार होता रहा.

सुबह उठ कर हरिया को चिंताओं ने आ घेरा. हलबैल कहां से आएगा? बीज के लिए पैसा, कटाई, खलियान, गोदाम…यह सब कहां से होगा?

वह चौधरी साहब के दरवाजे जा पहुंचा. चौधरी साहब के हाथ में पीतल की कटोरी थी. वह सवेरेसवेरे कच्चा दूध पीते थे.

‘‘पां लागन, मालिक.’’

‘‘जै राम जी की. हरिया, क्या हुआ रे? रात को नींद तो आई न?’’

‘‘हां मालिक, एक बात पूछनी थी. मुझे हलबैल और बीज, पानी की मदद तो करेंगे न?’’

‘‘अरे, क्यों नहीं, बस तुम्हें 2-4 कागजों पर अंगूठा मारना होगा. हम सबकुछ कर देंगे. चाहो तो कल से ही जोत लो जमीन. पट्टा तो मिल ही जाएगा. सरकार का कानून तो मानना ही होगा न.’’

हरिया ने अपनी धरती पर जीजान लगा दी. नाले से लगी वह धरती वर्षों से अछूती पड़ी थी. 2 महीने में ही धरती चमेली के फूल सी खिल उठी.

एक दिन चौधरी साहब ने उसे बुला कर बताया कि कल तहसील में मंत्रीजी पधार रहे हैं. सभी लोगों को उन के पट्टों के कागज दिए जाएंगे. उसे भी उन के साथ तहसील चलना होगा.

अगले दिन सुबह पगड़ी कस कर, मूंछों पर असली घी का हाथ फेर कर वह मेले के लिए तैयार हुआ. चौधरी साहब उसे अपने साथ बैलगाड़ी पर बैठा कर ही ले गए.

मेले में बड़ा मजा आया. मंत्रीजी ने ढेर सारे गरीब लोगों को जमीन के पट्टे बांटे. उस की बारी आई तो वह तन कर खड़ा हो गया. मंत्रीजी ने उस से पूछा कि जमीन का क्या करेगा, तो उस ने बताया कि जमीन तो उसे पहले ही सौंप दी गई है और चौधरी साहब ने हलबैल दे कर उस की पूरी मदद की है.

मंत्रीजी ने चौधरी हरचरनजी को मंच पर बुलवाया. सभा को संबोधित करते हुए कहा कि चौधरी साहब महान देशभक्त हैं. देश को उन जैसे महान व्यक्ति पर गर्व होना चाहिए जिन्होंने हरिया जैसे सर्वहारा और गरीब मजदूर को अपनी जमीन खुशीखुशी दी और जुताई- बोआई में भी उस की सहायता की.

मंत्रीजी ने अपने गले से उतार कर फूलों का हार चौधरी साहब के गले में डाल दिया. चारों ओर ‘चौधरी साहब जिंदाबाद’ के नारे लगने लगे.

दूसरे दिन हरिया जब चौधरी साहब के यहां बैल लेने गया तो परभू काका ने बैल देने से इनकार कर दिया. कहा कि चौधरी साहब का हुक्म नहीं है.

वह दौड़ादौड़ा हवेली में गया.  हरिया को देख कर उन्होंने भौंहें चढ़ा लीं. जब हरिया ने परभू काका की शिकायत की तो चौधरी साहब बही हाथ में ले कर पलंग पर बैठ गए. हरिया हाथ जोड़ कर जमीन पर उकडूं बैठ गया.

‘‘देख बच्चू, तेरा खाता अब ज्यादा हो गया है. तुझे जमीन का पट्टा आज मिला है और तू 3 महीने से हमारी जमीन पर कब्जा किए है. 1 हजार रुपया माहवार किराए के हिसाब से 3 हजार तेरे खाते में जमा है. हलबैल का किराया 5 रुपया रोज के हिसाब से 450 रुपए और ट्यूबवैल के पानी के 300 रुपए. कुल मिला कर 4 हजार रुपए तुझ पर कर्ज हैं. इस के एवज में हम तेरी 7 बीघा जमीन रेहन रख लेते हैं.

‘‘2 रुपए की दर से 80 रुपए का ब्याज तुझे देना है. कल से हमारे खेत पर काम कर के अपना रुपया भर देना. हम तेरी तनख्वाह बढ़ा कर पूरे 100 रुपए कर देते हैं. अब 80 रुपए काट कर 20 रुपए तुझे नगद मिलेंगे. कुछ चनाचबैना भी दे देंगे. जब भी तेरे पास हो मूल रकम का हिसाब कर देना.

‘‘चल, आज से ही हमारे खेत पर काम करना चालू कर दे. और हां, देख, ज्यादा समझदार बनने की कोशिश मत करना. दिल्ली वाले सरकारी आफिसर खाली नहीं बैठे. मंत्रीजी के माथे सौ काम हैं. सरकार को रोजरोज छीछरपुर आने की फुरसत नहीं है. ज्यादा ऊंचा उछलेगा तो हलदीचूना भी उधार न मिलेगा.’’

‘‘लेकिन मालिक, वह पट्टा तो मेरे नाम है,’’ हरिया बड़ी मुश्किल से इतना ही बोल सका.

‘‘भूल जा बच्चू, भूल जा. सबकुछ भूल जा. तू ने ढेर सारे अंगूठे छापछाप कर सब काम सही कर दिए हैं. वे सब फिर हमारे नाम हो जाएंगे. फिर तू इस की परवाह क्यों करता है? तू फौरन अपने काम पर लग जा.’’

हरिया के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह गरदन झुका कर चुपचाप खेत पर चला गया.

कुछ दिनों बाद हरिया एकाएक गायब हो गया. नीचे के तबके में कानाफूसी हुई कि शायद सरकार के पास गया है, न्याय ले कर आएगा.

4 दिन बाद 3 कोस दूर, हरी बाबा के अखाड़े के पीछे वाले नाले में उस की सड़ी हुई लाश दीनू चरवाहे ने देखी थी. सब ने जाना, लेकिन किसी ने कुछ भी नहीं कहा.

लेकिन कर्ज तो पूरा होना ही है. इसलिए अब नत्थी चौधरी साहब के घर की टहल करती है और उस के 2 बच्चे खेत में पसीना बहाते हैं. सुना है वह फिर एक बच्चे को जन्म देने वाली है. Short Hindi Stories

ऐक्टर विजय की रैली में भगदड़: Crowd Management में फेल प्रशासन

Crowd Management: 27 सितंबर को तमिल ऐक्टर जोसेफ विजय की एक पौलिटिकल रैली में भगदड़ के चलते 40 लोगों ने अपनी जान गंवाई. हजारों लोग रैली में शामिल होने आए थे जो विजय की एक झलक देखने आए थे. अक्सर देखा जाता है कि दक्षिण के मुकाबले ऐसा उन्माद उत्तर के कलाकारों के लिए देखने को नहीं मिलता. इस की वजह क्या है, पढ़ें.

तमिलनाडु के करूर में तमिल ऐक्टर विजय की पौलिटिकल पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ यानी टीवीके की चुनावी रैली में 27 सितंबर की शाम भगदड़ मची गई थी. टीवीके का शाब्दिक अर्थ तमिलनाडु विजय पार्टी है. विजय की रैली में भारी संख्या में जुटी भीड़ में भगदड़ में 40 लोगों के मारे और 400 लोगों के घायल होने का मामला सामने आया. अभिनेता से नेता बने विजय की तरफ से मृतकों के परिवार को 20-20 लाख की आर्थिक मदद देने का ऐलान किया है. राज्य पुलिस महानिदेशक जी वेंकटरामन ने बताया कि विजय को रैली स्थल तक पहुंचने में देरी हुई, जिस के कारण भीड़ लगातार बढ़ती चली गई और यह हादसा हो गया.

हमारे देश में इस तरह के हादसे होते रहते हैं. सरकार, समाज और रैली में हिस्सा लेने वाले लोग इस से सबक नहीं लेते हैं. अभी उत्तर प्रदेश में महाकुंभ के दौरान भगदड़ में पचासों लोग मारे गए थे. इस के बाद उत्तर प्रदेश के ही हाथरस में भोलेबाबा के सतसंग में 121 लोगों की भगदड़ में मौत हो गई थी. कई बड़ी घटनाएं मेले और मंदिरों में दर्शन के दौरान हो जाती है. साल में इस तरह की तमाम घटनाएं सामने आती हैं. तमाम घटनाओं के बाद भी हमें भीड़ का प्रबंधन करना नहीं आया जिस की वजह से इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं.

