Hindi Kavita : हंसते गाते बिना बात के खुश होते
काश की हम पागल होते

उच्चाकांक्षाओं से ना घायल होते
काश की हम पागल होते

समझ ना पाते लोगों के ताने
करते काम सब मनमाने

सब हमको बस दूर भगाते
तब शायद हम खुद को पा जाते

हर पल समाज के ना पहरे होते
दिल के ज़ख्म ना इतने गहरे होते

मर्यादाओं की भी ना मजबूरी होती
सोच और शब्द के बीच ना कुछ दूरी होती

ना ऊंचे ऊंचे सपने होते
झूठ मूठ के ना अपने होते

जान बूझ कर अंजान न बनते
झूठी महफिल के मेहमान न बनते

षडयंत्रों के व्यूह से घिरे न होते
हम कुछ पाने को इतना गिरे न होते

बिन मर्जी कोई काम न करते
बड़े बड़े लोगो से तनिक ना डरते

मन पर इतने अवसाद ना होते
बोझिल से दिन रात ना होते

मन में इतने अंतर्द्वंद ना होते
जीवन में इतने दंद फंद ना होते

ऊंची चौखट पे ही माथा टेके
काश हम इतने होशियार ना होते

लेखिका : प्रज्ञा पांडेय मनु

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 साल)
USD99USD49
 
सब्सक्राइब करें

सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
 

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
USD150USD129
 
सब्सक्राइब करें

सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
  • 24 प्रिंट मैगजीन
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...