खराब मैनेजमैंट बना दुर्घटना का कारण

टीवीके ने रैली के आयोजन के लिए दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक का समय तय किया था. लेकिन ऐक्टर विजय खुद शाम 7 बजे के बाद रैली स्थल पर पहुंचे. जिस वजह से वहां भीड़ लगातार बढ़ती चली गई. रैली में विजय ने अपना भाषण शुरू किया, लेकिन 7 घंटे से इंतजार कर रहे लोग भूख प्यास से बेहाल हो चुके थे. रैली के दौरान लोगों ने पानी मांगा तो विजय को अपना भाषण बीचबीच में रोकना पड़ा. इस के बाद कुछ लोग बेहोश होने लगे और विजय ने लोगों को गिरते हुए भी देखा. साथ ही मंच से एम्बुलेंस को रास्ता देने की अपील की.

भारी भीड़ और लोगों के बेहोश होने के बाद भी रैली में विजय अपना भाषण जारी रखते हैं. उधर भीड़ के बीच से बेहोश हुए लोगों को निकालने के लिए एम्बुलेंस को भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है. इस के बाद भी विजय का भाषण जारी रहता है. शाम के करीब 7.30 बजे जब विजय अपना भाषण खत्म करते हैं तो वहां खबर फैलती है कि 9 साल की एक लड़की भीड़ में से लापता हो गई है. विजय मदद के लिए कार्यकर्ताओं से अपील करते हैं और घटनास्थल से रवाना हो जाते हैं.

इस के बाद अचानक बिजली गुल हो जाती है और पहले से जमा भीड़ बेकाबू होने लगती है. हर तरफ भगदड़ मच जाती है और लोग अपनी जान मचाने के लिए इधरउधर भागना शुरू कर देते हैं. पहले जो भीड़ नियंत्रित नजर आ रही थी, वह बिजली गुल होने के बाद अचानक से बेकाबू हो जाती है और इतनी बड़ी घटना घटती है. आयोजन वाली जगह से बाहर जाने वाली सड़क काफी संकरी थी और चलनेफिरने तक की जगह नहीं थी.

तमिलनाडु के डीजीपी वेंकटरमन ने बताया कि आयोजकों ने 10 हजार लोगों के आने की उम्मीद जताई थी, लेकिन एक्टर की एक झलक पाने के लिए करीब 27 हजार लोग रैली स्थल पर जुट गए थे. उन्होंने कहा कि टीवीके के एक्स अकाउंट पर कहा गया था कि एक्टर 12 बजे रैली करने आएंगे और सुबह 11 बजे से ही भीड़ आनी शुरू हो गई थी. वह शाम सात बजे के बाद आए, तेज धूप में लोगों के पास पर्याप्त भोजन और पानी तक नहीं था.

विजय का इंतजार काफी लंबा हो गया था. इस बीच शाम 7 से 7.30 बजे तक बिजली गुल रही और उन के आने से ठीक पहले भीड़ उमड़ पड़ी. जिस से बड़े और छोटे बच्चों को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कई लोगों की मौत का कारण दम घुटना बताया गया है. पुलिस और टीवीके के कार्यकर्ता पर्याप्त इंतजाम करने में विफल रहे. किसी को भी यह नहीं पता था कि एम्बुलेंस कहां हैं. पानी की कोई व्यवस्था नहीं थी और सड़क बहुत ही ज्यादा संकरी थी.

कई लोग भागने की कोशिश में सड़क किनारे निचले नाले में गिर गए. कुछ लोग छप्पर की छतों पर चढ़ गए और गिर गए. पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज भी किया. रैली में आए लोग विजय के नारे लगा रहे थे, जिस से कई लोगों को पता ही नहीं चला कि वहां भगदड़ मच गई है. लोग जमीन पर गिरे हुए लोगों पर पैरों से ठोकर मार रहे थे. अगर सही तरह से भीड़ प्रबंधन किया गया होता तो इस तरह की घटना को रोका जा सकता था.

कौन है अभिनेता से नेता बने विजय

22 जून, 1974 में जन्मे विजय अब तक 68 फिल्मों में एक्टिंग कर चुके हैं. विजय ने एक्टिंग की दुनिया में बतौर बाल कलाकार कदम रखा था. 1984 में उन्होंने महज 10 साल की उम्र में वेत्री नाम की फिल्म में अभिनय किया था. 4 दशक से साउथ के सिनेमा में सक्रिय विजय करोड़ों रुपये की संपत्ति रखते हैं. विजय की संपत्ति लगभग 474 करोड़ रुपए है.

फोर्ब्स की रिपोर्ट के मुताबिक वह भारत के दूसरे महंगे पेड एक्टर हैं. एक फिल्म के लिए वह 130 से 275 करोड़ रुपए तक फीस लेते हैं. चैन्नई के नीलांकरई में कैसुआरिना ड्राइव पर समुद्र किनारे बना उन का सफेद महलनुमा बंगला लोगों को आकर्षित करता है. इस बीच हाउस का आइडिया हौलीवुड स्टार टौम क्रूज के बीच हाउस से लिया है. विजय के पास बीएमडब्ल्यू एक्स5-एक्स6, औडी ए8 एल जैसी 15 लग्जरी कारों का कलेक्शन है. विजय पर फिल्म से हुई कमाई को छिपाने का भी आरोप है. यह मामला अभी कोर्ट में लंबित है.

विजय ने अपनी स्कूलिंग चैन्नई के फातिमा मैट्रिकुलेशन हायर सैकेंडरी स्कूल से शुरू की. बाद में उन्होंने बालालोक मैट्रिकुलेशन हायर सेकेंडरी स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की. फिर लोयोला कालेज, चैन्नई से वह विजुअल कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन करने लगे. थलापति विजय ने अपनी ग्रेजुएशन पूरी नहीं की और वह एक्टिंग के क्षेत्र में चले गए. उन की शादी 1999 में ब्रिटेन में रहने वाली श्रीलंकाई मूल की उन की फैन संगीता से हुई. इन का एक बेटा और बेटी है.

राजनीति को पंसद नहीं करते थे विजय

तमिल अभिनेता जोसेफ विजय चंद्रशेखर उर्फ थलापति विजय का जीवन सिर्फ फिल्मों और ग्लैमर तक सीमित नहीं रहा. 2021 में राजनीति से दूर रहने की शर्त पर वे अपने मातापिता के खिलाफ कोर्ट तक जा चुके थे. उस समय उन के नाम पर नई पार्टी बनाने के मामले में उन्होंने पिता फिल्म डायरेक्टर एस. ए. चंद्रशेखर और मां सिंगर शोभा पर सिविल मुकदमा दर्ज कराया था. विजय का कहना था कि उन के मातापिता ने 2020 में उन के फैन क्लब ‘विजय मक्कल इयक्कम’ को चुनाव आयोग में राजनीतिक पार्टी के रूप में रजिस्टर करा दिया था.

विजय का राजनीति में शामिल होने का कोई इरादा नहीं था. उन्होंने अपने फैंस से भी कहा था कि वे पार्टी ज्वाइन न करें, क्योंकि यह उन के पिता ने शुरू की थी. इस में उन की मां कोषाध्यक्ष थीं. तब विजय ने 11 लोगों के खिलाफ भी केस दर्ज कराया ताकि कोई उन का नाम या छवि राजनीतिक इस्तेमाल के लिए न करे. इस के बाद सितंबर 2021 में उन के पिता ने पार्टी भंग कर दी. अपनी कही बात से मुकरते हुए ढाई साल बाद विजय ने खुद राजनीति में कदम रख लिया.

हिंदी फिल्मों के कलाकारों से अलग होते हैं दक्षिण के कलाकार

2 फरवरी 2024 को उन्होंने अपनी नई पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके)’ का ऐलान किया और फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने की बात भी कही. फैंस हैरान रह गए. जो शख्स ढाई साल पहले राजनीति से दूर रहना चाहता था. वही अब खुद पूरी तरह राजनीति में उतर आया. दक्षिण भारत के फिल्म कलाकार जनता से जुड़े रहते हैं. जिस की वजह से वह काफी लोकप्रिय होते हैं. वह जितने कलाकार के रूप में पंसद किए जाते हैं उतने ही नेता के रूप में भी पंसद किए जाते हैं. इस का सब से बड़ा कारण यह है कि दक्षिण भारत के कलाकार व्यवस्था के खिलाफ रील और रीयल लाइफ दोनों जगहों पर जनता के साथ खडे होते हैं. हिंदी फिल्मों के कलाकार इस के उलट सत्ता के साथ रहते हैं. जिस तरह की भीड़ विजय की रैली में आई क्या हिंदी फिल्मों का कोई कलाकार इस तरह की भीड़ जुटा सकता है ?

हिंदी फिल्मों के कलाकार सत्ताधारी पार्टियों की पिछलग्गू बने रहते हैं. समाजवादी पार्टी ने फिल्म अभिनेत्री जया बच्चन को 5वीं बार राज्यसभा में भेजा है. 25-30 साल से वह सपा के साथ जुड़ी हैं. पहले जब कांग्रेस सत्ता में थीं तो इन के पति अभिनेता अमिताभ बच्चन कांग्रेस के साथ थे. कांग्रेस जब सत्ता से बाहर गई तो अमिताभ बच्चन ने कांग्रेस छोड़ दी. अमर सिंह के साथ समाजवादी पार्टी में जुड़े. अमिताभ तो राजनीति में नहीं हैं पर उन की पत्नी जया बच्चन सपा से राज्यसभा की सांसद हैं.

फिल्मों से राजनीति में आए उत्तर भारत के कलाकारों में बड़ी संख्या ऐसे कलाकारों की है जो सत्ताधारी पार्टी के पिछलग्गू बन कर कुर्सी हासिल करने की फिराक में रहते हैं. यह राजनीति में पहुंच कर भी फकत तमाशाई रहते हैं. इस के उलट दक्षिण भारत के फिल्म कलाकार सक्रिय राजनीति करते हैं. यह सत्ता के विरोध में रहते हैं. इस कारण ही जनता इन को पसंद करती है.

फिल्मों में काम करते हुए राजनीति में कदम रखने वाले कलाकारों की लिस्ट लंबी है. इन कलाकारों ने जो दम फिल्मों में दिखाया वैसा दमदार प्रभाव राजनीति में दिखाने में सफल नहीं रहे हैं. इस से उन की पर्दे की नकली छवि का पता चलता है. पर्दे पर हीरो दिखने वाले यह कलाकार राजनीति में जीरो साबित होते हैं. राजेश खन्ना सुपरस्टार थे. एक के बाद 15 हिट फिल्में दी थीं. उन्होंने अपनी फिल्मी कैरियर की शुरुआत अपनी फिल्म ‘आखिरी खत’ से की थी. ये फिल्म 1966 में रिलीज हुई थी. जिस के बाद उन्होंने 166 फिल्मों में बेहतरीन काम किया.

इस के बाद 1991 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के मुकाबले लड़ा पर हार गए. राजेश खन्ना ने बाद में शत्रुघन सिन्हा को हरा कर लोकसभा के सदस्य बने. इतनी हिट फिल्में देने वाले राजेश खन्ना राजनीति में अपनी छाप छोड़ने में सफल नहीं हुए. गोविंदा भी सत्ता के सहारे राजनीति में उतरे थे. वह भी राजनीति में सफल नहीं हुए. कुछ यही हाल बौलीवुड के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन का हुआ.

फिल्मों से ब्रेक ले कर राजीव गांधी के कहने पर वह इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ा था और वो जीत भी गए थे. जब कांग्रेस संकट में आई बोफोर्स घोटाले का आरोप लगा तो अमिताभ बच्चन ने राजनीति से पलायन किया. फिर कभी राजनीति में प्रवेश नहीं करने की कसम खाई. ‘जंजीर’ जैसी तमाम फिल्में देने वाले अमिताभ पर्दे पर कैसे दिखते थे और राजनीति में पलायनवादी निकले.

विनोद खन्ना ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत 60 के दशक में आई फिल्म ‘मन का मीत’ से किया था. वह पंजाब के गुरदासपुर से सांसद चुने गए. इस कड़ी में एक नाम मिथुन चक्रवर्ती का भी है. सनी देओल ने 63 की उम्र में राजनीति में एंट्री ली है. 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस सांसद सुनील जाखड़ और आप के पीटर मसीह को भारी अंतर से हराने के बाद पंजाब के गुरदासपुर निर्वाचन क्षेत्र से सांसद बने हैं. फिल्म ‘गदर’ उन का किरदार बहुत पंसद किया गया. वैसा दमदार काम राजनीति में नहीं कर सके.

धर्मेन्द्र ने भी साल 2004 में बीजेपी का हाथ थामा था. पार्टी की ओर से उन को बीकानेर से टिकट दे कर लोकसभा में पहुंचाया गया था. जब भी सदन की कार्यवाही या सत्र चलता था तो वो उस में नहीं जाते थे, जिस के चलते राजनीति में उन का कैरियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया.

दिग्गज एक्ट्रैस रेखा भी साल 2012 से राज्यसभा सांसद रही हैं. रेखा भी सदन में सत्र के दौरान कम ही आया करती थीं, जिस का सीधा असर उन के राजनीति कैरियर के लिए भारी साबित हुआ और एक्ट्रैस ने भी राजनीति में एक्टिव रहना कम कर दिया.

शबाना आजमी बौलीवुड की एक बेहतरीन हीरोइन रही हैं. उन्होंने अपनी फिल्मों से बौलीवुड में सिनेमा की रूप रेखा बदलने में बहुत मदद की है. जिस वजह से एक्ट्रैस को राज्यसभा की सदस्यता हासिल है. फिल्मों जैसा प्रभाव वह राजनीति में डालने में सफल नहीं रहीं. फिल्म कलाकार परेश रावल ने 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है. गुजरात के अहमदाबाद पूर्व निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के सांसद हैं. राजनीति में कुछ नया करने में सफल नहीं हुए हैं.

स्मृति ईरानी ने एक मौडल के तौर पर टीवी इंडस्ट्री में कदम रखा था. उन को टीवी की रानी कहा जाता था. जिस के बाद उन्होंने राजनीति में अपना कदम रखा. स्मृति ईरानी मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री रहीं. 2024 के लोकसभा चुनाव में वह अमेठी से चुनाव हार गईं. इस के बाद उन की राजनीति खत्म हो गई. अब उन को ले कर खबरें आ रही हैं कि वह राजनीति छोड़ कर वापस फिल्मों में जा रही हैं.

शौर्टगन कहे जाने वाले शत्रुघ्न सिन्हा भारतीय जनता पार्टी सरकार में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण और जहाजरानी मंत्री के रूप में काम कर चुके हैं. इस के बाद वह राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए. 2019 के आम चुनाव में भाजपा ने उन को टिकट नहीं दिया था. राजनीति में फिल्मों जैसी सफलता उन को नहीं मिली. राज बब्बर भी इसी तरह के कलाकार हैं. फिल्मों की दुनिया को अलविदा कहने के बाद वह 3 बार लोकसभा के सदस्य और दो बार भारतीय संसद के राज्य सभा के सदस्य रहे हैं. उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे. ऐसा कोई उल्लेखनीय काम याद नहीं आता जो समाज के लिए किया हो. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहते पार्टी को चुनाव जितवाने में सफल नहीं रहे.

सुनील दत्त ने अपना सब से ज्यादा समय राजनीति को दिया और उस से उन के पारिवारिक रिश्ते भी बहुत दिक्कत में आ गए थे. उन्होंने 1984 से अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत की और 5 बार कांग्रेस पार्टी से सांसद रहे. इस के बाद भी फिल्मों जैसा प्रभाव राजनीति में नहीं डाल सके. लोकप्रिय हीरो रहे गोविंदा का फिल्मी कैरियर 80 के दशक में शुरू हुआ था. उन्होंने बौलीवुड में सारी भूमिकाओं में अपना नाम कमाया जिस के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा. 2004 के लोकसभा चुनाव में 15 हजार वोटों से मुंबई उत्तर सीट जीती और राजनीति में अपनी यात्रा शुरू की. राजनीति में फिल्मों जैसी सफलता इन के खाते में भी दर्ज नहीं हुई.

भोजपुरी फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवा चुके एक्टर रवि किशन और मनोज तिवारी सासंद हैं. दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ 2024 का लोकसभा चुनाव हार गए. यह भी भोजपुरी फिल्मों या समाज को नेता के रूप में कुछ भी देने में सफल नहीं रहे हैं. जया प्रदा ने तेलुगू, तमिल, हिंदी, कन्नड़, मलयालम, बंगाली और मराठी फिल्मों में काम किया है. एक्ट्रैस एक दौर में स्टारडम के मामले में श्रीदेवी को टक्कर देती थीं. लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने फिल्मों का दामन छोड़ राजनीति में आ गईं. वह 2004 से 2014 तक रामपुर से सांसद थीं. वह अपने प्रभाव से कभी चुनाव नहीं जीत सकीं. यही हालत ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी की है. वह भाजपा की सांसद हैं. अपने बल पर चुनाव नहीं जीत सकतीं.

प्रभावी रहे हैं दक्षिण के कलाकार

भारत के मुकाबले दक्षिण भारत के कलाकार अधिक सफल रहे हैं. वह राजनीति में केवल तमाशाई ही नहीं रहे. समाज को बदलने का काम किया है. एमजी रामचद्रंन, एनटी. रामाराव और जयललिता तो इस का बड़ा उदाहरण रही ही हैं. दूसरे कलाकारों ने भी अपनी पहचान बनाई है.

इन में कमल हासन का नाम प्रमुख हैं. उन्होंने अपनी फिल्म एक दूजे के लिए 1981 से बौलीवुड में एंट्री ली थी. जिस के बाद अब उन्होंने अपनी खुद की पार्टी से शुरुआत की है. उन की पार्टी का नाम ‘मक्कल निधि मैयम’ है. दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत ने भी 2021 में अपनी नई पार्टी बनाई.

दक्षिण भारत के कलाकार जनता के मुददों से जुड़ कर काम करते हैं. जिस के कारण जनता उन को हीरो मानती है. वह सरकार के खिलाफ जनता के मुददों को ले कर काम करते हैं. इस कारण फिल्मों से राजनीति में आ कर प्रभावी भूमिका अदा करते हैं. यह केवल सांसद विधायक ही नहीं बने रहते हैं. प्रदेश के मुख्यमंत्री तक बने हैं. इन में एमजी रामचन्द्रन, जयललिता और एनटी रामाराव जैसे कलाकार फिल्मों से राजनीति में आए और यहां भी शिखर तक पहुंचे. उत्तर भारत के कलाकार केवल राजनीति दलों के पिछलग्गू बने रहे. इस वजह से वह कोई बड़ी ताकत नहीं बन पाए. अभिनेता विजय की तरह भीड़ जुटाने में उत्तर का कोई कलाकार कभी नहीं कर सकता है. देश को हादसों से बचने के लिए भीड़ के प्रबंधन का तरीका सोचना पड़ेगा. नहीं तो ऐसे हादसों को रोकना अंसभव है. Crowd Management

Story In Hindi: यह दुनिया उसी की जमाना उसी का

Story In Hindi: रशीद धोबी की अचानक मृत्यु हो गई. संयोगवश या सदमे से या फिर इस खुशी से कि अब उसे बो झ नहीं ढोना पड़ेगा, उस का गधा भी उसी दिन दुनिया से विदा हो गया.

बेचारे रशीद के खाते में कोई गलत काम तो था ही नहीं. सो, वह सीधा स्वर्ग के दरवाजे पर पहुंचा. लेकिन समस्या यह हुई कि पीछेपीछे उस का वफादार गधा भी आ गया और जिद करने लगा कि वह भी अपने मालिक यानी उन के संग स्वर्ग जाएगा. मगर दूतों ने उसे एंट्री देने से साफ इनकार कर दिया क्योंकि गधों के लिए स्वर्ग में रहने का कोई प्रावधान नहीं था.

रशीद ने गधे को सम झाया, ‘‘भाई, तू मेरा टाइम बरबाद मत कर और लौट जा. स्वर्ग में भला गधा कैसे रह सकता है?’’

परंतु गधा अड़ गया, ‘‘वाहवाह, जीवनभर आप की सेवा की, बो झ ढोता रहा, डंडे खाए, डांट सुनी और मरा भी तो आप के साथ. अब आप अकेले ही स्वर्ग में मजे लूटना चाहते हैं. सच है कि मनुष्य जैसा स्वार्थी जीव कोईर् दूसरा नहीं. लेकिन मैं तो आप के साथ ही रहूंगा.’’

रशीद ने कहा, ‘‘देखो भई, यदि तुम कुत्ते होते, तो स्वर्ग जा भी सकते थे. दूसरा कोई जानवर इतना हाईफ्लाइंग नहीं हो सकता.’’

‘‘मैं कुछ सम झा नहीं?’’ गधे ने सिर हिलाते हुए कहा.

रशीद  झुं झला गया, ‘‘बात तो बिलकुल साफ है. तुम जैसे कितने ही जानवर हैं जो मनुष्य की सेवा करने के लिए जीवनभर कड़ी से कड़ी मेहनत करते हैं, जैसे बैल, भैंस, घोड़े, बकरी, भेड़. ऊंट आदि. क्या तुम ने इन सब की सुरक्षा, इलाज, फैशन, मेकअप, ब्यूटी शो या कुछ नहीं तो गुडलिविंग कंडीशन के लिए कभी किसी संस्था, किसी एनजीओ, किसी आश्रम या फेसबुक का नाम सुना है जो इन पशुओं को एडौप्ट करने यानी गोद लेने या सुरक्षा देने के लिए बनाई गई हो?

‘‘फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने अपने कुत्ते के लिए एक फेसबुक अकाउंट ‘बीस्ट’ के नाम से खोल रखा है. कुछ समय पहले नफीसा अली ने अपने कुत्ते ‘माचो’ की सेवा करने के लिए ग्लैमर की दुनिया से कुछ दिनों की छुट्टी ले ली थी. यही नहीं, उन्होंने अपने एक दूसरे पेट डौग की याद में इंग्लिश भाषा में एक पुस्तक भी लिख डाली जिस का नाम है, ‘हाऊ चीका बिकेम अ स्टार ऐंड अदर डौग स्टोरीज.’

‘‘गुल पनाग ऐसी दरियादिल हैं कि अपने कुत्ते माईलो को हवाई जहाज का सफर करवाती हैं और ऐसे होटलों में चेकइन करती हैं जहां कुत्तों के ठहरने की भी व्यवस्था हो. जैसा कि मुंबई के फोर सीजन होटल में.’’

‘‘लेकिन बहुत सारे कुत्ते गरीबी की हालत में इधरउधर मारे फिरते हैं. उन्हें तो कोई नहीं पूछता?’’ गधे ने एतराज किया.

रसीद हंस पड़ा, ‘‘इतनी सी बात नहीं सम झे? आखिरकार हो तो तुम गधे ही. सुनो भाई, फाइवस्टार लाइफ कौन गुजारता है? अमीर और चमकीले लोग. तो, कुत्ते भी वही मौज करते हैं जो उच्च कोटि यानी उच्च वंश के हों. जैसे, अमिताभ बच्चन ने एक शैनौक पाल रखा है. शाहरुख खान ने अपने लिए 2 कुत्ते विदेश से इंपोर्ट करवाए थे, तो प्रियंका चोपड़ा एक कोकर स्पैनियल ब्रांड के इश्क में डूबी हुई थीं.’’

गधे ने रशीद का मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘‘आप का सामान्य ज्ञान काफी वीक है. आप को यह पता नहीं कि अब देशी गरीब कुत्तों का समय भी आ गया है. सुना है हौलीवुड की स्टार पामेला एंडरसन ने कुछ दिनों पहले मुंबई के एक अनाथ कुत्ते यानी सड़क पर फिरने वाले आवारा कुत्ते को एडौप्ट किया यानी गोद लिया है.’’

‘‘यह तो एक अपवाद है. प्रश्न यह है कि क्या आज तक किसी ने दूसरे किसी पशु को गोद लिया है? गाय व भैंस जिन के दूध के बिना मनुष्य का जीवन अधूरा है, उन की लिविंग कंडीशन क्या है? वे  कितनी गंदी, गीली, कूड़ेकरकट तथा कीड़ेमकोड़े से भरी हुई जगहों में बांधी जाती हैं. चारे के नाम पर उन्हें जूठन व सूखी घास खाने को मिलती है,’’ गधे के मालिक रशीद ने कहा.

अब गधे ने धीरे से व्यंग्य किया, ‘‘लेकिन, गाय माता का तो बहुत आदरसत्कार करते हैं.’’

रशीद भड़क उठा, ‘‘ऐसे पाखंड से उसे क्या लाभ पहुंचता है? क्या कभी किसी ने गाय को अपना पेट बनाया है? क्या कोई उस के गले में किसी फैशन डिजाइनर का बनाया हुआ बहुमूल्य चमकता हुआ पट्टा डाल कर शान से सैर करने निकला है? पनीर, दही, मक्खन, आइसक्रीम व दूध से बने अन्य हजारों व्यंजन बेच कर मिलियन और बिलियन कमाने वाले किस इंडस्ट्रियलिस्ट ने अपनी गायभैंसों के लिए फेसबुक अकाउंट खोला है?

‘‘उन के रहने की जगह को क्या एयरकंडीशंड बनाया है? उन के गले में बांहें डाल कर क्या अपनी तसवीर छपवाई या पोस्ट की है? प्रतिदिन 100 एवं 200 टन लोहे की छड़ें, पत्थर, सीमेंट और ईंटों आदि से भरी गाड़ी खींचने वाले और उस पर भी गाड़ीवान के हंटर खाने वाले मासूम बेजबान बैल और भैंसे के बारे में किसी ने कोई पुस्तक लिखी है? क्या कोई एनजीओ गठित हुआ?’’

‘‘आखिरकार, ऐसा अन्याय क्यों है?’’ गधा बेचारा बड़ा हैरान था.

‘‘इसलिए कि मनुष्य को पक्षपात की आदत पड़ चुकी है. सो, हमारी हाईटैक मौडर्न सोसाइटी केवल ऊंची नस्ल के विदेशी कुत्तों को ही महत्त्व देती है. साईं आश्रम डौग एडौप्शन हो या फैंडीकोज, इन साइटों के सारे पेज इसी तरह के कुत्तों की तसवीरों से भरे पड़े हैं. सो, अब तुम भी मेरा रास्ता छोड़ दो, और जा कर विधाता से शिकायत करो,’’ रशीद ने अपनी बात रखी.

रशीद के तर्कों को सुन कर बेचारा गधा लाजवाब हो कर वापस जाने लगा. इतनी देर में स्वर्ग में एंट्री का समय समाप्त होने लगा और द्वार बंद किए जाने लगे.

रशीद के पैरोंतले मानो आकाश सरकने लगा. गधा भी पछता रहा था. गधे को सहसा एक आइडिया, फ्लैशलाइट की भांति कौंधा. जल्दी से उस ने कुत्ते की आवाज बना कर भौं…भौं…भौं… जोर व शोर से भूंकना शुरू कर दिया. रशीद को भी इशारा मिल गया था. उस ने तुरंत गधे  के गले में बांहें डाल दीं और बड़े गर्व से दूतों से बोला, ‘‘जी, यह मेरा पेट अलसेशियन गुड्डू है. यह एक फैंसी ड्रैस शो, मेरा मतलब है डौग फैंसी ड्रैस शो, में भाग लेने गया था. सहसा इसे मेरी मृत्यु की खबर मिली तो मेकअप और कौस्ट्यूम चेंज किए बिना ही मेरे पीछेपीछे भागता हुआ आ गया. प्रेम और वफा तो इसे कहते हैं. आई लव माई गुड्डू.’’

रशीद ने भावविभोर होने की अच्छी अदाकारी की. दूत प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके. ‘‘औफकोर्स, लव और वफादारी का यह अतुल्य नमूना है.’’ एक दूत ने प्रशंसाभरी निगाहों से उसे निहारते हुए कहा.

दूसरे दूत गधे की ओर देखते हुए नम्रता से बोले, ‘‘वाट अ वंडरफुल डौग. यू कैन टेक योर मास्टर विद यू. रशीद भी तुम्हारे साथ स्वर्ग जा सकता है. वी हैव नो औब्जैकशन.’’

‘‘हिपहिपहुरररे’’ रशीद और उस का गधा शीघ्रता से दौड़ कर स्वर्ग के भीतर प्रवेश कर गए.

उन दोनों में आज भी यह विवाद जारी है कि कौन किस की चतुराई के कारण स्वर्ग के मजे लूट रहा है.

पाठक महोदय, आप किस का झ्र साथ देंगे… Story In Hindi

Hindi Story: साब… ‘भारत’ नाम भी बदल दो!

Hindi Story: हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को किसी देशवासी ने एक पत्र लिखा, और फेंक दिया शायद, अब यह मुझे सड़क पर पड़ा मिला है. पहले तो सोचा, डाक के डिब्बे में डाल दूं. फिर जाने क्या मन में आया की खोला और पढ गया.किसी अज्ञात भारतीय ने मोदी जी की कार्यप्रणाली पर मन का गुबार निकाला है .मैं ने इसे पढ़कर सोचा, क्यों न हमारे प्रिय पाठक भी इसे एक नजर देख ले. सो नीचे पत्र शब्दश:प्रकाशित किया जा रहा है.

नरेंद्र मोदी साहब!

आप हमारे प्रधानमंत्री हैं.काफी अरसे से मैं आपके कामकाज पर नजरें गड़ाए हुए हूं .मैं देख रहा हूं आप उस धावक के जैसे व्यवहार कर रहे हैं, जो एक बार में ही 50, 100, 200, 500 मीटर की दौड़ में गोल्ड मेडल पाना चाहता है. मैं देख रहा हूं, आप उस बाॅलर की तरह है जो एक बाल में सारे खिलाड़ियों को आउट करने पर तुला हुआ है.

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क्या यह संभव है?आप जैसा गुणी आदमी, यह कैसी भूल कर रहा है. आप तो हीरे हैं!हीरे!! फिर अपनी चमक, आभा को बढ़ाने के बजाय ऐसी स्थिति क्यों पैदा किए जा रहे हैं की जो आपको देखे वह अपना सर पीटता रह जाए.
आप तो अपने समय काल मे सब कुछ बदल देने पर तुले हैं. यह बदल दो, वह बदल दो, इसे ठीक कर दो, उसे फैक दो… यह सब क्या है .

कभी योजना आयोग को भंग करने की तैयारी करते है. अभी नोटबंदी करते हैं, कभी पाकिस्तान पहुंचकर पाक को नमन करते हैं कभी पाक को नापाक बताते हैं…क्यों ? क्या इसलिए की इस रास्ते पर गांधी, नेहरू, इंदिरा और राजीव चले थे सिर्फ इसलिए सबकुछ बदल देना चाहते हैं ? योजना आयोग को भंग करके आप देश को ऐसी नवीन संस्था देने की चाहत रखते हैं ताकि हम देशवासियों आपको याद करें और उस पहले प्रधानमंत्री को भूल जाएं जो कांग्रेस का प्रतिनिधि था, जो खुद कांग्रेस था, भारत था, देश था. आपके इस देश में क्या हो रहा है कभी गाय मुद्दा बन जाती है कभी मुसलमान और हिंदू! आज नागरिक संहिता को लेकर सड़कों पर लोग निकल पड़े हैं मोदी साब… यह क्या हो रहा है संसद में आपके गृहमंत्री मंत्री कुछ कहते हैं और संसद के बाहर आप कुछ कहते हैं.

क्यों हर उस संस्था पर आपकी निगाह है, जो कांग्रेस ने खड़ी की है .संविधान में अगर कमियां हैं तो आप उसे सर्व अनुमति से दुरुस्त करें .आप तो एक सुयोग्य तीक्ष्ण दृष्टि वाले प्रधानमंत्री है. सब जानते हैं, सर्व जानकार हैं , आप सब कुछ बदलने पर क्यों तुले हुए हैं . इसलिए मुझे आपकी नियत पर शक हो रहा है.

मोदी साब… आप बड़ी चालाकी से वह सब कुछ करना चाहते हैं जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आपके ‘कान’ में पढता रहा है .मुझे तो लगता है,आप मोहन भागवत के हाथों की “कठपुतली’ मात्र हो. उन्हें खुश किए जा रहे हो .जबकि आपको इस देश ने प्रधानमंत्री चुना है .अब आपका दायित्व देश के प्रति है या किसी संस्था विशेष के प्रति, यह हम गरीब गुरबों को जरुर बताना चाहिए. आपकी आकर्षक बाते, आपके व्यक्तित्व, देश के प्रति समर्पण, विकास की भावना को देखकर हम लोगों ने आपको मत दिया था .

अब आप चतुराई का प्रदर्शन कर रहे हैं. कहते हैं हम सबकुछ सर्वसम्मति से कर रहे हैं. मुख्यमंत्रियों की राय ले रहे हैं .अरे! आपने तो वह सब कर दिखाया है जिसकी तो कल्पना तक हम आम लोगों ने नहीं की थी.

मोदी साब… आपको याद है की नहीं, हमारे देश का नाम भी अब बहुत प्राचीन हो गया है. लगे हाथ इसे भी बदल दीजिए. भारत नाम मे भी शायद आपको कोई बात नजर नहीं आती होगी. या इंडिया… को ही बदल दीजिए. इस पर भी कैबिनेट में फैसला ले लीजिए और ज्यादा हो तो आप अपने आका से परामर्श ले लीजिए.

आप में बदलाव और अपने नाम के प्रति बड़ा आकर्षण है .मुझे लगता है, आप जल्दी बाजी में है और जल्द से जल्द अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखाना चाहते हैं .इसलिए जो भाजपा, भाजपा के नारे लगाता है आपको पसंद नहीं आते और जो मोदी मोदी चिल्लाता है उसे आप सर आंखों पर बैठा लेते हैं.

गोकि मोदी साब… अब देश का नाम बदल ही दीजिए. आप अमर हो जाओगे .संसार और देश के इतिहास में आपका नाम हमेशा याद किया जाएगा कि आपने प्रधानमंत्री बनने के साथ भारतवासियों को भारत से निजात दिलाई और एक नए देश का, जो उज्जवल है, उजास से भरा है स्पूर्ति दायक है ऐसा नाम दिया है की सारे देशवासी गर्वान्वीत है! आपका भी काम हो जाएगा और हमारा भी कल्याण हो जाएगा.

अन्यथा, आप बेवजह परेशान रहेंगे .यह बदल दूं, वह बदल दूं. क्या करूं जो छा जाऊं क्या करूं की आका प्रसन्न हो, यह सोचते-सोचते आपका टैलेंट चुकने लगेगा और कुछ गलत हो जाएगा .मोदी साब… आप सौ सुनार की एक लोहार की तर्ज पर सीधे देश का नाम ही बदल दे. बस ! हो गया आपका काम.

क्या टुकुर टुकुर. आप को यह शोभा नहीं देता .यह योजना आयोग, यह राष्ट्रपिता, यह नेहरू की प्रतिमा यह इंदिरा गांधी ये राजीव टर्मिनल क्या-क्या बदलोगे भाई. साठ सालों में इन कांग्रेसियों ने हर चौक चौराहे पर कब्जा कर लिया है आप परेशान हो जाओगे.

मैं आपका एक बहुत बड़ा फैन हूं. मैं आपको नित्य प्रति दिन देखता हूं. सुनता हूं. मुझे लगा, आप परेशान हो, मैं आपके मनोविज्ञान को थोड़ा-थोड़ा समझ रहा हूं. इसलिए यह पत्र लिख रहा हूं .कहीं धृष्टता हुई तो क्षमा करना . अच्छा लगे तो लौटती डाक से एक लाईन का ही सही, ‘धन्यवाद’ का पत्र भेजना. Hindi Story

Hindi Story : अब पछताए होत क्या 

Hindi Story : दामोदर के ऊपर कामिनी समेत 20 औरतों ने छेड़छाड़ करने का केस दायर किया था. प्रधानमंत्री ने सख्ती दिखाते हुए उन्हें मंत्री पद से हटा दिया. चूंकि वे वरिष्ठ मंत्री रहे हैं इसलिए उन से इस्तीफा लिया गया और अदालत के फैसले के आधार पर उन के ऊपर कार्यवाही होगी.

इस सब में प्रधानमंत्री का बयान आग में घी का काम कर रहा था, ‘मैं ने प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारियों का पालन करते हुए दामोदर से इस्तीफा ले कर मंत्रिपरिषद से बाहर कर दिया है. अदालत बिना किसी दबाव के इस मसले पर फैसला लेगी.’

‘‘बड़ा ईमानदार बनता है. सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली,’’ दामोदर गुस्से में बड़बड़ा रहे थे. वे राजनीति में 50 साल यों ही नहीं गुजार चुके थे. उस में भी वे 30 साल से ज्यादा पत्रकारिता जगत में गुजार चुके थे. कामिनी को वे ही पत्रकारिता में लाए थे.

शाम को अपनी सफाई में दी गई प्रैस कौंफ्रैंस में दामोदर वहां आए पत्रकारों पर फट पड़े, ‘‘मैं खुद पत्रकार के रूप में सालों से आप के साथ रहा हूं और काम कर रहा हूं. इन आरोपों में कोई दम नहीं है, पर पत्रकार के रूप में आप सब जांच में सहयोग दें और सच को छापें.

‘‘मैं ने भी मंत्री पद से इसलिए इस्तीफा दिया क्योंकि न्यायपालिका में मेरा पूरा विश्वास है कि वह सही जांच करेगी. दूसरी बात यह है कि जिस दिन की बात कामिनी बता रही हैं, उस दौरान मैं प्रधानमंत्री के श्रीलंका दौरे को कवर करने वहां गया था और एक वक्त में मैं 2 जगह नहीं रह सकता.’’

‘‘फिर कामिनी ने आप पर आरोप क्यों लगाया?’’ एक पत्रकार का यह सवाल था.

‘‘आरोप तो कोई भी किसी पर लगा सकता है, मेरे इतने साल के पत्रकारिता और राजनीति के कैरियर में जब कोई गलती नहीं दिखाई दी तो मेरा सीधा चरित्र हनन कर डाला,’’ दामोदर मानो सफाई देते हुए बोले.

मीटिंग खत्म कर के वे कमरे में लौटे तो उन का कामिनी की पुरानी बातों और यादों पर ध्यान चला गया.

‘कामिनी, आप क्या लिखती हैं?’ दामोदर उस की रचनाओं और बायोडाटा को देखते हुए बोले थे.

‘कुछ नहीं बस आज से जुड़े विषयों पर छिटपुट रचनाएं लिखी हैं.’

‘अभी तुरंत कुछ लिख कर दीजिए,’ दामोदर 4 पेज देते हुए बोले थे.

कामिनी ने थोड़ी ही देर में एक ज्वलंत विषय पर रचना लिख कर दे दी थी. इस के बाद इतिहास से एमए पास कामिनी अकसर लिखती और उस की रचना छपने लगी थी.

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उस दिन भी कवरेज के लिए जब दामोदर कानपुर गए थे, तो कामिनी उन के साथ थी. बारिश हो रही थी. रात के 11 बजे जब वे कमरे में पहुंचे तो दोनों भीग चुके थे.

इस के बाद दामोदर ने कामिनी के साथ होटल में छक कर मजे लूटे थे. कामिनी ने भी भरपूर सहयोग दिया था. आग में घी तब पड़ा था, जब दामोदर कामिनी के बजाय राधा से शादी कर बैठे थे.

‘इतने दिनों तक मेरा इस्तेमाल किया, फिर…’ कामिनी बिफरते हुए बोली थी.

‘फिर क्या, हम दोनों ने एकदूसरे का इस्तेमाल किया है. तुम ने मेरे नाम का और मैं ने तुम्हारा. यह दुनिया ऐसे ही कारोबार पर चलती है,’ दामोदर सपाट लहजे में बोले थे.‘मैं आप को बदनाम कर दूंगी. आखिर उस राधा ने क्या दिया है आप को?’ कामिनी गुस्सा में बड़बड़ा रही थी.

‘तुम खुद टूट जाओगी. दूसरी बात यह कि मैं ने मंत्री की बेटी से शादी की है, तो अब सब अपनेआप मिल जाएगा,’ दामोदर सफाई देते हुए बोले थे.

फिर धीरेधीरे दोनों दूर हो गए थे. दामोदर ने सालों से कामिनी का चेहरा नहीं देखा था. इतने सालों के बाद वह न जाने कहां से टपक पड़ी थी.

अगर कामिनी ने अदालत में सुबूत पेश कर दिया तो उन्हें जेल होगी और हर्जाना भी देना पड़ेगा. सांसद की कुरसी भी छिन जाएगी.

‘क्या करूं…’ दामोदर सोच रहे थे कि उन्हें जग्गा याद आ गया. वे जग्गा के पास खुद पहुंचे थे.

‘‘आप जाइए, मैं इस का इलाज कर देता हूं. आप बस 20 औरतों के लिए 25 लाख रुपए का इंतजाम कर दें,’’ वह शराब पीता हुआ बोला.

‘‘पैसा कल तक पहुंच जाएगा. तुम काम शुरू कर दो,’’ दामोदर हामी भरते हुए बोले.

अगले दिन दोपहर के 12 बजे प्रैस कौंफ्रैंस कर उन सभी 20 औरतों ने नाम समेत माफी मांगी और आरोप वापस ले लिया.

अब तो दामोदर मंत्री पद पर दोबारा आ गए. इस मसले पर जब उन से पूछा गया तो वे झट बोल उठे, ‘‘वे सब

मेरी बहन जैसी हैं. मैं तो उन से कभी मिला नहीं, उन्हें जानता तक नहीं. बस राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल की गई मुहरें थीं. मुझे साजिश करने वाला चाहिए मुहरें नहीं.’’

‘‘मगर, वे सब औरतें कहां गईं?’’ एक पत्रकार ने पूछा.

‘‘यह सवाल आप उन से पूछिए जिन्होंने मुझ पर ऐसा घिनौना आरोप लगवाया है. वह तो भला हो उन बहनों का, जिन का जमीर जाग गया और आज मैं आप के सामने हूं. मेरे सामने खुदकुशी के सिवा कोई रास्ता नहीं था,’’ घडि़याली आंसू बहाते दामोदर के इस जवाब ने सब को चुप कर दिया था.

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दामोदर दोबारा सही हो गए, तो झट रात में जग्गा को फोन लगाया.

‘आप चिंता मत करो, सारा काम ठीक से हो गया है,’ जग्गा ने कहा.

‘‘फिर भी कहीं कुछ…’’ दामोदर थोड़े शंकित थे.

‘कोई अगरमगर नहीं… जग्गा पूरे पैसे ले कर आधा काम नहीं करता है.’

अब दामोदर ने चैन की सांस ली. अब वे कभी ऐसा कुछ नहीं करेंगे, ऐसा सोच कर वे हलका महसूस करने लगे और धीरेधीरे नींद के आगोश में चले गए. Hindi Story

Short Story : एक रिक्त कोना

Short Story :  सुशांत मेरे सामने बैठे अपना अतीत बयान कर रहे थे:

‘‘जीवन में कुछ भी तो चाहने से नहीं होता है. इनसान सोचता कुछ है होता कुछ और है. बचपन से ले कर जवानी तक मैं यही सोचता रहा…आज ठीक होगा, कल ठीक होगा मगर कुछ भी ठीक नहीं हुआ. किसी ने मेरी नहीं सुनी…सभी अपनेअपने रास्ते चले गए. मां अपने रास्ते, पिता अपने रास्ते, भाई अपने रास्ते और मैं खड़ा हूं यहां अकेला. सब के रास्तों पर नजर गड़ाए. कोई पीछे मुड़ कर देखता ही नहीं. मैं क्या करूं?’’

वास्तव में कल उन का कहां था, कल तो उन के पिता का था. उन की मां का था, वैसे कल उस के पिता का भी कहां था, कल तो था उस की दादी का.

विधवा दादी की मां से कभी नहीं बनी और पिता ने मां को तलाक दे दिया. जिस दादी ने अकेले रह जाने पर पिता को पाला था क्या बुढ़ापे में मां से हाथ छुड़ा लेते?

आज उन का घर श्मशान हो गया. घर में सिर्फ रात गुजारने आते हैं वह और उन के पिता, बस.

‘‘मेरा तो घर जाने का मन ही नहीं होता, कोई बोलने वाला नहीं. पानी पीना चाहो तो खुद पिओ. चाय को जी चाहे तो रसोई में जा कर खुद बना लो. साथ कुछ खाना चाहो तो बिस्कुट का पैकेट, नमकीन का पैकेट, कोई चिप्स कोई दाल, भुजिया खा लो.

‘‘मेरे दोस्तों के घर जाओ तो सामने उन की मां हाथ में गरमगरम चाय के साथ खाने को कुछ न कुछ जरूर ले कर चली आती हैं. किसी की मां को देखता हूं तो गलती से अपनी मां की याद आने लगती है.’’

‘‘गलती से क्यों? मां को याद करना क्या गलत है?’’

‘‘गलत ही होगा. ठीक होता तो हम दोनों भाई कभी तो पापा से पूछते कि हमारी मां कहां है. मुझे तो मां की सूरत भी ठीक से याद नहीं है, कैसी थीं वह…कैसी सूरत थी. मन का कोना सदा से रिक्त है… क्या मुझे यह जानने का अधिकार नहीं कि मेरी मां कैसी थीं जिन के शरीर का मैं एक हिस्सा हूं?

‘‘कितनी मजबूर हो गई होंगी मां जब उन्होंने घर छोड़ा होगा…दादी और पापा ने कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा होगा उन के लिए वरना 2-2 बेटों को यों छोड़ कर कभी नहीं जातीं.’’

‘‘आप की भाभी भी तो हैं. उन्होंने घर क्यों छोड़ दिया?’’

‘‘वह भी साथ नहीं रहना चाहती थीं. उन का दम घुटता था हमारे साथ. वह आजाद रहना चाहती थीं इसलिए शादी के कुछ समय बाद ही अलग हो गईं… कभीकभी तो मुझे लगता है कि मेरा घर ही शापित है. शायद मेरी मां ने ही जातेजाते श्राप दिया होगा.’’

‘‘नहीं, कोई मां अपनी संतान को श्राप नहीं देती.’’

‘‘आप कैसे कह सकती हैं?’’

‘‘क्योंकि मेरे पेशे में मनुष्य की मानसिकता का गहन अध्ययन कराया जाता है. बेटा मां का गला काट सकता है लेकिन मां मरती मर जाए, बच्चे को कभी श्राप नहीं देती. यह अलग बात है कि बेटा बहुत बुरा हो तो कोई दुआ भी देने को उस के हाथ न उठें.’’

‘‘मैं नहीं मानता. रोज अखबारों में आप पढ़ती नहीं कि आजकल मां भी मां कहां रह गई हैं.’’

‘‘आप खूनी लोगों की बात छोड़ दीजिए न, जो लोग अपराधी स्वभाव के होते हैं वे तो बस अपराधी होते हैं. वे न मां होते हैं न पिता होते हैं. शराफत के दायरे से बाहर के लोग हमारे दायरे में नहीं आते. हमारा दायरा सामान्य है, हम आम लोग हैं. हमारी अपेक्षाएं, हमारी इच्छाएं साधारण हैं.’’

बेहद गौर से वह मेरा चेहरा पढ़ते रहे. कुछ चुभ सा गया. जब कुछ अच्छा समझाती हूं तो कुछ रुक सा जाते हैं. उन के भाव, उन के चेहरे की रेखाएं फैलती सी लगती हैं मानो कुछ ऐसा सुना जो सुनना चाहते थे.

आंखों में आंसू आ रहे थे सुशांत की.

मुझे यह सोच कर बहुत तकलीफ होती है कि मेरी मां जिंदा हैं और मेरे पास नहीं हैं. वह अब किसी और की पत्नी हैं. मैं मिलना चाह कर भी उन से नहीं मिल सकता. पापा से चोरीचोरी मैं ने और भाई ने उन्हें तलाश किया था. हम दोनों मां के घर तक भी पहुंच गए थे लेकिन मां हो कर भी उन्होंने हमें लौटा दिया था… सामने पा कर भी उन्होंने हमें छुआ तक नहीं था, और आप कहती हैं कि मां मरती मर जाए पर अपनी संतान को…’’

‘‘अच्छा ही तो किया आप की मां ने. बेचारी, अपने नए परिवार के सामने आप को गले लगा लेतीं तो क्या अपने परिवार के सामने एक प्रश्नचिह्न न खड़ा कर देतीं. कौन जाने आप के पापा की तरह उन्होंने भी इस विषय को पूरी तरह भुला दिया हो. क्या आप चाहते हैं कि वह एक बार फिर से उजड़ जाएं?’’

सुशांत अवाक् मेरा मुंह देखते रह गए थे.

‘‘आप बचपना छोड़ दीजिए. जो छूट गया उसे जाने दीजिए. कम से कम आप तो अपनी मां के साथ अन्याय न कीजिए.’’

मेरी डांट सुन कर सुशांत की आंखों में उमड़ता नमकीन पानी वहीं रुक गया था.

‘‘इनसान के जीवन में सदा वही नहीं होता जो होना चाहिए. याद रखिए, जीवन में मात्र 10 प्रतिशत ऐसा होता है जो संयोग द्वारा निर्धारित किया जाता है, बाकी 90 प्रतिशत तो वही होता है जिस का निर्धारण व्यक्ति स्वयं करता है. अपना कल्याण या अपना सर्वनाश व्यक्ति अपने ही अच्छे या बुरे फैसले द्वारा करता है.

‘‘आप की मां ने समझदारी की जो आप को पहचाना नहीं. उन्हें अपना घर बचाना चाहिए जो उन के पास है…आप को वह गले क्यों लगातीं जबकि आप उन के पास हैं ही नहीं.

‘‘देखिए, आप अपनी मां का पीछा छोड़ दीजिए. यही मान लीजिए कि वह इस संसार में ही नहीं हैं.’’

‘‘कैसे मान लूं, जब मैं ने उन का दाहसंस्कार किया ही नहीं.’’

‘‘आप के पापा ने तो तलाक दे कर रिश्ते का दाहसंस्कार कर दिया था न… फिर अब आप क्यों उस राख को चौराहे का मजाक बनाना चाहते हैं? आप समझते क्यों नहीं कि जो भी आप कर रहे हैं उस से किसी का भी भला होने वाला नहीं है.’’

अपनी जबान की तल्खी का अंदाज मुझे तब हुआ जब सुशांत बिना कुछ कहे उठ कर चले गए. जातेजाते उन्होंने यह भी नहीं बताया कि अब कब मिलेंगे वह. शायद अब कभी नहीं मिलेंगे.

सुशांत पर तरस आ रहा था मुझे क्योंकि उन से मेरे रिश्ते की बात चल रही थी. वह मुझ से मिलने मेरे क्लीनिक में आए थे. अखबार में ही उन का विज्ञापन पढ़ा था मेरे पिताजी ने.

‘‘सुशांत तुम्हें कैसा लगा?’’ मेरे पिता ने मुझ से पूछा.

‘‘बिलकुल वैसा ही जैसा कि एक टूटे परिवार का बच्चा होता है.’’

पिताजी थोड़ी देर तक मेरा चेहरा पढ़ते रहे फिर कहने लगे, ‘‘सोच रहा हूं कि बात आगे बढ़ाऊं या नहीं.’’

पिताजी मेरी सुरक्षा को ले कर परेशान थे…बिलकुल वैसे जैसे उन्हें होना चाहिए था. सुशांत के पिता मेरे पिता को पसंद थे. संयोग से दोनों एक ही विभाग में कार्य करते थे उसी नाते सुशांत 1-2 बार मुझे मेरे क्लीनिक में ही मिलने चले आए थे और अपना रिक्त कोना दिखा बैठे थे.

मैं सुशांत को मात्र एक मरीज मान कर भूल सी गई थी. उस दिन मरीज कम थे सो घर जल्दी आ गई. फुरसत थी और पिताजी भी आने वाले थे इसलिए सोचा, क्यों न आज  चाय के साथ गरमागरम पकौडि़यां और सूजी का हलवा बना लूं.

5 बजे बाहर का दरवाजा खुला और सामने सुशांत को पा कर मैं स्तब्ध रह गई.

‘‘आज आप क्लीनिक से जल्दी आ गईं?’’ दरवाजे पर खड़े हो सुशांत बोले, ‘‘आप के पिताजी मेरे पिताजी के पास गए हैं और मैं उन की इजाजत से ही घर आया हूं…कुछ बुरा तो नहीं किया?’’

‘‘जी,’’ मैं कुछ हैरान सी इतना ही कह पाई थी कि चेहरे पर नारी सुलभ संकोच तैर आया था.

अंदर आने के मेरे आग्रह पर सुशांत दो कदम ही आगे बढे़ थे कि फिर कुछ सोच कर वहीं रुक गए जहां खड़े थे.

‘‘आप के घर में घर जैसी खुशबू है, प्यारीप्यारी सी, मीठीमीठी सी जो मेरे घर में कभी नहीं होती है.’’

‘‘आप उस दिन मेरी बातें सुन कर नाराज हो गए होंगे यही सोच कर मैं ने भी फोन नहीं किया,’’ अपनी सफाई में मुझे कुछ तो कहना था न.

‘‘नहीं…नाराजगी कैसी. आप ने तो दिशा दी है मुझे…मेरी भटकन को एक ठहराव दिया है…आप ने अच्छे से समझा दिया वरना मैं तो बस भटकता ही रहता न…चलिए, छोडि़ए उन बातों को. मैं सीधा आफिस से आ रहा हूं, कुछ खाने को मिलेगा.’’

पता नहीं क्यों, मन भर आया मेरा. एक लंबाचौड़ा पुरुष जो हर महीने लगभग 30 हजार रुपए कमाता है, जिस का अपना घर है, बेघर सा लगता है, मानो सदियों से लावारिस हो.

पापा का और मेरा गरमागरम नाश्ता मेज पर रखा था. अपने दोस्तों के घर जा कर उन की मां के हाथों में छिपी ममता को तरसी आंखों से देखने वाला पुरुष मुझ में भी शायद वही सब तलाश रहा था.

‘‘आइए, बैठिए, मैं आप के लिए चाय लाती हूं. आप पहले हाथमुंह धोना चाहेंगे…मैं आप के लिए तौलिया लाऊं?’’

मैं हतप्रभ सी थी. क्या कहूं और क्या न कहूं. बालक की तरह असहाय से लग रहे थे सुशांत मुझे. मैं ने तौलिया पकड़ा दिया तब एकटक निहारते से लगे.

मैं ने नाश्ता प्लेट में सजा कर सामने रखा. खाया नहीं बस, देखते रहे. मात्र चम्मच चलाते रहे प्लेट में.

‘‘आप लीजिए न,’’ मैं ने खाने का आग्रह किया.

वह मेरी ओर देख कर कहने लगे, ‘‘कल एक डिपार्टमेंटल स्टोर में मेरी मां मिल गईं. वह अकेली थीं इसलिए उन्होंने मुझे पुकार लिया. उन्होंने बड़े प्यार से मेरा हाथ पकड़ लिया था लेकिन मैं ने अपना हाथ छुड़ा लिया.’’

सुशांत की बातें सुन कर मेरी तो सांस रुक सी गई. बरसों बाद मां का स्पर्श कैसा सुखद लगा होगा सुशांत को.

सहसा सुशांत दोनों हाथों में चेहरा छिपा कर बच्चे की तरह रो पड़े. मैं देर तक उन्हें देखती रही. फिर धीरे से सुशांत के कंधे पर हाथ रखा. सहलाती भी रही. काफी समय लग गया उन्हें सहज होने में.

‘‘मैं ने ठीक किया ना?’’ मेरा हाथ पकड़ कर सुशांत बोले, ‘‘आप ने कहा था न कि मुझे अपनी मां को जीने देना चाहिए इसलिए मैं अपना हाथ खींच कर चला आया.’’

क्या कहती मैं? रो पड़ी थी मैं भी. सुशांत मेरा हाथ पकड़े रो रहे थे और मैं उन की पीड़ा, उन की मजबूरी देख कर रो रही थी. हम दोनों ही रो रहे थे. कोई रिश्ता नहीं था हम में फिर भी हम पास बैठे एकदूसरे की पीड़ा को जी रहे थे. सहसा मेरे सिर पर सुशांत का हाथ आया और थपक दिया.

‘‘तुम बहुत अच्छी हो. जिस दिन से तुम से मिला हूं ऐसा लगता है कोई अपना मिल गया है. 10 दिनों के लिए शहर से बाहर गया था इसलिए मिलने नहीं आ पाया. मैं टूटाफूटा इनसान हूं…स्वीकार कर जोड़ना चाहोगी…मेरे घर को घर बना सकोगी? बस, मैं शांति व सुकून से जीना चाहता हूं. क्या तुम भी मेरे साथ जीना चाहोगी?’’

डबडबाई आंखों से मुझे देख रहे थे सुशांत. एक रिश्ते की डोर को तोड़ कर दुखी भी थे और आहत भी. मुझ में सुशांत क्याक्या तलाश रहे होंगे यह मैं भलीभांति महसूस कर सकती थी. अनायास ही मेरा हाथ उठा और दूसरे ही पल सुशांत मेरी बांहों में समाए फिर उसी पीड़ा में बह गए जिसे मां से हाथ छुड़ाते समय जिया था.

‘‘मैं अपनी मां से हाथ छुड़ा कर चला आया? मैं ने अच्छा किया न…शुभा मैं ने अच्छा किया न?’’ वह बारबार पूछ रहे थे.

‘‘हां, आप ने बहुत अच्छा किया. अब वह भी पीछे मुड़ कर देखने से बच जाएंगी…बहुत अच्छा किया आप ने.’’

एक तड़पतेबिलखते इनसान को किसी तरह संभाला मैं ने. तनिक चेते तब खुद ही अपने को मुझ से अलग कर लिया.

शीशे की तरह पारदर्शी सुशांत का चरित्र मेरे सामने था. कैसे एक साफसुथरे सचरित्र इनसान को यों ही अपने जीवन से चला जाने देती. इसलिए मैं ने सुशांत की बांह पकड़ ली थी.

साड़ी के पल्लू से आंखों को पोंछने का प्रयास किया तो सहसा सुशांत ने मेरा हाथ पकड़ लिया और देर तक मेरा चेहरा निहारते रहे. रोतेरोते मुसकराने लगे. समीप आ कर धीरे से गरदन झुकाई और मेरे ललाट पर एक प्रगाढ़ चुंबन अंकित कर दिया. फिर अपने ही हाथों से अपने आंसू पोंछ लिए.

अपने लिए मैं ने सुशांत को चुन लिया. उन्हें भावनात्मक सहारा दे पाऊंगी यह विश्वास है मुझे. लेकिन उन के मन का वह रिक्त स्थान कभी भर पाऊंगी ऐसा विश्वास नहीं क्योंकि संतान के मन में मां का स्थान तो सदा सुरक्षित होता है न, जिसे मां के सिवा कोई नहीं भर सकता. Short Story

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